शुक्रवार, 27 मार्च 2026

नन्दकुलं कुल्या-


नन्द परिवार का विस्तृत परिचय: सात्वत वंश से गोकुल तक

1. सात्वत वंश और चतुर्थ वृष्णि (वंश परम्परा)

​सात्वत वंश की शाखा में चतुर्थ वृष्णि का विशेष स्थान है। वे सात्वत के पुत्र वृष्णि के पौत्र और अनमित्र के तीसरे पुत्र थे। सात्वत शाखा में ये अन्तिम वृष्णि थे और यही नन्द बाबा एवं वसुदेव जी के पूर्व-पितामह (परदादा) थे।

2. नन्द बाबा का पितृ-पक्ष (Grandparents & Parents)

  • पितामह (दादा): देवमीण जी (वृष्णि कुल में उत्पन्न)।
  • पिता: पर्जन्य जी (देवमीण के पुत्र)। इन्होंने नन्दीश्वर प्रदेश में भगवान विष्णु की घोर तपस्या की थी, जिसके फलस्वरूप इन्हें पाँच श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त हुए। केशी असुर के भय से ये सपरिवार नन्दीश्वर छोड़कर गोकुल (महावन) बस गए थे।
  • माता (दादी): वरीयसी (कुसुम्भ आभा वाले वस्त्र धारण करने वाली, छोटे कद की और पूजनीय वृद्धा)।
  • चाचा/बुआ: पर्जन्य जी के दो भाई अर्जन्य और राजन्य थे। इनकी एक बहन सुभ्यर्चना थी, जिनका विवाह सूर्य-कुण्ड निवासी गुणवीर से हुआ था।

3. नन्द बाबा और उनके भाई-बहन (The Five Brothers)

​पर्जन्य जी के पाँच पुत्र थे, जिनमें नन्द बाबा मध्य (तीसरे) पुत्र थे:

  1. उपनन्द (सबसे बड़े): गुलाबी अंगकान्ति, लम्बी दाढ़ी, हरे वस्त्र। पत्नी: तुंगी
  2. अभिनन्द: शंख के समान गोरे, काली दाढ़ी, काले वस्त्र। पत्नी: पीवरी
  3. नन्द (व्रजेश्वर): वसुदेव के परम मित्र और भ्राता और कृष्ण के पालक पिता। पत्नी: यशोदा
  4. सनन्द (सुनन्द): गौर-पीत वर्ण, काले वस्त्र। पत्नी: कुवलया
  5. नन्दन (सबसे छोटे): मयूर कण्ठ जैसी कान्ति। पत्नी: अतुल्या
  • बहनें: नन्द बाबा की दो बहनें सानन्दा और नन्दिनी थीं। इनके पति क्रमशः महानील और सुनील थे।

4. नन्द बाबा के मित्र और सम्बन्धी

  • वसुदेव जी: नन्द बाबा के अभिन्न मित्र। 'वसु' (रत्न/सत्वगुण) से प्रकाशित होने के कारण वसुदेव कहलाए। इन्हें 'आनक दुन्दुभि' भी कहा जाता है।
  • वृषभानु जी: गरुड़ पुराण के अनुसार, वृषभानु जी नन्द बाबा के प्रिय सुहृद (परम मित्र) थे।

माता यशोदा का परिवार (Maternal Side)

1. यशोदा जी के माता-पिता (Grandparents)

  • नाना: सुमुख (जिन्हें गिरिभानु भी कहा गया है)। पके जामुन जैसी श्यामल कान्ति और लम्बी सफेद दाढ़ी।
  • नानी: पाटला (पद्मावती)। पाटल पुष्प जैसी आभा और दही के समान सफेद बाल।
  • नानी की सखी: मुखरा (जिन्होंने स्नेहवश यशोदा जी को स्तनपान भी कराया था)।

2. यशोदा जी के भाई-बहन-

  • भाई: यशोधर, यशोदेव और सुदेव (अलसी के फूल जैसी कान्ति)। इनकी पत्नियाँ क्रमशः रेमा, रोमा और सुरेमा हैं।
  • बहनें: यशोदेवी और यशस्विनी (इन्हें दधिस्सारा और हविस्सारा भी कहा जाता है)।

3. अन्य सम्बन्धी-

  • मामा: यशोदा के मामा गोल थे  ( जो कृष्ण की नानी पाटला के भाई)थे। इनकी पत्नी का नाम जटिला है।
  • छोटे नाना: चारुमुख (सुमुख के छोटे भाई)। इनकी पत्नी बलाका और पुत्र सुचारु हैं।

श्रीराधा और उनके सखी-परिवार का परिचय-

1. श्रीराधा का मूल परिवार

  • पिता: वृषभानु जी। माता: कीर्तिदा जी (रत्नगर्भा)।
  • दादा: महीभानु। दादी: सुखदा।
  • नाना: इन्दु। नानी: मुखरा।
  • भाई-बहन: बड़े भाई श्रीदामा और छोटी बहन अनंगमञ्जरी

2. राधा जी की अष्ट सखियाँ-

​मुख्य सखी ललिता देवी हैं (राधा जी से 27 दिन बड़ी, माता: सारदी, पिता: विशोक, पति: भैरव)। अन्य सखियाँ: विशाखा, चित्रा, चम्पकलता, तुंगविद्या, इन्दुलेखा, रंगदेवी और सुदेवी।

3. भगवती पौर्णमासी का परिवार-

  • पौर्णमासी: सान्दीपनि मुनि की माता और मधुमंगल की दादी। ये देवर्षि नारद की शिष्या और राधा-कृष्ण के मिलन की सूत्रधार हैं।
  • पुत्र: महर्षि सान्दीपनि। पौत्र: मधुमंगल। पौत्री: नान्दीमुखी।

विशेष शोध टिप्पणी: यशोदा जी का वर्ण-

​विभिन्न शास्त्रों (जैसे 'राधाकृष्ण गणोद्देश दीपिका') के अनुसार माता यशोदा का वास्तविक वर्ण श्यामल (साँवला) था। गर्गसंहिता के कुछ श्लोक जो उन्हें 'गौर वर्ण' बताते हैं, उन्हें विद्वानों द्वारा बाद में प्रक्षिप्त (जोड़ा गया) माना जाता है, ताकि कृष्ण के श्याम वर्ण को 'विलक्षण' सिद्ध किया जा सके।

श्रेणी

नन्द बाबा का परिवार (गोकुल)

श्री वृषभानु का परिवार (बरसाना)

कुल/वंश-

सात्वत-वृष्णि वंश (यदु शाखा)

वृषभानु वंश (गोप कुल)

मुखिया (पिता)-

पर्जन्य जी (महान तपस्वी)

महीभानु जी (पितामह)

माता-

वरीयसी (दादी)

सुखदा (दादी)

मुख्य पुरुष-

नन्द बाबा (व्रजेश्वर)

श्री वृषभानु जी (नन्द के परम मित्र)

मुख्य स्त्री- -

माता यशोदा (श्यामल वर्ण)

माता कीर्तिदा (रत्नगर्भा)

सन्तान-

श्रीकृष्ण (पुत्र), सुभद्रा (पुत्री)

श्रीराधा (पुत्री), श्रीदामा (पुत्र)

भाई-

उपनन्द, अभिनन्द, सनन्द, नन्दन

रत्नभानु, सुभानु, भानु

बहनें-

सानन्दा, नन्दिनी

भानुमुद्रा (बुआ)

प्रमुख पारिवारिक कड़ियाँ (Main Connections)

1. नन्द और वृषभानु का मित्रता सम्बन्ध:

  • गरुड़ पुराण के अनुसार, नन्द बाबा और वृषभानु जी केवल पड़ोसी नहीं, बल्कि "प्रिय सुहृदर:" (परम प्रिय मित्र) थे। इनके परिवारों के बीच का प्रेम ही कृष्ण और राधा के मिलन का आधार बना।

2. यशोदा जी का ननिहाल पक्ष:

  • ​यशोदा जी के पिता सुमुख (गिरिभानु) थे और माता पद्मावती
  • ​यशोदा जी के नाना का परिवार भी व्रज के अत्यंत प्रतिष्ठित गोपों में से था, जिससे नन्द परिवार और गोप समुदाय के अन्य परिवारों के बीच वैवाहिक और सामाजिक संतुलन बना रहता था।

3. पौर्णमासी और सान्दीपनि की भूमिका-

  • भगवती पौर्णमासी (जो सान्दीपनि मुनि की माता और मधुमंगल की दादी हैं) इन दोनों परिवारों के बीच की आध्यात्मिक कड़ी थीं। वे नन्द बाबा की पूज्या थीं और श्रीराधा-कृष्ण के मिलन की प्रमुख सूत्रधार भी।

4. सखियों और मित्रों का जाल-

  • ​नन्द बाबा के पुत्र (कृष्ण) के सखा मधुमंगल की दादी स्वयं पौर्णमासी थीं।
  • ​राधा जी की सखी ललिता के पति भैरव, गोवर्धन गोप के सखा थे, जो नन्द बाबा के गोप समुदाय का हिस्सा थे।

वंशवृक्ष का सारांश (Tree Hierarchy)

  • सात्वत वंश \rightarrow चतुर्थ वृष्णि \rightarrow देवमीण \rightarrow पर्जन्य \rightarrow नन्द बाबा \rightarrow श्रीकृष्ण
  • वृषभानु वंश \rightarrow महीभानु \rightarrow वृषभानु \rightarrow श्रीराधा

नन्द बाबा के पितामह और पिता का परिचय-

वृष्णे: कुले उत्पन्नस्य देवमीणस्य पर्जन्यो नाम्न: सुतो।  वरिष्ठो बहुशिष्टो व्रजगोष्ठीनां स कृष्णस्य पितामह॥१॥

  • अनुवाद: यदुवंश के वृष्णि कुल में देवमीण जी के पुत्र 'पर्जन्य' नाम से प्रसिद्ध हुए। वे अत्यन्त शिष्ट, महान और समस्त व्रज समुदाय के रक्षक थे। वे ही श्रीकृष्ण के पितामह (दादा) अर्थात नन्द बाबा के पिता थे।                                  संस्कृत अनुवाद:
    "यदुवंशस्य वृष्णिकुले देवमीढस्य पुत्रः 'पर्जन्य' नाम्ना प्रसिद्धः अभवत्। सः अत्यन्तं शिष्टः, महान्, समस्तस्य व्रजसमुदायस्य रक्षकश्च आसीत्। सः एव श्रीकृष्णस्य पितामहः अर्थात् नन्दगोपस्य पिता आसीत्।"

    व्याकरण विश्लेषण:
    1. यदुवंशस्य वृष्णिकुले: 'यदुवंश के वृष्णि कुल में'—यहाँ 'यदुवंश' में षष्ठी विभक्ति (सम्बन्ध) और 'वृष्णिकुल' में सप्तमी विभक्ति (अधिकरण) का प्रयोग हुआ है।
    2. देवमीढस्य पुत्रः: 'देवमीढ के पुत्र'—सम्बन्ध अर्थ में षष्ठी विभक्ति।
    3. नाम्ना प्रसिद्धः अभवत्: 'नाम से प्रसिद्ध हुए'—'नाम्न्' शब्द में तृतीया विभक्ति। 'अभवत्' भू धातु का लङ् लकार (भूतकाल) है।
    4. समस्तस्य व्रजसमुदायस्य: 'समस्त व्रज समुदाय के'—दोनों पदों में षष्ठी विभक्ति है क्योंकि ये 'रक्षक' के विशेषण हैं।
    5. रक्षकश्च आसीत्: 'रक्षक और थे'—'रक्षकः + च' में विसर्ग सन्धि हुई है। 'आसीत्' अस् धातु का लङ् लकार है।
    6. पितामहः / पिता: ये दोनों शब्द प्रथमा विभक्ति एकवचन में हैं। 'पिता' मूल शब्द 'पितृ' (ऋकारान्त) का रूप है।
यदुवंश के इस वृत्तान्त को अनुष्टुप छन्द में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:
यदुवंशे ह्यभूच्छ्रेष्ठो देवमीढसुतः सुधीः।
पर्जन्य इति विख्यातो रक्षकः सर्वव्रजस्य च॥
नन्दगोपपिता चैव कृष्णस्य च पितामहः।
शिष्टः सर्वगुणैर्युक्तो महान् स पुरुषोत्तमः॥
भावार्थ:
यदुवंश में देवमीढ के पुत्र, बुद्धिमान और शिष्ट गुणों से युक्त 'पर्जन्य' नाम के महान पुरुष हुए। वे समस्त व्रज समुदाय के रक्षक, नन्द बाबा के पिता और भगवान श्रीकृष्ण के पितामह (दादा) थे।
क्या आप इस प्रसंग से संबंधित अन्य पात्रों या नन्द वंश के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं?
श्लोक
यदुवंशे ह्यभूच्छ्रेष्ठो देवमीढसुतः सुधीः।
पर्जन्य इति विख्यातो रक्षकः सर्वव्रजस्य च॥
नन्दगोपपिता चैव कृष्णस्य च पितामहः।
शिष्टः सर्वगुणैर्युक्तो महान् स पुरुषोत्तमः॥
1. पद-परिच्छेद एवं संधि-विच्छेद
  • यदुवंशे: यदुवंश (अकारान्त पुल्लिंग) + सप्तमी विभक्ति, एकवचन।
  • ह्यभूच्छ्रेष्ठो: हि + अभूत् + श्रेष्ठः।
    • हि + अभूत्: 'यण् सन्धि' ().
    • अभूत् + श्रेष्ठः: 'श्चुत्व सन्धि' ().
    • श्रेष्ठः: विसर्ग का 'ओ' (उत्व सन्धि).
  • देवमीढसुतः: देवमीढस्य सुतः (षष्ठी तत्पुरुष समास).
  • पर्जन्य इति: पर्जन्यः + इति (विसर्ग लोप संधि)।
  • सर्वव्रजस्य: समस्त व्रज का (षष्ठी विभक्ति, एकवचन).
  • चैव: च + एव (वृद्धि संधि: ).
  • सर्वगुणैर्युक्तो: सर्वगुणैः + युक्तः (ऋत्व संधि - विसर्ग का 'र' और उत्व संधि - विसर्ग का 'ओ').
2. अन्वय (वाक्य रचना)
अन्वय: (पुरा) यदुवंशे हि देवमीढसुतः सुधीः श्रेष्ठः पर्जन्यः इति विख्यातः अभूत्। सः शिष्टः, सर्वगुणैः युक्तः, महान्, पुरुषोत्तमः, सर्वव्रजस्य रक्षकः, नन्दगोपपिता च कृष्णस्य पितामहः एव (आसीत्)।
3. व्याकरणिक टिप्पणियाँ
  • छन्द: यह अनुष्टुप छन्द है, जिसके प्रत्येक चरण में 8 वर्ण होते हैं। इसका लक्षण है— "श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम्" (अर्थात् पाँचवाँ वर्ण लघु और छठा गुरु होता है).
  • विभक्ति प्रयोग:
    • प्रथमा विभक्ति (कर्ता/विशेषण): सुधीः, श्रेष्ठः, विख्यातः, रक्षकः, शिष्टः, युक्तः, महान्, पितामहः। ये सभी 'पर्जन्य' के विशेषण हैं.
    • षष्ठी विभक्ति (सम्बन्ध): कृष्णस्य, सर्वव्रजस्य। 'कृष्ण के' और 'समस्त व्रज के'.
  • क्रिया पद: 'अभूत्' (भू धातु, लुङ् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) - जिसका अर्थ है 'हुआ 
  •  2. नन्द बाबा के जन्म का सन्दर्भ (तपस्या का फल)

तपसानेन धन्येन भाविन: पुत्रा वरीयान्। पञ्च ते मध्यमस्तेषां नन्दनाम्ना जजान॥३॥

  • अनुवाद: पर्जन्य जी की महान तपस्या के फलस्वरूप उन्हें पाँच श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त हुए, जिनमें से मध्यम (तीसरे) पुत्र का नाम 'नन्द' था।

3. श्रीकृष्ण की दादी (पर्जन्य जी की पत्नी)

कृष्णस्य पितामही महीमान्या कुसुम्भाभा हरित्पटा।वरीयसीति वर्षीयसी विख्याता खर्वा: क्षीराभ लट्वा॥५॥

  • अनुवाद: श्रीकृष्ण की दादी 'वरीयसी' पूरे गोकुल में अत्यंत सम्मानित थीं। वे कुसुम्भ (सिंदूरी/नारंगी) आभा वाले और हरे वस्त्र धारण करती थीं। वे छोटे कद की थीं, उनके बाल दूध के समान श्वेत थे और वे अधिक वृद्धा थीं।

4. नन्द बाबा के भाई और बहन

उपनन्दानुजो नन्दो वसुदेवस्य सुहृत्तम:।

नन्दयशोदे च कृष्णस्य पितरौ व्रजेश्वरौ॥८॥

  • अनुवाद: उपनन्द के छोटे भाई नन्द, वसुदेव जी के परम मित्र थे। नन्द और यशोदा दोनों ही श्रीकृष्ण के माता-पिता और व्रज के स्वामी (व्रजेश्वर) के रूप में प्रसिद्ध हैं।

5. माता यशोदा का स्वरूप और परिचय

माता गोपान् यशोदात्री यशोदा श्यामलद्युति:।

मूर्ता वत्सलते! वासौ इन्द्रचापनिभाम्बरा॥११॥


  • अनुवाद: गोप जाति को यश प्रदान करने के कारण वे 'यशोदा' कहलाती हैं। उनकी अंग-कान्ति श्यामल (साँवली) है, वे साक्षात् वात्सल्य की प्रतिमूर्ति हैं और उनके वस्त्र इंद्रधनुष के समान रंग-बिरंगे हैं।

6. नन्द और यशोदा के गोरे वर्ण पर विवाद (गर्गसंहिता खंडन)

गौरवर्णा यशोदे त्वं नन्द त्वं गौरवर्णधृक्।

अयं जातः कृष्णवर्ण एतत्कुलविलक्षणम्॥५॥


  • अनुवाद (गर्गसंहिता के अनुसार): "हे यशोदा, तुम गोरी हो, नन्द बाबा भी गोरे हैं, किंतु यह बालक (कृष्ण) काला जन्मा है, जो इस कुल के लिए असामान्य है।"
  • विशेष टिप्पणी: जैसा कि आपके लेख में उल्लेख है, विद्वानों का मत है कि माता यशोदा का वर्ण श्यामल ही था और ये श्लोक बाद में जोड़े गए (फर्जी) प्रतीत होते हैं।

7. आदि पुराण के अनुसार यशोदा जी का दूसरा नाम

आदिपुराणे प्रोक्तं द्वे नाम्नी नन्दभार्याया यशोदा देवकी-इति च।

अत: सख्यमभूत्तस्या देवक्या: शौरिजायया॥१२॥


  • अनुवाद: आदि पुराण में कहा गया है कि नन्द की पत्नी के दो नाम हैं—यशोदा और देवकी। इसी नाम की समानता के कारण वसुदेव की पत्नी देवकी के साथ उनका स्वाभाविक सख्य (मित्रता) भाव था।

8. नन्द बाबा के अन्य भाइयों का परिचय

उपनन्दोऽभिनन्दश्च पितृव्यौ पूर्वजौ पितु:।

पितृव्यौ तु कनीयांसौ स्यातां सनन्द नन्दनौ॥१३॥


  • अनुवाद: श्रीकृष्ण के पिता (नन्द) के दो बड़े भाई 'उपनन्द' और 'अभिनन्द' हैं, तथा दो छोटे भाई 'सनन्द' और 'नन्दन' हैं। ये चारों श्रीकृष्ण के पितृव्य (ताऊ और चाचा) हैं।

नन्द बाबा (पितृ-पक्ष) एवं परिवार वंशावली-


संबंध

नाम

विशेष विवरण

पर-पितामह

चतुर्थ वृष्णि

सात्वत वंश की अंतिम शाखा के प्रमुख

पितामह (दादा)

देवमीण जी

वृष्णि कुल के प्रतिष्ठित पुरुष

पिता

पर्जन्य जी

नन्दीश्वर के निवासी, श्रीकृष्ण के पितामह

माता (दादी)

वरीयसी जी

छोटे कद की, दूध जैसे श्वेत बाल, हरे वस्त्र

मुख्य (पिता)

नन्द बाबा

व्रज के स्वामी (व्रजेश्वर), गौर वर्ण

बड़े भाई (ताऊ)

उपनन्द, अभिनन्द

उपनन्द (गुलाबी कान्ति), अभिनन्द (श्वेत कान्ति)

छोटे भाई (चाचा)

सनन्द, नन्दन

सनन्द (पीताभ श्वेत), नन्दन (मयूर कण्ठ आभा)

बहनें (बुआ)

सानन्दा, नन्दिनी

श्वेत कान्ति, रंग-बिरंगे वस्त्र



माता यशोदा (मातृ-पक्ष) वंशावली-


संबंध

नाम

विशेष विवरण

नाना

सुमुख (गिरिभानु)

पके जामुन जैसी श्यामल कान्ति, श्वेत दाढ़ी

नानी

पाटला (पद्मावती)

पाटल पुष्प जैसी आभा, दही जैसे श्वेत बाल

माता

यशोदा जी

श्यामल कान्ति, वात्सल्य की प्रतिमूर्ति

भाई (मामा)

यशोधर, यशोदेव, सुदेव

अलसी के फूल जैसी कान्ति, श्वेत वस्त्र

बहनें (मौसी)

यशोदेवी, यशस्वनी

इन्हें दधिसारा और हविसारा भी कहा जाता है।

श्रीराधा जी का परिवार (वृषभानु वंश)-


संबंध

नाम

विशेष विवरण

पिता

वृषभानु जी

सूर्य के समान तेजस्वी, नन्द बाबा के परम मित्र

माता

कीर्तिदा जी

रत्नगर्भा के नाम से विख्यात

बड़े भाई

श्रीदामा

श्रीकृष्ण के सखा

छोटी बहन

अनंगमञ्जरी

राधा जी की अनुजा

दादा/नाना

महीभानु / इन्दु

क्रमशः पिता के पिता और माता के पिता

दादी/नानी

सुखदा / मुखरा

क्रमशः पिता की माता और माता की माता




क्या आप इनमें से किसी विशिष्ट श्लोक की व्याकरण सहित व्याख्या या किसी अन्य पात्र (जैसे श्रीराधा के परिवार) के श्लोकों का विवरण भी चाहेंगे?



संस्कृत श्लोक:
सात्वतस्य सुतो वृष्णिः, तस्माज्जातोऽनमित्रकः।
तत्पुत्रस्तु तृतीयो यः, स चतुर्थो वृष्णिः स्मृतः॥
स एव सात्वतकुले, वृष्णिर्नाम्ना च पश्चिमः।१।
छन्द और शब्द विश्लेषण:
  • छन्द: यह अनुष्टुप छन्द में है, जिसमें प्रत्येक चरण में ८ वर्ण होते हैं। यह संस्कृत का सबसे सरल और लोकप्रिय छन्द है।
  • पश्चिमः (अन्तिम): संस्कृत काव्य में 'अन्तिम' के लिए 'पश्चिम' शब्द का प्रयोग किया जाता है।
  • तस्माज्जातोऽनमित्रकः: तस्मात् (उनसे) + जातः (उत्पन्न हुए) + अनमित्रकः। यहाँ सन्धि और छन्द की लय के लिए 'अनमित्र' को 'अनमित्रक' किया गया है।
अन्वय (भावार्थ):
सात्वत के पुत्र वृष्णि थे, उनसे अनमित्र पैदा हुए। अनमित्र के जो तीसरे पुत्र थे, उन्हें 'चतुर्थ वृष्णि' कहा गया है। सात्वत कुल में वृष्णि नाम के वे ही अन्तिम पुरुष थे।


संस्कृत श्लोक (अनुष्टुप छन्द):
वृष्णिगोत्रसमुद्भूतः पर्जन्यो देवमीढजः।
नन्दतातः स सच्छीलः सर्वव्रजहिताग्रणीः॥

व्याकरणिक विश्लेषण:
अनुष्टुप छन्द के प्रत्येक चरण में ८ वर्ण होते हैं। इसका लक्षण है— "पञ्चमं लघु सर्वत्र सप्तमं द्विचतुर्थयोः। गुरु षष्ठं च जानीयादेतच्छन्दस्य लक्षणम्॥"
  1. वृष्णिगोत्रसमुद्भूतः (८ वर्ण):
    • वृष्णि-गोत्र-सम्-उद्-भूतः: वृष्णि वंश में उत्पन्न। (विभक्ति: प्रथमा, एकवचन)।
  2. पर्जन्यो देवमीढजः (८ वर्ण):
    • पर्जन्यः: मूल नाम। (सन्धि के कारण 'पर्जन्यो' हुआ)।
    • देवमीढ-जः: देवमीढ के पुत्र (ज = उत्पन्न)।
  3. नन्दतातः स सच्छीलः (८ वर्ण):
    • नन्द-तातः: नन्द बाबा के पिता।
    • सः: वह।
    • सत्-शीलः: श्रेष्ठ चरित्र वाले (शिष्ट)।
  4. सर्वव्रजहिताग्रणीः (८ वर्ण):
    • सर्व-व्रज-हित-अग्रणीः: समस्त ब्रज समुदाय के हितैषी और उनके मार्गदर्शक/महान।
भावार्थ:
वृष्णि कुल में उत्पन्न देवमीढ के पुत्र पर्जन्य थे। वे श्रेष्ठ आचरण वाले, समस्त ब्रज के हितैषी और भगवान श्रीकृष्ण के पितामह (नन्द बाबा के पिता) थे।

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