गद्य का सुन्दर अनुष्टुप छंद में अनुवाद-
प्रायेण संसारे भोक्तारस्वादभोगिन: |स्वार्थातुरश्च प्रायशो दृश्यते हि जनो जन: ||१||
कटुकौषधिर्हि यथा व्याधिशमनी सर्वथा | न तु तां स्वादुरहितां रोगाच्छान्या रोगवानश्नाति ||२||
अन्यथा अस्वस्थ: न सन् तु सर्वोऽपि मानवा: |स्वादु: हि औषधम् खादति प्रायशः एव दृश्यते हि ||३||
प्राय: संसार में लोग स्वाद के भोगी और स्वार्थ के रोगी होते हैं, कटु ओषधि होने पर ही रोग को शान्त करती है,परन्तु रोगी उस कटु औषधि को स्वादिष्ट न होने के कारण नहीं खाता है, अन्यथा स्वस्थ और नीरोगी होने पर तो तो वह मीठी दवायों को भी खा जाते देखे गये हैं |
(अनुष्टुप छन्द)
स्वाद-भोग में लीन नर, स्वार्थ-रोग का दास।कटु औषधि भावे नहीं, तजे रोग की प्यास।।
तजे रोग की प्यास, स्वस्थ हो मेवा खाए।
कड़वी दवा निहार, जीभ को सदा चुराए।।
कह 'जमिनी' यह रीति, जगत की उलटी भारी।
रुचे नहीं उपचार, स्वाद में फँसे संसारी।।
छंद का विश्लेषण:
- दोहा (प्रथम दो पंक्तियाँ): इसमें बताया गया है कि मनुष्य स्वाद और स्वार्थ में फंसा है और कड़वी दवा (सत्य या सही उपचार) से दूर भागता है।
- रोला (अंतिम चार पंक्तियाँ): यह समझाता है कि स्वस्थ होने पर तो मनुष्य मीठी चीज़ें शौक से खाता है, पर रोग मिटाने वाली कड़वी दवा से मुँह मोड़ लेता है।
- विशेषता: यह कुंडलिया "स्वाद" शब्द से शुरू हुई है और "संसारी" (स्वाद के संदर्भ में) के भाव के साथ समाप्त होती है। (नियमतः प्रथम शब्द ही अंतिम होना चाहिए, यहाँ 'स' वर्ण का साम्य रखा गया है)।
स्वाद का लोभी जगत , स्वाद रोग का नाम।
कटु औषधि विष लगे, मिले नातब आराम।।
मिले नातब आराम, बनी रोग की काया।
खूब खाए मीठे पेड़, पड़ी सुगर की छाया।
कह 'कोई' कविराय, मिठाइ सबको याद।
रोग चढ़े तो नीचे दबे, दबा में खोजते स्वाद।
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