श्वानचित्रकयोः क्रीडा शत्रोर्हितमिवाहितम्।अवसरं प्राप्य हन्ति हि श्वेततां कुतः कज्जलं ॥१।
व्याकरण सम्मत अर्थ एवं विश्लेषण
1. श्वानचित्रकयोः क्रीडा (कुत्ते और लकड़बग्घे की क्रीडा/अठखेलियाँ):
- व्याकरण: 'श्वान' (कुत्ता) और 'चित्रक' (लकड़बग्घा/चीता - यहाँ लकड़बग्घे के अर्थ में प्रयुक्त) शब्दों में द्वन्द्व समास है। षष्ठी विभक्ति, द्विवचन।
- भाव: इन दोनों के बीच का खेल प्राकृतिक रूप से सम्भव नहीं है, क्योंकि यह एक शिकारी और शिकार का सम्बन्ध है।
2. शत्रोर्हितमिवाहितम् (शत्रु के हित प्रदर्शन के समान अनिष्टकारी):
- व्याकरण: शत्रु + हितम् + इव + अहितम्। (सन्धि विच्छेद)।
- भाव: जैसे शत्रु द्वारा दिखाया गया प्रेम या 'हित' वास्तव में 'अहित' (नुकसान) की तैयारी होता है, वैसे ही इनका मेल-जोल भी छलावा है।
3. अवसरं प्राप्य हन्ति हि (अवसर पाकर वह निश्चित ही मार देता है):
- व्याकरण: 'प्राप्य' में 'प्र' उपसर्ग, 'आप्' धातु और 'ल्यप्' प्रत्यय है। 'हन्ति' (हनु हिंसागत्योः) लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।
- भाव: लकड़बग्घा (दुष्ट) अपनी प्रकृति नहीं बदलता; जैसे ही उसे कमजोरी या मौका मिलता है, वह प्रहार कर देता है।
4. कज्जलं श्वेततां कुतः (काजल श्वेत/सफेद कैसे हो सकता है?):
- व्याकरण: 'श्वेतता' में 'तल्' प्रत्यय (भाववाचक संज्ञा)। 'कुतः' एक अव्यय है जिसका अर्थ है 'कहाँ से' या 'कैसे'।
- भाव: यह एक दृष्टान्त अलंकार है। जैसे काजल का गुण ही काला होना है और वह कभी सफेद नहीं हो सकता, वैसे ही दुष्ट या जन्मजात शत्रु का स्वभाव कभी मित्रतापूर्ण नहीं हो सकता।
निष्कर्ष-
इस श्लोक के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि स्वाभाविक शत्रुता (Natural Enmity) कभी भी वास्तविक मित्रता में नहीं बदल सकती। दिखावे की अठखेलियाँ केवल घात लगाने का एक माध्यम मात्र होती हैं।
संशोधित श्लोक (अनुष्टुप छंद)
श्वानचित्रकयोः क्रीडा, शत्रोर्हितमिवाहितम्।
कज्जलं श्वेततां याति, नावकाशं च विन्दति॥
व्याख्या और व्याकरण
अनुष्टुप छंद के प्रत्येक चरण में 8 वर्ण होते हैं। इसका मुख्य लक्षण है:
पंचमं लघु सर्वत्र सप्तमं द्विचतुर्थयोः।
गुरु षष्ठं च पादानां शेषेष्वनियमो मतः॥
- प्रथम पंक्ति: "श्वान-चित्र-क-योः क्री-डा" (8 वर्ण) - यह शत्रुओं के बीच की दिखावटी मित्रता को दर्शाती है।
- द्वितीय पंक्ति: "श-त्रोर्-हि-त-मि-वा-हि-तम्" (8 वर्ण) - यह बताती है कि शत्रु का 'हित' वास्तव में 'अहित' ही होता है।
- तृतीय पंक्ति: "कज्-ज-लं श्वे-त-तां या-ति" (8 वर्ण) - काजल कभी सफेद नहीं हो सकता (स्वभाव नहीं बदलता)।
- चतुर्थ पंक्ति: "ना-व-का-शं च विन्-द-ति" (8 वर्ण) - अवसर मिलते ही वह (शत्रु/काजल) अपना असली काला रंग या घातक स्वभाव दिखा देता है।
भावार्थ
कुत्ते और चीते की खेल जैसी मित्रता वैसी ही है जैसे शत्रु द्वारा किया गया उपकार—जो वास्तव में विनाशकारी होता है। जिस प्रकार काजल को रगड़ने पर वह कभी अपनी कालिमा छोड़कर श्वेत (सफेद) नहीं होता, उसी प्रकार दुष्ट शत्रु अवसर मिलते ही अपनी प्रकृति के अनुसार घात ही करता है।
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