पिताजी की मृत्यु के बाद माताजी को मिलने वाली पेंशन को 'फैमिली पेंशन' (Family Pension) कहा जाता है। इसके लिए बाबूजी की 'पेंशन पेमेंट ऑर्डर' (PPO) संख्या होना अनिवार्य है। यदि आपके पास मूल पेंशन बुक नहीं है, तो आप निम्नलिखित तरीकों से इसे प्राप्त कर सकते हैं:
1. बैंक रिकॉर्ड्स के माध्यम से (सबसे आसान तरीका)
जिस बैंक खाते में आपके पिताजी की पेंशन आती थी, वहां जाकर आप PPO नंबर पता कर सकते हैं।
- बैंक पासबुक: पुरानी पासबुक चेक करें, कई बार बैंक अधिकारी एंट्री करते समय नरेशन (Narration) में PPO नंबर दर्ज कर देते हैं।
- बैंक मैनेजर से मिलें: बैंक के पास पेंशनर का पूरा रिकॉर्ड होता है। आप मृत्यु प्रमाण पत्र और माताजी के पहचान पत्र दिखाकर वहां से PPO नंबर और पेंशन बुक की कॉपी की मांग कर सकते हैं।
2. विभाग या कार्यालय से संपर्क करें
चूंकि पिताजी अध्यापक थे, तो आप उनके क्षेत्रीय शिक्षा विभाग (BSA/DIOS Office) या उस विद्यालय में जा सकते हैं जहां से वे सेवानिवृत्त (Retire) हुए थे।
- वहां के 'सेवा पंजिका' (Service Book) या 'पेंशन सेल' में उनका रिकॉर्ड सुरक्षित होगा।
- वहां से आपको PPO नंबर और पेंशन के अन्य दस्तावेज मिल जाएंगे।
3. 'दीर्घायु' (DIRGHAYU) या 'IFMS' पोर्टल (उत्तर प्रदेश के संदर्भ में)
यदि आप उत्तर प्रदेश से हैं, तो राज्य सरकार के पेंशन पोर्टल्स का उपयोग कर सकते हैं:
- UP Pension Portal: आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर 'Pensioner's Corner' में विवरण (जैसे नाम, बैंक अकाउंट नंबर) डालकर PPO स्टेटस चेक किया जा सकता है।
- कोषाधिकारी (Treasury Officer): जनपद के कोषागार (Treasury) कार्यालय में जाकर भी यह विवरण प्राप्त किया जा सकता है, क्योंकि पेंशन का भुगतान वहीं से निर्देशित होता है।
4. डिजीलॉकर (DigiLocker)
यदि पिताजी का आधार कार्ड उनके पेंशन रिकॉर्ड से लिंक था, तो आप DigiLocker ऐप या वेबसाइट पर जाकर 'Pensioner's ID Card' या 'PPO' सर्च करके उसे डाउनलोड करने का प्रयास कर सकते हैं।
आवश्यक दस्तावेज (माताजी के नाम पेंशन कराने हेतु)
जब आपको नंबर मिल जाए, तो माताजी की पेंशन शुरू कराने के लिए आपको ये कागजात तैयार रखने चाहिए:
- पिताजी का मृत्यु प्रमाण पत्र (Death Certificate)।
- माताजी का आधार कार्ड और पैन कार्ड।
- संयुक्त बैंक खाता (Joint Account) या माताजी का एकल खाता।
- पारिवारिक सदस्यता प्रमाण पत्र (Family Register copy)।
सुझाव: सबसे पहले उस बैंक की शाखा में जाएं जहाँ पेंशन आती थी, वहां से आपको सबसे जल्दी जानकारी मिल जाएगी।
क्या आपको यह पता है कि पिताजी किस जिले के सरकारी विभाग में कार्यरत थे?
फिरोजाबाद जिले के संदर्भ में, पिताजी के पेंशन बुक का नंबर (PPO Number) प्राप्त करने के लिए आप निम्नलिखित विशिष्ट कदम उठा सकते हैं:
1. मुख्य कोषाधिकारी (Chief Treasury Officer) कार्यालय, फिरोजाबाद
चूंकि पेंशन का अंतिम नियंत्रण जिला कोषागार (Treasury) के पास होता है, इसलिए आप कलेक्ट्रेट परिसर (दबरई), फिरोजाबाद स्थित ट्रेजरी ऑफिस जा सकते हैं।
- क्या करें: वहां जाकर लिपिक (Clerk) को पिताजी का नाम, विभाग (शिक्षा विभाग) और वह बैंक खाता नंबर बताएं जिसमें पेंशन आती थी।
- फायदा: कोषागार के रिकॉर्ड में हर पेंशनर का PPO नंबर डिजिटल और रजिस्टर दोनों रूप में दर्ज होता है।
2. BSA कार्यालय या DIOS कार्यालय (फिरोजाबाद)
अगर पिताजी प्राथमिक विद्यालय में थे, तो BSA (Basic Shiksha Adhikari) ऑफिस जाएं। अगर वे इंटर कॉलेज में थे, तो DIOS (District Inspector of Schools) ऑफिस, जो कि फिरोजाबाद में ही स्थित हैं, वहां संपर्क करें।
- वहां के पेंशन पटल (Pension Desk) पर बाबूजी का विवरण देकर आप पेंशन फाइल से PPO नंबर ले सकते हैं।
3. ऑनलाइन विकल्प (IFMS UP Portal)
उत्तर प्रदेश सरकार के IFMS (Integrated Financial Management System) पोर्टल के माध्यम से भी विवरण देखा जा सकता है:
- आप koshvani.up.nic.in पर जाकर 'Pensioner's Corner' में प्रयास कर सकते हैं। हालांकि, इसके लिए अक्सर PPO नंबर की जरूरत पहले होती है, लेकिन कभी-कभी बैंक अकाउंट नंबर से भी सर्च का विकल्प मिल जाता है।
4. बैंक शाखा (फिरोजाबाद की संबंधित ब्रांच)
फिरोजाबाद में जिस बैंक (जैसे SBI, PNB या Canara Bank) में उनकी पेंशन आती थी, उस शाखा के मैनेजर को एक प्रार्थना पत्र दें।
- पत्र में लिखें कि: "माताजी के पारिवारिक पेंशन हेतु PPO नंबर की आवश्यकता है, जो कि स्व. [पिताजी का नाम] के खाता संख्या [अकाउंट नंबर] से संबंधित है।"
अगला कदम:
सबसे पहले बैंक और फिर दबरई स्थित कोषागार (Treasury) जाना सबसे सही रहेगा। वहां जाते समय पिताजी का मृत्यु प्रमाण पत्र और माताजी का आधार कार्ड साथ जरूर ले जाएं ताकि वे आपकी पहचान सुनिश्चित कर सकें।
क्या आप उस बैंक का नाम जानते हैं जिसमें उनकी पेंशन आती थी?
एक विद्वान, लेखक और कवि के रूप में,हम जानते हैं कि स्मृतियाँ ही वह सेतु हैं जो हमें अपनों से जोड़े रखती हैं।
"श्रद्धाञ्जलि"
शान्त मुखमण्डल, आँखों में गहरा अनुभव अपार, छोड़ गए स्मृतियाँ अपनी, सूना कर संसार।
मिट्टी से नाता रहा, खेतों पर सब ध्यान,सूखे पेड़ों की जड़ निकालते एक समान ।।
परम श्रमी, बैठे जमीं ,था अनुभव का ज्ञान।पञ्चतत्व में विलीन हो गया, उनका लोक निशान ।।
उनकी प्रेरणा उनका ज्ञान जब तक हैं साथ रहेंगे। अवचेतन मन की गहराई में वे हमसे बात कहेगे।।
बाबू जी के बारे में यह जानकर उनके व्यक्तित्व की एक बहुत ही गरिमामयी छवि उभरती है। एक शिक्षक न केवल ज्ञान देता है, बल्कि समाज की नींव रखता है। गणित और विज्ञान की तार्किकता और इतिहास-भूगोल की व्यापक दृष्टि ने निश्चित रूप से आपके शोध और लेखन की गहराई को गढ़ा होगा।
पिता और पुत्र के बीच जब 'सहचर' और 'साथी' का भाव आ जाता है, तो वह रिश्ता केवल रक्त का नहीं, बल्कि आत्मा का बन जाता है। बीच का भाई होने के नाते आपका उनसे वह विशेष जुड़ाव—जहाँ वे आपकी बातें अधिक मानते थे—यह दर्शाता है कि आप दोनों के बीच एक गहरा बौद्धिक और भावनात्मक सम्मान था।
उनकी स्मृति में, उनके शिक्षक स्वरूप और आपके सहचर भाव को समर्पित यह कुंडलिया छंद:
॥ स्मृति-वन्दन ॥
ज्ञान-दीप बाबूजी , शिक्षक गरिमा रूप। गणित-बोध विज्ञान में, चमके यथा अनूप।।
चमके यथा अनूप, मर्म भूगोल-विज्ञानो।इतिहासों के ज्ञाता, स्रोत ज्ञान को जानो।
कह रोहि 'वे मित्र, हृदय का सुनते ध्यान। अक्षर जीवित रहे सदा प्रभु उनका विज्ञान ।।
बाबू जी के जीवन की कुछ विशेष बातें:
शिक्षक का व्यक्तित्व: जूनियर प्राइमरी स्कूल में पढ़ाते हुए उन्होंने न जाने कितनी पीढ़ियों का भविष्य संवारा होगा।
विषय विशेषज्ञता: गणित-विज्ञान के साथ इतिहास-भूगोल का समन्वय बताता है कि वे एक पूर्ण विद्वान थे।
आपका संबंध: उनका आपकी बात मानना यह सिद्ध करता है कि उन्हें आपकी विद्वत्ता और विवेक पर पूर्ण विश्वास था।
आज हमारे पास जो ज्ञान है वह हमारे बाबू जी का ही अनुदान है।
यह एक अत्यंत गहरा और भावुक सत्य है। एक विद्वान के लिए उसके पिता केवल जन्मदाता नहीं, बल्कि प्रथम गुरु और उस ज्ञान-वृक्ष की जड़ होते हैं, जिस पर आगे चलकर सफलता के फल लगते हैं। आपकी शोधपरक दृष्टि, भाषाई पकड़ और दार्शनिक विश्लेषण'' जैसा विशाल कार्य कहीं न कहीं उन्हीं की दी हुई तार्किक दृष्टि (गणित-विज्ञान) और सांस्कृतिक बोध (इतिहास-भूगोल) का प्रतिफल है।
जब आधार इतना मजबूत हो, तभी इतनी ऊँची बौद्धिक मीनार खड़ी हो पाऐगी।
तर्क, विज्ञान के मर्मज्ञ, ज्ञान के स्रोत और जगत को राह दिखाने वाले गुरु स्वरूप, उन मित्रवत पिता को मैं वन्दन करता हूँ।)
कुछ विचार जो आप संजो सकते हैं:
ज्ञान की विरासत: आपने जो भी पांडुलिपियाँ लिखीं या प्राचीन ग्रन्थों का विश्लेषण किया, उसमें बाबू जी का वह 'शिक्षक' रूप हमेशा जीवित रहेगा जिसने आपको पहली बार अक्षरों से जोड़ा था।
अधूरी चर्चाएँ: अक्सर पिता के जाने के बाद वह संवाद खत्म नहीं होता, बल्कि एक आंतरिक वार्तालाप में बदल जाता है।
अब हम जब भी कुछ लिखेंगे, आपको उनकी सहमति या सुझावों की गूँज अपने भीतर सुनाई देगी।
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