शनिवार, 14 मार्च 2026

वैदिक काल में कृष्ण के साक्ष्य-

वैदिक काल में कृष्ण के साक्ष्य-

सत्य तो यही है कि कृष्ण को ऋग्वेद आदि वैदिक ग्रन्थों अदेव कहा है । और अदेव का अर्थ होता है "किसी देव अथवा देवता की सत्ता को न मानने वाला"



अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थेऽधारयत्तन्वं तित्विषाणः ।
विशो अदेवीरभ्याचरन्तीर्बृहस्पतिना युजेन्द्रः ससाहे ॥१५॥
______________
अर्थ-कृष्ण ने अंशुमती के जल के नीचे अपने दैदीप्यमान शरीर को अशुमती की गोद में धारण किया  जो इनके गोपों - विशों (गोपालन आदि करने वाले -वैश्यवृत्ति सम्पन्न) थे ।  चारो ओर चलती हुई गायों के साथ रहने वाले गोपों को इन्द्र ने बृहस्पति की  सहायता से दमन किया ।
पदपाठ-विच्छेदन :-
। द्रप्स:। अंशुऽमत्याः। उपऽस्थे ।अधारयत् । तन्वम् । तित्विषाणः। विशः। अदेवीः ।अभि । आऽचरन्तीः। बृहस्पतिना। युजा । इन्द्रः। ससहे॥१५।
“अध =अथ अधो वा “द्रप्सः= द्रव्य अथवा जल बिन्दु: “अंशुमत्याः= यमुनाया: नद्याः“(उपस्थे=समीपे “(  त्विष धातु =दीप्तौ अर्थे  तित्विषाणः= दीप्यमानः)( सन् =भवन् ) “(तन्वम् द्वितीया कर्मणि वैदिके रूपे = शरीरम्) “(अधारयत्  = शरीर धारण किया)। परैरहिंस्यत्वेन बिभर्ति । यद्वा । बलप्राप्त्यर्थं स्वशरीरमाहारादिभिरपोषयत्‌ । तत्र “इन्द्रः गत्वा “बृहस्पतिना एतन्नामकेन देवेन “युजा =सहायेन “अदेवीः = देवानाम्  ये न पूजयन्ति इति अदेवी:। कृष्णरूपा इत्यर्थः । 
यद्वा । पापयुक्तत्वादस्तुत्याः । “आचरन्तीः =आगच्छन्तीः “विशः=गोपालका:"अभि "ससहे षह्(सह्) लिट्लकार (अनद्यतन परोक्ष भूतकाल) । शक्यार्थे - चारो और से सख्ती की ।
 सह्- सह्यति विषह्यति ससाह सेहतुः सिसाहयिषति सुह्यति सुषोह अधेः प्रसहने (1333) इत्यत्र सह्यतेः सहतेर्वा निर्देश इति 



पुराणों में भी कृष्ण समस्त देवों के यज्ञों को बन्द करा देते हैं। क्योंकि उन यज्ञों में निरीह पशुओं का वध होता है। ऋग्वेद की वह ऋचा जिसमें कृष्ण को अदेव पद से सम्बोधित किया गया है और इन्द्र के साथ कृष्ण के युद्ध को दर्शाया गया है। निम्नलिखित है।

"अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थेऽधारयत्तन्वं तित्विषाणः ।
विशो अदेवीरभ्याचरन्तीर्बृहस्पतिना युजेन्द्रः ससाहे ॥१५॥
______________

अर्थ-कृष्ण ने अंशुमती के जल के नीचे अपने दैदीप्यमान शरीर को अशुमती की गोद में ही धारण किया  इनके साथ गोप -(विश) (गोपालन आदि करने वाले -वैश्यवृत्ति सम्पन्न ) जन भी थे । उन  चारों ओर चलती हुई गायों के साथ रहने वाले गोपों को इन्द्र ने बृहस्पति की  सहायता से शासन मे करना चाहा ।
पदपाठ-विच्छेदन :-
। द्रप्स:। अंशुऽमत्याः। उपऽस्थे ।अधारयत् । तन्वम् । तित्विषाणः। विशः। अदेवीः ।अभि । आऽचरन्तीः। बृहस्पतिना। युजा । इन्द्रः। ससहे॥१५।
“अध =अथ अधो वा। “द्रप्सः= द्रव्य अथवा जल बिन्दु:। “अंशुमत्याः= यमुनाया: नद्याः“(उपस्थे=समीपे क्रोडे वा ।“(  त्विष धातु =दीप्तौ अर्थे  तित्विषाणः= दीप्यमानः)। ( सन् =भवन् ) “(तन्वम् द्वितीया कर्मणि वैदिके रूपे = शरीरम्) “(अधारयत्  = शरीर धारण किया)। परैरहिंस्यत्वेन बिभर्ति । यद्वा । बलप्राप्त्यर्थं स्वशरीरमाहारादिभिरपोषयत्‌ । तत्र “इन्द्रः गत्वा “बृहस्पतिना एतन्नामकेन देवेन “युजा =सहायेन
_________________________________
अदेवीः = देवानाम्  ये न पूजयन्ति इति अदेवी:। कृष्णरूपा इत्यर्थः । 
यद्वा । पापयुक्तत्वादस्तुत्याः । “आचरन्तीः =आगच्छन्तीः “विशः=गोपालका:"अभि "ससहे षह्(सह्) लिट्लकार (अनद्यतन परोक्ष भूतकाल) । शक्यार्थे - चारो और से सख्ती की ।
 सह्- सह्यति विषह्यति ससाह सेहतुः सिसाहयिषति सुह्यति सुषोह अधेः प्रसहने (1333) इत्यत्र सह्यतेः सहतेर्वा निर्देश इति शक्तावुपेक्षायाञ्च उदाहृतं तमधिचक्रे इति ।

इसी सन्दर्भ में हम यह भी सुनिश्चित कर दें की कृष्ण को वैदिक ऋचाओं में असुर कहीं नहीं कहा गया है। ऋग्वेद की मूल ऋचा में उपस्थित  अदेवी पद का सायण ने भाष्य असुर के समानार्थक किया है। उसी को आधार मान कर वेदों का हिन्दी अनुवाद पढ़ने वालों ने कृष्ण को असुर मान लिया है।
परन्तु वैदिक सन्दर्भ में असुर का प्रारम्भिक अर्थ "प्रज्ञा तथा प्राणों से युक्त मानवेतर प्राणियों से है। इन्द्र वरुण और शिव को भी वेदों में असुर कहा गया है।

---उपर्युक्त ऋचा के अनुसार कृष्ण  यमुना की तलहटी में इन्द्र से युद्ध करते हैं 
मोहनजोदाड़ो सभ्यता के विषय में (1929) में हुई खोज के अनुसार पुरातत्व वेत्ता  "अरनेस्त मैके" के द्वारा मोहनजोदाड़ो में हुए उत्खनन में एक पुरातन टैबलेट (भित्तिचित्र) मिला है।
जिसमें दो वृक्षों के बीच खड़े एक बालक का चित्र बना हुआ था ।
जो भागवत आदि पुराणों के कृष्ण से सम्बद्ध है। और जो पुराणों में लिखे कृष्ण द्वारा यमलार्जुन के उद्धार की कथा की ओर ले जाता है। पुराणों का सृजन बुद्ध के परवर्ती काल में हुआ । और कृष्ण की कथाऐं इससे भी पुरानी हैं । वेद बुद्ध से पूर्व भी अस्तित्व में थे। अत: कृष्ण बुद्ध से प्राचीन हैं।

अथर्ववेद में भी ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचा निम्न क्रम मे है। जिसमें अदेवी पद है।

अथर्ववेद-(20/137/7)
ऋषिः - तिरश्चीराङ्गिरसो द्युतानो वा
देवता - इन्द्रः छन्दः - त्रिष्टुप् । सूक्तम् - (१३७)
"अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः। आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त ॥7।

इस अथर्ववेद की ऋचा का पद पाठ अर्थ सहित नीचे दे रहे हैं।

(इयानः) चलता हुआ (अंशुमतीम्) विभागवाली [सीमावाली नदी-म० ८]  पर (अव अतिष्ठत्) ठहरा है। (नृमणाः) नरों के समान मनवाले (इन्द्रः) इन्द्र  ने (तम् धमन्तम्) उस हाँफते हुए को (शच्या) शचि के साथ  (आवत्)-
लङ्(अनद्यतन भूत)
एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःआवत्=युद्ध किया 
 युद्ध किया  और (स्नेहितीः) स्नेहयुक्त (अप अधत्त) हटा लिया है ॥७॥

टिप्पणी:-
 (धमन्तम्) उच्छ्वसन्तम्। पराभवेन दीर्घं श्वसन्तम् (स्नेहितीः) स्नेहतिः स्नेहतिर्वधकर्मा-निघ० २।१९। स्वकीया मारणशीलाः सेनाः (नृमणाः) नेतृतुल्यमनस्कः (अप अधत्त) दूरे धारितवान् निवर्तितवान् ॥


विशेष=असुर शब्द का प्रयोग तो कृष्ण के लिए सायण ने अपने भाष्य में ही किया है । अन्यथा मूल ऋचा में असुर पद  न. होकर अदेव पद है ।
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परन्तु वैदिक सन्दर्भ में असुर का प्रारम्भिक अर्थ प्रज्ञा तथा प्राणों से युक्त मानवेतर प्राणियों को कहा गया है ।
इसी कारण सायण आचार्य ने कृष्ण को अपने 
ऋग्वेद के अष्टम् मण्डल के सूक्त संख्या 96 की कुछ ऋचाओं के भाष्य में अदेवी: पद के आधार पर  (13,14,15,) में कृष्ण को असुर अथवा अदेव  कहकर कृष्ण का युद्ध इन्द्र से हुआ ऐसा वर्णित है ।

सायण का सम्पूर्ण भाष्य इस अदेवी पद को लेकर भ्रान्तिजनक  है।


ऋग्वेद की हम उन तीनों ऋचाओं को क्रमशः प्रस्तुत करते हैं। जिसमें कृष्ण और इन्द्र का युद्ध दर्शाया गया है।

"अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः ।
आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त ॥१३॥
द्रप्समपश्यं विषुणे चरन्तमुपह्वरे नद्यो अंशुमत्याः ।
नभो न कृष्णमवतस्थिवांसमिष्यामि वो वृषणो युध्यताजौ ॥१४॥
अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थेऽधारयत्तन्वं तित्विषाणः ।
विशो अदेवीरभ्याचरन्तीर्बृहस्पतिना युजेन्द्रः ससाहे ॥१५॥
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क्रमशः उपर्युक्त तीनों ऋचाओं का पदपाठ-

"अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः ।
आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त ॥१३॥

पद का अन्वय= अव । द्रप्सः । अंशुऽमतीम् । अतिष्ठत् । इयानः । कृष्णः । दशऽभिः । सहस्रैः ।आवत् । तम् । इन्द्रः । शच्या । धमन्तम् । अप । स्नेहितीः । नृऽमनाः । अधत्त ॥१३।

शब्दार्थ व व्याकरणिक विश्लेषण-                १-अव= तुम रक्षा करो लोट्लकर  मध्यम पुरुष एकवचन।
२-द्रप्स:= जल से द्रप्स् का पञ्चमी एकवचन यहाँ करण कारक के रूप में  ।
३- अंशुमतीम् = यमुनाम्  –यमुना को अथवा यमुना के पास द्वितीया यहाँ करण कारक के रूप में ।
४-अवतिष्ठत् =  अव उपसर्ग पूर्वक (स्था धातु का तिष्ठ आदेश  लङ्लकार रूप)  स्थित हुए।
५- इन्द्र: शच्या -स्वपत्न्या= इन्द्र: पद में प्रथमा विभक्ति एकवचन कर्ता करक  तथा शच्या में शचि के तृत्तीया विभक्ति करणकारक का रूप शचि इन्द्र: की पत्नी का नाम है।।
 ६-धमन्तं= अग्निसंयोगम् कुर्वन्तं  कोलाहलकुर्वन्तंवा। चमकते हुए को अथवा हल्ला करते हुए को।  (ध्मा धातु का धम आदेश तथा +शतृ(अत्) प्रत्यय कर्मणि द्वित्तीया का रूप  एक वचन धमन्तं कृष्ण का विशेषण है  ।
७-अप स्नेहिती: = जल में भीगते हुए का।
८-नृमणां( धनानां) 
९-अधत्त= उपहार या धन दिया ।(डुधाञ् (धा)=दानधारणयोर्लङ्लकारे आत्मनेपदीय अन्यपुरुषएकवचने) 

विशेषटिप्पणी-
१०-अव्=१- रक्षण २-गति ३-कान्ति ४-प्रीति ५-तृप्ति ६-अवगम ७-प्रवेश ८-श्रवण ९- स्वाम्यर्थ १०-याचन ११-क्रिया। १२ -इच्छा १३- दीप्ति १४-अवाप्ति १५-आलिङ्गन १६-हिंसा १७-दान  १८-वृद्धिषु।                
११-अव् – एक परस्मैपदीय धातु है और धातुपाठ में इसके अनेक अर्थ हैं । प्रकरण के अनुरूप अर्थ ग्रहण करना चाहिए ।
प्रथम पुरुष एक वचन का लङ् लकार(अनद्यतन भूूूतकाल का रूप।
आवत् =प्राप्त किया । 
हिन्दी अर्थ- हे कृष्ण आप यमुना के तट पर स्थित इस जल के रक्षा करने वाले हैं आप इसकी रक्षा करो ! कृष्ण दश हजार गोपों से घिरे हुए हैं। इन्द्र ने अपनी पत्नी शचि के साथ अग्नि से संयोजित होते हुए अर्थात् दैदीप्यमान उस कृष्ण को प्राप्त किया अथवा उनके पास गमन किया  और जल में भीगे हुए कृष्ण को भेंट स्वरूप  धन दिया।
भाष्य-
कृष्णो दशसहस्रैर्गोपै: परिवृत: सन्  अँशुमतीनामधेयाया नद्या:  यमुनाया: तटेऽतिष्ठत् तत्र कृष्णस्य नाम्न: प्रसिद्धं  तं गोपं नद्यार्जलेमध्ये   स्थितं इन्द्रो ददर्श स इन्द्र: स्वपत्न्या शच्या सार्धं आगत्य जले स्निग्धे तं गोपं कृष्णं तस्यानुचरानुपगोपाञ्च अतीवानि धनानि अदात्।

हिन्दी अनुवाद- कृष्ण दश हजार गोपों से घिरे हुए हैं अशुमती अथवा यमुना के तट पर स्थित कृष्ण नाम से प्रसिद्ध उस गोप कृष्ण को यमुना नदी के जल में स्थित देखा।
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द्रप्समपश्यं विषुणे चरन्तमुपह्वरे नद्यो अंशुमत्याः ।
नभो न कृष्णमवतस्थिवांसमिष्यामि वो वृषणो युध्यताजौ ॥१४॥

पद का अन्वय= द्र॒प्सम् । अ॒प॒श्य॒म् । विषु॑णे । चर॑न्तम् । उ॒प॒ऽह्व॒रे । न॒द्यः॑ । अं॒शु॒ऽमत्याः॑ ।

नभः॑ । न । कृ॒ष्णम् । अ॒व॒त॒स्थि॒ऽवांस॑म् । इष्या॑मि । वः॒ । वृ॒ष॒णः॒ । युध्य॑त । आ॒जौ ॥१४।।

हिन्दी अर्थ-इन्द्र कहता है कि विभिन्न रूपों में मैंने यमुना के जल को देखा और वहीं अंशुमती नदी के निर्जन प्रदेश में चरते हुए बैल अथवा साँड़ को भी देखा  और इस साँड को युद्ध में लड़ते हुए मैं चाहूगा । अर्थात यह साँड अपने स्थान पर अडिग खडे़  कृष्ण को संग्राम में युद्ध करे ऐसा होते हुए मैं चाहूँगा। जहाँ जल और- ( नभ) बादल भी न हो 
(अर्थात कृष्ण की शक्ति मापन के लिए इन्द्र यह इच्छा करता है )
_______________    

शब्दार्थ व्याकरणिक विश्लेषण-
१-द्र॒प्सम्= जल को कर्मकारक द्वित्तीया।अपश्यम्=अदर्शम्  दृश् धातु का लङ्लकार  (सामान्य भूतकाल ) क्रिया पदरूप  - मैंने देखा ।__________________

२- वि + सवन(‌सुन) रूप विषुण -(विभिन्न रूप)।   षु (सु)= प्रसवऐश्वर्ययोः - परस्समैपदीय सवति सोता [ कर्मणि- ]  सुषुवे सुतः सवनः सवः अदादौ (234) सौति स्वादौ षुञ् अभिषवे (51) सुनोति (911) सूनुः, पुं, (सूयते इति । सू + “सुवः कित् ।” उणादिसूत्र्र ३।३५। इति (न:) स:च कित् )

पुत्त्रः । (यथा, रघुः । १ । ९५ ।
“सूनुः =सुनृतवाक् स्रष्टुः विससर्ज्जोदितश्रियम् ) अनुजः । सूर्य्यः । इति मेदिनी ॥ अर्कवृक्षः । इत्यमरः कोश ॥
षत्व विधान सन्धि :-"विसइक्कु हयण्सि षत्व" :- इक् स्वरमयी प्रत्याहार के बाद 'कु(कखगघड•)    'ह तथा यण्प्रत्याहार ( य'व'र'ल) के वर्ण हो और फिर उनके बाद 'स'आए तो वहाँ पर 'स'का'ष'हो जाता है:- यदि 'अ' 'आ' से भिन्न  कोई  स्वर जैैैसे इ उ आदि हो अथवा 'कवर्ग' ह् य् व् र् ल्'  के बाद तवर्गीय 'स' उष्म वर्ण आए तो 'स' का टवर्गीय मूर्धन्य 'ष' ऊष्म वर्ण हो जाता है ।

शर्त यह कि यह "स" आदेश या प्रत्यय का ही होना चाहिए जैसे :- दिक् +सु = दिक्षु । चतुर् + सु = चतुर्षु। हरि+ सु = हरिषु ।भानु+ सु = भानुषु । बालके + सु = बालकेषु । मातृ + सु = मातृषु ।परन्तु अ आ स्वरों के बाद स आने के कारण  ही गंगासु ,लतासु ,और अस्मासु आदि में परिवर्तन नहीं आता है 

परन्तु अ' आ 'स्वरों के बाद स आने के कारण ही गंगासु ,लतासु ,और अस्मासु आदि में परिवर्तन नहीं आता है 'हरि+ सु = हरिषु ।भानु+ सु = भानुषु । बालके + सु = बालकेषु ।मातृ + सु = मातृषु । वि+सम=विषम । वि+सुन =विषुण अथवा विष्+ उणप्रत्यय=विषुण।__________________________

विषुण-विभिन्न रूपी।
३-वृ॒ष॒णश्चर॑न्तम्=  चरते हुए साँड  को।
४-आजौ =  संग्रामे  युद्ध में।
५-अ॒व॒ = उपसर्ग
६- त॒स्थि॒ऽवांस॑म्= तस्थिवस् शब्द का द्वितीया विभक्ति एकवचन का रूप तस्थिवांसम् है । तस्थिवस्=  स्था--क्वसु  स्थितवति (स्थिर) अडिग अथवा जो एक ही स्थान पर खड़ा होते हुए में।
७-व:= युष्मान् - तुम सबको ।  युष्मभ्यम् ।  युष्माकम् । यष्मच्छब्दस्य द्बितीया चतुर्थी षष्ठी बहुवचनान्तरूपोऽयम् इति व्याकरणम् ॥
८-उपह्वरे= निर्जन देशे।
९-वृ॒ष॒णः॒ = साँड ने ।
१०-युध्य॑त= युद्ध करते हुए।
११-आजौ= युद्ध में ।
१२-इष्या॑मि= मैं इच्छा करुँगा।
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अथर्ववेद में कृष्ण का केशी दैत्य की वध करते हुए वर्णन प्राप्त है। देखें निम्नलिखित ऋचा -

यः कृष्णः केश्यसुर स्तम्बज उत तुण्डिकः ।
अरायान् अस्या मुष्काभ्यां भंससोऽप हन्मसि ॥५॥

अथर्ववेदः -
सूक्तं ८/६/५
(यः) जो  (कृष्णः)  (केशी) बहुत से केशवालाे केशी (असुरः) , (स्तम्बजः) स्तम्ब से उत्पन्न  होनेवाला है (उत) और (तुण्डिकः) कुरूप थूथन वा कुरूप नाभिवाला [है]। (अरायान्) अलक्ष्मीवाले उनको  (अस्याः) इस [स्त्री] के (मुष्काभ्याम्) दोनों अण्डकोशों से और (भंससः) गुप्त स्थान से (अप हन्मसि) तुम मारते हो  ॥५॥
______

यान्ति देवव्रता देवान् पितृ़न्यान्ति पितृव्रताः।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।।
(श्रीमद्भगवद्गीता-9/25)
अनुवाद:-
देवताओं का पूजन करने वाले  देवताओं को प्राप्त होते हैं। पितरों का पूजन करने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं। भूत-प्रेतों का पूजन करने वाले भूत-प्रेतों को ही प्राप्त होते हैं।
परन्तु  हे अर्जुन ! मेरा पूजन करने वाले वैष्णव भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।

वेदों में राधा, वृषभानु , कृष्ण अर्जुन केशी दैत्य आदि का वर्णन-

ऋग्वेद के अष्टम मण्डल के अतिरिक्त चौथे वेद ‌अथर्ववेद में भगवान कृष्ण का वर्णन केशी नामक दैत्य  का वध करने वाला बताकर वर्णन किया गया है।

अत: वेदों में भी कृष्ण होने की बात सिद्ध होती है।
नीचे स्पष्ट रूप से शौनक संहिता ,अथर्ववेद  और सामवेद आदि  में कृष्ण का स्पष्ट उल्लेख है।

"यःकृ॒ष्णः के॒श्यसु॑र स्तम्ब॒ज उ॒त तुण्डि॑कः। अ॒राया॑नस्या मु॒ष्काभ्यां॒ भंस॒सोऽप॑ हन्मसि॥"
(अथर्ववेद - काण्ड »8; सूक्त»6; ऋचा»5)
_________

१. ( यः कृष्ण:) = जो कृष्ण,२-(केशी) = केशी नामक  ३- (असुरः) =दैत्य  ४-(स्तम्बजः) जिसके केश गुच्छेदार हैं =  ५-(उत) = और ६- (तुण्डिक:) = कुत्सित मुखवाला है / थूथनवाला है। ७-(अरायान्) = निर्धन पुरुषों को ८-(अस्याः) = इस के ९-(मुष्काभ्याम्) = मुष्को से-अण्डकोषों से  तथा  १०-(भंसस:)भसत् कटिदेशः पृषो० । उपचारात् तत्सम्बन्धिनि पायौ ऋ० १० । १६३ ।  = कटिसन्धिप्रदेश  से  ११- (अपहन्मसि) = दूर करते हैं।


"अनुवाद:- जो कृष्ण केशी दैत्य के गुच्छे दार केशों और उसके विकृत मुख उसके अण्डकोशों तथा इसकी कटि ( कमर)आदि भागों को निर्धन लोग दूर करते हैं।
उपर्युक्त ऋचा में वर्णन है कि कृष्ण केशी दैत्य के गुच्छे दार केशों और उसके विकृत मुख और अण्डकोशों तथा कटि प्रदेश (कमर,)आदि के स्पर्श से गरीब अथवा निर्धन लोगों को तथा  स्वयं को भी कृष्ण दूर करते हैं।

भागवत पुराण में वर्णन है कि कृष्ण-भगवान का अत्यन्त कोमल कर(हाथ) कमल भी उस समय ऐसा हो गया, मानो तपाया हुआ लोहा हो।

उसका स्पर्श होते ही केशी के दाँत टूट-टूटकर गिर गये और जैसे जलोदर रोग उपेक्षा कर देने पर बहुत बढ़ जाता है, वैसे ही श्रीकृष्ण का भुजदण्ड उसके मुँह में बढ़ने लगा।
अचिन्त्यशक्ति भगवान श्रीकृष्ण का हाथ उसके मुँह में इतना बढ़ गया कि उसकी साँस के भी आने-जाने का मार्ग न रहा।
अब तो दम घुटने के कारण वह पैर पीटने लगा।

दशम स्कन्ध, अध्याय 36, श्लोक 16-26 तथा अध्याय 37, श्लोक 1-9

अथर्ववेद (दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व) में संकलित है जिसमें , केशी,= "बालों (केशों )वाले", दैत्य का  पहली बार वर्णन किया गया है    

अर्जुन द्वारा भगवत गीता में भी कृष्ण को तीन बार केशी का हत्यारा कहा गया है- केशव (1.30 और 3.1) और केशी-निषूदन (18.1)। पहले अध्याय (1.30) में, कृष्ण को केशी के हत्यारे के रूप में संबोधित करते हुए, अर्जुन युद्ध के बारे में अपना संदेह व्यक्त करते हैं।
ऋग्वेद १/१०/३/ तथा यजुर्वेद ८/३४ में केशिन् का वर्णन है ।
"युक्ष्वा हि केशिना हरी वृष॑णा कक्ष्यप्रा ।
अथा॑ न इन्द्र सोमपा गिरामुप॑श्रुतिं चर ।। 3.।।
पदों अन्वयार्थ:-
युक्ष्वा हि= संयुक्त ही होओ। केशिना= केशी दैत्य के संहारक अथवा सुन्दर केशों वाले के द्वारा   । हरी = हरि भगवान कृष्ण के द्वारा। वृषणा= वृषणों के द्वारा। कक्ष्यप्रा= काँछ के साथ। अथा= और। इन्द्र=  इन्द्र। सोमपा= सोमपा। नः= हमारी।गिरामुप॑श्रुतिं= सुनी हुई वाणी को । चर = दूत ।
"अनुवाद:- केशी दैत्य का बध  करने वाले हरि के साथा जुड़ जाओ ! जिसने केशी दैत्य के अण्डकोष और काँख पकड़ कर फैंक दिया। हे सोमपान करने वाले इन्द्र ! हमारी सुनी हुई स्तुतिगीत को कृष्ण तक दूत के रूप में पहुचाऐं।३।
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"यस्मा॑ज्जा॒तं न पु॒रा किं च॒नैव य आ॑ब॒भूव॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑। प्र॒जाप॑तिः प्र॒जया॑ सꣳररा॒णस्त्रीणि॒ ज्योती॑षि सचते॒ स॒ षो॑ड॒शी ॥५ ॥
पद पाठ
यस्मा॑त्। जा॒तम्। न। पु॒रा। किम्। च॒न। ए॒व। यः। आ॒ब॒भूवेत्या॑ऽऽ ब॒भूव॑। भुव॑नानि। विश्वा॑ ॥ प्र॒जाऽप॑ति॒रिति॑ प्र॒जाऽप॑तिः। प्र॒जया॑ स॒ꣳर॒रा॒ण इति॑ सम्ऽररा॒णः। त्रीणि॑। ज्योती॑षि। स॒च॒ते॒। सः। षो॒ड॒शी ॥५ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:-32» ऋचा -:5
पदों का अर्थ और अन्वय:- हे मनुष्यो ! (यस्मात्) जिस  से (पुरा) पहिले (किम्, चन) कुछ भी (न जातम्) नहीं उत्पन्न हुआ, (यः) जो  (आबभूव) हुआ जिसमें (विश्वा) सब (भुवनानि) लोक  वर्त्तमान हैं, (सः एव) वही (षोडशी) सोलह कलावाला (प्रजया) प्रजा के साथ (सम्, रराणः) सम्यक्  रमता हुआ (प्रजापतिः) प्रजा का पालक अधिष्ठाता (त्रीणि) तीन (ज्योतीषिं)ज्योतियों  को (सचते) संयुक्त करता है ॥५ ॥
"अनुवाद:-  हे मनुष्यों जिससे पहले कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ। जिससे सम्पूर्ण विश्व और सभी लेक उत्पन्न हुए वही ईश्वर !  सोलह कलाओं से युक्त प्रजा के साथ आनन्द करता हुआ। प्रजा पालक रूप में  तीन ज्योतियों में जुड़ता है।
उपर्युक्त ऋचा में कृष्ण के सौलह कलाओं से सम्पन्न होने का वर्णन है। उस कृष्ण के परम् -ब्रह्म रूप का वर्णन है जो संसार के सृजक पालक और संहारक तीन रूपों की ज्योतियों समाहित होते हैं। और आगे इसी क्रम में
निम्न ऋचा में भी वृष्णि नन्दन कृष्ण के चरित्र का अद्भुत वर्णन है।
"यत्सानोः सानुमारुहद्भूर्यस्पष्ट कर्त्वम्
तदिन्द्रो अर्थं चेतति यूथेन वृष्णिरेजति ॥२॥

"अनुवाद:
जो एक  पर्वत शिखर से दूसरे पर्वत शिखर पर बहुत सी  चढ़ाई चढ़ते हुए  इन्द्र को सावधान करने के लिए अथवा उसे  चेताने के लिए या कहें  चैलेंज करने के लिए  वृष्णि शिरोमणि कृष्ण अपने यूथ (गोप समूह ) के साथ वहाँ पहुँचते हैं।२।
यत्) यस्मात् = जिससे (सानोः) पर्वतस्य शिखरात्= पर्वत शिखर से ।
(सानुम्) =शिखरम् । (अरुहत्) रोहति । अत्र लडर्थे लङ् । विकरणव्यत्ययेन शपः स्थाने शः । (भूरि)= बहुत ।  (अस्पष्ट) =स्पशते । अत्र लडर्थे लङ्, बहुलं छन्दसीति शपो लुक् । (कर्त्त्वम्) कर्त्तुं योग्यं /कार्य्यम् । अत्र करोतेस्त्वन् प्रत्ययः । (तत्) तस्मात् (इन्द्रात्)  (अर्थम्) अर्तुं ज्ञातुं प्राप्तुं गुणं द्रव्यं वा । उषिकुषिगार्त्तिभ्यः स्थन् । (उणादि सूत्र०२.४) अनेनार्त्तेः स्थन् प्रत्ययः । (चेतति)= संज्ञापयति प्रकाशयति वा । अत्रान्तर्गतो ण्यर्थः । (यूथेन) सुखप्रापकपदार्थसमूहेनाथवा वायुगणेन सह । तिथपृष्ठगूथयूथप्रोथाः । (उणा०२.१२) अनेन यूथ शब्दो निपातितः । (वृष्णिः) वृष्णे: वंशोद्भव:श्रीकृष्ण   (एजति) कम्पते गम्यते वा ॥२॥

"सुविवृतं सुनिरजमिन्द्र त्वादातमिद्यशः ।
गवामप व्रजं वृधि कृणुष्व राधो अद्रिवः ॥७॥

"अनुवाद:
बकरा आदि की बलि से रहित इन्द्रदेव जल रहित हो गया। । तेरे द्वारा दिया गया  जल  अच्छी प्रकार विस्तार को प्राप्त हो गया जिसमें   गायों के बाड़े और आभीर वस्ती  वृद्धि रहित  हो गये  ,  ( हे राधा तुम इन्द्र को जल रहित करती हो।  (इन्द्र) इन्द्र। गायों  को ,व्रज  को क्षीण करके  बड़े बड़े विवरों में जल को  कर रहा है।॥७॥

(अद्रिवः) जल रहित। (इन्द्रः) इन्द्र देव।(सुनिरजम्) सु+ निर्+अजम्= बकरा आदि की बलि से रहित इन्द्र को । (त्वादातम्) तु + आदातम्= अथवा त्वा- दातम्। तेरे द्वारा दिया गया ।  (यशः) जल । (सुविवृतम्) अच्छी प्रकार विस्तार को प्राप्त हो  (गवाम्)=  गायों के  (व्रजम्) आभीर वस्ती को  (अपवृधि) वृद्धि रहित   करता है ,  (राधः) राधा   (कृणुष्व) करती हैं,    (अद्रिवः)  जल रहित  (इन्द्र) इन्द्र।  (गवाम्) गायों को ।  (व्रजम्) गायों के बाड़े को (अपावृधि) क्षीण करके  (सुविवृतम्)  बड़े बड़े विवरों में। (सुनिरजम्) सु+ निर्+ अजम् =  (यशः) जल को
(कृणुश्व) कम कीजिये॥७॥

"त्वं नो अस्या उषसो व्युष्टौ त्वं सूरं उदिते  बोधि गोपा:
जन्मेव नित्यं तनयं जुषस्व स्तोमं मे अग्ने तन्वा सुजात।। (ऋग्वेद -१५/३/२)
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अनुवाद:-
अर्थात् :-हे प्रभो! गोपों में रहने वाले तुम इस उषा काल के पश्चात् सूर्य उदय काल में हमको जाग्रत करो । जन्म से ही नित्य  तुम  विस्तारित होकर प्रेम पूर्वक स्तुतियों का सेवन करते हो  तुम अग्नि के समान सर्वत्र विस्तार को प्राप्त हो ।२।

"त्वं नृ चक्षा वृषभानु पूर्वी : कृष्णाषु अग्ने अरुषो विभाहि ।
वसो नेषि च पर्षि चात्यंह: कृधी नो राय उशिजो यविष्ठ ।। (ऋग्वेद - ३/१५/३ )
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अर्थात्  हे वृषभानु !  तुम मनुष्यों को देखो पूर्व काल में  कृष्ण अग्नि के सदृश्- उद्भासित होने  वाले है । ये सर्वत्र दिखाई देते हैं , ये अग्नि भी हमारे लिए धन उत्पन्न करे !
इस  दोनों ऋचाओं में श्री राधा के पिता वृषभानु गोप  का उल्लेख किया गया है । जो अन्य सभी प्रकार के सन्देह को भी निर्मूल कर देता है , क्योंकि वृषभानु गोप ही राधा के पिता हैं।

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"इ॒दं ह्यन्वोज॑सा सु॒तं रा॑धानां पते। पिबा॒ त्व१॒॑स्य गि॑र्वणः॥
पद पाठ-
इ॒दम्। हि। अनु॑। ओज॑सा। सु॒तम्। रा॒धा॒ना॒म्। प॒ते॒। पिब॑। तु। अ॒स्य। गि॒र्व॒णः॒॥

१- (गिर्वणः) स्तुति किये हुए२- (राधानाम्) राधा के षष्ठी विभक्ति बहुवचन सम्बन्ध कारक रूप में  ३-(पते) पति  ! सम्बोधन रूप में हे राधा के पति।  ४-(ओजसा) = बल  के द्वारा  ५-(अस्य) इसके ६-(इदम्) इस ७-(सुतम्) सु + क्त = निचोड़ा हुआ। ८- (पिब)- पीजिए ९-(हि) निश्चय ही ॥१०॥
१-गिर्वणः=
गिरा स्तुत्या वन्यते वन--कर्म्मणि असुन् संज्ञात्वात् णत्वं पृषो० नोपपददीर्घः। १- स्तोतरि च ।
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छान्दोग्य उपनिषद में कृष्ण का वर्णन-
छांदोग्य उपनिषद् सामवेदीय छान्दोग्य ब्राह्मण का औपनिषदिक भाग है जो प्राचीनतम दस उपनिषदों में नवम एवं सबसे बृहदाकार है। यह उपनिषद ब्रह्मज्ञान के लिये प्रसिद्ध है।
इसका समय 8 वीं से 6 वीं शताब्दी ईसा पूर्व है।
तद्धैताद्घोर अंगिरसः कृष्णाय देवकीपुत्रयोक्तवोवाचापिपास एव स बभुव सोऽन्तवेलायमेतत्रयं प्रतिपद्येताक्षितमास्युतमसि प्राणसंशितमासीति तत्रैते दवे ऋचौ भवतः || 3.17.6 ||

अनुवाद:-

6.  घोर अंगिरस ऋषि ने देवकी के पुत्र कृष्ण को यह सत्य सिखाया था । परिणामस्वरूप, कृष्ण सभी इच्छाओं से मुक्त हो गए। तब घोर ने कहा: 'मृत्यु के समय व्यक्ति को ये तीन मंत्र दोहराने चाहिए: आत्मा का कभी नाश नहीं होता, आत्मा कभी नहीं बदलता, और आत्मा जीवन का स्वरूप हैं।" इस संबंध में यहां दो ऋक मंत्र दिए गए हैं:




कृष्ण यमज- अर्थात कृष्ण का नन्द और वसुदेव के यहाँ जन्म लेना-

श्रीकृष्ण के जन्म की यथार्थ तिथि निर्णय क्या है ?

सनातन धर्म में श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का पूर्ण अवतार माना जाता है। इन पूर्ण विष्णु को ही स्वराट विष्णु कहते हैं। विष्णु के तीन भेदों में यह सर्वोच्च स्वरूप है। भगवान विष्णु  श्रीकृष्ण के रूप में द्वापर युग में अवतार लेते हैं। और धर्म की संस्थापना के लिए दुष्टों का संहार करते हैं। आम तौर पर श्रीकृष्ण के अवतरण या जन्म की तिथि भाद्रपद के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि की अर्द्ध-रात्रि को माना जाता है । लेकिन इसको लेकर भी पुराणों में मतभेद है। जिस पर एक विश्लेषण अपेक्षित है।

क्या श्रीकृष्ण का जन्म भादो के महीने में हुआ था ?

श्रीकृष्ण के चरित्र को लेकर सबसे ज्यादा प्रामाणिक ग्रन्थों में महाभारत, देवीभागवत महापुराण और हरिवंश पुराण को माना जाता है । हरिवंश पुराण को महाभारत का अवशिष्ट ( बचा हुआ) भाग भी माना जाता है जिसमें भगवान विष्णु के सभी अवतारों विशेष कर भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और कार्यों का विस्तार से वर्णन है।

महाभारत में श्रीकृष्ण के जन्म की तिथि और उनके बाल्यकाल का कोई विवरण नहीं मिलता है श्रीमद्भावगत महापुराण के दशम स्कन्ध में अवश्य भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का विवरण मिलता है लेकिन आश्चर्यजनक रूप से भगवान श्रीकृष्ण का जन्म किस महीने में हुआ था ,इसको लेकर श्रीमद्भभावगत महापुराण भी मौन है।

हरिवंश पुराण में भी श्रीकृष्ण के जन्म की कथा मिलती है लेकिन यहाँ भी ये नहीं बताया गया है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म किस महीने में हुआ था श्रीमद्भावत महापुराण में केवल ये बताया गया है कि श्रीकृष्ण का जन्म रात्रि के पहर में शुभ नक्षत्र था और ग्रह और तारे सभी शुभता के साथ स्थित थे। हरिवंश पुराण में भी यही कहा गया है कि श्रीकृष्ण का जन्म एक शुभ रात्रि में एक विशेष मूहूर्त में हुआ था । लेकिन इन दोनों ही ग्रन्थो में श्रीकृष्ण के जन्म का महीना नहीं बताया गया है ।

क्या श्रीकृष्ण का जन्म सावन के महीने में हुआ था ?

यद्यपि महाभारत श्रीकृष्ण के जन्म की घटना का कोई विवरण नही देता , श्रीमद्भावतम और महाभारत का खिल (परिशिष्ट) भाग हरिवंश पुराण में भी श्रीकृष्ण के जन्म के महीने का कोई श्लोक या विवरण नहीं मिलता , फिर भी  आज के भारतीय भादों के महीने में ही श्रीकृष्ण का जन्म मनाते हैं।

लेकिन अगर कुछ और ग्रन्थो के श्लोकों को पढ़ा जाए तो उनमें ये कहा गया है कि सावन के महीने में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था।


श्रावणे मासि पक्षे च कृष्णेऽष्टम्यां प्रजापतेः।
नक्षत्रे वसुदेवस्य देवक्यां भगवान् हरिः१६/६५॥
सर्वलोकहितार्थाय भूमेर्भारावतारणम्।
कर्तुमाविरभूद्भूमौ मध्यरात्रे महामते।।१६/६६॥

(विश्वामित्रसंहिता, अध्याय – १६, श्लोक – ६५-६६)

पुराणों में श्रीकृष्ण के जन्म को लेकर मतभेद-

विश्वामित्र संहिता का ये श्लोक ये कहता है कि  श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जब प्रजापति (ब्रह्मा) का नक्षत्र  था, तब आधी रात को सभी लोकों का कल्याण करने के लिए और पृथ्वी का भार कम करने के लिए वसुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से भगवान का अवतार हुआ ।६५-६६।

द्वापरे समनुप्राप्ते विरोधिवत्सरे शिवे।
श्रावणे चाष्टमी शुक्ला बुधरोहिणीसंयुता॥६३।
वज्रयोगे मध्यरात्रौ पूर्णः कृष्णो हरिः स्वयम्।
कंसस्य च वधार्थाय अर्जुनस्य हिताय च॥६४

(शक्तिसंगम महातन्त्र राज, छिन्नमस्ताखण्ड, पटल – 06, श्लोक – 63-64)

शक्ति संगम  महातंत्र का ये श्लोक कहता है कि  द्वापरयुग के आने पर विरोधी नामक सम्वत्सर में जब सावन के महीने के शुक्लपक्ष की अष्टमी की तिथि थी और वो दिन बुधवार का था और उस वक्त आधी रात को रोहिणी नक्षत्र का शुभ समय था उस वक्त वज्रयोग जैसे अति शुभ योग में आधी रात को ही स्वयं भगवान श्रीहरि विष्णु  अवतार लेकर कंस का वध करने और अर्जुन का हित करने के लिए श्रीकृष्ण रुप में पधारे।


स्कन्द पुराण जो सभी पुराणों में सबसे बड़ा माना जाता है , उसमें में सावन के महीने में ही भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बारे में श्लोक मिलते हैं

जयं पुण्यञ्च कुरुते जयन्तीमिति तां विदुः।
रोहिणीसहिता कृष्णमासे च श्रावणेऽष्टमी॥
अर्द्धरात्रादधश्चोर्द्ध्वं कलयापि यदा भवेत्।
जयन्ती नाम सा प्रोक्ता सर्वपापप्रणाशिनी॥

स्कन्द पुराण के इस श्लोक के अनुसार सावन के महीने की अष्टमी तिथि थी, रात का वक्त था और आकाश में रोहिणी नक्षत्र विराजमान था, उस पुण्य काल में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था।

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म किस तिथि को हुआ था ?


श्रीमद्भागवत महापुराण और हरिवंश पुराण भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की तिथि के बारे में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहते । श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से संबंधित दो श्लोक महत्वपूर्ण हैं –

अथ सर्वगुणोपेतः कालः परमशोभनः।
यर्हि एव अजनजन्मर्क्षं शान्तर्क्ष-ग्रहतारकम।।

(श्रीमद्भागवत पुराण, स्कंध 10, अध्याय 3, श्लोक 1)

इस श्लोक में शुकदेव जी राजा परीक्षित को कहते हैं कि  – “अब समस्त शुभ गुणों से युक्त शुभ समय आया जब उसका जन्म होने वाला था जो अजन्मा ( श्रीकृष्ण) है । इस काल में सभी नक्षत्र, ग्रह और तारे शान्त और सौम्य हो रहे थे।“

इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण का जब जन्म होता है तो इस समय के बारे में श्रीमद्भागवत महापुराण का ये श्लोक कुछ ऐसा कहता है –

(निशीथे तम उद्भूते जायमाने जनार्दन।) देवक्यां देवरूपिण्यां विष्णु: सर्वगुहाशय: आविरासीद् यथा प्राच्यां दिशि इन्दुरिव पुष्कल:।। ८।

(श्रीमद्भागवत पुराण, स्कन्ध 10, अध्याय 3, श्लोक 8) श्रीमद्भागवत महापुराण के दसवें स्कन्ध के अध्याय 3 के श्लोक 8 में ये कहा गया है कि – “ उस रात में उन जनार्दन ( विष्णु) के जन्म का समय आया। चारों तरफ अन्धकार का साम्राज्य था। उसी समय सबके ह्दय में विराजमान विष्णु देवरुपिणी देवकी के गर्भ से प्रगट हुए , जैसे पूर्व दिशा में सोलहों कलाओं से पूर्ण चन्द्रमा का उदय हुआ हो।“

स्पष्ट है कि श्रीमद्भागवत महापुराण में श्रीकृष्ण के न तो जन्म की तिथि बताई गई है और न ही उनके जन्म का नक्षत्र , लेकिन श्री हरिवंश पुराण श्रीकृष्ण के जन्म का नक्षत्र. मुहूर्त दोनों के बारे में बताता है –  

भिजिन्नाम नक्षत्रं जयन्ती नाम शर्वरी।
मुहूर्तो विजयो नाम यत्र जातो जनार्दनः॥

(हरिवंशपुराण, विष्णुपर्व, अध्याय – 04 – श्लोक – 17)

हरिवंश पुराण के इस श्लोक के अनुसार जब भगवान् जनार्दन (विष्णु) का अवतार हो रहा था, उस नक्षत्र का नाम अभिजित्, रात्रि का नाम जयन्ती और मुहूर्त का नाम विजय था। लेकिन आश्चर्य की बात यहां भी यही है कि श्रीकृष्ण के जन्म की तिथि नहीं बताई गई है और न ही महीना बताया गया है 

यद्यपि  हमनें इस लेख में विश्वामित्र संहिता और स्कन्द पुराण और कुछ ग्रन्थों के अनुसार ये दिखाया है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म सावन के महीने में अष्टमी की तिथि को ही हुआ था। ये भी स्पष्ट नहीं है कि अष्टमी की तिथि शुक्लपक्ष की है या फिर कृष्ण पक्ष की।

ये हो सकता है कि महीने और पक्षो में कुछ हजार सालो में परिवर्तन होता रहता हो और इसलिए ये भ्रम आज भी बना हुआ है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म आखिरकार किसी तिथि और किस महीने हुआ था। इस पर शोध सतत जारी है ।

ब्रह्मपुराण -

अथ भाद्रपदे मासि कृष्णाष्टम्यां कलौ युगे ।   अष्टाविंशतिमे जातः कृष्णोऽसौ देवकीसुतः” ।   परं कस्मिन्नेव कलौ प्रादुर्बभूव भगवानिति जिज्ञासायां वैवस्वतमन्वन्तरीयाष्टाविंशतिमे युगे   इत्युक्त्या वर्त्तमानकलेः प्रथम एव निर्णीयते ।  तथा   च उच्चस्थाः शशिभौमचान्द्रिशनय इति ।  खमाणिक्यनामज्योतिर्ग्रन्थोक्तेः कलियुगस्य ।६४७।   

वर्षेषु गतेषु एतत्समयस्य सम्भवः ततः पूर्ब्बं   कलौ तादृशसमयासम्भवात् ।  किञ्च राजतरङ्गिण्याम् । १ ।  ५१


📚: वृषभानुपुराद्याता क्रीडार्थं राधिका स्वयम्।।पारावारेति विख्यातं स्थानं तस्मात् समागता:।।५४।।

कृष्ण यामल तन्त्र-📚

बिम्बाधरेण मुरली कररी विलासी।मायूरपिच्छपरिलाञ्छित चारचूड:।आभीरबालककुलेन विहारकारी।। राधापतिर्मम पुनर्भविताऽनुकूल:।।१५८।

कृष्ण यामल तन्त्र-📚


📚: एक: कृष्णो द्विधाभूतो मुमुक्षुभजनैषिणो:। उपकाराय शुद्धात्मा वेदविद्भि: स गीयते।मुक्तोब्रृह्मपदंयाति तदंगं ज्योतिरुत्तमम्।।८/२६ ख –८/२७ क।(कृष्ण यामल तन्त्र)

📚: गोकुले वसुदेवस्य भार्या वै रोहिणी स्थिता।तस्याः प्रसूतिसमये गर्भो नेयस्त्वयोदरम्।। १८१.४० ।।

सप्तमो भोजराजस्य भयाद्रोधोपरोधतः। देवक्याः पतितो गर्भ इति लोको वदिष्यति।।१८१.४१ ।।

गर्भसंकर्षणात्सोऽथ लोके संकर्षणेति वै।संज्ञामवाप्स्यते वरीः श्वेताद्रिशिखरोपमः।। १८१.४२ ।।

ततोऽहं संभविष्यामि देवकीजठरे शुभे। गर्भे त्वया यशोदाया गन्तव्यमविलम्बितम्।।१८१.४३ ।।

प्रावृट्काले च नभसि कृष्णाष्टम्यामहं निशि।उत्पत्स्यामि नवम्यां च प्रसूतिं त्वमवाप्स्यसि।। १८१.४४ ।।

यशोदाशयने मां तु देवक्यास्त्वामनिन्दिते।मच्छक्तिप्रेरितमतिर्वसुदेवो नयिष्यति।१८१.४५।

कंसश्च त्वामुपादाय देवि शैलशिलातले।प्रक्षेप्स्यत्यन्तरिक्षे च त्वं स्थानं समवाप्स्यसि।। १८१.४६ ।।

श्रीमहापुराणे (ब्रह्मपुराणे) आदिब्राह्मे हरेरंशावतारनिरूपणं नामैकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः।। १८१ ।।


          📚: व्यास उवाच

एवं संस्तूयमानस्तु भगवान्परमेश्वरः।उज्जहाराऽऽत्मनः केशौ सितकृष्णौ द्विजोत्तमाः।। १८१.२६ ।।

उवाच च सुरानेतै मत्केशौ वसुधातले। अवतीर्य भुवो भारक्लेशहानिं करिष्यतः।।१८१.२७।।

सुराश्च सकलाः स्वांशैरवतीर्य महीतले।          कुर्वन्तु युद्धमुन्मत्तैः पूर्वोत्पन्नैर्महासुरैः।।१८१.२८।।

ततः क्षयमशेषास्ते दैतेया धरणीतले।        प्रयास्यन्ति न संदेहो नानायुधविचूर्णिताः।।१८१.२९।।

वसुदेवस्य या पत्नी देवकी देवतोपमा।          तस्या गर्भोऽष्टमोऽयं तु मत्केशो भविता सुराः।१८१.३०।

अवतीर्य च तत्रायं कंसं घातयिता भुवि।कालनेमिसमुद्‌भूतमित्युक्त्वाऽन्तर्दधे हरिः।। १८१.३१ ।।

अदृश्याय ततस्तेऽपि प्रणिपत्य महात्मने।      मेरुपृष्ठं सुरा जग्मुरवतेरुश्च भूतले।।१८१.३२।।

कंसाय चाष्टमो गर्भो देवक्या धरणीतले।भविष्यतीत्याचचक्षे भगवान्नारदो मुनिः।। १८१.३३ ।।

कंसोऽपि तदुपश्रुत्य नारदात्कुपितस्ततः।        देवकीं वसुदेवं च गृहे गुप्तावधारयत्।।१८१.३४ ।

जातं जातं च कंसाय तेनैवोक्तं यथा पुरा।        तथैव वसुदेवोऽपि पुत्रमर्पितवान्द्विजाः।१८१.३५ ।

श्रीमहापुराणे (ब्रह्मपुराणे) आदिब्राह्मे हरेरंशावतारनिरूपणं नामैकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः।। १८१ ।।

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अब विष्णु पुराण से समान श्लोक उद्धृत कर निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत हैं।

            श्रीपराशर उवाच
एवं संस्तूयमानस्तु भगवान्परमेश्वरः ।
उज्जहारात्मनः केशौ सितकृष्णौ महामुने ॥ ५,१.६० ॥

उवाच च सुरानेतौ मत्केशौ वसुधातले ।
अवतीर्य भुवो भारक्लेशहानिं करिष्यतः ॥ ५,१.६१ ॥

सुराश्च सकलाःस्वांशैरवतीर्य महीतले ।
कुर्वन्तु युद्धमुन्मत्तैः पूर्वोत्पन्नैर्महासुरैः ॥५,१.६२ ॥

ततः क्षयमशेषास्ते दैतेया धरमीतले ।
प्रयास्यन्ति न संदेहो मद्दृपातविचूर्णिताः ॥ ५,१.६३॥

वसुदेवस्य या पत्नी देवकी देवतोपमा ।
तत्रायमष्टमो गर्भो मत्केशो भविता सुराः ॥ ५,१.६४ ॥

अवतीर्य च तत्रायं कंसं घातयिता भुवि ।
कालनेमीं समुद्भूतमित्युक्त्वान्तर्दधे हरिः ॥ ५,१.६५ ॥

अदृश्याय ततस्तस्मै प्रणिपत्य महामुने ।
मेरुपृष्ठं सुरा जग्मुरवतेरुश्च भूतले ॥ ५,१.६६ ॥

कंसाय चाष्टमो गर्भो देवक्या धरणीधरः ।
भविष्यतीत्याच चक्षे भगवान्नारदो मुनिः ॥ ५,१.६७ ॥

कंसोऽपि तदुपश्रुत्य नारदात्कुपितस्ततः ।
देवकीं वसुदेवं च गृहे गुप्तावधारयत् ॥ ५,१.६८ ॥

वसुदेवेन कंसाय तेनैवोक्तं यथा पुरा ।
तथैव वसुदेवोऽपि पुत्रमर्पितवान् द्विज ॥ ५,१.६९॥

हिरण्यकशिपोः पुत्राःषड्गर्भा इति विश्रुताः ।
विष्णुप्रयुक्ता स्तान्निद्राक्रमाद्गर्भानयोजयत् ॥ ५,१.७० ॥

योगनिद्रा महामाया वैष्णवी मोहितं यया ।
अविद्यया जगत्सर्वं तामाह भगवान्हरिः ॥५,१.७१॥


              श्रीभगवानुवाच

निद्रे गच्छ ममादेशात्पातालातलसंश्रयान् ।
एकैकत्वेन षड्गर्भान्देवकीजठरं नय ॥ ५,१.७२ ॥

हतेषु तेषु कंसेन शेषाख्योंशस्ततो मम ।
अंशांशोनादरे तस्याःसप्तमः संभविष्यति ॥ ५,१.७३ ॥

गोकुले वसुदेवस्य भार्यान्या रोहिणी स्थिता ।
तस्याःस सम्भूतिसमं देवि नेयस्त्वयोदरम् ॥ ५,१.७४ ॥

सप्तमो भोजराजस्य भयाद्रोधोपरोधतः ।
देवक्याः पितितो गर्भ इति लोको वदिष्यति ॥ ५,१.७५ ॥

गर्भसंकर्षणात्सोऽथ लोके संकर्षणेति वै ।
संज्ञामवाप्स्यते वीरः श्वेताद्रिशिखरोपमः ॥ ५,१.७६ ॥

ततोऽहं संभविष्यामि देवकीजठरे शुभे ।
भर्गं त्वया यशोदाया गन्तव्यमविलंबितम् ॥ ५,१.७७ ॥

*****
प्रावृट्काले च नभसि कृष्णाष्टम्यामहं निशि ।
उत्पत्स्यामि नवम्यां तु प्रसूतिं त्वमवाप्स्यसि ॥ ५,१.७८ ॥

यशोदाशयने मां तु देवक्यास्त्वामनिन्दिते ।
मच्छक्तिप्रोरितमतिर्वसुदेवो नयिष्यति ॥५,१.७९ ॥

कंसश्च त्वामुपादाय देवि शैलशिलातले ।
प्रक्षेप्स्यत्यन्तारिक्षे च संस्थानं त्वमवाप्स्यसि ॥ ५,१.८० ॥

ततस्त्वां शतदृक्छक्रः प्रणम्य मम गौरवात् ।
प्रणिपातानतशिरा भगिनीत्वे ग्रहीष्यति ॥५,१.८१।

त्वं च शुंभनिशुंभादीन्हत्वा दैत्यान्सहस्रशः ।
स्थानैरनेकैः पृथिवीमशेषां मण्डयिष्यसि ॥ ५,१.८२ ॥

त्वं भूतिः सन्नतिः क्षान्तिः कान्तिर्द्यौः पृथिवी धृतिः 
लज्जापुष्टी रुषा या तु काचिदन्या त्वमेव सा ॥ ५,१.८३ ॥

ये त्वामार्येति दुर्गेति वेदगर्भांबिकेति च ।
भद्रेति भद्रकालीति क्षेमदा भग्यदेति च ॥ ५,१.८४॥

प्रातश्चैवापराह्ने च स्तोष्यन्त्यानम्रमूर्तयः ।
तेषां हि प्रार्थितं सर्वं मत्प्रसादाद्भविष्यति ॥ ५,१.८५ ॥

सुरामांसोपहरैश्च भक्ष्यभोज्यैश्च पूजिता ।
नॄणामशेषसामांस्त्वं प्रसन्ना संप्रदास्यसि ॥ ५,१.८६ ॥

ते सर्वे सर्वदा भद्रे मत्प्रसादादसंशयम् ।
असंदिग्धा भविष्यन्ति गच्छ देवि यथोदितम् ।
इति विष्णुमहापुराणे पञ्चमांशे प्रथमोऽध्यायः (१)

***************
अनुवाद:-

श्री पराशर जी बोले ;- हे महामुने ! इस प्रकार स्तुति किये जानेपर भगवान परमेश्वर ने अपने श्याम और श्वेत दो केश उखाड़े ॥ ५ ९॥ 

और देवताओं से बोले-मेरे ये दोनों केश पृथ्वी पर अवतार लेकर पृथिवी के भाररूप कष्ट को दूर करेंगे ॥ ६० ॥ 

सब देवगण अपने-अपने अंशों से पृथ्वी पर अवतार लेकर अपने से पूर्व उत्पन्न हुए उन्मत्त दैत्यों के साथ युद्ध करें।६१॥

तब मेरे दृष्टिपात से दलित होकर पृथिवी तलपर सम्पूर्ण दैत्यगण निस्सन्देह क्षीण हो जाएँगे ॥६२।। 

वसुदेवजी की जो देवी के समान देवकी नाम की भार्या है उसके आठवें गर्भ से मेरा यह (श्याम ) केश अवतार लेगा ॥६३॥

और इस प्रकार वहाँ अवतार लेकर यह कालनेमि का अवतार कंस का वध करेगा।' ऐसा कहकर श्रीहरि अन्तर्धान हो गये ॥६४॥ 

हे महामुने ! भगवान के अदृश्य हो जानेपर उन्हें प्रणाम करके देवगण सुमेरु पर्वत पर चले गये और फिर पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए ॥ ६५ ॥

इसी समय भगवान नारदजी ने कंस से आकर कहा कि देवकी के आठवें  गर्भ में भगवान धरणी धर जन्म लेंगे ॥६६॥

नारद जी से यह समाचार पाकर कंस ने कुपित होकर वसुदेव और देवकी को कारागृह में बंद कर दिया ॥ ६७ ॥

द्विज ! वसुदेव जी भी, जैसा कि उन्होंने पहले कह दिया था, अपना प्रत्येक पुत्र कंस को सौंपते रहे ॥६८ ॥

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ऐसा सुना जाता है कि ये छः गर्भ पहले हिरण्य कशिपु के पुत्र थे। भगवान विष्णु की प्रेरणा से योगनिद्रा उन्हें क्रमशः गर्भ में स्थित करती रही ।।६९॥ 

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 विशेष- परन्तु देवीभागवतपुरण के अनुसार ये छै: पुत्र अदिति के थे। और सातवाँ बलराम रूप शेषनाग  कद्रु के पुत्र थे। परन्तु अदिति रूप देवकी के छ: स्थापित पुत्र और सप्तम गर्भविस्थापित पुत्र बलराम थे। 

(जाता विनश्येरंस्तव पुत्रास्तु सप्त वै" - देवी भागवत महापुराण)

अत: देवीभागवत पुराण का वर्णन सत्य तथा  तर्कसंगत है। जबकि विष्णु पुराण और ब्रह्मपुराण का वर्णन प्रक्षेप है।

जिस अविद्या-रूपिणी से सम्पूर्ण जगत् मोहित हो रहा है, वह योगनिद्रा भगवान विष्णु के महामाया है उससे भगवान श्री हरि ने कहा--॥ ७०॥

श्रीभगवान् बोले  - हे निद्रे ! जा, मेरी आज्ञा से तू पाताल में स्थित छः गर्भ को एक-एक करके देवकी की कुक्षि में स्थापित कर दे॥७१।। 

कंस द्वारा उन सबके मारे जानेपर शेषनामक मेरा अंश अपने अंशांश देवकी के सातवें गर्भ में स्थित होगा ॥ ७२ ॥ 

हे देवि ! गोकुल में वसुदेवजी की जो रोहिणी नामकी दूसरी भार्या रहती है उसके उदर में उस सातवें गर्भ को ले जाकर तू इस प्रकार स्थापित कर देना जिससे वह उसी के जठर से उत्पन्न हुए के समान जान पड़े ॥७३॥

उसके विषय में संसार यही कहेगा कि कारागार में बन्द होने के कारण भोजराज कंस के भय से देवकी का सातवाँ गर्भ गिर गया ॥७४॥

 वह श्वेत शैलशिखर के समान वीर पुरुष गर्भ से आकर्षण किये जाने के कारण संसार में 'सङ्गर्षण' नाम से प्रसिद्ध होगा॥ ७५॥

तदनन्तर, हे शुभे ! देवकी के आठवें गर्भ में मैं स्थित होऊँगा । उस समय तू भी तुरन्त ही यशोदा के गर्भ में चली जाना ॥७६॥

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वर्षा ऋतु में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की रात्रि के समय मैं जन्म लूंगा और तू नवमी को उत्पन्न होगी। ७७ ॥ 

हे अनिन्दिते ! उस समय मेरी शक्ति से अपनी मति फिर जाने के कारण वसुदेव जी मुझे तो यशोदा के और तुझे देवकी के शयनगृह में ले जाएंगे ॥७८॥

तब, हे देवि ! कंस तुझे पकड़कर पर्वत-शिलापर पटक देगा; उसके पटकते ही तू आकाश में स्थित हो जायगी ॥ ७९ ।।

उस समय मेरे गौरव से सहस्रनयन इन्द्र शिर झुकाकर प्रणाम करनेके अनन्तर तुझे भगिनी रूप से स्वीकार करेगा॥ ८० ॥ 

तू भी शुम्भ, निशुम्भ आदि ,सहस्र दैत्यों को मारकर अपने अनेक स्थानों से समस्त पृथ्वी को सुशोभित करेगी॥८१॥ 

तू ही भूति, सन्नति, क्षान्ति और कन्ति है; तू ही आकाश, पृथिवी, धृति, लज्जा, पुष्टि और उषा है; इनके अतिरिक्त संसारमें और भी जो कोई शक्ति है वह सब तू ही है॥ ८२॥

जो लोग प्रातः काल और सायंकाल में अत्यन्त नम्रतापूर्वक तुझे आर्या, दुर्गा, वेदगर्भा, अम्बिका, भद्रा, भद्रकाली, क्षेमदा और भाग्यदा आदि कहकर तेरी स्तुति करेंगे उनकी समस्त कामनाएँ मेरी कृपा से पूर्ण हो जायँगी ॥८३-८४ ॥

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मदिरा और मांस की भेंट चढ़ाने से तथा भक्ष्य और भोज्य पदार्थो द्वारा पूजा करने से प्रसन्न होकर तू मनुष्यों की सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण कर देगी ॥८५॥ 

तेरे द्वारा दी हुई वे समस्त कामनाएँ मेरी कृपा से निस्सन्देह पूर्ण होंगी। हे देवि ! अब तू मेरे बतलाये हुए स्थानको जा ॥८६॥

 ऊपर कही हुई कहानी विष्णुमहापुराण के पञ्चमांश प्रथमोऽध्याय में तथा ब्रह्मा के विधि-विधानों पर केन्द्रित ब्रह्मपुराण( महापुराण) के (181) वें अध्याय  में उल्लिखित है। दोनो पाठ एक दूसरे की नकल हैं। यह यज्ञ मूलक कर्मकाण्डों के समर्थ  पुरोहितो द्वारा आरोपित हैं । यह सभी क्षेपक ही है।

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स्कन्द पुराणकार भी राधा जी के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए उन्हें आदि शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करता है। देखे निम्नलिखित श्लोकों को-

श्रीकृष्णस्य मनश्चंद्रो राधास्यप्रभयान्वितः ।।तद्विहारवनं गोभिर्मण्डयन्रोचते सदा ।।५।।

कृष्णचन्द्रः सदा पूर्णस्तस्य षोडश याः कलाः ।।चित्सहस्रप्रभाभिन्ना अत्रास्ते तत्स्वरूपता ।। ६ ।।

एवं वज्रस्तु राजेन्द्र प्रपन्नभयभञ्जकः।।श्रीकृष्णदक्षिणे पादे स्थानमेतस्य वर्तते ।।७।।

अवतारेऽत्र कृष्णेन योगमायाऽति भाविता ।।तद्बलेनात्मविस्मृत्या सीदन्त्येते न संशयः ।। ८।।

श्लोकार्थ -

श्रीकृष्ण का मनरूपी चन्द्रमा राधा के मुख की प्रभारूप चाँदनी से युक्त हो उनकी लीलाभूमि वृन्दावन को अपनी किरणों से सुशोभित करता हुआ यहाँ सदा प्रकाशमान रहता है ।।५।। 

श्रीकृष्णचन्द्र नित्य परिपूर्ण हैं, प्राकृत चन्द्रमा की भाँति उनमें वृद्धि और क्षयरूप विकार नहीं होते। उनकी जो सोलह कलाएँ हैं, उनसे सहस्रों चिन्मय किरणें निकलती रहती हैं; इससे उनके सहस्रों भेद हो जाते हैं। इन सभी कलाओं से युक्त, नित्य परिपूर्ण श्रीकृष्ण इस व्रजभूमि में सदा ही विद्यमान रहते हैं; इस भूमि में और उनके स्वरूप में कुछ अन्तर नहीं है ।।६।। 

राजेन्द्र परीक्षित् ! इस प्रकार विचार करने पर सभी व्रजवासी गोप भगवान्‌ के अंग में स्थित हैं। शरणागतों का भय दूर करनेवाले जो ये वज्रनाभ हैं, इनका स्थान श्रीकृष्ण के दाहिने चरण में है ।।७।। 

इस अवतार में भगवान् श्रीकृष्ण ने इन सबको अपनी योगमाया से अभिभूत कर लिया है, उसी के प्रभाव से ये अपने स्वरूप को भूल गये हैं और इसी कारण सदा दुःखी रहते हैं। यह बात निस्सन्देह ऐसी ही है ।।८।।

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श्रीस्कान्दे महापुराणे एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां द्वितीये वैष्णवखण्डे परीक्षिदुद्धवसंवादे श्रीभागवतमाहात्म्ये तृतीयोऽध्यायः।।३।।


           † श्रीकृष्ण जन्माष्टमी †

 वसुदेव को भी गोप जाति में जन्म लेने वाला कहा है।
जैसे - देवी भागवतमहापुराण के निम्नलिखित श्लोकों को देख सकते हैं। जो वसुदेव के पूर्वजन्म के प्रभाव से गोपों में जन्म लेने की बात करते हैं।

अंशेन त्वं पृथिव्यां वै प्राप्य जन्म यदोः कुले ।
भार्याभ्यां संयुतस्तत्र गोपालत्वं करिष्यसि ॥१६॥
                     -व्यास उवाच-
तथा दित्यादितिः शप्ता शोकसन्तप्तया भृशम्।
जाता जाता विनश्येरंस्तव पुत्रास्तु सप्त वै ॥१८॥
अनुवाद:-अतएव मर्यादा की रक्षा के लिये ब्रह्माजी ने भी अपने परमप्रिय पौत्र मुनिश्रेष्ठ कश्यप को शाप दे दिया कि तुम अपने अंश से पृथ्वीपर यदुवंश में जन्म लेकर वहाँ अपनी दोनों पत्नियों के साथ गोप जाति में जन्म लेकर गोपालन का कार्य करोगे ।। 15-16 ।।

व्यासजी बोले- इस प्रकार अंशावतार लेने तथा पृथ्वीका बोझ उतारने के लिये वरुणदेव तथा ब्रह्माजी ने उन महर्षि कश्यप को शाप दे दिया था ॥17॥
उधर कश्यप की भार्या दिति ने भी अत्यधिक शोकसन्तप्त होकर अदिति को शाप दे दिया कि क्रम से तुम्हारे सातों पुत्र उत्पन्न होते ही मृत्यु को प्राप्त हो जायँ ॥18॥
सन्दर्भ:-
(देवीभागवत महापुराण चतुर्थ स्कन्ध अध्याय तृतीय) 
इसके अतिरिक्त
हरिवंशपुराण हरिवंश पर्व के (55) वें अध्याय में भी वसुदेव को गोप कहा गया है। 
ये सभी गोप यादव आदि  आभीर शब्द के ही पर्याय हैं।
हरिवंश पुराण में में वसुदेव के गोप जाति में जन्म लेने की पूर्वजन्म के शाप प्रभाव का वर्णन है।
देखें निम्नलिखित श्लोकों को-
 
येनांशेन हृता गावः कश्यपेन महर्षिणा
स तेनांशेन जगतीं गत्वा गोपत्वमेष्यति।३३।
अनुवाद :- अच्युत ! जल के स्वामी वरुण के ऐसा कहने पर गौओं के कारण तत्व को जानने वाले मुझ ( ब्रह्मा ) ने कश्यप को शाप देते हुए कहा-।३२।

हे  कश्यप ! तुमने जिस अंश के द्वारा वरुण की गायों का हरण किया गया है  तुम उसी अंश से पृथ्वी पर जाकर गोपत्व को प्राप्त कर गोप होंगे।३३।

वायु भी भगवान श्रीकृष्ण के गोप ते घर जन्म लेने की बात करता है।
 
गोपायनं यः कुरुते जगतां सार्व्वलौकिकम्।
स कथं गां गतो विष्णुर्गोपमन्वकरोत्प्रभुः ।।१२।। (वायुपुराण- 97) 

गोपायनं यः कुरुते जगतः सार्वलौकिकम् ।
स कथं गां गतो देवो विष्णुर्गोपत्वमागतः ।।१२।।
(हरिवंश पुराण हरिवंशपर्व अध्याय-40)

गोपायनं यः कुरुते जगतः सार्वलौकिकम् ।
स कथं भगवान्विष्णुः प्रभासक्षेत्रमाश्रितः॥२६॥
स्कन्द पुराण-7/1/9/26

उपर्युक्त श्लोक तीन अलग अलग पुराणों  वायुपुराण, हरिवंशपुराण और स्कन्द पुराण  से उद्धृत हैं।
जिनका अर्थ है - जो प्रभु जगत के  सभी जीवों अथवा लोगों की रक्षा करने में समर्थ है । वह गोपों के घर गोप बनकर आते हैं।

अब कोई यदि यही राग अलाप रहा है। कि  कृष्ण गोप (अहीर) नहीं हैं। तो वह महाधूर्त और वज्र मूर्ख ही है।

कृष्ण का जन्म गोप जाति में हुआ था स्वयं राम भक्त तुलसी भी इसी बात को स्वीकार करते हैं।

पद संख्या (231) से (240) तक / तुलसीदास विनयपत्रिका / 

सुर-मुनि-बिप्र बिहाय बड़े कुल, गोकुल जनम गोपगृह लीन्हो।
बायों दियो बिभव कुरूपति को, भोजन जाइ बिदुर-घर कीन्हो।3।

सुर-मुनि-बिप्र बिहाय बड़े कुल, गोकुल जनम गोपग्रह लीन्हो"
 यह विनय पत्रिका का एक पदांश है, जिसमें कवि संत तुलसीदास ने कहा है कि देवों, मुनियों और ब्राह्मणों के श्रेष्ठ माने जाने वाले कुल को त्यागकर, भगवान श्री कृष्ण के गोपगृह (अहीरों के घर) में जन्म लेने की बात कही है। यह भगवान की लीला और उनके जन्म के समय की स्थिति को दर्शाता है। जैसा कि  स्वयं अनेक पुराणों में भी

व्याख्या:

सुर-मुनि-बिप्र बिहाय बड़े कुल: इसका अर्थ है कि देव (सुर), ऋषि-मुनि (मुनि) और ब्राह्मणों (बिप्र) के लिए जो बड़े और श्रेष्ठ माने जाते हैं, उन कुलों को त्यागकर। 
गोकुल जनम गोपगृह लीन्हो:
भगवान श्रीकृष्ण ने गोप (ग्वालों) के घर (गोपगृह) में गोकुल में जन्म लिया।  यही गोप ़यादव और अहीर भी कहलाते हैं।

यह पद इस बात पर प्रकाश डालता है कि किस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने संसार के सभी श्रेष्ठ माने जाने वाले जाति- कुलो को छोड़कर केवल अहीरों (गोपों) के घर में जन्म लिया, जो उनकी लीला का एक महत्वपूर्ण अंग है। 
विभिन्न पुराणों से उद्धृत सन्दर्भ जिनमें भगवान श्रीकृष्ण के जन्म समय का वर्णन है। प्रस्तुत करते हैं।

१. ब्रह्मपुराण

श्लोक
अथ भाद्रपदे मासि कृष्णाष्टम्यां कलौ युगे।
अष्टाविंशतिमे जातः कृष्णोऽसौ देवकीसुतः॥

हिन्दी अनुवाद
कलियुग में भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को, अष्टाविंशतिम (28 वें) वर्ष में, देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण का जन्म हुआ।


२. विष्णुपुराण

श्लोक १
प्रावृट्काले च नभसि कृष्णाष्टम्यां महानिशि।
उत्पत्स्यामि नवम्यान्तु प्रसूतिं त्वमवाप्स्यसि॥

हिन्दी अनुवाद
वर्षा ऋतु में, भाद्रपद मास (नभस्) की कृष्णाष्टमी की महानिशा (मध्यरात्रि) में मैं अवतरित होऊँगा, और नवमी के आरंभ तक तुम प्रसव करोगी।


श्लोक २
श्रावणे वा नभस्ये वा रोहिणीसहिताष्टमी।
यदा कृष्णे नरैर्लब्धा सा जयन्ती प्रकीर्तिता॥

हिन्दी अनुवाद
श्रावण या भाद्रपद मास में, जब कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि रोहिणी नक्षत्र के साथ हो, वही ‘जयन्ती’ (कृष्णजन्माष्टमी) कहलाती है।


३. अग्निपुराण

श्लोक १
रोहिणीसहिता कृष्णा मासि भाद्रपदेऽष्टमी।
सप्तम्यामर्द्धरात्राधः कलयापि यदा भवेत्॥
तत्र जातो जगन्नाथः कौस्तुभी हरिरीश्वरः॥

हिन्दी अनुवाद
भाद्रपद मास की कृष्णपक्ष अष्टमी, जब रोहिणी नक्षत्र के साथ हो, और सप्तमी के अंश के बाद मध्यरात्रि से नीचे के समय में आती हो — तब ही जगन्नाथ, कौस्तुभमणि धारण करने वाले हरि ईश्वर का जन्म हुआ।


४. ब्रह्मवैवर्तपुराण

श्लोक
उदये चाष्टमी किञ्चिन्नवमी सकला यदि।
भवेत्तु बुधसंयुक्ता प्राजापत्यर्क्षसंयुता॥
अपि वर्षशतेनापि लभ्यते वा न वा विभो॥

हिन्दी अनुवाद
यदि अष्टमी तिथि उदयकाल में हो और उसमें कुछ भाग नवमी का भी हो, तथा वह बुधवार और प्राजापत्य नक्षत्र के संयोग से युक्त हो, तो (हे प्रभो!) यह योग सौ वर्षों में भी कभी-कभी ही प्राप्त होता है।


५. पद्मपुराण

श्लोक
प्रेतयोनिगतानान्तु प्रेतत्वं नाशितं तैः।
यैः कृता श्रावणे मासि अष्टमी रोहिणीयुता॥
किं पुनर्बुधवारेण सोमेनापि विशेषतः॥
किं पुनर्नवमीयुक्ता कुलकोट्यास्तु मुक्तिदा॥

हिन्दी अनुवाद
जिन लोगों ने श्रावण मास में रोहिणी नक्षत्रयुक्त अष्टमी का व्रत किया, उनके प्रेतयोनि के दोष भी नष्ट हो जाते हैं। फिर यदि यह व्रत बुधवार या सोमवार को पड़े तो विशेष फल मिलता है। और यदि नवमी के संयोग वाली अष्टमी हो, तो यह कुल-कोटि (असंख्य पीढ़ियों) को भी मोक्ष देने वाली होती है।


६. भविष्यपुराण

श्लोक
एकेनैवोपवासेन कृतेन कुरुनन्दन।
सप्तजन्मकृतात् पापान्मुच्यते नात्र संशयः॥

हिन्दी अनुवाद
हे कुरुनन्दन! केवल एक बार भी यह उपवास (कृष्णजन्माष्टमी व्रत) करने से सात जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं।


७. भविष्योत्तरपुराण

श्लोक १
श्रावणेऽबहुले पक्षे कृष्णजन्माष्टमीव्रतम्।
न करोति नरो यस्तु स भवेत् क्रूरराक्षसः॥

हिन्दी अनुवाद
जो मनुष्य श्रावण मास के कृष्णपक्ष में कृष्णजन्माष्टमी व्रत नहीं करता, वह क्रूर राक्षस के समान होता है।


श्लोक २
वर्षे वर्षे च या नारी कृष्णजन्माष्टमीव्रतम्।
न करोति महाक्रूरा व्याली भवति कानने॥

हिन्दी अनुवाद
जो स्त्री प्रति वर्ष कृष्णजन्माष्टमी व्रत नहीं करती, वह महाक्रूर होकर वन में हिंसक नागिन (व्यालिनी) के रूप में जन्म लेती है।

       श्रीकृष्णका प्राकट्य-

श्रीगौड़ीय सम्प्रदाय के अनुयायी सन्तों की मान्यता है  कि जिस समय कारागार में श्रीवसुदेव-देवकी के सम्मुख चतुर्भुजरूप में भगवान्‌ प्रकट हुए थे, उसी समय नन्दबाबा के घर पर भी यशोदानन्दन के रूप में द्विभुजरूप में  भगवान प्रकट हुए थे। 

और यशोदा माता ने जुड़वाँ रूप में  दो सन्तानों को जन्म दिया था पुत्र का नाम गोविन्द और पुत्री का नाम अम्बिका था।  विदित हो कि भगवान का द्विभुजधारी गोप रूप गोलोक का शाश्वत रूप है। जबकि चतुर्भुज रूप वैकुण्ठ वासी विष्णु रूप है।

श्रीमद्भागवत, दशमस्कन्ध के पञ्चम अध्याय के प्रथम श्लोक में वर्णन आया है--

नन्दस्त्वात्मज उत्पन्ने जाताह्नादो महामनाः।

यह श्लोक श्रीमद्भागवतपुराण (स्कन्ध १०, अध्याय ५, श्लोक १) से है, जो कहता है कि पुत्र के उत्पन्न होने पर महान हृदय वाले नन्द को आनन्द हुआ, और उन्होंने स्नान व शुद्ध होकर अलंकार धारण किए तथा वेदज्ञ ब्राह्मणों को बुलाया। यह नन्द के पुत्र प्राप्ति के आनंद और जातकर्मादि उत्सव की प्रारम्भिकता का वर्णन करता है। पूर्ण श्लोक निम्नलिखित है।

नन्दस्त्वात्मज उत्पन्ने जाताह्लादो महामनाः।
आहूय विप्रान् वेदज्ञान् स्नातः शुचिरलंकृतः॥ १॥
वाचयित्वा स्वस्त्ययनं जातकर्मात्मजस्य वै।
कारयामास विधिवत् पितृदेवार्चनं तथा॥२।
अनुवाद:-
श्रीशुकदेवजी कहते हैंपरीक्षित्‌ ! नन्दबाबा बड़े मनस्वी और उदार थे । पुत्र का जन्म होने पर तो उनका हृदय विलक्षण आनन्द से भर गया । उन्होंने स्नान किया और पवित्र होकर सुन्दर-सुन्दर वस्त्राभूषण धारण किये । फिर वेदज्ञ ब्राह्मणों को बुलवाकर स्वस्तिवाचन और अपने पुत्र का जातकर्म-संस्कार करवाया । साथ ही देवता और पितरों की विधिपूर्वक पूजा भी करवायी ॥१-२॥

श्लोक का अर्थ नन्दस्त्वात्मज उत्पन्ने:
  • जब नन्द के पुत्र का जन्म हुआ।
  • जाताह्लादो महामनाः
    महान मन वाले नन्द आनन्दित हुए।
  • आहूय विप्रान् वेदज्ञान्:
    उन्होंने वेदों को जानने वाले ब्राह्मणों को बुलाकर।
  • स्नातः शुचिरलङ्कृतः:
    उन्होंने स्नान किया, शुद्ध हुए और अलंकार धारण किए।
आगे की जानकारी
  • नन्द ने तत्पश्चात विधिवत जातकर्मादि संस्कार करवाए और पितृ-देवताओं का पूजन किया। उन्होंने ब्राह्मणों को अलंकरणों से युक्त दस लाख गायें और सात रत्न तथा रेशमी वस्त्रों से युक्त तिलाद्रि (तिलों से भरे पर्वत) दान किए। 


श्रीनन्दजी के आत्मज स्वयं से उत्पन्न (पुत्र) होने पर उन महामना को परमाह्लाद हुआ।' 

श्रीनन्दजी के यहाँ भगवान्‌ पुत्ररूप में जन्म न  लेते तो शुकदेव जी 'आत्मज उत्पन्ने' पुत्र पैदा हुआ पद  न कहकर 'स्वात्मजं मत्वा' अपना पुत्र मानकर ' वाक्यपद कहते। जो उन्होंने ऐसा  नहीं  कही कहा। अत: व्याकरण की दृष्टि से भी कृष्ण गोविन्द नन्द के पुत्र हैं।

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कृष्ण यामल तन्त्र नामक ग्रन्थ में वर्णन है कि नन्द की पत्नी यशोदा के जुड़वां सन्तानें हुई एक लड़का हुआ और एक लड़की । लड़के का नाम गोविन्द और लड़की का नाम अम्बिका रखा गया जो मथुरा को चली गयी।५।

नन्दपत्न्यां यशोदायां मिथुनं सञ्जायत: । गोविन्दाख्यः पुमान् कन्या साम्बिका च मथुरां गता ।।५।

(कृष्ण यामल तन्त्र)

इतना ही नहीं विष्णु यामल में वर्णन है कि वसुदेव द्वारा ले जाए ग॒ए वासुदेव कृष्ण निश्चय ही नन्द पुत्र की आत्मा में विलीन हो गयी जैसे मेघों में बिजली समा जाती है।

वसुदेव: समानीतो वासुदेव किलात्मनि लीनो नन्दसुते राजन् घने सौदामिनी यथा।।६।

अनुवाद:-वसुदेव द्वारा लाये गये वासुदेव श्रीकृष्ण स्वयं नन्द पुत्र में लीन हो गये जैसे बिजली मेघों में विलीन हो जाती है।६।

(विष्णु यामल-तत्र)

इन महानुभावों का कहना है कि श्रीवसुदेव-देवकी की भक्ति ऐश्वर्यमिश्रित वात्सल्यमयी थी और श्रीनन्दयशोदा की भक्ति ऐश्वर्यगन्धशून्य विशुद्ध वात्सल्यमयी।

इसी से वसुदेव-देवकी के सामने भगवान्‌ शंख-चक्र-गदापद्मधारी चतुर्भुज अद्भुत बालक के रूप में आविर्भूत हुए। भगवान्‌ के इस ऐश्वर्यमय रूप को देखकर उन्होंने समझा कि श्रीभगवान्‌ नारायण हमारे पुत्ररूप में प्रकट हुए हैं; अतएव उन्होंने हाथ जोड़कर इनकी स्तुति की और भगवान ने भी पूर्व-जन्मों की स्मृति दिलाकर अपने साक्षात्‌ भगवान्‌ होने का परिचय दिया। 

इसमें ऐश्वर्य प्रत्यक्ष है। तदनन्तर वात्सल्य-भाव का उदय होनेपर कंस के भयसे उन्होंने भगवान्से बार-बार चतुर्भुजरूप को छिपाकर द्विभुज साधारण शिशु बनने के लिये अनुरोध किया।

इससे यह सिद्ध है कि श्रीवसुदेव-देवकी का वात्सल्य-प्रेम-ऐश्वर्यमिश्रित था और भगवान्‌ का ऐश्वर्यमय चतुर्भुजरूप ही उनका आराध्य था तथा वे उसको पुत्ररूप में प्राप्त करना तथा देखना चाहते थे। 

परन्तु इसके विपरीत श्रीनन्द-यशोदा का वात्सल्य-प्रेम विशुद्ध था, उसमें ऐश्वर्य-ज्ञान का तनिक भी सम्बन्ध नहीं था; इससे उनके सामने भगवान्‌ द्विभुज प्राकृत बालक के रूप में ही आविर्भूत हुए और उन्होंने कोई स्तुति-प्रार्थना भी नहीं की। यह द्विभुज रूप ही गोलोक का गोप रूप है। इसी रूप को 

पुत्र समझकर गोद में उठा लिया और नवजात बालक के कल्याणार्थ जातकर्मादि करवाये।

***

नन्दपत्नयां यशोदायां मिथुन: समपद्यत:। गोविन्दाख्यः पुमान्‌ कन्या साम्बिका मथुरां गता॥ 

यह प्रसिद्ध ही है कि भगवान्‌ उसी रूप में भक्त के सामने प्रकट होते हैं, जो रूप भक्त के मन में होता है। श्रीभागवत में श्रीब्रह्माजी ने कहा है--

त्वं भक्तियोगपरिभावितहृत्सरोज ।
आस्से श्रुतेक्षितपथो ननु नाथ पुंसाम् ।
यद् यद् धिया ते उरुगाय विभावयन्ति ।
तत्तद् वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥११॥

(भागवतपुराण-३/९/११)

भगवन्‌ ! आपके भक्त जिस स्वरूप की निरन्तर भावना करते हैं, आप आप उसी रूप में प्रकट होकर भक्तों की कामना पूर्ण करते हैं।'

श्रीमद्भागवत में जो यह स्पष्ट वर्णन नहीं आया है--इसका कारण यह बताया जाता है कि श्रीशुकदेवजी भक्तराज परीक्षित्‌ को कथा सुना रहे थे। परीक्षित्‌ का सम्बन्ध वसुदेवजी से था। अतः उन्हें विशेष आनन्द देने के लिये शुकदेवजी ने नन्दालय में भी भगवान्‌ के प्रकट होने का स्पष्ट वर्णन नहीं किया; परन्तु उनका प्रेमपूर्ण हृदय माना नहीं और इस श्लोक में उनके श्रीमुखसे “नन्दस्त्वात्मज उत्पन्ने ' के रूप में रहस्य प्रकट हो ही गया। 

श्रीमद्भागवतमें और भी संकेत है--कंस ने जब गोकुल से लायी हुई यशोदा की कन्या को देवकी की कन्या समझकर उसे मारने के लिये शिलापर पटकना चाहा, तब वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में चली गयी और देवीरूप से प्रकट हुई । उस समय भागवत में उसके लिये 'अदृश्यतानुजा विष्णो: ' अर्थात्‌ 'कंस ने भगवान्‌की अनुजा (छोटी बहिन)-को देखा '-यों लिखा है। पर यदि भगवान्‌ श्रीकृष्ण केवल श्रीदेवकी के पुत्र होते तो यशोदा की कन्या को भगवान्‌ की 'अनुजा' कहना युक्तियुक्त तथा सत्य न होता किन्तु परमानन्दघनविग्रह भक्तवाञ्छाकल्पत भक्तवाञ्छाकल्पतरु श्रीभगवान्‌ जिस समय कंस-कारागार में वसुदेव-आत्मजरूप में प्रकट हुए थे, ठीक उसी समय गोकुल में नन्दात्मज के रूप में भी वही भगवान् प्रकट हुए थे तथा उसी के थोड़ी देर बाद योगमाया कन्या के रूप में प्रकट हुई थीं। 

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श्रीहरिवंश में आया है-

गर्भकाले त्वसम्पूर्णे अष्टमे मासि ते स्त्रियौ। देवकी च यशोदा च सुषुवाते समं तदा ।११।

हरिवंशपुराण विष्णुपर्व अध्याय (4)

अर्थात्‌ गर्भकाल पूरा होने के पहले ही आठवें महीने में 'देवकी और यशोदा दोनों ने एक ही साथ प्रसव किया था।' 

इस तथ्य  पर यह कहा जा सकता है कि “जिस समय देवकी जी के भगवान्‌ पुत्ररूप में प्रकट हुए, उसी समय यशोदाजी के योगमाया प्रकट हुईं।' 

पर ऐसा कहना बनता नहीं; क्योंकि श्रीमद्भागवत (१०। ३। ४७) -में यह स्पष्ट उल्लेख है कि “' श्रीभगवान्‌ से प्रेरित वसुदेवजी ने पुत्र को गोद में लेकर कारागार से बाहर निकलने की इच्छा की, उस समय “योगमाया ' प्रकट हुईं।'

अतएव कारागार में भगवान का और गोकुल में योगमाया का प्राकट्य आगे-पीछे हुआ, एक ही समय नहीं हुआ था। इस तथ्य पर भी यह कहा जा सकता है कि गोकुलमें ' भगवान्‌ प्रकट हुए ! इसमें स्पष्ट प्रमाण क्या है ? तो इसके समाधान में ' श्रीकृष्णयामल तन्त्र' नामक ग्रन्थ का कहना है कि नन्द पत्नी यशोदा के यमज( जुड़वाँ) संतान हुई थी; पहले एक पुत्र हुआ, तदनन्तर एक कन्या हुई पुत्र साक्षात्‌ श्रीगोविन्द थे और कन्या थी स्वयं अम्बिका (योगमाया)। 

यशोदा की इस कन्या को ही वसुदेवजी मथुरा ले गये थे- 

इस स्पष्टोक्ति से योगमायाको 'श्रीकृष्ण की अनुजा'(छोटी बहिन)  कहा जाना भी सार्थक हो गया।

इस विषय पर फिर कहा जा सकता है--' श्रीवसुदेव जी जब शिशु श्रीकृष्ण को लेकर गोकुल गये, तब वहाँ उन्हें केवल शिशु बालिका ही क्‍यों दिखायी दी, बालक क्‍यों नहीं दिखायी दिया ? और बालक भी था तो फिर वह बालक कहाँ गया ? वहाँ दो बालक होने चाहिये।' 

इस शंका का समाधान यह है कि इनके वहाँ पहुँचते ही उसी क्षण इन वसुदेव बालक उस नन्दबालक में विलीन हो गया। इन्हें पता ही नहीं लगा कि वहाँ कोई बालक और भी था। वरिष्ठ महानुभावों ने यहाँ तक माना है कि जिस समय कंस के कारागार में देवकी ने यह प्रबल इच्छा की कि श्रीभगवान्‌ के चतुर्भुजरूप का गोपन हो जाय, उसी समय यशोदा हृदयस्थ भगवान्‌ का द्विभुज बालकरूप उस चतुर्भुजरूप को छिपाकर देवकी के सामने आविर्भूत हो गया (यदा स्वाविर्भूतचतुर्भुजरूपाच्छादनाय श्रीदेवकीच्छाजायत, तदा यशोदाहदयस्थद्विभुजरूपस्य तद्रूपाच्छादनपूर्वकाविर्भावस्तत्रासीदिति गम्यते--'वैष्णवतोषिणी')। 

यशोदा के यहाँ प्रकट भगवान्‌ वहाँ से तुरन्त यहाँ आकर प्रकट हो गये और उनमें भगवान्‌ का शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी चतुर्भुजरूप तुरन्त वैसे ही विलीन हो गया, जैसे बादल में बिजली विलीन हो जाती है-

वसुदेवसुतः श्रीमान्‌ वासुदेवोऽखिलात्मनि। लीनो नन्दसुते राजन ! घने सौदामनी यथा॥ 6। (श्रीकृष्णयामल तन्त्र )

देवक्‍यां देवरूपिण्यां. विष्णु: सर्वगुहाशयः। आविरासीद्‌ यथा प्राच्यां दिशीन्दुरिव पुष्कलः॥  भागवत पुराण-(१०। ३। ८)

यहाँ 'देवकी' शब्द 'देहली-दीपक' न्याय से श्रीदेवकीजी और श्रीयशोदाजी दोनोंका ही वाचक हैक्योंकि यशोदाजीका भी दूसरा नाम 'देवकी' था। 

श्रीहरिवंशपुराण में आया है-

द्वे नाम्नी नन्‍दभार्याया यशोदा देवकीति च। अतः सख्यमभूत्तस्या देवक्या शौरिजायया॥ अनुवाद:-“नन्दभार्या यशोदा के यशोदा और देवकी-दो नाम थे, इसीलिये उनका नामसाम्य के कारण वसुदेव-पत्नी देवकी से सख्यभाव था।' 

इस वाक्य से भी यह कहा जा सकता है कि सांकेतिक भाषा में श्रीशुकदेवजीने दोनों जगह भगवान्‌ के प्राकट्य की बात कह दी। एक अस्पष्ट संकेत और भी है-

यशोदा नन्दपत्नी च जातं॑ परमबुध्यत। न तल्लिड्रं परिश्रान्तना निद्रयापगतस्मृतिः॥ 

(श्रीमद्भागवत पुराण- १०। ३। ५३) 

नन्दपत्नी यशोदा को यह तो ज्ञात हुआ कि संतान हुई है; परंतु श्रम और निद्रा (भगवत्प्रेरित स्वजनमोहिनी माया)-के कारण अचेत होने से वे यह न जान सकीं कि पुत्र है या कन्या! इससे भी नन्दालय में भगवान्‌ के प्राकट्य का संकेत है। महानुभावों का कहना है कि भगवान्‌ के दो रूप हैं--'ऐश्वर्य सम्पन्न' और 'ब्राह्म सम्पन्न। 'ऐश्वर्य' मायायुक्त है और “ब्राह्म' स्वरूप मायातीत है। अचिन्त्यानन्त-अतुलनीय-कल्याण-गुणगणसम्पन्न स्वमायाविशिष्ट ' ऐश्वर्य' रूप के द्वारा इस विश्वब्रह्माण्ड का सृजन-पालन आदि होता है। भगवान्‌का शुद्ध ब्रह्मस्वरूप उत्पादन-पालनादि लीलाओं से रहित, केवल आनन्दप्रेममय है। अत: वसुदेवजी के यहाँ जिस रूप का प्राकट्य हुआ था, वह “ऐश्वर्य"' रूप था और “नन्दात्मज' रूप से ब्रह्मस्वरूप गोलोक रूप से भगवान्‌ अवतरित हुए थे। श्रीवसुदेवजीके यहाँ आविर्भूत 'ऐश्वर्य ' रूप और नन्दात्मज ब्राह्मस्वरूप में ब्राह्मस्वरूप गोपनरूप से गोपांगनाओं के साथ ब्रजमण्डल में रह गया। यही “वृन्दावन परित्यज्य पादमेक॑ न गच्छति' का रहस्य है।

यद्यपि श्रीभागवतमें इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं है तथा यह क्लिष्ट कल्पना-सी भी है, तथापि महानुभावोंके उपर्युक्त विवेचनके अनुसार श्रीभगवान्‌ “नन्दात्मज' रूपमें भी अवतीर्ण हुए हों तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। 




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