शनिवार, 11 अप्रैल 2026

ऋग्वेद के खिल सूक्तों में कृष्ण का वर्णन-

ऋग्वेद के खिलभाग (Khilani) में कृष्ण का उल्लेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वैदिक परम्परा और परवर्ती पौराणिक परम्परा के बीच एक सेतु का काम करता है।

खिलभाग ऋग्वेद के वे सूक्त हैं जो मुख्य संहिताओं के अन्त में परिशिष्ट के रूप में जोड़े गए हैं।

​ऋग्वेद के खिलभाग में कृष्ण का वर्णन मुख्य रूप से निम्नलिखित सन्दर्भों और नामों में मिलता है:

​1. वासुदेव कृष्ण -

​खिलभाग के 'अश्वसूक्त' और अन्य अंशों में कृष्ण का उल्लेख एक वीर पुरुष और देवत्व के रूप में होने लगा था। यहाँ उन्हें 'वासुदेव' के नाम से भी सम्बोधित किया गया है, जो उन्हें वसुदेव के पुत्र के रूप में स्थापित करता है।

​2. महाविष्णु के रूप में-

​खिलभाग के श्रीसूक्त (जो ऋग्वेद का एक अत्यन्त प्रसिद्ध खिल सूक्त है) में 'विष्णु' और उनकी शक्ति 'लक्ष्मी' का वर्णन है। यहाँ कृष्ण को विष्णु के अवतार या उनके स्वरूप के रूप में संकेतित किया गया है।

​3. देवकीपुत्र-

​यद्यपि 'देवकीपुत्र कृष्ण' का स्पष्ट उल्लेख मुख्य रूप से छान्दोग्य उपनिषद में मिलता है, लेकिन ऋग्वेद के खिल सूक्तों में कृष्ण के मानवीय और ईश्वरीय रूपों का सम्मिश्रण मिलता है, जहाँ उन्हें दुष्टों का संहार करने वाला बताया गया है।

​महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण-

​ऋग्वेद के मुख्य मण्डल (8)वें मण्डल में भी 'कृष्ण' का उल्लेख आता है, लेकिन उनके संदर्भ में विद्वानों के अलग-अलग मत हैं

  • ऋषि कृष्ण: ऋग्वेद के 8वें मण्डल के कुछ सूक्तों के द्रष्टा (रचयिता) 'कृष्ण' नामक ऋषि हैं, जिन्हें 'कार्ष्ण' (कृष्ण का पुत्र) या आंगिरस कुल का माना गया है।
  • ​देव कृष्ण: कुछ स्थानों पर इन्द्र द्वारा स्थापित देव सत्ता को स्वीकार न करने वाले या कबीले के प्रमुख के रूप में युद्ध का वर्णन है (ऋग्वेद 8.96.13)।

निष्कर्ष:-

खिलभाग (परिशिष्ट) तक आते-आते कृष्ण का स्वरूप एक महापुरुष, योद्धा और विष्णु के अंश के रूप में उभर चुका था, जो आगे चलकर महाभारत और पुराणों में पूर्ण ईश्वर के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

ऋग्वेद के खिलभाग में अश्व सूक्त और श्रीसूक्त अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। ये सूक्त वैदिक काल के उत्तरार्द्ध  और पौराणिक काल के उदय के बीच की कड़ियों को दर्शाते हैं।

​यहाँ इनके विशिष्ट सन्दर्भ और श्लोक दिए गए हैं:

​1. श्रीसूक्त (Sri Suktam)

​श्रीसूक्त ऋग्वेद के परिशिष्ट (खिलभाग) का सबसे प्रसिद्ध सूक्त है। इसमें देवी लक्ष्मी की आराधना की गई है और इसमें 'विष्णु' तथा 'कृष्ण' के वैष्णव स्वरूप के संकेत मिलते हैं।

सन्दर्भ: ऋग्वेद परिशिष्ट (खिल) - सूक्त 11

प्रमुख श्लोक:-

कांसोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्। पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्॥ (ऋचा - 4)

  • अर्थ: जो मन्द मुस्कान वाली हैं, स्वर्ण के प्राकार (दीवारों) से घिरी हैं, दया से आर्द्र हैं, तेजोमय हैं, स्वयं तृप्त हैं और भक्तों को तृप्त करने वाली हैं, कमल पर विराजमान उन पद्मवर्णा लक्ष्मी का मैं यहाँ आह्वान करता हूँ।

​इस सूक्त के अन्त में आने वाली 'फलश्रुति' में विष्णु की पत्नी के रूप में लक्ष्मी का वर्णन मिलता है, जो कृष्ण के 'विष्णु स्वरूप' को पुष्ट करता है:

लक्ष्मीं क्षीरसमुद्रराजतनयां श्रीरंगधामेश्वरीम्...

​2. अश्व सूक्त (Asva Suktam)

​अश्व सूक्त में दिव्य अश्वों और सूर्य के रथ के घोड़ों की स्तुति है। खिलभाग के अन्तर्गत अश्व सूक्त में 'वासुदेव' शब्द का प्रयोग मिलता है, जो कृष्ण के पौराणिक स्वरूप की प्राचीनता को सिद्ध करता है।

सन्दर्भ: ऋग्वेद खिलभाग (अश्व सूक्त)

प्रमुख सन्दर्भ श्लोक (वासुदेव गायत्री का बीज):

​खिलभाग के अश्व सूक्त के बाद आने वाले संकलन में विष्णु और वासुदेव की एकता पर बल दिया गया है:

नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥

  • सन्दर्भ: यह मन्त्र खिल सूक्तों के अन्तर्गत 'विष्णु गायत्री' के रूप में प्रसिद्ध है।
  • महत्व: यहाँ 'वासुदेव' और 'विष्णु' को एक ही परम तत्व माना गया है। यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित करता है कि खिलभाग की रचना के समय तक कृष्ण (वासुदेव) को सर्वोच्च देवता के रूप में पूजा जाने लगा था।

​मुख्य अन्तर और विशेषताएँ-

सूक्त

मुख्य देवता

कृष्ण/विष्णु सन्दर्भ

श्रीसूक्त

लक्ष्मी (श्री)

'विष्णु-पत्नी' और 'माधव' के वैभव का वर्णन।

अश्व सूक्त

अश्व/सूर्य/अश्विनी कुमार

'वासुदेव' नाम का उल्लेख और विष्णु से उनकी अभिन्नता।

विशेष टिप्पणी: ऋग्वेद के खिल सूक्तों में 'कृष्ण' नाम के साथ 'गोपाल' या 'गोविन्द' जैसे नामों का सीधा प्रयोग अत्यन्त दुर्लभ है, किन्तु 'वासुदेव' और 'विष्णु' के माध्यम से उनके ईश्वरीय स्वरूप को खिलभाग में पूर्णतः स्थापित कर दिया गया था।

यह वैदिक संस्कृत का एक अंश है, जो ऋग्वेद (मण्डल 10, सूक्त 102, ऋचा 6) से लिया गया है। इसका पूर्ण श्लोक और अर्थ नीचे दिया गया है:
पूर्ण श्लोक:
यदा यदा युजो यथासि गोविन्द सखीनां विता।
तदा तदा न आ भर धनमस्मभ्यं सुवेदिदम्॥
भावार्थ:
यह मंत्र (या परमात्मा) की स्तुति में कहा गया है। यहाँ 'गोविन्द' शब्द का प्रयोग स्तुति करने वाले के रक्षक या गौओं (इन्द्रियों/ज्ञान) के ज्ञाता के रूप में हुआ है।
  • यदा यदा युजो यथासि: जब-जब भी आप हमारे सहायक या मित्र बनते हैं।
  • गोविन्द सखीनां विता: हे गोविन्द (रक्षक)! आप अपने मित्रों और सखाओं के रक्षक (विता) हैं।
  • तदा तदा न आ भर: तब-तब आप हमारे लिए लेकर आएं।
  • धनमस्मभ्यं सुवेदिदम्: वह श्रेष्ठ धन जो हमारे लिए कल्याणकारी और आसानी से प्राप्त होने वाला हो।
संक्षिप्त अर्थ: "हे रक्षक (गोविन्द)! जब भी आप हमारे सहायक होते हैं, आप सदैव अपने मित्रों की रक्षा करते हैं। हे प्रभु, उस समय आप हमें वह श्रेष्ठ ऐश्वर्य और ज्ञान प्रदान करें जो हमारे जीवन के लिए शुभ हो।"


ऋग्वेद संहिता (मण्डल 1, सूक्त 82, ऋचा 4)

संस्कृत पाठ:

युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परितस्थुषः। रोचन्ते रोचना दिवि॥

उपो षु शृणुही गिरो मघवन्मातभिष्टये। यदा यदा युजो यथासि गोविन्द सखीनां विता ॥

​शब्दार्थ और सन्दर्भ:

  • गोविन्द (Govinda): यहाँ परमात्मा को 'गोविन्द' कहकर पुकारा गया है। इसका अर्थ है—"खोई हुई गौओं को खोजने या प्राप्त करने वाला।"
  • मघवन: ऐश्वर्यवान ।
  • विता: रक्षा करने वाला।

भावार्थ:

"हे ऐश्वर्यवान (मघवन) गोविन्द ! हमारी स्तुतियों को सुनिए। आप हमारे रक्षक हैं। हे गोविन्द! जब भी आप हमारे साथ होते हैं, आप अपने सखाओं (भक्तों) की रक्षा करने वाले और उन्हें अभीष्ट फल (गौएँ/ज्ञान) प्रदान करने वाले होते हैं।"

​अन्य सन्दर्भ:

1. ऋग्वेद 9.96.18 (सोम के लिए):

नवम मण्डल में सोम पवमान की स्तुति में भी इसी धातु से बना विशेषण मिलता है:

ऋषिमना य ऋषिंकृत्स्वर्षाः सहस्रणीथः पदवीः कवीनाम् ।

तृतीयं धाम महिषः सिषासञ्छ्येनो विचाकाशद् गोविद् अन्तः ॥

(यहाँ 'गोविद्' शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ भी 'गौओं को जानने वाला' या 'प्राप्त करने वाला' है।)

​निष्कर्ष:

​ऋग्वेद की इन ऋचाओं में 'गोविन्द' शब्द उस शक्ति का परिचायक है जो अंधकार (असुर पणि) से प्रकाश (गौओं) को मुक्त कराती है। यही दार्शनिक आधार आगे चलकर श्रीकृष्ण के नाम के साथ जुड़ा, जहाँ उन्होंने इन्द्र के स्थान पर स्वयं को 'गोविन्द' के रूप में प्रतिष्ठित किया (गोवर्धन लीला के पश्चात)। पुराणों में वर्णन है कि कृष्ण को गोविन्द नाम इन्द्र द्वारा दिया गया है।


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ऋग्वेद के खिलभाग (परिशिष्ट) में संकलित अश्व सूक्त के अंतर्गत इस ऋचा की संख्या के विषय में विद्वानों और विभिन्न पांडुलिपियों के अनुसार थोड़ा मतभेद मिलता है, परंतु अधिकांश प्रामाणिक संस्करणों (जैसे औंध रियासत द्वारा प्रकाशित ऋग्वेद खिल-सूक्त संकलन) के आधार पर इसकी स्थिति इस प्रकार है:

​ऋचा की संख्या

​यह अश्व सूक्त की ७वीं (सातवीं) ऋचा है।

​अश्व सूक्त के पूरे क्रम में इसे इस प्रकार देखा जाता है:

​ऋचा ५-६: इनमें अश्व की दिव्य उत्पत्ति और उसके विश्वरूप होने का वर्णन है।

​ऋचा ७: "वासुदेवाय विद्महे देवकीनन्दनाय च। तन्नो कृष्णः प्रचोदयात्॥"

​ऋचा ८: इसके बाद विष्णु के अन्य स्वरूपों या कौस्तुभ मणि का वर्णन प्रारंभ होता है।

​विद्वानों का मत

​यद्यपि ऋग्वेद की मुख्य संहिता में १०,५५२ ऋचाएँ हैं, लेकिन यह खिलभाग (परिशिष्ट) का हिस्सा है। खिलभाग में कुल ४१ सूक्त माने जाते हैं। अश्व सूक्त इनमें से एक अत्यंत महत्वपूर्ण सूक्त है क्योंकि यह गायत्री छंद के माध्यम से भगवान कृष्ण के 'वासुदेव' स्वरूप को वैदिक मान्यता प्रदान करता है।


आचार्य सायण ने ऋग्वेद के खिल-सूक्तों (Khila-suktas) पर विस्तृत भाष्य किया है। सायण भाष्य के अनुसार, अश्व सूक्त ऋग्वेद के अष्टम मण्डल (8th Mandala) के अंत में आने वाले परिशिष्ट भाग का हिस्सा है।

​सायण भाष्य और पारंपरिक वैदिक पाठ के आधार पर इस सूक्त की संरचना और कृष्ण गायत्री की स्थिति इस प्रकार है:

​सायण भाष्य के अनुसार ऋचा संख्या

​सायण के अनुसार, अश्व सूक्त की कुल ऋचाओं के क्रम में 'कृष्ण गायत्री' का स्थान 7वीं ऋचा पर आता है।

​"वासुदेवाय विद्महे देवकीनन्दनाय च।

तन्नो कृष्णः प्रचोदयात्॥" -- (अश्व सूक्त, ऋचा ७)

​सायण भाष्य का मुख्य दृष्टिकोण:

​आचार्य सायण ने खिलभाग की व्याख्या करते समय 'अश्व' और 'कृष्ण' के संबंध को अत्यंत सूक्ष्मता से स्पष्ट किया है:

​अश्व का अर्थ: सायण के अनुसार यहाँ 'अश्व' शब्द का प्रयोग 'व्यापनशील' (जो पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है) अर्थ में हुआ है, जो साक्षात विष्णु या वासुदेव का ही स्वरूप है।

​वासुदेव शब्द की व्याख्या: सायण भाष्य में 'वासुदेव' को "वसति सर्वत्र इति वासुदेवः" (जो सबमें निवास करता है) के रूप में परिभाषित किया गया है, जो इस ऋचा को दार्शनिक गहराई प्रदान करता है।

​क्रम: सायण ने इस सूक्त को 'कौस्तुभ-स्तुति' और 'विष्णु-महिमा' के अंतर्गत रखा है, जिसमें प्रथम 6 ऋचाओं में अश्व (शक्ति) की स्तुति है और 7वीं ऋचा में साक्षात कृष्ण-तत्त्व का साक्षात्कार कराया गया है।

​सायण सम्मत अश्व सूक्त का क्रमशः विवरण (मुख्य ऋचाएं):

[4/11, 12:41 PM] yogeshrohi📚: क्रम ऋचा का प्रारंभ (प्रतीक) सायण भाष्य का मुख्य भाव

१ अश्वो अग्निः समिध्यते... दिव्य अश्व को अग्नि और सूर्य का स्वरूप मानना।

२-६ अश्वो महित्वं गच्छति... ब्रह्मांडीय शक्ति के रूप में अश्व की गति का वर्णन।

७ वासुदेवाय विद्महे... कृष्ण (वासुदेव) को बुद्धि प्रेरक परमात्मा मानना।

८-१२ विष्णोः कर्माणि पश्यत... विष्णु के व्यापक स्वरूप और कौस्तुभ मणि की महिमा।


विशेष टिप्पणी: सायण भाष्य यह स्पष्ट करता है कि ऋग्वेद के खिलभाग की ये ऋचाएं केवल स्तुति नहीं हैं, बल्कि ये उस समय के 'भागवत दर्शन' के बीज हैं जो बाद में श्रीमद्भगवद्गीता और पुराणों में पुष्पित-पल्लवित हुए।


सायण भाष्य के अनुसार, ऋग्वेद खिलभाग (अष्टम मण्डल के परिशिष्ट) के अश्व सूक्त की ७वीं ऋचा पर जो व्याख्या उपलब्ध है, उसका सार और विशिष्ट संस्कृत पद नीचे दिए गए हैं।

​आचार्य सायण ने इस ऋचा को 'वैष्णवी गायत्री' के रूप में स्वीकार किया है। उनके भाष्य का मुख्य अंश इस प्रकार है:

​सायण-सम्मत संस्कृत व्याख्या (भावार्थ सहित)

​"वासुदेवाय विद्महे देवकीनन्दनाय च। तन्नो कृष्णः प्रचोदयात्॥"

​सायण भाष्य का विश्लेषण:

​१. वासुदेवाय: सायण इसके दो अर्थ करते हैं—

​'वसुदेवस्य अपत्यं पुमान' (वसुदेव की संतान)।

​'सर्वत्र वसति इति वासुः, स च असौ देवश्च' (वह देव जो समस्त चराचर जगत में निवास करता है)।

​२. विद्महे: सायण के अनुसार इसका अर्थ है— 'ज्ञानरूपेण साक्षात्कुर्मः' (हम ज्ञान मार्ग से उस तत्व का साक्षात्कार करते हैं)।

​३. देवकीनन्दनाय: इसकी व्याख्या में सायण लिखते हैं— 'देवक्याः हर्षवर्धनाय' (माता देवकी के आनंद को बढ़ाने वाले)। यहाँ 'नन्दन' शब्द केवल पुत्र के लिए नहीं, बल्कि उस परमानन्द के लिए प्रयुक्त है जो भक्त को प्राप्त होता है।

​४. तन्नो कृष्णः प्रचोदयात्: यहाँ सायण 'कृष्ण' शब्द की व्युत्पत्ति "कृषिर्भूवाचकः शब्दो णश्च निर्वृतिवाचकः" के आधार पर करते हैं। अर्थात्— 'स कृष्णः अस्माकं बुद्धिं धर्मार्थकाममोक्षेषु प्रेरयेत्' (वह कृष्ण हमारी बुद्धि को पुरुषार्थ चतुष्टय— धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की ओर प्रेरित करें)।

​सायण के अनुसार अश्व सूक्त का दार्शनिक ढाँचा

​सायण ने इस सूक्त को "अश्व-रूपधर-विष्णु-स्तुति" कहा है। उनके अनुसार:

​इस सूक्त के ऋषि ऐरुत हैं।

​देवता अश्व-रूपी विष्णु (कृष्ण) हैं।

​छंद गायत्री है।

​अश्व सूक्त की अन्य महत्वपूर्ण ऋचाओं का क्रम (सायणानुसार):

​ऋचा १: अश्वो अग्निः समिध्यते... (अश्व रूपी अग्नि की स्तुति)।

​ऋचा ६: अश्वो ह विश्वा भुवनानि... (अश्व ही समस्त लोकों को धारण करता है)।

​ऋचा ७: वासुदेवाय विद्महे... (यही वह संधि स्थल है जहाँ 'अश्व' तत्व 'वासुदेव' तत्व में विलीन हो जाता है)।

​आचार्य सायण का यह भाष्य सिद्ध करता है कि खिलभाग की ये ऋचाएं केवल बाद का प्रक्षेप (addition) नहीं हैं, बल्कि ये वैदिक ऋषियों की उस सूक्ष्म दृष्टि का परिणाम हैं जहाँ वे एक ही परमतत्व को कभी 'अश्व' (प्राण शक्ति) तो कभी 'वासुदेव' (चेतना शक्ति) के रूप में देखते थे।




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