सोमवार, 16 मार्च 2026

कृष्ण अदेव-

(1) श्रीकृष्ण के वैदिक साक्ष्य -

सायण आदि भाष्यकारों के अनुसार-
ऋग्वेद के मण्डल अष्टम (8) के  सूक्त (96)  की ऋचा संख्या क्रमशः ( 13 -14 -और 15 )  में कृष्ण से इन्द्र का युद्ध होने का वर्णन मिलता है। जिससे कृष्ण की वैदिक कालीन उपस्थिति ( सत्ता) सिद्ध होती है। जो ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टिकोणों से अतीव महत्वपूर्ण हैं। किन्तु इन भाष्यकारों ने युद्ध वाले प्रसंग की ऋचाओं में आये कुछ शब्दों के अर्थ का पूर्वदुराग्रह से ग्रस्त होकर अनर्थ  करके कृष्ण को असुर या अदेव  रूपों में रूढ़ कर दिया है।

असुर यद्यपि कृष्ण को मूल ऋचा में कहीं नहीं कहा गया है परन्तु उन्हें अदेव पद से  अवश्य सम्बोधित किया गया है। जिसे आधार मान कर वेदों में सायण आदि भाष्यकर्ताओं ने उसी "अदेव" को असुर अथवा दैत्य के परवर्ती व पौराणिक अर्थ में देव जाति के विपरीत असीरिया के एक  जनसमुदाय से सम्बन्धित कर दिया है।
असीरिया के मूल निवासी असुर ही थे।
भाष्यकारों ने ऐसा क्यों किया ? इन्हीं सब प्रश्नों का समाधान यहाँ पर हम विश्लेषणात्मक रूप से प्रस्तुत करते हैं।

सबसे पहले ऋग्वेद की उन तीनों ऋचाओं को देखें,  जिसमे कृष्ण और इन्द्र का युद्ध दर्शाया गया है।

इसके बाद हम उनके वास्तविक अर्थ और अनुवाद को प्रस्तुत करते हैं।

"अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः ।
आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त ॥१३॥

द्रप्समपश्यं विषुणे चरन्तमुपह्वरे नद्यो अंशुमत्याः ।
नभो न कृष्णमवतस्थिवांसमिष्यामि वो वृषणो युध्यताजौ ॥१४॥

अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थेऽधारयत्तन्वं तित्विषाणः ।
विशो अदेवीरभ्याचरन्तीर्बृहस्पतिना युजेन्द्रः ससाहे ॥१५॥

ऋचाओं का संयुक्त सन्दर्भ और अनुवाद सायण भाष्य पर आधारित है।-

सन्दर्भ
इन ऋचाओं में अंशुमती नदी (यमुना का प्राचीन नाम माना जाता है) के तट पर इन्द्र और कृष्ण नामक एक असुर या असुरराज के बीच हुए युद्ध का वर्णन है। यहाँ 'कृष्ण' को दस हजार सैनिकों के साथ इन्द्र को चुनौती देते हुए दिखाया गया है, जिसे इन्द्र बृहस्पति की सहायता से पराजित करते हैं। 

ऋचाओं का संयुक्त अनुवाद-

ऋचा १३:
"गतिशील और पराक्रमी कृष्ण (असुर) दस हजार सैनिकों के साथ अंशुमती नदी के तट पर युद्ध के लिए खड़ा था। इन्द्र ने अपनी शक्ति और बुद्धि से उस (कृष्ण) की गर्जना को भाँप लिया और मनुष्यों के हित के लिए अपनी सेना के साथ उस विनाशकारी असुर का दमन किया।" 

ऋचा १४:
"(इन्द्र अपनी सेना से कहते हैं) मैंने अंशुमती नदी के गुप्त स्थानों और गुफाओं में विचरते हुए उस कृष्ण (असुर) को देखा है, जो काले बादल के समान नदी के जल में छिपा हुआ है। हे वीर योद्धाओं ! मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, तुम युद्ध के मैदान में उतरो और उससे युद्ध करो।" 

ऋचा १५:
"वह कृष्ण (असुर) अपनी चमकती हुई देह के साथ अंशुमती नदी के तट पर स्थित था। तब इन्द्र ने बृहस्पति को अपना सहायक बनाया और देवताओं का विरोध करने वाली उन असुर सेनाओं को, जो चारों ओर से आक्रमण कर रही थीं, पूरी तरह परास्त कर दिया।"

सायण भाष्य के अनुयायी 
इन ऋचाओं में प्रयुक्त शब्दों के गहरे दार्शनिक और प्रतीकात्मक अर्थ इस प्रकार करते हैं-

1. द्रप्स
साधारण अर्थ में इसका अर्थ 'बूँद' या 'कण' होता है, लेकिन यहाँ यह 'गतिशील तत्व' के लिए आया है। दार्शनिक रूप से यह उस भटकती हुई शक्ति का प्रतीक है जो अभी स्थिर नहीं हुई है। कुछ विद्वान इसे 'सोम' की बूँद( Drops) मानते हैं, तो कुछ इसे 'अन्धकार का पुञ्ज' कहते हैं। 

2. अंशुमती
'अंशु' का अर्थ है किरण। अंशुमती का अर्थ हुआ 'किरणों वाली' या 'प्रकाशमयी'। भौतिक स्तर पर: यह कुरुक्षेत्र के पास की एक नदी हो सकती है। आध्यात्मिक स्तर पर: यह 'बुद्धि' या 'चेतना' का प्रतीक है। जब ज्ञान की किरणें (अंशु) मन में बहती हैं, तो वह अंशुमती है। 

3. कृष्ण-
ऋग्वेद के इस सूक्त में 'कृष्ण' किसी व्यक्ति के बजाय 'अन्धकार' का प्रतीक है। यह वह अवरोध है जो प्रकाश को रोकता है। दस हजार (दशभिः सहस्रैः) सेनाऐं हमारी अनगिनत वृत्तियों या बुराइयों को दर्शाती हैं जो चेतना के तट पर घेरा डाले रहती हैं। 

4. इन्द्र और बृहस्पति का योग -
 सायण आदि भाष्य कर्ताओं के अनुसार इन्द्र 'संकल्प शक्ति' हैं और बृहस्पति 'ज्ञान/वाणी'। ऋचा संख्या (१५) स्पष्ट करती है कि केवल बल से काम नहीं चलता, जब संकल्प को ज्ञान (बृहस्पति) का साथ मिलता है, तभी भीतर के 'अदेव' (नासत्य) तत्वों पर विजय मिलती है।

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5- विश-वेदों में  सायण ने विश विशेषण पद का प्रयोग विशो अदेवीर्" के रूप में देवों को इन मानने वाले की प्रजा से किया है।  


इतिहासकारों,भाष्यकारों और शोधकर्ताओं ने ऋग्वेद की इन ऋचाओं (8/96/13-14-15) को अलग-अलग चश्मे से देखा है।इस कारण मुख्य रूप से दो बड़े ऐतिहासिक मत उभरकर सामने आते हैं-

1- जनजातीय संघर्ष का मत 

डी.डी. कौशाम्बी और कई अन्य इतिहासकारों का मानना है कि ऋग्वेद के 'कृष्ण' एक आर्य-पूर्व (Non-Aryan) जनजातीय नायक या नेता थे। उनके अनुसार 'अंशुमती' सम्भवतः यमुना नदी का ही प्राचीन नाम है।

कृष्ण की शक्ति-  उपर्युक्त ऋचा  में 'दशभिः सहस्रैः' (दस हजार ) पद का उल्लेख यह संकेत देता है कि कृष्ण एक शक्तिशाली स्थानीय राजा या कबीले के प्रधान थे।

ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचाऐं इन्द्र (जो ऋग्वेद में किलों को तोड़ने वाले 'पुरन्दर' कहे गए हैं) और स्थानीय कृष्ण कबीले के बीच हुए वास्तविक ऐतिहासिक युद्ध की स्थिति को दर्शाता है।

2- पौराणिक विकास का मत-

कुछ शोधकर्ता इसे 'पौराणिक कृष्ण' के चरित्र निर्माण की प्रारम्भिक सोपान मानते हैं। किन्तु आश्चर्य और दिलचस्प बात यह है कि ऋग्वेद में इन्द्र 'कृष्ण' को हरा रहे हैं, जबकि पुराणों (जैसे गोवर्धन लीला) में श्रीकृष्ण इन्द्र के अहंकार को चूर कर रहे हैं। कृष्ण और इन्द्र के चरित्र तथा पौरुष को लेकर यहाँ दो विरोधाभासी बातें ही हैं।

उपर्युक्त ऋचा में हम कृष्ण, विश, शचि, बृहस्पति आदि पदों के आधार पर कृष्ण के कृष्ण वैदिक और पौराणिक काल की विवेचना अथवा समीक्षा करेंगे-
सायण के भाष्य की समीक्षा-

समीक्षा- नि:सन्देह सायण ने "द्रप्स" पद का वैकल्पिक व आनुमानित अर्थ ही ग्रहण किया हैं। क्योंकि "द्रप्स" पद भारोपीय परिवार की भाषाओं में अंग्रेज़ी शब्द (Drops)के समानार्थी है। जिसका अर्थ "जल-बिन्दु" होता है।

समीक्षा-
अंशुमती पर सायण का भाष्य  भी अभिधा शब्द शक्ति मूलक है। रूढ़ अर्थ नहीं है जोकि वैदिक कथाओं के अनुरूप होना चाहिए। पुराण  वेदों की ही व्याख्याऐं हैं-  पुराणों में अंशुमती पद यमुना नदी का वाचक व उसके लिए रूढ़ है। क्योंकि वह सूर्य की पुत्री बतायी जाती है। यमुना नदी को अंशुमति (और मुख्य रूप से सूर्यसुता, कहने के पीछे पौराणिक और धार्मिक कारण हैं, जो उन्हें सूर्य देव से जोड़ते हैं:
  • सूर्य देव की पुत्री: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यमुना सूर्य देव और संज्ञा की पुत्री हैं। अंशु का अर्थ 'किरण' होता है और अंशुमति का अर्थ 'किरणों वाली' या 'सूर्य की पुत्री' के रूप में लिया जाता है, जो सीधे सूर्य देव से उनके संबंध को दर्शाता है।

समीक्षा-उपर्युक्त ऋचा में आया हुआ कृष्ण शब्द भी लाक्षणिक शब्द शक्ति मूलक है। कृष्ण का धातुज अर्थ "कर्षण-(कृषि -कार्य करने वाला अथवा आकर्षण करने वाला" ही है। और कृषि करने वाले कृषक भी जलवायु और उष्णता के प्रभाव से श्याम वर्ण( साँवले रंग ) के ही होते हैं। और पौराणिक पात्र कृष्ण भी श्यामल (साँवले) रंग के थे जो यमुना की तलहटी में प्राय:  गायें चराया करते थे । इन्द्र और शचि भी दोनों पति- पत्नी के रूप में पौराणिक पात्र हैं जो उपर्युक्त ऋचा में प्रयुक्त है।

समीक्षा- इन्द्र एक पौराणिक पात्र है वेदों में भी एक देव विशेष का नाम इन्द्र जो जो कृष्ण का प्रतिद्वन्द्वी है। अत: उपर्युक्त ऋचा में इन्द्र का वही अर्थ ग्रहण करना चाहिए
और बृहस्पति इन्द्र के गुरु भी पौराणिक पात्र है।

समीक्षा-
वेदों में विश'   एक अत्यन्त महत्वपूर्ण और प्राचीन शब्द है, जो वैदिक सामाजिक संरचना का आधार स्तम्भ था। इसका अर्थ केवल साधारण जनसमूह नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित सामाजिक इकाई से था

वेदों में विश के मुख्य प्राचीन अर्थ निम्नलिखित हैं:
  •  ऋग्वेद में 'विश' का प्रयोग सामान्य जनसमुदाय के लिए किया गया है, जो एक जन (कबीले) का हिस्सा होते थे।
  • वैश्य वर्ग  पुरुषसूक्त (ऋग्वेद) के अनुसार, विश से ही वैश्य वर्ण की उत्पत्ति मानी गई है। वेदों में विश का अर्थ कृषि, पशुपालन  से है, जो समाज की आर्थिक रीढ़ थे।
  • बस्ती या ग्राम (Settlement/Village):  विश' का एक अर्थ उस स्थान या बस्ती से भी है जहाँ लोग रहते थे, जिसे बाद में 'ग्राम' के रूप में जाना गया। यह ग्राम या कबीले का निवास स्थान होता था।
  • प्रजा राजा या कबीले के नेता (जनस्य गोपा) के संदर्भ में, 'विश' का अर्थ उनकी प्रजा या सामान्य नागरिक होता था, जो राजा को कर (बल) देते थे।
  • वैदिक सामाजिक संरचना: ऋग्वैदिक काल में, समाज में 'जन' (कबीला) के बाद 'विश' सबसे महत्वपूर्ण इकाई थी। ऋग्वेद में 'विशाम्पति' शब्द का प्रयोग प्रजा के रक्षक या राजा के लिए किया गया 
  • निष्कर्ष:
वेदों में विश का अर्थ केवल लोग नहीं, बल्कि एक उत्पादक, कृषि-पशुपालक वर्ग है जो अपनी बस्ती में निवास करता था और कबीलाई व्यवस्था में आर्थिक और सामाजिक योगदान देता था। शब्द गोप जाति को समानार्थी कृषि और गोपालन की गतिविधियों से सम्बन्धित जन समुदाय का वाचक रहा है।


इन ऋचाओं के प्रति इतिहासकारों, भाष्यकारों और शोधकर्ताओं के बीच अर्थ विन्यास को लेकर मत-मतान्तर पूर्वाग्रह है।

इस पर कुछ इतिहासकारों का मानना हैं कि समय के साथ समाज की धार्मिक मान्यताओं में बदलाव आया। जिसके परिणामस्वरूप जो 'कृष्ण' ऋग्वेद में एक असुर या अदेव के रूप में चित्रित थे, वे ही बाद में भागवत धर्म के उदय के साथ सर्वोच्च देवता (भगवान श्रीकृष्ण) के रूप में स्थापित हुए।

3- भाषाविद् और निरुक्तकारों का विचार-

वेदों के भाष्यकार सायणाचार्य ने स्पष्ट किया है कि वैदिक 'कृष्ण' एक असुर का नाम है। उनके अनुसार, 'कृष्ण' शब्द का अर्थ 'काले रंग वाला' है, जो किसी व्यक्ति विशेष के बजाय अन्धकार के समूह या काले मेघों की ओर इशारा करता है जो प्रकाश (इन्द्र) को रोक रहे थे। 
कुल मिलाकर यदि भाष्यकार सायणाचार्य की मानें तो ऋग्वेद के कृष्ण गोपेश्वर श्रीकृष्ण नहीं बल्कि कोई काले शरीर का असुर है। ऐसे में भाष्यकार सायणाचार्य की मानें तो  श्रीकृष्ण का वर्णन वेदों में नहीं है। 
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भाषाविज्ञान के विशेषज्ञ व संस्कृत व्याकरणज्ञ और भारोपीय परिवार की भाषाओं के विश्लेषक- गोपाचार्य हंस श्री योगेश कुमार रोहि जी का मत-
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किन्तु इस सम्बन्ध में भाषाविज्ञान के विशेषज्ञ व संस्कृत व्याकरणज्ञ और भारोपीय परिवार की भाषाओं के विश्लेषक- गोपाचार्य हंस श्री योगेश कुमार रोहि जी का मनना है कि "वैदिक ऋचाओं में जिस कृष्ण का उल्लेख हुआ है, वह गोपेश्वर श्रीकृष्ण के लिए ही हुआ है। हाँ ये बात अलग है कि भाष्यकार सायणाचार्य ने श्रीकृष्ण के लिए प्रयुक्त अदेव पद को असुर के अर्थ में भाष्य कर उसे पौराणिक व परवर्ती दैत्य के अर्थ में ग्रहण  किया है। जोकि अप्रासंगिक व कालवाधित है

जिसे व्याकरणीय दृष्टि से भी पूर्णतया स्वीकार्य नहीं किया जा सकता।" क्योंकि इन ऋचाओं में आये कुछ प्रमुख शब्दों को देखा जाए तो उनके व्याकरणीय अर्थ निम्नलिखित हैं-
सर्व प्रथम हम असुर शब्द को ही अपने विश्लेषण का विषय बनाए-  तो असुर शब्द ऋग्वेद में ही अधिकतर वरुण, अग्नि, सूर्य, शिव(रूद्र) और इन्द्र का भी विशेषण व वाचक है।

ऋग्वेद में 'असुर' शब्द का प्रयोग लगभग (105 )बार हुआ है। इनमें से अधिकांश स्थानों पर (लगभग 90 बार) इसका प्रयोग 'प्राणशक्ति से सम्पन्न और प्रज्ञावान् ' के अर्थ में किया गया है। 
मुख्य रूप से यह शब्द इन्द्र, वरुण, अग्नि और रूद्र ( शिव) जैसे देवों के विशेषण के रूप में उनकी दिव्य शक्ति और सामर्थ्य को दर्शाने के लिए उपयोग हुआ है। ऋग्वेद के उत्तरार्ध (विशेषकर दसवें मण्डल) में ही यह शब्द धीरे-धीरे नकारात्मक अर्थों (राक्षस या देव-विरोधी) शक्तियों  में प्रयुक्त होने लगा था। 


स्वयं सायण ऋग्वेद के दशम मण्डल के सूक्त संख्या (10) की ऋचा संख्या (2) में असुर शब्द का अर्थ वरुण देव  के अर्थ में  करते हैं।
जैसे-
"न ते सखा सख्यं वष्ट्येतत्सलक्ष्मा यद्विषुरूपा भवाति ।
महस्पुत्रासो असुरस्य वीरा दिवो धर्तार उर्विया परि ख्यन् ॥२॥

ऋग्वेदः - मण्डल १० सूक्त १० ऋचा २-
सायण भाष्य- महः= महतः “असुरस्य= प्राणवतः प्रज्ञावतो वा प्रजापतेः “पुत्रासः =पुत्रभूताः “वीराः।
प्राण और प्रज्ञा ( तीव्र बुद्धि) से सम्पन्न वरुण देव को असुर कहा दया है। जो नैतिकता और धर्म के अधिष्ठाता देव हैं। 

ऋग्वेद में अग्नि देव को कई स्थानों पर 'असुर' शब्द से सम्बोधित किया गया है, जिसका अर्थ यहाँ शक्तिशाली, प्राणदाता या प्रज्ञा शक्ति से युक्त होता है, न कि दैत्य अथवा राक्षस।
अग्नि के लिए 'असुर' शब्द का प्रयोग करने वाली प्रमुख ऋचा/मन्त्र निम्नलिखित हैं:
  • ऋग्वेद 5.15.1: इस ऋचा में अग्नि को स्पष्ट रूप से असुर कहा गया है:              "प्र वेधसे कवये वेद्याय गिरं भरे यशसे पूर्व्याय।                                      घृतप्रसत्तो असुरः सुशेवो रायो धर्ता धरुणो वस्वो अग्निः ॥१॥   
  • (अनुवाद-: घृत (घी) में वास करने वाले, सुख देने वाले, धन के धारणकर्ता, दिव्य असुर (अग्नि) हमारे यज्ञ में पधारें)।
  • ऋग्वेद 3.3.4: इसमें अग्नि को 'असुर' के रूप में सम्बोधित किया गया है:          "पिता यज्ञानाम्-असुरो विपश्चितां विमानमग्निर्वयुनं च वाघताम् ।          आ विवेश रोदसी भूरिवर्पसा पुरुप्रियो भन्दते धामभिः कविः॥४॥                    
  • ऋग्वेद 2.1.6: इस ऋचा में कहा गया है      त्वमग्ने रुद्रो असुरो महो दिवस्त्वं शर्धो मारुतं पृक्ष ईशिषे ।
    त्वं वातैररुणैर्यासि शंगयस्त्वं पूषा विधतः पासि नु त्मना ॥६॥
    (अर्थ: हे अग्नि ! तुम ही रुद्र हो, तुम ही महान दिव्य असुर हो)। 
मुख्य तथ्य-
  • अग्नि सूक्त (1.1): यद्यपि ऋग्वेद का पहला सूक्त 'अग्नि सूक्त' है, लेकिन 'असुर' शब्द का विशेष प्रयोग ऊपर दिए गयी ऋचाओं (विशेषकर 5.15.1 और 2.1.6) में मिलता है।
त्वमग्ने रुद्रो असुरो महो दिवस्त्वं शर्धो मारुतं पृक्ष ईशिषे (ऋग्वेद 2.1.6)
  • ऋषि: इन मन्त्रों के द्रष्टा विभिन्न ऋषि हैं (जैसे 5.15 के भार्गव)।
वैदिक साहित्य में "असुर" का अर्थ प्रारम्भ में ' प्राणवान'  और प्रज्ञा लाने ही   रहा है, जो बाद के समय में नकारात्मक अर्थों में प्रयुक्त होने लगा।

इन्द्र के लिए असुर विशेषण पद का प्रयोग भी वैदिक है। - देखें निम्नलिखित ऋचा

"तमु त्वा नूनमसुर प्रचेतसं राधो भागमिवेमहे ।
महीव कृत्तिः शरणा त इन्द्र प्र ते सुम्ना नो अश्नवन् ॥६॥
मुख्य शब्दार्थ:
  • असुर: शक्तिशाली (यहाँ इन्द्र के सन्दर्भ में, है  दैत्य के सन्दर्भ में नहीं)।
  • प्रचेतसं: प्रकृष्ट चेतना वाले, बुद्धिमान।
  • राधो: धन, दान, या इष्ट वस्तु।
  • भागमिव: भाग (हिस्से) के समान।
  • कृत्तिः: खाल या चर्म।
यह ऋचा इन्द्र की स्तुति में उनके उदार रूप और भक्तों की रक्षा करने वाले रूप को प्रकट करती है। 
सायण भाष्य के अँश- हे "असुर बलवन् प्राणवन् हे इन्द्र य उक्तगुणोऽस्ति 


वेदों (विशेषकर ऋग्वेद) में 'असुर' शब्द का प्रयोग 
शिव के वैदिक स्वरूप रुद्र के लिए असुर विशेषण पद का  कई स्थानों पर प्रयोग हुआ है, लेकिन यहाँ इसका अर्थ 'राक्षस' न होकर 'अत्यन्त शक्तिशाली', 'प्राणवान' या 'दैवीय गुणों से युक्त' जनसत्ता  है।
वेदों में असुर शब्द शिव के लिए प्रयुक्त होने के प्रमुख सन्दर्भ निम्नलिखित हैं:
  • ऋग्वेद- ऋग्वेद में रुद्र (शिव) को असुर (शक्तिशाली) और देव दोनों कहा गया है। ऋग्वेद में रुद्र को (6) बार असुर के रूप में महिमामण्डित किया गया है।
  • संदर्भ (ऋग्वेद- 1.151.4 - विशेष उल्लेख): इसमें रुद्र के लिए 'असुर' शब्द का प्रयोग उनके भयावह लेकिन शक्तिशाली रूप के लिए किया गया है।
प्र सा क्षि॒तिर॑सुर॒ या महि॑ प्रि॒य ऋता॑वानावृ॒तमा घो॑षथो बृ॒हत्। यु॒वं दि॒वो बृ॑ह॒तो दक्ष॑मा॒भुवं॒ गां न धु॒र्युप॑ युञ्जाथे अ॒पः ॥
  • असुर का वैदिक अर्थ: वेदों के प्रारम्भिक काल में, असुर शब्द का प्रयोग अग्नि, वरुण, सूर्य और रुद्र जैसे देवताओं के लिए किया जाता था, जो 'असु' (प्राण) देने वाले या ज्ञान के स्वामी होते  थे।
निष्कर्ष:
वेदों में शिव (रुद्र) के लिए 'असुर' शब्द का प्रयोग अत्यन्त दिव्य शक्ति (Mighty/Supreme Power) के सन्दर्भ में हुआ है, न कि नकारात्मक अर्थ

अत: सायण  न"असुर" शब्द दो विरोधी अर्थों में प्रस्तुत किया है-
अत: प्रसंग के अनुरूप वैदिक ऋचाओं में असुर का अर्थ "प्राण व प्रज्ञा से सम्पन्न व्यक्ति" के लिए है। परन्तु ऋग्वेद में सायण ने इन सबको अनदेखा किया है। जो अनर्थ का कारण हैं।

विश- शब्द भी वैदिक ऋचाओं में प्रयुक्त है विशेषत: उपर्युक्त ऋचा में विश कृष्ण पक्ष ते जन समुदाय का वाचक है। परन्तु इसका अर्थ तृतीय वर्ण के व्यक्ति वैश्य अथवा कृषि कर्म और गोपालन करने वाले
के अर्थ को ध्वनित करता है। गोप ही ये सब कार्य करने वाले हैं।

ऋग्वेद में कृष्ण और इन्द्र सम्बन्धी युद्ध की विवेचना विस्तृत रूप से हम अपने सम्यक भाष्य के रूप निम्नलिखित रूप से प्रस्तुत करते हैं।
"अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः ।
आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त ॥१३॥ ऋग्वेद_८/९६/१३
अब देखा जाए तो अथर्ववेद में भी ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचा निम्न क्रम में है। जिसमें अदेवी पद कृष्ण के लिए  है।
अथर्ववेद-(20/137/7)

(इयानः) चलता हुआ (अंशुमतीम्) विभागवाली [सीमावाली नदी-म० ८]  पर (अव अतिष्ठत्) ठहरा है। (नृमणाः) नरों के समान मनवाले (इन्द्रः) इन्द्र  ने (तम् धमन्तम्) उस हाँफते हुए को (शच्या) शचि के साथ  (आवत्)- युद्ध किया  और (स्नेहितीः) स्नेहयुक्त (अप अधत्त) हटा लिया है ॥१३॥

टिप्पणी:-
 (धमन्तम्)= उच्छ्वसन्तम्। पराभवेन दीर्घं श्वसन्तम्= हार के द्वारा लम्बी- लम्बी श्वास लेता हुआ। (स्नेहितीः) = सिञ्चन करने वाला।
 स्नेहतिः स्नेहतिर्वधकर्मा-निघ० २।१९। स्वकीया मारणशीलाः सेनाः (नृमणाः) नेतृतुल्यमनस्कः= नेत्रों के समान (अप अधत्त) दूरे धारितवान्निवर्तितवान् = दूर कर दिया ।  ॥

पद का अन्वय= अव । द्रप्सः । अंशुऽमतीम् । अतिष्ठत् । इयानः । कृष्णः । दशऽभिः । सहस्रैः ।आवत् । तम् । इन्द्रः । शच्या । धमन्तम् । अप । स्नेहितीः । नृऽमनाः । अधत्त ॥१३।

शब्दार्थ व व्याकरणिक विश्लेषण-                १-अव= तुम रक्षा करो लोट्लकर  मध्यम पुरुष एकवचन।
२-द्रप्स:= जल से द्रप्स् का पञ्चमी एकवचन यहाँ करण कारक के रूप में  ।
३- अंशुमतीम् = यमुनाम्  –यमुना को अथवा यमुना के पास द्वितीया यहाँ करण कारक के रूप में ।
४-अवतिष्ठत् =  अव उपसर्ग पूर्वक (स्था धातु का तिष्ठ आदेश लङ्लकार रूप)  स्थित हुए।
५- इन्द्र: शच्या -स्वपत्न्या= इन्द्र: पद में प्रथमा विभक्ति एकवचन कर्ता करक  तथा शच्या में शचि के तृत्तीया विभक्ति करणकारक का रूप शचि इन्द्र: की पत्नी का नाम है यह सर्व विदित है।
 ६-धमन्तं= अग्निसंयोगम् कुर्वन्तं  कोलाहलकुर्वन्तंवा। चमकते हुए को अथवा हल्ला करते हुए को।  (ध्मा धातु का धम आदेश तथा +शतृ(अत्) प्रत्यय कर्मणि द्वित्तीया का रूप  एक वचन धमन्तं कृष्ण का विशेषण है ।
७-अप स्नेहिती: = जल में भीगते हुए का।
८-नृमणां( धनानां) 
९-अधत्त= उपहार या धन दिया ।(डुधाञ् (धा)=दानधारणयोर्लङ्लकारे आत्मनेपदीय अन्यपुरुषएकवचने) 

विशेषटिप्पणी- अव धातु
१०-अव्=१- रक्षण २-गति ३-कान्ति ४-प्रीति ५-तृप्ति ६-अवगम ७-प्रवेश ८-श्रवण ९- स्वाम्यर्थ १०-याचन ११-क्रिया। १२ -इच्छा १३- दीप्ति १४-अवाप्ति १५-आलिङ्गन १६-हिंसा १७-दान  १८-वृद्धिषु।                
११-अव् – एक परस्मैपदीय धातु है और धातुपाठ में इसके अनेक अर्थ हैं ।

 प्रकरण के अनुरूप अर्थ ग्रहण करना चाहिए ।
प्रथम पुरुष एक वचन का लङ् लकार(अनद्यतन भूूूतकाल का रूप।
आवत् =प्राप्त किया । 

हिन्दी अर्थ- हे कृष्ण आप यमुना के तट पर स्थित इस जल के रक्षा करने वाले हैं आप इसकी रक्षा करो ! कृष्ण दश हजार गोपों से घिरे हुए हैं। इन्द्र ने अपनी पत्नी शचि के साथ अग्नि से संयोजित होते हुए अर्थात् दैदीप्यमान उस कृष्ण को प्राप्त किया अथवा उनके पास गमन किया  और जल में भीगे हुए कृष्ण को भेंट स्वरूप  धन दिया।
भाष्य-
कृष्णो दशसहस्रैर्गोपै: परिवृत: सन्  अँशुमतीनामधेयाया नद्या:  यमुनाया: तटेऽतिष्ठत् तत्र कृष्णस्य नाम्न: प्रसिद्धं  तं गोपं नद्यार्जलेमध्ये  स्थितं इन्द्रो ददर्श स इन्द्र: स्वपत्न्या शच्या सार्धं आगत्य जले स्निग्धे तं गोपं कृष्णं तस्यानुचरानुपगोपाञ्च अतीवानि धनानि अदात्।

हिन्दी अनुवाद- कृष्ण दश हजार गोपों से घिरे हुए हैं अशुमती अथवा यमुना के तट पर स्थित कृष्ण नाम से प्रसिद्ध उस गोप कृष्ण को इन्द्र ने यमुना नदी के जल में स्थित देखा।
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द्रप्समपश्यं विषुणे चरन्तमुपह्वरे नद्यो अंशुमत्याः ।
नभो न कृष्णमवतस्थिवांसमिष्यामि वो वृषणो युध्यताजौ ॥१४॥

पद का अन्वय= द्र॒प्सम् । अ॒प॒श्य॒म् । विषु॑णे । चर॑न्तम् । उ॒प॒ऽह्व॒रे । न॒द्यः॑ । अं॒शु॒ऽमत्याः॑ ।
नभः॑ । न । कृ॒ष्णम् । अ॒व॒त॒स्थि॒ऽवांस॑म् । इष्या॑मि । वः॒ । वृ॒ष॒णः॒ । युध्य॑त । आ॒जौ ॥१४।।

हिन्दी अर्थ-इन्द्र कहता है कि विभिन्न रूपों में मैंने यमुना के जल को देखा और वहीं अंशुमती नदी के निर्जन प्रदेश में चरते हुए बैल अथवा साँड़ को भी देखा  और इस साँड को युद्ध में लड़ते हुए मैं चाहूगा । अर्थात यह साँड अपने स्थान पर अडिग खडे़  कृष्ण को संग्राम में युद्ध करे ऐसा होते हुए मैं चाहूँगा। जहाँ जल और- (नभ) बादल भी न हो 
(अर्थात कृष्ण की शक्ति मापन के लिए इन्द्र यह सब  इच्छा जाहिर करता है )
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शब्दार्थ व्याकरणिक विश्लेषण-
१-द्र॒प्सम्= जल को कर्मकारक द्वित्तीया।अपश्यम्=अदर्शम्  दृश् धातु का लङ्लकार  (सामान्य भूतकाल ) क्रिया पदरूप - मैंने देखा ।__________________
२- वि + सवन(‌सुन) रूप विषुण -(विभिन्न रूप)।   षु (सु)= प्रसवऐश्वर्ययोः - परस्समैपदीय सवति सोता [ कर्मणि- ]  सुषुवे सुतः सवनः सवः अदादौ (234) सौति स्वादौ षुञ् अभिषवे (51) सुनोति (911) सूनुः, पुं, (सूयते इति । सू + “सुवः कित् ।” उणादिसूत्र्र ३।३५। इति (न:) स:च कित् )

पुत्त्रः । (यथा, रघुः । १ । ९५ ।
“सूनुः =सुनृतवाक् स्रष्टुः विससर्ज्जोदितश्रियम् ) अनुजः । सूर्य्यः । इति मेदिनी ॥ अर्कवृक्षः । इत्यमरः कोश ॥
षत्व विधान सन्धि :-"विसइक्कु हयण्सि षत्व" :- इक् स्वरमयी प्रत्याहार के बाद 'कु(कखगघड•)    'ह तथा यण्प्रत्याहार ( य'व'र'ल) के वर्ण हो और फिर उनके बाद 'स'आए तो वहाँ पर 'स'का'ष'हो जाता है:- यदि 'अ' 'आ' से भिन्न  कोई  स्वर जैैैसे इ उ आदि हो अथवा 'कवर्ग' ह् य् व् र् ल्'  के बाद तवर्गीय 'स' उष्म वर्ण आए तो 'स' का टवर्गीय मूर्धन्य 'ष' ऊष्म वर्ण हो जाता है ।

शर्त यह कि यह "स" आदेश या प्रत्यय का ही होना चाहिए जैसे :- दिक् +सु = दिक्षु । चतुर् + सु = चतुर्षु। हरि+ सु = हरिषु ।भानु+ सु = भानुषु । बालके + सु = बालकेषु । मातृ + सु = मातृषु ।परन्तु अ आ स्वरों के बाद स आने के कारण  ही गंगासु ,लतासु ,और अस्मासु आदि में परिवर्तन नहीं आता है 

परन्तु अ' आ 'स्वरों के बाद स आने के कारण ही गंगासु ,लतासु ,और अस्मासु आदि में परिवर्तन नहीं आता है 'हरि+ सु = हरिषु ।भानु+ सु = भानुषु । बालके + सु = बालकेषु ।मातृ + सु = मातृषु । वि+सम=विषम । वि+सुन =विषुण अथवा विष्+ उणप्रत्यय=विषुण।__________________________

विषुण-विभिन्न रूपी।
३-वृ॒ष॒णश्चर॑न्तम्=  चरते हुए साँड  को।
४-आजौ =  संग्रामे  युद्ध में।
५-अ॒व॒ = उपसर्ग
६- त॒स्थि॒ऽवांस॑म्= तस्थिवस् शब्द का द्वितीया विभक्ति एकवचन का रूप तस्थिवांसम् है । तस्थिवस्=  स्था--क्वसु  स्थितवति (स्थिर) अडिग अथवा जो एक ही स्थान पर खड़ा होते हुए में।
७-व:= युष्मान् - तुम सबको ।  युष्मभ्यम् ।  युष्माकम् । यष्मच्छब्दस्य द्बितीया चतुर्थी षष्ठी बहुवचनान्तरूपोऽयम् इति व्याकरणम् ॥
८-उपह्वरे= निर्जन देशे।
९-वृ॒ष॒णः॒ = साँड ने ।
१०-युध्य॑त= युद्ध करते हुए।
११-आजौ= युद्ध में ।
१२-इष्या॑मि= मैं इच्छा करुँगा।







अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थेऽधारयत्तन्वं तित्विषाणः ।
विशो अदेवीरभ्याचरन्तीर्बृहस्पतिना युजेन्द्रः ससाहे ॥१५॥
______________
अर्थ-कृष्ण ने अंशुमती के जल के नीचे अपने दैदीप्यमान शरीर को अशुमती की गोद में धारण किया जो इनके गोपों - विशों (गोपालन आदि करने वाले -वैश्यवृत्ति सम्पन्न) थे ।  चारो ओर चलती हुई गायों के साथ रहने वाले गोपों को इन्द्र ने बृहस्पति की  सहायता शासन में किया ।

पदपाठ-विच्छेदन :-
द्रप्स:। अंशुऽमत्याः। उपऽस्थे ।अधारयत् । तन्वम् । तित्विषाणः। विशः। अदेवीः । अभि । आऽचरन्तीः। बृहस्पतिना। युजा । इन्द्रः। ससहे॥१५।
शब्दार्थ-
“अध =अथ अधो वा = नीचे
“द्रप्सः= द्रव्य अथवा जल बिन्दु: ( Drops)
“अंशुमत्याः=यमुनाया: नद्याः = यमुना नदी के “(उपस्थे=समीपे) पास में अथवा गोद में।
“त्विष धातु =दीप्तौ अर्थे = त्विष् धातु का अर्थ- चमकना है।
तित्विषाणः= दीप्यमानः= चमकता हुआ।
 सन् =भवन्= होता हुआ।
“तन्वम् द्वितीया कर्मणि वैदिके रूपे = शरीरम् 
“(अधारयत्  = शरीर धारण किया)।
 परैरहिंस्यत्वेन बिभर्ति । यद्वा । बलप्राप्त्यर्थं स्वशरीरमाहारादिभिरपोषयत्‌ =  बल प्राप्ति  के लिए अपने शरीर को आहार आदि से पोषित( पुष्ट) किया।
“इन्द्रः गत्वा “बृहस्पतिना एतन्नामकेन देवेन “युजा =सहायेन = इन्द्र ने जाकर बृहस्पति के साथ “अदेवीः = देवानाम्  ये न पूजयन्ति इति अदेवी:। कृष्णरूपा इत्यर्थः = जो देवताओं को नहीं पूजता वह कृष्ण  ।

यद्वा । पापयुक्तत्वादस्तुत्याः = अथवा पाप युक्त “आचरन्तीः =आगच्छन्तीः= चलती हुईं। “विशः=गोपालका: = कृषि कर्म और गोपालन करने  वाले "अभि "ससहे षह् (सह्) लिट्लकार (अनद्यतन परोक्ष भूतकाल) । शक्यार्थे =चारो और से सख्ती की अथवा शासन किया ।
 सह्- सह्यति विषह्यति ससाह सेहतुः सिसाहयिषति सुह्यति सुषोह अधेः प्रसहने (1333) इत्यत्र सह्यतेः सहतेर्वा निर्देश इति 

विशेष-
पुराणों में भी कृष्ण समस्त देवों के यज्ञों को बन्द करा देते हैं। क्योंकि उन यज्ञों में निरीह पशुओं का वध होता है। 

इसी सन्दर्भ में हम यह भी सुनिश्चित कर दें की कृष्ण को वैदिक ऋचाओं में असुर कहीं नहीं कहा गया है। ऋग्वेद की मूल ऋचा में उपस्थित अदेवी पद का की सायण ने भाष्य "असुर" के समानार्थक किया है। उसी को आधार मान कर वेदों का हिन्दी अनुवाद पढ़ने वाले जन- साधारण ने कृष्ण को असुर मान लिया है।
विशेष=असुर शब्द का प्रयोग तो कृष्ण के लिए सायण ने अपने भाष्य में ही किया है । अन्यथा मूल ऋचा में असुर पद  न. होकर अदेव पद है ।

परन्तु वैदिक सन्दर्भ में असुर का प्रारम्भिक अर्थ प्रज्ञा तथा प्राणों से युक्त मानवेतर प्राणियों को कहा गया है ।
इसी कारण सायण आचार्य ने कृष्ण को अपने 
ऋग्वेद के अष्टम् मण्डल के सूक्त संख्या 96 की कुछ ऋचाओं के भाष्य में अदेवी: पद के आधार पर  (13,14,15,) में कृष्ण को असुर अथवा अदेव  कहकर कृष्ण का युद्ध इन्द्र से हुआ ऐसा वर्णित है। सायण का सम्पूर्ण भाष्य इस अदेवी पद को लेकर भ्रान्तिजनक है।

परन्तु वैदिक सन्दर्भ में असुर का प्रारम्भिक अर्थ "प्रज्ञा तथा प्राणों से युक्त मानवेतर प्राणियों से है। इन्द्र, वरुण और शिव को भी वेदों में असुर कहा गया है।
अतः उपर्युक्त ऋचा के अनुसार स्पष्ट हुआ कि कृष्ण यमुना की तलहटी में इन्द्र से युद्ध करते हैं। यह बात वैदिक सत्य है। किन्तु श्रीकृष्ण तो वैदिक काल से भी प्राचीन हैं।
मोहनजोदाड़ो की सभ्यता पूर्ववैदिक है।
 इसकी पुष्टि-‌ मोहनजोदाड़ो सभ्यता के विषय में ईस्वी सन् (1929) में हुई खोज के अनुसार पुरातत्व वेत्ता  "अरनेस्त मैके" के द्वारा मोहनजोदाड़ो में हुए उत्खनन में प्राप्त हुए एक पुरातन टैबलेट (भित्तिचित्र) से इस सत्य की पुष्टि होती है। जिसमें दो वृक्षों के बीच खड़े एक बालक का चित्र बना हुआ था।🖐️

जो पूर्णत: भागवत आदि पुराणों के कृष्ण से सम्बद्ध है। और जो शोधकर्ताओं को पुराणों में लिखे कृष्ण द्वारा यमलार्जुन के उद्धार की कथा की ओर ले जाता है। पुराणों का सृजन बुद्ध के परवर्ती काल में हुआ । और कृष्ण की कथाऐं इससे भी पुरानी हैं । वेद बुद्ध से पूर्व भी अस्तित्व में थे और मोहनजोदाड़ो की सभ्यता वेदों से भी पूर्व है।।

अत: कृष्ण बुद्ध से तो प्राचीन हैं ही साथ में वैदिक काल से भी प्राचीन हैं जिनकी उपस्थिति सिन्धु सभ्यता में भी है।

इतना ही नहीं ऋग्वेद के अष्टम मण्डल के अतिरिक्त चौथे वेद ‌अथर्ववेद में भगवान कृष्ण का वर्णन केशी नामक दैत्य  का वध करने वाला बताकर कृष्ण की वैदिक कलीन  उपस्थिति दर्ज कर दी है।

अत: वेदों में भी कृष्ण होने की बात सिद्ध होती है।
नीचे स्पष्ट रूप से शौनक संहिता ,अथर्ववेद  और सामवेद आदि  में कृष्ण का स्पष्ट उल्लेख है।

"यःकृ॒ष्णः के॒श्यसु॑र स्तम्ब॒ज उ॒त तुण्डि॑कः। अ॒राया॑नस्या मु॒ष्काभ्यां॒ भंस॒सोऽप॑ हन्मसि॥"
(अथर्ववेद - काण्ड »8; सूक्त»6; ऋचा»5)
_________
१. ( यः कृष्ण:) = जो कृष्ण,२-(केशी) = केशी नामक  ३- (असुरः) =दैत्य  ४-(स्तम्बजः) जिसके केश गुच्छेदार हैं =  ५-(उत) = और ६- (तुण्डिक:) = कुत्सित मुखवाला है / थूथनवाला है। ७-(अरायान्) = निर्धन पुरुषों को ८-(अस्याः) = इस के ९-(मुष्काभ्याम्) = मुष्को से-अण्डकोषों से  तथा  १०-(भंसस:)भसत् कटिदेशः पृषो० । उपचारात् तत्सम्बन्धिनि पायौ ऋ० १० । १६३ ।  = कटिसन्धिप्रदेश  से  ११- (अपहन्मसि) = दूर करते हैं।

"अनुवाद:- जो कृष्ण केशी दैत्य के गुच्छे दार केशों और उसके विकृत मुख उसके अण्डकोशों तथा इसकी कटि (कमर)आदि भागों को निर्धन लोग दूर करते हैं।
उपर्युक्त ऋचा में वर्णन है कि कृष्ण केशी दैत्य के गुच्छे दार केशों और उसके विकृत मुख और अण्डकोशों तथा कटि प्रदेश (कमर,)आदि के स्पर्श से गरीब अथवा निर्धन लोगों को तथा  स्वयं को भी कृष्ण दूर करते हैं।

भागवत पुराण में दशम स्कन्ध, अध्याय 36, श्लोक 16-26 तथा अध्याय 37, श्लोक 1-9 वर्णन है कि कृष्ण-भगवान का अत्यन्त कोमल कर(हाथ) कमल भी उस समय ऐसा हो गया, मानो तपाया हुआ लोहा हो।

उसका स्पर्श होते ही केशी के दाँत टूट-टूटकर गिर गये और जैसे जलोदर रोग उपेक्षा कर देने पर बहुत बढ़ जाता है, वैसे ही श्रीकृष्ण का भुजदण्ड उसके मुँह में बढ़ने लगा। 
अचिन्त्यशक्ति भगवान श्रीकृष्ण का हाथ उसके मुँह में इतना बढ़ गया कि उसकी साँस के भी आने-जाने का मार्ग न रहा। अब तो दम घुटने के कारण वह पैर पीटने लगा।

अथर्ववेद (दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व) में संकलित है जिसमें , केशी,= "बालों (केशों )वाले", दैत्य का  पहली बार वर्णन किया गया है    

अर्जुन द्वारा भगवत गीता में भी कृष्ण को तीन बार केशी का हत्यारा कहा गया है- केशव (1.30 और 3.1) और केशी-निषूदन (18.1)। पहले अध्याय (1.30) में, कृष्ण को केशी के हत्यारे के रूप में संबोधित करते हुए, अर्जुन युद्ध के बारे में अपना संदेह व्यक्त करते हैं।

ऋग्वेद १/१०/३/ तथा यजुर्वेद ८/३४ में केशिन् का वर्णन है ।
"युक्ष्वा हि केशिना हरी वृष॑णा कक्ष्यप्रा ।
अथा॑ न इन्द्र सोमपा गिरामुप॑श्रुतिं चर ।। 3.।।

पदों का अन्वयार्थ:-
युक्ष्वा हि= संयुक्त ही होओ। केशिना= केशी दैत्य के संहारक अथवा सुन्दर केशों वाले के द्वारा   । हरी = हरि भगवान कृष्ण के द्वारा। वृषणा= वृषणों के द्वारा। कक्ष्यप्रा= काँछ के साथ। अथा= और। इन्द्र=  इन्द्र। सोमपा= सोमपा। नः= हमारी।गिरामुप॑श्रुतिं= सुनी हुई वाणी को । चर = दूत ।
"अनुवाद:- केशी दैत्य का बध  करने वाले हरि के साथा जुड़ जाओ ! जिसने केशी दैत्य के अण्डकोष और काँख पकड़ कर फैंक दिया। हे सोमपान करने वाले इन्द्र ! हमारी सुनी हुई स्तुतिगीत को कृष्ण तक दूत के रूप में पहुचाऐं।३।
_____________
कृष्ण अवतरण की भविष्यवाणी वेद में प्राप्त होती है।****

अब पुनः बात करते हैं पुनः यजुर्वेद » अध्याय:-32» ऋचा 5 की जो इस प्रकार है- 
"यस्मा॑ज्जा॒तं न पु॒रा किं च॒नैव य आ॑ब॒भूव॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑। प्र॒जाप॑तिः प्र॒जया॑ सꣳररा॒णस्त्रीणि॒ ज्योती॑षि सचते॒ स॒ षो॑ड॒शी ॥५ ॥

पद पाठ-
यस्मा॑त्। जा॒तम्। न। पु॒रा। किम्। च॒न। ए॒व। यः। आ॒ब॒भूवेत्या॑ऽऽ ब॒भूव॑। भुव॑नानि। विश्वा॑ ॥ प्र॒जाऽप॑ति॒रिति॑ प्र॒जाऽप॑तिः। प्र॒जया॑ स॒ꣳर॒रा॒ण इति॑ सम्ऽररा॒णः। त्रीणि॑। ज्योती॑षि। स॒च॒ते॒। सः। षो॒ड॒शी ॥५ ॥

पदों के अर्थ और अन्वय- को देखा जाए तो कुछ इस प्रकार से होगा "हे मनुष्यो ! (यस्मात्) जिस  से (पुरा) पहिले (किम्, चन) कुछ भी (न जातम्) नहीं उत्पन्न हुआ, (यः) जो  (आबभूव) हुआ जिसमें (विश्वा) सब (भुवनानि) लोक  वर्त्तमान हैं, (सः एव) वही (षोडशी) सोलह कलावाला (प्रजया) प्रजा के साथ (सम्, रराणः) सम्यक्  रमता हुआ (प्रजापतिः) प्रजा का पालक अधिष्ठाता (त्रीणि) तीन (ज्योतीषिं)ज्योतियों  को (सचते) संयुक्त करता है ॥५ ॥

"अनुवाद:-  हे मनुष्यों जिससे पहले कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ। जिससे सम्पूर्ण विश्व और सभी लोक उत्पन्न हुए वही ईश्वर !  सोलह कलाओं से युक्त प्रजा के साथ आनन्द करता हुआ। प्रजा पालक रूप में  तीन ज्योतियों में जुड़ता है।
उपर्युक्त वैदिक ऋचा कृष्ण के अवतरण की भविष्यवाणी करती है।
पुराणों के अनुसार कृष्ण सोलह कलाओं से भी युक्त थे। इस बात का संकेत हमें हे वेदों में भी मिलता है।

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