शनिवार, 7 मार्च 2026

यदुवंश संहिता का नवीनतम संस्करण -भाग द्वितीय-

आत्मानन्द जी:
परिशिष्ट कथा १- ७ तक

गोपों (यादवों) की परिशिष्ट कथाएँ।



इस पुस्तक की परिशिष्ट कथा का मुख्य उद्देश्य विशेष रूप से पौराणिक यादवों की लोकप्रिय कथाओं की जानकारी देना है जैसे-

(1) श्रीकृष्ण की नारायणी सेना
(2)- यादवों का विश्वजीत युद्ध
(3)- गोपों की सत्यनारायण व्रत कथा
(4)- वेदमाता गायत्री की कथा
(5)- गोपी स्वाहा और स्वधा की कथा
(6)- ब्रह्माण्ड विदुषी गोपी शतचन्द्रानना की कथा
(7)- गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था। (8) चंद्रमा और उसके वंश की उत्पत्ति।
(9)- देवमीढ की वंशावली।




(1) श्रीकृष्ण की नारायणी सेना


भूत-तल के भार (पाप) को दूर करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने नारायणी सेना (गोप सेना या 'यादव सेना') का गठन किया था जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अजेय और अविनाशी थी। इस बात की पुष्टि- श्रीमद्भागवत पुराण के स्कंध-12 अध्याय (2) के श्लोक- 22 और 23 से होती है जिसमें लिखा गया है कि- कलयुग के अन्त में जब धर्म लुप्त हो जाएगा, तब भगवान स्वराट विष्णु (श्रीकृष्ण) 'कल्कि' रूप में प्रकट होंगे और उनके साथ 'सत्य संध' (नारायणी सेना) होगी जिसमें सत्य का पालन करने वाले दिव्य गोप योद्धा होंगे।

तेषां प्रजाविसर्गश्च स्थाविष्ठः सम्भविष्यति।
वासुदेवे भगवति सत्त्वमूर्तौ हृदि स्थिते।।२२

यदावतीर्णो भगवान् काल्किर्धर्मपतिर्हरिः।
कृतं भविष्यति तदा प्रजासूतिश्च सात्त्विकी‌।।२३

अनुवाद - २२,२३ " उनके यानी कल्कि के पवित्र हृदय में सत्त्वमूर्ति भगवान वासुदेव विराजमान होंगे और फिर उनकी सन्तान (गोप) पहले की ही भाँति (नारायणी सेना के लिए) हृष्ट-पुष्ट और बलवान होने लगेंगी। २२
प्रजा के नयन-मनोहारी हरि (श्रीकृष्ण) ही धर्म के रक्षक और स्वामी हैं। वे ही भगवान जब कल्कि के रूप में अवतार ग्रहण करेंगे, उसी समय सतयुग का प्रारम्भ हो जाएगा और प्रजा की सन्तान-परम्परा स्वयं ही सत्तवगुण से युक्त हो जाएगी।२३

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि मौसल पर्व में यादवों सहित नारायणी सेना का भी अन्त हो गया था। किन्तु ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उपर्युक्त साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि श्रीकृष्ण की नारायणी सेना और उसके गोप योद्धाओं का कभी अन्त नहीं होता, क्योंकि नारायणी सेना की 'अजेय शक्ति' सूक्ष्म रूप में परमेश्वर श्रीकृष्ण में विलीन हो गई थी, वहीं हर युग में उनके ईश्वरीय अवतार के समय पुनः भौतिक रूप धारण करती है। इसीलिए नारायणी सेना को अक्षय, अविनाशी और अजेय कहा जाता है। और जब भी धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब भगवान श्रीकृष्ण अपने आप को तथा अपनी दिव्य शक्ति रुपी (नारायणी सेना) को साकार रूप से प्रकट करते हैं और पुनः धर्म की स्थापना करते हैं। इस बात की पुष्टि- श्रीमद्भागवत गीता ४/७ से होती है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहे हैं कि -

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। ७
                       
अनुवाद- "जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने आप को साकार रूप से प्रकट करता हूँ अर्थात् भूतल पर शरीर रूप धारण करता हूँ।"


यादवेश्वर श्रीकृष्ण अपनी नारायणी सेना की विशालता और उसके अजेय गोप योद्धाओं के बारे में महाभारत के उद्योग पर्व के सेनोद्योग नामक उपपर्व के सप्तम अध्याय के श्लोक संख्या- (१८) और (१९) में कहे हैं कि-

"मत्सहननं तुल्यानां ,गोपानाम् अर्बुदं महत्।
नारायणा इति ख्याता: सर्वे संग्रामयोधिन:।१८।

अनुवाद - मेरे पास दस करोड़ गोपों की विशाल सेना है, जो सबके सब मेरे जैसे ही बलिष्ठ शरीर वाले हैं। उन सबकी 'नारायण' संज्ञा है। अर्थात् वे सभी नारायण नाम से जानें जाते हैं। वे सभी युद्ध में डटकर मुकाबला करने वाले हैं।।१८।।

अब यहाँ पर कुछ लोगों को संशय अवश्य हुआ होगा कि नारायणी सेना से सम्बम्धित उपर्युक्त सभी श्लोकों में तो केवल गोपों का नाम है यादवों का नहीं। तो इस सम्बन्ध में ज्ञात हो कि नारायणी सेना के गोप ही यादव है और यादव ही गोप हैं। क्योंकि नारायणी सेना के उन्हीं गोप योद्धाओं के बारे में भगवान श्रीकृष्ण यादव नाम से भी सम्बोधित किये हैं।
जिसकी पुष्टि- गर्गसंहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय-(२) के श्लोक संख्या- (७) से होती है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण उग्रसेन से कहते हैं कि-

ममांशा यादवा: सर्वे लोकद्वयजिगीषव:।
जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम्।।७।    
   
अनुवाद - समस्त यादव मेरे अंश से प्रकट हुए हैं। वे लोक, परलोक दोनों को जीतने की इच्छा करते हैं। वे दिग्विजय के लिए यात्रा करके शत्रुओं को जीत कर लौट आएंगे और सम्पूर्ण दिशाओं से आपके लिए भेंट और उपहार लायेंगे।

कुल मिलाकर नारायणी सेना के वे गोप योद्धा जो कभी पराजित नहीं होते और अपने योग बल से 'सिद्ध' और अजेय अवस्था में सदैव श्रीकृष्ण के साथ ही रहते हैं, जो हर युग में भगवान श्रीकृष्ण के धर्म स्थापना अभियान का हिस्सा होते हैं। पौराणिक ग्रन्थों में उनके धर्म स्थापना अभियान को ही यादवों का विश्वजीत युद्ध कहा गया। जिसके बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी इसकी अगली कथा (दो) शीर्षक- यादवों का विश्वजीत युद्ध में दी गई है। जिसमें बताया गया है कि धर्म की स्थापना के लिए यादवों ने किस प्रकार विश्वजीत युद्ध किया।


नारायणी सेना की कुछ खास विशेषताएँ-

(1)- यह सेना केवल योद्धाओं का समूह नहीं थी, बल्कि इसमें दिव्य शक्तियों और विशेष युद्ध कलाओं का समावेश था, जिसमें लगभग 10 लाख से अधिक योद्धा थे जो सभी गोप यानी यादव थे। इस विशाल सेना में कुल 11 अक्षौहिणी टुकड़ियाँ थीं।  (ज्ञात हो- एक अक्षौहिणी में 21,870 रथ, 21,870 हाथी, 65,610 घुड़सवार और 1,09,350 पैदल सैनिक होते हैं।)

(2)- नारायणी सेना में श्रीकृष्ण के 18,000 भाई और चचेरे भाई शामिल थे। सेना में 7 महारथी और 7 अतिरथी योद्धा भी थे।

(3)-  नारायणी सेना के सैनिकों को स्वयं श्रीकृष्ण ने युद्ध नीति और कलारिपयट्टू (युद्धक्षेत्र की कलाओं का अभ्यास) जैसी प्राचीन मार्शल आर्ट में प्रशिक्षित किये थे। इस सेना प्रत्येक योद्धा मायावी अस्त्रों के प्रयोग और शत्रुओं की मानसिकता को प्रभावित करने में सक्षम थे। इस सेना का प्रत्येक सैनिक बिना किसी प्रश्न के भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा का पालन करने के लिए समर्पित थे।

(4)-  नारायणी सेना महाभारत जैसे भयंकर युद्ध में केवल 1 या 2 अक्षौहिणी ही प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया था। शेष सेना बलराम जी के आदेश पर युद्ध से अलग रही।

(5)-  नारायणी सेना के अजेय गोप योद्धाओं ने अपने विश्व युद्ध अभियान में मगध, हस्तिनापुर, गंधार, कलिंग जैसे कई बड़े साम्राज्यों के साथ ही बहुत से दैत्य, देव, दानव गंधर्व इत्यादि को पराजित करके पुनः धर्म को स्थापित किया।


अब हमलोग इसी क्रम में नारायणी सेना के यादवों के विश्वजीत युद्ध अभियान को जानेंगे।





  (2)- यादवों का विश्वजीत युद्ध



पौराणिक ग्रन्थों की मानें तो ब्रह्माण्ड का सबसे सबसे भयंकर युद्ध यादवों का 'विश्वजीत युद्ध' माना जाता है, जो महाभारत युद्ध से कुछ ही समय पहले भगवान श्री कृष्ण के आदेश पर हुआ था, जिसका मुख्य उद्देश्य राजा उग्रसेन के राजसूय यज्ञ के लिए कर (Tax) एकत्रित करना और इसी बहाने भूतल के समस्त पापी एवं दुष्ट मनुष्यों तथा दैत्यों आदि का वध करके पृथ्वी के भार को दूर करना था।

युद्ध की औपचारिक घोषणा-

यादवों के विश्वजीत युद्ध के बारे में विस्तार पूर्वक वर्णन गर्ग संहिता के विश्वजीत खण्ड में (१-५०) तक के अध्यायों में वर्णित है। जिसमें राजा उग्रसेन ने सुधर्मा सभा में राजसूय यज्ञ करने की इच्छा व्यक्त की और समस्त यादवों को पान का बीड़ा रखकर चुनौती दी कि जो समरांगन में जंबूद्वीप के समस्त नरेशों को जीत सके, वह यह पानी का बीड़ा उठाए।

तब भगवान श्रीकृष्ण उस सभा में युद्ध की औपचारिक घोषणा करते हुए जो कुछ कहा उसका वर्णन गर्गसंहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय-(२) के श्लोक संख्या- (७) में कुछ इस प्रकार से लिखा गया है-

ममांशा यादवा: सर्वे लोकद्वयजिगीषव:।
जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम्।।७।    
   
अनुवाद - समस्त यादव मेरे अंश से प्रकट हुए हैं। वे लोक, परलोक दोनों को जीतने की इच्छा करते हैं। वे दिग्विजय के लिए यात्रा करके शत्रुओं को जीत कर लौट आएंगे और सम्पूर्ण दिशाओं से आपके लिए भेंट और उपहार लायेंगे।

तब रुक्मिणी नन्दन प्रद्युम्न (भगवान श्री कृष्ण के पुत्र) ने सबसे पहले यह पान का बीड़ा उठाया और दिग्विजय की चुनौती स्वीकार की। इसके बाद उन्हीं के अगुआई में यादवों का विश्वजीत युद्ध प्रारम्भ हुआ।

इस युद्ध के दौरान यादवों ने न केवल मनुष्यों बल्कि यक्षों और गंधर्वों की सेनाओं को भी पराजित किया, जिससे स्वर्ग और पाताल तक उनकी कीर्ति फैली।


विजय अभियान और युद्ध परिणाम


युद्ध के दर्म्म्यान, कुछ देशों ने बिना युद्ध किए स्वेच्छा से संधि स्वीकार करके यज्ञ के लिए भेंट दी (जैसे कच्छा, कर्नाटक, मिथिला), वहीं कुछ से बलपूर्वक भेंट लेनी पड़ी (जैसे कलिंग, मरुधर, अवन्ती पुरी इत्यादि)।

कई भयंकर युद्ध हुए-



🔆 बाणासुर और अन्य: बाणासुर, दंतवक्र, शाल्व और कलिंग के राजाओं को पराजित कर यादवों ने अपनी सैन्य श्रेष्ठता सिद्ध की।


🔆 मगध के राजा जरासंध से घनघोर युद्ध हुआ। वह रण छोड़कर भाग गया। अंततः यादवों की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी और उसके पुत्र सहदेव ने यादवों को कर भेंट किया।

🔆 करु देश के राजा वृद्ध शर्मा के पुत्र दन्तवक्र से भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें दन्तवक्र पराजित हुआ।

🔆 कामरूप के राजा पूर्णरूप ने मायावी विद्या से युद्ध किया। अन्त में उसकी भी पराजय हुई।

🔆 अलकापुरी के अधिपति कुबेर और उनके गणों (यक्षों) से भी युद्ध हुआ, जिसमें गणेश जी भी शामिल थे। युद्ध यादवों के पक्ष में रहा।

🔆 हीरे देश के विशालकाय वानरों से विचित्र युद्ध हुआ, जिसमें हनुमान जी को प्रकट होकर शान्ति स्थापित करनी पड़ी।

🔆 चन्द्रावती पुरी के राक्षस राज शकुनि से भयंकर युद्ध हुआ, जहाँ भगवान श्री कृष्ण को भी प्रकट होना पड़ा। अन्त में शकुनी मारा गया।

🔆 गंधर्वों से भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें बलराम जी को प्रकट होना पड़ा। जिसमें गंधर्वों ने यादवों कर देना स्वीकार किया।

🔆 हस्तिनापुर से युद्ध एक महत्वपूर्ण युद्ध था। उद्धव को दूत बनाकर कौरवों से भेंट की मांग की गई, जिसे कौरवों ने अस्वीकार कर दिया तब यादवों का हस्तिनापुर से भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में प्रद्युम्न ने दुर्योधन को अपने तीखे बाणों से घायल कर दिया। बाद में अनिरुद्ध ने भीष्म के धनुष को काटकर उन्हें मूर्छित कर दिया। जब युद्ध और भयानक रूप लेने लगा, तो बलराम जी और भगवान श्री कृष्ण स्वयं प्रकट हुए और युद्ध को रोककर कौरवों तथा यादवों में मैत्री स्थापित की।

🔆 एक स्वयंवर के दौरान देवताओं से भी युद्ध हुआ, जिसमें यादवों ने देवताओं सहित  इन्द्र को भी पराजित किया।

युद्ध का परिणाम-

यादवों के इस विश्वजीत युद्ध से भूतल के समस्त राजाओं, दैत्यों, गंधर्वों और देवताओं का मानमर्दन हुआ, और यह पृथ्वी के भार को उतारने में सफल रहा।
युद्ध समाप्त होने के बाद, प्रद्युम्न अपनी यादव सेना के साथ द्वारिका पुरी लौटे और उग्रसेन को सम्पूर्ण भेंट प्रदान की, इसके पश्चात यादवों का यज्ञ प्रारम्भ हुआ।


युद्ध से हमें क्या सीख मिलती है-


1- यह युद्ध सिखाता है कि जब समाज में अधर्म और अहंकार बढ़ जाता है, तो सत्य और धर्म की रक्षा के लिए शक्ति का प्रयोग अनिवार्य हो जाता है। यादवों ने अपनी सेना का उपयोग व्यक्तिगत लालच के लिए नहीं, बल्कि न्याय की स्थापना के लिए किया।

2- प्रद्युम्न और अनिरुद्ध के नेतृत्व में यादवों की सफलता यह दर्शाती है कि यदि युवा नेतृत्व कुशल हो और उसे अनुभवी मार्गदर्शकों (जैसे कृष्ण और बलराम) का साथ मिले, तो असंभव लक्ष्य भी प्राप्त किए जा सकते हैं।

3- बाणासुर और जरासंध जैसे शक्तिशाली राजाओं की पराजय यह सिद्ध करती है कि चाहे व्यक्ति कितना भी बलशाली या वरदान प्राप्त क्यों न हो, यदि वह अहंकारी है, तो उसका पतन निश्चित है।

4-  यादवों ने राजाओं को पराजित करने के बाद उनके राज्यों को पूरी तरह नष्ट नहीं किया, बल्कि उन्हें कर देने और धर्म के मार्ग पर चलने के लिए विवश किया। यह सिखाता है कि विजेता को क्रूर नहीं, बल्कि न्यायप्रिय होना चाहिए।

5- राजसूय और विश्वजीत यज्ञ की पूर्णता के लिए यादवों ने हर बाधा (यक्ष, गंधर्व और असुर) का सामना किया। यह बाधाओं के बावजूद अपने संकल्प को पूरा करने की सीख देता है।

विशेष- यादवों के विश्वजीत युद्ध को यदि आप यूट्यूब पर देखना चाहते हैं तो- यादव सम्मान चैनल पर, (यादवों का विश्वजीत युद्ध) वाले विडियो के शीर्षक में देख सकते हैं।

इस प्रकार से आपलोग श्रीकृष्ण की नारायणी सेना और यादवों के विश्वजीत युद्ध को जाना। अब इसकी अगली परिशिष्ट कथा (3) में गोपों की सत्यनारायण व्रत कथा को जानेंगे।

(3)- गोपों की सत्यनारायण व्रत कथा

                  
वास्तव में देखा जाए तो पूर्व काल में गोपों ने ही परमेश्वर श्रीकृष्ण (सवराट विष्णु) की सार्वजनिक कथा को सत्यनारायण व्रत कथा के नाम से प्रतिष्ठित किया जो आज भी भारतीय समाज में प्रचलित है। गोपों की सत्यनारायण व्रत कथा का सर्वप्रथम वर्णन श्रीस्कन्दपुराण के अवन्ति खण्ड के उपखण्ड रेवाखण्ड के अध्याय-(२३३ से २३७) में मिलता है, जिसे हम और आप बचपन से ही इस विष्णु कथा को सुनते आयें हैं। किन्तु इस बात को कम ही लोग जानते हैं कि इस सत्यनारायण व्रत कथा के मुख्य पात्र गोप ही हैं, जो इस कथा के माध्यम से अनेकों भक्तों का तारण करते हैं। इस बात की पुष्टि सत्यनारायण व्रत कथा के मुख्य स्रोत श्रीस्कन्दपुराण के रेवाखण्ड के अध्याय-(२३३) से (२३७) से होती है। जो सत्यनारायण व्रत कथा के नाम से स्थापित है। जानकारी के लिए उसे नीचे उद्धृत किया गया है।

                      "सूत उवाच"
अथान्यच्च प्रवक्ष्यामि शृणुध्वं मुनिसत्तमाः।
आसीत् तुङ्गध्वजो राजा प्रजापालनतत्परः॥१॥

प्रसादं सत्यदेवस्य त्यक्त्वा दुःखमवाप सः।
एकदा स वनं गत्वा हत्वा बहुविधान् पशून्॥२॥

आगत्य वटमूलं च  दृष्ट्वा   सत्यस्य  पूजनम्।
गोपाः कुर्वन्ति संतुष्टा भक्तियुक्ताः सबान्धवाः॥३॥

राजा दृष्ट्वा तु दर्पेण न गतो न ननाम सः।
ततो गोपगणाः सर्वे  प्रसादं नृपसन्निधौ ॥४॥

संस्थाप्य पुनरागत्य भुक्त्वा सर्वे यथेप्सितम्।
ततः प्रसादं संत्यज्य राजा दुःखमवाप सः॥५॥

"अनुवाद- १-५

• श्रीसूतजी बोले- हे श्रेष्ठ मुनियो ! अब इसके बाद मैं एक अन्य कथा कहूँगा, आप उसे सुनें। अपनी प्रजा का पालन करने में तत्पर (तैयार रहने वाला) तुङ्गध्वज नाम का एक राजा था।१।

• उसने सत्यदेव (सत्यनारायण) के प्रसाद का परित्याग करके दुःख प्राप्त किया। एक बार वह वन में जाकर और वहाँ बहुत-से पशुओं को मारकर।२।

• वह वट वृक्ष के नीचे आया तो वहाँ उसने देखा कि गोपगण (अहीर लोग) बन्धु-बान्धवों के साथ सन्तुष्ट होकर भक्तिपूर्वक भगवान् सत्यदेव (सत्यनारायण) की पूजा करतें हैं।३।

• राजा यह देखकर भी अहंकार (दर्प) वश न तो वह वहाँ गया और न ही उसने भगवान् सत्यनारायण को प्रणाम ही किया। इसके बाद (पूजन के पश्चात) सभी गोपगण भगवान् सत्य नारायण का प्रसाद राजा के समीप में।४।

• रखकर वहाँ से पुन: लौट कर और इच्छानुसार उन सभी ने भगवान्‌ का प्रसाद ग्रहण किया। इधर राजा को प्रसाद का परित्याग करने से बहुत दुःख भोगना पड़ा ॥ ५॥


तस्य पुत्रशतं नष्टं धनधान्यादिकं च यत्।
सत्यदेवेन तत्सर्वं नाशितं मम निश्चितम्॥६॥

अतस्तत्रैव गच्छामि यत्र देवस्य पूजनम्।
मनसा तु विनिश्चित्य ययौ गोपालसन्निधौ॥७॥

ततोऽसौ सत्यदेवस्य पूजां गोपगणैः सह।
भक्तिश्रद्धान्वितो भूत्वा चकार विधिना नृपः॥८॥

सत्यदेवेन प्रसादेन धनपुत्रान्वितोऽभवत् ।
इहलोके सुखं भुक्त्वा चान्ते सत्यपुरं ययौ॥ ९॥

"अनुवाद  ६-९

•उसका सम्पूर्ण धन-धान्य एवं सभी सौ पुत्र नष्ट हो गये। राजा ने मन में यह निश्चय किया कि अवश्य हो भगवान् सत्यनारायण ने हमारा नाश कर दिया है।६।

•इसलिये मुझे वहीं जाना चाहिये जहाँ श्रीसत्यनारायण का पूजन हो रहा था। ऐसा मन में निश्चय करके वह राजा गोपगणों (अहीरों) के समीप गया।७।

•और उसने गोपगणों के साथ भक्ति-श्रद्धा से युक्त होकर विधिपूर्वक भगवान् सत्यदेव की पूजा की।८।

• भगवान् सत्यदेव की कृपा से वह पुनः धन और पुत्रों से सम्पन्न हो गया तथा इस लोक में सभी सुखों को उपभोगकर अन्त में सत्यपुर (वैकुण्ठलोक)- को चला गया॥९॥

य इदं कुरुते  सत्यव्रतं  परमदुर्लभम्      
शृणोति च कथां पुण्यां भक्तियुक्तः फलप्रदाम् ॥१०॥

धनधान्यादिकं तस्य भवेत् सत्यप्रसादतः।
दरिद्रो लभते वित्तं बद्धो मुच्येत् बन्धनात्॥ ११॥

भीतो भयात् प्रमुच्येत् सत्यमेव न संशयः।
ईप्सितं च फलं भुक्त्वा चान्ते सत्यपुरं व्रजेत्॥ १२॥

इति वः कथितं विप्राः सत्यनारायणव्रतम्।
यत् कृत्वा सर्वदुः खेभ्यो मुक्तो भवति मानवः॥१३॥

"अनुवाद:- १०- १३

• सूत जी कहते हैं- जो व्यक्ति इस परम दुर्लभ श्रीसत्यनारायण के व्रत को करता और पुण्यमयी तथा फलप्रदायिनी कथा को भक्तियुक्त होकर सुनता है।१०।

• उसे भगवान् सत्यनारायण की कृपा से धन-धान्य आदि की प्राप्ति होती है। दरिद्र के घर में धन हो जाता है, बन्धन में पड़ा हुआ बन्धन से छूट जाता है।११।

• डरा हुआ व्यक्ति भय से मुक्त हो जाता है। यह सत्य बात है, इसमें संशय नहीं। (इस लोक में वह सभी इच्छित फलों का भोग प्राप्त करके अन्त में सत्यपुर (वैकुण्ठलोक) को जाता है।१२।

• हे ब्राह्मणो ! इस प्रकार मैंने आप लोगों से भगवान् सत्यनारायण के व्रत को कहा, जिसे करके मनुष्य सभी दुःखों से मुक्त हो जाता है॥१३॥


विशेषतः कलियुगे  सत्यपूजा  फलप्रदा।
केचित् कालं वदिष्यन्ति सत्यमीशं तमेव च॥१४॥

सत्यनारायणं केचित् सत्यदेवं तथापरे।
नानारूपधरो भूत्वा सर्वेषामीप्सितप्रदम् ॥१५॥

भविष्यति कलौ सत्यव्रतरूपी सनातनः।
श्रीविष्णुना धृतं रूपं सर्वेषामीप्सितप्रदम्॥१६॥

य इदं पठेत् नित्यं शृणोति मुनिसत्तमाः।
तस्य नश्यन्ति पापानि सत्यदेवप्रसादतः॥१७॥

व्रतं वैस्तु कृतं पूर्व सत्यनारायणस्य च।
तेषां त्वपरजन्मानि कथयामि मुनीश्वराः॥१८॥


"अनुवाद:- १४-१८

• कलियुग में तो भगवान् सत्यदेव (सत्यनारायण) की पूजा विशेष फल प्रदान करने वाली है। स्वराट विष्णु (परमेश्वर श्रीकृष्ण) को ही कुछ लोग काल, कुछ लोग सत्य, कोई ईश।१४।

•  और कोई सत्यदेव तथा दूसरे लोग सत्यनारायण नाम से कहेंगे। अनेक रूप धारण करके भगवान् सत्यनारायण सभी का मनोरथ सिद्ध करते हैं।१५।

• कलियुग में सनातन भगवान् विष्णु ही सत्यव्रत-रूप धारण करके सभी का मनोरथ पूर्ण करनेवाले होंगे।१६।

• हे श्रेष्ठ मुनियो ! जो व्यक्ति नित्य भगवान् सत्यनारायण की इस व्रत-कथा को पढ़ता है, सुनता है, भगवान् सत्यनारायण की कृपा से उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।१७।

• हे मुनीश्वरो ! पूर्वकाल में जिन लोगों ने भगवान् सत्यनारायण का व्रत किया था, उनके अगले जन्म का वृत्तान्त कहता हूँ, आप लोग उसे सुनें॥१८।


"शतानन्दो महाप्राज्ञः सुदामा ब्राह्मणो ह्यभूत्।
तस्मिञ्जन्मनि श्रीकृष्णं ध्यात्वा मोक्षमवाप ह ॥१९॥

"काष्ठभारवहो   भिल्लो   गुहराजो   बभूव ह।
तस्मिञ्जन्मनि श्रीरामं सेव्य मोक्षं जगाम वै ॥२०॥

"उल्कामुखो महाराजो नृपो दशरथोऽभवत्।
श्रीरङ्गनाथं सम्पूज्य श्रीवैकुण्ठं तदागमत् ॥२१॥

"धार्मिकः सत्यसन्धश्च साधुर्मोरध्वजोऽभवत्।
देहार्धं क्रकचैश्छित्त्वा दत्त्वा मोक्षमवाप ह॥२२॥

"तुङ्गध्वजो महाराजः स्वायम्भुवोऽभवत् किल।
सर्वान् भागवतान् कृत्वा श्रीवैकुण्ठं तदाऽगमत्॥ २३॥


अनुवाद:- १९-२३

• महान् प्रज्ञासम्पन्न शतानन्द नाम के ब्राह्मण [सत्यनारायणका व्रत करनेके प्रभावसे] दूसरे जन्म में सुदामा नामक ब्राह्मण हुए और उस जन्म में भगवान् श्रीकृष्ण का ध्यान करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया।१९।

• लकड़‌हारा भिल्लों का राजा गुहराज हुआ और अगले जन्ममें उसने भगवान् श्रीराम की सेवा करके मोक्ष प्राप्त किया।२०।

• महाराज उल्कामुख [दूसरे जन्म में] राजा दशरथ हुए, जिन्होंने श्रीरङ्गनाथ (विष्णु) की पूजा करके अन्त में वैकुण्ठ प्राप्त किया।२१।

• इसी प्रकार धार्मिक और सत्यव्रती साधु [ पिछले जन्म के सत्यव्रत के प्रभाव से दूसरे जन्म में ] मोरध्वज नाम का राजा हुआ। उसने आरे से चीरकर अपने पुत्र की आधी देह भगवान् विष्णुको अर्पित कर मोक्ष प्राप्त किया।२२।

• महाराज तुङ्गध्वज पूर्व जन्म में स्वायम्भुव मनु के रूप में हुए थे और भगवत्सम्बन्धी सम्पूर्ण कार्यों का अनुष्ठान करके वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुए। २३।

"भूत्वा गोपाश्च ते सर्वे  व्रजमण्डलवासिनः।
निहत्य राक्षसान् सर्वान् गोलोकं तु तदा ययुः॥२४॥

अनुवाद -

और जो गोपगण थे, वे सब जन्मान्तर में व्रजमण्डल में निवास करने वाले गोप हुए और सभी राक्षसों का संहार करके भगवान के शाश्वतधाम- गोलोक को प्राप्त किया ॥ २४॥

श्लोक २४ का शब्दार्थ :-
सत्यनारायण की वन में कथा करने वाले वे सभी गोपगण ही  व्रजमण्डल में (भूत्वा = जन्म लेकर /होकर )
गोपा: = गोप गण। ते सर्वे= वे सब। व्रजमण्डलवासिनः= व्रजमण्डल के निवासी।
निहत्य= मारकर। राक्षसान् सर्वान् = सभी राक्षसों को ।


✳️  किन्तु आश्चर्य इस बात यह है कि- इस सत्यनारायण व्रत कथा में गोपों से सम्बन्धित सबसे महत्वपूर्ण श्लोक- ।२४ को-

"भूत्वा गोपाश्च  ते  सर्वे  व्रजमण्डलवासिनः।
निहत्य राक्षसान् सर्वान् गोलोकं तु तदा ययुः"॥२४।

स्कन्दपुराण के रेवाखण्ड के अध्याय-(२३६) से कथाकारों
ने इर्ष्या बस निकलवा दिया है। अब वहाँ पर (२४) श्लोक न होकर केवल (२३) श्लोक ही शेष रह गए हैं। गोपों के इस (२४ वें) महत्वपूर्ण श्लोक अब वर्तमान समय में गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित "सत्यनारायण व्रत कथा" में मिलता है। इसके अलावा "शब्द कल्पद्रुम" (खण्ड- ५ पृष्ठ संख्या- २२९) में गोपों का यह महत्वपूर्ण श्लोक आज भी सुरक्षित है।

कुल मिलाकर सत्यनारायण व्रत कथा से यह सिद्ध होता है कि गोप प्रारम्भ से ही धार्मिक, धर्मवत्सल, तथा वैष्णव धर्म के प्रबल प्रचारक रहे हैं।

गोपों के इसी गुण विशेष के कारण भगवान श्रीकृष्ण के सामने श्रीराधा जी ने गोपों को सबसे बड़ा धर्मवत्सल कहा इस बात की पुष्टि - गर्गसंहिता के वृन्दावन खण्ड के अध्याय-१८ के श्लोक संख्या -२२ से होती है। जिसमें राधा जी श्रीकृष्ण से कहती हैं कि-

"गा: पालयन्ति सततं रजसो गवां च गङ्गां स्पृशन्ति च जपन्ति गवां सुनाम्नाम।
प्रेक्षन्त्यहर्निशमलं सुमुखं गवां च जाति: परा न विदिता भुवि गोपजाते:।।२२।

अनुवाद - गोप सदा गौओं का पालन करते हैं। गोरज की  गङ्गा में नहाते हैं, उनका स्पर्श करते हैं तथा गौओं के उत्तम नाम का जाप करते हैं। इतना ही नहीं उन्हें दिन- रात गौओं के सुन्दर मुख का दर्शन होता है। मेरी समझ में तो इस भूतल पर गोप जाति से बढ़ कर दूसरी कोई जाति ही नहीं है।

इस प्रकार से गोपों की सत्यनारायण व्रत कथा समाप्त हुई। अब इसकी अगली परिशिष्ट कथा (4) में वेदमाता गायत्री की कथा को जानेंगे।

(4)- वेदमाता गायत्री की कथा


ज्ञान की देवी जगत कल्याणिनी माता गायत्री भी एक गोप यानी अहीर कन्या हैं, जिनका विवाह पूर्व काल में ब्रह्माजी के उस तत्कालिक महान यज्ञ को सम्पन्न करने के लिए हुआ था, जिसको ब्रह्माजी ने अपनी प्रथम सृष्टि सृजन के उपरान्त भू-तल पर पुष्कर में किया था। या कहें कि अहीर कन्या गायत्री का विवाह ब्रह्मा जी से केवल यज्ञ सम्पादन और संसार में आध्यात्मिक ज्ञान के प्रसारण के लिए ही है। सांसारिक सृष्टि उत्पादन के लिए नहीं।


देवी गायत्री का पारिवारिक परिचय-

पौराणिक साक्ष्यों की मानें तो देवी गायत्री की माता का नाम "गोविला" और पिता का नाम "गोविल" था। जो दोनो ही नाम परमेश्वर श्रीकृष्ण के परमधाम गोलोक से सम्बन्धित है। गायत्री के पिता-गोविल को नन्दसेन,अथवा नरेन्द्र सेन आभीर नाम से भी जाना जाता है। जो आनर्त देश, वर्तमान नाम (गुजरात) के रहने वाले थे। इस बात की पुष्टि-
लक्ष्मीनारायणी-संहिता के खण्ड (एक) के अध्याय-(५०९) के प्रमुख श्लोकों से होती है,जो इस प्रकार हैं -

"ब्रह्मणं यज्ञमिमं ज्ञात्वा शुद्धः स्नात्वा समागतः।
गोपकन्या नित्यं या शुद्धात्मा वैष्णव जातिका।।६२।।

श्री विष्णो वै तमुवाच प्रत्युत्तरं शृणु प्रिये ।
जाल्म एषाऽस्ति वीराण्याभीराणी जातितोऽस्ति वै ।।६४।।

शृणु जानामि तद्वृत्तं नान्ये जानन्त्येतद्विदः।
पुरा सृष्टे समारम्भे गोलोके श्रीकृष्णेन परात्मना सुघटिता।६५।

अमुना स्वांशरूपा हि सावित्री स्वमूर्तेः प्रकटीकृता।
अथ द्वितीया रूपा कन्या च गायत्र्याभिधा कृता।।६६।

सावित्री श्रीहरिणैव गोलोके एव सन्निधौ।
अथ भूलोके यज्ञप्रवाहार्थं  ब्रह्माणं ववल्हे।।६८।

पृथिव्यां मर्त्यरूपेण तत्र मानुषविग्रहा ।
पत्नी यज्ञस्य कार्यार्थमपेक्षिता बभूव।।६९।

हेतुनाऽनेन कृष्णेन सावित्र्याज्ञापिता तदा ।
द्वितीयेन स्वरूपेण त्वया गन्तव्यमेव ह गायत्री नाम्ना।। ७०।

अनुवाद:-
• इस ब्रह्मा के यज्ञसत्र को जानकर शुद्ध स्नान करके आयी हुई गोप कन्या नित्य जो शुद्धात्मा और वैष्णव जाति (अभीर जाति) की है।६२।

• श्रीकृष्ण ने उत्तर देते हुए उस गोप-कन्या को कहा ! सुन प्रिये ! ये बात छिपी हुई नही है कि ये वीराणी जाति से निश्चय ही अहीराणी है।६४।

• सुनो ! मैं जानाता हूँ वह वृत (इतिहास) कोई अन्य विद्वान नहीं जानता यह सत्य पूर्वकाल में सृष्टि के प्रारम्भ में श्रीकृष्ण परमात्मा के द्वारा गोलोक में सुघटित हुआ।।६५।

• उस परमात्मा के द्वारा अपने ही अंश से सावित्री और दूसरी कन्या को गायत्री नाम से प्रकट किया गया।६६।

• सावित्री श्रीहरि के द्वारा ही गोलोक में प्रभु के सानिन्ध्य में भूलोक में यज्ञ प्रवाहन के लिए ब्रह्माजी को प्रदान की गयीं ।६८।

• पृथ्वी पर मनुष्य रूप में वहाँ मानव शरीर में ब्रह्मा की पत्नी रूप में यज्ञ कार्य के लिए अवतरित  हुईं।६९।

• उस कारण से कृष्ण के द्वारा सावित्री को आज्ञा दी गयी। तब द्वित्तीय स्वरूप में तुमको गायत्री नाम से जानना चाहिए।७०।
        


वैवाहिक सम्बन्ध

अहीर कन्या गायत्री का विवाह ब्रह्मा जी से हुआ था। किन्तु उनका विवाह एक आकस्मिक घटना का परिणाम था जो अचानक घटित हुआ और इत्तेफाक से गायत्री का विवाह ब्रह्मा जी से हो गया। उनके विवाह के सम्बन्ध में न तो ब्रह्मा जी की कोई पूर्व योजना थी और ना ही गायत्री के परिवार वालों को इसकी जानकारी थी। उनके वैवाहिक घटनाक्रम का वर्णन पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय- 16 और 17 में मिलता है। वहीं से गायत्री के वैवाहिक घटनाक्रम को उद्धृत किया गया है जो निम्नलिखित है-


पद्मपुराण (सृष्टि खण्ड अध्याय- 16)


द्वाराध्यक्षं तथा शक्रं वरुणं रसदायकम्।
वित्तप्रदं वैश्रवणं पवनं गंधदायिनम्।१११।
उद्योतकारिणं सूर्यं प्रभुत्वे माधवः स्थितः।
सोमः सोमप्रदस्तेषां वामपक्ष पथाश्रितः११२।

उस पुष्कर यज्ञ में-  ब्रह्मा ने शंकर और इन्द्र को द्वारपाल नियुक्त किया, वरुण को जल देने का, कुबेर को धन वितरित करने का, वायु को सुगन्ध प्रदान करने का, सूर्य को प्रकाश व्यवस्था करने का और विष्णु को मुख्य अधिकारी के रूप में नियुक्त किया। सोम दाता चन्द्रमा ने बाईं ओर के मार्ग का सहारा लिया। १११-११२

सुसत्कृता च पत्नी सा सवित्री च वरांगना।
अध्वर्युणा समाहूता एहि देवि त्वरान्विता११३।
उत्थिताश्चाग्नयः सर्वे दीक्षाकाल उपागतः।
व्यग्रा सा कार्यकरणे स्त्रीस्वभावेन नागता११४।
इहवै न कृतं किंचिद्द्वारे वै मंडनं मया।
भित्त्यां वैचित्रकर्माणि स्वस्तिकं प्रांगणेन तु११५।
प्रक्षालनं च भांडानां न कृतं किमपि त्विह।
लक्ष्मीरद्यापि नायाता पत्नीनारायणस्य या११६।

अग्नेः पत्नी तथा स्वाहा धूम्रोर्णा तु यमस्य तु।
वारुणी वै तथा गौरी वायोर्वै सुप्रभा तथा११७।
ऋद्धिर्वैश्रवणी भार्या शम्भोर्गौरी जगत्प्रिया।
मेधा श्रद्धा विभूतिश्च अनसूया धृतिः क्षमा११९।
गंगा सरस्वती चैव नाद्या याताश्च कन्यकाः।
इंद्राणी चंद्रपत्नी तु रोहिणी शशिनः प्रियाः१२०।
अरुंधती वसिष्ठस्य सप्तर्षीणां च याः स्त्रियः।
अनसूयात्रिपत्नी च तथान्याः प्रमदा इह१२१।
वध्वो दुहितरश्चैव सख्यो भगिनिकास्तथा।
नाद्यागतास्तु ताः सर्वा अहं तावत्स्थिता चिरं१२२।
नाहमेकाकिनी यास्ये यावन्नायांति ता स्त्रियः।
ब्रूहि गत्वा विरंचिं तु तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम्१२३।
सर्वाभिः सहिता चाहमागच्छामि त्वरान्विता।
सर्वैः परिवृतः शोभां देवैः सह महामते१२४।
भवान्प्राप्नोति परमां तथाहं तु न संशयः।
वदमानां तथाध्वर्युस्त्यक्त्वा ब्रह्माणमागतः१२५।

उनकी सुंदर पत्नी सावित्री, जो बहुत सम्मानित थीं, को अध्वर्यु ने आमंत्रित किया : “महोदया, जल्दी आइए, सभी अग्नि प्रज्वलित हो गई हैं (अर्थात अच्छी तरह प्रज्वलित हैं), दीक्षा का समय निकट आ गया है।” वह किसी काम में तल्लीन होने के कारण, जैसा कि आमतौर पर महिलाओं के साथ होता है,उसी प्रकार सावित्री के साथ हुआ जो  तुरन्त नहीं आईं। “मैंने यहाँ द्वार पर कोई सजावट नहीं की है; मैंने दीवार पर चित्र नहीं बनाए हैं; मैंने आँगन में स्वस्तिक नहीं बनाया है । यहाँ बर्तनों की सफाई भी नहीं की गई है। नारायण की पत्नी लक्ष्मी अभी तक नहीं आई हैं। अग्नि की पत्नी स्वाहा ; यम की पत्नी धूम्रोर्णा ; वरुण की पत्नी गौरी ; कुबेर की पत्नी ऋद्धि ; शंभू की पत्नी गौरी, जो संसार को प्रिय हैं। मेधा , श्रद्धा , विभूति , अनसूया , धृति , क्षमा और गंगा एवं सरस्वती नदियाँ भी अभी तक नहीं आई हैं।”सावित्री ने इस प्रकार अधर्वु से कहा - आओ। इंद्राणी , और चंद्रमा की प्रिय पत्नी रोहिणी । इसी प्रकार वशिष्ठ की पत्नी आरुंधती; सात ऋषियों की पत्नियाँ, और अत्रि की पत्नी अनसूया और अन्य देवियाँ, बहुएँ, पुत्रियाँ, मित्राएँ, बहनें अभी तक नहीं आई हैं।
मैं अकेले ही यहाँ (उनकी प्रतीक्षा में) बहुत समय से रुकी हुई हूँ। उन देवियों के आने तक मैं अकेले नहीं जाऊँगी। जाओ और ब्रह्मा से कहो कि वे थोड़ी देर प्रतीक्षा करें। मैं उन सभी (देवियों) के साथ शीघ्र ही आऊँगी; हे उच्च बुद्धि वाले, देवताओं से घिरे हुए, आपको महान कृपा प्राप्त होगी; मुझे भी होगी; इसमें कोई संदेह नहीं है।” उसे इस प्रकार बोलते हुए सावित्री को छोड़कर अध्वर्यु ब्रह्मा के पास आ गया। ११३-१२५


सावित्री व्याकुला देव प्रसक्ता गृहकर्माणि।
सख्यो नाभ्यागता यावत्तावन्नागमनं मम१२६।
एवमुक्तोस्मि वै देव कालश्चाप्यतिवर्त्तते।
यत्तेद्य रुचितं तावत्तत्कुरुष्व पितामह१२७।
एवमुक्तस्तदा ब्रह्मा किंचित्कोपसमन्वितः।

“हे भगवान, सावित्री व्यस्त हैं; वे घरेलू कामों में लगी हैं। उन्होंने मुझसे कहा है कि जब तक मेरी अन्य सखियाँ नहीं आ जाती, मैं नहीं आऊँगी। हे प्रभु, समय बीत रहा है। हे दादाजी, अब आप जो करना चाहें करें।” १२६-१२७

पत्नीं चान्यां मदर्थे वै शीघ्रं शक्र इहानय१२८।
यथा प्रवर्तते यज्ञः कालहीनो न जायते।
तथा शीघ्रं विधित्स्व त्वं नारीं कांचिदुपानय१२९।
यावद्यज्ञसमाप्तिर्मे वर्णे त्वां मा कृथा मनः।
भूयोपि तां प्रमोक्ष्यामि समाप्तौ तु क्रतोरिह१३०।


ब्रह्मा, इस प्रकार सम्बोधित किए जाने पर थोड़ा क्रोधित हुए और इन्द्र से बोले, “हे शक्र, मेरे लिए शीघ्र ही दूसरी पत्नी का प्रबन्ध कीजिए। वह कार्य शीघ्र कीजिए जिससे यज्ञ सुचारू रूप से सम्पन्न हो और विलम्ब न हो; यज्ञ समाप्त होने तक मेरे लिए कोई स्त्री लाइए; मैं आपसे विनती कर रहा हूँ; मेरे लिए निर्णय कीजिए; यज्ञ समाप्त होने के बाद मैं उसे फिर से मुक्त कर दूँगा।” १२८-१३०

एवमुक्तस्तदा शक्रो गत्वा सर्वं धरातलं।
स्त्रियो दृष्टाश्च यास्तेन सर्वाः परपरिग्रहाः१३१।

131. इस प्रकार सम्बोधित होकर, इन्द्र ने पूरी पृथ्वी पर घूमकर स्त्रियों का अवलोकन किया, (परन्तु) वे सब दूसरों की पत्नियाँ थीं।

आभीरकन्या रूपाढ्या सुनासा चारुलोचना।
न देवी न च गंधर्वी नासुरी न च पन्नगी१३२।
न चास्ति तादृशी कन्या यादृशी सा वरांगना।
ददर्श तां सुचार्वंगीं श्रियं देवीमिवापराम्१३३।
संक्षिपन्तीं मनोवृत्ति विभवं रूपसंपदा।
यद्यत्तु वस्तुसौंदर्याद्विशिष्टं लभ्यते क्वचित्१३४।
तत्तच्छरीरसंलग्नं तन्वंग्या ददृशे वरम्।
तां दृष्ट्वा चिंतयामास यद्येषा कन्यका भवेत्१३५।
तन्मत्तः कृतपुण्योन्यो न देवो भुवि विद्यते।
योषिद्रत्नमिदं सेयं सद्भाग्यायां पितामहः१३६।
सरागो यदि वा स्यात्तु सफलस्त्वेष मे श्रमः।
नीलाभ्र कनकांभोज विद्रुमाभां ददर्श तां१३७।
त्विषं संबिभ्रतीमंगैः केशगंडे क्षणाधरैः।
मन्मथाशोकवृक्षस्य प्रोद्भिन्नां कलिकामिव१३८।
प्रदग्धहृच्छयेनैव नेत्रवह्निशिखोत्करैः।
धात्रा कथं हि सा सृष्टा प्रतिरूपमपश्यता१३९।
कल्पिता चेत्स्वयं बुध्या नैपुण्यस्य गतिः परा।

एक अहीर की पुत्री थी, जो अत्यन्त सुन्दर, सुडौल नाक और आकर्षक आँखों वाली थी। कोई देवी, कोई गन्धर्व स्त्री, कोई राक्षसी, कोई नाग स्त्री, कोई कन्या उस उत्तम स्त्री के समान नहीं थी। उसने उसे एक अन्य देवी लक्ष्मी के समान आकर्षक रूप में देखा, और वह अपनी सुन्दरता के बल पर मन की क्रियाओं को वश में कर लेती थी।
सौन्दर्य से परिपूर्ण जो भी वस्तुएँ कहीं भी पाई जाती हैं, वैसी ही उत्तम वस्तुएँ सुडौल शरीर वाली स्त्री से जुड़ी हुई प्रतीत हुईं। उन्हें देखकर इन्द्र ने सोचा: 'यदि वह कन्या है, तो पृथ्वी पर मुझसे अधिक गुणवान देवता कोई नहीं है। यह वह अनमोल स्त्री है, जिसके लिए यदि दादाजी की इच्छा हो, तो मेरा यह प्रयास फलदायी होगा।'
उसने उसे नीले आकाश, सुनहरे कमल और मूंगे जैसी सुंदरता से युक्त देखा, उसके अंगों, बालों, गालों, आँखों और होठों में चमक थी और वह सेब के पेड़ या अशोक के पेड़ की अंकुरित कली जैसी थी। उसे 'सृष्टिकर्ता ने कैसे बनाया, जिसके हृदय में जलता हुआ बाण था और आँखों में कामना की) आग की लपटें थीं, बिना उसकी कोई छवि देखे? १३२-१३९


उत्तुंगाग्राविमौ सृष्टौ यन्मे संपश्यतः सुखं१४०।
पयोधरौ नातिचित्रं कस्य संजायते हृदि।
रागोपहतदेहोयमधरो यद्यपि स्फुटम्१४१।
तथापि सेवमानस्य निर्वाणं संप्रयच्छति।
वहद्भिरपि कौटिल्यमलकैः सुखमर्प्यते१४२।
दोषोपि गुणवद्भाति भूरिसौंदर्यमाश्रितः।
नेत्रयोर्भूषितावंता वाकर्णाभ्याशमागतौ१४३।


181-183. कमल भी उसकी आँखों के समान नहीं होता। जल शंख की तुलना उसके शंख जैसे कानों से कैसे की जा सकती है? यहाँ तक कि मूंगा भी उसके होंठों के समान नहीं होता। उसमें अमृत निवास करता है। वह निश्चित रूप से अमृत का प्रवाह उत्पन्न करता है। यदि मैंने अपने सैकड़ों पूर्व जन्मों में कोई शुभ कर्म किया है, तो उसकी शक्ति से, जिसे मैं चाहूँ, वही मेरा पति हो।

कारणाद्भावचैतन्यं प्रवदंति हि तद्विदः।
कर्णयोर्भूषणे नेत्रे नेत्रयोः श्रवणाविमौ१४४।
कुंडलांजनयोरत्र नावकाशोस्ति कश्चन।
न तद्युक्तं कटाक्षाणां यद्द्विधाकरणं हृदि१४५।
तवसंबंधिनोयेऽत्र कथं ते दुःखभागिनः।
सर्वसुंदरतामेति विकारः प्राकृतैर्गुणैः१४६।
वृद्धे क्षणशतानां तु दृष्टमेषा मया धनम्।
धात्रा कौशल्यसीमेयं रूपोत्पत्तौ सुदर्शिता१४७।
करोत्येषा मनो नॄणां सस्नेहं कृतिविभ्रमैः।
एवं विमृशतस्तस्य तद्रूपापहृतत्विषः१४८।
निरंतरोद्गतैश्छन्नमभवत्पुलकैर्वपुः।
तां वीक्ष्य नवहेमाभां पद्मपत्रायतेक्षणाम्१४९।
देवानामथ यक्षाणां गंधर्वोरगरक्षसाम्।
नाना दृष्टा मया नार्यो नेदृशी रूपसंपदा१५० 1.16.150।
त्रैलोक्यांतर्गतं यद्यद्वस्तुतत्तत्प्रधानतः।
समादाय विधात्रास्याः कृता रूपस्य संस्थितिः१५१।


यदि भगवान ने उसे अपने विचार के अनुसार गढ़ा है, तो यह उसकी कला का सर्वोच्च उत्पाद है। ये ऊंचे स्तन उसी ने गढ़े हैं; इन्हें देखकर मुझे आनन्द मिल रहा है। इन्हें देखकर किसके हृदय में विस्मय उत्पन्न नहीं होगा? यद्यपि इस होंठ का आकार स्पष्ट रूप से कामना (और लालिमा) से भरा हुआ है, फिर भी यह देखने वाले को अपार आनन्द देगा। बाल, टेढ़े-मेढ़े होने के बावजूद (अर्थात घुंघराले बाल), आनन्द दे रहे हैं। यहाँ तक कि दोष भी, जब प्रचुर सुन्दरता के साथ मिल जाता है, तो गुण प्रतीत होता है। उसकी आँखों के सजे हुए कोने उसके कानों तक पहुँच गए हैं; और इसी कारण विशेषज्ञ *सुंदरता को प्रेम की आत्मा कहते हैं।* उसकी आँखें उसके कानों के आभूषण हैं और उसके कान उसकी आँखों के आभूषण हैं। यहाँ न तो कान की बालियों की कोई आवश्यकता है और न ही काजल की। उसकी निगाहें हृदय को दो भागों में बांटने के लिए उपयुक्त नहीं हैं। जो लोग आपके सम्पर्क में आते हैं, वे कैसे दुःख का अनुभव कर सकते हैं? प्राकृतिक गुणों के सम्पर्क में आने पर कुरूपता भी अत्यन्त सुन्दर हो जाती है। मैंने अपनी सैकड़ों विशाल आँखों का अनमोल खजाना देखा है। सृष्टिकर्ता ने इस सुन्दर रूप को बनाने में अपनी कुशलता का अद्भुत प्रदर्शन किया है। अपनी मनमोहक गतिविधियों से वह मनुष्यों के मन में प्रेम उत्पन्न करती है।' इस प्रकार सोचते समय जिसकी चमक छिन गई थी, उसका शरीर लगातार रोंगटे खड़े होने से ढक गया। नए सोने के समान आकर्षण और कमल के पत्तों जैसी लंबी आँखों वाली उस स्त्री को देखकर उसने सोचा: 'मैंने देवताओं, यक्षों, गंधर्वों, नागों और राक्षसों की कई देवियाँ देखी हैं, पर कहीं भी इतनी सुन्दरता नहीं देखी। सृष्टिकर्ता ने तीनों लोकों में मौजूद सभी चीजों को विशेष रूप से एकत्रित करके उसका रूप गढ़ा है।' १४०-१५१

इन्द्र उवाच।
कासि कस्य कुतश्च त्वमागता सुभ्रु कथ्यताम्।

एकाकिनी किमर्थं च वीथीमध्येषु तिष्ठसि१५२।
यान्येतान्यंगसंस्थानि भूषणानि बिभर्षि च।
नैतानि तव भूषायै त्वमेतेषां हि भूषणम्१५३।
न देवी न च गंधर्वी नासुरी न च पन्नगी।
किन्नरी दृष्टपूर्वा वा यादृशी त्वं सुलोचने१५४।
उक्ता मयापि बहुशः कस्माद्दत्से हि नोत्तरम्।
त्रपान्विता तु सा कन्या शक्रं प्रोवाच वेपती१५५।


इन्द्र ने गोप कन्या से  कहा :
152-155. हे आकर्षक भौंहों वाली, मुझे बताओ—तुम कौन हो? तुम किसकी पुत्री हो? तुम कहाँ से आई हो? तुम सड़क के बीचों बीच क्यों खड़ी हो? ये आभूषण जो तुम्हारे शरीर को और भी आकर्षक बनाते हैं और जिन्हें तुमने पहना है, वे तुम्हें नहीं, बल्कि तुम ही उन्हें सुशोभित करती हो। हे सुंदर नेत्रों वाली, न कोई देवी, न कोई गंधर्व स्त्री, न कोई राक्षसी, न कोई नाग, न कोई किन्नर स्त्री तुम्हारे समान सुंदर देखी गई है। बार-बार कहने पर भी तुम उत्तर क्यों नहीं देती? तब वह कन्या (गायत्री), लज्जा और भय से अभिभूत होकर, इन्द्र से बोली-


गोपकन्या त्वहं वीर विक्रीणामीह गोरसम्।
नवनीतमिदं शुद्धं दधि चेदं विमंडकम्१५६।

दध्ना चैवात्र तक्रेण रसेनापि परंतप।
अर्थी येनासि तद्ब्रूहि प्रगृह्णीष्व यथेप्सितम्१५७।



“हे वीर, मैं एक आभीर (अहीर) कन्या हूँ; मैं दूध, यह शुद्ध मक्खन और मलाई से भरा दही बेचती हूँ। आपको जो भी स्वाद चाहिए- दही का या छाछ का मुझे बताएँ, जितना चाहें उतना ले लें।” १५६-१५७


एवमुक्तस्तदा शक्रो गृहीत्वा तां करे दृढम्।
अनयत्तां विशालाक्षीं यत्र ब्रह्मा व्यवस्थितः१५८।
नीयमाना तु सा तेन क्रोशंती पितृमातरौ।
हा तात मातर्हा भ्रातर्नयत्येष नरो बलात्१५९।
यदि वास्ति मया कार्यं पितरं मे प्रयाचय।
स दास्यति हि मां नूनं भवतः सत्यमुच्यते१६०।
का हि नाभिलषेत्कन्या भर्तांरं भक्तिवत्सलम्।
नादेयमपि ते किंचित्पितुर्मे धर्मवत्सल१६१।
प्रसादये तं शिरसा मां स तुष्टः प्रदास्यति।
पितुश्चित्तमविज्ञाय यद्यात्मानं ददामि ते१६२।
धर्मो हि विपुलो नश्येत्तेन त्वां न प्रसादये।
भविष्यामि वशे तुभ्यं यदि तातः प्रदास्यति१६३।


इस प्रकार (उसके द्वारा) सम्बोधित किए जाने पर, इन्द्र ने दृढ़ता से उसका हाथ पकड़ लिया और उस बड़ी आँखों वाली महिला (गायत्री) को उस स्थान पर ले आए जहाँ ब्रह्मा स्थित थे।
जिसे इन्द्र ले जा रहा था, वह अपने माता-पिता के लिए रो रही थी। 'हे पिता, हे माता, हे भाई, यह आदमी मुझे जबरदस्ती ले जा रहा है।'
उसने इन्द्र से कहा- “यदि आपको मुझसे कुछ काम करवाना है, तो मेरे पिता से निवेदन कीजिए। वे मुझे आपको सौंप देंगे; मैं सत्य कह रही हूँ। कौन सी कन्या स्नेही पति की कामना नहीं करती ? हे धर्मनिष्ठ, मेरे पिता आपसे कुछ भी स्वीकार नहीं करेंगे।”
मैं अपना सिर झुकाकर उसे प्रसन्न करूँगा, और प्रसन्न होकर वह मुझे आपके समक्ष प्रस्तुत करेगा। यदि मैं अपने पिता के मन को जाने बिना स्वयं को आपके समक्ष प्रस्तुत करूँ, तो मेरे बहुत से धार्मिक पुण्य नष्ट हो जाएँगे और इसलिए मैं आपको प्रसन्न नहीं कर पाऊँगा। मैं आपके समक्ष तभी स्वयं को समर्पित करूँगा जब मेरे पिता मुझे आपके समक्ष प्रस्तुत करेंगे। १५८-१६३



इत्थमाभाष्यमाणस्तु तदा शक्रोऽनयच्च ताम्।
ब्रह्मणः पुरतः स्थाप्य प्राहास्यार्थे मयाऽबले१६४।
आनीतासि विशालाक्षि मा शुचो वरवर्णिनि।
गोपकन्यामसौ दृष्ट्वा गौरवर्णां महाद्युतिम्१६५।
कमलामेव तां मेने पुंडरीकनिभेक्षणाम्।
तप्तकांचनसद्भित्ति सदृशा पीनवक्षसम्१६६।
मत्तेभहस्तवृत्तोरुं रक्तोत्तुंग नखत्विषं।
तं दृष्ट्वाऽमन्यतात्मानं सापि मन्मनथचरम्१६७।
तत्प्राप्तिहेतु क धिया गतचित्तेव लक्ष्यते।
प्रभुत्वमात्मनो दाने गोपकन्याप्यमन्यत१६८।


यद्यपि शक्र को वह इस प्रकार संबोधित कर रही थी, फिर भी उसने उसे अपने साथ ले लिया और ब्रह्मा के समक्ष रखकर कहा: “हे बड़ी आँखों वाली स्त्री, मैं तुम्हें इस (स्वामी) के लिए लाया हूँ; हे उत्तम रंग वाली, दुखी मत हो।” गोरी और तेज से भरी ग्वालिन पुत्री को देखकर ब्रह्मा ने कमल के समान आँखों वाली उसे स्वयं लक्ष्मी समझा। गर्म सोने की दीवार के एक भाग के समान, वह भी उसे मजबूत सीने, मदहोश हाथियों के सूंड के समान गोल जांघों और लाल और चमकदार नाखूनों से युक्त देखकर प्रेम से ओतप्रोत प्रतीत हुई। उसे (पति के रूप में) प्राप्त करने की इच्छा से गोपी बेसुध सी प्रतीत हुई। उसने यह भी सोचा कि उसे स्वयं को (उसे) अर्पित करने का अधिकार है। १६४-१६८

उसने मन ही मन कहा-
यद्येष मां सुरूपत्वादिच्छत्यादातुमाग्रहात्।
नास्ति सीमंतिनी काचिन्मत्तो धन्यतरा भुवि१६९।
अनेनाहं समानीता यच्चक्षुर्गोचरं गता।

अस्य त्यागे भवेन्मृत्युरत्यागे जीवितं सुखम्१७०।
भवेयमपमानाच्च धिग्रूपा दुःखदायिनी।
दृश्यते चक्षुषानेन यापि योषित्प्रसादतः१७१।
सापि धन्या न संदेहः किं पुनर्यां परिष्वजेत्।
जगद्रूपमशेषं हि पृथक्संचारमाश्रितम्१७२।
लावण्यं तदिहैकस्थं दर्शितं विश्वयोनिना।
अस्योपमा स्मरः साध्वी मन्मथस्य त्विषोपमा१७३।
तिरस्कृतस्तु शोकोयं पिता माता न कारणम्।
यदि मां नैष आदत्ते स्वल्पं मयि न भाषते१७४।
अस्यानुस्मरणान्मृत्युः प्रभविष्यति शोकजः।
अनागसि च पत्न्यां तु क्षिप्रं यातेयमीदृशी१७५।
कुचयोर्मणिशोभायै शुद्धाम्बुज समद्युतिः।
मुखमस्य प्रपश्यंत्या मनो मे ध्यानमागतम्१७६।
अस्यांगस्पर्शसंयोगान्न चेत्त्वं बहु मन्यसे।
स्पृशन्नटसि तर्हि न त्वं शरीरं वितथं परम्१७७।
अथवास्य न दोषोस्ति यदृच्छाचारको ह्यसि।
मुषितः स्मर नूनं त्वं संरक्ष स्वां प्रियां रतिम्१७८।
त्वत्तोपि दृश्यते येन रूपेणायं स्मराधिकः।
ममानेन मनोरत्न सर्वस्वं च हृतं दृढम्१७९।
शोभा या दृश्यते वक्त्रे सा कुतः शशलक्ष्मणि।
नोपमा सकलं कस्य निष्कलंकेन शस्यते१८०।


अनुवाद- १६९-१८०

(उसने मन ही मन कहा-) 'यदि वह मेरी सुन्दरता के कारण मुझे पाने की ज़िद करता है, तो मुझसे अधिक भाग्यशाली कोई स्त्री नहीं है। उसने मुझे देखते ही अपना लिया। यदि मैं उसे छोड़ दूँ तो मेरी मृत्यु हो जाएगी; यदि मैं उसे नहीं छोड़ूँ तो मेरा जीवन सुखमय होगा; और अपमान के कारण—अपने निंदित रूप से—मैं (दूसरों को) दुःख पहुँचाऊँगी; जिस भी स्त्री पर उसकी नज़र कृपा करे, वह भी धन्य होगी। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है; (तो) उस स्त्री का क्या होगा जिसे वह गले लगाएगा? संसार की सारी सुन्दरता अनेक दिशाओं में विचरण कर चुकी है (अर्थात् विभिन्न स्थानों में विद्यमान रही है); (अब) ब्रह्माण्ड के स्रोत (अर्थात् सृष्टिकर्ता) ने सुन्दरता को केवल एक ही स्थान पर प्रकट किया है। वह केवल कामदेव के समान है; उसकी चमक के कारण कामदेव से तुलना करना उचित है। मैं अपने इस दुःख को त्याग देती हूँ। न तो पिता और न ही माता (जीवन में जो कुछ भी मिलता है) का कारण होते हैं। यदि वह मुझे स्वीकार न करे या मुझसे थोड़ी भी बात न करे, तो मैं उसके लिए तड़पते हुए दुःख से मर जाऊँगी।' जब यह निष्कलंक अपनी पत्नी के पास जाता है (अर्थात अपनी पत्नी के प्रति पति का आलिंगन करता है), तो शुद्ध कमलों के समान तेज उसके स्तनों पर रत्नों की शोभा बढ़ा देता है। उसे देखकर मेरा मन चिंतन में लीन हो गया है। (वह मन ही मन कहती है:) यदि तुम उसके शरीर के स्पर्श और संपर्क को महत्व नहीं देते, तो तुम ऐसे उत्तम शरीर को स्पर्श न करके व्यर्थ ही भटक रहे हो। या यह उसकी गलती नहीं है; क्योंकि तुम अपनी इच्छा से भटकते हो। हे कामदेव, तुम सचमुच लूटे गए हो। अपनी प्रिय रति की रक्षा करो , क्योंकि हे कामदेव, वह सुन्दरता में तुमसे श्रेष्ठ प्रतीत होता है। उसने निश्चय ही मेरे मन का रत्न और मेरी समस्त संपत्ति छीन ली है। उसके चेहरे पर जो सौंदर्य दिखाई देता है, वह चन्द्रमा पर कैसे पाया जा सकता है? दागदार वस्तु और बेदाग वस्तु की तुलना करना उचित नहीं है।

समानभावतां याति पंकजं नास्य नेत्रयोः।
कोपमा जलशंखेन प्राप्ता श्रवणशंङ्खयोः१८१।
विद्रुमोप्यधरस्यास्य लभते नोपमां ध्रुवम्।
आत्मस्थममृतं ह्येष संस्रवंश्चेष्टते ध्रुवम्१८२।
यदि किंचिच्छुभं कर्म जन्मांतरशतैः कृतम्।
तत्प्रसादात्पुनर्भर्ता भवत्वेष ममेप्सितः१८३।
एवं चिंतापराधीना यावत्सा गोपकन्यका।
तावद्ब्रह्मा हरिं प्राह यज्ञार्थं सत्वरं वचः१८४।
देवी चैषा महाभागा गायत्री नामतः प्रभो।
एवमुक्ते तदा विष्णुर्ब्रह्माणं प्रोक्तवानिदम्१८५।
तदेनामुद्वहस्वाद्य मया दत्तां जगत्प्रभो।
गांधर्वेण विवाहेन विकल्पं मा कृथाश्चिरम्१८६।
अमुं गृहाण देवाद्य अस्याः पाणिमनाकुलम्।
गांधेर्वेण विवाहेन उपयेमे पितामहः१८७।


184-187. जब वह गोपी चिंतन में लीन होकर व्याकुल हो गई, तो ब्रह्मा ने यज्ञ को शीघ्र सम्पन्न कराने के लिए विष्णु से ये शब्द कहे: “हे प्रभु, यह अत्यन्त धन्य देवी गायत्री हैं।” ये शब्द सुनकर विष्णु ने ब्रह्मा से ये शब्द कहे: “हे जगत के स्वामी, आज ही गांधर्व विधि से उनका विवाह कीजिए, जिन्हें मैंने आपको दिया है। अब और संकोच न कीजिए। हे प्रभु, बिना विचलित हुए उनका हाथ स्वीकार कीजिए।” (तब) दादाजी ने उनका गांधर्व विधि से विवाह किया।


तामवाप्य तदा ब्रह्मा जगादाद्ध्वर्युसत्तमम्।
कृता पत्नी मया ह्येषा सदने मे निवेशय१८८।
मृगशृंगधरा बाला क्षौमवस्त्रावगुंठिता।
पत्नीशालां तदा नीता ऋत्विग्भिर्वेदपारगैः१८९।
औदुंबेरण दंडेन प्रावृतो मृगचर्मणा।
महाध्वरे तदा ब्रह्मा धाम्ना स्वेनैव शोभते।१९०।

प्रारब्धं च ततो होत्रं ब्राह्मणैर्वेदपारगैः।
भृगुणा सहितैः कर्म वेदोक्तं तैः कृतं तदा।
तथा युगसहस्रं तु स यज्ञः पुष्करेऽभवत्।१९१।

188-191. उसे (अपनी पत्नी के रूप में) प्राप्त करने के बाद, ब्रह्मा ने श्रेष्ठ अध्वर्यु पुरोहितों से कहा, “मैंने इस स्त्री को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया है; इसे मेरे घर में रख दीजिए।” वेदों के ज्ञाता पुरोहितों ने हिरण का सींग धारण किए और रेशमी वस्त्र पहने उस युवती को यज्ञकर्ता की पत्नी के लिए निर्धारित कक्ष में ले गए। ब्रह्मा औदुंबरा दंड हाथ में लिए और हिरण की खाल से ढके हुए यज्ञ में अपने ही तेज से चमक रहे थे। तब ब्राह्मणों ने भृगु के साथ वेदों में वर्णित विधि के अनुसार यज

प्रारम्भ किया। तब वह यज्ञ पुष्कर- तीर्थ में एक हजार युगों तक चला ।

अब इसके आगे जो हुआ उसका वर्णन अध्याय- 17 में कुछ इस प्रकार है।

उधर गायत्री हरण को जानकर समस्त गोप और गोपियाँ उसे को खोजते हुए पुष्कर यज्ञ में ब्रह्मा के पास आए और इसके बाद जो धटना घटी उसके बारे में पद्मपुराण सृष्टि खण्ड के अध्याय- 17 में कुछ इस प्रकार लिखा गया है-



गोप्यश्च तास्तथा सर्वा आगता ब्रह्मणोंतिकम् दृष्ट्वा तां मेखलाबद्धां यज्ञसीमव्यस्थिताम्।७।

हा पुत्रीति तदा माता पिता हा पुत्रिकेति च स्वसेति बान्धवाः सर्वे सख्यः सख्येन हा सखि।८।

केन त्वमिह चानीता अलक्ताङ्का तु सुन्दरी शाटीं निवृत्तां कृत्वा तु केन युक्ता च कम्बली।९।

केन चेयं जटा पुत्रि रक्तसूत्रावकल्पिता एवंविधानि वाक्यानि श्रुत्वोवाच स्वयं हरिः।१०।

इह चास्माभिरानीता पत्न्यर्थं विनियोजिता ब्रह्मणालम्बिता बाला प्रलापं मा कृथास्त्विह।११।

पुण्या चैषा सुभाग्या च सर्वेषां कुलनन्दिनी पुण्या चेन्न भवत्येषा कथमागच्छते सदः।१२।



अनुवाद:- ७-१२
गोप और गोपियों ने गायत्री हरण की बात जानी तो वे सब के सब ब्रह्मा जी के पास आये। वहाँ उन्होंने देखा कि यह गोपकन्या (अभीरकन्या) कमर में मेखला (करधनी) बाँधे यज्ञ भूमि की सीमा में स्थित है।७।
यह देखकर उसके माता-पिता हाय पुत्री ! कहकर चिल्लाने लगे उसके भाई (बान्धव) स्वसा (बहिन) कहकर तथा सभी सखियाँ सखी- सखी कहकर चिल्ला रह थी ।८।
और किस के द्वारा तुम यहाँ लायी गयीं महावर (अलक्तक) से अंकित तुम सुन्दर साड़ी उतारकर किस के द्वारा  कम्बल से युक्त कर दी गयीं ‌? ।९।
हे पुत्री ! किसके द्वारा तुम्हारे केशों की जटा (जूड़ा) बनाकर लालसूत्र से बाँध दिया गया ? (अहीरों की) इस प्रकार की बातें सुनकर श्रीहरि भगवान विष्णु ने उनसे स्वयं कहा-।१०।
यहाँ यह हमारे द्वारा लायी गयी हैं और इसे पत्नी के रूप के लिए नियुक्त किया गया है। अर्थात ब्रह्मा जी ने इसे अपनी पत्नी रूप में अधिग्रहीत किया है अर्थात् यह बाला ब्रह्मा पर आश्रिता है अत: यहाँ प्रलाप अथवा दु:खपूर्ण रुदन मत करो ।११।
यह अत्यन्त पुण्यशालिनी सौभाग्यवती तथा तुम्हारे सबके जाति-कुल को आनन्दित करने वाली है। यदि यह पुण्यशालिनी नहीं होती तो यह ब्रह्मा की सभा (यज्ञ) में कैसे आ सकती थी ?।१२।


एवं ज्ञात्वा महाभाग न त्वं शोचितुमर्हसि कन्यैषा ते महाभागा प्राप्ता देवं विरिंचनम्।१३।

योगिनो योगयुक्ता ये ब्राह्मणा वेदपारगाः न लभन्ते प्रार्थयन्तस्तां गतिं दुहिता गता।१४।

धर्मवन्तं सदाचारं भवन्तं धर्मवत्सलम्मया ज्ञात्वा ततः कन्या दत्ता चैषा विरञ्चये।१५।

अनया तारितो गच्छ दिव्यान्लोकान्महोदयान्
युष्माकं च कुले  चापि  देवकार्यार्थसिद्धये अवतारं करिष्येहं ।१६।

सा क्रीडा तु भविष्यति यदा नन्दप्रभृतयो ह्यवतारं धरातले।
१७।

करिष्यन्ति तदा चाहं वसिष्ये तेषु मध्यतः युष्माकं कन्यकाः सर्वा वसिष्यन्ति मया सह।१८।

तत्र दोषो न भविता न द्वेषो न च मत्सरः करिष्यन्ति तदा गोपा भयं च न मनुष्यकाः।१९।

न चास्या भविता दोषः कर्मणानेन कर्हिचित्श्रुत्वा वाक्यं तदा विष्णोः प्रणिपत्य ययुस्तदा।२०


अनुवाद- १३-२०

इसलिए हे महाभाग अहीरों ! इस बात को जानकर आप लोगों शोक करने के योग्य नहीं होते हो ! यह कन्या परम सौभाग्यवती है इसने स्वयं ब्रह्मा जी को (पति के रूप में) प्राप्त किया है ।१३।   
तुम्हारी इस कन्या ने जिस गति को प्राप्त किया है उस गति को योग करने वाले योगी और प्रार्थना करने वाले वेद पारंगत ब्राह्मण भी प्राप्त नहीं कर पाते हैं ।१४।
(भगवान विष्णु अहीरों से बोले ! हे गोपों) मेरे द्वारा यह जानकर धार्मिक' सदाचरण करने वाली और धर्मवत्सला के रूप पात्र है यह कन्या तब मेरे द्वारा ही ब्रह्मा को दान (कन्यादान) की गयी है ।१५।
द्विव्य लोकों को गये हुए महोदयों को इसके द्वारा तारदिया गया है। तुम्हारे कुल में और भी देव-कार्य की सिद्धि के लिए में मैं अवतरण करुँगा अर्थात इस कन्या के द्वारा तुम्हारी जाति- कुल के दिवंगत पितरों का भी उद्धार कर दिया गया और भी देवों के कार्य की सिद्धि के लिए मेैं भी तुम्हारे कुल में ही अवतरण करुँगा ।१६।
और वे तब मेरे साथ भविष्य में क्रीडा (रास नृत्य करेंगीं जब नन्द आदि का अवतरण भूलोक पर होगा।१७।
मैं भी उस समय गोप रूप में तुम्हारी कन्याओं के साथ (रास अथवा हल्लीसम्) खेल करुँगा और वे सब कन्या मेरे साथ रहेंगीं।१८।
उस समय न तो कोई दोष होगा और न किसी को इसका द्वेष होगा और न कोई किसी से क्रोध करेगा उस समय आभीर लोग भी किसी प्रकार का भय नहीं करेंगे अर्थात् निर्भीक रहेंगे।१९।
इस कार्य से इनको भी कोई पाप नहीं लगेगा। भगवान विष्णु की ये आश्वासन पूर्ण बातें सुनकर सभी अहीर उन विष्णु को प्रणाम किया और सभी अपने घरों को चले गये ।२०।


एवमेष वरो देव यो दत्तो भविता हि मे अवतारः कुलेस्माकं कर्तव्यो धर्मसाधनः।२१।

भवतो दर्शनादेव भवामः गोलोक वासिनः शुभदा कन्यका चैषा तारिणी मे कुलैः सह।२२।

एवं भवतु देवेश वरदानं विभो तव। अनुनीतास्तदा गोपाः स्वयं देवेन विष्णुना।२३।

ब्रह्मणाप्येवमेवं तु वामहस्तेन भाषितम् । त्रपान्विता दर्शने तु बन्धूनां वरवर्णिनी ॥ २४॥

कैरहं तु समाख्याता येनेमं देशमागताः दृष्ट्वा तु तांस्ततः प्राह गायत्री गोपकन्यका।२५।

वामहस्तेन तान्सर्वान्प्राणिपातपुरःसरम्। अत्र चाहं स्थिता मातर्ब्रह्माणं समुपागता।२६।

भर्ता लब्धो मया देवः सर्वस्याद्यो जगत्पतिः नाहं शोच्या भवत्या तु न पित्रा न च बांधवैः।२७।

सखीगणश्च मे यातु भगिन्यो दारकैः सह सर्वेषां कुशलं वाच्यं स्थितास्मि सह दैवतैः।२८।

गतेषु तेषु सर्वेषु गायत्री सा सुमध्यमा ब्रह्मणा सहिता रेजे यज्ञवाटं गता सती।२९।

याचितो ब्राह्मणैर्ब्रह्मा वरान्नो देहि चेप्सितान्। यथेप्सितं वरं तेषां तदा ब्रह्माप्ययच्छत।३०।


अनुवाद:- २१-३०
उन सभी अहीरों ने जाने से पहले भगवान विष्णु से कहा कि हे देव ! आपने जो वरदान हम्हें दिया है वह निश्चय ही हमारा होकर रहे ! आप ही हमारे जाति कुल (वंश) में धर्म के सिद्धिकरण के लिए आप अवतार करने योग्य है ।२१।
आपका दर्शन करके ही हम सब लोग दिव्य होकर गोलोक के निवासी बन गये हैं। शुभ देने वाली ये कन्या भी हम लोगों के जाति कुल का तारण करने वाली बन गयी है ।२२।
हे देवों के स्वामी हे विभो ! आपका ऐसा ही वरदान हो ! इसके बाद स्वयं भगवान विष्णु द्वारा अहीरों को अनुनय पूर्वक आश्वस्त किया गया ।२३।
ब्रह्मा जी द्वारा भी अपने बाँये हाथ से सूचित करते हुए कहा गया कि ऐसा ही हो ! उसके दौरान लज्जित होने के कारण वह वर का वरण करने वाली कन्या गायत्री अपने बान्धवों को भी नहीं देख पा रही थी।२४।
किसके द्वारा मैं बता दी गयी जिस कारण ये इस देश को आगये। उन सबको (अपने भाई बन्धू माता पिता) को देखकर गोपकन्या यह बोली ।२५।
बाँयें हाथ के द्वारा उन सबको सामने से प्रणाम करती हुई उन अपने माता-पिता के पास जाकर कहा- मैंने सर्वप्रथम पति रूप में देव ब्रह्मा को प्राप्त कर लिया है। आप लोगों और मेरे माता-पिता और बान्धवों ! मेरे विषय में अब तुम सब को कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिए ।२७।
मेरी सखीयाँ', मेरी बहने और उनके पुत्र -पुत्रीयाँ सभी से मेरा कुशल आप लोग कहेंगे मैं देवताओं (देवीयों) के साथ हूँ।२८।
तत्पश्चात् उन सभी गोपों के अपने घर चले जाने पर अत्यन्ता सुन्दरी गायत्री देवी ब्रह्मा जी के साथ यज्ञ शाला में जाते हुए सुशोभित हुयीं ।२९।



किन्तु इसके बाद जो धटना घटी वह आश्चर्य जनक और सबको अचम्भित कर देने वाली वाली थी। हुआ यह कि उस दरम्यान यज्ञ को पूर्ण करने के लिए देवताओं और ऋषियों ने ब्रह्मा जी की पत्नी सावित्री के विकल्प में गोप कन्या गायत्री को स्थापित कर यज्ञ की सारी औपचारिकताएँ पूर्ण करने लगे। तभी ब्रह्मा जी की पत्नी सावित्री अपनी सखियों के साथ यज्ञशाला में उपस्थित हुईं। उसके बाद की धटना को नीचे उद्धृत किया जा रहा है -

कालहीनं न कर्तव्यं कृतं न फलदं यतः।
वेदेष्वेवमधीकारो दृष्टःसर्वैर्मनीषिभिः।१३१।
प्रावर्ग्ये क्रियमाणे तु ब्राह्मणैर्वेदपारगैः।
क्षीरद्वयेन संयुक्त शृतेनाध्वर्युणा तथा।१३२।
उपहूतेनागते नचाहूतेषु द्विजन्मसु।
क्रियमाणे तथाभक्ष्ये दृष्ट्वा देवी रुषान्विता।१३३।

उवाच देवी ब्रह्माणं सदोमध्ये तु मौनिनम्।
किमेतद्युज्यते देव कर्तुमेतद्विचेष्टितम्।१३४।
मां परित्यज्य यत्कामात्कृतवानसि किल्बिषम्।
नतुल्यापादरजसा ममैषा या शिरः कृता।१३५।
यद्वदन्ति जनास्सर्वे संगताः सदसि स्थिताः।
आज्ञामीश्वरभूतानां तां कुरुष्व यदीच्छसि।१३६।

131-136. तब यज्ञ में आहुति का अंश प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले देवताओं ने कहा: “(बलि) में देरी नहीं करनी चाहिए; (किसी कार्य के लिए) देर से किया हुआ, उसका (वांछित) फल नहीं देता; यही नियम वेदों में सभी विद्वानों द्वारा देखा गया है।” जब दो दूध के बर्तन तैयार हो गए, तो भोजन संयुक्त रूप से पकाया गया, और जब ब्राह्मणों को आमंत्रित किया गया, तो अध्वर्युजिसे आहुति दी गई थी, वह वहाँ आया था, और प्रवर्ग्य वेदों में कुशल ब्राह्मणों द्वारा किया गया था; खाना बन रहा था. देवी
(सावित्री) ने यह देखकर क्रोध से ब्रह्मा से कहा, जो (यज्ञ) सत्र में चुपचाप बैठे थे: “तुम यह क्या दुष्कर्म करने जा रहे हो, कि वासना के कारण तुमने मुझे त्याग दिया और पाप किया? वह, जिसे तुमने अपने सिर पर रखा है (अर्थात जिसे तुमने इतना महत्व दिया है) वह मेरे पैर की धूल से भी तुलनीय नहीं है। (यज्ञ-सभा में एकत्र हुए लोग यही कहते हैं।) यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा हो तो उन देवताओं की आज्ञा का पालन करो।

भवता रूपलोभेन कृतं लोकविगर्हितम्।
पुत्रेषु नकृतालज्जा पौत्रेषुचन तेप्रभो।१३७।

कामकारकृतं मन्य एतत्कर्मविगर्हितम्।
पितामहोसि देवानामृषीणां प्रपितामहः।१३८।

कथं न ते त्रपा जाता आत्मनःपश्यतस्तनुम्।
लोकमध्येकृतं हास्यमहं चापकृता प्रभो।१३९।

यद्येष ते स्थिरो भावस्तिष्ठ देव नमोस्तुते।
अहंकथंसखीनांतु दर्शयिष्यामि वैमुखम्।१४०।
भर्त्रा मे विधृता पत्नी कथमेतदहं वदे।

ऋत्विग्भिस्त्वरितश्चाहं दीक्षाकालादनंतरम्।१४१। (१४८)
पत्नीं विना न होमोत्र शीघ्रं पत्नीमिहानय।

137-141. सौन्दर्य की अभिलाषा के द्वारा तू ने वह किया है, जिसकी लोग निन्दा करते हैं; हे प्रभु, तू न तो अपने बेटों से लज्जित हुआ और न अपने पोतों से; मैं समझता हूँ कि तुमने आवेश में आकर यह निंदनीय कार्य किया है; आप देवताओं के पौत्र और ऋषियों के प्रपौत्र हैं! जब तुमने अपना शरीर देखा तो तुम्हें शर्म कैसे नहीं आई? तुम लोगों के लिए हास्यास्पद बन गये हो और तुमने मुझे हानि पहुँचायी है। यदि यह तुम्हारी दृढ़ भावना है, तो हे भगवान, (अकेले) जियो; तुम्हें नमस्कार (अलविदा); मैं अपने दोस्तों को अपना चेहरा कैसे दिखा पाऊँगी और कैसे लोगों को यह बतापाऊँगी कि मेरे पति ने (किसी दूसरी स्त्री को) अपनी पत्नी बना लिया है?”

इस पर ब्रह्मा जी ने सावित्री से कुछ इस प्रकार कहा-

शक्रेणैषा समानीता दत्तेयं मम विष्णुना।१४२।
गृहीता च मया सुभ्रु क्षमस्वैतं मया कृतम्।

न चापराधं भूयोन्यं करिष्ये तव सुव्रते।१४३।
पादयोः पतितस्तेहं क्षमस्वेह नमोस्तुते।।


142-143. दीक्षा के तुरन्त बाद, पुजारियों ने मुझसे कहा कि- पत्नी के बिना यज्ञ नहीं किया जा सकता; अपनी पत्नी को जल्दी लाओ. यह (दूसरी) पत्नी इन्द्र द्वारा लाई गई थी, और विष्णु द्वारा मुझे प्रदान की गई थी; (तो) मैंने उसे स्वीकार कर लिया; हे सुन्दर भौहों वाली, मैंने जो किया उसके लिए मुझे क्षमा करें। हे उत्तम प्रतिज्ञा करने वाली, मैं फिर तुझ पर ऐसा अन्याय न करूँगा। मुझे क्षमा करना, मैं तुम्हारे चरणों पर गिर पड़ा हूँ; आपको मेरा प्रणाम.

▪️ब्रह्मा जी के इस प्रकार सम्बोधित करने पर सावित्री और क्रोधित हो गयी और उनको कुछ इस प्रकार से श्राप देते हुए कहीं कि-


यदि मेस्ति तपस्तप्तं गुरवो यदि तोषिताः।
सर्वब्रह्मसमूहेषु स्थानेषु विविधेषु च।१४५।

नैव ते ब्राह्मणाः पूजां करिष्यंति कदाचन।ॠते तु कार्तिकीमेकां पूजां सांवत्सरीं तव।१४६।

करिष्यंति द्विजाः सर्वे मर्त्या नान्यत्र भूतले।एतद्ब्रह्माणमुक्त्वाह शतक्रतुमुपस्थितम्।१४७।


145-147. "यदि मैंने तपस्या की है, यदि मैंने ब्राह्मणों के समूहों में और विभिन्न स्थानों पर अपने गुरुओं को प्रसन्न किया है, तो ब्राह्मण कभी भी आपकी पूजा नहीं करेंगे, सिवाय कार्तिक के महीने में आपकी वार्षिक पूजा (जो कि ब्राह्मणों द्वारा की जाती है) को छोड़कर (अकेले) पेशकश करें, लेकिन पृथ्वी पर किसी अन्य स्थान पर अन्य पुरुषों को नहीं।”


वहीं पास में मौजूद इन्द्र को भी सावित्री ने शाप देते हुए कहा कि-

भोभोः शक्र त्वयानीता आभीरी ब्रह्मणोन्तिकम्।
यस्मात्ते क्षुद्रकंकर्मतस्मात्वं लप्स्यसे फलम्।१४८।

यदा संग्राममध्ये त्वं स्थाता शक्र भविष्यसि।
तदा त्वं शत्रुभिर्बद्धो नीतः परमिकां दशाम्।१४९।

यदा संग्राममध्ये त्वं स्थाता शक्र भविष्यसि।
तदा त्वं शत्रुभिर्बद्धो नीतः परमिकां दशाम्।१४९।

अकिंचनो नष्टसत्वः शत्रूणां नगरे स्थितः।
पराभवं महत्प्राप्य न चिरादेव मोक्ष्यसे।१५०।

अकिंचनो नष्टसत्वः शत्रूणां नगरे स्थितः।
पराभवं महत्प्राप्य न चिरादेव मोक्ष्यसे।१५०।

हे शक्र (इन्द्र), आप चरवाहे (गोपी,अहीर कन्या) को ब्रह्मा के पास ले आए, यह तुमरा नीच कर्म था इसलिए तुम्हें इसका फल अवश्य मिलेगा।१४८
जब तुम युद्ध में खड़े होगे (लड़ने को तैयार होगे) तो उसी समय शत्रुओं द्वारा बाँध दिये जाओगे और बहुत (दयनीय) दुर्दशा में पहुँच जाओगे। १४९
तथा बिना किसी सम्पत्ति के होने के कारण, अपनी ऊर्जा खोकर, आप एक बड़ी हार का सामना करने के बाद, अपने दुश्मन के शहर में रहेंगे, लेकिन जल्द ही रिहा कर दिए जाओगे। १५०



🔆 इसके उपरान्त सावित्री ने वहीं पर खड़े विष्णु को भी शाप देते हुए कुछ इस तरह के शब्द कही-

शक्रं शप्त्वा तदा देवी विष्णुं वाक्यमथाब्रवीत्।
भृगुवाक्येन ते जन्म यदा मर्त्ये भविष्यति।१५१।

भार्यावियोगजं दुःखं तदा त्वं तत्र भोक्ष्यसे।
हृतातेशत्रुणा पत्नी परे पारो महोदधेः।१५२।

न च त्वं ज्ञास्यसे नीतां शोकोपहतचेतनः।
भ्रात्रा सह परं कष्टामापदं प्राप्य दुःखितः।१५३।

यदा यदुकुले जातः कृष्णसंज्ञो भविष्यसि।
पशूनां दासतां प्राप्य चिरकालं भ्रमिष्यसि।१५४।

हे विष्णु !"जब तुम भृगु के शाप के कारण नश्वर संसार में जन्म लोगे, तो वहाँ तुम्हें (अर्थात उस अस्तित्व में) अलगाव की पीड़ा का अनुभव होगा।" तेरी पत्नी को तेरा शत्रु (रावण) महासागर के उसपार (लंका में) ले जाएगा; तब दुःख से व्याकुल मन के कारण तुम्हें पता नहीं चलेगा कि (किसके द्वारा तुम्हारी पत्नी को ले जाया गया है) और तुम एक महान विपत्ति का सामना करते हुए अपने भाई के साथ दुखी होगे। और उसके बाद (द्वापरयुग) जब तुम यदुकुल में जन्म लोगे तो तुम्हारा नाम कृष्ण रखा जायेगा; तब तुम पशुओं का सेवक (गोपालक) होकर बहुत दिनों तक भटकते रहेगो।” १५१-१५४

विशेष- भगवान श्रीकृष्ण को भू-तल पर गोपकुल यानी यादव वंश में अवतरित होने की घटना क्रम में सावित्री के शाप की अहम भूमिका मानी जाती है। जो आगे चलकर भृगु के शाप से श्री राम की पत्नी सीता का रावण द्वारा हरण हुआ और राम को बहुत कष्ट हुआ। उसके पश्चात द्वापरयुग में भगवान श्रीकृष्ण का गोपों (आभीरों) यानी यादवों के यहाँ गोपालक के रूप में जन्म हुआ। तब उन्हीं गोपों को साथ लेकर नारायणी सेना बनाई और उन्हीं को लेकर बड़े से बड़े युद्ध को जीत कर पृथ्वी के भार को दूर किया और धर्म को पुनर्स्थापित किया।


इसके बाद सावित्री ने क्रोधित होकर शिव जी को भी शाप देते हुए कही कि-

तदाह रुद्रं कुपिता यदा दारुवने स्थितः।
तदा त ॠषयः क्रुद्धाःशापं दास्यंतिवै हर।१५५।
भोभोः कापालिक क्षुद्र स्त्रीरस्माकं जिहीर्षसि।
तदेतद्दर्पितं तेद्य भूमौ लिगंपतिष्यति।१५६।

“हे रुद्र, जब तुम दारुवन में रहोगे, तब क्रोधित ऋषि तुम्हें शाप देंगे कि- हे खोपड़ीवाले, नींच, तू हमारे बीच में से एक स्त्री को छीन लेना चाहता है; अत: तुम्हारा यह अभिमानी जनन अंग आज भूमि पर गिर पड़ेगा।


यह कहकर सावित्री यज्ञस्थली से बहुत दूर एकान्त में चली गई। तब उसी समय अहीर कन्या गायत्री ने ब्रह्माजी की प्रथम पत्नी सावित्री ने जो विष्णु को यह शाप दे चुकी थी कि- हे विष्णु ! जब तुम यदुवंश में जन्म लोगे, तो तुम कृष्ण के नाम से जाने जाओगे। उस समय तुम पशुओं (गायों) के सेवक बन कर लम्बे समय तक इधर-उधर भटकते रहोगे। उस शाप को गायत्री ने वरदान में बदलते हुए विष्णु से जो कहा उसका वर्णन- स्कन्द पुराण खण्ड- (६) के नागर खण्ड के अध्याय- १९३ के श्लोक -(१४) और (१५) में मिलता है। जिसमें गायत्री विष्णु से कहतीं हैं कि -

तेनाकृत्येऽपि  रक्तास्ते  गोपा यास्यन्ति श्लाघ्यताम्।
सर्वेषामेव लोकानां देवानां च विशेषतः ॥१४॥
यत्रयत्र  च वत्स्यंन्ति  मद्वं शप्रभवानराः।
तत्रतत्र श्रियो वासो वनेऽपि प्रभविष्यति॥१५॥

अनुवाद -(१४-१५)
• आभीर कन्या गायत्री विष्णु से कहती है- हे विष्णो ! (श्रीकृष्ण) तुम्हारे रक्त सम्बन्धी (blood relative) सभी गोप बिना कुछ किये ही तुम्हारे द्वारा प्रसिद्धि को प्राप्त हो जाऐंगे। और इनकी प्रशंसा विशेषतः देवताओं सहित सभी लोकों में होगी।
•  पुन: गायत्री विष्णु से कहती हैं- मेरे गोप वंश के लोग जहाँ भी रहेंगे वहाँ श्री (सौभाग्य और समृद्धि) विद्यमान रहेगी, चाहे वह स्थान जंगल ही क्यों न हो।१५।

विशेष- ज्ञात हो उपर्युक्त श्लोकों में गायत्री द्वारा जिस विष्णु को सम्बोधित किया जा रहा है वह छूद्र (छोटे) विष्णु हैं जो परमेश्वर श्रीकृष्ण के एक अंश से भूतल पर श्रीकृष्ण का ही प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ऐसे ही अनन्त ब्रह्माण्ड हैं और उन सभी में श्रीकृष्ण के एक-एक अंश से उन सभी ब्रह्माण्डों में उतने ही छूद्र (छोटे) विष्णु रहते हैं जो परमेश्वर श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व किया

करते हैं। अतः गायत्री द्वारा भूलोक पर विष्णु नाम का वास्तविक सम्बोधन परमेश्वर श्रीकृष्ण के लिए ही है।

इस प्रकार से आप लोग- ब्रह्मा जी का पुष्कर यज्ञ, अहीर कन्या देवी गायत्री तथा उनके वैवाहिक सम्बन्धों जाना। जिसका सम्पूर्ण निष्कर्ष निम्नलिखित है-

.पहली बात यह कि- ब्रह्मा की पत्नी गायत्री केवल यज्ञ सम्पादन और संसार में आध्यात्मिक ज्ञान के प्रसारण के लिए ही है। सांसारिक सृष्टि उत्पादन के लिए नहीं।

• दूसरी बात यह कि- गोपों से बड़ा कोई धार्मिक, सदाचारी एवं धर्मवत्सल नहीं है। इस बात को जानकर ही भगवान विष्णु ने गोपों की कन्या- देवी गायत्री को ब्रह्माजी को कन्यादान किया। और ब्रह्माजी ने उसे अपनी पत्नी स्वीकार किया।

• तीसरी बात यह सिद्ध होती है कि- आभीर कन्या देवी गायत्री उस स्थान और पद को प्राप्त हुई। जिसे योगी तथा वेदज्ञ ब्राह्मण, प्रार्थना करने के बाद भी नहीं पाते। अब इससे बड़ा ब्राह्मणत्व कर्म वैष्णव वर्ण के गोपों के लिए और क्या हो सकता है।

• चौथी बात यह कि- देवी गायत्री महती विदुषी और कठिन व्रतों का पालन करने वाली प्रथम अहीर कन्या थीं। जिसकी  प्रसंशा भगवान विष्णु ने ब्रह्माजी के यज्ञ-सत्र में की और गायत्री को ही ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी पद पर नियुक्त किया। जो आज भी यह मान्यता है कि संसार का सम्पूर्ण ज्ञान गायत्री से नि:सृत होता है।

और पांचवीं सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि- गोपों अर्थात् आभीरों में श्रीकृष्ण का रक्त सम्बन्ध है।



विशेष- किन्तु उस यज्ञ में एक और घटना घटी, जिसमें ब्राह्मणों ने शिव जी को इतना परेशान किया कि अन्त में शिव जी बाध्य होकर ब्राह्मणों को ऐसा शाप दिया कि उसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। उसको भी जान लेना आवश्यक है। तो उस घटना का वर्णन इसी अध्याय के श्लोक- ३२ से ७५ में कुछ इस प्रकार से लिखा गया है-


दिव्यंवर्षशतं साग्रं स यज्ञो ववृधे तदायज्ञवाटं कपर्दी तु भिक्षार्थं समुपागतः।३२ या ३४।

अनुवाद:-वह यज्ञ दिव्य सौ वर्षों से भी अधिक वर्षों तक चलता रहा उसी समय यज्ञशाला में भगवान रूद्र भिक्षा प्राप्त करने के लिए आये ।३२।

बृहत्कपालं सङ्गृह्य पञ्चमुण्डैरलङ्कृतः ऋत्विग्भिश्च सदस्यैश्च दूरात्तिष्ठन्जुगुप्सितः।३३।
अनुवाद:-वे अपने हाथ में बहुत बड़ा कपाल लिए हुए और पाँच मुण्डों की माला धारण किए हुए थे उन्हें दूर से उठते हुए देखकर ऋत्विक् और सदस्य उनकी निन्दा करने लगे ३३।

कथं त्वमिह सम्प्राप्तो निन्दितो वेदवादिभिः एवं प्रोत्सार्यमाणोपि निन्द्यमानः स तैर्द्विजैः।३४।

अनुवाद:-
अरे ! तुम यहाँ कैसे आ गये ? वेदज्ञ पुरुष तुम्हारे इस आचरण और स्वरूप की निन्दा करते हैं । इस प्रकार शिव को उन पुरोहितों द्वारा  दूर किये जाते हुए और निन्दा किये जाते हुए  ।३४।

उवाच तान्द्विजान्सर्वान्स्मितं कृत्वा महेश्वरः अत्र पैतामहे यज्ञे सर्वेषां तोषदायिनि।३५।

अनुवाद:-शंकर ने मुस्कराकर उन ब्राह्मणों के प्रति कहा यहाँ सभी को सन्तुष्ट करने वाले ब्रह्मा जी का यज्ञ है ।३५।

कश्चिदुत्सार्य तेनैव ऋतेमां द्विजसत्तमाः उक्तः स तैः कपर्दी तु भुक्त्वा चान्नं ततो व्रज।३६।

अनुवाद:-हे द्विज श्रेष्ठो ! तुम किसी के द्वारा मुझे ही दूर हटाया जा रहा है। अर्थात हे ब्राह्मण श्रेष्ठो ! केवल मुझको ही भगाया जा रहा है ? इसके पश्चात वे पुरोहित बोले ! ठीक है तुम भोजन करके चले जाना ।३६।

कपर्दिना च ते उक्ता भुक्त्वा यास्यामि भो द्विजाः एवमुक्त्वा निषण्णः स कपालं न्यस्य चाग्रतः।३७।

अनुवाद:-इसके प्रत्युत्तर में शंकर जी ने कहा – ब्राह्मणों ! मैं भोजन करके चला जाऊँगा इस तरह से कहकर शंकर जी अपने सामने कपाल रखकर बैठ गये ।३७।

तेषां निरीक्ष्य तत्कर्म चक्रे कौटिल्यमीश्वरः मुक्त्वा कपालं भूमौ तु तान्द्विजानवलोकयन्।३८।

अनुवाद:-उन ब्राह्मणों के उस कर्म को देखकर शंकर जी ने भी कुटिलता की और कपाल को भूमि पर रखकर उन लोगों को देखते रहे ।३८।

उवाच पुष्करं यामि स्नानार्थं द्विजसत्तमाः तूर्णं गच्छेति तैरुक्तः स गतः परमेश्वरः।३९।

अनुवाद:-उन्होंने कहा श्रेष्ठ ब्राह्मणों ! मैं पुष्कर में स्नान करने के लिए जा रहा हूँ । ब्राह्मणों ने कहा शीघ्र जाओ ! यह सुनकर परमेश्वर शंकर वहाँ से चले गये।३९।

वियत्स्थितः कौतुकेन मोहयित्वा दिवौकसः स्नानार्थं पुष्करं याते कपर्दिनि द्विजातयः।४०।

अनुवाद:-वे देवताओं को मोहित करके आकाश में वहीं स्थित हो गये; कौतुक के साथ शंकर जी के पुष्कर चले जाने पर ब्राह्मणों ने परस्पर कहा ।४०।

कथं होमोत्र क्रियते कपाले सदसि स्थिते कपालान्तान्यशौचानि पुरा प्राह प्रजापतिः।४१।

अनुवाद:-जब इस यज्ञ सभा मेंं कपाल विद्यमान है ; तो फिर होम कैसे किया जा सकता है ? कपाल के भीतर रहने वाली वस्तुएँ अपवित्र होती हैं ऐसा स्वयं ब्रह्मा जी ने पूर्व काल में कहा था

विप्रोभ्यधात्सदस्येकः कपालमुत्क्षिपाम्यहं उद्धृतं तु सदस्येन प्रक्षिप्तं पाणिना स्वयम्।४२।

अनुवाद:-उस सभा में एक ब्राह्मण ने कहा कि मैं इस कपाल को उठाकर फैंक देता हूँ। और स्वयं सदस्य द्वारा अपने हाथ में उठाकर उसे फैंक दिए जाने पर ।४२।

तावदन्यत्स्थितं तत्र पुनरेव समुद्धृतमेवं  द्वितीयं तृतीयं विंशतिस्त्रिंशदप्यहो।४३।

अनुवाद:-वहाँ दूसरा कपाल निकल आया फिर उसके भी फैंक दिये जाने पर तीसरा बींसवाँ तीसवाँ भी कपाल ब्राह्मण द्वारा फैंका गया ।४३।

पञ्चाशच्च शतं चैव सहस्रमयुतं तथा एवं नान्तः कपालानां प्राप्यते द्विजसत्तमैः।४४।

अनुवाद:-पचासवाँ' सौंवाँ 'हजारवाँ 'दश हजारवाँ 'भी उसी तरह उठाकर फैंका गया इस तरह वे ब्राह्मण कपालों का अन्त नहीं कर पाते थे ।४४।

नत्वा कपर्दिनं देवं शरणं समुपागताः पुष्करारण्यमासाद्य जप्यैश्च वैदिकैर्भृशम्।४५।

अनुवाद:-इसके पश्चात शंकर जी को नमस्कार करके वे ब्राह्मण शंकर जी की शरण में उनके पास गये पुष्कर वन में जाकर वैदिक स्त्रोतों द्वारा उन ब्राह्मणों ने शंकर (रूद्र) की अत्यधिक स्तुति की।४५।

तुष्टुवुः सहिताः सर्वे तावत्तुष्टो हरः स्वयं  ततः सदर्शनं प्रादाद्द्विजानां भक्तितःशिवः।४६।

अनुवाद:-परिणामस्वरूप शिव जी प्रसन्न हो गये और ब्राह्मणों की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें साक्षात् दर्शन दिया।४५-४६।

उवाच तांस्ततो देवो भक्तिनम्रान्द्विजोत्तमान् पुरोडाशस्य निष्पत्तिः कपालं न विना भवेत्।४७।

अनुवाद:- उसके पश्चात शंकर की भक्ति से नम्र बने रहे ब्राह्मणों से शंकर जी ने कहा ! ब्राह्मणों कपाल के विना पुरोडास की सिद्धि अथवा निष्पत्ति नहीं होती है ।४७।

विशेष- यव (जौ)आदि के आटे की बनी हुई टिकिया जो कपाल में पकाई जाती थी।
विशेषत:— यह आकार में लम्बाई लिए गोल और बीच में कुछ मोटी होती थी। यज्ञों में इसमें से टुकड़ा काटकर देवताओं के लिये मन्त्र पढ़कर आहुति दी जाती थी।
अत: यह यज्ञ का अंग है। यही हवि है अर्थात वह हवि या पुरोडाश जो यज्ञ से बच रहे।
वह वस्तु जो यज्ञ में होम की जाय। यज्ञभाग।. सोमरस को भी पुरोडाश कहा जाता था आटे की चौंसी

कुरुध्वं वचनं विप्राः भागः स्विष्टकृतो मम एवं कृते कृतं सर्वं मदीयं शासनं भवेत्।४८।

अनुवाद:-हे ब्राह्मणों ! मेरी बात मानों स्विष्टकृत (अच्छे यज्ञ) का भाग मेरा होता है ऐसा करने से मेरी सभी आज्ञाओं का पालन अथवा शास्त्रीय विधान हो जाता है ।४८।
विशेष- सु+इष्ट= स्विष्ट इज्यते इष्यते वा यज इष वा + भावे क्त ।) इष्ट– यज्ञादिकर्म्म ।

तथेत्यूचुर्द्विजाश्शंभुं कुर्मो वै तव शासनम्।कपालपाणिराहेशो भगवंतं पितामहम्।।४९।

अनुवाद:-तब सभी द्विज बोले ! हे शम्भु ! आप जो भी आदेश दोगे हम करेगें। अर्थात् ब्राह्मणों ने तथास्तु ! कह कर शंकर जी से कहा कि- हम आपकी आज्ञाओं का पालन करेंगे हाथ में कपाल लेकर शिवजी ने ब्रह्मा जी से कहा ।।४९।

वरं वरय भो ब्रह्मन्हृदि यत्ते प्रियं स्थितम् । सर्वं तव प्रदास्यामि अदेयं नास्ति मे प्रभो।५०।

अनुवाद:-हे ब्रह्मा ! आपके हृदय में जो वरदान की प्रिय इच्छा हो वह माँग लीजिए आपको अदेय कुछ भी नहीं है प्रभो !।५०।

ब्रह्मोवाच न ते वरं ग्रहीष्यामि दीक्षितोहं सदः स्थितः सर्वकामप्रदश्चाहं यो मां प्रार्थयते त्विह।५१।

अनुवाद:-ब्रह्मा जी ने कहा हे शंकर मैं आपसे वरदान नहीं मागूँगा मैं दीक्षा लेकर इस सभा में उपस्थित हूँ । यहाँ कोई भी मुझसे जो याचना करता है मैं उसकी सारी कामनाऐं पूर्ण कर देता हूँ।५१।

एवं वदन्तं वरदं क्रतौ तस्मिन्पितामहम्।तथेति चोक्त्वा रुद्रः स वरमस्मादयाचत।५२।

अनुवाद:-उस यज्ञ में इस प्रकार कहने वाले और वरदान देने वाले ब्रह्मा जी से शंकर ने वरदान माँगा ।५२।

ततो मन्वन्तरेतीते पुनरेव प्रभुः स्वयम्।ब्रह्मोत्तरं कृतं स्थानं स्वयं देवेन शम्भुना।५३।

अनुवाद:- इसके बाद मन्वन्तर बीत जाने पर स्वयं प्रभु शिव ने ब्रह्मोत्तर स्थान पर स्वयं का स्थान बनाया ।।५३।

चतुर्ष्वपि हि वेदेषु परिनिष्ठां गतो हि यः तस्मिन्काले तदा देवो नगरस्यावलोकने।५४।

अनुवाद:- चारों वेदोंं के जानकार ब्राह्मण उस समय निश्चय ही वे तब देव नगरों को देखने के लिए गये ।५४।

सम्भाषणे द्विजानां तु कौतुकेन सदो गतः तेनैवोन्मत्तवेषेण हुतशेषे महेश्वरः।५५।

अनुवाद:-शिवजी को सभा में उन्मत्त वेष में गया हुआ देखकर ब्राह्मणों को शिव जी ने कौतूहल से बात करते देखा।५५।

प्रविष्टो ब्रह्मणः सद्म दृष्टो देवैर्द्विजोत्तमैः प्रहसन्ति च केप्येनं केचिन्निर्भर्त्सयंति च।५६।

अनुवाद:-शंकर जी उस उन्मत्त वेष से ब्राह्मणों के घर में घुस गये। उस समय ब्राह्मणों ने उनको देखकर कुछ ने उनका उपहास किया तो कुछ ने निन्दा की ।५६।

अपरे पान्सुभिः सिञ्चन्त्युन्मत्तं तं तथा द्विजाः लोष्टैश्च लगुडैश्चान्ये शुष्मिणो बलगर्विताः।५७।

अनुवाद:-दूसरे ब्राह्मण उन्मत्त शंकर के ऊपर धूल फेंकने लगे। बल के गर्व से कुछ ब्राह्मण प्रचण्ड बने थे कुछ ब्राह्मण शंकर को ढ़ेले और लकुटी से मारने लगे ।५७।

प्रहरन्ति स्मोपहासं कुर्वाणा हस्तसंविदम्।ततोन्ये वटवस्तत्र जटास्वागृह्य चान्तिकम्।५८।

अनुवाद:-कुछ उपहास करते हुए शंकर पर मुक्कों से प्रहार करते हैं तत्पश्चात कुछ अन्य ब्रह्मचारी (वटव) वहाँ उनकी जटा पकड़कर उनके पास जाते हैं।५८।

पृच्छन्ति व्रतचर्यां तां केनैषा ते निदर्शिता अत्र वामास्त्रियः सन्ति तासामर्थेत्वमागतः।५९।

अनुवाद:-यह व्रतचर्या किससे तुमने पूछी और किसके द्वारा इसको निर्देशित किया गया है यहाँ सुन्दर स्त्रियाँ हैं उनको पाने के लिए तुम यहाँ आये हो।५९।

केनैषा दर्शिता चर्या गुरुणा पापदर्शिना येनचोन्मत्तवद्वाक्यं वदन्मध्ये प्रधावसि।६०।

अनुवाद:-तुम्हें यह वृतचर्या किस पापदर्शी गुरु के द्वारा दिखाई गयी है ? किस पापी गुरु ने तुमको यह आचरण बताया है किसके कहने से पागल के समान बोलते हुए तुम सबके बीच में दौड़ रहे हो।६०।

शिश्नं मे ब्रह्मणो रूपं भगं चापि जनार्दनः उप्यमानमिदं बीजं लोकः क्लिश्नाति चान्यथा।६१।

अनुवाद:-शंकर ने कहा मेरा लिंग ब्रह्म स्वरूप है और भग (योनि) भी जनार्दन है अन्यथा यह संसार बीज वपन करते हुए कष्ट अनुभव करता।६१।
विशेष- जनान् लोकान् अर्द्दति गच्छति प्राप्नोति रक्षणार्थं पालकत्वादिति जनार्द्दनः । ” इत्यमरटीकायां भरतः
(जन: जननं अर्द्दति प्राप्नोति इति जनार्दन-यौनि).     

मयायं जनितः पुत्रो जनितोनेन चाप्यहम्।महादेवकृते सृष्टिः सृष्टा भार्या हिमालये।६२।

अनुवाद:-मैने इसे पुत्र रूप से उत्पन्न किया और इसने मुझे उत्पन्‍न किया है महादेव के द्वारा सृष्टि किये जाने पर उसकी पत्नी की सृष्टि हिमालय से हुई।६२।

उमादत्ता तु रुद्रस्य कस्य सा तनया वद मूढा यूयं न जानीथ वदतां भगवांस्तु वः।६३।

अनुवाद:-उमा का विवाह शंकर से हुआ बताओ यह किस की पुत्री है। तुम लोग मूर्ख हो नहीं जानते हो जाकर इस बात को ब्राह्मा जी से पूछो ।६३।

ब्रह्मणा न कृता चर्या दर्शिता नैव विष्णुना गिरिशेनापि देवेन ब्रह्मवध्या कृते न तु।६४।

अनुवाद:-इस आचरण को ब्रह्मा ने नहीं किया यह आचरण विष्णु के द्वारा भी नहीं दर्शाया गया है। पर्वत पर सोने वाले देव के द्वारा यह ब्रह्म हत्या करने के निमित्त तो नहीं ! ।६४।

कथंस्विद्गर्हसे देवं वध्योस्माकं त्वमद्य वै एवं तैर्हन्यमानस्तु ब्राह्मणैस्तत्र शङ्करः।६५।

अनुवाद:-अरे तुम लोग ब्रह्मा जी की निन्दा कर रहे हो आज तुम हम लोगों के बाध्य हो इस तरह से उन ब्राह्मणों द्वारा कहकर मारे जाते हुए है वहाँ शंकर । ६५।

स्मितं कृत्वाब्रवीत्सर्वान्ब्राह्मणान्नृपसत्तम किं मां न वित्थ भो विप्रा उन्मत्तं नष्टचेतनम्।६६।

अनुवाद:-हे नृप श्रेष्ठ शंकर ने मुस्कराते हुए उन ब्राह्मणों से कहा ब्राह्मणों ! क्या तुम लोग अज्ञानी और उन्मत्त मुझको नहीं जानते हो ।६६।

यूयं कारुणिकाः सर्वे मित्रभावे व्यवस्थिताः वदमानमिदं छद्म ब्रह्मरूपधरं हरम्।६७।

अनुवाद:-बनाबटी ब्रह्म-रूपधारी शंकर को इस तरह से कहते हुए कि आप लोग दयालु और मेरे मित्र हैं  ।६७।

मायया तस्य देवस्य मोहितास्ते द्विजोत्तमाः कपर्दिनं निजघ्नुस्ते पाणिपादैश्च मुष्टिभिः।६८।

अनुवाद:-शंकर की माया से मोहित वे ब्राह्मण शंकर को हाथ' पैैर' मुुुक्कोंं से मारते हैं ।६८।

दण्डैश्चापि च कीलैश्च उन्मत्तवेषधारिणम्पीड्यमानस्ततस्तैस्तु द्विजैः कोपमथागमत्।६९।

अनुवाद:-उन्मत्त वेष धारी शंकर को वे डण्डों और कीलों से पीडित करने लगे तब उन सबके द्वारा पीटे जातेे हुए शंकर क्रोधित हो गये ।६९।

ततो देवेन ते शप्ता यूयं वेदविवर्जिताः ऊर्ध्वजटाः क्रतुभ्रष्टाः परदारोपसेविनः।७०।

अनुवाद:-इसके बाद ने उन ब्राह्मणों को शंकर जी ने शाप दे दिया कि तुम सब वेदज्ञानविहीन, ऊपर की ओर जटा रखने वाले, और  यज्ञाधिकार से रहित परस्त्रीगामी हो जाओ ।७०।

वेश्यायां तु रता द्यूते पितृमातृविवर्जिताः न पुत्रः पैतृकं वित्तं विद्यां वापि गमिष्यति।७१।

अनुवाद:- तुम सब ब्राह्मण वेश्या- प्रेमी' द्यूतक्रीडाप्रेमी, और माता-पिता से रहित हो जाओगे  तथा तुम लोगों का पुत्र पिता की सम्पत्ति अथवा विद्या को नहीं प्राप्त कर पायेगा।७१।

सर्वे च मोहिताः सन्तु सर्वेन्द्रियविवर्जिताः रौद्रीं भिक्षां समश्नन्तु परपिण्डोपजीविनः।७२।

अनुवाद:-तुम सब लोग अज्ञानी तथा शिथिल इन्द्रियों वाले हो जाओगे, रूद्र की भिक्षा को खाने के लिए दूसरों के द्वारा दिये गये अन्न पर ही जीवन धारण करोगे। ७२।

आत्मानं वर्तयन्तश्च निर्ममा धर्मवर्जिताः कृपार्पिता तु यैर्विप्रैरुन्मत्ते मयि साम्प्रतम्।७३।

अनुवाद:-जिन ब्राह्मणों ने मुझ उन्मत्त के ऊपर इस समय कृपा की है। वे केवल अपने शरीर का पोषण करने वाले, निर्मम और अधार्मिक हो जाऐंगे, ७३।

तेषां धनं च पुत्राश्च दासीदासमजाविकम् । कुलोत्पन्नाश्च वै नार्यो मयि तुष्टे भवन्विह।७४।

अनुवाद:-उन ब्राह्मणों के यहाँ धन पुत्र दासी 'दास बकरी" भेड़ आदि पशु हों मेरी कृृृृपा से उनके यहाँ कुलीन (सदकुुुल) में उत्पन्न नारियाँ हों ।७४।


एवं शापं वरं चैव दत्वांतर्द्धानमीश्वरः गतो द्विजागते देवे मत्वा तं शंकरं प्रभुम्।७५।

अनुवाद:- इस तरह से ब्राह्मणों को शाप और वरदान देकर अर्द्ध नारीश्वर शंकर जी अन्तर्ध्यान हो गये उनके चले जाने पर ब्राह्मणों ने जाना कि ये तो भगवान शंकर थे ।७५।


इस प्रकार से परिशिष्ट (4) गायत्री कथा के साथ समाप्त हुआ। अब इसके अगले परिशिष्ट (5) में गोप कन्या स्वाहा और स्वधा के बारे में जानकारी दी गई है।

परिशिष्ट (5)


गोपी स्वाहा और स्वधा की कथा।


देवी गायत्री के समान ही गोप कुल की देवी दक्षिणा, देवी स्वाहा और स्वधा भी हैं। जिनका यज्ञ, हवन और पित्र- पूजन में विशेष भूमिका रहती है। क्योंकि यज्ञ और हवन के दरम्यान जो स्वाहा नाम के उच्चारण से हवन कुण्डों में नैवेद्य अर्पण किया जाता है, और यज्ञ समाप्ति के बाद जो दान दक्षिणा दिया जाता है, वह सब देवी स्वाहा और दक्षिण के माध्यम से ही फलीभूत होता है। और ये देवी स्वाहा, स्वधा और दक्षिणा दोनों ही गोपेश्वर श्रीकृष्ण के गोलोक की गोपी सुशीला के ही अंशावतार है। जो कभी गोलोक में श्रीराधा के शाप से गोपी सुशील को भूतल पर स्वाहा, स्वधा और दक्षिणा के रूप में आना पड़ा था।

जिसमें सुशीला के गोपी होने का प्रमाण तथा सुशीला को
यज्ञ पुरुष की पत्नी दक्षिणा के रूप में उत्पन्न होने का वर्णन देवी भागवत पुराण के नवम स्कन्ध के अध्याय- (४५) के निम्नलिखित श्लोकों में मिलता है -

गोपी सुशीला गोलोके पुराऽऽसीत्प्रेयसी हरेः।
राधा प्रधाना सध्रीची धन्या मान्या मनोहरा।२।

अतीव सुन्दरी रामा सुभगा सुदती सती ।
विद्यावती गुणवती चातिरूपवती सती॥३।

अनुवाद - प्राचीन काल में गोलोक में भगवान् श्रीकृष्ण की प्रेयसी सुशीला नामक एक गोपी थी। परमधन्या, मान्या तथा मनोहरा वह गोपी भगवती राधा की प्रधान सखी थी। वह अत्यन्त सुन्दर, लक्ष्मी के लक्षणों से सम्पन्न, सौभाग्यवती, उज्ज्वल दाँतों वाली, परम पतिव्रता साध्वी, विद्या गुण तथा रूप से अत्यधिक सम्पन्न थी।२-३।

रसज्ञा रसिका रासे रासेशस्य रसोत्सुका ।
उवासादक्षिणे क्रोडे राधायाः पुरतः पुरा ॥७॥

सम्बभूवानम्रमुखो भयेन मधुसूदनः ।
दृष्ट्वा राधां च पुरतो गोपीनां प्रवरोत्तमाम् ॥८।

अनुवाद- वह रसज्ञान से परिपूर्ण, रासक्रीडा की रसिक तथा रासेश्वर श्रीकृष्णके प्रेमरसहेतु लालायित रहनेवाली वह गोपी सुशीला एक बार राधा के सामने ही भगवान् श्रीकृष्ण के वाम अंक (बगल) में बैठ गयी ॥ ७-८।

कामिनीं रक्तवदनां रक्तपङ्‌कजलोचनाम् ।
कोपेन कम्पिताङ्‌गीं च कोपेन स्फुरिताधराम्॥९॥

वेगेन तां तु गच्छन्तीं विज्ञाय तदनन्तरम् ।
विरोधभीतो भगवानन्तर्धानं चकार सः॥१०॥

अनुवाद- तब मधुसूदन श्रीकृष्ण ने गोपिकाओं में परम श्रेष्ठ राधा की ओर देखकर भयभीत हो अपना मुख नीचे कर लिया। उस समय पत्नी राधा का मुख लाल हो गया और उनके नेत्र रक्तकमल के समान हो गये। क्रोध से उनके अंग काँप रहे थे तथा ओठ प्रस्फुरित हो रहे थे। तब उन राधा को बड़े वेग से जाती देखकर उनके विरोध से अत्यन्त डरे हुए भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये ॥९-१०॥

पलायन्तं च कान्तं च विज्ञाय परमेश्वरी।
पलायन्तीं सहचरीं सुशीलां च शशाप सा॥ १५॥

अद्यप्रभृति गोलोकं सा चेदायाति गोपिका ।
सद्यो गमनमात्रेण भस्मसाच्च भविष्यति ॥१६॥

  अनुवाद-  १५-१६
• परमेश्वरी राधा ने अपने कान्त श्रीकृष्ण को अन्तर्धान तथा सहचरी सुशीला को पलायन करते देखकर उन्हें शाप दे दिया कि-  यदि गोपिका सुशीला आज से गोलोक में आयेगी, तो वह आते ही भस्मसात् हो जायगी।१५-१६।

✳️  इस सम्बन्ध में ज्ञात होगा कि भगवान नारायण ने ही उस सुशीला का नाम दक्षिणा रखा इसके लिए नीचे के ये श्लोक कुछ इसी प्रकार का संकेत दे रहे हैं-

नालभंस्ते फलं तेषां विषण्णाः प्रययुर्विधिम्।
विधिर्निवेदनं श्रुत्वा देवादीनां जगत्पतिम्॥३७॥

दध्यौ च सुचिरं भक्त्या प्रत्यादेशमवाप सः।
नारायणश्च भगवान् महालक्ष्याश्च देहतः॥३८॥

विनिष्कृष्य मर्त्यलक्ष्मीं ब्रह्मणे दक्षिणां ददौ।
ब्रह्मा ददौ तां यज्ञाय पूरणार्थं च कर्मणाम्॥ ३९॥

अनुवाद -  जिसे भगवान नारायण ने महालक्ष्मी के विग्रह से मर्त्यलक्ष्मी को प्रकट किया और उसका दक्षिणा नाम रखकर उसे ब्रह्माजी को सौंप दिया। तब ब्रह्माजी ने यज्ञ सम्बन्धी समस्त कार्यों की सम्पन्नता के लिए देवी दक्षिणा को यज्ञ पुरुष के हाथ में दे दिया।३७-३८-३९।
            
तब यज्ञपुरुष ने देवी दक्षिणा के पूर्व काल की बातों का स्मरण दिलाते हुए देवी दक्षिणा से कहा कि-

पुरा गोलोकगोपी त्वं गोपीनां प्रवरा वरा॥ ७१॥
राधासमा तत्सखी च श्रीकृष्णप्रेयसी प्रिया।

अनुवाद - हे महाभागे! तुम पूर्वकाल में गोलोक की एक गोपी थी और गोपियों में परमश्रेष्ठा थीं। श्रीकृष्ण तुमसे अत्यधिक प्रेम करते थे और तुम राधा के समान ही उन श्रीकृष्ण की प्रिय सखी थीं।७१।

कार्तिकीपूर्णिमायां तु रासे राधामहोत्सवे ॥७२॥
आविर्भूता दक्षिणांसाल्लक्ष्म्याश्च तेन दक्षिणा।

पुरा त्वं च सुशीलाख्या ख्याता शीलेन शोभने॥ ७३॥
लक्ष्मीदक्षांसभागात्त्वं राधाशापाच्च दक्षिणा ।

गोलोकात्त्वं परिभ्रष्टा मम भाग्यादुपस्थिता ॥७४॥
कृपां कुरु महाभागे मामेव स्वामिनं कुरु ।


अनुवाद-७३,७३,७४

एक बार कार्तिक पूर्णिमा को राधामहोत्सव के अवसर पर रासलीला में तुम भगवती लक्ष्मी के दक्षिणांश से प्रकट हो गयी थीं, उसी कारण तुम्हारा नाम दक्षिणा पड़ गया। हे शोभने ! इससे भी पहले अपने उत्तम शील के कारण तुम सुशीला नाम से प्रसिद्ध थी तुम भगवती राधिका के शाप से गोलोक से च्युत (पतित) होकर और पुनः देवी लक्ष्मी के दक्षिणांश से आविर्भूत हो। अब देवी दक्षिणाके रूप में मेरे सौभाग्यसे मुझे प्राप्त हुई हो। हे महाभागे ! मुझपर कृपा करो और मुझे ही अपना स्वामी बना लो॥ ७२,-७४।

फिर यज्ञपुरुष ने उस देवी से कहा-
कृपां कुरु महाभागे मामेव स्वामिनं कुरु।
कर्मिणां कर्मणां देवी त्वमेव फलदा सदा॥७५॥

त्वया विना च सर्वेषां सर्वं कर्म च निष्फलम्।
त्वया विना तथा कर्म कर्मिणां च न शोभते॥७६॥ 

ब्रह्मविष्णुमहेशाश्च दिक्पालादय एव च ।
कर्मणश्च फलं दातुं न शक्ताश्च त्वया विना ॥ ७७॥

अनुवाद- ७५,७६,७७

तुम्हीं यज्ञ करने वालों को उनके कर्मों का सदा फल प्रदान करने वाली देवी हो। तुम्हारे बिना सम्पूर्ण प्राणियों का सारा कर्म निष्फल हो जाता है और तुम्हारे बिना अनुष्ठानकर्ताओं का कर्म शोभा नहीं पाता है।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश, दिक्पाल आदि भी तुम्हारे बिना प्राणियों को कर्मका फल प्रदान करने में समर्थ नहीं हैं।

अतः यहाँ सिद्ध होता है कि गोपकन्या- दक्षिणा ही कर्म फलों की विधायिका हैं।

और इस सम्बन्ध में सबसे महत्वपूर्ण बात श्रीमद्देवी भागवत पुराण के नवम् स्कन्ध के अध्याय-(४३) के श्लोक संख्या-(३८) में लिखी गई है, जिसमें बताया गया है कि यज्ञ, हवन के मध्य गोपी सुशीला की अंशस्वरूपा देवी स्वाहा का कितना महत्व है-

दक्षिणाग्निगार्हपत्याहवनीयान् क्रमेण च।
ऋषियो मुनयश्चैव ब्राह्मणा: क्षत्रियादय:।३८।

स्वाहान्तं मन्त्रमुच्चार्य हविर्दानं च चक्रिरे।
स्वाहायुक्तं च मन्त्रं च यो गृह्णाति प्रशस्तकम्।।३९।

अनुवाद - तभी से ऋषि, मुनि, ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि मन्त्र के अन्त में स्वहा शब्द जोड़कर मन्त्रोच्चारण करके अग्नि में हवन करने लगे। और जो मनुष्य स्वाहा युक्त प्रशस्त मन्त्र का उच्चारण करता है, उसे सभी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती है।




परिशिष्ट (6)

ब्रह्माण्ड विदुषी गोपी शतचन्द्रानना की कथा
                    

शतचन्द्रानना गोलोक  की एक धन्या और मान्या विदुषी गोपी है, जो गोलोक के सोलहवें द्वार की सदैव रक्षा में तत्पर रहती है। गोपी शतचन्द्रानना को ब्रह्माण्ड विदुषी होने का परिचय उस समय मिलता है जब समस्त देवता भगवान नारायण के कहने पर पृथ्वी के भार को दूर करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण के परमधाम गोलोक को प्रस्थान करते हैं। किन्तु जब देवता लोग गोलोक के सोलहवें द्वार पर पहुँचे तो वहाँ द्वार की रक्षा में नियुक्त गोपी शतचन्द्रानना उनसे कुछ प्रश्न पूछकर अन्दर जाने से रोक दिया। तब देवताओं ने जो कुछ कहा उसका सारा वृत्तान्त गर्गसंहिता के गोलोकखण्ड के अध्याय- (२) के प्रमुख श्लोकों में कुछ इस प्रकार मिलता है।

तत्र कन्दर्पलावण्याः श्यामसुन्दरविग्रहाः।
द्वरि गन्तुं चाभ्यदितान् न्यषेधन् कृष्णपार्षदाः।२०।

अनुवाद - वहाँ कामदेव के समान मनोहर रूप लावण्य शालिनी श्यामसुन्दर विग्रह श्रीकृष्ण पार्षदा (शतचन्द्रानना) द्वारपाल का कार्य करती थीं। देवताओं को द्वारा के भीतर जाने के लिए उद्यत देख उन्होंने मना किया।

             "श्रीदेवा ऊचुः
लोकपाला वयं सर्वे ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।
श्रीकृष्णदर्शनार्थाय शक्राद्या आगता इह॥२१॥

अनुवाद - देवता बोले- हम सभी ब्रह्मा" विष्णु शंकर नाम के लोकपाल और इन्द्र आदि देवता हैं भगवान श्रीकृष्ण के दर्शनार्थ यहाँ आए हैं।

तच्छ्रुत्वा तदभिप्रायं श्रीकृष्णाय सखीजनाः।
ऊचुर्देवप्रतीहारा गत्वा चान्तःपुरं परम्॥२२॥

तदा विनिर्गता काचिच्छतचन्द्रानना सखी।
पीतांबरा वेत्रहस्ता सापृच्छद्वाञ्छितं सुरान्॥ २३॥

अनुवाद - २२-२३

देवताओं की बात सुनकर उन सखियों ने जो श्रीकृष्ण की द्वारपालिकाऐं थी, श्रेष्ठ अन्तःपुर में जाकर देवताओं की बात कह सुनाईं। तभी एक सखी जो शतचन्द्रानना नाम से विख्यात थी उनके वस्त्र पीले थे और जो हाथ में बेंत की छड़ी लिए थी, बाहर आयीं और उन देवताओं से उनका अभीष्ट प्रयोजन पूछा।२२-२३।

                श्रीशतचन्द्राननोवाच -
कस्याण्डस्याधिपा देवा यूयं सर्वे समागताः।
वदताशु गमिष्यामि तस्मै भगवते ह्यहम् ॥२४॥

अनुवाद - शतचन्द्रानना बोली - यहाँ पधारे हुए आप सब देवता किस ब्रह्माण्ड के अधिपति हैं ? यह शीघ्र बताइये। तब मैं भगवान श्रीकृष्ण को सूचित करने के लिए उनके पास जाऊँगी। २४

                     "श्रीदेवा ऊचुः -
अहो अण्डान्युतान्यानि नास्माभिर्दर्शितानि च।
एकमण्डं प्रजानीमोऽथोऽपरं नास्ति नः शुभे॥२५॥

अनुवाद - तब देवताओं नें कहा - अहो ! यह तो बहुत आश्चर्य की बात है, क्या अन्यान्य ब्रह्माण्ड भी हैं ? हमनें तो उन्हें कभी नहीं देखा। शुभे ! हम तो यही जानते हैं कि एक ही ब्रह्माण्ड है, इसके अतिरिक्त दूसरा कोई है ही नहीं।२५।

              "श्रीशतचन्द्राननोवाच -
ब्रह्मदेव लुठन्तीह कोटिशो ह्यण्डराशयः।
तेषां यूयं यथा देवास्तथाण्डेऽण्डे पृथक् पृथक्॥ २६॥

नामग्रामं न जानीथ कदा नात्र समागताः।
जडबुद्ध्या प्रहृष्यध्वे गृहान्नापि विनिर्गताः॥२७॥

ब्रह्माण्डमेकं जानन्ति यत्र जातास्तथा जनाः।
मशका च यथान्तःस्था औदुंबरफलेषु वै॥२८॥

अनुवाद - २६-२८

तब शतचन्द्रानना उन देवताओं से बोलीं - ब्रह्मदेव ! यहाँ (गोलोक) में करोड़ों  ब्रह्माण्ड  इधर-उधर लुढ़क रहे हैं। उनमें भी आप जैसे ही पृथक पृथक देवता वास करते हैं। अरे ! क्या आप लोग अपना नाम गाँव तक नहीं जानते ? जान पड़ता है की कभी यहाँ आए नहीं है, अपनी थोड़ी सी जानकारी में ही हर्ष से फूल उठे हैं। जान पड़ता है कभी घर से बाहर निकले ही नहीं। जैसे गूलर के फूलों में रहने वाले कीड़े जिस फल में रहते हैं, उसके सिवा दूसरे को नहीं जानते, उसी प्रकार आप जैसे साधारण जन जिसमें उत्पन्न होते हैं, एक मात्र उसी को ब्रह्माण्ड समझते हैं। २६-२८।

                 "श्रीनारद उवाच -
उपहास्यं गता देवा इत्थं तूष्णीं स्थिताः पुनः।
चकितानिव तान् दृष्ट्वा विष्णुर्वचनमब्रवीत्॥२९॥

                   श्रीविष्णुरुवाच -
यस्मिन्नण्डे पृश्निगर्भोऽवतारोऽभूत्सनातन।
त्रिविक्रमनखोद्‌भिन्ने तस्मिन्नण्डे स्थिता वयम्॥ ३०॥

                   "श्रीनारद उवाच -
तच्छ्रुत्वा तं च संश्लाघ्य शीघ्रमन्तःपुरं गता
पुनरागत्य देवेभ्योऽप्याज्ञां दत्त्वा गताः पुरम्॥३१॥

अथ देवगणाः सर्वे गोलोकं ददृशुः परम् ।
तत्र गोवर्धनो नाम गिरिराजो विराजते॥३२॥

अनुवाद - २९- ३२

• इस प्रकार उपहास के पात्र बने हुए सब देवता चुपचाप खड़े रहे, कुछ बोल ना सके। तब उन्हें चकित से देखकर भगवान विष्णु ने शतचन्द्रानना से कहा- जिस ब्रह्माण्ड़ में भगवान पृश्निगर्भ का सनातन अवतार हुआ है तथा त्रिविक्रम (विराट रूपधारी वामन) के नख से ब्रह्माण्ड़ में विवर बन गया है वहीं हम निवास करते हैं।२९-३०।

• तब भगवान विष्णु की यह बात सुनकर शतचन्द्रानना ने उनकी भूरि भूरि प्रशंसा की और स्वयं भीतर चली गयी। फिर शीघ्र ही आयी और सबको अन्तःपुर में पधारने की आज्ञा देकर वापस चली गयी। तदनन्तर सम्पूर्ण देवताओं ने परम सुन्दर धाम गोलोक का दर्शन किया। वहाँ गोवर्धन नामक गिरिराज शोभा पर रहे थे। २९-३२।


अतः उपरोक्त प्रसंग से सिद्ध होता है कि गोपी शतचन्द्रानना जैसी विदुषी की तुलना सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में किसी अन्य से नही की जा सकती। क्योंकि इसकी विद्वता के सामने ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा समस्त देवताओं को लज्जित होना पड़ा।


इस तरह से देखा जाए तो गोप और गोपियाँ ही एकमात्र धर्मज्ञ ज्ञान से परिपूर्ण सारे कर्म-विधान और फल के नियामिका हैं। इनके ही माध्यम से ज्ञान की अविरल धारा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रवाहित होती है। और सारे धार्मिक कर्म- विधान इन्हीं के द्वारा सम्पन्न एवं फलित होते हैं, चाहे वह यज्ञ हो या पूजा पाठ में हवन इत्यादि ही क्यों न हो। और इन्हीं गोप-गोपियों को आधार मानकर ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य के कर्मकाण्डी ब्राह्मण लोग ब्राह्मणत्व कर्म करते हैं। किन्तु उनके सभी कर्मफलों व परिणामों में गोपों की ही भूमिका रहती है। इसीलिए गोपों को श्रेष्ठ व धर्मवत्सल जानकर ही गर्गसंहिता के अश्वमेधखण्ड  के अध्याय (६०) के श्लोक -संख्या (४१) में गोपों को पापों से मुक्ति दिलाने वाला कहा गया है-

य: श्रृणोति चरित्रं वै गोलोकारोहणं हरे:।
मुक्तिं यदुनां गोपानां सर्वपापै: प्रमुच्यते।।४१।

अनुवाद - जो लोग श्रीहरि के गोलोक धाम पधारने का चरित्र सुनते हैं, तथा यादव गोपों की मुक्ति का वृत्तान्त पढ़ते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो जाते हैं।४१।

परिशिष्ट (7)

गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था।


गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था (G.S.S.K.S) की स्थापना 20 नवंबर 2023 को गोपाष्टमी के दिन श्री आत्मानन्द जी महाराज ने अपने दो सहयोगियों (मता प्रसाद और योगेश कुमार रोही) को लेकर किया। उसी समय उन्होंने (मता प्रसाद और योगेश कुमार रोही) दोनों को एक ही साथ औपचारिक घोषणा करते हुए संस्था के गोपाचार्य हंस पद अभिषिक्त किया और अपने स्वयं गोपाचार्य हंस पद पर आसीन हुए। तभी से इन तीनों को गोपाचार्य हंस पदनाम नाम से जाना जाता है। ज्ञात हो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ऐसा पदनाम कहीं नहीं है। यह आत्मानन्द जी महाराज के अन्तर्मन की उपज है, जो अपने आप में यूनिक (Unique) यानी इकलौता नाम है। गोपाचार्य नाम के बारे में उन्होंने स्वयं कहा है कि- गोपाचार्य नाम इसलिए इकलौता नाम है, क्योंकि यह पदनाम सिर्फ गोपों यानी यादवों के आचार्य या गुरु से ही सम्बन्धित है अन्य किसी से नहीं है, या कहें गोपाचार्य पदनाम का सम्बन्ध ब्राह्मी व्यवस्था के किसी भी व्यास पीठ, संकराचार्य या अखाड़े इत्यादि से नहीं है। इसलिए यह पदनाम अपने आप में यूनिक (Unique) यानी इकलौता है जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में यादव कथावाचकों के अतिरिक्त और किसी का नहीं है।


संस्था के उद्देश्य एवं उसके द्वारा सृजित प्रमुख पद

गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था (G.S.S.K.S) का मुख्य उद्देश्य विद्वान गोपाचार्यों द्वारा वैश्विक स्तर पर श्रीकृष्ण कथा का प्रचार-प्रसार करना तथा भारत के प्रत्येक ग्राम सभा स्तर पर राधा कृष्ण मंदिर का निर्माण करना है। संस्था अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए निम्नलिखित पद सृजित किया है -

(1)- अध्यक्ष और उपाध्यक्ष-

राष्ट्रीय स्तर पर संस्था का एक अध्यक्ष और उसके विकल्प में एक उपाध्यक्ष पद होगा जो राष्ट्रीय स्तर पर संस्था के निर्देशन में कार्य करेगा और श्रीकृष्ण कथा की व्यवस्था व संचालन में सहयोग करेगा। इसी तरह से भारत के प्रत्येक राज्यों के लिए एक राज्य- अध्यक्ष और क्रमशः जिला- अध्यक्ष होंगे। जो राष्ट्रीय अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के निर्देशन में काम करेंगे।
वर्तमान में इस संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष- गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष गोपाचार्य हंस श्री माता प्रसाद एवं उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष- गोपाचार्य हंस श्री योगेश कुमार रोही जी हैं।


(2)- मंत्री-

संस्था का एक मंत्री पद होगा जिसका मुख्य कार्य निम्नलिखित होगा-

(क) सहमति के आधार पर संस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए समय-समय पर आवश्यक नियम बनाना और स्वीकृति प्रदान करना।

(ख) समयं समयं पर संस्था के पदाधिकारियों की बैठकों का आयोजन करना तथा उनके कार्यों की समीक्षा करके राष्ट्रीय अध्यक्ष (संस्था प्रमुख) को सूचित करना।

(ग) संस्था के पदाधिकारिओं और सदस्यों की प्रत्येक गतिविधियों पर पैनी नजर रखना मंत्री पद का मुख्य कार्य होगा। यदि कोई पदाधिकारी या सदस्य संस्था के नियमों के विपरीत कार्य करता है या कोई ऐसा षड्यंत्र रचता है जिससे संस्था की गरिमा प्रभावित हो सकती है, तो मंत्री को यह सर्वाधिकार होगा कि ऐसे सदस्य को राष्ट्रीय अध्यक्ष की अनुमति से उसकी सदस्यता और उसके पद से बिना देरी किए तत्काल प्रभाव से हटा सकता है। वर्तमान में इस संस्था के मंत्री- श्री श्रवण कुमार यादव जी हैं।


(3)- कोषाध्यक्ष- 

संस्था का एक धनकोष होगा जो भारत के किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में संस्था के नाम से एक खाता के रूप में होगा। जिसकी निगरानी यादव (गोप) समाज का एक पदेन कोषाध्यक्ष करेगा। संस्था के बैंक खाते से धन तभी निकला जा सकेगा जब कोषाध्यक्ष सहित संस्था के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, मंत्री और कोई एक गोपाचार्य हंस, इन तीनों का एक साथ हस्ताक्षर होगा।

संस्था के धन की आय-व्यय की आडिट वर्ष में एक बार संस्था की "निगरानी समिति" द्वारा की जाएगी जिसमें संस्था के पांच पदेन सदस्य- राष्ट्रीय अध्यक्ष, एक गोपाचार्य हंस, एक गोपाचार्य, कोषाध्यक्ष, और मंत्री होंगे। वर्तमान में इस संस्था के कोषाध्यक्ष- श्री पंकज सिंह यादव हैं।



(4)- संस्था के पदेन कथावाचक-

वैश्विक स्तर पर श्रीकृष्ण कथा का प्रचार-प्रसार करने के लिए संस्था अनिवार्य रूप से यादव समाज से (दो) तरह के कथावाचकों का चयन करेगी जो पूरी तरह से संस्था के नियमों से प्रतिबद्ध होंगे।

(क)- पहले प्रकार के कथावाचकों में गोपाचार्य हंस होंगे जो श्रीकृष्ण कथा के समय दूध का दूध और पानी का पानी करने की क्षमता रखते हो अर्थात् परम् सत्य की वास्तविकता का बोध कराने की क्षमता रखते हों। गोपाचार्य हंस संस्था के नियमानुसार सफेद वस्त्र व सफेद पगड़ी या साफा को धारण कर कथामंच से गोपेश्वर श्रीकृष्ण के गूढ़ रहस्यों और उनके परम् स्वरुप तथा उनकी लीलाओं इत्यादि का वर्णन करेंगे।  अभी वर्तमान में केवल तीन गोपाचार्य हंस- श्री आत्मानन्द जी, श्री योगेश कुमार

रोही और श्री माता प्रसाद जी हैं। भविष्य में इनकी संख्या बढ़ सकती है।




(ख)- दूसरे प्रकार के कथावाचक "गोपाचार्य" होंगे जो ज्ञान, अनुभव और श्रीकृष्ण के गूढ़ रहस्यों को जानने से थोड़ी बहुत पीछे रह गए हैं किन्तु संस्था के प्रति अत्यधिक समर्पित हैं, वे सभी गोपाचार्य होंगे और गोपाचार्य हंस की अनुपस्थिति में संस्था के नियमानुसार हल्के पीले रंग वस्त्र व पगड़ी को धारण कर कथामंच से गोपेश्वर श्रीकृष्ण की कथा कहेंगे।

भविष्य में तीन गोपाचार्य हंसों के द्वारा इनके ज्ञान और अनुभव की परीक्षा लेकर इनको भी गोपाचार्य हंस पद पर अभिषिक्त किया जा सकेगा। वर्तमान में 15 से अधिक गोपाचार्य हैं।


(5)- संस्था के सदस्य-

संस्था के अनन्त सदस्य होंगे जो हर वर्ग से होंगे। इनकी कोई निश्चित सीमा नहीं होगी। जो भी श्रीकृष्ण भक्त स्वेच्छा से संस्था की सदस्यता लेना चाहते हैं वे कम से कम 1000₹ की सदस्तायता शुल्क देकर सदस्यता ले सकते है। यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से अधिक सदस्तायता शुल्क देकर सदस्यता ग्रहण करना चाहता है तो उसके लिए संस्था आभार प्रकट करेगी। प्रत्येक सदस्यता ग्रहण करने वाले सदस्यों को सदस्यता प्रमाण पत्र के साथ एक अच्छा सा पहचान पत्र भी मिलेगा जो मौके पर गले मे धारण करने योग्य होगा।

कोई भी व्यक्ति संस्था की सदस्यता ग्रहण कर सकता है किन्तु संस्था को यह आशंका हो जाए कि वह व्यक्ति संस्था के प्रति उतना समर्पित नहीं है जितना चाहिए। तो ऐसे व्यक्ति को किसी (दो) सोशल मीडिया (ह्वाट्सएप और फेसबुक) पर प्रत्यक्ष रूप से यह घोषणा करनी होगी कि-
"मैं......आज दिनांक....को परमेश्वर श्रीकृष्ण को शाक्षी मानकर यह घोषणा करता हूँ कि गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था के प्रति निष्ठा भाव से समर्पित होकर काम करूँगा तथा संस्था के प्रत्येक नियमों का अक्षरशः पालन करूँगा"।
उसके उपरान्त संस्था उसकी सदस्यता स्वीकार करेगी और भविष्य में आवश्कतानुसार उसे किसी पद पर भी अभिषिक्त कर सकेगी।

परिशिष्ट (9)


देवमीढ की वंशावली।


योगेश जी को लिखना है.........✍️

🙏 नमस्कार धन्यवाद जय श्रीकृष्ण

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