शनिवार, 18 अप्रैल 2026

बुद्ध

[4/19, 6:43 AM] आत्मानन्द जी: अध्याय-१ 

श्रीकृष्ण का परिचय- 


यह अध्याय उनके लिए आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है जो भगवान श्रीकृष्ण को काल्पनिक और अनैतिहासिक मानकर उनकी सत्ता को मानने से इन्कार करते हैं। किन्तु उन्हें यह पता नहीं कि भगवान श्रीकृष्ण वैदिक, पौराणिक और ऐतिहासिक तीनों ही रुपों में स्थित (विद्यमान) हैं। इसको अच्छी तरह समझने के लिए इस अध्याय को मुख्यतः तीन भागों में विभाजित किया गया है -

 
(क)- श्रीकृष्ण का वैदिक परिचय-


(ख)- श्रीकृष्ण का पौराणिक परिचय-

    (1)- गोलोक में श्रीकृष्ण का परिचय 
    (2)- भूलोक में श्रीकृष्ण का परिचय 


(ग)- ऐतिहासिक परिचय-

(क)- पुरातात्विक परिचय (ख)- अभिलेखीय परिचय।
(ग)- खगोलीय साक्ष्य (घ)- साहित्यिक साक्ष्य
[4/19, 7:03 AM] आत्मानन्द जी: बौद्ध साहित्यों में श्रीकृष्ण का उल्लेख



 जिस तरह से जैन साहित्यों में श्रीकृष्ण का उल्लेख मिलता है उसी तरह से बौद्ध साहित्यों में भी मिलता है, लेकिन उनका चित्रण हिन्दू धर्म के पारम्परिक स्वरूप से काफी भिन्न है। 

बौद्ध ग्रन्थों में श्रीकृष्ण के उल्लेख के होने का मुख्य बिन्दु निम्नलिखित हैं।


(1) घट जातक कथाएँ  

जातक कथाएँ मूल रूप से लिखित ग्रन्थों के रूप में पन्नों और पत्थरों दोनों रूपों में लिखी गई हैं। प्राचीन काल में जातक कथाओं को आम जनता तक पहुँचाने के लिए उन्हें स्तूपों की रेलिंग और तोरणों (द्वारों) पर उकेरा गया था। इसके प्रमुख उदाहरण भरहुत, सांची और अमरावती के स्तूपों में मिलते हैं, जहाँ इन कहानियों के दृश्यों को पत्थरों पर बहुत ही खूबसूरती से तराशा गया है। अजंता की गुफाओं की दीवारों पर भी इनके चित्र और नक्काशी मौजूद हैं।

पन्नों पर (साहित्यिक ग्रन्थ)-
जातक कथाएँ बौद्ध धर्म के पवित्र साहित्य का एक विशाल हिस्सा हैं। इन्हें मुख्य रूप से पालि भाषा में लिखा गया था और ये 'खुद्दक निकाय' नामक ग्रंथ का हिस्सा हैं। समय के साथ इन्हें ताड़ के पत्तों और बाद में कागज़ के पन्नों पर संकलित किया गया ताकि इन्हें पढ़ा और पढ़ाया जा सके। 

संक्षेप में, जहाँ पत्थरों की नक्काशी ने इन्हें अमर बनाया और अनपढ़ लोगों तक पहुँचाया, वहीं लिखित ग्रंथों (पन्नों) ने इनके दार्शनिक और नैतिक संदेशों को सुरक्षित रखा। 
श्रीकृष्ण से सम्बन्धित कुछ जातक कथाओं का उल्लेख निम्नलिखित है- 


 घट जातक सबसे प्रमुख बौद्ध ग्रन्थ है जिसमें कृष्ण की कहानी विस्तार से मिलती है। इसमें कृष्ण (जिन्हें 'कण्ह' कहा गया है) को 'वासुदेव' के रूप में चित्रित किया गया है। इस कथा के अनुसार, वे दस भाइयों (अंधकवेणु पुत्रों) में से एक थे जिन्होंने कंस का वध किया और द्वारका पर शासन किया।

घट जातक कथा में जिसमें श्रीकृष्ण (वासुदेव) और उनके भाइयों की कहानी को एक अलग दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है। यहाँ इस कथा के प्रमुख विस्तार दिए गए हैं।


(1) श्रीकृष्ण का जन्म और परिवार

हिन्दू परम्परा के विपरीत, जहाँ मुख्य रूप से कृष्ण और बलराम की चर्चा होती है, घट जातक में वासुदेव (कृष्ण) 10 भाइयों में सबसे बड़े थे और उनकी एक बड़ी बहन भी थी। इन भाइयों के नाम अंधकवेणु पुत्र के रूप में प्रसिद्ध हैं। इनके जन्म के समय कंस द्वारा बच्चों को मारने का प्रसंग तो है, लेकिन जातक कथा के अनुसार कोई बच्चा मारा नहीं गया। प्रत्येक पुत्र के जन्म के समय उसे एक दासी (नन्दगोपा) की पुत्री से बदल दिया गया था, जिससे वे सुरक्षित बच सके। 


(2) ईश्वर नहीं वल्कि एक योद्धा और विजेता के रूप में श्रीकृष्ण का उल्लेख।

घट जातक कथा में कथा में कृष्ण को एक कोमल 'माखन चोर' के बजाय "विशाल, कठोर और भयंकर" योद्धा के रूप में चित्रित किया गया है।
वे और उनके भाई कुश्ती के एक मैच में राजा कंस को पराजित करते हैं और फिर पूरे जम्बुद्वीप पर विजय प्राप्त करते हैं।
उन्होंने अपनी राजधानी द्वारवती (द्वारका) बनाई। कथा के अनुसार, यह नगरी जादुई सुरक्षा से घिरी थी जो शत्रुओं के आने पर समुद्र में छिप सकती थी। 


3. शोक और घट पण्डित (बुद्ध) का उपदेश

घट जातक कथा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा वासुदेव के पुत्र की मृत्यु के बाद उनके अत्यधिक शोक से जुड़ा है। जिसमें 
कृष्ण के छोटे भाई, घट पण्डित (जो स्वयं भगवान बुद्ध का पूर्व जन्म थे), कृष्ण को इस शोक से बाहर निकालने के लिए 'पागलपन' का नाटक करते हैं।
वे चन्द्रमा से खरगोश मांगते हैं। जब कृष्ण उनसे कहते हैं कि यह असम्भव है, तब घट पण्डित उन्हें समझाते हैं कि मरे हुए व्यक्ति को वापस पाना भी उतना ही असम्भव है। 


(4) अन्त और पुनर्जन्म का सम्बन्ध

घट जातक कथा में श्रीकृष्ण के वंश का अन्त होने के कारण को जन्म और पुनर्जन्म के आधार पर बताया गया है। जिसमें बताया गया है कि मदिरा के प्रभाव में भाइयों के बीच हुए संघर्ष के कारण श्रीकृष्ण के वंश का विनाश हो जाता है। जिसमें वासुदेव (कृष्ण) की मृत्यु भी 'जरा' नामक शिकारी के तीर से होती है, जो उनके पैर में लगता है।

विशेष- देखा जाए तो जातक कथा के अन्त में बुद्ध स्पष्ट करते हैं कि उस समय के वासुदेव उनके शिष्य सारिपुत्त थे और घट पण्डित स्वयं बुद्ध थे। 
यह कथा मुख्य रूप से अनित्यता और शोक पर नियन्त्रण पाने का सन्देश देने के लिए सुनाई गई है।
[4/19, 7:04 AM] आत्मानन्द जी: महायान बौद्ध धर्म में श्रीकृष्ण और उनके 'नारायण' स्वरूप का उल्लेख-
 

(1) कारण्डव्यूह सूत्र-

बौद्ध धर्म के महायान शाखा के प्रसिद्ध 'कारण्डव्यूह सूत्र'  में एक बहुत ही रोचक वर्णन है। इस ग्रन्थ के अनुसार: 
भगवान नारायण (विष्णु/कृष्ण) की उत्पत्ति ब्रह्माण्ड के संरक्षक बोधिसत्व अवलोकितेश्वर के हृदय से हुई है।
इस ग्रन्थ में कहा गया है कि अवलोकितेश्वर ने संसार के कल्याण के लिए विभिन्न देवताओं का रूप धारण किया, जिनमें नारायण भी एक थे।
यहाँ कृष्ण/नारायण को एक स्वतन्त्र ईश्वर के बजाय बुद्धत्व की राह पर चलने वाले एक शक्तिशाली बोधिसत्व के रूप में देखा गया है। 


(2) ललितविस्तार सूत्र 

इस ग्रन्थ में बुद्ध के जीवन और उनकी शक्तियों का वर्णन है। यहाँ बुद्ध की महानता को दर्शाने के लिए कृष्ण का संदर्भ मिलता है। जिसमें बुद्ध की शारीरिक शक्ति और आध्यात्मिक प्रभाव की तुलना करते समय उन्हें "नारायण के समान पराक्रमी" बताया गया है। यह ग्रन्थ कृष्ण को एक ऐसे महापुरुष के रूप में स्वीकार करता है जिनकी शक्ति और तेज सर्वविदित था। 


(3) बोधिसत्व के रूप में श्रीकृष्ण का वर्णन 

बोधिसत्व के रूप में कई महायान परम्पराओं में कृष्ण को एक 'धर्मपाल' (धर्म का रक्षक) या उच्च श्रेणी का बोधिसत्व माना गया है। कुछ प्राचीन ग्रीको-बौद्ध (Indo-Greek) कलाकृतियों में कृष्ण को बुद्ध के रक्षक के रूप में भी दिखाया गया है।

 विद्वानों का मानना है कि महायान बौद्ध धर्म में 'भक्ति' का जो तत्व आया, उस पर कृष्ण भक्ति परम्परा का गहरा प्रभाव था। जिस तरह कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण की बात कही गई, वैसी ही भक्ति महायान में बुद्ध और बोधिसत्वों के प्रति देखी जाती है। 

संक्षेप में, महायान साहित्य कृष्ण को नकारता नहीं है, बल्कि उन्हें बुद्ध के ज्ञान और करुणा के एक विशेष प्रकटीकरण के रूप में आत्मसात करता है। 



तिब्बती बौद्ध परम्परा में श्रीकृष्ण का उल्लेख 

तिब्बती बौद्ध परम्परा में श्रीकृष्ण का उल्लेख बहुत ही विशिष्ट और सम्मानजनक है। यहाँ उन्हें केवल एक राजा ही नहीं, बल्कि एक सिद्ध पुरुष और धर्मरक्षक के रूप में देखा जाता है। जैसे इसके कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं- 


(1) कृष्ण का नाम: 'कण्हपा' 

तिब्बती बौद्ध धर्म में 84 महासिद्धों की सूची बहुत महत्वपूर्ण है। इनमें से एक प्रमुख सिद्ध का नाम 'कण्हपा' (कृष्णपाद) है। तिब्बती परम्परा इन्हें कृष्ण का ही एक तान्त्रिक स्वरूप या उनसे प्रेरित महापुरुष मानती है।


(2) चक्रसंवर तन्त्र 

तिब्बती तन्त्र साधनाओं में श्रीकृष्ण को 'विष्णु' के अवतार के रूप में पहचाना जाता है। कई तिब्बती ग्रंथों में कृष्ण को 'ऋषि' या 'विद्याधर' (ज्ञान धारण करने वाला) कहा गया है।
उन्हें एक ऐसे शक्तिशाली पुरुष के रूप में वर्णित किया गया है जिन्होंने अपनी योग शक्तियों से असुरों का दमन किया और धर्म की स्थापना की।


(3) रक्षक देवता के रूप में श्रीकृष्ण का वर्णन 

तिब्बती बौद्ध विहारों में कई बार 'नारायण' या 'वासुदेव' को एक रक्षक देवता के रूप में चित्रित किया जाता है। माना जाता है कि उन्होंने बुद्ध के सामने धर्म की रक्षा करने की प्रतिज्ञा ली थी।


(4) कर्मफल का उपदेश

तिब्बती विद्वान (जैसे तारानाथ) अपनी इतिहास की पुस्तकों में कृष्ण की कहानी का सन्दर्भ देते हैं। वे कृष्ण और उनके वंश (यादवों) के विनाश की कथा का उपयोग यह समझाने के लिए करते हैं कि 'कर्म' का फल कितना अचूक होता है—चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसे अपने कर्मों का फल भुगतना पड़ता है।


(5) कला और थंगका पेंटिंग्स

कुछ विशेष तिब्बती थंगका चित्रों में बुद्ध के चारों ओर उपस्थित देवताओं की मण्डली में नीले रंग के नारायण को भी स्थान दिया जाता है, जो उनकी शक्ति और सुरक्षा का प्रतीक हैं।
संक्षेप में: तिब्बती परम्परा में कृष्ण एक 'साधक' और 'विजेता' के प्रतीक हैं, जिन्होंने संसार को अधर्म से बचाने में बुद्ध के मार्ग की सहायता की।



कुछ प्राचीन ऐतिहासिक व पौराणिक ग्रन्थों में श्रीकृष्ण का उल्लेख 


(|) मेगस्थनीज की 'इंडिका- 
यूनानी राजदूत मेगस्थनीज (300 ईसा पूर्व) ने लिखा है कि 'शौरसेनी' लोग (मथुरा के लोग) 'हेराक्लेस' की पूजा करते थे। इतिहासकारों के अनुसार, यह 'हेराक्लेस' शब्द श्रीकृष्ण (हरि-कृष्ण) के लिए प्रयुक्त हुआ था।


(||) छान्दोग्य उपनिषद- 
इसमें 'घोर अंगिरस' के शिष्य के रूप में 'देवकी-पुत्र कृष्ण' का स्पष्ट वर्णन मिलता है, जिसमें श्रीकृष्ण का उल्लेख सबसे प्राचीन माना जाता है। इस ग्रन्थ के अध्याय 3, खणड 17, श्लोक 6 में उनका विवरण इस प्रकार मिलता है-
देवकी-पुत्र: उपनिषद में उन्हें स्पष्ट रूप से 'देवकी का पुत्र' (कृष्णाय देवकीपुत्राय) कहा गया है।
घोर अंगिरस के शिष्य: उन्हें ऋषि घोर अंगिरस के शिष्य के रूप में वर्णित किया गया है।
यज्ञ का उपदेश: ऋषि घोर अंगिरस ने श्रीकृष्ण को जीवन को ही एक 'यज्ञ' के रूप में देखने की विद्या सिखाई थी। इस शिक्षा को ग्रहण करने के बाद श्रीकृष्ण 'अतृप्त' (जिज्ञासा से मुक्त या पूर्ण ज्ञानी) हो गए थे।

मृत्यु के समय का मन्त्र-

 उन्हें यह उपदेश दिया गया था कि मृत्यु के समय मनुष्य को तीन मन्त्रों का आश्रय लेना चाहिए: 'अक्षितमसि' (तुम अविनाशी हो), 'अच्युतमसि' (तुम अटल हो), और 'प्राणसंशितमसि' (तुम प्राणों का सार हो)। 

विद्वानों का मत-
कई विद्वान और शोधकर्ता इस कृष्ण को महाभारत और भगवद्गीता के वासुदेव कृष्ण के समान मानते हैं क्योंकि नाम और माता का नाम (देवकी) मेल खाता है। हालांकि, कुछ विद्वान इसे एक ऐतिहासिक सन्दर्भ के रूप में देखते हैं जहाँ कृष्ण को एक दिव्य भगवान के बजाय एक ऋषि या साधक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। 

(1) संगम साहित्य

संगम साहित्य (प्राचीन तमिल साहित्य) में श्रीकृष्ण का उल्लेख बहुत महत्वपूर्ण और स्पष्ट है, जहाँ उन्हें 'मायोन' (काला रंग वाला) के रूप में पूजा गया है।
संगम साहित्य यह दर्शाता है कि दक्षिण भारत में कृष्ण की भक्ति अत्यंत प्राचीन है और उन्हें विष्णु के ही एक रूप में स्वीकार किया गया था। तमिल कवियों ने उन्हें एक रक्षक और प्रेमी के रूप में चित्रित किया है, जो बाद में चलकर अलवार संतों की भक्ति परम्परा का आधार बना। संगम साहित्य के विभिन्न ग्रन्थों में श्रीकृष्ण के सन्दर्भ निम्नलिखित हैं-

(A) परिपाडल-  
इस ग्रन्थ में श्रीकृष्ण और उनके भाई बलराम की स्तुति में कई गीत समर्पित हैं। यहाँ श्रीकृष्ण को 'मायोन' कहा गया है, जो चरागाहों और जंगलों के देवता (मुल्लई क्षेत्र) माने जाते हैं।

(B) अहनानूरु-
 इस ग्रन्थ में श्रीकृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र के युद्ध में पाण्डवों की सहायता करने और उनके द्वारा कंस के विनाश जैसी घटनाओं के संकेत मिलते हैं।

(C) शिलप्पादिकारम- 
यद्यपि यह संगम काल के थोड़ा बाद का महाकाव्य माना जाता है, लेकिन इसमें 'आयचियर कुरवई' नामक नृत्य का वर्णन है, जो वृन्दावन में कृष्ण और गोपियों के रासलीला जैसा ही है। इसमें कृष्ण की बाल लीलाओं, जैसे मक्खन चुराना और गोवर्धन पर्वत उठाने का उल्लेख है।

(D) पुरनानूरु-
 इस संग्रह के गीतों में कृष्ण (मायोन) की तुलना राजाओं की शक्ति और गौरव से की गई है। 

(E) शिलप्पादिकारम

इस महाकाव्य में कृष्ण के हल्लोन (हलधर बलराम) की प्रशंसा की गई है। 

(F) आंडाल की भक्ति

तमिल की प्रसिद्ध वैष्णव कवयित्री आंडाल ने कृष्ण के वियोग में तिरुप्पावै और नाच्चिचार तिरूमोलि जैसे पद लिखे, जिनमें कृष्ण के प्रति उनकी गहन भक्ति और प्रेम व्यक्त किया गया है। वह कृष्ण को अपना पति मानती थीं और उनके साथ रासलीला की कल्पना करती थीं। 

इस प्रकार से अध्याय (एक) का भाग (ग)- श्रीकृष्ण के ऐतिहासिक परिचय के साथ समाप्त हुआ। अब अगले अध्याय (दो) में गोप (यादव) की उत्पत्ति के बारे में बताया गया। उसे भी इस के साथ जोड़कर अवश्य पढ़ें।

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