(ऋग्वेद १०/२१/३)त्वे धर्माण आसते जुहूभिः सिञ्चतीरिव ।कृष्णा रूपाण्यर्जुना वि वो मदे विश्वा अधि श्रियो धिषे विवक्षसे ॥३॥
- पदों का व्याकरण सम्मत अर्थ-
- त्वे (Tve): 'त्वयि' का वैदिक रूप। सप्तमी विभक्ति, एकवचन (तुझमें/तेरे आश्रय में)।
- धर्माणः (Dharmāṇaḥ): प्रथमा विभक्ति, बहुवचन। धारण करने वाले गुण या उपासक।
- आसते (Āsate): 'आस्' धातु (बैठना/विराजना), लट् लकार, आत्मनेपद। (विराजते हैं)।
- जुहूभिः (Juhūbhiḥ): तृतीया विभक्ति, बहुवचन। 'जुहू' (हवन पात्र/चमच) के द्वारा।
- सिञ्चतीः-इव (Siñcatīḥ-iva): सींचती हुई धाराओं के समान। 'सिच्' धातु + शतृ प्रत्यय (स्त्रीलिंग)।
- कृष्णा रूपाणि-अर्जुना (Kṛṣṇā rūpāṇi-arjunā): कृष्ण और अर्जुन आदि अनेक रूपों में। यहाँ द्वन्द्व और विशेषण का प्रयोग है।
- वि वो मदे (Vi vo made): 'वः' (तुम्हारे लिए) और ' मदे=स्तुति में। 'वि' उपसर्ग विशिष्टता को दर्शाता है।
- विश्वा अधि श्रियो धिषे (Viśvā adhi śriyo dhiṣe): तुम समस्त (विश्वा)के (श्रियो) कल्याणों (धिषे) धारण करते हो
- विवक्षसे (Vivakṣase): 'वच्' धातु का सन्नत रूप मध्यम पुरुष एक वचन आत्मनेपदीय -कहते हो।
अनुवाद-(हे कृष्ण ) जिस प्रकार जुहुओं (हवन-पात्रों) से घी अग्नि में छिड़का जाता है, उसी प्रकार सारे धर्म आप में ही स्थित हैं। आपकी स्तुति में विश्व कल्याण को अधिग्रहण( धारण) करता है । कृष्ण और अर्जुन आदि रूपों में अनेक बार तुम ही सब धर्मों को कहने की इच्छा प्रकट करते हो। ऋग्वेद- १०/२१/३____________________व्याकरण विश्लेषण (Grammar Breakdown):
- यथा जुहूभिः घृतम् अग्नौ सिच्यते:
- यथा/तथा: 'जिस प्रकार/उस प्रकार' के लिए अव्यय।
- जुहूभिः: 'जुहू' (हवन-पात्र) शब्द का तृतीया विभक्ति, बहुवचन। (करण कारक)
- सिच्यते: 'सिच्' धातु (सींचना/छिड़कना), लट् लकार, कर्मवाच्य (Passive voice)।
- सर्वे धर्माः त्वय्येव स्थिताः:
- त्वय्येव: त्वयि + एव (यण् संधि)। 'आप में ही'।
- स्थिताः: 'स्था' धातु + क्त प्रत्यय (स्थित होना)।
- तव स्तुत्या विश्वकल्याणं गृह्यते:
- स्तुत्या: 'स्तुति' शब्द का तृतीया विभक्ति, एकवचन।
- गृह्यते: 'ग्रह्' धातु (ग्रहण करना/अधिग्रहण), लट् लकार, कर्मवाच्य।
- कृष्णार्जुनरूपेण त्वमेव... वक्तुमिच्छसि:
- कृष्णार्जुनरूपेण: कृष्ण और अर्जुन के रूप के द्वारा (तृतीय विभक्ति)।
- बहुवारं: अनेक बार।
- वक्तुमिच्छसि:/ विवक्षसे= वक्तुम् (वच् + तुमुन् प्रत्यय - बोलने के लिए) + इच्छसि (चाहते हो)।
ऋग्वेद १०/२१/३)
"त्वे धर्माण आसते जुहूभिः सिञ्चतीरिव।
कृष्णा रूपाण्यर्जुना वि वो मदे विश्वा अधि श्रियो धिषे विवक्षसे ॥"
अनुवाद:
"(हे कृष्ण ) जिस प्रकार जुहुओं (हवन-पात्रों) से घी अग्नि में छिड़का जाता है, उसी प्रकार सारे धर्म आप में ही स्थित हैं। और आप सभी धर्मों को धारण करते हो। आपकी स्तुति में सम्पूर्ण विश्व कल्याण को अधिग्रहण करता है । कृष्ण और अर्जुन आदि अनेक रूपों में अनेक बार तुम ही धर्मों को कहते हो।
"(हे कृष्ण ) जिस प्रकार जुहुओं (हवन-पात्रों) से घी अग्नि में छिड़का जाता है, उसी प्रकार सारे धर्म आप में ही स्थित हैं। और आप सभी धर्मों को धारण करते हो। आपकी स्तुति में सम्पूर्ण विश्व कल्याण को अधिग्रहण करता है । कृष्ण और अर्जुन आदि अनेक रूपों में अनेक बार तुम ही धर्मों को कहते हो।
- प्रस्तुत ऋचा पर योगेश रोहि का भाष्य-
संस्कृत श्लोक-
यथा जुह्विर्घृतं वह्नौ त्वयि धर्मास्तथा स्थिताः।
त्वं धारयसि धर्मान् वै विश्वं स्वस्ति च विन्दति॥
कृष्णार्जुनस्वरूपेण बहुधा वदसि प्रभो।
धर्मान् सनातनंश्चापि नमोऽस्तु परमात्मने॥
व्याकरण सहित हिन्दी अनुवाद:
- यथा जुह्विर्घृतं वह्नौ त्वयि धर्मास्तथा स्थिताः।
- अनुवाद: जिस प्रकार जुहुओं (हवन-पात्रों) के द्वारा घी अग्नि में (अर्पित होकर) स्थित होता है, उसी प्रकार सभी धर्म आप में भी स्थित होता हैं।
- व्याकरण:
- यथा/तथा: अव्यय (जैसे/वैसे)।
- जुह्वि: 'जुहू' शब्द (तृतीया विभक्ति, बहुवचन के अर्थ में यहाँ प्रयुक्त) - हवन का पात्र।
- वह्नौ: 'वह्नि' (अग्नि) शब्द, सप्तमी विभक्ति, एकवचन।
- स्थिताः 'स्था' धातु + 'क्त' प्रत्यय (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन)।
- त्वं धारयसि धर्मान् वै विश्वं स्वस्ति च विन्दति॥
- अनुवाद: आप ही समस्त धर्मों को धारण करते हैं और (आपकी स्तुति से) सम्पूर्ण विश्व कल्याण (स्वस्ति) प्राप्त करता है।
- व्याकरण:
- धारयसि: 'धृ' धातु (णिजन्त), लट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन।
- विन्दति: 'विद्' धातु (लाभ प्राप्त करना), लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।
- स्वस्ति: कल्याण/मंगल।
- कृष्णार्जुनस्वरूपेण बहुधा वदसि प्रभो।
- अनुवाद: हे प्रभु! कृष्ण और अर्जुन जैसे अनेक रूपों में आप ही बार-बार धर्म का उपदेश देते हैं।
- व्याकरण:
- स्वरूपेण: तृतीया विभक्ति, एकवचन (रूप के द्वारा)।
- बहुधा: अव्यय (अनेक प्रकार से/अनेक बार)।
- वदसि: 'वद्' धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन।
विशेष: यह पंक्तियाँ कृष्ण को 'धर्म-गोप्ता' (धर्म का रक्षक) और 'साक्षात् धर्म' के रूप में प्रतिपादित करती हैं। जिस प्रकार अग्नि आहुति को स्वीकार करती है, उसी प्रकार परमात्मा सभी धर्मों का आधार (आश्रय) हैं।
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