*यदुवंश संहिता*
लेखन कार्य का प्रारम्भ दिनाङ्क- १३/०१/२०२६
यदुपुङ्गवं केशवं, गोलोके विराजितम्।।
विधायकं नायकं शरणं प्रपद्ये मार्जितम्।
अनुवाद-
गोलोक में विराजमान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का सञ्चालन और विधान करने वाले, भक्तों का मार्गदर्शन करने वाले,यादव श्रेष्ठ विशुद्धत्तम( अत्यधिक मजे हुए) व सुलझे हुए भगवान श्रीकृष्ण की हम शरण लेते हैं।
(श्रीकृष्ण साराङ्गिणी)
यदोर्वंशं नर: श्रुत्वा सर्वपापै: प्रमुच्यतते।
यत्रावतीर्णं कृष्णाख्यं परं ब्रह्म निराकृति।।४।
(श्रीविष्णुपुराण-४/११/४)
अनुवाद-
"जिसमें श्रीकृष्ण नामक निराकार परब्रह्म ने साकार होकर अवतार लिया था, उस यदुवंश का श्रवण करने से मनुष्य सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है।"
परमेश्वर श्रीकृष्ण का चित्र -🔲
"प्राक्कथन"
पुस्तक "यदुवंश संहिता" का मुख्य उद्देश्य- पौराणिक और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर भगवान श्रीकृष्ण की सत्ता को सिद्ध करते हुए उनसे उत्पन्न यादवों के प्राचीनतम और अद्यतन इतिहास को प्रमाणों सहित निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर बताना है कि-
▪️श्रीकृष्ण कौन हैं ?
▪️यादवों की उत्पत्ति के पौराणिक और ऐतिहासिक साक्ष्य क्या है ?
▪️यादवों की मुख्य- जाति, वंश, वर्ण, कुल एवं गोत्र क्या है ?
▪️यादवों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तथा भारतीय संस्कृति में उनका क्या योगदान रहा है ?
▪️भारत के अलग-अलग प्रान्तों में यादवों को किन नामों से जाना जाता है ?
▪️भारतीय राजनीति में यादवों की प्रारम्भिक एवं अद्यतन स्थिति क्या है ?
▪️भारतीय राजनीति के कुछ महान यादव राजनेताओं के जीवन परिचय इत्यादि को बताना भी इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य है।
-निर्देशक एवं मार्गदर्शक -
गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज
लेखक गण-
गोपाचार्य हंस श्री योगेश कुमार रोहि जी
एवं
गोपाचार्य हंस श्री माता प्रसाद जी
-विषय सूची-
अध्याय-(1)- श्रीकृष्ण का परिचय-
(क)- आध्यात्मिक व भौतिक धरातल पौराणिक परिचय -
(1)- गोलोक में श्रीकृष्ण का परिचय
(2)- भूलोक में श्रीकृष्ण का परिचय
(ख)- ऐतिहासिक परिचय-
(1)- पुरातात्विक परिचय
(2)- लिपिकीय (अभिलेखीय) परिचय
अध्याय-(2)- गोपों (यादवों) की उत्पत्ति
(क)- पौराणिक साक्ष्य
(1)- गोलोक में यादवों की उत्पत्ति
(2)- भू-लोक में यादवों की उत्पत्ति
अध्याय(3)- यादवों की मुख्य जाति
अध्याय(4)- यादवों का वर्ण (वैष्णव वर्ण)
अध्याय(5)- यादवों का वंश एवं कुल
अध्याय(6)- यादवों का गोत्र
अध्याय(7)- भारत के प्रमुख यादव शासक
(क)- पौराणिक गोप (यादव) शासक (राजा)
(1)- पुरूरवा पुत्र- आयुष।
(2) आयुष पुत्र- नहुष। (3) नहुष पुत्र- ययाति।
(4) ययाति पुत्र- यदु। (5) यदु पुत्र- कार्त्यवीर्य अर्जुन
(6) हृदीक पुत्र- देवमीढ।
(7) नन्द पुत्री- योगमाया विन्ध्यवासिनी।
(ख)- ऐतिहासिक यादव राजा
(1)- वीर अहीर लोरिक
(2)- आल्हा-ऊदल
(3)- अहीर देवायत बोदर
(4)- देवगिरी के यादव राजा
(A)- भिल्लम पञ्चम
(B)- जैतुगी (जैत्रपाल)
(C)- सिंघण द्वितीय
(D)- रामचन्द्र यादव
(5)- विजयनगर के यादव राजा
(A)- हरिहर एवं बुक्का (B)- कृष्णदेवराय
(6)- दक्कन के अहीर राजा
(7)- वाडियार के यादव राजा- देवराज वाडियार
अध्याय(8)- प्रमुख क्रान्तिकारी यादव
1- राव तुला राम
2- राव गोपाल देव
3- प्राण सुख यादव
4- वीरन अलगु मुत्थु
5- रघुवर प्रसाद यादव
6- ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव
अध्याय(9)- प्रान्तीय या स्थानीय स्तर पर यादवों के प्रमुख सरनेम।
अध्याय(10)- प्रमुख यादव राजनेता
(A)- उत्तर प्रदेश के प्रमुख राजनेता
1- रामनरेश यादव
2- मुलायम सिंह यादव
3- प्रो० राम गोपाल यादव
4- शिवपाल सिंह यादव
5- प्रो. रामगोविन्द चौधरी
6- शरद यादव
7- अखिलेश सिंह यादव
8- डिम्पल यादव
(B)- बिहार के प्रमुख राजनेता
1- बिन्देश्वरी प्रसाद मण्डल
2- रामलखन सिंह यादव (शेरे बिहार)
3- लालू प्रसाद यादव
4- श्रीमती रावड़ी देवी
5- तेजस्वी यादव
6- पप्पू यादव (राजेश रञ्जन)
7- नित्यानन्द राय
(C)- अन्य राज्यों के यादव राजनेता
1- मोहन यादव
2- भूपेन्द्र यादव
3- अन्नपूर्णा देवी
4- राव इन्द्रजीत सिंह और राव वीरेन्द्र सिंह
5- राव विजेंद्र सिंह
6- शरद यादव
अध्याय(11)- प्रमुख यादव सामाजिक
कार्यकर्ता।
(1)- राजित सिंह यादव
(2)- गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज
(3)- गोपाचार्य श्री माता प्रसाद यादव
(4)- गोपाचार्य श्री योगेश कुमार रोहि
(5)- राव विजेन्द्र सिंह यादव
(5)- जाहल बेन अहीर
(6) शैलेन्द्र सिंह यादव (इटावा)
(7)- मनोज कुमार यादव (बिहार)
(8)- सुनील यादव सुल्तानपुरिया
(9)-कालीशंकर यदुवंशी
अध्याय(12)- खेल, सिने एवं संगीत जगत के प्रमुख यादव-
(क)- खेल जगत के प्रमुख यादव
(A) - क्रिकेट
1- सूर्यकुमार यादव
2- कुलदीप यादव
3- उमेश यादव
4- पूनम यादव
5- राधा यादव
(B)- कुस्ती
1- नरसिंह पञ्चम यादव
2- वीरेन्द्र सिंह यादव
3- गुरु हनुमान (विजय पाल यादव)
(ख)- सिने जगत के प्रमुख यादव
1- खेसारी लाल यादव
2- राजपाल यादव
3- लीना यादव
4- पारुल यादव
5- नरसिंह यादव
6- बाबा यादव
(ग)- संगीत जगत के प्रमुख यादव
1- हीरालाल यादव
2- काशीनाथ यादव
3- राम कैलाश यादव
4- विहारी लाल यादव
5- दिनेशलाल-निरहुआ
6- सञ्जय यदुवंशी (अवधी गायक)
7- स्वामी आधार चैतन्य ( उत्तर- प्रदेश)
गोपों (यादवों) की परिशिष्ट कथाएँ
(1) श्रीकृष्ण की नारायणी सेना
(2)- यादवों का विश्वजीत युद्ध
(3)- गोपों की सत्यनारायण व्रत कथा
(4)- वेदमाता गायत्री की कथा
(5)- गोपी स्वाहा और स्वधा की कथा
(6)- ब्रह्माण्ड विदुषी गोपी शतचन्द्रानना की कथा
(7)- गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था।
(8) चन्द्रमा और उसके वंश की उत्पत्ति
(9)- देवमीढ की वंशावली
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अध्याय 👇
अध्याय(1)-
श्रीकृष्ण का परिचय-
यह अध्याय उनके लिए आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है जो भगवान श्रीकृष्ण को काल्पनिक और अनैतिहासिक मानकर उनकी सत्ता को मानने से अस्वीकार करते हैं।
किन्तु ऐसी बात नहीं है क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण की सत्ता आध्यात्मिक और ऐतिहासिक दोनों ही धरातलों पर स्थित है।
इसको अच्छी तरह समझने के लिए इस अध्याय को मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया गया है -
(क)- श्रीकृष्ण का आध्यात्मिक परिचय-
(1)- गोलोक में श्रीकृष्ण का परिचय
(2)- भूलोक में श्रीकृष्ण का परिचय
(ख)- ऐतिहासिक परिचय-
(1)- पुरातात्विक परिचय
(2)- लिपिकीय परिचय
(क)- श्रीकृष्ण का आध्यात्मिक परिचय-
(1)- गोलोक में श्रीकृष्ण का परिचय-
भगवान श्रीकृष्ण समस्त ब्रह्माण्डों से पच्चास करोड़ योजन ऊपर गोलोक में अपने गोप और गोपियों के साथ सदैव गोप वेष में रहते हैं। जिसकी पुष्टि ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय (दो) के श्लोक २१ से होती है जिसमें बताया गया है कि -
स्वेच्छामयं सर्वबीजं सर्वाधारं परात्परम्।
किशोरवयसं शश्वद्गोपवेषविधायकम् ।२१।
अनुवाद - वे ही प्रभु स्वेच्छामयी सभी के मूल- (आदि-कारण) सर्वाधार तथा परात्पर- परमात्मा हैं। उनकी नित्य किशोरावस्था रहती है और वे प्रभु गायों के उस लोक (गोलोक) में सदा गोप (आभीर)- वेष में रहते हैं।२१।
इसी तरह से ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय- (२८) के श्लोक - ६१ से ६५ में लिखा गया है कि -
एवंरूपमरूपं तं मुने ध्यायन्ति वैष्णवाः।६१॥
सततं ध्येयमस्माकं परमात्मानमीश्वरम्।।
अक्षरं परमं ब्रह्म भगवन्तं सनातनम्।६२।।
स्वेच्छामयं निर्गुणं च निरीहं प्रकृतेः परम्।।
सर्वाधारं सर्वबीजं सर्वज्ञं सर्वमेव च।६३।।
सर्वेश्वरं सर्वपूज्यं सर्वसिद्धिकरं प्रदम्।।
स एव भगवानादिर्गोलोके द्विभुजः स्वयम्।६४।
गोपवेषश्च गोपालैः पार्षदैः परिवेष्टितः।।
परिपूर्णतमः श्रीमान् श्रीकृष्णो राधिकेश्वरः।६५।
अनुवाद -६१-६५-
• मुने ! वैष्णवजन उन निराकार परमात्मा का इस रूप में ध्यान किया करते हैं। वे परमात्मा ईश्वर हम सब लोगों के सदा ही ध्येय हैं। उन्हीं को अविनाशी परब्रह्म कहा गया है।६१-६२।
• वे ही दिव्य स्वेच्छामय शरीरधारी सनातन भगवान हैं। वे निर्गुण, निरीह और प्रकृति से परे हैं। सर्वाधार, सर्वबीज, सर्वज्ञ,सर्वस्वरुप है।६३।।
• सर्वेश्वर, सर्वपूज्य तथा सम्पूर्ण सिद्धियों को हाथ में देने वाले हैं। वे आदि पुरुष भगवान स्वयं ही द्विभुज रूप धारण करके गोलोक में निवास करते हैं।६४।
• उनकी वेशभूषा भी ग्वालों (अहीरों) के समान होती है और वे अपने पार्षद गोपालों (गोपों) से घिरे रहते हैं। उन परिपूर्णतम भगवान को श्रीकृष्ण कहते हैं। वे सदा श्रीजी (श्रीराधा) के साथ रहने वाले और श्रीराधिका के प्राणेश्वर हैं।६५।
इसके अतिरिक्त ऋग्वेद मण्डल (१) के सूक्त- (१५४) की ऋचा (६) में भी गोलोक का वर्णन मिलता है। जिसमें लिखा गया है कि- गोलोक में भूरिश्रृङ्गा गायें रहती हैं। इसीलिए उस परमधाम को गोलोक अर्थात् गायों का लोक कहा जाता है।
"ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिश्रृङ्गा अयास:। अत्राह तदुरुगायस्य वृष्ण: परमं पदमव भाति भूरि॥६।।
पदों के अर्थ व अन्वय:-
जिसमें "पदों का अर्थ है:-(यत्र)= जहाँ (अयासः)= प्राप्त हुए अथवा गये (भूरिश्रृङ्गाः)= स्वर्ण युक्त सींगों वाली (गावः)= गायें हैं (ता)= उन ।(वास्तूनि)= स्थानों को (वाम्)= तुम को (गमध्यै)= जाने को लिए (उश्मसि)= इच्छा करते हो। (उरुगायस्य)= बहुत प्रकारों से प्रशंसित (वृष्णः)= सुख वर्षाने वाले परमेश्वर का (परमम्)= उत्कृष्ट (पदम्)= स्थान (भूरिः)= अत्यन्त (अव भाति) =उत्कृष्टता से प्रकाशमान होता है (तत्)= उसको (अत्राह)= यहाँ ही हम लोग चाहते हैं ॥६।
अर्थात् उपर्युक्त ऋचाओं का सार यही है कि श्रीकृष्ण का परम धाम वहीं है, जहाँ स्वर्ण युक्त सींगों वाली गायें रहती हैं, और वे विष्णु (श्रीकृष्ण) वहाँ गोप रूप में अहिंस्य (अवध्य) हैं, और यही स्वराट-विष्णु ही श्रीकृष्ण, वासुदेव, नारायण आदि नामों से परवर्ती युग में लोकप्रिय हुए हैं। क्योंकि इस सम्बन्ध में ऐसा ही लिखा गया है कि -
"त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः ।
अतो धर्माणि धारयन् ॥१८॥
(ऋग्वेद १/२२/१८)
इस ऋचा के पद-भेद से स्पष्ट होता है कि -
(अदाभ्यः) =सोमरस रखने के लिए गूलर की लकड़ी का बने हुए पात्र को (धारयन्)= धारण करता हुआ । (गोपाः)= गोपालक रूपों वाले, (विष्णुः)= संसार के अन्तर्यामी परमेश्वर (त्रीणि) =तीन (पदानि)= क़दमो से (विचक्रमे)= गमन करते हैं । और ये ही (धर्माणि)= धर्मों को । धारयन= धारण करते रहते हैं ।१८॥
अर्थात् यह बात वेदों से भी सुनिश्चित है कि - परमेश्वर श्रीकृष्ण का सनातन निवास गोलोक है, जहाँ वे गोप-वेष में अपनी गायों तथा गोपों के साथ रहते हैं और और वे ही भगवान भूतल पर अपने गोपों के यहाँ गोप-वेष में ही अवतरित होकर धर्म की स्थापना बारम्बार करते हैं। इसी बात को प्रमाण सहित इसी क्रम में आगे बताया गया है।
विशेष- विष्णु त्रय में स्वराट्- विष्णु की सर्वोच्च सत्ता है। वेदों में उन्हीं विष्णु को गोप रूप में वक्णित कि़ा गया है।
(2)- भूलोक में श्रीकृष्ण का परिचय-
जिस तरह से भगवान श्रीकृष्ण का परिचय गोलोक में है उसी तरह से इनका परिचय भूतल में भी है। क्योंकि सर्वविदित है कि भगवान श्रीकृष्ण गोलोक से जब भी भू-तल पर भूमि भार हरण के लिए अवतरित होते हैं, तो वे अपने समस्त गोप-गोपियों के साथ ही गोपकुल में गोपों के यहाँ ही अवतरित होते हैं।
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।७।
(श्रीमद्भागवत गीता अध्याय- ४/७)
अनुवाद:-
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं- "जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने आप को साकार रूप से प्रकट करता हूँ अर्थात् भूतल पर शरीर रूप धारण करता हूँ"।
इसी सत्य को चरितार्थ करने के लिए परमेश्वर श्रीकृष्ण अपने गोलोक से धरा-धाम पर गोप जाति के यादव वंश में अवतरित होते हैं।
इस बात की पुष्टि- श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कन्ध के अध्याय -४ के श्लोक संख्या- (२२) से होती है जिसमें लिखा गया है कि-
"भूमेर्भरावतरणाय यदुष्वजन्मा जातः करिष्यति सुरैरपि दुष्कराणि।
वादैर्विमोहयति यज्ञकृतोऽतदर्हान् शूद्रान कलौ क्षितिभुजो न्यहनिष्यदन्ते।।२२।
अनुवाद - अजन्मा होने पर भी पृथ्वी का भार उतारने के लिए वे ही भगवान यदुवंश में जन्म लेंगे और ऐसे-ऐसे कर्म करेंगे, जिन्हें बड़े-बड़े देवता भी नहीं कर सकते।
इसी तरह से श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कन्ध के अध्याय-(६) के श्लोक संख्या -(२३) और (२५) में ब्रह्मा जी श्रीकृष्ण से कहते हैं कि-
"अवततीर्य यदोर्वंशे बिभ्रद् रुपमनुत्तमम्।
कर्माण्युद्दामवृत्तानि हिताय जगतोऽकृथाः।। २३।
"यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरूषोत्तम।
शरच्छतं व्यतीताय पंचविंशाधिकं प्रभो।।२५।
अनुवाद - आपने यह सर्वोत्तम रूप धारण करके यदुवंश में अवतार लिया और जगत् के हित के लिए उदारता और पराक्रम से भरी अनेक लीलाएँ कीं ।२३।
• पुरुषोत्तम सर्वशक्तिमान प्रभु ! आपको यदुवंश में अवतार ग्रहण किये "एक सौ पचीस वर्ष" बीत गए हैं।२५।
▪️इसी तरह से हरिवंश पुराण के हरिवंश पर्व के अध्याय- (५५) के श्लोक-१७ में गोपेश्वर श्रीकृष्ण, ने ब्रह्माजी से पूछा कि- आप मुझे यह बताएं कि मैं किस प्रदेश में कैसे प्रकट होकर अथवा किस वेष में रहकर उन सब असुरों का समर भूमि में संहार करूँगा ? इस पर ब्रह्माजी ने श्लोक संख्या- (१८ से २०) में कहा -
नारायणेमं सिद्धार्थमुपायं श्रृणु मे विभो।
भुवि यस्ते जनयिता जननी च भविष्यति।। १८।
यत्र त्वं च महाबाहो जात: कुलकरो भुवि।
यादवानां महद वंशमखिलं धारयिष्यसि।।१९।
ताश्चासुरान् समुत्पाट्य वंशं कृत्वाऽऽत्मननो महत्।
स्थापयिष्यसि मर्यादां नृणां तन्मे निशामय।।२०।
अनुवाद - सर्वव्यापी नारायण ! आप मेरे इस उपाय को सुनिए, जिसके द्वारा सारा प्रयोजन सिद्ध हो जाएगा। हे महाबाहो ! भूतल पर जो आपके पिता होंगे,जो माता होगीं और जहाँ जन्म लेकर आप अपने कुल की वृद्धि करते हुए यादवों के सम्पूर्ण विशाल वंश को धारण करेंगे तथा उन समस्त असुरों का संहार करके अपने वंश का महान विस्तार करते हुए जिस प्रकार मनुष्यों के लिए धर्म की मर्यादा स्थापित करेंगे, वह सब बताता हूँ सुनिए।१८-१९-२०।
▪️इसी तरह से गोपेश्वर श्रीकृष्ण को यदुवंश में जन्म लेने की पुष्टि- गर्गसंहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय- (१४) के श्लोक संख्या- (४१) से होती है। जिसमें त्रेता-युग के रावण का भाई विभीषण जो अमर होकर लंका का राजा बन कर द्वापर युग तक जीवित था। उसी समय यादव अपनी विशाल सेना के साथ विश्वजीत युद्ध के लिए निकले थे। उसी समय दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य ने विभीषण को बताया कि-
असंख्यब्राह्मण्डपतिर्गोलोकेश: परात्पर:।
जातस्तयोर्वधाथार्य यदुवंशे हरि: स्वयंम्।।४१।
यादवेन्द्रो भूरिलीलो द्वारकायां विराजते। ४२/२
अनुवाद - असंख्य ब्रह्माण्डपति परात्पर गोलोकनाथ श्रीकृष्ण यदुवंश में अवतीर्ण हुए हैं। वे यादवेंद्र बहुत सी लीलाएँ करते हुए इस समय द्वारिका में विराजमान है।४१-४२/२।
राजंस्त्वं हि न जानसि परिपूर्णतमं हरिम्।
सुराणां महदर्थाय जातं यदुकुले स्वयंम्।
भुवो भारावताराय भक्तानां रक्षणाय च।।४५।
भूत्वा यदुकुले साक्षाद् द्वारकायां विराजते।
तेन कृष्णेन पुत्रोऽयं प्रदुम्नो यादवेश्वरः।
उग्रसेनमखार्थाय जगज्नेतुं प्रणोदित:।।४६।
अनुवाद - राजन ! तुम नहीं जानते कि परिपूर्णतम परमात्मा श्रीहरि, देवताओं का महान कार्य सिद्ध करने के लिए यादवों के कुल में अवतीर्ण हुए हैं। पृथ्वी का भार उतरने और भक्तों की रक्षा करने के लिए यदुकुल में अवतीर्ण हो वे साक्षात भगवान द्वारिकापुरी में विराजते हैं। उन्हीं श्रीकृष्ण ने उग्रसेन के यज्ञ की सिद्धि के लिए सम्पूर्ण जगत को जीतने के निमित्त अपने पुत्र यादवेश्वर प्रद्युम्न को भेजा है।४५- ४६।
▪️यादवों के उसी विश्वजित् युद्ध के समय जब श्रीकृष्ण के द्वारा महान बलशाली दैत्यराज शकुनि मारा गया तब उसकी पत्नी मदालसा ने हाथ जोड़कर श्रीकृष्ण से जो कुछ कहा उससे भी सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण गोप जाति के यदुवंश के वृष्णि कुल में अवतीर्ण हुए थे। जिसका वर्णन गर्गसंहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय- (४२) के श्लोक संख्या- (६) और (७) में कुछ इस प्रकार लिखा गया है-
भारावताराय भुवि प्रभो त्वं जातो यदूनां कुल आदिदेव।
ग्रसिष्यसे पासि भवं निधाय गुणैर्न लिप्तोऽसि नमामितुभ्यम्।। ६।
मदात्मजं पालय भीत-भीतममुष्य हस्तं कुरु शीर्षि्ण देव।
भर्त्रा कृते में किल तेऽपराधं क्षमस्व देवेश जगन्निवास।। ७।
अनुवाद- (६-७)
प्रभो आदि देव ! आप भूतल का भार उतारने के लिए यदुकुल में अवतरित हुए हैं। आप ही संसार के स्रष्टा एवं पालक है, और प्रलयकाल आनेपर आप ही इसका संहार भी करते हैं। किन्तु आप कभी भी गुणों में लिप्त नहीं होते। मैं आपकी अनुकूलता प्राप्त करने के लिए आपके चरणों को प्रणाम करती हूँ। मेरा पुत्र बहुत डरा हुआ है। आप इसकी रक्षा कीजिए। देव ! इसके मस्तक पर अपना वरद हस्त रखिए। देवेश ! जगन्निवास ! मेरे पति ने जो अपराध किया है उसे क्षमा कीजिए।
▪️इसी तरह से जब सभी देव मिलकर ब्रह्माजी का विवाह अहीर कन्या गायत्री से भगवान् विष्णु के निर्देशन में कराते हैं, तब ब्रह्माजी की पत्नी सावित्री क्रोध से तिलमिलाकर अहीर कन्या गायत्री सहित देवताओं को शापित करती हैं। उसी समय वहाँ उपस्थित विष्णु को भी सावित्री शाप दे देती हैं। उसी शाप के विधान से भी गोपेश्वर श्रीकृष्ण को यदुकुल में जन्म लेना पड़ता। इस बात की पुष्टि- पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय- (१७) के श्लोक संख्या-(१६१) से होती है। जिसमें सावित्री विष्णु को शाप देते हुए कहती हैं कि-
यदा यदुकुले जातः कृष्णसंज्ञो भविष्यसि।
पशूनां दासतां प्राप्य चिरकालं गोप रूपेण भ्रमिष्यसि ।।१६१।
अनुवाद - हे विष्णु ! जब तुम यदुवंश में जन्म लोगे, तो तुम कृष्ण के नाम से जाने जाओगें। उस समय तुम पशुओं (गायों) के सेवक बनकर लम्बे समय तक इधर-उधर भ्रमण करोगे।१६१।
▪️इसी तरह से बलरामजी को भी यदुकुल में उत्पन्न होने की पुष्टि गर्गसंहिता के बलभद्र खण्ड के श्लोक संख्या -(१३) और (१४) से होती है। जिसमें बलराम जी स्वयं अपने पार्षदों से कहते हैं कि -
हे हलमुसले यदा-यदा युवयोः स्मरणंं करिष्यमि।
तदा तदा मत्युर आविर्भूते भवतम्।। १३
अनुवाद - हे हल और मुसल ! मैं जब-जब तुम्हारा स्मरण करूँ, तब-तब तुम मेरे सामने प्रकट हो जाना।
हे कवच ! तुम भी वैसे ही प्रकट हो जाना। हे पाणिनि, व्यास तथा कुमुद आदि मुनियों ! हे कोटि-कोटि रूद्रों ! गिरिजापति शंकर जी ! ग्यारह रुद्रों ! गन्धर्वों ! वासुकि आदि नागराजों ! निवातकवच आदि दैत्यों ! हे वरूण और कामधेनु ! मैं भूमण्डल पर भारतवर्ष में यदुकुल में अवतार लूँगा। तुम सब वहाँ आकर सदा सर्वदा मेरा दर्शन करना।१३-१४।
✳️ अतः उपर्युक्त सभी श्लोकों से सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण गोप अथवा आभीर जाति के यदुवंश के वृष्णि कुल में हुआ है। किन्तु इस सम्बन्ध में ज्ञात हो कि- यदुवंश - वैष्णव वर्ण के गोपजाति का ही प्रमुख वंश है। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण को जब वंश में जन्म लेने की बात कही जाती है तब उनके लिए यदुवंश का नाम लिया जाता है। किन्तु जब भगवान श्रीकृष्ण को जाति में जन्म लेने की बात कही जाती है तो उनके लिए गोपजाति या आभीर (आहिर) जाति का नाम लिया जाता है। इसमें दोनों तरह से बात एक ही है। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण को अनेक बार यदुवंश के साथ-साथ गोपजाति में भी जन्म लेने की बात कही गई है। जैसे-
गोपेश्वर श्रीकृष्ण को गोपजाति में जन्म लेने की बात हरिवंश पुराण के विष्णु पर्व के ग्यारहवें अध्याय के श्लोक संख्या -५८ में कही गई है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि-
एतदर्थं च वासोऽयंव्रजेऽस्मिन् गोपजन्म च।
अमीषामुत्पथस्थानां निग्रहार्थं दुरात्मनाम्।।५८।
अनुवाद - इसीलिए ब्रज में मेरा यह निवास हुआ है ; और इसीलिए मैंने गोपों में अवतार ग्रहण किया है।
▪️भगवान श्रीकृष्ण को भू-तल पर गोपकुल में अवतीर्ण होने की बात गायत्री संग ब्रह्माजी के विवाह के समय तब होती है जब इन्द्र गोप कन्या गायत्री को लेकर ब्रह्माजी से विवाह हेतु यज्ञ स्थल पर ले गए थे। तब सभी गोप अपना मुख्य शस्त्र लकुटि- दण्ड (लाठी- डण्डा) के साथ अपनी कन्या गायत्री को खोजते हुए ब्रह्मा के यज्ञ स्थल में पहुँचे। वहाँ पहुँच कर गायत्री के माता-पिता ने पूछा कि- मेरी कन्या को कौन यहाँ लाया है ? तब उनकी यह बात सुनकर तथा उनके क्रोध का अन्दाजा लगाकर वहाँ उपस्थित सभी देवता और ऋषि मुनि भयभीत हो गए। तभी वहाँ उपस्थित विष्णु भगवान् गोपों के सामने उपस्थित हो गए और उस अवसर पर जो कुछ गोपों से कहा उसका वर्णन पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय- (१७) के श्लोक संख्या -(१६) से (२०) में मिलता है। जिसमें भगवान्- विष्णु यज्ञ-स्थल में सबके समक्ष गोपों से कहते हैं कि -
युष्माभिरनया आभीरकन्याया
तारितो गच्छ ! दिव्यान्लोकान्महोदयान्।
युष्माकं च कुले चापि देवकार्यार्थसिद्धये।१६।
अवतारं करिष्येहं सा क्रीडा तु भविष्यति।
यदा नन्दप्रभृतयो ह्यवतारं धरातले।१७।
करिष्यन्ति तदा चाहं वसिष्ये तेषु मध्यतः।
युष्माकं कन्यकाः सर्वा वसिष्यन्ति मया सह।। १८।
तत्र दोषो न भविता न द्वेषो न च मत्सरः।
करिष्यन्ति तदा गोपा भयं च न मनुष्यकाः।।१९।
न चास्याभविता दोषः कर्मणानेन कर्हिचित्।
श्रुत्वा वाक्यं तदा विष्णोः प्रणिपत्य ययुस्तदा ।।२०।
अनुवाद:- हे आभीरों ( गोपों ) इस तुम्हारी आभीर कन्या गायत्री के द्वारा उद्धार किये गये तुम सब लोग दिव्यलोकों को जाओ तुम्हारी अहीर जाति के यदुकुल के अन्तर्गत वृष्णिकुल में देवों के कार्य की सिद्धि के लिए मैं अवतरण करुँगा।१६।
• और वहीं मेरी लीला (क्रीडा) होगी। उसी समय धरातल पर नन्द आदि का भी अवतरण होगा।१७।
• तब मैं उनके बीच रहूँगा। तुम्हारी सभी पुत्रियाँ मेरे साथ ही रहेंगी।१८।
• तब वहाँ कोई पाप, द्वेष और ईर्ष्या नहीं होगी। गोप (आभीर) लोग भी किसी को भय नहीं देंगे।१९।
• इस कार्य (ब्रह्मा से विवाह करने) के फलस्वरूप इस (तुम्हारी पुत्री को) कोई पाप नहीं लगेगा। विष्णु के ये वचन सुनकर वे सभी उन्हें प्रणाम करके वहाँ से चले गए।२०।
किन्तु जाते समय गोपगणों ने भी विष्णु से यह वचन करवाया कि आप निश्चित रूप से गोपकुल में ही जन्म लेंगे। जिसका वर्णन इसी अध्याय के श्लोक -२१ में है जिसमें गोपगण भगवान-विष्णु से कहते हैं कि -
एवमेष वरो देव यो दत्तो भविता हि मे।
अवतारः कुलेऽस्माकंं कर्तव्योधर्मसाधनः।। २१।
अनुवाद - हे देव ! ऐसा ही हो। आपने जो वर दिया, वैसा ही हो। आप हमारे कुल में धर्मसाधन के कर्तव्य के लिए अवश्य अवतार लेंगे।२१।
तब विष्णु ने भी गोपों को ऐसा ही वचन दिया। तत्पश्चात सभी गोप प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने घर चले गए।
उसी समय अहीर कन्या गायत्री ने ब्रह्माजी की प्रथम पत्नी सावित्री जो विष्णु को यह शाप दे चुकी थी कि- हे विष्णु ! जब तुम यदुवंश में जन्म लोगे, तो तुम कृष्ण के नाम से जाने जाओगे। उस समय तुम पशुओं (गायों) के सेवक बन कर लम्बे समय तक इधर-उधर भटकते रहोगे। उस शाप को गायत्री ने वरदान में बदलते हुए विष्णु से जो कहा उसका वर्णन- स्कन्द पुराण खण्ड- (६) के नागर खण्ड के अध्याय- १९३ के श्लोक -(१४) और (१५) में मिलता है। जिसमें गायत्री विष्णु से कहतीं हैं कि -
तेनाकृत्येऽपि रक्तास्ते गोपा यास्यन्ति श्लाघ्यताम्॥
सर्वेषामेव लोकानां देवानां च विशेषतः ॥१४॥
यत्रयत्र च वत्स्यंन्ति मद्वं शप्रभवानराः॥
तत्रतत्र श्रियो वासो वनेऽपि प्रभविष्यति॥१५॥
अनुवाद -(१४-१५)
• आभीर कन्या गायत्री विष्णु से कहती है- हे विष्णो ! (श्रीकृष्ण) तुम्हारे रक्त सम्बन्धी (blood relative) सभी गोप बिना कुछ किये ही तुम्हारे द्वारा प्रसिद्धि को प्राप्त हो जाऐंगे। और इनकी प्रशंसा विशेषतः देवताओं सहित सभी लोकों में होगी।
• पुन: गायत्री विष्णु से कहती हैं- मेरे गोप वंश के लोग जहाँ भी रहेंगे वहाँ श्री (सौभाग्य और समृद्धि) विद्यमान रहेगी, चाहे वह स्थान जंगल ही क्यों न हो।१५।
✳️ ज्ञात हो उपर्युक्त श्लोकों में गायत्री द्वारा जिस विष्णु को सम्बोधित किया जा रहा है वह क्षुद्र (छोटे) विष्णु हैं जो परमेश्वर श्रीकृष्ण के एक अंश से भूतल पर श्रीकृष्ण का ही प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ऐसे ही अनन्त ब्रह्माण्ड में अनन्त क्षुद्र (छोटे) विष्णु हैं जो परमेश्वर श्रीकृष्ण के एक-एक अंश से उनका प्रतिनिधित्व किया करते हैं। अतः गायत्री द्वारा भूलोक पर विष्णु नाम का वास्तविक सम्बोधन परमेश्वर श्रीकृष्ण के लिए ही है।
अतः उपर्युक्त सभी महत्वपूर्ण श्लोकों के आधार पर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि- गोपों में श्रीकृष्ण का रक्त सम्बन्ध है और धर्म स्थापना हेतु गोपेश्वर श्रीकृष्ण का जन्म या अवतरण, वैष्णव वर्ण के अन्तर्गत गोप जाति (अहीर जाति) के यादव वंश में ही होता है जहाँ सभी गोप उनके रक्त सम्बन्धी हैं। अन्य किसी जाति या वंश में उनका अवतरण नहीं।
यही कारण है कि भगवान श्रीकृष्ण, चाहे गोलोक में हों या भूलोक में हों, वे सदैव गोपवेष में गोपों के ही साथ ही रहते हैं, और सभी लीलाएँ उन्हीं के साथ ही करते हैं। इसीलिए गोपों को श्रीकृष्ण का सहचर (सहगामी) अर्थात् साथ-साथ चलने वाला भी कहा जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण को सदैव गोपवेष में गोपों के साथ रहने की पुष्टि - हरिवंश पुराण के विष्णुपर्व के अध्याय -(३) के श्लोक -(३४) से होती है। जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अपने जन्म से पूर्व योग माया से कहते हैं कि-
मोहहित्वा च तं कंसमेका त्वं भोक्ष्यसे जगत्।
अहमप्यात्मनो वृत्तिं विधास्ये गोषु गोपवतः।। ३४।
अनुवाद - तुम उस कंस को मोह में डालकर अकेली ही सम्पूर्ण जगत का उपभोग करोगी। और मैं भी व्रज में गौओं के बीच में रहकर गोपों के समान ही अपना व्यवहार बनाऊँगा।
ये तो रही बात भूलोक की। किन्तु गोपेश्वर श्रीकृष्ण गोलोक में भी अपने गोपों के साथ सदैव गोपवेष में ही रहते हैं। इस बात की पुष्टि -ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्म-खण्ड के अध्याय
(२)- के श्लोक -(२१) से होती है। जिसमें लिखा गया है कि -
स्वेच्छामयं सर्वबीजं सर्वाधारं परात्परम्।
किशोरवयसं शश्वद्गोपवेषविधायकम्।।२१।
अनुवाद- वे ही प्रभु स्वेच्छामयी सभी के मूल- (आदि-कारण) सर्वाधार तथा परात्पर- परमात्मा हैं। उनकी नित्य किशोरावस्था रहती है और वे प्रभु गायों के उस लोक (गोलोक) में सदा गोप (आभीर) भेष में रहते हैं।२१।
अतः इस उपर्युक्त श्लोक से सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण चाहे गोलोक में हों या भूलोक, दोनों स्थानों पर वे सदैव गोपवेष में गोपों के साथ ही रहते हैं।
यही कारण है कि भगवान श्रीकृष्ण के एक हजार नामों में एक नाम "गोपवेशः" और गोपकृत भी है जिसका क्रमशः अर्थ है- सर्वदा गोप (अहीर) वेश में रहने वाला तथा नूतन गोपों का निर्माण करने वाला
इसकी पुष्टि- गर्गसंहिता के अश्वमेधखण्ड के अध्याय -(५९) के श्लोक- (३०) से होती है।
वने वत्सचारी महावत्सहारी
बकारिः सुरैः पूजितोऽघारिनामा ।
वने वत्सकृद्गोपकृद्गोपवेषः*
कदा ब्रह्मणा संस्तुतः पद्मनाभः ॥३०।
गोपकृत - अर्थात् = नूतन गोपों का निर्माण करने वाला।
गोपवेशः - अर्थात् = सर्वदा गोप (अहीर) वेश में रहने वाला
इसी तरह से हरिवंश पुराण के भविष्य पर्व के अध्याय- (१००) के श्लोक - (२६) और (४१) में भगवान श्रीकृष्ण को गोप और यादव दोनों होने की पुष्टि पौण्ड्रक-श्रीकृष्ण के समय होती है। उस युद्ध के मध्य श्रीकृष्ण से पौण्ड्रक कहता है कि-
स ततः पौण्ड्रको राजा वासुदेवमुवाच ह।
भो भो यादव गोपाल इदानिं क्व गतो भवात।। २६।
गोपोऽहं सर्वदा राजन् प्राणिनां प्राणदः सदा।
गोप्ता सर्वेषु लोकेषु शास्ता दुष्टस्य सर्वदा।। ४१।
अनुवाद - ओ यादव ! ओ गोपाल ! इस समय तुम कहाँ चले गए थे ? आजकल मैं ही वासुदेव नाम से विख्यात हूंँ।२६।
तब भगवान श्रीकृष्ण ने पौण्ड्रक से कहा-
• राजन मैं सर्वदा गोप हूँ, प्राणियों का सदा प्राण दान करने वाला हूँ, तथा सम्पूर्ण लोकों का रक्षक तथा सर्वदा दुष्टों का शासक हूँ। ४१।
इसी प्रकार से एक बार श्रीकृष्ण की तरह-तरह की अद्भुत लीलाओं को देखकर गोपों को संशय होने लगा कि कृष्ण कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। ये या तो कोई देव हैं या कोई ईश्वरीय शक्ति। और इस रहस्य को श्रीकृष्ण अपने गोपों से गुप्त रखना चाहते थे, ताकि मेरी बाल-लीला बाधित न हो। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण उनके संशय को दूर करने के लिए हरिवंश पुराण के विष्णुपर्व के अध्याय- (२०) के श्लोक- (११) में अपने सजातीय गोपों से कहते हैं कि-
मन्यते मां यथा सर्वे भवन्तो भीमविक्रमम्।
तथाहं नावमन्तव्यः स्वजातीयोऽस्मि बान्धवः।।११।
अनुवाद - आप सब लोग मुझे जैसा भयानक पराक्रमी समझ रहे हैं, वैसा मानकर मेरा अनादर न करें। मैं तो आप लोगों का सजातीय (गोप जाति का) भाई बन्धु ही हूँ।
इस प्रकार से यह अध्याय (एक)- इस जानकारी के साथ समाप्त हुआ कि- गोपेश्वर श्रीकृष्ण गोलोक और भू-लोक दोनों स्थानों पर सदैव गोपवेष में अपने गोपकुल के गोपों के साथ ही रहते हैं। अब इसके अगले अध्याय- (दो) में गोप (यादवों) की उत्पत्ति के बारे में बताया गया है। उसको भी इस अध्याय के साथ जोड़कर पढे़े।
भाग- (ख) ऐतिहासिक परिचय-
यह भाग उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो भगवान श्रीकृष्ण को अनैतिहासिक मानकर श्रीकृष्ण को एक काल्पनिक (व्यक्ति) चरित्र ( Character) मानते हैं। जबकि उन लोगों को यह पता नहीं है कि श्रीकृष्ण की सत्ता काल्पनिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक है। इसी बात को अच्छी तरह से समझने के लिए इसे दो प्रमुख भागों में बांटा गया है-
(1)पुरातात्विक परिचय (2)- लिपिकीय परिचय।
(1) पुरातात्विक परिचय -
कृष्ण अस्तित्व के ऐतिहासिक व वैदिक साक्ष्य-
भगवान श्रीकृष्ण का ऐसा परिचय जिसे शायद ही आपने पहले कभी सुना या पढ़ा होगा। 3228 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् में श्रीमुख संवत्सर, भाद्रपद अथवा श्रावणपद कृष्ण अष्टमी, (21 जुलाई, बुधवार के दिन मथुरा में कंस के कारागार में माता देवकी के गर्भ से कृष्ण ने जन्म लिया उनके पिता- श्री वसुदेव जी थे । उसी दिन वासुदेव ने नन्द-यशोदा जी के घर गोकुल में छोड़ा।
"उत्तर- तर्क सम्मत समाधान -
उत्तर-१
यह मोहनजो-दारो, लरकाना जिले, सिंध (अब पाकिस्तान में) के पुरातात्विक स्थल है जहाँ से खोदी गई एक साबुन की टेबलेट प्राप्त है।
विशेष:-
टेबलेट- सोपस्टोन (जिसे स्टीटाइट या सोपरॉक के नाम से भी जाना जाता है) एक टैल्क-शिस्ट है, जो एक प्रकार की रूपांतरित चट्टान है। यह मुख्य रूप से मैग्नीशियम से भरपूर खनिज टैल्क से बना है। यह डायनेमोथर्मल मेटामोर्फिज्म और मेटासोमैटिज्म द्वारा निर्मित होता है, जो उन क्षेत्रों में होता है जहां टेक्टोनिक प्लेटें नीचे जाती हैं, गर्मी और दबाव से, तरल पदार्थ के प्रवाह के साथ, लेकिन पिघले बिना चट्टानों को बदलती हैं। यह हजारों वर्षों से नक्काशी का एक माध्यम रहा है।
यह टेबलेट भगवान कृष्ण के जीवन की एक महत्वपूर्ण कहानी के साथ अद्भुत समानता दर्शाता है।
टैबलेट में एक बालक को दो पेड़ों को उखाड़ते हुए दिखाया गया है। इन दोनों पेड़ों से दो मानव आकृतियाँ निकल रही हैं और कुछ पुरातत्वविदों इसे भगवान कृष्ण से जुड़ी तारीखें तय करने के लिए एक दिलचस्प पुरातात्विक खोज करार दे रहे हैं।
यह छवि यमलार्जुन प्रकरण- (भागवत और हरिवंश पुराण दोनों में उल्लिखित) से मिलती जुलती है।
टैबलेट पर मौजूद युवा लड़के के भगवान कृष्ण होने की बहुत संभावना है, और पेड़ों से निकलने वाले दो इंसान दो शापित गंधर्व हैं, जिन्हें नलकूबर और मणिग्रीव के रूप में पहचाना जाता है।
ऊपर: मोहेंजो-दारो, लरकाना जिला, सिंध (अब पाकिस्तान में) के पुरातात्विक स्थल से सोपस्टोन टैबलेट की खुदाई की गई। स्रोत - मैके की रिपोर्ट, भाग 1, पृष्ठ 344-45, भाग 2, प्लेट 90, वस्तु संख्या। डीके 10237.
दिलचस्प बात यह है कि मोहनजो-दारो में खुदाई करने वाले डॉ. ईजेएच मैके" ने भी इस छवि की तुलना यमलार्जुन प्रकरण से की है। इस विषय के एक अन्य विशेषज्ञ प्रो. वीएस अग्रवाल ने भी इस पहचान को स्वीकार किया है। इसलिए, यह काफी सम्भव है कि सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग भगवान कृष्ण की कहानियों से अवगत थे। बेशक, इस तरह का एक और पृथक साक्ष्य तथ्यों को स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता है। हालाँकि, सबूतों को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इस सन्दर्भ में और अधिक अध्ययन किये जाने की आवश्यकता है।
द्वारिका के साथ सिन्धु घाटी सभ्यता के स्थलों (पूरे उपमहाद्वीप में) की भौगोलिक निकटता को देखते हुए, इस कोण को भी ध्यान में रखते हुए अनुसंधान किया जाना चाहिए।
जबकि मोहनजो-दारो शब्द का आम तौर पर स्वीकृत अर्थ 'मुर्दों का टीला' है, इसके समानांतर अर्थ - 'मोहन का टीला' की जांच की भी कुछ गुंजाइश है। समानता एक संयोग से भी अधिक हो सकती है!
रुचि रखने वालों के लिए मोहनजो-दारो की पृष्ठभूमि की जानकारी (स्रोत:www.harappa.com)
मोहनजो-दारो की खोज मूल रूप से 1922 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के एक अधिकारी आरडी बनर्जी ने की थी, हड़प्पा में प्रमुख खुदाई शुरू होने के दो साल बाद।
बाद में, 1930 के दशक के दौरान "जॉन मार्शल, केएन दीक्षित, अर्नेस्ट मैके" और कई अन्य लोगों के निर्देशन में साइट( स्थल ) पर बड़े पैमाने पर खुदाई की गई।
हालाँकि उनके तरीके उतने वैज्ञानिक या तकनीकी रूप से अच्छे नहीं थे जितने होने चाहिए थे, फिर भी वे बहुत सारी जानकारी लेकर आए जिसका अभी भी विद्वानों द्वारा अध्ययन किया जा रहा है।
इस स्थल पर अन्तिम प्रमुख उत्खनन परियोजना 1964-65 में स्वर्गीय डॉ. जीएफ डेल्स द्वारा की गई थी, जिसके बाद मौसम से उजागर संरचनाओं को संरक्षित करने की समस्याओं के कारण खुदाई रोक दी गई थी।
1964-65 के बाद से साइट पर केवल बचाव उत्खनन, सतह सर्वेक्षण और संरक्षण परियोजनाओं की अनुमति दी गई है।
इनमें से अधिकांश बचाव अभियान और संरक्षण परियोजनाएं पाकिस्तानी पुरातत्वविदों और संरक्षकों द्वारा संचालित की गई हैं।
(1980) के दशक में व्यापक वास्तुशिल्प दस्तावेज़ीकरण, विस्तृत सतह सर्वेक्षण, सतह स्क्रैपिंग और जांच के साथ मिलकर जर्मन और इतालवी सर्वेक्षण टीमों द्वारा डॉ. माइकल जानसन (आरडब्ल्यूटीएच) और डॉ. मौरिज़ियो तोसी (आईएसएमईओ) के नेतृत्व में किया गया था।
शिलापट पर श्रीकृष्ण जन्म के प्रमाण-
भगवान श्रीकृष्ण के मथुरा में जन्म लेने को लेकर भारतीयों में कोई संदेह नहीं। धर्मग्रंथों में उनकी न जाने कितनी लीलाओं का वर्णन है। इसके पुरातात्विक प्रमाण भी मौजूद हैं, लेकिन आमतौर पर जानकारी में नहीं हैं। सत्तानवे साल पहले गताश्रम टीला से मिली मूर्ति को भगवान कृष्ण के जन्म का पुरातत्व में पहला प्रमाण है।
धर्मग्रन्थ-
एक व्यक्तित्व के रूप में कृष्ण का विस्तृत विवरण सबसे पहले ऋग्वेद और उसके बाद छान्दोग्योपनिषद में मिलता है।
फिर बहुत बाद में महाकाव्य महाभारत में कृष्ण के विषय में लिखा गया है , जिसमें कृष्ण को विष्णु के पूर्ण-अवतार के रूप में दर्शाया गया है। जबकि महाभारत से पूर्व लिखित ग्रन्थ ब्रह्म वैवर्तपुराण में कृष्ण को विष्णु का भी मूल कहा गया है।
महाभारत के बाद के परिशिष्ट हरिवंशपुराण में कृष्ण के बचपन और युवावस्था का एक विस्तृत संस्करण है। इसके अतिरिक्त
भारतीय-यूनानी मुद्रण में भीकृष्ण चरित्र अंकित हैं।-
भारत में अब उन सिक्को को वैष्णव दर्शन से सम्बन्धित माना जाता है। सिक्कों पर प्रदर्शित देवताओं को विष्णु के अवतार बलराम -( संकर्षण) के रूप में देखा जाता है जिसमें गदा और हल और वासुदेव-कृष्ण , शंख और सुदर्शन चक्र दर्शाये हुए हैं।
प्राचीन संस्कृत व्याकरण भाष्यकार पतंजलि ने अपने महाभाष्य में भारतीय ग्रन्थों के देवता कृष्ण और उनके सहयोगियों के कई सन्दर्भों का उल्लेख किया है।
पाणिनी की श्लोक- (३/१/२६) पर अपनी टिप्पणी में, वह कंसवध अथवा कंस की हत्या का भी उल्लेख करते हैं, जो कि कृष्ण से सम्बन्धित किंवदन्तियों का एक महत्वपूर्ण अंग है।
पाणिनि का समय भी ईसा पूर्व 800 से 400 के मध्य है, विद्वान् जन पाणिनि का समय भगवान बुद्ध से पूर्व बताते हैं। पाणिनी पणि ( फोनीशियन ) जाति से सम्बन्धित थे जिन्होंने भाषा और लिपि पर कार्य किया।
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दुनियाँ की प्रथम लिपि फोनेशियन है पणि लोगो की देन है जिससे कालान्तर में दुनियाभर की अन्य लिपियाँ विकसित हुई । पणियों का उल्लेख ऋग्वेद में हुआ है ।
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बौद्ध ग्रन्थ पाली भाषा और ब्राह्मी लिपि में लिखे गये हैं।
ब्राह्मी लिपि के विषय में नीचे कुछ विश्लेषण है। जिसमें कृष्ण चरित्र को लिखा गया है।
हेलीडियोरस स्तम्भ और अन्य शिलालेख-
मध्य भारतीय राज्य मध्य प्रदेश में औपनिवेशिक काल के पुरातत्वविदों ने एक ब्राह्मी लिपि में लिखे शिलालेख के साथ एक स्तम्भ की खोज की थी। आधुनिक तकनीकों का उपयोग करते हुए, इसे १२५ और १०० ईसा पूर्व के बीच का घोषित किया गया है और ये निष्कर्ष निकाला गया कि यह एक इंडो-ग्रीक प्रतिनिधि द्वारा एक क्षेत्रीय भारतीय राजा के लिए बनवाया गया था जो ग्रीक राजा एण्टिलासिडास के एक राजदूत के रूप में उनका प्रतिनिधि था। इसी इंडो-ग्रीक के नाम अब इसे हेलेडियोरस स्तंभ के रूप में जाना जाता है। इसका शिलालेख "वासुदेव" के लिए समर्पण है जो भारतीय परम्परा में कृष्ण का दूसरा नाम है।
कई विद्वानों का मत है कि इसमें "वासुदेव" नामक देवता का उल्लेख है, क्योंकि इस शिलालेख में कहा गया है कि यह " भागवत हेलियोडोरस" द्वारा बनाया गया था और यह " गरुड़ स्तंभ" (दोनों विष्णु-कृष्ण-संबंधित शब्द हैं)।
इसके अतिरिक्त, शिलालेख के एक अध्याय में कृष्ण से संबंधित कविता भी शामिल हैं महाभारत के अध्याय ११/७ का सन्दर्भ देते हुए बताया गया है कि अमरता और स्वर्ग का रास्ता सही ढंग से तीन गुणों का जीवन जीना है: स्व- संयम ( दमः ), उदारता ( त्याग ) और सतर्कता ( अप्रामदाह )।
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हेलियोडोरस शिलालेख एकमात्र प्रमाण नहीं है। तीन हाथीबाड़ा शिलालेख और एक घोसुण्डी शिलालेख,जो कि राजस्थान राज्य में स्थित हैं।
और आधुनिक कार्यप्रणाली के अनुसार जिनका समयकाल 19 वीं सदी ईसा पूर्व है उनमें भी कृष्ण का उल्लेख किया गया है। पहली सदी ईसा पूर्व , संकर्षण (बलराम का एक नाम ) और वासुदेव का उल्लेख करते हुए, उनकी पूजा के लिए एक संरचना का निर्माण किया गया था। ये चार शिलालेख प्राचीनतम ज्ञात संस्कृत शिलालेखों में से एक है ।
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ये ब्राह्मी लिपि में, संस्कृत के प्राचीनतम शिलालेख हैं। हाथीबाड़ा शिलालेख, नगरी गाँव से प्राप्त हुए थे जो चित्तौड़गढ़ से 8 किलोमीटर उत्तर में है।
घोसुण्डी शिलालेख (द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व)
यह लेख कई शिलाखण्डों में टूटा हुआ है। इसके कुछ टुकड़े ही उपलब्ध हो सके हैं। इसमें एक बड़ा खण्ड उदयपुर संग्रहालय में सुरक्षित है।
घोसुण्डी का शिलालेख नगरी चित्तौड़ के निकट घोसुण्डी गांव में प्राप्त हुआ था इस लेख में प्रयुक्त की गई भाषा संस्कृत और लिपि ब्राह्मी है।
घोसुण्डी का शिलालेख सर्वप्रथम डॉक्टर देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर द्वारा पढ़ा गया यह राजस्थान में वैष्णव या भागवत संप्रदाय से संबंधित सर्वाधिक प्राचीन अभिलेख है।
इस अभिलेख से ज्ञात होता है कि उस समय तक राजस्थान में भागवत धर्म लोकप्रिय हो चुका था।
इसमें भागवत की पूजा के निमित्त शिला प्राकार बनाए जाने का वर्णन है
इस लेख में संकर्षण और वासुदेव के पूजागृह के चारों ओर पत्थर की चारदीवारी बनाने और गजवंश के सर्वतात द्वारा अश्वमेघ यज्ञ करने का उल्लेख है। इस लेख का महत्त्व द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में भागवत धर्म का प्रचार, संकर्षण तथा वासुदेव की मान्यता और अश्वमेघ यज्ञ के प्रचलन आदि में है।
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कई पुराणों में कृष्ण की जीवन कथा को बताया या कुछ इस पर प्रकाश डाला गया है ।
जैसा कि बताया जा चुका है कि ऋग्वेद की ऋचाओं को लिखने वाली पहली लिपि शारदा लिपि है। जिसका विकास ब्राह्मी लिपि से हुआ है। औ ब्राह्मी लिपि का निर्माण फिनीशियन लिपि के आधार पर हुआ। और पाणिनी फनीशी( पणि) भाषाविद् - पाणिनी ने संस्कृत व्याकरण अष्टाध्यायी का लेखन किया।
- ब्राह्मी लिपि एक प्राचीन लिपि है जिससे कई एशियाई लिपियों का विकास हुआ है। प्राचीन ब्राह्मी लिपि के उत्कृष्ट उदाहरण सम्राट अशोक (असोक) द्वारा ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में बनवाये गये शिलालेखों के रूप में अनेक स्थानों पर मिलते हैं। नये अनुसन्धानों के आधार 6 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के लेख भी मिले है। ब्राह्मी भी खरोष्ठी की तरह ही पूरे एशिया में फैली हुई थी।
- अशोक ने अपने लेखों की लिपि को 'धम्मलिपि' का नाम दिया है; उसके लेखों में कहीं भी इस लिपि के लिए 'ब्राह्मी' नाम नहीं मिलता। लेकिन बौद्धों, जैनों तथा ब्राह्मण-धर्म के ग्रंथों के अनेक उल्लेखों से ज्ञात होता है कि इस लिपि का नाम 'ब्राह्मी' लिपि ही रहा होगा।
- बौद्ध ग्रंथ 'ललितविस्तर' में 64 लिपियों के नाम दिए गए हैं। इनमें पहला नाम 'ब्राह्मी' है और दूसरा 'खरोष्ठी' है ।
- जैनों के 'पण्णवणासूत्र' तथा 'समवायांगसूत्र' में 16 लिपियों के नाम दिए गए हैं, जिनमें से पहला नाम 'बंभी' (ब्राह्मी) का है।
- 'भगवतीसूत्र' में सर्वप्रथम 'बंभी' (ब्राह्मी) लिपि को नमस्कार करके (नमो बंभीए लिविए) सूत्र का आरंभ किया गया है।
- 668 ई. में लिखित एक चीनी बौद्ध विश्वकोश 'फा-शु-लिन्' में ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का उल्लेख मिलता है। इसमें लिखा है कि, 'लिखने की कला का शोध दैवी शक्ति वाले तीन आचार्यों ने किया है; उनमें सबसे प्रसिद्ध ब्रह्मा है, जिसकी लिपि बाईं ओर से दाहिनी ओर को पढ़ी जाती है।'
- इससे यही जान पड़ता है कि ब्राह्मी भारत की सार्वदेशिक लिपि थी और उसका जन्म भारत में ही हुआ किन्तु बहुत-से विदेशी पुराविद मानते हैं कि किसी बाहरी वर्णमालात्मक लिपि के आधार पर ही ब्राह्मी वर्णमाला का निर्माण किया गया था। *****
- ब्यूह्लर जैसे प्रसिद्ध पुरालिपिविद की मान्यता रही कि ब्राह्मी लिपि का निर्माण फिनीशियन लिपि के आधार पर हुआ। इसके लिए उन्होंने एरण के एक सिक्के का प्रमाण भी दिया था। एरण मध्य प्रदेश के सागर जिले में स्थित एक प्राचीन नगर है, जिसका नाम ऐरिकिण भी मिलता है।
- एरण (सागर ज़िला, म.प्र.) से ताँबे के कुछ सिक्के मिले हैं, जिनमें से एक पर 'धमपालस' शब्द के अक्षर दाईं ओर से बाईं ओर को लिखे हुए मिलते हैं। चूंकि, सेमेटिक लिपियां भी दाईं ओर से बाईं ओर को लिखी जाती थीं, इसलिए ब्यूह्लर ने इस अकेले सिक्के के आधार पर यह कल्पना कर ली कि आरंभ में ब्राह्मी लिपि भी सेमेटिक लिपियों की तरह दाईं ओर से बाईं ओर को लिखी जाती थी।
- ओझा जी तथा अन्य अनेक पुरालिपिविदों ने ब्यूह्लर की इस मान्यता का तर्कयुक्त खंडन किया है। उस समय ओझा जी ने लिखा था, 'किसी सिक्के पर लेख का उलटा आ जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि सिक्के पर उभरे हुए अक्षर सीधे आने के लिए सिक्के के ठप्पे में अक्षर उलटे खोदने पड़ते हैं, अर्थात् जो लिपियां बाईं ओर से दाहिनी ओर लिखी जाती हैं उनके ठप्पों में सिक्कों की इबारत की पंक्ति का आरंभ दाहिनी ओर से करके प्रत्येक अक्षर उलटा खोदना पड़ता है, परंतु खोदनेवाला इसमें चूक जाए और ठप्पे पर बाईं ओर से खोदने लग जाए तो सिक्के पर सारा लेख उलटा आ जाता है, जैसा कि एरण के सिक्के पर पाया जाता है।' साथ ही, ओझा जी ने लिखा था, 'अब तक कोई शिलालेख इस देश में ऐसा नहीं मिला है कि जिसमें ब्राह्मी लिपि फ़ारसी की नाईं उलटी लिखी हुई मिली हो।'
- यह 1918 के पहले की बात है।
पालि भाषा एवं मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषाओं के सम्बन्ध में ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह भाषाविकास के क्रम में जो संस्कृत से माना जाता है वह ठीक नहीं।
यथार्थत: वैदिककाल से ही साहित्यिक भाषा के रूप में परिमार्जित करके संस्कृत के साथ साथ उससे मिलती जुलती लोकभाषाओं ने देश एवं कालभेदानुसार साहित्यिक प्राकृत भाषाओं का रूप धारण किया है।
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पालि भी अपनी पूरी विरासत संस्कृत से नहीं ले रही, क्योंकि उसमें अनके शब्दरूप ऐसे पाए जाते हैं जिसका मेल संस्कृत से नहीं, किन्तु उसका उत्पत्ति मिलान वेदों की भाषा से बैठता है।
उदाहरणार्थ- पालि एवं अन्य प्राकृतों में तृतीया बहुवचन के देवेर्भि, देवेहि, जैसे रूप मिलते हैं।
अकारान्त संज्ञाओं के ऐसे रूपों का संस्कृत में सर्वथा अभाव है, किंतु वैदिक में देवेभिर्, उतना ही सुप्रचिलित है जितना देवै:।
वैदिक भाषा में देवेभिर्- और दैवै: दोनों शब्द प्रचलन में रहे परन्तु पूर्व शब्द देवेभिर् ही है परन्तु लौकिक भाषा संस्कृत में देवै: ही प्रचलित है।
अतएव उक्त रूप की परम्परा पालि तथा प्राकृतों में वैदिक भाषा से ही उत्पन्न मानी जा सकती है।
उसी प्रकार पालि में 'यमामसे', 'मासरे', 'कातवे' आदि अनेक रूप ऐसे हैं जिनके प्रत्यय संस्कृत में पाए ही नहीं जाते, किन्तु वैदिक भाषा में विद्यमान हैं। *******
पालि के ग्रन्थों तथा अशोक की प्रशस्तियों से पूर्व का प्राकृत (लोकभाषाओं) में लिखित साहित्य उपलब्ध नहीं है तथा प्राकृत वैयाकरणों ने अपनी सुविधा के लिए संस्कृत को प्रकृति मानकर प्राकृत भाषा का व्याकरणात्मक विश्लेषण किया है और इसीलिए यह भ्रान्ति उत्पन्न हो गई है कि प्राकृत भाषाओं की उत्पत्ति संस्कृत से हुई।
पालि के कच्चान, मोग्गल्लान आदि व्याकरणों में यह दोष नहीं पाया जाता, क्योंकि वहाँ भाषा का वर्णन संस्कृत को प्रकृति मानकर नहीं किया गया।
पालि भाषा दीर्घकाल तक राज्य भाषा के रूप में भी गौरवान्वित रही है। भगवान बुद्ध ने पालि भाषा में ही उपदेश दिये थे। अशोक के समय में इसकी बहुत उन्नति हुई। उस समय इसका प्रचार भी विभिन्न बाहरी देशों में हुआ। अशोक के समय सभी लेख पालि भाषा में ही लिखे गए थे। यह कई देशो जैसे श्रीलंका, बर्मा तिब्बत आदि देशों की धर्म भाषा के रूप में सम्मानित हुई।
‘पाली’ भाषा का उद्भव गौतम बुद्ध से लगभग तीन सौ वर्ष पहले ही हो चुका था, किन्तु उसके प्रारम्भिक साहित्य का पता नहीं लगता। प्रत्येक भाषा का अपना साहित्य प्रारम्भिक अवस्था में कथा, गीत, पहेली आदि के रूप में रहता है और उसकी रूपरेखा तब तक लोगों को जबानी याद रहती है जब तक कि वह लेखबद्ध हो या ग्रन्थारूढ न हो जाय।
इस काल में पालि भाषा की जैसे उत्पत्ति हुई वैसे ही विकास भी हुआ। प्रारम्भ से लेकर लगभग तीन सौ वर्षों तक पालि भाषा जन साधारण के बोलचाल की भाषा रही, किन्तु जिस समय भगवान बुद्ध ने इसे अपने उपदेश के लिए चुना और इसी भाषा में उपदेश देना शुरू किया, तब यह थोड़े ही दिनों में शिक्षित समुदाय की भाषा होने के साथ राजभाषा भी बन गई।
‘पालि’ शब्द का सबसे पहला व्यापक प्रयोग हमें आचार्य बुद्धघोष की अट्टकथाओं और उनके विसुद्धिमग्ग में मिलता है।
परन्तु अश्वघोष ने बुद्धचरित संस्कृत भाषा में लिखा- वहाँ यह बात अपने उत्तर कालीन भाषा सम्बन्धी अर्थ से मुक्त है। आचार्य बुद्धघोष ने पालि शब्द -दो अर्थों में इसका प्रयोग किया है- (१) बुद्ध-बचन या मूल त्रिपिटक के अर्थ में (२) पाठ या मूल टिपिटक के पाठ अर्थ में।
‘पालि भाषा’ से तात्पर्य उस भाषा से लेते हैं जिसमें स्थविरवाद(थेरवाद)-बौद्धधर्म का तिपिटक और उसका सम्पूर्ण उपजीवी साहित्य रखा हुआ है। किन्तु ‘पालि’ शब्द का इस अर्थ में प्रयोग स्वयं पालि साहित्य में भी उन्नीसवीं शताब्दी से पूर्व कभी नहीं किया गया।
विहार की पालि भाषा के उदाहरण कच्चायन-व्याकरण में देखने को मिलते हैं।
मागधी ही मूल पालि भाषा है, जिसमें प्रथम कल्प के मनुष्य बोलते थे, जो ही अश्रुत वचन वाले शिशुओं की मूल भाषा है और जिसमें ही बुद्ध ने अपने धर्म का, मूल रूप से भाषण किया। इसी प्रकार महावंश के परिवर्द्धित अंश चोल वंश के परिच्छेद 37 की 244 वीं गाथा में कहा गया है “सब्बेसं मूलभासाय मागवाय निरुत्तीया” आदि। निश्चय ही सिंहली परम्परा अपनी इस मान्यता में बड़ी दृढ़ है कि जिसे हम आज पालि कहते हैं, वह बुद्धकालीन भारत में बोली जाने वाली मागध भाषा ही थी। बुद्ध बचनों की भाषा को ही सिंहली परम्परा ‘मागधी’ कहना नहीं चाहती, वह अट्टककथाओं तक की भाषा को बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में मागधी कहना ही अधिक पसन्द करती है। पालि शब्द वैदिक पल्लि- ( ग्राम) से विकसित है। जहाँ वाचन की स्वाभाविकता होती है।
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- यह बाँये से दाँये की तरफ लिखी जाती है।
- यह मात्रात्मक लिपि है। व्यञ्जनों पर मात्रा लगाकर लिखी जाती है।
- कुछ व्यञ्जनों के संयुक्त होने पर उनके लिये 'संयुक्ताक्षर' का प्रयोग (जैसे प्र= प् + र)
- वर्णों का क्रम वही है जो आधुनिक भारतीय लिपियों में है।
- सम्राट अशोक के ब्राह्मी लिपि में अंकित प्रमुख अभिलेख
- रुम्मिनदेई - स्तम्भलेख
- गिरनार - शिलालेख
- बराबर - गृहालेख
- मानसेहरा - शिलालेख
- शाहबाजगद्री - शिलालेख
- दिल्ली - स्तम्भलेख
- गुर्जर - लघु-शिलालेख
- मस्की- शिलालेख
- कान्धार - द्विभाषी शिलालेख
ब्राह्मी लिपि से उद्गम हुई कुछ लिपियाँ और उनकी आकृति एवं ध्वनि में समानताएं स्पष्टतया देखी जा सकती हैं। इनमें से कई लिपियाँ ईसा के समय के आसपास विकसित हुई थीं। इन में से कुछ इस प्रकार हैं-
- १-देवनागरी, २-बांग्ला लिपि, ३-उड़िया लिपि, ४-गुजराती लिपि, ५-गुरुमुखी, ६-तमिल लिपि, ७-मलयालम लिपि, ८-सिंहल लिपि, ९-कन्नड़ लिपि, तेलुगु लिपि, १०तिब्बती लिपि, ११-रञ्जना, प्रचलित १२-नेपाल, १३-भुंजिमोल, १४-कोरियाली, १५-थाई, १६-बर्मेली, १७-लाओ, १८-ख़मेर, १९-जावानीज़, २०-खुदाबादी लिपि आदि।
कन्या च निकृतिस्ताभ्यां भयन्नरकमेव च।
माया च वेदना चैव मिथुनन्त्विदमेतयोः । १८ ।।
तयोर्जज्ञेथ वै मायां मृत्युं भूतापहारिणम्।
वेदना च सुतं चापि दुः खं जज्ञेथ रौरवात् ।१९ ।।
18. निकृति उनकी पुत्री थी। उनसे भय और नरक उत्पन्न हुए, जिनकी पत्नियाँ माया और वेदना थीं।
19. उन दोनों में से, माया ने प्राणियों का संहार करने वाले मृत्यु को जन्म दिया । और वेदना ने रौरव (नरक) से दुःख नामक पुत्र को जन्म दिया।
अस्मभ्यमस्य वेदनं दद्धि सूरिश्चिदोहते ॥४॥
(असुन्वन्तम्)= अभिषवादिनिष्पादनपुरुषार्थरहितम् (समम्)= सर्वम् (जहि)= मारो- हन् धातु लोटलकार । (दूणाशम्)= दुःखेन नाशनीयम् (यः)=जो (न)= निषेधे (ते)= तव (मयः)= सुखम् (अस्मभ्यम्) (अस्य) (वेदनम्)= धनम् (दद्धि) धर । अत्र दध धारण इत्यस्माद्बहुलं छन्दसीति शपो लुक् व्यस्ययेन परत्मैपदञ्च । (सूरिः) =विद्वान् (चित्) इव (ओहते) व्यवहारान् वहति । अत्र वाच्छन्दसीति संप्रसारणं लघूपधगुणः ॥ ४ । |
(असुन्वन्तम्) पदार्थों के सार खींचने आदि पुरुषार्थ से रहित (दूणाशम्) दुःख से विनाशने योग्य (समम्) समस्त को (जहि) मारो (यः) जो (सूरिः) विद्वान् (चित्) समान (ओहते) व्यवहारों की प्राप्ति करता है (ते) तुम्हारे (मयः) सुख को (न) नही (अस्य) इसके (वेदनम्) धन को (अस्मभ्यम्) हमारे लिए (दद्धि) याच्ञायाम् निघण्टुः । अयं धातुरित्यन्ये । दे दो ॥ ४ । |
उत शुष्णस्य धृष्णुया प्र मृक्षो अभि वेदनम्। पुरो यदस्य सम्पिणक् ॥१३॥
1.बोधिसत्त
2.सब्बगुणाकार
3.कच्चान
4.मोग्गल्लान
5.सद्दनीति
बोधिसत्त और सब्बगुणाकार अधिक प्राचीन व्याकरण है, जो वर्तमान में उपलब्ध नहीं है।
पालि भाषा में कच्चायन व्याकरण में अक्खरापादयो एकचत्तालिसं अर्थात (41) वर्ण माने गए है तथा मोग्गल्लान
व्याकरण में तेचत्तालीस-क्खरा वण्णा अर्थात (43) वर्ण माने जाते है। पाली भाषा में मोग्गल्लान व्याकरण
अधिक प्रचलित है। प्रस्ततु लेख में मोग्गल्लान व्याकरण का आधार लिया गया है।
स्वर
पालि भाषा में दसादो सरा अर्थात (10) स्वर है।
अ,आ, इ, ई, उ, ऊ, एँ, ऐ , ओँ, ओ।
द्वेद्वे सवण्णा अर्थात दो-दो स्वर सवर्ण कहे गए है। पुब्बो रस्सो अर्थात पूर्व स्वर हृस्व जाता है और परोदीघो अर्थात बाद का स्वर दीर्घ माना जाता है।
व्यञ्जन
पालि भाषा में (33) व्यञ्जन है।
| क | ख | ग | घ | ङ् |
| च | छ | ज | झ | ञ |
| ट | ठ | ड | ढ | ण |
| त | थ | द | ध | न |
| प | फ | ब | भ | म |
| य | र | ल | व | |
| स | ह | ळ | अं |
पञ्च पञ्चका वग्गा का तात्पर्य पाँच- पाँच वण्ण के पाँच वग्ग है-जसे कवग्ग, चवग्ग, टवग्ग,तवग्ग,पवग्ग. बिन्दु निग्गहीतं अर्थात ‘अं’ को निग्गहित- निग्रहित (अनुस्वार) कहते है।
"जो वर्ण पालि भाषा में नहीं हैं उनके लिए प्रयुक्त वर्ण"
- लृ ऐ, औ पालि भाषा में नहीं है.
- रेफ भी पालि भाषा में नहीं है। कभी कभी रेफ का लोप होता है तो कभी कभी ‘र’ होता है।
जैसे-
कर्म = कम्म
महार्ह = महारहो
- ऋ के स्थान पर पालि भाषा में अ, इ ,उ का प्रयोग करते है।
जैसे-
गृहं= गहं
ऋणं= इणं
ऋतु= उतु
- ऐ के स्थान पर ए, इ, ई का प्रयोग करते है।
जैसे-
ऐरावण = एरावण
ग्रैवेयं = गीवेय्यं
सैन्धव = सिन्धव
- औ के स्थान पर ओ, उ का प्रयोग करते है।
जैसे-
दौवारीक =दोवारीक
मौक्तिक =मुत्तिकं
- श,ष के स्थान पर स का प्रयोग करते है।
जैसे-
ऋषि =इसि
शाखा=साखा
तथागत बुद्ध ने अपने उपदेश पालि में ही दिए है। धम्म ग्रन्थ त्रिपिटक की भाषा भी पालि ही हैl
प्राक्मध्यकालीन (ई.पू. 600 से ई. सन् 100 तक),अन्तर मध्यकालीन (ई. सन् 100 से 600 तक), तथा
(1000) ईसा पूर्व से पहले, बाइब्लोस सबसे महत्वपूर्ण फोनीशियन शहर-राज्य था, जो माउण्ट लेबनान की ढलानों से देवदार की लकड़ी और पेपीरस का वितरण केंद्र था। मिस्र से राजा हीराम , जो 969 ईसा पूर्व में सत्ता में आए थे, वे ही टायर शहर की में वृद्धि के लिए प्रमुखता जिम्मेदार थे, उन्होंने राजासोलोमन के साथ घनिष्ठ गठबन्धन बनाया और यरूशलेम में पहले मंदिर के निर्माण के लिए कुशल फोनीशियन कारीगरों और देवदार की लकड़ी प्रदान की।
800 ईसा पूर्व में टायर ने पास के सिडोन पर कब्ज़ा कर लिया और भूमध्यसागरीय तटीय व्यापार पर हावी हो गया। टायर व्यावहारिक रूप से अभेद्य था, जिसमें एक नहर से जुड़े दो बंदरगाह, एक बड़ा बाज़ार, राजकोष और अभिलेखागार के साथ एक शानदार महल, और देवताओं मेलकार्ट और एस्टार्ट(ईस्तर) के मंदिर थे । 30,000 निवासियों में से कुछ मुख्य भूमि पर उपनगरों में रहते थे।
तूनिशिया से मिली फ़ोनीशियाई में लिखी
(बाल हम्मोन) और तनित नामक देवताओं की प्रार्थना का प्रमाणित दस्तावेज है।
बाल ऋग्वेद में वर्णित बल है जो इन्द्र और बृहस्पति का प्रतिद्वन्
तूनिसीया उत्तरी अफ़्रीक़ा महाद्वीप में एक अरब राष्ट्र है जिसका अरबी भाषा में नाम अल्जम्हूरीयाह अत्तूनिसीयाह (الجمهرية التونسية) या तूनिस है। यह भूमध्यसागर के किनारे स्थित है, इसके पूर्व में लीबिया और पश्चिम मे अल्जीरिया देश हैं। देश की पैंतालीस प्रतिशत ज़मीन सहारा रेगिस्तान में है जबकि बाक़ी तटीय जमीन खेती के लिए इस्तमाल होती है। रोमन इतिहास मे तूनिस का शहर कारथिज एक आवश्यक जगह रखता है और इस प्रान्त को बाद में रोमीय राज्य का एक प्रदेश बना दीया गया जिस का नाम अफ़्रीका यानी गरम प्रान्त रखा गया जो अब पूरे महाद्वीप का नाम है।
तूनीशियाई वर्णमाला फ़ोनीशिया की सभ्यता द्वारा अविष्कृत वर्णमाला थी !
जिसमें हर वर्ण एक व्यंजन की ध्वनि बनता था। क्योंकि फ़ोनीशियाई लोग समुद्री सौदागर थे।
इसलिए उन्होंने इस अक्षरमाला को दूर-दूर तक फैला दिया और उनकी देखा-देखी और सभ्यताएँ भी अपनी भाषाओँ के लिए इसमें फेर-बदल करके इसका प्रयोग करने लगीं। और फिर अनेक समानान्तर लिपियों का विकास हुआ।
माना जाता है के आधुनिक युग की सभी मुख्य अक्षरमालाएँ( लिपियाँ) इसी फ़ोनीशियाई वर्णमाला की संताने हैं।
"ब्राह्मी , देवनागरी सहित, भारत की सभी वर्णमालाएँ भी फ़ोनीशियाई वर्णमाला की वंशज हैं।
इसका विकास लगभग (1050) ईसा-पूर्व में आरम्भ हुआ था ।
और प्राचीन यूनानी सभ्यता के उदय के साथ-साथ अंत हो गया। परन्तु यूनानी लिपि भी फोनेशियन लिपि से विकसित हुई।
वर्णमाला की दृष्टि से-फ़ोनीशियाई वर्णमाला के हर अक्षर का नाम फ़ोनीशियाई भाषा में किसी वस्तु के नाम पर रखा गया है।
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अंग्रेज़ी में वर्णमाला को "ऐल्फ़ाबॅट" बोलते हैं जो नाम फ़ोनीशियाई वर्णमाला के पहले दो अक्षरों ("अल्फ़" यानि "बैल" और "बॅत" यानि "घर") से आया है।
पहले हम अलिफ की कुण्डली निकालते हैं
Aleph-First letter of many Semitic abjads
"Alef" redirects here. For other uses, see Aleph (disambiguation) and Alef (disambiguation).
Aleph (or alef or alif, transliterated ʾ) is the first letter of the Semitic abjads, including Phoenician ʾālep 𐤀, Hebrew ʾālef א, Aramaic ʾālap 𐡀, Syriac ʾālap̄ ܐ, Arabic ʾalif ا, and North Arabian 𐪑. It also appears as South Arabian 𐩱 and Ge'ez ʾälef አ.
Quick Facts Bet →, Phoenician ...
These letters are believed to have derived from an Egyptian hieroglyph depicting an ox's head to describe the initial sound of *ʾalp, the West Semitic word for ox (compare Biblical Hebrew אֶלֶף ʾelef, "ox").
संस्कृत में अलीक: का अर्थ मस्तक है।
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The Phoenician variant gave rise to the Greek alpha (Α), being re-interpreted to express not the glottal consonant but the accompanying vowel, and hence the Latin A and Cyrillic А.
Phonetically, aleph originally represented the onset of a vowel at the glottis.
In Semitic languages, this functions as a prosthetic weak consonant, allowing roots with only two true consonants to be conjugated in the manner of a standard three consonant Semitic root. In most Hebrew dialects as well as Syriac, the aleph is an absence of a true consonant, a glottal stop ([ʔ]), the sound found in the catch in uh-oh. In Arabic, the alif represents the glottal stop pronunciation when it is the initial letter of a word. In texts with diacritical marks, the pronunciation of an aleph as a consonant is rarely indicated by a special marking, hamza in Arabic and mappiq in Tiberian Hebrew. In later Semitic languages, aleph could sometimes function as a mater lectionis indicating the presence of a vowel elsewhere (usually long). When this practice began is the subject of some controversy, though it had become well established by the late stage of Old Aramaic (ca. 200 BCE). Aleph is often transliterated as U+02BE ʾ , based on the Greek spiritus lenis ʼ; for example, in the transliteration of the letter name itself, ʾāleph.
Origin-The name aleph is derived from the West Semitic word for "ox" (as in the Biblical Hebrew word Eleph (אֶלֶף) 'ox'), and the shape of the letter derives from a Proto-Sinaitic glyph that may have been based on an Egyptian hieroglyph, which depicts an ox's head.
More information Hieroglyph, Proto-Sinaitic ...
In Modern Standard Arabic, the word أليف /ʔaliːf/ literally means 'tamed' or 'familiar', derived from the root ʔ-L-F, from which the verb ألِف /ʔalifa/ means 'to be acquainted with; to be on intimate terms with'. In modern Hebrew, the same root ʔ-L-P (alef-lamed-peh) gives me’ulaf, the passive participle of the verb le’alef, meaning 'trained' (when referring to pets) or 'tamed' (when referring to wild animals).
Ancient Egyptian
Further information: Transliteration of Ancient Egyptian § alef
More information "Aleph" in hieroglyphs ...
The Egyptian "vulture" hieroglyph (Gardiner G1), by convention pronounced [a]) is also referred to as aleph, on grounds that it has traditionally been taken to represent a glottal stop ([ʔ]), although some recent suggestions tend towards an alveolar approximant ([ɹ]) sound instead. Despite the name it does not correspond to an aleph in cognate Semitic words, where the single "reed" hieroglyph is found instead.
The phoneme is commonly transliterated by a symbol composed of two half-rings, in Unicode (as of version 5.1, in the Latin Extended-D range) encoded at U+A722 Ꜣ LATIN CAPITAL LETTER EGYPTOLOGICAL ALEF and U+A723 ꜣ LATIN SMALL LETTER EGYPTOLOGICAL ALEF. A fallback representation is the numeral 3, or the Middle English character ȝ Yogh; neither are to be preferred to the genuine Egyptological characters.
Aramaic-
The Aramaic reflex of the letter is conventionally represented with the Hebrew א in typography for convenience, but the actual graphic form varied significantly over the long history and wide geographic extent of the language. Maraqten identifies three different aleph traditions in East Arabian coins: a lapidary Aramaic form that realizes it as a combination of a V-shape and a straight stroke attached to the apex, much like a Latin K; a cursive Aramaic form he calls the "elaborated X-form", essentially the same tradition as the Hebrew reflex; and an extremely cursive form of two crossed oblique lines, much like a simple Latin X.
More information Cursive Aramaic, Lapidary Aramaic ...
Hebrew
"א" redirects here. For the Biblical manuscript, see Codex Sinaiticus.
Hebrew spelling: אָלֶף
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In Modern Israeli Hebrew, the letter either represents a glottal stop ([ʔ]) or indicates a hiatus (the separation of two adjacent vowels into distinct syllables, with no intervening consonant). It is sometimes silent (word-finally always, word-medially sometimes: הוּא [hu] "he", רָאשִׁי [ʁaˈʃi] "main", רֹאשׁ [ʁoʃ] "head", רִאשׁוֹן [ʁiˈʃon] "first"). The pronunciation varies in different Jewish ethnic divisions.
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In gematria, aleph represents the number 1, and when used at the beginning of Hebrew years, it means 1000 (e.g. א'תשנ"ד in numbers would be the Hebrew date 1754, not to be confused with 1754 CE).
Aleph, along with ayin, resh, he and heth, cannot receive a dagesh. (However, there are few very rare examples of the Masoretes adding a dagesh or mappiq to an aleph or resh. The verses of the Hebrew Bible for which an aleph with a mappiq or dagesh appears are Genesis 43:26, Leviticus 23:17, Job 33:21 and Ezra 8:18.)
In Modern Hebrew, the frequency of the usage of alef, out of all the letters, is 4.94%.
Aleph is sometimes used as a mater lectionis to denote a vowel, usually /a/. That use is more common in words of Aramaic and Arabic origin, in foreign names, and some other borrowed words.
More information Orthographic variants, Various Print Fonts ...
Rabbinic Judaism–
Aleph is the subject of a midrash that praises its humility in not demanding to start the Bible. (In Hebrew, the Bible begins with the second letter of the alphabet, bet.) In the story, aleph is rewarded by being allowed to start the Ten Commandments. (In Hebrew, the first word is אָנֹכִי, which starts with an aleph.)
In the Sefer Yetzirah, the letter aleph is king over breath, formed air in the universe, temperate in the year, and the chest in the soul.
Aleph is also the first letter of the Hebrew word emet (אֶמֶת), which means truth. In Judaism, it was the letter aleph that was carved into the head of the golem that ultimately gave it life.
Aleph also begins the three words that make up God's name in Exodus, I Am who I Am (in Hebrew, Ehyeh Asher Ehyeh אהיה אשר אהיה), and aleph is an important part of mystical amulets and formulas.
Aleph represents the oneness of God. The letter can be seen as being composed of an upper yud, a lower yud, and a vav leaning on a diagonal. The upper yud represents the hidden and ineffable aspects of God while the lower yud represents God's revelation and presence in the world. The vav ("hook") connects the two realms.
Judaism relates aleph to the element of air, and the Scintillating Intelligence (#11) of the path between Kether and Chokmah in the Tree of the Sephiroth [citation needed].
Yiddish–
In Yiddish, aleph is used for several orthographic purposes in native words, usually with different diacritical marks borrowed from Hebrew niqqud:
With no diacritics, aleph is silent; it is written at the beginning of words before vowels spelled with the letter vov or yud. For instance, oykh 'also' is spelled אויך. The digraph וי represents the initial diphthong [oj], but that digraph is not permitted at the beginning of a word in Yiddish orthography, so it is preceded by a silent aleph. Some publications use a silent aleph adjacent to such vowels in the middle of a word as well when necessary to avoid ambiguity.
An aleph with the diacritic pasekh, אַ, represents the vowel [a] in standard Yiddish.
An aleph with the diacritic komets, אָ, represents the vowel [ɔ] in standard Yiddish.
Loanwords from Hebrew or Aramaic in Yiddish are spelled as they are in their language of origin.
Syriac–
More information Alaph ...
In the Syriac alphabet, the first letter is ܐ, Classical Syriac: ܐܵܠܲܦ, alap (in eastern dialects) or olaph (in western dialects). It is used in word-initial position to mark a word beginning with a vowel, but some words beginning with i or u do not need its help, and sometimes, an initial alap/olaph is elided. For example, when the Syriac first-person singular pronoun ܐܸܢܵܐ is in enclitic positions, it is pronounced no/na (again west/east), rather than the full form eno/ana. The letter occurs very regularly at the end of words, where it represents the long final vowels o/a or e. In the middle of the word, the letter represents either a glottal stop between vowels (but West Syriac pronunciation often makes it a palatal approximant), a long i/e (less commonly o/a) or is silent.
South Arabian/Ge'ez
In the Ancient South Arabian alphabet, 𐩱 appears as the seventeenth letter of the South Arabian abjad. The letter is used to render a glottal stop /ʔ/.
In the Ge'ez alphabet, ʾälef አ appears as the thirteenth letter of its abjad. This letter is also used to render a glottal stop /ʔ/.
More information South Arabian, Ge'ez ...
Arabic–
Written as ا or 𐪑, spelled as ألف or 𐪑𐪁𐪐 and transliterated as alif, it is the first letter in Arabic and North Arabian. Together with Hebrew aleph, Greek alpha and Latin A, it is descended from Phoenician ʾāleph, from a reconstructed Proto-Canaanite ʾalp "ox".
Alif is written in one of the following ways depending on its position in the word:
More information Position in word, Isolated ...
More information North Arabian ...
Arabic variants
Alif mahmūza: أ and إ
Main article: Hamza
The Arabic letter was used to render either a long /aː/ or a glottal stop /ʔ/. That led to orthographical confusion and to the introduction of the additional marking hamzat qaṭ‘ ﺀ to fix the problem. Hamza is not considered a full letter in Arabic orthography: in most cases, it appears on a carrier, either a wāw (ؤ), a dotless yā’ (ئ), or an alif.
More information Position in word, Isolated ...
The choice of carrier depends on complicated orthographic rules. Alif إ أ is generally the carrier if the only adjacent vowel is fatḥah. It is the only possible carrier if hamza is the first phoneme of a word. Where alif acts as a carrier for hamza, hamza is added above the alif, or, for initial alif-kasrah, below it and indicates that the letter so modified is indeed a glottal stop, not a long vowel.
A second type of hamza, hamzat waṣl (همزة وصل) whose diacritic is normally omitted outside of sacred texts, occurs only as the initial letter of the definite article and in some related cases. It differs from hamzat qaṭ‘ in that it is elided after a preceding vowel. Alif is always the carrier.
More information Position in word, Isolated ...
Alif mamdūda: آ
The alif maddah is a double alif, expressing both a glottal stop and a long vowel. Essentially, it is the same as a أا sequence: آ (final ـآ) ’ā /ʔaː/, for example in آخر ākhir /ʔaːxir/ 'last'.
More information Position in word, Isolated ...
"It has become standard for a hamza followed by a long ā to be written as two alifs, one vertical and one horizontal." (the "horizontal" alif being the maddah sign).
Alif maqṣūrah: ى
The ى ('limited/restricted alif', alif maqṣūrah), commonly known in Egypt as alif layyinah (ألف لينة, 'flexible alif'), may appear only at the end of a word. Although it looks different from a regular alif, it represents the same sound /aː/, often realized as a short vowel. When it is written, alif maqṣūrah is indistinguishable from final Persian ye or Arabic yā’ as it is written in Egypt, Sudan and sometimes elsewhere.
The letter is transliterated as y in Kazakh, representing the vowel /ə/. Alif maqsurah is transliterated as á in ALA-LC, ā in DIN 31635, à in ISO 233-2, and ỳ in ISO 233.
In Arabic, alif maqsurah ى is not used initially or medially, and it is not joinable initially or medially in any font. However, the letter is used initially and medially in the Uyghur Arabic alphabet and the Arabic-based Kyrgyz alphabet, representing the vowel /ɯ/: (ىـ ـىـ).
More information Position in word, Isolated ...
Numeral As a numeral, alif stands for the number one. It may be modified as follows to represent other numbers.[citation needed]
More information Modification to alif, Number represented ...
Other uses
Mathematics
In set theory, the Hebrew aleph glyph is used as the symbol to denote the aleph numbers, which represent the cardinality of infinite sets. This notation was introduced by mathematician Georg Cantor. In older mathematics books, the letter aleph is often printed upside down by accident, partly because a Monotype matrix for aleph was mistakenly constructed the wrong way up.
Aleph
कई सेमेटिक( अबजदों वर्णमालाओं)का पहला अक्षर-
एलेफ़ (या एलेफ़ या अलिफ़, लिप्यंतरित ʾ) सेमेटिक अबजादों का पहला अक्षर है, जिसमें
1-फ़ोनीशियन ʾalep 𐤀,
2-हिब्रू ʾalef א,
3-अरामी ʾalap 𐡀,
4-सिरिएक ʾalap̄ ̄,
5-अरबी ʾalif ا, और
6-उत्तरी अरब 𐪑 शामिल हैं।
यह साउथ अरेबियन 𐩱 और गीज़ ʾälef አ के रूप में भी दिखाई देता है।
त्वरित तथ्य शर्त →, फोनीशियन ...
ऐसा माना जाता है कि ये अक्षर मिस्र के एक चित्रलिपि से लिए गए हैं, जिसमें एक बैल के सिर को दर्शाया गया है, जो बैल के लिए पश्चिमी सेमिटिक शब्द *ʾalp की प्रारंभिक ध्वनि का वर्णन करता है (बाइबिल के हिब्रू אֶלֶף ʾelef, "बैल" की तुलना करें)।
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फोनीशियन संस्करण ने ग्रीक अल्फा (Α) को जन्म दिया, जिसे ग्लोटल व्यंजन नहीं बल्कि साथ वाले स्वर को व्यक्त करने के लिए दोबारा व्याख्या की गई, और इसलिए लैटिन ए और सिरिलिक ए।
ध्वन्यात्मक रूप से, एलेफ़ मूल रूप से ग्लोटिस पर एक स्वर की शुरुआत का प्रतिनिधित्व करता था।
सेमिटिक भाषाओं में, यह एक कृत्रिम कमजोर व्यंजन के रूप में कार्य करता है, जिससे केवल दो सच्चे व्यंजन वाली जड़ों को मानक तीन व्यंजन सेमिटिक रूट (धातु)के तरीके से संयुग्मित किया जा सकता है। अधिकांश हिब्रू बोलियों के साथ-साथ सिरिएक में, एलेफ एक सच्चे व्यंजन, एक ग्लोटल स्टॉप ([ʔ]) की अनुपस्थिति है, जो ध्वनि उह-ओह में पकड़ में पाई जाती है।
अरबी में, अलिफ़ ग्लोटल स्टॉप उच्चारण का प्रतिनिधित्व करता है जब यह किसी शब्द का प्रारंभिक अक्षर होता है।
विशेषक चिह्नों वाले ग्रंथों में, व्यंजन के रूप में एलेफ़ का उच्चारण शायद ही कभी एक विशेष चिह्न द्वारा दर्शाया जाता है, अरबी में हम्ज़ा और तिबेरियन हिब्रू में मप्पिक। बाद की सेमेटिक भाषाओं में, एलेफ़ कभी-कभी मेटर लेक्शनिस के रूप में कार्य कर सकता है जो कहीं और स्वर की उपस्थिति (आमतौर पर लंबा) का संकेत देता है।
यह प्रथा कब शुरू हुई यह कुछ विवाद का विषय है, हालाँकि यह पुराने अरामाइक के अंतिम चरण (लगभग 200 ईसा पूर्व) तक अच्छी तरह से स्थापित हो गई थी।
एलेफ़ को अक्सर ग्रीक स्पिरिटस लेनिस ʼ के आधार पर U+02BE ʾ के रूप में लिप्यंतरित किया जाता है; उदाहरण के लिए, अक्षर नाम के लिप्यंतरण में ही, āleph.
मूल
एलेफ नाम पश्चिमी सेमिटिक शब्द "बैल" से लिया गया है (जैसा कि बाइबिल के हिब्रू शब्द एलीफ (אֶלֶף) 'बैल') में है, और अक्षर का आकार एक प्रोटो-सिनाईटिक ग्लिफ़ से लिया गया है जो शायद एक पर आधारित हो सकता है मिस्र का चित्रलिपि, जो एक बैल के सिर को दर्शाता है।
आधुनिक मानक अरबी में, शब्द أليف /ʔaliːf/ का शाब्दिक अर्थ है 'पालित' या 'परिचित', है।
जो मूल ʔ-L-F से लिया गया है, जिससे क्रिया ألِف /ʔalifa/ का अर्थ है 'परिचित होना; 'के साथ घनिष्ठ संबंध रखना।प्रेमी-आदि
आधुनिक हिब्रू में, वही मूल ʔ-L-P (एलेफ़-लैमेड-पेह) मी'उलाफ़ देता है, जो क्रिया ले 'एलेफ़ का निष्क्रिय कृदन्त है, जिसका अर्थ है 'प्रशिक्षित' (पालतू जानवरों का संदर्भ देते समय) या 'पालतू' (जब सन्दर्भित किया जाता है) जंगली जानवर)।
पौराणिक मिश्र:-
अधिक जानकारी: प्राचीन मिस्र का लिप्यंतरण § एलेफ़
इब्रानी:-
सुविधा के लिए टाइपोग्राफी में अक्षर के अरामी रिफ्लेक्स को पारंपरिक रूप से हिब्रू א के साथ दर्शाया जाता है, लेकिन वास्तविक ग्राफिक रूप भाषा के लंबे इतिहास और व्यापक भौगोलिक विस्तार के कारण काफी भिन्न होता है।
मराकटेन पूर्वी अरब के सिक्कों में तीन अलग-अलग एलेफ़ परंपराओं की पहचान करता है: एक लैपिडरी अरामी रूप जो इसे वी-आकार के संयोजन और शीर्ष से जुड़े एक सीधे स्ट्रोक के रूप में महसूस करता है, लैटिन के की तरह; एक घसीट अरामी रूप को वह "विस्तृत एक्स-फॉर्म" कहते हैं, मूलतः वही परंपरा हिब्रू प्रतिवर्त के रूप में; और दो पार की गई तिरछी रेखाओं का एक अत्यंत घसीट रूप, एक साधारण लैटिन एक्स की तरह।
यहूदी
"א" यहां पुनर्निर्देश करता है। बाइबिल पांडुलिपि के लिए, कोडेक्स साइनेटिकस देखें।
हिब्रू वर्तनी: אָלֶף
आधुनिक इज़राइली हिब्रू में, अक्षर या तो एक ग्लोटल स्टॉप ([ʔ]) का प्रतिनिधित्व करता है या एक अंतराल को इंगित करता है (दो आसन्न स्वरों को अलग-अलग अक्षरों में अलग करना, बिना किसी हस्तक्षेप वाले व्यंजन के)।
यह कभी-कभी मौन होता है (शब्द-अंततः हमेशा, शब्द-मध्यवर्ती रूप से कभी-कभी: הוּא [hu] "he", רָאשִׁי [ʁaˈʃi] "main", רֹאשׁ [ʁoʃ] "head", רִאשׁוֹן [ʁiˈʃon] "first " ). विभिन्न यहूदी जातीय प्रभागों में उच्चारण भिन्न-भिन्न होता है।
जेमट्रिया में, एलेफ संख्या 1 का प्रतिनिधित्व करता है, और जब हिब्रू वर्षों की शुरुआत में उपयोग किया जाता है, तो इसका मतलब 1000 होता है (उदाहरण के लिए א'תשנ"ד संख्या में हिब्रू तारीख 1754 होगी, 1754 सीई के साथ भ्रमित नहीं होना चाहिए)।
अलेफ, अयिन, रेश, हे और हेथ के साथ, दागेश प्राप्त नहीं कर सकता। (हालाँकि, मासोरेट्स द्वारा अलेफ या रेश में दागेश या मप्पिक जोड़ने के कुछ बहुत ही दुर्लभ उदाहरण हैं।
हिब्रू बाइबिल के छंद जिनके लिए मप्पिक या दागेश के साथ अलेफ दिखाई देता है, उत्पत्ति 43:26, लेविटस 23:17 हैं, अय्यूब 33:21 और एज्रा 8:18.)
आधुनिक हिब्रू में, सभी अक्षरों में से, एलेफ़ के उपयोग की आवृत्ति 4.94% है।
एलेफ का उपयोग कभी-कभी स्वर को दर्शाने के लिए मेटर लेक्शनिस के रूप में किया जाता है, आमतौर पर /ए/। यह प्रयोग अरामी और अरबी मूल के शब्दों, विदेशी नामों और कुछ अन्य उधार लिए गए शब्दों में अधिक आम है।
रब्बीनिक यहूदी धर्म:-
एलेफ एक मिड्रैश का विषय है जो बाइबिल शुरू करने की मांग न करने की अपनी विनम्रता की प्रशंसा करता है। (हिब्रू में, बाइबल वर्णमाला के दूसरे अक्षर से शुरू होती है।कहानी में, एलेफ़ को दस आज्ञाएँ शुरू करने की अनुमति देकर पुरस्कृत किया जाता है। (हिब्रू में, पहला शब्द אָנֹכִי है, जो एलेफ से शुरू होता है।)
सेफ़र यत्ज़िराह में, अक्षर एलेफ़ सांस पर राजा है, ब्रह्मांड में वायु का निर्माण होता है, वर्ष में शीतोष्ण होता है, और आत्मा में छाती होती है।
एलेफ़ हिब्रू शब्द एमेट (אֶמֶת) का पहला अक्षर भी है, जिसका अर्थ सत्य है। यहूदी धर्म में, यह अक्षर एलेफ़ था जिसे गोलेम के सिर में उकेरा गया था जिसने अंततः इसे जीवन दिया।
एलेफ उन तीन शब्दों की भी शुरुआत करता है जो निर्गमन में भगवान का नाम बनाते हैं, मैं वही हूं जो मैं हूं (हिब्रू में, एहयेह आशेर एहयेह אהיה אשר אהיה), और एलेफ रहस्यमय ताबीज और सूत्रों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
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अलेफ ईश्वर की एकता का प्रतिनिधित्व करता है। पत्र को एक ऊपरी युद, एक निचले युद और एक विकर्ण पर झुके हुए वाव से बना देखा जा सकता है।
ऊपरी युद ईश्वर के छिपे और अवर्णनीय पहलुओं का प्रतिनिधित्व करता है जबकि निचला युद दुनिया में ईश्वर के रहस्योद्घाटन और उपस्थिति का प्रतिनिधित्व करता है। वाव ("हुक") दो क्षेत्रों को जोड़ता है।
यहूदी धर्म एलेफ को हवा के तत्व से जोड़ता है, और सेफिरोथ के पेड़ में केथर और चोकमा के बीच के पथ की स्किंटिलेटिंग इंटेलिजेंस (#11) [उद्धरण वांछित]।
यहूदी
यिडिश में, एलेफ़ का उपयोग मूल शब्दों में कई वर्तनी संबंधी उद्देश्यों के लिए किया जाता है, आमतौर पर हिब्रू निक्कुड से उधार लिए गए विभिन्न विशेषक चिह्नों के साथ:
बिना किसी विशेषक चिह्न के, एलेफ़ चुप है; यह शब्दों की शुरुआत में वोव या युड अक्षर से लिखे गए स्वरों से पहले लिखा जाता है। उदाहरण के लिए, oykh 'भी' को אויך लिखा जाता है। डिग्राफ וי प्रारंभिक डिप्थॉन्ग [ओजे] का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन यिडिश ऑर्थोग्राफी में किसी शब्द की शुरुआत में उस डिग्राफ की अनुमति नहीं है, इसलिए यह एक साइलेंट एलेफ से पहले होता है। कुछ प्रकाशन अस्पष्टता से बचने के लिए आवश्यक होने पर शब्द के बीच में ऐसे स्वरों से सटे एक साइलेंट एलेफ़ का भी उपयोग करते हैं।
विशेषक पसेख,( אַ )के साथ एक एलेफ, मानक यिडिश में स्वर [ए] का प्रतिनिधित्व करता है।
विशेषक कोमेट्स, אָ के साथ एक एलेफ़, मानक यिडिश में स्वर [ɔ] का प्रतिनिधित्व करता है।
यिडिश में हिब्रू या अरामी भाषा के ऋणशब्दों की वर्तनी वैसे ही की जाती है जैसे वे उनकी मूल भाषा में हैं।
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सिरिएक
अधिक जानकारी अलफ़...
सिरिएक वर्णमाला में, पहला अक्षर Ԑ है, शास्त्रीय सिरिएक: ԐֵԵԠֲ֦, अलाप (पूर्वी बोलियों में) या ओलाफ़ (पश्चिमी बोलियों में)। इसका उपयोग स्वर से शुरू होने वाले शब्द को चिह्नित करने के लिए शब्द-प्रारंभिक स्थिति में किया जाता है, लेकिन i या u से शुरू होने वाले कुछ शब्दों को इसकी सहायता की आवश्यकता नहीं होती है, और कभी-कभी, प्रारंभिक अलाप/ओलाफ हटा दिया जाता है। उदाहरण के लिए, जब सिरिएक प्रथम-व्यक्ति एकवचन सर्वनाम ԐԸԢԵԐ enclitic स्थिति में होता है, तो इसका उच्चारण पूर्ण रूप eno/ana के बजाय no/na (फिर से पश्चिम/पूर्व) किया जाता है। यह अक्षर शब्दों के अंत में बहुत नियमित रूप से आता है, जहां यह लंबे अंतिम स्वरों ओ/ए या ई का प्रतिनिधित्व करता है। शब्द के मध्य में, अक्षर या तो स्वरों के बीच एक ग्लोटल स्टॉप का प्रतिनिधित्व करता है (लेकिन पश्चिम सिरिएक उच्चारण अक्सर इसे एक तालव्य सन्निकटन बनाता है), एक लंबा आई/ई (कम सामान्यतः ओ/ए) या मौन होता है।
साउथ अरेबियन/गीज़
प्राचीन दक्षिण अरब वर्णमाला में, 𐩱 दक्षिण अरब अबजद के सत्रहवें अक्षर के रूप में प्रकट होता है। अक्षर का उपयोग ग्लोटल स्टॉप /ʔ/ प्रस्तुत करने के लिए किया जाता है।
गीज़ वर्णमाला में, ʾälef አ इसके अबजद के तेरहवें अक्षर के रूप में प्रकट होता है। इस अक्षर का उपयोग ग्लोटल स्टॉप /ʔ/ प्रस्तुत करने के लिए भी किया जाता है।
अधिक जानकारी साउथ अरेबियन, गीज़...
अरबी
ا या 𐪑 के रूप में लिखा जाता है, ألف या 𐪑𐪁𐪐 के रूप में लिखा जाता है और अलिफ़ के रूप में लिप्यंतरित किया जाता है, यह अरबी और उत्तरी अरब में पहला अक्षर है। हिब्रू एलेफ़, ग्रीक अल्फ़ा और लैटिन ए के साथ, यह फ़ोनीशियन सेलेफ़ का वंशज है, एक पुनर्निर्मित प्रोटो-कैनानाइट एल्प "बैल" से।
अलिफ़ को शब्द में उसकी स्थिति के आधार पर निम्नलिखित में से किसी एक तरीके से लिखा जाता है:
यद्यपि यूरोपीय भाषाओं में "Axe" ( तलवार या कुलाड़ी) के लिए वैदिक तथा संस्कृत में असि: शब्द है।
असिः, पुंल्लिंग-(असतीति । अस दीप्तौ इनि ।) अस्त्र- भेदः । खा~डा तरवाल इत्यादि भाषा । तत्प- र्य्यायः । खड्गः २ निस्त्रिंशः ३ चन्द्रहासः ४ रिष्टिः ५ कौक्षेयकः ६ मण्डलाग्रः ७ करपालः ८ कृपाणः ९ इत्यमरः ॥ प्रबालकः १० भद्रात्मजः ११ रिष्टः १२ ऋष्टिः १३ धाराविषः १४ कौक्षेयः १५ तरवारिः १६ तरवाजः १७ कृपाणकः १८ करवालः १९ कृपाणी २० शस्त्रः २१ । इति शब्दरत्नावली ॥ विषसनः २२ । इति त्रिकांण्ड- शेषः ॥ (“पर्णशालामथ क्षिप्रं विकृष्टासिः प्रविश्य सः । वैरूप्यपौनरुक्तेन भीषणां तामयोजयत्” ॥ इति रघवंशे १२ । ४० ॥ “स्यन्दनाश्वैः समे युध्येदनूपे नौद्विपैस्तथा । वृक्षगुल्मावृते चापैरसिचर्म्मायुधैः स्थले ॥” इति मनौ ७ । १९२ ॥) तस्य स्तुतिर्यथा । “असिर्व्विषसनः खड्गस्तीक्ष्णधारो दुरासदः । श्रीगर्भो विजयश्चैव धर्म्मपालो नमोऽस्तु ते ॥ इत्यष्टौ तव नामानि स्वयमुक्तानि वेधसा । नक्षत्रं कृत्तिका ते तु गुरुर्देवो महेश्वरः ॥ हिरण्यञ्च शरीरन्ते धाता देवो जनार्द्दनः । पिता पितामहो देवस्त्वं मां पालय सर्व्वदा ॥ नीलजीमूतसङ्काशस्तीक्ष्णदंष्ट्रः कृशोदरः । भावशुद्धोऽमर्षणश्च अतितेजास्तथैव च ॥ इयं येन धृता क्षौणी हतश्च महिषासुरः । तीक्ष्णधाराय शुद्धाय तस्मै खड्गाय ते नमः” ॥ इति वृहन्नन्दिकेश्वरपुराणीयदुर्गोत्सवपद्धतिधृत- वाराहीतन्त्रं ॥
मा त्वा तपत्प्रिय आत्मापियन्तं मा स्वधितिस्तन्व आ तिष्ठिपत्ते ।
मा ते गृध्नुरविशस्तातिहाय छिद्रा गात्राणि असिना मिथू कः ॥२०॥( ऋग्वेद १/१६२/२०)
अक्रीळन्क्रीळन्हरिरत्तवेऽदन्वि पर्वशश्चकर्त गामिव -असिः ॥६॥( ऋग्वेदः सूक्तं १०/७९/६)
माहेश्वर सूत्र को संस्कृत व्याकरण का प्रथम आधार माना जाता है।
- पाणिनि ने संस्कृत भाषा के तत्कालीन स्वरूप को परिष्कृत अर्थात् संस्कारित एवं नियमित करने के उद्देश्य से वैदिक भाषा के विभिन्न अवयवों एवं घटकों को ध्वनि-विभाग के रूप अर्थात् (अक्षरसमाम्नाय), नाम- (संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण), पद- (विभक्ति युक्त वाक्य में प्रयुक्त शब्द , आख्यात-(क्रिया), उपसर्ग, अव्यय, वाक्य, लिंग इत्यादि तथा उनके अन्तर्सम्बन्धों का समावेश अष्टाध्यायी में किया है।
अष्टाध्यायी में ३२ पाद हैं जो आठ अध्यायों मे समान रूप से विभाजित हैं । व्याकरण के इस महद् ग्रन्थ में पाणिनि ने विभक्ति-प्रधान संस्कृत भाषा के विशाल कलेवर (शरीर)का समग्र एवं सम्पूर्ण विवेचन लगभग 4000 सूत्रों में किया है।
जो आठ अध्यायों में (संख्या की दृष्टि से असमान रूप से) विभाजित हैं।
तत्कालीन समाज में लेखन सामग्री की दुष्प्राप्यता को दृष्टि गत रखते हुए पाणिनि ने व्याकरण को स्मृतिगम्य बनाने के लिए सूत्र शैली की सहायता ली है।
- विदित होना चाहिए कि संस्कृत भाषा का प्रादुर्भाव वैदिक भाषा छान्दस् से ई०पू० चतुर्थ शताब्दी में ही हुआ यद्यपि संस्कृत की शब्दावली वैदिक भाषा की ही थी। ।
- तभी ग्रामीण या जनसाधारण की भाषा बौद्ध काल से पूर्व ई०पू० 563 में भी थी । यह भी वैदिक भाषा (छान्दस्)से विकसित हुई। ये ही भाषाऐं गाँव( पल्लि) से सम्बन्धित होने से पालि और साधारण जन प्रकृति से सम्बन्धित होने से प्राकृत कह लायी गयीं।
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व्याकरण को स्मृतिगम्य बनाने के लिए पाणिनी ने सूत्र शैली की सहायता ली है।
- पुनः विवेचन को अतिशय संक्षिप्त बनाने हेतु पाणिनि ने अपने पूर्ववर्ती वैयाकरणों से प्राप्त उपकरणों के साथ-साथ स्वयं भी अनेक उपकरणों का निर्माण करके प्रयोग किया है जिनमे शिवसूत्र या माहेश्वर सूत्र सबसे महत्वपूर्ण हैं।
माहेश्वर सूत्रों की उत्पत्ति-----माहेश्वर सूत्रों की उत्पत्ति भगवान नटराज (शंकर) के द्वारा किये गये ताण्डव नृत्य से मानी गयी है। जो कि एक श्रृद्धा प्रवण अतिरञ्जना ही है ।
रूढ़िवादी ब्राह्मणों ने इसे आख्यान परक रूप इस प्रकार दिया। 👇
- नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्। उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धान्एतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम् ॥
अर्थात:- "नृत्य (ताण्डव) के अवसान (समाप्ति) पर नटराज (शिव) ने सनकादि ऋषियों की सिद्धि और कामना की उद्धार (पूर्ति) के लिये नवपञ्च (चौदह) बार डमरू बजाया।
इस प्रकार चौदह शिवसूत्रों का ये जाल (वर्णमाला) रूप में प्रकट हुया। " डमरु के चौदह बार बजाने से चौदह सूत्रों के रूप में ध्वनियाँ निकली, इन्हीं ध्वनियों से व्याकरण का प्रकाट्य हुआ।
- इसलिये व्याकरण सूत्रों के आदि-प्रवर्तक भगवान नटराज को माना जाता है।
- वस्तुत भारतीय संस्कृति की इस मान्यता की पृष्ठ भूमि में शिव का ओ३म स्वरूप भी है ।
- उमा शिव की ही शक्ति का रूप है ।
उमा शब्द की व्युत्पत्ति -
- (उ- भो मा तपस्यां कुरुवति -अरे तपस्या मत करो- यथा, “उमेति मात्रा तपसो निषिद्धा पश्चादुमाख्यां सुमुखी जगाम ” । जब उमा की माता ने तपस्या का निषेध ( मनाही) की तब इसके बाद इस सुमुॉखी का नाम उमा हुआ।
इति कुमारोक्तेः(कुमारसम्भव महाकाव्य)।
- यद्वा ओर्हरस्य मा लक्ष्मीरिव ।उं शिवं माति मिमीते वा । आतोऽनुपसर्गेति कः । अजादित्वात् टाप् ।
- अवति ऊयते वा उङ् शब्दे “विभाषा तिलमाषो मेति” । ५।२।४। निपातनात् मक् )
- दुर्गा का विशेषण ।
परन्तु यह पाणिनि के द्वारा भाषा का उत्पत्ति मूलक विश्लेषण है जिसमें संशोधन और भी अपेक्षित है।
- यादव योगेश कुमार रोहि ने इसका विश्लेषण किया है।
- यदि ये सूत्र शिव से प्राप्त होते तो इनमें चार सन्धि स्वर (ए,ऐ,ओ,औ) का समावेश कभी नहीं होता तथा अन्त:स्थ वर्ण (य,व,र,ल )भी माहेश्वर सूत्र में सम्मिलित न होते ! क्यों कि ये भी सन्धि- संक्रमण स्वर ही हैं मौलिक नहीं।
- इनकी संरचना के विषय में नीचे विश्लेषण प्रस्तुत है
________________________________________
पाणिनि के माहेश्वर सूत्रों की कुल संख्या 14 है ;जो निम्नलिखित हैं: 👇__________________________________________
- १. अइउण्। २. ॠॡक्। ३. एओङ्। ४. ऐऔच्। ५. हयवरट्। ६. लण्। ७. ञमङणनम्। ८. झभञ्। ९. घढधष्। १०. जबगडदश्। ११. खफछठथचटतव्। १२. कपय्। १३. शषसर्। १४. हल्।
उपर्युक्त्त 14 सूत्रों में संस्कृत भाषा के वर्णों (अक्षरसमाम्नाय) को एक विशिष्ट प्रकार के क्रम से संयोजित किया गया है।
- फलतः, पाणिनि को शब्दों के निर्वचन या नियमों मे जब भी किन्ही विशेष वर्ण समूहों या प्रत्याहारों (एक से अधिक वर्णों) के प्रयोग की आवश्यकता होती है, वे उन वर्णों (अक्षरों) को माहेश्वर सूत्रों से प्रत्याहार बनाकर संक्षेप मे ग्रहण करते हैं।
- माहेश्वर सूत्रों को इसी कारण ‘प्रत्याहार विधायक’ सूत्र भी कहते हैं।
- प्रत्याहार बनाने की विधि तथा संस्कृत व्याकरण में उनके बहुविध प्रयोगों को आगे दर्शाया गया है।
- इन 14 सूत्रों में संस्कृत भाषा के समस्त वर्णों को समावेश किया गया है।
- प्रथम 4 सूत्रों (अइउण् – ऐऔच्) में स्वर वर्णों तथा शेष 10 सूत्र व्यंजन वर्णों की गणना की गयी है।
- संक्षेप में स्वर वर्णों को अच् एवं व्यंजन वर्णों को हल् कहा जाता है।
- अच् एवं हल् भी प्रत्याहार हैं।
- प्रत्याहार की अवधारणा :---प्रत्याहार का अर्थ होता है – संक्षिप्त कथन।
अष्टाध्यायी के प्रथम अध्याय के प्रथम पाद के 71वें सूत्र ‘आदिरन्त्येन सहेता’ (१-१-७१) सूत्र द्वारा प्रत्याहार बनाने की विधि का पाणिनि ने निर्देश किया है।
आदिरन्त्येन सहेता (१-१-७१): (आदिः) आदि वर्ण (अन्त्येन इता) अन्तिम इत् वर्ण (सह) के साथ मिलकर प्रत्याहार बनाता है जो आदि वर्ण एवं इत्संज्ञक अन्तिम वर्ण के पूर्व आए हुए वर्णों का समष्टि रूप में (collectively) बोध कराता है।
- उदाहरण: अच् = प्रथम माहेश्वर सूत्र ‘अइउण्’ के आदि वर्ण ‘अ’ को चतुर्थ सूत्र ‘ऐऔच्’ के अन्तिम वर्ण ‘च्’ से योग कराने पर अच् प्रत्याहार बनता है।
- यह अच् प्रत्याहार अपने आदि अक्षर ‘अ’ से लेकर इत्संज्ञक च् के पूर्व आने वाले औ पर्यन्त सभी अक्षरों का बोध कराता है।
- अतः, अच् = अ इ उ ॠ ॡ ए ऐ ओ औ।
- इसी तरह हल् प्रत्याहार की सिद्धि ५ वें सूत्र हयवरट् के आदि अक्षर ह को अन्तिम १४ वें सूत्र हल् के अन्तिम अक्षर (या इत् वर्ण) ल् के साथ मिलाने (अनुबन्ध) से होती है।
- फलतः, हल् = ह य व र, ल, ञ म ङ ण न, झ भ, घ ढ ध, ज ब ग ड द, ख फ छ ठ थ च ट त, क प, श ष स, ह।
- उपर्युक्त सभी 14 सूत्रों में अन्तिम वर्ण
- (ण् क् च् आदि हलन्त वर्णों ) को पाणिनि ने इत् की संज्ञा दी है।
- इत् संज्ञा होने से इन अन्तिम वर्णों का उपयोग प्रत्याहार बनाने के लिए केवल अनुबन्ध (Bonding) हेतु किया जाता है, लेकिन व्याकरणीय प्रक्रिया मे इनकी गणना नही की जाती है |
- अर्थात् इनका प्रयोग नही होता है।
________________________________
- (अ"इ"उ ऋ"लृ मूल स्वर ।
- (ए ,ओ ,ऐ,औ) ये सन्ध्याक्षर होने से मौलिक नहीं अपितु इनका निर्माण हुआ है ।
- जैसे क्रमश: अ+ इ = ए तथा अ + उ = ओ संयुक्त स्वरों के रूप में गुण सन्धि के रूप में उद्भासित होते हैं ।
- अतः स्वर तो केवल तीन ही मान्य हैं ।👇
- । अ" इ" उ" । और ये परवर्ती (इ) तथा (उ) स्वर भी केवल
- (अ) स्वर के उदात्त( ऊर्ध्वगामी ) उ ।
- तथा अनुदात्त-(निम्न गामी) इ । के रूप में हैं ।
- ___________
- ऋ तथा ऌ स्वर न होकर क्रमश पार्श्वविक तथा आलोडित रूप है ।
- जो उच्चारण की दृष्टि से मूर्धन्य तथा वर्त्स्य ( दन्तमूलीय रूप ) है ।
- अब (ह)वर्ण महाप्राण है ।
- जिसका उच्चारण स्थान काकल है ।👉👆👇
- मूलत: ध्वनि के प्रतीक तो 28 हैं ।
- परन्तु पाणिनी ने अपने शिक्षा शास्त्र में (64) चतु:षष्टी वर्णों की रचना दर्शायी है ।
- पच्चीस स्वर ( प्रत्येक स्वर के उदात्त (ऊर्ध्वगामी) अनुदात्त( निम्न गामी) तथा स्वरित( मध्य गामी) फिर इन्हीं के अनुनासिक व निरानुनासिक रूप
- इस प्रकार से प्रत्येक ह्रस्व स्वर के पाँच रूप हुए )इस प्रकार कुल योग (25) हुआ ।
- क्यों कि मूल स्वर पाँच ही हैं । 5×5=25
- _________________________
- और पच्चीस स्पर्श व्यञ्जन
- कवर्ग ।चवर्ग ।टवर्ग ।तवर्ग । पवर्ग। = 25।
- तेरह (13) स्फुट वर्ण ( आ ई ऊ ऋृ लृ ) (ए ऐ ओ औ )
- ( य व र ल) ( चन्द्रविन्दु ँ )
- अनुस्वार तथा विसर्ग अनुसासिक के रूप होने से पृथक रूप से गणनीय नहीं हैं ।
- पाणिनीय शिक्षा में कहा कि ---त्रिषष्टि चतु: षष्टीर्वा वर्णा शम्भुमते मता: ।
स्वर (Voice) या कण्ठध्वनि की उत्पत्ति उसी प्रकार के कम्पनों से होती है जिस प्रकार वाद्ययन्त्र से ध्वनि की उत्पत्ति होती है।
अत: स्वरयन्त्र और वाद्ययन्त्र की रचना में भी कुछ समानता के सिद्धान्त हैं।
वायु के वेग से बजनेवाले वाद्ययन्त्र के समकक्ष मनुष्य तथा अन्य स्तनधारी प्राणियों में निम्नलिखित अंग होते हैं :👇
_________________________________________
1. कम्पक (Vibrators) इसमें स्वर रज्जुएँ (Vocal cords) भी सम्मिलित हैं।
2. अनुनादक अवयव (resonators) इसमें निम्नलिखित अंग सम्मिलित हैं :
क. नासा ग्रसनी (nasopharynx), ख. ग्रसनी (pharynx),
ग. मुख (mouth),
घ. स्वरयंत्र (larynx),
च. श्वासनली और श्वसनी
(trachea and bronchus)
छ. फुफ्फुस (फैंफड़ा )(lungs),
ज. वक्षगुहा (thoracic cavity)।
3. स्पष्ट उच्चारक (articulators)अवयव :- इसमें निम्नलिखित अंग सम्मिलित हैं :
क. जिह्वा (tongue),
ख. दाँत (teeth),
ग. ओठ (lips),
घ. कोमल तालु (soft palate),
च. कठोर तालु (मूर्धा )(hard palate)।
__________________________________________
स्वर की उत्पत्ति में उपर्युक्त अव्यव निम्नलिखित प्रकार से कार्य करते हैं :
जीवात्मा द्वारा प्रेरित वायु फुफ्फुस जब उच्छ्वास की अवस्था में संकुचित होता है, तब उच्छ्वसित वायु वायुनलिका से होती हुई स्वरयन्त्र तक पहुंचती है, जहाँ उसके प्रभाव से स्वरयंत्र में स्थिर स्वररज्जुएँ कम्पित होने लगती हैं, जिसके फलस्वरूप स्वर की उत्पत्ति होती है।
ठीक इसी समय अनुनादक अर्थात् स्वरयन्त्र का ऊपरी भाग, ग्रसनी, मुख तथा नासा अपनी अपनी क्रियाओं द्वारा स्वर में विशेषता तथा मृदुता उत्पन्न करते हैं।
इसके उपरान्त उक्त स्वर का शब्द उच्चारण के रूपान्तरण उच्चारक अर्थात् कोमल, कठोर तालु, जिह्वा, दन्त तथा ओष्ठ आदि करते हैं।
इन्हीं सब के सहयोग से स्पष्ट शुद्ध स्वरों की उत्पत्ति होती है।
स्वरयंत्र---
अवटु (thyroid) उपास्थि
वलथ (Cricoid) उपास्थि
स्वर रज्जुऐं
ये संख्या में चार होती हैं जो स्वरयन्त्र के भीतर सामने से पीछे की ओर फैली रहती हैं।
यह एक रेशेदार रचना है जिसमें अनेक स्थिति स्थापक रेशे भी होते हैं।
देखने में उजली तथा चमकीली मालूम होती है।
इसमें ऊपर की दोनों तन्त्रियाँ गौण तथा नीचे की मुख्य कहलाती हैं।
इनके बीच में त्रिकोण अवकाश होता है जिसको कण्ठ-द्वार (glottis) कहते हैं।
इन्हीं रज्जुओं के खुलने और बन्द होने से नाना प्रकार के विचित्र स्वरों की उत्पत्ति होती है।
स्वर की उत्पत्ति में स्वररज्जुओं की गतियाँ (movements)----
श्वसन काल में रज्जुद्वार खुला रहता है और चौड़ा तथा त्रिकोणकार होता है।
श्वाँस लेने में यह कुछ अधिक चौड़ा (विस्तृत) तथा श्वाँस छोड़ने में कुछ संकीर्ण (संकुचित) हो जाता है।
बोलते समय रज्जुएँ आकर्षित होकर परस्पर सन्निकट आ जाती हैं ;और उनका द्वार अत्यंत संकीर्ण हो जाता है।
जितना ही स्वर उच्च होता है, उतना ही रज्जुओं में आकर्षण अधिक होता है और द्वारा उतना ही संकीर्ण हो जाता है।
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स्वरयन्त्र की वृद्धि के साथ साथ स्वररज्जुओं की लंबाई बढ़ती है ; जिससे युवावस्था में स्वर भारी हो जाता है।
स्वररज्जुएँ स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों में अधिक लंबी होती हैं।
इसी लिए पुरुषों का स्वर मन्द्र सप्तक पर आधारित है
और स्त्रियों का स्वर तार सप्तक पर आधारित है।
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स्वरों की उत्पत्ति का मानव शास्त्रीय सिद्धान्त --
उच्छ्वसित वायु के वेग से जब स्वर रज्जुओं का कम्पन होता है ; तब स्वर की उत्पत्ति होती है।
यहाँ स्वर मूलत: एक ही प्रकार का उत्पन्न होता है किन्तु आगे चलकर तालु, जिह्वा, दन्त और ओष्ठ आदि अवयवों के सम्पर्क से उसमें परिवर्तन आ जाता है।
ये ही उसके विभिन्न प्रारूपों के साँचें है ।
स्वररज्जुओं के कम्पन से उत्पन्न स्वर का स्वरूप निम्लिखित तीन बातों पर आश्रित है :👇
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1. प्रबलता (loudness) - यह कम्पन तरंगों की उच्चता के अनुसार होता है।
2. तारत्व (Pitch) - यह कम्पन तरंगों की संख्या के अनुसार होता है।
3. गुणता (Quality) - यह गुञ्जनशील स्थानों के विस्तार के अनुसार बदलता रहता है; और कम्पन तरंगों के स्वरूप पर निर्भर करता है।
- अ" स्वर का उच्चारण तथा ह स्वर का उच्चारण श्रोत समान है । कण्ठ तथा काकल ।
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- नि: सन्देह काकल कण्ठ का पार्श्ववर्ती है और "अ" तथा "ह" सम्मूलक सजातिय बन्धु हैं।
- जैसा कि संस्कृत व्याकरण में रहा भी गया है कहा भी गया है ।
- "अ कु ह विसर्जनीयीनांकण्ठा ।
- अर्थात् अ स्वर , कवर्ग :- ( क ख ग घ ड्•) तथा विसर्ग(:) , "ह" ये सभीे वर्ण कण्ठ से उच्चारित होते हैं ।
- अतः "ह" महाप्राण " भी "अ " स्वर के घर्षण से ही विकसित रूप है । अ-<हहहहह.... ।
- अतः "ह" भी मौलिक नहीं है। इसका विकास भी "अ" स्वर से हुआ ।
- अत: हम इस "ह" वर्ण को भी मौलिक वर्णमाला में समावेशित नहीं करते हैं।________________________________________
- य, व, र ,ल , ये अन्त:स्थ वर्ण हैं ; स्वर और व्यञ्जनों के मध्य में होने से ये अन्त:स्थ हैं।
- क्यों कि अन्त: का अर्थ मध्य ( Inter) और स्थ का अर्थ स्थित रहने वाला ।ये अन्त:स्थ वर्ण
- क्रमश: गुण सन्ध्याक्षर या स्वरों के विरीत संरचना वाले हैं । 👇
- जैसे :- इ+अ = य अ+इ =ए
- उ+अ = व अ+उ= ओ ______________________________________
- ५. हयवरट्। ६. लण्। ७. ञमङणनम्।
- स्पर्श व्यञ्जनों सभी अनुनासिक अपने अपने वर्ग के अनुस्वार अथवा नकार वर्ण का प्रतिनिधित्व करते हैं ।
- ८. झभञ्। ९. घढधष्। १०. जबगडदश्। ११.
- खफछठथचटतव्। १२. कपय्। १३.
- शषसर्।
- उष्म वर्ण श, ष, स, वर्ण क्रमश: चवर्ग , टवर्ग और चवर्ग के सकार क प्रतिनिधित्व करते हैं ।
- जैसे पश्च । पृष्ठ ।पस्त परास्त ।
- यहाँ क्रमश चवर्ग के साथ तालव्य श उष्म वर्ण है।
- टवर्ग के साथ मूर्धन्य (ष) उष्म वर्ण है ।
- तथा तवर्ग के साथ दन्त्य (स) उष्म वर्ण है ।
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- यूरोपीय भाषाओं में विशेषत: अंग्रेजी आदि में जो रोमन लिपि में है वहाँ तवर्ग का अभाव है।
- अतः त थ द ध तथा स वर्णो को यूरोपीय अंग्रेजी आदि भाषाओं में नहीं लिख सकते हैं ।
- क्यों कि वहाँ की शीत जलवायु के कारण जिह्वा का रक्त सञ्चरण (गति) मन्द रहती है । और तवर्ग की की उच्चारण तासीर ( प्रभाव) सम शीतोष्ण जल- वायवीय है ।
अतः "श्" वर्ण के लिए (Sh) तथा "ष्" वर्ण के (S )वर्ण रूपान्तरित हो सकते हैं । यूरोपीय भाषाओं में तवर्ग तथा "स" वर्ण शुद्धता की कषौटी पर पूर्णत: निषिद्ध व अमान्य ही हैं ।
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- १४. हल्।
- तथा पाणिनि माहेश्वर सूत्रों में एक "ह" वर्ण केवल हलों के विभाजन के लिए है ।
- इस प्रकार वर्ण जो ध्वनि अंकन के रूप हैं ।
- मौलिक रूप में केवल 28 वर्ण हैं ।
- जो ध्वनि के मुल रूप के द्योतक हैं ।
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1. बाह्योष्ठ्य (exo-labial)
2. अन्तःओष्ठ्य (endo-labial)
3. दन्त्य (dental)
4. वर्त्स्य (alveolar)
5. पश्च वर्त्स्य (post-alveolar)
6. प्रतालव्य( prä-palatal )
7. तालव्य (palatal)
8. मृदुतालव्य (velar)
9. अलिजिह्वीय (uvular)
10.ग्रसनी से (pharyngal)
11.श्वासद्वारीय (glottal)
12.उपजिह्वीय (epiglottal)
13.जिह्वामूलीय (Radical)
14.पश्चपृष्ठीय (postero-dorsal)
15.अग्रपृष्ठीय (antero-dorsal)
16.जिह्वापाग्रीय (laminal)
17.जिह्वाग्रीय (apical)
18.उप जिह्विय( sub-laminal)
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स्वनविज्ञान के सन्दर्भ में, मुख गुहा के उन 'लगभग अचल' स्थानों को उच्चारण बिन्दु (articulation point या place of articulation) कहते हैं; जिनको 'चल वस्तुएँ' छूकर जब ध्वनि मार्ग में बाधा डालती हैं तो उन व्यंजनों का उच्चारण होता है।
उत्पन्न व्यञ्जन की विशिष्ट प्रकृति मुख्यतः तीन बातों पर निर्भर करती है- उच्चारण स्थान, उच्चारण विधि और स्वनन (फोनेशन)।
मुख गुहा में 'अचल उच्चारक' मुख्यतः मुखगुहा की छत का कोई भाग होता है जबकि 'चल उच्चारक' मुख्यतः जिह्वा, नीचे वाला ओष्ठ (ओठ), तथा श्वाँस -द्वार (ग्लोटिस)आदि हैं।
व्यञ्जन वह ध्वनि है जिसके उच्चारण में वायु अबाध गति से न निकलकर मुख के किसी भाग:-
(तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ आदि) से या तो पूर्ण अवरुद्ध होकर आगे बढ़ती है या संकीर्ण मार्ग से घर्षण करते हुए या पार्श्व मार्ग से निकलती है ।
- इस प्रकार वायु मार्ग में पूर्ण या अपूर्ण अवरोध उपस्थित होता है। तब व्यञ्जन ध्वनियाँ प्रादुर्भूत ( उत्पन्न) होती हैं ।
- हिन्दी व्यञ्जनों का वर्गीकरण----
- व्यञ्जनों का वर्गीकरण मुख्य रूप से स्थान और प्रयत्न के आधर पर किया जाता है।
- व्यञ्जनों के उत्पन्न होने के स्थान से सम्बन्धित व्यञ्जन को आसानी से पहचाना जा सकता है।
- इस दृष्टि से हिन्दी व्यञ्जनों का वर्गीकरण इस प्रकार है-
- उच्चारण स्थान (ध्वनि वर्ग) उच्चरित ध्वनि--👇
- द्वयोष्ठ्य:- ,प , फ, ब, भ, म
- दन्त्योष्ठ्य :-, फ़
- दन्त्य :-,त, थ, द, ध
- वर्त्स्य :-न, स, ज़, र, ल, ळ
- मूर्धन्य :-ट, ठ, ड, ढ, ण, ड़, ढ़, र, ष
- कठोर :-तालव्य श, च, छ, ज, झ
- कोमल तालव्य :-क, ख, ग, घ, ञ, ख़, ग़
- पश्च-कोमल-तालव्य:- क़ वर्ण है।
- स्वरयन्त्रामुखी:-. ह वर्ण है ।
- "ह" ध्वनि महाप्राण है इसका विकास "अ" स्वर से हुआ है ।जैसे धड़कन (स्पन्दन) से श्वाँस का
- जैसे धड़कन (स्पन्दन) से श्वाँस का अन्योन्य सम्बन्ध है उसी प्रकार "अ" और "ह" वर्ण हैं।
- "ह" वर्ण का उच्चारण स्थान काकल है ।
- काकल :--- गले में सामने की ओर निकल हुई हड्डी । कौआ । घण्टी । टेंटुवा आदि नाम इसके साधारण भाषा में हैं। शब्द कोशों में इसका अर्थ :- १. काला कौआ । २. कंठ की मणि या गले की मणि ।
- उच्चारण की प्रक्रिया के आधार पर व्यञ्जनों का वर्गीकरण--👇
- उच्चारण की प्रक्रिया या प्रयत्न के परिणाम-स्वरूप उत्पन्न व्यञ्जनों का वर्गीकरण इस प्रकार है-
- स्पर्श : उच्चारण अवयवों के स्पर्श करने तथा सहसा खुलने पर जिन ध्वनियों का उच्चारण होता है उन्हें स्पर्श कहा जाता है।
- विशेषत: जिह्वा का अग्र भाग जब मुख के आन्तरिक भागों का उच्चारण करता है ।
- क, ख, ग, घ, ट, ठ, ड, ढ, त, थ, द, ध, प, फ, ब, भ और क़ सभी ध्वनियाँ स्पर्श हैं।
- च, छ, ज, झ को पहले 'स्पर्श-संघर्षी' नाम दिया जाता था ; लेकिन अब सरलता और संक्षिप्तता को ध्यान में रखते हुए इन्हें भी स्पर्श व्यञ्जनों के वर्ग में रखा जाता है।
- इनके उच्चारण में उच्चारण अवयव सहसा खुलने के बजाए धीरे-धीरे खुलते हैं।
- मौखिक व नासिक्य :- व्यञ्जनों के दूसरे वर्ग में मौखिक व नासिक्य ध्वनियां आती हैं।
- हिन्दी में ङ, ञ, ण, न, म व्यञ्जन नासिक्य हैं। इनके उच्चारण में श्वासवायु नाक से होकर निकलती है, जिससे ध्वनि का नासिकीकरण होता है। इन्हें 'पञ्चमाक्षर' भी कहा जाता है।
- और अनुनासिक भी --
- इनके स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग सुविधजनक माना जाता है।
- वस्तुत ये सभीे प्रत्येक वर्ग के पञ्चम् वर्ण "न" अथवा "म" के ही रूप हैं ।
- परन्तु सभी केवल अपने स्ववर्गीय वर्णों के सानिध्य में अाकर "न" वर्ण का रूप प्रकट करते हैं ।
- जैसे :-
- कवर्ग के अनुरूप अनुनासिक:-
- अङ्क , सङ्ख्या अङ्ग , लङ्घ।
- चवर्ग के अनुरूप अनुनासिक:-
- चञ्चल, पञ्छी ,पिञ्जल अञ्झा ।
- टवर्ग के अनुरूप अनुनासिक:-
- कण्टक, कण्ठ, अण्ड ,. पुण्ढीर ।
- तवर्ग के अनुरूप अनुनासिक:-
- तन्तु , पन्थ ,सन्दीपन, अन्ध ।
- पवर्ग के अनुरूप अनुनासिक:-
- पम्प , गुम्फन , अम्बा, दम्भ ।
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- इन व्यंजनों को छोड़कर अन्य सभी व्यञ्जन मौखिक हैं।
- उष्म वर्ण - उष्म व्यञ्जन :- उष्म का अर्थ होता है- गर्म। जिन वर्णो के उच्चारण के समय वायु मुख के विभिन्न भागों से टकरा कर और श्वाँस में गर्मी पैदा कर , ध्वनि समन्वित होकर बाहर निकलती उन्हें उष्म व्यञ्जन कहते है।
- वस्तुत इन उष्म वर्णों का प्रयोजन अपने वर्ग के अनुरूप सकारत्व का प्रतिनिधित्व करना है ।
- तवर्ग - (त थ द ध न) का उच्चारण स्थान दन्त्य होने से "स" उष्म वर्ण है ।
- और यह हमेशा तवर्ग के वर्णों के साथ प्रयोग होता है।
- जैसे - अस्तु, वस्तु,आदि--
- इसी प्रकार टवर्ग - ट ठ ड ढ ण का उच्चारण स्थान मूर्धन्य होने से "ष" उष्म वर्ण ये सभी सजातिय हैं।
- जैसे - कष्ट ,स्पष्ट पोष्ट ,कोष्ठ आदि
- चवर्ग -च छ ज झ ञ का तथा "श" का उच्चारण स्थान तालव्य होने से ये परस्पर सजातिय हैं ।
- जैसे- पश्चात् , पश्च ,आदि
- इन व्यञ्जनों के उच्चारण के समय वायु मुख से रगड़(घर्षण) खाकर ऊष्मा पैदा करती है अर्थात् उच्चारण के समय मुख से गर्म वायु निकलती है।
- उष्म व्यञ्जनों का उच्चारण एक प्रकार की रगड़ या घर्षण से उत्पत्र उष्म वायु से होता हैं।
- ये भी चार व्यञ्जन होते है- श, ष, स, ह।
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- पार्श्विक : इन व्यञ्जनों के उच्चारण में श्वास -वायु जिह्वा के दोनों पार्श्वों (अगल-बगल) से निकलती है।
- 'ल' ऐसी ही पार्श्विक ध्वनि है।
- अर्ध स्वर : इन ध्वनियों के उच्चारण में उच्चारण अवयवों में कहीं भी पूर्ण स्पर्श नहीं होता तथा श्वासवायु अवरोधित नहीं रहती है।
- हिन्दी में य, व ही अर्धस्वर की श्रेणि में हैं।
- लुण्ठित :- इन व्यञ्जनों के उच्चारण में जिह्वा वर्त्स्य (दन्त- मूल या मसूड़े) भाग की ओर उठती है। हिन्दी में 'र' व्यञ्जन इसी तरह की ध्वनि है।
- उत्क्षिप्त :- जिन व्यञ्जन ध्वनियों के उच्चारण में जिह्वा का अग्र भाग (नोक) कठोर तालु के साथ झटके से टकराकर नीचे आती है, उन्हें उत्क्षिप्त कहते हैं।
- ड़ और ढ़ ऐसे ही व्यञ्जन हैं।
- जो अंग्रेजी' में क्रमश (R) तथा ( Rh ) वर्ण से बनते हैं ।
- घोष और अघोष वर्ण---
- व्यञ्जनों के वर्गीकरण में स्वर-तन्त्रियों की स्थिति भी महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।
- इस दृष्टि से व्यञ्जनों को दो वर्गों में
- विभक्त किया जाता है :- घोष और अघोष।
- जिन व्यञ्जनों के उच्चारण में स्वर-तन्त्रियों में कम्पन होता है, उन्हें घोष या सघोष कहा जाता हैं।
- दूसरे प्रकार की ध्वनियाँ अघोष कहलाती हैं।
- स्वर-तन्त्रियों की अघोष स्थिति से अर्थात् जिनके उच्चारण में कम्पन नहीं होता उन्हें अघोष व्यञ्जन कहा जाता है।
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- घोष अघोष
- ग, घ, ङ,क, ख
- ज,झ, ञ,च, छ
- ड, द, ण, ड़, ढ़,ट, ठ
- द, ध, न,त, थ
- ब, भ, म, प, फ
- य, र, ल, व, ह ,श, ष, स ।
- प्राणतत्व के आधर पर भी व्यञ्जन का वर्गीकरण किया जाता है।
- प्राण का अर्थ है - श्वास -वायु।
- जिन व्यञ्जन ध्वनियों के उच्चारण में श्वास बल अधिक लगता है उन्हें महाप्राण और जिनमें श्वास बल का प्रयोग कम होता है उन्हें अल्पप्राण व्यञ्जन कहा जाता है।
- पञ्चम् वर्गों में दूसरी और चौथी ध्वनियाँ महाप्राण हैं।
- हिन्दी के ;- ख, घ, छ, झ, ठ, ढ, थ, ध, फ, भ, ड़, ढ़ - व्यञ्जन महाप्राण हैं।
- वर्गों के पहले, तीसरे और पाँचवें वर्ण अल्पप्राण हैं।
- क, ग, च, ज, ट, ड, त, द, प, ब, य, र, ल, व, ध्वनियाँ इसी अल्प प्रमाण वर्ग की हैं।
वर्ण यद्यपि स्वर और व्यञ्जन दौनों का वाचक है
परन्तु जब व्यञ्जन में स्वर का समावेश होता है; तब वह अक्षर होता है ।
(अक्षर में स्वर ही मेरुदण्ड अथवा कशेरुका है।)
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भाषाविज्ञान में 'अक्षर' या शब्दांश (अंग्रेज़ी रूप (syllable) सिलेबल) ध्वनियों की संगठित इकाई को कहते हैं।
किसी भी शब्द को अंशों में तोड़कर बोला जा सकता है और शब्दांश ही अक्षर है ।
शब्दांश :- शब्द के वह अंश होते हैं जिन्हें और अधिक छोटा नहीं बनाया जा सकता यदि छोटा किया तो शब्द की ध्वनियाँ बदल जाती बैंड
उदाहरणतः 'अचानक' शब्द के तीन शब्दांश हैं - 'अ', 'चा' और 'नक'।
यदि रुक-रुक कर 'अ-चा-नक' बोला जाये तो शब्द के तीनों शब्दांश खंडित रूप से देखे जा सकते हैं।
लेकिन शब्द का उच्चारण सुनने में सही प्रतीत होता है।
अगर 'नक' को आगे तोड़ा जाए तो शब्द की ध्वनियाँ ग़लत हो जातीं हैं - 'अ-चा-न-क'. इस शब्द को 'अ-चान-क' भी नहीं बोला जाता क्योंकि इस से भी उच्चारण ग़लत हो जाता है।
यह क्रिया उच्चारण बलाघात पर आधारित है ।
कुछ छोटे शब्दों में एक ही शब्दांश होता है, जैसे 'में', 'कान', 'हाथ', 'चल' और 'जा'. कुछ शब्दों में दो शब्दांश होते हैं, जैसे 'चलकर' ('चल-कर'), खाना ('खा-ना'), रुमाल ('रु-माल') और सब्ज़ी ('सब-ज़ी')। कुछ में तीन या उस से भी अधिक शब्दांश होते हैं, जैसे 'महत्त्वपूर्ण' ('म-हत्व-पूर्ण') और 'अन्तर्राष्ट्रीय' ('अंत-अर-राष-ट्रीय')।
एक ही आघात या बल में बोली जाने वाली या उच्चारण की जाने वाली ध्वनि या ध्वनि समुदाय की इकाई को अक्षर कहा जाता है।
इकाई की पृथकता का आधार स्वर या स्वर-रत (Vocoid) व्यञ्जन होता है। व्यञ्जन ध्वनि किसी उच्चारण में स्वर का पूर्व या पर अंग बनकर ही आती है।
अक्षर में स्वर ही मेरुदण्ड अथवा कशेरुका है।
अक्षर से स्वर को न तो पृथक् ही किया जा सकता है और न बिना स्वर या स्वरयुक्त व्यञ्जन के द्वारा अक्षर का निर्माण ही सम्भव है।
उच्चारण में यदि व्यञ्जन मोती की तरह है तो स्वर धागे की तरह।
यदि स्वर सशक्त सम्राट है तो व्यञ्जन अशक्त राजा। इसी आधार पर प्रायः अक्षर को स्वर का पर्याय मान लिया जाता है, किन्तु ऐसा है नहीं, फिर भी अक्षर निर्माण में स्वर का अत्यधिक महत्व होता है।
कतिपय भाषाओं में व्यञ्जन ध्वनियाँ भी अक्षर निर्माण में सहायक सिद्ध होती हैं।
- अंग्रेजी भाषा में न, र, ल, जैसे एन ,आर,एल, आदि ऐसी व्यञ्जन ध्वनियाँ स्वरयुक्त भी उच्चरित होती हैं एवं स्वर-ध्वनि के समान अक्षर निर्माण में सहायक सिद्ध होती हैं।
- अंग्रेजी सिलेबल के लिए हिन्दी में अक्षर शब्द का प्रयोग किया जाता है।
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- ध्वनि उत्पत्ति- सिद्धान्त-----
- मानव एवं अन्य जन्तु ध्वनि को कैसे सुनते हैं? -- ध्वनि तरंग कर्णपटल का स्पर्श करती है , कान का पर्दा, कान की वह मेकेनिज्म जो ध्वनि को संकेतों में बदल देती है।
- श्रवण तंत्रिकाएँ, (पर्पल): ध्वनि संकेत का आवृति स्पेक्ट्रम, तन्त्रिका में गया संकेत) ही शब्द है ।
- भौतिक विज्ञान में -
- ध्वनि (Sound) एक प्रकार का कम्पन या विक्षोभ है जो किसी ठोस, द्रव या गैस से होकर सञ्चारित होती है। किन्तु मुख्य रूप से उन कम्पनों को ही ध्वनि कहते हैं जो मानव के कान (Ear) से सुनायी पडती हैं।
- ध्वनि की प्रमुख विशेषताएँ---
- ध्वनि एक यान्त्रिक तरंग है न कि विद्युतचुम्बकीय तरंग। (प्रकाश विद्युतचुम्बकीय तरंग है।
- ध्वनि के सञ्चरण के लिये माध्यम की जरूरत होती है। ठोस, द्रव, गैस एवं प्लाज्मा में ध्वनि का सञ्चरण सम्भव है।
- निर्वात में ध्वनि का सञ्चरण नहीं हो सकता।
- द्रव, गैस एवं प्लाज्मा में ध्वनि केवल अनुदैर्घ्य तरंग (longitudenal wave) के रूप में चलती है जबकि ठोसों में यह अनुप्रस्थ तरंग (transverse wave) के रूप में भी संचरण कर सकती है।
- अनुदैर्घ्य तरंग:---
- जिस माध्यम में ध्वनि का सञ्चरण होता है यदि उसके कण ध्वनि की गति की दिशा में ही कम्पन करते हैं तो उसे अनुदैर्घ्य तरंग कहते हैं!
- अनुप्रस्थ तरंग:-
- जब माध्यम के कणों का कम्पन ध्वनि की गति की दिशा के लम्बवत होता है तो उसे अनुप्रस्थ तरंग कहते है।
- सामान्य ताप व दाब (NTP) पर वायु में ध्वनि का वेग लगभग 343 मीटर प्रति सेकेण्ड होता है।
- बहुत से वायुयान इससे भी तेज गति से चल सकते हैं उन्हें सुपरसॉनिक विमान कहा जाता है।
- मानव कान लगभग २० हर्ट्स से लेकर २० किलोहर्टस (२०००० हर्ट्स) आवृत्ति की ध्वनि तरंगों को ही सुन सकता है।
- बहुत से अन्य जन्तु इससे बहुत अधिक आवृत्ति की तरंगों को भी सुन सकते हैं। जैसे चमकाधड़
- एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाने पर ध्वनि का परावर्तन एवं अपवर्तन होता है।
- माइक्रोफोन ध्वनि को विद्युत उर्जा में बदलता है; लाउडस्पीकर विद्युत उर्जा को ध्वनि उर्जा में बदलता है।
- किसी भी तरंग (जैसे ध्वनि) के वेग, तरंगदैर्घ्य और आवृत्ति में निम्नलिखित संबन्ध होता है:-
- {\displaystyle \lambda ={\frac {v}{f}}}
- जहाँ v तरंग का वेग, f आवृत्ति तथा : {\displaystyle \lambda } तरंगदर्ध्य है।
- आवृत्ति के अनुसार वर्गीकर---
- अपश्रव्य (Infrasonic) 20 Hz से कम आवृत्ति की ध्वनि मानव को सुनाई नहीं देती,
- श्रव्य (sonic) 20 Hz से 20 kHz, के बीच की आवृत्तियों वाली ध्वनि सामान्य मानव को सुनाई देती है।
- पराश्रव्य (Ultrasonic) 20 kHz से 1,6 GHz के बीच की आवृत्ति की ध्वनि मानव को सुनाई नहीं पड़ती,
- अतिध्वनिक (Hypersonic) 1 GHz से अधिक आवृत्ति की ध्वनि किसी माध्यम में केवल आंशिक रूप से ही संचरित (प्रोपेगेट) हो पाती है।
- ध्वनि और प्रकाश का सम्बन्ध शब्द और अर्थ के सामान्य या शरीर और आत्मा के समान जैविक सत्ता का आधार है ।
- ध्वनि के विषय में दार्शनिक व ऐैतिहासिक मत -
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- सृष्टि के प्रारम्भ में ध्वनि का प्रादुर्भाव ओ३म् के रूप में हुआ --
- ओ३म् शब्द की व्युत्पत्ति----
- एक वैश्विक विश्लेषण करते हैं
- ओ३म् की अवधारणा द्रविडों की सांस्कृतिक अभिव्यञ्जना है
- वे नि: सन्देह फॉनिशियन जन-जाति के सहवर्ती अथवा सजातिय बन्धु रहे होंगे । क्यों दौनों का सांस्कृतिक समीकरण है ।
- द्रविड द्रव (पदार्थ ) अथवा जल तत्व का विद =वेत्ता ( जानकार) द्रव+विद= समाक्षर लोप (Haplology)
- के द्वारा निर्मित रूप द्रविद -द्रविड है !
- ये बाल्टिक सागर के तटवर्ती -संस्कृतियों जैसे प्राचीन फ्रॉञ्च ( गॉल) की सैल्टिक (कैल्टिक) जन-जाति में द्रूयूद (Druid) रूप में हैं ।
- कैल्ट जन जाति के धर्म साधना के रहस्य मय अनुष्ठानों में इसी कारण से आध्यात्मिक और तान्त्रिक क्रियाओं को प्रभावात्मक बनाने के लिए ओघम् (ogham शब्द का दृढता से उच्चारण विधान किया जाता था !
- कि उनका विश्वास था ! कि इस प्रकार (Ow- ma) अर्थात् जिसे भारतीय आर्यों ने ओ३म् रूप में साहित्य और कला के ज्ञान के उत्प्रेरक और रक्षक के रूप में प्रतिष्ठित किया था वह ओ३म् प्रणवाक्षर नाद- ब्रह्म स्वरूप है।
- और उनका मान्यता भी थी..
- प्राचीन भारतीय आर्य मान्यताओं के अनुसार सम्पूर्ण भाषा की आक्षरिक सम्पत्ति (syllable prosperity) यथावत् रहती है
- इसके उच्चारण प्रभाव से ओघम् का मूर्त प्रारूप सूर्य के आकार के सादृश्य पर था ।
- जैसी कि प्राचीन पश्चिमीय संस्कृतियों की मान्यताऐं भी हैं।
- ..ब. वास्तव में ओघम् (ogham )से बुद्धि उसी प्रकार नि:सृत होती है .
- जैसे सूर्य से प्रकाश प्राचीन मध्य मिश्र के लीबिया प्रान्त में तथा थीब्ज में यही आमोन् रा (ammon- ra) के रूप ने था ..जो वस्तुत: ओ३म् -रवि के तादात्मय रूप में प्रस्तावित है।
- आधुनिक अनुसन्धानों के अनुसार भी अमेरिकीय अन्तरिक्ष यान - प्रक्षेपण संस्थान के वैज्ञानिकों ने भी सूर्य में अजस्र रूप से निनादित ओ३म् प्लुत स्वर का श्रवण किया है।
- सैमेटिक -- सुमेरियन हिब्रू आदि संस्कृतियों में अोमन् शब्द आमीन के रूप में है ।
- तथा रब़ का अर्थ .नेता तथा महान होता हेै ! जैसे रब्बी यहूदीयों का धर्म गुरू है .. अरबी भाषा में..रब़ -- ईश्वर का वाचक है .अमोन तथा रा प्रारम्भ में पृथक पृथक थे .. दौनों सूर्य सत्ता के वाचक थे ।
- मिश्र की संस्कृति में ये दौनों कालान्तरण में एक रूप होकर अमॉन रॉ के रूप में अत्यधिक पूज्य हुए
- .. क्यों की प्राचीन मिश्र के लोगों की मान्यता थी कि अमोन -- रॉ.. ही सारे विश्व में प्रकाश और ज्ञान का कारण है,।
- मिश्र की परम्पराओ से ही यह शब्द मैसोपोटामिया की सैमेटिक हिब्रु परम्पराओं में प्रतिष्ठित हुआ जो क्रमशः यहूदी ( वैदिक यदुः ) के वंशज थे !!
- इन्हीं से ईसाईयों में (Amen) तथा अ़रबी भाषा में यही आमीन ?
पणि कौन थे ? यह जानना भी आवश्यक है क्योंकि पणियों को यूरोपीय ग्रीक, लैटिन और डच इत्यादि पुराणों में वर्णन है।
राथ के मतानुसार यह शब्द 'पण्=विनिमय' से बना है तथा पणि वह व्यक्ति है, जो कि बिना बदले के कुछ नहीं दे सकता।
इस मत का समर्थन जिमर तथा लुड्विग ने भी किया है।
लड्विग ने इस पार्थक्य के कारण पणिओं को यहाँ का आदिवासी व्यवसायी माना है।
ये अपने सार्थ अरब, पश्चिमी एशिया तथा उत्तरी अफ़्रीका में भेजते थे और अपने धन की रक्षा के लिए बराबर युद्ध करने को प्रस्तुत रहते थे।
इनके लिए
दस्यु अथवा दास शब्द के प्रसंगों के आधार पर उपर्युक्त मत पुष्ट होता है।
किन्तु आवश्यक है कि आर्यों के देवों की पूजा न करने वाले और पुरोहितों को दक्षिणा न देने वाले इन पणियों को धर्मनिरपेक्ष, लोभी और हिंसक व्यापारी कहा जा सकता है।
ये आर्य और अनार्य दोनों हो सकते हैं।
हिलब्रैण्ट ने इन्हें स्ट्राबो द्वारा उल्लिखित पर्नियन जाति के तुल्य माना है।
जिसका सम्बन्ध दहा (दास) लोगों से था।
फ़िनिशिया इनका पश्चिमी उपनिवेश था, जहाँ ये भारत से व्यापारिक वस्तुएँ, लिपि, कला आदि ले गए।
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पणि के संस्कृत में अर्थ ,
व्यवहारो द्यूतं स्तुतिर्वा पणः अस्त्यर्थे इनि पणिन्।
१ क्रयादिव्यवहारयुक्ते
२ स्तुतियुक्ते च
३ ऋषिभेदे पु० । तस्यापत्यम् अण् “गाथिविदथीत्यादि” पाणिनि ।
पाणिन तस्यापत्ये यूनि ततः इञ् पाणिनिः ।
सरमा तथा पणि संवाद–
सरमा शब्द निर्वचन प्रसंग में उद्धृत ऋग्वेद 10/108/01 के व्याखयान में प्राप्त होता है। आचार्य यास्क का कथन है कि इन्द्र द्वारा प्रहित देवशुनी सरमा ने पणियों से संवाद किया।
पणियों ने देवों की गाय चुरा ली थी।
इन्द्र ने सरमा को गवान्वेषण के लिए भेजा था।
यह एक प्रसिद्ध आख्यान है।
आचार्य यास्क द्वारा सरमा माध्यमिक देवताओं में पठित है। वे उसे शीघ्रगामिनी होने से सरमा मानते हैं।
वस्तुतः मैत्रायणी संहिता के अनुसार भी सरमा वाक् ही है। गाय रश्मियाँ हैं इस प्रकार यह आख्यान सूर्य रश्मियों के अन्वेषण का आलंकारिक वर्णन है।
निरुक्त शास्त्र के अनुसार
‘‘ऋषेः दृष्टार्थस्य प्रीतिर्भवत्यायानसंयुक्ता’’
अर्थात् सब जगत् के प्रेरक परमात्मा अद्रष्ट अर्थों को आख्यान के माध्यम से उपदिष्ट करते हैं।
क्रमशः एक-एक शब्द पर विचार करते हैं।
पणयः- ऋग्वेद में 16 बार प्रयुक्त बहुवचनान्त पणयः शब्द तथा चार बार एकवचनान्त पणि शब्द का प्रयोग है।
पणि शब्द पण् व्यवहारे स्तुतौ च धातु से अच् प्रत्यय करके पुनः मतुबर्थ में अत इनिठनौ से इति प्रत्यय कर के सिद्ध होता है।
यः पणते व्यवहरति स्तौति स पणिः अथवा कर्मवाच्य में पण्यते व्यवहियते सा पणिः’’।
अर्थात् जिसके साथ हमारा व्यवहार होता है और जिसके बिना हमारा जीवन व्यवहार नहीं चल सकता है, उसे पणि कहते हैं ।
पणिक भाषा , जिसे कार्थागिनीन या फोएनिसियो-पूनिक भी कहा जाता है!
यह सेमेटिक परिवार की कनानी भाषा , फिनिशियन भाषा की एक विलुप्त विविधतामयी भाषा है।
यह 8 वीं शताब्दी ईसा पूर्व से 5 वीं शताब्दी ईस्वी तक, उत्तर पश्चिमी अफ्रीका में कार्तगिनियन साम्राज्य और शास्त्रीय पुरातनता में पणिक लोगों द्वारा कई भूमध्य द्वीपों में बोली जाती थी
ट्यूनीशिया और (तटीय हिस्सों), जैसे मोरक्को , अल्जीरिया , दक्षिणी इबेरिया , लीबिया , माल्टा , पश्चिमी सिसिली आदि देशों में यह लोग भ्रमण करते थे
800 ईसा पूर्व से 500 ईस्वी तक का समय --
भाषा परिवार-
अफ्रीकी-एशियाई
यहूदी
पश्चिम सेमिटिक
केंद्रीय सेमिटिक
नॉर्थवेस्ट सेमिटिक
कैनेनिटी( कनानी)
इतिहास के दृष्टि कोण से -
पेनिक्स या वैदिक सन्दर्भों में वर्णित पणि 146 ईसा पूर्व रोमन गणराज्य द्वारा कार्थेज के विनाश तक फेनेशिया के संपर्क में रहे।
फोनिशियन नामकरण पणिस् अथवा पणिक से सम्बद्ध है ।
नियो-पुणिक शब्द को दो इंद्रियों में प्रयोग किया जाता है: एक फीनशियन वर्णमाला से संबंधित है और दूसरा भाषा में ही है। वर्तमान सन्दर्भ में, नियो-पुणिक ने कार्तेज के पतन के बाद और 146 ईसा पूर्व पूर्व पुणिक क्षेत्रों के रोमन विजय के बाद पूनिक की बोली को संदर्भित किया है।
बोली पहले की पंचिक भाषा से भिन्न थी, जैसा कि पहले के पंख की तुलना में अलग-अलग वर्तनी से और गैर-सेमिटिक नामों के उपयोग से स्पष्ट रूप से लिबिको-बर्बर मूल के उपयोग से स्पष्ट है।
अंतर द्विपक्षीय परिवर्तनों के कारण था कि पुणिक उत्तर-अफ्रीकी लोगों के बीच फैल गया था।
नव-पुणिक कार्यों में लेपिस मैग्ना एन 1 9 (9 2 ईस्वी) शामिल है।
चौथी शताब्दी ईस्वी तक, पुणिक अभी भी ट्यूनीशिया, उत्तर पश्चिमी अफ्रीका के अन्य हिस्सों और भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में बोली जाती थी।
नव-पुणिक वर्णमाला भी Punic (प्यूनिक)भाषा से निकली। लगभग 400 ईस्वी तक, पुणिक का पहला अर्थ मुख्य रूप से स्मारक शिलालेखों के लिए उपयोग किया जाता था, जो कहीं और कर्सर नव-पुणिक वर्णमाला द्वारा प्रतिस्थापित किया गया था।
पुणिक साहित्यिक कार्यों के उदाहरणों में मागो के विषय को शामिल किया गया है, जो महान कुख्यातता के साथ एक पुणिक जनरल है, जिसने लड़ाई के दौरान किताबों के लेखन के माध्यम से कार्थेज के प्रभाव को उतना ही फैलाया।
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रोमन सीनेट ने इतने कामों की सराहना की कि कार्थेज लेने के बाद, उन्होंने उन्हें बर्बर राजकुमारों को प्रस्तुत किया, जिनके पास पुस्तकालयों का स्वामित्व था।
मैगो का काम ग्रीक में यूटिका के कैसियस डायनीसियस द्वारा अनुवादित किया गया था।
लैटिन संस्करण का शायद ग्रीक संस्करण से अनुवाद किया गया था। साहित्य के पुणिक कार्यों के और उदाहरणों में हनो नेविगेटर के काम शामिल हैं, जिन्होंने अफ्रीका के आसपास नौसेना के दौरान और नई उपनिवेशों के निपटारे के दौरान अपने मुठभेड़ों के बारे में लिखा था।
Punic का एक तीसरा संस्करण लैटिनो-Punic होगा, लैटिन वर्णमाला में लिखा एक Punic, लेकिन सभी वर्तनी उत्तर पश्चिमी अफ्रीकी उच्चारण का पक्ष लिया। लैटिनो-पुनीक को तीसरी और चौथी शताब्दी तक बोली जाती थी और सत्तर बरामद ग्रंथों में दर्ज की गई थी। रोमन शासन के तहत पुणिक का आश्चर्यजनक अस्तित्व इसलिए था क्योंकि बोलने वाले लोगों के पास रोम के साथ बहुत अधिक संपर्क नहीं था, और इसलिए लैटिन सीखने की आवश्यकता नहीं थी।
सन्दर्भ तालिका -
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लैटिनो- Punic ग्रंथों में पहली शताब्दी Zliten एलपी 1, या दूसरी शताब्दी Lepcis Magna एलपी 1 शामिल हैं। [ स्पष्टीकरण की आवश्यकता ] उन्हें चौथी शताब्दी के अंत में भी लिखा गया था, बीर एड-ड्रेडर एलपी 2 । शास्त्रीय स्रोत जैसे स्ट्रैबो (63/4 ईसा पूर्व - एडी 24), लिबिया के फोनीशियन विजय का जिक्र करते हैं।
सलस्ट (86 - 34 ईसा पूर्व) के अनुसार 146 ईसा पूर्व के बाद पुणिक के हर रूप में परिवर्तन हुआ है, जो दावा करते हैं कि पुणिक को " न्यूमिडियन के साथ उनके विवाहों में बदल दिया गया था"। यह खाता पुणिक पर उत्तर-अफ्रीकी प्रभाव का सुझाव देने के लिए पाए गए अन्य सबूतों से सहमत है, जैसे यूनेबियस के ओनोमास्टिक में लिबिको-बर्बर नाम। [ संदिग्ध ] आखिरी ज्ञात साक्ष्य रिपोर्टिंग एक जीवित भाषा के रूप में Punic है हिप्पो के अगस्तिन (डी। 430) की है।
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पणियों का देवता (ईश्वरीय सत्ता) वल
का सेमैेटिक पुराणों में रूप -बाल ठीक से Ba'al , पुरातनता के दौरान Levant में बोली जाने वाली उत्तर पश्चिमी सेमेटिक भाषाओं में एक शीर्षक और सम्मानित अर्थ " भगवान " था। लोगों के बीच इसके उपयोग से, यह देवताओं पर लागू किया गया था। विद्वानों ने पहले सौर संप्रदायों के साथ और विभिन्न असंबद्ध संरक्षक देवताओं के साथ नाम से जुड़ा हुआ था, लेकिन शिलालेखों से पता चला है कि बाल नाम विशेष रूप से तूफान और प्रजनन भगवान हदाद और उनके स्थानीय अभिव्यक्तियों से जुड़ा हुआ था। [8]
Ba'al
प्रजनन , मौसम , बारिश , हवा , बिजली , ऋतु , युद्ध , नाविकों के संरक्षक और समुद्री व्यापारियों के देवता , रेफाईम (पैतृक आत्माओं) के नेता
बाद के विचार: देवताओं के राजा
उगलिट के खंडहर में पाए गए थंडरबॉल्ट के साथ बाल का स्टील
प्रतीक
बुल , भेड़
क्षेत्र
कनान के पास और पास
पास, आसपास और उगारिट में
मिस्र (मध्य साम्राज्य)
व्यक्तिगत जानकारी
पत्नी के
अनाट , अथतर्ट, आर्से, तलेय, पिड्रे
माता-पिता
डगन (सामान्य लोअर) एल (कुछ उगारिटिक ग्रंथ)
एक माँ की संताने
Anat
सदियों की अवधि में संकलित और क्यूरेटेड हिब्रू बाइबिल में विभिन्न लेवेंटाइन देवताओं के संदर्भ में शब्द का सामान्य उपयोग शामिल है, और आखिरकार हदाद की ओर इशारा करते हुए आवेदन, जिसे झूठे भगवान के रूप में अस्वीकार कर दिया गया था। उस प्रयोग को ईसाई धर्म और इस्लाम में ले जाया गया था, कभी-कभी दानव में बेल्जबूब के अपमानजनक रूप के तहत।
एटिमोलॉजी -
अंग्रेजी शब्द "बाल" की वर्तनी ग्रीक बाल ( Βάαλ ) से निकली है, जो नए नियम [9] और सेप्टुआजिंट , [10] में दिखाई देती है और इसके लैटिनयुक्त रूप बाल से , जो वल्गेट में दिखाई देती है। [10] ये रूप स्वर में कम-से-कम नॉर्थवेस्ट सेमेटिक फॉर्म बीएल से निकलते हैं। फोएनशियन देवता और झूठे देवताओं के रूप में शब्द की बाइबिल की इंद्रियों को आम तौर पर प्रोटेस्टेंट सुधार के दौरान किसी भी मूर्तियों , संतों के प्रतीक , या कैथोलिक चर्च को दर्शाने के लिए बढ़ाया गया था। [11] इस तरह के संदर्भों में, यह anglicized उच्चारण का पालन करता है और आमतौर पर इसके दो As के बीच किसी भी निशान को छोड़ देता है। [1] सेमिटिक नाम के करीबी लिप्यंतरण में, आयन का प्रतिनिधित्व बाल के रूप में किया जाता है।
नॉर्थवेस्ट सेमेटिक भाषाओं में - यूगारिटिक , फोएनशियन , हिब्रू , एमोरिट , और अरामासिक- शब्द बाल ने " मालिक " और विस्तार से, "भगवान", [10] एक "मास्टर" या "पति" का संकेत दिया। [12] [13] संज्ञेयों में अक्कडियन बेल्लू ( 𒂗 ), [सी] अम्हारिक बाल ( ባል ), [14] और अरबी बाल ( بعل ) शामिल हैं। बाल ( बेथेल ) और बाल अभी भी आधुनिक हिब्रू और अरबी में "पति" के शब्दों के रूप में कार्य करते हैं। वे चीजों के स्वामित्व या गुणों के कब्जे से संबंधित कुछ संदर्भों में भी दिखाई देते हैं।
स्त्री का रूप ba'alah है ( हिब्रू : בַּעֲלָה ; [15] अरबी : بعلة ), जिसका अर्थ है मादा मालिक या घर की महिला [15] के अर्थ में "मालकिन" और अभी भी " पत्नी " के लिए दुर्लभ शब्द के रूप में सेवा करना । [16]
प्रारंभिक आधुनिक छात्रवृत्ति में सुझावों में सेल्टिक भगवान बेलेनस के साथ तुलना भी शामिल है। [17]
सेमिटिक धर्म -
यह भी देखें: प्राचीन निकट पूर्व के धर्म , प्राचीन सेमिटिक धर्म , कनानी धर्म , और कार्थागिनी धर्म
एक बाल का कांस्य मूर्ति, 14 वीं x 12 वीं शताब्दी ईसा पूर्व, फीनशियन तट के पास रस शमरा (प्राचीन उगारिट ) में पाया गया। Musée du Louvre ।
जेनेरिक -
यह भी देखें: बेल , ज़ीउस बेलोस , और बेलस नाम के अन्य आंकड़े
सुमेरियन में एन की तरह, अक्कडियन बेल्लू और नॉर्थवेस्ट सेमिटिक बाल (साथ ही साथ इसकी स्त्री रूप बालाह ) मेसोपोटामियन और सेमिटिक पैंथियंस में विभिन्न देवताओं के शीर्षक के रूप में प्रयोग किया जाता था। केवल एक निश्चित लेख , जननांग या उपकला , या संदर्भ स्थापित कर सकता है कि कौन सा विशेष भगवान था। [18]
हदाद -
मुख्य लेख: हदाद और अदद
बायल को तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व द्वारा उचित नाम के रूप में भी इस्तेमाल किया गया था, जब वह अबू सलाबीख में देवताओं की एक सूची में प्रकट होता है। [10] अधिकांश आधुनिक छात्रवृत्ति का दावा है कि यह बाल-आमतौर पर "भगवान" के रूप में प्रतिष्ठित है ( हे बहेल , हा बाल ) - तूफान और प्रजनन देवता हदाद के समान है; [10] [1 9] [12] यह बाल हडु के रूप में भी प्रकट होता है। [13] [20]विद्वानों ने प्रस्ताव दिया कि, हदाद की पंथ महत्त्व में बढ़ी है, इसलिए उसका सच्चा नाम किसी के लिए बहुत पवित्र माना गया है, लेकिन महायाजक जोर से बोलने के लिए और उपनाम "भगवान" ("बाल") था इसके बजाए, " बेल " का इस्तेमाल बाबुलियों के बीच मर्दुक और इस्राएलियों के बीच यहोवा के लिए " अदोनी " के लिए किया गया था। एक अल्पसंख्यक प्रस्ताव करता है कि बाल एक देशी कनानी देवता था जिसकी पंथ की पहचान अदद के पहलुओं के साथ की गई थी या अवशोषित की गई थी। [10] पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व तक , उनके मूल संबंधों के बावजूद, दोनों अलग थे: हदाद की पूजा अरामियों और बाल ने फीनशियनों और अन्य कनानियों द्वारा की थी। [10]
एल -
मुख्य: एल
फोएनशियन बायल आमतौर पर एल या डगन के साथ पहचाना जाता है। [21]
Ba'al बाल ( वैदिक -बल)
Ba'al शिलालेखों में जीवित रहने के लिए अच्छी तरह से प्रमाणित है और लेवेंट [22] में अलौकिक नामों में लोकप्रिय था, लेकिन आमतौर पर अन्य देवताओं के साथ उनका उल्लेख किया जाता है, "कार्रवाई के अपने क्षेत्र को शायद ही कभी परिभाषित किया जा रहा है"। [23] फिर भी, उगारिटिक रिकॉर्ड उन्हें मौसम देवता के रूप में दिखाते हैं, विशेष रूप से बिजली , हवा , बारिश और प्रजनन क्षमता पर शक्ति। [23] [डी] क्षेत्र के सूखे गर्मियों को अंडरवर्ल्ड में बाल के समय के रूप में समझाया गया था और शरद ऋतु में उनकी वापसी ने तूफान का कारण बनने के लिए कहा था। [23] इस प्रकार, कनान में बालल की पूजा - जहां उन्होंने अंततः देवताओं के नेता और राजा के संरक्षक के रूप में एल को आपूर्ति की- मिस्र और मेसोपोटामिया के विपरीत, इसकी खेती के लिए वर्षा पर क्षेत्रों की निर्भरता से जुड़ा हुआ था, जो सिंचाई पर केंद्रित था उनकी प्रमुख नदियों से। फसलों और पेड़ों के लिए पानी की उपलब्धता के बारे में चिंता ने अपनी पंथ के महत्व को बढ़ाया, जिसने वर्षा देवता के रूप में अपनी भूमिका पर ध्यान केंद्रित किया। [12] युद्ध के दौरान उन्हें भी बुलाया गया था, जिसमें दिखाया गया था कि उन्हें मनुष्यों की दुनिया में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करने का विचार किया गया था, [23] एल के अधिक अलगाव के विपरीत। बालाबेक के लेबनानी शहर का नाम बाल के नाम पर रखा गया था। [26]
उगारिट का बाल हदाद का प्रतीक था, लेकिन समय बीतने के बाद, यह सिद्धांत भगवान का नाम बन गया, जबकि हदाद महाकाव्य बन गया। [27] बायल को आमतौर पर दगान का पुत्र कहा जाता था, लेकिन यूगारिटिक स्रोतों में एल के पुत्रों में से एक के रूप में दिखाई देता है। [22] [13] [ई] बालाल और एल दोनों यगारिटिक ग्रंथों में बैल से जुड़े थे, क्योंकि यह ताकत और प्रजनन दोनों का प्रतीक था। [28] कुंवारी देवी ' अनाथ उसकी बहन थीं और कभी-कभी उसके माध्यम से एक बच्चे के साथ श्रेय दिया जाता था। [ उद्धरण वांछित ] उन्होंने सांपों के खिलाफ विशेष दुश्मन आयोजित किया, दोनों स्वयं और यमू के प्रतिनिधियों ( lit. "सागर"), कनानी समुद्र देवता और नदी देवता के रूप में । [2 9] उन्होंने टैनिन ( तुन्नानु ), "ट्विस्ट सर्प" ( बान'क्लटन ), " लिटन द फ्यूजिटिव सर्पेंट" ( लेट्टन बान ब्र , बाइबिल लीविथान ), [2 9] और " सात प्रमुखों के साथ ताकतवर " ( Šlyṭ D.šb't Rašm )। [30] [एफ] बाम के यमू के साथ संघर्ष अब आम तौर पर बाइबिल की पुस्तक डैनियल के 7 वें अध्याय में दर्ज दृष्टि के प्रोटोटाइप के रूप में माना जाता है। [32] समुद्र के विजेता के रूप में, बालल को कनानी और फोएनशियनों ने नाविकों और समुद्री व्यापारियों के संरक्षक के रूप में माना था। [2 9] मोना के विजेता के रूप में, कनानी मृत्यु देवता , उन्हें बाल रापूमा ( बीएल आरपीयू ) के नाम से जाना जाता था और विशेष रूप से सत्तारूढ़ राजवंशों के पूर्वजों, रेफैम ( आरपीयूएम ) के नेता के रूप में जाना जाता था। [29]
कनान से, पूर्व साम्राज्य बीसीई में फोएनशियन उपनिवेशवाद की लहरों के बाद, मध्य साम्राज्य और भूमध्यसागरीय इलाकों में बाल की पूजा मिस्र में फैल गई। [22] उन्हें विभिन्न उपहासों के साथ वर्णित किया गया था और, यूगारिट को फिर से खोजने से पहले, यह माना जाता था कि इन्हें अलग-अलग स्थानीय देवताओं के लिए संदर्भित किया गया था। हालांकि, जैसा कि दिन द्वारा समझाया गया है, उगारिट के ग्रंथों से पता चला है कि उन्हें "विशेष देवता के स्थानीय अभिव्यक्तियों" के रूप में माना जाता था, जो रोमन कैथोलिक चर्च में वर्जिन मैरी के स्थानीय अभिव्यक्तियों के समान थे। " [1 9] उन शिलालेखों में, उन्हें अक्सर "विक्टोरियस बाल" ( अलीिन या आलिन बाल ) के रूप में वर्णित किया जाता है, [13] [10] "
Phoenicia में
फेनिशिया एक प्राचीन सेमिटिक सभ्यता थी जिसकी उत्पत्ति पूर्वी भूमध्य सागर और उपजाऊ वर्धमान के पश्चिम में हुई थी । उनकी सभ्यता प्राचीन ग्रीस के समान शहर-राज्यों में संगठित थी, जिनमें से सबसे उल्लेखनीय थे टायर , सिडोन , अरवाड , बेरिटस , बायब्लोस , त्रिपोलिस , एको या टॉलेमाइस और कार्थेज ।
विद्वान आम तौर पर इस बात से सहमत हैं कि इसमें आज के लेबनान , उत्तरी इज़राइल और दक्षिणी सीरिया के तटीय क्षेत्र शामिल हैं जो उत्तर में अरवाड तक पहुँचते हैं, लेकिन इस बात पर कुछ विवाद है कि यह दक्षिण में कितनी दूर तक गया, सबसे दूर सुझाया गया क्षेत्र अश्कलोन है । [5] इसके उपनिवेश बाद में पश्चिमी भूमध्य सागर (विशेष रूप से कार्थेज) और यहां तक कि अटलांटिक महासागर तक पहुंच गए। यह सभ्यता 1500 ईसा पूर्व से 300 ईसा पूर्व के बीच भूमध्य सागर में फैली थी ।
शब्द-साधन(शब्द व्युत्पत्ति
फोनीशियन नाम , लैटिन पोएनी (विशेषण पोएनिकस, बाद में प्यूनिकस) की तरह, ग्रीक Φοίνικες ( फोनिकेस ) से आया है। शब्द φοῖνιξ फ़ोनिक्स का अर्थ भिन्न-भिन्न रूप से " फोनीशियन व्यक्ति", "टायरियन पर्पल, क्रिमसन" या "खजूर" है और होमर में पहले से ही तीनों अर्थों के साथ प्रमाणित है । [6] (पौराणिक पक्षी फ़ीनिक्स का भी यही नाम है, लेकिन यह अर्थ सदियों बाद तक प्रमाणित नहीं हुआ है।) यह शब्द φόοινός phoinós "रक्त लाल" से लिया गया है, [7] स्वयं संभवतः φόνος फ़ोनोस "हत्या" से संबंधित है . यह पता लगाना मुश्किल है कि कौन सा अर्थ पहले आया, लेकिन यह समझ में आता है कि यूनानी कैसे थेखजूर और डाई के लाल या बैंगनी रंग का संबंध उन व्यापारियों से हो सकता है जो दोनों उत्पादों का व्यापार करते थे। रॉबर्ट एसपी बीकेस ने जातीय नाम की पूर्व-ग्रीक उत्पत्ति का सुझाव दिया है। [8] ग्रीक में शब्द का सबसे पुराना प्रमाणित रूप माइसेनियन पो-नी-की-जो , पो-नी-की हो सकता है , जो संभवतः मिस्र के fnḫw (फेनखु) से उधार लिया गया है। [9]
फेनिशिया एक प्राचीन यूनानी शब्द है जिसका उपयोग क्षेत्र के प्रमुख निर्यात को संदर्भित करने के लिए किया जाता है, म्यूरेक्स मोलस्क से टायरियन बैंगनी रंगे कपड़े, और प्रमुख कनानी बंदरगाह कस्बों को संदर्भित किया जाता है; समग्र रूप से फोनीशियन संस्कृति के अनुरूप नहीं है क्योंकि इसे मूल रूप से समझा गया होगा। उनकी सभ्यता प्राचीन ग्रीस के समान शहर-राज्यों में संगठित थी , [28] शायद उनमें से सबसे उल्लेखनीय थे टायर , सिडोन , अर्वाड , बेरिटस , बायब्लोस और कार्थेज । [29]प्रत्येक शहर-राज्य एक राजनीतिक रूप से स्वतंत्र इकाई थी, और यह अनिश्चित है कि फोनीशियन किस हद तक खुद को एक राष्ट्रीयता के रूप में देखते थे। पुरातत्व, भाषा, जीवनशैली और धर्म के संदर्भ में फोनीशियनों को अलग करने के लिए कुछ भी नहीं था क्योंकि वे लेवांत के अन्य निवासियों, जैसे उनके करीबी रिश्तेदारों और पड़ोसियों, इज़राइलियों से स्पष्ट रूप से भिन्न थे। [30]
लगभग 1050 ईसा पूर्व, फोनीशियन भाषा लिखने के लिए फोनीशियन वर्णमाला का उपयोग किया जाता था। [31] यह सबसे व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली लेखन प्रणालियों में से एक बन गई, जिसे फोनीशियन व्यापारियों ने भूमध्यसागरीय दुनिया भर में फैलाया, जहां यह विकसित हुई और कई अन्य संस्कृतियों द्वारा इसे आत्मसात किया
1. ज़ीउस देवी हेकेट के साथ खड़ा है । [11] ग्रीक: "किंग अगाथोकल्स"।
2. देवता सिर पर आयतन के साथ एक लंबा हेमेशन पहने हुए, हाथ आंशिक रूप से मुड़े हुए और कॉन्ट्रापोस्टो मुद्रा में हैं। ग्रीक: "राजा अगाथोकल्स"। [11] यह सिक्का कांसे का है । [12]
3. हिंदू भगवान बलराम - गुणों के साथ संकर्षण । ग्रीक: "राजा अगाथोकल्स"। [13]
4. हिंदू भगवान वासुदेव - गुणों के साथ कृष्ण । [13] ब्राह्मी : "राजने अगाथुक्लेयासा", "राजा अगाथोकलेस"।
1880 में, इसी तरह का एक सिक्का अगाथोकल्स द्वारा चलाया गया था, लेकिन फिलिप के बेटे अलेक्जेंडर की "स्मृति" में ब्रिटिश संग्रहालय के पर्सी गार्ंडर द्वारा प्रकाशित किया गया था। [4] अगाथोकल्स के लिए किसी ऐसे व्यक्ति का उप-राजा बनना असंभव था जिसने लगभग दो सौ साल पहले शासन किया था, ड्रॉयसन के स्पष्टीकरण को सैलेट के पक्ष में सरसरी तौर पर खारिज कर दिया गया था। [4] [ई] गार्डनर ने प्रस्तावित किया कि ये सिक्के यूक्रेटाइड्स प्रथम द्वारा (अंततः सफल) चुनौती की पूर्व संध्या पर अपनी जनता को बढ़ाने के लिए जारी किए गए थे । [15] 1900 के मध्य की शुरुआत में, ह्यूग रॉविन्सन और विलियम टार्नएक भव्य हेलेनिस्टिक अतीत के अपने दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने के लिए गार्डनर के विचारों का विस्तार करेगा जहां अगाथोकल्स ने अपनी वंशावली को नकली बना दिया था और यूक्रेटाइड्स I सेल्यूसिड नियंत्रण को फिर से स्थापित करने के लिए एंटिओकस IV के आदेशों का पालन कर रहा था । [16] [15] अन्य विद्वान आम तौर पर इन "पूर्वज सिक्कों" को बहुत अधिक महत्व देने से बचते हैं। [17]
इन सिक्कों की और भी किस्में बाद में खोजी जाएंगी। [4] इनमें डायोडोटस द्वितीय , डेमेट्रियस द्वितीय और डेमेट्रियस का उल्लेख है । [4] [6] [18] [17] पिछले कुछ दशकों में, ऐसे सिक्के अधिक संख्या में खोजे गए हैं लेकिन इन सिक्कों की सटीकता इस तथ्य से प्रभावित है कि ये नियंत्रित उत्खनन से नहीं बल्कि नीलामी नेटवर्क से आए थे। [4] महाद्वीपों की यात्रा करने और कई हाथों से गुजरने के बाद ही विद्वानों द्वारा उनका मूल्यांकन किया गया। [4]
तब से यह स्वीकार कर लिया गया है कि ये सिक्के वास्तव में अगाथोकल्स के पूर्ववर्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। [19] ढलाई और महत्व का सटीक संदर्भ अभी भी स्पष्ट नहीं है। [6]
ओबीवी बलराम - ग्रीक किंवदंती के साथ संकर्षण : ΒΑΣΙΛΕΩΣ ΑΓΑΘΟΚΛΕΟΥΣ ( बेसिलोस अगाथोक्लिअस )। ब्राह्मी कथा के साथ
रेव वासुदेव-कृष्ण :𑀭𑀚𑀦𑁂 𑀅𑀕𑀣𑀼𑀼𑀓𑁆𑀮𑁂𑀬𑁂𑀲 राजने अगाथुक्लेसा "राजा अगाथोकल्स"।
3 अक्टूबर 1970 को, फ्रांसीसी पुरातत्वविदों की एक टीम द्वारा एक तीर्थयात्री के पानी के जहाज से ऐ-खानौम के प्रशासनिक क्वार्टर में छह भारतीय-मानक चांदी के ड्रैकमास की खोज की गई थी। [26] ये सिक्के वैदिक देवताओं का पहला मुद्राशास्त्रीय प्रतिनिधित्व हैं और प्रारंभिक भारत में भगवतीवाद के वैष्णववाद का पहला रूप होने के प्रमुख साक्ष्य के रूप में काम करते हैं। [27] [28]
सिक्के विष्णु के शुरुआती अवतारों को प्रदर्शित करते हैं : बलराम - संकर्षण , पीछे मूसल और हल की विशेषताओं के साथ , और वासुदेव - कृष्ण , सामने शंख और सुदर्शन चक्र की विशेषताओं के साथ । [27] [28] [जी] सिक्कों के आधार पर भारतीय मूर्तिकला के विशिष्ट ट्रेडमार्क - तीन-चौथाई के विपरीत ललाट मुद्रा, पर्दों में कठोर और स्टार्चयुक्त सिलवटें, अनुपात की अनुपस्थिति, और पैरों का बग़ल में स्वभाव - ऑडोइन और बर्नार्ड ने अनुमान लगाया कि नक्काशी भारतीय कलाकारों द्वारा की गई थी। [27]बोपेराच्ची निष्कर्ष पर विवाद करते हैं और वासुदेव-कृष्ण के छत्र के साथ टोपी और ऊंची गर्दन वाले फूलदान के साथ शंख के गलत चित्रण की ओर इशारा करते हैं ; उनका अनुमान है कि एक यूनानी कलाकार ने अब लुप्त हो चुकी (या अनदेखी) मूर्ति से सिक्का उकेरा था। [27]
अगाथोकल्स के कुछ कांस्य सिक्कों के अग्रभाग पर पाई गई एक नाचती हुई लड़की को सुभद्रा का प्रतिनिधित्व माना जाता है । [27]
साइन्स जर्नी चैनल का यूट्यूबर कृष्ण शब्द को पाली और प्राकृत भाषाओं में नही मानता है जबकि वेद शब्द भारोपीय होने अनेक भाषाओ में है जिसका कुछ विवरण नीचे है।
प्राकृत- में कृष्ण का रूप (काण्ह) है और पाली की पूर्व लिपि ब्राह्मी थी ।
बौद्ध ग्रन्थ तो महावीर स्वामी का वर्ण निगंठ ( निर्ग्रन्थ तथा ज्ञान पुत्र के रूप में वर्णन करते हैं
परन्तु जैन ग्रन्थों में किसी भी बुद्ध का वर्णन नहीं है। अत: जैन धर्म बौद्ध धर्म से पुराना है ।
सत्य तो यही है कि कृष्ण को ऋग्वेद
में असुर अर्थात् अदेव कहा है ।
--- जो यमुना की तलहटी में इन्द्र से युद्ध करते हैं
मोहनजोदाड़ो सभ्यता के विषय में 1929 में हुई खोज के अनुसार पुरातत्व वेत्ता मैके द्वारा मोहनजोदाड़ो में हुए उत्खनन में एक पुरातन टैबलेट (भित्तिचित्र) मिला है।
जिसमें दो वृक्षों के बीच खड़े एक बच्चे का चित्र बना हुआ था ।
जो भागवत आदि पुराणों के कृष्ण से सम्बद्ध थे।
पुराणों में लिखे कृष्ण द्वारा यमलार्जुन के उद्धार की कथा की ओर ले जाता है। पुराणों का सृजन बुद्ध के परवर्ती काल में हुआ । और कृष्ण की कथाऐं इससे भी ---पुरानी हैं ।
| लङ्(अनद्यतन भूत) | |||
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | |
| प्रथमपुरुषः | आवत्=युद्ध किया | ||
वेदों में कृष्ण और इन्द्र के युद्ध सम्बन्धी तथ्य-
भारतीय भाषाओं में इन्द्र" नाम की कोई निश्चित व्युत्पत्ति नहीं है। सबसे प्रशंसनीय रूप से यह एक प्रोटो-इण्डो-यूरोपियन मूल का शब्द है।
यूरोपीय भाषाओं में एण्डरो-(andró) शब्द ग्रीक भाषा के Aner से विकसित हुआ है। Aner का सम्बन्ध कारक रूप एण्डरो- है। मूल भरोपीय भाषाओं में (H- Ner) हनर-
ओस्कैन में (ner)- "पुरुषों का"), अल्बानियाई में नजेरी "आदमी, मानव," वेल्स- नर । मितन्नी में इन-द-र- शब्द है। यद्यपि अवेस्ता में इन्द्र एक दुष्ट शक्ति है। क्योंकि देव शब्द ही अवेस्ता में दुष्ट का वाचक है। पारसी मिथ को के सम्बन्ध में इन्द्र और देव शब्द पर आगे यथा क्रम विचार किया जाएगा ।
संस्कृत(Sanskrit) एक वैदिक भाषा परिनिष्ठित व संशोधित रूपान्तरण है. कुछ लोगों का मानना है कि ये दुनिया की सबसे पुरानी भाषा है, जो लगभग 5000 साल पुरानी है. ऋग्वेद जिस भाषा में लिखा गया है वो इसका यानी संस्कृत का प्रथम स्वरूप है, लेकिन कुछ इतिहासकारों का मानना है कि संस्कृत ऋग्वेद से भी पहले इस्तेमाल होती थी. इस भाषा का इस्तेमाल आज से लगभग 3500 साल पहले सीरिया का एक राजवंश किया करता था. आज हम उसी राजवंश के बारे में आपको आगे यथाक्रम बताएंगे.
भारतीय वेदों में इन्द्र की सबसे अधिक स्तुति वैदिक ब्राह्मणों ने की है। और इन्द्र को वेदों में सबसे वड़ा देव घोषित किया गया है ।
परन्तु वैदिक पुरोहित भौतिक कामनाओं की आपूर्ति के लिए ही इन्द्र आदि देवताओं का योजन( यज्ञ) आदि किया करते थे। देवताओं की उपासना से आध्यात्मिक ज्ञान अथवा मोक्ष तो मिन नहीं सकता और न ही यज्ञों के सम्पादन से न ईश्वर की अनुभूति हो सकती है और नहीं आत्मज्ञान प्राप्त होता है।
यज्ञ केवल देवों की प्रसन्नता के लिए किए जाते थे और ये यज्ञ भी निर्दोष पशुओं पक्षीयों की हत्या के बिना सम्पन्न नहीं माने जाते थे। इन्द्र स्वयं यज्ञ में पशुमेध का समर्थ था।
वेदों में तथा पुराणों में इन्द्र का चरित्र पूर्णतया राजसिक है । वह पुराणों में तो अपनी कामुक प्रवृत्ति के लिए जाना जाता है। वेदों वनो भी उसका विलासी चरित्र उभर कर आता है। उसमें सत्व गण का कोई भाव नहीं है। भोग विलास में निरन्तर लगा हुआ इन्द्र आध्यात्मिक ज्ञान से विमुख और परे है।
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महाभारत के आदि पर्व में इन्द्र का यज्ञ भूमि में सोम पीकर उन्मत्त होने का वर्णन है।
सोम एक नशीला पदार्थ था जिसे पारसी धर्म ग्रन्थों में होम कहा गया है क्योंकि फारसी में प्राय: वैदिक भाषा के " स" वर्ण का उच्चारण "ह"वर्ण के रूप में होता है"
प्राचीन भारत में सुर, सुरा, सोम और मदिरा आदि का बहुत प्रचलन था। कहते हैं कि इंद्र की सभा में सुंदरियों के नृत्य के बीच सुरों के साथ सुरापान होता था।
सोम रस : सभी देवता लोग सोमरस का सेवन करते थे। प्रमाण- 'यह निचोड़ा हुआ शुद्ध दधिमिश्रित सोमरस, सोमपान की प्रबल इच्छा रखने वाले इंद्रदेव को प्राप्त हो।-
सुतपाव्ने सुता इमे शुचयो यन्ति वीतये ।
सोमासो दध्याशिरः ॥५॥
सुतऽपाव्ने । सुताः । इमे । शुचयः । यन्ति । वीतये।सोमासः । दधिऽआशिरः ॥५।
सायणभाष्य:-
“इमे "सोमासः अस्मिन् कर्मणि संपादिताः सोमाः "सुतपाव्ने= अभिषुतस्य सोमस्य पानकर्त्रे । षष्ठ्यर्थे चतुर्थी । तस्य पातुः =“वीतये भक्षणार्थं "यन्ति तमेव प्राप्नुवन्ति । कीदृशाः सोमाः । "सुता:= अभिषुताः । “शुचयः =दशापवित्रेण शोधितत्वात् शुद्धाः । "दध्याशिरः =अवनीयमानं दधि आशीर्दोषघातकं येषां सोमानां ते दध्याशिरः ।। सुतपाव्ने । सुतं पिबतीति सुतपावा । वनिप: पित्त्वात् धातुस्वर एव शिष्यते । समासे द्वितीयापूर्वपदप्रकृतिस्वरं बाधित्वा कृदुत्तरपदप्रकृतिस्वरत्वम् । शुचयः । शुच दीप्तौ'। ‘इन्' इत्यनुवृत्तौ ‘इगुपधात्कित्' (उ. सू. ४. ५५९) इति इन् । कित्त्वाल्लघूपधगुणाभावः। नित्त्वादाद्युदात्तत्वम् । वीतये । ‘ वि गतिप्रजनकान्त्यशनखादनेषु' इत्यस्मात् ' मन्त्रे वृषेषपचमनविदभूवीरा उदात्तः ' ( पा. सू. ३, ३. ९६ ) इति क्तिन् उदात्तः । सोमासः । ‘ षुञ् अभिषवे'। ‘ अर्तिस्तुसुहुसृधृक्षि° ' ( उ. सू. १. १३७ ) इत्यादिना मन् । नित्त्वादाद्युदात्तः । ‘ आज्जसेरसुक्' (पा. सू. ७. १. ५० } इत्यसुगागमः । दध्याशिरः । दधाति पुष्णातीति दधि । ‘डुधाञ् धारणपोषणयोः । ‘ आदृगमहनजनः किकिनौ लिट् च ' ( पा. सू.ब॒ ३. २. १७१ ) इति किन् । लिङ्वद्भावात् द्विर्भावः । कित्त्वादाकारलोपः । नित्त्वादाद्युदात्तत्वम् ।शॄ ‘हिंसायाम् ' । शृणाति हिनस्ति सोमेऽवनीयमानं सत् सोमस्य स्वाभाविकं रसम् ऋजीषत्वप्रयुक्तं नीरसं दोषं वा इत्याशीः । क्विपि ‘ ऋत इद्धातोः ' ( पा. सू. ७, १. १०० ) इति इत्वं रपरत्वं च । दध्येव आशीर्येषां सोमानां ते दध्याशिरः। बहुव्रीहौ पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वम् ।९ ॥ (ऋग्वेद-1/5/5).
तीव्राः सोमास आ गह्याशीर्वन्तः सुता इमे ।
वायो तान्प्रस्थितान्पिब ॥१॥
"शतं वा य: शुचीनां सहस्रं वा समाशिराम्। एदुनिम्नं न रीयते।।
(ऋग्वेद-1/23/1)..
शतं वा यः शुचीनां सहस्रं वा समाशिराम् ।
एदु निम्नं न रीयते ॥२॥
(ऋग्वेद-1/30/2)
इन्द्रा य गाव आशिरं दुदुह्रे वज्रिणे मधु” (ऋग्वेद- ८/, ५८,/ ६ )
इमे त इन्द्र सोमास्तीव्रा अस्मे सुतासः ।
शुक्रा आशिरं याचन्ते ॥१०॥
ताँ आशिरं पुरोळाशमिन्द्रेमं सोमं श्रीणीहि ।
रेवन्तं हि त्वा शृणोमि ॥११॥
हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम् ।
ऊधर्न नग्ना जरन्ते ॥१२॥
सुरापान : प्राचीन काल में सुरा एक प्रकार से शराब ही थी कहते हैं कि सुरों द्वारा ग्रहण की जाने वाली हृष्ट (बलवर्धक) प्रमुदित (उल्लासमयी) वारुणी (पेय) इसीलिए सुरा कहलाई। कुछ देवता सुरापान करते थे।
हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम् ।
ऊधर्न नग्ना जरन्ते ॥१२॥ (ऋग्वेदः सूक्तं 8/2/12)
अर्थात : सुरापान करने या नशीले पदार्थों को पीने वाले अक्सर नंगे होकर युद्ध, मार-पिटाई या उत्पात ही मचाया करते हैं।
धर्मग्रन्थों में असुर वे लोग हैं जो 'सुर' (देवताओं) से संघर्ष करते हैं।
धर्मग्रन्थों में उन्हें शक्तिशाली, अतिमानवीय, असु राति अर्थात् जो प्राण देता है, के रूप में चित्रित किया गया है
'असुर' शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में लगभग १०५ बार हुआ है। उसमें ९० स्थानों पर इसका प्रयोग 'असु युक्त अथवा प्राण -युक्त के अर्थ में किया गया है । और केवल १५ स्थलों पर यह 'देवताओं के शत्रु' का वाचक है।
'असुर' का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है- प्राणवंत, प्राणशक्ति संपन्न ('असुरिति प्राणनामास्त: शरीरे भवति, निरुक्ति ३.८)
और इस प्रकार यह वैदिक देवों के एक सामान्य विशेषण के रूप में व्यवहृत किया गया है।
विशेषत: यह शब्द इंद्र, मित्र तथा वरुण के साथ प्रयुक्त होकर उनकी एक विशिष्ट शक्ति का द्योतक भी है। इंद्र के तो यह वैयक्तिक बल का सूचक है, परंतु वरुण के साथ प्रयुक्त होकर यह उनके नैतिक बल अथवा शासनबल का स्पष्टत: संकेत करता है।
परन्तु लौकिक संस्कृत में सुर के विपरीत असुर हैं।
वाल्मीकि रामायण को बाल काण्ड नें सुरा पीने वाले को सुर" ( देव) कहा है ।
इन्द्र सुरापान करके उन्मत्त रहता था । और सुरापान करने वाला ही कामुक और उन्मत्त होकर व्यवहार करता है।
अर्थात : सुरापान करने या नशीले पदार्थों को पीने वाले अक्सर नंगे होकर युद्ध, मार-पिटाई या उत्पात ही मचाया करते हैं।
हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम् । ऊधर्न नग्ना जरन्ते ॥(ऋग्वेद -8/2./12)
पदान्वय:-सुरायाम्- पीतासो= सुरा पीने वाले।दुर्मदासो= बुरी तरह उन्मत्त होकर। नग्ना हृत्सु:- नंगे होकर छाती या हृदय में स्थित । ऊध: - स्तनो को । जरन्ते - जारके समान मसलते या जीर्ण करते हैं।
(न ) जिस प्रकार- (दुर्मदास:- दूषित मद से उन्मत्त लोग। युध्यन्ते-युद्ध करते हैं। हृत्सु- हृदयों में। सुरायाम्- पीतास:- सुरा पीने वाले लोग। नग्ना: - नंगे लोग।ऊध:-स्तन या छाती। जरन्ते- जारों की तरह मसलते रहते हैं। जीर्ण करते रहते हैं।
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इन्द्र भी इसी प्रकार का चरित्र निर्वहन करता है।
"व्युषिताश्व इति ख्यातो बभूव किल पार्थिवः ।पुरा परमधर्मिष्ठः पूरोर्वंशविवर्धनः ।७।
तस्मिंश्च यजमाने वै धर्मात्मनि महात्मनि।उपागमंस्ततो देवाः सेन्द्राः सह महर्षिभिः।८।
अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः ।व्युषिताश्वस्य राजर्षेस्ततो यज्ञे महात्मनः।९।
महाभारत आदिपर्व- (1/120/ 7-8-9-10)
"अनुवाद :-एक समय वे महाबाहु धर्मात्मा नरेश व्युषिताश्व जब यज्ञ करने लगे, उस समय इन्द्र आदि देवता देवर्षियों के साथ उस यज्ञ में पधारे थे। उसमें देवराज इन्द्र सोमपान करके उन्मत्त हो उठे !थे तथा ब्राह्मण लोग पर्याप्त दक्षिणा पाकर हर्ष से फूल उठे थे।
इन्द्रोपासक पुरोहित भी केवल भौतिक कामनाओं की आपूर्ति के लिए इन्द्र की स्तुति करते हैं। इन्द्र के उपासक केवल स्वर्ग" सुन्दर स्त्री और भौतिक कामनाओं की आपूर्ति के लिए ही इन्द्र की उपासना करते है।
इन्द्र बहुत से बैलों( उक्षण) को खाने वाला और अपनी यज्ञों में पशु बलि माँगता है।
ऋग्वेद के दशम मण्डल के सूक्त-(86) जो वृषाकपि के नाम से है उसकी समस्त ऋचाऐं इन्द्र के विलासी चरित्र का दिग्दर्शन करती हैं।
ऋग्वेदः सूक्तं १०/८६/
" वृषाकपिसूक्तम्
वि हि सोतोरसृक्षत नेन्द्रं देवममंसत ।यत्रामदद्वृषाकपिरर्यः पुष्टेषु मत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः॥१॥
"सोम-अभिषव करने के लिए यज्ञ में मुझ इन्द्र द्वारा आज्ञा दिए हुए स्तोताओं ने वृषाकपि का पूजन किया। वहाँ उपस्थित दैदीप्मीन मुझ इन्द्र की मेरे द्वारा प्रेरित होकर भी उन स्तोताओं ने स्तुति नहीं की किन्तु मेरे पुत्र वृषाकपि की ही स्तुति की जिस सोम से बढ़े हुए यज्ञो में स्वामी वृषाकपि मेरा पुत्र और मेरा मित्र होकर सोमपान में हालांकि हर्षित हुआ। तो भी उन यज्ञों में मैं इन्द्र सम्पूर्ण जगत में श्रेष्ठतर हूँ। आचार्य माधव भट्ट के अनुयायी इस ऋचा को इन्द्राणी का वचन मानते हैं। उनका कहना है कि इन्द्राणी के लिए अर्पित हवि को वृषाकपि के स्थान में विद्यमान किसी अन्य मृग ( पशु ) ने दूषित कर दिया है। वहाँ इन्द्राणी इन्द्र से कहती है। उस पक्ष में तो इस ऋचा का यह अर्थ है।)सोमाभिषव करने के लिए आज्ञा दिए गये यजमान सोनाभिषव की प्रक्रिया से अलग हो गये और मेरे पति इन्द्रदेव की स्तोता उस जनपद में स्तुति नहीं करते हैं। जिस जनपद में बढ़े हुए धनों में स्वामी वृषाकपि हर्षित होता है। मेरे मित्र और मेरे प्रिय इन्द्र देव सब जगत् में श्रेष्ठतर हैं।१।
परा हीन्द्र धावसि वृषाकपेरति व्यथिः। नो अह प्र विन्दस्यन्यत्र सोमपीतये विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः॥२॥
"अनुवाद :- हे इन्द्र तुम अत्यन्त चलकर वृषाकपि के पास जाते हो। अर्थात् अन्यत्र सोम पीने के लिए नहीं जाते हो। वही इन्द्र समस्त जगत् में श्रेष्ठतर है।२।
किमयं त्वां वृषाकपिश्चकार हरितो मृगः। यस्मा इरस्यसीदु न्वर्यो वा पुष्टिमद्वसु विश्वस्मादिन्द्रप उत्तरः ॥३॥
"अनुवाद :- हे इन्द्र हरित वर्ण वाले वृषाकपि ने तुम्हारा क्या प्रिय कार्य किया ? क्यों कि वृषाकपि मृग पशु) जाति का है। जिस वृषा कपि के तुम इन्द्र उदार होकर पुष्टिकर धन शीघ्र न करते हो। जो इन्द्र समस्त जगति में श्रेष्ठतर है।३।
यमिमं त्वं वृषाकपिं प्रियमिन्द्राभिरक्षसि । श्वा न्वस्य जम्भिषदपि कर्णे वराहयुर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥४॥
"अनुवाद :- हे इन्द्र तुम जिस अभिलाषित वृषाकपि का पालन करते हो उस वृषाकपि को सूकर खाने की इच्छाकरने वाला कुत्ता शीघ्र भक्षण करे।और उसके कान को पकड़े । क्योंकि कुत्ता सूअर को खाना चाहता है। इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठतर है।४।
प्रिया तष्टानि मे कपिर्व्यक्ता व्यदूदुषत् ।शिरो न्वस्य राविषं न सुगं दुष्कृते भुवं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥५॥
"अनुवाद :- मुझ इन्द्राणी के लिए यजमानों द्रारा अर्पितप्रिय और विशेषरूप से घृतयुक्त हवियोंं को वृषाकपि के स्थान में विद्मान किसी कपि ने दूषित कर दिया। तत्पश्चात् मेरी इच्छा गै कि उस कि स्वामी वृषाकपि का शिर शीघ्र काट दूँ। मैं इस दुष्ट कर्म करने वाले वृषाकपि के लिए सुखकर न होऊँ। इस मुझ इन्द्राणी के पति इन्द्र समस्त जगत् में श्रेष्ठतर हैं।५।
न मत्स्त्री सुभसत्तरा न सुयाशुतरा भुवत् ।न मत्प्रतिच्यवीयसी न सक्थ्युद्यमीयसी विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः॥६॥
मुझ इन्द्राणी से दूसरी कोई नारी अत्यन्त सौभाग्य वती नहीं है। मुझ इन्द्राणी से दूसरी नारी अत्यन्त सुखी अथवा सुपुत्रों वाली नहीं है। जैसा कि यह ऋचा कहती है ।६।
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वैदिक काल में सर्वत्र पत्नी को सम्मान प्राप्त नहीं था। वेदों में ऐसे अनेक प्रसंग आए हैं, जिनसे पति की पत्नी के प्रति हेय दृष्टि का आभास मिलता है। स्त्रियों के विषय में ऋग्वेद में जो विवरण आए हैं।
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इस सन्दर्भ में इन्द्राणी और कृषाकपि का प्रसंग अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
इन्द्र की अनुपस्थिति में वृक्षाकपि ने इन्द्राणी का शील भंग करने का प्रयास किया, जिसे इन्द्राणी में प्रयत्नपूर्वक असफल कर दिया।
इन्द्र के आने पर इन्द्राणी ने इन्द्र से वृक्षाकपि की शिकायत की, तो इन्द्र ने वृषाकपि पर क्रोध नहीं करते हुए अपितु यह कहकर वे इन्द्राणी को शान्त कर देते हैं, कि वृषाकपि मेरा घनिष्ठ मित्र है। स्वयं इन्द्र भी इसी कामुक प्रवृति का देव है । जो सुरा और सनुन्दरीयों ही जीवन का आनन्द खोजता है
उवे अम्ब सुलाभिके यथेवाङ्ग भविष्यति ।भसन्मे अम्ब सक्थि मे शिरो मे वीव हृष्यति विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥७॥
"अनुवाद :-"इस प्रकार इन्द्राणी द्रारा बुरा भला कहा हुआ वृषाकपि कहता है कि हे माता ! सुन्दर लाभभ मे जिस प्रकार से तुमने कहा है। वैसा ही अंग शीघ्र हो जाये । तुम्हारे इस प्रेम करने को स्वीकार करने में मेरा क्या प्रयोजन है। मेरे पिता के लिए तुम्हारी यौनि उपयुक्त हो ।और मेरे पिता के लिए तुम्हीरी जंघा उपयुक्त हो। मेरे पिता इन्द्र को आपका शिर प्रेमालाप करने में कोयल आदि पक्षी की तरह हर्षिकत करे। मेरे पिता इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठ हैं।७।
इन्द्र के आने पर इन्द्राणी ने इन्द्र से वृक्षाकपि की शिकायत की, तो इन्द्र ने वृषाकपि पर क्रोध नहीं करते हुए अपितु यह कहकर वे इन्द्राणी को शान्त कर देते हैं, कि वृषाकपि मेरा घनिष्ठ मित्र है। स्वयं इन्द्र भी इसी कामुक प्रवृति का देव है । जो सुरा और सनुन्दरीयों में ही जीवन का आनन्द खोजता है । इन्द्र शचि से कहता है कि वृषाकपि के बिना मुझे सुख नहीं प्राप्त हो सकता-
किं सुबाहो स्वङ्गुरे पृथुष्टो पृथुजाघने ।किं शूरपत्नि नस्त्वमभ्यमीषि वृषाकपिं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥८॥
"अनुवाद :- इन्द्र क्रोधित इन्द्राणी को शान्त करते हुए कहता है कि हे सुन्दर भुजाओं वाली ,सुन्दर अंगुरियों वाली बड़े बालों वाली चौड़ी जाँघो वाली तथा वीर पत्नी इन्द्राणी! तुम हमारे पुत्र वृषाकपि पर क्यो क्रोध कर रही हो।जिसका पिता मैं इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठ हूँ।८।
अवीरामिव मामयं शरारुरभि मन्यते ।उताहमस्मि वीरिणीन्द्रपत्नी मरुत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः॥९॥
संहोत्रं स्म पुरा नारी समनं वाव गच्छति ।वेधा ऋतस्य वीरिणीन्द्रपत्नी महीयते विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१०॥
इन्द्राणीमासु नारिषु सुभगामहमश्रवम् ।नह्यस्या अपरं चन साकं मरते पतिर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥११॥
नाहमिन्द्राणि रारण सख्युर्वृषाकपेरृते ।यस्येदमप्यं हविः प्रियं देवेषु गच्छति विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१२॥
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वृषाकपायि रेवति सुपुत्र आदु सुस्नुषे । घसत्ते इन्द्र उक्षणः प्रियं काचित्करं हविर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१३॥
मुझ इन्द्राणी से दूसरी नारी सौभाग्य शाली नहीं है । कामनाओं की वर्षा करने से वृषभ अभीष्टदेश को जाने से इन्द्र वृषाकपि है। हे धनवाली और उत्तम पुत्र वाली और पुत्र वधू वाली शचि ! तुम्हारे ये पति इन्द्र वीर्य दान करने नें समर्थ पशु ( बैल)को शीघ्र खाऐं। और तुम्हें सुख कर हवि प्रदान करें । तुम्हारे पति इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठ हैं।१३ ।
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उक्ष्णो हि मे पञ्चदश साकं पचन्ति विंशतिम् ।उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१४॥
इसके बाद इन्द्र कहता है। मेरी पत्नी इन्द्राणी द्वारा भेजे हुए याज्ञिक पन्द्रह से बीस बैलों( वृषभों) को एक साथ पकाते हैं। और उन्हें मैं इन्द्र खाता हूँ । तथा उन्हें खाकर मोटा होता हूँ।मेरी मैंने कोशों को यज्ञ करने वाले सोम रस से भरते हैं। वह मैं इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठ हूँ।१४।
एक भारतीय कालखण्ड में पुरोहित ॉअ पने अतिथि को गाय का मांस खिलाते थे।
अनुवाद:-
हे ऋषिवर! उन्होंने विशिष्ट अतिथियों के लिए गाय (बैल) और बकरे आदि पशुओं को मारकर उन्हें परोसा।
वृषभो न तिग्मशृङ्गोऽन्तर्यूथेषु रोरुवत् मन्थस्त इन्द्र शं हृदे यं ते सुनोति भावयुर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१५॥
"अनुवाद :- इसके बाद इन्द्राणी कहती है कि हे इन्द्र! जैसे तेज लिंग या सींगों वाला वृषभ गायों के समूह के बीच में आवाज करता हुआ प्रसन्न होता है। वैसे ही तुम मेरे साथ रमण(सैक्स ) करो । तुम्हारे हृदय के लिए दधिमन्थन के सयय में शब्द करता हुआ कल्याण कारी हो। तुम्हारे लिए इन्द्राणी भावाभिलाषिणी जिस सोम को अभिषुत करती है। वह सोम भी कल्याण कारी हो । मेरे पति समस्त जगत में श्रेष्ठ हैं ।१५।
न सेशे यस्य रम्बतेऽन्तरा सक्थ्या कपृत् । सेदीशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१६॥
हे इन्द्र वह मनुष्य कभी मैथुन नहीं कर सकता , जिस पुरुष का लिंग जंघाओं के बीच में लम्बा होकर लटक जाता है। वही पुरुष स्त्री के साथ मैथुन कर सकता है जिस लेटे हुए पुरुष का लिंग जम्हाई लेता हो । इन्द्राणी का पति इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठ हैं ।१६।
न सेशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते । सेदीशे यस्य रम्बतेऽन्तरा सक्थ्या कपृद्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१७॥
अनुवाद :-वह मनुष्य मैथुन नहीं कर सकता जिस लेटे हुए पुरुष का लिंग लटक जाता है।किन्तु वही मनुष्य मैथुन कर सकता है जिस मनुष्य का लिंग जंघाओं के बीच में अकड़ता जम्हाई लेता है।
शेष अर्थ पूर्ववत् है। यहाँ पूर्वोक्त का अन्तर देखने योग्य है। पहली ऋचा में इन्द्राणी इन्द्र से कहती है। और उस दूसरी ऋचा में इन्द्र इन्द्राणी से कहता है। इस प्रकार दौंनों में कोई विरोध नहीं है।१७। कामशास्त्र की खुलकर वार्ता है।
अर्थ:- (वृषभः-न तिग्मशृङ्गः) जैसे तीक्ष्ण शृङ्गवाला वृषभ-साँड (यूथेषु-अन्तः-रोरुवत्) गोसमूहों के अन्दर बहुत शब्द करता है, तथा वैसे (इन्द्र) हे इन्द्र (ते मन्थः) तेरा मन्थन व्यापार (हृदे शम्) हृदय के लिये कल्याणकारी हो (तं यं भावयुः-सुनोति) उस जिस पुत्र को आत्मभाव चाहनेवाली अपनानेवाली इन्द्राणी उत्पन्न करती है (न सः-ईशे) वह नहीं स्वामित्व करता है, न ही (यस्य कपृत्) जिसका लिंग (सक्थ्या-अन्तरा लम्बते) दोनों जङ्घाओं के मध्य में लम्बित होता लटकता है (स-इत्-ईशे) वह ही समर्थ होता है (यस्य निषेदुषः) जिस निकट शयन करते हुए का (रोमशं विजृम्भते) रोमोंवाला लिंग विजृम्भन करता है-फड़कता है (न सः-ईशे) वह मैथुन नहीं कर सकता है (यस्य निषेदुषः-रोमशं विजृम्भते) जिसके निकट शयन किये हुए रोमों वाला अङ्ग लिंग फड़कता है (सः-इत्-ईशे) वह ही गृहस्थकर्म पर अधिकार रखता है (यस्य सक्थ्या-अन्तरा कपृत्-लम्बते) जिसके निकट शयन करने पर -जङ्घाओं के बीच में लिंग लम्बा होता है, वह ही स्त्रीयों पर अधिकार कर पाता है॥१७॥
अयमिन्द्र वृषाकपिः परस्वन्तं हतं विदत् ।असिं सूनां नवं चरुमादेधस्यान आचितं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१८॥
१८ हे “इन्द्र "अयं “वृषाकपिः "परस्वन्तं परस्वमात्मनो विषयेऽवर्तमानं "हतं= हिंसितं “विदत् =विन्दतु । तथा हतस्य विशसनाय “असिं =शस्त्रं "सूनाम्= उद्धानं पाकार्थं "नवं प्रत्यग्रं "चरुं =भाण्डम् “आत् अनन्तरम् “{एधस्य काष्ठस्य} “आचितं=संगृहीतं "अनः =शकटं च विन्दतु । मस पतिः "इन्द्रः “विश्वस्मात् "उत्तरः ॥
बैल पकाने का जिक्र-
सायण- भाष्य-−(इन्द्र) हे इन्द्र ! (अयं वृषाकपिः) यह वृषाकपि-है।(परस्वन्तं हतं विदत्) वराहयु-वन्य- कुत्ते को मार सका (असिम्) काटनेवाले शस्त्र तलवार को (सूनाम्) वधस्थान को (नवं चरुम्) नव अन्न हवि को (आत्) अनन्तर और (एधस्य-आचितम्-अनः)- पकाने के लिये ईंधन के भरे अन:-छकड़े को (इन हत्या के साधनों को) चयनित कर लिया ॥१८॥
अयमेमि विचाकशद्विचिन्वन्दासमार्यम् । पिबामि पाकसुत्वनोऽभि धीरमचाकशं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१९॥
तत्पश्चात इन्द्र कहता है। मैं इन्द्र यजमानों को देखता हुआ। दास और आर्य को अलग करता हुआ यज्ञ में जाता हूँ।तथा हवि पकाने वाले औरसोम अभिषव करने वाले यजमान का परिपक्व मन से सोम अभिषव करने वाले यजमान का सोम पीता हूँ। तथा बुद्धि मान यजमान को मैं इन्द्र देखता हूँ। जो मैं इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठ हूँ।१९।
धन्व च यत्कृन्तत्रं च कति स्वित्ता वि योजना ।नेदीयसो वृषाकपेऽस्तमेहि गृहाँ उप विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२०॥
अनुवाद :-जल शून्य और जल विहीन देश धन्व होता है। काटने योग्य वन कृन्तत्र होता है।जो जल शून्य और वन विहीन देश होता है। ऐसा वन मृगों के निर्वासन वाला होता है। किन्तु सघन जल नहीं होता है उस शत्रु गृह और हमारे घर के बीच कितने योजनों की दूरी है। अर्थात वह हमारा घर अत्यन्त दूर नहीं हैं।अत: निकटवर्ती शत्रुगगृह से ही हे वृषाकपि ! तुम हमारे घर में विशेष रूप में चले आओ और आकर यज्ञ गृहों के समीप जाओ । क्योंकि मैं इन्द्र सबसे अधिक श्रेष्ठ हूँ।२०।
पुनरेहि वृषाकपे सुविता कल्पयावहै । य एष स्वप्ननंशनोऽस्तमेषि पथा पुनर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२१॥
अनुवाद :-आकर वापिस गये हुए वृषाकपि से इन्द्र कहते हैं। हे वृषाकपि तुम फिर हमारी ओर आओ!और तुम्हारे आने पर तुम्हारे चित को प्रसन्न करने वाले कर्मों को इन्द्राणी और मैं इन्द्र हम दोनों विचार कर पूर्ण करें ! उदय होकर सब प्राणियों की नींद के नाशक जो सूर्य हैं जैसे वे अस्त होते हैं वैसे ही तुम मार्ग में अपने आवास को जाते हो। क्योंकि मैं इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठ हूँ ।२१।
यदुदञ्चो वृषाकपे ! गृहमिन्द्राजगन्तन । क्व स्य पुल्वघो मृगः कमगञ्जनयोपनो विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२२॥
अनुवाद :-जाकर फिर आये हुए वृषाकपि से इन्द्र पूछते हैं। हे परम ऐश्वर्य शाली वृषाकपि ! तुम सीधे खड़े़ होकर मेरे घर में आओ ! एक वृषाकप् के लिए बहुवचन पद पूजा-( सम्मान) के लिए प्रयुक्त है। हे वृषाकपि वहाँ आप से सम्बन्धित बहुत से पाथिक( मार्गसम्बन्धी) रसों का उपभोक्ता वह मृग कहाँ रह गया अथवा मनुष्यों को हर्षित करने वाला मृग किस देश को चला गया। वह मैं इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठ हूँ ।२२।
पर्शुर्ह नाम मानवी साकं ससूव विंशतिम् । भद्रं भल त्यस्या अभूद्यस्या उदरमामयद्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२३॥
इन्द्र के द्वारा छोड़े जाते हुए वाण से इस मन्त्र के द्वारा वषाकपि आश करते हैं। कि हे इन्द्र द्वारा छोड़े हुए वाण पर्शु नाम की मृगी थी इस मनु पुत्री पर्ष़शु ने एक साथ बीस पुत्रों को जन्म दिया उसका उदर गर्भ में स्थित बीस पुत्रों से पुष्ट हो गया था। उस पर्शु का कल्याण हो मेरे पिता इन्द्र जगत में सबसे श्रेष्ठ हैं।२३।
सायणभाष्यम्: - मूल संस्कृत रूप-
"यस्य निःश्वसितं वेदा यो वेदेभ्योऽखिलं जगत् ।निर्ममे तमहं वन्दे विद्यातीर्थमहेश्वरम् ॥
अष्टमाष्टकस्य चतुर्थोऽध्याय आरभ्यते । तत्र ‘वि हि ' इति त्रयोविंशत्यृचं द्वितीयं सूक्तम् ।
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वृषाकपिर्नामेन्द्रस्य पुत्रः । स चेन्द्राणीन्द्रश्चैते त्रयः संहताः संविवादं कृतवन्तः । तत्र ‘वि हि सोतोरसृक्षत ' : किं सुबाहो स्वङ्गुरे ' ‘ इन्द्राणीमासु नारिषु ' इति द्वे ‘ उक्ष्णो हि मे ' ' अयमेमि' इति चतस्र इत्येता नवर्च इन्द्रवाक्यानि । अतस्तासामिन्द्र ऋषिः । ‘ पराहीन्द्र ' इति पञ्च ‘ अवीराम् ' इति द्वे ' वृषभो न तिग्मशृङ्गः' इत्याद्याश्चतस्र इत्येकादशर्चं इन्द्राण्या वाक्यानि । अतस्तासामिन्द्राण्यृषिः । ‘ उवे अम्ब ' ‘ वृषाकपायि रेवति ' • पशुर्ह नाम ' इति तिस्रो वृषाकपेर्वाक्यानि । अतस्तासां वृषाकपिर्ऋषिः । सर्वं सूक्तमैन्द्रं पञ्चपदापङ्क्तिच्छन्दस्कम् । तथा चानुक्रान्तं -- वि हि त्र्यधिकैन्द्रो वृषाकपिरिन्द्राणीन्द्रश्च समूदिरे पाङ्तम् ' इति । षष्ठेऽहनि ब्राह्मणाच्छंसिन उक्थ्यशस्त्र एतत्सूक्तम् । सूत्रितं च ---- ‘ अथ वृषाकपिं शंसेद्यथा होताज्याद्यां चतुर्थे ' ( आश्व. श्रौ. ८. ३) इति । यदि षष्ठे:हन्युक्थ्यस्तोत्राणि द्विपदासु न स्तुवीरन् सामगा यदि वेदमहरग्निष्टोमः स्यात्तदानीं ब्राह्मणाच्छंसी माध्यंदिने सवन आरम्भणीयाभ्यः ऊर्ध्वमेतत्सूक्तं शंसेद्विश्वजित्यपि । तथा च सूत्रितं -- सुकीर्तिं ब्राह्मणाच्छंसी वृषाकपिं च पङ्क्तिशंसम् ' (आश्व. श्रौ. ८. ४) इति ।।
॥१।।सोतोः =सोमाभिषवं कर्तुं "वि "असृक्षत । यागं प्रति मया विसृष्टा अनुज्ञाताः स्तोतारो= वृषाकपेर्यष्टारः । “हि= इति पूरणः । तत्र "देवं= द्योतमानम् "इन्द्रं मां “न “अमंसत । मया प्रेरिताः सन्तोऽपि ते स्तोतारो न स्तुतवन्तः । किंतु मम पुत्रं वृषाकपिमेव स्तुतवन्तः । "यत्र येषु “पुष्टेषु सोमेन प्रवृद्धेषु यागेषु "अर्यः= स्वामी “वृषाकपिः मम पुत्रः मत्सखा मम सखिभूतः सन् “अमदत् सोमपानेन हृष्टोऽभूत् । यद्यप्येवं तथापि “इन्द्रः अहं "विश्वस्मात् सर्वस्माज्जगतः "उत्तरः =उत्कृष्टतरः। माधवभट्टास्तु वि हि सोतोरित्येषर्गिन्द्राण्या वाक्यमिति मन्यन्ते। तथा च तद्वचनम् । इन्द्राण्यै कल्पितं हविः कश्चिन्मृगोऽदूदुषदिन्द्रपुत्रस्य वृषाकपेर्विषये वर्तमानः । तत्रेन्द्रमिन्द्राणी वदति । तस्मिन्पक्षे त्वस्या ऋचोऽयमर्थः । सोतोः= सोमाभिषवं कर्तुं वि ह्यसृक्षत। उपरतसोमाभिषवा आसन् यजमाना इत्यर्थः । किंच मम पतिमिन्द्रं देवं नामंसत स्तोतारो न स्तुवन्ति । कुत्रेति अत्राह । यत्र यस्मिन् जनपदे पुष्टेषु प्रवृद्धेषु धनेष्वर्यः स्वामी वृषाकपिरमदत् । मत्सखा मत्प्रियश्चेन्द्रो विश्वस्मात् सर्वस्माज्जगत उत्तरः उत्कृष्टतरः ।।
॥२।हे “इन्द्र त्वम् "अति {अत्यन्तं “व्यथिः= चलितः "वृषाकपेः =वृषाकपिं “परा “धावसि= प्रतिगच्छसि । "अन्यत्र "सोमपीतये सोमपानाय “नो "अह नैव च “प्र “विन्दसि प्रगच्छसीत्यर्थः । सोऽयम् "इन्द्रः "विश्वस्मात् "उत्तरः ॥ ।
॥३।हे इन्द्र “त्वां प्रति "हरितः= हरितवर्णः "मृगः= मृगभूतः "अयं वृषाकपिः। मृगजातिर्हि =वृषाकपि। "किं प्रियं "चकार अकार्षीत् । "यस्मै वृषाकपये "पुष्टिमत्= पोषयुक्तं "वसु= धनम् "अर्यो “वा उदार इव स त्वं "नु क्षिप्रम् “इरस्यसीत् प्रयच्छस्येव । यः "इन्द्रः “विश्वस्मात् "उत्तरः ॥
५=“मे मह्यमिन्द्राण्यै “तष्टानि यजमानैः कल्पितानि “प्रिया प्रियाणि “व्यक्ता व्यक्तान्याज्यैर्विशेषेणाक्तानि हवींषि कश्चित् वृषाकपेर्विषये वर्तमानः "कपिः “व्यदूदुषत्= दूषयामास । ततोऽहम् “अस्य तत्कपिस्वामिनो वृषाकपेः “शिरो “नु क्षिप्रं "राविषं लुनीयाम् । "दुष्कृते दुष्टस्य कर्मणः कर्त्रे वृषाकपयेऽस्मै {"सुगं= सुखं} न "भुवम् अहं न भवेयम् । अस्मै सुखप्रदात्री न भवामीत्यर्थः । अस्या मम पतिः “इन्द्रः “विश्वस्मात् "उत्तरः ॥१।
6-“मत् मत्तोऽन्या "स्त्री नारी "सुभसत्तरा अतिशयेन सुभगा "न "भुवत् न भवति । नास्तीत्यर्थः । किंच मत्तोऽन्या स्त्री "सुयाशुतरा अतिशयेन सुसुखातिशयेन सुपुत्रा वा "न भवति । तथा च मन्त्रान्तरं -- ददाति मह्यं यादुरी =याशूनां =भोज्या शता' (ऋ. सं. १. १२६. ६) इति । किंच “मत् मत्तोऽन्या “प्रतिच्यवीयसी पुमांसं प्रति शरीरस्यात्यन्तं च्यावयित्री “न अस्ति । किंच मत्तोऽन्या स्त्री “सक्थ्युद्यमीयसी संभोगेऽत्यन्तमुत्क्षेप्त्री “न अस्ति । न मत्तोऽन्या काचिदपि नारी मैथुनेऽनुगुणं!
अयं शरारु:) यह घातक (माम्) मुझको (अवीराम् इव) अबला की भाँति (अभि मन्यते) मानता है ।(वीरिणी अस्मि) वीराङ्गना हूँ (इन्द्रपत्नी) मैं इन्द्र की पत्नी हूँ (मरुत् सखा) मरुत जिनके मित्र है। (इन्द्रः) (विश्वस्मात् उत्तर:) संसार में सबसे श्रेष्ठ है।
मुझ इन्द्राणी से दूसरी कोई नारी अत्यन्त सौभाग्य वती नहीं है। मुझ इन्द्राणी से दूसरी नारी अत्यन्त सुखी अथवा सुपुत्रों वाली नहीं है। जैसा कि यह ऋचा कहती है ।६।
"यह बहुत रज वाली रमणी मुझ सुना राजा को बहुत बार भोग( संभोग) प्रदान करती है। मेरे से दूसरी नारी पुरुषो को अत्यधिक रूप से अपना शरीर समर्पित करने वाली नहीं है। मेरी तुलना में दूसरी स्त्री संभोग में अपनी दौंनों जाघों को ऊपर उठाने वाली नहीं है। मेरे पति समस्त जगत में उत्कृष्ट हैं।६।
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वैदिक काल में सर्वत्र पत्नी को सम्मान प्राप्त नहीं था। वेदों में ऐसे अनेक प्रसंग आए हैं, जिनसे पति की पत्नी के प्रति हेय दृष्टि का आभास मिलता है। स्त्रियों के विषय में ऋग्वेद में जो विवरण आए हैं।
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"इस सन्दर्भ में इन्द्राणी और कृषाकपि का प्रसंग अत्यन्त महत्वपूर्ण है!
इन्द्र की अनुपस्थिति में वृक्षाकपि ने इन्द्राणी का शील भंग करने का प्रयास किया, जिसे इन्द्राणी में प्रयत्नपूर्वक असफल कर दिया।
इन्द्र के आने पर इन्द्राणी ने इन्द्र से वृक्षाकपि की शिकायत की, तो इन्द्र ने वृषाकपि पर क्रोध नहीं करते हुए अपितु यह कहकर वे इन्द्राणी को शान्त कर देते हैं, कि वृषाकपि मेरा घनिष्ठ मित्र है। स्वयं इन्द्र भी इसी कामुक प्रवृति का देव है । जो सुरा और सनुन्दरीयों ही जीवन का आनन्द खोजता है
इन्द्र शचि से कहता है कि वृषाकपि के बिना मुझे सुख नहीं प्राप्त हो सकता-
"नाहमिन्द्राणि शरण सख्युर्वृषाकपेर्ऋते।‘‘
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ब्याज पर उधार में दिए जाने वाली वस्तुओं में स्वर्ण, अन्न और गायों के साथ स्त्रियों का भी उल्लेख आता है।
सम्भवतः इसी कारण पी0वी0 काणे जी लिखते हैं, ‘‘ऋग्वेद (1.109.12) गलत सन्दर्भ), मैत्रायाणी संहिता (1.10.1), निरूक्त (6.9,1.3) तैत्तिरीय ब्राह्मण (1.7,10) आदि के अवलोकन से यह विदित होता है कि प्राचीन काल में विवाह के लिए लड़कियों का क्रय-विक्रय होता था।‘‘
अथर्ववेदः/ काण्डं २०/सूक्तम् १२६-
| अथर्ववेदः - काण्डं २० सूक्तं २०.१२६ वृषाकपिरिन्द्राणी च। |
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(अथर्ववेद 20/126)
वि हि सोतोरसृक्षत नेन्द्रं देवममंसत ।
यत्रामदद्वृषाकपिरर्यः पुष्टेषु मत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१॥
परा हीन्द्र धावसि वृषाकपेरति व्यथिः ।
नो अह प्र विन्दस्यन्यत्र सोमपीतये विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२॥
किमयं त्वां वृषाकपिश्चकार हरितो मृगः ।
यस्मा इरस्यसीदु न्वर्यो वा पुष्टिमद्वसु विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥३॥
यमिमं त्वं वृषाकपिं प्रियमिन्द्राभिरक्षसि ।
श्वा न्वस्य जम्भिषदपि कर्णे वराहयुर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥४॥
प्रिया तष्टानि मे कपिर्व्यक्ता व्यदूदुषत्।
शिरो न्वस्य राविषं न सुगं दुष्कृते भुवं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥५॥
न मत्स्त्री सुभसत्तरा न सुयाशुतरा भुवत्।
न मत्प्रतिच्यवीयसी न सक्थ्युद्यमीयसी विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥६॥
उवे अम्ब सुलाभिके यथेवाङ्गं भविष्यति ।
भसन् मे अम्ब सक्थि मे शिरो मे वीव हृष्यति विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥७॥
किं सुबाहो स्वङ्गुरे पृथुष्टो पृथुजाघने ।
किं शूरपत्नि नस्त्वमभ्यमीषि वृषाकपिं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥८॥
अवीरामिव मामयं शरारुरभि मन्यते ।
उताहमस्मि वीरिणीन्द्रपत्नी मरुत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥९॥
संहोत्रं स्म पुरा नारी समनं वाव गच्छति ।
वेधा ऋतस्य वीरिणीन्द्रपत्नी महीयते विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१०॥
इन्द्राणीमासु नारिषु सुभगामहमश्रवम् ।
नह्यस्या अपरं चन जरसा मरते पतिर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥११॥
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नाहमिन्द्राणि रारण सख्युर्वृषाकपेर्ऋते ।
यस्येदमप्यं हविः प्रियं देवेषु गच्छति विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१२॥
वृषाकपायि रेवति सुपुत्र आदु सुस्नुषे ।
घसत्त इन्द्र उक्षणः प्रियं काचित्करं हविर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१३॥
उक्ष्णो हि मे पञ्चदश साकं पचन्ति विंसतिम् ।
उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१४॥
वृषभो न तिग्मशृङ्गोऽन्तर्यूथेषु रोरुवत्।
मन्थस्त इन्द्र शं हृदे यं ते सुनोति भावयुर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१५॥
न सेशे यस्य रम्बतेऽन्तरा सक्थ्या कपृत्।
सेदीशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१६॥
न सेशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते ।
सेदीशे यस्य रम्बतेऽन्तरा सक्थ्या कपृत्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१७॥
अयमिन्द्र वृषाकपिः परस्वन्तं हतं विदत्।
असिं सूनां नवं चरुमादेधस्यान आचितं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१८॥
अयमेमि विचाकशद्विचिन्वन् दासमार्यम् ।
पिबामि पाकसुत्वनोऽभि धीरमचाकशं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१९॥
धन्व च यत्कृन्तत्रं च कति स्वित्ता वि योजना ।
नेदीयसो वृषाकपेऽस्तमेहि गृहामुप विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२०॥
पुनरेहि वृषाकपे सुविता कल्पयावहै ।
य एष स्वप्ननंशनोऽस्तमेषि पथा पुनर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२१॥
यदुदञ्चो वृषाकपे गृहमिन्द्राजगन्तन ।
क्व स्य पुल्वघो मृगः कमगं जनयोपनो विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२२॥
पर्शुर्ह नाम मानवी साकं ससूव विंशतिम् ।
भद्रं भल त्यस्या अभूद्यस्या उदरमामयद्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२३॥
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॥७-एवमिन्द्राण्या शप्तो वृषाकपिर्ब्रवीति । “उवे इति संबोधनार्थो निपातः । हे "अम्ब= मातः “सुलाभिके= शोभनलाभे त्वया "यथैव येन प्रकारेणैवोक्तं तथैव तत् "अङ्ग क्षिप्रं "भविष्यति भवतु । किमनेन त्वदनुप्रीतिकारिणा ग्रहेण मम प्रयोजनम् । किंच "मे मम पितुः त्वदीयो “भसत् भग उपयुज्यताम्। किंच मम पितुस्त्वदीयं "सक्थि चोपयुज्यताम् । किंच "मे मम पितरमिन्द्रं त्वदीयं "शिरः च प्रियालापेन “वीव यथा कोकिलादिः पक्षी तद्वत् “हृष्यति हर्षयतु । मम पिता “इन्द्रः "विश्वस्मात् “उत्तरः ॥
इस प्रकार इन्द्राणी के द्वारा बुरा भला कहा गया वृषाकपि कहता है। हे माता ! सुन्दर लाभ में जिस प्रकार तुमने कहा है। वैसा ही अंग शीघ्र हो जाए तुम्हारे इस प्रेम करने में मेरा क्या प्रयोजन है। मेरे पिता के लिये तुम्हारी यौनि उपयुक्त हो। और मेरे पिता के लिए तुम्हारी जंघा उपयुक्त हो। मेरे पिता को तुम्हारा सिर प्रेमालाप से कोयल आदि पक्षीयों की भाँति हर्षित करे। मेरे पिता इन्द्र समस्त जगत में उत्तम है।७।
।८-क्रुद्धामिन्द्र उपशमयति । हे “सुबाहो हे =शोभनबाहो{ "स्वङ्गुरे= शोभनाङ्गुलिके} “पृथुष्टो पृथुकेशसंघाते “पृथुजघने विस्तीर्णजघने "शूरपत्नि वीरभार्ये हे इन्द्राणि “त्वं "नः अस्मदीयं “वृषाकपिं “किं किमर्थम् "अभ्यमीषि अभिक्रुध्यसि । एकः किंशब्दः पूरणः । यस्य पिता “इन्द्रः अहं “विश्वस्मात् "उत्तरः ॥
॥९-पुनरिन्द्रमिन्द्राणी ब्रवीति ।“शरारुः= घातुको मृगः “अयं वृषाकपिः “माम् इन्द्राणीम् “अवीरामिव "अभि "मन्यते विजानाति । "उत अपि च “इन्द्रपत्नी इन्द्रस्य भार्या "अहम् इन्द्राणी “वीरिणी पुत्रवती " *मरुत्सखा मरुद्भिर्युक्ता च "अस्मि भवामि ।*
अनुवाद:
“[ इन्द्राणी बोलती है]: यह क्रूर जानवर ( वृशाकापि ) मुझे एक ऐसे व्यक्ति के रूप में तुच्छ जानता है जिसका कोई नर (रक्षक) नहीं है, और फिर भी मैं नर संतानों की मां हूं, इंद्र की पत्नी हूं , मरुतों की मित्र ; इंद्र सब (संसार) से ऊपर है।”
सायण की टिप्पणी: ऋग्वेद-भाष्य (ऋग्वेद 10/86/9)
[इंद्राणी बोलती है]: यह जंगली जानवर (वृषाकपि) मुझे ऐसे तुच्छ समझता है जैसे कि उसका कोई नर (रक्षक) नहीं है, और फिर भी मैं नर संतानों की मां हूं, इंद्र की पत्नी हूं, मरुतों की मित्र हूं; इंद्र सब (संसार) से ऊपर है।
१०-नारी= स्त्री “ऋतस्य= सत्यस्य "वेधाः= विधात्री “वीरिणी= पुत्रवती “इन्द्रपत्नी इन्द्रस्य भार्येन्द्राणी “संहोत्रं स्म समीचीनं यज्ञं खलु “समनं= संग्रामं “वा। समितिः समनम्' इति संग्रामनामसु पाठात् । "अव प्रति “पुरा “गच्छति । “महीयते स्तोतृभिः स्तूयते च । तस्या मम पतिः “इन्द्रः "विश्वस्मात् "उत्तरः ॥ ॥ २ ॥
॥११-अथेन्द्राणीमिन्द्रः स्तौति । "आसु सौभाग्यवत्तया प्रसिद्धासु "नारिषु स्त्रीषु स्त्रीणां मध्ये “इन्द्राणीं “सुभगां सौभाग्यवतीम् "अहम् इन्द्रः “अश्रवम् अश्रौषम्। किंच “अस्याः इन्द्राण्याः “पतिः पालकः "विश्वस्मात् "उत्तरः उत्कृष्टतरः "इन्द्रः “अपरं “चन अन्यद्भूतजातमिव "जरसा =वयोहान्या ("नहि "मरते न खलु म्रियते )
। यद्वा । इदं वृषाकपेर्वाक्यम् । तस्मिन् पक्षे त्वहमिति शब्दो वृषाकपिपरतया योज्यः । अन्यत्समानम् ॥
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१३-हे वृषाकपायि । कामानां वर्षकत्वादभीष्टदेशगमनाच्चेन्द्रो वृषाकपिः । तस्य पत्नि । यद्वा । वृषाकपेर्मम मातरित्यर्थः । “रेवति धनवति "सुपुत्रे शोभनपुत्रे "सुस्नुषे शोभनस्नुषे हे इन्द्राणि "ते तवायम्
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"इन्द्रः {"उक्षणः= Oxen सेचन समर्थान् “आदु= अद् भक्षणे) अनन्तरमेव । शीघ्रमेवेत्यर्थः । पशून्- “घसत्= प्राश्नातु । किंच “काचित्करम् । कं= सुखम् । तस्याचित् संघः । तस्करं हविः "प्रियम् इष्टं कुर्विति शेषः । किंच ते पतिः “इन्द्रः “विश्वस्मात् “उतरः । तथा च यास्कः - ‘ वृषाकपायि रेवति सुपुत्रे मध्यमेन {सुस्नुषे} पुत्रवधू-
माध्यमिकया वाचा । स्नुषा साधुसादिनीति वा साधुसानिनीति वा । प्रियं कुरुष्व सुखाचयकरं हविः सर्वस्माद्य इन्द्र उत्तरः' (निरु. १२, ९) इति
"अनुवाद :-कामनाओं की वर्षा करने से वृषभ अभीष्टदेश को जाने से इन्द्र वृषाकपि है। हे धनवाली और उत्तम पुत्र वाली और पुत्र वधू वाली शचि ! तुम्हारे ये पति इन्द्र वीर्य दान करने नें समर्थ पशु ( बैल) को शीघ्र खाऐं। और तुम्हें सुख कर हवि प्रदान करें । तुम्हारे पति इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठ हैं।१३ ।
॥१४-अथेन्द्रो ब्रवीति । “मे =मदर्थं “पञ्चदश पञ्चदशसंख्याकान् “विंशतिं= विंशतिसंख्याकांश्च “उक्ष्णः= वृषभान् "साकं= सह मम भार्ययेन्द्राण्या। प्रेरिता यष्टारः "पचन्ति =। “उत अपि च अहमग्नि तान् भक्षयामि । जग्ध्वा चाहं "पीव =“इत स्थूल एव भवामीति शेषः । किंच "मे मम “उभा= उभौ “कुक्षी “पृणन्ति= सोमेन पूरयन्ति यष्टारः । सोऽहम् "इन्द्रः "सर्वस्मात् "उत्तरः ॥
इसके बाद इन्द्र कहता है। मेरी पत्नी इन्द्राणी द्वारा भेजे हुए याज्ञिक पन्द्रह से बीस बैलों( वृषभों) को एक साथ पकाते हैं। और उन्हें मैं इन्द्र खाता हूँ । तथा उन्हें खाकर मोटा होता हूँ।मेरी मैंने कोशों को यज्ञ करने वाले सोम रस से भरते हैं। वह मैं इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठ हूँ।१४।
१५-अथेन्द्राणी ब्रवीति ।"{तिग्मशृङ्गः =तीक्ष्णशृङ्गः शेप: वा} "वृषभो "न यथा वृषभः "यूथेषु गोसंघेषु “अन्तः =मध्ये “रोरुवत्= शब्दं कुर्वन् गा अभिरमयति- (मैथुन करोति) तथा हे इन्द्र त्वं मामभिरमय इति शेषः । किंच “हे इन्द्र "ते =तव "हृदे हृदयाय "मन्थः =दध्नो मथनवेलायां शब्दं कुर्वन् “शं शंकरो भवत्विति शेषः । किंच "ते तुभ्यं "यं सोमं “भावयुः भावमिच्छन्तीन्द्राणी “सुनीति अभिषुणोति सोऽपि शंकरो भववित्यर्थः । मम पतिः “इन्द्रः "विश्वस्मात् "उत्तरः ॥१५ ॥
इसके बाद इन्द्राणी कहती है कि हे इन्द्र! जैसे तेज लिंग या सींगों वाला वृषभ गायों के समूह के बीच में आवाज करता हुआ प्रसन्न होता है। वैसे ही तुम मेरे साथ रमण( सैक्स ) करो । तुम्हारे हृदय के लिए दधिमन्थन के सयय में शब्द करता हुआ कल्याण कारी हो। तुम्हारे लिए इन्द्राणी भावाभिलाषिणी जिस सोम को अभिषुत करती है। वह सोम भी कल्याण कारी हो । मेरे पति समस्त जगत में श्रेष्ठ हैं ।१५।
१६- हे इन्द्र "सः जनः “न “ईशे मैथुनं कर्तुं नेष्टे न शक्नोति "यस्य जनस्य “कपृत् =शेपः “सक्थ्या= सक्थिनी “अन्तरा "रम्बते= लम्बते । "सेत् स एव स्त्रीजने “ईशे =मैथुनं कर्तुं शक्नोति “यस्य जनस्य “निषेदुषः शयानस्य "रोमशम् उपस्थं "=विज़म्भते विवृतं भवति । यस्य च पतिः "इन्द्रः “विश्वस्मात् “उत्तरः ॥
अश्लील अर्थ-
हे इन्द्र वह मनुष्य कभी मैथुन नहीं कर सकता , जिस पुरुष का लिंग जंघाओं के बीच में लम्बा होकर लटक जाता है। वही पुरुष स्त्री के साथ मैथुन कर सकता है जिस लेटे हुए पुरुष का लिंग विस्तृत हो जाता है। इन्द्राणी का पति इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठ हैं ।१६।
न सेशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते । सेदीशे यस्य रम्बतेऽन्तरा सक्थ्या कपृद्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१७॥
(अथर्ववेद में भी - काण्ड » 20; सूक्त » 126; ऋचा » 16 है।
सः) वह पुरुष (न ईशे) ऐश्वर्यवान् नहीं होता है, (यस्य) जिसका (कपृत्) लिंग (सक्थ्या अन्तरा) दोनों जंघाओं के बीच (रम्बते) नीचे लटकता है, (सः इत्) वही पुरुष (ईशे) ऐश्वर्यवान् होता है, (यस्य निषेदुषः) जिस बैठे हुए हुए]पुरुष का (रोमशम्) रोमवाला लिंग।(विजृम्भते) जम्हाई लेता है फैलता है, (इन्द्रः) इन्द्र (विश्वस्मात्) सब [प्राणी मात्र] से (उत्तरः) उत्तम है ॥१६॥
सक्थि= उरु( जाँघ) (सज्यते इति । सन्ज सङ्गे + “ असिसञ्जिभ्यां क्थिन् । “ उणा० ३ । १५४ । क्थिन् । ) ऊरुः । इत्यमरः कोश ॥ (यथा मार्कण्डेये । १८ । ४९ । “ नृणां पदे स्थिता लक्ष्मीर्निलयं संप्रयच्छति । सक्थ्नोश्च संस्थिता वस्त्रं तथा नानाविधं वसु ॥ ) शकटावयवविशेषः । इत्युणादिकोषः ॥
सक्थि शब्द यूरोपीय तथा ईरानी ईराकी भाषाओं में भी है।
Etymology-
From Proto-Indo-Iranian *sáktʰiš,(सक्थि) from Proto-Indo-European *sokʷHt-i-s (“thigh”). Cognate with Avestan 𐬵𐬀𐬑𐬙𐬌 (haxti, “thigh”), Old Armenian ազդր (azdr), Middle Persian [script needed] (h(ʾ)ht' /haxt/, “thigh”), Ossetian агъд (aǧd), Hittite [Term?] (/šakuttai/).
Noun-
सक्थि • (sákthi) n
- the thigh, thigh-bone quotations
- the pole or shafts of a cart
- (euphemistic, in the dual) the female genitals quotations
Declension-
| Neuter i-stem declension of सक्थि (sákthi) |
|---|
Further reading
- Monier Williams (1899), “सक्थि”, in A Sanskrit–English Dictionary, […], new edition, Oxford: At the Clarendon Press, →OCLC, page 1124.
शेष अर्थ पूर्ववत् है। यहाँ पूर्वोक्त का अन्तर देखने योग्य है। पहली ऋचा में इन्द्राणी इन्द्र से कहती है। और उस दूसरी ऋचा में इन्द्र इन्द्राणी से कहता है। इस प्रकार दौंनों में कोई विरोध नहीं है।१७। कामशास्त्र की खुलकर वार्ता है।
अर्थ:- (वृषभः-न तिग्मशृङ्गः) जैसे तीक्ष्ण शृङ्गवाला वृषभ-साँड (यूथेषु-अन्तः-रोरुवत्) गोसमूहों के अन्दर बहुत शब्द करता है, तथा वैसे (इन्द्र) हे इन्द्र (ते मन्थः) तेरा मन्थन व्यापार (हृदे शम्) हृदय के लिये कल्याणकारी हो (तं यं भावयुः-सुनोति) उस जिस पुत्र को आत्मभाव चाहनेवाली अपनानेवाली इन्द्राणी उत्पन्न करती है (न सः-ईशे) वह नहीं स्वामित्व करता है, न ही (यस्य कपृत्) जिसका लिंग (सक्थ्या-अन्तरा लम्बते) दोनों जङ्घाओं के मध्य में लम्बित होता लटकता है (स-इत्-ईशे) वह ही समर्थ होता है (यस्य निषेदुषः) जिस निकट शयन करते हुए का (रोमशं विजृम्भते) रोमोंवाला लिंग विजृम्भन करता है-फड़कता है (न सः-ईशे) वह मैथुन नहीं कर सकता है (यस्य निषेदुषः-रोमशं विजृम्भते) जिसके निकट शयन किये हुए रोमोंवाला अङ्ग फड़कता है (सः-इत्-ईशे) वह ही गृहस्थकर्म पर अधिकार रखता है (यस्य सक्थ्या-अन्तरा कपृत्-लम्बते) जिसके निकट शयन करने पर -जङ्घाओं के बीच में लिंग विजृम्भित होता है, वह ही स्त्रीयोंपर अधिकार कर पाता है ॥१७॥
शृङ्गं हि मन्मथोद्भेदस्तदागमनहेतुकः । उत्तमप्रकृतिप्रायो रसः शृङ्गार इष्यते ॥
शृङ्ग= न॰ शॄ--गन् पृषो॰ मुम् ह्रस्वश्च।
१ पर्वतोपरिभागेसातौ अमरः कोश।
२ प्रभुत्वे
३ चिह्ने
४ जलक्रीडार्थयन्त्रभेदे(पिचकारी) लिङ्गे च। यूरोपीय रूप सिरञ्ज- syringe से साम्य-
५ पश्वादीनां विषाणे (शृङ्गा)
६ उत्कर्षे चमेदि॰।
७ ऊर्ये
८ तीक्ष्णे
९ पद्मे च शब्दर॰
१० महिष- शृङ्गनिर्मितवाद्यभेदे (शिङ्ग)
११ कामोद्रेके साहित्यदर्पण- शृङ्गार शब्दे दृश्यम्।
१२ कूर्चशीर्षकवृक्षे पु॰ मेदिनीकोश।
syringe (noun) (latin-suringa) (Greek-syringa,)
सिरिंज (संज्ञा) संकीर्ण ट्यूब," जो"तरल धारा इंजेक्ट करने के लिए 15-वीं सदी की शुरुआत में.प्रयोग होता था (पहले यह सुरिंगा, 14वीं सदी के अंत में था), जो लेट लैटिन के (सिरिंज,)(श्रृंगा-) से ग्रीक के (सिरिंज,) सिरिंक्स से आया।
"ट्यूब, होल, चैनल, शेफर्ड पाइप," सिरिजिन से संबंधित "पाइप, सीटी, फुसफुसाहट के लिए" ,'' श्रृँग - सींग -से सम्बन्धित हैं।
१८ हे “इन्द्र "अयं “वृषाकपिः "परस्वन्तं परस्वमात्मनो विषयेऽवर्तमानं "हतं= हिंसितं “विदत् =विन्दतु । तथा हतस्य विशसनाय “असिं =शस्त्रं "सूनाम्= उद्धानं पाकार्थं "नवं प्रत्यग्रं "चरुं =भाण्डम् “आत् अनन्तरम् “{एधस्य काष्ठस्य} “आचितं पूर्णम् "अनः =शकटं च विन्दतु । मस पतिः "इन्द्रः “विश्वस्मात् "उत्तरः ॥
बैल पकाने का जिक्र-
−(इन्द्र) हे इन्द्र ! (अयं वृषाकपिः) यह वृषाकपि-है।(परस्वन्तं हतं विदत्) वराहयु-वन्य कुत्ते को मार सका (असिम्) काटनेवाले शस्त्र तलवार को (सूनाम्) वधस्थान को (नवं चरुम्) नव अन्न हवि को (आत्) अनन्तर और (एधस्य-आचितम्-अनः) जलाने के लिये ईंधन के भरे शकट-छकड़े को इन हत्या के साधनों को अपने अधीन कर लिया, ॥१८॥
______________________
॥१९-अथेन्द्रो ब्रवीति । "विचाकशत् पश्यन् यजमानान् “दासम्= उपक्षपयितारम् {सुरम्= "आर्यम् }अपि च "विचिन्वन् = पृथक्कुर्वन् "अयम् अहमिन्द्रः “एमि= यज्ञं प्रति गच्छामि। यज्ञं गत्वा च “पाकसुत्वनः । पचतीति =पाकः । सुनोतीति =सुत्वा । हविषां पक्तुः सोमस्याभिषोतुर्यजमानस्य पाकेन विपक्वेन मनसा सोमस्याभिषोतुर्वा यजमानस्य संबन्धिनं सोमं "पिबामि । तथा “धीरं धीमन्तं यजमानम् "अभि "अचाकशम्= अभिपश्यामि । योऽहम् "इन्द्रः "विश्वस्मात् "उत्तरः॥
॥२०"धन्व निरुदकोऽरण्यरहितो देशः । "कृन्तत्रं कर्तनीयमरण्यम् । "यत् यत् "च “धन्व "च कृन्तत्रं च भवति । मृगोद्वासमरण्यमेवंविधं भवति न त्वत्यन्तविपिनम् । तस्य शत्रुनिलयस्यास्मदीयगृहस्य च मध्ये "कति "स्वित् “ता तानि “योजना योजनानि स्थितानि । नात्यन्तदूरे तद्भवतीत्यर्थः । अतः "नेदीयसः अतिशयेन समीपस्थाच्छत्रुनिलयात् हे "वृषाकपे त्वम् "अस्तम् अस्माकं गृहं “वि “एहि विशेषेणागच्छ । आगत्य च "गृहान् यज्ञगृहान् "उप गच्छ । यतोऽहम् "इन्द्रः सर्वस्मादुत्कृष्टः ॥
२१-आगत्य प्रतिगतं वृषाकपिमिन्द्रो ब्रवीति । हे "वृषाकपे त्वं "पुनरेहि अस्मान् प्रत्यागच्छ । आगते च त्वयि "सुविता सुवितानि कल्याणानि त्वच्चित्तप्रीतिकराणि कर्माणि "कल्पयावहै इन्द्राण्यहं च आवामुभौ पर्यालोच्य कुर्याव । किंच “यः स्वप्ननंशनः उदयेन सर्वस्य प्राणिनः स्वप्नानां नाशयिता आदित्यः सः “एषः त्वं “पथा मार्गेण “अस्तम् आत्मीयमावासं "पुनः “एषि गच्छसि । यतोऽहम् “इन्द्रः "विश्वस्मात् “उत्तरः। तथा च यास्कः - ‘ सुप्रसूतानि वः कर्माणि कल्पयावहै य एष स्वप्ननंशनः स्वप्नान्नाशयस्यादित्य उदयेन सोऽस्तमेषि पथा पुनः' (निरु. १२.२८) इति ॥
२२-गत्वा पुनरागतं वृषाकपिमिन्द्रः पृच्छति । हे “इन्द्र= परमैश्वर्यवन् हे "वृषाकपे यूयम् "उदञ्चः उद्गामिनः सन्तो मद्गृहम् "अजगन्तन =आगच्छ ।
एकस्यापि बहुवचनं पूजार्थम् । तत्र भवतः संबन्धी “पुल्वघः बहूनां भौमरसानामत्ता “स्यः सः "मृगः "क्व अभूत् "जनयोपनः जनानां मोदयिता मृगः "कं वा देशम् "अगन् =अगच्छत् । सोऽहम् “इन्द्रः "विश्वस्मात् "उत्तरः । यद्वा इन्द्राणीवाक्यमिदम् । अत्र यास्कः-- ‘यदुदुञ्चो वृषाकपे गृहमिन्द्राजगमत क्व स्य पुल्वघो मृगः क्व स बह्वादी मृगः । मृगो मार्ष्टेर्गतिकर्मणः । कमगमद्देशं जनयोपनः ' (निरु. १३. ३ ) इति ॥
२३-इन्द्रविसृज्यमानमनेन' मन्त्रेण वृषाकपिराशास्ते । हे "भल इन्द्रेण विसृज्यमान शर । भलतिर्भेदनकर्मा । ("पर्शुः "नाम मृगी) । “ह इति पूरणः । "मानवी मनोर्दुहितेयं "विंशतिं विंशतिसंख्याकान् पुत्रान् "साकं= सह "ससूव= अजीजनत् । "त्यस्यै =तस्यै “भद्रं भजनीयं कल्याणम् "अभूत् =भवतु । लोडर्थे लुङ। "यस्या
"उदरमामयत्= गर्भस्थैर्विंशतिभिः पुत्रैः पुष्टमासीत् । मम पिता “इन्द्रः “विश्वस्मात् "उत्तरः ॥ ॥ ४ ॥
Yima (Yama) – the first mortal king to have ruled. He was favored by the gods and given supernatural powers. When the population grew too large, he enlarged the world and also saved the world when the gods informed him a bitter winter was coming and he enclosed animals, vegetation, and seeds in a giant barn (a tale preceding the biblical narrative of Noah and his Ark) to preserve life. He fell from divine grace when he began to think more highly of himself than he should have. Even so, for his virtuous service, he was made Lord of the Dead, and the afterlife was initially known as Yima's Realm.
Jamshid (Jam, Yima Kshaeta) – the fourth king of the world who brought civilization to its greatest height, initiated the construction of cities, established social hierarchy, and introduced winemaking. According to one part of his legend, Jamshid banished a woman of his harem who, in attempting to commit suicide afterwards, drank a bottle of fermented grape juice thinking it was poison. When she found it produced pleasing sensations, she brought the rest to Jamshid who reinstated her and decreed that grapes should be used in making wine.
Indar – the early god of courage, bravery, heroism, and warfare.
Indra – the demon of apostasy who encouraged the abandonment of religious practice and true faith.
Haoma सोम:– god of the harvest, health, strength, and vitality; personification of the haoma plant whose juices brought enlightenment and of which Gaokerena was the greatest and largest.
Daevas व- – the mostly male demons in the service of Angra Mainyu who spread lies and disorder in the world. They are the sworn enemies of the Amesha Spentas and all that is good and work closely with the drujs who are mostly female demons.
Dev – demon of war and the terror of war, one of the most powerful daevas, completely lacking in morality or compassion.
Atar अत्रि- – the god of fire who is also the personification of fire and physically present when fires are lighted. He is associated with light, righteousness, and purity.
२१-आगत्य प्रतिगतं वृषाकपिमिन्द्रो ब्रवीति । हे "वृषाकपे त्वं "पुनरेहि अस्मान् प्रत्यागच्छ । आगते च त्वयि "सुविता सुवितानि कल्याणानि त्वच्चित्तप्रीतिकराणि कर्माणि "कल्पयावहै इन्द्राण्यहं च आवामुभौ पर्यालोच्य कुर्याव । किंच “यः स्वप्ननंशनः उदयेन सर्वस्य प्राणिनः स्वप्नानां नाशयिता आदित्यः सः “एषः त्वं “पथा मार्गेण “अस्तम् आत्मीयमावासं "पुनः “एषि गच्छसि । यतोऽहम् “इन्द्रः "विश्वस्मात् “उत्तरः। तथा च यास्कः - ‘ सुप्रसूतानि वः कर्माणि कल्पयावहै य एष स्वप्ननंशनः स्वप्नान्नाशयस्यादित्य उदयेन सोऽस्तमेषि पथा पुनः' (निरु. १२.२८) इति ॥
२२-गत्वा पुनरागतं वृषाकपिमिन्द्रः पृच्छति । हे “इन्द्र= परमैश्वर्यवन् हे "वृषाकपे यूयम् "उदञ्चः उद्गामिनः सन्तो मद्गृहम् "अजगन्तन =आगच्छ ।
एकस्यापि बहुवचनं पूजार्थम् । तत्र भवतः संबन्धी “पुल्वघः बहूनां भौमरसानामत्ता “स्यः सः "मृगः "क्व अभूत् "जनयोपनः जनानां मोदयिता मृगः "कं वा देशम् "अगन् =अगच्छत् । सोऽहम् “इन्द्रः "विश्वस्मात् "उत्तरः । यद्वा इन्द्राणीवाक्यमिदम् । अत्र यास्कः---- ‘ यदुदुञ्चो वृषाकपे गृहमिन्द्राजगमत क्व स्य पुल्वघो मृगः क्व स बह्वादी मृगः । मृगो मार्ष्टेर्गतिकर्मणः । कमगमद्देशं जनयोपनः ' (निरु. १३. ३ ) इति ॥
२३-इन्द्रविसृज्यमानमनेन' मन्त्रेण वृषाकपिराशास्ते । हे "भल इन्द्रेण विसृज्यमान शर । भलतिर्भेदनकर्मा । ("पर्शुः "नाम मृगी) । “ह इति पूरणः । "मानवी मनोर्दुहितेयं "विंशतिं विंशतिसंख्याकान् पुत्रान् "साकं= सह "ससूव= अजीजनत् । "त्यस्यै =तस्यै “भद्रं भजनीयं कल्याणम् "अभूत् =भवतु । लोडर्थे लुङ। "यस्या
"उदरमामयत्= गर्भस्थैर्विंशतिभिः पुत्रैः पुष्टमासीत् । मम पिता “इन्द्रः “विश्वस्मात् "उत्तरः ॥ ॥ ४ ॥
Yima (Yama) – the first mortal king to have ruled. He was favored by the gods and given supernatural powers. When the population grew too large, he enlarged the world and also saved the world when the gods informed him a bitter winter was coming and he enclosed animals, vegetation, and seeds in a giant barn (a tale preceding the biblical narrative of Noah and his Ark) to preserve life. He fell from divine grace when he began to think more highly of himself than he should have. Even so, for his virtuous service, he was made Lord of the Dead, and the afterlife was initially known as Yima's Realm.
Jamshid (Jam, Yima Kshaeta) – the fourth king of the world who brought civilization to its greatest height, initiated the construction of cities, established social hierarchy, and introduced winemaking. According to one part of his legend, Jamshid banished a woman of his harem who, in attempting to commit suicide afterwards, drank a bottle of fermented grape juice thinking it was poison. When she found it produced pleasing sensations, she brought the rest to Jamshid who reinstated her and decreed that grapes should be used in making wine.
Indar – the early god of courage, bravery, heroism, and warfare.
Indra – the demon of apostasy who encouraged the abandonment of religious practice and true faith.
Haoma सोम:– god of the harvest, health, strength, and vitality; personification of the haoma plant whose juices brought enlightenment and of which Gaokerena was the greatest and largest.
Daevas व- – the mostly male demons in the service of Angra Mainyu who spread lies and disorder in the world. They are the sworn enemies of the Amesha Spentas and all that is good and work closely with the drujs who are mostly female demons.
Dev – demon of war and the terror of war, one of the most powerful daevas, completely lacking in morality or compassion.
Atar अत्रि- – the god of fire who is also the personification of fire and physically present when fires are lighted. He is associated with light, righteousness, and purity.
यूरोपीय पुरातन कथाओं में इन्द्र को "एण्ड्रीज" (Andreas) के रूप में वर्णन किया गया है । जिसका अर्थ होता है शक्ति सम्पन्न व्यक्ति ।
🌅⛵
Andreas - son of the river god peneus and founder of orchomenos in Boeotia।
Andreas Ancient Greek - German was the son of river god peneus in Thessaly from whom the district About orchomenos in Boeotia was called Andreas in Another passage pousanias speaks of Andreas( it is , however uncertain whether he means the same man as the former) as The person who colonized the island of Andros ....
अर्थात् इन्द्र थेसिली में एक नदी देव पेनियस का पुत्र था । जिससे एण्ड्रस नामक द्वीप नामित हुआ
पेनिस - लिंगेन्द्रीय का वाचक है। _____________________________
"डायोडॉरस के अनुसार .." ग्रीक पुरातन कथाओं के अनुसार एण्ड्रीज (Andreas) रॉधामेण्टिस (Rhadamanthys) से सम्बद्ध था । रॉधमेण्टिस ज्यूस तथा यूरोपा का पुत्र और मिनॉस (मनु) का भाई था ।
ग्रीक पुरातन कथाओं में किन्हीं विद्वानों के अनुसार एनियस (Anius) का पुत्र एण्ड्रस( Andrus) के नाम से एण्ड्रीज प्रायद्वीप का नामकरण करता है।
जो अपॉलो का पुजारी था परन्तु पूर्व कथन सत्य है । ग्रीक भाषा में इन्द्र शब्द का अर्थ शक्ति-शाली पुरुष है । जिसकी व्युत्पत्ति- ग्रीक भाषा के ए-नर (Aner) शब्द से हुई है ।
जिससे एनर्जी (energy) शब्द विकसित हुआ है। संस्कृत भाषा में{ अन् =श्वसने प्राणेषु च }के रूप में वैदिक कालीन धातु विद्यमान है ।
जिससे प्राण तथा अणु जैसे शब्दों का विकास हुआ है।
कालान्तरण में वैदिक भाषा में नर शब्द भी इसी रूप से व्युत्पन्न हुआ .... वेल्स भाषा में भी नर व्यक्ति का वाचक है । फ़ारसी मे नर शब्द तो है ।
परन्तु इन्द्र शब्द नहीं है इनदर है। वेदों में इन्द्र को वृत्र का शत्रु बताया है।यह सर्व विदित है।
वृत्र को केल्टिक माइथॉलॉजी मे (ए-बरटा) ( Abarta ) कहा है । जो वहाँ दनु और त्वष्टा परिवार का सदस्य है ।
इन्द्रस् देवों का नायक अथवा यौद्धा था ।
भारतीय पुरातन कथाओं में त्वष्टा को इन्द्र का पिता बताया है।
शम्बर को ऋग्वेद के द्वित्तीय मण्डल के सूक्त १४ / १९ में कोलितर कहा है पुराणों में इसे दनु का पुत्र कहा है । जिसे इन्द्र मारता है । ऋग्वेद में इन्द्र पर आधारित २५० सूक्त हैं । यद्यपि कालान्तरण में सुरों के नायक को ही इन्द्र उपाधि प्राप्त हुई ।
अत: कालान्तरण में भी जब देवोपासक भू- मध्य रेखीय भारत भूमि में आये ... जहाँ भरत अथवा वृत्र की अनुयायी व्रात्य ( वारत्र )नामक जन जाति पूर्वोत्तरीय स्थलों पर निवास कर रही थी।
भारत में भी यूरोप से आगत सुरों की सांस्कृतिक मान्यताओं में भी स्वर्ग उत्तर में है । और नरक दक्षिण में है ।
स्मृति रूप में अवशिष्ट रहीं ... और विशेष तथ्य यहाँ यह है कि नरक के स्वामी यम हैं यह मान्यता भी यहीं से मिथकीय रूप में स्थापित हुई ।
नॉर्स माइथॉलॉजी के ग्रन्थ प्रॉज-एड्डा में नारके का अधिपति यमीर को बताया गया है।
यमीर यम ही यूरोपीय रूपान्तरण है । हिम शब्द संस्कृत में यहीं से विकसित है यूरोपीय लैटिन आदि भाषाओं में हीम( Heim) शब्द हिम के लिए आज भी यथावत है।
नॉर्स माइथॉलॉजी प्रॉज-एड्डा में यमीर (Ymir) Ymir is a primeval being , who was born from venom that dripped from the icy - river earth from his flesh and from his blood the ocean , from his bones the hills from his hair the trees from his brains the clouds from his skull the heavens from his eyebrows middle realm in which mankind lives" _______________________________
(Norse mythology prose adda) अर्थात् यमीर ही सृष्टि का प्रारम्भिक रूप है। यह हिम नद से उत्पन्न , नदी और समुद्र का अधिपति हो गया । पृथ्वी इसके माँस से उत्पन्न हुई ,इसके रक्त से समुद्र और इसकी अस्थियाँ पर्वत रूप में परिवर्तित हो गयीं इसके वाल वृक्ष रूप में परिवर्तित हो गये ,मस्तिष्क से बादल और कपाल से स्वर्ग और भ्रुकुटियों से मध्य भाग जहाँ मनुष्य रहने लगा उत्पन्न हुए .. ऐसी ही धारणाऐं कनान देश की संस्कृति में थी । वहाँ यम को यम रूप में ही नदी और समुद्र का अधिपति माना गया है।
जो हिब्रू परम्पराओं में या: वे अथवा यहोवा हो गया उत्तरी ध्रुव प्रदेशों में जब शीत का प्रभाव अधिक हुआ तब नीचे दक्षिण की ओर ये लोग आये जहाँ आज बाल्टिक सागर है, यहाँ भी धूमिल स्मृति उनके ज़ेहन ( ज्ञान ) में विद्यमान् थी
बाल्टिक सागर के तट वर्ती प्रदेशों पर दीर्घ काल तक क्रीडाऐं करते रहे .
पश्चिमी बाल्टिक सागर के तटों पर इन्हीं देव संस्कृति के अनुयायीयों ने मध्य जर्मन स्केण्डिनेवीया द्वीपों से उतर कर बोल्गा नदी के द्वारा दक्षिणी रूस .त्रिपोल्जे आदि स्थानों पर प्रवास किया आर्यों के प्रवास का सीमा क्षेत्र बहुत विस्तृत था । आर्यों की बौद्धिक सम्पदा यहाँ आकर विस्तृत हो गयी थी ।
मनुः जिसे जर्मन आर्यों ने मेनुस् (Mannus) कहा आर्यों के पूर्व - पिता के रूप में प्रतिष्ठित थे ! मेन्नुस mannus( थौथा) (त्वष्टा)--(Thautha ) की प्रथम सन्तान थे !
मनु के विषय में रोमन लेखक टेकिटस (tacitus) के अनुसार---- Tacitus wrote that mannus was the son of tuisto and The progenitor of the three germanic tribes ---ingeavones--Herminones and istvaeones .... ____________________________________ in ancient lays, their only type of historical tradition they celebrate tuisto , a god brought forth from the earth they attribute to him a son mannus, the source and founder of their people and to mannus three sons from whose names those nearest the ocean are called ingva eones , those in the middle Herminones, and the rest istvaeones some people inasmuch as anti quality gives free rein to speculation , maintain that there were more tribal designations- Marzi, Gambrivii, suebi and vandilii-__and that those names are genuine and Ancient Germania ____________________________________________
Chapter 2 ग्रीक पुरातन कथाओं में मनु को मिनॉस (Minos)कहा गया है । जो ज्यूस तथा यूरोपा का पुत्र तथा क्रीट का प्रथम राजा था । जर्मन जाति का मूल विशेषण डच (Dutch) था । जो त्वष्टा नामक इण्डो- जर्मनिक देव ही है ।
टेकिटिस लिखता है , कि Tuisto ( or tuisto) is the divine encestor of German peoples...... ट्वष्टो tuisto---tuisto--- शब्द की व्युत्पत्ति- भी जर्मन भाषाओं में *Tvai----" two and derivative *tvis --"twice " double" thus giving tuisto--- The Core meaning -- double अर्थात् द्वन्द्व -- अंगेजी में कालान्तरण में एक अर्थ द्वन्द्व- युद्ध (dispute / Conflict )भी होगया यम और त्वष्टा दौनों शब्दों का मूलत: एक समान अर्थ था इण्डो-जर्मनिक संस्कृतियों में मिश्र की पुरातन कथाओं में त्वष्टा को (Thoth) अथवा tehoti ,Djeheuty कहा गया जो ज्ञान और बुद्धि का अधिपति देव था । ____________________________________
आर्यों में यहाँ परस्पर सांस्कृतिक भेद भी उत्पन्न हुए विशेषतः जर्मन आर्यों तथा फ्राँस के मूल निवासी गॉल ( Goal ) के प्रति जो पश्चिमी यूरोप में आवासित ड्रूयूडों की ही एक शाखा थी l जो देवता (सुर ) जर्मनिक जन-जातियाँ के थे लगभग वही देवता ड्रयूड पुरोहितों के भी थे । यही ड्रयूड( druid ) भारत में द्रविड कहलाए
इन्हीं की उपशाखाऐं वेल्स (wels) केल्ट (celt )तथा ब्रिटॉन (Briton )के रूप थीं जिनका तादात्म्य (एकरूपता ) भारतीय जन जाति क्रमशः भिल्लस् ( भील ) किरात तथा भरतों से प्रस्तावित है ये भरत ही व्रात्य ( वृत्र के अनुयायी ) कहलाए आयरिश अथवा केल्टिक संस्कृति में वृत्र का रूप अवर्टा ( Abarta ) के रूप में है यह एक देव है। जो थौथा (thuatha) (जिसे वेदों में त्वष्टा कहा है !) और दि - दानन्न ( वैदिक रूप दनु ) की सन्तान है .
Abarta an lrish / celtic god amember of the thuatha त्वष्टाः and De- danann his name means = performer of feats अर्थात् एक कैल्टिक देव त्वष्टा और दनु परिवार का सदस्य वृत्र या Abarta जिसका अर्थ है कला या करतब दिखाने बाला देव यह अबर्टा ही ब्रिटेन के मूल निवासी ब्रिटों Briton का पूर्वज और देव था इन्हीं ब्रिटों की स्कोट लेण्ड ( आयर लेण्ड ) में शुट्र--- (shouter )नाम की एक शाखा थी , जो पारम्परिक रूप से वस्त्रों का निर्माण करती थी ।
वस्तुतःशुट्र फ्राँस के मूल निवासी गॉलों का ही वर्ग था , जिनका तादात्म्य भारत में शूद्रों से प्रस्तावित है , ये कोल( कोरी) और शूद्रों के रूप में है ।
जो मूलत: एक ही जन जाति के विशेषण हैं एक तथ्य यहाँ ज्ञातव्य है कि प्रारम्भ में जर्मन आर्यों और गॉलों में केवल सांस्कृतिक भेद ही था जातीय भेद कदापि नहीं ।
क्योंकि आर्य शब्द का अर्थ यौद्धा अथवा वीर होता है । यूरोपीय लैटिन आदि भाषाओं में इसका यही अर्थ है ।
बाल्टिक सागर से दक्षिणी रूस के पॉलेण्ड त्रिपोल्जे आदि स्थानों पर बॉल्गा नदी के द्वारा कैस्पियन सागर होते हुए भारत ईरान आदि स्थानों पर इनका आगमन हुआ ।
आर्यों के ही कुछ क़बीले इसी समय हंगरी में दानव नदी के तट पर परस्पर सांस्कृतिक युद्धों में रत थे ।
भरत जन जाति यहाँ की पूर्व अधिवासी थी संस्कृत साहित्य में भरत का अर्थ जंगली या असभ्य किया है।
और भारत देश के नाम करण कारण यही भरत जन जाति थी ।भारतीय प्रमाणतः जर्मन आर्यों की ही शाखा थे जैसे यूरोप में पाँचवीं सदी में जर्मन के ऐंजीलस कबीले के आर्यों ने ब्रिटिश के मूल निवासी ब्रिटों को परास्त कर ब्रिटेन को एञ्जीलस - लेण्ड अर्थात् इंग्लेण्ड कर दिया था और ब्रिटिश नाम भी रहा जो पुरातन है ।
इसी प्रकार भारत नाम भी आगत आर्यों से पुरातन है दुष्यन्त और शकुन्तला पुत्र भरत की कथा बाद में जोड़ दी गयी जैन साहित्य में एक भरत ऋषभ देव परम्परा में थे। जिसके नाम से भारत शब्द बना।
इस लिए द्रविड और शूद्र शब्द भी यूरोपीय मूल के हैं। आर्य द्रविड और शूद्र थ्योरी सत्यनिष्ठ नहीं है।
मध्य-एशिया के अधिकतर लोग संस्कृत भाषा बोलने लगे.
संस्कृत बोलने वाले सीरिया के इस साम्राज्य के बारे में पहले जानते थे।
इंडो-आर्यन परम्परा में . इन्द्र नाम की सबसे पुरानी तारीख़ी घटना 14-वीं सदी ईसापूर्व की बोगाज़कोय की प्रसिद्ध हित्ती-मितानी संधि में है। जहां मितन्नी( मितज्ञु) दैवीय गवाहों के रूप में मित्र-वरुण, इंद्र और नासत्य का आह्वान करते हैं
यह सन्देश कीलाक्षर लिपि में है। जो उस समय सुमेर की लिपि थी।
मितन्नी "एमोराइट-(मरुत) तथा हित्ती ये सुमेरियन जातियाँ थी।
यदु और तुर्वसु को जब पुरोहितों ने नहीं छोड़ा तो उनके वंशज कृष्ण को कैसे छोड़ के।
पदों का अर्थ:-(यः) जो (युवा) जवानी युक्त (इन्द्रः) इन्द्र देव (सुनीती) सुन्दर न्याय से (परावतः)- दूरदेशात् दूर देश से भी -परा+अव--वा० अति । १ दूरदेशे निघण्टुः (तुर्वशम्) तुर्वसु को (यदुम्) यदु को (आ) सब प्रकार से (अनयत्) लङ्(अनद्यतन भूत) वह इन्द्र ले गया । (सः) वह (नः) हम लोगों का (सखा) मित्र हो ॥१॥
ऋग्वेद 6.45.1 व्याकरण का अंग्रेजी विश्लेषण]
[संज्ञा], कर्म कारक, एकवचन, पुल्लिंग
[संज्ञा], कर्म कारक, एकवचन, पुल्लिंग
“यदु < इन्द्र
[संज्ञा], कर्तावाचक, एकवचन, पुल्लिंग
"यह; वह, वह, यह (निरर्थक सर्वनाम); संबंधित(ए); वह; कर्तावाचक; तब; विशेष(ए); संबंधकारक; वाद्य; आरोपवाचक; वहाँ; बालक [शब्द]; संप्रदान कारक; एक बार; वही।"
[संज्ञा], संबंधवाचक, बहुवचन"मैं; मेरा।"
[संज्ञा], कर्तावाचक, एकवचन, पुल्लिंग; साथी; सखी [शब्द]।”
| लुट्(अनद्यतन भविष्यत् ष्णै=बन्धने वेष्टने वा" ) | |||
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | |
| प्रथमपुरुषः | स्नाता | स्नातारौ | स्नातारः |
| मध्यमपुरुषः | स्नातासि | स्नातास्थः | स्नातास्थ |
| उत्तमपुरुषः | स्नातास्मि | स्नातास्वः | स्नातास्मः |
| लुट्(अनद्यतन भविष्यत् - ष्ना= शुचौ स्नाने वा" ) | |||
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | |
| प्रथमपुरुषः | स्नाता | स्नातारौ | स्नातारः |
| मध्यमपुरुषः | स्नातासि | स्नातास्थः | स्नातास्थ |
| उत्तमपुरुषः | स्नातास्मि | स्नातास्वः | स्नातास्मः |
कृष्ण की अवधारणा भारत में है। सिन्धु घाटी की सभ्यता के मोहन -जोदारो में कृष्ण की बाल लीला सम्बन्धी भित्ति चित्र है।
वेदों में इन्द्र और कृष्ण का युद्ध वर्णित है।
| लङ्(अनद्यतन भूत) | |||
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | |
| प्रथमपुरुषः | आवत्=युद्ध किया | ||
वेदों में राधा, वृषभानु , कृष्ण अर्जुन केशी दैत्य आदि का वर्णन-
पदपाठ- त्वे इति । धर्माणः । आसते । जुहूभिः । सिञ्चतीःऽइव । कृष्णा । रूपाणि । अर्जुना । वि । वः । मदे । विश्वाः । अधि । श्रियः । धिषे । विवक्षसे ॥३
श्रीराधा माधव चिन्तन -हनुमान प्रसाद पोद्दार
परिशिष्टश्रीराधा, श्रीराधा-नाम और राधा-उपासना सनातन हैइसके अतिरिक्त दक्षिण के बहुत-से प्राचीन ग्रन्थों में राधा का उल्लेख है। भक्त कवि बिल्वमगंल का ‘कृष्णकर्णामृत’ तो श्रीराधा-कृष्णलीला से ही ओतप्रात है। वेद में ‘राधम्’ आदि शब्द बहुत जगह आये हैं। इसके विभिन्न अर्थ किये गये हैं। हो सकता है कि वेद के कोई विशिष्ट विद्वान इसका स्पष्ट ‘राधा’ ही अर्थ करें। महाभारत के प्रसिद्ध टीकाकार महान् श्रीनीलकण्ठजी ने ऋग्वेद के बहुत-से मन्त्रों के भगवान श्रीकृष्ण के लीला परक अर्थ किये हैं। उनका इस विषय पर एक ग्रन्थ ही है- जिसका नाम है ‘मन्त्रभागवत’। इसमें नीलकण्ठ जी ने निम्रलिखित मन्त्र में राधा के दर्शन किये हैं-
इसके अतिरिक्त ऋक्-परिशिष्ट के नाम से निम्रलिखित श्रुति निम्बार्क-सम्प्रदाय के उदुम्बरसंहिता, वेदान्तरत्नमंजूषा, सिद्धान्तरत्न आदि ग्रन्थों में तथा श्रीश्रीजीवगोस्वामी के प्रसिद्ध ग्रन्थ श्रीकृष्णसंदर्भ अनुच्छेद (189) में उद्धत की हुई मिलती है-
अर्थात् ‘भगवान श्रीमाधव श्रीराधा के साथ और श्रीराधा श्रीमाधव के साथ सुशोभित रहती हैं। मनुष्यों में जो कोई इनमें अन्तर देखता है तो वह संसार से मुक्त नहीं होता।’ |
राधे विशाखे सुहवानुराधा ज्येष्ठा सुनक्षत्रमरिष्ट मूलम् ॥३॥
तद्धैताद्घोर अंगिरसः कृष्णाय देवकीपुत्रयोक्तवोवाचापिपास एव स बभुव सोऽन्तवेलायमेतत्रयं प्रतिपद्येताक्षितमास्युतमसि प्राणसंशितमासीति तत्रैते दवे ऋचौ भवतः || 3.17.6 ||
अनुवाद:-
6. घोर अंगिरस ऋषि ने देवकी के पुत्र कृष्ण को यह सत्य सिखाया था । परिणामस्वरूप, कृष्ण सभी इच्छाओं से मुक्त हो गए। तब घोर ने कहा: 'मृत्यु के समय व्यक्ति को ये तीन मंत्र दोहराने चाहिए: आत्मा का कभी नाश नहीं होता, आत्मा कभी नहीं बदलता, और आत्मा जीवन का स्वरूप हैं।" इस संबंध में यहां दो ऋक मंत्र दिए गए हैं:
- "तद् विष्णो: परमं पदं पश्यन्ति सूरयः। दिवीय चक्षुरातातम् -(ऋग्वेद १/२२/२०)।
सूरयः) सूर्यगण (दिवि) प्रकाशित लोक में । (आततम्) =फैले हुए (चक्षुरिव) नेत्रों के समान जो (विष्णोः) परमेश्वर का विस्तृत (परमम्) उत्तम से उत्तम (पदम्)=स्थान (तत्) उस को (सदा) सब काल में (पश्यन्ति) देखते हैं॥२०॥
अनुवाद:-वह विष्णु के परम पद में अनेक सूर्य प्रकाशित होते हैं।
ऋग्वेद के मंडल 1 के सूक्त (154) का ऋचा संख्या (6)
- "ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयासः ।अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णः परमं पदमवभाति भूरि" ऋग्वेद-१/१५४/६।
सायण- भाष्य-"हे यजमान और उसकी पत्नी ! तुम दोनों के लिए जाने योग्य उन प्रसिद्ध सुखपूर्वक निवास करने योग्य स्थानों पर हम कामना करते हैं।
अर्थात तुम्हारे जाने के लिए विष्णु से प्रार्थना करते हैं। जिन स्थानों पर किरणें अत्यन्त उन्नत और बहुतों के द्वारा आश्रयवाली होकर अति विस्तृत हैं। अथवा न जाने वाली अर्थात् अत्यन्त प्रकाशवाली हैं।
उन निवास स्थानों के आधारभूत द्युलोक में बहुत से महात्माओं के द्वारा स्तुति करने योग्य और कामनाओं की वर्षा करने वाले विष्णु का गन्तव्य रूप में प्रसिद्ध निरतिशय स्थान अपनी महिमा से अत्यधिक स्फुरित होता है।६।
तत्प्रवेष्टुमशक्यं च ब्रह्मरुद्रादिदैवतैः।
वेदवेदान्तसिद्धान्तैर्विनिर्णीतं तदक्षरम् ।४२.४२ ।
अक्षरान्न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परा गतिः ।
इत्येवं श्रूयते वेदे बहुधापि विचारिते ।। ४२.४३ ।।
अक्षरस्यात्मनश्चापि स्वात्मरूपतया स्थितम्।
परमानन्दसन्दोहरूपमानन्द विग्रहम् ।। ४२.४४।
लीलाविलासरसिकं बल्लवीयूथमध्यगम्।
शिखिपिच्छकिरीटेन बास्वद्रत्नचितेन च ।४२.४५।
उल्लसद्विद्युदाटोपकुण्डलाभ्यां विराजितम्।
कर्णोपान्तचरन्नेत्रखञ्जरीटमनोहरम् ।।४२.४६।।
कुञ्जकुञ्जप्रियावृन्दविलासरतिलम्पटम्।
पीताम्बरधरं दिव्यं चन्दनालेपमण्डितम् ।।४२.४७।
अधरामृत संसिक्तवेणुनादेन वल्लवीः।
मोहयन्तञ्चिदानन्दमनङ्गमदभञ्जनम् ।४२.४८ ।
कोटिकामकलापूर्णं कोटिचन्द्रांशुनिर्मलम्।
त्रिरेखकम्ठविलसद्रत्नगुञ्जामृगा कुलम् ।४२.४९
यमुनापुलिने तुङ्गे तमालवनकानने।
कदम्बचम्पकाशोकपारिजातमनोहरे ।। ४२.५० ।।
शिखिपारावतशुकपिककोलाहलाकुले।
निरोधार्थं गवामेव धावमानमितस्ततः ।। ४२.५१।
राधाविलासरसिकं कृष्णाख्यं पुरुषं परम्।
श्रुतवानस्मि वेदेभ्यो यतस्तद्गोचरोऽभवत् ।। ४२.५२ ।।
एवं ब्रह्मणि चिन्मात्रे निर्गुणे भेदवर्जिते।
गोलोकसंज्ञिके कृष्णो दीव्यतीति श्रुतं मया ।। ४२.५३ ।।
नातः परतरं किञ्चिन्निगमागमयोरपि।
तथापि निगमो वक्ति ह्यक्षरात् परतः परः।४२.५४।
गोलोकवासी भगवानक्षरात्पर उच्यते।
तस्मादपि परः कोऽसौ गीयते श्रुतिभिः सदा । ४२.५५ ।
उद्दिष्टो वेद वचनैर्विशेषो ज्ञायते कथम्।
श्रुतेर्वार्थोऽन्यथा बोध्यः परतस्त्वक्षरादिति ।। ४२.५६ ।।
श्रुत्यर्थे संशयापन्नो व्यासः सत्यवतीसुतः।
विचारयामास चिरं न प्रपेदे यथातथम् ।४२.५७।
"सूत उवाच।।
विचारयन्नपि मुनिर्नाप वेदार्थनिश्चयम्।
वेदो नारायणः साक्षाद्यत्र मुह्यन्ति सूरयः।४२.५८।
तथापि महतीमार्त्तिं सतां हृदयतापिनीम्।
पुनर्विचारयामास कं व्रजामि करोमि किम् । ४२.५९ ।
पश्यामि न जगत्यस्मिन्सर्वज्ञं सर्वदर्शनम्।
अज्ञात्वाऽन्यतमं लोके सन्देहविनिवर्त्तकम् । ४२.६० ।
श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे तृतीये गणपतिखण्डे/नारद-नारायणसंवादे परशुरामाय श्रीकृष्णकवच-प्रदानं नाम एकत्रिंशत्तमोऽध्ययः ॥
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बाइबिल में "अबीर" नाम ईश्वर तथा ईश्वरीय सत्ताओं का वाचक-
The name Abir: Summary
🔼 The name Abir in the Bible
The name Abir is one of the titles of the Living God. For some reason it's usually translated (for some reason all God's names are usually translated and usually not very accurate), and the translation of choice is usually Mighty One, which isn't very accurate. Our name occurs six times in the Bible but never alone; five times it's coupled with the name Jacob and once with Israel.
In Isaiah 1:24 we find four names of the Lord in rapid succession as Isaiah reports: "Therefore Adon YHWH Sabaoth Abir Israel declares..". Another full cord occurs in Isaiah 49:26: "All flesh will know that I, the Lord, am your Savior and your Redeemer, the Abir Jacob," and the identical is noted in Isaiah 60:16.
The full name Abir Jacob was first spoken by Jacob himself. At the end of his life, Jacob blessed his sons, and when it was Joseph's turn he spoke to him of blessings from the hands of Abir Jacob (Genesis 49:24). Many years later, the Psalmist remembered king David, who swore by Abir Jacob that he would not sleep until he had found a place for YHWH; a dwelling place for Abir Jacob (Psalm 132:2-5).
हिन्दी अनुवाद:-
अबीर नाम : सारांश
🔼 बाइबिल में अबीर नाम
अबीर नाम जीवित परमेश्वर की उपाधियों में से एक है। किसी कारण से इसका आमतौर पर अनुवाद किया जाता है जैसे भगवान के नामों का आमतौर पर अनुवाद किया जाता है और आमतौर पर बहुत सटीक नहीं होता है। और पसंद का अनुवाद आमतौर पर रक्षक ही होता है, जो बहुत सटीक नहीं होता है। हमारा यह अबीर नाम बाइबिल में छह बार आता है लेकिन अकेले कभी नहीं; पांच बार इसे याकूब और एक बार इस्राएल के नाम से जोड़ा जाता है ।
यशायाह 1:24 में हम यशायाह की रिपोर्ट के अनुसार तेजी से उत्तराधिकार में भगवान के चार नाम पाते हैं : "इसलिए अदोन यह्व (YHWH) सबाथ और अबीर" इज़राइल घोषित करता है ..."। यशायाह 49:26 में एक और पूर्ण रस्सी होती है: "सभी मनुष्य जानेंगे कि मैं, यहोवा, तुम्हारा उद्धारकर्ता और तुम्हारा छुड़ानेवाला, अबीर याकूब हूं," और यशायाह 60:16 में समान उल्लेख किया गया है।
अबीर जैकब का पूरा नाम सबसे पहले खुद जैकब ने बोला था। अपने जीवन के अंत में, याकूब ने अपने पुत्रों को आशीष दी, और जब यूसुफ की बारी आई तो उसने उससे अबीर याकूब के हाथों आशीषों के बारे में बात की (उत्पत्ति 49:24)। कई वर्षों बाद, भजन लिखने वाले को राजा दाऊद की याद आई , जिसने अबीर याकूब की शपथ खाई थी कि वह तब तक नहीं सोएगा जब तक उसे यहोवा के लिए जगह नहीं मिल जाती; वही "अबीर" याकूब का निवास स्थान या शरण है।(भजन संहिता 132:2-5)।
उसे कई बार अबीर इज़राइल (यशायाह 1:24) या अबीर जैकब (उत्पत्ति 49:24, भजन 132:2 और 132:5, यशायाह 49:26 और 60:16) के रूप में जाना जाता है।
†-हिब्रू बाइबिल में तथा यहूदीयों की परम्पराओं में ईश्वर के पाँच नाम प्रसिद्ध हैं :----
(१)----अबीर (२)----अदॉन (३)---सबॉथ (४)--याह्व्ह्
तथा (५)----(इलॉही) अबीर नाम जीवित परमेश्वर की उपाधियों में से एक है। किसी कारण से सभी भगवान के नामों का आमतौर पर अनुवाद किया जाता है और आमतौर पर बहुत सटीक नहीं होता है), और पसंद का अनुवाद आमतौर पर एक शक्तिशाली/ रक्षक (माइटी वन) होता है, जो बहुत सटीक नहीं होता है। अबीर नाम बाइबिल में छह बार आता है लेकिन अकेले कभी नहीं; पांच बार इसे याकूब और एक बार इस्राएल के नाम से जोड़ा जाता है ।
यशायाह 1:24 में हम यशायाह की रिपोर्ट के अनुसार तेजी से उत्तराधिकार में भगवान के चार नाम पाते हैं : "इसलिए अदोन YHWH सबाथ अबीर इज़राइल घोषित करता है "। यशायाह 49:26 में एक और पूर्ण रस्सी होती है: "सभी मनुष्य जानेंगे कि मैं, यहोवा, तुम्हारा उद्धारकर्ता और तुम्हारा छुड़ानेवाला, अबीर याकूब हूं," और यशायाह 60:16 में समान उल्लेख किया गया है।
अबीर जैकब का पूरा नाम सबसे पहले स्वयं जैकब ने बोला था। अपने जीवन के अंत में, याकूब ने अपने पुत्रों को आशीष दी, और जब यूसुफ की बारी आई तो उसने उससे अबीर याकूब के हाथों आशीषों के बारे में बात की (उत्पत्ति खण्ड- 49:24)। कई वर्षों बाद, भजन लिखने वाले को राजा दाऊद की याद आई , जिसने अबीर याकूब की शपथ खाई थी कि वह तब तक नहीं सोएगा जब तक उसे यहोवा के लिए जगह नहीं मिल जाती; अबीर याकूब का निवास स्थान (भजन संहिता- 132:2-5)।
अबीर नाम אבר ( 'br ) धातु से आया है, जिसका अर्थ मोटे तौर पर मजबूत होना होता है:
स्वयं बाइबिल में क्रिया के रूप में नहीं आती है, लेकिन असीरियन भाषा में इसका अर्थ मजबूत या दृढ़ होना होता है। स्पष्ट रूप से इब्रानी भाषा में ऐसे कई शब्द हैं जिनका संबंध शक्ति से है, लेकिन यह एक विशिष्ट प्रकार की शक्ति को दर्शाता है।
🔼 Etymology of the name Abir-
The name Abir comes from the root אבר ('br), which roughly means to be strong:
אבר
The verb אבר ('br) means to be strong or firm, particularly in a defensive way (rather than offensive). The derived nouns אבר ('eber) and אברה ('ebra) refer to the pinion(s) that make up a bird's wings, which in turn means that the ancients saw avian wings as means to protect rather than to fly with (the signature trait of angels, hence, is not an ability to fly but a tendency to protect). The verb אבר ('abar) describes activities done with pinions, which is to fly or to protect. The adjective אביר ('abbir), meaning strong in a defensive way; protective.
(१)----अबीर (२)----अदॉन (३)---सबॉथ (४)--याह्व्ह्
तथा (५)----(इलॉही) अबीर नाम जीवित परमेश्वर की उपाधियों में से एक है। किसी कारण से सभी भगवान के नामों का आमतौर पर अनुवाद किया जाता है और आमतौर पर बहुत सटीक नहीं होता है), और पसंद का अनुवाद आमतौर पर एक शक्तिशाली/ रक्षक (माइटी वन) होता है, जो बहुत सटीक नहीं होता है। अबीर नाम बाइबिल में छह बार आता है लेकिन अकेले कभी नहीं; पांच बार इसे याकूब और एक बार इस्राएल के नाम से जोड़ा जाता है ।
यशायाह 1:24 में हम यशायाह की रिपोर्ट के अनुसार तेजी से उत्तराधिकार में भगवान के चार नाम पाते हैं : "इसलिए अदोन YHWH सबाथ अबीर इज़राइल घोषित करता है "। यशायाह 49:26 में एक और पूर्ण रस्सी होती है: "सभी मनुष्य जानेंगे कि मैं, यहोवा, तुम्हारा उद्धारकर्ता और तुम्हारा छुड़ानेवाला, अबीर याकूब हूं," और यशायाह 60:16 में समान उल्लेख किया गया है।
अबीर जैकब का पूरा नाम सबसे पहले स्वयं जैकब ने बोला था। अपने जीवन के अंत में, याकूब ने अपने पुत्रों को आशीष दी, और जब यूसुफ की बारी आई तो उसने उससे अबीर याकूब के हाथों आशीषों के बारे में बात की (उत्पत्ति खण्ड- 49:24)। कई वर्षों बाद, भजन लिखने वाले को राजा दाऊद की याद आई , जिसने अबीर याकूब की शपथ खाई थी कि वह तब तक नहीं सोएगा जब तक उसे यहोवा के लिए जगह नहीं मिल जाती; अबीर याकूब का निवास स्थान (भजन संहिता- 132:2-5)।
अबीर नाम אבר ( 'br ) धातु से आया है, जिसका अर्थ मोटे तौर पर मजबूत होना होता है:
(अबर शब्द का विकास-)
क्रिया אבר ( 'br ) का अर्थ मजबूत या दृढ़ होना होता है, विशेष रूप से (आक्रामक के बजाय) रक्षात्मक तरीके से । इस मूल की संज्ञाऐं हैं- אבר ( 'eber ) और אברה ( 'ebra ) पिनियन (ओं) को संदर्भित करती हैं जो एक पक्षी के पंख बनाती हैं, जिसका अर्थ है कि पूर्वजों ने एवियन पंखों को उड़ान भरने के बजाय (हस्ताक्षर) के रूप में रक्षा करने के साधन के रूप में देखा था यह फरिश्तों का गुण है:- इसलिए, उड़ने की क्षमता नहीं बल्कि रक्षा करने की प्रवृत्ति है)। यद्यपि אבר ( 'abar )क्रिया- पंखों के साथ की जाने वाली गतिविधियों का वर्णन करती है, जो उड़ना या रक्षा करना ही है। विशेषण אביר ( 'अब्बीर ), जिसका अर्थ रक्षात्मक तरीके से मजबूत होता है; सुरक्षात्मक है।
Abarim प्रकाशन 'ऑनलाइन बाइबिल हिब्रू शब्दकोश
अबर
जड़ אבר ( 'br ) एक उल्लेखनीय जड़ है जो पूरे सामी भाषा स्पेक्ट्रम में पाई जाती है। जड़ स्वयं बाइबिल में क्रिया के रूप में नहीं आती है, लेकिन असीरियन भाषा में इसका अर्थ मजबूत या दृढ़ होना होता है। स्पष्ट रूप से इब्रानी भाषा में ऐसे कई शब्द हैं जिनका संबंध शक्ति से है, लेकिन यह एक विशिष्ट प्रकार की शक्ति को दर्शाता है, अर्थात् एक पक्षी के पंख या उड़ान-पंख। यह तुरंत स्पष्ट नहीं है कि पूर्वजों ने पंख को कैसे देखा (या उन्होंने इसे "मजबूत" नाम क्यों दिया), लेकिन इसका कारण यह है कि उन्होंने इसे दो अधिचर्मिक (एपिडर्मल) विकासों में से एक के रूप में पहचाना, जिसके साथ एक प्राणी स्वाभाविक रूप से ढंका हो सकता है, दूसरा एक बाल होना (और एक्सोस्केलेटन की गिनती नहीं)। शायद पूर्वजों ने अपने स्पष्ट संरचनात्मक गुणों के कारण बालों को "कमजोर" और पंख को "मजबूत होने" के रूप में देखा, लेकिन यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि बालों के लिए हिब्रू शब्द, अर्थात् שער ( s'r ) का हिस्सा है शब्दों का एक समूह जो सभी को एक गहन भावनात्मक अनुभव के साथ करना है (और इसे करीब से देखने के लिए, ( संस्कृत भाषा में अभ्र -गतौ धातु विद्यमान है।अभ्र--अच् । १ मेघ २ मुस्तक ३ आकाश अब्भ्र- शब्देऽधिकं दृश्यम् “. जब बालों वाला प्राणी भय का अनुभव करता है, तो वह केवल अपने जीवन के लिए लड़ सकता है या भाग सकता है; एक पंख वाला प्राणी बस उड़ सकता है और तैर सकता है। एक पक्षी की पृथ्वी से ऊपर उठने और स्वर्ग की ओर उड़ने की क्षमता का आध्यात्मिक पहलू हिब्रू कवियों से नहीं बचा है ; कुछ स्वर्गदूतों के बारे में कहा गया है कि उनके पंख पक्षी जैसे होते हैं, जिनसे वे उड़ते हैं (यशायाह 6:2), और स्वयं परमेश्वर के पास भी पंख होते हैं (भजन संहिता 91:4)। लेकिन चूंकि स्वर्गदूतों का आम तौर पर मानवीय रूप होता है और मनुष्य परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए हैं, इसलिए यह तर्क संगत है कि मनुष्यों के पंख भी होते हैं। और इसका मतलब है कि:
- पक्षियों के शारीरिक अंग बहुत अधिक सामान्य गुणवत्ता की शारीरिक अभिव्यक्ति मात्र हैं, और
- भगवान, स्वर्गदूतों और मनुष्यों के पंख गैर-भौतिक पंख हैं जो पक्षियों के लिए भौतिक पंखों की तरह ही काम करते हैं।
अब, वह "वही चीज़" क्या हो सकती है?
पूर्वजों ने आज की तुलना में बहुत अधिक देखभाल के साथ सृष्टि का अवलोकन किया, और उन्होंने कहा कि उड़ान एक पंख का सबसे परिभाषित कार्य नहीं है। वास्तव में, पंख के लिए हिब्रू शब्द כנף ( kanap ) है, और संबंधित क्रिया כנף ( kanep ) है, जिसका अर्थ उड़ना नहीं है, बल्कि छिपाना या घेरना है। यशायाह के सेराफिम के छह पंख हैं, लेकिन केवल दो का उपयोग उड़ान के लिए किया जाता है और चार का उपयोग आवरण और सुरक्षा के लिए किया जाता है। इसलिए यशायाह ने YHWH -यह्व: यहोवा- को यरूशलेम की मुर्गी के बच्चों की तरह रक्षा करने की बात की (यशायाह 31:5) और भजनकार परमेश्वर के पंखों के नीचे शरण लेने की बात करता है (भजन संहिता 91:4)। पक्षियों और कीड़ों जैसे पंख वाले जीवों को सामूहिक रूप से जाना जाता थाעוף ( 'op' ), समान क्रिया עוף ( 'op' ) के बाद, लेकिन एक संबद्ध संज्ञा עפעף ( 'ap'ap ) का अर्थ है पलक; वह अंग जो आंख को ढकता और उसकी रक्षा करता है।
दूसरे शब्दों में: पंख अनिवार्य रूप से उपकरण हैं जिनके साथ छिपाने या रक्षा करने के लिए हम तत्पर होते हैं।, और उड़ान के पंख होने का एक मात्र दुष्प्रभाव है।
हमारी जड़ की बाइबिल व्युत्पत्ति हैं:
- पुल्लिंग संज्ञा אבר ( 'eber ), जिसका अर्थ है पिनियन,(पंख ) वह करने की क्षमता जो आप पंखों के साथ कर सकते हैं। यह एवर संज्ञा तीन बार आती है: भजन 55: 6 में डेविड बहुत अधिक भयावहता को देखता है, और चाहता है कि कोई उसे कबूतर की तरह אבר - एवर दे ( יונה , योना ), ताकि वह उड़ सके ( עוף , 'op ) और बस सके ( שכן , शकन ) [शांति में?]। भविष्यवक्ता यशायाह ने प्रसिद्ध रूप से घोषित किया कि जो लोग YHWH यहोवा की प्रतीक्षा करते हैं, वे ( עלה , 'ala ) אבר के साथ उकाब की तरह चढ़ेंगे (यशायाह 40:31)। और यहेजकेलडाबर YHWH से एक पहेली मिली , जिसमें स्पष्ट रूप से बड़े पंखों ( כנפים , kanapim ), लंबे पंखों ( אבר ) और पूर्ण पंख ( נוצה , nosa ) और विभिन्न रंगों के साथ बेबीलोन साम्राज्य को एक महान ईगल (बाज) के रूप में दर्शाया गया है ।(यहेजकेल 17:3)।
- स्त्रैण समतुल्य אברה ( 'ebra ), जिसका अर्थ समान है और चार बार प्रयोग किया जाता है: अय्यूब 39:13 में एक शुतुरमुर्ग खुशी से אברה और प्रेम के पंख के साथ फड़फड़ाता है। मुश्किल भजन संहिता 68:13 में "वह जो घर पर रहती है," एक स्पष्ट लड़ाई के बाद, एक सुरक्षा में झूठ बोलती है जिसे कबूतर के चांदी के पंखों और सोने के אברה एवरा के साथ करना पड़ता है । उल्लेखनीय रूप से, व्यवस्थाविवरण 32:11 में, यहोवा को एक उकाब के समान माना गया है जिसने याकूब (= इस्राएल ) को उसकी आभा में पकड़ा, उसके ऊपर मंडराते हुए और उसकी देखभाल करते हुए और उसकी आँख के तारे की तरह उसकी रखवाली करते हुए उपस्थित रहा। कुछ ऐसा ही, लेकिन उपमा के बिना, भजन संहिता 91:4 में होता है, जहां वह जो यहोवा पर भरोसा रखता है, यहोवा के पंखों के नीचे शरण ले सकता है और वह उसे यहोवा अपने पंखों से ढांप लेगा ।
- सांकेतिक क्रिया אבר ( 'abar ), जिसका अर्थ है: पंख/पंखों का उपयोग करना। अय्यूब 39:26 में इसका केवल एक बार प्रयोग किया गया है। अधिकांश अनुवाद मानते हैं कि यहोवा अय्यूब से पूछता है कि क्या यह उसकी समझ से है कि बाज उड़ता है, लेकिन स्पष्ट रूप से हमारी क्रिया उड़ान तक सीमित नहीं है।
- विशेषण אביר ( 'अब्बीर ), जिसका अर्थ है मजबूत (जिस तरह से एक पंख मजबूत होता है), और यहीं पर हमारी जड़(मूल) और भी दिलचस्प हो जाती है:
विशेषण אביר ( 'अब्बीर ) का शाब्दिक अर्थ पंख वाला होता है। जिसका स्पष्ट रूप से अंग्रेजी में हिब्रू की तुलना में कुछ और अर्थ होता है। हिब्रू में यह शब्द उड़ान-पंख की कठोरता और लचीलेपन के साथ-साथ पंख के सुरक्षात्मक गुणों और वाहक और संभावित मेहमानों को सुरक्षा की भावना देने की क्षमता को दर्शाता है। यह शब्द अक्सर सैन्य संदर्भों में प्रकट होता है (पराक्रमी के अर्थ में;
अय्यूब 24:22, यिर्मयाह 46:15, विलापगीत 1:15), और यहाँ अबारीम प्रकाशन में हमें आश्चर्य होता है कि क्या यह शायद एक प्रकार के सैनिक के लिए सामान्य शब्द के रूप में भी काम करता है, तुलनीय है । डेविड के "पराक्रमी-पुरुषों" के लिए (जो एक अलग शब्द है, גבר , geber से )।
सबसे खास बात यह है कि इस शब्द का प्रयोग भगवान के व्यक्तिगत नाम के रूप में भी किया जाता है, जिसका नाम अबीर है, जिसका अर्थ है ताकतवर।
मसोरा लेखकों ने हमारे विशेषण 'अब्बीर' और इस नाम ' अबीर' के उच्चारण के बीच एक मिनट के अंतर पर जोर दिया , लेकिन यह अंतर इस शब्द के पहली बार लिखे जाने के 1500 साल बाद तक मौजूद नहीं था।
बहुवचन में, यह शब्द ज्यादातर एक सामूहिक सैन्य बल को दर्शाता है, और ध्यान दें कि हिब्रू में एक बहुवचन भी शाब्दिक बहुसंख्यकता के बजाय तीव्रता की दशा अथवा अवस्था को दर्शाता है। न्यायियों 5:22 में, न्यायाधीश दबोरा और जनरल बाराक गाते हैं कि कैसे उन्होंने कनानी सेनापति सीसरा की सेना के खिलाफ (मार्च )आक्रमण अभियान किया, और कैसे घोड़ों के ( סוס , sus ) गरजने वाले खुरों ने उनके डैशिंग אבירי के रूप में धराशायी कर दिया । यिर्मयाह 8:16 और 47:3 में अबेर्री और घुड़सवार सेना के बीच एक समान संबंध बनाया गया है। दूसरी ओर, भजन संहिता 22:12 में, हम जाने-पहचाने कथन को पढ़ते हैं, "बहुत से बैलों बृषभों [ פר , par का बहुवचन ] ने मुझे घेर लिया है, बाशान के אבירי ने मुझे घेर लिया है"। ऐसा प्रतीत होता है कि बुल-थीम को भजन संहिता 50:13 पर ले जाया गया है, जहाँ אבירים का उपयोग עתוד ( 'attud ) के साथ किया जाता है, जिसका अर्थ है वह-बकरी। भजन संहिता 68:30 में, यह עגל ( 'egel ) के साथ प्रकट होता है, जिसका अर्थ नर बछड़ा है। यशायाह 34:7 में यह फिर से פר ( par ) के बगल में दिखाई देता है, जिसका अर्थ है युवा बैल बृषभ-।
यह सब दृढ़ता से सुझाव देता है कि शब्दों का यह विशेष समूह एक धर्मशास्त्रीय विचार को दर्शाता है जो अश्शूर और बेबीलोन में भी मौजूद था, जिसे वहां लामासु या सेडू नाम के प्रसिद्ध पंख वाले बैल के रूप में चित्रित किया गया था (और जो बदले में दिव्य शदाई नाम से संबंधित हो सकता है )।
साम्राज्य के वर्षों के हिब्रू विद्वान एक सांस्कृतिक निर्वात में काम नहीं कर रहे थे, लेकिन पड़ोसी संस्कृतियों के अपने सहयोगी विद्वानों से बड़े पैमाने पर उधार ली गई कहानियाँ, कल्पना और शब्दावली हैं।। यही बात स्पष्ट रूप से आज भी होती है।
पाठक को अब तक यह समझ लेना चाहिए कि जब प्राचीन लोग आधुनिक लोगों की तुलना में पंखों या बैलों या पंख वाले बैल की मूर्ति को देखते थे तो उनके मन में पूरी तरह से अलग भावनाएँ थीं। पूर्वजों के विभिन्न संघों के कारण जो भी हो, जहाँ तक हम बता सकते हैं, असीरियन पंख वाले बैल ने एक रक्षक आत्मा, एक घर-भावना का चित्रण किया, जिसे बाद में रोमनों ने एक जीनियस या डेमन कहा ।
नियमित घरों के लिए छोटे और शहरों, राज्यों और साम्राज्यों के लिए बड़े थे।
जाहिर है, जब लोगों ने इस घर-भावना के विचार के इर्द-गिर्द संगठित दुनिया में याह्विज़्म की व्याख्या करने की कोशिश की, तो YHWH सारी सृष्टि की "हाउस-स्पिरिट" बन गया। और चूँकि परमेश्वर का "घर-आध्यात्मिक" वाचा इब्राहीम (के घर) के साथ शुरू हुआ, फिर याकूब के घराने और फिर इस्राएल के घराने तक पहुँचा, और अंततः बाइबल में पृथ्वी के सभी परिवारों तक पहुँचेगा।
उसे कई बार अबीर इज़राइल (यशायाह 1:24) या अबीर जैकब (उत्पत्ति 49:24, भजन 132:2 और 132:5, यशायाह 49:26 और 60:16) के रूप में जाना जाता है।
जिस ओ३म् (ऊँ) शब्द के उच्चारण करने पर शूद्र अथवा निम्न समझी जाने वाली जन-जातियाें की जिह्वा का रूढि वादी परम्पराओं के अनुगामी ब्राह्मण उच्छेदन तक कर देते थे ।
जिस ओ३म् (ऊँ) शब्द के उच्चारण करने पर शूद्र अथवा निम्न समझी जाने वाली जन-जातियाें की जिह्वा का रूढि वादी परम्पराओं के अनुगामी ब्राह्मण उच्छेदन तक कर देते थे ।
और जिस ओ३म् शब्द का प्रादुर्भाव उसी द्रविड संस्कृति से हुआ हो ! जिनके लिए इसका शब्द के उच्चारण पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया हो ।
आज हम उस शब्द की जन्म-कुण्डली खोलेंने का प्रयास करेंगे -
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सर्व-प्रथम हम विचार करते हैं ओ३म् शब्द के विकास की पृष्ठ-भूमि पर...
विश्व इतिहास के सांस्कृतिक अन्वेषणों के उपरान्त कुछ तथ्यों से हम अवगत हुए ।
कैल्ट जन जाति के धर्म साधना के रहस्य मय अनुष्ठानों में इसी कारण से आध्यात्मिक और तान्त्रिक क्रियाओं को प्रभावात्मक बनाने के लिए ओघम् (OGHUM )शब्द का दृढता से उच्चारण विधान किया जाता था ।
ई०पू० 400 से ई०पू० एक शतक के समय होगा ।
कि उस संस्कृति के विश्वास करने वालों का मत था ! कि इस प्रकार आउ-मा (Ow- ma) अर्थात् जिसे
भारतीय आर्यों ने ओ३म् रूप में साहित्य ,कला और ज्ञान के उत्प्रेरक और रक्षक के रूप में प्रतिष्ठित किया है ...
अर्थात् प्राचीन भारतीय देव संस्कृति के अनुयायीयों की मान्यताओं के अनुसार सम्पूर्ण भाषा की आक्षरिक सम्पत्ति ( syllable prosperity ) यथावत् रहती है !
प्राचीनत्तम फ्रॉन्स की संस्कृतियों में ओघम् का मूर्त प्रारूप 🌞 सूर्य के आकार के सादृश्य पर था ।
जैसा कि प्राचीन पश्चिमीय संस्कृतियों की मान्यताऐं भी हैं
वास्तव में ओघम् (ogham )से बुद्धि उसी प्रकार नि:सृत होती है जैसे सूर्य से उसका प्रकाश 🌞☀⚡☀ प्राचीन मध्य मिश्र के लीबिया प्रान्त में तथा थीब्ज में भी द्रविड संस्कृति का यही ऑघम शब्द आमोन् रा ( ammon - ra ) जो वस्तुत: ओ३म् -रवि के तादात्मयी रूप में प्रस्तावित है ..
आधुनिक अनुसन्धानों के अनुसार भी अमेरिकीय अन्तरिक्ष यान - प्रक्षेपण संस्थान
के वैज्ञानिकों ने भी सूर्य में अजस्र रूप से निनादित ओ३म् प्लुत स्वर का श्रवण किया है ।
सुमेरियन एवं सैमेटिक हिब्रू आदि परम्पराओं में ..
रब़ अथवा रब्बी शब्द का अर्थ - नेता तथा महान एवं गुरू होता हेै !
जैसे रब्बी यहूदीयों का धर्म गुरू है ..
अरबी भाषा में रब़ --ईश्वर का वाचक है ।
रब्बुल उल् अलामीन मतलब ईश्वर सम्पूर्ण संसार का रक्षक है ।
अमीन शब्द (अरबी:जुबान में ( آمین) या आमीन का शाब्दिक अर्थ है "ऐसा हो सकता है" या "ऐसा है"। मुसलमानों में शब्द आमिन का प्रयोग आमतौर पर उसी शब्द के साथ किया जाता है जिसका अर्थ है "मुझे जवाब दें", और वाक्यांश "इलाही अमीन"
(अरबी: الهی آمین; अर्थ:-
हे मेरे भगवान ! मुझे जवाब दें) आधुनिक काल सैमेटिक परम्पराओं के अनुयायी लोगों के बीच बहुत आम है।
इसका उपयोग अंग्रेजी में अमेन के रूप में किया जाता है (अर्थ: तो यह हो)। वस्तुत: अमेन हिब्रू बाइबिल में वर्णित रूप है ।
शिया शरीयत में, प्रार्थनाओं में कुरान 1 (सूर अल-हम्द) को पढ़ने के बाद अमीन न कहने पर कि प्रार्थना को शरीयती तौर पर अमान्य कर दिया गया है।
हिब्रू परम्पराओं से यह अरब की रबायतों में कायम हुआ
हिब्रू में, शब्द अमीन को सबसे पहले "सही" और "सत्य" नामक विशेषण के रूप में उपयोग किया जाता था, लेकिन यशायाह की किताब के मुताबिक इसका उपयोग संज्ञा के रूप में किया जाता था।
यह शब्द फिर हिब्रू में एक invariant ऑपरेटर (अर्थात्, "वास्तव में" और "निश्चित रूप से")के अर्थ में बदल गया।
इसका उपयोग बाइबिल में 30 बार और तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के यूनानी अनुवाद में 33 बार किया गया है।
इतिहास की पहली पुस्तक [नोट 2] और किंग्स बुक्स [नोट 3] की पहली पुस्तक में इस शब्द की घटना से पता चलता है।
कि यह शब्द यहूदी प्रार्थनाओं और अनुष्ठानों में चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से पहले भी इस्तेमाल किया गया था।
प्राचीन यहूदी परम्परा में, इस शब्द का उपयोग शुरुआत या प्रार्थना के अन्त में किया गया था।
प्रार्थनाओं, और भजनों के अन्त में इसकी पुनरावृत्ति प्रासंगिक सामग्रियों की पुष्टि और समर्थन दोनों में थी , और उम्मीद की अभिव्यक्ति थी कि हर कोई अमेन का उल्लेख करने के दौरान अभ्यास के आशीर्वाद साझा कर सकता है।
तलमूद और अन्य यहूदी परम्पराओं की अवधि में, यह महत्वपूर्ण था कि विभिन्न स्थितियों में शब्द का उपयोग कैसे किया जाए, और ऐसा माना जाता था कि भगवान किसी भी प्रार्थना के लिए "आमीन" कहता है जो उसे सम्बोधित किया जाता है।
ईसाई धर्म में---------
यहूदी परम्पराओं को ईसाई चर्चों में अपना रास्ता मिला। "अमीन" शब्द का प्रयोग नए नियम में 119 बार किया गया था, जिनमें से 52 मामले यहूदी धर्म में इसका उपयोग कैसे किया जाता है।
नए नियम के माध्यम से, शब्द दुनिया की लगभग सभी मुख्य भाषाओं में प्रवेश किया।
शब्द, अमीन, जैसा कि नए नियम में प्रयोग किया गया है, उसमें इसके चार अर्थ हैं -
पावती और अनुमोदन; एक प्रार्थना में समझौता या भागीदारी, और किसी के प्रतिज्ञा की अभिव्यक्ति।
दिव्य प्रतिक्रिया का अनुरोध, जिसका अर्थ है:
"हे भगवान! स्वीकार करें या जवाब दें!" अर्थात् एवं अस्तु !
एक प्रार्थना या प्रतिज्ञा की पुष्टि, जिसका अर्थ है: "तो यह हो" (आज शब्द को दो अर्थों को इंगित करने के लिए प्रार्थनाओं के अंत में उपयोग किया जाता है)।
एक विशेषता या यीशु मसीह का नाम ।
अरबी में
चूंकि इस्लाम के उद्भव से पहले यहूदी धर्म और नाज़रेन ईसाई धर्म दोनों अरब प्रायद्वीप में अनुयायी थे, इसलिए यह संभव है कि मक्का और मदीना समेत अरब, इससे परिचित थे, हालांकि जहिल्या काल की कविताओं में इसका कोई निशान नहीं मिला है। यह शब्द कुरान में नहीं होता है, लेकिन प्रारंभिक मुस्लिम शब्द से निश्चित रूप से परिचित थे। पैगंबर मुहम्मद ने शब्द का प्रयोग किया, लेकिन ऐसा लगता है कि शुरुआती मुस्लिम शब्द के अर्थ के बारे में निश्चित नहीं थे, क्योंकि पैगंबर ने उन्हें एक स्पष्टीकरण और शब्द की व्याख्या दी (यह कहकर कि "अमीन एक है अपने वफादार सेवकों पर दिव्य डाक टिकट ")। और 'अब्द अल्लाह बी। अल-अब्बास ने शब्द का व्याकरणिक विवरण देने की कोशिश की।
पवित्र कुरान के निष्कर्षों में
शब्द कुरान 10:88 और 89 के उत्थानों में उल्लिखित है। कुरान के लगभग सभी exegetes के अनुसार, जब पैगंबर मूसा (ए) फिरौन को शाप दिया, वह और उसके भाई, भविष्यवक्ता हारून (ए) , शब्द अमेन उद्धृत किया।
प्रार्थना में अमीन का हवाला देते हुए
सुन्नी मुस्लिम इस शब्द का हवाला देते हैं, अमीन, प्रार्थना में कुरान 1 को कविता के जवाब के रूप में पढ़ने के बाद, "हमें सही मार्ग दिखाएं", (कुरान, 1: 6)। यदि उपासक अपनी प्रार्थना व्यक्तिगत रूप से कहता है, तो वे स्वयं को इस शब्द का हवाला देते हैं, और यदि वे एक मंडली प्रार्थना कहते हैं, जब प्रार्थना के नेता कुरान 1 को पढ़ना समाप्त कर देते हैं, तो सभी अनुयायियों ने एक साथ उद्धृत किया है। शिया न्यायविदों का कहना है कि प्रार्थना में अमीन का हवाला देते हुए यह अमान्य है, क्योंकि यह प्रार्थना में एक विधर्मी अभ्यास है जिसे पैगंबर की परंपरा में पुष्टि नहीं माना जाता है।
टिप्पणियाँ
↑ यशायाह 65:16
↑ धन्य है यहोवा, इस्राएल का परमेश्वर, अनन्तकाल से अनन्तकाल तक। "तब सभी लोगों ने कहा"
आमीन! "1 पुरानी
.अमोन तथा रा प्रारम्भ में पृथक पृथक थे ..
दौनों सूर्य सत्ता के वाचक थे ..मिश्र की संस्कृति
में ये दौनों कालान्तरण में एक रूप होकर अमॉन रॉ के रूप में
अत्यधिक पूज्य था ..
क्यों की प्राचीन मिश्र के लोगों की मान्यता थी कि ..अमोन -- रॉ.. ही सारे विश्व में प्रकाश और ज्ञान का कारणहै मिश्र की परम्पराओ से ही यह शब्द मैसोपोटामिया की सैमेटिक हिब्रु परम्परओं में प्रतिष्ठित हुआ जो क्रमशः यहूदी ( वैदिक यदुः ) के वंशज थे !!
....इन्हीं से ईसाईयों में Amen तथा अ़रबी भाषा में यही आमीन् !! (ऐसा ही हो ) होगया है इतना ही नहीं जर्मन आर्य ओ३म् का सम्बोधन omi /ovin या के रूप में अपने ज्ञान के देव वॉडेन ( woden) के लिए सम्बोधित करते करते थे .....
.इसी वुधः का दूसरा सम्बोधन ouvin ऑविन् भी था ..
...यही woden अंग्रेजी मेंgoden बन गया था जिससे कालान्तर में गोड(god )शब्द बना है
जो फ़ारसी में ख़ुदा के रूप में हैं !
सीरिया की सुर संस्कृति में यह शब्द ऑवम् ( aovm ) हो गया है ।
वेदों में ओमान् शब्द बहुतायत से रक्षक ,के रूप में आया है । भारतीय संस्कृति में मान्यता है कि शिव ( ओ३म् ) ने ही पाणिनी को ध्वनि निकाय के रूप में चौदह माहेश्वर सूत्रों की वर्णमाला प्रदान की ! ......
जिससे सम्पूर्ण भाषा व्याकरण का निर्माण हुआ पाणिनी पणि अथवा ( phoenici) पुरोहित थे जो मेसोपोटामिया की सैमेटिक शाखा के लोग थे !
ये लोग द्रविडों से सम्बद्ध थे !
वस्तुत: यहाँ इन्हें द्रुज संज्ञा से अभिहित किया गया था ...
...द्रुज जनजाति ...प्राचीन इज़राएल ..
जॉर्डन ..लेबनॉन में तथा सीरिया में
आज तक प्राचीन सांस्कृतिक मान्यताओं को सञ्जोये हुए है ..
.द्रुजों की मान्यत थी कि आत्मा अमर है ..पुनर्जन्म .. कर्म फल के भोग के लिए होता है ..ठीक यही मान्यता बाल्टिक सागर के तटवर्ति druid द्रयूडों में पुरोहितों के रूप में थी !
केल्ट वेल्स ब्रिटॉनस् आदि ने
इस वर्णमाला को द्रविडों से ग्रहण किया था !
एक द्रविड अपने समय के सबसे बडे़ द्रव्य - वेत्ता और तत्व दर्शी थे !
जैसा कि द्रविड नाम से ध्वनित होता है
...मैं यादव योगेश कुमार 'रोहि'
भारतीय सन्दर्भ में भी इस शब्द पर
कुछ व्याख्यान करता हूँ !
जो संक्षिप्त ही है ऊँ एक प्लुत स्वर है जो सृष्टि का आदि कालीन प्राकृतिक ध्वनि रूप है जिसमें सम्पूर्ण वर्णमाला समाहित है !!
इसके अवशेष एशिया - माइनर की पार्श्ववर्ती आयोनिया ( प्राचीन यूनान ) की संस्कृति में भी प्राप्त हुए है
यूनानी आर्य ज्यूस और पॉसीडन ( पूषण ) की साधना के अवसर पर अमोनॉस ( amonos) के रूप में ओमन् अथवा ओ३म् का उच्चारण करते थे !!!!!!!
भारतीय सांस्कृतिक संन्दर्भ में भी ओ३म् शब्द की व्युत्पत्ति परक व्याख्या आवश्यक है वैदिक ग्रन्थों विशेषतः ऋग्वेद मेंओमान् के रूप में भी है संस्कृत के वैय्याकरणों के अनुसार ओ३म् शब्द धातुज ( यौगिक) है जो अव् घातु में मन् प्रत्यय करने पर बना है
पाणिनीय धातु पाठ में अव् धातु के अनेक अर्थ हैं ।
अव्-- --१ रक्षक २ गति ३ कान्ति४ प्रीति ५ तृप्ति ६ अवगम ७ प्रवेश ८ श्रवण ९ स्वामी १० अर्थ ११ याचन १२ क्रिया १३ इच्छा १४ दीप्ति १५ अवाप्ति १६ आलिड्.गन १७ हिंसा १८ आदान १९ भाव वृद्धिषु ( १/३९६/ भाषायी रूप में ओ३म् एक अव्यय ( interjection) है जिसका अर्थ है -- ऐसा ही हो ! ( एवमस्तु !) it be so इसका अरबी़ तथा हिब्रू रूप है आमीन् ।
लौकिक संस्कृत में ओमन् ( ऊँ) का अर्थ--- औपचारिकपुष्टि करण अथवा मान्य स्वीकृति का वाचक है ---
मालती माधव ग्रन्थ में १/७५ पृष्ट पर-- ओम इति उच्यताम् अमात्यः" तथा साहित्य दर्पण --- द्वित्तीयश्चेदोम् इति ब्रूम १/"" हमारा यह संदेश प्रेषण क्रम अनवरत चलता रहेगा **** मैं योगेश कुमार रोहि निवेदन करता हूँ !! कि इस महान संदेश को सारे संसार में प्रसारित कर दो !!! आमीन् ..............
योगेश कुमार रोहि के द्वारा अनुसन्धानित
भारतीयही नहीं अपितु विश्व इतिहास का यह एक नवीनत्तम् सांस्कृतिक शोध है |
यहोवा की कहानी मितानीयों से -
YHWH: नाम का मूल अरबी अर्थ
परमेश्वर ने मूसा को अपना नाम इब्रानी मूल ה.ו.י, "अस्तित्व" से "मैं हूँ" के रूप में प्रकट किया। हालाँकि, YHWH नाम मिद्यान में उत्पन्न हुआ है, और "प्यार, इच्छा या जुनून" के लिए अरबी शब्द से निकला है।

जलती हुई झाड़ी से पहले मोसेस, मार्क चागल 1966, संग्रहालय आन डे स्ट्रूम
निर्गमन अध्याय 6 में, जब मूसा ने शिकायत की कि कैसे फिरौन ने इस्राएल के कार्यभार को बढ़ा दिया है और उन्हें स्वतंत्र करने से इनकार कर दिया है, तो परमेश्वर मूसा के सामने प्रकट होता है और इस्राएल को मिस्र से बाहर ले जाने और उन्हें प्रतिज्ञा की भूमि पर लाने के अपने वादे को दोहराता है। [1] इस संदेश के भाग के रूप में, परमेश्वर ने मूसा से कहा कि उसका नाम YHWH है, भले ही उसने कभी भी इस नाम को कुलपतियों के साथ साझा नहीं किया, और केवल उन्हें (एल शादाई )के रूप में दिखाई दिया:
שמות ו:ב וַיְדַבֵּר אֱלֹהִים אֶל מֹשֶׁה וַיֹּאמֶר אֵלָיו אֲנִי יְָו। ו:ג וָאֵרָא אֶל אַבְרָהָם אֶל יִצְחָק וְאֶל יַעֲקֹב בְּאֵל שַׁדָּי וּשְׁמִי יְ־הוָה לֹא נוֹדַעְתִּי לָהֶם.
निर्गमन 6:2 परमेश्वर ने मूसा से बात की, और उस से कहा, मैं यहोवा हूं। 6:3 मैं ने इब्राहीम, इसहाक, और याकूब को एलशदै के रूप में दर्शन दिया, परन्तु यहोवा के नाम से उन पर प्रगट न किया।
पाठ यह स्पष्ट करता है कि YHWH नाम - छात्रवृत्ति में टेट्राग्रामेटन ("चार अक्षरों" के लिए ग्रीक) के रूप में जाना जाता है - प्राचीन इज़राइली इतिहास में एक नए युग को चिह्नित करते हुए बहुत महत्व रखता है, लेकिन यह इसके अर्थ के लिए कोई स्पष्टीकरण नहीं देता है।
YHWH होने के रूप में
इसके विपरीत, जलती हुई झाड़ी पर भगवान का पहला रहस्योद्घाटन, जिसमें पहली बार मूसा को इस विशेष नाम से परिचित कराया गया है, [2] इसके अर्थ की व्याख्या करता है या कम से कम संकेत देता है:
שמ ַ ַ ג ָאֱלֹ ִנֵּ ִנֵּ ִנֵּ אָנֹכִ אָנֹכִ אֶל בְּנֵ בְּנֵ ִשְׂרָאֵל ִשְׂרָאֵל ְאָמַרְתִּ ְאָמַרְתִּ אֱלֹ אֱלֹ אֱלֹ אֲב אֲב אֲב אֲב מַ מַ מַ מַ שְּׁמ מָ מָ מָ מָ מָ מָ מָ מָ מָ।
निर्गमन 3:13 मूसा ने परमेश्वर से कहा, जब मैं इस्राएलियों के पास जाकर उन से कहूं, कि तुम्हारे पितरोंके परमेश्वर ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है, और वे मुझ से पूछें, कि उसका क्या नाम है? मैं उनसे क्या कहूँ?”
ג:יד וַיֹּאמֶר אֱלֹהִים אֶל מֹשֶׁה אֶהְיֶה אֲשֶׁר אֶהְיֶה। וַיֹּאמֶר כֹּה תֹאמַר לִבְנֵי יִשְׂרָאֵל אֶהְיֶה שְׁלָחַנִי אֲלֵי֝।
3:14 और परमेश्वर ने मूसा से कहा, मैं जो हूं सो हूं। और उस ने कहा, इस्त्राएलियों से यों कहना, कि एह, मैं हूं ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है।
जब मूसा परमेश्वर से उसका नाम पूछता है, तो परमेश्वर सबसे पहले "मैं वही हूँ जो मैं हूँ" कहकर उत्तर देता है और यहाँ तक कि "उन्हें बताओ कि एह्ये (मैं-हूँ) अस्मि- ने तुम्हें भेजा है" कहकर उत्तर देता है। शब्द एहिह ("मैं हूं") बहुत कुछ (YHWH) की तरह लगता है, और इसका अर्थ शब्दों पर एक नाटक के रूप में है, यह समझाते हुए कि (YHWH) के नाम का अर्थ है "वह होगा" या "अस्तित्व"। [3] इस प्रकार, ईश्वर इस निहित व्युत्पत्ति का (चतुराक्षर) टेट्राग्रामेटन के साथ अनुसरण करता है:
ג:טו וַיֹּאמֶר עוֹד אֱלֹהִים אֶל מֹשֶׁה כֹּה תֹאמַר אֶל בְּנֵי יִשְׂרָאֵל יְ־הוָה אֱלֹהֵי אֲבֹתֵיכֶם אֱלֹהֵי אַבְרָהָם אֱלֹהֵי יִצְחָק וֵאלֹהֵי יַעֲקֹב שְׁלָחַנִי אֲלֵיכֶם זֶה שְּׁמִי לְעֹלָם וְזֶה זִכְרִי לְדֹר דֹּר.
3:15 फिर परमेश्वर ने मूसा से आगे कहा, इस्त्राएलियों से यों कहना, कि तुम्हारे पितरों का परमेश्वर, अर्यात् इब्राहीम का परमेश्वर, इसहाक का परमेश्वर, और याकूब का परमेश्वर यहोवा, उसी ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है। ' यह हमेशा के लिए मेरा नाम होगा, यह अनंत काल के लिए मेरा उपनाम होगा।
फिर भी, यह व्याख्या YHWH के मूल अर्थ को नहीं दर्शाती है। शब्द "वह है" इसके तीसरे अक्षर के रूप में एक वाव के साथ नहीं लिखा जाएगा, लेकिन एक योड के साथ , जैसा कि יהיה, जैसा कि "मैं हूं" शब्द אהיה है। दूसरा, ध्यान दें कि आयतें कितनी अजीब तरह से पढ़ी जाती हैं, यह शब्द (YHWH) पर अर्थ (एहहे )को लागू करने की कोशिश कर रही है। भगवान ने पहले मूसा को "एहयेह" नाम का उपयोग करने के लिए कहा, और फिर स्वयं को समझाए बिना, YHWH नाम का उपयोग करने के लिए कहा। [4] इस प्रकार, मैं तर्क दूंगा कि यहां स्पष्टीकरण एक लोकप्रिय व्युत्पत्ति है, और हमें इस नाम की व्युत्पत्ति के लिए कहीं और देखने की जरूरत है।
मूसा की मिद्यानी-मितानी (मितज्ञु) पृष्ठभूमि की कहानी-
नाम को समझने का पहला सुराग निर्गमन की पुस्तक में जलती हुई झाड़ी की कहानी के संदर्भ से मिलता है। मूसा द्वारा एक मिस्री को मारने और फिरौन से भाग जाने के बाद (2:12-15), वह मिद्यान में समाप्त होता है, जहाँ वह मिद्यान के याजक रूएल (या यित्रो) से मिलता है, और उसकी बेटी सिप्पोरा से विवाह करता है (2:15-22) अपने ससुर के झुंड की चरवाही करते हुए, वह जलती हुई झाड़ी को देखता है और परमेश्वर के अपने पहाड़ पर परमेश्वर से एक रहस्योद्घाटन प्राप्त करता है:
שמות ג:א וּמֹשֶׁה הָיָה רֹעֶה אֶת צֹאן יִתְרוֹ חֹתְנוֹ כֹּהֵן מִדְיָן וַיִּנְהַג אֶת הַצֹּאן אַחַר הַמִּדְבָּר וַיָּבֹא אֶל הַר הָאֱלֹהִים חֹרֵבָה.
निर्गमन 3:1 मूसा अपने ससुर यित्रो नाम मिद्यान के याजक की भेड़-बकरियां चराता या, और वह उनको जंगल में हांककर परमेश्वर के पर्वत (होरेब) तक ले गया।
यह प्रसंग बताता है कि परमेश्वर का पर्वत इस्राएल या मिस्र में नहीं है, बल्कि यह होरेब जंगल में है, जो मिद्यान से दूर नहीं है। मिद्यान कहाँ है और ऐतिहासिक रूप से हम इसके बारे में क्या जानते हैं ?
मिद्यान और उत्तरी अरब की कुरैय्या संस्कृति-
टॉलेमी द्वारा मिडियाना के रूप में वर्णित क्षेत्र को मानते हुए बाइबिल में मिडियन के समान क्षेत्र है, एक धारणा जिसे मिद्यान और इश्माएल के बीच बाइबिल के संबंध द्वारा समर्थित किया जा सकता है, हम स्वर्गीय कांस्य और इसकी भौतिक संस्कृति के बारे में काफी कुछ जान सकते हैं। प्रारंभिक लौह युग (13 वीं -12 वीं शताब्दी ईसा पूर्व ) ।
अर्ध-खानाबदोशों का एक समूह, जो शुतुरमुर्ग या अन्य पक्षियों की छवियों के साथ एक बहुत ही विशिष्ट, रंगीन और आकर्षक, सजाए गए मिट्टी के बर्तनों का उत्पादन करता था, कुरैय्याह के ओएसिस के रूप में जाने वाले क्षेत्र में टॉलेमी मिडियन कहे जाने वाले क्षेत्र के उत्तर-पूर्व में रहते थे। इस मिट्टी के बर्तनों की शैली को विद्वानों में कुरैय्या पेंटेड वेयर (QPW) के रूप में जाना जाता है।
कुरैय्या लोग धातु विज्ञान के विशेषज्ञ भी थे, विशेष रूप से तांबे को गलाने और कांस्य के उत्पादन में। कुरैय्या के क्षेत्र में स्वयं तांबे की नसें नहीं हैं, लेकिन ऐसी नसें अरब प्रायद्वीप में आगे दक्षिण में पाई जाती हैं, और तांबे के अयस्क को गलाने के लिए कुरैय्या के उत्तर में भेजा गया था क्योंकि कुरैय्याह (मिद्यानियों) के लोग धातु के काम में विशेषज्ञ थे। [5]
इस संस्कृति के उंगलियों के निशान के साक्ष्य इस अवधि में तांबे के गलाने के अन्य क्षेत्रों में भी पाए जाते हैं, विशेष रूप से दक्षिणी लेवेंट में फेनान और टिमना की साइटें (क्रमशः आधुनिक जॉर्डन और इज़राइल में)। [6] डेड-सी और अरावा साइंस सेंटर में काम करने वाले एक पुरातत्वविद् "उजी अवनेर" ने तर्क दिया है कि मिद्यानियों को विशेषज्ञों या ठेकेदारों के रूप में लाया गया था, जो स्थानीय खानाबदोश (शासु) जनजातियों या मिस्र के लोगों के साथ काम कर रहे थे, जिनकी उपस्थिति थी इस अवधि के दौरान यह क्षेत्र, अपने ग्राहकों (या नियोक्ताओं) के लिए अयस्क से शुद्ध तांबे का उत्पादन करता था। [7]
एक अरबी जनजाति
मिद्यानी एक प्रोटो-अरेबियन जनजाति थे; [8] उनका गृह आधार अरब में था और वे इश्माएलियों से संबंधित हैं। न्यायियों की पुस्तक इसे गिदोन की कहानी में स्पष्ट रूप से बताती है, जो मिद्यानियों को हराने के बाद इस्राएलियों से निम्नलिखित अनुरोध करता है:
שופטים ח:כד וַיֹּאמֶר אֲלֵהֶם גִּדְעוֹן אֶשְׁאֲלָה מִכֶּם שְׁאֵלָה וּתְנוּ לִי אִישׁ נֶזֶם שְׁלָלוֹ כִּי נִזְמֵי זָהָב לָהֶם כִּי יִשְׁמְעֵאלִים הֵם . ח:כה וַיֹּאמְרוּ נָתוֹן נִתֵּן וַיִּפְרְשׂוּ אֶת הַשִּׂמְלָה וַיַּשְׁלִיכוּ שָׁמָּה אִישׁ נֶזֶם שְׁלָלוֹ.
Judg 8:24 गिदोन ने उन से कहा, मुझे तुम से यह बिनती करनी है, कि तुम में से हर एक अपक्की अपक्की बाली मुझे दे। (उनके पास सोने की बालियाँ थीं, क्योंकि वे इश्माएली थे।) 8:25 "निश्चित रूप से!" उन्होंने उत्तर दिया। और उन्होंने कपड़ा बिछाकर उस पर अपनी लूट की बाली डाल दी।
ח:כו וַיְהִי מִשְׁקַל נִזְמֵי הַזָּהָב אֲשֶׁר שָׁאָל אֶלֶף וּשְׁבַע מֵאוֹת זָהָב לְבַד מִן הַשַּׂהֲרֹנִים וְהַנְּטִפוֹת וּבִגְדֵי הָאַרְגָּמָן שֶׁעַל מַלְכֵי מִדְיָן וּלְבַד מִן הָעֲנָקוֹת אֲשֶׁר בְּצַוְּארֵי גְמַלֵּיהֶם . ח:כז וַיַּעַשׂ אוֹתוֹ גִדְעוֹן לְאֵפוֹד…
8:26 जो सोने की बालियां उसने मांग ली थीं उनका वजन एक हजार सात सौ शेकेल सोना था। यह चाँद और झुमके और मिद्यान के राजाओं द्वारा पहने जाने वाले बैंजनी वस्त्रों और उनके ऊँटों के गले के हार के अलावा था । 8:27 गिदोन ने इस सोने का एक एपोद बनाया...
जब नामों की बात आती है तो हम मिद्यानियों और इश्माएलियों के बीच संबंध के प्रमाण भी देखते हैं। उदाहरण के लिए, मूसा के ससुर यित्रो या जेतेर (निर्गमन 4:17) का वही नाम है जो दाऊद के बहनोई (दाऊद की बहन अबीगैल का पति), यतेर इश्माएली (1 इतिहास 2:17) का है।
मसाला व्यापार
लौह युग के दौरान और बाद में, अरब जनजाति के रूप में मिद्यानियों, मसाला व्यापार का हिस्सा थे। वे अरब से यात्रा करेंगे और भूमध्यसागरीय तट और/या मिस्र के रास्ते में इज़राइल से गुजरेंगे। यह यूसुफ की बाइबिल की कहानी में परिलक्षित होता है, जिसमें मिद्यानियों और इश्माएली व्यापारियों का मसालों और दासों के साथ मिस्र जाने का वर्णन है:
בראשית לז:כה …וַיִּשְׂאוּ עֵינֵיהֶם וַיִּרְאוּ וְהִנֵּה אֹרְחַת יִשְׁמְעֵאלִים בָּאָה מִגִּלְעָד וּגְמַלֵּיהֶם נֹשְׂאִים נְכֹאת וּצְרִי וָלֹט הוֹלְכִים לְהוֹרִיד מִצְרָיְמָה… לז:כח וַיַּעַבְרוּ אֲנָשִׁים מִדְיָנִים סֹחֲרִים וַיִּמְשְׁכוּ וַיַּעֲלוּ אֶת יוֹסֵף מִן הַבּוֹר וַיִּמְכְּרוּ אֶת יוֹסֵף לַיִּשְׁמְעֵאלִים בְּעֶשְׂרִים כָּסֶף וַיָּבִיאוּ אֶת יוֹסֵף מִצְרָיְמָה.
उत्पत्ति 37 :25 …उन्होंने (यूसुफ के भाइयों) ने आंख उठाकर इश्माएलियों का एक दल गिलाद से ऊंटों पर गोंद, बलसान, और लदानम लादे हुए मिस्र को जाते देखा। 37:28 जब मिद्यान के सौदागर उधर से निकले, तब उन्होंने यूसुफ को गड़हे में से बाहर निकाला। उन्होंने यूसुफ को चान्दी के बीस सिक्कोंमें इश्माएलियोंके हाथ बेच डाला, और वे उसको मिस्र में ले आए। [9]
इस कहानी में, व्यापारी पहले उत्तर की ओर गए थे, शायद अरामियों के साथ व्यापार करने के लिए, और यिज्रेल घाटी के माध्यम से वाया मैरिस तक दक्षिण की ओर बढ़ रहे थे, जो उन्हें मिस्र में ले जाएगा। हालांकि कहानी दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में सेट की गई है , ऊंटों जैसी कालानुक्रमिक विशेषताओं से पता चलता है कि यह पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व में लिखा गया था ।
इन पूर्वी अरब जनजातियों और मसाला मार्ग के बीच मजबूत संबंध बाइबिल के नाम से परिलक्षित होता है (जनरल 25: 1-2) उनकी नामांकित मां, क़ेटुराह (קטורה) देता है, धूप के लिए हिब्रू शब्द से संबंधित एक नाम, क्यूटोरट (קטורת ) ).
संक्षेप में, मिद्यानियों धातु विज्ञान और मसाला व्यापार में शामिल एक अरब जनजाति थे, जिसका आधार अरब प्रायद्वीप के उत्तर-पूर्व में था, लेकिन जिनकी बस्ती की पहुंच बहुत व्यापक थी, दक्षिण-पश्चिम सिनाई प्रायद्वीप, दक्षिणी ट्रांसजॉर्डन में रहने वाले पॉकेट के साथ, और अरावाह (दक्षिण-पूर्वी नेगेव का रेगिस्तानी इलाका), शायद वहाँ तांबे की नसों के कारण।
शास्वे-लैंड YHWA
14 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के मिस्र के अभिलेखों के आधार पर , हम जानते हैं कि इन क्षेत्रों में रहने वाले केवल मिद्यानी लोग ही जातीय समूह नहीं थे। [10] अमुनहोटेप III के सोलेब न्युबियन मंदिर की भौगोलिक सूची में, अरावाह और दक्षिणी ट्रांसजॉर्डन के लोगों को शास्वे (या शासु) कहा जाता है, एक सामान्य शब्द जिसका अर्थ कुछ "खानाबदोश जनजाति" जैसा है।
शब्द शास्वे , š ꜣ स्व (
) [11] "भूमि" टी ꜣ (
) के लिए मिस्र के निर्धारक के बाद लिखा गया है, यह दर्शाता है कि मिस्री पाठ विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों का वर्णन कर रहा है जो विभिन्न शास्वे में बसे हुए हैं । सूचीबद्ध एक क्षेत्र को खानाबदोश-भूमि सेईर कहा जाता है, जो एदोम में माउंट सेईर क्षेत्र के समान है। सूची में निम्नलिखित नाम, और इस प्रकार सेईर के पास या सन्निहित, घुमंतू-भूमि येहवा, yhw ꜣ( w) (
) था। [12]इस नाम का उच्चारण अनिश्चित है, क्योंकि हिब्रू की तरह, चित्रलिपि में स्वर शामिल नहीं हैं, लेकिन यह शब्द इस्राएल के देवता, YHWH के नाम से संबंधित प्रतीत होता है, जिसका सटीक प्राचीन उच्चारण भी अज्ञात है।
एक देवता और एक भूमि
सूची में येहवा एक भूमि का नाम है। जैसे एक खानाबदोश समूह सेईर नामक भूमि में रहता था, दूसरा येहवा नामक भूमि में रहता था। लेकिन प्राचीन काल में, एक नाम कभी-कभी एक उपनाम और एक उपनाम दोनों हो सकता था। असीरिया (असुर) नाम इसे स्पष्ट रूप से दिखाता है: यह अश्शूर के मुख्य देवता और उनके प्राचीन राजधानी शहर दोनों का नाम है। कालांतर में यह उनके साम्राज्य का नाम भी हो गया। एक अन्य उदाहरण ज्ञान की ग्रीक देवी एथेना होगी, जो एथेंस की संरक्षक देवी के रूप में शुरू हुई थी। [13]
YHWH एदोमी दक्षिण से आता है
बाइबिल के प्रमाण बताते हैं कि (YHWH) दक्षिण-पूर्व से आता है, या तो एदोम की पहाड़ियों से या उससे भी आगे दक्षिण में मिद्यान या उससे आगे। यह विशेष रूप से बाइबल की तीन अति प्राचीन कविताओं में स्पष्ट है:
मूसा का गीत (व्यव. 33:2)
יְ־הוָה מִסִּינַי בָּא וְזָרַח מִשֵּׂעִיר לָמוֹ הוֹפִיעַ מֵהַר פָּארָן וְאָתָה מֵרִבְבֹת קֹדֶשׁ…
यहोवा सीनै (सिनाई पर्वत) से आया; उसने सेईर से उन पर अपना तेज चमकाया; वह पारान पर्वत से प्रकट हुआ, और रिबेबोत-कोडेश से आया ...
दबोरा का गीत (न्यायियों 5:4)
יְ־הוָה בְּצֵאתְךָ מִשֵּׂעִיר בְּצַעְדְּךָ מִשְּׂדֵה אֵּׂ֩עִיר אֶרָץ
हे यहोवा, जब तू सेईर से निकला, और एदोम देश से निकला, तब पृथ्वी कांप उठी...
हबक्कूक का गीत (हबक्कूक 3:3)
אֱלוֹהַ מִתֵּימָן יָבוֹא וְקָדוֹשׁ מֵהַר פָּארָן סֶלָה…
परमेश्वर तेमान से आ रहा है, पवित्र परमेश्वर पारान पर्वत से आ रहा है। सेला…।
इनमें से प्रत्येक कविता दक्षिण में अपने घर से आने वाले YHWH की छवि के साथ शुरू होती है। वास्तव में, हबक्कूक का गीत (पद. 7) यह भी वर्णन करता है कि कैसे मिद्यानियों के तंबू (יְרִיעוֹת אֶרֶץ מִדְיָן) हिलते हैं जब यहोवा अपने लोगों के रास्ते में उनके पास जमीन पर पैर रखता है।
भगवान का पहाड़
यह अवधारणा मूसा और जलती हुई झाड़ी की कहानी के साथ सही बैठती है, जहाँ मूसा अपने मिद्यानियों के ससुर के झुंडों को चराते हुए परमेश्वर के पर्वत पर जाता है। मूसा मिद्यानियों के इलाके में भटक रहा है, हालांकि अरब में नहीं, बल्कि आधुनिक समय के पेट्रा, बाइबिल के कादेश (अरामाईक में रिकेम) के आसपास के क्षेत्र में, जहां हमारे पास एदोम से दूर नहीं रहने वाले एक कुरैया-संस्कृति समूह का प्रमाण है।
एक अरबी नाम
यदि YHWH की उत्पत्ति मिद्यानियों के बीच येहवा की खानाबदोश भूमि में है, तो नाम का अर्थ हिब्रू भाषा परिवार के बजाय अरबी भाषा परिवार से होना चाहिए। यह आगे ה.ו.י, "होना" से टेट्राग्रामेटन के निर्गमन 3 में व्युत्पत्ति पर सवाल उठाता है, क्योंकि हिब्रू और अरामी के विपरीत, प्रोटो-अरबी में "टू" शब्द के लिए रूट ה.ו.י नहीं है। होना।" [15]
ईर्ष्यालु भगवान
1956 में, शेलोमो डोव गोइटिन (1900-1985), यहूदी और अरबी दोनों अध्ययनों के एक विद्वान, [16] ने सुझाव दिया कि यह नाम अरबी मूल hwy (هوى), और शब्द हवा ( هوايا ) से लिया गया है, जिसका अर्थ है "प्रेम , स्नेह, जुनून, इच्छा। [17] उन्होंने इस सुझाव को निर्गमन 34 के अनुच्छेद के साथ जोड़ा, जो विद्वानों द्वारा धार्मिक अनुष्ठान के रूप में जाने जाने वाले कानूनों के एक समूह में है। कानूनों में से एक, जो इज़राइल को अन्य देवताओं की पूजा करने से मना करता है, पढ़ता है:
שמ לד לד
निर्गमन 34:14 क्योंकि तुम्हें किसी दूसरे देवता को दण्डवत् नहीं करना चाहिए, क्योंकि यहोवा जिसका नाम भावशून्य है, वह भावहीन परमेश्वर है।
गोइटिन का सुझाव है कि "यहवह जिसका नाम भावुक है" देवता के व्यक्तिगत नाम YHWH को संदर्भित करता है, जिसका अर्थ है "भावुक व्यक्ति", और यह नाम जुनून के लिए उस (प्रोटो) अरबी शब्द से निकला है। यह इस विचार को दर्शाता है कि अपने उपासकों के साथ YHWH का बंधन भावुक प्रेम में से एक है, और यदि उपासक अन्य देवताओं की पूजा करके "धोखा" देते हैं तो YHWH परेशान हो जाते हैं।
दूसरे शब्दों में, उपासकों का YHWH के साथ संबंध अनन्य होना चाहिए। इसके अलावा, गोइटिन के अनुसार, YHWH द्वारा मांगी गई यह विशिष्टता खानाबदोश, अरब जनजातियों के बीच एक देवता के रूप में उनकी उपस्थिति पर वापस जाती है।
मोनोलैट्री तौहीद-एकेश्वरवाद
विद्वान एक ईश्वर की ऐसी विशिष्ट पूजा को "मोनोलाट्री" कहते हैं। जबकि एकेश्वरवाद का दावा है कि कोई अन्य देवताओं का अस्तित्व नहीं है, एकेश्वरवाद अन्य देवताओं के अस्तित्व की अनुमति देते हुए, एक ईश्वर के प्रति वफादारी और अनन्य संबंध मानता है। वास्तव में, बाइबल के कई अनुच्छेद जिन्हें हम आजकल एकेश्वरवादी के रूप में पढ़ते हैं, वास्तव में एकपक्षी हैं। एक उत्कृष्ट उदाहरण स्वयं डिकोलॉग में है:
דברים ה:ז-ט לֹא יִהְיֶה לְךָ אֱלֹהִים אֲחֵרִים עַל פָּנָיַ… ה:ט לֹא תִשְׁתַּחְוֶה לָהֶם וְלֹא תָעָבְדֵם כִּי אָנֹכִי יְ־הוָה אֱלֹהֶיךָ אֵל קַנָּא….
Deut 5:7 मेरे सिवाय तेरा कोई और देवता न हो... 5:9 तू उनको दण्डवत् न करना, और न उनकी उपासना करना। क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर याहवेह भावशून्य परमेश्वर हूं...
पाठ यह नहीं कहता है कि कोई अन्य देवता मौजूद नहीं है, केवल यह है कि उन्हें YHWH के अलावा किसी दूसरे की पूजा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि YHWH एक भावुक भगवान है जो स्वाभाविक रूप से इस तरह के व्यवहार से ईर्ष्या और उत्तेजित हो जाएगा। YHWH का अपने अनुयायियों के साथ संबंध एक पति की तरह एक पत्नी के साथ है; वह अपने उपासकों से प्यार करता है लेकिन किसी भी "आस-पास पूजा करने" से खतरनाक रूप से ईर्ष्या करता है। जैसे नीतिवचन की पुस्तक पतियों के बारे में कहती है:
משלי ו:לד כִּי קִנְאָה חֲמַת גָּבֶר וְלֹא יַחְמוֹל בְּיוֹם נָקָם।
नीतिवचन 6:34 पति का कोप भड़क उठेगा; वह अपने प्रतिशोध के दिन पर कोई दया नहीं करेगा।
YHWH अपने लोगों के लिए एक ऐसा ही भावपूर्ण पति है और अगर उसके लोग बेवफा हैं तो वह उतना ही तामसिक है।
भंजन
अनन्य होने के अलावा, YHWH पूजा अप्रतिष्ठित थी, यानी इसमें देवता की छवियां शामिल नहीं थीं। यह 12 वीं -11 वीं शताब्दी (लौह युग I, बाइबिल के अनुसार, न्यायाधीशों की अवधि) की इस्राएलियों की बस्तियों में मानव छवियों की अनुपस्थिति से स्पष्ट है। [18] इसके अलावा, YHWH के अनुयायी स्पष्ट रूप से मूर्तिभंजक थे, और वे अन्य देवताओं की छवियों को नष्ट कर देंगे। हम इसे 13 वीं शताब्दी के अंत में हज़ोर पर इस्राएल की विजय में देख सकते हैं , जहाँ हम पाते हैं कि विजेताओं ने व्यवस्थित रूप से सभी धार्मिक मूर्तियों और छवियों को नष्ट कर दिया। [19]
इकोनोक्लासम ने कुरैय्याह संस्कृति (मिद्यानियों) की भी विशेषता बताई, जैसा कि तिम्ना में खुदाई से देखा गया है। मिस्रवासियों ने तिमना में देवी "हाथोर" अशेरा- के लिए एक छोटा सा मंदिर बनाया, जिसकी खुदाई "तेलअवीव" विश्वविद्यालय और लंदन के पुरातत्वविद्, बेनो रोथेनबर्ग (1914-2012) द्वारा की गई थी। उसी समय, मिद्यानियों का अपना स्वयं का पूजा स्थल था, जिसमें एक तंबू में खंभे (מצבות) का संग्रह था। (क्षेत्र की अत्यधिक शुष्कता के कारण, तंबू के टुकड़े बच गए और उत्खननकर्ताओं द्वारा खोजे गए।)
मिस्र के हैथोर मंदिर के विपरीत, मिद्यानियों के पूजा क्षेत्र में कोई चित्र नहीं था, चाहे वे चित्रित हों या खुदी हुई हों, जो उनके एकोनिज़्म को दर्शाता है। जब मिस्रियों ने इस क्षेत्र को छोड़ दिया, तो मिद्यानियों ने हाथोर मंदिर सहित पूरे क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। ऐसा करने में, उन्होंने शैल चित्रों से हाथोर के चेहरे को मिटाकर क्षेत्र को धार्मिक रूप से स्वीकार्य बना दिया और इन चट्टानों को अपने क्षेत्र में एक अन्य स्तंभ के रूप में पुन: उपयोग किया। रोथेनबर्ग के तर्क की उजी अवनर द्वारा हाल ही में की गई खुदाई से पुष्टि हुई थी। [20] यह मूर्ति भंजन एक अन्य संबंधित समूह, केनाइट्स (परिशिष्ट देखें) में भी परिलक्षित होता है।
YHWH, मिद्यान और मूसा के बारे में प्रामाणिक परम्परा-
एक मिद्यानी महिला से मूसा के विवाह की परंपरा में प्रामाणिकता की छाप है: इस्राएली अपने प्राथमिक धार्मिक नेता के एक गैर-इस्राएली महिला से विवाह के बारे में एक कहानी क्यों गढ़ेंगे ?
अधिक समस्यात्मक रूप से, मूसा न केवल अपनी पत्नी को मिद्यानियों के बीच पाता है, बल्कि वहाँ अपने परमेश्वर को भी पाता है। जैसा कि मैंने अन्य संदर्भों में तर्क दिया है, जैसे कि मेरा, "होवव द मिद्यानी: कहानी का अंत क्यों कट गया? ( TheTorah , 2016), “बाइबिल के ग्रंथ इसे नरम करने या यहां तक कि छिपाने की कोशिश करते हैं, लेकिन मूसा-इन-मिडियन परंपरा की पूरी ताकत वह है जो मिद्यानी/प्रोटो-अरेबियन देवता YHWH के उद्भव की व्याख्या करती है- एक भावुक देवता की अपेक्षा अनन्य प्रेम—इस्राएल के ईश्वर के रूप में।
अनुबंध
एनीकोनिक केनाइट्स: एक अन्य मिद्यानी-जैसी याहविस्टिक जनजाति
मिद्यानियों के एकोनिज़्म के लिए एक और सबूत केनियों से आता है। मिद्यानियों और केनियों के बीच संबंध स्पष्ट नहीं है, लेकिन बाइबिल का पाठ कभी-कभी दोनों को मिलाता है, क्योंकि मूसा के ससुर को कभी-कभी एक और कभी-कभी दूसरे के रूप में वर्णित किया जाता है। [21]
न्यायियों 1:16 में, हमें बताया गया है कि अरद घाटी में केनियों का बसेरा था, और विद्वानों ने लंबे समय से सुझाव दिया है कि होर्वत उज़ा शहर बाइबिल कीना है, क्योंकि इसके आसपास की धारा को वादी-एल-केनी कहा जाता है, अर्थात, केनाइट स्ट्रीम। आयरन II (राजशाही काल) शहर की खुदाई से पता चलता है कि पड़ोसी (इज़राइली!) शहरों में लोगों की छोटी नक्काशी थी, होर्वत उज़ा में कोई नहीं था। तेल अवीव विश्वविद्यालय के बाइबिल काल के एक इतिहासकार नादव नामान ने सुझाव दिया कि ऐसा इसलिए था क्योंकि केनाइट्स विशेष रूप से उनकी प्राचीन, अलौकिक परंपरा से जुड़े थे। [22]
इसी तरह, बाद की अवधि के एक केनाइट व्यक्ति, यहोनादाब बेन रेकाब (1 इतिहास 2:55), [23] को जेहू के बाल-विरोधी आंदोलन में शामिल होने के रूप में वर्णित किया गया है (2 किग्रा 10:15-16)। यिर्मयाह में हम सुनते हैं कि यह समूह—रेकाबियों, एक केनी उपकुल—एक खानाबदोश तंबू में रहने वाला जीवन व्यतीत करता था, बिना घर बनाए या खेत लगाए, और शराब की खपत से परहेज करता था। यह जीवन शैली उस चीज़ की याद दिलाती है जिसे हम बाद के समय में एक अन्य अरबी जनजाति, नबातियन के साथ देखते हैं, जो कि अप्रतिष्ठित भी थे। [24]
भले ही मिद्यानियों, केनियों और रेकाबियों के बीच सटीक संबंध धुंधला बना रहे - सिवाय इसके कि बाद के दो छोटे समूह इस्राएल का हिस्सा बन गए और पहले के बड़े समूह नहीं बने - ये सभी समूह एक अलौकिक, (YHWH) पूजा करने वाली परंपरा का हिस्सा थे, जो कि था प्रारंभिक काल में इस्राएलियों द्वारा अपनाया और पुन: आकार दिया गया।
✍️ योगेश रोहि जी द्वारा यह भाग लिखा गया है
यादवों अर्थात् गोपों की उत्पत्ति को अच्छी तरह से समझने के लिए इसे दो भागों तथा चार उपभागों में विभाजित करके प्रमाण सहित बताया गया है की गोप अथवा यादवों की उत्पत्ति सर्वप्रथम गोलोक में तथा उसके बाद भू-लोक में कब और कैसे हुई है। जिसमें आप यह भी जान पाएंगे की गोप और यादव कैसे एक ही होते हैं। इन समस्त जानकारियों के लिए निम्नलिखित पौराणिक और ऐतिहासिक साक्ष्य प्रस्तुत हैं -
(क)- पौराणिक साक्ष्य
(1)- गोलोक में यादवों की उत्पत्ति
(2)- भू-लोक में यादवों की उत्पत्ति
(क)- पौराणिक साक्ष्य -
(1)- गोलोक में यादवों की उत्पत्ति
यदि गोपों अर्थात् यादवों की उत्पत्ति के पौराणिक संदर्भों को देखा जाए तो वेदों से लेकर लगभग प्रत्येक पुराणों में गोलोक में इनकी प्रथम उत्पत्ति के संदर्भ मिलते हैं। जैसे- ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय-(5) के श्लोक संख्या- २५, ४० और ४२ में बहुत ही स्पष्ट रूप से लिखा गया है-
"आविर्बभूव कन्यैका कृष्णस्य वामपार्श्वतः।
धावित्वा पुष्पमानीय ददावर्घ्यं प्रभोः पदे।२५।
तस्या राधायाश्च लोमकूपेभ्यः सद्योगोपाङ्गनागणः।
आविर्बभूव रूपेण वेशेनैव च तत्समः।४०।
कृष्णस्य लोमकूपेभ्यः सद्यो गोपगणो मुने।
आविर्बभूव रूपेण वेषेणैव च तत्समः।४२।
अनुवाद -
गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण के वाम-पार्श्व से वामा के रूप में एक कामनाओं की प्रतिमूर्ति- प्रकृति रूपा कन्या उत्पन्न हुई जो कृष्ण के ही समान किशोर-वय थी।२५।
• फिर तो उस किशोरी अर्थात् श्रीराधा के रोमकूपों से तत्काल ही अनेक गोपांगनाओं की उत्पत्ति हुई; जो रूप और वेष में राधा के ही समान थीं। ४०।
• उसी क्षण श्रीकृष्ण के रोमकूपों से भी अनेक गोप-गणों का आविर्भाव हुआ जो रूप और वेष रचना में श्रीकृष्ण के ही समान थे।४२।
इसी प्रकार से गोपों की उत्पत्ति के बारे में श्रीमद्देवी भागवत पुराण के नवम् स्कन्ध अध्याय-(२) के श्लोक- ६०-६१ में लिखा गया है कि -
अथगोलोकनाथस्य लोमनां विवरतो मुने।
भूताश्चासंख्यगोपाश्च वयसा तेजसा समाः।। ६०
रुपेण च गुणेनैव बलेन विक्रमेण च।
प्राणतुल्यप्रियाः सर्वे भभूवः पार्षदा विभोः।। ६१
अनुवाद- ६०-६१
हे मुने ! गोलोकनाथ श्रीकृष्ण के रोमकूपों (कोशिकाओं) से असंख्य गोपगण प्रकट हुए, जो वय, तेज, रुप, गुण, बल तथा पराक्रम में उन्हीं के समान थे। वे सभी परमेश्वर श्रीकृष्ण के प्राणों के समान प्रिय पार्षद बन गये।
✳️ ज्ञात हो कि- गोप और गोपियाँ श्रीकृष्ण और श्रीराधा के समरूप इसलिए थे, क्योंकि इनकी उत्पत्ति श्रीकृष्ण और श्रीराधा की सूक्ष्मतम इकाई (कोशिका) अर्थात उनके क्लोन से हुई हैं। इसलिए सभी गोप श्रीकृष्ण के समरूप तथा सभी गोपियों श्रीराधा के समरूप उत्पन्न हुईं।
इस बात को आज विज्ञान भी स्वीकारता है कि- समरूपण अर्थात क्लोनिंग विधि से उत्पन्न जीव उसी के समरूप होता है, जिससे उसकी क्लोनिंग की गई होती है।
और विज्ञान के इस समरूपण सिद्धान्त से परमेश्वर श्रीकृष्ण और श्रीराधा ने पूर्व काल में ही अपनी सूक्ष्मतम इकाइयों से समरूपण विधि द्वारा गोलोक में गोप-गोपियों की उत्पत्ति कीं थीं।
विशेष-क्लोन (Clone) और क्लोनिंग विधि (Cloning Method) का तात्पर्य किसी जीव, कोशिका या डीएनए (DNA) की आनुवंशिक रूप से बिल्कुल समान प्रतिलिपि (replica) या प्रति तैयार करना है। यह एक अलैंगिक (asexual) प्रजनन प्रक्रिया है, जिसमें केवल एक ही जनक (parent) की आनुवंशिक जानकारी का उपयोग होता है
इस प्रकार से सिद्ध होता है कि गोपों की उत्पत्ति भगवान श्रीकृष्ण से तथा गोपियों की उत्पत्ति श्रीराधा से हुई है। इस बात को प्रमुख देवों सहित परमात्मा श्रीकृष्ण ने भी स्वीकार किया है। जैसे- गोप और गोपियों की उत्पत्ति के बारे में भगवान शिव ने पूर्व काल में पार्वती को भी ऐसा ही दृष्टान्त सुनाया था। जिसे शिव-वाणी समझ कर इस घटना को पुराणों में सार्वकालिक और सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया गया। जिसका वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृतिखण्ड के अध्याय-(४८) के श्लोक संख्या- (४३) में मिलता है। जिसमें शिवजी पार्वती से कहते हैं-
"बभूव गोपीसंघश्च राधाया लोमकूपतः।श्रीकृष्णलोमकूपेभ्यो बभूवुः सर्वबल्लवाः।।४३।
अनुवाद -• श्रीराधा के रोमकूपों से गोपियों का समुदाय प्रकट हुआ है, तथा श्रीकृष्ण के रोमकूपों से सम्पूर्ण गोपों (आभीरों) का प्रादुर्भाव हुआ है।
▪️इस प्रकार से देखा जाए तो शिव जी के कथन से भी यह सिद्ध होता है कि गोप और गोपियों की उत्पत्ति भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराधा के रोम कूपों से प्रारम्भिक रूप से गोलोक में ही हुई है।
▪️इसी तरह से गोप-गोपियों की उत्पत्ति को लेकर परम प्रभु परमात्मा श्रीकृष्ण की वे सभी बातें और प्रमाणित कर देती है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अपने अँश से उत्पन्न गोपों की उत्पत्ति के विषय में स्वयं ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृति खण्ड के अध्याय -(३६) के श्लोक संख्या -(६२) में राधा जी से कहते हैं-
"गोपाङ्गनास्तव कला अत एव मम प्रियाः।
मल्लोमकूपजा गोपाः सर्वे गोलोकवासिनः। ६२।
अनुवाद:- हे राधे ! समस्त गोपियाँ तुम्हारी कलाऐं हैं। और सभी गोलोक वासी गोप मेरे रोमकूपों से उत्पन्न मेरी ही कलाऐं तथा अंश हैं।६२।
और ऐसी ही बात भगवान श्रीकृष्ण उस समय भी कहते हैं- जब वे स्वयं भूतल पर गोप जाति के यदुवंश के अन्तर्गत वृष्णि कुल में अवतरित होते हैं।, और कुछ समय पश्चात कंस का वध करके मथुरा के सिंहासन पर पुन: कंस के पिता उग्रसेन को अभिषिक्त करते हैं। और इसके कुछ समय पश्चात उग्रसेन भगवान श्रीकृष्ण से राजसूय यज्ञ के आयोजन का परामर्श करते हैं।। उसी प्रसंग के क्रम में स्वयं श्रीकृष्ण उग्रसेन से कहते हैं कि- "सभी यादव मेरे अंश हैं"। श्रीकृष्ण के इस कथन की पुष्टि गर्गसंहिता के विश्वजितखण्ड के अध्याय (२) के श्लोक संख्या- (५-६ और- ७) से होती है, जिसमें लिखा गया है कि-
"सम्यग्व्यवसितं राजन् भवता यादवेश्वर।
यज्ञेन ते जगत्कीर्तिस्त्रिलोक्यां सम्भविष्यति॥५॥
आहूय यादवान्साक्षात्सभां कृत्वथ सर्वतः।
ताम्बूलबीटिकां धृत्वा प्रतिज्ञां कारय प्रभो ॥६॥
ममांशा यादवाः सर्वे लोकद्वयजिगीषवः॥ जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम्॥७॥
अनुवाद:- (५,६,७)- तब श्रीकृष्ण ने कहा- राजन् ! यादवेश्वर ! आपने बड़ा उत्तम निश्चय किया है। उस यज्ञ से आपकी कीर्ति तीनों लोकों में फैल जायगी।
• प्रभो ! सभा में समस्त यादवों को सब ओर से बुलाकर पान का बीड़ा रख दीजिये और प्रतिज्ञा करवाईये कि-
• समस्त यादव मेरे ही अंश से प्रकट हुए हैं, और वे लोक,परलोक दोनों को जीतने की इच्छा रखने वाले हैं। वे दिग्विजय के लिये यात्रा करके, शत्रुओं को जीतकर लौट आयेंगे और सम्पूर्ण दिशाओं से आपके लिये भेंट और उपहार लायेंगे।
▪️ इसके अतिरिक्त गोपों की उत्पत्ति के विषय में कुछ ऐसा ही वर्णन उस समय भी मिलता है, जब समस्त यादव विश्वजीत युद्ध के लिए भूमण्डल पर चारों दिशाओं में निकल पड़े, तब उस समय दन्तवक्र नाम के एक दुष्ट राजा से यादवों का भयानक युद्ध हुआ। उसी समय श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न ने गर्गसंहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय-( 11 ) के श्लोक संख्या-(२१ और २२) में दन्तवक्र को यादवों का परिचय देते हुए कहा-
"नन्दो द्रोणो वसुः साक्षाज्जातो गोपकुलेऽपि सः। गोपाला ये च गोलोके कृष्णरोम समुद्भवाः।२१।
"राधारोमोद्भवा गोप्यस्ताश्च सर्वा इहागताः।
काश्चित्पुण्यैः कृतैः पूर्वैः प्राप्ताः कृष्णं वरैः परै:।२२।
अनुवाद (२१-२२)- नन्दराज साक्षात् द्रोण नामक वसु हैं, जो गोपकुल में अवतीर्ण हुए हैं। और गोलोक में जो गोपालगण (आभीर) हैं, वे साक्षात श्रीकृष्ण के रोम से प्रकट हुए हैं, और गोपियों श्री राधा के रोम से उत्पन्न हुई हैं। वे सब की सब यहाँ व्रज में उतर आई हैं। उनमें से कुछ ऐसी भी गोपांगनाऐं हैं जो पूर्व-काल में पूण्यकर्मों तथा उत्तम वरों के प्रभाव से श्रीकृष्ण को प्राप्त हुईं हैं।
भगवान श्रीकृष्ण के एक हजार नामों में एक नाम "गोपकृत"
भी है जिसका अर्थ है- नूतन गोपों का निर्माण करने वाला।इसकी पुष्टि- गर्गसंहिता के अश्वमेधखण्ड के अध्याय -(५९) के श्लोक- (३०) से होती है।
वने वत्सचारी महावत्सहारी
बकारिः सुरैः पूजितोऽघारिनामा ।
वने वत्सकृद्गोपकृद्गोपवेषः*
कदा ब्रह्मणा संस्तुतः पद्मनाभः ॥ ३०
गोपकृत - अर्थात् = नूतन गोपों का निर्माण करने वाला।
गोपवेशः - अर्थात् = सर्वदा गोप (अहीर) वेश में रहने वाला
▪️इस प्रकार से इन अनेक पौराणिक साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि सर्वप्रथम गोलोक में परमेश्वर श्रीकृष्ण और श्रीराधा के रोम कूपों से ही गोप और गोपियों की उत्पत्ति हुई है जिन्हें भू-तल पर यादव, अहीर, घोष, गोप, और गोपाला इत्यादि नामों से भी जाना जाता है।
किन्तु सवाल यह है कि क्या गोलोक के गोप और गोपियाँ ही
भू-लोक की गोप- गोपियाँ हैं या कोई और? इस प्रश्न का समाधान प्रमाण सहित भाग- (दो) में बताया गया है।
(2)- भू-लोक में यादवों की उत्पत्ति
(2)- भू-लोक में यादवों की उत्पत्ति
कुछ लोगों को यह संशय हो सकता है कि गोलोक की गोप- गोपियाँ भू-लोक की नहीं हो सकतीं। किन्तु ऐसी बात नहीं है, गोलोक की ही गोप-गोपियाँ भू-लोक की भी हैं। और ये गोलोक से भू-लोक पर एक निश्चित प्रयोजन के तहत् भगवान श्रीकृष्ण के साथ ही समयं समयं पर भू-लोक पर आती हैं। यह ध्रुव सत्य है। इसकी पुष्टि- ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्मखण्ड के अध्याय-(६) में उस समय होती है जब देवों के निवेदन पर गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने समस्त गोप-गोपियों को बुलाकर कहते हैं-
जनुर्लभत गोपाश्च गोप्यश्च पृथिवीतले।।
गोपानामुत्तमानां च मन्दिरे मन्दिरे शुभे।६९।।
अनुवाद - भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- गोप और गोपियों ! तुम सब भूतल पर श्रेष्ठ गोपों के शुभ घर-घर में जन्म लो ।
तब श्रीकृष्ण का आदेश पाकर सभी गोप-गोपियाँ भूतल पर श्रेष्ठ गोपों के शुभ-शुभ घरों में अवतरित हुए। उनको भूतल पर अवतरित होने की पुष्टि- उस समय भी होती है, जब समस्त यादव विश्वजीत युद्ध के लिए भू-तल पर चारों दिशाओं में निकल पड़े, तब उस समय दन्तवक्र नाम के एक दुष्ट राजा से यादवों का भयानक युद्ध हुआ। उसी समय श्री कृष्ण पुत्र प्रद्युम्न ने गर्गसंहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय-(११ ) के श्लोक संख्या-(२१ और २२) में दन्तवक्र को यादवों का परिचय देते हुए कहते हैं-
"नन्दो द्रोणो वसुः साक्षाज्जातो गोपकुलेऽपि सः।
गोपाला ये च गोलोके कृष्णरोम समुद्भवाः।२१।
"राधारोमोद्भवा गोप्यस्ताश्च सर्वा इहागताः।
काश्चित्पुण्यैः कृतैः पूर्वैः प्राप्ताः कृष्णं वरैः परै:।२२।
अनुवाद-नन्दराज साक्षात् द्रोण नामक वसु हैं जो गोकुल में अवतीर्ण हुए हैं। और गोलोक के गोपालगण (आभीर) जो साक्षात श्रीकृष्ण के रोम से प्रकट हुए हैं, और गोपियाँ जो श्रीराधा के रोमकूप से उत्पन्न हुई हैं। वे सब की सब यहाँ (भूतल के ) व्रज में उतर आईं हैं। उनमें से कुछ ऐसी भी गोपांगनाऐं हैं जो पूर्व-काल में पूण्यकर्मों तथा उत्तम वरों के प्रभाव से श्रीकृष्ण को प्राप्त हुईं हैं।२१-२२।
इसी तरह से समस्त गोलोकवासी गोप जो कभी श्रीकृष्ण के अंश से गोलोक में उत्पन्न हुए थे उन सभी को भू-तल पर गोपकुल के यादव वंश में भगवान श्रीकृष्ण के ही अंश रूप में अवतरित या जन्म लेने की पुष्टि- गर्गसंहिता के विश्वजित्खण्ड के अध्याय (२) के श्लोक- ७ से होती है, जिसमें भगवान श्री कृष्ण यादवों के विश्वजीत युद्ध होने से पहले उग्रसेन से कहते हैं-
ममांशा यादवाः सर्वे लोकद्वयजिगीषवः।
जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम्॥७॥
अनुवाद:- समस्त यादव मेरे ही अँश से प्रकट हुए हैं, और वे लोक,परलोक दोनों को जीतने की इच्छा रखने वाले हैं। वे दिग्विजय के लिये यात्रा करके, शत्रुओं को जीतकर लौट आयेंगे और सम्पूर्ण दिशाओं से आपके लिये भेंट और उपहार लायेंगे।७।
इसी तरह से गोप और गोपियों को गोलोक से भूतल पर आने की पुष्टि- गर्गसंहिता के गोलोकखण्ड के अध्याय- १५ के श्लोक-६३ से भी होती है। जिसमें लिखा गया है-
यूयं सर्वेऽपि गोपाला गोलोकादागता भुवि ।
तथा गोपीगणा गोपा गोलोके राधिकेच्छया॥ ६३॥
अनुवाद :-आप समस्त गोप तथा गोपियाँ इस भूतल पर गोलोक से आये हुए हो। यह सब राधा जी की ही इच्छा थी।६३।
ठीक इसी तरह की बात गर्गसंहिता के गिरिराजखण्ड के अध्याय- ५ के श्लोक संख्या- ३७ में भी लिखी गई कि-
यूयं सर्वेऽपि गोपाला गोलोकादागता भुवि ।
तथा गोपीगणा गावो गोकुले राधिकेच्छया॥ ३७॥
अनुवाद :-आप समस्त गोपगण इस भूतल पर गोलोक से आये हो। इसी तरह से गोपियाँ और गौएँ भी श्रीराधा की इच्छा से ही गोकुल में आयी हैं।३७।
अतः उपर्युक्त श्लोकों से स्पष्ट होता है कि गोलोक की समस्त गोप तथा गोपियाँ भगवान श्रीकृष्ण के आदेश पर उनके साथ ही गोलोक से भू-लोक पर अवतरित हुए हैं।
इस प्रकार से आप लोगों ने गोप यानी यादवों की उत्पत्ति के पौराणिक सन्दर्भों को जाना। अब आप लोग यादवों के ऐतिहासिक सन्दर्भों में यानी इनको इतिहास के पन्नों में जान पाएंगे कि इनका वर्णन कब और कैसे किया गया है। इनके ऐतिहासिक सन्दर्भों को अध्याय (7) के भाग (ख) के शीर्षक (ऐतिहासिक यादव राजा) में विस्तार पूर्वक बताया गया है, वहाँ से इनके ऐतिहासिक सन्दर्भों को पाठक गण जानकारी ले सकते हैं।
इस प्रकार से यह अध्याय यादवों की उत्पत्ति के साथ समाप्त हुआ। अब इसके अगले अध्याय (3) में यादवों की प्रमुख जाती अहीर की उत्पत्ति के बारे में जानकारी दी गई है।
🫵
अध्याय(3)-
यादवों की मुख्य जाती
जातियों की उत्पत्ति या कहें निर्धारण मनुष्य के एक ही तरह के रक्त सम्बन्धी आनुवांशिक प्रवृत्तियों से होता है। जिसमें प्रवृत्तियाँ व्यक्ति की जन्मजात (Genetic) होती हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी उनके जाति समूहों में संचारित होती रहती है। इसी जन्मजात प्रवृत्तियों के अनुरुप ही व्यक्ति का स्वभाव और गुण बनता है, जो उस जाति समूह को उसी अनुरूप कार्य करने को प्रेरित करता है। और इसी गुण विशेष के आधार पर मनुष्य जातियों में एक विशेष जाति का उत्पत्ति होती है। इसी जन्मजात प्रवृत्तियों के कारण समाज में अलग-अलग जातियों के भिन्न-भिन्न स्वभाव और गुण देखें जातें हैं।
इसको इस तरह से भी समझा जा सकता है कि जाति व्यक्ति समूहों की प्रवृत्ति मूलक पहचान है जो मनुष्य समूहों में अलग-अलग देखी जाती है। जैसे वणिक समाज का वर्ण "वैश्य" है जिनका वृत्ति (व्यवसाय) खरीद-फरोख्त करना है। और उसी अनुसार उनकी स्वभावगत गहराई- लोलुपता और मितव्यता है। यही उनकी जातिगत और वर्णगत पहचान है।
कोई भी जाती अपने समूह की सबसे बड़ी इकाई होती है। और यह ऐसे ही नहीं बनती है। इसके लिए जाती को छोटी-छोटी इकाईयों के विकास क्रमों से गुजरना होता है। जैसे -
किसी भी जाती की सबसे छोटी इकाई व्यक्ति होता है, फिर कई व्यक्तियों के मिलने से एक परिवार बनता है, और कई परिवारों के मिलने से अनेक कुलों या गोत्रों का निर्माण होता है। पुनः कई कुलों के संयोग से उस जाती का एक वंश और वर्ण बनता है। अर्थात् वंश, वर्ण, कुल, गोत्र और परिवार के सामूहिक रूप को जाति कहा जाता है। इसी को जाती का विकास क्रम कहा जाता है।
दूसरी बात यह है की किसी भी जाती के विकास क्रम में मनुष्यों की प्रवृत्तियाँ ही मुख्य कारण होती है। क्योंकि मनुष्यों की जन्मजात प्रवृत्तियाँ ही विकसित होकर अन्ततोगत्वा वृत्तियों यानी व्यवसायों का वरण (चयन) करती है। उनके व्यवसायों के वरण करने से ही उस जाति का वर्ण निर्धारित होता है।
व्यवसायों के वरण के आधार पर ही जातियों का चार वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र) निर्धारित हुआ है।
अब यह सब कैसे सम्भव होता है। इसको अच्छी तरह समझने के लिए क्रमशः जाति, वर्ण, वंश, कुल और गोत्र को विस्तार से जानना होगा तभी पूरी बात समझ में आयेगी। इन सभी बातों को क्रमशः अगले अध्यायों में बताया गया है।
अब इसी क्रम में हमलोग जानेंगे कि की अहीर (आभीर) जाति की उत्पत्ति कैसे हुई और किस आधार पर यादवों की जाति "अहीर" हुई़ ? जिसे- आभीर को गोप, गोपाल, ग्वाल, घोष, वल्लभ, इत्यादि नामों से क्यों जाना जाता है ?
तो इस सम्बन्ध में बता दें कि- अहीर जाति की वृत्ति यानी व्यवसाय पूर्वकाल से ही कृषि और पशु पालन रहा है। यह वृत्ति उन्ही प्रवृत्ति वालों में हो सकती है जो निर्भीक और साहसी हों। चुँकि गोपालक अहीर अपने पशुओं को जंगलों, तपती धूप, आँधी तूफान, ठण्ढ़ और बारिश की तमाम प्राकृतिक झन्झावातों को निर्भीकता पूर्वक झेलते हुए पशुओं के बीच रहते हैं। इसी जन्मजात निर्भीक प्रवृत्ति के कारण ही इनको आभीर (अहीर) कहा गया, तथा वृत्ति (व्यवसाय) गोपालन की वजह से इन्हें - गोप, गोपाल, ग्वाल, घोष और वल्लभ कहा गया जो इनकी वृत्ति यानी व्यवसाय मूलक पहचान हैं। ये तो रही अहीर जाती की वृत्ति एवं प्रवृत्ति मूलक पहचान।
किन्तु जबतक गोप (अहीर) जाती के (Blood relation) रक्त सम्बन्धों को न जान लिया जाए, तबतक अहीर जाति की (Genetic) जानकारी अधुरी ही मानी जाएगी। इसलिए अहीर (गोप) जाती के रक्त सम्बन्धों को जानना आवश्यक है कि अहीर जाती के मूल में किसका प्रारम्भिक रक्त सम्बन्ध विद्यमान है।
तो इसके लिए बता दें कि अहीर जाती के मूल में गोपेश्वर श्रीकृष्ण का ही रक्त सम्बन्ध है। इसकी पुष्टि- उस समय होती है जब सावित्री द्वारा विष्णु को दिये गये शाप को गायत्री ने वरदान में बदलते हुए विष्णु से जो कहा उसका वर्णन- स्कन्द पुराण खण्ड- (६) के नागर खण्ड के अध्याय- १९३ के श्लोक -(१४ और १५) में मिलता है। जिसमें गायत्री विष्णु से कहतीं हैं कि -
तेनाकृत्येऽपि रक्तास्ते गोपा यास्यन्ति श्लाघ्यताम्॥
सर्वेषामेव लोकानां देवानां च विशेषतः ॥१४॥
यत्रयत्र च वत्स्यन्ति मद्वंशप्रभवा नराः॥
तत्रतत्र श्रियो वासो वनेऽपि प्रभविष्यति॥१५॥
अनुवाद -(१४-१५)
आभीर कन्या गायत्री विष्णु से कहती है- हे विष्णो ! तुम्हारे रक्त सम्बन्धी (blood relative) सभी गोप (अहीर) बिना कुछ किये ही तुम्हारे द्वारा प्रसिद्धि को प्राप्त हो जाऐंगे। और इनकी प्रशंसा विशेषतः देवताओं सहित सभी लोकों में होगी। तथा मेरे गोप वंश (कुल) के लोग जहाँ भी रहेंगे, वहाँ श्री (सौभाग्य और समृद्धि) विद्यमान रहेगी, चाहे वह स्थान जंगल ही क्यों न हो। १४-१५।
अब सवाल यह है कि गायत्री स्वयं अपने को गोप कुल का तथा गोपों को श्रीकृष्ण का रक्त सम्बन्धी (blood relative) किस आधार पर कहीं ? इसको भी जानना आवश्यक है।
चुँकि भूतल पर देवी गायत्री गोप कुल की सनातनी एवं आदि देवी हैं। इसलिए उन्हें स्वयं तथा अपने गोपों की मूल उत्पत्ति का ज्ञान था कि गोप और गोपियों की उत्पत्ति गोलोक में श्रीकृष्ण और श्रीराधा के रोम कूपों अर्थात उनके क्लोन से हुई है। जिसकी पुष्टि- ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय-5 के श्लोक संख्या- (४०) और (४२) से है, जिसमें लिखा गया है कि -
तस्या राधायाश्च लोमकूपेभ्यः सद्योगोपाङ्गनागणः। आविर्बभूव रूपेण वेशेनैव च तत्समः।४०।
कृष्णस्य लोमकूपेभ्यः सद्यो गोपगणो मुने।
आविर्बभूव रूपेण वेषेणैव च तत्समः। ४२।
अनुवाद- ४०-४२
• उसी क्षण उस किशोरी अर्थात् श्री राधा के रोमकूपों से तत्काल ही अनेक गोपांगनाओं की उत्पत्ति हुई; जो रूप और वेष में राधा के ही समान थीं। ४०।
• फिर तो श्रीकृष्ण के रोम कूपों से भी अनेक गोप-गणों का आविर्भाव हुआ जो रूप और वेष रचना में श्रीकृष्ण के ही समान थे।४२।
अतः उपर्युक्त श्लोकों के आधार पर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि- अहीर जाति के मूल में गोपेश्वर श्रीकृष्ण का ही रक्त विद्यमान है। इसी लिए स्कन्द पुराण खण्ड- (६) के नागर खण्ड के श्लोक-(१४) में ज्ञान की देवी गायत्री ने भी गोपों अर्थात् आभीरों को श्रीकृष्ण का रक्त सम्बन्धी (blood relative) कहीं हैं।
अब हमलोग आभीर जाती की शब्द व्युत्पत्ति के आधार पर जानेंगे कि इसकी उत्पत्ति कैसे हुई है।
तो आभीर जाती को यदि शब्द ब्युत्पत्ति के हिसाब से देखा जाय तो- अभीर शब्द में 'अण्' तद्धित प्रत्यय करने पर आभीर समूह वाची रूप बनता है। अर्थात् आभीर शब्द अभीर शब्द का ही बहुवचन है। 'परन्तु परवर्ती संस्कृत कोश कारों नें आभीरों की गोपालन वृत्ति और उनकी वीरता प्रवृत्ति को दृष्टि-गत करते हुए अभीर और आभीर शब्दों की दो तरह से भिन्न-भिन्न व्युत्पत्तियाँ कर दीं। जैसे-
ईसा पूर्व पाँचवी सदी में कोशकार अमर सिंह ने अपने कोश अमरकोश में अहीरों की प्रवृत्ति वीरता (निडरता) को केन्द्रित करके आभीर शब्द की व्युत्पत्ति की है। नीचे देखें।
आ= समन्तात् + भी=भीयं (भयम्) + र= राति ददाति शत्रुणां हृत्सु = जो चारो तरफ से शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करता है वह आभीर कहलाता है।
किन्तु वहीं पर अमर सिंह के परवर्ती शब्द कोशकार- तारानाथ नें अपने ग्रन्थ वाचस्पत्यम् में अभीर- जाती की शब्द व्युत्पत्ति को उनकी वृत्ति यानी व्यवसाय के आधार पर गोपालन को केन्द्रित करके की है। नींचे देखें।
"अभिमुखी कृत्य ईरयति गा- इति अभीर = जो सामने मुख करके चारो-ओर से गायें चराता है या उन्हें घेरता है।
अगर देखा जाय तो उपरोक्त दोनों शब्दकोश में जो अभीर शब्द की ब्युत्पत्ति को बताया गया है उनमें बहुत अन्तर नही है। क्योंकि एक नें अहीरों की वीरता मूलक प्रवृत्ति (aptitude ) को आधार मानकर शब्द ब्युत्पत्ति को दर्शाया है तो वहीं दूसरे नें अहीर जाती को गोपालन वृत्ति अथवा (व्यवसाय) (profation) को आधार मानकर शब्द ब्युत्पत्ति को दर्शाया है।
अहीर शब्द के लिए दूसरी जानकारी यह है कि- आभीर का तद्भव रूप अहीर होता है। अब यहाँ पर तद्भव और तत्सम शब्द को जानना आवश्यक हो जाता है। तो इस सम्बन्ध में सर्वविदित है कि - संस्कृत भाषा के वे शब्द जो हिन्दी में अपने वास्तविक रूप में प्रयुक्त होते है, उन्हें तत्सम शब्द कहते हैं। ऐसे शब्द, जो संस्कृत और प्राकृत से विकृत होकर हिन्दी में आये हैं, 'तद्भव' कहलाते हैं। यानी तद्भव शब्द का मतलब है, जो शब्द संस्कृत से आए हैं, लेकिन उनमें कुछ बदलाव के बाद हिन्दी में प्रयोग होने लगे हैं। जैसे आभीर संस्कृत का शब्द है, किन्तु कालान्तर में बदलाव हुआ और आभीर शब्द हिन्दी में अहीर शब्द के रूप में प्रयुक्त होने लगा। ऐसे ही तद्भव शब्द के और भी उदाहरण है जैसे- दूध, दही, अहीर, रतन, बरस, भगत, थन, घर इत्यादि।
किन्तु यहाँ पर हमें अहीर और आभीर, शब्द के बारे में ही विशेष जानकारी देना है कि इनका प्रयोग हिन्दी और संस्कृत ग्रन्थों में कब, कहाँ और कैसे एक ही अर्थ के लिए प्रयुक्त हुआ है।
तो इस सम्बन्ध में सबसे पहले अहीर शब्द के बारे में जानेंगे कि हिन्दी ग्रन्थों में इसका प्रयोग कब और कैसे हुआ। इसके बाद संस्कृत ग्रन्थों में जानेंगे कि आभीर शब्द का प्रयोग गोप, अहीर और यादवों के लिए कहाँ-कहाँ प्रयुक्त हुआ।
अहीर शब्द का प्रयोग हिन्दी पद्य साहित्यों में कवियों द्वारा बहुतायत रुप से किया गया है। जैसे-
अहीर शब्द का रसखान कवि अपनी रचनाओं में खूब प्रयोग किए हैं-
"ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं।
धुरि भरे अति सोहत स्याम जू, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।। खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनी बाजति, पीरी कछोटी।
वा छबि को रसखान बिलोकत, वारत काम कला निधि कोटी।।
इसी तरह से भगवान श्रीकृष्ण की श्रद्धा में सदैव लीन रहने वाले कवि इशरदास रोहडिया (चारण), जिनका जन्म विक्रम संवत- (1515) में राजस्थान के भादरेस गांँव में हुआ था। जिन्होंने 500 साल पहले दो ग्रन्थ "हरिरस" और "देवयान" लिखे। जिसमें ईशरदासजी द्वारा रचित "हरिरस" के एक दोहे में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि कृष्ण भगवान का जन्म अहीर (यादव) कुल में हुआ था।
नारायण नारायणा! तारण तरण अहीर।
हूँ चारण हरिगुण चवां, सागर भरियो क्षीर।। ५८
अर्थात् - अहीर जाती में अवतार लेने वाले हे नारायण (श्रीकृष्ण)! आप जगत के तारण तरण (सर्जक) हो, मैं चारण आप श्रीहरि के गुणों का वर्णन करता हूँ, जो कि सागर (समुन्दर) और दूध से भरा हुआ है। ५८
और श्रीकृष्ण भक्ति शाखा के प्रमुख कवि सूरदास जी ने भी श्रीकृष्ण को अहीर कहते हुए सूरसागर के दशमस्कन्ध-(पृष्ठ ४७९) में लिखा है-
सखीरी काके मीत अहीर ।
काहेको भरिभरि ढारति हो इन नैन राहके नीर ।।
आपुन पियत पियावत दुहि दुहिं इन धेनुनके क्षीर। निशि वासर छिन नहिं विसरत है जो यमुनाके तीर।। ॥
मेरे हियरे दौं लागतिहै जारत तनुकी चीर । सूरदास प्रभु दुखित जानिकै छांडि गए वे परि ।।८२॥
ये उपर्युक्त सभी उदाहरण अहीर के हैं जो हिन्दी साहित्यिक ग्रन्थों प्रयुक्त हुआ हैं। अब हमलोग आभीर शब्द को जानेंगे जो अहीर का तद्भव रूप है, वह संस्कृत ग्रन्थों में कहाँ-कहाँ प्रयुक्त हुआ हैं। इसके साथ ही आभीर (अहीर) शब्द के पर्यायवाची शब्द - गोप, गोपाल और यादव को भी जानेंगे कि पौराणिक ग्रन्थों में अभीर के ही अर्थ में कैसे प्रयुक्त हुए हैं।
सबसे पहले हम गर्ग संहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय ७ के श्लोक संख्या- १४ को लेते हैं जिसमें में भगवान श्रीकृष्ण और नन्दबाबा सहित पूरे अहीर समाज के लिए आभीर शब्द का प्रयोग शिशुपाल उस समय किया जब सन्धि का प्रस्ताव लेकर उद्धव जी शिशुपाल के यहाँ गए। किन्तु वह प्रस्ताव को ठुकराते हुए उद्धव जी से श्रीकृष्ण के बारे में कहा कि-
आभीरस्यापि नन्दस्य पूर्वं पुत्रः प्रकीर्तितः।
वसुदेवो मन्यते तं मत्पुत्तोऽयं गतत्रपः।। १४
प्रद्युम्नं तस्तुतं जित्वा सबलं यादवैः सह।
कुशस्थलीं गमिश्यामि महीं कर्तुमयादवीम्।। १६
अनुवाद -
• वह (श्रीकृष्ण) पहले नन्द नामक अहीर का भी बेटा कहा जाता था। उसी को वासुदेव लाज- हया छोड़कर अपना पुत्र मानने लगे हैं। १४
• मैं उसके पुत्र प्रद्युम्न को यादवों तथा सेना सहित जीतकर भूमण्डल को यादवों से शून्य कर देने के लिए कुशस्थली पर चढ़ाई करूँगा। १६
उपर्युक्त दोनो श्लोक को यदि देखा जाए तो भगवान श्रीकृष्ण सहित सम्पूर्ण अहीर और यादव समाज के लिए ही आभीर शब्द का प्रयोग किया गया है किसी अन्य के लिए नहीं।
इसी तरह से आभीर शूरमाओं का वर्णन महाभारत के द्रोणपर्व के अध्याय- २० के श्लोक - ६ और ७ में मिलता है जो शूरसेन देश से सम्बन्धित थे।
भूतशर्मा क्षेमशर्मा करकाक्षश्च वीर्यवान्।
कलिङ्गाः सिंहलाः प्राच्याः शूराभीरा दशेरकाः।। ६
यवनकाम्भोजास्तथा हंसपथाश्च ये।
शूरसेनाश्च दरन्दा मद्रकेकयाः।। ७
अर्थ:- भूतशर्मा , क्षेमशर्मा पराक्रमी कारकाश , कलिंग सिंहल पराच्य (शूर के वंशज आभीर) और दशेरक। ६
अनुवाद - शक यवन ,काम्बोज, हंस -पथ नाम वाले देशों के निवासी शूरसेन प्रदेश के अभीर (अहीर) दरद, मद्र, केकय ,तथा एवं हाथी सवार घुड़सवार रथी और पैदल सैनिकों के समूह उत्तम कवच धारण करने उस व्यूह के गरुड़ ग्रीवा भाग में खड़े थे।६-७।
इसी तरह से विष्णुपुराण द्वित्तीयाँश तृतीय अध्याय का श्लोक संख्या १६,१७ और १८ में अन्य जातियों के साथ-साथ शूर आभीरों का भी वर्णन मिलता है-
"तथापरान्ताः ग्रीवायांसौराष्ट्राः शूराभीरास्तथार्ब्बुदाः। कारूषा माल्यवांश्चैव पारिपात्रनिवासिनः । १६
सौवीरा-सैन्धवा हूणाः शाल्वाः शाकलवासिनः।मद्रारामास्तथाम्बष्ठाः पारसीकादयस्तथा । १७
आसां पिबन्ति सलिलं वसन्ति सरितां सदा ।
समीपतो महाभागा हृष्टपुष्टजनाकुलाः ।। १८
अनुवाद - पुण्ड्र, कलिंग, मगध, और दाक्षिणात्य लोग, अपरान्त देशवासी, सौराष्ट्रगण, शूर आभीर और अर्बुदगण, कारूष,मालव और पारियात्रनिवासी, सौवीर, सैन्धव, हूण, साल्व, और कोशल देश वासी तथा माद्र,आराम, अम्बष्ठ, और पारसी गण रहते हैं। १७-१७
हे महाभाग ! वे लोग सदा आपस में मिलकर रहते हैं और इन्हीं का जलपान करते हैं। उनकी सन्निधि के कारण वे बड़े हृष्ट-पुष्ट रहते हैं। १८
▪️ इसी तरह से महाभारत के उद्योग पर्व के सेनोद्योग नामक उपपर्व के सप्तम अध्याय में श्लोक संख्या- (१८) और (१९) पर गोपों (अहिरों) को अजेय योद्धा के रूप में वर्णन है-
"मत्सहननं तुल्यानां ,गोपानाम् अर्बुदं महत् । नारायणा इति ख्याता: सर्वे संग्रामयोधिन:।१८।
अनुवाद - मेरे पास दस करोड़ गोपों (आभीरों) की विशाल सेना है, जो सबके सब मेरे जैसे ही बलिष्ठ शरीर वाले हैं। उन सबकी 'नारायण' संज्ञा है। वे सभी युद्ध में डटकर मुकाबला करने वाले हैं। ।।१८।।
इसी तरह से जब भगवान श्रीकृष्ण इन्द्र की पूजा बन्द करवा दी, तब इसकी सूचना जब इन्द्र को मिली तो वह क्रोध से तिलमिला उठा और भगवान श्रीकृष्ण सहित समस्त अहीर समाज को जो कुछ कहा उसका वर्णन श्रीमद् भागवत पुराण के दशम स्कन्ध के अध्याय -२५ के श्लोक - ३ से ५ में मिलता है। जिसमें इन्द्र अपने दूतों से कहा कि-
अहो श्रीमदमाहात्म्यं गोपानां काननौकसाम्
कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य ये चक्रुर्देवहेलनम्।। ३
वाचालं बालिशं स्तब्धमज्ञं पण्डितमानिनम्।
कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य गोपा मे चक्रुरप्रियम् ।। ५
अनुवाद- ओह, इन जंगली ग्वालों (गोपों ) का इतना घमण्ड! सचमुच यह धन का ही नशा है। भला देखो तो सही, एक साधारण मनुष्य कृष्ण के बल पर उन्होंने मुझ देवराज का अपमान कर डाला। ३
• कृष्ण बकवादी, नादान, अभिमानी और मूर्ख होने पर भी अपने को बहुत बड़ा ज्ञानी समझता है। वह स्वयं मृत्यु का ग्रास है। फिर भी उसी का सहारा लेकर इन अहीरों ने मेरी अवहेलना की है। ५
उपर्युक्त दोनो श्लोकों में यदि देखा जाए- तो इनमें गोप शब्द आया है जो अहीर, और यादव शब्द का पर्यायवाची शब्द है।
इसी तरह से संस्कृत श्लोकों में अहीरों के लिए गोपाल शब्द का प्रयोग श्रीमद्भागवत पुराण स्कन्ध १० अध्याय- ६१ के श्लोक ३५ में मिलता है। जिसमें जूवा खेलते समय रुक्मी बलराम जी को कहता है कि -
नैवाक्षकोविदा यूयं गोपाला वनगोचरा:।
अक्षैर्दीव्यन्ति राजनो बाणैश्च नभवादृशा।। ३५
अनुवाद - बलराम जी आखिर आप लोग वन- वन भटकने वाले वाले गोपाल (ग्वाले) ही तो ठहरे! आप पासा खेलना क्या जाने ? पासों और बाणों से तो केवल राजा लोग ही खेला करते हैं।
इस श्लोक को यदि देखा जाए तो इसमें बलराम जी के लिए गोपाल शब्द का प्रयोग किया गया है जो एक साथ- गोप, ग्वाल, अहीर और यादव समाज के लिए ही प्रयुक्त हुआ है। इसलिए गर्ग संगीता के अनुवाद कर्ता, अनुवाद करते हुए गोपाल शब्द को ग्वाल के रूप में रखा।
इसी तरह से भगवान श्रीकृष्ण को एक ही प्रसंग में एक ही स्थान पर यदुवंश शिरोमणि और गोप (ग्वाला) दोनों शब्दों से सम्बोधित युधिष्ठिर के राजशूय यज्ञ के दरम्यान उस समय किया गया। जब यज्ञ हेतु सर्वसम्मति श्रीकृष्ण को अग्र पूजा के लिए चुना गया। किन्तु वहीं पर उपस्थित शिशुपाल इसका विरोध करते हुए भगवान श्रीकृष्ण को
यदुवंश शिरोमणि न कहकर उनके लिए ग्वाला (गोप) शब्द से सम्बोधित करते हुए उनका तिरस्कार किया। जिसका वर्णन- श्रीमद् भागवत पुराण के दशम स्कन्ध के अध्याय 74 के श्लोक संख्या - १८, १९, २० और ३४ में कुछ इस प्रकार है -
सदस्याग्र्यार्हणार्हं वै विमृशनतः सभासदः।
नाध्यगच्छन्ननैकान्त्यात् सहदेवस्तदाब्रवीत् ।। १८
अर्हति ह्यच्युतः श्रैष्ठ्यं भगवान् सात्वतां पतिः।
एष वै देवताः सर्वा देशकालधनादयः।। १९
यदात्मकमिदं विश्वं क्रतवश्च यदात्मकाः।
अग्निनराहुतयो मन्त्राः सांख्यं योगश्च यत्परः।। २०
अनुवाद - अब सभासद लोग इस विषय पर विचार करने लगे कि सदस्यों में सबसे पहले किसकी पूजा (अग्रपूजा) होनी चाहिए। जितनी मति, उतने मत। इसलिए सर्वसम्मति से कोई निर्णय न हो सका। ऐसी स्थिति में सहदेव ने कहा। १८
• यदुवंश शिरोमणि भक्त वत्सल भगवान श्रीकृष्ण ही सदस्यों में सर्वश्रेष्ठ और अग्रपूजा के पात्र हैं, क्योंकि यही समस्त देवताओं के रूप में है, और देश, काल, धन आदि जितनी भी वस्तुएँ हैं, उन सब के रूप में भी ये ही हैं। १९
• यह सारा विश्व श्रीकृष्ण का ही रूप है। समस्त यज्ञ भी श्री कृष्ण स्वरूप ही है। भगवान श्रीकृष्णा ही अग्नि, आहुति और मन्त्रों के रूप में है। ज्ञान मार्ग और कर्म मार्ग ये दोनों भी श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिए ही हैं।
भगवान श्रीकृष्ण की इतनी प्रशंसा सुनकर शिशुपाल क्रोध से तिलमिला उठा और कहा -
सदस्पतिनतिक्रम्य गोपालः कुलपांसनः।
यथा काकः पुरोडाशं सपर्यां कथमर्हति।। ३४
अनुवाद - यज्ञ की भूल-चूक को बताने वाले उन सदस्यपत्तियों को छोड़कर यह कुलकलंक ग्वाला (गोपालक) भला, अग्रपूजा का अधिकारी कैसे हो सकता है ? क्या कौवा कभी यज्ञ के पुरोडाश का अधिकारी हो सकता है ? ३४
उपर्युक्त श्लोकों के अनुसार यदि शिशुपाल के कथनों पर विचार किया जाए तो वह श्रीकृष्ण के लिए गोपाल शब्द का प्रयोग किया। यहाँ तक तो शिशुपाल का कथन बिल्कुल सही है, क्योंकि - भगवान श्रीकृष्ण- गोप, गोपाल और ग्वाला ही हैं। इस सम्बन्ध में भगवान श्रीकृष्ण हरिवंश पुराण के विष्णु पर्व के ग्यारहवें अध्याय के श्लोक संख्या -५८ में स्वयं अपने को गोप और गोपकुल में जन्म लेने की भी बात कहे हैं जो इस प्रकार
है-
एतदर्थं च वासोऽयंव्रजेऽस्मिन् गोपजन्म च।
अमीषामुत्पथस्थानां निग्रहार्थं दुरात्मनाम्।।५८
अनुवाद - इसीलिए ब्रज में मेरा यह निवास हुआ है और इसीलिए मैंने गोपों में अवतार ग्रहण किया है।
अतः शिशुपाल भगवान श्रीकृष्ण को गोपाल या गोप कहा कोई गलत नहीं कहा। किन्तु वह भगवान श्रीकृष्ण को कौवा और कुलकलंक कहा, यहीं उसने गलत कहा जिसके परिणाम स्वरुप भगवान श्रीकृष्ण ने उसका वध कर दिया।
इसी तरह से पौण्ड्रक ने अपने सभासदों से श्रीकृष्ण के लिए गोपबालक और यदुश्रेष्ठ (यादव श्रेष्ठ) नाम से सम्बोधित किया है। जिसका वर्णन हरिवंश पुराण के भविष्य पर्व के अध्याय- ९१ के श्लोक- १४ में कुछ इस तरह से वर्णन किया गया है।
वासुदेवेति मां ब्रूत न तु गोपं यदुत्तमम्।
एकोऽहं वासुदेवो हि हत्वा तं गोपदारकम्।। १४
अनुवाद - पौंड्रक अपने सभासदों से कहता है कि- मुझे ही वासुदेव कहो उस यदुश्रेष्ठ गोप को नहीं। उस गोपबालक को
मारकर एकमात्र मैं ही वासुदेव रहूँगा।
इसी तरह से हरिवंश पुराण के भविष्य पर्व के अध्याय- १०० के श्लोक - २६ और ४१ में भगवान श्रीकृष्ण को गोप और यादव दोनों होने की पुष्टि होती है। जो पौण्ड्रक, श्रीकृष्ण युद्ध का प्रसंग है। उस युद्ध के बीच पौण्ड्रक भगवान श्रीकृष्ण से कहता है कि-
स ततः पौण्ड्रको राजा वासुदेवमुवाच ह।
भो भो यादव गोपाल इदानिं क्व गतो भवात।। २६
गोपोऽहं सर्वदा राजन् प्राणिनां प्राणदः सदा।
गोप्ता सर्वेषु लोकेषु शास्ता दुष्टस्य सर्वदा।। ४१
अनुवाद- राजा पौंड्रक ने भगवान से कहा- ओ यादव ! ओ गोपाल ! इस समय तुम कहाँ चले गए थे? २६
• तब भगवान श्रीकृष्ण ने पौंड्रक से कहा- राजन ! मैं सर्वदा गोप हूँ, अर्थात प्राणियों का प्राण दान करने वाला हूँ , सम्पूर्ण लोकों का रक्षक तथा सर्वदा दुष्टों का शासक हूँ।
देखा जाए तो उपर्युक्त तीनों श्लोकों से तीन बातें और सिद्ध होती है।
• पहला यह कि- राजा पौंड्रक, भगवान श्रीकृष्ण को यादव, यादवश्रेष्ठ, गोपबालक और गोप शब्दों से सम्बोधित करता है। इससे सिद्ध होता है कि यादव और गोप (अहीर) एक दूसरे के पर्यायवाची शब्द हैं।
• दूसरा यह कि- भगवान श्रीकृष्ण स्वयं घोषणा करते हैं कि - "मैं सर्वदा गोप हूँ"।
• तीसरा यह कि- गोप ही एक ऐसी जाती है जो सम्पूर्ण लोकों का रक्षक तथा सर्वदा दुष्टों पर शासन करने वाली है।
ज्ञात हो - अहीर, गोप, गोपाल, ग्वाल ये सभी यादव शब्द का ही पर्यायवाची शब्द हैं, चाहे इन्हें अहीर कहें, गोप कहें, गोपाल कहें, ग्वाला कहें, यादव कहें ,सब एक ही बात है। जैसे-
भगवान श्रीकृष्ण को तो सभी जानते हैं कि यदुवंश में उत्पन्न होने से उन्हें यादव कहा गया जो उनकी वंश मूलक पहचान है। तथा उनको गोप कुल में जन्म लेने से उन्हें गोप कहा गया जो उनके कुल रूपी पहचान है। इसी क्रम में उन्हें गोपालन करने से उन्हें गोपाल और गोप कहा गया जो उनकी वृत्ति यानी व्यवसाय मूलक पहचान है। इसी तरह से उनकी जाती मूलक पहचान के लिए उन्हें आभीर या अहीर कहा गया। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण को चाहे अहीर कहें, गोप- कहें, गोपाल कहें, गोप कहें, या यादव कहें ,सब एक ही बात है।
इस प्रकार से आप लोगों ने जाती उत्पत्ति को व्यक्तियों के वृत्ति और प्रबृत्ति मूलक आधार पर यादवों की मुख्य जाती - अहीर, घोष, गोप, गोपाल, इत्यादि को जाना। अब इसके अगले अध्याय (4) में यादवों के वर्ण के बारे में जानकारी दी गई है कि यादवों का वास्तविक वर्ण क्या है।
🫵
अध्याय(4)- यादवों का वर्ण
अधिकांश लोग वर्ण और जाती में अन्तर नहीं जानते हैं। इसलिए अपने वर्ण को ही जाती कहते हैं और जाती को ही वर्ण कहते हैं। इसके दो कारण हो सकते हैं-
पहला यह कि या तो उन्हें जाती और वर्ण में अन्तर का ज्ञान नहीं है या दूसरा यह कि पौराणिक ग्रन्थों में अधिकांश लोगों की जातियों का वर्णन नहीं मिलता है, ऐसी स्थिति में वे लोग अपने वर्ण को जाति कहनें लगते हैं। जैसे किसी ब्राह्मण से पूछा जाए कि आपकी जाती क्या है? तो वह अपनी जाती के स्थान पर अपने "वर्ण" ब्राह्मण को ही जाती बताएगा। इसी तरह से ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था के किसी क्षत्रिय वर्ण से यदि पूछा जाए कि आपकी जाती क्या है? तो वह अपनी जाती के स्थान पर अपने वर्ण को ही बताते हुए कहेगा कि मेरी जाती क्षत्रिय है। जबकि उसे पता होना चाहिए कि क्षत्रिय जाती नहीं बल्कि एक वर्ण है।
जैसा की हमने इसके पहले अध्याय (3) में जाती वाले प्रकरण में स्पष्ट कर चुका हूँ कि- " किसी भी जाती के विकास क्रम में मनुष्यों की प्रवृत्तियाँ ही मुख्य कारण होती है। क्योंकि मनुष्यों की जन्मजात प्रवृत्तियाँ ही विकसित होकर अन्ततोगत्वा वृत्तियों यानी व्यवसायों का वरण करती है। उनके व्यवसायों के वरण करने से ही उस जाती का वर्ण निर्धारित होता है, और उनके व्यवसायों के वरण के आधार पर ही जातियों का चार वर्ण- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र निर्धारित हुआ है"।
किन्तु पौराणिक ग्रंथों में ब्रह्मा जी ने मनुष्यों के कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था के विपरीत केवल अपने यज्ञ सम्पादन हेतु इन चार वर्णों को जन्म के आधार पर बना दिया। जिसमें ब्रह्मा जी ने अपने मुख से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिय, उदर से वैष्य, और पैरों से शूद्र को उत्पन्न करके मानव स्वभाव के विपरीत एक नई वर्ण व्यवस्था को जन्म दिया, जिसके परिणाम स्वरूप सामाजिक भेदभाव का उदय हुआ।
ब्रह्मा जी द्वारा इस तरह के चार वर्णों को बनाए जाने की पुष्टि- विष्णुपुराण- प्रथमांशः/अध्यायः (६) के श्लोक- ७ से होती है। जिसमें लिखा गया है कि -
यज्ञनिष्पत्तये सर्वमेतद्ब्रह्या चकार वै ।
चातुर्वर्ण्यं महाभाग यज्ञसाधनमुत्तमम् ॥७॥
अनुवाद:-तदनन्तर, यज्ञ के साधन-भूत चातुर्वर्ण्य को ब्रह्मा ने यज्ञ-निष्पत्ति (उत्पादन) के लिए बनाया।७।
इसके अतिरिक्त और भी प्रमाण है जिसमें बताया गया है कि जन्म आधारित चातुर्वर्ण्य की रचना ब्रह्मा जी द्वारा ही की गई है। जैसे- विष्णु पुराण के प्रथमांश के छठे अध्याय के श्लोक- (६) में लिखा गया है कि -
ब्रह्मणाः क्षत्रिया वेश्याः शूद्राश्च द्विजसत्तम।
पादोरुवक्षस्थलतो मुखतश्च समुद्गताः।।६।।
अनुवाद:-
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों को ब्रह्मा जी ने
उत्पन्न किया। इनमें ब्राह्मण उनके मुख से, क्षत्रिय वक्षःस्थल से, वैश्य जाँघों से और शूद्र पैरों से उत्पन्न हुए।।६।
इसी तरह से पद्मपुराण सृष्टिखण्ड के अध्याय-(३) के श्लोक संख्या-(१३०) में भी लिखा गया है कि-
"ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च नृपसत्तम। पादोरुवक्षस्थलतो मुखतश्च समुद्गताः।१३०।
अनुवाद- पुलस्त्यजी बोले- कुरुश्रेष्ठ ! सृष्टि की इच्छा रखने वाले ब्रह्माजी ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों को उत्पन्न किया। इनमें ब्राह्मण मुख से, क्षत्रिय वक्षःस्थल से, वैश्य जाँघों से और शूद्र ब्रह्माजी के पैरों से उत्पन्न हुए।१३०।
फिर तो ब्रह्मा जी की जन्म आधारित ब्राह्मी वर्ण- व्यवस्था भी चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य,और शूद्र) में विभाजित हो गई, जिसके परिणाम स्वरूप समाजिक वर्ग विभेद का उदय हुआ। इस बात की पुष्टि- अत्रि संहिता के (१४० वाँ) श्लोक से होती है जिसमें लिखा गया है कि-
"जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्कारैर्द्विज उच्यते।
विद्यया याति विप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रिय उच्यते॥१४०
अनुवाद:- ब्राह्मणकुल में उत्पन्न हाेने वाला जन्म से ही 'ब्राह्मण' कहलाता है। फिर उपनयन संस्कार हाे जाने पर वह 'द्विज' कहलाता है और विद्या प्राप्त कर लेने पर वही ब्राह्मण 'विप्र' कहलाता है। इन तीनाें नामाें से युक्त हुआ ब्राह्मण 'श्राेत्रिय' कहा जाता है।१४०।
विशेष:- (श्रुति (वेद) के ज्ञाता ब्राह्मण ही श्रोत्रिय कहलाता है।)
अतः उपर्युक्त सभी पौराणिक साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि सर्वप्रथम ब्रह्मा जी ने ही कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था के विपरीत जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था (मनुवादी व्यवस्था) को जन्म दिया।
किन्तु ध्यान रहे ये ब्रह्मा जी द्वारा स्थापित वर्ण व्यवस्था (मनुवादी व्यवस्था) केवल ब्रह्मा जी से उत्पन्न उनकी सन्तानों पर ही लागू और प्रभावी हो सकती है यादवों पर नहीं।
अब सवाल यह है कि ऐसी क्या बात है कि ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था गोपों यानी यादवों पर लागू नहीं होती? या कहें यादव ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था के भाग क्यों नहीं हैं?
तो इसका जवाब यह है कि- गोपों की उत्पत्ति ब्रह्मा जी से न होकर श्रीकृष्ण से हुई है, इसलिए गोप यानी आभीर जिन्हें यादव भी कहा जाता है ब्रह्मा जी की सृष्टि रचना और उनकी वर्ण व्यवस्था से परे हैं। चूँकि गोप श्रीकृष्ण यानी स्वराट विष्णु से उत्पन्न हैं इसलिए उत्पत्ति विशेष के कारण इनका वर्ण श्रीकृष्ण यानी स्वराट विष्णु के नामानुसार इनका वर्ण वैष्णव ही है, जो ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था से बिल्कुल अलग और स्वतन्त्र है। जिसे पञ्चम वर्ण के नाम से भी जाना जाता है। इस पांचवें वर्ण यानी वैष्णव वर्ण के बारे में भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्णजन्मखण्ड के अध्याय- ७३ के श्लोक- ९२ में स्वयं कहे हैं कि-
पशुजन्तुषु गौश्चहं चन्दनं काननेषु च ।
तीर्थपूतश्च पूतेषु निःशङ्केषु च वैष्णवः।।९२।
अनुवाद- मैं पशुओं में गाय हूँ, और वनों में चन्दन हूँ। पवित्र स्थानों में तीर्थ हूँ, और निशंकों (अभीरों अथवा निर्भीकों ) में वैष्णव हूँ। ९२
"नि:शङ्क शब्द की व्याकरणिक व्युत्पत्ति विश्लेषण-
नि:शङ्क- निस् निषेध वाची उपसर्ग+ शङ्क = भय (त्रास) भीक:अथवा डर।
नि:शङ्क पुलिङ्ग शब्द है जिसका अर्थ होता है- निर्भीक अथवा निडर।)
नि:शङ्क का मूल अर्थ निर्भीक है और निर्भीक का अर्थ होता जो कभी भयभीत नहीं होता हो।
अत: नि:शङ्क अथवा निर्भीक विशेषण पद आभीर शब्द का ही पर्याय है, जो अहीरो (गोपों) की जातिगत प्रवृत्ति है। आभीर लोग वैष्णव वर्ण तथा धर्म के अनुयायी होते ही हैं।
अत: ब्रह्मवैवर्त पुराण श्रीकृष्ण जन्मखण्ड का उपर्युक्त श्लोक गोप जाति की निर्भीकता प्रवृत्ति का भी संकेत करता है।
अतः उपर्युक्त श्लोक से सिद्ध होता है कि- "वैष्णव वर्ण" की उत्पत्ति श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) से हुई है। जिसमें केवल गोप (अहीर) आते हैं। जिसकी पुष्टि- ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मखण्ड के एकादश (११) अध्याय के श्लोक संख्या (४3) से होती है। जिसमें लिखा गया है कि -
"ब्रह्मक्षत्त्रियविट्शूद्राश्चतस्रो जातयो यथा।
स्वतन्त्रा जातिरेका च विश्वस्मिन्वैष्णवाभिधा।।४३।
"अनुवाद:- ब्राह्मण" क्षत्रिय" वैश्य" और शूद्र इन चार वर्णों के अतिरिक्त एक स्वतन्त्र जाती अथवा वर्ण इस संसार में प्रसिद्ध है। जिसे वैष्णव नाम दिया गया है। जो स्वराट विष्णु (श्रीकृष्ण) से सम्बन्धित अथवा उनके रोमकूपों से उत्पन्न होने से वैष्णव संज्ञा से नामित है।४३।
*(विषेश- गोपों की उत्पत्ति श्रीकृष्ण से हुई है इसको इसी पुस्तक के अध्याय-(2) में तथा मेरी दूसरी पुस्तक- "श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" में विस्तार पूर्वक बताया गया है)
चूँकि "वैष्णव वर्ण" की उत्पत्ति स्वराट विष्णु से हुई है इसलिए वैष्णव वर्ण सभी वर्णों में श्रेष्ठ है। इस बात की पुष्टि - पद्म पुराण के उत्तराखण्ड के अध्याय(६८) श्लोक संख्या १-२-३ से होती है जिसमें भगवान शिव नारद से कहते हैं।
महेश्वर उवाच-
शृणु नारद! वक्ष्यामि वैष्णवानां च लक्षणम् यच्छ्रुत्वा मुच्यते लोको ब्रह्महत्यादिपातकात् ।१।
तेषां वै लक्षणं यादृक्स्वरूपं यादृशं भवेत् ।तादृशंमुनिशार्दूलशृणु त्वं वच्मिसाम्प्रतम्।२।
विष्णोरयं यतो ह्यासीत्तस्माद्वैष्णव उच्यते। सर्वेषां चैव वर्णानां वैष्णवःश्रेष्ठ उच्यते ।३।
अनुवाद- (१,२,३) महेश्वर उवाच ! हे नारद , सुनो, मैं तुम्हें वैष्णव का लक्षण बतलाता हूँ। जिन्हें सुनने से लोग ब्रह्म- हत्या जैसे पाप से मुक्त हो जाते हैं।१।
वैष्णवों के जैसे लक्षण और स्वरूप होते हैं। उसे मैं बतला रहा हूँ। हे मुनि श्रेष्ठ ! उसे तुम सुनो ।२।
चूँकि वह स्वराट विष्णु (श्रीकृष्ण) से उत्पन्न होने से ही वैष्णव कहलाते है; और सभी वर्णों मे वैष्णव वर्ण श्रेष्ठ कहा जाता हैं।३।
यदि वैष्णव शब्द की व्युत्पत्ति को व्याकरणिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो "शब्द कल्पद्रुम" में विष्णु से ही वैष्णव शब्द की ब्युत्पत्ति बताई गई है-
विष्णुर्देवताऽस्य तस्येदं वा अण्- वैष्णव - तथा विष्णु-उपासके विष्णोर्जातो इति वैष्णव विष्णुसम्बन्धिनि च स्त्रियां ङीप् वैष्णवी- दुर्गा गायत्री आदि।
अर्थात् विष्णु देवता से सम्बन्धित वैष्णव स्त्रीलिंग में (ङीप्) प्रत्यय होने पर वैष्णवी शब्द बना है जो- दुर्गा, गायत्री आदि का वाचक है।
अतः उपरोक्त सभी साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि- विष्णु से वैष्णव शब्द और वैष्णव वर्ण की उत्पत्ति होती है, जिसे पञ्चमवर्ण के नाम से भी जाना जाता है। जिसमें केवल- गोप, (अहीर, यादव) जाती ही आती हैं बाकी कोई नहीं।
तब ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि- जब यादव ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था (मनुवादी व्यवस्था) के भाग नहीं हैं तो ये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र में क्या है?
तो इसका उत्तर है- यादव- वैष्णव वर्ण के अन्तर्गत-महाब्राह्मण, महाक्षत्रिय, महावैश्य, और महाशूद्र है। क्योंकि
वैष्णव वर्ण के लोग बिना किसी संकोच और प्रतिबंध के वे सभी कार्य कर सकते हैं जो ब्राह्मी जी के चातुर्वर्ण्य के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र करते हैं। जब ये ब्राह्मणत्व (धार्मिक) कर्म करते हैं तो ये महाब्राह्मण, धर्मवत्सल,धर्मज्ञ, महाज्ञानी, महाविद्वान और महाउपदेशक कहलाते है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण गोपेश्वर श्रीकृष्ण हैं जिनका उपदेश रुपी गीता ज्ञान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अद्भुत एवं अद्वितीय है। इसी तरह से गोपी शतचन्द्रानना, गोपी स्वाहा, गोपी स्वधा, अहीर कन्या देवी गायत्री और समस्त गोप-गोपियाँ धर्मज्ञ और धर्मवत्सल के विशेष उदाहरण हैं। इन सभी के बारे में इसी किताब में अध्यायों के बाद "परिशिष्ट कथाओं" में क्रमशः (2,3, और 4) में वर्णन किया गया है। इनके धर्मवत्सल कर्मों से ही पुराणों में खूब प्रसंशा हुई है जैसे -
देवी गायत्री सहित समस्त गोपों को धर्म वत्सल एवं धर्मज्ञ होने की पुष्टि-पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय- (१७ के श्लोक- १५-१६ और १७) से होती है जिसमें भगवान विष्णु गोपों की कन्या, गायत्री को ब्रह्माजी को कन्यादान के उपरान्त गोपों से कहते हैं कि-
भोभोगोपसदाचारनत्वंशोचितुमर्हसि।
कन्यााषतेमहाभागाप्राप्तादेवंविरिञ्चिनम्।।१५।
योगिनियोंगयुक्तायेब्राह्मणाबेदपारगा:।
नलभन्तेप्रार्थयन्तस्ताङ्गतिन्दुहितागता।१६।
धर्मवन्तं सदाचारं भवन्तं धर्मवत्सलम्।
मया ज्ञात्वा तत:कन्यादत्ताचैषा विरंचयते।।१७।
अनुवाद - १५ से १७
• हे गोपगण (अहीरगण) ! तुम यहाँ वृथा प्रलाप मत करो। यह पुण्यवती, सौभाग्यवती तथा कुल एवं बन्धुगण के लिए आनन्दप्रदा है। इस बाला को हम यहाँ लाए हैं। इसे ब्रह्मा ने अपनी पत्नी बनाया है। इन्होंने भी ब्रह्मा का अवलम्बन किया है। यदि यह पुण्यवती नहीं होती, तब इस सभा में आती क्यों ? हे महाभाग! तुम यह सब जानकर अब शोक मत करो। तुम्हारी यह भाग्यशाली कन्या ने ब्रह्मा को प्राप्त किया है। १५।
• ज्ञान योगी, कर्मयोगी तथा वेदज्ञ ब्राह्मण, प्रार्थना भी करके यह स्थान नहीं पाते, तथापि तुम्हारी यह कन्या उस गति को पा गई है।१६।
• तुम लोगों को मैंने धार्मिक, सदाचारी एवं धर्मवत्सल जानकर ही तुम्हारी कन्या ब्रह्मा को प्रदान किया है।१७।
*विशेष- (देवी गायत्री को अहीर कन्या होने के बारे में इसी किताब के परिशिष्ट कथा वाले भाग में बताया गया है)
गोपों के इसी गुण विशेष के कारण भगवान श्रीकृष्ण के सामने श्रीराधा जी ने गोपों को सबसे बड़ा धर्मवत्सल कहा इस बात की पुष्टि - गर्गसंहिता के वृन्दावन खण्ड के अध्याय-१८ के श्लोक संख्या -२२ से होती है। जिसमें राधा जी श्रीकृष्ण से कहती हैं कि-
"गा: पालयन्ति सततं रजसो गवां च गङ्गां स्पृशन्ति च जपन्ति गवां सुनाम्नाम।
प्रेक्षन्त्यहर्निशमलं सुमुखं गवां च जाति: परा न विदिता भुवि गोपजाते:।।२२।
अनुवाद - गोप सदा गौओं का पालन करते हैं। गोरज की गङ्गा में नहाते हैं, उनका स्पर्श करते हैं तथा गौओं के उत्तम नाम का जाप करते हैं। इतना ही नहीं उन्हें दिन- रात गौओं के सुन्दर मुख का दर्शन होता है। मेरी समझ में तो इस भूतल पर गोप जाति से बढ़ कर दूसरी कोई जाति ही नहीं है।
गोपों और यादवों के धर्मज्ञ और धर्मवत्सल होने के कारण ही इनको जगत का मुक्ति दाता कहा गया है। इसकी पुष्टि-
गर्गसंगीता के अश्वमेधखंड खंड के अध्याय ६० के श्लोक संख्या ४० से होती है जिसमें लिखा गया है कि-
य: श्रृणोति चरित्रं वै गोलोकारोहणं हरे:।
मुक्तिं यदुनां गोपानां सर्वपापै: प्रमुच्यते।। ४०
अनुवाद -जो लोग श्री हरि के गोलोक धाम पधारने का चरित्र सुनते हैं तथा गोप, यादव की मुक्ति का वृतांत पढ़ते हैं, वे सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं।
इसी तरह का वर्णन श्रीविष्णुपुराण के चतुर्थ अंश के अध्याय-११ के श्लोक संख्या-४ में भी लिखा गया है, जिसमें गोपकुल के यादव वंश को पाप मुक्ति का सहायक बताया गया है-
यदोर्वंशं नर: श्रुत्वा सर्वपापै: प्रमुच्यतते।
यत्रावतीर्णं कृष्णाख्यं परं ब्रह्म निराकृति।। ४
अनुवाद - जिसमें श्री कृष्णा नमक निराकार परब्रह्म ने अवतार लिया था, उस यदुवंश का श्रवण करने से मनुष्य सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है।
अतः उपर्युक्त सभी पौराणिक सन्दर्भों से से सिद्ध होता है कि वैष्णव वर्ण के गोपों से बडा़ कोई धर्मज्ञ और धर्मवत्सल इस भूतल पर नहीं है। तभी तो चातुर्वर्ण्य के नियामक ब्रह्मा जी स्वयं गोपों में गोप बनकर जन्म लेने की कामना करते हुए गर्गसंहिता के वृन्दावन खण्ड, अध्याय-९ के श्लोक संख्या-४३ में कहते हैं कि-
घोषेषु वासिनामेषां भूत्वाऽहं त्वत्पदाम्बुजम्।
यदा भजेयं सुगतिस्तदा भूयान्न चान्यथा ॥४३॥"
अनुवाद- मैं गोप कुल में जन्म लेकर पादपद्मों की आराधना करता करता हुआ सुगति प्राप्त कर सकूँ।
निष्कर्ष- अब यहाँ दो बातें निकल कर बाहर आतीं हैं-
(1) पहली बात यह है कि जब चातुर्वर्ण्य के नियामक ब्रह्मा जी स्वयं वैष्णव वर्ण के गोपों में गोप बनकर जन्म लेने की कामना करते हों, तो इससे यहीं निष्कर्ष निकलता है कि भूतल पर गोपों से बड़ा धर्मज्ञ, सुब्रतज्ञ, सदाचारी और धर्मवत्सल इस सृष्टि जगत में कोई नहीं है।
(2) दूसरी बात यह की जो ब्रह्मा जी स्वयं सृष्टि का सृजन कर्ता होकर अपने चार वर्णों के लोगों को उत्पन्न किया हो वह स्वयं अपने ही सृजन में जन्म लेने की कामना (प्रार्थना) करें यह सम्भव हो ही नहीं सकता। इससे सिद्ध होता है कि ब्रह्मा जी अपनी सृष्टि रचना से अलग स्वराट विष्णु से उत्पन्न वैष्णव वर्ण के गोपों के यहाँ ही जन्म लेने कामना करते है। अतः उपर्युक्त सभी साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि ब्रह्मा जी न तो वैष्णव वर्ण की उत्पत्ति हुई है और न ही गोपों को ब्रह्मा जी ने उत्पन्न किया है। इस लिए गोप और उनका वैष्णव वर्ण ब्रह्मा जी के चातुर्वर्ण्य से बिल्कुल अलग और स्वतंत्र है। जिसमें सभी गोप बिना भेदभाव के निःसंकोच एवं स्वतन्त्रता पूर्वक कार्य करते हुए महाब्राह्मण, महाक्षत्रिय, महावैश्य, और महाशूद्र है। इनको ब्रह्मा जी के चातुर्वर्ण्य में से किसी एक वर्ण में स्थापित करना महामूर्खता है।
अब सवाल यह है कि वैष्णव वर्ण के गोपों को क्षत्रिय न कह कर महाक्षत्रिय क्यों कहा जाता है?
तो इसका उत्तर है- इनको महाक्षत्रिय इस लिए कहा जाता है कि जब भी भू-तल पर धर्म की हानि और पाप की वृद्धि होती है तब गोपेश्वर श्रीकृष्ण गोलोक से अपने सम्तस्त गोप-गोपियो को लेकर भू-तल पर अवतरित होते हैं और गोपेश्वर श्रीकृष्ण अपने गोपों को लेकर धर्म स्थापना के निमित्त सम्पूर्ण विश्व पर विजय प्राप्त करके पुनः धर्म की स्थापना करते हैं। उस समय उनका साथ देने वाले सिर्फ गोप ही होते हैं दूसरा कोई नहीं। इस अद्भुत और असम्भव कार्य की वजह से ही गोपों को क्षत्रिय नहीं वल्कि महाक्षत्रिय कहा जाता है। उनके इस विजय अभियान को "यादवों के विश्वजीत युद्ध" नाम से जाता है। जिसको गर्गसंहिता में "विश्वजीत युद्ध" नामक खण्ड में विशेष रूप में वर्णन किया गया है।
यादवों के इस विश्वजीत युद्ध को इस पुस्तक में अध्यायों के अन्त में "परिशिष्ट-(5) में भी संक्षिप्त रूप में वर्णन किया गया है। वहाँ से पाठक गण जानकारी ले सकते हैं। इसके अतिरिक्त यूट्यूब पर "यादव सम्मान" चैनल पर भी यादवों के विश्वजीत युद्ध को चल चित्र (विडियो) के रुप में बडे़े ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
दूसरा सवाल यह है कि यादवों को महावैष्य (महाव्यापारी) क्यों कहा जाता है? तो इसका उत्तर यह है कि यादव (गोप) पूर्व काल से ही पशु पालक और दुग्ध उत्पादक होने के साथ ही कुशल कृषक भी हैं। इनके इसी वृत्ति (व्यवसाय) की वजह से भगवान श्रीकृष्ण सहित समस्त यादवों को गोपाल कहा जाता है। ये अपने इन सभी कार्यों में पूर्णतया दक्ष हैं। सर्वप्रथम कृषि क्षेत्र में क्रान्ति लाने वाले गोप (यादव) ही हैं। बलराम जी इसके प्रथम उदाहरण है। क्योंकि इन्होंने ही सर्वप्रथम हल और मूल की खोज करके उस समय कृषि क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाए। इसलिए उनका एक नाम हलधर हुआ।
ज्ञात हो- आज भी किसान का प्रतीक हलधर है। बलराम जी अपने हल और मूशल से खेती भी किया करते थे और समय आने पर इसी से महायुद्ध भी करते थे। बलराम जी जब भी भगवान श्रीकृष्ण के साथ भू-तल पर अवतरित होते हैं तो वे अपने हर और मूशल के साथ यादव कुल में ही अवतरित होते हैं। इसकी पुष्टि- गर्गसंहिता के बलभद्र खण्ड के अध्याय-(२) के श्लोक -(१३) से होती है। जिसमें बलराम जी भू-तल पर अवतरित होने से पहले अपने हल और मूसल से कहते हैं-
हे हलमुसले यदा-यदा युवयोः स्मरणंं करिष्यमि।
तदा तदा मत्युर आविर्भूते भवतम्।।१३।
अनुवाद - हे हल और मूसल ! मैं जब-जब तुम्हारा स्मरण करूँ, तब-तब तुम मेरे सामने प्रकट हो जाना।१३।
इसी तरह से भगवान श्रीकृष्ण सहित सभी गोपों को एक साथ कृषक होने की पुष्टि- श्रीगर्गसंहिता, गिरिराज खण्ड के अध्याय-(६ ) से होती है। जिसमें भगवान श्रीकृष्ण नन्दबाबा से कहते हैं कि-
कृषीवला वयं गोपाः सर्वबीजप्ररोहकाः।
क्षेत्रे मुक्ताप्रबीजानि विकीर्णीकृतवाहनम्।२६।
अनुवाद- बाबा हमारे गोप किसान हैं, जो खेतों में सब प्रकार के बीज बोया करते हैं। अतः हमने भी खेतों में मोती के बीच बिखेर दिए हैं।।२६।
उपर्युक्त सन्दर्भों से स्पष्ट होता है श्रीकृष्ण और बलराम और समस्त गोप कृषि और आर्य संस्कृति के जनक होने के साथ साथ किसानों के आदि पूर्वज और प्रतीक भी हैं। क्योंकि अबतक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में इनके जैसा किसान तथा गोपालक भेष (रूप) वाला न तो कोई देवता न किन्नर न गन्धर्व न दैत्य और न ही कोई दानव देखा गया और न ही ब्रह्मा जी के चातुर्वर्ण्य में इनके जैसा कोई है।
सम्पूर्ण निष्कर्ष -
उपर्युक्त सभी सन्दर्भों से सिद्ध होता है कि यादवों का वर्ण "वैष्णव" है जो स्वराट विष्णु से उत्पन्न होने की वजह से ब्रह्मा जी के चातुर्वर्ण्य (मनुवाद) से बिल्कुल अलग और स्वतन्त्र है।
इस लिए यादवों को ब्रह्मा जी के चार वर्णों में से किसी एक वर्ण में स्थापित करना महामूर्खता है।
इस प्रकार से यह अध्याय यादवों के वास्तविक वर्ण की जानकारी के साथ समाप्त हुआ। अब इसके अगले अध्याय-(5) में यादवों के वंश एवं कुल के बारे में जानकारी दी गई।
🫵
अध्याय(5)-
यादवों का वंश एवं कुल
वास्तविकता यह है कि जाती और वंश में बस इतना ही अन्तर होता है कि जाती एक सामूहिक नाम है और वंश उस जाती समूह का व्यक्तिगत नाम है तथा वंश और कुल में रक्त सम्बन्धी घनिष्ठता होती है। वास्तव में देखा जाए तो वंश- दो प्रकार के होते हैं और एक वंश में अनेकों कुल होते हैं। जैसे (क) प्राथमिक या व्यक्तिगत वंश। (ख) टोटम या आध्यात्मिक वंश।
जिसमें हम सबसे पहले यादवों के (दो) प्रकार के वंशों के बारे में बताएंगे उसके उपरान्त यादवों के कुल को बताएंगे।
(क) प्राथमिक या व्यक्तिगत वंश-
प्राथमिक या प्रारंभिक स्तर पर जब किसी जाती के अन्तर्गत किसी विशेष व्यक्ति के नाम पर सर्वप्रथम पहचान स्थापित होती है तो उस व्यक्ति के नाम पर उस जाती का एक वंश स्थापित होता है। इस तरह के वंश को प्राथमिक, प्रारम्भिक या व्यक्तिगत वंश कहा जाता है। इस तरह के वंश के लिए कोई जरुरी नहीं है कि वह विशेष व्यक्ति जिसके नाम पर वंश बना है, वह राजा ही हो। क्योंकि ऐसे बहुत से वंश हैं जो किसी ऋषि-मुनि या विशिष्ट व्यक्ति के नाम से ही बनें हैं। जैसे ब्राह्मण जाति में जितने भी वंश बनें हैं वे सभी किसी न किसी ऋषि मुनि के नाम से ही हैं बनें हैं। इस तरह के वंश में उस जाती का किसी न किसी रूप में ब्लड रिलेशन अवश्य रहता है। जैसे यादवों का वंश "यदुवंश" सर्वप्रथम महाराज यदु से स्थापित हुआ जिसमें यादवों का ब्लड रिलेशन शास्वत उपस्थित है। इसके बारे में आगे विस्तार से बताया गया है।
(ख) टोटम या आध्यात्मिक वंश -:
मानव जाती में दूसरे प्रकार का वंश टोटम या आध्यात्मिक है। इस प्रकार के वंश किसी जाती में तब स्थापित होता है
जब किसी जाती के लोग सामूहिक रूप से किसी प्राकृतिक वस्तु जैसे तारे, ग्रह या उपग्रह को आध्यात्मिक प्रतीक या चिन्ह के रूप स्वीकार करते हुए उसको अपना ईष्ट देव मानकर उसी के नाम पर अपना एक वंश स्थापित करते हैं।इस तरह के वंश को टोटम या आध्यात्मिक वंश कहा जाता है। इस तरह के वंश में उस जाती का किसी भी तरह से ब्लड रिलेशन नहीं होता है। जैसे चंद्रवंश और सूर्यवंश।
हो सकता है कि जो लोग अपने को सूर्यवंशी मानते हों उनका सूर्य से ब्लड रिलेशन होता होगा किन्तु जितने चन्द्रवंशी हैं उनका चन्द्रमा से ब्लड रिलेशन नहीं है। क्योंकि यह ध्रुव सत्य है कि तारे और ग्रहों से पुत्र इत्यादि पैदा करके किसी जाति की जन्मगत वंशावली बताकर उनमें ब्लड रिलेशन स्थापित करना महामूर्खता होगी। क्योंकि यह ध्रुव सत्य है कि चन्द्रमा कोई मानव नहीं है कि उससे पुत्र या पुत्री उत्पन्न होंगी। चन्द्रमा एक आकाशीय पिण्ड है इसलिए चन्द्रमा से पुत्र इत्यादि उत्पन्न करना अवैज्ञानिक एवं कोरी कल्पना ही है। जिसे वर्तमान समय में किसी भी तरह से स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसा वंश अर्थात् आकाशीय पिण्डों वाला वंश केवल आस्था, टोटम और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ही स्वीकार्य किये जा सकतें हैं। इसी आस्था और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यादवों का प्रथम वंश "चन्द्रवंश" हुआ है। किन्तु इसका मतलब यह नहीं है कि यादव चन्द्रमा से उत्पन्न हुए हैं। जबकि इस सम्बन्ध में वास्तविकता यह है कि सभी यादव चन्द्रमा से नहीं बल्कि भगवान श्रीकृष्ण के अंश से उत्पन्न हुए हैं। इसकी पुष्टि- गर्गसंहिता विश्वजित्खण्ड के अध्यायः (२) के श्लोक संख्या- ७ से है जिसमें भगवान श्री कृष्ण उग्रसेन से कहते हैं-
ममांशा यादवाः सर्वे लोकद्वयजिगीषवः॥ जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम्॥७॥
अनुवाद:- समस्त यादव मेरे ही अंश से प्रकट हुए हैं, और वे लोक,परलोक दोनों को जीतने की इच्छा रखने वाले हैं। वे दिग्विजय के लिये यात्रा करके, शत्रुओं को जीतकर लौट आयेंगे और सम्पूर्ण दिशाओं से आपके लिये भेंट और उपहार लायेंगे। ७।
अतः उपरोक्त श्लोक से सिद्ध होता है कि समस्त यादवों की उत्पत्ति चन्द्रमा से नहीं बल्कि श्रीकृष्ण से हुई है।
और जिस तरह से यादवों की उत्पत्ति भगवान श्रीकृष्ण से हुई, उसी तरह से प्रारम्भिक काल में चन्द्रमा की भी उत्पत्ति भगवान श्रीकृष्ण के सोलहवें अंश से उत्पन्न विराट विष्णु से हुई। इसकी पुष्टि ऋग्वेद के १०/९०/१३ की ऋचा से होती है जिसमें लिखा गया है कि -
चन्द्रमा मनसो जातश्वक्षोः सूर्यो अजायत।
मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्रणाद्वायुरजायत।।१३।
अर्थात् - परमात्मा-रूपी पुरुष के मन से चन्द्रमा उत्पन्न हुआ, उसके चक्षु से सूर्य, श्रोत्र से वायु और प्राण तथा मुख से अग्नि, उत्पन्न हुई।
✳️ ज्ञात हो पूर्व काल से ही चन्द्रमा और यादवों की उत्पत्ति विशेष के कारण यादवों और चन्द्रमा में घनिष्ठ सम्बन्ध रहा। जिसके परिणाम स्वरूप यादवों ने भूतल पर चन्द्रमा को अपना प्रथम ईष्ट देव मानकर चन्द्रमा के नाम पर अपना टोटम या कहें आध्यात्मिक एवं प्राथमिक वंश "चन्द्रवंश" को स्थापित किया।
विशेष- चन्द्रवंश की वास्तविक उत्पत्ति के बारे में विशेष जानकारी इसी पुस्तक की परिशिष्ट कथा भाग (8) में दी गयी है। जिसमें बताया गया है किस तरह से पौराणिक कथा कारों ने अवैज्ञानिक, काल्पनिक और मनगढ़ंत तरीके से एक आकाशीय पिण्ड चन्द्रमा और बुद्ध से पुरूष तथा एक स्त्री को एक महीने के लिए घोड़ी तो कभी एक महीने के लिए उसे स्त्री बना कर उससे चन्द्रवंशी यादवों की उत्पत्ति को बताया हैं। जिसे आज के वैज्ञानिक युग में किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं किया जा सकता।
और यह ध्रुव सत्य है कि- हर द्वापर युग में भूतल पर इसी चन्द्रवंश में भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ करता है। इसकी पुष्टि- विष्णु पुराण के पञ्चंम अंश के अध्याय-२३ के श्लोक सं- २४ में कहते हैं कि-
कस्त्वमित्याह सोऽप्याह जातोऽहं शशिनः कुले।
वसुदेवस्य तनयो यदोर्वंशसमुद्भवः।।२४।
अनुवाद - मैं चन्द्रवंश के अन्तर्गत यदुकुल में वसुदेव जी के पुत्र रूप से उत्पन्न हुआ हूँ।
और आगे चलकर इसी चन्द्रवंश में महाराज यदु के नाम पर यदुवंश का उदय हुआ जिसके समस्त सदस्यपत्तियों को यादव कहा जाता है। इसकी पुष्टि-
विष्णु पुराण के चौथे अंश के अध्याय- ग्यारह के श्लोक २८ से ३० से होती है, जिसमें लिखा गया है कि -
यतो वृष्णिसंज्ञामेतद् गोत्रमवाप।। २८।।
मधुसंज्ञाहेतुश्च मधुरभवत्।। २९।।
यादवाश्च यदुनामोपलक्षणादिति।। ३०।।
अनुवाद - २८-३०
मधु के कारण इसकी संज्ञा मधु हुई, और यदु के नामानुसार इस वंश के लोग यादव कहलाए।
जिस तरह से भगवान श्रीकृष्ण को चन्द्रवंश में अवतरित होने की पुष्टि होती है उसी तरह से उनको यादव वंश में भी अवतरित होने की पुष्टि- श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कन्ध के अध्याय -४ के श्लोक संख्या- २२ से होती है जिसमें लिखा गया है कि-
भूमेर्भरावतरणाय यदुष्वजन्मा जातः करिष्यति सुरैरपि दुष्कराणि।
वादैर्विमोहयति यज्ञकृतोऽतदर्हान् शूद्रान कलौ क्षितिभुजो न्यहनिष्यदन्ते।।२२।
अनुवाद - अजन्मा होने पर भी पृथ्वी का भार उतारने के लिए वे ही भगवान यदुवंश में जन्म लेंगे और ऐसे-ऐसे कर्म करेंगे, जिन्हें बड़े-बड़े देवता भी नहीं कर सकते।
इसी तरह से भगवान श्रीकृष्ण को अहीर जाती के यादव वंश के गोकुल में जन्म लेने की पुष्टि- हरिवंश पुराण के विष्णु पर्व के ग्यारहवें अध्याय के श्लोक संख्या -५८ से होती है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि-
एतदर्थं च वासोऽयंव्रजेऽस्मिन् गोपजन्म च।
अमीषामुत्पथस्थानां निग्रहार्थं दुरात्मनाम्।।५८।
अनुवाद - इसीलिए ब्रज में मेरा यह निवास हुआ है ; और इसीलिए मैंने गोपों (आभीरों) में अवतार ग्रहण किया है।
विशेष - यादव वंश को और विस्तार से जानने के लिए इसके अध्याय (7) के भाग (क/3) में महाराज यदु का परिचय तथा इस पुस्तक के अध्यायों के अन्त में "परिशिष्ट कथा (9)" में यादवों की वंशावली को विस्तार से बताया गया है।
कुल मिलाकर उपर्युक्त सन्दर्भों से सिद्ध होता है कि आभीर जाति के विकास क्रम में चन्द्रवंश के अन्तर्गत यदुवंश का उदय हुआ। यदुवंश में भगवान श्रीकृष्ण को अवतरित होने से ही उन्हें यादव कहा गया जो उनकी वंश मूलक पहचान है। तथा उनको गोप कुल में जन्म लेने से उन्हें गोप कहा गया जो उनके कुल रूपी पहचान है। इसी क्रम में उन्हें गोपालन करने से उन्हें गोप और गोपाल कहा गया जो उनकी वृत्ति यानी व्यवसाय मूलक पहचान है। इसी तरह से उनकी जाति मूलक पहचान के लिए अभीर या अहीर कहा गया। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण सहित आभीरो को चाहे अहीर कहें, गोप कहें , गोपाल कहें, कहें, या यादव कहें, चन्द्रवंशी कहें सब एक ही बात है।
(ग) यादवों का कुल
यदि कुल के विकास क्रम को देखा जाए तो कई व्यक्तियों के मिलने से एक परिवार बनता है और कई परिवारों के मिलने एक कुल बनता और अनेकों कुलों के मिलने से उनका एक वंश बनता है जिसमें किसी एक जाती विशेष का रक्त सम्बन्ध होता है। इसलिए वंश और कुल में केवल छोटा और बड़ा का ही अन्तर है बाकी कोई अन्तर नहीं है। क्योंकि ये सभी जाती विकास के क्रमिक सोपान है। इसलिए कभी कभी लोग वंश को ही कुल और कुल को ही वंश मान लेते है। इसमें कोई ग़लत नहीं है क्योंकि पौराणिक ग्रन्थों में कहीं-कहीं यादवों के वंश "यदुवंश" को ही "कुल" तथा कहीं-कहीं यादवों के वर्ण "वैष्णव" को कुल और कहीं पर यादवों के कुल "गोप कुल" को मुख्य कुल मानकर भगवान श्रीकृष्ण को भूतल पर जन्म लेने को बताया गया है। किन्तु सभी तरह से कही गई बातें एक ही है, इसको अच्छी तरह से समझनें की आवश्यकता है। इसके लिए निम्नलिखित (तीन) उदाहरण प्रस्तुत है।
(१)- श्रीकृष्ण का जन्म यदुकुल में -
(क)- पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय- (१७) के श्लोक संख्या-(१६१) में सावित्री विष्णु को शाप देते हुए कहती हैं कि-
यदा यदुकुले जातः कृष्णसंज्ञो भविष्यसि।
पशूनां दासतां प्राप्य चिरकालं गोप रूपेण भ्रमिष्यसि ।।१६१।
अनुवाद - हे विष्णु ! जब तुम यदुकुल में जन्म लोगे, तो तुम कृष्ण के नाम से जाने जाओगे। उस समय तुम पशुओं (गायों) के सेवक बनकर गोप रुप में लम्बे समय तक इधर-उधर भ्रमण करते रहोगे।१६१।
(ख)- गर्ग संहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय- (२८) के श्लोक संख्या (४५) व (४६) में श्रीकृष्ण का जन्म यदुकुल में होने की पुष्टि होती है।
राजंस्त्वं हि न जानसि परिपूर्णतमं हरिम्।
सुराणां महदर्थाय जातं यदुकुले स्वयंम्।
भुवो भारावताराय भक्तानां रक्षणाय च।।४५।
भूत्वा यदुकुले साक्षाद् द्वारकायां विराजते।
तेन कृष्णेन पुत्रोऽयं प्रदुम्नो यादवेश्वरः।
उग्रसेनमखार्थाय जगज्नेतुं प्रणोदित:।।४६।
अनुवाद - ४५-४६
• राजन ! तुम नहीं जानते कि परिपूर्णतम परमात्मा श्रीहरि, देवताओं का महान कार्य सिद्ध करने के लिए यदुकुल में अवतीर्ण हुए हैं। ४५
• पृथ्वी का भार उतारने और भक्तों की रक्षा करने के लिए यदुकुल में अवतीर्ण हो वे साक्षात भगवान द्वारिकापुरी में विराजते हैं। उन्हीं श्रीकृष्ण ने उग्रसेन के यज्ञ की सिद्धि के लिए सम्पूर्ण जगत को जीतने के निमित्त अपने पुत्र यादवेश्वर प्रद्युम्न को भेजा है।४६।
(उपर्युक्त श्लोकों में श्रीकृष्ण को यदुकुल में जन्म लेने की बात कही गई है। ऐसे ही बहुत से उदाहरण हैं उन सभी को दोहराना उचित नही है।)
(२)- श्रीकृष्ण का जन्म यदुवंश में -
(क)- श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कन्ध के अध्याय-(६) के श्लोक संख्या -(२३) और (२५) में श्रीकृष्ण का जन्म यदुवंश में होने की पुष्टि होती है। जिसमें ब्रह्माजी श्रीकृष्ण से कहते हैं कि-
अवततीर्य यदोर्वंशे बिभ्रद् रुपमनुत्तमम्।
कर्माण्युद्दामवृत्तानि हिताय जगतोऽकृथाः।। २३।
यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरूषोत्तम।
शरच्छतं व्यतीताय पंचविंशाधिकं प्रभो।।२५।
अनुवाद - आपने यह सर्वोत्तम रूप धारण करके यदुवंश में अवतार लिया और जगत् के हित के लिए उदारता और पराक्रम से भरी अनेक लीलाएँ कीं ।२३।
• पुरुषोत्तम सर्वशक्तिमान प्रभु ! आपको यदुवंश में अवतार ग्रहण किये "एक सौ पचीस वर्ष" बीत गए हैं।२५।
(ख)- श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कन्ध के अध्याय -४ के श्लोक संख्या- २२ में श्रीकृष्ण का जन्म यदुवंश में होने की पुष्टि होती है।
भूमेर्भरावतरणाय यदुष्वजन्मा जातः करिष्यति सुरैरपि दुष्कराणि।
वादैर्विमोहयति यज्ञकृतोऽतदर्हान् शूद्रान कलौ क्षितिभुजो न्यहनिष्यदन्ते।।२२।
अनुवाद - अजन्मा होने पर भी पृथ्वी का भार उतारने के लिए वे ही भगवान यदुवंश में जन्म लेंगे और ऐसे-ऐसे कर्म करेंगे, जिन्हें बड़े-बड़े देवता भी नहीं कर सकते।
(उपर्युक्त श्लोकों में श्रीकृष्ण को यदुवंश में जन्म लेने की बात कही गई है। ऐसे ही और बहुत से उदाहरण हैं।)
(३)- श्रीकृष्ण का जन्म गोप कुल या आभीर जाति में -
हरिवंश पुराण के विष्णु पर्व के ग्यारहवें अध्याय के श्लोक संख्या -५८ में श्रीकृष्ण का जन्म गोप कुल या आभीर जाति में होने को बताया गया है। जिसकी पुष्टि स्वयं श्रीकृष्ण ने ही किया है।
एतदर्थं च वासोऽयंव्रजेऽस्मिन् गोपजन्म च।
अमीषामुत्पथस्थानां निग्रहार्थं दुरात्मनाम्।।५८।
अनुवाद - इसीलिए ब्रज में मेरा यह निवास हुआ है ; और इसीलिए मैंने गोपों (आभीरों) में अवतार ग्रहण किया है।
(हरिवंश पुराण के उपर्युक्त श्लोकों में श्रीकृष्ण को गोकुल या आभीर जाति में जन्म लेने की बात कही गई है। ऐसे ही बहुत से उदाहरण हैं।)
अतः भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से सम्बन्धित उपर्युक्त सभी श्लोकों से सिद्ध होता है किसी भी जाति में एक वंश होता है और वंश में अनेकों कुल और होते हैं। यहीं कारण है कि महाभारत काल में यादवों के कुलों की संख्या एक सौ से भी अधिक थी। उन सभी का एक ही मुख्य कुल था जिसका नाम था "वैष्णव कुल" इसी वैष्णव कुल में यादवों के अनेकों कुल- अन्धक, वृष्णि, कुकुर, भोज इत्यादि थे। जिनको कुल या खानदान के नाम से जाना भी जाता था। इसकी पुष्टि- वायुपुराण उत्तरार्द्ध भाग के अध्याय-३४ के श्लोक- २५५ और २५६ से होती है।
कुलानि दश चैकञ्च यादवानां महात्मनाम्।
सर्व्वमककुलं यद्वद्वर्त्तते वैष्णवे कुले ।२५५।
विष्णुस्तेषां प्रमाणे च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः।
निदेशस्थायिभिस्तस्य बद्ध्यन्ते सर्वमानुषाः। २५६।
अनुवाद:- (२५५ से २५६) यादवों के एक सौ एक वैष्णव कुल हैं। उन सभी में स्वराट् विष्णु (श्रीकृष्ण) विद्यमान हैं। *उन सबके प्रमाण और प्रभुत्व में श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) व्यवस्थित हैं। जिनके निर्देशन में सभी यादव मनुष्य प्रतिबद्ध (बन्धे हुए) हैं।२५५, २५६।
इसी तरह से मत्स्यपुराण के अध्यायः (४७) के श्लोक २८और २९ में यादवों के मुख्य वैष्णव कुल में सौ से अधिक उपकुल होने को बताया गया है-
कुलानां शतमेकं च यादवानां महात्मनाम् ।
सर्वमेतत्कुलं यावद्वर्तते वैष्णवे कुले।२८।
विष्णुस्तेषां प्रणेता च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः।
निदेशस्थायिनस्तस्य कथ्यन्ते सर्वयादवाः।२९।
अनुवाद - (२८, २९) इन महाभाग यादवों के एक सौ एक कुल थे। जो सब-के सब श्रीकृष्ण से सम्बन्धित वैष्णव कुल के अन्दर ही विद्यमान थे।। २८।
भगवान श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) उनके नेता और स्वामी थे। तथा वे सभी यादव श्रीकृष्ण की आज्ञा के अधीन रहते थे। ऐसा कहा जाता है।।२९
अतः उपर्युक्त श्लोकों से सिद्ध होता है कि यादवों का एक मुख्य कुल है जिसका नाम है "वैष्णव कुल" इसी वैष्णव कुल में अनेकों उपकुल हैं जो वैष्णव नाम से ही जानें जातें हैं, क्योंकि उन सभी में प्रमाण और प्रभुत्व में श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) व्यवस्थित रहते हैं। जिनके निर्देशन में सभी यादव मनुष्य प्रतिबद्ध (बन्धे हुए) हैं। इस बात को पहले ही बता दिया गया है।
निष्कर्ष-
उपर्युक्त सभी सन्दर्भों से सिद्ध होता है कि यादवों का टोटम (आध्यात्मिक) वंश "चंद्रवंश" हैं, तथा मुख्य वंश यादव वंश है और इनका मुख्य कुल और वर्ण दोनों ही "वैष्णव" है जिसमें छोटे बड़े अनेकों उपकुल समाहित हैं। जिनको आज भी भारत के अलग-अलग प्रान्तों में अलग-अलग नामों से जाना जाता हैं। भारत में वर्तमान समयं के यादवों के कुलों के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी इस पुस्तक के अध्याय (9) में दी गई है। इसके अतिरिक्त हमारी दूसरी पुस्तक "श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" में यादवों के कुलों के बारे में और विस्तार से बताया गया।
अब इसके अगले अध्याय में (6) में यादवों के गोत्र के बारे में जानकारी दी गई। उसको भी इस अध्याय के साथ जोड़कर अवश्य पढे़ें ।
🫵
अध्याय(6)-
यदवों का गोत्र
इस अध्याय का मुख्य उदेश्य किसी जाती के अन्तर्गत गोत्रों का निर्धारिण कब और कैसे होता है की जानकारी के साथ ही यादवों के प्रमुख गोत्रों के बारे में भी जानकारी देना है कि यादवों में कितने गोत्र और उप गोत्र हैं तथा यादवों का मुख्य गोत्र क्या है?
तो सबसे पहले हम लोग गोत्र के बारे में जानेंगे की गोत्र क्या होता है और मानव जीवन में इसकी आवश्यकता क्या है।
गोत्र की परिभाषा -
गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज के अनुसार "गोत्र शब्द से तात्पर्य विवाह इत्यादि के अवसरों पर अपने किसी आदि पुरुष के नाम पर अपना परिचय देना या उसके नाम का आह्वान करना है"।
गोत्र के बारे में भरत मुनि का कहना हैं कि - "गोत्रम्- गवते शब्दयति पूर्व्व पुरुषान् यतिति"। अर्थात् जिसके द्वारा अपने कुल के पूर्व पुरुष का आह्वान किया जाए वह गोत्र है।
गोत्र का शाब्दिक और ऐतिहासिक अर्थ-
संस्कृत में 'गो' का अर्थ 'इंद्रियाँ' और 'त्र' का अर्थ 'रक्षा करना होता है, अर्थात 'इंद्रियों के आघात से रक्षा करने वाला। ऋग्वेद में इसका प्रारम्भिक अर्थ "गोष्ठ" (वह स्थान जहाँ गायें रखी जाती थीं) था, जो बाद में एक ही वंश या कुल की पहचान बन गया।
ऋषि परम्परा के अनुसार और हिंदू धर्म के अनुसार हम सभी प्राचीन ऋषियों की सन्तानें हैं। गोत्र उस मूल पुरुष या ऋषि की पहचान है जिससे वंश का आरम्भ हुआ। उदाहरण के लिए, 'कश्यप गोत्र' के लोग ऋषि कश्यप के वंशज माने जाते हैं।
व्याकरणिक परिभाषा-
महर्षि पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी में गोत्र को 'अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम् कहा है। जिसका अर्थ है— "पौत्र (पोते) से लेकर आगे की संतानें गोत्र कहलाती हैं"।
कुल और वंश की पहचान: गोत्र एक अविच्छिन्न पितृवंश को दर्शाता है। जो एक ही पूर्वज से जुड़ी रक्त संबंधी निकटता को स्पष्ट करता है, जिसके कारण 'सगोत्र' (एक ही गोत्र) में विवाह वर्जित माना जाता है ताकि अनुवांशिक रोगों से बचा जा सके।
विशेष - अमरकोश के अनुसार गोत्र कुल का भी पर्याय है।
गोत्र की उत्पत्ति-
वास्तव में देखा जाए तो किसी भी जाती में व्यक्ति का गोत्र मुख्यतः तीन प्रकार या कहें तीन तरह से स्थापित या निर्धारित होता है-
(1)- जनन या (Genetic) गोत्र।
(2) पिण्ड गोत्र
(3)- स्थानीय गोत्र।
(4)- गुरु गोत्र।
उपर्युक्त तीनों प्रकार के गोत्रों के बारे नीचे क्रमबद्ध बताया गया है।
(1)- जनन, या (Genetic) गोत्र-
जनन गोत्र को मूल गोत्र, या आनुवंशिक गोत्र भी कहा जाता है। जनन गोत्र अपने नाम की सार्थकता को सिद्ध करते हुए यह पहचान कराता है कि किसी व्यक्ति का जन्मगत आधार क्या है और उसकी प्रारम्भिक उत्पत्ति किससे हुई है। अर्थात उसके प्रथम जनक कौन हैं।
जनन गोत्र में किसी जाति के समस्त व्यक्तियों का रक्त सम्बन्ध होता है जिनके प्रत्येक सदस्यों की D.N.A. संरचना लगभग एक समान होती है। जैसे जो लोग अपने को ब्रह्मा की सन्तान मानते हैं। उन सभी का जनन गोत्र कहें या मूल गोत्र- "ब्राह्मी गोत्र" है। जैसे- ब्रह्माजी के मुख से उत्पन्न कुछ ब्राह्मण इत्यादि। इसके अतिरिक्त बहुत से ब्राह्मणों का गोत्र किसी न किसी ऋषि मुनि के नाम से भी स्थापित है। तथा जिनके गोत्र का कुछ अता पता नहीं है वे सभी लोग कश्यप गोत्र के अन्तर्गत आते हैं। अब हम लोग जनन गोत्र सिद्धान्त के अनुसार यादवों के जनन गोत्र को जानेंगे।
यादवों का जनन गोत्र-
जनन गोत्र सिद्धान्त के अनुसार यादवों का जनन गोत्र कार्ष्ण है। क्योंकि कृष्ण पद में सन्तान वाचक अण् प्रत्यय लगाने पर "कार्ष्ण" पद बना है। (कृष्णस्येदम् + अण् = कार्ष्ण) जिसका अर्थ है श्रीकृष्ण की सन्तान अर्थात् जो श्रीकृष्ण से उत्पन्न हुआ हो। इस हिसाब से देखा जाए तो आभीर जाती के अन्तर्गत समस्त गोप-गोपियों अर्थात् यादवों का जन्म प्रारम्भिक काल में गोपेश्वर श्रीकृष्ण और श्रीराधा से हुआ है।
इसलिए यादवों में श्रीकृष्ण का ही रक्त विद्यमान है। इस बात की पुष्टि- उस समय होती है जब सावित्री द्वारा विष्णु को दिये गये शाप को गायत्री ने वरदान में बदलते हुए विष्णु से जो कुछ कहा उसका वर्णन- स्कन्द पुराण खण्ड- (६) के नागर खण्ड के अध्याय- १९३ के श्लोक -(१४) में मिलता है। जिसमें आभीर कन्या गायत्री विष्णु से कहती हैं कि -
तेनाकृत्येऽपि रक्तास्ते गोपा यास्यन्ति श्लाघ्यताम्॥
सर्वेषामेव लोकानां देवानां च विशेषतः ॥१४॥
अनुवाद - हे विष्णो (कृष्ण)! तुम्हारे रक्त सम्बन्धी (blood relative) सभी गोप (अहीर) बिना कुछ किये ही तुम्हारे द्वारा प्रसिद्धि को प्राप्त हो जाऐंगे।१४
देखा जाए तो उपर्युक्त श्लोक में देवी गायत्री बड़े ही स्पष्ट रूप से गोपों (आभीरों) को श्रीकृष्ण का ही रक्त सम्बन्धी (blood relative) होने को कहतीं हैं। इसलिए यादवों का जनन गोत्र श्रीकृष्ण के नामानुसार "कार्ष्ण" है।
और जहाँ तक गोप और गोपियों का जन्म श्रीकृष्ण और श्रीराधा से होने की बात है तो इसकी पुष्टि के लिए निम्नलिखित साक्ष्य प्रस्तुत हैं-
(१)- ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खण्ड के अध्याय-(४८) केश्लोक (४३) से है जिसमें शिव जी पार्वती से कहते हैं कि-
"बभूव गोपीसंघश्च राधाया लोमकूपतः।
श्रीकृष्णलोमकूपेभ्यो बभूवुः सर्वबल्लवाः।।४३।
अनुवाद -• श्रीराधा के रोम कूपों (कोशिकाओं) से गोपियों का समुदाय प्रकट हुआ है, तथा श्रीकृष्ण के रोम कूपों (कोशिकाओं) से सम्पूर्ण गोपों का प्रादुर्भाव हुआ है।
विशेष - ध्यान रहे रोम कूपों को ही आज विज्ञान की भाषा में कोशिका कहा जाता है जिसकी क्लोनिंग करके जीव के समान जीवन की उत्पत्ति की जाती है। इसी सिद्धान्त के अनुसार पूर्व काल में ही भगवान श्रीकृष्ण ने गोपों अपने ही समरूप उत्पन्न किया है। गोप और गोपियों को श्रीकृष्ण और श्रीराधा के समरुप होने की पुष्टि निम्नलिखित सन्दर्भों से होती है-
(1)-ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय-५ के श्लोक संख्या- (४०) और (४२) में लिखा गया है कि -
तस्या राधायाश्च लोमकूपेभ्यः सद्योगोपाङ्गनागणः।
आविर्बभूव रूपेण वेशेनैव च तत्समः ।४०।।
कृष्णस्य लोमकूपेभ्यः सद्यो गोपगणो मुने।
आविर्बभूव रूपेण वेषेणैव च तत्समः। ४२।
अनुवाद- (४०-४२) उसी क्षण उस किशोरी अर्थात् श्रीराधा के रोमकूपों से तत्काल ही अनेक गोपांगनाओं की उत्पत्ति हुई; जो रूप और वेष में राधा के ही समान थीं। ४०।
फिर तो श्रीकृष्ण के रोम कूपों से भी अनेक गोप- गणों का आविर्भाव हुआ जो रूप और वेष रचना में श्रीकृष्ण के ही समान थे।४२।
(2)- इसी तरह से ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृति खण्ड के अध्याय -(३६ के श्लोक- ६२) में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं गोप और गोपियों की उत्पत्ति के बारे में राधा जी से कहते हैं-
"गोपाङ्गनास्तव कला अत एव मम प्रियाः।
मल्लोमकूपजा गोपाः सर्वे गोलोकवासिनः। ६२।
अनुवाद- हे राधे ! समस्त गोपियाँ तुम्हारी कलाऐं हैं। और सभी गोलोक वासी गोप मेरे रोमकूपों से उत्पन्न मेरी ही कलाऐं तथा अंश हैं।६२।
(3)- इसी तरह से गर्गसंहिता विश्वजित्खण्ड के अध्याय- (२) के श्लोक संख्या- (७) में भगवान श्री कृष्ण उग्रसेन से कहते हैं-
ममांशा यादवाः सर्वे लोकद्वयजिगीषवः॥ जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम्॥७॥
अनुवाद:- समस्त यादव मेरे ही अंश से प्रकट हुए हैं, और वे लोक,परलोक दोनों को जीतने की इच्छा रखने वाले हैं। वे दिग्विजय के लिये यात्रा करके, शत्रुओं को जीतकर लौट आयेंगे और सम्पूर्ण दिशाओं से आपके लिये भेंट और उपहार लायेंगे। ७।
अतः उपर्युक्त सभी साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि गोप और गोपियों (यादवों) का जन्म गोपेश्वर श्रीकृष्ण और श्रीराधा से समरुपण विधि से हुआ है। इस लिए यादवों का जनन गोत्र गोत्र "कार्ष्ण" ही हुआ। यह वैज्ञानिक और ध्रुव सत्य है।
✳️ किन्तु आश्चर्य है कि अधिकांश यादव लोग अपने जनन गोत्र "कार्ष्ण" के स्थान पर एक ब्राह्मण ऋषि अत्रि के नाम पर अपना जनन गोत्र स्थापित कर अपने मूल जनन गोत्र को ही भूल गए। इसको गुरु गोत्र वाले प्रकरण में आगे बताया गया है कि यादवों का जनन गोत्र "कार्ष्ण" है या अत्रि?
अब हमलोग इसी क्रम में पिण्ड गोत्र के बारे में जानेंगे।
(2)पिण्ड गोत्र-
जनन गोत्र की ही तरह पिण्ड गोत्र भी होता है। किन्तु पिण्ड गोत्र "जनन" गोत्र के बाद की उत्पत्ति को दर्शाता है। पिण्ड गोत्र को पित्र गोत्र भी कहा जाता है, जो किसी जाति विशेष के पूर्वजों के नाम से होता है जिसके कारण अनेक पिण्ड गोत्रों की उत्पत्ति होती है। इसी पित्र गोत्र को ध्यान में रखकर सगोत्र विवाह वर्जित है। किन्तु माता की पाँचवीं तथा पिता की सातवीं पीढ़ियों के बाद सपिण्डता का दोष नहीं रहता है। वर्तमान समय में यादवों में उनके पूर्वजों के नाम पर बहुत से पिण्ड गोत्र हैं जिनका यहाँ पर वर्णन करना सम्भव नहीं है। अब हम लोग यादवों के स्थानीय गोत्र के बारे में विस्तार से जानेंगे।
(3)- स्थानीय गोत्र-
स्थानीय गोत्र को कभी-कभी कुल या खानदान भी कहा जाता है। स्थानीय गोत्र वे होते हैं- जो किसी व्यक्ति समूह की भौगोलिक स्थिति को दर्शाते हुए स्थान विशेष की पहचाँन कराते हैं। इस तरह के गोत्रों की उत्पत्ति तब होती है जब एक ही जाति और वंश के लोग किसी परिस्थिति विशेष के कारण अपने मूल निवास स्थान से पलायन (Migrate) कर जाते हैं, अर्थात वे अपने मूल निवास स्थान को छोड़कर अपने समूह सहित अन्यत्र जाकर बस जातें हैं। तब उनके मूल स्थान के नाम पर उनका एक उपगोत्र बन जाता हैं। किन्तु उनका मूल जनन गोत्र पूर्ववत बना रहता है।
इस तरह के स्थानीय गोत्र अधिकांशतः गोपों अर्थात यादवों में देखने को मिलता है। यहीं कारण है कि यादवों में इस तरह के गोत्र बहुतायत पाए जाते हैं। देखा जाए तो भारत के हर प्रान्तों में यादवों की पहचान अलग-अलग स्थानीय गोत्रों से होती है। किन्तु उनका मूल जनन गोत्र "कार्ष्ण" ही है, जिसमें श्रीकृष्ण का रक्त सम्बन्ध है पूर्ववत बना रहता है। यादवों के प्रान्तिय या स्थानीय स्तर पर उनकी पहचान को
अध्याय(9)- में विस्तार पूर्वक बताया गया।
महाभारत काल में यादवों के स्थानीय गोत्र (कुल) एक सौ से भी अधिक थे। जिनको कुल या खानदान के नाम से जाना भी जाता था। इनके सभी कुलों को श्रीकृष्ण के नामानुसार वैष्णव कुल कहा गया है, क्योंकि उनमें भी श्रीकृष्ण का ही रक्त सम्बन्ध है। इसकी पुष्टि- वायुपुराण उत्तरार्द्ध भाग के अध्याय-३४ के श्लोक- २५५ और २५६ से होती है।
कुलानि दश चैकञ्च यादवानां महात्मनाम्।
सर्व्वमककुलं यद्वद्वर्त्तते वैष्णवे कुले ।२५५।
विष्णुस्तेषां प्रमाणे च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः।
निदेशस्थायिभिस्तस्य बद्ध्यन्ते सर्वमानुषाः। २५६।
अनुवाद:- २५५-२५६
• यादवों के एक सौ एक वैष्णव कुल हैं। उन सभी में स्वराट् विष्णु (श्रीकृष्ण) विद्यमान हैं।२५५।
• उन सबके प्रमाण और प्रभुत्व में श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) व्यवस्थित हैं। जिनके निर्देशन में सभी यादव मनुष्य प्रतिबद्ध (बन्धे हुए) हैं।२५६।
इसी तरह से श्रीमद्भागवतपुराण उत्तरार्द्ध स्कन्ध १० अध्याय-९० के श्लोक- ४४ में यादवों के स्थानीय गोत्रों एवं कुलों की संख्या के बारे में लिखा गया कि-
तन्निग्रहाय हरिणा प्रोक्ता देवा यदोः कुले ।
अवतीर्णाः कुलशतं तेषां एकाधिकं नृप॥४४॥
अनुवाद :- उन दैत्यों का निग्रह (दमन) करने के लिए ही यादव वंश के कुलों में हरि (श्रीकृष्ण ) के कहने पर देवों ने अवतार लिया था। उनके कुलों की संख्या एक सौ एक थीं।४४
इसी तरह से मत्स्यपुराण के अध्यायः (४७) के श्लोक २८और २९ में यादवों के गोत्रों (कुलों) की संख्या के बारे में लिखा गया है कि
कुलानां शतमेकं च यादवानां महात्मनाम् ।
सर्वमेतत्कुलं यावद्वर्तते वैष्णवे कुले।२८।
विष्णुस्तेषां प्रणेता च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः।
निदेशस्थायिनस्तस्य कथ्यन्ते सर्वयादवाः।२९।
अनुवाद - २८-२९
• अनुवाद - इन महाभाग यादवों के एक सौ एक कुल थे। जो सब-के सब श्रीकृष्ण से सम्बन्धित वैष्णव कुल के अन्दर ही विद्यमान थे।। २८।
• भगवान श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) उनके नेता और स्वामी थे। तथा वे सभी यादव श्रीकृष्ण की आज्ञा के अधीन रहते थे। ऐसा कहा जाता है।।२९
इसी तरह से विष्णु पुराण के चौथे अंश के अध्याय- १५ के श्लोक ४७,४८ और ४९ में यादवों के गोत्रों (कुलों) की संख्या के बारे में लिखा गया है कि-
देवासुरे हता ये तु दैतेयास्मुमहाबलाः।
उत्पन्नास्ते मनुष्येषु जनोपद्रवकारिणः॥४७।
तेषामुत्सादनार्थाय भुविदेवा यदो: कुले।
अवतीर्णा: कुलशतं यत्रैकाभ्यधिकं द्विज:।४८।
विष्णुस्तेषां प्रमाणे च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः।निदेश्षस्थायिनस्तस्य ववृधुस्सर्वयादवाः॥४९।
अनुवाद:-४७-४८,४९
• देवासुर संग्राम में महाबली दैत्यगण मारे गये थे।
वे मनुष्य लोक में उपद्रव करने वाले राजालोग बनकर उत्पन्न हुए।४७।
• उनका नाश करने के लिए देवों ने यदुवंश में जन्म लिया उस यदुवंश में एक सौ एक कुल थे।४८।
• विष्णु उन सबके प्रमाण में और प्रभुत्व में व्यवस्थित हैं। विष्णु के निर्देशन में सभी यादव मनुष्य प्रतिबद्ध (बन्धे हुए) हैं।४९।
तब ऐसे में प्रश्न उठाना स्वाभाविक है कि यादवों में इतनें कुल या स्थानीय गोत्र क्यों और कैसे हुए ?
तो यादवों में इतनें कुल (परिवार) या स्थानीय गोत्र होने का मुख्य कारण यह रहा कि- यादवों में स्थान परिवर्तन की परम्परा पूर्व काल से ही रही है। देखा जाए तो पूर्व काल में कंस के अत्याचारों से बहुत से यादव मथुरा छोड़कर यत्र-तत्र सर्वत्र बस गए।
इसी तरह से केशी राक्षस के भय से नन्द बाबा के पिता पर्जन्य मथुरा छोड़कर परिवार सहित गोकुल में जा बसे। किन्तु वहाँ पर पशुओं के लिए अच्छा चारागाह न होने के कारण नन्द बाबा गोकुल को भी छोड़कर श्रीकृष्ण सहित समस्त गोपों के साथ ब्रज के बृन्दावन में रहने लगे।
इसके अतिरिक्त जब श्रीकृष्ण कंस का वध करके मथुरा में रहने लगे तब वहाँ पर जरासंध के बार बार आक्रमण से तंग आकर अपने समस्त गोपों के साथ मथुरा छोड़कर द्वारकापुरी में रहने लगे।
कहने का तात्पर्य यह है कि यादवों में स्थान परिवर्तन की परम्परा पूर्व काल से ही रही है। जिसके परिणामस्वरूप यादवों के अनेकों स्थानीय गोत्रों (परिवारों) कुलों का उदय हुआ। जैसे- अन्धक, वृष्णि, कुकुर, भोज इत्यादि जितने भी हुए उन सभी का जनन गोत्र "कार्ष्ण" या कहें उनका मुख्य कुल-खान्दान "वैष्णव ही था। क्योंकि (स्वराट विष्णु) अर्थात् श्रीकृष्ण उन सबके प्रमाण में और प्रभुत्व में व्यवस्थित थे ऐसी बात उपर्युक्त श्लोकों में लिखी गई है।
ठीक उसी तरह से आज वर्तमान समय में भी यादवों की पहचान हर प्रान्तों में अलग-अलग गोत्रों, परिवारों, या कुलों से होती हैं। किन्तु उनका मूल जनन गोत्र "कार्ष्ण गोत्र" ही। जैसे- ढ़़ढ़ोर, ग्वाल, कृष्नौत, मझरौट, मथुरौट, नारायणी, घोसी, घोष, गोल्ला, गवली, मरट्ठा, मथुवंशी, इत्यादि बहुत से स्थानीय उपगोत्र हैं और उसी आधार पर उनकी पहचान स्थापित है, उन सभी को यहाँ बता पाना सम्भव नहीं है।
इसके अतिरिक्त भारत से सटे राज्य नेपाल में भी यादवों के बहुत से स्थानीय उपगोत्र है जैसे - सिराहा, धनुषा, सप्तरी, बारा, रौतहट, सरलाही, परसा, महोत्तरी, बांके, सुनहरी इत्यादि। ये सभी यादवों के वैष्णव कुल के ही स्थानी गोत्र, उपगोत्र, परिवार या कुल हैं। और इन सभी में किसी न किसी रूप में भगवान श्रीकृष्ण का रक्त सम्बन्ध है। और रक्त सम्बन्ध ही इनके मूल जनन गोत्र "कार्ष्ण" को सिद्ध करता है। क्योंकि अभीर जाति के समस्त यादवों यानी समस्त गोपों की उत्पत्ति पूर्व काल में श्रीकृष्ण के रोम कूपों से ही हुई है। इस बात को जनन गोत्र वाले प्रसंग में पहले ही बताया गया है। अब हमलोग चौथे प्रकार के गोत्र - गुरु गोत्र के बारे में जानेंगे।
(4)- गुरु गोत्र-
तीसरे प्रकार के गोत्र का नाम "गुरुगोत्र" है। इस तरह का गोत्र तब निर्धारित होता है, जब कोई व्यक्ति या व्यक्ति समूह किसी ऋषि या अपने मनपसन्द के विश्वसनीय सतनामी गुरु या किसी ऋषि मुनि से- दीक्षा, गुरुमंत्र या गुरूमुख होकर उसका अनुयायी बनकर उसके नाम पर अपने गोत्र का निर्धारण करता हैं, तब उस ऋषि या गुरु के नाम उसका गोत्र निर्धारित हो जाता है। इसलिए इस प्रकार के गोत्र को "गुरुगोत्र " कहा जाता है, जिसमे गोत्र कर्ता (ऋषि) और उसके अनुयायियों में किसी प्रकार का रक्त सम्बन्ध न होकर केवल गुरु शिष्य का सम्बन्ध रहता है। इस तरह के गोत्र का मुख्य उद्देश्य- दीक्षा, शिक्षा, पूजा-पाठ, विवाह इत्यादि को सम्पन्न कराना होता है। जैसे यादवों का "गुरुगोत्र" अत्रि है। किन्तु इस अत्रि गोत्र से यादवों का किसी भी तरह से रक्त सम्बन्ध नहीं है।
यादवों के इस वैकल्पिक "गुरुगोत्र" अत्रि नाम की परम्परा का प्रारम्भ पूर्व काल में सर्वप्रथम भू-तल पर ब्रह्माजी के पुष्कर यज्ञ में अहीर कन्या देवी गायत्री के विवाह के उपरान्त ही प्रचलन में आया। जिसमें अहीर कन्या देवी गायत्री का विवाह ब्रह्मा से अत्रि ने ही यज्ञ में मन्त्रोच्चारण से सम्पन्न कराया था। क्योंकि उस यज्ञ के प्रमुख "अध्वर्यु" (यज्ञ में मन्त्रोच्चारण करनें वाला पुरोहित) अत्रि ही थे। उसी समय से ऋषि अत्रि गोपों के प्रथम ब्राह्मण पुरोहित हुए। और गोपों के प्रत्येक धार्मिक कार्यों को सम्पन्नता का संकल्प लिया तथा गोपों ने भी ब्राह्मण ऋषि अत्रि के नाम से गुरुगोत्र स्वीकार किया।
अहीर कन्या देवी गायत्री का ब्रह्मा से विवाह का प्रसंग पद्मपुराण के अध्याय- (१६ और १७) में मिलता है। जिस किसी को यह जानकारी लेना है वहाँ से ले सकता है।
किन्तु अज्ञानता वश 99 % यादव समाज "अत्रि" को ही अपना जनन गोत्र मान लिया, और अपने मूल जनन गोत्र "कार्ष्ण" को ही भूल गया कि गोपों अर्थात् यादवों का जन्म किसी ऋषि-मुनियों न होकर सीधे परमेश्वर श्रीकृष्ण और श्रीराधा से हुआ है।
किन्तु आश्चर्य है कि कुछ लोग ऋषि अत्रि को भी यादव ही मानते हैं। यह एक हास्यास्पद स्थिति है, क्योंकि किसी को भी यादव होने से पहले उसे अभीर और गोप होना पड़ेगा तभी वह यादव हो सकता है। इस स्थिति में ऋषि अत्रि गोप और अभीर तभी हो सकते जब उनका भी जन्म श्रीकृष्ण से हुआ होता। किन्तु ऋषि अत्रि तो ब्रह्माजी के मानस पुत्र हैं। इसलिए ऋषि अत्रि ब्रह्माजी से उत्पन्न होने के कारण ब्राह्मण हो सकते हैं किन्तु गोप और अहीर कभी नहीं हो सकते। और जब ऋषि अत्रि गोप, अहीर नहीं हो सकते तो निश्चित रूप से वह यादव भी नहीं हो सकते। यह ध्रुव सत्य है।
इसलिए ऋषि अत्रि को यादव कहना और उनसे यादवों की उत्पत्ति करना तथा उनके नाम पर यादवों का जनन गोत्र स्थापित करना महति मूर्खता होगी।
अतः उपर्युक्त सभी साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि यादवों का जनन गोत्र श्रीकृष्ण के नामानुसार "कार्ष्ण" है अत्रि नहीं ।
इस प्रकार से यह अध्याय गोत्रों की जानकारी के साथ समाप्त हुआ। अब इसके अगले अध्याय (7) में आप लोग प्रमुख ऐतिहासिक और पौराणिक राजाओं के बारे में जानेंगे।
🫵
अध्याय-(7)
भारत के प्रमुख ऐतिहासिक और पौराणिक यादव राजा।
इस अध्याय को अच्छी तरह से समझने के लिए इसे भाग- (क) और (ख) में विभाजित करके निम्नलिखित पौराणिक और ऐतिहासिक यादव राजाओं के बारे में बताया गया।
(क)- पौराणिक गोप (यादव) राजा-
इस भाग में निम्नलिखित पौराणिक यादव राजाओं के बारे में जानकारी दी गई -
(1) पुरुरवा पुत्र- आयु (2) आयु पुत्र- नहुष (3) नहुष पुत्र- ययाति (4) ययाति पुत्र- यदु (5) यदु पुत्र-कार्त्यवीर्य अर्जुन (6) हृदीक पुत्र देवमीढ (7)- नन्द पुत्री- योगमाया विंध्यवासिनी
(ख)- ऐतिहासिक यादव राजा-
इस भाग में निम्नलिखित ऐतिहासिक यादव राजाओं के बारे में जानकारी दी गई-
(1)- वीर अहीर लोरिक (2)- आल्हा-ऊदल (3)- अहीर देवायत बोदर (4)- देवगिरी के यादव राजा (A)- भिल्लम पंचम (B)- सिंघण द्वितीय (C)- रामचंद्र यादव (5)- विजयनगर के यादव राजा (A)- हरिहर एवं बुक्का (B)- कृष्णदेवराय (6)- दक्कन के अहीर राजा (A)- राजा ईश्वरसेन अहीर (6)- मैसूर के यादव राजा (A)- राजा देवराज वाडियार (7)- कर्नाटक के यादव राजा (A)- राजा देवराज वाडियार।
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(क)- पौराणिक गोप (यादव) राजा-
भाग (1)- पुरुरवा पुत्र- आयु (आयुष) का परिचय-
इस भाग को अच्छी तरह से जानेंगे से पहले आयुष के पिता पुरुरवा व उनकी उर्वशी को जानना होगा तभी पूरी बात समझ में आएगी। तो इसके लिए इसी पुस्तक की परिशिष्ट कथा (8) बड़े ही स्पष्ट रूप से विस्तार पूर्वक बताया गया कि भू-तल का प्रथम चन्द्रवंशी अहीर सम्राट पुरुरवा था जिसकी पत्नी का नाम उर्वशी था। वह भी अहीर कन्या ही थी। जिसमें यह भी बताया गया है कि- आभीर पुरुरवा की पत्नी उर्वशी से कुल सात देवतुल्य पुत्र हुए, जिसमें आयुष सबसे ज्येष्ठ थे।
गुरूवार के सात पुत्रों में विशेष रूप से यहाँ पर आयुष के बारे में ही वर्णन किया गया है क्योंकि इनकी ही पीढ़ी में आगे चलकर यादव वंश का उदय हुआ जिसमें आगे चलकर भगवान श्रीकृष्ण का भी अवतरण हुआ, जिनका सम्बन्ध गोलोक के साथ ही भू-लोक पर भी गोप जाति से ही रहा है।
पुरुरवा से आभीर कन्या उर्वशी के गर्भ से ज्येष्ठ पुत्र- आयु (आयुष) का जन्म हुआ। आयुष का विवाह स्वर्भानु (सूर्यभानु) गोप की पुत्री इन्दुमती से हुआ था। इन्दुमती का दूसरा नाम- लिंगपुराण में "प्रभा" भी मिलता है।
ज्ञात हो कि इन्दुमती के पिता स्वर्भानु गोप वहीं हैं जो भगवान श्रीकृष्ण के गोलोक में सदैव तीसरे द्वार के द्वारपाल रहते हैं। इस बात की पुष्टि -ब्रह्मवैवर्तपुराण के चतुर्थ श्रीकृष्णजन्म खण्ड के अध्याय-५ के श्लोक- १२ और १३ से होती है। जिसमें लिखा गया है कि -
'द्वारे नियुक्तं ददृशुः सूर्यभानुं च नारद ।
द्विभुजं मुरलीहस्तं किशोरं श्यामसुन्दरम् ।। १२।
मणिकुण्डलयुग्मेन कपोलस्थलराजितम् ।
रत्नदण्डकरं श्रेष्ठं प्रेष्यं राधेशयोः परम्।। १३।
अनुवाद - देवता लोग तीसरे उत्तम द्वार पर गए, जो दूसरे से भी अधिक सुन्दर ,विचित्र तथा मणियों के तेज से प्रकाशित था। नारद ! वहाँ द्वारा की रक्षा में नियुक्त सूर्यभानु नामक द्वारपाल दिखाई दिए, जो दो भुजाओं से युक्त मुरलीधारी, किशोर, श्याम एवं सुन्दर थे। उनके दोनों गालों पर दो मणियय कुण्डल झलमला रहे थे। रत्नकुण्डलधारी सूर्यभानु श्री राधा और श्री कृष्ण के परम प्रिय एवं श्रेष्ठ सेवक थे। १२-१३
इसी सुर्यभानु गोप की पुत्री- इन्दुमती (प्रभा) का विवाह भू-तल पर गोप पुरूरवा के ज्येष्ठ पुत्र आयुष से हुआ था। इस बात की भी पुष्टि लिंग पुराण के (६६ )वें अध्याय के श्लोक संख्या- ५९ और ६० से होती है। जिसमें लिखा गया है कि -
"आयुषस्तनया वीराः पञ्चैवासन्महौजसः।
स्वर्भानुतनयायां ते प्रभायां जज्ञिरे नृपाः।। ५९।
अनुवाद - आयुष के पाँच वीर और पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुए। इन नहुष आदि पाँचो राजाओं का जन्म आयुष की पत्नी स्वर्भानु (सूर्यभानु ) की पुत्री प्रभा की कुक्षा (उदर) से हुआ था। ५९।
आयुष पुत्र "नहुष" का परिचय इस अध्याय के भाग (2) दिया गया है उसको भी इसी के जोड़ कर अवश्य पढ़ें।
भाग (2)
आयुष पुत्र "नहुष" का परिचय-
भाग- (1) के समस्त संदर्भों के आधार पर ज्ञात होता है कि आयुष के पुत्र "नहुष" थे। जिनका विवाह पार्वती की पुत्री अशोकसुन्दरी (विरजा) से हुआ था। विरजा नाम सूर्यपुराण के सृष्टि निर्माण खण्ड तथा लिंगपुराण में मिलता है।
विशेष- नहुष श्रीकृष्ण के अंशावतार थे। अतः इनका भी सम्बन्ध वैष्णव वर्ण के गोप कुल से ही था। जिसमें नहुष को श्रीकृष्ण का अंशावतार होने की पुष्टि- श्रीपद्मपुराण के भूमि खण्ड के अध्याय संख्या -(१०३) से होती है जिसमें नहुष के पिता- आयुष (आयु ) की तपस्या से प्रसन्न होकर दत्तात्रेय ने वर दिया कि तेरे घर में विष्णु के अंश वाला पुत्र होगा। उस प्रसंग को नीचे देखें।
'देहि पुत्रं महाभाग ममवंशप्रधारकम् ।
यदि चापि वरो देयस्त्वया मे कृपया विभो। १३५।
'दत्तात्रेय उवाच-
एवमस्तु महाभाग तव पुत्रो भविष्यति।
गृहे वंशकरः पुण्यः सर्वजीवदयाकरः।१३६।
एभिर्गुणैस्तु संयुक्तो वैष्णवांशेन संयुतः।
राजा च सार्वभौमश्च इन्द्रतुल्यो नरेश्वरः।१३७।
अनुवाद-
• सम्राट आयुष दत्तात्रेय से कहते हैं कि हे भगवन यदि आप मुझे वर देना चाहते हों तो वर दें। १३५।
• दत्तात्रेय ने कहा - ऐसा ही हो ! तेरे घर में सभी जीवों पर दया करनेवाला पुण्य-कर्मा और भाग्यशाली पुत्र होगा।१३६।
• जो इन सभी गुणों से संयुक्त विष्णु के अंश से युक्त-सार्वभौमिक राजा इन्द्र के तुल्य होगा।१३७।
अतः उपर्युक्त श्लोकों से ज्ञात होता है कि नहुष भगवान श्रीकृष्ण के ही अंशावतार थे। वहीं दूसरी तरफ नहुष की पत्नी विरजा (अशोक सुन्दरी) भी गोलोक की गोपी तथा भगवान श्रीकृष्ण की प्रेयसी थी। इसके पहले पूर्व काल में ही इस विरजा और श्रीकृष्ण से गोलोक में कुल सात पुत्र उत्पन्न हुए थे। इस बात की पुष्टि- गर्गसंहिता- वृन्दावनखण्ड के अध्याय-२६ के श्लोक - १७ से होती है। जिसमें लिखा गया है कि -
विरजायां सप्त सुता बभूवुः कृष्णतेजसा।
निकुञ्जं ते ह्यलंचक्रुः शिशवो बाललीलया॥ १७।
अनुवाद - श्रीकृष्ण के तेज से विरजा के गर्भ से सात पुत्र उत्पन्न हुए। वे सातों शिशु अपनी बाल- क्रीड़ा से निकुञ्ज की शोभा बढ़ाने लगे।
ज्ञात हो कि श्रीकृष्ण की प्रेयसी गोलोक की विरजा ही कालान्तर में भू-तल पर अशोक सुन्दरी नाम से पार्वती जी के अंश से पुत्री रूप में प्रकट हुई। फिर उसका विवाह भू-तल पर किसी और से नहीं बल्कि श्रीकृष्ण के अंश नहुष से ही हुआ। इस बात की भी पुष्टि- श्रीपद्मपुराण के भूमिखण्ड के अध्याय संख्या -(१०२) के श्लोक संख्या - (७१ से ७४) में होती है। जिसमें पार्वती जी अपनी पुत्री अशोक सुन्दरी (विरजा) को वरदान देते हुए कहती हैं कि -
"वृक्षस्य कौतुकाद्भावान्मया वै प्रत्ययः कृतः।
सद्यः प्राप्तं फलं भद्रे भवती रूपसम्पदा।७१।
अशोकसुन्दरी नाम्ना लोके ख्यातिं प्रयास्यसि।
सर्वसौभाग्यसम्पन्ना मम पुत्री न संशयः।। ७२।
सोमवंशेषु विख्यातो यथा देवः पुरन्दरः।
नहुषोनाम राजेन्द्रस्तव नाथो भविष्यति।। ७३।
एवं दत्वा वरं तस्यै जगाम गिरिजा गिरिम् ।
कैलासं शङ्करेणापि मुदा परमया युता।। ७४।
अनुवाद- पार्वती ने अपनी पुत्री अशोक सुन्दरी से कहा- इस कल्पद्रुम के बारे में सच्चाई जानने की जिज्ञासा से मैंने पुत्री तुम्हारे बारे में चिन्तन किया। हे भद्रे ! तुझे फल अर्थात् सौन्दर्य का धन तुरन्त प्राप्त हो जाता है तुम रूप सम्पदा हो। तुम निःसंदेह सर्व सौभाग्य से सम्पन्न मेरी पुत्री हो। तुम संसार में अशोकसुन्दरी के नाम से विख्यात होओंगी। राजाओं के स्वामी सम्राट, नहुष , जो देव इन्द्र के समान चन्द्रवंशी परिवार में प्रसिद्ध होंगे वे ही तुम्हारे पति होंगे।७१-७४।
इस प्रकार पार्वती ने अशोक सुन्दरी को वरदान दिया और बड़ी खुशी के साथ शंकर जी के साथ कैलास पर्वत पर चली गईं।
उपर्युक्त श्लोकों से एक बात और निकल कर सामने आती है कि - पार्वती जी के वरदान के अनुसार अशोक सुन्दरी का विवाह चन्द्रवंशी सम्राट नहुष से होने की बात निश्चित होती है।
अतः यहाँ सिद्ध होता है कि "नहुष" गोप- कुल के चन्द्रवंशी सम्राट थे। यह बात उस समय की है कि- जब भू-तल पर अभी यादवंश का उदय नहीं हुआ था। किन्तु श्रीकृष्ण अंश नहुष को चन्द्रवंशी होने का प्रमाण यहाँ मिलता है। और चन्द्रवंश के अंतर्गत आनेवाला यादव वंश अब बहुत दूर नहीं रहा, जल्द ही उसका भी क्रम आएगा।
अब आगे श्रीकृष्ण अंश नहुष और विरजा (अशोक सुन्दरी) से गोलोक की ही भाँति भू-तल पर भी कुल छह पुत्र हुए। जिसकी पुष्टि - भागवत पुराण के नवम् स्कन्ध के अध्याय -१८ के श्लोक (१) से होती है। जिसमें लिखा गया है कि-
'यतिर्यायातिः संयातिरायतिर्वियतिः कृतिः।
षडिमे नहुषस्यासन्निद्रयाणीव देहिनः।।१।
अनुवाद- जैसे शरीरधारियों के छः इन्द्रियाँ होती हैं, वैसे ही नहुष के छः पुत्र थे। उनके नाम थे- यति, ययाति, संयाति, आयति, वियति, और कृति। १
जिसमें ययाति सबसे छोटे थे। फिर भी नहुष ने ययाति को ही अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और राजा बनाया।
✴️ ज्ञात हो कि ययाति अपने पिता नहुष के इसी परम्परा का पालन करते हुए अपने छोटे पुत्र- पुरु को राजा बनाया था। इसका विवरण आगे दिया गया है।)
भाग-(3)
ययाति का परिचय -
महाराज ययाति श्रीकृष्ण अंशावतार नहुष के पुत्र थे और उनकी माता "विरजा" गोलोक की गोपी थीं। ऐसे में ययाति अपने माता-पिता के गुणों एवं ब्लड रिलेशन से गोप ही थे। इसी वजह से वे राजा होते हुए भी बड़े स्तर पर गोपालन किया करते थे। और यज्ञ आदि के समय अधिक से अधिक गायों का दान किया करते थे। ययाति और उनके पिता नहुष को एक ही साथ गोपालक होने की पुष्टि- महाभारत अनुशासनपर्व के अध्याय -८१ के श्लोक संख्या-५-६ से भी होती है।
"मान्धाता यौवनाश्वश्च ययातिर्नहुषस्तथा।
गा वै ददन्तः सततं सहस्रशतसम्मिताः।।५।
गताः परमकं स्थानं देवैरपि सुदुर्लभम्।
अपि चात्र पुरावृत्तं कथयिष्यामि तेऽनघ।। ६।
अनुवाद - युवनाश्व के पुत्र राजा मान्धाता, (सोमवंशी) नहुष और ययाति- ये सदा लाखों गौओं का दान किया करते थे; इससे वह उन उत्तम स्थानों को प्राप्त हुऐ हैं, जो देवताओं के लिये भी अत्यन्त दुर्लभ हैं। अर्थात् गोलोक को चले गये। ५-६।
अतः उपर्युक्त श्लोकों के आधार पर सिद्ध होता है कि श्रीकृष्ण अंशावतार नहुष के पुत्र "ययाति" भी गोप (अहीर) थे। ययाति की तीन पत्नियाँ थीं, जिनके क्रमशः नाम हैं - देवयानी, शर्मिष्ठा, और अश्रुबिन्दुमति। उसमें देवयानी शुक्राचार्य की पुत्री थी और शर्मिष्ठा दैत्यराज विषपर्वा की पुत्री थी। तथा अश्रुबिन्दुमति कामदेव की पुत्री थी। जिसमें ययाति की दो पत्नियों का वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण के नवम स्कन्ध के अध्याय- १८ के श्लोक- ४ में मिलता है। जिसमें लिखा गया है कि -
'चतसृष्वादिशद् दिक्षु भ्रातृन् भ्राता यवीयशः।
कृतदारो जुगोपोर्वी काव्यस्य वृषपर्वणः।। ४।
अनुवाद - ययाति अपने चार छोटे भाइयों को चार दिशाओं में नियुक्त कर दिया और स्वयं शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी और दैत्य राज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा को पत्नी के रूप में स्वीकार करके पृथ्वी की रक्षा करने लगे।४।
(ययाति की तीसरी पत्नी अश्रुबिन्दुमति कब ययाति की पत्नी हुईं इस बात को इसी प्रसंग में आगे बताया गया है।)
आगे ययाति की इन दो पत्नियों से कुल पाँच यशस्वी पुत्र हुए। जिसमें शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से दो पुत्र - यदु और तुर्वसु तथा दैत्यराज विषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा से तीन पुत्र - द्रुह्यु, अनु, और पुरु हुए। किन्तु अश्रुबिन्दुमति सदा पुत्रहीन रही।
ज्ञात हो कि - ययाति अपनी तीनों पत्नियों में कभी सामञ्जस्य नहीं बैठा पाए। क्योंकि ये तीनों आपसी सौत होने की वजह से हमेशा एक दूसरे से (ईर्ष्या) करती थीं। विशेष रूप से अश्रुबिन्दुमति से तो देवयानी और शर्मिष्ठा दोनों और अधिक ईर्ष्या करती थीं। जिसका परिणाम यह हुआ कि कलह बढ़ता ही गया, अन्ततोगत्वा ययाति ने क्रुद्ध होकर अपने ज्येष्ठ पुत्र यदु को बेवजह (बिनाकारण) ही शाप दे दिया। किन्तु पिता का यही शाप आगे चलकर यदु के लिए वरदान सिद्ध हुआ। वह शाप कैसा था और क्यों दिया गया ? इसका विस्तार वर्णन पद्मपुराण के खण्ड (२) के अध्याय- (८०) के श्लोक -३ से लेकर १४ तक मिलता है। जिसका श्लोक और अनुवाद दोनों नीचे दिया गया है।
• यदानीता कामकन्या स्वगृहं तेन भूभुजा।
अत्यर्थं स्पर्धते सा तु देवयानी मनस्विनी।। ३।
• तस्यार्थे तु सुतौ शप्तौ क्रोधेनाकुलितात्मना।
शर्मिष्ठां च समाहूय शब्दं चक्रे यशस्विनी।। ४।
• रूपेण तेजसा दानैः सत्यपुण्यव्रतैस्तथा ।
शर्मिष्ठा देवयानी च स्पर्धेते स्म तया सह।। ५।
• दुष्टभावं तयोश्चापि साऽज्ञासीत्कामजा तदा।
राज्ञे सर्वं तया विप्र कथितं तत्क्षणादिह।। ६।
• अथ क्रुद्धो महाराजः समाहूयाब्रवीद्यदुम् ।
शर्मिष्ठा वध्यतां गत्वा शुक्रपुत्री तथा पुनः।। ७।
• सुप्रियं कुरु मे वत्स यदि श्रेयो हि मन्यसे ।
एवमाकर्ण्य तत्तस्य पितुर्वाक्यं यदुस्तदा।। ८।
• प्रत्युवाच नृपेंद्रं तं पितरं प्रति मानद ।
नाहं तु घातये तात मातरौ दोषवर्जिते।। ९।
• मातृघाते महादोषः कथितो वेदपण्डितैः।
तस्माद्घातं महाराज एतयोर्न करोम्यहम्।। १०।
• दोषाणां तु सहस्रेण माता लिप्ता यदा भवेत्।
भगिनी च महाराज दुहिता च तथा पुनः।। ११।
• पुत्रैर्वा भ्रातृभिश्चैव नैव वध्या भवेत्कदा ।
एवं ज्ञात्वा महाराज मातरौ नैव घातये।। १२।
• यदोर्वाक्यं तदा श्रुत्वा राजा क्रुद्धो बभूव ह।
शशाप तं सुतं पश्चाद्ययातिः पृथिवीपतिः।।१३।
• यस्मादाज्ञाहता त्वद्य त्वया पापि समोपि हि।
मातुरंशं भजस्व त्वं मच्छापकलुषीकृतः।।१४।
अनुवाद- (३- से १४ तक)
• सुकर्मा ने कहा– जब वह राजा (ययाति) कामदेव की पुत्री को अपने घर ले गये, तो उच्च विचार वाली देवयानी उसके साथ बहुत प्रतिद्वन्द्विता करने लगी।३।
•इस कारण ययाति ने क्रोध के वशीभूत होकर अपने दो पुत्रों (अर्थात तुरुवसु और यदु ) जो देवयानी से उत्पन्न थे; उनको शाप दे दिया। और राजा ने दूत के द्वारा शर्मिष्ठा को बुलाकर ये शब्द कहे। ४।
• शर्मिष्ठा और देवयानी दोनों रूप, तेज और दान के द्वारा उस अश्रु- बिन्दुमती के साथ प्रतिस्पर्धा करती हैं। ५
• तब काम देव की पुत्री अश्रुबिन्दुमती ने उन दोनों के दुष्टभाव को जाना तो उसने राजा को वह सब बातें उसी समय कह सुनायीं।६।
• तब क्रोधित होकर राजा ययाति ने यदु को बुलाया और उनसे कहा: हे यदु ! तुम “जाओ और शर्मिष्ठा और शुक्र की बेटी अर्थात अपनी माता (देवयानी) को मार डालो।७।
• हे पुत्र तुम मेरा प्रिय करो यदि तुम इसे कल्याण कारी मानते हो तो। अपने पिता के ये वचन सुनकर यदु ने पिता से कहा। ८।
• मान्यवर ! पिता श्री ! मैं निर्दोष दोनों माताओं को नहीं मारुँगा। ९।
क्योंकि- वेदों के ज्ञाता लोगों ने अपनी माता की हत्या को महापाप बताया है। इसलिए महाराज ! मैं इन दोनों माताओं का बध नहीं करुँगा। १०।
• हे राजन ! (भले ही) यदि एक माँ, एक बहन या एक पुत्री पर हजार दोष लगें हो। ११।
• तो भी उसे कभी भी बेटों या भाइयों द्वारा नहीं मारा जाना चाहिए ! यह जानकर महाराज मैं दोनों माताओ को नहीं मारुँगा। १२।
• उस समय यदु की बातें सुनकर राजा ययाति क्रोधित हो गये। इसके बाद पृथ्वी के स्वामी ययाति ने अपने पुत्र को शाप दे दिया। १३।
• चूँकि तुमने आज मेरे आदेश का पालन नहीं किया है, तुम एक पापी के समान हो, मेरे शाप से प्रदूषित हो, तुम सदा मातृभक्त बने रहो और अपनी माँ के अंश का ही भक्ति भजन करो।१४।
पिता की इतनी बातें सुनने के बाद यदु ने अपने पिता राजा ययाति से विनम्रता पूर्वक उस राज्य का नागरिक होने के नाते से पूछा था-
हे महाराजा! मैं तो निर्दोष हूँ।, फिर भी आपने मुझे क्यों शाप दिया ? कृपया मुझ निर्दोष का पक्ष लें और मुझ पर दया करने की कृपा करें।
तब यदु के इस प्रकार निवेदन करने पर ययाति नें यदु से जो कुछ कहा उसका वर्णन- पद्मपुराण के भूमि खण्ड के अध्याय- ७८ के श्लोक संख्या- ३४ में है-
"राजोवाच-
'महादेवः कुले ते वै स्वांशेनापि हि पुत्रक।
करिष्यति विसृष्टिं च तदा पूतं कुलं तव।। ३४।
तब राजा ने कहा- हे पुत्र ! जब महान देवता श्रीकृष्ण (स्वराट विषषणु) अपने अंश सहित तेरे कुल में जन्म लेंगे तब तेरा कुल शुद्ध हो जाएगा। ३३-३४।
विशेष- ज्ञात हो- अनन्त ब्रह्माण्ड में अनन्त छोटे विष्णु, ब्रह्मा, और महेश हैं। किन्तु स्वराट विष्णु (श्रीकृष्ण) एक हैं जिन्हें परमेश्वर कहा जाता है। जो सभी देवताओं के भी ईश्वर और महान देवता हैं। उनका निवास स्थान सभी लोकों से ऊपर है। उसका नाम है गोलोक, उसी गोलोक में गोपेश्वर श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) रहते है। इस बात की सम्पूर्ण जानकारी के लिए इस पुस्तक के अध्याय दो और तीन को अवश्य पढें।)
और आगे चलकर ययाति का यहीं शाप यदु के लिए वरदान सिद्ध हुआ, क्योंकि ययाति के कथनानुसार कालान्तर में यदु के वंश में गोपेश्वर श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ। महाराज यदु के बारे में भाग-(5) में विस्तार पूर्वक जानकारी दी गई है।उसे भी भी इस भाग के साथ जोड़ कर अवश्य
(5)- महाराज यदु का परिचय
महाराज "यदु" ययाति के ज्येष्ठ पुत्र एवं यादवों के आदि पुरुष या कहें पूर्वज थे। इनके बारे में भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद्भागवत महापुराण के (११) वें स्कन्ध के अध्याय - (७) के श्लोक- (३१) में कहे हैं कि -
यदुनैवं महाभागो ब्रह्मण्येन सुमेधसा।
पृष्टः सभाजितः प्राह प्रश्रयावनतं द्विजः।। ३१।
अनुवाद- हमारे पूर्वज महाराज "यदु" की बुद्धि शुद्ध थी और उनके हृदय में ब्रह्मज्ञानीयों के प्रति भक्ति थी। ३१।
वास्तव में महाराज यदु- यादवों के आदि पूर्वज, वैष्णव भक्त एवं सफल गोपालक थे। यदु का जीवन प्रारम्भ से ही संघर्षमय रहा। यदु के संघर्षों की कहानी इनके घर से ही प्रारम्भ होती है। जिसका वर्णन कुछ इस प्रकार है-
यदु के पिता ययाति की कुल तीन पत्नियाँ देवयानी, शर्मिष्ठा, और अश्रुबिन्दुमती नाम की थीं। उनमें से दो पत्नियों से कुल पाँच यशस्वी पुत्र हुए। जिसमें शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से दो पुत्र - यदु और तुर्वसु तथा दैत्यराज विषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा से तीन पुत्र- द्रुह्य, अनु,और पुरु हुए। ययाति की तीसरी पत्नी अश्रुबिन्दुमती सदैव पुत्रहीन रही। राजा ययाति अपने पाँच पुत्रों में ज्येष्ठ पुत्र यदु को शाप देकर राज्यपद से वञ्चित कर पशुपालक (गोपालाक) होने का शाप दिया और सबसे छोटे पुत्र- पुरु को राजपद दिया। इस बात की पुष्टि - लक्ष्मीनारायणसंहिता/खण्डः(३) अध्याय- (७३) के श्लोक (७५-७६) से होती है। जिसमें लिखा गया है कि-
"श्रुत्वा राजा शशापैनं राज्यहीनः सवंशजः।
तेजोहीनः क्षत्रधर्मवर्जितः पशुपालकः।। ७५।
भविष्यसि न सन्देहो याहि राज्याद् बहिर्मम।
इत्युक्त्वा च पुरुं प्राह शर्मिष्ठाबालकं नृपः।७६।
अनुवाद- यह सुनकर राजा ने उसे (यदु) को शाप दे दिया ।और उसने अपने वंशजो सहित राज्य को छोड़ दिया। वह यदु राजकीय तेज से हीन और राजकीय क्षत्र धर्म से रहित पशुपालन से जीवन निर्वाह करने लगे।७५।।
पुनः राजा ने कहा तुम्हारे वंशज कभी राजतन्त्र की प्रणाली से राजा नहीं होंगे इसमें सन्देह नहीं हेै। यदु ! मेरे राज्य से बाहर चले जाओ। इस प्रकार कहकर राजा (ययाति) ने पुरू से कहा शर्मिष्ठा के बालक पुरु तुम राजा बनोगे। ७६।
यहीं से यदु के जीवन का कठिन दौर प्रारम्भ हुआ।
पिता के शाप और राजपद से वञ्चित "यदु" ने अपने पूर्वजों की तरह ही गोपालन से अपना जीविकोपार्जन करना प्रारम्भ किया और कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए अपने बल एवं पौरुष से राजतन्त्र के विकल्प में प्रजातन्त्र की स्थापना की और प्रजातान्त्रिक ढंग से राजा बनकर अपने वंश और कुल का विस्तार कर जगत में कीर्तिमान स्थापित किया।
विशेष- ध्यान रहे - राजा ययाति नें यदु को यह शाप दे रखा था कि- तुम्हारे वंशज कभी राजतन्त्र की प्रणाली से राजा नहीं होंगे। अतः यदु के सामने यह एक बहुत बड़ी समस्या और सामाजिक चुनौती थी।समस्या और चुनौतियां ही आविष्कार की जननी होती है। अतः यदु नें राजतन्त्र के विकल्प में प्रजातन्त्र की खोज किया और प्रजातान्त्रिक तरीके से राजा हुए। इसीलिए यदु को प्रजातन्त्र का जनक माना जाता है।
आगे चलकर इसी यदु के नाम से समुद्र के समान विशाल (यदुवंश) यादवंश का उदय हुआ। जिसके सदस्यपतियों को यादव कहा गया। इस सम्बन्ध में यदि देखा जाए तो जिस तरह से ब्रह्मन् शब्द में अण् प्रत्यय लगाने से ब्राह्मण शब्द की उत्पत्ति होती है, वैसे ही यदु नें अण् प्रत्यय पश्चात लगाने पर यादव शब्द की भी उत्पत्ति होती है।
[यदोरपत्यम् " इति यादव- अर्थात् यदु शब्द के अन्त में सन्तान वाचक संस्कृत अण्- प्रत्यय लगाने से यादव शब्द की उत्पत्ति होती है। (यदु + अण् = यादव:) जिसका अर्थ है यदु की सन्तानें अथवा वंशज।]
यदु के संघर्षमय जीवन में हमसफ़र के रूप में यदु की पत्नी यज्ञवती आयीं। जो यदु नाम के अनुरूप ही जगत विख्यात थी, जो कभी गोलोक में सुशीला गोपी नाम से प्रसिद्ध थी। वही कालान्तर में यज्ञपुरुष की पत्नी दक्षिणा के रूप में भू-तल पर अवतरित हुई। जिसमें यदु और यज्ञवती का विष्णु और दक्षिणा के अंश से उत्पन्न होने का प्रकरण पौराणिक है। जिसका वर्णन-देवीभागवतपुराण- स्कन्धः नवम के अध्याय (४५) तथा ब्रह्मवैवर्त्त महापुराण के प्रकृतिखण्ड के बयालीसवें अध्याय में मिलता है।
आगे चलकर यदु और उनकी पत्नी यज्ञवती से प्रमुख चार धर्मवत्सल पुत्र पैदा हुए। जिनके क्रमशः नाम हैं - सहस्रजित, क्रोष्टा, नल, और रिपु। जिसमें सहस्रजित यदु के ज्येष्ठ पुत्र थे। महाराज यदु के चार पुत्रों का वर्णन अन्य पुराणों तथा श्रीमद्भागवत पुराण के स्कन्घ- ९ के अध्याय- २३ में भी मिलता है। उसके लिए कुछ श्लोक नीचे प्रस्तुत है -
वर्णयामि महापुण्यं सर्वपापहरं नृणाम् ।
यदोर्वंशं नरः श्रुत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१९॥
यत्रावतीर्णो भगवान् परमात्मा नराकृतिः ।
यदोः सहस्रजित्क्रोष्टा नलो रिपुरिति श्रुताः ॥२०॥
चत्वारः सूनवस्तत्र शतजित् प्रथमात्मजः ।
महाहयो रेणुहयो हैहयश्चेति तत्सुताः ॥२१॥
धर्मस्तु हैहयसुतो नेत्रः कुन्तेः पिता ततः ।
सोहञ्जिरभवत् कुन्तेः महिष्मान् भद्रसेनकः॥२२॥
अनुवाद- महाराज यदु का वंश परम पवित्र और मनुष्यों के समस्त पापों को नष्ट करने वाला है। जो मनुष्य इसका श्रवण करता है वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।१९।
इस वंश में स्वयं भगवान परब्रह्म श्रीकृष्ण ने मनुष्य रूप में अवतार लेते हैं।। यदु के चार पुत्र थे- सहस्रजित, क्रोष्टा, नल, और रिपु। सहस्रजित से शतजित का जन्म हुआ। शतजित के तीन पुत्र थे - महाहय, वेणुहय, और हैहय। ।२०-२१।
महाराज यदु के बारे विस्तृत जानकारी हमारी दूसरी पुस्तक- "श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" में दी गई है। वहाँ से पाठक गण जानकारी ले सकते हैं।
अब इसके अगले भाग-(6) में विस्तार से जानकारी दी गई है कि यदु के ज्येष्ठ पुत्र सहस्रजित से हैहय वंशी यादवों की उत्पत्ति कब और कैसे हुई। जिसमें कार्त्यवीर्य अर्जुन के बारे में विशेष जानकारी दी गई है।
(6) यदु पुत्र- कार्तवीर्य अर्जुन का परिचय
जैसा की इसके पिछले भाग में बताया जा चुका है कि यदु के चार प्रमुख पुत्र - सहस्रजित, क्रोष्टा, नल, और रिपु थे। जिसमें सहस्रजित यदु के पुत्रों में सबसे ज्येष्ठ थे। उसके आगे- सहस्रजित से शतजित का जन्म हुआ। शतजित के तीन पुत्र- महाहय, वेणुहय और हैहय हुए। जिसमें यदु के प्रपौत्र हैहय से धनक हुए और धनक के कुल चार पुत्र- कृतवीर्य, कृताग्नि, कृतवर्मा, और कृतौजा हुए। कृतवीर्य के पुत्र - सहस्त्रबाहु अर्जुन हुए। सहस्त्रबाहु अर्जुन का जन्म महाराज हैहय की दसवीं पीढ़ी में माता पद्मिनी के गर्भ से हुआ था। राजा कृतवीर्य की सन्तान होने के कारण इन्हें कार्तवीर्य अर्जुन और भगवान दत्तात्रेय से एक हजार बाहुबल के वरदान के उपरान्त उन्हें सहस्त्रबाहु अर्जुन कहा गया।
महाराज कार्तवीर्य अर्जुन का जन्म कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को श्रावण नक्षत्र में प्रात: काल के मुहूर्त में हुआ था। इसी तिथि को उनकी जयन्ती मनाई जाती है। इसके साथ ही कार्तवीर्य अर्जन सुदर्शन चक्र के अवतार भी थे। इसके बारे में आगे बताया गया है।
सहस्त्रबाहु अर्जुन अपने समय के सबसे बलशाली, धर्मवत्सल, कुशल कृषक, प्रजापालक और गोपालक चक्रवर्ती अहीर सम्राट थे। इस बात की पुष्टि- मत्स्यपुराण के अध्याय-४३ के- १८ से २८ तक के श्लोकों से होती है। जिसमें कार्तवीर्यार्जुन के महत्व को एक नारद नामक गन्धर्व नें उनके यज्ञ में कुछ इस प्रकार गुणगान किया था -
'तेनेयं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपर्वता।
समोदधिपरिक्षिप्ता क्षात्रेण विधिना जिता।।१८।।
जज्ञे बाहुसहस्रं वै इच्छत स्तस्य धीमतः।
रथो ध्वजश्च सञ्जज्ञे इत्येवमनुशुश्रुमः।।१९ ।।
दशयज्ञसहस्राणि राज्ञा द्वीपेषु वै तदा।
निरर्गला निवृत्तानि श्रूयन्ते तस्य धीमतः।। २० ।।
सर्वे यज्ञा महाराज्ञस्तस्यासन् भूरिदक्षिणाः।
सर्वेकाञ्चनयूपास्ते सर्वाः काञ्चनवेदिकाः।।२१।।
सर्वे देवैः समं प्राप्तै र्विमानस्थैरलङ्कृताः।
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च नित्यमेवोपशोभिताः।२ ।
तस्य यो जगौ गाथां गन्धर्वो नारदस्तथा।
कार्तवीर्य्यस्य राजर्षेर्महिमानं निरीक्ष्य सः।।२३ ।।
न नूनं कार्तवीर्य्यस्य गतिं यास्यन्ति क्षत्रियाः।
यज्ञैर्दानै स्तपोभिश्च विक्रमेण श्रुतेन च।।२४ ।।
स हि सप्तसु द्वीपेषु, खड्गी चक्री शरासनी।
रथीद्वीपान्यनुचरन् योगी पश्यति तस्करान्।।२५।।
पञ्चाशीतिसहस्राणि वर्षाणां स नराधिपः।
स सर्वरत्नसम्पूर्ण श्चक्रवर्त्ती बभूव ह।२६ ।।
स एव पशुपालोऽभूत् क्षेत्रपालः स एव हि।
स एव वृष्ट्या पर्जन्यो योगित्वादर्ज्जुनोऽभवत्।२७।
योऽसौ बाहु सहस्रेण ज्याघात कठिनत्वचा।
भाति रश्मिसहस्रेण शारदेनैव भास्करः।। २८ ।।
अनुवाद- १८-२८
भावी क्षत्रिय नरेश निश्चय ही यज्ञ, दान, तप, पराक्रम और शास्त्रज्ञान के द्वारा कार्तवीर्यार्जुन की समकक्षता को नहीं प्राप्त होंगे। योगी कार्तवीर्यार्जुन रथ पर आरूढ़ हो हाथ में खङ्ग, चक्र और धनुष धारण करके सातों दीपों में भ्रमण करता हुआ चोरों- डाकुओं पर कड़ी दृष्टि रखता था। राजा कार्तवीर्यार्जुन पचासी हजार वर्षों तक भू-तल पर शासन करके समस्त रत्नों से परिपूर्ण हो चक्रवर्ती सम्राट बना रहा। राजा कार्तवीर्यार्जुन ही अपने योग बल से पशुपालक (गोप) था। वही खेतों का भी रक्षक था और वही समयानुसार मेंघ बनकर वृष्टि भी करता था। प्रत्यञ्चा के आघात से कठोर हुई त्वचाओं वाली अपनी सहस्र भुजाओं से वह उसी प्रकार शोभा पता था, जिस प्रकार सहस्रों किरणों से युक्त शारदीय सूर्य शोभित होता है। १८-२८।
ज्ञात हो- अयोध्यापति श्रीराम, लंकापति रावण और महिष्मतिपुरी (आधुनिक नाम मध्यप्रदेश का महेश्वर जो नर्मदा नदी के किनारे स्थित है।) के चक्रवर्ती अहीर सम्राट कार्तवीर्यार्जुन लगभग एक ही समय के राजा थे। और
जिस रावण को वश में करने और परास्त करने के लिए श्रीराम ने सम्पूर्ण जीवन दाँव पर लगा दिया था, उस रावण को अभीर सम्राट कार्तवीर्यार्जुन ने मात्र पाँच वाणो में परास्त कर बन्दी बना लिया था।
इस बात की पुष्टि- मत्स्यपुराण के अध्याय-(४३) के- (३७ से ३९) तक के श्लोकों से होती है। जिसमें एक नारद नाम का एक गंधर्व कार्तवीर्यार्जुन का गुणगान करते हुए कहा -
एवं बध्वा धनुर्ज्यायामुत्सिक्तं पञ्चभिः शरैः।
लङ्कायां मोहयित्वा तु सबलं रावणं बलात्।। ३७।
निर्जित्य बध्वा चानीय माहिष्मत्यां बबन्ध च।
ततो गत्वा पुलस्त्यस्तु अर्जुनं संप्रसादयत्।। ३८।
मुमोच रक्षः पौलस्त्यं पुलस्त्येनेह सान्त्वितम्। तस्य बाहुसहस्रेण बभूव ज्यातलस्वनः।।३९।
अनुवाद- ३७-३९
इसी प्रकार अर्जुन ने एक बार लंका में जाकर अपने पाँच बाणों द्वारा सेना सहित रावण को मोहित कर दिया, और उसे बलपूर्वक जीत कर अपने धनुष की प्रत्यञ्चा में बांँध लिया, फिर माहिष्मती पुरी में लाकर उसे बन्दी बना लिया। यह सुनकर महर्षि पुलस्त्य (रावण के पितामह) ने माहिष्मती पुरी में जाकर अर्जुन को अनेकों प्रयास से समझा बुझाकर प्रसन्न किया। तब सहस्रबाहु- अर्जुन ने महर्षि पुलस्त्य को सान्त्वना देकर उनके पौत्र राक्षस राज रावण को बन्धन मुक्त कर दिया।३७-३९।
कार्तवीर्यार्जुन कोई साधारण पुरुष नहीं थे। वे साक्षात भगवान श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र के अवतार थे। इस बात की पुष्टि- नारदपुराणम्- पूर्वभाग अध्यायः (७६) के श्लोक-( ४ ) से होती है। जिसमें नारद जी कार्तवीर्यार्जुन के बारे में कहते हैं कि -
यः सुदर्शनचक्रस्यावतारः पृथिवीतले।
दत्तात्रेयं समाराध्य लब्धवांस्तेज उत्तमम्।। ४।
अनुवाद- ये (कार्तवीर्यार्जुन) पृथ्वी लोक पर सुदर्शन चक्र के अवतार हैं। इन्होंने महर्षि दत्तात्रेय की आराधना से उत्तम तेज प्राप्त किया। ४
कार्तवीर्यार्जुन सुदर्शन चक्र का अवतार होने के साथ-साथ दत्तात्रेय का वर पाकर अजेय हो गये थे। उस समय कार्तवीर्यार्जुन और परशुराम से कई बार युद्ध हुआ। जिसमें दिव्य शक्ति सम्पन्न कार्तवीर्यार्जुन ने परशुराम का बध भी कर दिया था। किन्तु यह बात कथाकारों को बर्दाश्त नहीं हुई। परिणामतः इसके उलट कार्तवीर्यार्जुन को ही परशुराम द्वारा वध करने की पुराणों में एक नई कथा जोड़ दिया।
अब सवाल यह है कि क्या वास्तव में कार्तवीर्यार्जुन ने परशुराम का वध किया कि परशुराम ने कार्तवीर्यार्जुन का वध किया, इसकी सच्चाई तभी उजागर हो सकती है जब दोनों के बीच युद्धों का निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए। क्योंकि कि इसमें बहुत घाल- मेल किया गया है। दोनों के बीच हुए युद्धों का वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण के गणपतिखण्ड के अध्याय- ४० के कुछ प्रमुख श्लोकों से होती है। जिसको नीचे उद्धत किया जा रहा है -
"पतिते तु सहस्राक्षे कार्तवीर्य्यार्जुनः स्वयम्।।
आजगाम महावीरो द्विलक्षाक्षौहिणीयुतः।।३।।
सुवर्णरथमारुह्य रत्नसारपरिच्छदम् ।।
नानास्त्रं परितः कृत्वा तस्थौ समरमूर्द्धनि।।४।।
समरे तं परशुरामो राजेन्द्रं च ददर्श ह ।।
रत्नालंकारभूषाढ्यै राजेन्द्राणां च कोटिभिः ।।५।।
रत्नातपत्रभूषाढ्यं रत्नालंकारभूषितम् ।।
चन्दनोक्षितसर्वांगं सस्मितं सुमनोहरम् ।। ६ ।।
राजा दृष्ट्वा मुनीन्द्रं तमवरुह्म रथादहो ।।
प्रणम्य रथमारुह्य तस्थौ नृपगणैः सह ।। ७ ।।
ददौ शुभाशिषं तस्मै रामश्च समयोचितम् ।।
प्रोवाच च गतार्थं तं स्वर्गं गच्छेति सानुगः।।८।।
उभयोः सेनयोर्युद्धमभवत्तत्र नारद।
पलायिता रामशिष्या भ्रातरश्च महाबलाः ।।
क्षतविक्षतसर्वाङ्गाः कार्त्तवीर्य्यप्रपीडिताः।।९।
नृपस्य शरजालेन रामः शस्त्रभृतां वरः ।।
न ददर्श स्वसैन्यं च राजसैन्यं तथैव च ।।१०।
चिक्षेप रामश्चाग्नेयं बभूवाग्निमयं रणे ।।
निर्वापयामास राजा वारुणेनैव लीलया ।।११।।
चिक्षेप रामो गान्धर्वं शैलसर्पसमन्वितम् ।।
वायव्येन महाराजः प्रेरयामास लीलया ।१२।
चिक्षेप रामो नागास्त्रं दुर्निवार्य्यं भयंकरम् ।।
गारुडेन महाराजः प्रेरयामास लीलया ।।१३।
माहेश्वरं च भगवांश्चिक्षेप भृगुनन्दनः ।।
निर्वापयामास राजा वैष्णवास्त्रेण लीलया ।।१४ ।।
ब्रह्मास्त्रं चिक्षिपे रामो नृपनाशाय नारद ।।
ब्रह्मास्त्रेण च शान्तं तत्प्राणनिर्वापणं रणे ।। १५ ।।
दत्तदत्तं च यच्छूलमव्यर्थं मन्त्रपूर्वकम् ।।
जग्राह राजा परशुरामनाशाय संयुगे ।। १६ ।।
शूलं ददर्श रामश्च शतसूर्य्यसमप्रभम् ।।
प्रलयाग्रिशिखोद्रिक्तं दि रि नि वाक्य सुरैरपि ।। १७ ।।
पपात शूलं समरे रामस्योपरि नारद ।।
मूर्च्छामवाप स भृगुः पपात च हरिं स्मरन् ।।१८।।
पतिते तु तदा रामे सर्वे देवा भयाकुलाः ।।
आजग्मुः समरं तत्र ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।।१९।
शङ्करश्च महाज्ञानी महाज्ञानेन लीलया ।।
ब्राह्मणं जीवयामास तूर्णं नारायणाज्ञया ।। 3.40.२० ।।
भृगुश्च चेतनां प्राप्य ददर्श पुरतः सुरान् ।।
प्रणनाम परं भक्त्या लज्जानम्रात्मकन्धरः।।२१ ।।
राजा दृष्ट्वा सुरेशांश्च भक्तिनम्रात्मकन्धरः ।।
प्रणम्य शिरसा मूर्ध्ना तुष्टाव च सुरेश्वरान् ।।२२।
तत्राजगाम भगवान्दत्तात्रेयो रणस्थलम् ।।
शिष्यरक्षानिमित्तेन कृपालुर्भक्तवत्सलः ।२३।
भृगुः पाशुपतास्त्रं च सोऽग्रहीत्कोपसंयुतः ।।
दत्तदत्तेन दृष्टेन बभूव स्तम्भितो भृगुः ।।२४।।
ददर्श स्तम्भितो रामो राजानं रणमूर्द्धनि ।।
नानापार्षदयुक्तेन कृष्णेनाऽऽरक्षितं रणे ।।२५।।
सुदर्शनं प्रज्वलन्तं भ्रमणं कुर्वता सदा ।।
सस्मितेन स्तुतेनैव ब्रह्मविष्णुमहेश्वरैः ।।२६।
गोपालशतयुक्तेन गोपवेषविधारिणा ।।
नवीनजलदाभेन वंशीहस्तेन गायता ।२७।
एतस्मिन्नन्तरे तत्र वाग्बभूवाशरीरिणी ।।
दत्तेन दत्तं कवचं कृष्णस्य परमात्मनः ।। २८ ।।
राज्ञोऽस्ति दक्षिणे बाहौ सद्रत्नगुटिकान्वितम् ।।
गृहीतकवचे शम्भौ भिक्षया योगिनां गुरौ ।।२९ ।।
तदा हन्तुं नृपं शक्तो भृगुश्चेति च नारद ।।
श्रुत्वाऽशरीरिणीं वाणीं शङ्करो द्विजरूपधृक्।। ३०।।
भिक्षां कृत्वा तु कवचमानीय च नृपस्य च।।
शम्भुना भृगवे दत्तं कृष्णस्य कवचं च यत् ।। ३१।।
रामस्ततो राजसैन्यं ब्रह्मास्त्रेण जघान ह ।।
नृपं पाशुपतेनैव लीलया श्रीहरिं स्मरन् ।।७२ ।।
अनुवाद- ३ से ७२ तक
• सहस्राक्ष के गिर जाने पर महाबली कार्तवीर्यार्जुन दो लाख अक्षौहिणी सेना के साथ स्वयं युद्ध करने के लिए आया।
•वह रत्ननिर्मित खोल से आच्छादित स्वर्णमय रथपर सवार हो अपने चारों ओर नाना प्रकार के अस्त्रों को सुसज्जित करके रण के मुहाने पर डटकर खड़ा हो गया।
• इसके बाद वहाँ दोनों सेनाओं में युद्ध होने लगा तब परशुराम के शिष्य तथा उसके महाबली भाई कार्तवीर्य से पीड़ित होकर भाग खड़े हुए।
•उस समय उनके सारे अंग घायल हो गए थे। राजा के बाणसमूह से अच्छादित होने के कारण शास्त्रधारियों में श्रेष्ठ परशुराम को अपनी तथा राजा की सेना भी नहीं दिख रही थी।
• फिर तो परस्पर घोर दिव्यास्त्रों का प्रयोग होने लगा। अन्त में राजा (कार्तवीर्य) ने दत्तात्रेय के दिए हुए अमोघ शूल को यथाविधि मन्त्रों का पाठ करके परशुराम पर छोड़ दिया।
• उस सैकड़ों सूर्य के समान प्रभावशाली एवं प्रलयाग्नि की शिखा के सदृश शूल के लगते ही परशुराम धराशायी हो गये।
• तदनन्तर भगवान शिव ने वहाँ जाकर परशुराम को पुनर्जीवनदान दिया (पुनः जीवित किया)।
• इसी समय वहाँ युद्ध स्थल में भक्तवत्सल कृपालु भगवान दत्तात्रेय अपने शिष्य (कार्तवीर्य) की रक्षा करने के लिए आ पहुँचे। फिर परशुराम ने क्रुद्ध होकर पाशुपतास्त्र हाथ में लिया, परन्तु दत्तात्रेय की दृष्टि पड़ने से वह (परशुराम) पाशुपत अस्त्र सहित रणभूमि में स्तम्भित (जड़वत्) हो गये।
• तब रणके मुहाने पर स्तम्भित हुए परशुराम ने देखा कि जिनके शरीर की कान्ति नूतन जलधार के सदृश्य है, जो हाथ में वँशी लिए बजा रहे हैं, सैकड़ो गोप जिनके साथ हैं, जो मुस्कुराते हुए राजा कार्तवीर्यार्जुन की रक्षा के लिए अपने प्रज्वलित सुदर्शन चक्र को निरन्तर घुमा रहे हैं।
•और अनेकों पार्षदों से गिरे हुए हैं, एवं ब्रह्मा, विष्णु, और महेश्वर जिनका स्तवन कर रहे हैं, वे गोपवेषधारी श्रीकृष्ण युद्ध क्षेत्र में राजा (कार्तवीर्य) की रक्षा कर रहे हैं।
• उसी समय वहाँ यूं आकाशवाणी हुई- दत्तात्रेय के द्वारा दिया हुआ परमात्मा श्रीकृष्ण का कवच उत्तम रत्न की गुटका के साथ राजा की दाहिनी भुजा पर बँधा हुआ है, अतः योगियो के गुरु शंकर भिक्षारूप से जब उस कवच को माँग लेंगे, तभी परशुराम राजा कार्तवीर्यार्जुन का वध करने में समर्थ हो सकेंगे।
• नारद ! उस आकाशवाणी को सुनकर शंकर जी एक ब्राह्मण का रूप धारण करके गए और राजा से याचना करके उसका कवच माँग लाये। फिर शम्भू ने श्रीकृष्ण का वह कवच परशुराम को दे दिया।
• तत्पश्चात परशुराम ने श्रीहरि का स्मरण करते हुए ब्रह्मास्त्र द्वारा राजा की सेना का सफाया कर दिया और फिर लीलापूर्वक पशुपतास्त्र का प्रयोग करके राजा कार्तवीर्यार्जुन की जीवन लीला समाप्त कर दी।
युद्ध विश्लेषण-
यदि उपर्युक्त श्लोक संख्या- (२५ से २८) पर विचार किया जाए तो रणभूमि में कार्तवीर्यार्जुन की रक्षा परमेश्वर श्रीकृष्ण स्वयं अपने सैकड़ो गोपों एवं पार्षदों के साथ कर रहे होते हैं। तो उस स्थिति में ब्रह्माण्ड का न दैत्य, न देवता, न किन्नर, न गन्धर्व, और ना ही कोई मनुष्य कार्तवीर्यार्जुन का बाल बाँका कर सकता था। परशुराम की बात करना तो बहुत दूर है।
• दूसरी बात यह कि- श्लोक संख्या - (१८ से २०) में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि- युद्ध में कार्तवीर्यार्जुन के भयंकर शूल के आघात से परशुराम मारे जाते हैं। किन्तु शिव जी द्वारा उन्हें पुनः जीवित कर दिया जाता है।
अब यहाँ सोचने वाली बात है कि कोई मरने के बाद पुनः जीवित होता है क्या ? जवाब होगा नहीं। तो फिर परशुराम जीवित कैसे हो गये ? यह बात भी हजम नहीं होती।
• तीसरी बात यह कि- श्लोक संख्या (२८ से २९) में लिखा गया है कि- परमात्मा श्रीकृष्ण का कवच जो कार्तवीर्यार्जुन की दाहिनी भुजा में बँधा हुआ था उसी से कार्तवीर्यार्जुन की रणभूमि में रक्षा हो रही होती है, और उसे शिवजी ब्राह्मण वेष में आकर भिक्षा के रूप में माँगते हैं और राजा कार्तवीर्यार्जुन उस कवच को सहर्ष दे देते हैं।
अब यहाँ पर विचारणीय बात यह है कि- क्या राजा को उस समय इतना ज्ञान नहीं था कि युद्धभूमि में अचानक एक ब्रह्मण भिखारी भिक्षा में धन दौलत न माँगकर रक्षा कवच क्यों माँग रहा है ? और सोचने वाली बात यह है की जिस कार्तवीर्यार्जुन की रक्षा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कर रहे हों उस समय कोई भिखारी उसके प्राणों के समान कवच माँगे और अन्तर्यामी भगवान मूकदर्शक बने रहे। यह सम्भव नहीं लगता ? और ना ही यह बात किसी भी तरह
से हजम हो सकती है।
चौथी बात यह कि- अगर कार्तवीर्यार्जुन का वध हुआ होता तो शास्त्रों में उनकी पूजा का विधान कभी नहीं होता। और न ही उनकी जयंती मनाई जाती। जबकि कार्तवीर्यार्जुन का विधिवत पूजा करने का शास्त्रों में विधान किया गया है। इसके लिए निम्नलिखित संदर्भ देखें-
कार्तवीर्यार्जुन की पूजन विधि और उनकी जयंती -
पूराणों में सहस्रबाहू अर्जुन की पूजा करने के विधान की पुष्टि- श्रीबृहन्नारदीयपुराण पूर्वभागे बृहदुपाख्यान तृतीयपाद कार्तवीर्यमाहात्म्यमन्त्रदीपकथनं नामक - (७६) वें अध्याय से होती है। परन्तु परशुराम कि पूजा का विधान किसी पुराण में नहीं है। नारद पूराण में सहस्रबाहू अर्जुन की पूजा करने का विधान नारद और सनत्कुमार संवाद के रूप में जाना जाता है। जिसमें नारद के पूछे जाने पर सनत्कुमार जी कहते हैं-
"नारद उवाच।
"कार्तवीर्यतप्रभृतयो नृपा बहुविधा भुवि।
जायन्तेऽथ प्रलीयन्ते स्वस्वकर्मानुसारतः।। १।
तत्कथं राजवर्योऽसौ लोकेसेव्यत्वमागतः।
समुल्लंघ्य नृपानन्यानेतन्मे नुद संशयम्।। २।
अनुवाद:-
• देवर्षि नारद कहते हैं ! पृथ्वी पर कार्तवीर्य आदि राजा अपने कर्मानुगत होकर उत्पन्न होते और विलीन हो जाते हैं।
• तब उन्हीं सभी राजाओं को लाँघकर कार्तवीर्य किस प्रकार सन्सार में पूज्य हो गये यही मेरा संशय है। १-२।
"सनत्कुमार उवाच"
श्रृणु नारद ! वक्ष्यामि सन्देहविनिवृत्तये।
यथा सेव्यत्वमापन्नः कार्तवीर्यार्जुनो भुवि।।३
अनुवाद:- सनत्कुमार ने कहा ! हे नारद ! मैं आपके संशय की निवृति हेतु वह तथ्य कहता हूँ। जिस प्रकार से कार्तवीर्य अर्जुन पृथ्वी पर पूजनीय (सेव्यमान) कहे गये हैं सुनो ! । ३।
यः सुदर्शनचक्रस्यावतारः पृथिवीतले।
दत्तात्रेयं समाराध्य लब्धवांस्तेज उत्तमम्।। ४।
तस्य क्षितीश्वरेंद्रस्य स्मरणादेव नारद।
शत्रूञ्जयति संग्रामे नष्टं प्राप्नोति सत्वरम्।। ५।
तेनास्य मन्त्रपूजादि सर्वतन्त्रेषु गोपितम्।
तुभ्यं प्रकाबशयिष्येऽहं सर्वसिद्धिप्रदायकम्।। ६।
अनुवाद:- ४ से ६
• ये सहस्रबाहु अर्जुन पृथ्वी लोक पर सुदर्शन चक्र के अवतार हैं। इन्होंने महर्षि दत्तात्रेय की आराधना से उत्तम तेज प्राप्त किया।
हे नारद ! कार्तवीर्य अर्जुन के स्मरण मात्र से ही पृथ्वी पर विजय लाभ की प्राप्ति होती है। शत्रु पर युद्ध में विजय प्राप्त होती है। तथा शत्रु का नाश भी शीघ्र ही हो जाता है।
• कार्तवीर्य अर्जुन का मन्त्र सभी तन्त्रों में गुप्त है। मैं सनत्कुमार आपके लिए इसे आज प्रकाशित करता हूँ। जो सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाला है। ४ से ६।
वह्नितारयुता रौद्री लक्ष्मीरग्नींदुशान्तियुक्।वेधाधरेन्दुशांत्याढ्यो निद्रयाशाग्नि बिंदुयुक्।। ७।
पाशो मायांकुशं पद्मावर्मास्त्रे कार्तवीपदम्।
रेफोवा द्यासनोऽनन्तो वह्निजौ कर्णसंस्थितौ।। ८।
मेषः सदीर्घः पवनो मनुरुक्तो हृदंतिमः।
ऊनर्विशतिवर्णोऽयं तारादिर्नखवर्णकः।। ९।
दत्तात्रेयो मुनिश्चास्यच्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम्।
कार्तवीर्यार्जुनो देवो बीजशक्तिर्ध्रुवश्च हृत्।। १०।
शेषाढ्यबीजयुग्मेन हृदयं विन्यसेदधः।
शान्तियुक्तचतुर्थेन कामाद्येन शिरोंऽगकम्। ११।
इन्द्वाढ्यं वामकर्णाद्यमाययोर्वीशयुक्तया।
शिखामंकुशपद्माभ्यां सवाग्भ्यां वर्म विन्यसेत्।।१२।
वर्मास्त्राभ्यामस्त्रमुक्तं शेषार्णैर्व्यापकं पुनः।
हृदये जठरे नाभौ जठरे गुह्यदेशतः।। १३।
दक्षपादे वामपादे सक्थ्नि जानुनि जङ्घयोः। विन्यसेद्बीजदशकं प्रणवद्वयमध्यगम् ।।१४ ।।
ताराद्यानथ शेषार्णान्मस्तके च ललाटके।
भ्रुवोः श्रुत्योस्तथैवाक्ष्णोर्नसि वक्त्रे गलेंऽसके ।।१५ ।।
सर्वमन्त्रेण सर्वांगे कृत्वा व्यापकमादृतः।
सर्वेष्टसिद्धये ध्यायेत्कार्तवीर्यं जनेश्वरम् ।। १६।।
उद्यद्रर्कसहस्राभं सर्वभूपतिवन्दितम् ।
दोर्भिः पञ्चाशता दक्षैर्बाणान्वामैर्धनूंषि च।।१७ ।।
दधतं स्वर्णमालाढ्यं रक्तवस्त्रसमावृतम्।
चक्रावतारं श्रीविष्णोर्ध्यायेदर्जुनभूपतिम् ।१८।
अनुवाद- ७ से १८
इनकी कान्ति (आभा) हजारों उदित सूर्यों के समान है। सन्सार के सभी राजा इनकी वन्दना अर्चना करते हैं। सहस्रबाहु के (500) दक्षिणी हाथों में वाण और (500) उत्तरी (वाम) हाथों में धनुष हैं। ये स्वर्ण मालाधारी तथा रक्वस्त्र (लाल वस्त्र) से समावृत (लिपटे हुए) हैं। ऐसे श्रीविष्णु के चक्रावतार राजा सुदर्शन का ध्यान करें।
• इनका वह मन्त्र उन्नीस अक्षरों का है यह मूल में "श" तक वर्णित है। इसका मन्त्रोद्धार विद्वान जन करें अत: इसका अनुवाद करना भी त्रुटिपूर्ण होगा इस मन्त्र के जनक ऋषि दत्तात्रेय हैं। छन्द अनुष्टुप् और देवाता हैं कार्तवीर्य अर्जुन "बीज" है ध्रुव- तथा शक्ति है हृत् - शेषाढ्य बीज द्वय से हृदय न्यास करें। शन्तियुक्त- चतुर्थ मन्त्रक्षर से शिरोन्यास इन्द्राढ्यम् से वाम कर्णन्यास अंकुश तथा पद्म से शिखान्यास वाणी से कवचन्यास करें हुँ फट् से अस्त्रन्यास
करें। तथा शेष अक्षरों से पुन: व्यापक न्यास करना चाहिए इसके बाद सर्व सिद्धि हेतु जनेश्वर (लोगों के ईश्वर) कार्तवीर्य का चिन्तन करें।७-१८।
उपर्युक्त दर्शायी गयी पौराणिक घटना के समान तथ्य अन्य पौराणिक ग्रन्थों में भी मिलता है। जैसे-
लक्ष्मीनारायणसंहिता - खण्ड प्रथम (कृतयुगसन्तानः) अध्यायः (४५८ ) में परशुराम और सहस्रबाहू युद्ध का वर्णन इस प्रकार किया गया है। वहाँ से भी इसकी जानकारी ली जा सकती है।
सम्पूर्ण निष्कर्ष - इन तमाम तर्कों एवं संदर्भों के आधार पर सिद्ध होता है कि निश्चय ही कार्तवीर्यार्जुन नें परशुराम का वध कर दिया था। किन्तु यह बात कथाकारों को गले से नींचे नहीं उतरी। परिणाम यह हुआ कि कथाकारों नें एक नई कहानी जोड़कर इसके उलट कार्तवीर्यार्जुन का ही वध परशुराम से उसी तरह से करा दिया जिस तरह से भगवान श्रीकृष्ण को एक बहेलिया से करा दिया है। ऐसे झूठे और छद्म कथकारों को परमेश्वर कभी क्षमा नहीं करते।
इस प्रकार से कार्तवीर्यार्जुन की जानकारी के साथ यह भाग समाप्त हुआ। अब इसके अगले भाग-(7) में देवमीढ के बारे में बताया गया है। उसको भी इस भाग के साथ जोड़कर अवश्य पढ़ें।
(7)- देवमीढ का परिचय-
हृदीक पुत्र- महाराज देवमीढ को जानने से पूर्व संक्षेप में इनके पूर्वजों का जानना होगा तभी पूरी बात समझ में आएगी। देवमीढ के पूर्वज- सात्वत के सात पुत्रों में वृष्णि (द्वितीय) के दो पुत्र- सुमित्र और युद्धाजित हुए। जिसमें युद्धाजित के शिनि और अनमित्र दो पुत्र हुए। फिर अनमित्र के तीन पुत्र- निघ्न, शिनि (द्वितीय) और वृष्णि (तृतीय) हुए। इस तृतीय वृष्णि के भी दो पुत्र- श्वफलक और चित्ररथ हुए।
जिसमें श्वफलक की पत्नी गान्दिनी से अक्रूर जी का जन्म हुआ जो यादवों की सुरक्षा को लेकर सदैव तत्पर रहते थे। उसी क्रम में श्वफलक के भाई चित्ररथ के भी दो पुत्र - पथ और विदुरथ हुए। फिर इस विदुरथ के शूर, हुए। शूर के भजमान (द्वितीय), भजमान (द्वितीय) के शिनि (तृतीय), शिनि (तृतीय) के स्वयमभोज, स्वयमभोज के हृदीक, हृदीक के देवमीढ हुए।
महाराज देवमीढ की तीन पत्नियाँ-
अश्मिका, सतप्रभा और गुणवती थीं। जिसमें देवमीढ की पत्नी सतप्रभा से एक कन्या- सतवती हुई। पुनः उसी क्रम में अश्मिका से शूरसेन का जन्म हुआ। इस शूरसेन की पत्नी का नाम मारिषा था, जिससे कुल दस पुत्र हुए। उन्हीं दस पुत्रों में धर्मवत्सल वसुदेव जी भी थे। जिसमें वसुदेव जी की बहुत सी पत्नियाँ थीं, किन्तु मुख्य रूप से दो ही पत्नियाँ- देवकी और रोहिणी प्रसिद्ध थीं। जिसमें वसुदेव और देवकी से गोपेश्वर श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। तथा वासुदेव जी की दूसरी पत्नी रोहिणी से बलराम जी का जन्म हुआ।
वहीं दूसरी तरफ देवमीढ की दूसरी पत्नी- गुणवती से- अर्जन्य, पर्जन्य और राजन्य नाम के तीन पुत्र हुए। जिसमें पर्जन्य की पत्नी का नाम वरियसी था। इसी वरियसी और पर्जन्य से कुल पाँच पुत्र- उपनन्द, अभिनन्द, नन्द (नन्दबाबा), सुनन्द, और नन्दन हुए। पर्जन्य के कुल पाँच पुत्रों में नन्दबाबा अधिक लोकप्रिय थे। नन्दबाबा की पत्नी का नाम यशोदा था। जिससे विन्ध्यवासिनी (योगमाया) अथवा एकानशा नाम की एक अद्भुत कन्या का जन्म हुआ।
विशेष- पारिवारिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो वसुदेव जी और नन्द बाबा एक ही परिवार से थे, जिसमें दोनों के पितामह देवमीढ थे। इस हिसाब से नन्दबाबा और वासुदेव जी आपस के भाई हुए, क्योंकि वसुदेव जी नन्द बाबा के सगे चाचा (सुरसेन) के पुत्र थे।
देवमीढ के बारे में तथा उनके "वंश वृक्ष" को और विस्तार से इस पुस्तक के परिशिष्ट- (9) में बताया गया है। अधिक जानकारी के लिए उस परिशिष्ट को अवश्य पढ़ें।
(8) योगमाया विंध्यवासिनी का परिचय-
योगमाया विंध्यवासिनी स्वयं गोप कुल में नन्द बाबा के यहाँ जन्म लेने को पूर्वकाल में ही कह चुकीं थीं। इसकी पुष्टि- श्रीमार्कण्डेय पुराण के देवीमाहात्म्य अध्याय- ११ के श्लोक- ४१-४२ से होती है। जिसमें योगमाया कहती हैं कि -
वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते अष्टाविंशतिमे युगे ।
शुम्भो निशुम्भश्चैवान्यावुत्पत्स्येते महासुरौ ॥४१॥
नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा ।
ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी ॥ ४२॥
अनुवाद- ४१-४२
• वैवस्वत मन्वन्तर में अठाईसवां द्वापर युग आने पर शुम्भ और निशुम्भ जैसे दूसरे महासुर उत्पन्न होंगे ।
• तब नन्दगोप के घर में यशोदा के गर्भ से उत्पन्न हो विन्ध्याचल निवासिनी के रूप में उन दोनों का नाश करुँगी।
विशेष- योगमाया को जन्म लेते ही वसुदेव जी अपने नवजात शिशु श्रीकृष्ण को योगमाया के स्थान पर रखकर योगमाया को लेकर कंस के बन्दीगृह में पुनः पहुँच गए। और जब कंस को यह पता चला कि देवकी को आठवीं सन्तान पैदा हो चुकी है तो वह बन्दीगृह में पहुँच कर योगमाया को ही देवकी का आठवाँ पुत्र समझकर पत्थर पर पटक कर मारना चाहा, किन्तु योगमाया उसके हाथ से छुटकर कंस को यह कहते हुए आकाश मार्ग से विन्ध्याचल पर्वत पर चली गईं कि- तुझे मारने वाला पैदा हो चुका है। वही योगमाया विन्ध्याचल पर्वत पर आज भी यादवों की प्रथम कुल देवी के रूप विराजमान है।
इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण भक्त गोपाचार्य हँस श्रीमाता प्रसाद जी कहना है कि- "कुलदेवी या कुल देवता उसी को कहा जाता है जो कुल की रक्षा करते हैं।
योगमाया विन्ध्यवासिनी को श्रीकृष्ण सहित समस्त यादवों की रक्षा करने वाली कुल देवी और श्रीकृष्ण को कुल देवता होने की पुष्टि - हरिवंश पुराण के विष्णुपर्व के अध्याय- ४ के श्लोक- ४६, ४७ और ४८ से होती है। जिसमें लिखा गया है कि -
सा कन्या ववृधे तत्र वृष्णिसंघसुपूजिता ।
पुत्रवत् पाल्यमाना सा वसुदेवाज्ञया तदा।४६ ।
विद्धि चैनामथोत्पन्नामंशाद् देवीं प्रजापतेः ।
एकानंशां योगकन्यां रक्षार्थं केशवस्य तु ।४७ ।
तां वै सर्वे सुमनसः पूजयन्ति स्म यादवाः ।
देववद् दिव्यवपुषा कृष्णः संरक्षितो यया ।४८।
अनुवाद- ४६ से ४८
• वहाँ (विन्ध्याचल पर्वतपर) वृष्णी वंशी यादवों के समुदाय से भली-भाँति पूजित हो वह कन्या बढ़ने लगी। वसुदेव की आज्ञा से उसका पुत्रवत पालन होने लगा।
• इस देवी (विंध्यवासिनी) को प्रजा पलक भगवान विष्णु के अंश से उत्पन्न हुई समझो। वह एक होती हुई अनंंशा (अंश रहित) अर्थात अविभक्त थी, इसीलिए एकानंशा कहलाती थी। योग बल से कन्या रूप में प्रकट हुई वह देवी भगवान श्री कृष्ण की रक्षा के लिए आविर्भूत हुई थी।
• यदुकुल में उत्पन्न सभी लोग उस देवी को आराध्य देव के समान पूजन करते थे, क्योंकि उसने अपनी दिव्यदेह से श्रीकृष्ण की भी रक्षा की थी।
विशेष- तभी से समस्त यादव समाज विंध्यवासिनी योगमाया को प्रथम कुल देवी तथा गोपेश्वर श्रीकृष्ण को कुल देवता मानकर परम्परागत रूप से पूजते हैं। नन्दबाबा को योगमाया विन्ध्यवासिनी के अतिरिक्त एक भी पुत्र नहीं हुआ। इसलिए उनका वंश आगे तक नहीं चल सका। इस लिए किसी को नन्दवंशी यादव कहना उचित नहीं है।
निष्कर्ष- यदि अध्याय (7) के सम्पूर्ण संदर्भों को देखा जाए तो अंततोगत्वा यहीं निष्कर्ष निकालाता है कि अहीर (गोप) जाती के अंतर्गत यादव वंश में महाराज देवमीढ का जन्म हुआ था। और देवमीढ के एक पुत्र- पर्जन्य से नन्द बाबा का जन्म हुआ। वहीं दूसरी तरफ देवमीढ के दूसरे पुत्र- शूरसेन का जन्म हुआ। इसी सुरसेन से वसुदेव जी का जन्म हुआ था। अतः पारिवारिक रिश्तों के आधार पर नन्द बाबा और वसुदेव जी आपस के भाई हुए क्योंकि वसुदेव जी नन्द बाबा के सगे चाचा (सुरसेन) के पुत्र थे।
इतना नजदीकी पारिवारिक रिश्ता होने के बाद भी कुछ अज्ञानी तथा धुर्थ कथा वाचक नन्द बाबा और वसुदेव जी को अलग अलग बताकर ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था में वर्ण भेद करते हुए नन्द बाबा को वैष्य तथा वसुदेव जी को क्षत्रिय बता कर यादवों में विघटन पैदा करने भरसक प्रयास करते हैं जो बिल्कुल ही असम्भव, निराधार और तर्कहीन है।
(ख)- ऐतिहासिक यादव राजा-
इस भाग का मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित ऐतिहासिक यादव राजाओं के बारे में जानकारी देना है-
(1)- वीर अहीर लोरिक
(2)- आल्हा-ऊदल
(3)- अहीर देवायत बोदर
(4)- देवगिरी के यादव राजा-
(A)- भिल्लम पंचम (B)- सिंघण द्वितीय (C)- रामचंद्र यादव इत्यादि।
(5)- विजयनगर के यादव राजा-
(A) हरिहर एवं बुक्का
(B)- कृष्णदेवराय
(6)- दक्कन के अहीर राजा- ईश्वरसेन अहीर
(7)- वाडियार के यादव राजा- देवराज वाडियार
(1)- वीर अहीर लोरिक
वीर अहीर लोरिक- 5वीं-6वीं शताब्दी के एक महान अहीर योद्धा थे, जो अपनी अदम्य शक्ति और वीरता के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी वीरगाथा 'लोरिकायन' के रूप में भोजपुरी लोकगीतों और उत्तर प्रदेश व बिहार की लोक संस्कृति में आज भी जीवंत है। अहीर समाज में लोरिकायन को 'अहीरों की रामायण' कहा जाता है।
लोरिक का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के सिकंदरपुर तहसील के गौरा गाँव में एक अहीर परिवार में हुआ था।
अपार शक्ति: लोककथाओं के अनुसार, वीर लोरिक की विशाल तलवार का नाम बिजुली था, जो लगभग 3400 किलो की थी। लोरिक के गुरु अजयी धोबी थे जो कुस्ती के हर दांव पेंच में पारंगत थे।
लोरिकायन के अनुसार वीर लोरिक की वीरता से प्रभावित होकर महर नाम के एक अहीर ने अपनी पुत्री मंजरी (चन्दा) का विवाह लोरिक से तय (निश्चित) कर दिया। इस बात की जानकारी जब अगोरी (वर्तमान नाम सोनभद्र) के राजा मोलागत को हुई तो वह मंजरी से जबरन विवाह करने लिए बाध्य करने लगा। राजा से परेशान होकर मंजरी के पिता महर ने लोरिक से जाकर अपनी सारी व्यथा कह सुनाई। मंजरी के पिता की दुःख भरी बातों को सुनकर वीर लोरिक क्रोध से तिलमिला उठा और अपने वीर जांबाज अहिर सेना को लेकर अपनी प्रेयसी मंजरी को लेने निकल पड़ा। उधर राजा मोलागत भी अपने किला की सुरक्षा के लिए सैनिकों के साथ सोन नदी के तट पर आ डटा। फिर तो दोनों पक्षों में भयानक युद्ध होने लगा। यह युद्ध इतना भयानक था कि युद्ध भूमि पर खून की धारा बहने लगी। उस खून की धारा को आज भी रूधिरा नाला के नाम से जाना जाता है। अन्ततोगत्वा राजा मोलागत युद्ध भूमि में मारा गया। इसके बाद लोरिक अपनी प्रेयसी मंजरी को प्रेम पूर्वक लेकर सोनभद्र की पहाड़ियों के बीच से निकल ही रहा था कि अचानक एक घटना घटी। मंजरी अचानक रुकी और लोरिक से प्रेम पूर्वक बोली- "हे वीर ! आप मेरे मायके (नैहर) के इस क्षेत्र में कुछ ऐसा कीजिए कि आप की वीरता और अदम्य साहस को लोग युगों युगों तक याद करते रहें तथा हम दोनों का यह प्रेम विवाह अमिट निशानी बन जाय। वीर लोरिक मंजरी की तरफ देखा और मुस्कराते हुए कहा- प्रिये! बताओ मैं ऐसा क्या करूँ ? इस पर मंजरी बोली हे मेरे स्वामी ! आप इस विशाल पर्वत की चट्टान को अपनी तलवार से एक ही बार में दो टुकडा़ कर दीजिए और तुरन्त इसके लाल चूर्ण से मेरी मांग भरिये। वीर लोरिक अपनी प्रेयसी की बात सुनकर तुरन्त अपनी तलवार से सामने पड़ी उस विशाल पर्वत की चट्टान को पलक भजते ही एक ही बार में दो टुकड़ा कर दिया।
तत्पश्चात अपनी कुल देवी विंध्यवासिनी को साक्षी मानकर उस पत्थर के लाल चूर्ण को सिंदूर मानकर अपनी प्रेयसी मंजरी की मांग भर दी और मंजरी के साथ अपने गौरा गाँव को प्रस्थान किया।
वीर लोरिक का ऐतिहासिक कालक्रम-
ऐतिहासिक विद्वानों ने लोरिक के समय को अलग-अलग कालखण्डों से जोड़ा है जैसे-
डॉ. भोला शंकर व्यास ने वीर लोरिक को गुप्त कालीन (5वीं-6वीं शताब्दी) का माना है।
वहीं दूसरी तरफ डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी के ऐतिहासिक उपन्यास 'पुनर्नवा' के आधार पर लोरिक को सम्राट समुद्रगुप्त (335–380 ईस्वी) का समकालीन बताया है।कुछ गाथाओं के अनुसार, वे समुद्रगुप्त के सेनापति भी थे।
डॉ. रामकुमार वर्मा ने अपनी पुस्तक 'हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास' में उन्हें राजा भोज के समकालीन 10वीं-11वीं शताब्दी का माना है।
पुरातात्विक साक्ष्य-
सोनभद्र में जिस पत्थर को वीर लोरिक ने दो टुकडो़ में विभाजित कर दिया था वह आज भी पुरातात्विक साक्ष्य के रूप में सोनभद्र के मारकुण्डी पहाड़ी पर स्थित है।
साहित्यिक साक्ष्य-
लोरिकायन वीर लोरिक की गाथा को पहली बार 1379 ईस्वी में सूफी कवि मुल्ला दाऊद ने 'चन्दायन' (या लोरिकायन) के नाम से लिखा था। यह इस बात को प्रमाणित करती है कि 14 वीं शताब्दी तक लोरिक की कथा ऐतिहासिक महाकाव्य बन चुकी थी। जो उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में अहीरों की रामायण के रूप में प्रसिद्ध है।
(2)- आल्हा-ऊदल-
आल्हा और ऊदल 12वीं सदी के बुन्देलखण्ड के दो महान योद्धा थे। जिनकी वीरता की गाथाएँ आज भी उत्तर भारत में बड़े प्रेम से गाई जाती हैं। इनके बारे में मुख्य बातें निम्नलिखित हैं-
ऐतिहासिक परिचय-
आल्हा और ऊदल महोबा के चंदेल राजा परमाल के सेनापति दशराज के पुत्र थे, जो बनाफरी अहीर थे। क्योंकि लोक कथाओं और ऐतिहासिक तथा पौराणिक ग्रन्थों में उन्हें अहीर कहा गया है। इसके लिए निम्नलिखित साक्ष्य प्रस्तुत हैं -
1. भविष्य पुराण-
भविष्य पुराण (प्रतिसर्ग पर्व, खण्ड 2) के अनुसार, आल्हा और ऊदल की माता देवकी (या देवला) अहीर जाति से थीं।
ग्रन्थ में उल्लेख है कि उनके नाना, ग्वालियर के राजा दलपत सिंह, अहीर (आभीर) समुदाय के थे।
इसी पुराण के अनुसार, आल्हा के पिता दशराज को भी कुछ स्थानों पर अहीर पृष्ठभूमि से जोड़ा गया है और उनकी दादी भी बक्सर के एक अहीर परिवार से थीं।
एतस्मिन्नन्तरे विप्र यथा जातं शृणुष्व तत् ।।
आभीरी वाक्सरे ग्रामे व्रतपा नाम विश्रुता ।।२२।।
अनुवाद- इसके उपरान्त हे ब्राह्मण जो हुआ वह सुन ! बक्सर (आधुनिक बिहार का एक जिला) नामक गाँव में एक व्रतपा नामकी अहीराणी प्रसिद्ध थी।२२।
नवदुर्गाव्रतं श्रेष्ठं ? नववर्षं चकार ह ।।
प्रसन्ना चण्डिका प्राह वरं वरय शोभने ।।२३ ।।
अनुवाद- उसने नवदुर्गा का व्रत नौ वर्ष तक किया तत्पश्चात प्रसन्न हो कर देवी दुर्गा ने उससे कहा हे प्रिया ! वरदान माँग ।२३।
साह तां यदि मे मातर्वरो देयस्त्वयेश्वरि।।
रामकृष्णसमौ बालौ भवेयाः ममान्वये।।२४ ।।
अनुवाद- तब व्रतपा ने कहा ! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो हे देवी बलराम और कृष्ण के समान दो पुत्र मेरे वंश में उत्पन्न हों ।२४।
तथेत्युक्त्वा तु सा देवी तत्रैवान्तरधीयत।।
वसुमान्नाम नृपतिस्तस्या रूपेण मोहितः।।२५।।
अनुवाद - ऐसा ही हो कहकर वह देवी अन्तर्ध्यान हो गयी वसुमान नामक राजा ने उस व्रतपा के रूप पर मोहित होकर उसके साथ विवाह किया।२५।
उद्वाह्य धर्मतो भूपः स्वगेहे तामवासयत् ।।
तस्यां जातौ नृपात्पुत्रौ देशराजस्तु तद्वरः।२६।।
अनुवाद:-विवाह कर धर्म पूर्वक वह राजा उसे अपने घर ले जाकर प्रसन्नता पूर्वक रहने लगा। उस व्रतपा के गर्भ से उस वसुमान राजा के दो श्रेष्ठ पुत्र देशराज और वत्सराज हुए ।२६।
आवार्य वत्सराजश्च शतहस्तिसमो बले ।।
जित्वा तौ मागधान्देशान्राज्यवन्तौ बभूवतुः।२७।।
अनुवाद- उन दोनों ( व्रतपा और वसुमान) उत्पन्न हुए उन दोनों नें मगध( पश्चिमी बिहार) को जीतकर उसपर शासन किया ।२७।
इति श्रीभविष्ये महापुराणे प्रतिसर्गपर्वणि चतुर्युगखण्डापरपर्याये कलियुगीयेतिहासमुच्चये चतुर्थोऽध्यायः।।४।।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI)- अलेक्जेंडर कनिंघम और एच.बी.डब्ल्यू. गैरिक द्वारा 1881 में लिखी गई रिपोर्ट (Report of a Tour through Bihar, Central India, etc.) में आल्हा और ऊदल को "अहीर सरदार" के रूप में वर्णित किया गया है। तथा ब्रिटिश राजपत्रों और जनगणना रिपोर्टों में उनको बनाफर वंशी अहीर जाती का माना गया है।
साहित्यिक साक्ष्य-
कवि जगनिक द्वारा रचित 'आल्हा-खंड' (या परमाल रासो) में उनकी वीरता का सजीव वर्णन मिलता है। जिसे अहीर समाज सदियों से आल्हा खण्ड का गायन करता आ रहा है और उन्हें अपना पूर्वज मानता है। पुरानी प्रतियों में ऊदल के चचेरे भाई मलखान सिंह को "आभीर कुंवर" या "यादव राय" कहकर सम्बोधित किया गया है। आल्हा खण्ड की गणना दुनिया के सबसे लम्बे युद्ध-काव्यों में की जाती है, जिसको आज भी उत्तर भारत में बड़े चाव से गाया जाती हैं। जिसे सुनकर लोगों में जोश भर जाता है।
(3)- अहीर देवायत बोदर-
अहीर देवायत बोदर गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के एक महान अहीर (यादव) योद्धा थे। उन्हें उनकी अदम्य वीरता, त्याग और शरणागत की रक्षा के लिए जाना जाता है। एक समय की बात है- रा' नवघन की रक्षा: जब पाटन के सोलंकी राजा दुर्लभराज ने जूनागढ़ पर आक्रमण कर राजा रा' दियास की हत्या कर दी, तब रानी ने अपने छोटे पुत्र रा' नवघन को सुरक्षित रखने के लिए देवायत बोदर को यह कहते हुए सौंप दिया की आप इस बच्चे को पुत्र की तरह पालन करना। देवायत बोदर ने वैसा ही किया और नवघन को अपने पुत्र की तरह पाला।
किन्तु जब सोलंकी राजा को भनक लगी कि नवघन जीवित है, तो उसने देवायत बोदर की परीक्षा ली। उस समय अपने वचन और शरणागत की रक्षा के लिए देवायत बोदर ने अपने सगे पुत्र उगा (वासना) का बलिदान दे दिया ताकि दुश्मन को लगे कि नवघन मारा गया है। उनकी पत्नी सोनल ने भी इस कठिन परीक्षा में साहस दिखाया।
कुछ समय बाद देवायत बोदर ने अहीर सेना को संगठित किया और सोलंकी राजा को पराजित कर रा' नवघन को जूनागढ़ के सिंहासन पर बिठाया। उनके इसी त्याग के कारण गुजरात में "अहीर नो आसरो" कहावत प्रसिद्ध हुई, जिसका अर्थ है कि विपत्ति के समय अहीर की शरण सबसे सुरक्षित होती है।
(4)- देवगिरी के यादव राजा
देवगिरी के निम्नलिखित तीन प्रमुख यादव राजा थे-
(A)- भिल्लम पञ्चम (B)- जैतुगी (जैत्रपाल) (C)- सिंघण द्वितीय और (D)- रामचन्द्र यादव। इन तीनों प्रमुख यादव राजाओं के बारे में विस्तार से जानकारी देना ही इस भाग का मुख्य उद्देश्य है।
(A)- भिल्लम पंचम
इतिहास के पन्नों में यादवों की प्रथम कीर्तिमान स्थापित करने का श्रेय भिल्लम पञ्चम को ही दिया जाता है। इनका शासनकाल- 1175–1191 ई० तक तक माना जाता है। भिल्लम पंचम दक्षिण भारत के सेउना (यादव) राजवंश के प्रथम स्वतंत्र और सम्प्रभु सम्पन्न शासक थे। भिल्लम पंचम के बारे में निम्नलिखित ऐतिहासिक तथ्य प्रस्तुत हैं-
(क) भिल्लम पञ्चम ने सबसे पहले कल्याणी के चालुक्यों की अधीनता को त्याग कर 1187 ई. के आसपास एक स्वतंत्र यादव साम्राज्य की नींव रखी।
(ख) भिल्लम पञ्चम ही एक ऐसा यादव राजा हुआ जिसने देवगिरि (वर्तमान महाराष्ट्र का दौलताबाद) शहर बसाया और उसे अपनी राजधानी बनाया तथा प्रसिद्ध देवगिरि किले के निर्माण किया। निर्माण: भिल्लम पञ्चम ने 1187 ई. में इस किले का निर्माण 1187 ई० में एक ऊंची पहाड़ीयों पर करवाया था जो अपनी जटिल रक्षा प्रणाली के लिए प्रसिद्ध है। जिसमें अभेद्य तीन सुरक्षा दीवारें (कोट), गहरी खाइयाँ और 'अन्धेरी गुफा (एक भूलभुलैया जैसा अन्धेरा रास्ता) आज भी प्रसिद्ध हैं। यह किला अभेद्य कवच के समान था जिसको तोड़ पाना दुश्मन के लिए असम्भव था।
(ग) भिल्लम पञ्चम गुजरात के चालुक्यों, मालवा के परमारों और दक्षिण के होयसल राजाओं के खिलाफ कई सफल अभियान चलाए। 1189 ई. में सोरातुर के युद्ध में उन्होंने होयसल राजा बल्लाल द्वितीय को हराया था। उसके इसी ऐतिहासिक अभियान के उपरान्त शिलालेखों में 'चक्रवर्ती यादव' के नाम से सम्बोधित किया गया है।
विशेष- भिल्लम पञ्चम वैज्ञानिकों, कवियों और विद्वानों का विशेष आदर करते थे। इनके ही यादव साम्राज्य में प्रसिद्ध गणितज्ञ नागार्जुन के गुरु भास्कर फले फूले थे। देवगिरी के यादव राजवंश में और भी महत्वपूर्ण राजा हुए। जिनके बारे में क्रमशः नीचे बताया गया है।
(B)जैतुगी (जैत्रपाल)-
जैतुगी जिन्हें जैत्रपाल नाम से भी जाना जाता है। ये अपने पिता भिल्लम पञ्चम के उत्तराधिकारी थे। इन्होंने होयसलों और काकतीयों को हराकर साम्राज्य को और सुदृढ़ किया।
(C)- सिंघण द्वितीय
सिंघण द्वितीय के पिता का नाम जैतुगी (जैतुगीदेव प्रथम) था। तथा इनकी माता का नाम भागीरथीबाई था। सिंघण द्वितीय देवगिरी के यादव राजवंश का सबसे प्रतापी और शक्तिशाली शासक थे। इनका कार्यकाल- 1210–1247 ई. तक माना जाता है। सिंघण द्वितीय का साम्राज्य विस्तार नर्मदा नदी से तुंगभद्रा नदी तक था। इनके ही दरबार में दरबार में प्रसिद्ध संगीतज्ञ शार्ङ्गदेव रहा करते थे, जिन्होंने 'संगीत रत्नाकर' जैसी महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना किया जो भारतीय शास्त्रीय संगीत का महत्वपूर्ण ग्रन्थ माना जाता है।
(D)- रामचन्द्र यादव
देवगिरी के यादव राजा रामचन्द्र यादव जिनका दूसरा नाम रामदेव था। ये देवगिरी के यादव सम्राट कृष्ण के पुत्र थे। पिता कृष्ण की मृत्यु के समय रामचन्द्र बहुत छोटे थे, इसलिए उनके चाचा महादेव सिंहासन पर बैठे। महादेव के बाद जब उनके पुत्र यानी रामचन्द्र के चचेरे भाई अम्माना राजा बने। किन्तु कुछ ही समयं बाद रामचन्द्र ने तख्तापलट कर 1271 ई. मे देवगिरी का राजा हुए। रामचन्द्र यादव देवगिरि के अन्तिम महान यादव राजा थे। इनका शासनकाल- 1271–1311 ई. तक माना जाता है।
इनके ही शासनकाल 1296 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने देवगिरि पर आक्रमण किया, जो दक्षिण भारत पर दिल्ली सल्तनत का पहला सफल अभियान था। अलाउद्दीन खिलजी के देवगिरि पर आक्रमणों से दक्षिण भारत में दिल्ली सल्तनत का विस्तार हुआ तथा यादव साम्राज्य का अन्त हुआ। अलाउद्दीन खिलजी यादवों की अपार सम्पत्तियों को लूटा और मलिक काफूर के नेतृत्व में दक्कन पर वर्चस्व स्थापित किया। राजा रामचन्द्र देव के अधीनता स्वीकार करने से दक्षिण का द्वार खुल गया और यादव राजधानी देवगिरि जो बाद में दौलताबाद दिल्ली का प्रमुख केंद्र बनी।
कुछ समय पश्चात 1327 ई. में मुहम्मद बिन तुगलक ने पुनः देवगिरि को दिल्ली के स्थान पर अपनी राजधानी बनाया और इसका नाम बदलकर दौलताबाद ('धन का शहर') रख दिया। वर्तमान में महाराष्ट्र सरकार ने दौलताबाद किले का नाम बदलकर पुनः 'देवगिरी' करने का निर्णय लिया है।
विशेष- देवगिरी के यादव काल में मराठी साहित्य और संस्कृत को विशेष प्रोत्साहन मिला। संत ज्ञानेश्वर और नामदेव के समय भक्ति आन्दोलन का उदय देवगिरी यादव शासकों के संरक्षण में हुआ। अब हमलोग इसी क्रम में विजयनगर के प्रमुख यादव राजाआओं के बारे में जानेंगे।
(5)- विजयनगर के यादव राजा-
इतिहास के पन्नों में जिस तरह से देवगिरी के यादव राजाओं का वर्णन मिलता है उसी तरह से विजयनगर के यादव राजाओं का भी वर्णन मिलता है। जिसे इतिहास में संगम वंश या संगम काल के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि विजयनगर साम्राज्य (संगम वंश) की स्थापना 1336 में हरिहर और बुक्का ने की थी, जो भावना संगम के पुत्र थे, इसलिए इसे संगम वंश कहा गया। विजयनगर साम्राज्य का इतिहास यादव संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भों के अनुसार, इसके संस्थापक और सबसे महान शासक स्वयं को यादव कुल का मानते थे। शिलालेखों और साहित्यिक साक्ष्यों जैसे- कृष्णदेव राय की (अमुक्तमाल्यदा) के अनुसार- ये शासक खुद को यादव कुरुबा (अहीर) समुदाय से जुड़ा बताते थे। कुछ इतिहासकार इन्हें मूल रूप से कर्नाटक का कुरुबा (अहीर जाती) के यादव मानते हैं। ये लोग उस समय अपने नाम के आगे राय और यादव टाईटिल लगाते थे, जो आज भी भारत के अनेकों प्रान्तों में अहीर जाती के लोग राव और यादव टाईटिल लगाते हैं। विजयनगर के प्रमुख यादव राजाओं का वर्णन निम्नलिखित हैं-
(A) हरिहर एवं बुक्का
हरिहर प्रथम-
हरिहर प्रथम ने ही होयसल 1336 ई.में होयसल राज्य को जीतकर संगम साम्राज्य की नींव रखी और हम्पी को अपनी शक्ति का केंद्र बनाया। इन्होंने 1377–1404 ई. में 'महाराजाधिराज' की उपाधि धारण की और साम्राज्य का विस्तार गोवा से बेलगाम तक किया।
बुक्का प्रथम-
बुक्का प्रथम हरिहर प्रथम के सगे भाई थे। दोनों भाइयों की युगल जोड़ी ने मदुरै सल्तनत का अन्त किया और दक्षिण भारत में हिंदू धर्म का संरक्षण किया। चूँकि दोनों भाई कोई भी कार्य एक साथ मिलकर करते थे इसलिए इतिहास में इन दोनों का नाम एक दूसरे के साथ ही लिया जाता है। बुक्का अपने साम्राज्य का खूब विस्तार किया और 'वेद मार्ग प्रतिस्थापक' की उपाधि धारण की।
हरिहर द्वितीय-
संगम वंश के प्रसिद्ध शासक बुक्का प्रथम के पुत्र हरिहर द्वितीय थे। इनकी माता का नाम गौराम्बिका था। 1377 ईस्वी में अपने पिता बुक्का प्रथम की मृत्यु के बाद वे सिंहासन पर बैठे। इनका शासन काल 1377–1404 ई. तक रहा। हरिहर द्वितीय पहले ऐसे विजयनगर के शासक थे जिन्होंने 'महाराजाधिराज' और 'राजपरमेश्वर' जैसी भव्य उपाधियाँ धारण की थीं।
देवराय प्रथम-
विजयनगर साम्राज्य के देवराय प्रथम संगम वंश के सम्राट हरिहर द्वितीय के पुत्र थे। 1404 ईस्वी में हरिहर द्वितीय की मृत्यु के बाद उनके पुत्रों के बीच सत्ता के लिए संघर्ष हुआ, जिसमें अंततोगत्वा देवराय प्रथम विजयी हुए। इनके शासन काल में शासनकाल में प्रसिद्ध इतालवी यात्री निकोलो कोंटी विजयनगर आया था। देवराय प्रथम ने तुंगभद्रा नदी पर विशाल बांध बनवाया। इन्हें 'इम्मादि देवराय' और 'गजबेटकर' (हाथियों का शिकार करने वाला) भी कहा जाता था।
देवराय द्वितीय-
देव राय द्वितीय संगम वंश के सबसे महान शासक थे और संगम वंश के सबसे शक्तिशाली राजा थे। इन्होंने अपनी सेना का विस्तार किया तथा सेना को अत्याधुनिक बनाया और विदेशी व्यापार को खूब बढ़ावा दिया। देवराय द्वितीय के सेनापति लक्कन दंडेश ने 15वीं शताब्दी में विरुपाक्ष मन्दिर का निर्माण कराया जो हम्पी का सबसे पवित्र और प्राचीन मन्दिर है, जो भगवान शिव को समर्पित है। इसका 50 मीटर ऊँचा गोपुरम (प्रवेश द्वार) इसकी भव्यता का प्रतीक है। बाद में कृष्णदेवराय ने 1510 ई. को मन्दिर में केंद्रीय स्तम्भों वाला हॉल और पूर्वी गोपुरम (गेटवे) का निर्माण करवाया था। देवराय द्वितीय के समय 1443 में अब्दुल रज्जाक ईरानी यात्री आया था। जिसने विजय नगर के बारे में कहा कि-"दुनिया में विजयनगर जैसी सुन्दर जगह न तो आँखों द्वारा देखी गई और न ही कानों द्वारा सुनी गई।"
मल्लिकार्जुन राय
मल्लिकार्जुन राय सम्राट देवराय द्वितीय के पुत्र थे। इनको 'प्रौढ़ देवराय' के नाम से भी जाना जाता है। ये अपने पिता देवराय द्वितीय की मृत्यु के बाद सिंहासन संभाला, जिनका शासनकाल को विजयनगर का स्वर्ण युग माना जाता है। इनका शासन काल 1446–1465 ईस्वी तक रहा। इनके शासनकाल में बहमनी सुल्तानों और ओडिशा के गजपति शासकों के आक्रमणों का सामना करना पड़ा, जिससे विजयनगर की शक्ति धीरे-धीरे कम होने लगी। मल्लिकार्जुन के बाद उनके भतीजे (या भाई) विरुपाक्ष राय द्वितीय शासक बने। विरूपाक्ष राय द्वितीय संगम वंश के अंतिम शासक थे, जिनकी हत्या के बाद सालुव वंश की स्थापना हुई।
हम्पी और तिरुपति के शिलालेखों में प्रसिद्ध राजा कृष्णदेवराय को तुलुव वंशीय यादव रत्न के रूप में वर्णन किया गया है।
कृष्णदेव राय
कृष्णदेवराय विजयनगर के सबसे प्रतापी राजा थे। हम्पी और तिरुपति के शिलालेखों में तुलुव वंशीय कृष्णदेवराय को यादव रत्न के रूप में वर्णन किया गया है। कई ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विवरणों में उन्हें यदुवंश का गौरव बताया गया है। सम्राट कृष्णदेव राय ने ओडिशा के गजपति शासक प्रतापरुद्र देव को हराकर उदयगिरि और कोंडाविदु के किलों पर अधिकार किया तथा बीजापुर के सुल्तान इस्माइल आदिल शाह को निर्णायक रूप से हराकर रायचूर दोआब पर कब्जा किया। उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारियों के अनुसार, उनकी वंशावली भी यादव परम्पराओं से जुड़ी मानी जाती है। उनके शासनकाल को दक्षिण भारत का 'स्वर्ण युग' कहा जाता है। कृष्णदेव राय कला, साहित्य और वास्तुकला के महान संरक्षक थे। इन्होंने ही प्रसिद्ध विट्ठल मन्दिर का निर्माण कराया जो 56 संगीतमय स्तम्भों' और प्रसिद्ध शिला-रथ के लिए जाना जाता है। इसके स्तम्भों को थपथपाने पर विभिन्न वाद्ययन्त्रों की ध्वनियाँ निकलती हैं। इसके अलावा कृष्ण देव ने हजारा राम मन्दिर का निर्माण कराया था जो राजा का निजी मन्दिर था, जिसकी दीवारों पर रामायण के प्रसंगों को पत्थर पर उकेरा गया है। कृष्णदेव राय ने स्वयं 'अमुक्तमाल्यद' नामक महान ग्रन्थ की रचना की थी। इनके दरबार में 'अष्टदिग्गज' (आठ महान कवि) रहते थे, जिनमें तेनालीराम सबसे प्रसिद्ध थे।इनका शासन काल 1509–1529 ई० तक रहा।
विजय नगर साम्राज्य का अन्त
विजय नगर साम्राज्य के पतन का कारण तालीकोटा युद्ध को माना जाता है। जो 23 जनवरी 1565 ई० को हुआ था। यह युद्ध विजयनगर साम्राज्य के लिए निर्णायक और विनाशकारी साबित हुआ।
तालीकोटा युद्ध होने का कारण-
तालीकोटा युद्ध होने का मुख्य कारण बताया जाता है कि - राम राय सल्तनतों को आपस में लड़ाने की हमेशा कूटनीतिक चालें चलते थे। जिसका परिणाम यह हुआ कि एक दिन उनकी ही चाल उन्हीं पर भारी पड़ी। जिसका परिणाम यह हुआ कि चारों सल्तनतें विजयनगर के खिलाफ एकजुट होकर ताकोटा युद्ध किया। इसे राक्षसी-तांगड़ी या बनीहट्टी का युद्ध भी कहा जाता है। जिसमें विजयनगर की तरफ से आलिया राम राय (यादव) नेतृत्व कर रहे थे और दूसरी तरफ दक्कन की चार सल्तनत- बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुंडा और बीदर का संयुक्त गठबन्धन था।
युद्ध परिणाम-
युद्ध के दौरान विजयनगर की सेना के दो मुस्लिम कमाण्डरों गिलानी बन्धु ने अन्तिम समय में पाला बदल लिया और राम राय के साथ विश्वासघात किया। राम राय पकड़े गए और उनकी हत्या कर दी गई। अन्ततोगत्वा युद्ध का परिणाम यह हुआ कि विजयनगर की राजधानी हम्पी को छह महीनों तक बेरहमी से लूटा गया और और उसे नष्ट कर दिया गया। इसके साथ ही दक्षिण भारत में हिन्दू राजनीतिक प्रभुत्व का पतन शुरू हो गया। विजयनगर साम्राज्य का अवशेष अरविडु वंश के तहत पेनुकोंडा से कुछ समय तक चलता रहा किन्तु वह पहले जैसा शक्तिशाली कभी नहीं हो सका।
विजयनगर का पतन भारतीय इतिहास की एक दुखद घटना मानी जाती है जिसमें यादवों की उन्नत सभ्यता और उच्च कोटि का संस्कृतिक केंद्र सदा सदा के लिए खण्डहरों में बदल गया।
(6)- दक्कन के अहीर राजा-
पुराणों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, दक्कन साम्राज्य में लगभग 10 अहीर राजाओं ने शासन किया। जिसमें मुख्य रूप पर से ईश्वरसेन अहीर थे।
राजा ईश्वरसेन अहीर
दक्कन साम्राज्य के राजा ईश्वरसेन, आभीर शिवदत्त के पुत्र थे। उन्होंने तीसरी शताब्दी (लगभग 248-249 AD) में दक्कन में एक स्वतन्त्र आभीर साम्राज्य की नींव रखी। जिनको 'राजन' और 'महाक्षत्रप' जैसी प्रतिष्ठित उपाधियां को धारण किया। राजा ईश्वरसेन ने अपने राज्याभिषेक की स्मृति में एक नए संवत की शुरुआत की, जिसे बाद में 'कलचुरी-चेदी संवत' के नाम से जाना गया। जिसे चेदि संवत या हैहय संवत भी कहा जाता है प्राचीन भारत की एक महत्वपूर्ण काल-गणना पद्धति है। जर्मन विद्वान एफ. कीलहॉर्न के अनुसार, यह संभवतः सितंबर 248 ईस्वी के आश्विन महीने से शुरू हुआ था। शुरुआत में इसे "आभीर संवत" कहा जाता था, लेकिन बाद में कलचुरी शासकों द्वारा व्यापक रूप से उपयोग किए जाने के कारण इसका नाम कलचुरी संवत पड़ा। इस संवत का उपयोग 5वीं शताब्दी से लेकर 13वीं शताब्दी ईस्वी तक के शिलालेखों और ताम्रपत्रों में मिलता है। इसे त्रैकूटक, कलचुरी और गुर्जर-प्रतिहार जैसे राजवंशों ने अपने अभिलेखों में अपनाया था।
साम्राज्य का विस्तार-
दक्कन के अहीर राजाओं ने सातवाहनों के पतन के बाद पश्चिमी भारत के एक बड़े भूभाग पर शासन किया। उनके साम्राज्य में आधुनिक महाराष्ट्र, कोंकण, गुजरात (सौराष्ट्र), खानदेश और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्से शामिल थे। ऐतिहासिक शिलालेखों के अनुसारन नासिक और उसके आसपास का क्षेत्र उनके शासन का मुख्य केंद्र था। राजा ईश्वरसेन के शिलालेखों से पता चलता है कि वे उदार शासक थे। उन्होंने बौद्ध भिक्षुओं के इलाज के लिए औषधियों हेतु व्यापारिक श्रेणियों में धन निवेश किया था।
दक्कन के अहीर राजाओं का असीरगढ़ का किला प्रसिद्ध है। जिसका निर्माण राजा आशा अहीर द्वारा करवाया गया था, जो इसी परंपरा के एक शक्तिशाली शासक माने जाते हैं।राजा आशा अहीर असीरगढ़ के शासक थे जिनका इतिहास मध्यकालीन भारत से जुड़ा है। दक्कन के अहीर राजा स्वयं को पौराणिक यदुवंशी क्षत्रिय और भगवान कृष्ण के वंशज मानते थे।
मन्दिरों का निर्माण
कलचुरी शासक मुख्यतः शैव धर्म (भगवान शिव के उपासक) के अनुयायी थे, इसलिए उनके द्वारा निर्मित अधिकांश मन्दिर शिव को समर्पित हैं
चौसठ योगिनी मन्दिर- यह भेड़ाघाट जबलपुर का मन्दिर है, इसका निर्माण 10वीं-11वीं शताब्दी में राजा युवराज देव ने करवाया था। यह एक गोलाकार मन्दिर है जिसमें योगिनियों की सुन्दर मूर्तियाँ हैं।
अमरकंटक मन्दिर समूह- ये सभी मन्दिर नर्मदा नदी के उद्गम स्थल पर स्थित कलचुरी स्थापत्य के बेहतरीन उदाहरण हैं, जिन्हें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित किया गया है।
महामाया मन्दिर- यह मन्दिर रतनपुर में स्थित है जिसक निर्माण राजा रत्नदेव प्रथम ने कराया। यह मन्दिर छत्तीसगढ़ के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है।
विष्णु वराह मन्दिर- इस मन्दिर का निर्माण राजा लक्ष्मणराज द्वितीय के मंत्री सोमेश्वर ने कराया था। इस मन्दिर में विष्णु के वराह अवतार को दर्शाया गया है।
(7)- वाडियार के यादव राजा-
वाडियार के यादव राजवंश की उत्पत्ति-
राजा वाडियार प्रथम (1578-1617) ने ही इस वंश को एक स्वतन्त्र और शक्तिशाली पहचान दिलाई थी। उन्होंने ही मैसूर की राजधानी को श्रीरंगपट्टनम स्थानांतरित किया और विजयनगर के पतन के बाद अपनी सम्प्रभुता घोषित की।
कुछ लोगों का मानना है वाडियार के यादव राजवंश की उत्पत्ति- 1399 ईस्वी में उस समय हुई जब द्वारका (गुजरात) के दो यादव राजकुमार, यदुराय और कृष्णराय, दक्षिण भारत की तीर्थयात्रा पर निकले थे। जब वे मैसूर पहुंचे, तो उन्होंने पाया कि वहाँ की रानी मुसीबत में है। यदुराय ने शत्रुओं को पराजित कर राज्य की रक्षा की और यहीं से वाडियार के यादव राजवंश की नींव पड़ी। वाडियार राजवंश अपनी वंशावली को भगवान श्रीकृष्ण से जोड़ते हैं जो मूलतः द्वारका के निवासी हैं।
वाडियार राजवंश के साथ एक रहस्यमयी शाप की कहानी भी जुड़ी है। कहा जाता है कि राजा वाडियार प्रथम के समय, अलमेलम्मा नाम की एक महिला ने शाप दिया था कि इस वंश के राजाओं को प्राकृतिक उत्तराधिकारी (सन्तान) नहीं मिलेगी। आश्चर्य की बात है कि लगभग 400 वर्षों तक वाडियार राजाओं को अक्सर गोद लिए हुए पुत्रों को ही उत्तराधिकारी बनाना पड़ा।
वाडियार राजवंश आभीर जाति के शासकों द्वारा शासित एक भारतीय हिन्दू राजवंश था जिसने 1399 से 1947 तक मैसूर राज्य पर शासन किया। ब्रिटिश शासन से स्वतन्त्रता के बाद इस राज्य को भारत के डोमिनियन में शामिल कर लिया गया। कन्नड़ में, "वडियार" शब्द का अर्थ "स्वामी" होता है। मैसूर के वाडियार यादव राजवंश के प्रसिद्ध शासकों में चिक्का देवराज वाडियार का नाम सबसे प्रमुखता से लिया जाता है, जिन्हें अक्सर "राजा देवराज" के रूप में याद किया जाता है। वे मैसूर के 14वें महाराजा थे। उनके शासनकाल की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं-
(क) प्रशासनिक क्षेत्र में चिक्का देवराज वाडियार ने पहली बार एक व्यवस्थित नौकरशाही की नींव रखी जिसमें प्रशासन को 18 विभागों में विभाजित किया, जिन्हें 'चावड़ी' या 'अठारह कचहरी' कहा जाता था। इससे शासन व्यवस्था में पारदर्शिता और दक्षता आई।
(ख)- आर्थिक क्षेत्र के विद्वान नवककोटि नारायण देवराज वाडियार एक कुशल वित्त प्रबन्धक थे। उन्होंने राज्य के खजाने को इतना समृद्ध किया कि लोग उन्हें सम्मान से 'नवककोटि नारायण' (नौ करोड़ की संपत्ति का स्वामी) कहने लगे थे। ये अपनी कूटनीतिक चाल से बेंगलुरु को लगभग 330 साल पहले मुगलों (मराठों से जीतकर मुगलों के पास आए हिस्से) से बेंगलुरु को 3 लाख रुपये में खरीदा था।
(ग)- चिक्का देवराज वाडियार
राजा वाडियार प्रथम (1578-1617) ने ही इस वंश को एक स्वतन्त्र और शक्तिशाली पहचान दिलाई थी। उन्होंने ही मैसूर की राजधानी को श्रीरंगपट्टनम स्थानान्तरित किया और विजयनगर के पतन के बाद अपनी सम्प्रभुता घोषित की।
ने जनकल्याण और कृषि को बढ़ावा देने के लिए श्रीरंगपट्टनम के पास कावेरी नदी पर बांध बनवाया और नहरें निकलवाईं तथा धार्मिक क्षेत्र में चामुण्डी पहाड़ियों पर स्थित नन्दी की विशाल अखण्ड मूर्ति का निर्माण डोड्डा देवराज वाडियार ने शुरू किया था, उसे नारायण देवराज वाडियार ने पूरा किया।
विश्वविख्यात दशहरा की शुरुआत
मैसूर के यादव राजवंश के राजाओं ने परम्परागत दशहरा की शुरुआत किया जो विश्वविख्यात है। इस दशहरे की औपचारिक शुरुआत राजा वाडियार प्रथम ने 1610 ईस्वी में श्रीरंगपट्टनम में की थी जो विजयनगर साम्राज्य की परम्पराओं से प्रेरित था। राजा ने आदेश दिया कि दशहरे के मौके पर देवी चामुंडेश्वरी (महिषासुरमर्दिनी) की विशेष पूजा की जाए क्योंकि ये हमारे राजवंश की कुलदेवी हैं। इस मौके पर हाथियों का जुलूस निकलता है जिसे 'जम्बू सवारी' कहते हैं। इसमें 750 किलो सोने के हौदे में देवी चामुंडेश्वरी की मूर्ति को रखा जाता है।
विशेष निष्कर्ष- विजयनगर, देवगिरी और वाडियार के यादवों का इतिहास उन धुर्त और अज्ञानी लोगों के दोनों गालों पर जोरदार तमाचा है जो अक्सर चट्टी-चौराहे पर मुंह उठाकर बोला करते हैं कि- अहीर लोग- यादव महासभा के प्रथम अधिवेशन (सन् 1924) के बाद से यादव टाईटिल लगाना प्रारम्भ किया। उसके पहले अहीर जाती के लोग यादव टाईटिल नहीं लगाते थे। उन बेवकूफों को इतना ज्ञान नहीं कि- अहीर पूर्व काल से ही यादव सरनेम से जाने जाते थे और आज भी जानें जाते हैं।
🫵
अध्याय (8)-
प्रमुख क्रान्तिकारी यादव
इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य भारत के प्रमुख क्रान्तिकारी यादव स्वतन्त्रता सेनानियों के बारे में जानकारी देना है जो निम्नलिखित हैं -
1- राव तुला राम 2- राव गोपाल देव 3-प्राण सुख यादव
4- वीरन अलगु मुत्थु कोने 5- रघुवर प्रसाद यादव
6- ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव
1- राव तुला राम
राव तुला राम प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के एक महान नायक और हरियाणा के रेवाड़ी के राजा थे। वे यदुवंशी अहीर राजवंश से सम्बन्ध रखते थे और उन्हें हरियाणा का "राज्य नायक" के रूप में आज भी जाना जाता है।
स्वतंत्रता आंदोलन और योगदान
राव तुला राम 1857 की क्रान्ति में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और दक्षिण-पश्चिम हरियाणा में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका और 17 मई 1857 को रेवाड़ी पर कब्जा कर अपनी स्थानीय सरकार स्थापित की। उनके इस युद्ध अभियान में नसीबपुर (नारनौल) का युद्ध सबसे महत्वपूर्ण है। यह युद्ध 1857 की क्रांति के सबसे भीषण और निर्णायक युद्धों में से एक था। राव तुला राम ने इसमें एक चतुर रणनीतिकार की भूमिका निभाते हुए रामपुर किले में पारम्परिक कारीगरों की मदद से अपनी बंदूकें और गोला-बारूद बनाने का कारखाना स्थापित किया ताकि हमारे सैनिक युद्ध संसाधनों से आत्मनिर्भर हो जायं। उनकी इस रणनीति से सेना युद्ध के शुरुआती चरण में ब्रिटिश सेना को भारी नुकसान हुआ। उन्होंने ब्रिटिश कमाण्डर कर्नल जॉन ग्रांट गेरार्ड और कैप्टन वालेस को मार गिराया, जिससे दुश्मन सेना में हड़कम्प मच गया। किन्तु दुर्भाग्य रहा कि पटियाला, जींद और नाभा जैसी रियासतों ने अंग्रेजों से मिल गये। इन रियासतों की अतिरिक्त मदद मिलने से ब्रिटिश सेना का पलड़ा भारी हो गया परिणामस्वरूप सफलता नहीं मिली।
फिर भी वे हार नहीं माने और अंग्रेजों के खिलाफ मदद माँगने के लिए ईरान, अफगानिस्तान और रूस के शासकों से मिलने निकल पड़े। वे मुंबई से समुद्री रास्ते से बुखारा पहुँचे और वहाँ से रूसी साम्राज्य के अधिकारियों से सम्पर्क साधा। उन्होंने रूसी जार अलेक्जेंडर द्वितीय को भारत की स्थिति पर एक विस्तृत पत्र लिखा, जो आज भी रूस के सेंट पीटर्सबर्ग संग्रहालय में सुरक्षित है। इस कार्य के लिए रूस उन्हें "भारत का पहला राजदूत" माना।
इसके बाद उन्होंने ईरान के शाह और अफगानिस्तान के अमीर दोस्त मोहम्मद खान से भी मुलाकात की। अफगानिस्तान के शासक ने अंग्रेजों के खिलाफ सहयोग का आश्वासन दिया और भारतीय विद्रोही सैनिकों को काबुल में इकट्ठा करना शुरू कर दिया था। दुर्भाग्यवश जब वे एक बड़ी सेना तैयार करने के करीब थे, तभी 23 सितंबर 1863 को काबुल में संक्रमण (पेचिश/डिसेंट्री) के कारण उनका देहान्त हो गया।
उनकी याद और सम्मान में हर साल 23 सितंबर को हरियाणा में 'शहीदी दिवस' मनाया जाता है। भारत सरकार ने 2001 में उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया था। इसके साथ ही दिल्ली में उनके नाम पर एक प्रसिद्ध सड़क 'राव तुला राम मार्ग' और एक कॉलेज स्थित है।
राव तुलाराम की वंशावली-
राव तुलाराम की वंशावली का प्रारम्भ राजस्थान के तिजारा से शुरू होता है। उनके पूर्वज महाराजा राव चारो सिंह थे और अफरिया गोत्र के इन यदुवंशियों का मूल स्थान मथुरा माना जाता है। राव हरपाल सिंह ने तिजारा से आकर रेवाड़ी में अपनी जागीर स्थापित की तथा
राव तुला राम का जन्म 9 दिसंबर 1825 को रेवाड़ी के राजा राव पूर्ण सिंह और रानी ज्ञान कौर के घर हुआ था। राव गोपाल देव: राव तुला राम के चचेरे भाई और उनके सेनापति थे, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में उनका कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया था।
राव तुला राम के निधन के बाद भी उनका परिवार भारतीय राजनीति और समाज सेवा में सक्रिय रहा:
पुत्र (राव युधिष्ठिर सिंह): उनके पुत्र राव युधिष्ठिर सिंह को 1877 में अंग्रेजों ने 'अहीरवाल' का प्रमुख स्वीकार किया था। उन्होंने रेवाड़ी में विश्व की पहली आधुनिक गौशाला का निर्माण करवाया था।
राव तुला राम के वंशज राव वीरेंद्र सिंह हरियाणा के दूसरे मुख्यमन्त्री बने थे तथा राव तुला राम के प्रपौत्र राव इंद्रजीत सिंह आज रेवाड़ी के यादव वंश परम्परा को आगे बढ़ाते हुए वर्तमान में भारत सरकार में सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मन्त्रालय में राज्य मन्त्री (स्वतन्त्र प्रभार) हैं। उनकी बेटी राव आरती सिंह एक प्रसिद्ध निशानेबाज हैं।
2- राव गोपाल देव-
राव गोपाल देव का जन्म 1829 में रेवाड़ी में हुआ था। वह राव नाथूराम के पुत्र और प्रसिद्ध अहीर शासक राव शाहबाज सिंह के वंशज थे। 1855 में पिता की मृत्यु के बाद उन्हें रेवाड़ी की जागीर विरासत में मिली।
राव गोपाल देव 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम के नायक थे। उन्होंने अपने चचेरे भाई राव तुला राम के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व किया था। इन्होंने 17 मई 1857 को राव तुला राम के साथ मिलकर रेवाड़ी पर कब्जा कर लिया और स्थानीय तहसीलदार को पद से हटा दिया और लगभग 5000 सैनिकों की फौज तैयार की और हथियारों व गोला-बारूद के लिए अपनी कार्यशाला (वर्कशॉप) स्थापित की।
राव गोपाल देव रेवाड़ी रियासत की सशस्त्र सेनाओं के कमांडर-इन-चीफ थे। उन्होंने नारनौल के पास नसीबपुर के ऐतिहासिक युद्ध में ब्रिटिश सेना का डटकर मुकाबला किया। यह युद्ध हरियाणा में 1857 की क्रांति की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक माना जाता है।
इसी युद्ध के बाद 1859 में अंग्रेजों ने उनकी जागीर और सम्पत्तियाँ जब्त कर लीं। विद्रोह के दौरान संघर्ष करते हुए 1862 में उनका निधन हो गया।
3- प्राण सुख यादव-
क्रान्तिकारी प्राण सुख यादव का सम्बन्ध राजस्थान के अलवर जिले से था। उन्होंने महाराजा रणजीत सिंह की सिख खालसा सेना को प्रशिक्षित किया और वे प्रसिद्ध सिख कमांडर हरी सिंह नलवा के करीबी मित्र थे। उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध प्रथम और द्वितीय आंग्ल-सिख युद्धों में भी भाग लिया था। इसके बाद 1857 की क्रान्ति के दौरान प्राण सुख यादव राव तुला राम के साथ मिलकर नारनौल के समीप नसीबपुर की लड़ाई में ब्रिटिश सेना का डटकर मुकाबला किया। इस युद्ध प्राण सुख यादव ने ही अपनी पसंदीदा राइफल से ब्रिटिश कर्नल गेरार्ड को मार गिराया था। इस युद्ध के बाद वे कुछ समय तक गुप्त रहे और अन्ततः अपने पैतृक गाँव निहालपुर वापस आ गए। जीवन के अन्तिम वर्षों में वे स्वामी दयानन्द सरस्वती के सम्पर्क में आए और आर्य समाज के अनुयायी बनकर समाज सुधार के कार्यों में लग गए।
4- वीरन अलगु मुत्थु कोने
वीरन अलगु मुत्थु का जन्म 11 जुलाई 1710 को थूथुकुडी जिले के कट्टलंकुलम में हुआ था। वे यादव (कोनार) समुदाय से थे और एट्टयपुरम के सैन्य नेता व कट्टलंकुलम के शासक थे। ये भारत के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी माने जाते हैं। उन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लगभग 100 वर्ष पहले ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूँका था तथा अंग्रेजों द्वारा लगाए गए कर (टैक्स) का विरोध किया और 1750-1759 के दौरान प्रेसीडेंसी सेनाओं के खिलाफ युद्ध छेड़ा।
1759 में उन्हें अंग्रेजों ने छल से बन्दी बना लिया था। जब उन्होंने आत्मसमर्पण करने और माफ़ी माँगने से इनकार कर दिया, तो उन्हें तोप के मुंह पर बाँधकर उड़ा दिया गया।
इनके सम्मान में भारत सरकार ने 2015 में डाक टिकट जारी किया था। तमिलनाडु सरकार हर साल 11 जुलाई को उनकी जयन्ती मनाती है।
5- रघुवर प्रसाद यादव-
उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के रघुवर प्रसाद यादव एक स्वतन्त्रता सेनानी थे, जिन्होंने 1941-42 के भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। उन्होंने महात्मा गाँधी द्वारा शुरू किए गए भारत छोड़ो आन्दोलन (1942) के दौरान ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष किया। हाल के वर्षों में स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासन द्वारा उनकी स्मृति में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं, जिसमें उन्हें एक सच्चे राष्ट्रभक्त के रूप में याद किया जाता है।
6- ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव
योगेंद्र सिंह यादव का जन्म 10 मई 1980 में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के औरंगाबाद अहीर गाँव में हुआ था। वे 16 साल और 5 महीने की उम्र में सेना में भर्ती हो गए। परमवीर चक्र विजेता योगेंद्र सिंह यादव अभी जीवित हैं।
सूबेदार मेजर और मानद कैप्टन योगेंद्र सिंह यादव भारतीय सेना के 18 ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट के एक असाधारण वीर योद्धा हैं। इनकी ख्याति 1999 में तब हुई जब वे टाइगर हिल के के कारगिल विजय के लिए उन्हें 'घातक' प्लाटून का हिस्सा बनाकर टाइगर हिल पर स्थित तीन रणनीतिक बंकरों पर कब्जा करने का कार्य सौंपा गया था। तब उन्होंने बर्फ से ढकी पहाड़ी पर रस्सी के सहारे चढ़ाई कर ही रहे थे कि आधे रास्ते में दुश्मन की गोलीबारी में उनके प्लाटून कमाण्डर और साथी शहीद हो गए और योगेंद्र सिंह यादव को उसी समय दुश्मनों की ताबड़तोड़ 17 गोलियाँ लगी। फिर भी घायल अवस्था में रेंगते हुए दुश्मन के बंकर पर ग्रेनेड फेंका और चार पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया, जिससे बाकी प्लाटून के लिए रास्ता साफ हो गया।
उनकी इस वीरता और अदम्य साहस के लिए भारत सरकार ने अबतक के सबसे कम उम्र (19 साल) में उन्हें भारत का सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से नवाजा।
🫵
अध्याय(9)
प्रान्तिय या स्थानीय स्तर पर यादवों के प्रमुख सरनेम।
इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य यादवों के सरनेम को बताना है कि अलग-अलग प्रान्तों में यादवों के सरनेम क्या हैं। किन्तु ये सब जानने से पहले यह जान लेना अति आवश्यक है कि आजकल बिना अहीर और गोप बने ही एका एक (Direct)) यादव बनने की होड़ मची हुई है। ऐसे में यादव समाज को बहुत ही सावधान और सतर्क रहने की जरूरत है। क्योंकि आजकल ऐसे लोग यादव बनने का भरसक प्रयास कर रहे हैं जिनको अपनी मूल जाती और अपनी मूल उत्पत्ति के बारे में कुछ अता पता नहीं है।
आजकल ऐसे ही लोग यादवों की मूल जाती अहीर को दरकिनार करके अकेले ही यादव बनने की कोशिश कर रहें हैं। जबकि उन्हें पता होना चाहिए कि "यादव बनने से पहले अहीर होना अनिवार्य होता है। क्योंकि अहीर जाती में बहुत समयं बाद यादव वंश की उत्पत्ति हुई है। इसलिए बिना अहीर हुए कोई भी यादव नहीं हो सकता। इस बात को हम पहले ही अध्याय(1) के भाग (क/2)- में बता चुका हूँ।
फिर भी यहाँ पर कुछ बताना चाहूँगा कि- भगवान श्रीकृष्ण भी पहले गोप यानी अहीर ही हैं उसके बाद यादव हैं, और जब भी वे गोलोक से भू-लोक पर आते हैं तो वे अपनी ही जाती के अहीर (गोपों) में ही आते हैं अन्य किसी दूसरी जाती में नहीं। इस बात की पुष्टि- ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय (दो) के श्लोक २१ से होती है जिसमें बताया गया है कि -
स्वेच्छामयं सर्वबीजं सर्वाधारं परात्परम्।
किशोरवयसं शश्वद्गोपवेषविधायकम् ।२१।
अनुवाद - वे ही प्रभु (श्रीकृष्ण) स्वेच्छामयी सभी के मूल- (आदि-कारण) सर्वाधार तथा परात्पर- परमात्मा हैं। उनकी नित्य किशोरावस्था रहती है और वे प्रभु गायों के उस लोक (गोलोक) में सदा गोप (अहीर)- वेष में रहते हैं।२१।
कुछ इसी तरह की बात ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय- (२८) के श्लोक- ६५ में लिखी गई है कि -
गोपवेषश्च गोपालैः पार्षदैः परिवेष्टितः।।
परिपूर्णतमः श्रीमान् श्रीकृष्णो राधिकेश्वरः।६५।
अनुवाद - उनकी (श्रीकृष्ण) वेशभूषा भी ग्वालों (अहीरों) के समान होती है और वे अपने पार्षद गोपालों (गोपों) से घिरे रहते हैं। उन परिपूर्णतम भगवान को श्रीकृष्ण कहते हैं। वे सदा श्रीजी (श्रीराधा) के साथ रहने वाले और श्रीराधिका के प्राणेश्वर हैं।६५।
और इस सम्बन्ध सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गोपेश्वर श्रीकृष्ण जब भी भू-तल पर अवतरित होते हैं तो वे गोपजाति में ही अवतरित होते हैं। इस बात की पुष्टि-हरिवंश पुराण के विष्णु पर्व के ग्यारहवें अध्याय के श्लोक संख्या -५८ से होती है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहे हैं कि-
एतदर्थं च वासोऽयंव्रजेऽस्मिन् गोपजन्म च।
अमीषामुत्पथस्थानां निग्रहार्थं दुरात्मनाम्।।५८।
अनुवाद - इसीलिए ब्रज में मेरा यह निवास हुआ है ; और इसीलिए मैंने गोपों में अवतार ग्रहण किया है।
ज्ञात हो की भगवान श्रीकृष्ण के बारे में जिस तरह से बताया गया है कि वे अहीर जाती में अवतरित होते हैं उसी तरह से उनके बारे में यह भी बताया गया है कि भगवान श्रीकृष्ण अहीर जाती के यादव वंश में ही अवतरित होते हैं। इस बात की पुष्टि- श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कन्ध के अध्याय -४ के श्लोक संख्या- २२ से होती है जिसमें लिखा गया है कि-
भूमेर्भरावतरणाय यदुष्वजन्मा जातः करिष्यति सुरैरपि दुष्कराणि।
वादैर्विमोहयति यज्ञकृतोऽतदर्हान् शूद्रान कलौ क्षितिभुजो न्यहनिष्यदन्ते।।२२।
अनुवाद - अजन्मा होने पर भी पृथ्वी का भार उतारने के लिए वे ही भगवान यदुवंश में जन्म लेंगे और ऐसे-ऐसे कर्म करेंगे, जिन्हें बड़े-बड़े देवता भी नहीं कर सकते।
अतः उपर्युक्त सभी सन्दर्भों से सिद्ध होता है कि जिस तरह से भगवान श्रीकृष्ण सबसे पहले अहीर (गोप) हैं उसके बाद यादव हैं। उसी तरह से आज भी समस्त यादव सबसे पहले अहीर हैं उसके बाद यादव हैं। अतः यह ध्रुव सत्य है कि बिना अहीर हुए कोई यादव नहीं हो सकता।
अब हमलोग जानेंगे कि भारत के अलग-अलग प्रान्तों में यादवों के सरनेम क्या हैं। किन्तु इस बात का ध्यान रहे कि मेरे द्वारा दी गई जानकारी अभी सम्पूर्ण नहीं है क्योंकि अहीर जाती एक विशाल समुद्र के समान है। उस समुद्र में से कुछ ही जानकारी दे पाया हूँ। अभी बहुत से यादवों के उपनामों को खोजने का सतत प्रयास जारी हैं। फिर भी अबतक जो मेरे संज्ञान में है उसका वर्णन निम्नलिखित है-
1- उत्तर प्रदेश-
उत्तर प्रदेश के यादवों को प्रमुख रूप से- यादव, अहीर, राय, चौधरी, गोप, ग्वाला, महतो, मण्डल, ढढोर, डाबल, नाहर, घोषी, कमरिया, इत्यादि उपनामों से जाना जाता है।
2- बिहार-
बिहार के यादवों को प्रमुख रूप से- यादव, अहीर, राय, रंजन, चौधरी, गोप, ग्वाला, महतो, मण्डल, कृष्णौत, मझरौट, ठाकुर, गोल्ला, लक्ष्मी नारायण इत्यादि उपनामों से जाना जाता है।
2- हरियाणा
हरियाणा क्षेत्र के यादवों को प्रमुख रूप से- राव, राय, कृष्णौत, मझरौट, यादव, अहीर, अहीरवाल। इत्यादि नामों से जाना जाता है।
3- पंजाब और दिल्ली
पंजाब और दिल्ली के यादवों को प्रमुख रूप से- राव, राय साहब अहीर, और यादव इत्यादि नामों से जाना जाता है।
4- राजस्थान-
राजस्थान के यादवों को प्रमुख रूप से- ढढोर, अहीर, यादव, राव, चौधरी इत्यादि नामों से जाना जाता है।
5- मध्यप्रदेश
मध्यप्रदेश के यादवों को प्रमुख रूप से- यादव, अहीर, ग्वाला, राव, राय, चौधरी, ढढोर इत्यादि नामों से जाना जाता है।
6- बुन्देलखण्ड
बुन्देलखण्ड के यादवों को प्रमुख रूप से- कमरिया, बनाफर अहीर, नागिल, पवार, भट्टी, जाटव, तोमर, ढढोर इत्यादि नामों से जाना जाता है।
7- गुजरात-
गुजरात के यादवों को प्रमुख रूप से-अहीर और यादव नाम से जाना जाता है।
8- महाराष्ट्र-
महाराष्ट्र के यादवों को प्रमुख रूप से- जाधव, गवली, धनगर, गायकवाड़, और खेदकर इत्यादि नामों से जाना जाता है।
9- तमिलनाडु-
तमिलनाडु के यादवों को प्रमुख रूप से- कोनार, आयर, इडैयर, और पिल्लई इत्यादि नामों से जाना जाता है।
10-आंध्र प्रदेश और तेलंगाना-
आंध्र प्रदेश के यादवों को प्रमुख रूप से- गोल्ला, कुरुबा, और यादवुलु इत्यादि नामों से जाना जाता है।
11- कर्नाटक
कर्नाटक के यादवों को प्रमुख रूप से- कुरुबा, गोल्ला, और वाडियार इत्यादि नामों से जाना जाता है।
12- केरल
केरल के यादवों को प्रमुख रूप से- मणियानी और एरुमकर इत्यादि नामों से जाना जाता है।
13- बंगाल
बंगाल में यादवों को घोष और सदगोप इत्यादि नामों से जाना जाता है।
14- ओडिशा
ओडिशा के यादवों को प्रमुख रूप से- बेहेरा, गोपाल, गौड़ा, महाकुल, राउत इत्यादि नामों से जाना जाता है।
विशेष- यादवों का सरनेम अभी शोध का विषय है। क्योंकि अधिकांश प्रान्तों में यादवों के कुछ ऐसे सरनेम हैं जिनको हम और आप अभी तक नहीं जानते हैं।
इस प्रकार से यह अध्याय यादवों के सरनेम की जानकारी के साथ समाप्त हुआ। अब इसके अगले अध्याय (10) में प्रमुख यादव राजनेताओं के बारे में जानकारी दी गई है।
🫵
अध्याय(10)
प्रमुख यादव राजनेता
इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य भारत के प्रमुख यादव राजनेताओं के बारे जानकारी देना है। इसको अच्छी तरह से समझने के लिए इस अध्याय को क्रमशः A, B और C भागों में विभाजित किया गया है।
(A)- उत्तर प्रदेश के प्रमुख राजनेता
1- रामनरेश यादव 2- मुलायम सिंह यादव
3- प्रो० राम गोपाल यादव 4- शिवपाल सिंह यादव
5- रामगोविन्द चौधरी 6- अम्बिका चौधरी
7- शरद यादव 8- अखिलेश सिंह यादव
9- डिम्पल यादव
(B)- बिहार के प्रमुख राजनेता
1- बिंदेश्वरी प्रसाद मण्डल 2- रामलखन सिंह यादव (शेरे बिहार)
3- लालू प्रसाद यादव 4- श्रीमती रावड़ी देवी
5- तेजस्वी यादव 6- पप्पू यादव (राजेश रंजन)
7- नित्यानंद राय
(C)- अन्य राज्यों के यादव राजनेता
1- मोहन यादव 2- अन्नपूर्णा देवी
4- राव इंद्रजीत सिंह और राव बीरेंद्र सिंह
5- राव बिजेंद्र सिंह
(A)- उत्तर प्रदेश के प्रमुख राजनेता
1- रामनरेश यादव
राम नरेश यादव का जन्म सन् 1 जुलाई 1928 को आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) के आजमगढ़ जिला में हुआ था।उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से एम.ए. और एल.एल.बी. की डिग्री प्राप्त की थी और पेशे से वकील थे।
इसके साथ ही वे भारत के एक वरिष्ठ राजनेता थे। शुरुआत में वे समाजवादी विचारधारा से प्रभावित थे और जनता पार्टी में रहे, लेकिन बाद में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए थे। ये 1977 में प्रथम बार आजमगढ़ से लोकसभा सदस्य चुने गए थे। इसके अलावा वह राज्यसभा सदस्य और उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य भी रहे।
ये जनता पार्टी की सरकार में उत्तर प्रदेश के 10 वें मुख्यमन्त्री के तौर पर 23 जून 1977 से 28 फरवरी 1979 तक रहे। इसके बाद 8 सितंबर 2011 से 7 सितंबर 2016 तक मध्य प्रदेश के राज्यपाल के रूप में कार्य किया। इस दौरान उन्होंने कुछ समय के लिए छत्तीसगढ़ के राज्यपाल का अतिरिक्त कार्यभार भी सम्हाला।
विशेष- ये अपनी सादगी के लिए जाने जाते थे। मुख्यमन्त्री चुने जाने के बाद वे दिल्ली से लखनऊ ट्रेन से आए और रेलवे स्टेशन से रिक्शे पर बैठकर राज्यपाल को अपना पत्र सौंपने राजभवन पहुँचे थे।
22 नवंबर 2016 को लखनऊ के एसजीपीजीआई (SGPGI) में लम्बी बीमारी के बाद उनका निधन हुआ।
2- मुलायम सिंह यादव
नेताजी मुलायम सिंह यादव का जन्म- सन् 22 नवंबर 1939 को उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के सैफई गाँव में एक किसान परिवार में हुआ था। इनके पिता सुघर सिंह यादव और माता मूर्ति देवी थीं। वे राजनीति विज्ञान में एम.ए. और बी.टी. (टीचिंग) की डिग्री प्राप्त करने के उपरान्त 1963 में उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के जैन इण्टर कॉलेज, करहल में एक सहायक शिक्षक के रूप में अपने करियर की शुरुआत की, जिसमें वे मुख्य रूप से हिंदी और सामाजिक विज्ञान पढ़ाते थे। 1974 में राजनीति विज्ञान में मास्टर डिग्री (MA) पूरी करने के बाद, उन्हें उसी कॉलेज में लेक्चरर (प्रवक्ता) के पद पर पदोन्नत कर दिया गया। उस समय उनका वेतन मात्र 120 रुपये था। वे अपना सम्पूर्ण जीवन समाज सेवा और राजनीति में लाने के लिए 1984 में शिक्षक की नौकरी से इस्तीफा दे दिया। आगे चलकर 4 अक्टूबर 1992 को समाजवादी पार्टी की नींव रखकर अपनी बुलन्दियों का परचम लहराया और भारतीय राजनीति के एक दिग्गज नेता के रुप में उभरे। उनके समर्थक उन्हें प्यार से "नेताजी" और "धरतीपुत्र" कहकर बुलाते थे।
मुलायम सिंह यादव का राजनीतिक कैरियर लगभग छह दशकों तक चला। वे पहली बार 1967 में जसवन्तनगर से विधायक चुने गए और कुल 10 बार विधानसभा सदस्य रहे तथा तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री के रहे। इसके अतिरिक्त वे 7 बार लोकसभा सांसद चुने गए, जिसमें मैनपुरी, आजमगढ़ और सम्भल जैसे निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व किया। इसके साथ ही वे 1996 से 1998 तक भारत के केंद्रीय रक्षा मन्त्री रहे।
उन्हें सामाजिक न्याय, पिछड़ों, दलितों और किसानों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले नेता के रूप में याद किया जाता है। उनकी इसी विशेषता के कारण भारत सरकार ने मरणोपरान्त वर्ष 2023 में पद्म विभूषण जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किया।
अन्ततोगत्वा 10 अक्टूबर 2022 को 82 वर्ष की आयु में गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में लम्बी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया।
विशेष-
(1) जब मुलायम सिंह यादव 1996 से 1998 के बीच रक्षा मन्त्री थे, तब उन्होंने यह ऐतिहासिक नियम बनाया कि शहीद का पार्थिव शरीर पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनके गाँव या घर पहुँचाया जाएगा। इस नियम के तहत डीएम (DM) और एसपी (SP) का भी शहीद के अन्तिम संस्कार में शामिल होना अनिवार्य किया गया। उनके इस फैसले की प्रसंशा समाज के प्रत्येक वर्गों द्वारा की गई।
(2) मुलायम सिंह यादव कुस्ती में 'चरखा' और धोविया दांव के लिए मशहूर थे। 1960 के दशक में जसवन्तनगर में एक बार कुश्ती का दंगल हो रहा था, जिसमें मुलायम सिंह ने अपने से कहीं बड़े और तगड़े पहलवान को चित कर दिया। उस दंगल को स्थानीय विधायक नथू सिंह देख रहे थे। वे मुलायम के दांव-पेंच और फुर्ती से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने वहीं तय कर लिया कि यह लड़का राजनीति का भी कुशल खिलाड़ी बनेगा। नथू सिंह ने उन्हें अपना राजनीतिक शिष्य बना लिया और 1967 के चुनाव में अपनी सीट छोड़कर मुलायम सिंह को टिकट दिलवाया।
(3) जब मुलायम सिंह ने अपना पहला चुनाव लड़ा, तो उनके पास न संसाधन थे और न ही पैसे। उनके दोस्त दर्शन सिंह साइकिल चलाते थे और मुलायम पीछे कैरियर पर बैठकर गाँव-गाँव प्रचार करने जाते थे। इसी संघर्ष के कारण बाद में जब उन्होंने अपनी पार्टी (समाजवादी पार्टी) बनाई, तो उसका चुनाव चिह्न भी 'साइकिल' ही रखा।
उनके हुनर, कद, और राजनीतिक रणनीति को देखते हुए पूर्व प्रधानमन्त्री चौधरी चरण सिंह उन्हें प्यार से 'नन्हा नेपोलियन' कहकर बुलाते थे।
(4) यह ध्रुव सत्य है कि मुलायम सिंह यादव जी की ही देन रही कि आज यादव समाज- आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, ऊँचाइयों को प्राप्त कर सका। इसके पहले यादवों की बहुत ही दैनीय दशा थी, ये लोग मनुवादी व्यवस्था के उच्चवर्णों के सामने चारपाई पर नहीं बैठ सकते थे।
3- प्रो० राम गोपाल यादव
प्रोफेसर राम गोपाल यादव का जन्म 29 जून 1946 को उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के सैफई गाँव में हुआ था। प्रोफेसर राम गोपाल यादव के पिता का नाम स्वर्गीय बच्ची लाल यादव और माता का नाम श्रीमती फूलवती था। ये दिवंगत मुलायम सिंह यादव के चचेरे भाई, और पार्टी के मुख्य रणनीतिकारों में से एक माने जाते हैं। प्रो० राम गोपाल यादव एक वरिष्ठ भारतीय राजनीतिज्ञ और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं।
प्रोफेसर राम गोपाल यादव 1992 से (वर्तमान में अपने पाँचवें कार्यकाल में) राज्यसभा सांसद हैं। इन्होंने 2004 से 2008 तक संभल निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है।
इन्हें समाजवादी पार्टी का थिंक-टैंक और संविधान विशेषज्ञ माना जाता है। 2017 में सपा के पारिवारिक विवाद के दौरान उन्होंने अखिलेश यादव का पुरजोर समर्थन किया था।
उनके बेटे, अक्षय यादव, भी राजनीति में सक्रिय हैं और फिरोजाबाद से सांसद रह चुके हैं।
ये वर्तमान में राज्यसभा में समाजवादी पार्टी के संसदीय दल के नेता हैं और सितंबर 2024 में उन्हें स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। ये राजनीति विज्ञान और भौतिकी में एम.ए. और एम.एससी. तथा आगरा विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है।
राजनीति में आने से पहले वे इटावा के चौधरी चरण सिंह डिग्री कॉलेज में लेक्चरर और प्रधानाचार्य के रूप में कार्यरत थे।
4- शिवपाल सिंह यादव
शिवपाल सिंह यादव का जन्म: 16 फरवरी 1955 को बसन्त पञ्चमी के दिन को इटावा जिले के सैफई गाँव में हुआ। इनके पिता सुघर सिंह यादव और माता मूर्ति देवी थीं। ये स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव के सबसे छोटे भाई और अखिलेश यादव के चाचा हैं। इनका विवाह 1981 में सरला यादव से हुआ। उनके दो बच्चे हैं—पुत्र आदित्य यादव (राजनीति में सक्रिय) और पुत्री डॉ. अनुभा यादव हैं।
ये 1976 में कानपुर विश्वविद्यालय के के.के. डिग्री कॉलेज से स्नातक (बी.ए.) किया और 1977 में लखनऊ विश्वविद्यालय से शारीरिक शिक्षा में स्नातक (बी.पी.एड.) की डिग्री प्राप्त की।
राजनीति में आने से पहले वे अपने बड़े भाई मुलायम सिंह यादव के लिए चुनाव प्रबन्धन और सुरक्षा का कार्य देखते थे।शिवपाल सिंह यादव उत्तर प्रदेश के एक प्रभावशाली राजनेता और समाजवादी पार्टी (सपा) के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं। वे वर्तमान में सपा के राष्ट्रीय महासचिव और जसवन्तनगर (इटावा) से विधायक हैं। 1996 में वे पहली बार जसवन्तनगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए, जहाँ से वे अब तक लगातार 6 बार विधायक चुने जा चुके हैं।
ये सपा की पिछली सरकार में उत्तर प्रदेश सरकार में लोक निर्माण विभाग (PWD), सिंचाई और सहकारिता जैसे महत्वपूर्ण मन्त्रालयों के कैबिनेट मन्त्री रहे तथा 2007 से 2012 तक, मायावती सरकार के दौरान, उन्होंने विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाई।
2016-17 में अखिलेश यादव के साथ वैचारिक और राजनीतिक मतभेदों के चलते उन्होंने समाजवादी पार्टी छोड़ दी और 2018 में प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) का गठन किया। हालांकि, मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद वे फिर से समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए और अपनी पार्टी का सपा में विलय कर दिया।
वर्तमान में वे सपा के राष्ट्रीय महासचिव के रूप में पार्टी के रणनीतिक निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। ये अक्सर भाजपा सरकार की नीतियों पर तीखे प्रहार करते हैं और पार्टी कार्यकर्ताओं को एकजुट रहने की नसीहत देते हैं।
शिवपाल सिंह यादव को राजनीति का एक मंझा हुआ खिलाड़ी और "जमीनी नेता" माना जाता है, जिनकी पकड़ उत्तर प्रदेश के पिछड़े और ग्रामीण इलाकों में काफी मजबूत है।
5- रामगोविन्द चौधरी
गोविंद चौधरी का जन्म 9 जुलाई 1953 को बलिया जिले के गोसाईपुर में हुआ था। प्रो० रामगोविन्द चौधरी भारत के एक वरिष्ठ समाजवादी नेता और उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक प्रमुख चेहरा हैं।
गोविंद चौधरी अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत छात्र राजनीति से की और 1971-72 में बलिया के मुरली मनोहर टाउन महाविद्यालय के अध्यक्ष रहे। वे पूर्व प्रधानमन्त्री चन्द्रशेखर के अत्यन्त करीबी रहे हैं और उन्हीं के सानिध्य में राजनीति सीखी।
ये 2017 से 2022 तक उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (Leader of Opposition) के रूप में कार्य किया है। वे अखिलेश यादव की सरकार में बेसिक शिक्षा, बाल विकास और पुष्टाहार मन्त्री भी रह चुके हैं।
इनका निर्वाचन क्षेत्र बलिया जिले की बांसडीह विधानसभा है। ये इस सीट से कई बार विधायक चुने गए हैं। हालांकि, 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्हें इस सीट से हार का सामना करना पड़ा था।
वर्तमान में ये समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव के रूप में सक्रिय हैं और पार्टी के एक मजबूत वैचारिक स्तम्भ माने जाते हैं।
विशेष - बलिया के गोविंद चौधरी के बारे में विशेष जानकारी निम्नलिखित है-
(1) ये जयप्रकाश नारायण के JP आन्दोलन की उपज हैं। 1975 में आपातकाल (Emergency) के दौरान, उन्होंने भूमिगत होकर 'प्रतिरोध' नामक पत्रिका निकाली थी, जिसके कारण उन्हें गिरफ्तार कर मेरठ जेल में सात महीने रखा गया था।
(2) पूर्व पीएम चन्द्रशेखर के सबसे विश्वसनीय पात्र (Man Friday) माने जाते थे। वे चन्द्रशेखर की समाजवादी जनता पार्टी (राष्ट्रीय) के टिकट पर भी चुनाव लड़ चुके हैं और चंद्रशेखर की सहमति के बाद ही वे आधिकारिक तौर पर समाजवादी पार्टी के पाले में आए।
(3) आठ बार के विधायक: वे उत्तर प्रदेश विधानसभा के 8 बार सदस्य (MLA) रहे हैं। उन्होंने बलिया की चिलकहर सीट से 1977 में पहली बार जीत दर्ज की थी और बाद में बांसडीह सीट का प्रतिनिधित्व किया।
(4) 2020 में उन्होंने तब चर्चा बटोरी थी जब वे बयान दिया था कि यदि समाजवादी पार्टी की सरकार सत्ता में आती है, तो नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों को पेंशन दी जाएगी।
(5) संसदीय ज्ञान के धनी: उत्तर प्रदेश की राजनीति में उन्हें विधानसभा की नियमावली और संसदीय परम्पराओं का प्रकाण्ड विद्वान माना जाता है, यही कारण है कि अखिलेश यादव ने शिवपाल यादव की जगह उन्हें नेता प्रतिपक्ष चुना था।
6- अम्बिका चौधरी
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मन्त्री अम्बिका चौधरी के पिता का नाम स्व. सीताराम चौधरी है।
अम्बिका चौधरी का जन्म 1 जुलाई 1955 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के हसनपुरा गाँव में हुआ था। ये काशी हिंदू विश्वविद्यालय से (L.L.B) की डिग्री प्राप्त की है। उनके बेटे आनन्द चौधरी भी राजनीति में सक्रिय हैं और बलिया के जिला पञ्चायत अध्यक्ष रहे हैं।
अम्बिका चौधरी उत्तर प्रदेश की राजनीति के एक प्रमुख नेता और समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं। वे उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मन्त्री रह चुके हैं और उन्हें बलिया जिले की राजनीति का 'चाणक्य' माना जाता है।
ये 1993 से 2012 तक लगातार चार बार विधायक रहे। उन्होंने बलिया के कोपाचीट (अब फेफना) विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया।
ये मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव दोनों की सरकारों में महत्वपूर्ण पदों पर रहे। इन्होंने राजस्व, पिछड़ा वर्ग कल्याण और विकलांग कल्याण जैसे मन्त्रालयों का कार्यभार सम्हाला।
ये 2012 में उत्तर प्रदेश विधान परिषद (MLC) के सदस्य भी निर्वाचित हुए थे। तथा उत्तर प्रदेश विधानसभा में समाजवादी पार्टी के मुख्य सचेतक (Chief Whip) की जिम्मेदारी भी निभा चुके हैं।
समाजवादी पार्टी के आन्तरिक कलह के दौरान, उन्हें शिवपाल यादव का करीबी माना गया और अखिलेश यादव द्वारा टिकट न दिए जाने के कारण उन्होंने 2017 के चुनाव से ठीक पहले सपा छोड़ दी और बहुजन समाज पार्टी में शामिल होकर 2017 का चुनाव बसपा के टिकट पर लड़ा, लेकिन वे चुनाव हार गए।
पुनः 2021 अगस्त में उन्होंने फिर से समाजवादी पार्टी में वापसी की। इस दौरान वे अखिलेश यादव के सामने भावुक भी हुए थे।
7- शरद यादव
स्व० शरद यादव भारत के एक वरिष्ठ समाजवादी नेता और पूर्व केन्द्रीय मन्त्री थे, जिन्हें भारतीय राजनीति में 'मण्डल मसीहा' के रूप में जाना जाता है। उनके पिता का नाम नन्द किशोर यादव तथा माता का नाम सुमित्रा था। वे मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के बाबई गाँव के एक किसान थे। शरद यादव का जन्म 1 जुलाई 1947 को होशंगाबाद जिले के बाबई गाँव में हुआ था। उनकी पत्नी का नाम रेखा यादव है।
उन्होंने जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज से इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग में गोल्ड मेडल के साथ डिग्री प्राप्त की थी।
12 जनवरी 2023 को 75 वर्ष की आयु में गुरुग्राम के फोर्टिस अस्पताल में शरद यादव का निधन हुआ।
शरद यादव भारत के इकलौते ऐसे नेता थे जिन्होंने तीन अलग-अलग राज्यों से लोकसभा चुनाव जीता-
मध्य प्रदेश (जबलपुर) 1974 के उपचुनाव में पहली बार जीत (जेपी आन्दोलन के समय)। उत्तर प्रदेश (बदायूं) 1989 में जीत। तथा बिहार (मधेपुरा) यहाँ से वे चार बार (1991, 1996, 1999 और 2009) सांसद चुने गए।
वे कुल 7 बार लोकसभा और 3 बार राज्यसभा के सदस्य रहे। इसके साथ ही वे मण्डल आयोग 1990 में वी.पी. सिंह सरकार द्वारा ओबीसी आरक्षण लागू करवाने में उनकी निर्णायक भूमिका थी। वे जनता दल (यूनाइटेड) के संस्थापक अध्यक्ष थे और 2003 से 2016 तक इस पद पर रहे। उन्होंने नागरिक उड्डयन, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति, कपड़ा और उपभोक्ता मामलों जैसे महत्वपूर्ण मन्त्रालयों का कार्यभार सम्हाला।
वे एनडीए (NDA) के संयोजक रहे, लेकिन बाद में वैचारिक मतभेदों के कारण उन्होंने अपनी पार्टी 'लोकतान्त्रिक जनता दल' (LJD) बनाई, जिसका बाद में आरजेडी (RJD) में विलय कर दिया।
उन्हें राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण के विचारों का सच्चा उत्तराधिकारी माना जाता था, जिन्होंने आजीवन सामाजिक न्याय और गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति की।
8- अखिलेश सिंह यादव
अखिलेश यादव का जन्म 1 जुलाई 1973 सन् को इटावा जिले के सैफई गाँव में मुलायम सिंह यादव और मालती देवी के गर्भ से हुआ था। श्री अखिलेश यादव की पत्नी का नाम डिम्पल यादव है। इनके एक पुत्र- अर्जुन यादव तथा दो पुत्रियाँ- अदिति यादव और टीना यादव हैं। जिसमें अर्जुन और टीना जुड़वां हैं। इन तीनों में अदिति यादव उनकी सबसे बड़ी बेटी हैं।
इन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा धौलपुर मिलिट्री स्कूल, राजस्थान से पूरी की। इसके बाद मैसूर विश्वविद्यालय से सिविल एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन और ऑस्ट्रेलिया की सिडनी यूनिवर्सिटी से मास्टर ऑफ इंजीनियरिंग (पर्यावरण) की डिग्री प्राप्त की।
भारतीय राजनीतिज्ञ और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। वे 2012 से 2017 तक उत्तर प्रदेश के 20वें मुख्यमन्त्री रहे, जहाँ 38 वर्ष की आयु में शपथ लेकर उन्होंने राज्य के सबसे युवा मुख्यमन्त्री बनने का गौरव प्राप्त किया।
राजनीतिक सफर
श्री अखिलेश यादव अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत साल 2000 में कन्नौज लोकसभा उपचुनाव जीतकर की। वे अब तक कई बार लोकसभा सांसद (2000, 2004, 2009, 2019 और 2024) और उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य रह चुके हैं। ये 2012 के विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी की प्रचंड जीत के बाद मुख्यमंत्री बने। तथा मार्च 2022 से जून 2024 तक यूपी विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाई, जिसके बाद वे 18वीं लोकसभा में कन्नौज से सांसद चुने गए।
2024 के भारतीय आम चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें जीतकर ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की और 18वीं लोकसभा में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई।
अखिलेश यादव की प्रमुख उपलब्धियाँ और योजनाएँ-
अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल में उन्होंने कई निम्नलिखित महत्वपूर्ण ढांचागत और कल्याणकारी कार्य किए
(1) आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे- यह देश का सबसे आधुनिक और लंबे एक्सप्रेसवे में से एक है। यह एक्सप्रेसवे 302 किलोमीटर लंबा 6-लेन एक्सप्रेसवे उनकी सरकार की सबसे प्रमुख उपलब्धि मानी जाती है, जिसे रिकॉर्ड समय में पूरा किया गया। जिसपर फाइटर विमान उतार कर अपनी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठ को दिखाया जिसकी सराहना अपने देश में खूब हुई।
(2) लखनऊ मेट्रो रेल: लखनऊ में मेट्रो रेल परियोजना का निर्माण कार्य शुरू किया गया और ट्रायल रन हुआ।
(3) यूपी 100- अखिलेश यादव तीसरा महत्वपूर्ण कार्य पुलिस को आधुनिक बनाने और सुरक्षा बढ़ाने का था। इसके लिए उन्होंने आपातकालीन सेवा शुरू की जो यूपी डायल 100 के नाम से जानी गई किन्तु योगी आदित्यनाथ की सरकार ने उसका नाम बदल कर यूपी 112 कर दिया।
(4) महिला सुरक्षा 1090- अखिलेश यादव की सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा और शिकायतें दर्ज करने के लिए एक विशेष हेल्पलाइन शुरू की गई, जो अपनी तरह की पहली पहल थी।
(5) स्वास्थ्य सेवाएं 108 और 102- अखिलेश यादव की सरकार ने 108 एम्बुलेंस सेवा पूरे राज्य में 'समाजवादी स्वास्थ्य सेवा' के तहत नि:शुल्क आपातकालीन एम्बुलेंस सेवा शुरू की गई। इसके पहले ऐसी सेवाएं उत्तर प्रदेश में नहीं थी। इसी तर्ज पर 102 एम्बुलेंस सेवा को सर्वप्रथम इन्होंने ने ही प्रारम्भ किया जो मुख्य रूप से गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं के लिए शुरू की गई थी।
(6) शिक्षा और रोजगार- अखिलेश यादव की सरकार ने 10वीं और 12वीं पास छात्रों को तकनीकी रूप से सशक्त बनाने के लिए बड़े पैमाने पर लैपटॉप वितरित किए गए। जो अपने आप में मिशाल है। इसी तर्ज पर उन्होंने कन्या विद्या धन योजना को लागू किया जो कक्षा 12वीं पास करने वाली लड़कियों को उच्च शिक्षा के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की गई।
(7) सामाजिक कार्य- अखिलेश यादव ने सामाजिक कार्यों पर विशेष ध्यान दिया जिसके तहत उनकी सरकार में गरीबों और जरूरतमंदों के लिए समाजवादी पेंशन योजना तथा ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों के लिए लोहिया आवास योजना का प्रारम्भ किया।
श्री अखिलेश यादव ने 07 जनवरी 2026 को मेरी पहली पुस्तक "श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" का सर्वप्रथम विमोचन किया। उनको ऐसा करने से लेखकों में उत्साह की लहर दौड़ गई। उनके द्वारा पुस्तक "श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" के विमोचन का विडियो यादव सम्मान चैनल पर विडियो शीर्षक- अखिलेश यादव ने किया श्रीकृष्ण साराङ्गिणी पुस्तक का विमोचन। को देखा जा सकता है।
विशेष - कुल मिलाकर देखा जाए तो कम समय में जितना काम अखिलेश यादव ने किया अबतक के राजनीतिक इतिहास में कोई नहीं किया।
9- डिम्पल यादव
डिम्पल यादव का जन्म 15 जनवरी 1978 को पुणे, महाराष्ट्र में हुआ था। उनके पिता कर्नल राम चन्द्र सिंह रावत भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हैं। उनका परिवार मूल रूप से उत्तराखण्ड का रहने वाला है। डिम्पल यादव पुणे, बठिंडा और अण्डमान-निकोबार में स्कूली शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से बी.कॉम की डिग्री हासिल की है। इनका विवाह 24 नवंबर 1999 को समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमन्त्री अखिलेश यादव से हुआ।
डिम्पल यादव का राजनीतिक सफर उत्तर प्रदेश की राजनीति से शुरू हुई। उन्होंने अपना पहला चुनाव 2009 फिरोजाबाद लोकसभा उपचुनाव लड़ा था, जिसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा। पुनः 2012 में वह कन्नौज लोकसभा उपचुनाव में निर्विरोध चुनी गईं। उत्तर प्रदेश के इतिहास में निर्विरोध चुनी जाने वाली वह पहली महिला सांसद बनीं। तब से वे (2012 से 2019) तक कन्नौज से सांसद रहीं।
पुनः 2022 में मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद हुए उपचुनाव में उन्होंने मैनपुरी सीट से लडीं और बड़े अन्तर से जीत दर्ज की। 2024 के लोकसभा चुनाव में वे दोबारा मैनपुरी से सांसद चुनी गईं।
प्रमुख उपलब्धियाँ
1- रानी लक्ष्मीबाई महिला सम्मान कोष: उन्होंने संकटग्रस्त महिलाओं और एसिड अटैक पीड़ितों की मदद के लिए 100 करोड़ रुपये से रानी लक्ष्मीबाई महिला सम्मान कोष की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई।
2- महिलाओं की सुरक्षित यात्रा के लिए लखनऊ में 'पिंक ऑटो' और दिल्ली-लखनऊ के बीच 'पिंक एक्सप्रेस' बस सेवा शुरू करने का श्रेय उन्हें दिया जाता है।
3- उन्होंने स्कूल जाने वाली लड़कियों को निशुल्क सैनिटरी नैपकिन वितरित करने और मासिक धर्म स्वच्छता के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए किशोरी सुरक्षा योजना की शुरुआत की।
4- राज्य पोषण मिशन: डिम्पल यादव ने कुपोषित बच्चों और गर्भवती माताओं की मदद के लिए राज्य पोषण मिशन को गति दी और अधिकारियों को गाँवों में कुपोषित बच्चों की सूची तैयार करने के निर्देश दिए।
(B)- बिहार के प्रमुख राजनेता
1- बिंदेश्वरी प्रसाद मण्डल
बिंदेश्वरी प्रसाद मण्डल का जन्म 25 अगस्त 1918 को वाराणसी में एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। उनका पैतृक गाँव बिहार के मधेपुरा जिले में स्थित मुरहो था।
इनके पिता बाबू रासबिहारी लाल मण्डल जो एक धनी जमींदार और बिहार के एक प्रमुख नेता थे, जिन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारम्भिक वर्षों में सक्रिय भूमिका निभाई थी।
BP मण्डल का राजनीतिक सफर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से शुरू हुआ। वे 1952 में बिहार विधानसभा के सदस्य चुने गए। और 1967 और 1977 में लोकसभा सांसद भी रहे।और 1968 में वे मात्र 30 दिनों के लिए बिहार के मुख्यमन्त्री बने।
1979 में तत्कालीन प्रधानमन्त्री मोरारजी देसाई ने उन्हें "पिछड़ा वर्ग आयोग" का अध्यक्ष नियुक्त किया। तब उन्होंने आयोग से सम्बन्धित निम्नलिखित प्रमुख सिफारिशें और घोषणा की जिसे आज मण्डल आयोग के नाम से जाना जाता है
(क) आयोग ने सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक आधार पर 11 संकेतकों का उपयोग कर 3,743 जातियों को पिछड़ा घोषित किया।
(ख) 27% आरक्षण: आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि देश की लगभग 52% आबादी ओबीसी है, और उनके लिए सरकारी नौकरियों व शिक्षण संस्थानों में 27% आरक्षण की सिफारिश की।
फिर तो 7 अगस्त 1990 को प्रधानमन्त्री वी.पी. सिंह ने संसद में इस रिपोर्ट को लागू करने की घोषणा की।
लाख विरोध और प्रदर्शन के बाद 1992 के प्रसिद्ध इंदिरा साहनी केस में सर्वोच्च न्यायालय ने इस आरक्षण को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया।
इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए बिंदेश्वरी प्रसाद मण्डल को पिछडो़ का मसीहा कहा जाता है।
2- रामलखन सिंह यादव (शेरे बिहार)
रामलखन सिंह यादव का जन्म 9 मार्च 1920 को बिहार के पटना जिले के हरिरामपुर या अंबारी गाँव में हुआ था। ये यादव लालू प्रसाद यादव से पहले बिहार में यादवों और पिछड़े वर्गों के निर्विवाद नेता थे। ये बिहार में शिक्षा व बुनियादी ढांचे के विकास में ऐतिहासिक योगदान दिया। उनके इस योगदान से उन्हें 'शेरे बिहार' के नाम से जाना जाता है। बिहार के एक कद्दावर स्वतन्त्रता सेनानी, दूरदर्शी राजनेता और महान शिक्षाविद थे। उनको बिहार में शिक्षा के प्रसार का श्रेय दिया जाता है क्योंकि उन्होंने राज्य भर में 100 से अधिक शिक्षण संस्थानों (स्कूल और कॉलेज) की स्थापना की। औरंगाबाद का रामलखन सिंह यादव कॉलेज इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
वे यादव समाज के एक अत्यन्त शक्तिशाली नेता माने जाते थे। उन्होंने वंचित वर्गों और किसानों के अधिकारों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। वे कई वर्षों तक 'अखिल भारतीय यादव महासभा' के अध्यक्ष भी रहे।
शेरे बिहार का राजनीतिक सफर-
छात्र जीवन से ही वे भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में सक्रिय रहे और ब्रिटिश सरकार ने उन्हें "खतरनाक छात्र" घोषित कर जेल भेज दिया था। वे 1952 से 1991 तक लगातार बिहार विधानसभा के सदस्य रहे।
1963 में कृष्ण वल्लभ सहाय की सरकार में वे पहली बार कैबिनेट मन्त्री बने और राज्य में लोक निर्माण (PWD) और भूमि सुधार जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभाले।
1991 में वे आरा लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से सांसद चुने गए।
उन्होंने केंद्र सरकार में 1994 से 1996 तक रसायन और उर्वरक मन्त्री के रूप में कार्य किया।
3- लालू प्रसाद यादव
लालू प्रसाद यादव (जन्म 11 जून 1948) भारतीय राजनीति के एक अत्यन्त प्रभावशाली और चर्चित व्यक्तित्व हैं। वे बिहार के पूर्व मुख्यमन्त्री, भारत के पूर्व रेल मन्त्री और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के संस्थापक अध्यक्ष हैं।
इनका जन्म 11 जून 1948 को बिहार के गोपालगंज जिले के फुलवरिया गाँव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम स्वर्गीय कुन्दन राय तथा माता का नाम मरछिया देवी है। इन्होंने पटना विश्वविद्यालय से कानून (LLB) और राजनीति विज्ञान में मास्टर (MA) की डिग्री प्राप्त की।
उनके राजनीतिक सफर का सिलसिला 1970 के दशक में पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष के रूप में हुई। वे जयप्रकाश नारायण के जेपी आन्दोलन के प्रमुख छात्र नेताओं में से एक थे। 1977 में मात्र 29 वर्ष की आयु में वे जनता पार्टी के टिकट पर पहली बार लोकसभा सदस्य चुने गए और 1990 से 1997 तक दो बार बिहार के मुख्यमन्त्री रहे। उनके कार्यकाल को पिछड़ों और दलितों के सशक्तिकरण के लिए जाना जाता है, हालांकि इसे "जंगल राज" के आरोपों और विवादों का भी सामना करना पड़ा।
(UPA-1) सरकार के दौरान 2004 से 2009 तक उन्होंने रेल मन्त्री के रूप में कार्य किया। भारतीय रेलवे को घाटे से उबारने और मुनाफे में लाने के लिए उन्हें भारतीय प्रबंधन संस्थानों (IIM) में "मैनेजमेंट गुरु" के रूप में व्याख्यान देने के लिए बुलाया गया था।
जमीन के बदले नौकरी (Land-for-Jobs): हाल के वर्षों में वे और उनका परिवार रेलवे में नौकरी देने के बदले जमीन लिखवाने के आरोपों की जांच का सामना कर रहे हैं।
वर्तमान स्थिति में लालू यादव लम्बे समय से किडनी और हृदय सम्बन्धी बीमारियों से जूझ रहे हैं। दिसंबर 2022 में सिंगापुर में उनका किडनी ट्रांसप्लान्ट हुआ था, जिसमें उनकी बेटी रोहिणी आचार्य ने अपनी किडनी दान की थी। स्वास्थ्य कारणों से वे अब सक्रिय राजनीति से थोड़ा पीछे हट गए हैं। जनवरी 2026 में, तेजस्वी यादव को राजद का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है, जो पार्टी की कमान सम्हाल रहे हैं।
4- तेजस्वी यादव
तेजस्वी यादव का जन्म 9 नवंबर 1989 को बिहार के गोपालगंज में हुआ था। ये बिहार के दो पूर्व मुख्यमन्त्रियों, लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के सबसे छोटे बेटे हैं। उनकी पत्नी का नाम राजश्री यादव है और उनकी एक बेटी है जिसका नाम कात्यायनी है।
तेजस्वी यादव बिहार की राजनीति के एक प्रमुख युवा चेहरा और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के शीर्ष नेता हैं। 25 जनवरी 2026 को उन्हें आधिकारिक तौर पर राजद का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
तेजस्वी यादव ने दिल्ली पब्लिक स्कूल (आर.के. पुरम) से पढ़ाई की, लेकिन क्रिकेट में करियर बनाने के लिए उन्होंने 9वीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी। और वे आईपीएल (IPL) में दिल्ली डेयरडेविल्स टीम का हिस्सा रहे (हालांकि उन्हें मैच खेलने का मौका नहीं मिला) और उन्होंने झारखणड की ओर से घरेलू क्रिकेट (रणजी ट्रॉफी) भी खेला है।
तेजस्वी यादव का राजनीतिक सफर 2010 से अपने पिता के साथ चुनाव प्रचार शुरू किया और 2015 में पहली बार राघोपुर सीट से विधायक चुने गए। और दो बार बिहार के उपमुख्यमन्त्री रह चुके हैं। वे 2015-2017 में पहली बार 26 साल की उम्र में वे बिहार के सबसे युवा उपमुख्यमन्त्री बने।
2022-2024: जब नीतीश कुमार ने एनडीए छोड़कर महागठबंधन के साथ सरकार बनाई तब तेजस्वी यादव वर्तमान में बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं।
वे मुख्य रूप से बेरोजगारी, सरकारी नौकरी और विकास के मुद्दों पर केंद्रित राजनीति कर रहे हैं। फरवरी 2026 में बिहार विधानसभा के बजट सत्र के दौरान वे स्वास्थ्य कारणों से व्हीलचेयर पर सदन पहुँचे थे।
6- पप्पू यादव (राजेश रंजन)
पप्पू यादव का असली नाम राजेश रंजन है। इनका जन्म 24 दिसंबर 1967 को बिहार के मधेपुरा जिले के खुर्दा में हुआ। उनकी पत्नी रंजीता रंजन वर्तमान में कांग्रेस की राज्यसभा सांसद हैं। उनका एक बेटा सार्थक रंजन और एक बेटी है। इन्हें सीमांचल और कोसी क्षेत्र में एक 'मसीहा' के रूप में देखा जाता है, विशेष रूप से बाढ़ और कोरोना काल के दौरान उनकी सक्रियता के लिए। ये राजनीति विज्ञान से स्नातक (BA) किया है।
पप्पू यादव प्रारम्भ में राजद (RJD) और समाजवादी पार्टी में रहे हैं किन्तु 2015 में उन्होंने अपनी खुद की पार्टी जन अधिकार पार्टी (L) बनाई। वे 1990 में पहली बार निर्दलीय विधायक बने और 6 बार सांसद और एक बार विधायक रह चुके हैं जिसमें वे पूर्णिया से 4 बार और मधेपुरा से 2 बार सांसद रहे हैं।
2024 से ठीक पहले अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में कर दिया था। हालांकि, सीट बंटवारे में पूर्णिया सीट राजद के पास जाने के कारण उन्हें कांग्रेस का टिकट नहीं मिला, जिसके बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। ये आधिकारिक तौर पर निर्दलीय सांसद हैं लेकिन खुद को कांग्रेस की विचारधारा के हैं।
पप्पू यादव को 2015 में संसद में 'सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन' करने वाले सांसदों में से एक के रूप में सम्मानित किया गया था
उपलब्धियाँ
पप्पू यादव को बिहार में अक्सर 'संकटमोचक' के रूप में देखा जाता है। उनके प्रमुख समाजसेवी कार्य निम्नलिखित हैं-
(क) 2019 में पटना में आई भयानक बाढ़ के दौरान उन्होंने खुद नाव पर सवार होकर लोगों तक दूध, पानी और खाना पहुँचाया था। 2025 की बाढ़ में भी उन्होंने प्रभावित इलाकों में राशन के पैकेट और सीधे नकद (₹500 प्रति महिला) बांटे।
(ख) कोरोना काल के महामारी के दौरान उन्होंने ऑक्सीजन सिलेंडर, दवाइयाँ और एम्बुलेंस की व्यवस्था की। उन्होंने कथित तौर पर अपनी 90 कट्ठा जमीन बेचकर राहत कार्यों के लिए फण्ड जुटाया था।
(ग) दिल्ली में इलाज कराने जाने वाले बिहार के गरीब मरीजों के लिए उन्होंने 'सेवा आश्रम' (28 कमरों का आवास) की व्यवस्था की है।
(घ) वे अक्सर गरीबों की शादियों, पढ़ाई और इलाज के लिए सीधे आर्थिक मदद देने के लिए चर्चा में रहते हैं।
इस प्रकार से पप्पू यादव राजनिति के साथ साथ एक सफल समाजसेवी हैं।
7- नित्यानंद राय
नित्यानंद राय (यादव) का जन्म 1 जनवरी 1966 को बिहार के वैशाली जिले के कर्णपुरा गाँव में एक किसान परिवार में हुआ था। उन्होंने बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय के आर.एन. कॉलेज, हाजीपुर से बी.ए. (ऑनर्स) की डिग्री प्राप्त की। ये अपने छात्र जीवन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के माध्यम से सामाजिक और राजनीतिक कार्यों की शुरुआत की और आज भारत सरकार में केंद्रीय गृह राज्य मन्त्री के रूप में कार्यरत हैं। वे बिहार की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (BJP) का एक महत्वपूर्ण चेहरा माने जाते हैं। इनको बिहार में भाजपा के यादव चेहरे के रूप में भी देखा जाता है, जिन्होंने पार्टी के आधार को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई है।
नित्यानंद राय वैशाली जिले की हाजीपुर विधानसभा सीट से लगातार चार बार विधायक निर्वाचित हुए। इसके बाद 2014 में वे पहली बार उजियारपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए। 2019 और 2024 के आम चुनावों में भी उन्होंने इसी क्षेत्र से जीत दर्ज की। 2016 से 2019 तक बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे। उनके नेतृत्व में 2019 के लोकसभा चुनाव में NDA ने बिहार की 40 में से 39 सीटों पर जीत हासिल की थी।
मई 2019 में वे पहली बार केंद्रीय गृह राज्य मन्त्री बने और 2024 में मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में भी उन्हें इसी पद की जिम्मेदारी दी गई। गृह मन्त्रालय में वे आन्तरिक सुरक्षा, सीमा प्रबन्धन और वामपंथी उग्रवाद (LWE) जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर कार्य कर रहे हैं।
(C)- अन्य राज्यों के यादव राजनेता
1- मोहन यादव 2- अन्नपूर्णा देवी
4- राव इंद्रजीत सिंह और राव बीरेंद्र सिंह
5- राव बिजेंद्र सिंह
1- मोहन यादव
डॉ. मोहन यादव का जन्म 25 मार्च 1965, को उज्जैन में हुआ है। इनके पिता का नाम पूनमचद्र यादव है। उनकी पत्नी का नाम सीमा यादव है और उनके दो बेटे और एक बेटी हैं। ये एक कुश्ती प्रेमी हैं और राज्य कुश्ती संघ के अध्यक्ष भी रहे हैं।
मोहन यादव एक शिक्षित नेता हैं। उन्होंने विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से B.Sc, LLB, MA (राजनीति विज्ञान), MBA और PhD की डिग्रियाँ प्राप्त की हैं।
मोहन यादव ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत छात्र राजनीति से किया जिसमें वे 1982 में उज्जैन के माधव विज्ञान महाविद्यालय के छात्र संघ के सह-सचिव और 1984 में अध्यक्ष चुने गए। वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर रहे।
वे लंबे समय से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े रहे हैं और 1993-95 के दौरान उज्जैन में खण्ड कार्यवाह के पद पर रहे। वे 2013 में पहली बार उज्जैन दक्षिण सीट से विधायक बने। इसके बाद 2018 से 2023 तक लगातार तीसरी बार इसी सीट से चुनाव जीता। और शिवराज सिंह चौहान की सरकार (2020-2023) में वे उच्च शिक्षा मन्त्री थे। उनके कार्यकाल के दौरान मध्य प्रदेश में 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति' (NEP) को प्रभावी ढंग से लागू किया गया था। ये वर्तमान में BJP से 13 दिसंबर 2023 को मध्य प्रदेश के 19वें मुख्यमन्त्री पद की शपथ ली।
मोहन यादव अन्य पिछड़ा वर्ग के यादव समुदाय से आते हैं, जो मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा वोट बैंक है। 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद, बीजेपी आलाकमान ने शिवराज सिंह चौहान की जगह मोहन यादव को मुख्यमन्त्री चुनकर सभी को हैरान कर दिया था।
अन्नपूर्णा देवी (यादव)
अन्नपूर्णा देवी (यादव) का जन्म 2 फरवरी 1970 को वर्तमान झारखण्ड (तत्कालीन बिहार) के दुमका जिले के एक छोटे से अजमेरी गाँव में एक बंगाली भाषी किसान परिवार में हुआ था। वर्तमान में भारत सरकार में महिला एवं बाल विकास कैबिनेट मन्त्री हैं। वे झारखण्ड के कोडरमा संसदीय क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सांसद हैं।
उनका राजनीतिक सफर 1998 में उनके पति रमेश प्रसाद यादव (RJD नेता) के आकस्मिक निधन के बाद हुआ। वे राष्ट्रीय जनता दल के टिकट पर कोडरमा विधानसभा सीट से चार बार विधायक रहीं और अविभाजित बिहार व झारखंड सरकारों में मन्त्री भी रहीं। वे झारखण्ड RJD की प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुकी हैं।
2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले वे भाजपा में शामिल हुईं और भारी मतों के अन्तर से जीतकर पहली बार सांसद बनीं। उन्हें झारखण्ड में OBC के एक बड़े और प्रभावशाली चेहरे के रूप में देखा जाता है। उन्होंने रांची विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की है।
4- राव इंद्रजीत सिंह और राव बीरेंद्र सिंह
राव इंद्रजीत सिंह का जन्म हरियाणा के रेवाड़ी में 11 फरवरी 1950 को हुआ था। इनके पिता राव बीरेंद्र सिंह हरियाणा की राजनीति के एक अत्यंत प्रभावशाली स्तम्भ माने जाते हैं। ये दोनों (पिता-पुत्र) ऐतिहासिक रूप से अहीर शासक व स्तंवतन्त्रता सेनानी राव तुलाराम के वंशज हैं। राव इंद्रजीत सिंह के पिता राव बीरेंद्र सिंह हरियाणा के दूसरे मुख्यमन्त्री (1967) हुए और राज्य के पहले निर्वाचित मुख्यमन्त्री बने तथा हरियाणा राज्य के गठन के बाद, वे विधानसभा के पहले पुरुष अध्यक्ष भी रहे। इसके साथ ही वे भारतीय यादव महासभा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। और अहीर रेजिमेंट' के गठन की पुरानी माँग के प्रमुख समर्थकों में से एक रहे हैं।
वर्तमान में राव बीरेंद्र सिंह के पुत्र इंद्रजीत सिंह केंद्र सरकार में राज्य मन्त्री (स्वतन्त्र प्रभार) के रूप में कार्यरत हैं। तथा योजना मन्त्रालय राज्य मन्त्री (स्वतन्त्र प्रभार) हैं
राव इंद्रजीत सिंह अबतक 6 बार सांसद (MP) और 4 बार हरियाणा विधानसभा के सदस्य (MLA) रह चुके हैं।
खेल: राजनीति के अलावा, वे एक अन्तरराष्ट्रीय स्तर के निशानेबाज (Shooter) रहे हैं और उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स व अन्य प्रतियोगिताओं में पदक जीते हैं。
शिक्षा: उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से स्नातक और लॉ फैकल्टी से LL.B. की डिग्री प्राप्त की है।
हाल ही में (फरवरी 2026), उन्होंने हरियाणा के मुख्यमन्त्री से गुरुग्राम और रेवाड़ी के बुनियादी ढांचे के विकास के लिए राज्य के आगामी बजट में अधिक आवंटन की माँग की है।
राव बिजेंद्र सिंह
रेवाड़ी स्टेट की रानी की ड्योढ़ी (रानी महल) के राव बिजेंद्र सिंह के पिता का नाम राव लाल सिंह है जो अहीरवाल के महान क्रान्तिकारी राव गोपाल देव के प्रत्यक्ष वंशज हैं।
इस समय राव बिजेंद्र सिंह रेवाड़ी स्टेट की रानी की ड्योढ़ी (जिसे रानी महल या रानी निवास भी कहा जाता है) उसके संरक्षक और निवासी हैं।
ऐतिहासिक महत्व- रानी की ड्योढ़ी लगभग 200 साल पुरानी ऐतिहासिक इमारत है। राव विजेंद्र सिंह के अनुसार, इसके जीर्णोद्धार के दौरान 225 ईस्वी तक के अवशेष मिले हैं, जो रेवाड़ी के प्राचीन इतिहास को दर्शाते हैं। उन्होंने महल के भीतर एक निजी संग्रहालय भी स्थापित किया है जहाँ रेवाड़ी राज्य से जुड़ी ऐतिहासिक वस्तुएं संरक्षित हैं।
राव बिजेंद्र सिंह इस रेवाड़ी की ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने के लिए सदैव सक्रिय रहते हैं। उन्होंने नगर परिषद द्वारा महल के आसपास सड़क ऊंची करने और जलभराव की समस्या के खिलाफ आवाज़ उठाई है ताकि इस प्राचीन विरासत को नुकसान न पहुँचे।
राव विजेंद्र सिंह वर्तमान में राजनीति में भी सक्रिय हैं। जनवरी 2026 में उन्हें समाजवादी पार्टी का हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। ये अहीरवाल क्षेत्र में 'समाजवादी चिंतन' और किसानों के मुद्दों को प्रमुखता से उठाते हैं। वे हरियाणा में समाजवादी पार्टी के संगठन को और मजबूत करने और राज्य की राजनीति में पार्टी की सक्रियता बढ़ाने पर विशेष ध्यान दे रहे हैं।
विशेष - 'रानी की ड्योढ़ी' और 'रामपुरा हाउस' रेवाड़ी के दो अलग-अलग ऐतिहासिक ठिकाने हैं। जहाँ रामपुरा हाउस का नेतृत्व राव इंद्रजीत सिंह (राव बीरेंद्र सिंह के पुत्र) करते हैं, वहीं रानी की ड्योढ़ी की विरासत को राव विजेंद्र सिंह सम्हाल रहे हैं।
🫵
अध्याय(11)
प्रमुख यादव सामाजिक कार्यकर्ता।
इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित भारत के प्रमुख यादव सामाजिक कार्यकर्ता एवं समाज सेवको के बारे में जानकारी देना है
(1)- राजित सिंह यादव (2)- गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज (3)- गोपाचार्य श्री माता प्रसाद यादव (4)- गोपाचार्य श्री योगेश कुमार रोही
(5)- राव विजेन्द्र सिंह यादव (5)- जाहल बेन अहीर (6)- शैलेन्द्र सिंह यादव (इटावा) (7)- मनोज कुमार यादव (बिहार) (8)- सुनील यादव सुल्तानपुरिया
(9) कालीशंकर यदुवंशी
(1)- राजित सिंह यादव
चौधरी राजित सिंह यादव का जन्म 15 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद के बरहज क्षेत्र स्थित नरसिंह डांड गाँव में हुआ था। जहाँ आज भी उनकी स्मृति में 'राष्ट्रीय यादव दिवस' का बड़ा आयोजन किया जाता है।
स्व. चौधरी राजित सिंह यादव एक प्रभावशाली सामाजिक सुधारक और विचारक थे, जिन्हें मुख्य रूप से यादव समुदाय को एक नई पहचान देने के लिए जाना जाता है।
उनकी ख्याति तब हुई जब उन्होंने 1897 के आसपास अहीर समुदाय को 'यादव' उपनाम अपनाने के लिए गाँव, शहर, और कस्बों में पैदल चलकर प्रेरित किया। उनके प्रयासों के फलस्वरूप 1910 के बाद देश भर में 'यादव' उपनाम का चलन तेजी से बढ़ा। इसके पहले यादव समाज अपनी मूल पहचान को भूल गया था। इसका मुख्य कारण था, भारत का लम्बे समय से गुलाम होना तथा अचानक कुछ चाटुकार जातियों का राजाओं की चाटुकारिता करके अचानक आगे हो जाना। उन चाटुकारों के आगे यादव लोग अत्यन्त पीछे हो गये, क्योंकि यादवों का जन्मगत स्वभाव होता है कि- यादव अपने मान और स्वाभिमान के लिए कभी झुक नहीं सकते। जिसका परिणाम यह हुआ कि यादव समाज अत्यन्त पिछड़ गया और धीरे धीरे अपनी मूल पहचान को भी खोता गया।
किन्तु चौधरी राजित सिंह यादव अपने भूले बिसरे यादवों को पुनः उनकी मूल पहचान को वापस लाने के लिए स्वयं कमर कसी और भारत के प्रत्येक प्रान्तों के लगभग प्रत्येक गाँवों, शहरों और कस्बों में पैदल चलकर यादवों को जगाने का कार्य किया। यादव समाज उनके इस कृत्य का सदैव ऋणी रहेगा। किन्तु दुर्भाग्य है कि जिसने यादवों को जगाया आज यादव समाज उसे ही भूल गया।
प्रमुख उपलब्धियाँ
चौधरी राजित सिंह यादव अखिल भारतीय यादव महासभा के प्रारम्भिक विचारकों और संस्थापकों में से एक थे। उन्होंने समुदाय के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए निरन्तर कार्य किया।
उन्होंने 'यादव' नाम से एक पत्रिका भी निकाली थी। उनकी वैचारिक स्पष्टता इतनी प्रभावी थी कि भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री चौधरी चरण सिंह और कर्पूरी ठाकुर जैसे बड़े नेता भी उनसे मार्गदर्शन प्राप्त करते थे।
उन्होंने यादवों की ऐतिहासिक और क्षत्रिय उत्पत्ति को रेखांकित करने वाले साहित्य के लेखन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
(2)- गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज-
गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज का जन्म- 25 जुलाई सन् 1972 को उत्तर प्रदेश के (गाजीपुर जिला) में एक किसान परिवार में हुआ है। इनके पिता स्वर्गीय श्री रामाधार सिंह यादव हनुमान सिंह इण्टर कालेज देवकली में संस्कृत के प्रवक्ता पर रहे हैं। इनकी माता स्वर्गीय श्रीमती कौशल्या देवी हैं।
इनके माता-पिता दोनों ही श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। जिनका प्रभाव आत्मानन्द जी महाराज पर भी पडा़ और ये भी श्रीकृष्ण भक्त हो गये। ये श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति और साधना में सदैव लीन होकर पौराणिक एवं आध्यात्मिक ग्रन्थों का अध्ययन करके परमेश्वर श्रीकृष्ण के समस्त गूढ़ रहस्यों और सम्पूर्ण आध्यात्मिक चरित्रों को गहराई से जाना और परमेश्वर श्रीकृष्ण के स्वरूप को अपने अन्तर्मन में देखा और अनुभव भी किया। इसके बाद इन्होंने यह संकल्प लिया कि परमेश्वर श्रीकृष्ण की भक्ति और उनके उपदेशों को जन-जन तक पहुँचाना है। इसके लिए उन्होंने अबतक निम्नलिखित कार्य किया।
उपलब्धियाँ-
(क)- गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज ने श्रीकृष्ण के उपदेशो और उसके वंश विस्तार को जन-जन तक पहुँचाने के लिए 10 जनवरी 2019 को यूट्यूब पर "यादव सम्मान" नाम से एक चैनल बनाकर परमेश्वर श्रीकृष्ण के उपदेशों, उसके गूढ़ रहस्यों और उनके द्वारा सृष्टि सर्जन तथा उनके वंश विस्तार को विडियो के माध्यम से बतान प्रारम्भ किया। इनके चैनल के विडियो को अबतक (आज इस किताब के इस अध्याय के लिखने तक - 07-03-2026) भारत सहित अन्य देशों के कुल- 4 करोड़ से अधिक लोगों ने देखा और श्रीकृष्ण के गूढ़ रहस्यो को गहराई से जाना और समझा। इनके चैनल से सबसे ज्यादा लाभ यह हुआ कि यादव समाज के बहुत से लोग एक दूसरे जुड़े सके, जिससे आपसी विचारों का आदान-प्रदान होना और आसान हुआ।
इस सम्बन्ध में लेखक- गोपाचार्य हंस श्री माता प्रसाद जी का कहना है कि "आत्मानन्द जी महाराज द्वारा यादवों के आत्मविश्वास और आत्मसम्मान को जगाने के लिए जो प्रयास किया गया, वह अद्वितीय है"।
(ख)- इनकी दूसरी महत्वपूर्ण उपलब्धि- गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था (G.S.S.K.S) की स्थापना है। इन्होंने 20 नवंबर 2023 को गोपाष्टमी के दिन अपने दो सहयोगी साथियों (मता प्रसाद और योगेश कुमार रोही) को लेकर इस महत्वपूर्ण संस्था की स्थापना किया। उसी समय उन्होंने (मता प्रसाद और योगेश कुमार रोही) दोनों को एक ही साथ औपचारिक घोषणा करते हुए संस्था के गोपाचार्य हंस पद अभिषिक्त किया और अपने स्वयं गोपाचार्य हंस पद पर आसीन हुए। तभी से इन तीनों को गोपाचार्य हंस पदनाम नाम से जाना जाता है।
इस महत्वपूर्ण संस्था के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी इस पुस्तक की परिशिष्ट कथा भाग-(7) में दी गई है।
(ग)- इनका तीसरा सबसे महत्वपूर्ण कार्य श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" और "यदुवंश संहिता" जैसी दो महत्वपूर्ण किताब को लिखवाने का है। इनके ही मार्गदर्शन में "श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" और "यदुवंश संहिता" नाम की महत्वपूर्ण किताब को दो विद्वान लेखकों- गोपाचार्य श्री माता प्रसाद यादव और गोपाचार्य श्री योगेश रोही द्वारा लिखी गई है, जो श्रीकृष्ण पर लिखी गई अबतक की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक मानी जाती हैं।
अब यहाँ पर कुछ लोगों को यह संशय अवश्य हुआ होगा कि "श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" पुस्तक में परमेश्वर श्रीकृष्ण के बारे में ऐसा क्या लिखा गया है वह अबतक की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक हो गई। तो इस सम्बन्ध में ज्यादा तो नहीं किन्तु उसकी विषय सूची को अवश्य बताना चाहूँगा जिससे आप स्वयं निर्णय कर सकते हैं कि यह श्रीकृष्ण पर लिखी गई "श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" अबतक की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक क्यों है।
"श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" की विषय सूची-
अध्याय-
(१)- पूजा-अर्चना के विधि- विधान एवं गलत कथाओं को सुनने व कहने के दुष्परिणामों का वर्णन।
[क] - परमेश्वर की सार्थकता व पहचान।
[ख] - तैंतीस (३३) कोटि देवता में किसकी पूजा करें ?
[ग] - श्रीकृष्ण पूजा के लाभ। [घ] - शिव पूजा के लाभ
[ङ] - विष्णु पूजा के लाभ। [च] - श्रीराम पूजा के लाभ।
[छ] - देवी सावित्री व सरस्वती पूजा के लाभ।
[ज] - श्रीकृष्ण कथा कौन कह सकता हैं ?
[झ] - गलत कथा कहने व सुनने के दुष्परिणामों का वर्णन
[ञ] - सच्चे गुरु की पहचान।
(२)- श्रीकृष्ण का स्वरूप एवं उनके गोलोक का वर्णन।
(३)- श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कोई दूसरा परमेश्वर या परमशक्ति नही है।
(४)- गोलोक में गोप-गोपियों सहित नारायण, शिव, ब्रह्मा आदि देवताओं की उत्पत्ति तथा सृष्टि का विस्तार।
(५)- भगवान श्रीकृष्ण का सदैव गोप होना तथा गोपकुल में उनका अवतरण।
(६)- गोप-कुल के श्रीकृष्ण सहित कुछ महान पौराणिक व्यक्तियों का परिचय।
भाग- (१) गोपेश्वर श्रीकृष्ण का परिचय।
भाग- (२) श्रीराधा का परिचय।
भाग- (३) पुरुरवा और उर्वशी का परिचय।
भाग- (४) आयुष, नहुष, और ययाति का परिचय।
(७)- गोप कुल के यादव वंश का उदय एवं उसके प्रमुख सदस्यपतियों का परिचय।
भाग- (१) महाराज यदु का परिचय।
भाग- (२) हैहय वंशी यादवों का परिचय।
भाग- (३) यदु पुत्र- क्रोष्टा और उनके वंशज।
(८)- यादवों का मौसल युद्ध तथा श्रीकृष्ण का गोलोक गमन।
भाग- (१)- यादवों के सम्पूर्ण विनाश की वास्तविकता एवं श्रीकृष्ण को बहेलिए से मारे जाने का खण्डन
भाग- (२)- श्रीकृष्ण का गोलोक गमन।
(९)- यादवों की जाति, वर्ण, वंश, कुल एवं गोत्र।
भाग- (१) जातियों की मौलिकता (Originality) एवं आभीर जाति की उत्पत्ति।
भाग- (२) भारतीय समाज में पञ्च-प्रथा की संकल्पना।
[क]- पञ्चमवर्ण वर्ण की उत्पत्ति।
[ख]- ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति।
[ग] - वैष्णव वर्ण और चातुर्वर्ण्य में अन्तर-
[१]- जन्मगत एवं कर्मगत अन्तर।
[२]- यज्ञमूलक एवं भक्तिमूलक अन्तर।
[३]- भेदभाव एवं समतामूलक अन्तर-
भाग- (३) यादवों का वंश।
भाग- (४) यादवों का कुल।
भाग- (५) यादवों का गोत्र।
(१०)- यादवों का वास्तविक गोत्र कार्ष्ण है या अत्रि ?
(११)- वैष्णव वर्ण के सदस्यों के प्रमुख कार्य एवं दायित्व।
भाग- [१] गोपों का ब्राह्मणत्व (धर्मज्ञ) कर्म-
(क)- सत्यनारायण व्रत कथा के मुख्य पात्र अहीर हैं।
(ख)- अहीर कन्या वेदमाता गायत्री का परिचय
(ग)- यज्ञों में हवन को ग्रहण करने वाली गोपी स्वाहा और स्वधा का परिचय।
(घ)- ब्रह्माण्ड विदुषी गोपी शतचन्द्रानना का परिचय।
भाग- [२] गोपों का क्षत्रित्व कर्म।
भाग- [३] गोपों का वैश्य कर्म।
भाग- [४] गोपों का शूद्र कर्म।
(१२)- वैष्णव वर्ण" के गोपों की पौराणिक ग्रन्थों में प्रशंसा एवं सांस्कृतिक विरासत-
भाग [१]- गोपों की पौराणिक प्रशंसा।
भाग [२]- भारतीय संस्कृति में गोपों का योगदान।
(क)- हल्लीसं एवं 'रास' नृत्य। (ख)- गोपों की देन "पञ्चम वर्ण"। (ग)- किसान और कृषि शब्द कृष्ण सहित गोपों की देन है। (घ)- आर्य व ग्राम संस्कृति के जनक गोप हैं। (ङ)- आभीर छन्द और आभीर राग।
अतः "श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" की विषय सूची को देखने से ही समझ में आता है कि यह किताब अद्भुत, एवं अद्वितीय है।श्रीकृष्ण साराङ्गिणी को मंगवाने के लिए - मोबाइल नंबर- 919452533334 तथा 918077160219 पर कोई भी सम्पर्क कर सकता है। ये दोनों मोबाइल नंबर उन दो विद्वान लेखकों के हैं जिन्होंने दोनों किताबों को लिखा है।
(3)- गोपाचार्य श्री माता प्रसाद यादव
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(4)- गोपाचार्य हंस श्री योगेश कुमार रोही-
भारतीय अध्यात्म- दर्शन व उपनिषद तथा वेद एवं पुराणों के सम्यक अध्येता योगेश कुमार रोहि- का जन्म- 10 मार्च 1983 ईस्वी सन् को ग्राम- दभारा, पत्रालय- फरिहा, जिला- फिरोजाबाद में हुआ। परन्तु ग्राम आजादपुर पत्रालय पहाड़ीपुर ज़िला अलीगढ़ इनकी कर्मभूमि और साधना स्थली रही, जो कि इनकी माता जी का जन्म स्थान और इनकी ननिहाल भी है। पिता श्रीपुरुषोतम सिंह" कृषक होने के साथ साथ एक प्राइमरी जूनियर अध्यापक भी रहे, जो गणित, इतिहास, साहित्य और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समन्वित थे।
श्रीमद्भगवद्गीता का सांख्ययोग और भक्तियोग मूलक तथ्यो की व्याख्या तथा मन बुद्धि और आत्मा के स्वरूप की अर्थ समन्वित व्याख्या योगेश कुमार रोहि जी को जीवन के निर्माण की प्रक्रिया के यथार्थ बोध के सन्निकट प्रतीत हुई। परिणाम स्वरूप आपको श्रीमद्भगवद्गीता के अनुशीलन से जीवन की एक सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त हुई।
प्राचीन भारतीय संस्कृति के अन्वेषक, अध्येता होने के साथ साथ आप भारतीय शास्त्रों में विशेषतः भारतीय दर्शन वैशेषिक, सांख्य, योग और वेदान्त के सैद्धान्तिक विवेचक के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करने में सफल हुए। इसके लिए आपने भारतीय पुराणों का सम्यक् अनुशीलन करना ही उचित समझा तथा महाभारत" वाल्मीकि रामायण आदि महाकाव्यो के अतिरिक्त आपने भारतीय आध्यात्मिकता के दिग्दर्शन उपनिषदों के सम्यक अध्येता के रूप में जीवन का अधिकांश समय व्यतीत किया है।
श्री योगेश रोहि जी अध्ययन और ज्ञानार्जन कार्य अपने गृह क्षेत्र में ही रहकर किया और भारतीय संस्कृति के अतिरिक्त विश्व की भारोपीय संस्कृतियों के समता मूलक तथ्यों के शोध का कार्य प्रशस्त किया।
भाषा विज्ञान के क्षेत्र में आपकी पकड़ अधिक प्रसंशनीय है। आपके भाषा अध्ययन के विषय भारत और यूरोप की प्राचीन सांस्कृतिक भाषाएँ रहीं जिसमे संस्कृत ,ग्रीक, लैटिन, और फ्रॉञ्च आदि की शब्द व्युत्पत्ति (Etymology) में गहन रूचि थी।
एक मध्यम किसान परिवार में जन्म, फिर सत्संग से जुड़ाव, फिर लगातार अध्ययन,और समाज के साथ आपके अनवरत वैचारिक विमर्श ने जीवन को अनुभवों की एक नव्यता प्रदान की और गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज के मार्गदर्शन में "श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" और "यदुवंश संहिता" जैसी (दो) महत्वपूर्ण किताबों को लिखकर श्रीकृष्ण भक्तों के लिए भक्ति का एक उत्तम मार्ग प्रशस्त किया।
आप वर्तमान में गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था के गोपाचार्य हंस पद को सुशोभित कर रहे हैं। इसके साथ आप इस महत्वपूर्ण संस्था के राष्ट्रीय इकाई उत्तर प्रदेश- का अध्यक्ष पद भी सम्हाल रहे हैं।
(5)- जाहल बेन अहीर
जाहर बेन अहीर का जन्म गुजरात के भावनगर जिले में हुआ है। ये देवा भाई अहीर की सुपुत्री हैं। जाहल बेन अहीर वर्तमान में गुजरात की एक प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता और वक्ता हैं, जो मुख्य रूप से यदुवंशी अहीर समाज के इतिहास, संस्कृति और एकता के लिए कार्य करती हैं। ये यादव समाज सेवा विकास ट्रस्ट (YSSVT) गुजरात की वर्तमान अध्यक्षा हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य- समाज की बेटियों को उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित करना और उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना तथा फिजूलखर्ची और दहेज प्रथा को रोकना है। इनके द्वारा किए जाने वाले प्रमुख सामाजिक कार्य निम्नलिखित है-
(1)- जाहल बेन पूरे भारत में घूम-घूम कर अहीर समाज को उनके गौरवशाली इतिहास और क्षत्रिय परम्पराओं से परिचित कराती हैं।
(2)- ये दहेज मुक्त शादियों और सामूहिक विवाह सम्मेलनों के आयोजन में सक्रिय भूमिका निभाती हैं। उन्होंने पिछले 10 वर्षों से अधिक समय से गुजरात के तलाजा (भावनगर) में सामूहिक विवाह सम्मेलनों का सफल आयोजन कर रही हैं। उनके वैवाहिक आयोजनों का मुख्य उद्देश्य समाज में व्याप्त दहेज प्रथा को समाप्त करना और सादगीपूर्ण विवाह को बढ़ावा देना है। उनका कहना है कि-"शादियों में दहेज देने के बजाय अपनी बेटियों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर निवेश करें ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें"।
(3)- ये अहीर समाज को उनके क्षत्रिय गौरव और भगवान श्रीकृष्ण के वंशज होने के इतिहास से परिचित कराती हैं और एकजुट होने की अपील करती हैं। तथा अहीर/यादव समुदाय से अपनी खुद की पहचान और संस्कृति को बचाने की सदैव अपील करती रहती हैं।
(4)- ये सोशल मीडिया और सार्वजनिक सभाओं के माध्यम से अहीर/यादव समुदाय से अपनी पहचान और संस्कृति को बचाने की सदैव अपील करती रहती हैं।
(5)- ये सितंबर 2024 में भावनगर में बहनों की आत्मरक्षा के लिए 151 अहिराणियो को कटार वितरण करने का एक विशिष्ट कार्यक्रम आयोजित किया था। और कहा कि- देश की सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए अहीर रेजिमेंट' का गठन अति आवश्यक है।
(5)- ये *रास* को भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति का मुख्य साधन मानतीं हैं और इसे जन-जन तक पहुँचाना भी चाहतीं हैं। इसके लिए इन्होंने सितंबर 2023 को द्वारका में 37,000 से अधिक अहिराणियों को लेकर महारास का आयोजन कर विश्व रिकॉर्ड बनाया।
(6)- शैलेन्द्र सिंह यादव (इटावा)
समाजसेवी श्री शैलेन्द्र सिंह यादव का जन्म- उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के मल्हूपुर (किशनपुरा) गांव के एक कृषक परिवार में हुआ है। इनके पिता स्व० बाबू राम यादव भारतीय सेना में एक सैनिक थे। समाजसेवी श्री शैलेन्द्र सिंह यादव बकेवर इटावा के जनता कॉलेज से एम० कॉम०, एल एल बी० की डिग्री हासिल किया तथा शिक्षा के दौरान इन्होने समय-समय पर फुटबॉल, वॉलीबॉल, हॉकी, कबड्डी और कुश्ती में अच्छा प्रदर्शन किया। ये अपने जीवन के प्रारम्भिक 28 साल की उम्र से ही यादव समाज के इतिहास की खोज कर रहे हैं। इसके साथ ही इन्होंने विगत कई वर्षों से "अखिल भारतीय प्रबुद्ध यादव संगम " नाम के संगठन में प्रदेश सचिव के पद पर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। इन्होंने कुछ वर्षों तक सामाजिक पत्रिका "यादव -शक्ति" का इटावा और औरैया जिले का प्रतिनिधित्व भी किया किन्तु पत्रिका के सम्पादक मण्डल से वैचारिक मतभेद होने के कारण अलग हो गये। समाजसेवी श्री शैलेन्द्र सिंह यादव वर्तमान में भरथना तहसील में वकालत कर रहे हैं। विशेष सूत्रों से पता चला है कि इन्हें "श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था" के इटावा जिले का अध्यक्ष चुन लिया गया है।
(7)- मनोज कुमार यादव (बिहार)
समाजसेवी व श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त श्री मनोज कुमार यादव का जन्म 05 फरवरी 1973 को बिहार की राजधानी पटना के ढेकवाहाचक (परसावां) में हुआ है। इनके पिता का नाम श्री देवेन्द्र नाथ यादव तथा माता का नाम इन्दुमुनि यादव है। श्री मनोज कुमार यादव राजनिति विज्ञान से B.A की डिग्री हासिल करके समाज सेवा में जुट गए।
आप पटना के ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में हर साल बाढ़ से होने वाली क्षति से बचाव के लिए जनता को जागरूक करने का काम किया, तथा गरीब व मलीन बस्तियों के बच्चों को पढ़ने के लिए जागरुकता अभियान चलाया। इससे प्रभावित होकर आपके क्षेत्र की जनता ने पिछली पञ्चायत चुनाव में पटना के शहरी क्षेत्र का सरपञ्च चुना। आप सदैव श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन रहकर गोपेश्वर श्रीकृष्ण की भक्ति का प्रचार-प्रसार करते हैं। वर्तमान में आप "गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था" (G.S.S.K.S) के बिहार राज्य के प्रदेश अध्यक्ष हैं।
(8)- सुनील यादव सुल्तानपुरिया
श्रीकृष्ण भक्त एवं समाज सेवी श्री सुनील यादव का जन्म 01 जनवरी 1993 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिला के ग्राम साढ़ापुर में एक किसान परिवार में हुआ है। इनके पिता का नाम मुनेलाल यादव हैं। सुनील यादव एक सफल कृषक और पशुपालक होने के साथ ही श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त हैं। चट्टी-चौराहे या किसी विशेष मौके पर श्रीकृष्ण भक्ति का प्रचार-प्रसार करने में आपको विशेष महारत हासिल है। जब श्रीकृष्ण साराङ्गिणी पुस्तक लिखी जा रही थी उस समय आपने किसी प्रसंग विशेष पर महत्वपूर्ण सुझाव भी दिया था।
आप यादव समाज की सांस्कृतिक पहचान को बढ़ावा देने के लिए अपने क्षेत्र में विशेष रूप जाने जाते हैं। आप वर्तमान में "गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था" (G.S.S.K.S) के उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर के जिला अध्यक्ष हैं।
(9) कालीशंकर यदुवंशी
काली शंकर यदुवंशी का जन्म 14 अप्रैल 1981 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा (ब्रह्मपुर) क्षेत्र के एक प्रतिष्ठित यादव परिवार में हुआ है। इसके पिता स्वर्गीय मोतीलाल यादव हैं। काली शंकर यदुवंशी की शिक्षा गोरखपुर के गवर्नमेंट जुबली इंटर कॉलेज से हुई है। आप एक राजनेता के साथ साथ एक सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। आप अपनी स्वयं पार्टी (वन भारत सिटीजन पार्टी) के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। आप मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के गोरखपुर क्षेत्र से ताल्लुक रखते हैं और यदुवंश (यादव समाज) की सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान को बढ़ावा देने के लिए जाने जाते हैं।
आप पिछड़ा वर्ग, दलित और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए आवाज उठाते रहते हैं। इसी को ध्यान में रखकर आपने 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में पिछड़ा वर्ग और दलित समाज के सहयोग से एक मजबूत विकल्प बनने का जो लक्ष्य रखा है वह आपके सक्रिय राजनीतिक पहल का सराहनीय कदम है। इसके साथ ही आपने भारतीय सेना में अहीर रेजिमेंट के गठन की मांग को लेकर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौंपे हैं इसके लिए यादव समाज आपका सदैव आभारी रहेगा।
आपके द्वारा गोरखपुर के चौरी-चौरा (ब्रह्मपुर) में 'श्री यदुधाम पीठ' का निर्माण और वहाँ पर यदुवंश के आदिपुरुष महाराज यदु की पहली भव्य प्रतिमा स्थापित करने का जो संकल्प लिया गया है वह निश्चय ही समस्त यदुवंशियों की अस्मिता और गौरव का प्रतीक होगा इसमें कोई संशय नहीं है।
आपके द्वारा सर्वप्रथम चौधरी राजित सिंह यादव की स्मृति में उनके जन्म दिवस (15 अप्रैल) को राष्ट्रीय यादव दिवस' के रूप मनाने का जो सफल अभियान चलाया गया वह हमारे यादव समाज को जागरूक करने का एक सफल अभियान रहा। इसके साथ ही आपने यादवों द्वारा उत्कृष्ट कार्य किये जाने पर उनको श्रीकृष्ण सम्मान देने की जो योजना बनाई है वह भी एक सराहनीय कदम है।
आप श्रीकृष्ण धर्म ट्रस्ट के अध्यक्ष रहकर सांस्कृतिक और धार्मिक पुनर्जागरण के कार्य कर रहे हैं। इसके साथ ही नेशनल ई-गवर्नेंस प्लान (CSC) में राज्य समन्वयक के रूप में भी कार्य किया तथा आप यूपी को-ऑपरेटिव बैंक, लखनऊ के पूर्व निदेशक भी रह चुके हैं।
🫵
अध्याय (12)
संगीत जगत के प्रमुख यादव
इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य- खेल, सिने एवं संगीत जगत के प्रमुख यादवों के बारे में जानकारी देना है। इसको सम्पूर्ण रूप से जानने के लिए- (क,ख,और ग) तीन भागों तथा कई उपभागों में विभाजित किया गया है। जो निम्नलिखित है -
(क)- खेल जगत के प्रमुख यादव
(A) - क्रिकेट
1- सूर्यकुमार यादव 2- कुलदीप यादव 3- उमेश यादव
4- पूनम यादव 5- राधा यादव
(B)- कुस्ती
1- नरसिंह पंचम यादव 2- वीरेंद्र सिंह यादव
3- गुरु हनुमान (विजय पाल यादव)
(ख)- सिने जगत के प्रमुख यादव
1- खेसारी लाल यादव 2- राजपाल यादव 3- लीना यादव 4- पारुल यादव 5- नरसिंह यादव 6- बाबा यादव
(ग)- वाद्य एवं संगीत जगत के प्रमुख यादव
1- हीरालाल यादव 2- काशीनाथ यादव
2- राम कैलाश यादव 4- विहारी लाल यादव
5- निरहुआ 6- संजय यदुवंशी (अवधी गायक)
भाग (A) क्रिकेट
1- सूर्यकुमार यादव
भारतीय क्रिकेट टीम के टी20 कप्तान सूर्यकुमार यादव का जन्म 14 सितंबर 1990 को मुंबई, महाराष्ट्र में हुआ है, लेकिन उनका पैतृक मूल निवास उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के हथौड़ा गाँव है। उनके पिता का नाम अशोक कुमार यादव तथा माता का नाम सपना यादव है।। पिता जी भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) में एक वैज्ञानिक/इंजीनियर के रूप में कार्यरत थे अब मई 2025 में सेवानिवृत्त (Retire) हुए हैं।
सूर्यकुमार यादव वाराणसी में अपने चाचा विनोद कुमार यादव के मार्गदर्शन में क्रिकेट खेलना शुरू किया था। जब वे लगभग 10 वर्ष के थे, तब उनके पिता की नौकरी मुंबई में लगने के कारण उनका पूरा परिवार गाजीपुर से मुंबई स्थानांतरित हो गया।
इन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत शिक्षा से किया। वे मुंबई के पिल्लई कॉलेज ऑफ आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस से बीकॉम किया है और मुंबई के लिए घरेलू क्रिकेट खेलकर अपना करियर शुरू किया।
प्रमुख उपलब्धियाँ
(1)- सूर्यकुमार को मैदान के चारों ओर शॉट खेलने की क्षमता के कारण 'मिस्टर 360' के रूप में जाना जाता है।
(2)- सूर्यकुमार यादव गेंदों के मामले में सबसे तेज़ 3,000 रन पूरे करने वाले बल्लेबाज़ हैं जिन्होंने मात्र 1822 में यह रिकॉर्ड बनाया।
(3)- सूर्यकुमार यादव के नाम T-20 में 4 शतक हैं, जो किसी भी भारतीय द्वारा दूसरे सबसे अधिक हैं। 2024 टी20 वर्ल्ड कप विजेता टीम का हिस्सा थे और फाइनल में उन्होंने डेविड मिलर का ऐतिहासिक कैच पकड़कर जीत पक्की की थी
(4)- सूर्यकुमार यादव लंबे समय तक ICC T20I रैंकिंग में शीर्ष पर रहे हैं और 912 रेटिंग पॉइंट्स हासिल करने वाले दूसरे भारतीय बल्लेबाज हैं।
(5)- रोहित शर्मा के संन्यास के बाद, इनको जुलाई 2024 में उन्हें टी20 टीम का पूर्णकालिक कप्तान नियुक्त किया गया। उनकी कप्तानी में भारत ने एशिया कप 2025 (T20 फॉर्मेट) जीता और श्रीलंका, दक्षिण अफ्रीका एवं इंग्लैंड के खिलाफ टी20 सीरीज में जीत दर्ज की।
(6)- सूर्यकुमार यादव (IPL 2025) में 717 रन बनाकर मुंबई इण्डियंस के लिए एक सीजन में सबसे ज्यादा रन बनाने का रिकॉर्ड बनाया। जिसमें लगातार 16 मैचों में 25 से अधिक रन बनाने का विश्व रिकॉर्ड भी स्थापित किया और सीजन के MVP (मोस्ट वैल्यूएबल प्लेयर) चुने गए। ये भविष्य में और भी रिकॉर्ड बना सकते हैं।
2- कुलदीप यादव
भारतीय क्रिकेटर कुलदीप यादव का जन्म 14 दिसंबर, 1994 को उन्नाव जिले में हुआ है। इनके पिता का नाम राम सिंह यादव एक ईंट भट्ठे के मालिक हैं। तथा इनकी माता का नाम उषा यादव है।
कुलदीप यादव एक ऐसे भारतीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर हैं, जो बाएँ हाथ के अपरम्परागत (चाइनामैन) स्पिनर के रूप में खेलते हैं। ये घरेलू क्रिकेट में उत्तर प्रदेश और इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) 2026 में दिल्ली कैपिटल्स का प्रतिनिधित्व करते हैं। कुलदीप भारतीय टीम के उन प्रमुख सदस्यों में से एक रहे हैं जिन्होंने 2024 टी20 विश्व कप और 2025 चैंपियंस ट्रॉफी जीतने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रमुख उपलब्धियाँ
(1)- ये अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट (वनडे) में दो हैट्रिक लेने वाले पहले भारतीय गेंदबाज हैं।
(2)- कुलदीप यादव, अनिल कुंबले को पीछे छोड़ते हुए 150 वनडे विकेट तक पहुँचने वाले सबसे तेज भारतीय स्पिनर हैं। 2026 की शुरुआत में, वनडे गेंदबाजी रैंकिंग में 8 वें और टेस्ट रैंकिंग में 14 वें स्थान पर काबिज हैं।
(3)- कुलदीप यादव को उनकी अनूठी गेंदबाजी शैली के कारण 'चाइनामैन' कहा जाता है, जिसमें गेंद बाएँ हाथ की कलाई के स्पिनर द्वारा दाएँ हाथ के बल्लेबाज से दूर की ओर घूमती है। वह अपनी गुगली और फ्लिपर जैसी विविधताओं के लिए जाने जाते हैं।
3- उमेश यादव
क्रिकेटर उमेश यादव का जन्म 25 अक्टूबर 1987 को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला में हुआ है और नागपुर में पले-बढ़े हैं। उनके पिता तिलक यादव कोयला खदान मजदूर थे। इनकी पत्नी तान्या वाधवा है। क्रिकेट में आने से पहले, उमेश यादव पुलिस या सेना में भर्ती होना चाहते थे, लेकिन वे परीक्षाओं में असफल रहे। ये भारतीय क्रिकेट टीम के तेज गेंदबाज हैं, जो मुख्य रूप से टेस्ट क्रिकेट में अपनी 140-150 किमी/घण्टा की गति और घरेलू परिस्थितियों में घातक गेंदबाजी के लिए जाने जाते हैं। 2015 विश्व कप में भारत के लिए सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज थे। इनका टेस्ट क्रिकेट की एक पारी में उच्चतम स्ट्राइक रेट (10 गेंदों में 31 रन) का रिकॉर्ड भी दर्ज है, जो उन्होंने 2019 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ बनाया था।
4- पूनम यादव
क्रिकेटर पूनम यादव का जन्म 24 अगस्त 1991 को उत्तर प्रदेश के जिला मैनपुरी में हुआ है। इनके पिता रघुवीर सिंह यादव एक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी हैं तथा इनकी माँ मुन्ना देवी एक गृहिणी हैं। पूनम यादव एक अनुभवी भारतीय अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेटर हैं, जो मुख्य रूप से अपनी घातक लेग-ब्रेक गुगली गेंदबाजी के लिए जानी जाती हैं। ये टी20 अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट में भारत की ओर से सबसे सफल गेंदबाजों में से एक हैं।
प्रमुख उपलब्धियाँ
पूनम यादव ने 2013 में अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण किया और तब से वह भारतीय स्पिन गेंदबाजी का एक प्रमुख हिस्सा रही हैं। पूनम यादव भारत के लिए महिला टी20 अंतरराष्ट्रीय (WT20I) में 98 विकेट के साथ दूसरी सबसे अधिक विकेट लेने वाली गेंदबाज हैं।
2017 महिला वनडे विश्व कप और 2020 टी20 विश्व कप के फाइनल में पहुंचने वाली भारतीय टीम का महत्वपूर्ण हिस्सा थीं।
उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए पूनम यादव को 2019 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
5- राधा यादव
राधा यादव का जन्म 21 अप्रैल 2000 को मुंबई, महाराष्ट्र में हुआ। हांलांकि इनका परिवार मूल रूप से उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के अजोशी गाँव से है। राधा यादव का प्रारंभिक जीवन काफी संघर्षपूर्ण रहा। उनके पिता ओमप्रकाश यादव मुंबई में सब्जी और दूध की एक छोटी दुकान चलाते थे और उनका परिवार 225-250 वर्ग फुट के एक छोटे से घर में रहता था।
राधा यादव एक प्रमुख भारतीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर हैं, जो मुख्य रूप से बाएँ हाथ की स्पिनर के रूप में खेलती हैं। 2026 तक, वह भारतीय महिला टीम की एक महत्वपूर्ण सदस्य हैं और उन्होंने हाल ही में 2025 महिला क्रिकेट विश्व कप में भारतीय टीम की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
प्रमुख उपलब्धियाँ
राधा यादव ने 13 फरवरी 2018 को दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टी20 (T20I) में और 14 मार्च 2021 को दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ ही वनडे (ODI) में पदार्पण किया।
राधा यादव 2025 महिला क्रिकेट विश्व कप विजेता भारतीय टीम की सदस्य रहीं। तथा 2018 टी20 विश्व कप में वह भारत के लिए संयुक्त रूप से सबसे ज्यादा विकेट (8 विकेट) लेने वाली गेंदबाज थीं। वह इस टूर्नामेंट में 5 विकेट लेने वाली पहली खिलाड़ी बनीं। इन्हें भारतीय टीम की सबसे बेहतरीन फील्डर्स में से एक माना जाता है।
(B)- कुस्ती
1- नरसिंह पंचम यादव
नरसिंह पंचम यादव का जन्म 6 अगस्त 1989 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के चोलापुर ब्लॉक के नीमा गाँव में हुआ है। इनके पिता का नाम पंचम यादव है तथा माता का नाम भुलना देवी है। नरसिंह के पिता स्वयं एक अच्छे पहलवान थे। उन्होंने ही नरसिंह को कुश्ती के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। नरसिंह के बड़े भाई, विनोद यादव, भी एक पहलवान हैं और वर्तमान में भारतीय रेलवे में कार्यरत हैं।
नरसिंह पंचम यादव मुख्य रूप से 74 किलोग्राम फ्रीस्टाइल वर्ग में प्रतिस्पर्धा करते हैं। इन्हें अप्रैल 2024 में भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) के एथलीट आयोग के अध्यक्ष चुना गया। वर्तमान में ये मुंबई पुलिस उपायुक्त के पद पर तैनात हैं।
प्रमुख उपलब्धियाँ
नरसिंह पंचम यादव एक विशिष्ट भारतीय फ्रीस्टाइल पहलवान हैं, जिन्होंने 2010 राष्ट्रमंडल खेलों (74 किग्रा) में स्वर्ण पदक जीतकर अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई। उन्होंने 2015 विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में कांस्य पदक के साथ रियो ओलंपिक 2016 के लिए कोटा हासिल किया और लगातार तीन बार (2011-2013) 'महाराष्ट्र केसरी' का प्रतिष्ठित खिताब जीता। उन्हें 2012 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
2- वीरेंद्र सिंह यादव
पहलवान वीरेंद्र सिंह यादव हरियाणा के झज्जर जिले के एक प्रसिद्ध मूक-बधिर भारतीय फ्रीस्टाइल पहलवान हैं। इनका जन्म: 1 अप्रैल 1986 को ससरोली गाँव, झज्जर (हरियाणा) में हुआ है। इनके पिता अजीत सिंह यादव हैं जो (CISF) में अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हैं। इनकी माता का नाम मन्ना देवी है। इन्हें गूंगा पहलवान' के नाम से भी जाना जाता है जो भारत के
सबसे सफल बधिर (Deaf) एथलीटों में से एक हैं। उनके जीवन और संघर्ष पर 'गूंगा पहलवान' नाम से एक राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी बनी है।
प्रमुख उपलब्धियाँ
वीरेंद्र सिंह यादव ने बधिर ओलंपिक- 2005 (मेलबर्न), 2013 (सोफिया), और 2017 (सैमसन) में स्वर्ण पदक और 2009 (ताइपे) में कांस्य पदक जीता।
भारत सरकार द्वारा चौथा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्म श्री (2021) तथा खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए उन्हें 2015 में अर्जुन पुरस्कार मिला।
3- गुरु हनुमान (विजय पाल यादव)
गुरु हनुमान जिनका नाम विजय पाल यादव था, का जन्म राजस्थान के झुंझुनू जिले के चिड़ावा (Chirawa) कस्बे में हुआ था। इनके पिता का नाम ईश्वर दत्त यादव था। विजय पाल यादव आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया और भारतीय कुश्ती को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए द्रोणाचार्य पुरस्कार और पद्म श्री जैसे सम्मान प्राप्त किया।
उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने और ब्रह्मचर्य का पालन किया। वे अक्सर कहते थे, "मैंने कुश्ती से शादी की है"।
गुरु हनुमा का निधन 24 मई 1999 को हरिद्वार जाते समय मेरठ के पास एक कार दुर्घटना में हुआ था। उनकी याद में नई दिल्ली के कल्याण विहार स्टेडियम में उनकी एक प्रतिमा भी स्थापित की गई है।
प्रमुख उपलब्धियाँ
इनके मार्गदर्शन में दारा सिंह, गुरु सतपाल, सुशील कुमार, करतार सिंह और योगेश्वर दत्त जैसे दिग्गज पहलवानों ने प्रशिक्षण लिया।
इनके तीन शिष्य (सुदेश कुमार, प्रेम नाथ और वेद प्रकाश) ने 1972 के कार्डिफ कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीते थे।
इनको भारत सरकार द्वारा 1983 में पद्मश्री से सम्मानित तथा 1987-88 में खेल प्रशिक्षकों के लिए सर्वोच्च पुरस्कार, द्रोणाचार्य पुरस्कार दिया गया।
(ख)- सिने जगत के प्रमुख यादव
1- खेसारी लाल यादव
समाजसेवी, राजनेता, गायक और एक्टर श्री खेसारी लाल यादव उर्फ शत्रुघ्न कुमार यादव का जन्म 15 मार्च 1986 को बिहार के छपरा जिले में हुआ है। खेसारी लाल यादव के पिता का नाम मंगरू लाल यादव है। खेसारी के सुपरस्टार बनने से पहले, उनके पिता ने परिवार चलाने के लिए बहुत मेहनत की। वे दिल्ली में सुबह सड़क किनारे चना बेचते थे और रात में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करते थे। खेसारी लाल अपनी मेहनत और बेहतरीन एक्टिंग के लिए जाने जाते हैं, जो भोजपुरी के सबसे महंगे सितारों में से एक हैं।
उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक लोक गायक के रूप में की थी और पहला हिट एल्बम "माल भेटाई मेला" था। 2012 में "साजन चले ससुराल" से उन्हें फिल्मों में बड़ी पहचान मिली। इसके बाद उन्होंने 'मेहंदी लगा के रखना', 'संघर्ष', 'लिट्टी चोखा' जैसी कई हिट फिल्में दीं।
उन्होंने बॉलीवुड में भी काम किया और 'कोयलांचल' फिल्म के लिए गाना गाया। इसके अलावा, उन्होंने रियलिटी शो 'बिग बॉस 13' में भी भाग लिया था। उनके गाने बहुत लोकप्रिय होते हैं, इस वजह से उन्हें 'ट्रेंडिंग स्टार' के रूप में जाना जाता है। यूट्यूब पर उनके गाने हमेशा ट्रेंड में रहते हैं।
उन्होंने 2025 में सक्रिय राजनीति में कदम रखा और बिहार विधानसभा चुनाव में राजद (RJD) के उम्मीदवार के रूप में छपरा से चुनाव लड़े किन्तु हार गए।
प्रमुख उपलब्धियाँ
2011 में 'साजन चले ससुराल' से उन्हें पहली बड़ी सफलता मिली, जिसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
खेसारी लाल यादव ने अपने करियर में 70 से अधिक फिल्में और 5000 से ज्यादा गाने गा कर महारत हासिल किया।
इनको 2018 में फिल्म 'मेहंदी लगा के रखना के लिए सबरंग फिल्म अवार्ड्स में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक का पुरस्कार मिला।
2017 में इनको दादा साहेब फाल्के अकादमी प्रतिष्ठित सम्मान से नवाजा गया।
भोजपुरी अवार्ड' के तहत उन्हें 2021 और 2022 में सोशल मीडिया किंग' का खिताब दिया गया।
2023 में फिल्म 'बोल राधा बोल' के लिए उन्हें एक बार फिर बेस्ट एक्टर और बेस्ट सिंगर चुना गया।
प्रसिद्ध रैपर बादशाह के साथ मिलकर उन्होंने सुपरहिट गाने "पानी पानी" का भोजपुरी वर्जन बनाया, जो काफी वायरल हुआ।
उन्होंने 2022 में फिल्म 'आशिकी' के माध्यम से पटकथा लेखक के रूप में भी अपनी पहचान बनाई। इसके साथ ही उन्होंने रियलिटी शो 'बिग बॉस 13' में एक प्रतियोगी के रूप में भाग लेकर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई।
खेसारी लाल यादव कई सामाजिक कार्यों के लिए भी जाने जाते हैं उन्होंने एक सार्वजनिक विवाह कार्यक्रम में भाग 11 गरीब लड़कियों की शादी करवाई और दुल्हन को एक-एक मोटरसाइकिल दिया।
2- राजपाल यादव
राजपाल उर्फ नौरंग यादव का जन्म 16 मार्च 1971 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के कुंडरा गाँव में हुआ था। छोटे कद (लगभग 5 फुट 2 इंच) को अपनी कमजोरी न मानकर उन्होंने इसे अपनी पहचान बनाया। वे अब भी हिंदी सिनेमा में एक सक्रिय और प्रिय हास्य अभिनेता हैं। राजपाल यादव का पहला विवाह करुणा से हुआ था, जिनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद उन्होंने राधा से शादी की, जो उनसे उम्र में काफी छोटी हैं।
भारतीय सिनेमा के एक प्रख्यात अभिनेता और हास्य कलाकार हैं, जो अपनी बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग और ऊर्जावान अभिनय के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1999 में फिल्म दिल क्या करे से किया।
उन्हें असली पहचान राम गोपाल वर्मा की फिल्म 'जंगल' (2000) में 'सिप्पा' नामक नकारात्मक भूमिका (विलेन) से मिली, जिसके लिए उन्हें 'सेंसुई स्क्रीन बेस्ट एक्टर' (नेगेटिव रोल) का पुरस्कार भी मिला।
उन्होंने 200 से अधिक फिल्मों में काम किया है। जिसमें प्रमुख रूप से कॉमेडी फ़िल्में- हंगामा, वक़्त: द रेस अगेंस्ट टाइम, चुप चुप के, गरम मसाला, फिर हेरा फेरी, ढोल, और भूल भुलैया (छोटा पंडित) काफी फेमस हैं।
फिल्म "मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूँ" के लिए उनको यश भारती पुरस्कार मिला है।
कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें जनपद रत्न अवार्ड दिया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें फिल्मफेयर और स्क्रीन अवार्ड्स के लिए कई बार नामांकित किया गया है।
बड़े दुःख की बात है कि राजपाल यादव वर्तमान में तिहाड़ जेल में हैं। कारण यह है कि 2010 की उनकी फिल्म 'अता पता लापता' के लिए लिए गए 5 करोड़ रुपये के लोन के चेक बाउंस से जुड़ा है, जो अब ब्याज के साथ लगभग 9 करोड़ रुपये हो चुका है। इस दुःख की घड़ी में यादव समाज सहित सोनू सूद और गुरमीत चौधरी जैसे कई फिल्मी सितारों ने उनका सहयोग करने की इच्छा जताई है।
4- लीना यादव
लीना यादव का जन्म 6 जनवरी 1971 को मध्य प्रदेश में एक भारतीय सेना के जनरल के घर हुआ था। उन्होंने दिल्ली के लेडी श्री राम कॉलेज से इकोनॉमिक्स में स्नातक और मुंबई के सोफिया कॉलेज से मास कम्युनिकेशन किया है। और जाने-माने सिनेमैटोग्राफर असीम बजाज से शादी की है। लीना ने अपने करियर की शुरुआत- लीना ने टेलीविजन उद्योग में एक सम्पादक के रूप में करियर शुरू किया और लगभग 12 वर्षों तक शो का निर्देशन किया। उनकी पहली फीचर फिल्म 'शब्द' (2005) थी। इसके बाद 'तीन पत्ती' (2010) आई, जिसमें अमिताभ बच्चन और बेन किंग्सले ने अभिनय किया।
लीना यादव की सबसे सफल फिल्म 'पार्च्ड' है, जो पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के संघर्षों को उजागर करती है। इस फिल्म ने दुनिया भर के 57 फिल्म समारोहों में भाग लिया और 30 से अधिक अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते।
4- पारुल यादव
पारुल यादव एक प्रसिद्ध भारतीय अभिनेत्री और मॉडल हैं, जिन्हें मुख्य रूप से दक्षिण भारतीय सिनेमा, विशेषकर कन्नड़ फिल्मों में उनके काम के लिए जाना जाता है।
उन्होंने 2004 में तमिल फिल्म 'ड्रीम्स' से अभिनय की शुरुआत की थी। इससे पहले उन्होंने मॉडलिंग और टेलीविजन (जैसे 'भाग्य विधाता') में काम किया था। उन्हें 2012 की कन्नड़ फिल्म 'गोविंदाया नमः' के गाने 'प्यारगे आगबिट्टाइते से जबरदस्त लोकप्रियता मिली।
उनकी फिल्म 'आतगारा' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ कन्नड़ अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।
5- नरसिंह यादव
भारतीय अभिनेता और हास्य कलाकार नरसिंह यादव का जन्म 15 मई, 1963 को भारत के एकोठी, हैदराबाद, तेलंगाना में हुआ था। उनके पिता का नाम रजैया और माता का नाम लक्ष्मी नरसम्मा था।
नरसिंग यादव एक दिग्गज भारतीय अभिनेता थे, जिन्होंने 300 से अधिक तेलुगु फिल्मों के साथ-साथ हिंदी और तमिल सिनेमा में मुख्य रूप से हास्य और खलनायक की भूमिकाएँ निभाईं। उन्होंने 1979 में 'हेमा हिमीलू' से शुरुआत की और क्षणक्षणम और पोकिरी जैसी फिल्मों के लिए प्रसिद्ध थे। 31 दिसंबर 2020 को गुर्दे (किडनी) संबंधी बीमारी के कारण हैदराबाद में उनका निधन हो गया। उनके परिवार में पत्नी चित्रा यादव और एक बेटा है।
उन्होंने रामगोपाल वर्मा की फिल्मों के माध्यम से भी हिंदी सिनेमा में पहचान बनाई। उनकी प्रमुख फिल्मों में बाशा (1995), मास्टर (1997), टैगोर (2003), मास (2004) और अला वैकुंठपुरमूलु (2020) शामिल हैं।
6- बाबा यादव
बाबा यादव उर्फ राजेश कुमार यादव का जन्म 18 फरवरी को हुआ था। ये भारतीय फिल्म उद्योग, विशेष रूप से बंगाली सिनेमा (टॉलीवुड) के एक जाने-माने कोरियोग्राफर और निर्देशक हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1997 में फिल्म 'मोहब्बत' से एक कोरियोग्राफर के रूप में की थी और बाद में निर्देशन की दुनिया में कदम रखा।
उन्होंने 'लगान' (2001) और 'देवदास' (2002) जैसी बड़ी बॉलीवुड फिल्मों में कोरियोग्राफर के रूप में काम किया है। उनके काम को उनकी सटीकता और आधुनिक व पारम्परिक शैलियों के मिश्रण के लिए सराहा जाता है।
उन्होंने 2013 में फिल्म 'बॉस: बॉर्न टू रूल' के साथ निर्देशन की शुरुआत की। उनकी अन्य चर्चित निर्देशित फिल्मों में 'गेम' (2014), 'बादशाह द डॉन' (2016) और 'विलेन' (2018) शामिल हैं।
बाबा यादव ने कई रियलिटी शो में जज और मेंटर की भूमिका भी निभाई है, जहाँ वे युवा डांसरों का मार्गदर्शन करते हैं।
(ग)- संगीत जगत के प्रमुख यादव
1- हीरालाल यादव 2- काशीनाथ यादव
3- राम कैलाश यादव 4- विहारी लाल यादव
5- निरहुआ 6- संजय यदुवंशी (अवधी गायक)
1- हीरालाल यादव
बिरहा सम्राट हीरालाल यादव का जन्म 7 मार्च 1936 को वाराणसी के सरायगोवर्द्धन (चेतगंज) में एक गरीब परिवार में हुआ था। उन्होंने बिरहा की बारीकियाँ लोक गायक रमन दास, होरी और गाटर खलीफा जैसे गुरुओं से सीखीं। उनकी सबसे बड़ी विशेषता उनकी गायकी में शास्त्रीय संगीत का पुट था, जिसने बिरहा को एक विशिष्ट विधा के रूप में स्थापित किया। वे गायकी में 'हीरा-बुल्लू' की प्रसिद्ध जोड़ी के रूप में सात दशकों तक सक्रिय रहे।
वे भोजपुरी लोक संगीत के एक स्तम्भ थे। उनकी सबसे प्रसिद्ध धुनों और गीतों में "सुई के छेदा में हाथी" अत्यंत लोकप्रिय है, जो उनके प्रसिद्ध 'जौनपुर काण्ड' बिरहा संग्रह का हिस्सा है।
उनका निधन 12 मई 2019 को 93 वर्ष की आयु में वाराणसी में हुआ। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने भी उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया था।
प्रमुख उपलब्धियाँ
भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें 2019 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
उन्हें 2015 में उत्तर प्रदेश सरकार का सर्वोच्च नागरिक सम्मान यश भारती दिया गया और 1993-94 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार दिया गया।
2011 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी द्वारा सम्मानित किया गया।
2- काशीनाथ यादव
प्रसिद्ध बिरहा गायक और पूर्व मंत्री काशीनाथ यादव का जन्म उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जनपद के कासिमबाद क्षेत्र के पास स्थित सरौरा गाँव में 11 अक्टूबर 1958 को हुआ था। उन्हें भोजपुरी लोक विधा 'बिरहा' में महारत हासिल करने के कारण 'बिरहा सम्राट' के नाम से भी जाना जाता है।
प्रमुख उपलब्धियाँ
उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से की थी और संस्थापक कांशीराम के करीबी माने जाते थे, जिन्होंने उन्हें पहली बार एमएलसी बनने का मौका दिया था। बाद में वे मुलायम सिंह यादव के सम्पर्क में आए और सपा में शामिल हो गए।
वर्तमान में वे समाजवादी पार्टी (सपा) के वरिष्ठ नेता हैं। मार्च 2021 में उन्हें समाजवादी पार्टी के सांस्कृतिक प्रकोष्ठ का राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया गया था।
वे उत्तर प्रदेश सरकार में राज्य मन्त्री रह चुके हैं और तीन बार उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य (MLC) के रूप में कार्य किया है।
संगीत के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें 2016 में राज्य के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'यश भारती पुरस्कार' से सम्मानित किया था।
3- राम कैलाश यादव
स्वर्गीय राम कैलाश यादव जी का जन्म उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के जसवा गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम रघुवीर था। राम कैलाश यादव एक साधारण किसान परिवार से थे और बचपन में भैंस चराने के साथ-साथ गुनगुनाने का शौक रखते थे, आगे चलकर वे 'बिरहा सम्राट' और बिरहा शिरोमणि बने। उन्होंने अपनी जादुई आवाज और कला के जरिए बिरहा को न केवल देश में, बल्कि विदेशों तक भी पहचान दिलाई।
उनके लोकप्रिय एल्बम और गाने-
उन्होंने कई प्रसिद्ध बिरहा एल्बम दिए, जिनमें 'राम कलेवा', 'सईया गवनवा ले जाई', और 'धनुष यज्ञ' प्रमुख हैं।
धार्मिक और निर्गुणी भजन: उन्होंने धार्मिक कथाओं जैसे 'शिव भक्त महिमा', 'धर्मी हरिश्चंद्र' और 'हरिद्वार की कहानी' को अपनी आवाज दी। इसके अलावा वे निर्गुणी भजनों के लिए भी प्रसिद्ध थे।
गीतकार व संगीतकार: गायन के साथ-साथ वे एक प्रतिभाशाली संगीतकार और गीतकार भी थे, जो खुद के गानों की रचना भी करते थे।
5- निरहुआ
दिनेश लाल यादव उर्फ 'निरहुआ' का जन्म 2 फरवरी 1979 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के टंढवा गाँव में हुआ था। उनकी शादी साल 2000 में मंशा देवी से हुई थी। उनके दो बेटे (आदित्य और अमित) और एक बेटी (अदिति) हैं।
दिनेश लाल यादव, जिन्हें दुनिया "निरहुआ" के नाम से जानती है, भोजपुरी फिल्म जगत के सबसे बड़े सुपरस्टार्स, गायक और राजनेता हैं। उनके बारे में मुख्य बातें यहाँ दी गई हैं:
2003 में आए उनके सुपरहिट संगीत एल्बम 'निरहुआ सटल रहे' की अपार सफलता के बाद उन्हें 'निरहुआ' के नाम से घर-घर में पहचान मिली।
उन्होंने 2006 में फिल्म 'हमका ऐसा वैसा ना समझा' से अभिनय की शुरुआत की। उनकी फिल्म 'निरहुआ रिक्शावाला', 'निरहुआ हिंदुस्तानी' (सीरीज), 'पटना से पाकिस्तान' और 'बॉर्डर' जैसी फिल्में उनकी बड़ी सफलताओं में गिनी जाती हैं।
निरहुआ भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सक्रिय नेता हैं।उन्होंने 2022 के उपचुनाव में आजमगढ़ लोकसभा सीट से जीत हासिल की और 2024 तक वहाँ के सांसद रहे।
6- संजय यदुवंशी (अवधी गायक)
संजय यदुवंशी उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के रहने वाले एक प्रसिद्ध लोक गायक और यूट्यूबर हैं। उन्हें अवधी गानों का पहला सुपरस्टार माना जाता है क्योंकि उन्होंने अवधी भाषा को एक नई पहचान और लोकप्रियता दिलाई है। इनकी लोकप्रियता को इसी से समझ सकते हैं कि- एक बार गोंडा में बृजभूषण शरण सिंह के एक कार्यक्रम (राष्ट्र कथा) के दौरान संजय यदुवंशी को देखने के लिए इतनी भारी भीड़ उमड़ पड़ी कि सुरक्षा कारणों से पुलिस को उन्हें कुछ समय के लिए नजरबंद करना पड़ा था, ताकि अव्यवस्था न फैले।
संजय एक साधारण परिवार से आते हैं; उनके पिता हरियाणा में ऑटो चलाते थे। कभी वे सेना में जाने और UPSC की तैयारी करने का सपना देखते थे, लेकिन आज अपनी गायकी और कॉमेडी के लिए करोड़ों लोगों के बीच लोकप्रिय हैं। वे मुख्य रूप से अवधी में गाते हैं, लेकिन उनके गीतों में हिंदी और भोजपुरी का भी पुट होता है। वे अपने जोशीले और 'रंगबाजी' शैली के गीतों के लिए जाने जाते हैं।
उन्हें असली पहचान (108 पे लदके जाओ) गाने से मिली, जो युवाओं के बीच काफी चर्चित और विवादित भी रहा।
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