अन्य धर्मों में भी कृष्ण की मान्यता ब्राह्मण धर्म से बाहर- जैन" बौद्ध जातक और बहाई धर्म तक (भाग प्रथम) में हमने संक्षेप में उल्लेख किया -
"बौद्ध धर्म के ग्रन्थों में कृष्ण का अस्तित्व-
अभीर,आभीर, अवर, अफर, अबीर आयर, आयबेरिया, तथा वीर नाम से अहीरों की प्राचीन विभिन्न संस्कृतियों में उपस्थिति -
आहिर आदिमजाति माना जाता है इनको इजरायल में अबीर। अफ्रीका में अफर । तुर्की में अवर। आयरलैंड अथवी आयरिश में आबेरिय । । चीन में "सु" नाम से शोधकर्ताओं ने पहचान किया।
परन्तु इनका मुख्य रूप से हर सभ्यता के साथ तो जिक्र है ही अब्राहमिक( यहूदी ) धर्म और भारतीय धर्म में भी समान जिक्र है। दोनों मुख्य धर्मो के ग्रन्थ को देखा जाय तो समानता है।
यादव की उत्पत्ति पुराणों के अनुसार ययाति से यदु और यदु से यादव वंश की उत्पत्ति हुई । परन्तु प्रश्न उत्पन्न होता है कि यदु वंश किस जाति में उत्पन्न हुआ। भारतीय पुराणों में विशेषत: पद्मपुराण सृष्टि खण्ड में आभीर जाति को सत्युग के प्रारम्भ में उपस्थित माना है । भारतीय पुराणों के अनुसार सभी चारों युगों में आभीर जाति उपस्थित रही है।
यहूदीयों की उत्पत्ति बाइबिल के सृष्टि खण्ड ( जेनेसिस ) अनुसार याकूब से यहूदा और यहूदा से यहूदीयों की उत्पत्ति हुई है।
याकूब इजराएल के नीम से भी जानी जाती है। याकूब से जैकब और हाकि़म जैसे शब्द विकसित हुए। याकूव ही ययाति है।
अब ये यादव यहुदी हैं अथवा यहूदी यादव हैं तो सवाल उठता है ये अहीर कौन है?
हिब्रू बाइबिल में अबीर शब्द शक्तिशाली अथवा बहादुर का विशेषण है।
- ** ईश्वर के लिए विशेषण:** यह ईश्वर की शक्ति और दृढ़ता को व्यक्त करने के लिए एक विशेषण के रूप में प्रयुक्त होता है।
- "अबीर याकूब": जेनेसिस 49:24 में, यह "याकूब का बल" (Mighty One of Jacob) के रूप में आता है, जो ईश्वर को याकूब के संरक्षक और रक्षक के रूप में दर्शाता है।
- ** काव्यात्मक प्रयोग**: इसका उपयोग अक्सर काव्य पंक्तियों में किया जाता है, जो ईश्वर की ताकत और उसकी शक्ति को दर्शाती है।
- उत्पत्ति 49:24: "परन्तु उसका धनुष बना रहा और उसका बाण दृढ़ रहा; उसके हाथों की कलाइयाँ मेरे अबीर-याकूब के हाथों के कारण मज़बूत हो गईं..."।
- भजन 132:2, 5: ईश्वर का उल्लेख "अबीर" के रूप में भी किया जाता है।
- भजन 132:2, 5: ईश्वर का उल्लेख "अबीर" के रूप में भी किया जाता है।
- यशायाह 49:26: ईश्वर की अपनी लोगों पर विजय और बचाव का वर्णन करने के लिए।
यहुदह् को ही यदु कहा गया ...
हिब्रू बाइबिल में यदु के समान यहुदह् शब्द की व्युत्पत्ति
मूलक अर्थ है " जिसके लिए यज्ञ की जाये"
और यदु शब्द यज् --यज्ञ करणे
धातु से व्युत्पन्न वैदिक शब्द है ।
इज़राएल में आज भी अबीर यहूदीयों का एक वर्ग है ।
जो अपनी वीरता तथा युद्ध कला के लिए विश्व प्रसिद्ध है ।
कहीं पर " आ समन्तात् भीयं राति ददाति इति आभीर :
इस प्रकार आभीर शब्द की व्युत्पत्ति-की है , जो
अहीर जाति के भयप्रद रूप का प्रकाशन करती है ।
अर्थात् सर्वत्र भय उत्पन्न करने वाला आभीर है ।
यह सत्य है कि अहीरों ने दास होने की अपेक्षा दस्यु होना उचित समझा ...
- प्राचीन भारतीय संदर्भ:यहूदी धर्म का इतिहास लगभग 4000 साल पुराना है, जिसकी शुरुआत पैगंबर इब्राहिम ने की थी, और उनके पोते याकूब (जिन्हें इजराइल भी कहा जाता है) ने 12 यहूदी कबीलों का गठन किया था, जिनमें से एक "अबीर" कबीला था। यहूदी धर्म के ऐतिहासिक ग्रंथ, 'तनख', में इस बात का उल्लेख है कि यह कबीला भारत की प्राचीन अहीर जाति से उत्पन्न हुआ था।
- प्रमाण और शोध:कुछ शोधकर्ताओं ने "अबीर" कबीले के इस संबंध में प्राचीन भारत के "अहीर" वंश से होने के साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं, जिन्होंने भारत के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
- समान नामकरण:"यहूदी अबीर कबीला" के रूप में, यहूदी धर्म से जुड़ा "अबीर" कबीला भारत के प्राचीन अहीर कबीले से जुड़ा हुआ है, जो आज भी भारत में कई क्षेत्रों में रहते हैं।
- सांस्कृतिक और भाषाई जुड़ाव:यहूदी धर्म के अनुयायियों के बीच "अबीर" का विशेष स्थान है क्योंकि यह उनकी प्राचीन जड़ों और उनके ऐतिहासिक महत्व से जुड़ा हुआ है।
यहूदीयों की हिब्रू बाइबिल के सृष्टि-खण्ड नामक अध्याय Genesis 49: 24 पर ---
अहीर शब्द को जीवित ईश्वर का वाचक बताया है।
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___The name Abir is one of The titles of the living god for some reason it,s usually translated for some reason all god,s
in Isaiah 1:24 we find four names of
The lord in rapid succession as Isaiah
Reports " Therefore Adon - YHWH - Saboath and Abir ---- Israel declares...
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Abir (अभीर )---The name reflects protection more than strength although one obviously -- has to be Strong To be any good at protecting still although all modern translations universally translate this name whith ---- Mighty One , it is probably best translated whith --- Protector --रक्षक ।
हिब्रू बाइबिल में तथा यहूदीयों की परम्पराओं में ईश्वर के पाँच नाम प्रसिद्ध हैं :----
(१)----अबीर (२)----अदॉन (३)---सबॉथ (४)--याह्व्ह् तथा (५)----(इलॉही)
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हिब्रू भाषा मे अबीर (अभीर) शब्द के बहुत ऊँचे अर्थ हैं- अर्थात् जो रक्षक है, सर्व-शक्ति सम्पन्न है
इज़राएल देश में याकूब अथवा इज़राएल-- ( एल का सामना करने वाला )को अबीर
का विशेषण दिया था ।
इज़राएल एक फ़रिश्ता है जो भारतीय पुराणों में यम के समान है ।
जिसे भारतीय पुराणों में ययाति कहा है ।
ययाति यम का भी विशेषण है।
समानता के और भी स्तर हैं जैसे- हिब्रू बाइबिल में ईसा मसीह की बिलादत (जन्म) भी गौओं के सानिध्य में ही हुई ...
ईसा का नाम (कृष्ट) है जो कृष्ण के चरित्र का भी साम्य है।
ईसा के गुरु ऐञ्जीलस ( Angelus)/Angel हैं जिन्हें हिब्रू परम्पराओं ने फ़रिश्ता माना है ।
तो कृष्ण के आध्यात्मिक गुरु घोर- आंगीरस हैं ।जिन्हें सप्तर्षियों गिना जाता है।
तो ये समझना जरूरी है। कि यदु तो व्यक्ति थे जिनके वंश को यादव नाम से जाना थे उनकी जाति क्या थी ? इसका जवाब प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद में जैसा कि वर्णन है ऋग्वेद के दशम मण्डल के (62) में सूक्त मन्त्र में 👇
उत दासा परिविषे स्मद्दिष्टी (स्मत् दिष्टी गोपरीणसा यदुस्तुर्वश् च मामहे।१०।
अर्थात् यदु और तुर्वशु नामक जो दास हैं गोओं से परिपूर्ण है अर्थात् चारो ओर से घिरे हुए हैं हम सब उनकी स्तुति करते हैं।१०।
यहाँ यदु को गोप ही बताया गया है। यादव ही अभीर है यदु के बाद इनको यादव भी कहा जाने लगा था
इस कारण ही सभी शोधकार्ता यहूदी यादव को एक ही मानते हैं। क्यों की इनके उत्त्पति में तो समानता है ही संस्कृति में भी व्यवस्था में अत्यधिक समानता है। यहाँ तक की वैवाहिक परम्पराओं और प्रवृत्तियों में भी गजब की आश्चर्जनक समानता है।
बदले की भावना ये अपने दुश्मन को छोड़ते नही जातिवादी कट्टरता इनको रक्तशुद्धता में परिबद्ध करती है।
यानी यादव यहूदी वही हो सकता है जिसके माता पिता दोनों यादव हो बरना मामला गड़बड़ समझो समाज से बाहर कर देते है। जैसे यहां यादवों का योद्धा कबीला अहीर है वैसे ही यहूदियों का योद्धा कबीला अबीर है। जिसने पश्चिमी एशिया में जूडो -कराटे का व्यवहारिक ज्ञान दिया।
"मिश्र के यहूदीयों का एक विशेषण कॉप्ट(गुप्त)-
गोप और अंग्रेज़ी कॉप(Cop) शब्दों की एक रूपता-
- कॉप्टिक (Coptic)शब्द मिस्र के ईसाई समुदाय को संदर्भित करता है, जो प्राचीन मिस्रवासियों के वंशज हैं।
- यह शब्द ग्रीक शब्द "एजिप्टियोस" से आया है, जिसका अर्थ "मिस्रवासी" है, जिसे बाद में अरबों ने इसे "क़ुबत" कर दिया। परन्तु संस्कृत शब्द गुप्त यूनानी भाषाओं में कॉप्ट हो गया है। चंद्रगुप्त मौर्य को यूनानी लेखकों द्वारा मुख्य रूप से "सैंड्रोकोटस" (Sandrocottus) या कभी-कभी "एंड्रोकोप्टस" (Androcopttus) के नाम से जाना जाता था. यह नाम ब्रिटिश प्राच्यविद् सर विलियम जोन्स द्वारा पहचाना गया था, जिन्होंने पहली बार चंद्रगुप्त मौर्य और "सैंड्रोकोटस" के बीच संबंध स्थापित किया था."The Dutch verb kopen for "to buy" originates from Middle Dutch côpen,which in turn comes from Old Dutch cōpon and the Proto-Germanic root kaupaz.This Germanic root was likely a loanword from Latin caupō, meaning "tradesman" or "merchant".डच भाषा में खरीदने के लिए" क्रियात्मक कोपेन शब्द मध्य डच के कोपेन शब्द से उत्पन्न होता है,जो बदले रूपों में पुराने डच कॉपोन और प्रोटो-जर्मेनिक शब्द कौपज़ से आता है।यह जर्मेनिक मूलशब्द लैटिन के (कोपो) से निष्पन्न है। जिसका अर्थ है - व्यापारी "जर्मन भाषा मे यह शब्द कॉफेन और डेनिश भाषा में कोबे, रूप में है।"कोपेनहेगन:गोपांगनडेनमार्क की राजधानी, इसका नाम इस शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ है "व्यापारी का बंदरगाह"।ब्राह्मणीय वर्णव्यवस्था में गोप अथवा गुप्त वैश्य वर्ण का भी विशेषण है। गोप लोग गोपालक तथा कृषि कर्मकरने से वैश्य वर्ण में ब्राह्मणों ने माने हैं। यद्यपि गोप सभी वर्णों का कार्य करते हैं।संस्कृत भाषा की 1865 धातुओं (शब्द तथा क्रिया के मूल रूपों) में गुप्- एक नामधातु है। जिसका विकास गोप शब्द से हुआ गो+पा = गाय पालना से हुआ है।प्राचीन काल में गाय पालना अत्यधिक कठिन कार्य था गायें भारतीय अर्थ व्यवस्था की ही आधार स्तम्भिका नहीं अपितु विश्व की अनेक संस्कृतियों में जीवन और जीविका का उत्स थीं ।इस सन्दर्भ में भाषाविज्ञान को आधार बनाकर हम कुछ तथ्यों का प्रकाशन कर रहे हैं।जैसे पशु शब्द से ही पैसा और फीस जैसे शब्द विकसित होते हैं। पशु हमारी अर्थ- व्यवस्था के आधार थे। पशुओं गाय प्राचीन पाल्या पशु है। और गोप "अहीर" जाति का व्यवसाय मूलक विशेषण है।अहीर लोग वैदिक काल से ही गोपालन करते हैं ।अत: वेद में गोप " गोधुक् और अभीरु: शब्द उपलब्ध हैं।पाश्चात्य संस्कृतियों में जो वैदिक संस्कृति के समानान्तर विकसित हुईं विशेषत: ग्रीक लैटिन और जर्मन की संस्कृतियाँ उनमें भी गो शब्द विद्यमान हैं । गौ प्रथम पाल्य पशु था।पशु शब्द और पैसा शब्द के बीच आज भले ही सीधा सम्बन्ध नहीं है, बल्कि प्राचीन काल में पशुधन को धन के रूप में प्रयोग किया जाता था, जिसे पशु-मुद्रा कहते थे, जो भविष्य में धातु-मुद्रा और फिर आधुनिक पैसे के विकास का एक अप्रत्यक्ष आधार बनी। समय के साथ, वस्तुओं के बदले वस्तुओं के विनिमय (वस्तु-विनिमय) से पशु-मुद्रा की ओर बढ़ा गया, और फिर तृतीय चरण में धातु-मुद्रा का विकास हुआ।पशु-मुद्रा से पैसे का अप्रत्यक्ष संबंध
- पशु-मुद्रा प्राचीन समाजों में, विनिमय के माध्यम के रूप में सीधे पशुओं का इस्तेमाल होता था। लोग अपनी ज़रूरतों के अनुसार मवेशी, गाय या भैंस जैसी चीज़ों का आदान-प्रदान करते थे।
- पशुओं का महत्व:पशुधन को धन और संपत्ति का एक महत्वपूर्ण रूप माना जाता था। यह वित्तीय सुरक्षा और विनिमय का एक प्रारंभिक तरीका पशु ही थे ।
- ** धातु मुद्रा की ओर विकास:** धीरे-धीरे, धातु मुद्रा का विकास हुआ, जो पशुधन की तुलना में अधिक सुविधाजनक और टिकाऊ थी। धातु मुद्रा का प्रचलन बढ़ने के साथ ही पशु-मुद्रा समाप्त होने लगी परन्तु उनके लिए नामित शब्द रूढ हो गये।
- आधुनिक पैसे का विकास:धातु मुद्रा से हुआ, जो पैसे के एक महत्वपूर्ण विकासवादी क्रम का हिस्सा है।
- लैटिन/पुरानी फ्रेंच से उत्पत्ति:'फीस' (Fee) शब्द की उत्पत्ति पुरानी फ्रेंच शब्द 'fée' या लैटिन शब्द 'feudum' से हुई है, जिसका अर्थ किसी अधिकार या विशेषाधिकार के बदले भुगतान किया जाने वाला शुल्क था।
- सामंती व्यवस्था:प्रारंभिक सामंती व्यवस्था में, 'फीस' शब्द का उपयोग भूमि के स्वामित्व या सामंती व्यवस्था के तहत प्राप्त होने वाले पदों के लिए किया जाता था। सेवा के बदले दी जाने वाली भुगतान को भी फीस कहा जाता था।
- पृष्ठभूमि:जब मूसा पर्वत सिनाई पर परमेश्वर से मिलने के लिए गए, तब इस्राएलियों ने मूसा के पीछे छूटने के कारण सोने का बछड़ा बनाने और उसकी पूजा करने का निर्णय लिया।
- आराधना:इस्राएलियों ने सोने के इस बछड़े की पूजा की, जिसे परमेश्वर की पूजा के बजाय एक मूर्तिकला के रूप में देखा गया, जिससे ईश्वर के साथ उनका विश्वास और भरोसा कमज़ोर हुआ।
- बाइबिल का चित्रण:निर्गमन की पुस्तक में इस घटना को मूर्तिपूजा का एक उदाहरण के रूप में वर्णित किया गया है और इसे 'पाप' माना गया है।
- यह पूरी तरह से लाल होना चाहिए (बहुत ही चुनिंदा बातें!)
- इसमें कोई दोष नहीं हो सकता
- इसका उपयोग कभी भी श्रम के लिए नहीं किया गया होगा (काम करने वाली बछियाओं की अनुमति नहीं है!)
इन रूपों में पशु' शब्द से 'पैसा' और 'फीस' शब्दों का प्रत्यक्ष संबंध न होकर परोक्ष सम्बन्ध है। 'यहूदी पशुपालक समाज था ये लोग बैल की पूजा करते थे।बाइबिल में निर्गमन 32 में वर्णित सोने के बछड़े की मूर्ति की पूजा एक ऐतिहासिक घटना थी जिसमें मूसा के अनुपस्थित रहने पर इस्राएलियों के एक समूह ने मूर्तियों का निर्माण करके उनकी पूजा की, लेकिन यह यहूदी धर्म के मूल सिद्धांतों के अनुसार नहीं था और इसकी निंदा की गई थी। यहोवा के एक ही ईश्वर की अवधारणा यहूदी धर्म का केंद्र है, जबकि सोने के बछड़े की पूजा एक पाप और ईश्वर से दूर जाने का प्रतीक था।सोने के बछड़े की घटना का विवरणयहूदी धर्म में गाय के प्रति श्रद्धा भाव की विधि भारतीय यादवों से पृथक है । सम्भवत; यह अति प्राचीन परम्परा का ही एक परिवर्तित रूप हो जैसेएक लाल बछिया, या हिब्रू में जिसे "पराह अदुमाह", कहते है बिल्कुल वैसा ही है जैसा सुनने में लगता है—एक छोटी मादा गाय जो पूरी तरह से लाल होती है। लेकिन हम यहाँ किसी भी लाल गाय की बात नहीं कर रहे हैं। यहूदी परम्परा के अनुसार, इस बछिया को कुछ खास मानदण्डों पर खरा उतरना होता है:
ये आवश्यकताएं सीधे बाइबल से आती हैं, विशेष रूप से गिनती 19:1-2 , जिसमें ईश्वर द्वारा कहा गया है:
“अदोन( ईश्वर) ने मूसा और हारून से कहा, 'यह तोरा( धर्म संहिता )की विधि है, जिसकी आज्ञा अदोन ने दी है: इस्राएलियों से कहो कि वे तुम्हारे पास एक निर्दोष लाल बछिया ले आएं, जिस पर कोई दोष न हो और जिस पर कभी कोई जूआ न रखा गया हो।'”
इन सभी मानदंडों पर खरी उतरने वाली गाय मिलना लगभग उतना ही मुश्किल है जितना भूसे के ढेर में सुई मिलना—अगर वह सुई भी पूरी तरह लाल हो और उससे कभी कुछ सिलने में इस्तेमाल न किया गया हो। कोई आश्चर्य नहीं कि जब कोई संभावित उम्मीदवार सामने आता है तो लोग उत्साहित हो जाते हैं!
भारत-यूरोपीय देवताओं वरुण , मित्र और इंद्र और यम को किसके राज्य में मान्यता दी गई थी। यह पूर्वोत्तर सीरिया में मितन्नीयों( जिसे वेद में मितज्ञु) कहा गया है। यहीं पूर्वोत्तर सीरिया( सामदेश) दूसरी सहस्राब्दी की तीसरी तिमाही में हुर्रियन आबादी पर एक इंडो-आर्यन अभिजात वर्ग का शासन था। उनके मुख्य देवताओं के नाम और सामान्य चरित्र से परे हुर्रियनों के धर्म के बारे में बहुत कम जानकारी है: तेशुब( अशुतोष) , एक तूफान देवता, और उसकी पत्नी हेपत( हेमवती); उनका बेटा, शर्रुमा( स्कन्द), का विवरण है। एक तूफान देवता भी; मेसोपोटामियन ईशर( स्त्री) के साथ पहचानी जाने वाली देवी शौशका; और कुसुख और शिमेगी, चंद्र और सौर देवता , क्रमशः तथा इनसे सम्बन्धित हुरियन पौराणिक कथाओं को हित्ती संस्करणों के माध्यम से ही जाना जाता है।
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