यदुवंश संहिता का नवीनतम संस्करण-भाग प्रथम-
*यदुवंश संहिता*
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"
लेखन कार्य का प्रारम्भ दिनाङ्क- १३/०१/२०२६
लेखन कार्य का प्रारम्भ दिनाङ्क- १३/०१/२०२६
माघ मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि, विशाखा नक्षत्र दिन मङ्गलवार को हुआ।
यदुपुङ्गवं केशवं, गोलोके विराजितम्।।
विधायकं नायकं शरणं प्रपद्ये मार्जितम्।
अनुवाद-
गोलोक में विराजमान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का सञ्चालन और विधान करने वाले, भक्तों का मार्गदर्शन करने वाले,यादव श्रेष्ठ विशुद्धत्तम( अत्यधिक मजे हुए) व सुलझे हुए भगवान श्रीकृष्ण की हम शरण लेते हैं।
(श्रीकृष्ण साराङ्गिणी)
यदोर्वंशं नर: श्रुत्वा सर्वपापै: प्रमुच्यतते।
यत्रावतीर्णं कृष्णाख्यं परं ब्रह्म निराकृति।।४।
(श्रीविष्णुपुराण-४/११/४)
अनुवाद-
"जिसमें श्रीकृष्ण नामक निराकार परब्रह्म ने साकार होकर अवतार लिया था, उस यदुवंश का श्रवण करने से मनुष्य सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है।"
परमेश्वर श्रीकृष्ण का चित्र -🔲
"प्राक्कथन"
पुस्तक "यदुवंश संहिता" का मुख्य उद्देश्य- पौराणिक और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर भगवान श्रीकृष्ण की सत्ता को सिद्ध करते हुए उनसे उत्पन्न यादवों के प्राचीनतम और अद्यतन इतिहास को प्रमाणों सहित निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर बताना है कि-
▪️श्रीकृष्ण कौन हैं ?
▪️यादवों की उत्पत्ति के पौराणिक और ऐतिहासिक साक्ष्य क्या है ?
▪️यादवों की मुख्य- जाति, वंश, वर्ण, कुल एवं गोत्र क्या है ?
▪️यादवों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तथा भारतीय संस्कृति में उनका क्या योगदान रहा है ?
▪️भारत के अलग-अलग प्रान्तों में यादवों को किन नामों से जाना जाता है ?
▪️भारतीय राजनीति में यादवों की प्रारम्भिक एवं अद्यतन स्थिति क्या है ?
▪️भारतीय राजनीति के कुछ महान यादव राजनेताओं के जीवन परिचय इत्यादि को बताना भी इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य है।
-निर्देशक एवं मार्गदर्शक -
गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज
लेखक गण-
गोपाचार्य हंस श्री योगेश कुमार रोहि जी
एवं
गोपाचार्य हंस श्री माता प्रसाद जी
-विषय सूची-
अध्याय-(1)- श्रीकृष्ण का परिचय-
(क)- आध्यात्मिक व भौतिक धरातल पौराणिक परिचय -
(1)- गोलोक में श्रीकृष्ण का परिचय
(2)- भूलोक में श्रीकृष्ण का परिचय
(ख)- ऐतिहासिक परिचय-
(1)- पुरातात्विक परिचय
(2)- लिपिकीय (अभिलेखीय) परिचय
अध्याय-(2)- गोपों (यादवों) की उत्पत्ति
(क)- पौराणिक साक्ष्य
(1)- गोलोक में यादवों की उत्पत्ति
(2)- भू-लोक में यादवों की उत्पत्ति
अध्याय(3)- यादवों की मुख्य जाति
अध्याय(4)- यादवों का वर्ण (वैष्णव वर्ण)
अध्याय(5)- यादवों का वंश एवं कुल
अध्याय(6)- यादवों का गोत्र
अध्याय(7)- भारत के प्रमुख यादव शासक
(क)- पौराणिक गोप (यादव) शासक (राजा)
(1)- पुरूरवा पुत्र- आयुष।
(2) आयुष पुत्र- नहुष। (3) नहुष पुत्र- ययाति।
(4) ययाति पुत्र- यदु। (5) यदु पुत्र- कार्त्यवीर्य अर्जुन
(6) हृदीक पुत्र- देवमीढ।
(7) नन्द पुत्री- योगमाया विन्ध्यवासिनी।
(ख)- ऐतिहासिक यादव राजा
(1)- वीर अहीर लोरिक
(2)- आल्हा-ऊदल
(3)- अहीर देवायत बोदर
(4)- देवगिरी के यादव राजा
(A)- भिल्लम पञ्चम
(B)- जैतुगी (जैत्रपाल)
(C)- सिंघण द्वितीय
(D)- रामचन्द्र यादव
(5)- विजयनगर के यादव राजा
(A)- हरिहर एवं बुक्का (B)- कृष्णदेवराय
(6)- दक्कन के अहीर राजा
(7)- वाडियार के यादव राजा- देवराज वाडियार
अध्याय(8)- प्रमुख क्रान्तिकारी यादव
1- राव तुला राम
2- राव गोपाल देव
3- प्राण सुख यादव
4- वीरन अलगु मुत्थु
5- रघुवर प्रसाद यादव
6- ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव
अध्याय(9)- प्रान्तीय या स्थानीय स्तर पर यादवों के प्रमुख सरनेम।
अध्याय(10)- प्रमुख यादव राजनेता
(A)- उत्तर प्रदेश के प्रमुख राजनेता
1- रामनरेश यादव
2- मुलायम सिंह यादव
3- प्रो० राम गोपाल यादव
4- शिवपाल सिंह यादव
5- प्रो. रामगोविन्द चौधरी
6- शरद यादव
7- अखिलेश सिंह यादव
8- डिम्पल यादव
(B)- बिहार के प्रमुख राजनेता
1- बिन्देश्वरी प्रसाद मण्डल
2- रामलखन सिंह यादव (शेरे बिहार)
3- लालू प्रसाद यादव
4- श्रीमती रावड़ी देवी
5- तेजस्वी यादव
6- पप्पू यादव (राजेश रञ्जन)
7- नित्यानन्द राय
(C)- अन्य राज्यों के यादव राजनेता
1- मोहन यादव
2- भूपेन्द्र यादव
3- अन्नपूर्णा देवी
4- राव इन्द्रजीत सिंह और राव वीरेन्द्र सिंह
5- राव विजेंद्र सिंह
6- शरद यादव
अध्याय(11)- प्रमुख यादव सामाजिक
कार्यकर्ता।
(1)- राजित सिंह यादव
(2)- गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज
(3)- गोपाचार्य श्री माता प्रसाद यादव
(4)- गोपाचार्य श्री योगेश कुमार रोहि
(5)- राव विजेन्द्र सिंह यादव
(5)- जाहल बेन अहीर
(6) शैलेन्द्र सिंह यादव (इटावा)
(7)- मनोज कुमार यादव (बिहार)
(8)- सुनील यादव सुल्तानपुरिया
(9)-कालीशंकर यदुवंशी
अध्याय(12)- खेल, सिने एवं संगीत जगत के प्रमुख यादव-
(क)- खेल जगत के प्रमुख यादव
(A) - क्रिकेट
1- सूर्यकुमार यादव
2- कुलदीप यादव
3- उमेश यादव
4- पूनम यादव
5- राधा यादव
(B)- कुस्ती
1- नरसिंह पञ्चम यादव
2- वीरेन्द्र सिंह यादव
3- गुरु हनुमान (विजय पाल यादव)
(ख)- सिने जगत के प्रमुख यादव
1- खेसारी लाल यादव
2- राजपाल यादव
3- लीना यादव
4- पारुल यादव
5- नरसिंह यादव
6- बाबा यादव
(ग)- संगीत जगत के प्रमुख यादव
1- हीरालाल यादव
2- काशीनाथ यादव
3- राम कैलाश यादव
4- विहारी लाल यादव
5- दिनेशलाल-निरहुआ
6- सञ्जय यदुवंशी (अवधी गायक)
7- स्वामी आधार चैतन्य ( उत्तर- प्रदेश)
यदुपुङ्गवं केशवं, गोलोके विराजितम्।।
विधायकं नायकं शरणं प्रपद्ये मार्जितम्।
अनुवाद-
गोलोक में विराजमान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का सञ्चालन और विधान करने वाले, भक्तों का मार्गदर्शन करने वाले,यादव श्रेष्ठ विशुद्धत्तम( अत्यधिक मजे हुए) व सुलझे हुए भगवान श्रीकृष्ण की हम शरण लेते हैं।
(श्रीकृष्ण साराङ्गिणी)
यदोर्वंशं नर: श्रुत्वा सर्वपापै: प्रमुच्यतते।
यत्रावतीर्णं कृष्णाख्यं परं ब्रह्म निराकृति।।४।
(श्रीविष्णुपुराण-४/११/४)
अनुवाद-
"जिसमें श्रीकृष्ण नामक निराकार परब्रह्म ने साकार होकर अवतार लिया था, उस यदुवंश का श्रवण करने से मनुष्य सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है।"
परमेश्वर श्रीकृष्ण का चित्र -🔲
"प्राक्कथन"
पुस्तक "यदुवंश संहिता" का मुख्य उद्देश्य- पौराणिक और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर भगवान श्रीकृष्ण की सत्ता को सिद्ध करते हुए उनसे उत्पन्न यादवों के प्राचीनतम और अद्यतन इतिहास को प्रमाणों सहित निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर बताना है कि-
▪️श्रीकृष्ण कौन हैं ?
▪️यादवों की उत्पत्ति के पौराणिक और ऐतिहासिक साक्ष्य क्या है ?
▪️यादवों की मुख्य- जाति, वंश, वर्ण, कुल एवं गोत्र क्या है ?
▪️यादवों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तथा भारतीय संस्कृति में उनका क्या योगदान रहा है ?
▪️भारत के अलग-अलग प्रान्तों में यादवों को किन नामों से जाना जाता है ?
▪️भारतीय राजनीति में यादवों की प्रारम्भिक एवं अद्यतन स्थिति क्या है ?
▪️भारतीय राजनीति के कुछ महान यादव राजनेताओं के जीवन परिचय इत्यादि को बताना भी इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य है।
-निर्देशक एवं मार्गदर्शक -
गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज
लेखक गण-
गोपाचार्य हंस श्री योगेश कुमार रोहि जी
एवं
गोपाचार्य हंस श्री माता प्रसाद जी
-विषय सूची-
अध्याय-(1)- श्रीकृष्ण का परिचय-
(क)- आध्यात्मिक व भौतिक धरातल पौराणिक परिचय -
(1)- गोलोक में श्रीकृष्ण का परिचय
(2)- भूलोक में श्रीकृष्ण का परिचय
(ख)- ऐतिहासिक परिचय-
(1)- पुरातात्विक परिचय
(2)- लिपिकीय (अभिलेखीय) परिचय
अध्याय-(2)- गोपों (यादवों) की उत्पत्ति
(क)- पौराणिक साक्ष्य
(1)- गोलोक में यादवों की उत्पत्ति
(2)- भू-लोक में यादवों की उत्पत्ति
अध्याय(3)- यादवों की मुख्य जाति
अध्याय(4)- यादवों का वर्ण (वैष्णव वर्ण)
अध्याय(5)- यादवों का वंश एवं कुल
अध्याय(6)- यादवों का गोत्र
अध्याय(7)- भारत के प्रमुख यादव शासक
(क)- पौराणिक गोप (यादव) शासक (राजा)
(1)- पुरूरवा पुत्र- आयुष।
(2) आयुष पुत्र- नहुष। (3) नहुष पुत्र- ययाति।
(4) ययाति पुत्र- यदु। (5) यदु पुत्र- कार्त्यवीर्य अर्जुन
(6) हृदीक पुत्र- देवमीढ।
(7) नन्द पुत्री- योगमाया विन्ध्यवासिनी।
(ख)- ऐतिहासिक यादव राजा
(1)- वीर अहीर लोरिक
(2)- आल्हा-ऊदल
(3)- अहीर देवायत बोदर
(4)- देवगिरी के यादव राजा
(A)- भिल्लम पञ्चम
(B)- जैतुगी (जैत्रपाल)
(C)- सिंघण द्वितीय
(D)- रामचन्द्र यादव
(5)- विजयनगर के यादव राजा
(A)- हरिहर एवं बुक्का (B)- कृष्णदेवराय
(6)- दक्कन के अहीर राजा
(7)- वाडियार के यादव राजा- देवराज वाडियार
अध्याय(8)- प्रमुख क्रान्तिकारी यादव
1- राव तुला राम
2- राव गोपाल देव
3- प्राण सुख यादव
4- वीरन अलगु मुत्थु
5- रघुवर प्रसाद यादव
6- ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव
अध्याय(9)- प्रान्तीय या स्थानीय स्तर पर यादवों के प्रमुख सरनेम।
अध्याय(10)- प्रमुख यादव राजनेता
(A)- उत्तर प्रदेश के प्रमुख राजनेता
1- रामनरेश यादव
2- मुलायम सिंह यादव
3- प्रो० राम गोपाल यादव
4- शिवपाल सिंह यादव
5- प्रो. रामगोविन्द चौधरी
6- शरद यादव
7- अखिलेश सिंह यादव
8- डिम्पल यादव
(B)- बिहार के प्रमुख राजनेता
1- बिन्देश्वरी प्रसाद मण्डल
2- रामलखन सिंह यादव (शेरे बिहार)
3- लालू प्रसाद यादव
4- श्रीमती रावड़ी देवी
5- तेजस्वी यादव
6- पप्पू यादव (राजेश रञ्जन)
7- नित्यानन्द राय
(C)- अन्य राज्यों के यादव राजनेता
1- मोहन यादव
2- भूपेन्द्र यादव
3- अन्नपूर्णा देवी
4- राव इन्द्रजीत सिंह और राव वीरेन्द्र सिंह
5- राव विजेंद्र सिंह
6- शरद यादव
अध्याय(11)- प्रमुख यादव सामाजिक
कार्यकर्ता।
(1)- राजित सिंह यादव
(2)- गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज
(3)- गोपाचार्य श्री माता प्रसाद यादव
(4)- गोपाचार्य श्री योगेश कुमार रोहि
(5)- राव विजेन्द्र सिंह यादव
(5)- जाहल बेन अहीर
(6) शैलेन्द्र सिंह यादव (इटावा)
(7)- मनोज कुमार यादव (बिहार)
(8)- सुनील यादव सुल्तानपुरिया
(9)-कालीशंकर यदुवंशी
अध्याय(12)- खेल, सिने एवं संगीत जगत के प्रमुख यादव-
(क)- खेल जगत के प्रमुख यादव
(A) - क्रिकेट
1- सूर्यकुमार यादव
2- कुलदीप यादव
3- उमेश यादव
4- पूनम यादव
5- राधा यादव
(B)- कुस्ती
1- नरसिंह पञ्चम यादव
2- वीरेन्द्र सिंह यादव
3- गुरु हनुमान (विजय पाल यादव)
(ख)- सिने जगत के प्रमुख यादव
1- खेसारी लाल यादव
2- राजपाल यादव
3- लीना यादव
4- पारुल यादव
5- नरसिंह यादव
6- बाबा यादव
(ग)- संगीत जगत के प्रमुख यादव
1- हीरालाल यादव
2- काशीनाथ यादव
3- राम कैलाश यादव
4- विहारी लाल यादव
5- दिनेशलाल-निरहुआ
6- सञ्जय यदुवंशी (अवधी गायक)
7- स्वामी आधार चैतन्य ( उत्तर- प्रदेश)
8- व्रजेश शास्त्री-
गोपों (यादवों) की परिशिष्ट कथाएँ
(1) श्रीकृष्ण की नारायणी सेना
(2)- यादवों का विश्वजीत युद्ध
(3)- गोपों की सत्यनारायण व्रत कथा
(4)- वेदमाता गायत्री की कथा
(5)- गोपी स्वाहा और स्वधा की कथा
(6)- ब्रह्माण्ड विदुषी गोपी शतचन्द्रानना की कथा
(7)- गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था।
(8) चन्द्रमा और उसके वंश की उत्पत्ति
(9)- देवमीढ की वंशावली
**********************************************
अध्याय 👇
अध्याय(1)-
श्रीकृष्ण का परिचय-
यह अध्याय उनके लिए आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है जो भगवान श्रीकृष्ण को काल्पनिक और अनैतिहासिक मानकर उनकी सत्ता को मानने से अस्वीकार करते हैं।
किन्तु ऐसी बात नहीं है क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण की सत्ता आध्यात्मिक और ऐतिहासिक दोनों ही धरातलों पर स्थित है।
इसको अच्छी तरह समझने के लिए इस अध्याय को मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया गया है -
(क)- श्रीकृष्ण का आध्यात्मिक परिचय-
(1)- गोलोक में श्रीकृष्ण का परिचय
(2)- भूलोक में श्रीकृष्ण का परिचय
(ख)- ऐतिहासिक परिचय-
(1)- पुरातात्विक परिचय
(2)- लिपिकीय परिचय
(क)- श्रीकृष्ण का आध्यात्मिक परिचय-
(1)- गोलोक में श्रीकृष्ण का परिचय-
भगवान श्रीकृष्ण समस्त ब्रह्माण्डों से पच्चास करोड़ योजन ऊपर गोलोक में अपने गोप और गोपियों के साथ सदैव गोप वेष में रहते हैं। जिसकी पुष्टि ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय (दो) के श्लोक २१ से होती है जिसमें बताया गया है कि -
स्वेच्छामयं सर्वबीजं सर्वाधारं परात्परम्।
किशोरवयसं शश्वद्गोपवेषविधायकम् ।२१।
अनुवाद - वे ही प्रभु स्वेच्छामयी सभी के मूल- (आदि-कारण) सर्वाधार तथा परात्पर- परमात्मा हैं। उनकी नित्य किशोरावस्था रहती है और वे प्रभु गायों के उस लोक (गोलोक) में सदा गोप (आभीर)- वेष में रहते हैं।२१।
इसी तरह से ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय- (२८) के श्लोक - ६१ से ६५ में लिखा गया है कि -
एवंरूपमरूपं तं मुने ध्यायन्ति वैष्णवाः।६१॥
सततं ध्येयमस्माकं परमात्मानमीश्वरम्।।
अक्षरं परमं ब्रह्म भगवन्तं सनातनम्।६२।।
स्वेच्छामयं निर्गुणं च निरीहं प्रकृतेः परम्।।
सर्वाधारं सर्वबीजं सर्वज्ञं सर्वमेव च।६३।।
सर्वेश्वरं सर्वपूज्यं सर्वसिद्धिकरं प्रदम्।।
स एव भगवानादिर्गोलोके द्विभुजः स्वयम्।६४।
गोपवेषश्च गोपालैः पार्षदैः परिवेष्टितः।।
परिपूर्णतमः श्रीमान् श्रीकृष्णो राधिकेश्वरः।६५।
अनुवाद -६१-६५-
• मुने ! वैष्णवजन उन निराकार परमात्मा का इस रूप में ध्यान किया करते हैं। वे परमात्मा ईश्वर हम सब लोगों के सदा ही ध्येय हैं। उन्हीं को अविनाशी परब्रह्म कहा गया है।६१-६२।
• वे ही दिव्य स्वेच्छामय शरीरधारी सनातन भगवान हैं। वे निर्गुण, निरीह और प्रकृति से परे हैं। सर्वाधार, सर्वबीज, सर्वज्ञ,सर्वस्वरुप है।६३।।
• सर्वेश्वर, सर्वपूज्य तथा सम्पूर्ण सिद्धियों को हाथ में देने वाले हैं। वे आदि पुरुष भगवान स्वयं ही द्विभुज रूप धारण करके गोलोक में निवास करते हैं।६४।
• उनकी वेशभूषा भी ग्वालों (अहीरों) के समान होती है और वे अपने पार्षद गोपालों (गोपों) से घिरे रहते हैं। उन परिपूर्णतम भगवान को श्रीकृष्ण कहते हैं। वे सदा श्रीजी (श्रीराधा) के साथ रहने वाले और श्रीराधिका के प्राणेश्वर हैं।६५।
इसके अतिरिक्त ऋग्वेद मण्डल (१) के सूक्त- (१५४) की ऋचा (६) में भी गोलोक का वर्णन मिलता है। जिसमें लिखा गया है कि- गोलोक में भूरिश्रृङ्गा गायें रहती हैं। इसीलिए उस परमधाम को गोलोक अर्थात् गायों का लोक कहा जाता है।
"ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिश्रृङ्गा अयास:। अत्राह तदुरुगायस्य वृष्ण: परमं पदमव भाति भूरि॥६।।
पदों के अर्थ व अन्वय:-
जिसमें "पदों का अर्थ है:-(यत्र)= जहाँ (अयासः)= प्राप्त हुए अथवा गये (भूरिश्रृङ्गाः)= स्वर्ण युक्त सींगों वाली (गावः)= गायें हैं (ता)= उन ।(वास्तूनि)= स्थानों को (वाम्)= तुम को (गमध्यै)= जाने को लिए (उश्मसि)= इच्छा करते हो। (उरुगायस्य)= बहुत प्रकारों से प्रशंसित (वृष्णः)= सुख वर्षाने वाले परमेश्वर का (परमम्)= उत्कृष्ट (पदम्)= स्थान (भूरिः)= अत्यन्त (अव भाति) =उत्कृष्टता से प्रकाशमान होता है (तत्)= उसको (अत्राह)= यहाँ ही हम लोग चाहते हैं ॥६।
अर्थात् उपर्युक्त ऋचाओं का सार यही है कि श्रीकृष्ण का परम धाम वहीं है, जहाँ स्वर्ण युक्त सींगों वाली गायें रहती हैं, और वे विष्णु (श्रीकृष्ण) वहाँ गोप रूप में अहिंस्य (अवध्य) हैं, और यही स्वराट-विष्णु ही श्रीकृष्ण, वासुदेव, नारायण आदि नामों से परवर्ती युग में लोकप्रिय हुए हैं। क्योंकि इस सम्बन्ध में ऐसा ही लिखा गया है कि -
"त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः ।
अतो धर्माणि धारयन् ॥१८॥
(ऋग्वेद १/२२/१८)
इस ऋचा के पद-भेद से स्पष्ट होता है कि -
(अदाभ्यः) =सोमरस रखने के लिए गूलर की लकड़ी का बने हुए पात्र को (धारयन्)= धारण करता हुआ । (गोपाः)= गोपालक रूपों वाले, (विष्णुः)= संसार के अन्तर्यामी परमेश्वर (त्रीणि) =तीन (पदानि)= क़दमो से (विचक्रमे)= गमन करते हैं । और ये ही (धर्माणि)= धर्मों को । धारयन= धारण करते रहते हैं ।१८॥
अर्थात् यह बात वेदों से भी सुनिश्चित है कि - परमेश्वर श्रीकृष्ण का सनातन निवास गोलोक है, जहाँ वे गोप-वेष में अपनी गायों तथा गोपों के साथ रहते हैं और और वे ही भगवान भूतल पर अपने गोपों के यहाँ गोप-वेष में ही अवतरित होकर धर्म की स्थापना बारम्बार करते हैं। इसी बात को प्रमाण सहित इसी क्रम में आगे बताया गया है।
गोपों (यादवों) की परिशिष्ट कथाएँ
(1) श्रीकृष्ण की नारायणी सेना
(2)- यादवों का विश्वजीत युद्ध
(3)- गोपों की सत्यनारायण व्रत कथा
(4)- वेदमाता गायत्री की कथा
(5)- गोपी स्वाहा और स्वधा की कथा
(6)- ब्रह्माण्ड विदुषी गोपी शतचन्द्रानना की कथा
(7)- गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था।
(8) चन्द्रमा और उसके वंश की उत्पत्ति
(9)- देवमीढ की वंशावली
**********************************************
अध्याय 👇
अध्याय(1)-
श्रीकृष्ण का परिचय-
यह अध्याय उनके लिए आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है जो भगवान श्रीकृष्ण को काल्पनिक और अनैतिहासिक मानकर उनकी सत्ता को मानने से अस्वीकार करते हैं।
किन्तु ऐसी बात नहीं है क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण की सत्ता आध्यात्मिक और ऐतिहासिक दोनों ही धरातलों पर स्थित है।
इसको अच्छी तरह समझने के लिए इस अध्याय को मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया गया है -
(क)- श्रीकृष्ण का आध्यात्मिक परिचय-
(1)- गोलोक में श्रीकृष्ण का परिचय
(2)- भूलोक में श्रीकृष्ण का परिचय
(ख)- ऐतिहासिक परिचय-
(1)- पुरातात्विक परिचय
(2)- लिपिकीय परिचय
(क)- श्रीकृष्ण का आध्यात्मिक परिचय-
(1)- गोलोक में श्रीकृष्ण का परिचय-
भगवान श्रीकृष्ण समस्त ब्रह्माण्डों से पच्चास करोड़ योजन ऊपर गोलोक में अपने गोप और गोपियों के साथ सदैव गोप वेष में रहते हैं। जिसकी पुष्टि ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय (दो) के श्लोक २१ से होती है जिसमें बताया गया है कि -
स्वेच्छामयं सर्वबीजं सर्वाधारं परात्परम्।
किशोरवयसं शश्वद्गोपवेषविधायकम् ।२१।
अनुवाद - वे ही प्रभु स्वेच्छामयी सभी के मूल- (आदि-कारण) सर्वाधार तथा परात्पर- परमात्मा हैं। उनकी नित्य किशोरावस्था रहती है और वे प्रभु गायों के उस लोक (गोलोक) में सदा गोप (आभीर)- वेष में रहते हैं।२१।
इसी तरह से ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय- (२८) के श्लोक - ६१ से ६५ में लिखा गया है कि -
एवंरूपमरूपं तं मुने ध्यायन्ति वैष्णवाः।६१॥
सततं ध्येयमस्माकं परमात्मानमीश्वरम्।।
अक्षरं परमं ब्रह्म भगवन्तं सनातनम्।६२।।
स्वेच्छामयं निर्गुणं च निरीहं प्रकृतेः परम्।।
सर्वाधारं सर्वबीजं सर्वज्ञं सर्वमेव च।६३।।
सर्वेश्वरं सर्वपूज्यं सर्वसिद्धिकरं प्रदम्।।
स एव भगवानादिर्गोलोके द्विभुजः स्वयम्।६४।
गोपवेषश्च गोपालैः पार्षदैः परिवेष्टितः।।
परिपूर्णतमः श्रीमान् श्रीकृष्णो राधिकेश्वरः।६५।
अनुवाद -६१-६५-
• मुने ! वैष्णवजन उन निराकार परमात्मा का इस रूप में ध्यान किया करते हैं। वे परमात्मा ईश्वर हम सब लोगों के सदा ही ध्येय हैं। उन्हीं को अविनाशी परब्रह्म कहा गया है।६१-६२।
• वे ही दिव्य स्वेच्छामय शरीरधारी सनातन भगवान हैं। वे निर्गुण, निरीह और प्रकृति से परे हैं। सर्वाधार, सर्वबीज, सर्वज्ञ,सर्वस्वरुप है।६३।।
• सर्वेश्वर, सर्वपूज्य तथा सम्पूर्ण सिद्धियों को हाथ में देने वाले हैं। वे आदि पुरुष भगवान स्वयं ही द्विभुज रूप धारण करके गोलोक में निवास करते हैं।६४।
• उनकी वेशभूषा भी ग्वालों (अहीरों) के समान होती है और वे अपने पार्षद गोपालों (गोपों) से घिरे रहते हैं। उन परिपूर्णतम भगवान को श्रीकृष्ण कहते हैं। वे सदा श्रीजी (श्रीराधा) के साथ रहने वाले और श्रीराधिका के प्राणेश्वर हैं।६५।
इसके अतिरिक्त ऋग्वेद मण्डल (१) के सूक्त- (१५४) की ऋचा (६) में भी गोलोक का वर्णन मिलता है। जिसमें लिखा गया है कि- गोलोक में भूरिश्रृङ्गा गायें रहती हैं। इसीलिए उस परमधाम को गोलोक अर्थात् गायों का लोक कहा जाता है।
"ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिश्रृङ्गा अयास:। अत्राह तदुरुगायस्य वृष्ण: परमं पदमव भाति भूरि॥६।।
पदों के अर्थ व अन्वय:-
जिसमें "पदों का अर्थ है:-(यत्र)= जहाँ (अयासः)= प्राप्त हुए अथवा गये (भूरिश्रृङ्गाः)= स्वर्ण युक्त सींगों वाली (गावः)= गायें हैं (ता)= उन ।(वास्तूनि)= स्थानों को (वाम्)= तुम को (गमध्यै)= जाने को लिए (उश्मसि)= इच्छा करते हो। (उरुगायस्य)= बहुत प्रकारों से प्रशंसित (वृष्णः)= सुख वर्षाने वाले परमेश्वर का (परमम्)= उत्कृष्ट (पदम्)= स्थान (भूरिः)= अत्यन्त (अव भाति) =उत्कृष्टता से प्रकाशमान होता है (तत्)= उसको (अत्राह)= यहाँ ही हम लोग चाहते हैं ॥६।
अर्थात् उपर्युक्त ऋचाओं का सार यही है कि श्रीकृष्ण का परम धाम वहीं है, जहाँ स्वर्ण युक्त सींगों वाली गायें रहती हैं, और वे विष्णु (श्रीकृष्ण) वहाँ गोप रूप में अहिंस्य (अवध्य) हैं, और यही स्वराट-विष्णु ही श्रीकृष्ण, वासुदेव, नारायण आदि नामों से परवर्ती युग में लोकप्रिय हुए हैं। क्योंकि इस सम्बन्ध में ऐसा ही लिखा गया है कि -
"त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः ।
अतो धर्माणि धारयन् ॥१८॥
(ऋग्वेद १/२२/१८)
इस ऋचा के पद-भेद से स्पष्ट होता है कि -
(अदाभ्यः) =सोमरस रखने के लिए गूलर की लकड़ी का बने हुए पात्र को (धारयन्)= धारण करता हुआ । (गोपाः)= गोपालक रूपों वाले, (विष्णुः)= संसार के अन्तर्यामी परमेश्वर (त्रीणि) =तीन (पदानि)= क़दमो से (विचक्रमे)= गमन करते हैं । और ये ही (धर्माणि)= धर्मों को । धारयन= धारण करते रहते हैं ।१८॥
अर्थात् यह बात वेदों से भी सुनिश्चित है कि - परमेश्वर श्रीकृष्ण का सनातन निवास गोलोक है, जहाँ वे गोप-वेष में अपनी गायों तथा गोपों के साथ रहते हैं और और वे ही भगवान भूतल पर अपने गोपों के यहाँ गोप-वेष में ही अवतरित होकर धर्म की स्थापना बारम्बार करते हैं। इसी बात को प्रमाण सहित इसी क्रम में आगे बताया गया है।
विशेष- विष्णु त्रय में स्वराट्- विष्णु की सर्वोच्च सत्ता है। वेदों में उन्हीं विष्णु को गोप रूप में वक्णित कि़ा गया है।
(2)- भूलोक में श्रीकृष्ण का परिचय-
जिस तरह से भगवान श्रीकृष्ण का परिचय गोलोक में है उसी तरह से इनका परिचय भूतल में भी है। क्योंकि सर्वविदित है कि भगवान श्रीकृष्ण गोलोक से जब भी भू-तल पर भूमि भार हरण के लिए अवतरित होते हैं, तो वे अपने समस्त गोप-गोपियों के साथ ही गोपकुल में गोपों के यहाँ ही अवतरित होते हैं।
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।७।
(श्रीमद्भागवत गीता अध्याय- ४/७)
अनुवाद:-
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं- "जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने आप को साकार रूप से प्रकट करता हूँ अर्थात् भूतल पर शरीर रूप धारण करता हूँ"।
इसी सत्य को चरितार्थ करने के लिए परमेश्वर श्रीकृष्ण अपने गोलोक से धरा-धाम पर गोप जाति के यादव वंश में अवतरित होते हैं।
इस बात की पुष्टि- श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कन्ध के अध्याय -४ के श्लोक संख्या- (२२) से होती है जिसमें लिखा गया है कि-
"भूमेर्भरावतरणाय यदुष्वजन्मा जातः करिष्यति सुरैरपि दुष्कराणि।
वादैर्विमोहयति यज्ञकृतोऽतदर्हान् शूद्रान कलौ क्षितिभुजो न्यहनिष्यदन्ते।।२२।
अनुवाद - अजन्मा होने पर भी पृथ्वी का भार उतारने के लिए वे ही भगवान यदुवंश में जन्म लेंगे और ऐसे-ऐसे कर्म करेंगे, जिन्हें बड़े-बड़े देवता भी नहीं कर सकते।
इसी तरह से श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कन्ध के अध्याय-(६) के श्लोक संख्या -(२३) और (२५) में ब्रह्मा जी श्रीकृष्ण से कहते हैं कि-
"अवततीर्य यदोर्वंशे बिभ्रद् रुपमनुत्तमम्।
कर्माण्युद्दामवृत्तानि हिताय जगतोऽकृथाः।। २३।
"यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरूषोत्तम।
शरच्छतं व्यतीताय पंचविंशाधिकं प्रभो।।२५।
अनुवाद - आपने यह सर्वोत्तम रूप धारण करके यदुवंश में अवतार लिया और जगत् के हित के लिए उदारता और पराक्रम से भरी अनेक लीलाएँ कीं ।२३।
• पुरुषोत्तम सर्वशक्तिमान प्रभु ! आपको यदुवंश में अवतार ग्रहण किये "एक सौ पचीस वर्ष" बीत गए हैं।२५।
▪️इसी तरह से हरिवंश पुराण के हरिवंश पर्व के अध्याय- (५५) के श्लोक-१७ में गोपेश्वर श्रीकृष्ण, ने ब्रह्माजी से पूछा कि- आप मुझे यह बताएं कि मैं किस प्रदेश में कैसे प्रकट होकर अथवा किस वेष में रहकर उन सब असुरों का समर भूमि में संहार करूँगा ? इस पर ब्रह्माजी ने श्लोक संख्या- (१८ से २०) में कहा -
नारायणेमं सिद्धार्थमुपायं श्रृणु मे विभो।
भुवि यस्ते जनयिता जननी च भविष्यति।। १८।
यत्र त्वं च महाबाहो जात: कुलकरो भुवि।
यादवानां महद वंशमखिलं धारयिष्यसि।।१९।
ताश्चासुरान् समुत्पाट्य वंशं कृत्वाऽऽत्मननो महत्।
स्थापयिष्यसि मर्यादां नृणां तन्मे निशामय।।२०।
अनुवाद - सर्वव्यापी नारायण ! आप मेरे इस उपाय को सुनिए, जिसके द्वारा सारा प्रयोजन सिद्ध हो जाएगा। हे महाबाहो ! भूतल पर जो आपके पिता होंगे,जो माता होगीं और जहाँ जन्म लेकर आप अपने कुल की वृद्धि करते हुए यादवों के सम्पूर्ण विशाल वंश को धारण करेंगे तथा उन समस्त असुरों का संहार करके अपने वंश का महान विस्तार करते हुए जिस प्रकार मनुष्यों के लिए धर्म की मर्यादा स्थापित करेंगे, वह सब बताता हूँ सुनिए।१८-१९-२०।
▪️इसी तरह से गोपेश्वर श्रीकृष्ण को यदुवंश में जन्म लेने की पुष्टि- गर्गसंहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय- (१४) के श्लोक संख्या- (४१) से होती है। जिसमें त्रेता-युग के रावण का भाई विभीषण जो अमर होकर लंका का राजा बन कर द्वापर युग तक जीवित था। उसी समय यादव अपनी विशाल सेना के साथ विश्वजीत युद्ध के लिए निकले थे। उसी समय दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य ने विभीषण को बताया कि-
असंख्यब्राह्मण्डपतिर्गोलोकेश: परात्पर:।
जातस्तयोर्वधाथार्य यदुवंशे हरि: स्वयंम्।।४१।
यादवेन्द्रो भूरिलीलो द्वारकायां विराजते। ४२/२
अनुवाद - असंख्य ब्रह्माण्डपति परात्पर गोलोकनाथ श्रीकृष्ण यदुवंश में अवतीर्ण हुए हैं। वे यादवेंद्र बहुत सी लीलाएँ करते हुए इस समय द्वारिका में विराजमान है।४१-४२/२।
यादवों के उसी विश्वजीत युद्ध के समय मुनि वामदेव ने राजा गुणाकर को भी भगवान श्रीकृष्ण को यादव कुल में उत्पन्न होने की बात बहुत ही अच्छे ढंग से बताया है। जिसका वर्णन गर्ग संहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय- (२८) के श्लोक संख्या (४५) व (४६) में कुछ इस प्रकार लिखा गया है-
राजंस्त्वं हि न जानसि परिपूर्णतमं हरिम्।
सुराणां महदर्थाय जातं यदुकुले स्वयंम्।
भुवो भारावताराय भक्तानां रक्षणाय च।।४५।
भूत्वा यदुकुले साक्षाद् द्वारकायां विराजते।
तेन कृष्णेन पुत्रोऽयं प्रदुम्नो यादवेश्वरः।
उग्रसेनमखार्थाय जगज्नेतुं प्रणोदित:।।४६।
अनुवाद - राजन ! तुम नहीं जानते कि परिपूर्णतम परमात्मा श्रीहरि, देवताओं का महान कार्य सिद्ध करने के लिए यादवों के कुल में अवतीर्ण हुए हैं। पृथ्वी का भार उतरने और भक्तों की रक्षा करने के लिए यदुकुल में अवतीर्ण हो वे साक्षात भगवान द्वारिकापुरी में विराजते हैं। उन्हीं श्रीकृष्ण ने उग्रसेन के यज्ञ की सिद्धि के लिए सम्पूर्ण जगत को जीतने के निमित्त अपने पुत्र यादवेश्वर प्रद्युम्न को भेजा है।४५- ४६।
▪️यादवों के उसी विश्वजित् युद्ध के समय जब श्रीकृष्ण के द्वारा महान बलशाली दैत्यराज शकुनि मारा गया तब उसकी पत्नी मदालसा ने हाथ जोड़कर श्रीकृष्ण से जो कुछ कहा उससे भी सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण गोप जाति के यदुवंश के वृष्णि कुल में अवतीर्ण हुए थे। जिसका वर्णन गर्गसंहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय- (४२) के श्लोक संख्या- (६) और (७) में कुछ इस प्रकार लिखा गया है-
भारावताराय भुवि प्रभो त्वं जातो यदूनां कुल आदिदेव।
ग्रसिष्यसे पासि भवं निधाय गुणैर्न लिप्तोऽसि नमामितुभ्यम्।। ६।
मदात्मजं पालय भीत-भीतममुष्य हस्तं कुरु शीर्षि्ण देव।
भर्त्रा कृते में किल तेऽपराधं क्षमस्व देवेश जगन्निवास।। ७।
अनुवाद- (६-७)
प्रभो आदि देव ! आप भूतल का भार उतारने के लिए यदुकुल में अवतरित हुए हैं। आप ही संसार के स्रष्टा एवं पालक है, और प्रलयकाल आनेपर आप ही इसका संहार भी करते हैं। किन्तु आप कभी भी गुणों में लिप्त नहीं होते। मैं आपकी अनुकूलता प्राप्त करने के लिए आपके चरणों को प्रणाम करती हूँ। मेरा पुत्र बहुत डरा हुआ है। आप इसकी रक्षा कीजिए। देव ! इसके मस्तक पर अपना वरद हस्त रखिए। देवेश ! जगन्निवास ! मेरे पति ने जो अपराध किया है उसे क्षमा कीजिए।
▪️इसी तरह से जब सभी देव मिलकर ब्रह्माजी का विवाह अहीर कन्या गायत्री से भगवान् विष्णु के निर्देशन में कराते हैं, तब ब्रह्माजी की पत्नी सावित्री क्रोध से तिलमिलाकर अहीर कन्या गायत्री सहित देवताओं को शापित करती हैं। उसी समय वहाँ उपस्थित विष्णु को भी सावित्री शाप दे देती हैं। उसी शाप के विधान से भी गोपेश्वर श्रीकृष्ण को यदुकुल में जन्म लेना पड़ता। इस बात की पुष्टि- पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय- (१७) के श्लोक संख्या-(१६१) से होती है। जिसमें सावित्री विष्णु को शाप देते हुए कहती हैं कि-
यदा यदुकुले जातः कृष्णसंज्ञो भविष्यसि।
पशूनां दासतां प्राप्य चिरकालं गोप रूपेण भ्रमिष्यसि ।।१६१।
अनुवाद - हे विष्णु ! जब तुम यदुवंश में जन्म लोगे, तो तुम कृष्ण के नाम से जाने जाओगें। उस समय तुम पशुओं (गायों) के सेवक बनकर लम्बे समय तक इधर-उधर भ्रमण करोगे।१६१।
▪️इसी तरह से बलरामजी को भी यदुकुल में उत्पन्न होने की पुष्टि गर्गसंहिता के बलभद्र खण्ड के श्लोक संख्या -(१३) और (१४) से होती है। जिसमें बलराम जी स्वयं अपने पार्षदों से कहते हैं कि -
हे हलमुसले यदा-यदा युवयोः स्मरणंं करिष्यमि।
तदा तदा मत्युर आविर्भूते भवतम्।। १३
राजंस्त्वं हि न जानसि परिपूर्णतमं हरिम्।
सुराणां महदर्थाय जातं यदुकुले स्वयंम्।
भुवो भारावताराय भक्तानां रक्षणाय च।।४५।
भूत्वा यदुकुले साक्षाद् द्वारकायां विराजते।
तेन कृष्णेन पुत्रोऽयं प्रदुम्नो यादवेश्वरः।
उग्रसेनमखार्थाय जगज्नेतुं प्रणोदित:।।४६।
अनुवाद - राजन ! तुम नहीं जानते कि परिपूर्णतम परमात्मा श्रीहरि, देवताओं का महान कार्य सिद्ध करने के लिए यादवों के कुल में अवतीर्ण हुए हैं। पृथ्वी का भार उतरने और भक्तों की रक्षा करने के लिए यदुकुल में अवतीर्ण हो वे साक्षात भगवान द्वारिकापुरी में विराजते हैं। उन्हीं श्रीकृष्ण ने उग्रसेन के यज्ञ की सिद्धि के लिए सम्पूर्ण जगत को जीतने के निमित्त अपने पुत्र यादवेश्वर प्रद्युम्न को भेजा है।४५- ४६।
▪️यादवों के उसी विश्वजित् युद्ध के समय जब श्रीकृष्ण के द्वारा महान बलशाली दैत्यराज शकुनि मारा गया तब उसकी पत्नी मदालसा ने हाथ जोड़कर श्रीकृष्ण से जो कुछ कहा उससे भी सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण गोप जाति के यदुवंश के वृष्णि कुल में अवतीर्ण हुए थे। जिसका वर्णन गर्गसंहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय- (४२) के श्लोक संख्या- (६) और (७) में कुछ इस प्रकार लिखा गया है-
भारावताराय भुवि प्रभो त्वं जातो यदूनां कुल आदिदेव।
ग्रसिष्यसे पासि भवं निधाय गुणैर्न लिप्तोऽसि नमामितुभ्यम्।। ६।
मदात्मजं पालय भीत-भीतममुष्य हस्तं कुरु शीर्षि्ण देव।
भर्त्रा कृते में किल तेऽपराधं क्षमस्व देवेश जगन्निवास।। ७।
अनुवाद- (६-७)
प्रभो आदि देव ! आप भूतल का भार उतारने के लिए यदुकुल में अवतरित हुए हैं। आप ही संसार के स्रष्टा एवं पालक है, और प्रलयकाल आनेपर आप ही इसका संहार भी करते हैं। किन्तु आप कभी भी गुणों में लिप्त नहीं होते। मैं आपकी अनुकूलता प्राप्त करने के लिए आपके चरणों को प्रणाम करती हूँ। मेरा पुत्र बहुत डरा हुआ है। आप इसकी रक्षा कीजिए। देव ! इसके मस्तक पर अपना वरद हस्त रखिए। देवेश ! जगन्निवास ! मेरे पति ने जो अपराध किया है उसे क्षमा कीजिए।
▪️इसी तरह से जब सभी देव मिलकर ब्रह्माजी का विवाह अहीर कन्या गायत्री से भगवान् विष्णु के निर्देशन में कराते हैं, तब ब्रह्माजी की पत्नी सावित्री क्रोध से तिलमिलाकर अहीर कन्या गायत्री सहित देवताओं को शापित करती हैं। उसी समय वहाँ उपस्थित विष्णु को भी सावित्री शाप दे देती हैं। उसी शाप के विधान से भी गोपेश्वर श्रीकृष्ण को यदुकुल में जन्म लेना पड़ता। इस बात की पुष्टि- पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय- (१७) के श्लोक संख्या-(१६१) से होती है। जिसमें सावित्री विष्णु को शाप देते हुए कहती हैं कि-
यदा यदुकुले जातः कृष्णसंज्ञो भविष्यसि।
पशूनां दासतां प्राप्य चिरकालं गोप रूपेण भ्रमिष्यसि ।।१६१।
अनुवाद - हे विष्णु ! जब तुम यदुवंश में जन्म लोगे, तो तुम कृष्ण के नाम से जाने जाओगें। उस समय तुम पशुओं (गायों) के सेवक बनकर लम्बे समय तक इधर-उधर भ्रमण करोगे।१६१।
▪️इसी तरह से बलरामजी को भी यदुकुल में उत्पन्न होने की पुष्टि गर्गसंहिता के बलभद्र खण्ड के श्लोक संख्या -(१३) और (१४) से होती है। जिसमें बलराम जी स्वयं अपने पार्षदों से कहते हैं कि -
हे हलमुसले यदा-यदा युवयोः स्मरणंं करिष्यमि।
तदा तदा मत्युर आविर्भूते भवतम्।। १३
भो वर्म त्वमपि चाविर्भव। हे मुनयः पाणिन्यादयो हे व्यासादयो हे कुमुदादयो हे कोटिशो रुद्रा हे भवानीनाथ हे एकादश रुद्रा हे गन्धर्वा, हे वासुक्यादिनागेन्द्रा, हे निवातकवचा हे वरुण, हे कामधेनो मूम्यां भारतखण्डे यदुकुलेऽवतरन्तं मां यूयं सर्वे सर्वदा एत्य मम दर्शनं कुरुत।।१४।
अनुवाद - हे हल और मुसल ! मैं जब-जब तुम्हारा स्मरण करूँ, तब-तब तुम मेरे सामने प्रकट हो जाना।
हे कवच ! तुम भी वैसे ही प्रकट हो जाना। हे पाणिनि, व्यास तथा कुमुद आदि मुनियों ! हे कोटि-कोटि रूद्रों ! गिरिजापति शंकर जी ! ग्यारह रुद्रों ! गन्धर्वों ! वासुकि आदि नागराजों ! निवातकवच आदि दैत्यों ! हे वरूण और कामधेनु ! मैं भूमण्डल पर भारतवर्ष में यदुकुल में अवतार लूँगा। तुम सब वहाँ आकर सदा सर्वदा मेरा दर्शन करना।१३-१४।
✳️ अतः उपर्युक्त सभी श्लोकों से सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण गोप अथवा आभीर जाति के यदुवंश के वृष्णि कुल में हुआ है। किन्तु इस सम्बन्ध में ज्ञात हो कि- यदुवंश - वैष्णव वर्ण के गोपजाति का ही प्रमुख वंश है। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण को जब वंश में जन्म लेने की बात कही जाती है तब उनके लिए यदुवंश का नाम लिया जाता है। किन्तु जब भगवान श्रीकृष्ण को जाति में जन्म लेने की बात कही जाती है तो उनके लिए गोपजाति या आभीर (आहिर) जाति का नाम लिया जाता है। इसमें दोनों तरह से बात एक ही है। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण को अनेक बार यदुवंश के साथ-साथ गोपजाति में भी जन्म लेने की बात कही गई है। जैसे-
गोपेश्वर श्रीकृष्ण को गोपजाति में जन्म लेने की बात हरिवंश पुराण के विष्णु पर्व के ग्यारहवें अध्याय के श्लोक संख्या -५८ में कही गई है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि-
एतदर्थं च वासोऽयंव्रजेऽस्मिन् गोपजन्म च।
अमीषामुत्पथस्थानां निग्रहार्थं दुरात्मनाम्।।५८।
अनुवाद - हे हल और मुसल ! मैं जब-जब तुम्हारा स्मरण करूँ, तब-तब तुम मेरे सामने प्रकट हो जाना।
हे कवच ! तुम भी वैसे ही प्रकट हो जाना। हे पाणिनि, व्यास तथा कुमुद आदि मुनियों ! हे कोटि-कोटि रूद्रों ! गिरिजापति शंकर जी ! ग्यारह रुद्रों ! गन्धर्वों ! वासुकि आदि नागराजों ! निवातकवच आदि दैत्यों ! हे वरूण और कामधेनु ! मैं भूमण्डल पर भारतवर्ष में यदुकुल में अवतार लूँगा। तुम सब वहाँ आकर सदा सर्वदा मेरा दर्शन करना।१३-१४।
✳️ अतः उपर्युक्त सभी श्लोकों से सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण गोप अथवा आभीर जाति के यदुवंश के वृष्णि कुल में हुआ है। किन्तु इस सम्बन्ध में ज्ञात हो कि- यदुवंश - वैष्णव वर्ण के गोपजाति का ही प्रमुख वंश है। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण को जब वंश में जन्म लेने की बात कही जाती है तब उनके लिए यदुवंश का नाम लिया जाता है। किन्तु जब भगवान श्रीकृष्ण को जाति में जन्म लेने की बात कही जाती है तो उनके लिए गोपजाति या आभीर (आहिर) जाति का नाम लिया जाता है। इसमें दोनों तरह से बात एक ही है। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण को अनेक बार यदुवंश के साथ-साथ गोपजाति में भी जन्म लेने की बात कही गई है। जैसे-
गोपेश्वर श्रीकृष्ण को गोपजाति में जन्म लेने की बात हरिवंश पुराण के विष्णु पर्व के ग्यारहवें अध्याय के श्लोक संख्या -५८ में कही गई है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि-
एतदर्थं च वासोऽयंव्रजेऽस्मिन् गोपजन्म च।
अमीषामुत्पथस्थानां निग्रहार्थं दुरात्मनाम्।।५८।
अनुवाद - इसीलिए ब्रज में मेरा यह निवास हुआ है ; और इसीलिए मैंने गोपों में अवतार ग्रहण किया है।
▪️भगवान श्रीकृष्ण को भू-तल पर गोपकुल में अवतीर्ण होने की बात गायत्री संग ब्रह्माजी के विवाह के समय तब होती है जब इन्द्र गोप कन्या गायत्री को लेकर ब्रह्माजी से विवाह हेतु यज्ञ स्थल पर ले गए थे। तब सभी गोप अपना मुख्य शस्त्र लकुटि- दण्ड (लाठी- डण्डा)के साथ अपनी कन्या गायत्री को खोजते हुए ब्रह्मा के यज्ञ स्थल में पहुँचे। वहाँ पहुँच कर गायत्री के माता-पिता ने पूछा कि- मेरी कन्या को कौन यहाँ लाया है ? तब उनकी यह बात सुनकर तथा उनके क्रोध का अन्दाजा लगाकर वहाँ उपस्थित सभी देवता और ऋषि मुनि भयभीत हो गए। तभी वहाँ उपस्थित विष्णु भगवान् गोपों के सामने उपस्थित हो गए और उस अवसर पर जो कुछ गोपों से कहा उसका वर्णन पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय- (१७) के श्लोक संख्या -(१६) से (२०) में मिलता है। जिसमें भगवान्- विष्णु यज्ञ-स्थल में सबके समक्ष गोपों से कहते हैं कि -
युष्माभिरनया आभीरकन्याया
तारितो गच्छ ! दिव्यान्लोकान्महोदयान्।
युष्माकं च कुले चापि देवकार्यार्थसिद्धये।१६।
अवतारं करिष्येहं सा क्रीडा तु भविष्यति।
यदा नन्दप्रभृतयो ह्यवतारं धरातले।१७।
करिष्यन्ति तदा चाहं वसिष्ये तेषु मध्यतः।
युष्माकं कन्यकाः सर्वा वसिष्यन्ति मया सह।। १८।
तत्र दोषो न भविता न द्वेषो न च मत्सरः।
करिष्यन्ति तदा गोपा भयं च न मनुष्यकाः।।१९।
न चास्याभविता दोषः कर्मणानेन कर्हिचित्।
श्रुत्वा वाक्यं तदा विष्णोः प्रणिपत्य ययुस्तदा ।।२०।
अनुवाद:- हे आभीरों ( गोपों ) इस तुम्हारी आभीर कन्या गायत्री के द्वारा उद्धार किये गये तुम सब लोग दिव्यलोकों को जाओ तुम्हारी अहीर जाति के यदुकुल के अन्तर्गत वृष्णिकुल में देवों के कार्य की सिद्धि के लिए मैं अवतरण करुँगा।१६।
• और वहीं मेरी लीला (क्रीडा) होगी। उसी समय धरातल पर नन्द आदि का भी अवतरण होगा।१७।
• तब मैं उनके बीच रहूँगा। तुम्हारी सभी पुत्रियाँ मेरे साथ ही रहेंगी।१८।
• तब वहाँ कोई पाप, द्वेष और ईर्ष्या नहीं होगी। गोप (आभीर) लोग भी किसी को भय नहीं देंगे।१९।
• इस कार्य (ब्रह्मा से विवाह करने) के फलस्वरूप इस (तुम्हारी पुत्री को) कोई पाप नहीं लगेगा। विष्णु के ये वचन सुनकर वे सभी उन्हें प्रणाम करके वहाँ से चले गए।२०।
किन्तु जाते समय गोपगणों ने भी विष्णु से यह वचन करवाया कि आप निश्चित रूप से गोपकुल में ही जन्म लेंगे। जिसका वर्णन इसी अध्याय के श्लोक -२१ में है जिसमें गोपगण भगवान-विष्णु से कहते हैं कि -
एवमेष वरो देव यो दत्तो भविता हि मे।
अवतारः कुलेऽस्माकंं कर्तव्योधर्मसाधनः।। २१।
अनुवाद - हे देव ! ऐसा ही हो। आपने जो वर दिया, वैसा ही हो। आप हमारे कुल में धर्मसाधन के कर्तव्य के लिए अवश्य अवतार लेंगे।२१।
तब विष्णु ने भी गोपों को ऐसा ही वचन दिया। तत्पश्चात सभी गोप प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने घर चले गए।
उसी समय अहीर कन्या गायत्री ने ब्रह्माजी की प्रथम पत्नी सावित्री जो विष्णु को यह शाप दे चुकी थी कि- हे विष्णु ! जब तुम यदुवंश में जन्म लोगे, तो तुम कृष्ण के नाम से जाने जाओगे। उस समय तुम पशुओं (गायों) के सेवक बन कर लम्बे समय तक इधर-उधर भटकते रहोगे। उस शाप को गायत्री ने वरदान में बदलते हुए विष्णु से जो कहा उसका वर्णन- स्कन्द पुराण खण्ड- (६) के नागर खण्ड के अध्याय- १९३ के श्लोक -(१४) और (१५) में मिलता है। जिसमें गायत्री विष्णु से कहतीं हैं कि -
तेनाकृत्येऽपि रक्तास्ते गोपा यास्यन्ति श्लाघ्यताम्॥
सर्वेषामेव लोकानां देवानां च विशेषतः ॥१४॥
यत्रयत्र च वत्स्यंन्ति मद्वं शप्रभवानराः॥
तत्रतत्र श्रियो वासो वनेऽपि प्रभविष्यति॥१५॥
अनुवाद -(१४-१५)
• आभीर कन्या गायत्री विष्णु से कहती है- हे विष्णो ! (श्रीकृष्ण) तुम्हारे रक्त सम्बन्धी (blood relative) सभी गोप बिना कुछ किये ही तुम्हारे द्वारा प्रसिद्धि को प्राप्त हो जाऐंगे। और इनकी प्रशंसा विशेषतः देवताओं सहित सभी लोकों में होगी।
• पुन: गायत्री विष्णु से कहती हैं- मेरे गोप वंश के लोग जहाँ भी रहेंगे वहाँ श्री (सौभाग्य और समृद्धि) विद्यमान रहेगी, चाहे वह स्थान जंगल ही क्यों न हो।१५।
✳️ ज्ञात हो उपर्युक्त श्लोकों में गायत्री द्वारा जिस विष्णु को सम्बोधित किया जा रहा है वह क्षुद्र (छोटे) विष्णु हैं जो परमेश्वर श्रीकृष्ण के एक अंश से भूतल पर श्रीकृष्ण का ही प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ऐसे ही अनन्त ब्रह्माण्ड में अनन्त क्षुद्र (छोटे) विष्णु हैं जो परमेश्वर श्रीकृष्ण के एक-एक अंश से उनका प्रतिनिधित्व किया करते हैं। अतः गायत्री द्वारा भूलोक पर विष्णु नाम का वास्तविक सम्बोधन परमेश्वर श्रीकृष्ण के लिए ही है।
अतः उपर्युक्त सभी महत्वपूर्ण श्लोकों के आधार पर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि- गोपों में श्रीकृष्ण का रक्त सम्बन्ध है और धर्म स्थापना हेतु गोपेश्वर श्रीकृष्ण का जन्म या अवतरण, वैष्णव वर्ण के अन्तर्गत गोप जाति (अहीर जाति) के यादव वंश में ही होता है जहाँ सभी गोप उनके रक्त सम्बन्धी हैं। अन्य किसी जाति या वंश में उनका अवतरण नहीं।
यही कारण है कि भगवान श्रीकृष्ण, चाहे गोलोक में हों या भूलोक में हों, वे सदैव गोपवेष में गोपों के ही साथ ही रहते हैं, और सभी लीलाएँ उन्हीं के साथ ही करते हैं। इसीलिए गोपों को श्रीकृष्ण का सहचर (सहगामी) अर्थात् साथ-साथ चलने वाला भी कहा जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण को सदैव गोपवेष में गोपों के साथ रहने की पुष्टि - हरिवंश पुराण के विष्णुपर्व के अध्याय -(३) के श्लोक -(३४) से होती है। जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अपने जन्म से पूर्व योग माया से कहते हैं कि-
मोहहित्वा च तं कंसमेका त्वं भोक्ष्यसे जगत्।
अहमप्यात्मनो वृत्तिं विधास्ये गोषु गोपवतः।। ३४।
अनुवाद - तुम उस कंस को मोह में डालकर अकेली ही सम्पूर्ण जगत का उपभोग करोगी। और मैं भी व्रज में गौओं के बीच में रहकर गोपों के समान ही अपना व्यवहार बनाऊँगा।
ये तो रही बात भूलोक की। किन्तु गोपेश्वर श्रीकृष्ण गोलोक में भी अपने गोपों के साथ सदैव गोपवेष में ही रहते हैं। इस बात की पुष्टि -ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्म-खण्ड के अध्याय
(२)- के श्लोक -(२१) से होती है। जिसमें लिखा गया है कि -
स्वेच्छामयं सर्वबीजं सर्वाधारं परात्परम्।
किशोरवयसं शश्वद्गोपवेषविधायकम्।।२१।
अनुवाद- वे ही प्रभु स्वेच्छामयी सभी के मूल- (आदि-कारण) सर्वाधार तथा परात्पर- परमात्मा हैं। उनकी नित्य किशोरावस्था रहती है और वे प्रभु गायों के उस लोक (गोलोक) में सदा गोप (आभीर) भेष में रहते हैं।२१।
अतः इस उपर्युक्त श्लोक से सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण चाहे गोलोक में हों या भूलोक, दोनों स्थानों पर वे सदैव गोपवेष में गोपों के साथ ही रहते हैं।
यही कारण है कि भगवान श्रीकृष्ण के एक हजार नामों में एक नाम "गोपवेशः" और गोपकृत भी है जिसका क्रमशः अर्थ है- सर्वदा गोप (अहीर) वेश में रहने वाला तथा नूतन गोपों का निर्माण करने वाला
इसकी पुष्टि- गर्गसंहिता के अश्वमेधखण्ड के अध्याय -(५९) के श्लोक- (३०) से होती है।
वने वत्सचारी महावत्सहारी
बकारिः सुरैः पूजितोऽघारिनामा ।
वने वत्सकृद्गोपकृद्गोपवेषः*
कदा ब्रह्मणा संस्तुतः पद्मनाभः ॥३०।
गोपकृत - अर्थात् = नूतन गोपों का निर्माण करने वाला।
गोपवेशः - अर्थात् = सर्वदा गोप (अहीर) वेश में रहने वाला
इसी तरह से हरिवंश पुराण के भविष्य पर्व के अध्याय- (१००) के श्लोक - (२६) और (४१) में भगवान श्रीकृष्ण को गोप और यादव दोनों होने की पुष्टि पौण्ड्रक-श्रीकृष्ण के समय होती है। उस युद्ध के मध्य श्रीकृष्ण से पौण्ड्रक कहता है कि-
स ततः पौण्ड्रको राजा वासुदेवमुवाच ह।
भो भो यादव गोपाल इदानिं क्व गतो भवात।। २६।
गोपोऽहं सर्वदा राजन् प्राणिनां प्राणदः सदा।
गोप्ता सर्वेषु लोकेषु शास्ता दुष्टस्य सर्वदा।। ४१।
अनुवाद - ओ यादव ! ओ गोपाल ! इस समय तुम कहाँ चले गए थे ? आजकल मैं ही वासुदेव नाम से विख्यात हूंँ।२६।
तब भगवान श्रीकृष्ण ने पौण्ड्रक से कहा-
• राजन मैं सर्वदा गोप हूँ, प्राणियों का सदा प्राण दान करने वाला हूँ, तथा सम्पूर्ण लोकों का रक्षक तथा सर्वदा दुष्टों का शासक हूँ। ४१।
इसी प्रकार से एक बार श्रीकृष्ण की तरह-तरह की अद्भुत लीलाओं को देखकर गोपों को संशय होने लगा कि कृष्ण कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। ये या तो कोई देव हैं या कोई ईश्वरीय शक्ति। और इस रहस्य को श्रीकृष्ण अपने गोपों से गुप्त रखना चाहते थे, ताकि मेरी बाल-लीला बाधित न हो। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण उनके संशय को दूर करने के लिए हरिवंश पुराण के विष्णुपर्व के अध्याय- (२०) के श्लोक- (११) में अपने सजातीय गोपों से कहते हैं कि-
मन्यते मां यथा सर्वे भवन्तो भीमविक्रमम्।
तथाहं नावमन्तव्यः स्वजातीयोऽस्मि बान्धवः।।११।
अनुवाद - आप सब लोग मुझे जैसा भयानक पराक्रमी समझ रहे हैं, वैसा मानकर मेरा अनादर न करें। मैं तो आप लोगों का सजातीय (गोप जाति का) भाई बन्धु ही हूँ।
इस प्रकार से यह अध्याय (एक)- इस जानकारी के साथ समाप्त हुआ कि- गोपेश्वर श्रीकृष्ण गोलोक और भू-लोक दोनों स्थानों पर सदैव गोपवेष में अपने गोपकुल के गोपों के साथ ही रहते हैं। अब इसके अगले अध्याय- (दो) में गोप (यादवों) की उत्पत्ति के बारे में बताया गया है। उसको भी इस अध्याय के साथ जोड़कर पढे़े।
भाग- (ख) ऐतिहासिक परिचय-
यह भाग उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो भगवान श्रीकृष्ण को अनैतिहासिक मानकर श्रीकृष्ण को एक काल्पनिक (व्यक्ति) चरित्र ( Character) मानते हैं। जबकि उन लोगों को यह पता नहीं है कि श्रीकृष्ण की सत्ता काल्पनिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक है। इसी बात को अच्छी तरह से समझने के लिए इसे दो प्रमुख भागों में बांटा गया है-
(1)पुरातात्विक परिचय (2)- लिपिकीय परिचय।
(1) पुरातात्विक परिचय -
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