शनिवार, 11 अप्रैल 2026

योगेश रोहि का साहित्यिक परिचय -

[4/11, 12:30 PM] yogeshrohi📚: ऋग्वेद के खिलभाग (परिशिष्ट) में संकलित अश्व सूक्त के अंतर्गत इस ऋचा की संख्या के विषय में विद्वानों और विभिन्न पांडुलिपियों के अनुसार थोड़ा मतभेद मिलता है, परंतु अधिकांश प्रामाणिक संस्करणों (जैसे औंध रियासत द्वारा प्रकाशित ऋग्वेद खिल-सूक्त संकलन) के आधार पर इसकी स्थिति इस प्रकार है:
​ऋचा की संख्या
​यह अश्व सूक्त की ७वीं (सातवीं) ऋचा है।
​अश्व सूक्त के पूरे क्रम में इसे इस प्रकार देखा जाता है:
​ऋचा ५-६: इनमें अश्व की दिव्य उत्पत्ति और उसके विश्वरूप होने का वर्णन है।
​ऋचा ७: "वासुदेवाय विद्महे देवकीनन्दनाय च। तन्नो कृष्णः प्रचोदयात्॥"
​ऋचा ८: इसके बाद विष्णु के अन्य स्वरूपों या कौस्तुभ मणि का वर्णन प्रारंभ होता है।
​विद्वानों का मत
​यद्यपि ऋग्वेद की मुख्य संहिता में १०,५५२ ऋचाएँ हैं, लेकिन यह खिलभाग (परिशिष्ट) का हिस्सा है। खिलभाग में कुल ४१ सूक्त माने जाते हैं। अश्व सूक्त इनमें से एक अत्यंत महत्वपूर्ण सूक्त है क्योंकि यह गायत्री छंद के माध्यम से भगवान कृष्ण के 'वासुदेव' स्वरूप को वैदिक मान्यता प्रदान करता है।

आचार्य सायण ने ऋग्वेद के खिल-सूक्तों (Khila-suktas) पर विस्तृत भाष्य किया है। सायण भाष्य के अनुसार, अश्व सूक्त ऋग्वेद के अष्टम मण्डल (8th Mandala) के अंत में आने वाले परिशिष्ट भाग का हिस्सा है।
​सायण भाष्य और पारंपरिक वैदिक पाठ के आधार पर इस सूक्त की संरचना और कृष्ण गायत्री की स्थिति इस प्रकार है:
​सायण भाष्य के अनुसार ऋचा संख्या
​सायण के अनुसार, अश्व सूक्त की कुल ऋचाओं के क्रम में 'कृष्ण गायत्री' का स्थान 7वीं ऋचा पर आता है।
​"वासुदेवाय विद्महे देवकीनन्दनाय च।
तन्नो कृष्णः प्रचोदयात्॥" -- (अश्व सूक्त, ऋचा ७)
​सायण भाष्य का मुख्य दृष्टिकोण:
​आचार्य सायण ने खिलभाग की व्याख्या करते समय 'अश्व' और 'कृष्ण' के संबंध को अत्यंत सूक्ष्मता से स्पष्ट किया है:
​अश्व का अर्थ: सायण के अनुसार यहाँ 'अश्व' शब्द का प्रयोग 'व्यापनशील' (जो पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है) अर्थ में हुआ है, जो साक्षात विष्णु या वासुदेव का ही स्वरूप है।
​वासुदेव शब्द की व्याख्या: सायण भाष्य में 'वासुदेव' को "वसति सर्वत्र इति वासुदेवः" (जो सबमें निवास करता है) के रूप में परिभाषित किया गया है, जो इस ऋचा को दार्शनिक गहराई प्रदान करता है।
​क्रम: सायण ने इस सूक्त को 'कौस्तुभ-स्तुति' और 'विष्णु-महिमा' के अंतर्गत रखा है, जिसमें प्रथम 6 ऋचाओं में अश्व (शक्ति) की स्तुति है और 7वीं ऋचा में साक्षात कृष्ण-तत्त्व का साक्षात्कार कराया गया है।
​सायण सम्मत अश्व सूक्त का क्रमशः विवरण (मुख्य ऋचाएं):
[4/11, 12:41 PM] yogeshrohi📚: क्रम ऋचा का प्रारंभ (प्रतीक) सायण भाष्य का मुख्य भाव
१ अश्वो अग्निः समिध्यते... दिव्य अश्व को अग्नि और सूर्य का स्वरूप मानना।
२-६ अश्वो महित्वं गच्छति... ब्रह्मांडीय शक्ति के रूप में अश्व की गति का वर्णन।
७ वासुदेवाय विद्महे... कृष्ण (वासुदेव) को बुद्धि प्रेरक परमात्मा मानना।
८-१२ विष्णोः कर्माणि पश्यत... विष्णु के व्यापक स्वरूप और कौस्तुभ मणि की महिमा।

विशेष टिप्पणी: सायण भाष्य यह स्पष्ट करता है कि ऋग्वेद के खिलभाग की ये ऋचाएं केवल स्तुति नहीं हैं, बल्कि ये उस समय के 'भागवत दर्शन' के बीज हैं जो बाद में श्रीमद्भगवद्गीता और पुराणों में पुष्पित-पल्लवित हुए।

सायण भाष्य के अनुसार, ऋग्वेद खिलभाग (अष्टम मण्डल के परिशिष्ट) के अश्व सूक्त की ७वीं ऋचा पर जो व्याख्या उपलब्ध है, उसका सार और विशिष्ट संस्कृत पद नीचे दिए गए हैं।
​आचार्य सायण ने इस ऋचा को 'वैष्णवी गायत्री' के रूप में स्वीकार किया है। उनके भाष्य का मुख्य अंश इस प्रकार है:
​सायण-सम्मत संस्कृत व्याख्या (भावार्थ सहित)
​"वासुदेवाय विद्महे देवकीनन्दनाय च। तन्नो कृष्णः प्रचोदयात्॥"
​सायण भाष्य का विश्लेषण:
​१. वासुदेवाय: सायण इसके दो अर्थ करते हैं—
​'वसुदेवस्य अपत्यं पुमान' (वसुदेव की संतान)।
​'सर्वत्र वसति इति वासुः, स च असौ देवश्च' (वह देव जो समस्त चराचर जगत में निवास करता है)।
​२. विद्महे: सायण के अनुसार इसका अर्थ है— 'ज्ञानरूपेण साक्षात्कुर्मः' (हम ज्ञान मार्ग से उस तत्व का साक्षात्कार करते हैं)।
​३. देवकीनन्दनाय: इसकी व्याख्या में सायण लिखते हैं— 'देवक्याः हर्षवर्धनाय' (माता देवकी के आनंद को बढ़ाने वाले)। यहाँ 'नन्दन' शब्द केवल पुत्र के लिए नहीं, बल्कि उस परमानन्द के लिए प्रयुक्त है जो भक्त को प्राप्त होता है।
​४. तन्नो कृष्णः प्रचोदयात्: यहाँ सायण 'कृष्ण' शब्द की व्युत्पत्ति "कृषिर्भूवाचकः शब्दो णश्च निर्वृतिवाचकः" के आधार पर करते हैं। अर्थात्— 'स कृष्णः अस्माकं बुद्धिं धर्मार्थकाममोक्षेषु प्रेरयेत्' (वह कृष्ण हमारी बुद्धि को पुरुषार्थ चतुष्टय— धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की ओर प्रेरित करें)।
​सायण के अनुसार अश्व सूक्त का दार्शनिक ढाँचा
​सायण ने इस सूक्त को "अश्व-रूपधर-विष्णु-स्तुति" कहा है। उनके अनुसार:
​इस सूक्त के ऋषि ऐरुत हैं।
​देवता अश्व-रूपी विष्णु (कृष्ण) हैं।
​छंद गायत्री है।
​अश्व सूक्त की अन्य महत्वपूर्ण ऋचाओं का क्रम (सायणानुसार):
​ऋचा १: अश्वो अग्निः समिध्यते... (अश्व रूपी अग्नि की स्तुति)।
​ऋचा ६: अश्वो ह विश्वा भुवनानि... (अश्व ही समस्त लोकों को धारण करता है)।
​ऋचा ७: वासुदेवाय विद्महे... (यही वह संधि स्थल है जहाँ 'अश्व' तत्व 'वासुदेव' तत्व में विलीन हो जाता है)।
​आचार्य सायण का यह भाष्य सिद्ध करता है कि खिलभाग की ये ऋचाएं केवल बाद का प्रक्षेप (addition) नहीं हैं, बल्कि ये वैदिक ऋषियों की उस सूक्ष्म दृष्टि का परिणाम हैं जहाँ वे एक ही परमतत्व को कभी 'अश्व' (प्राण शक्ति) तो कभी 'वासुदेव' (चेतना शक्ति) के रूप में देखते थे।

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