उस सुन्दर स्त्री इला ने भी चन्द्रकुमार बुध को पति बनाना चाहा। इस पर बुध ने उसके गर्भ से पुरूरवा नामका पुत्र उत्पन्न किया।35।
इस प्रकार मनुपुत्र राजा सुद्युम्न इला नामक स्त्री हो गये। ऐसा सुनते हैं कि उन्होंने उस अवस्थामें अपने कुलपुरोहित वसिष्ठजीका स्मरण किया। ।।36।
सुद्युम्न की यह दशा देखकर वसिष्ठजी के हृदय में कृपावश अत्यन्त पीड़ा हुई। उन्होंने सुद्युम्न को पुनः पुरुष बना देने के लिये भगवान् शङ्कर की आराधना की। 37।
भगवान् शङ्कर वसिष्ठजी पर प्रसन्न हुए। परीक्षित् उन्होंने उनकी अभिलाषा पूर्ण करने के लिये अपनी वाणी को सत्य रखते हुए ही यह बात कही- ।38।
'वसिष्ठ ! तुम्हारा यह यजमान एक महीने तक पुरुष रहेगा और एक महीने तक स्त्री। इस व्यवस्था से सुद्युम्न इच्छानुसार पृथ्वी का पालन करे'। 39।
इस प्रकार वसिष्ठजी के अनुग्रह से व्यवस्थापूर्वक अभीष्ट पुरुषत्व लाभ करके सुद्युम्न पृथ्वीका पालन करने लगे। परन्तु प्रजा उनका अभिनन्दन नहीं करती थी। 40
(पुरुप रुप में उनकी पत्नी से) उनको तीन पुत्र हुए- उत्कल, गय और विमल। परीक्षित् ! वे सब दक्षिणापथके राजा हुए। 41
बहुत दिनोंके बाद वृद्धावस्था आनेपर प्रतिष्ठान नगरी के अधिपति सुद्युम्न ने अपने पुत्र पुरूरवा को राज्य दे दिया और स्वयं तपस्या करने के लिये वन की यात्रा की। 42।*
विशेष - ज्ञात हो राजा सुद्युम्न को जब स्त्री और पुरुष होने की घटना नहीं घटी थी, उस समय उनकी किसी पत्नी से तीन पुत्र हुए- उत्कल, गय और विमल। किन्तु जब उनके लिए एक-एक महीने के लिए स्त्री और पुरुष होने की घटना घटी तब उनके स्त्री रूप में आकाशीय पिण्ड बुध से पुरुरवा का जन्म हुआ।
अब वहाँ पर बुध के बारे में जानना आवश्यक हो गया कि बुध कौन हैं ? जिन्होंने एक महीने के लिए स्त्री हुए राजा सुद्युम्न से पुरुरवा को जन्म दिया।
तो सूर्य पुत्र बुध का वर्णन भागवत पुराण स्कन्ध (९) के अध्याय १४ के निम्नलिखित श्लोकों में मिलता है। जिसमें बताया गया है कि-
"श्रीशुक उवाच"
अथातः श्रूयतां राजन् वंशः सोमस्य पावनः।
यस्मिन्नैलादयो भूपाः कीर्त्यन्ते पुण्यकीर्तयः ॥१॥
सहस्रशिरसः पुंसो नाभिह्रद सरोरुहात्।
जातस्यासीत् सुतो धातुः अत्रिः पितृसमो गुणैः॥२॥
तस्य दृग्भ्योऽभवत् पुत्रः सोमोऽमृतमयः किल ।
विप्रौषध्युडुगणानां ब्रह्मणा कल्पितः पतिः॥३॥
सोऽयजद् राजसूयेन विजित्य भुवनत्रयम्।
पत्नीं बृहस्पतेर्दर्पात् तारां नामाहरद् बलात्॥४॥
यदा स देवगुरुणा याचितोऽभीक्ष्णशो मदात्।
नात्यजत् तत्कृते जज्ञे सुरदानवविग्रहः॥५॥
निवेदितोऽथाङ्गिरसा सोमं निर्भर्त्स्य विश्वकृत्।
तारां स्वभर्त्रे प्रायच्छद् अन्तर्वत्नीमवैत् पतिः॥८॥
त्यज त्यजाशु दुष्प्रज्ञे मत्क्षेत्रात् आहितं परैः।
नाहं त्वां भस्मसात्कुर्यां स्त्रियं सान्तानिकः सति॥ ९॥
तत्याज व्रीडिता तारा कुमारं कनकप्रभम्।
स्पृहामाङ्गिरसश्चक्रे कुमारे सोम एव च॥ १०॥
ममायं न तवेत्युच्चैः तस्मिन् विवदमानयोः।
पप्रच्छुः ऋषयो देवा नैवोचे व्रीडिता तु सा ॥११॥
कुमारो मातरं प्राह कुपितोऽलीकलज्जया ।
किं न वोचस्यसद्वृत्ते आत्मावद्यं वदाशु मे ॥१२ ॥
ब्रह्मा तां रह आहूय समप्राक्षीच्च सान्त्वयन् ।
सोमस्येत्याह शनकैः सोमस्तं तावदग्रहीत् ॥१३ ॥
तस्यात्मयोनिरकृत बुध इत्यभिधां नृप ।
बुद्ध्या गम्भीरया येन पुत्रेणापोडुराण्मुदम् ॥ १४॥
अनुवाद- १-१४
श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित् ! अब मैं तुम्हें चन्द्रमा के पावन वंश का वर्णन सुनाता हूँ। इस वंश में पुरूरवा आदि बड़े-बड़े पवित्रकीर्ति राजाओं का कीर्तन किया जाता है। 1।
सहस्त्रों सिर वाले विराट् पुरुष नारायण के नाभि से कमल की उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजी के पुत्र अत्रि हुए। वे अपने गुणों कारण ब्रह्माजी के समान ही थे॥ 2 ॥
उन्हीं अत्रि के नेत्रों से अमृतमय चन्द्रमा का जन्म हुआ। ब्रह्माजी ने चन्द्रमा को ब्राह्मण, ओषधि और नक्षत्रों का अधिपति बना दिया ॥ 3 ॥
तब चन्द्रमा तीनों लोकों पर विजय प्राप्त की और राजसूय यज्ञ किया। इससे उनका घमण्ड बढ़ गया और उन्होंने बलपूर्वक बृहस्पति की पत्नी तारा को हर लिया ॥4 ॥
देवगुरु बृहस्पति ने अपनी पत्नी को लौटा देने के लिये उनसे बार-बार याचना की, परन्तु वे इतने मतवाले हो गये थे उन्होंने किसी प्रकार उनकी पत्नी को नहीं लौटाया। ऐसी परिस्थिति में उसके लिये देवता और दानव में घोर संग्राम छिड़ गया ॥ 5॥
तब अङ्गिरा ऋषि ने ब्रह्माजी के पास जाकर यह युद्ध बन्द कराने की प्रार्थना की। इस पर ब्रह्माजी ने चन्द्रमा को बहुत डाँटा-फटकारा और तारा को उसके पति बृहस्पति जी के हवाले कर दिया। जब बृहस्पतिजी को यह मालूम हुआ कि तारा तो गर्भवती है, तब उन्होंने कहा- ॥8॥
दुष्टे ! मेरे क्षेत्र में यह तो किसी दूसरे का गर्भ है। इसे तू अभी त्याग दे, तुरन्त त्याग दे। डर मत, मैं तुझे जलाऊँगा नहीं। क्योंकि एक तो तू स्त्री है और दूसरे मुझे भी सन्तान की कामना है। देवी होने के कारण तू निर्दोष भी है ही ।।9।।
अपने पति की बात सुनकर तथ अत्यन्त लज्जित हुई। उसने सोने के समान चमकता हुआ एक बालक अपने गर्भ से अलग कर दिया। उस बालक को देखकर बृहस्पति और चन्द्रमा दोनों ही मोहित हो गये और चाहने लगे कि यह हमें मिल जाय ॥10॥
अब वे एक दूसरे से इस प्रकार जोर-जोर से झगड़ा करने लगे कि यह तुम्हारा नहीं, मेरा है।' ऋषियों और देवताओं ने तारा से पूछा कि 'यह किसका लड़का है।परन्तु तारा ने लज्जावश कोई उत्तर न दिया ॥ 11 ॥
बालक ने अपनी माता को झूठी लज्जा से क्रोधित होकर कहा-'दुष्टे तू बतलाती क्यों नहीं ? तू अपना कुकर्म मुझे शीघ्र से शीघ्र बतला दे ॥12 ॥
उसी समय ब्रह्माजी ने तारा को एकान्त में बुलाकर बहुत कुछ समझा-बुझाकर पूछा। तब तारा ने धीरे से कहा कि 'चन्द्रमा का।' इसलिये चन्द्रमा ने उस बालक को ले लिया।13।
परीक्षित् ! ब्रह्माजी ने उस बालक का नाम रखा 'बुध', क्योंकि उसकी बुद्धि बड़ी गम्भीर थी। ऐसा पुत्र प्राप्त कर के चन्द्रमा को बहुत आनन्द हुआ। 14।
इस प्रकार से आप लोगों ने संक्षेप में चन्द्रमा पुत्र बुध को जो आगे चलकर इसी बुध और इला से पुरूरवा का जन्म हुआ वर्णन सुना-।
अब हम पुनः इला के बारे में दूसरे पुराण से बताएंगे।
[ - हरिवंशपुराण, हरिवंशपर्व के अध्याय- (10) के अनुसार- (सुद्युम्न) इला नाम की एक माह वाली स्त्री का वर्णन।
"वैशम्पायन उवाच"
मनोर्वैवस्वतस्यासन् पुत्रा वै नव तत्समाः ।
इक्ष्वाकुश्चैव नाभागो धृष्णुः शर्यातिरेव च ।। १
नरिष्यञ्श्च तथा प्राञ्शुर्नाभागारिष्टसप्तमाः ।
करूषश्च पृषध्रश्च नवैते भरतर्षभ ।। २ ।।
अकरोत् पुत्रकामस्तु मनुरिष्टिं प्रजापतिः ।
मित्रावरुणयोस्तात पूर्वमेव विशाम्पते ।। ३ ।।
अनुत्पन्नेषु नवसु पुत्रेष्वेतेषु भारत ।
तस्यां तु वर्तमानायामिष्ट्यां भरतसत्तम ।। ४ ।।
मित्रावरुणयोरंशे मुनिराहुतिमाजुहोत् ।
आहुत्यां हूयमानायां देवगन्धर्वमानुषाः ।। ५ ।।
तुष्टिं तु परमां जग्मुर्मुनयश्च तपोधनाः । अहोऽस्य तपसो वीर्यमहोऽस्य श्रुतमद्भुतम् ।।६ ।।
तत्र दिव्याम्बरधरा दिव्याभरणभूषिता। दिव्यसंहनना चैव इला जज्ञे इति श्रुतिः ।। ७ ।।
तामिलेत्येव होवाच मनुर्दण्डधरस्तदा ।
अनुगच्छस्व मां भद्रे तमिला प्रत्युवाच ह ।
धर्मयुक्तमिदं वाक्यं पुत्रकामं प्रजापतिम् ।। ८ ।।
"इलोवाच"
मित्रावरुणयोरंशे जातास्मि वदतां वर ।
तयोः सकाशं यास्यामि न मां धर्मो हतोऽवधीत्।। ९ ।।
अनुवाद-
1-2. वैशम्पायन ने कहा: - हे भरतश्रेष्ठ , विवस्वत मनु के नौ पुत्र हुए - इक्ष्वाकु , नाभाग , धृष्णु , शर्याति , नरिष्यन्त, प्राञ्शु, नाभागरिष्ठ, कौरुष और पृषध्र ।
3. हे राजा, सन्तान की इच्छा से प्रेरित होकर कुलपति मनु ने मित्र और वरुण के समक्ष यज्ञ किया ।
4-6. हे भरत वंशज , अपने इन नौ पुत्रों के जन्म से पहले, मुनि ने इस यज्ञ में मित्र और वरुण के अंशों को आहुति दी। जब यह आहुति दी गई, तो देवताओं, गन्धर्वों , मनुष्यों और तपस्वियों को अत्यन्त प्रसन्नता हुई और वे कहने लगे, "हे भगवान! उनकी तपस्या कितनी अद्भुत है ! हे भगवान! शास्त्रों का उनका ज्ञान कितना अद्भुत है !"
7.परम्परा यह है कि उस बलिदान में इला का जन्म हुआ, जो दिव्य वस्त्रों से सजी, दिव्य आभूषणों से सुशोभित और दिव्य कवच से सुसज्जित थी।
8. मनु ने हाथ में दंड लिए उससे कहा: "हे सुंदरी, मेरे पीछे आओ।" उसने संतान की इच्छा रखने वाले उस कुलपति को निम्नलिखित नैतिक उत्तर दिया।
9. इला ने कहा:—"हे श्रेष्ठ वक्ता, मैं मित्र और वरुण की शक्ति से उत्पन्न हुई हूँ, इसलिए मैं उनके(वरुण) के पास ही जाऊँगी। मेरी नैतिकता को नष्ट मत करो।"
सैवमुक्त्वा मनुं देवं मित्रावरुणयोरिला ।
गत्वान्तिकं वरारोहा प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ।। 1.10.१० ।।
अंशेऽस्मि युवयोर्जाता देवौ किं करवाणि वाम्।
मनुना चाहमुक्ता वै अनुगच्छस्व मामिति ।। ११ ।।
तां तथावादिनीं साध्वीमिलां धर्मपरायणाम् ।
मित्रश्च वरुणश्चोभावूचतुर्यन्निबोध तत् ।। १२ ।।
अनेन तव धर्मेण प्रश्रयेण दमेन च ।
सत्येन चैव सुश्रोणि प्रीतौ स्वो वरवर्णिनि ।।१३ ।।
आवयोस्त्वं महाभागे ख्यातिं कन्येति यास्यसि ।
मनोर्वंशधरः पुत्रस्त्वमेव च भविष्यसि ।। १४ ।।
सुद्युम्न इति विख्यातस्त्रिषु लोकेषु शोभने ।
जगत्प्रियो धर्मशीलो मनोर्वंशविवर्धनः ।। १५ ।।
निवृत्ता सा तु तच्छुत्वा गच्छन्ती पितुरन्तिकम्।
बुधेनान्तरमासाद्य मैथुनायोपमन्त्रिता ।। १६ ।।
सोमपुत्राद् बुधाद् राजंस्तस्यां जज्ञे पुरूरवाः ।
जनयित्वा सुतं सा तमिला सुद्युम्नतां गता।।१७ ।।
सुद्युम्नस्य तु दायादास्त्रयः परमधार्मिकाः ।
उत्कलश्च गयश्चैव विनताश्वश्च भारत ।। १८।।
परिशिष्ट (8)
चंद्रमा और उसके वंश की उत्पत्ति
इस परिशिष्ट कथा का मुख्य उद्देश्य समालोचना और तार्किक आधार पर यह बताना है कि- पौराणिक ग्रन्थों में आकाशीय पिण्ड चन्द्रमा और उसके वंश की उत्पत्ति कैसे हुई ? उसी क्रम में यह बताना है कि बृहस्पति की पत्नी तारा कैसे आकाशीय पिण्ड चन्द्रमा की पत्नी होकर एक आकाशीय पिण्ड बुध को जन्म देती है। उसके उपरान्त यह जानकारी देना है कि चन्द्रमा के पुत्र बुध से इला नाम की एक अपूर्ण स्त्री (किन्नर) कैसे गर्भवती होकर प्राकृतिक विधान के विपरीत एक माह में ही भू-तल के प्रथम सम्राट पुरूरवा को जन्म देकर चन्द्रवंश का विस्तार करती है।
********************
चन्द्रमा की उत्पत्ति-
पौराणिक ग्रन्थों के हिसाब से चन्द्रमा की उत्पत्ति सर्वप्रथम परमेश्वर श्रीकृष्ण के सोलहवें अंश से उत्पन्न विराट विष्णु यानी गर्भोदकशायी विष्णु से हुई है, यह ध्रुव सत्य है। किन्तु कथाकारों को यह सत्य हज़म नहीं हुआ। तब इसके उलट उन्होंने चन्द्रमा को ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था में या कहें चन्द्रमा को ब्राह्मीकरण करने के उद्देश्य से उसको एक ब्राह्मण ऋषि "अत्रि" से उत्पन्न करा दिया और ब्राह्मणों का अधिपति भी बना दिया।
अब चन्द्रमा का ब्राह्मीकरण भी ब्राह्मण वाद की स्थापन ही है।-
चन्द्रमा उत्पत्ति की वास्तविकता को आप लोग "यादव सम्मान" चैनल पर "वैष्णव वर्ण के अहीर जाति के यादव वंश की वंशावली" नाम के विडियो में देख सकते हैं।
जिसमें बड़े ही स्पष्ट रूप से चल -चित्रों के माध्यम से इस तथ्य को समझाया गया है।
फिर भी यहाँ पर चन्द्रमा की वास्तविक उत्पत्ति की जानकारी के लिए निम्नलिखित सन्दर्भ प्रस्तुत किया जा रहा हैं-
***
ऋग्वेद के (१०/९०/१३ और १४) ऋचा में चन्द्रमा और सूर्य की उत्पत्ति को ब्राह्मण ऋषि अत्रि से नहीं बल्कि विराट विष्णु बताई गई है।
चन्द्रमा मनसो जातश्वक्षोः सूर्यो अजायत।
मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्रणाद्वायुरजायत।।१३।
नाभ्यां आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत ।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन् ॥१४॥
अनुवाद- १३-१४
महाविष्णु के मन से चन्द्रमा, नेत्रों से सूर्य और ज्योति, मुख से तेज और अग्नि का प्राकट्य हुआ।१३।
उसकी नाभि से अन्तरिक्ष की उत्पत्ति हुई, उसके सिर से स्वर्ग (द्यौलोक) की उत्पत्ति हुई, उसके पैरों से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई,और उसके कानों से दिशाओं की उत्पत्ति हुई, इस प्रकार इन सबसे मिलकर संसार का निर्माण हुआ।१४।
इसी तरह से विराट विष्णु से चन्द्रमा के उत्पन्न होने की पुष्टि- श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय- ११ के श्लोक- (१९) में उस समय होती है जब भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाते हैं। उसी समय अर्जुन उस विराट रूप में सम्पूर्ण सृष्टि का सृजन और विलय देखता है। जिसमें उन्होंने यह भी देखा कि- उस विराट स्वरूप से सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि क्रमशः उत्पन्न होकर अन्ततोगत्वा उसी विराट पुरुष (श्रीकृष्ण) में विलीन हो रहे हैं।
"अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रंस्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्।।
अनुवाद- आपको मैं आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त प्रभावशाली, अनन्त भुजाओं वाले, चन्द्र और सूर्यरूप नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्नि रूप मुख वाले और अपने तेज से इस संसार को तपाते हुए देख रहा हूँ।१९।
✳️ चूँकि पौराणिक ग्रन्थों के हिसाब से चन्द्रमा विराट विष्णु से उत्पन्न हुआ है इस लिए वह प्रथम वैष्णव है। यह ध्रुव सत्य है, किन्तु यह सत्य ब्राह्मण वादी कथाकारों को किसी भी तरह से हज़म नहीं हुआ। परिणाम यह हुआ कि कथाकारों ने चन्द्रमा का ब्राह्मीकरण करने के लिए अत्रि नाम के एक ब्राह्मण से, तो कभी किसी स्त्री से, तो कभी समुद्र मन्थन से उत्पन्न होने की बहुत सी कथाएँ लिखकर चन्द्रमा की वास्तविक उत्पत्ति से लोगों को भ्रमित कर दिया। जैसे-
विष्णु पुराण, प्रथम अंश, अध्याय- ९ के श्लोक संख्या- ९६ और ९७ में चन्द्रमा को समुद्र से उत्पन्न होने को बताया गया है।
रुपौदार्यगुणोपेतस्तथा चाप्सरसां गणः।
क्षीरोदधेः समुत्पन्नो मैत्रेय परमाद्भुतः।।९६।
ततः शीतांशुरभवज्जगृहे तं महेश्वरः।
जगृहुश्च विषं नागाः क्षीरोदाब्धिसमुत्थितम्।।९७।
अनुवाद- ९६-९७
"हे मैत्रेय ! फिर समुद्र से अत्यन्त सुन्दर और अद्भुत रूप एवं उदारता के गुणों से युक्त अप्सराओं का समूह प्रकट हुआ।९७।
फिर भी यहाँ पर चन्द्रमा की वास्तविक उत्पत्ति की जानकारी के लिए निम्नलिखित सन्दर्भ प्रस्तुत किया जा रहा हैं-
***
ऋग्वेद के (१०/९०/१३ और १४) ऋचा में चन्द्रमा और सूर्य की उत्पत्ति को ब्राह्मण ऋषि अत्रि से नहीं बल्कि विराट विष्णु बताई गई है।
चन्द्रमा मनसो जातश्वक्षोः सूर्यो अजायत।
मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्रणाद्वायुरजायत।।१३।
नाभ्यां आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत ।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन् ॥१४॥
अनुवाद- १३-१४
महाविष्णु के मन से चन्द्रमा, नेत्रों से सूर्य और ज्योति, मुख से तेज और अग्नि का प्राकट्य हुआ।१३।
उसकी नाभि से अन्तरिक्ष की उत्पत्ति हुई, उसके सिर से स्वर्ग (द्यौलोक) की उत्पत्ति हुई, उसके पैरों से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई,और उसके कानों से दिशाओं की उत्पत्ति हुई, इस प्रकार इन सबसे मिलकर संसार का निर्माण हुआ।१४।
इसी तरह से विराट विष्णु से चन्द्रमा के उत्पन्न होने की पुष्टि- श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय- ११ के श्लोक- (१९) में उस समय होती है जब भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाते हैं। उसी समय अर्जुन उस विराट रूप में सम्पूर्ण सृष्टि का सृजन और विलय देखता है। जिसमें उन्होंने यह भी देखा कि- उस विराट स्वरूप से सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि क्रमशः उत्पन्न होकर अन्ततोगत्वा उसी विराट पुरुष (श्रीकृष्ण) में विलीन हो रहे हैं।
"अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रंस्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्।।
अनुवाद- आपको मैं आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त प्रभावशाली, अनन्त भुजाओं वाले, चन्द्र और सूर्यरूप नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्नि रूप मुख वाले और अपने तेज से इस संसार को तपाते हुए देख रहा हूँ।१९।
✳️ चूँकि पौराणिक ग्रन्थों के हिसाब से चन्द्रमा विराट विष्णु से उत्पन्न हुआ है इस लिए वह प्रथम वैष्णव है। यह ध्रुव सत्य है, किन्तु यह सत्य ब्राह्मण वादी कथाकारों को किसी भी तरह से हज़म नहीं हुआ। परिणाम यह हुआ कि कथाकारों ने चन्द्रमा का ब्राह्मीकरण करने के लिए अत्रि नाम के एक ब्राह्मण से, तो कभी किसी स्त्री से, तो कभी समुद्र मन्थन से उत्पन्न होने की बहुत सी कथाएँ लिखकर चन्द्रमा की वास्तविक उत्पत्ति से लोगों को भ्रमित कर दिया। जैसे-
विष्णु पुराण, प्रथम अंश, अध्याय- ९ के श्लोक संख्या- ९६ और ९७ में चन्द्रमा को समुद्र से उत्पन्न होने को बताया गया है।
रुपौदार्यगुणोपेतस्तथा चाप्सरसां गणः।
क्षीरोदधेः समुत्पन्नो मैत्रेय परमाद्भुतः।।९६।
ततः शीतांशुरभवज्जगृहे तं महेश्वरः।
जगृहुश्च विषं नागाः क्षीरोदाब्धिसमुत्थितम्।।९७।
अनुवाद- ९६-९७
"हे मैत्रेय ! फिर समुद्र से अत्यन्त सुन्दर और अद्भुत रूप एवं उदारता के गुणों से युक्त अप्सराओं का समूह प्रकट हुआ।९७।
उसके बाद शीतांशु (चन्द्रमा) प्रकट हुए, जिन्हें भगवान शिव (महेश्वर) ने ग्रहण किया और क्षीरसमुद्र से निकले विष को नागों ने ग्रहण कर लिया।१८।
इसी तरह से ब्रह्माण्ड पुराण मध्यभाग तृतीय उपोद्धातपाद- के श्लोक में चन्द्रमा उत्पत्ति के सम्बन्ध में लिखा गया है कि-
मद्रायां जनयामास सोमं पुत्रं यशस्विनम् ।
स्वर्भानुना हते सूर्ये पतमाने दिवो महीम् ॥ २/८/७७॥
"अनुवाद:- उन प्रभाकर अत्रि ने मद्रा नामक पत्नी से प्रसिद्ध पुत्र सोम (चन्द्रमा) को जन्म दिया। जब सूर्य पर स्वर्भानु (राहु) का प्रहार हुआ, जब वह सूर्य स्वर्ग से पृथ्वी पर गिर रहे था।७७।
कुछ इसी तरह की बातें श्रीमद्भागवत पुराण खण्ड-२ स्कन्ध- ९ अध्याय के अध्याय (१४)श्लोक-2 से 3 में भी कथाकारों नें चन्द्रमा को ब्रह्मा के पुत्र अत्रि से उत्पन्न होने की बतायी हैं।
सहस्रशिरसः पुंसो नाभिह्रद सरोरुहात्।
जातस्यासीत् सुतो धातुः अत्रिः पितृसमो गुणैः॥ २॥
तस्य दृग्भ्योऽभवत् पुत्रः सोमोऽमृतमयः किल।
विप्रौषध्युडुगणानां ब्रह्मणा कल्पितः पतिः ॥३॥
अनुवाद- २-३
सहस्रों( हजारों ) सिर वाले विराट् पुरुष नारायण के नाभि सरोवर कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। उसी ब्रह्मा जी के पुत्र हुए अत्रि। वे (अत्रि) अपने गुणों के कारण ब्रह्माजी के ही समान थे।२।
उन्हीं अत्रि के नेत्रों से अमृतमय चन्द्रमा का जन्म हुआ। तब ब्रह्माजी ने चन्द्रमा को ब्राह्मण, ओषधि और नक्षत्रों का अधिपति बना दिया।३।***
विशेष- अब यहाँ पर यदि उपर्युक्त श्लोक संख्या-(३) पर विचार किया जाए तो कथाकारों ने प्राकृतिक नियमानुसार चन्द्रमा को ओषधियों और नक्षत्रों का अधिपति बनाया यहाँ तक तो ठीक है।
किन्तु उसी के साथ बड़ी चालाकी से सम्पूर्ण मानव जाती को छोड़कर चन्द्रमा को केवल ब्राह्मणों का अधिपति बनाकर चन्द्रमा का पूरी तरह से ब्राह्मीकरण कर दिया।
*************************
जबकि यह ध्रुव सत्य है कि प्रकृति की प्रत्येक वस्तुओं पर हर मनुष्यों का समान अधिकार होता है। किन्तु इस प्राकृतिक विधान के विपरीत कथाकारों ने चन्द्रमा को केवल ब्राह्मणों का अधिपति बनाया। यह कितनी प्रक्षिप्त और हास्यास्पद बात है।
जबकि यह ध्रुव सत्य है कि प्रकृति की प्रत्येक वस्तुओं पर हर मनुष्यों का समान अधिकार होता है। किन्तु इस प्राकृतिक विधान के विपरीत कथाकारों ने चन्द्रमा को केवल ब्राह्मणों का अधिपति बनाया। यह कितनी प्रक्षिप्त और हास्यास्पद बात है।
निष्कर्ष-
उपर्युक्त चन्द्रमा की उत्पत्ति को लेकर पौराणिक ग्रन्थों की कथन भिन्नता को लेकर यही स्पष्ट होता है कि असत्य बहुरूपिया और परस्पर विरोध-भाषी( उल्टा बोलने वाला- (और परस्पर विपरीताभासी होता है जबकि सत्य सदैव एकरूप व विकल्प रहित होता है।
तब ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कथाकारों ने ऐसा क्यों किया ? तो इसका उत्तर है- कथाकारों को ऐसा करने का एकमात्र उद्देश्य किसी भी तरह से भू-तल के प्रथम सम्राट पुरूरवा की अहीर जाति की पहचान को सदा के लिए मिटाकर चन्द्रवंश के वास्तविक इतिहास से लोगों को भ्रमित करना था।
इसके लिए कथाकारों ने पौराणिक कथाओं में एक ऐसी काल्पनिक स्त्री को चुना जो एक माह स्त्री होकर पुनः एक माह के लिए पुरुष हो जाता करती थी। उसी एक माह की स्त्री ने भू-तल के प्रथम सम्राट पुरुरवा को जन्म दिया।
इस प्रक्षिप्त कथा की पुष्टि कई पुराणों से होती है। जानकारी के लिए उनमें से कुछ प्रमुख पौराणिक कथाओं का वर्णन क्रमशः नीचे उद्धृत है।
(१)- श्रीमद्भागवतपुराण के स्कन्धः ९ अध्यायः (१) के अनुसार - (सुद्युम्न) इला नाम की एक महीने वाली स्त्री का वर्णन।
अप्रजस्य मनोः पूर्वं वसिष्ठो भगवान् किल ।
मित्रावरुणयोः इष्टिं प्रजार्थं अकरोद् विभुः ॥१३॥
तत्र श्रद्धा मनोः पत्नी होतारं समयाचत ।
दुहित्रर्थं उपागम्य प्रणिपत्य पयोव्रता ॥ १४ ॥
प्रेषितोऽध्वर्युणा होता ध्यायन् तत् सुसमाहितः ।
हविषि व्यचरत् तेन वषट्कारं गृणन् द्विजः ॥१५॥
होतुस्तद् व्यभिचारेण कन्येला नाम साभवत् ।
तां विलोक्य मनुः प्राह नाति हृष्टमना गुरुम् ॥१६॥
भगवन् किमिदं जातं कर्म वो ब्रह्मवादिनाम् ।
विपर्ययं अहो कष्टं मैवं स्याद् ब्रह्मविक्रिया ॥ १७।।
यूयं मंत्रविदो युक्ताः तपसा दग्धकिल्बिषाः ।
कुतः संकल्पवैषम्यं अनृतं विबुधेष्विव ॥ १८ ॥
निशम्य तद्वचः तस्य भगवान् प्रपितामहः ।
होतुर्व्यतिक्रमं ज्ञात्वा बभाषे रविनन्दनम् ॥ १९ ॥
एतत् संकल्पवैषम्यं होतुस्ते व्यभिचारतः ।
तथापि साधयिष्ये ते सुप्रजास्त्वं स्वतेजसा ॥ २०॥
अनुवाद- १३-२०
वैवस्वत मनु पहले सन्तानहीन थे उस समय सर्वसमर्थ भगवान् वसिष्ठ ने उन्हें सन्तान प्राप्ति करानेके लिये मित्रावरुण का यज्ञ कराया था॥13॥
(१)- श्रीमद्भागवतपुराण के स्कन्धः ९ अध्यायः (१) के अनुसार - (सुद्युम्न) इला नाम की एक महीने वाली स्त्री का वर्णन।
अप्रजस्य मनोः पूर्वं वसिष्ठो भगवान् किल ।
मित्रावरुणयोः इष्टिं प्रजार्थं अकरोद् विभुः ॥१३॥
तत्र श्रद्धा मनोः पत्नी होतारं समयाचत ।
दुहित्रर्थं उपागम्य प्रणिपत्य पयोव्रता ॥ १४ ॥
प्रेषितोऽध्वर्युणा होता ध्यायन् तत् सुसमाहितः ।
हविषि व्यचरत् तेन वषट्कारं गृणन् द्विजः ॥१५॥
होतुस्तद् व्यभिचारेण कन्येला नाम साभवत् ।
तां विलोक्य मनुः प्राह नाति हृष्टमना गुरुम् ॥१६॥
भगवन् किमिदं जातं कर्म वो ब्रह्मवादिनाम् ।
विपर्ययं अहो कष्टं मैवं स्याद् ब्रह्मविक्रिया ॥ १७।।
यूयं मंत्रविदो युक्ताः तपसा दग्धकिल्बिषाः ।
कुतः संकल्पवैषम्यं अनृतं विबुधेष्विव ॥ १८ ॥
निशम्य तद्वचः तस्य भगवान् प्रपितामहः ।
होतुर्व्यतिक्रमं ज्ञात्वा बभाषे रविनन्दनम् ॥ १९ ॥
एतत् संकल्पवैषम्यं होतुस्ते व्यभिचारतः ।
तथापि साधयिष्ये ते सुप्रजास्त्वं स्वतेजसा ॥ २०॥
अनुवाद- १३-२०
वैवस्वत मनु पहले सन्तानहीन थे उस समय सर्वसमर्थ भगवान् वसिष्ठ ने उन्हें सन्तान प्राप्ति करानेके लिये मित्रावरुण का यज्ञ कराया था॥13॥
यज्ञ के आरम्भ में केवल दूध पीकर रहने वाली वैवस्वत मनु की धर्मपत्नी श्रद्धा ने अपने होता( चार ऋत्विजों में से एक जो ऋग्वेद की ऋचाओं का गान करता है ) के पास जाकर प्रणाम पूर्वक याचना की कि मुझे कन्या ही प्राप्त हो ।14।
***
विशेष- होता-(होतृ)-यज्ञ में आहुति देनेवाला अथवा ऋग्वेद की ऋचा पढ़कर यज्ञकुण्ड में हवन की सामग्री डालनेवाला कहा जाता है।—यह चार प्रधान ऋत्विजों में से एक है जो ऋग्वेद के मन्त्र( ऋचा) पढ़ता और देवताओं का आह्वान करता है।
तब अध्वर्यु (यज्ञ में यजुर्वद का मन्त्र पढ़नेवाला ब्राह्मण) की प्रेरणा से होता बने हुए ब्राह्मण ने श्रद्धा के कथन का स्मरण करके एकाग्र चित्तसे वषट्कार का उच्चारण करते हुए यज्ञकुण्ड में आहुति दी ।15।
जब होता ने इस प्रकार विपरीत कर्म किया, तब यज्ञ के फलस्वरूप पुत्र के स्थान पर इला नामकी कन्या हुई। उसे देखकर श्राद्धदेव मनु का मन कुछ विशेष प्रसन्न नहीं हुआ। उन्होंने अपने गुरु वसिष्ठजी से कहा- ।16।
'भगवन् ! आपलोग तो ब्रह्मवादी हैं, आपका कर्म इस प्रकार विपरीत फल देनेवाला कैसे हो गया ? अरे, यह तो बड़े दुःख की बात है। वैदिक कर्म का ऐसा विपरीत फल तो कभी नहीं होना चाहिये 17॥
आप लोगों का मन्त्र ज्ञान तो पूर्ण है ही इसके अतिरिक्त आप लोग जितेन्द्रिय भी है तथा तपस्या के कारण निष्पाप हो चुके है देवताओं में सत्य की प्राप्ति के समान आप के संकल्प का यह उलटा फल कैसे हुआ ?' ।18।
परीक्षित् ! हमारे वृद्ध प्रपितामह भगवान् वसिष्ठ ने उनकी यह बात सुनकर जान लिया कि होता ने विपरीत संकल्प किया है। इसलिये उन्होंने वैवस्वत मनुसे कहा- ॥ 19 ॥
'राजन् ! तुम्हारे होता के विपरीत संकल्प से ही हमारा संकल्प ठीक-ठीक पूरा नहीं हुआ। फिर भी अपने तप के प्रभाव से मैं तुम्हें श्रेष्ठ पुत्र दूँगा'॥ 20 ॥
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एवं व्यवसितो राजन् भगवान् स महायशाः ।
अस्तौषीद् आदिपुरुषं इलायाः पुंस्त्वकाम्यया ॥ २१ ॥
तस्मै कामवरं तुष्टो भगवान् हरिरीश्वरः ।
ददौ इविलाभवत् तेन सुद्युम्नः पुरुषर्षभः ॥ २२ ॥
स एकदा महाराज विचरन् मृगयां वने ।
वृतः कतिपयामात्यैः अश्वं आरुह्य सैन्धवम् ॥२३॥
प्रगृह्य रुचिरं चापं शरांश्च परमाद्भुतान् ।
दंशितोऽनुमृगं वीरो जगाम दिशमुत्तराम् ॥ २४ ॥
सु कुमातो वनं मेरोः अधस्तात् प्रविवेश ह ।
यत्रास्ते भगवान् शर्वो रममाणः सहोमया ॥ २५ ॥
तस्मिन् प्रविष्ट एवासौ सुद्युम्नः परवीरहा ।
अपश्यत् स्त्रियमात्मानं अश्वं च वडवां नृप ॥२६॥
तथा तदनुगाः सर्वे आत्मलिङ्ग विपर्ययम् ।
दृष्ट्वा विमनसोऽभूवन् वीक्षमाणाः परस्परम् ॥ २७ ॥
अनुवाद- २१- २७
परीक्षित्! परम यशस्वी भगवान् वसिष्ठने ऐसा निश्चय करके उस इला नामकी कन्याको ही पुरुष बना देने के लिये पुरुषोत्तम भगवान् नारायण की स्तुति की। 21
सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरिने सन्तुष्ट होकर उन्हें मुँहमाँगा वर दिया, जिसके प्रभावसे वह कन्या ही सुद्युम्न नामक श्रेष्ठ पुत्र बन गयी। 22
महाराज! एक बार राजा सुद्युन शिकार खेलनेके लिये सिन्धुदेश के घोड़ेपर सवार होकर कुछ मन्त्रियोंके साथ वनमें गये। 23
वीर सुद्युम्न कवच पहनकर और हाथमें सुन्दर धनुष एवं अत्यन्त अद्भुत वाण लेकर हरिनोंका पीछा करते हुए उत्तर दिशामें बहुत आगे बढ़ गये। 24
अन्तमें सुधुम्र मेरुपर्वतकी तलहटीके एक वनमें चले गये। उस वनमें भगवान् शङ्कर पार्वतीके साथ विहार करते रहते हैं। 25
उसमें प्रवेश करते ही वीरवर सुद्युम्नने देखा कि मैं स्त्री हो गया हूँ और मेरा घोड़ा घोड़ी हो गया है। 26
परीक्षित् ! साथ ही उनके सब अनुचरोंने भी अपनेको स्त्रीरूपमें देखा। वे सब एक-दूसरेका मुँह देखने लगे, उनका चित्त बहुत उदास हो गया। 27
श्रीराजोवाच-
कथं एवं गुणो देशः केन वा भगवन् कृतः ।
प्रश्नमेनं समाचक्ष्व परं कौतूहलं हि नः ॥ २८ ॥
श्रीशुक उवाच-
एकदा गिरिशं द्रष्टुं ऋषयस्तत्र सुव्रताः ।
दिशो वितिमिराभासाः कुर्वन्तः समुपागमन् ॥२९।।
तान् विलोक्य अम्बिका देवी विवासा व्रीडिता भृशम् । भर्तुरङ्गात समुत्थाय नीवीमाश्वथ पर्यधात् ॥ ३० ॥
ऋषयोऽपि तयोर्वीक्ष्य प्रसङ्गं रममाणयोः ।
निवृत्ताः प्रययुस्तस्मात् नरनारायणाश्रमम् ॥ ३१।।
तदिदं भगवान् आह प्रियायाः प्रियकाम्यया ।
स्थानं यः प्रविशेदेतत् स वै योषिद् भवेदिति ॥ ३२ ॥
तत ऊर्ध्वं वनं तद्वै पुरुषा वर्जयन्ति हि ।
सा चानुचरसंयुक्ता विचचार वनाद् वनम् ॥ ३३ ॥
अनुवाद- २८-३३
राजा परीक्षितने पूछा- भगवन् ! उस भूखण्ड में ऐसा विचित्र गुण कैसे आ गया ? किसने उसे ऐसा बना दिया था ? आप कृपा कर हमारे इस प्रश्नका उत्तर दीजिये; क्योंकि हमें बड़ा कौतूहल हो रहा है। 28
श्रीशुकदेवजीने कहा- परीक्षित्! एक दिन भगवान् शङ्करका दर्शन करनेके लिये बड़े-बड़े व्रतधारी ऋषि अपने तेजसे दिशाओंका अन्धकार मिटाते हुए उस वनमें गये। 29
उस समय अम्बिका देवी वस्त्रहीन थीं। ऋषियोंको सहसा आया देख वे अत्यन्त लज्जित हो गयीं। झटपट उन्होंने भगवान् शङ्करकी गोदसे उठकर वस्त्र धारण कर लिया।30
ऋषियोंने भी देखा कि भगवान् गौरी-शङ्कर इस समय विहार कर रहे हैं, इसलिये वहाँसे लौटकर वे भगवान् नर-नारायणके आश्रमपर चले गये। 31
उसी समय भगवान् शङ्करने अपनी प्रिया भगवती अम्बिकाको प्रसन्न करनेके लिये कहा कि 'मेरे सिवा जो भी पुरुष इस स्थानमें प्रवेश करेगा, वहीं स्त्री हो जायेगा। 32
परीक्षित्! तभीसे पुरुष उस स्थानमें प्रवेश नहीं करते। अब सुद्युम्न स्त्री हो गये थे। इसलिये वे अपने स्त्री बने हुए अनुचरोंके साथ एक वनसे दूसरे वनमें विचरने लगे। 33
अथ तां आश्रमाभ्याशे चरन्तीं प्रमदोत्तमाम् ।
स्त्रीभिः परिवृतां वीक्ष्य चकमे भगवान् बुधः ॥ ३४ ॥
सापि तं चकमे सुभ्रूः सोमराजसुतं पतिम् ।
स तस्यां जनयामास पुरूरवसमात्मजम् ॥ ३५ ॥
एवं स्त्रीत्वं अनुप्राप्तः सुद्युम्नो मानवो नृपः ।
सस्मार स कुलाचार्यं वसिष्ठमिति शुश्रुम ॥ ३६ ॥
स तस्य तां दशां दृष्ट्वा कृपया भृशपीडितः ।
सुद्युम्नस्याशयन् पुंस्त्वं उपाधावत शंकरम् ॥३७ ॥
तुष्टस्तस्मै स भगवान् ऋषये प्रियमावहन् ।
स्वां च वाचं ऋतां कुर्वन् इदमाह विशाम्पते ॥३८ ॥
मासं पुमान् स भविता मासं स्त्री तव गोत्रजः ।
इत्थं व्यवस्थया कामं सुद्युम्नोऽवतु मेदिनीम् ॥ ३९ ॥
आचार्यानुग्रहात् कामं लब्ध्वा पुंस्त्वं व्यवस्थया ।
पालयामास जगतीं नाभ्यनन्दन् स्म तं प्रजाः ॥ ४० ॥
तस्योत्कलो गयो राजन् विमलश्च सुतास्त्रयः ।
दक्षिणापथराजानो बभूवुः धर्मवत्सलाः ॥ ४१ ॥
ततः परिणते काले प्रतिष्ठानपतिः प्रभुः ।
पुरूरवस उत्सृज्य गां पुत्राय गतो वनम् ॥ ४२ ॥
अनुवाद- ३४-४२
उसी समय शक्तिशाली बुधने देखा कि मेरे आश्रमके पास ही बहुत-सी स्त्रियोंसे घिरी हुई एक सुन्दरी स्त्री विचर रही है। उन्होंने इच्छा की कि यह मुझे प्राप्त हो जाय। 34
उस सुन्दर स्त्री ने भी चन्द्रकुमार बुधको पति बनाना चाहा। इसपर बुधने उसके गर्भ से पुरूरवा नामका पुत्र उत्पन्न किया।35
इस प्रकार मनुपुत्र राजा सुद्युम्न स्त्री हो गये। ऐसा सुनते हैं कि उन्होंने उस अवस्थामें अपने कुलपुरोहित वसिष्ठजीका स्मरण किया। 36
सुद्युम्न की यह दशा देखकर वसिष्ठजीके हृदयमें कृपावश अत्यन्त पीड़ा हुई। उन्होंने सुद्युम्न को पुनः पुरुष बना देनेके लिये भगवान् शङ्करकी आराधना की। 37
भगवान् शङ्कर वसिष्ठजीपर प्रसन्न हुए। परीक्षित् । उन्होंने उनकी अभिलाषा पूर्ण करनेके लिये अपनी वाणीको सत्य रखते हुए ही यह बात कही- 38
'वसिष्ठ ! तुम्हारा यह यजमान एक महीने तक पुरुष रहेगा और एक महीने तक स्त्री। इस व्यवस्था से सुद्युम्न इच्छानुसार पृथ्वीका पालन करे'। 39
इस प्रकार वसिष्ठजीके अनुग्रहसे व्यवस्थापूर्वक अभीष्ट पुरुषत्व लाभ करके सुद्युम्न पृथ्वीका पालन करने लगे। परन्तु प्रजा उनका अभिनन्दन नहीं करती थी। 40
(पुरुप रुप में उनकी पत्नी से) उनको तीन पुत्र हुए- उत्कल, गय और विमल। परीक्षित् ! वे सब दक्षिणापथके राजा हुए। 41
बहुत दिनोंके बाद वृद्धावस्था आनेपर प्रतिष्ठान नगरीके अधिपति सुद्युम्न ने अपने पुत्र पुरूरवा को राज्य दे दिया और स्वयं तपस्या करने के लिये वन की यात्रा की। 42
विशेष - ज्ञात हो राजा सुद्युम्न को जब स्त्री और पुरुष होने की धटना नहीं घटी थी, उस समय उनकी किसी पत्नी से तीन पुत्र हुए- उत्कल, गय और विमल। किन्तु जब उनके लिए एक-एक महिने के लिए स्त्री और पुरुष होने की धटना घटी तब उनके स्त्री रुप में आकाशीय पिण्ड बुध से पुरुरवा का जन्म हुआ।
अब वहाँ पर बुध के बारे में जानना आवश्यक हो गया कि बुध कौन हैं जिन्होंने एक महीने के लिए स्त्री हुए राजा सुद्युम्न से पुरुरवा को जन्म दिया।
तो सूर्य पुत्र बुध का वर्णन भागवत पुराण स्कन्ध (९) के अध्याय १४ के निम्नलिखित श्लोकों में मिलता है। जिसमें बताया गया है कि-
श्रीशुक उवाच ।
अथातः श्रूयतां राजन् वंशः सोमस्य पावनः।
यस्मिन्नैलादयो भूपाः कीर्त्यन्ते पुण्यकीर्तयः ॥१॥
सहस्रशिरसः पुंसो नाभिह्रद सरोरुहात्।
जातस्यासीत् सुतो धातुः अत्रिः पितृसमो गुणैः॥२॥
तस्य दृग्भ्योऽभवत् पुत्रः सोमोऽमृतमयः किल ।
विप्रौषध्युडुगणानां ब्रह्मणा कल्पितः पतिः॥३॥
सोऽयजद् राजसूयेन विजित्य भुवनत्रयम्।
पत्नीं बृहस्पतेर्दर्पात् तारां नामाहरद् बलात्॥ ४ ॥
यदा स देवगुरुणा याचितोऽभीक्ष्णशो मदात्।
नात्यजत् तत्कृते जज्ञे सुरदानवविग्रहः॥ ५ ॥
निवेदितोऽथाङ्गिरसा सोमं निर्भर्त्स्य विश्वकृत्।
तारां स्वभर्त्रे प्रायच्छद् अन्तर्वत्नीमवैत् पतिः॥ ८ ॥
त्यज त्यजाशु दुष्प्रज्ञे मत्क्षेत्रात् आहितं परैः।
नाहं त्वां भस्मसात्कुर्यां स्त्रियं सान्तानिकः सति॥ ९ ॥
तत्याज व्रीडिता तारा कुमारं कनकप्रभम्।
स्पृहामाङ्गिरसश्चक्रे कुमारे सोम एव च॥ १० ॥
ममायं न तवेत्युच्चैः तस्मिन् विवदमानयोः।
पप्रच्छुः ऋषयो देवा नैवोचे व्रीडिता तु सा ॥ ११ ॥
कुमारो मातरं प्राह कुपितोऽलीकलज्जया ।
किं न वोचस्यसद्वृत्ते आत्मावद्यं वदाशु मे ॥ १२ ॥
ब्रह्मा तां रह आहूय समप्राक्षीच्च सान्त्वयन् ।
सोमस्येत्याह शनकैः सोमस्तं तावदग्रहीत् ॥ १३ ॥
तस्यात्मयोनिरकृत बुध इत्यभिधां नृप ।
बुद्ध्या गम्भीरया येन पुत्रेणापोडुराण्मुदम् ॥ १४॥
अनुवाद- १-१४
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! अब मैं तुम्हें चन्द्रमा के पावन वंश का वर्णन सुनाता हूँ। इस वंश में पुरूरवा आदि बड़े-बड़े पवित्रकीर्ति राजाओं का कीर्तन किया जाता है। 1
सहस्त्रों सिर वाले विराट् पुरुष नारायण के नाभि से कमल की उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजी के पुत्र अत्रि हुए। वे अपने गुणों कारण ब्रह्माजी के समान ही थे॥ 2 ॥
उन्हीं अत्रि के नेत्रों से अमृतमय चन्द्रमा का जन्म हुआ। ब्रह्माजी ने चन्द्रमा को ब्राह्मण, ओषधि और नक्षत्रों का अधिपति बना दिया ॥ 3 ॥
तब चंद्रमा तीनों लोकों पर विजय प्राप्त की और राजसूय यज्ञ किया। इससे उनका घमंड बढ़ गया और उन्होंने बलपूर्वक बृहस्पति की पत्नी तारा को हर लिया ॥ 4 ॥
देवगुरु बृहस्पति ने अपनी पत्नी को लौटा देने के लिये उनसे बार-बार याचना की, परन्तु वे इतने मतवाले हो गये थे उन्होंने किसी प्रकार उनकी पत्नी को नहीं लौटाया। ऐसी परिस्थिति में उसके लिये देवता और दानवमें घोर संग्राम छिड़ गया ॥ 5 ॥
तब अङ्गिरा ऋषिने ब्रह्माजी के पास जाकर यह युद्ध बंद कराने की प्रार्थना की। इस पर ब्रह्माजीने चन्द्रमा को बहुत डाँटा-फटकारा और तारा को उसके पति बृहस्पतिजी के हवाले कर दिया। जब बृहस्पतिजीको यह मालूम हुआ कि तारा तो गर्भवती है, तब उन्होंने कहा- ॥ 8 ॥
दुष्टे ! मेरे क्षेत्रमें यह तो किसी दूसरेका गर्भ है। इसे तू अभी त्याग दे, तुरन्त त्याग दे। डर मत, मैं तुझे जलाऊँगा नहीं। क्योंकि एक तो तू स्त्री है और दूसरे मुझे भी सन्तान की कामना है। देवी होने के कारण तू निर्दोष भी है ही ।। 9 ।।
अपने पति की बात सुनकर तथ अत्यन्त लज्जित हुई। उसने सोनेके समान चमकता हुआ एक बालक अपने गर्भसे अलग कर दिया। उस बालकको देखकर बृहस्पति और चन्द्रमा दोनों ही मोहित हो गये और चाहने लगे कि यह हमें मिल जाय ॥ 10 ॥
अब वे एक दूसरेसे इस प्रकार जोर-जोर से झगड़ा करने लगे कि यह तुम्हारा नहीं, मेरा है।' ऋषियों और देवताओंने तारासे पूछा कि 'यह किसका लड़का है।परन्तु ताराने लज्जावश कोई उत्तर न दिया ॥ 11 ॥
बालकने अपनी माताको झूठी लज्जा से क्रोधित होकर कहा-'दुष्टे तू बतलाती क्यों नहीं ? तू अपना कुकर्म मुझे शीघ्र से शीघ्र बतला दे ॥ 12 ॥
उसी समय ब्रह्माजीने ताराको एकान्तमें बुलाकर बहुत कुछ समझा-बुझाकर पूछा। तब ताराने धीरेसे कहा कि 'चन्द्रमा का।' इसलिये चन्द्रमा ने उस बालकको ले लिया। 13
परीक्षित् ! ब्रह्माजीने उस बालकका नाम रखा 'बुध', क्योंकि उसकी बुद्धि बड़ी गम्भीर थी। ऐसा पुत्र प्राप्त करके चन्द्रमाको बहुत आनन्द हुआ। 14
इस प्रकार से आप लोगों ने संक्षेप में चन्द्रमा पुत्र बुध को जो आगे चलकर इसी बुध और इला से पुरुरवा का जन्म हुआ।अब हम पुनः इला के बारे में दूसरे पुराण से बताएंगे।
[2]- हरिवंश पुराण, हरिवंशपर्व के अध्याय- (10) के अनुसार- (सुद्युम्न) इला नाम की एक माह वाली स्त्री का वर्णन।
वैशम्पायन उवाच
मनोर्वैवस्वतस्यासन् पुत्रा वै नव तत्समाः ।
इक्ष्वाकुश्चैव नाभागो धृष्णुः शर्यातिरेव च ।। १
नरिष्यंश्च तथा प्रांशुर्नाभागारिष्टसप्तमाः ।
करूषश्च पृषध्रश्च नवैते भरतर्षभ ।। २ ।।
अकरोत् पुत्रकामस्तु मनुरिष्टिं प्रजापतिः ।
मित्रावरुणयोस्तात पूर्वमेव विशाम्पते ।। ३ ।।
अनुत्पन्नेषु नवसु पुत्रेष्वेतेषु भारत ।
तस्यां तु वर्तमानायामिष्ट्यां भरतसत्तम ।। ४ ।।
मित्रावरुणयोरंशे मुनिराहुतिमाजुहोत् ।
आहुत्यां हूयमानायां देवगन्धर्वमानुषाः ।। ५ ।।
तुष्टिं तु परमां जग्मुर्मुनयश्च तपोधनाः । अहोऽस्य तपसो वीर्यमहोऽस्य श्रुतमद्भुतम् ।। ६ ।।
तत्र दिव्याम्बरधरा दिव्याभरणभूषिता। दिव्यसंहनना चैव इला जज्ञे इति श्रुतिः ।। ७ ।।
तामिलेत्येव होवाच मनुर्दण्डधरस्तदा ।
अनुगच्छस्व मां भद्रे तमिला प्रत्युवाच ह ।
धर्मयुक्तमिदं वाक्यं पुत्रकामं प्रजापतिम् ।। ८ ।।
इलोवाच
मित्रावरुणयोरंशे जातास्मि वदतां वर ।
तयोः सकाशं यास्यामि न मां धर्मो हतोऽवधीत्।। ९ ।।
1-2. वैशम्पायन ने कहा: - हे भरतश्रेष्ठ , विवस्वत मनु के नौ पुत्र हुए - इक्ष्वाकु , नाभाग , धृष्णु , शर्याति , नरिष्यन, प्राञ्शु, नाभागरिष्ठ, कौरुष और पृषध्र ।
3. हे राजा, संतान की इच्छा से प्रेरित होकर कुलपति मनु ने मित्र और वरुण के समक्ष यज्ञ किया ।
4-6. हे भरत वंशज , अपने इन नौ पुत्रों के जन्म से पहले, मुनि ने इस यज्ञ में मित्र और वरुण के अंशों को आहुति दी। जब यह आहुति दी गई, तो देवताओं, गंधर्वों , मनुष्यों और तपस्वियों को अत्यंत प्रसन्नता हुई और वे कहने लगे, "हे भगवान! उनकी तपस्या कितनी अद्भुत है ! हे भगवान! शास्त्रों का उनका ज्ञान कितना अद्भुत है!"
7. परम्परा यह है कि उस बलिदान में इला का जन्म हुआ, जो दिव्य वस्त्रों से सजी, दिव्य आभूषणों से सुशोभित और दिव्य कवच से सुसज्जित थी।
8. मनु ने हाथ में दंड लिए उससे कहा: "हे सुंदरी, मेरे पीछे आओ।" उसने संतान की इच्छा रखने वाले उस कुलपति को निम्नलिखित नैतिक उत्तर दिया।
9. इला ने कहा:—"हे श्रेष्ठ वक्ता, मैं मित्र और वरुण की शक्ति से उत्पन्न हुई हूँ, इसलिए मैं उनके(वरुण) के पास ही जाऊँगी। मेरी नैतिकता को नष्ट मत करो।"
सैवमुक्त्वा मनुं देवं मित्रावरुणयोरिला ।
गत्वान्तिकं वरारोहा प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ।। 1.10.१० ।।
अंशेऽस्मि युवयोर्जाता देवौ किं करवाणि वाम्।
मनुना चाहमुक्ता वै अनुगच्छस्व मामिति ।। ११ ।।
तां तथावादिनीं साध्वीमिलां धर्मपरायणाम् ।
मित्रश्च वरुणश्चोभावूचतुर्यन्निबोध तत् ।। १२ ।।
अनेन तव धर्मेण प्रश्रयेण दमेन च ।
सत्येन चैव सुश्रोणि प्रीतौ स्वो वरवर्णिनि ।। १३ ।।
आवयोस्त्वं महाभागे ख्यातिं कन्येति यास्यसि ।
मनोर्वंशधरः पुत्रस्त्वमेव च भविष्यसि ।। १४ ।।
सुद्युम्न इति विख्यातस्त्रिषु लोकेषु शोभने ।
जगत्प्रियो धर्मशीलो मनोर्वंशविवर्धनः ।। १५ ।।
निवृत्ता सा तु तच्छुत्वा गच्छन्ती पितुरन्तिकम्।
बुधेनान्तरमासाद्य मैथुनायोपमन्त्रिता ।। १६ ।।
सोमपुत्राद् बुधाद् राजंस्तस्यां जज्ञे पुरूरवाः ।
जनयित्वा सुतं सा तमिला सुद्युम्नतां गता ।।१७ ।।
सुद्युम्नस्य तु दायादास्त्रयः परमधार्मिकाः ।
उत्कलश्च गयश्चैव विनताश्वश्च भारत ।। १८ ।।
उत्कलस्योत्कला राजन् विनताश
होतुर्व्यतिक्रमं ज्ञात्वा बभाषे रविनन्दनम् ॥ १९ ॥
एतत् संकल्पवैषम्यं होतुस्ते व्यभिचारतः ।
तथापि साधयिष्ये ते सुप्रजास्त्वं स्वतेजसा ॥ २०॥
अनुवाद- १३-२०
वैवस्वत मनु पहले सन्तानहीन थे उस समय सर्वसमर्थ भगवान् वसिष्ठने उन्हें सन्तान प्राप्ति करानेके लिये मित्रावरुणका यज्ञ कराया था ॥ 13 ॥
यज्ञके आरम्भ में केवल दूध पीकर रहने वाली वैवस्वत मनुकी धर्मपत्नी श्रद्धाने अपने होताके पास जाकर प्रणाम पूर्वक याचना की कि मुझे कन्या ही प्राप्त हो 14
तब अध्वर्युकी प्रेरणासे होता बने हुए ब्राह्मणने श्रद्धाके कथनका स्मरण करके एकाग्र चित्तसे वषट्कार का उच्चारण करते हुए यज्ञकुण्डमें आहुति दी ।। 15 ।
जब होताने इस प्रकार विपरीत कर्म किया, तब यज्ञके फलस्वरूप पुत्र के स्थानपर इला नामकी कन्या हुई। उसे देखकर श्राद्धदेव मनु का मन कुछ विशेष प्रसन्न नहीं हुआ। उन्होंने अपने गुरु वसिष्ठजी से कहा- 16
'भगवन् ! आपलोग तो ब्रह्मवादी हैं, आपका कर्म इस प्रकार विपरीत फल देनेवाला कैसे हो गया ? अरे, यह तो बड़े दुःख की बात है। वैदिक कर्म का ऐसा विपरीत फल तो कभी नहीं होना चाहिये 17॥
आप लोगों का मन्त्र ज्ञान तो पूर्ण है ही इसके अतिरिक्त आप लोग जितेन्द्रिय भी है तथा तपस्या के कारण निष्पाप हो चुके है देवताओं में सत्य की प्राप्ति के समान आपके संकल्प का यह उलटा फल कैसे हुआ ?' 18
परीक्षित् ! हमारे वृद्ध प्रपितामह भगवान् वसिष्ठ ने उनकी यह बात सुनकर जान लिया कि होता ने विपरीत संकल्प किया है। इसलिये उन्होंने चैवस्वत मनुसे कहा- ॥ 19 ॥
'राजन् ! तुम्हारे होताके विपरीत संकल्पसे ही हमारा संकल्प ठीक-ठीक पूरा नहीं हुआ। फिर भी अपने तपके प्रभावसे मैं तुम्हें श्रेष्ठ पुत्र दूँगा' ॥ 20 ॥
एवं व्यवसितो राजन् भगवान् स महायशाः ।
अस्तौषीद् आदिपुरुषं इलायाः पुंस्त्वकाम्यया ॥ २१ ॥
तस्मै कामवरं तुष्टो भगवान् हरिरीश्वरः ।
ददौ इविलाभवत् तेन सुद्युम्नः पुरुषर्षभः ॥ २२ ॥
स एकदा महाराज विचरन् मृगयां वने ।
वृतः कतिपयामात्यैः अश्वं आरुह्य सैन्धवम् ॥२३॥
प्रगृह्य रुचिरं चापं शरांश्च परमाद्भुतान् ।
दंशितोऽनुमृगं वीरो जगाम दिशमुत्तराम् ॥ २४ ॥
सु कुमातो वनं मेरोः अधस्तात् प्रविवेश ह ।
यत्रास्ते भगवान् शर्वो रममाणः सहोमया ॥ २५ ॥
तस्मिन् प्रविष्ट एवासौ सुद्युम्नः परवीरहा ।
अपश्यत् स्त्रियमात्मानं अश्वं च वडवां नृप ॥२६॥
तथा तदनुगाः सर्वे आत्मलिङ्ग विपर्ययम् ।
दृष्ट्वा विमनसोऽभूवन् वीक्षमाणाः परस्परम् ॥ २७ ॥
अनुवाद- २१- २७
परीक्षित्! परम यशस्वी भगवान् वसिष्ठने ऐसा निश्चय करके उस इला नामकी कन्याको ही पुरुष बना देने के लिये पुरुषोत्तम भगवान् नारायण की स्तुति की। 21
सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरिने सन्तुष्ट होकर उन्हें मुँहमाँगा वर दिया, जिसके प्रभावसे वह कन्या ही सुद्युम्न नामक श्रेष्ठ पुत्र बन गयी। 22
महाराज! एक बार राजा सुद्युन शिकार खेलनेके लिये सिन्धुदेश के घोड़ेपर सवार होकर कुछ मन्त्रियोंके साथ वनमें गये। 23
वीर सुद्युम्न कवच पहनकर और हाथमें सुन्दर धनुष एवं अत्यन्त अद्भुत वाण लेकर हरिनोंका पीछा करते हुए उत्तर दिशामें बहुत आगे बढ़ गये। 24
अन्तमें सुधुम्र मेरुपर्वतकी तलहटीके एक वनमें चले गये। उस वनमें भगवान् शङ्कर पार्वतीके साथ विहार करते रहते हैं। 25
उसमें प्रवेश करते ही वीरवर सुद्युम्नने देखा कि मैं स्त्री हो गया हूँ और मेरा घोड़ा घोड़ी हो गया है। 26
परीक्षित् ! साथ ही उनके सब अनुचरोंने भी अपनेको स्त्रीरूपमें देखा। वे सब एक-दूसरेका मुँह देखने लगे, उनका चित्त बहुत उदास हो गया। 27
श्रीराजोवाच-
कथं एवं गुणो देशः केन वा भगवन् कृतः ।
प्रश्नमेनं समाचक्ष्व परं कौतूहलं हि नः ॥ २८ ॥
श्रीशुक उवाच-
एकदा गिरिशं द्रष्टुं ऋषयस्तत्र सुव्रताः ।
दिशो वितिमिराभासाः कुर्वन्तः समुपागमन् ॥२९।।
तान् विलोक्य अम्बिका देवी विवासा व्रीडिता भृशम् । भर्तुरङ्गात समुत्थाय नीवीमाश्वथ पर्यधात् ॥ ३० ॥
ऋषयोऽपि तयोर्वीक्ष्य प्रसङ्गं रममाणयोः ।
निवृत्ताः प्रययुस्तस्मात् नरनारायणाश्रमम् ॥ ३१।।
तदिदं भगवान् आह प्रियायाः प्रियकाम्यया ।
स्थानं यः प्रविशेदेतत् स वै योषिद् भवेदिति ॥ ३२ ॥
तत ऊर्ध्वं वनं तद्वै पुरुषा वर्जयन्ति हि ।
सा चानुचरसंयुक्ता विचचार वनाद् वनम् ॥ ३३ ॥
अनुवाद- २८-३३
राजा परीक्षितने पूछा- भगवन् ! उस भूखण्ड में ऐसा विचित्र गुण कैसे आ गया ? किसने उसे ऐसा बना दिया था ? आप कृपा कर हमारे इस प्रश्नका उत्तर दीजिये; क्योंकि हमें बड़ा कौतूहल हो रहा है। 28
श्रीशुकदेवजीने कहा- परीक्षित्! एक दिन भगवान् शङ्करका दर्शन करनेके लिये बड़े-बड़े व्रतधारी ऋषि अपने तेजसे दिशाओंका अन्धकार मिटाते हुए उस वनमें गये। 29
उस समय अम्बिका देवी वस्त्रहीन थीं। ऋषियोंको सहसा आया देख वे अत्यन्त लज्जित हो गयीं। झटपट उन्होंने भगवान् शङ्करकी गोदसे उठकर वस्त्र धारण कर लिया।30
ऋषियोंने भी देखा कि भगवान् गौरी-शङ्कर इस समय विहार कर रहे हैं, इसलिये वहाँसे लौटकर वे भगवान् नर-नारायणके आश्रमपर चले गये। 31
उसी समय भगवान् शङ्करने अपनी प्रिया भगवती अम्बिकाको प्रसन्न करनेके लिये कहा कि 'मेरे सिवा जो भी पुरुष इस स्थानमें प्रवेश करेगा, वहीं स्त्री हो जायेगा। 32
परीक्षित्! तभीसे पुरुष उस स्थानमें प्रवेश नहीं करते। अब सुद्युम्न स्त्री हो गये थे। इसलिये वे अपने स्त्री बने हुए अनुचरोंके साथ एक वनसे दूसरे वनमें विचरने लगे। 33
अथ तां आश्रमाभ्याशे चरन्तीं प्रमदोत्तमाम् ।
स्त्रीभिः परिवृतां वीक्ष्य चकमे भगवान् बुधः ॥ ३४ ॥
सापि तं चकमे सुभ्रूः सोमराजसुतं पतिम् ।
स तस्यां जनयामास पुरूरवसमात्मजम् ॥ ३५ ॥
एवं स्त्रीत्वं अनुप्राप्तः सुद्युम्नो मानवो नृपः ।
सस्मार स कुलाचार्यं वसिष्ठमिति शुश्रुम ॥ ३६ ॥
स तस्य तां दशां दृष्ट्वा कृपया भृशपीडितः ।
सुद्युम्नस्याशयन् पुंस्त्वं उपाधावत शंकरम् ॥३७ ॥
तुष्टस्तस्मै स भगवान् ऋषये प्रियमावहन् ।
स्वां च वाचं ऋतां कुर्वन् इदमाह विशाम्पते ॥३८ ॥
मासं पुमान् स भविता मासं स्त्री तव गोत्रजः ।
इत्थं व्यवस्थया कामं सुद्युम्नोऽवतु मेदिनीम् ॥ ३९ ॥
आचार्यानुग्रहात् कामं लब्ध्वा पुंस्त्वं व्यवस्थया ।
पालयामास जगतीं नाभ्यनन्दन् स्म तं प्रजाः ॥ ४० ॥
तस्योत्कलो गयो राजन् विमलश्च सुतास्त्रयः ।
दक्षिणापथराजानो बभूवुः धर्मवत्सलाः ॥ ४१ ॥
ततः परिणते काले प्रतिष्ठानपतिः प्रभुः ।
पुरूरवस उत्सृज्य गां पुत्राय गतो वनम् ॥ ४२ ॥
अनुवाद- ३४-४२
उसी समय शक्तिशाली बुधने देखा कि मेरे आश्रमके पास ही बहुत-सी स्त्रियोंसे घिरी हुई एक सुन्दरी स्त्री विचर रही है। उन्होंने इच्छा की कि यह मुझे प्राप्त हो जाय। 34
उस सुन्दर स्त्री ने भी चन्द्रकुमार बुधको पति बनाना चाहा। इसपर बुधने उसके गर्भ से पुरूरवा नामका पुत्र उत्पन्न किया।35
इस प्रकार मनुपुत्र राजा सुद्युम्न स्त्री हो गये। ऐसा सुनते हैं कि उन्होंने उस अवस्थामें अपने कुलपुरोहित वसिष्ठजीका स्मरण किया। 36
सुद्युम्न की यह दशा देखकर वसिष्ठजीके हृदयमें कृपावश अत्यन्त पीड़ा हुई। उन्होंने सुद्युम्न को पुनः पुरुष बना देनेके लिये भगवान् शङ्करकी आराधना की। 37
भगवान् शङ्कर वसिष्ठजीपर प्रसन्न हुए। परीक्षित् । उन्होंने उनकी अभिलाषा पूर्ण करनेके लिये अपनी वाणीको सत्य रखते हुए ही यह बात कही- 38
'वसिष्ठ ! तुम्हारा यह यजमान एक महीने तक पुरुष रहेगा और एक महीने तक स्त्री। इस व्यवस्था से सुद्युम्न इच्छानुसार पृथ्वीका पालन करे'। 39
इस प्रकार वसिष्ठजीके अनुग्रहसे व्यवस्थापूर्वक अभीष्ट पुरुषत्व लाभ करके सुद्युम्न पृथ्वीका पालन करने लगे। परन्तु प्रजा उनका अभिनन्दन नहीं करती थी। 40
(पुरुप रुप में उनकी पत्नी से) उनको तीन पुत्र हुए- उत्कल, गय और विमल। परीक्षित् ! वे सब दक्षिणापथके राजा हुए। 41
बहुत दिनोंके बाद वृद्धावस्था आनेपर प्रतिष्ठान नगरीके अधिपति सुद्युम्न ने अपने पुत्र पुरूरवा को राज्य दे दिया और स्वयं तपस्या करने के लिये वन की यात्रा की। 42
विशेष - ज्ञात हो राजा सुद्युम्न को जब स्त्री और पुरुष होने की धटना नहीं घटी थी, उस समय उनकी किसी पत्नी से तीन पुत्र हुए- उत्कल, गय और विमल। किन्तु जब उनके लिए एक-एक महिने के लिए स्त्री और पुरुष होने की धटना घटी तब उनके स्त्री रुप में आकाशीय पिण्ड बुध से पुरुरवा का जन्म हुआ।
अब वहाँ पर बुध के बारे में जानना आवश्यक हो गया कि बुध कौन हैं जिन्होंने एक महीने के लिए स्त्री हुए राजा सुद्युम्न से पुरुरवा को जन्म दिया।
तो सूर्य पुत्र बुध का वर्णन भागवत पुराण स्कन्ध (९) के अध्याय १४ के निम्नलिखित श्लोकों में मिलता है। जिसमें बताया गया है कि-
श्रीशुक उवाच ।
अथातः श्रूयतां राजन् वंशः सोमस्य पावनः।
यस्मिन्नैलादयो भूपाः कीर्त्यन्ते पुण्यकीर्तयः ॥१॥
सहस्रशिरसः पुंसो नाभिह्रद सरोरुहात्।
जातस्यासीत् सुतो धातुः अत्रिः पितृसमो गुणैः॥२॥
तस्य दृग्भ्योऽभवत् पुत्रः सोमोऽमृतमयः किल ।
विप्रौषध्युडुगणानां ब्रह्मणा कल्पितः पतिः॥३॥
सोऽयजद् राजसूयेन विजित्य भुवनत्रयम्।
पत्नीं बृहस्पतेर्दर्पात् तारां नामाहरद् बलात्॥ ४ ॥
यदा स देवगुरुणा याचितोऽभीक्ष्णशो मदात्।
नात्यजत् तत्कृते जज्ञे सुरदानवविग्रहः॥ ५ ॥
निवेदितोऽथाङ्गिरसा सोमं निर्भर्त्स्य विश्वकृत्।
तारां स्वभर्त्रे प्रायच्छद् अन्तर्वत्नीमवैत् पतिः॥ ८ ॥
त्यज त्यजाशु दुष्प्रज्ञे मत्क्षेत्रात् आहितं परैः।
नाहं त्वां भस्मसात्कुर्यां स्त्रियं सान्तानिकः सति॥ ९ ॥
तत्याज व्रीडिता तारा कुमारं कनकप्रभम्।
स्पृहामाङ्गिरसश्चक्रे कुमारे सोम एव च॥ १० ॥
ममायं न तवेत्युच्चैः तस्मिन् विवदमानयोः।
पप्रच्छुः ऋषयो देवा नैवोचे व्रीडिता तु सा ॥ ११ ॥
कुमारो मातरं प्राह कुपितोऽलीकलज्जया ।
किं न वोचस्यसद्वृत्ते आत्मावद्यं वदाशु मे ॥ १२ ॥
ब्रह्मा तां रह आहूय समप्राक्षीच्च सान्त्वयन् ।
सोमस्येत्याह शनकैः सोमस्तं तावदग्रहीत् ॥ १३ ॥
तस्यात्मयोनिरकृत बुध इत्यभिधां नृप ।
बुद्ध्या गम्भीरया येन पुत्रेणापोडुराण्मुदम् ॥ १४॥
अनुवाद- १-१४
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! अब मैं तुम्हें चन्द्रमा के पावन वंश का वर्णन सुनाता हूँ। इस वंश में पुरूरवा आदि बड़े-बड़े पवित्रकीर्ति राजाओं का कीर्तन किया जाता है। 1
सहस्त्रों सिर वाले विराट् पुरुष नारायण के नाभि से कमल की उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजी के पुत्र अत्रि हुए। वे अपने गुणों कारण ब्रह्माजी के समान ही थे॥ 2 ॥
उन्हीं अत्रि के नेत्रों से अमृतमय चन्द्रमा का जन्म हुआ। ब्रह्माजी ने चन्द्रमा को ब्राह्मण, ओषधि और नक्षत्रों का अधिपति बना दिया ॥ 3 ॥
तब चंद्रमा तीनों लोकों पर विजय प्राप्त की और राजसूय यज्ञ किया। इससे उनका घमंड बढ़ गया और उन्होंने बलपूर्वक बृहस्पति की पत्नी तारा को हर लिया ॥ 4 ॥
देवगुरु बृहस्पति ने अपनी पत्नी को लौटा देने के लिये उनसे बार-बार याचना की, परन्तु वे इतने मतवाले हो गये थे उन्होंने किसी प्रकार उनकी पत्नी को नहीं लौटाया। ऐसी परिस्थिति में उसके लिये देवता और दानवमें घोर संग्राम छिड़ गया ॥ 5 ॥
तब अङ्गिरा ऋषिने ब्रह्माजी के पास जाकर यह युद्ध बंद कराने की प्रार्थना की। इस पर ब्रह्माजीने चन्द्रमा को बहुत डाँटा-फटकारा और तारा को उसके पति बृहस्पतिजी के हवाले कर दिया। जब बृहस्पतिजीको यह मालूम हुआ कि तारा तो गर्भवती है, तब उन्होंने कहा- ॥ 8 ॥
दुष्टे ! मेरे क्षेत्रमें यह तो किसी दूसरेका गर्भ है। इसे तू अभी त्याग दे, तुरन्त त्याग दे। डर मत, मैं तुझे जलाऊँगा नहीं। क्योंकि एक तो तू स्त्री है और दूसरे मुझे भी सन्तान की कामना है। देवी होने के कारण तू निर्दोष भी है ही ।। 9 ।।
अपने पति की बात सुनकर तथ अत्यन्त लज्जित हुई। उसने सोनेके समान चमकता हुआ एक बालक अपने गर्भसे अलग कर दिया। उस बालकको देखकर बृहस्पति और चन्द्रमा दोनों ही मोहित हो गये और चाहने लगे कि यह हमें मिल जाय ॥ 10 ॥
अब वे एक दूसरेसे इस प्रकार जोर-जोर से झगड़ा करने लगे कि यह तुम्हारा नहीं, मेरा है।' ऋषियों और देवताओंने तारासे पूछा कि 'यह किसका लड़का है।परन्तु ताराने लज्जावश कोई उत्तर न दिया ॥ 11 ॥
बालकने अपनी माताको झूठी लज्जा से क्रोधित होकर कहा-'दुष्टे तू बतलाती क्यों नहीं ? तू अपना कुकर्म मुझे शीघ्र से शीघ्र बतला दे ॥ 12 ॥
उसी समय ब्रह्माजीने ताराको एकान्तमें बुलाकर बहुत कुछ समझा-बुझाकर पूछा। तब ताराने धीरेसे कहा कि 'चन्द्रमा का।' इसलिये चन्द्रमा ने उस बालकको ले लिया। 13
परीक्षित् ! ब्रह्माजीने उस बालकका नाम रखा 'बुध', क्योंकि उसकी बुद्धि बड़ी गम्भीर थी। ऐसा पुत्र प्राप्त करके चन्द्रमाको बहुत आनन्द हुआ। 14
इस प्रकार से आप लोगों ने संक्षेप में चन्द्रमा पुत्र बुध को जो आगे चलकर इसी बुध और इला से पुरुरवा का जन्म हुआ।अब हम पुनः इला के बारे में दूसरे पुराण से बताएंगे।
[2]- हरिवंश पुराण, हरिवंशपर्व के अध्याय- (10) के अनुसार- (सुद्युम्न) इला नाम की एक माह वाली स्त्री का वर्णन।
वैशम्पायन उवाच
मनोर्वैवस्वतस्यासन् पुत्रा वै नव तत्समाः ।
इक्ष्वाकुश्चैव नाभागो धृष्णुः शर्यातिरेव च ।। १
नरिष्यंश्च तथा प्रांशुर्नाभागारिष्टसप्तमाः ।
करूषश्च पृषध्रश्च नवैते भरतर्षभ ।। २ ।।
अकरोत् पुत्रकामस्तु मनुरिष्टिं प्रजापतिः ।
मित्रावरुणयोस्तात पूर्वमेव विशाम्पते ।। ३ ।।
अनुत्पन्नेषु नवसु पुत्रेष्वेतेषु भारत ।
तस्यां तु वर्तमानायामिष्ट्यां भरतसत्तम ।। ४ ।।
मित्रावरुणयोरंशे मुनिराहुतिमाजुहोत् ।
आहुत्यां हूयमानायां देवगन्धर्वमानुषाः ।। ५ ।।
तुष्टिं तु परमां जग्मुर्मुनयश्च तपोधनाः । अहोऽस्य तपसो वीर्यमहोऽस्य श्रुतमद्भुतम् ।। ६ ।।
तत्र दिव्याम्बरधरा दिव्याभरणभूषिता। दिव्यसंहनना चैव इला जज्ञे इति श्रुतिः ।। ७ ।।
तामिलेत्येव होवाच मनुर्दण्डधरस्तदा ।
अनुगच्छस्व मां भद्रे तमिला प्रत्युवाच ह ।
धर्मयुक्तमिदं वाक्यं पुत्रकामं प्रजापतिम् ।। ८ ।।
इलोवाच
मित्रावरुणयोरंशे जातास्मि वदतां वर ।
तयोः सकाशं यास्यामि न मां धर्मो हतोऽवधीत्।। ९ ।।
1-2. वैशम्पायन ने कहा: - हे भरतश्रेष्ठ , विवस्वत मनु के नौ पुत्र हुए - इक्ष्वाकु , नाभाग , धृष्णु , शर्याति , नरिष्यन, प्राञ्शु, नाभागरिष्ठ, कौरुष और पृषध्र ।
3. हे राजा, संतान की इच्छा से प्रेरित होकर कुलपति मनु ने मित्र और वरुण के समक्ष यज्ञ किया ।
4-6. हे भरत वंशज , अपने इन नौ पुत्रों के जन्म से पहले, मुनि ने इस यज्ञ में मित्र और वरुण के अंशों को आहुति दी। जब यह आहुति दी गई, तो देवताओं, गंधर्वों , मनुष्यों और तपस्वियों को अत्यंत प्रसन्नता हुई और वे कहने लगे, "हे भगवान! उनकी तपस्या कितनी अद्भुत है ! हे भगवान! शास्त्रों का उनका ज्ञान कितना अद्भुत है!"
7. परम्परा यह है कि उस बलिदान में इला का जन्म हुआ, जो दिव्य वस्त्रों से सजी, दिव्य आभूषणों से सुशोभित और दिव्य कवच से सुसज्जित थी।
8. मनु ने हाथ में दंड लिए उससे कहा: "हे सुंदरी, मेरे पीछे आओ।" उसने संतान की इच्छा रखने वाले उस कुलपति को निम्नलिखित नैतिक उत्तर दिया।
9. इला ने कहा:—"हे श्रेष्ठ वक्ता, मैं मित्र और वरुण की शक्ति से उत्पन्न हुई हूँ, इसलिए मैं उनके(वरुण) के पास ही जाऊँगी। मेरी नैतिकता को नष्ट मत करो।"
सैवमुक्त्वा मनुं देवं मित्रावरुणयोरिला ।
गत्वान्तिकं वरारोहा प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ।। 1.10.१० ।।
अंशेऽस्मि युवयोर्जाता देवौ किं करवाणि वाम्।
मनुना चाहमुक्ता वै अनुगच्छस्व मामिति ।। ११ ।।
तां तथावादिनीं साध्वीमिलां धर्मपरायणाम् ।
मित्रश्च वरुणश्चोभावूचतुर्यन्निबोध तत् ।। १२ ।।
अनेन तव धर्मेण प्रश्रयेण दमेन च ।
सत्येन चैव सुश्रोणि प्रीतौ स्वो वरवर्णिनि ।। १३ ।।
आवयोस्त्वं महाभागे ख्यातिं कन्येति यास्यसि ।
मनोर्वंशधरः पुत्रस्त्वमेव च भविष्यसि ।। १४ ।।
सुद्युम्न इति विख्यातस्त्रिषु लोकेषु शोभने ।
जगत्प्रियो धर्मशीलो मनोर्वंशविवर्धनः ।। १५ ।।
निवृत्ता सा तु तच्छुत्वा गच्छन्ती पितुरन्तिकम्।
बुधेनान्तरमासाद्य मैथुनायोपमन्त्रिता ।। १६ ।।
सोमपुत्राद् बुधाद् राजंस्तस्यां जज्ञे पुरूरवाः ।
जनयित्वा सुतं सा तमिला सुद्युम्नतां गता ।।१७ ।।
सुद्युम्नस्य तु दायादास्त्रयः परमधार्मिकाः ।
उत्कलश्च गयश्चैव विनताश्वश्च भारत ।। १८ ।।
उत्कलस्योत्कला राजन् विनताश्वस्य पश्चिमा।
दिक् पूर्वा भरतश्रेष्ठ गयस्य तु गया पुरी ।। १९ ।।
प्रविष्टे तुं मनौ तात दिवाकरमरिंदम ।
दशधा तद्दधत्क्षत्रमकरोत् पृथिवीमिमाम् ।। 1.10.२० ।।
10-11. मनु से यह कहकर इला, मित्र और वरुण के पास गई और उस सुन्दर स्त्री ने हाथ जोड़कर उनसे कहा, "मैं आपकी ही ऊर्जा से उत्पन्न हुई हूँ; मनु ने मुझे अपने पीछे आने को कहा है। मुझे बताइए कि मुझे क्या करना चाहिए।"
राजन्! इला के इस प्रकार कहने पर मित्र और वरुण ने उससे जो कहा था, उसे सुनो
13. हे सुंदर कमर वाली स्त्री, हम तुम्हारे सद्गुण, विनम्रता, आत्मसंयम और सत्यनिष्ठा से प्रसन्न हुए हैं।
14-15. इसलिए हे महान देवी, आप हमारी पुत्री के रूप में प्रसिद्ध होंगी, हे सुंदरी, आप मनु की पुत्री होंगी, उनके वंश को आगे बढ़ाएंगी, तीनों लोकों में सुद्युम्न नाम से प्रसिद्ध होंगी । आप धर्मपरायण होंगी, जगत की प्रिय होंगी और मनु के वंश को बढ़ाएंगी।
16. यह सुनकर जब वह अपने पिता (मनु) के पास लौटने ही वाली थी, तभी रास्ते में बुध ने उसे वैवाहिक उद्देश्यों के लिए आमन्त्रित किया।
17. फिर सोम के पुत्र बुध ने उससे पुरुरवा को जन्म दिया । उस पुत्र को जन्म देने के बाद इला सुद्युम्न बन गई।
मानवेयो महाराज स्त्रीपुंसोर्लक्षणैर्युतः ।
धृतवान् य इलेत्येव सुद्युम्नश्चातिविश्रुतः ।। २७ ।।
27. हे महाराज, मनु के उस पुत्र को, जो पुरुष और स्त्री दोनों के गुणों से युक्त था। उसने (स्त्री रुप में) इला नाम धारण किया और सुद्युम्न नाम से उनको प्रसिद्धि मिली।
मत्स्यपुराण, अध्यायः (१२) के अनुसार-
सुद्युम्न (इला) नाम की एक माह वाली स्त्री का वर्णन।
सूत उवाच।
अथान्विषन्तो राजानं भ्रातरस्तस्य मानवाः। इक्ष्वाकु प्रमुखा जग्मुस्तदा शरवणान्तिकम्।। १
ततस्ते दद्रृशुः सर्वे वडवामग्रतः स्थिताम्।रत्नपर्याणकिरणदीप्तकायामनुत्तमाम्।। २
पर्याणप्रत्यभिज्ञानात् सर्वे विस्मयमागताः। अयं चन्द्रप्रभो नाम वाजीतस्य महात्मनः।। ३
अगमद्वडवा रूपमुत्तमं केन हेतुना। ततस्तु मैत्रावरुणिं पप्रच्छुस्ते पुरोधसम्।। ४
किमित्येतदभूच्चित्रं वद योग विदाम्वर। वशिष्ठश्चाब्रवीत् सर्वं द्रृष्ट्वा तद्ध्यानचक्षुषा।। ५
समयः शम्भुदयिता कृतः शरवणे पुरा। यः पुमान् प्रविशेदत्र स नारीत्वमवाप्स्यति।। ६
अयमश्वोऽपि नारीत्वमगाद्राज्ञा सहैवतु। पुनः पुरुषतामेति यथासौ धनदोपमः।। ७
तथैव यत्नः कर्तव्य चाराध्यैव पिनाकिनम्। ततस्ते मानवा जग्मुर्यत्र देवो महेश्वरः।। ८
तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैः पार्वतीपरमेश्वरौ। तावूचतुरलङ्घ्योऽयं समयः किन्तु साम्प्रतम्।। ९
इक्ष्वाकोरश्वमेधेन यत् फलं स्यात्तदावयोः। दत्त्वा किम्पुरुषो वीरः स भविष्यत्यसंशयम्।। १०
तथेत्युक्तास्ततस्तेस्तु जग्मुर्वैवस्वतात्मजाः। इक्ष्वाकोश्चाश्वमेधेन चेलः किम्पुरुषोऽभवत्।। ११
मासमेकम्पुमान्वीरः स्त्री च मासमभूत् पुनः। बुधस्य भवने तिष्ठन्निलो गर्भधरोऽभवत्।। १२
अजीजनत् पुत्रमेकमनेक गुणसंयुतम्। बुधश्चोत्पाद्य तं पुत्रं स्वर्लोकमगमत्ततः।। १३
अनुवाद- १-१३
सूतजी कहते हैं-
ऋपियो बहुत दिनोंतक राजा इल (सुद्युम्न) के राजधानी न लौटनेपर सशङ्कित होकर उनके छोटे भाई मनु-पुत्र इक्ष्वाकु आदि राजा इल (सुद्युम्र) का अन्वेषणः करते हुए उसी शरवण के निकट जा पहुँचे। वहाँ उन सभीने मार्गके अग्रभाग में खड़ी हुई एक अनुपम घोड़ी को देखा, जिसका शरीर रत्ननिर्मित जीन की किरणोंसे उद्दीप्त हो रहा था। तत्पश्चात् जीन को पहचानकर वे सभी बन्धु आश्चर्यचकित हो गये, और परस्पर कहने लगे 'अरे ! यह तो हमारे भाई महात्मा राजा इल का चन्द्रप्रभ नामक घोड़ा है। किस कारण यह सुन्दर घोड़ी के रूप में परिणत हो गया। तब वे सभी लौटकर अपने कुल पुरोहित महर्षि वसिष्ठ के पास जाकर पूछने लगे 'योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे ! ऐसी आश्चर्यजनक घटना क्यों घटित हुई ? इसका रहस्य हमें बतलाइये। तब महर्षि वसिष्ठ ध्यानदृष्टि द्वारा सारा वृत्तान्त जानकर इक्ष्वाकु आदि से बोले- 'राजपुत्रो ! पूर्वकालमें शम्भु पत्नी उमा ने इस शरवण के विषय में ऐसा नियम और शर्त निर्धारित कर रखा है कि 'जो पुरुष इस शरवण में प्रवेश करेगा, वह स्त्री रूप में परिवर्तित हो जायगा। इसी कारण राजा इल के साथ ही साथ यह घोड़ा भी स्त्रीत्व को प्राप्त हो गया है। अब जिस प्रकार राजा इल कुबेर की भाँति पुनः पुरुषत्वको प्राप्त कर सकें, तुमलोगों को पिनाकधारी शंकर की आराधना करके वैसा ही प्रयत्न करना चाहिये।' महर्षि वसिष्ठ की आज्ञा पाकर वे सभी मनु-पुत्र वहाँ गये, जहाँ देवाधिदेव महेश्वर विराजमान थे। वहाँ उन्होंने विभिन्न स्तोत्रोंद्वारा पार्वती और परमेश्वर का स्तवन किया। उस स्तवन से प्रसन्न होकर पार्वती और परमेश्वरने कहा- 'राजकुमारो यद्यपि मेरे इस नियम (शर्त) का उल्लङ्घन नहीं किया जा सकता, फिर भी इस समय उसके निवारण के लिये मैं एक उपाय बतला रहा हूँ। यदि इक्ष्वाकु द्वारा किये गये अश्वमेध यज्ञका जो कुछ फल हो, वह सारा का सारा हम दोनों को समर्पित कर दिया जाय तो राजा इल निःसंदेह किम्पुरुष (किन्नर, अर्ध नारी) हो जायेंगे। यह सुनकर 'बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा'- यों कहकर वैवस्वत मनुके वे सभी पुत्र राजधानी को लौट आये। घर आकर इक्ष्वाकु ने अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान किया और उसका पुण्य फल पार्वती परमेश्वर को अर्पित कर दिया। जिसके परिणामस्वरूप इल किम्पुरुष (किन्नर) हो गये। वहाँ वे एक मास पुरुषरूप में रहकर पुनः एक मास स्त्री हो जाते थे। बुध के भवन में स्त्री रूप से रहते समय इल ने गर्भ धारण कर लिया था। उस गर्भ से अनेक गुणों से सम्पन्न एक पुत्र (पुरुरवा) उत्पन्न हुआ। उस पुत्र को उत्पन्न कर बुध भूलोक से पुन: स्वर्ग लोक को चले गये॥
कथा की वास्तविकता-
वास्तव में देखा जाए तो चंद्रमा और उससे उत्पन्न चंद्रवंश से सम्बन्धित उपर्युक्त जितने भी साक्ष्य विशेष रूप से इला से सम्बन्धित संदर्भ प्रस्तुत किया गया है, उनमें सोची-समझी साजिश और शास्त्रीय षड्यंत्र के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। यानी अधिकांश सन्दर्भों में सत्यता कम असत्यता (कपोल-कल्पना) अधिक है।
अब कुछ लोग कह सकते हैं कि शास्त्रों में लिखी गई बातें कैसे असत्य हों सकतीं हैं। तो इसके लिए बता दें कि शास्त्रों या किसी भी ग्रन्थ की प्रामाणिकता तभी मानी जा सकती है, जब उसके पीछे लिखने वाले की शुद्ध मंशा, निस्वार्थ भाव और सत्य को उजागर करने की निष्पक्षता हो। यदि लेखक का विचार कलुषित हैं, तो निश्चय ही उसका परिणाम भ्रामक होगा। इतना ही नहीं जब लेखक के मन में व्यक्तिगत
स्वार्थ, पूर्वाग्रह या किसी विशेष प्रयोजन (hidden agenda) का समावेश हो जाता है तब वह तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है जिससे उसकी लेखनी में सत्य पीछे छूट जाता है। तब उससे उसकी लेखनी की सत्यता के बारे में पूछा जाता है तो वह हर बार एक नया झूठ बोलता है। परिणाम यह होता है उसका झूठ पकड़ा जाता है। क्योंकि सत्य झूठ से परे, निर्विवाद और अपरिवर्तनीय रूप से अपने एक ही रुप में सदैव अडिग (स्थिर) रहता है। यदि सत्य के बारे में एक बार नहीं हजार बार पूछा जाए तो वह हर बार वही कहेगा जो पहली बार कहा था।
गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज का कथन है कि- "वास्तव में सत्य को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि आचरण और अंतरात्मा की शुद्धता में उतारना ही आध्यात्मिकता मूल है।"
कथा की समालोचना
अब हम लोग क्रमशः शुद्ध अंतरात्मा से पौराणिक ग्रंथों का सम्मान करते हुए विचार करेंगे कि चंद्रमा और उसके वंश की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जो शास्त्रों (पौराणिक ग्रंथों) में बातें लिखी गई है वह कितनी संगत और असंगत हैं।
(1) पौराणिक ग्रंथों में पहली विसंगति चंद्रमा की उत्पत्ति को लेकर होती है। जैसे- श्रीमद्भागवत गीता और चार वेदों के अनुसार चंद्रमा की उत्पत्ति को सर्वप्रथम परमेश्वर श्रीकृष्ण (विराट विष्णु) से बताई गई है। इस बात को मैं पहले ही बता चुका हूँ। चूँकि यह उत्पत्ति सबसे पहले और प्राचीनतम ग्रन्थों में बताई गई है इसलिए यही शास्वत और सार्वभौमिक सत्य है। किन्तु यदि इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो चंद्रमा की उत्पत्ति सूर्य से हुई है। यह भी ध्रुव सत्य है। किन्तु यहाँ पर हम पौराणिक संदर्भों की ही बात करेंगे। इस क्रम में देखा जाए तो वेदों के बाद जो पुराण लिखे गए, उन सभी में पुराणकारों ने अपने नीजी स्वार्थ से प्रेरित होकर चंद्रमा को कभी "अत्रि" से, तो कभी समुद्र से, तो कभी त्रिपुर सुन्दरी की बाईं आंख से उत्पन्न कराकर चंद्रमा की वास्तविक उत्पत्ति से लोगों को भ्रमित कर दिया। इस सम्बन्ध में समाज में एक कहावत प्रचलित है कि- एक झूठ को छुपाने के लिए हजार झूठ बोला जाए तब भी सत्य नहीं हो सकता। अर्थात झूठ सत्य का विकल्प कभी नहीं हो सकता।
(2)- पौराणिक ग्रंथों में दूसरी विसंगति राजा सुद्युम्न (इला) की कथाओं में मिलती है, जो पूरी तरह से प्रक्षिप्त, निराधार, और अवैज्ञानिक है। क्योंकि आजतक ऐसा नहीं देखा गया कि कोई व्यक्ति एक माह के लिए स्त्री हो जाए और पुनः एक माह के लिए पुरुष हो जाए और उसी एक माह के स्त्रित्व काल में गर्भवती होकर एक ही माह में पुत्र पैदा करें। यह सम्भव हो ही नहीं सकता। जबकि पुराणकारों ने कुछ इसी तरह की कथा राजा सुद्युम्न (इला) के लिए लिखा है। वह कथा किसी भी तरह से सत्य की कसौटी पर खरी नहीं उतर सकती, क्योंकि यह प्राकृति विधानों के बिल्कुल विपरीत है। सुद्युम्न (इला) नाम की एक माह वाली स्त्री की घटनाक्रम को हम अलग अलग पुराणों के हिसाब से पहले ही बता चुका हूँ।
अब सवाल यह है कि पौराणिक कथाओं में ऐसी बातें क्यों लिखी गई ? तो इसका स्पष्ट उत्तर है- कथाकारों को ऐसा करने का एकमात्र उद्देश्य किसी भी तरह से भू-तल के प्रथम सम्राट पुरुरवा को पूरी तरह से ब्राह्मीकरण करके उसकी अहीर जाती की पहचान को सदा के लिए मिटाकर चंद्रवंशी अहीर जाती के वास्तविक इतिहास से लोगों को भ्रमित करना था।
इसके लिए उन्होंने सबसे पहले आकाशीय पिण्ड चंद्रमा को एक ब्राह्मण अत्रि से उत्पन्न कराकर ब्राह्मीकरण किया, फिर चंद्रमा और किसी तारा (Star) से आकाशीय पिण्ड बुध को उत्पन्न किया। पुनः चंद्रमा के पुत्र- बुध से एक माह स्त्री और एक माह पुरुष हो जाने वाले काल्पनिक पुरुष सुद्युम्न (इला) से भू-तल के प्रथम चंद्रवंशी सम्राट पुरुरवा तथा उसकी अहीर जाती को ब्राह्मीकरण के लिए तरह-तरह के शास्त्रीय षड्यंत्र रचा। जो किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं है।
कथा का सम्पूर्ण समाधान-
तो इस सम्बन्ध में बता दें कि पौराणिक ग्रंथों के हिसाब से सृष्टि की रचना दो तरह से बाताई गई है। इन दोनों तरह की सृष्टि रचना को जानने के बाद सारे प्रश्नों का समाधान स्वतः हो जाएगा।
(1) पहली सृष्टि रचना-
सृष्टि की प्रथम सर्जना परमेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा हुई है। जिसमें परमेश्वर श्रीकृष्ण ने सर्वप्रथम नारायण, शिव, ब्रह्मा इत्यादि के साथ ही गोप और गोपियों को उत्पन्न किया। इस बात की पुष्टि ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय-(३) के निम्नलिखित श्लोकों से होती है। जिसमें लिखा गया है कि-
आविर्बभूवुः सर्गादौ पुंसो दक्षिणपार्श्वतः ।
भवकारणरूपाश्च मूर्तिमन्तस्त्रयो गुणाः।४।
ततो महानहङ्कारः पञ्चतन्मात्र एव च।
रूपरसगन्धस्पर्शशब्दाश्चैवेतिसंज्ञकाः।५।
आविर्बभूव पश्चात्स्वयं नारायणः प्रभुः ।
श्यामो युवा पीतवासा वनमाली चतुर्भुजः।६।
शंखचक्रगदापद्मधरः स्मेरमुखाम्बुजः।।
रत्नभूषणभूषाढ्यः शार्ङ्गी कौस्तुभभूषणः।७।
सबसे पहले उन परम पुरुष श्रीकृष्ण के दक्षिणपार्श्व से जगत के कारण रूप तीन मूर्तिमान गुण प्रकट हुए। उन गुणों से महत्तत्व, अहंकार, पाँच तन्मात्राऐं तथा रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, और शब्द-ये पाँच विषय क्रमशः प्रकट हुए।४-५।
• तदनन्तर श्रीकृष्ण से साक्षात भगवान नारायण का प्रादुर्भाव हुआ जिनकी अंग-कान्ति श्याम थी वे नित्य तरुण पीताम्बर धारी तथा वनमाला से विभूषित थे। उनकी चार भुजाऐं थीं, उन्होंने अपने हाथ में क्रमशः शञ्ख, चक्र, गदा, और पद्म धारण कर रखे थे।६-७।
आविर्बभूव तत्पश्चादात्मनो वामपार्श्वतः।
शुद्धस्फटिकसङ्काशः पञ्चवक्त्रो दिगम्बरः।। १८।
तत्पश्चात परमात्मा श्रीकृष्ण के वामपार्श्व से भगवान शिव प्रकट हुए। उनकी अंककान्ति शुद्ध स्फटिकमणि के समान निर्मल एवं उज्जवल थी। उनके पाँच मुख थे और दिशाऐं ही उनके लिए वस्त्र थीं अर्थात् वे निर्वस्त्र थे।१८।
आविर्वभूव तत्पश्चात्कृष्णस्य नाभिपङ्कजात्।
महातपस्वी वृद्धश्च कमण्डलुकरो वरः।३०।
शुक्लवासाः शुक्लदन्तः शुक्लकेशश्चतुर्मुखः।
योगीशः शिल्पिनामीशः सर्वेषां जनको गुरुः।३१।
• तत्पश्चात श्री कृष्ण के नाभि कमल से बड़े- बूढ़े महातपस्वी ब्रह्माजी प्रकट हुए। उन्होंने अपने हाथ में कमण्डलु लिया था। उनके वस्त्र, दाँत और केश सभी श्वेत (सफेद) थे। और उनके चार मुख थे। ३०-३१।
फिर सृष्टि- सर्जन के उसी क्रम में ब्रह्मा, शिव नारायण आदि की उत्पत्ति के समय ही गोपों (आभीरों) की भी उत्पत्ति हुई। जिसकी पुष्टि- ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय-(5) के श्लोक संख्या- २५, (४० और ४२) से होती है, जिसमें लिखा गया है कि -
"आविर्बभूव कन्यैका कृष्णस्य वामपार्श्वतः।
धावित्वा पुष्पमानीय ददावर्घ्यं प्रभोः पदे।२५।
तस्या राधायाश्च लोमकूपेभ्यः सद्योगोपाङ्गनागणः।
आविर्बभूव रूपेण वेशेनैव च तत्समः।४०।
कृष्णस्य लोमकूपेभ्यः सद्यो गोपगणो मुने।
आविर्बभूव रूपेण वेषेणैव च तत्समः।४२।
अनुवाद -
गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण के वाम-पार्श्व से वामा के रूप में एक कामनाओं की प्रतिमूर्ति- प्रकृति रूपा कन्या उत्पन्न हुई जो कृष्ण के ही समान किशोर-वय थी।२५।
• फिर तो उस किशोरी अर्थात् श्रीराधा के रोमकूपों से तत्काल ही अनेक गोपांगनाओं की उत्पत्ति हुई; जो रूप और वेष में राधा के ही समान थीं। ४०।
• उसी क्षण श्रीकृष्ण के रोमकूपों से भी अनेक गोप-गणों का आविर्भाव हुआ जो रूप और वेष रचना में श्रीकृष्ण के ही समान थे।४२।
इसी तरह से गोपों की उत्पत्ति के बारे में श्रीमद्देवी भागवत पुराण के नवम् स्कन्ध अध्याय-(२) के श्लोक- ६०-६१ में लिखा गया है कि -
अथगोलोकनाथस्य लोमनां विवरतो मुने।
भूताश्चासंख्यगोपाश्च वयसा तेजसा समाः।। ६०
रुपेण च गुणेनैव बलेन विक्रमेण च।
प्राणतुल्यप्रियाः सर्वे भभूवः पार्षदा विभोः।। ६१
अनुवाद- ६०-६१
हे मुने ! गोलोकनाथ श्रीकृष्ण के रोमकूपों (कोशिकाओं) से असंख्य गोपगण प्रकट हुए, जो वय, तेज, रुप, गुण, बल तथा पराक्रम में उन्हीं के समान थे। वे सभी परमेश्वर श्रीकृष्ण के प्राणों के समान प्रिय पार्षद बन गये।
गोपों यानी यादवों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में भगवान श्रीकृष्ण भू-तल पर उस समय कहें हैं- जब वे स्वयं भूतल पर गोप जाति के यदुवंश के अन्तर्गत वृष्णि कुल में अवतरित होते थे। और कुछ समय पश्चात कंस का वध करके मथुरा के सिंहासन पर पुन: कंस के पिता उग्रसेन को अभिषिक्त करते हैं। और इसके कुछ समय पश्चात उग्रसेन भगवान श्रीकृष्ण से राजसूय यज्ञ के आयोजन का परामर्श करते हैं।। उसी प्रसंग के क्रम में स्वयं श्रीकृष्ण उग्रसेन से कहते हैं कि- "सभी यादव मेरे अंश हैं"। श्रीकृष्ण के इस कथन की पुष्टि गर्गसंहिता के विश्वजितखण्ड के अध्याय (२) के श्लोक संख्या- (७) से होती है, जिसमें लिखा गया है कि-
ममांशा यादवाः सर्वे लोकद्वयजिगीषवः॥ जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम्॥७॥
समस्त यादव मेरे ही अंश से प्रकट हुए हैं, और वे लोक,परलोक दोनों को जीतने की इच्छा रखने वाले हैं। वे दिग्विजय के लिये यात्रा करके, शत्रुओं को जीतकर लौट आयेंगे और सम्पूर्ण दिशाओं से आपके लिये भेंट और उपहार लायेंगे।
विशेष- गोप और गोपियाँ श्रीकृष्ण और श्रीराधा के समरूप इसलिए थे, क्योंकि इनकी उत्पत्ति श्रीकृष्ण और श्रीराधा की सूक्ष्मतम इकाई (कोशिका) अर्थात उनके क्लोन से हुई हैं। इसलिए सभी गोप श्रीकृष्ण के समरूप तथा सभी गोपियों श्रीराधा के समरूप उत्पन्न हुईं हैं। इस बात को आज विज्ञान भी स्वीकारता है कि- समरूपण अर्थात क्लोनिंग विधि से उत्पन्न जीव उसी के समरूप होता है, जिससे उसकी क्लोनिंग की गई होती है। और विज्ञान के इसी समरूपण सिद्धान्त से परमेश्वर श्रीकृष्ण और श्रीराधा ने पूर्व काल में ही अपनी सूक्ष्मतम इकाइयों से समरूपण विधि द्वारा गोलोक में गोप-गोपियों की उत्पत्ति कीं थीं।
अतः स्पष्ट होता है प्रथम सर्जनकर्ता परमेश्वर श्रीकृष्ण ही है। उन्होंने अपनी प्रथम सृष्टि रचना में नारायण, शिव, ब्रह्मा आदि देवताओं की उत्पत्ति के साथ ही गोप और गोपियों की भी उत्पत्ति की है। इस लिए उत्पत्ति विशेष के कारण गोप और गोपियाँ ब्रह्मा के जन्म के समय से सृष्टि में उसी तरह से विद्यमान है जैसे ब्रह्मा, नारायण और शिव विद्यमान हैं। अतः यहाँ यह भी सिद्ध होता है कि गोप ब्रह्मा जी की सृष्टि रचना के भाग नहीं हैं। चूँकि गोप यानी यादव विष्णु (श्रीकृष्ण) से उत्पन्न हैं इसलिए इनका वर्ण "वैष्णव" हैं। यह ध्रुव सत्य है। जिसकी पुष्टि आगे स्वतः हो जाएगी।
(2) दूसरी सृष्टि रचना ब्रह्मा जी द्वारा-
गोलोक में जब भगवान श्रीकृष्ण ब्रह्मा, नारायण, शिव तथा देवों की उत्पत्ति कर लेते हैं, उसके पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ब्रह्माजी को बुलाकर उनके कर्म- एवं दायित्वों को निश्चित करते हुए ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्म खण्ड के अध्याय-(६ ) के श्लोक संख्या-(७१) और-(७२) में कहते हैं-
"मदीयं च तपः कृत्वा दिव्यं वर्षसहस्रकम् ।
सृष्टिं कुरु महाभाग विधे नानाविधां पराम् ।७१।
इत्युक्त्वा ब्रह्मणे कृष्णो ददौ मालां मनोरमाम्।
जगाम सार्द्धं गोपीभिर्गोपैर्वृन्दावनं वनम् ।७२।
अनुवाद- 71-72
• महाभाग विधे ! अर्थात ब्रह्माजी ! तुम सहस्र दिव्य वर्षों तक मेरी प्रसन्नता के लिए तप करके नाना प्रकार की उत्तम सृष्टि करो।
• ऐसा कह कर श्रीकृष्ण ने ब्रह्माजी को एक मनोरमा माला दी। फिर गोप- गोपियों के साथ वे नित्य नूतन दिव्य वृन्दावन में चले गए।
(ध्यान रहे गोलोक में भी वृन्दावन है। यहाँ उसी वृन्दावन का वर्णन है )
इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण का आदेश पाकर ब्रह्माजी विविध प्रकार की उत्तम सृष्टि रचना का कार्य प्रारम्भ करते हैं। जिसकी पुष्टि- ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय-५ के श्लोक -१२ से १७ में भी होती है
जो इस प्रकार है-
"ब्राह्मवाराहपाद्माश्च त्रयः कल्पा निरूपिताः।
कल्पत्रये यथा सृष्टिः कथयामि निशामय।१२।
"ब्राह्मे च मेदिनीं सृष्ट्वा स्रष्टा सृष्टिं चकार सः।
मधुकैटभयोश्चैव मेदसा चाज्ञया प्रभोः।१३।
"वाराहे तां समुद्धृत्य लुप्तां मग्नां रसातलात् ।
विष्णोर्वराहरूपस्य द्वारा चातिप्रयत्नतः।१४।
"पाद्मे विष्णोर्नाभिपद्मे स्रष्टा सृष्टिं विनिर्ममे ।
त्रिलोकीं ब्रह्मलोकान्तां नित्यलोकत्रयं विना।१५।
'एतत्तु कालसंख्यानमुक्तं सृष्टिनिरूपणे।
किंचिन्निरूपणं सृष्टे किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।१६।
"अतः परं किं चकार भगवान्सात्वतांपतिः।
एतान्सृष्ट्वा किं चकार तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ।१७।
अनुवाद -( १२ से १७ ) तक-
ब्रह्मकल्प में मधु-कैटभ के मेद (चर्बी) से मेदिनी (पृथ्वी) की सृष्टि करके स्रष्टा ने भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा ले सृष्टि रचना की थी। फिर वाराहकल्प में जब पृथ्वी एकार्णव के जल में डूब गई थी, तब वाराहरूपधारी भगवान विष्णु के द्वारा अत्यन्त प्रयत्न पूर्वक रसातल से उसका उद्धार करवाया और सृष्टि रचना की।
तत्पश्चात पाद्मकल्प में सृष्टि- कर्ता ब्रह्मा ने विष्णु के नाभि- कमल पर सृष्टि का निर्माण किया। ब्रह्मलोक पर्यन्त जो त्रिलोकी (तीन लोक) हैं उसकी रचना की। किन्तु उसके ऊपर जो नित्य तीन लोक (शिवलोक, वैकुण्ठलोक, और उससे भी ऊपर गोलोक है ) उसकी रचना ब्रह्मा ने नहीं की।
कुल मिलाकर ब्रह्मा जी सभी की सृष्टि करते हैं किन्तु उनकी भी कुछ मर्यादाऐं हैं- जैसे वे सत्य सनातन एवं चिर-स्थाई- वैकुण्ठ लोक, शिवलोक, और सबसे ऊपर गोलोक और उसमें रहने वाले गोप और गोपियों की सृष्टि नहीं करते।
क्योंकि गोप और गोपियों की उत्पत्ति तो भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराधा के रोम-कूपों से उसी समय हो जाती है जिस समय नारायण, शिव और ब्रह्मा की उत्पत्ति होती है। तो ऐसे में ब्रह्माजी, गोपों की उत्पत्ति दुबारा (पुनः) कैसे कर सकते हैं ?
ब्रह्मा जी की सृष्टि रचना की विशेषताएँ-
(१)- श्रीकृष्ण की प्रथम सृष्टि सृजन के बाद गोपेश्वर श्रीकृष्ण के आदेश पर ब्रह्माजी विविध प्रकार की उत्तम सृष्टि रचना का कार्य किया इसलिए ब्रह्माजी को द्वितीयक सृष्टि रचनाकार भी कहा जाता है, जिसमें ब्रह्माजी अपनी मर्यादा में रहकर ही सृष्टि की रचना किया। जिसमें वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अनन्त लोकों की रचना करते हुए उनमें जड़, जीव, जगत इत्यादि की सुन्दर रचना करते हैं। उसी क्रम में ब्रह्मा जी मानवीय सृष्टि के चातुर्यवर्णों की भी रचना की है। जिसमे- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों की सामाजिक स्थितियाँ बनी है। किन्तु ब्रह्माजी सबसे ऊपर वाले गोलोक और उससे क्रमशः नीचे स्थित शिव लोक और वैकुण्ठ लोक तथा गोप और गोपियों की सृष्टि रचना नहीं करते हैं। यहीं कारण है कि गोपों को ब्रह्माजी की सृष्टि रचना का भाग नहीं माना जाता है। इन सभी बातों को प्रमाण सहित पहले ही बता दिया गया है ताकि किसी को किसी प्रकार का संशय न रह जाए। क्योंकि हम आगे ब्रह्मा जी की
सृष्टि रचना की मनुवादी व्यवस्था के उपरान्त गोपेश्वर श्रीकृष्ण की उस वैष्णवी व्यवस्था के बारे में बताऊँगा जिसके प्रवर्तक चंद्रवंशी अहीर सम्राट पुरुरवा हैं।
(2)- ब्रह्मा जी अपनी मानवीय सृष्टि रचना में चार वर्ण- (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों) की रचना की। जिसके परिणामस्वरूप मानव समाज में चार तरह की सामाजिक स्थितियाँ बनी है। इसी समाजिक स्थिति को मनुवादी व्यवस्था कहा जाता है। इस व्यवस्था के प्रथम प्रवर्तक महाराज मनु थे जो ब्रह्मा जी के शरीर के दाएँ भाग से तथा उनकी पत्नी शतरूपा ब्रह्मा जी के बाएँ भाग से प्रकट हुई थीं। फिर ब्रह्मा जी की अगली सृष्टि रचना में यहीं मनु, सूर्य (विवस्वान) के पुत्र हुए। इस लिए उनको वैवस्वत मनु कहा गया। इसी मनु महाराज को ब्राह्मी व्यवस्था के अन्तर्गत सूर्यवंश के प्रथम सम्राट, सूर्यवंश के प्रथम देवता और रक्षक इत्यादि सबकुछ माना गया है।
ब्रह्मा जी की सृष्टि रचना में हर मन्वंतर में अलग अलग मनु होते हैं। इस समय सातवें मनु: वैवस्वत मनु (वर्तमान मनु) हैं जो वर्तमान मन्वंतर के अधिपति हैं। इस वैवस्वत मनु के 10 पुत्र थे, उन्हीं से सूर्यवंश का आरम्भ मना जाता है। उनके नाम इस प्रकार हैं- नृग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यंत, दिष्ट (नाभानेदिष्ट), करुष, पृषध्र, नभग, कवि (या प्रांशु)।
मनु की एक पुत्री भी थी जिसका नाम इला (सुद्युम्न) था। जिसके बारे में हम पहले ही बता चुका हूँ कि- वह न तो स्त्री था और न ही पुरुष, फिर भी वह सूर्यपुत्र मनु के पुत्रों से ही सम्बन्धित था। कहने का मतलब यह है कि सूर्य पुत्र मनु का पुत्र ही सुद्युम्न और इला दोनों ही था, जो एक माह के लिए स्त्री और एक माह के लिए पुरुष हो जाया करता था। उसी एक माह के स्त्रित्व काल में उसने पुरुरवा को जन्म दिया। इस बात को भी हम पहले ही बता चुका हूँ।
और इस बात को भी सदैव के लिए याद कर लीजिए कि- इसी एक माह की स्त्री वाली मनगढ़ंत कहानी से चंद्रवंशी अहीर सम्राट पुरुरवा को ब्रह्मा जी की सृष्टि रचना की सूर्यवंश की मनुवादी व्यवस्था में शास्त्रीय षड्यंत्र द्वारा घसीट लिया गया।
जबकि पूरुरवा और उसकी पत्नी उर्वशी दोनों ही वैष्णव वर्ण की अभीर जाति से सम्बन्धित थे। जिनका साम्राज्य भूलोक से स्वर्गलोक तक था। इन दोनों को वैष्णव वर्ण के अहीर (गोप) जाति से सम्बन्धित होने की पुष्टि- सर्वप्रथम ऋग्वेद के दशम मण्डल के (९५) वें सूक्त की ऋचा- (३) से होती है, जो पुरूरवा-उर्वशी संवाद के रूप में है। जिसमें पुरूरवा के विशेषण गोष (घोष-गोप) तथा गोपीथ हैं। नीचे सन्दर्भ देखें-
"इषुर्न श्रिय इषुधेरसना गोषाः शतसा न रंहिः।
अवीरे क्रतौ वि दविद्युतन्नोरा न मायुं चितयन्त धुनयः॥३।।
(ऋग्वेद-10/95/3)
अर्थानुवाद: हे गोपिके ! तेरे सहयोग के बिना- तुणीर से फेंका जाने वाला बाण भी विजयश्री में समर्थ नहीं होता। (गोषाः शतसा) मैं सैकड़ो गायों का सेवक तुझ भार्या उर्वशी के सहयोग के बिना वेगवान भी नहीं हूँ। (अवीरे) हे आभीरे ! विस्तृत कर्म में या संग्राम में भी अब मेरा वेग (बल) प्रकाशित नहीं होता है। और शत्रुओं को कम्पित करने वाले मेरे सैनिक भी अब मेरे आदेश (वचन अथवा हुंक्कार) को नहीं मानते हैं।३।
ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचा का हम नीचे संस्कृत भाष्य हिन्दी अनुवाद सहित प्रस्तुत कर रहे हैं।
भाष्य- हिन्दी अनुवाद सहित-
"अनया उर्वश्या प्रति पुरूरवाः स्वस्य विरहजनितं वैक्लव्यं ब्रूते।
अर्थात् उस उर्वशी के प्रति पुरूरवा अपनी विरह जनित व्याकुलता को कहता है-
“इषुधेः। इषवो धीयन्तेऽत्रेतीषुधिर्निषङ्गः = (इषुधि पद का पञ्चमी एक वचन का रूप इषुधे:= तीरकोश से)
इषु:- (वाण) धारण करने वाला निषंग या तीरकोश। इषुधि)
ततः सकाशात् “इषुः= (उसके पास से वाण) “असना असनायै= प्रक्षेप्तुं न भवति=(फेंकने के लिए नहीं होता)। “श्रिये = विजयार्थम्। (विजयश्री के लिए) त्वद्विरहाद्युद्धस्य बुद्ध्वावप्यनिधानात्। (तेरे विरह से युद्ध का बोध करके भी विना निधान (सहारे) के द्वारा तथा “रंहिः= वेगवानहं= (मैं वेगवान्/ बलवान्) नहीं होता। “गोषाः = गोसेवका:( गवां संभक्ता:) =(गायों का भक्त- सेवक) "न अभवम्- भू धातु रूप - कर्तरि प्रयोग लङ् लकार परस्मैपद उत्तम पुरुष एकवचन- (मैं न हुआ) तथा “शतसाः शतानामपरिमितानां गवां संभक्ता नाभवम्। अर्थात्- (मैं सैकड़ों गायों का सेवक सामर्थ्य वान न हो सका)। किञ्च= और तो क्या“ अवीरे = अभीरे ! हे गोपिके ! वा हे आभीरे “क्रतौ = यज्ञे कर्मणि वा सति “
“न “वि “द्विद्युतत्= न विद्योतते मत्सामर्थ्यम्। (यज्ञ या कर्म में भी मेरी सामर्थ्य अब प्रकाशित नहीं होती।) किञ्च संग्रामे धुनयः = कम्पयितारोऽस्मदीया भटाः =(और तो क्या युद्ध में शत्रुओं को कम्पायमान करने वाले मेरे सैनिक भी ) ।
मायुम् = मीयते प्रक्षिप्यत इति मायुः =शब्दः। 'कृवापाजि° - इत्यादिनोण्। सिंहनादं =(मेरी (मायु) हुंक्कार“ न “चितयन्त न बुध्यन्ते वा=(नहीं समझते हैं) ‘चिती संज्ञाने'। अस्माण्णिचि संज्ञापूर्वकस्य विधेरनित्यत्वाल्लघूपधगुणाभावः। छान्दसो लङ्॥
अब हम लोग ऋग्वेद की इस रिचा में आये प्रमुख (दो) शब्दों- "गोषा:" और "अवीरे" की व्याकरणीय व्याख्या करके यह जानेंगे कि इन दोनों शब्दों का वैदिक और लौकिक संस्कृत में क्या अर्थ होता है ? जिसमें पहले "गोषा:" शब्द की व्याकरणीय व्याख्या करेंगे उसके बाद "अवीरे" की।
गोषः शब्द की व्याकरणिक उत्पत्ति-
गोष: = गां सनोति (सेवयति) सन् (षण् ) धातु =संभक्तौ/भक्ति/दाने च) = भक्ति करना दान करना पूजा करना + विट् ङा। सनोतेरनः” पाणिनीय षत्वम् सूत्र ।
अर्थात "गो शब्द में षन् धातु का "ष" रूप शेष रहने पर (गो+षन्)= गोष: शब्द बना - जिसका अर्थ है। गो सेवक अथवा पालक। गोष: का वैदिक रूप गोषा: है।
उपर्युक्त ऋचाओं में गोषन् तथा गोषा: शब्द गोसेवक के वाचक हैं। वैदिक संस्कृत का यही गोषः शब्द लौकिक संस्कृत में घोष हुआ जो कालान्तर में गोप, गोपाल, अहीर, और यादव का पर्यायवाची शब्द बन गया। क्योंकि ये सभी गोपालक थे।
और जग जाहिर है कि सभी पुराण लौकिक संस्कृत में लिखे गए हैं। इस हेतु पुराणों में भी देखा जाए तो वैदिक शब्द "गोषः" लौकिक संस्कृत में "घोष" गोपालक अथवा अहीर जाति के लिए ही प्रयुक्त होता है अन्य किसी जाति के लिए नहीं। अतः घोष शब्द पुरूरवा के गोप, गोपालक और अहीर होने की पुष्टि करता है।
इसके अतिरिक्त श्रीमद्भागवत महापुराण के नवम-स्कन्ध के प्रथम अध्याय के श्लोक संख्या-(४२) से भी पुष्टि होती है कि पुरूरवा गोप (गोपालक) थे -
"ततः परिणते काले प्रतिष्ठानपतिः प्रभुः।
पुरूरवस उत्सृज्य गां पुत्राय गतो वनम्॥४२।
अनुवाद:- उसके बाद समय बीतने पर प्रतिष्ठान पुर का अधिपति अपने पुत्र पुरूरवा को गो-समुदाय देकर वन को चला गया।४२।
उपर्युक्त श्लोक में गाम्- संज्ञा पद गो शब्द का ही द्वितीया कर्म कारक रूप है। यहाँ गो पद - गायों के समुदाय का वाचक है।
अतः उपरोक्त श्लोक से सिद्ध होता है कि वैदिक ऋचाओं में गोष: (घोष) शब्द का पूर्व रूप ही है। जिसका अर्थ वैदिक और लौकिक संस्कृत में - गायों का दान करने वाला तथा गोसेवा करने वाला होता है।
पुरूरवा को धर्मवत्सल तथा सम्पूर्ण भू-तल का एक क्षत्र सम्राट होने और उसकी दिनचर्या इत्यादि के बारे में हरिवंश पुराण के हरिवंशपर्व के अध्याय- (२६) के निम्नलिखित श्लोकों में बहुत कुछ लिखा गया है-
"ब्रह्मवादी पराक्रान्तः शत्रुभिर्युधि दुर्जयः।
आहर्ता चाग्निहोत्रस्य यज्ञानां च महीपतिः।।२।
सत्यवादी पुण्यमतिः काम्यः संवृतमैथुनः।
अतीव त्रिषु लोकेषु यशसाप्रतिमस्तदा।।३।
तं ब्रह्मवादिनं क्षान्तं धर्मज्ञं सत्यवादिनम् ।
उर्वशी वरयामास हित्वा मानं यशस्विनी।।४।
तया सहावसद् राजा वर्षाणि दश पञ्च च।
पञ्च षट्सप्त चाष्टौ च दश चाष्टौ च भारत।।५।
वने चैत्ररथे रम्ये तथा मन्दाकिनीतटे।
अलकायां विशालायां नन्दने च वनोत्तमे।। ६।
उत्तरान् स कुरून् प्राप्य मनोरथफलद्रुमान्।
गन्धमादनपादेषु मेरुपृष्ठे तथोत्तरे।। ७।
एतेषु वनमुख्येषु सुरैराचरितेषु च।
उर्वश्या सहितो राजा रेमे परमया मुदा।। ८।
देशे पुण्यतमे चैव महर्षिभिरभिष्टुते।
राज्यं च कारयामास प्रयागं पृथिवीपतिः।। ९।
अनुवाद- २-९
• वह ब्रह्मज्ञान का ज्ञाता और शक्तिशाली था और शत्रु उसे युद्ध में हरा नहीं पाते थे। उस राजा ने अपने घर में सदैव अग्नि जलाई और अनेक यज्ञ किये। २।
• वह सच्चा, धर्मनिष्ठ और अत्यधिक सुन्दर था। उसका अपनी यौन-भूख( कामवासना) पर पूरा नियंत्रण था। उस समय तीनों लोकों में उनके समान तेज वाला कोई नहीं था। ३।
• अपना अभिमान त्यागकर यशस्विनी उर्वशी ने ब्रह्मज्ञान से परिचित क्षमाशील तथा धर्मनिष्ठ राजा को अपने पति के रूप में चुना। ४।
• राजा पुरुरवा दस साल तक आकर्षक चैत्ररथ उद्यान में, पाँच साल तक मन्दाकिनी नदी के तट पर , पाँच साल तक अलका शहर में , छह साल तक वद्रिका के जंगल आदि स्थानों में उर्वशी के साथ रहे।
सर्वोत्तम उद्यान नन्दन में सात वर्षों तक, उत्तर कुरु प्रान्त में आठ वर्षों तक जहाँ पेड़ इच्छानुसार फल देते हैं, गन्धमादन पर्वत की तलहटी में दस वर्षों तक और उत्तरी सुमेरु के शिखर पर आठ वर्षों तक फल देते हैं। ५-७।
• देवताओं द्वारा आश्रयित इन सबसे सुन्दर उद्यानों में राजा पुरुरवा ने उर्वशी के साथ सबसे अधिक प्रसन्नतापूर्वक आनन्द से रमण किया। ८।
• पृथ्वीपति पुरूरवा (उर्वशी के साथ) महर्षियों से प्रशंसित परम पवित्र देश प्रयागराज में राज्य करते थे। ९।
इस प्रकार से सिद्ध होता है कि अहीर पुरूरवा भू-तल का प्रथम ऐतिहासिक प्रजापालक सम्राट था। जिसने अपने तपोबल एवं बाहुबल से स्वर्ग लोक को भी जीत कर इन्द्र पद को प्राप्त किया। अहीर पुरुरवा अपनी पत्नी उर्वशी के साथ बहुत दिनों तक भू-तल पर सुखपूर्वक रहा।
अतः उपर्युक्त सभी संदर्भों से सिद्ध होता है कि चंद्रवंश का प्रथम सम्राट पुरुरवा अहीर जाती का ही था।
किन्तु आश्चर्य इस बात है कि- पुराण कारों ने शास्त्रीय खड्यंत्र करके विराट विष्णु (श्रीकृष्ण) से उत्पन्न वैष्णव वर्ण के प्रथम चंद्रवंशी अहीर सम्राट पुरुरवा को ब्रह्मा जी की सृष्टि रचना की मनुवादी व्यवस्था के अन्तर्गत मनु के एक ऐसे काल्पनिक पुत्र सुद्युम्न (इला) से उत्पन्न कराया जो एक माह के लिए स्त्री और एक माह के लिए स्त्री हो जाया करता था। अब आप लोग स्वयं विचार करिए कि यह शास्त्रीय खड्यंत्र के अतिरिक्त और क्या हो सकता है ?
इस सम्बन्ध में गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज का कथन है कि " आज के वैज्ञानिक युग में इस तरह की बेतुकी और निराधार बातों पर कोई विश्वास नहीं कर सकता। यदि कोई करता भी होगा, तो वह इस लोक नहीं किसी दूसरे लोक का प्राणी होगा, या फिर मानसिक रूप से विक्षिप्त होगा।"
विशेष - ध्यान रहे राजा पुरुरवा इतना प्राचीनतम् है कि उसके समय में यादव वंश का उदय नहीं हुआ था। उस समय उसकी पहचान केवल गोप (अहीर) जाती से ही थी। इसी अहीर पुरुरवा और उसकी पत्नी अहिराणी उर्वशी से आगे चलकर महान यादव वंश का उदय हुआ। जिसको आगे बताया गया है। पूरूरवा को और अच्छी तरह से समझने के लिए उसकी पत्नी उर्वशी को भी जानना होगा तभी पूरी बात समझ में आयेगी।
उर्वशी का परिचय -
उर्वशी भी पूर्व काल की एक धन्या और मान्या अहीर कन्या थी। जो कभी अपने तपोबल से स्वर्ग की अप्सराओं की अधिश्वरी हुई। इस ऐतिहासिक अहीर कन्या के धन्या और मान्या होने की पुष्टि उस समय होती है, जब परमेश्वर श्रीकृष्ण प्रमुख विभूतियों की तुलना करते हुए ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्रीकृष्णजन्मखण्ड के अध्याय- ७३ में कहते हैं-
वेदाश्च सर्वशास्त्राणां वरुणो यादसामहम् ।
उर्वश्यप्सरसामेव समुद्राणां जलार्णवः ।७०।
अनुवाद:- मैं सभी शास्त्रों में वेद हूँ समुद्र के प्राणीयों में वरुण हूँ। अप्सराओं में उर्वशी हूँ। समुद्रों में जलार्णव हूँ।७०।
वास्तव में उर्वशी एक अहीर कन्या ही थी इस बात की पुष्टि- ऋग्वेद की ऋचा- 10/95/3 से होती है जिसमें उसके पति पुरुरवा द्वारा उसके लिए अवीरे शब्द से सम्बोधन हुआ है।
"इषुर्न श्रिय इषुधेरसना गोषाः शतसा न रंहिः।
अवीरे क्रतौ वि दविद्युतन्नोरा न मायुं चितयन्त धुनयः॥३।।
इस ऋचा में आये सम्बोधन पद- 'अवीरे' की व्याकरणीय व्याख्या करके जानेंगे कि "अवीरे" शब्द का वैदिक और लौकिक संस्कृत तथा अपभ्रंश भाषा, पालि आदि भाषाओं में क्या रूप और अर्थ होता है ?
वास्तव में देखा जाए तो उपरोक्त ऋचा में उर्वशी का सम्बोधन अवीरे ! है, जो लौकिक संस्कृत के अभीरा शब्द का ही वैदिक पूर्व रूप है। लौकिक संस्कृत में अभीर तथा आभीर दो रूप परस्पर एक वचन और बहुवचन (समूह-वाची) हैं।
वैदिक भाषा का एक नियम है कि उसमें उपसर्ग कभी भी क्रियापद और संज्ञापद के साथ नहीं आते हैं। इसलिए ऋग्वेद में आया हुआ अवीरे सम्बोधन-पद मूल तद्धित विशेषण शब्द है-
(अवीर=(अवि+ईर्+अच्)= अवीर: की स्त्रीलिंग रूप अवीरा है, जो सम्बोधन काल में अवीरे ! हो जाता है।)
अत: अवीरा शब्द ही लौकिक संस्कृत में अभीरा हो गया और यही अभीर तथा समूह वाची रूप आभीर प्राकृत, अपभ्रंश आदि भाषाओं में अहीर तथा आहीर हो गया। यह सब कैसे हुआ ? यह नींचे सन्दर्भ देखें-
वैदिक अवीर शब्द की व्युत्पत्ति ( अवि = गाय, भेड़ आदि पशु + ईर:= चराने वाला। हाँ करने वाला , निर्देशन करने वाला, के रूप में हुई है। परन्तु यह व्युत्पत्ति एक संयोग मात्र ही है। क्योंकि अवीरा शब्द की व्युत्पत्ति ऋग्वेद में प्राप्त लौकिक अवीरा शब्द की व्युत्पत्ति से अलग ही है।
वैदिक ऋचा में अवीर (अवि+ ईर:) शब्द दीर्घ सन्धि के रूप में तद्धित पद है। जबकि लौकिक संस्कृत में अवीर (अ + वीर) के रूप में वीर के पूर्व में अ (नञ्) निषेधवाची उपसर्ग लगाने से बनता है। वैदिक भाषा नें लौकिक संस्कृत भाषा सी व्याकरणिक प्रक्रिया अमान्य ही है।
परन्तु कुछ लोग इसी कारण इसका अर्थ- "जो वीर न हो" निकालते हैं। किन्तु यह ग़लत है क्योंकि उर्वशी के लिए इस अर्थ में अवीरा शब्द अनुपयुक्त व सिद्धान्त विहीन ही है। अत: अवीरा शब्द को अवि + ईरा के रूप में ही सही माना जाना चाहिए। क्योंकि अवीर शब्द का मूल सहचर हिब्रू भाषा का अबीर (अवीर) शब्द है। जो ईश्वर का एक नाम भी है। हिब्रू भाषा में अबीर का अर्थ वीर ही होता है। वास्तव में देखा जाए तो वैदिक और लौकिक संस्कृत भाषा में अवीर तथा अभीर शब्द अहीरों की पशुपालन वृत्ति (व्यवसाय) के साथ साथ अहीरों की वीरता प्रवृत्ति को भी सूचित करता है। वीर शब्द ही सम्प्रसारित होकर आर्य बन गया। इस सम्बन्ध में विदित हो आर्य शब्द प्रारम्भिक काल में पशुपालक तथा कृषक का ही वाचक था।
अवीर शब्द का विकास क्रम-
यदि अवीर शब्द का विकास क्रम देखा जाए तो-
वैदिक कालीन अवीर शब्द ईसापूर्व सप्तम सदी के आस-पास गाय भेड़ बकरी पालक के रूप में प्रचलित था।
यह वीर अहीरों का वाचक था। परन्तु कालान्तर में ईसापूर्व पञ्चम सदी के समय यही अवीर शब्द अभीर रूप में प्रचलन में रहा और इसी अभीर का समूह वाची अथवा बहुवचन रूप आभीर हुआ जो अहीरों की वीरता प्रवृत्ति का सूचक रहा इसी समय के शब्दकोशकार अमर सिंह ने आभीर शब्द की व्युत्पत्ति अपने अमरकोष में कुछ इस तरह से बतायी है।
आभीरः= पुंल्लिंग (आ समन्तात् भियं राति (आ+भी+ रा + क:) रा=दाने आत इति कः।)
अर्थात जो चारों तरफ से शत्रुओं के हृदय में भय दे या भरे। आभीर- गोपः। इत्यमरःकोश - आभीर प्राकृत भाषा में आहिर हो गया है। अभीर- अभिमुखीकृत्य ईरयति गाः अभि + ईरः अच् । अर्थात् जो सामने मुख करके गायें हाँकता या चराता है।
और आगे कालक्रम से यही आभीर शब्द एक हजार ईस्वी में अपभ्रष्ट पूर्व हिन्दी भाषा के विकास काल में प्राकृत भाषा के प्रभाव से आहीर हो गया। ज्ञात हो कि लौकिक संस्कृत में जो आभीर शब्द प्रयुक्त होता है उसका तद्भव रुप आहीर होता है।
दूसरी बात यह कि- ऋग्वेद में गाय चराने या हाँकने के सन्दर्भ में ईर् धातु का क्रियात्मक लट्लकार अन्य पुरुष एक वचन का रूप ' ईर्ते ' विद्यमान है। जैसे -
'रुशद्- ईर्त्ते पयो गोः ”प्रकाशित होती हुई दूध वाली गाय करती है। (ऋग्वेद-9/91/3 )
यह तो सर्वविदित है कि- "उर्वशी गाय और भेड़ें पालती थी। आभीर कन्या होने के नाते भी उसका इन पशुओं से प्रेम स्वाभाविक ही था। इस बात की भी पुष्टि- देवी भागवत पुराण के प्रथम स्कन्ध के अध्याय- (१३) के श्लोक- संख्या-(८) से होती है कि उर्वशी के पास दो भेंड़े भी थीं।
"समयं चेदृशं कृत्वा स्थिता तत्र वराङ्गना ।
एतावुरणकौ राजन्न्यस्तौ रक्षस्व मानद ॥८।
अनुवाद -वह वरांगना इस प्रकार की शर्त रखकर वहीं रहने लगी। उसने पुरूरवा से कहा - हे राजन ! यह दोनों भेंड़ के बच्चे मैं आपके पास धरोहर के रूप में रखती हूँ।
✴️ ध्यान रहे अमरकोश - 2/9/76/2/3 - भेंड़ के पर्याय निम्नांकित बताए गए हैं। "उरण पुं। मेषः"
समानार्थक- मेढ्र,उरभ्र,उरण,ऊर्णायु,मेष,वृष्णि,एडक,अवि।
अतः सिद्ध होता है कि उर्वशी के पास दो भेंड़ के बच्चे थे।
कुछ समय बाद उर्वशी के दोनों भेड़ के बच्चों के साथ एक घटना घटी जिसमें इन्द्र के कहने पर गन्धर्वों ने उर्वशी के दोनों भेंड़ के बच्चों को चुरा कर आकाश मार्ग से ले जाने लगे, तब दोनों भेंड़ के बच्चे जोर-जोर से चिल्लाने लगे। इस घटना का वर्णन श्रीमद् देवी भागवत पुराण के प्रथम स्कन्ध के अध्याय- (१३) के श्लोक - १७ से २० में कुछ इस प्रकार लिखा हुआ मिलता है।
इत्युक्तास्तेऽथ गन्धर्वा विश्वावसुपुरोगमाः।
ततो गत्वा महागाढे तमसि प्रत्युपस्थिते॥१७।।
जह्रुस्तावुरणौ देवा रममाणं विलोक्य तम्।
चक्रन्दतुस्तदा तौ तु ह्रियमाणौ विहायसा॥१८।।
उर्वशी तदुपाकर्ण्य क्रन्दितं सुतयोरिव।
कुपितोवाच राजानं समयोऽयं कृतो मया॥ १९।।
नष्टाहं तव विश्वासाद्धृतौ चोरैर्ममोरणौ।
राजन्पुत्रसमावेतौ त्वं किं शेषे स्त्रिया समः॥२०।।
अनुवाद- १७-२०
• तब इन्द्र के ऐसा कहने पर विश्वावसु आदि प्रधान गन्धर्वों ने वहाँ से जाकर रात्रि के घोर अन्धकार में राजा पुरुरवा को बिहार करते देख उन दोनों भेंड़ों को चुरा लिया तब आकाश मार्ग से जाते हुए चुराए गए वे दोनों भेंड़ जोर से चिल्लाने लगे। १७-१८।
• अपने पुत्र के समान पाले हुए भेड़ों का क्रन्दन सुनते ही उर्वशी ने क्रोधित होकर राजा पुरूरवा से कहा- हे राजन ! मैंने आपके सम्मुख जो पहली शर्त रखी थी, वह टूट गई आपके विश्वास पर मैं धोखे में पड़ी, क्योंकि पुत्र के समान मेरे प्रिय भेंड़ों को चोरों ने चुरा लिया फिर भी आप घर में स्त्री की तरह शयन कर रहे हैं।१९-२०।
अतः इन उपरोक्त श्लोक से सिद्ध होता है कि पुरूरवा और उर्वशी दोनों पशुपालक अहीर जाति से सम्बन्धित थे।
उर्वशी को अहिर कन्या होने की पुष्टि- मत्स्यपुराण- के (६९) वें अध्याय के श्लोक- ६१-६२ से भी होती है। जिसमें उर्वशी के द्वारा "कल्याणिनी" नामक कठिन व्रत का अनुष्ठान करने का प्रसंग है। इसी प्रसंग में भगवान श्री कृष्ण भीम से कल्याणिनी व्रत के बारे में कहते हैं कि -
"त्वा च यामप्सरसामधीशा वैश्याकृता ह्यन्यभवान्तरेषु।
आभीरकन्यातिकुतूहलेन सैवोर्वशी सम्प्रति नाकपृष्ठे॥ ६१
जाताथवा वैश्यकुलोद्भवापि पुलोमकन्या पुरुहूतपत्नी।
तत्रापि तस्याः परिचारिकेयं मम प्रिया सम्प्रति सत्यकामा॥६२
अनुवाद- ६१-६२
जन्मान्तर में एक अहीर की कन्या ने अत्यन्त कुतूहलवश इस व्रत का अनुष्ठान किया था, जिसके फलस्वरूप वह वैश्य पुत्री अप्सराओं की अधीश्वरी हुई। वही इस समय स्वर्गलोक में उर्वशी नाम से विख्यात है। ६१।
• इसी प्रकार इसी वैश्यकुल में उत्पन्न हुई एक दूसरी कन्या ने भी इस व्रत का अनुष्ठान किया था, जिसके परिणामस्वरूप वह पुलोम (दानव) की पुत्रीरूप में उत्पन्न होकर इन्द्र की पत्नी बनी। उसके अनुष्ठान काल में जो उसकी सेविका थी, वही इस समय मेरी प्रिया सत्यभामा है। ६२
निष्कर्ष - अतः वैदिक और पौराणिक सभी साक्ष्यों से सिद्ध होता है। कि उर्वशी अहीर कन्या थी। उसके पति का नाम पुरुरवा था वह भी गोप (अहीर) था। उस समय उसके जैसा धर्मवत्सल राजा तीनों लोकों में नहीं था। उन्होंने बहुत काल तक अपनी पत्नी उर्वशी के साथ सुख भोगा।
पुरुरवा और उर्वशी का वंश विस्तार
अब हम लोग यह जानेंगे कि पुरूरवा और उर्वशी से किस नाम के कौन-कौन पुत्र हुए तथा इनका वंश विस्तार कैसे हुआ। जिसमें आप लोग यह भी जान पाएंगे कि इसी अहीर पुरुरवा और अहिराणी उर्वशी से आगे चलकर अहीर जाती के अन्तर्गत यादव वंश का उदय कैसे हुआ।
पुरुरवा और उर्वशी से उत्पन्न पुत्रों का सर्वप्रथम वर्णन हरिवंशपुराण के हरिवंशपर्व के अध्याय -२६ के प्रमुख श्लोकों में मिलता है। जिसमें वैशम्पायनजी जन्मेजय के पूछने पर कहते हैं कि -
"तस्य पुत्रा बभूवुस्ते सप्त देवसुतोपमाः ।
दिवि जाता महात्मान आयुर्धीमानमावसुः।१०।
विश्वायुश्चैव धर्मात्मा श्रुतायुश्च तथापरः ।
दृढायुश्च वनायुश्च शतायुश्चोर्वशीसुताः ।११।
अनुवाद- उनके सातों पुत्र सभी उच्चात्मा थे और दिव्य क्षेत्र में जन्मे देवताओं के पुत्रों के समान थे। उनके नाम- आयु (आयुष) , धीमान , अमावसु , धर्मात्मा विश्वायु , श्रुतायु , दृढायु , वनायु और शतायु थे। इन सभी को उर्वशी ने जन्म दिया था। १०-११।
पुरुरवा के पुत्र आयु (आयुष) के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी इस पुस्तक के अध्याय-7(क/1) में दी गई है। उसको भी इस भाग के साथ जोड़कर अवश्य पढ़ें।
इस प्रकार से आपलोग वैष्णव वर्ण के प्रथम चंद्रवंशी अहीर सम्राट पुरुरवा और उसकी पत्नी अहीर उर्वशी के बारे में जाना। अब इसके अगले क्रम परिशिष्ट कथा (9) में यादव वंश के सम्राट देवमीढ की वंशावली को जानेंगे।
जय श्रीकृष्ण
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