गुरुवार, 12 मार्च 2026

यदुवंश संहिता या नवीनतम संस्करण ( आत्मा नन्द) भाग तृतीय-


अध्याय- १ भाग (ख)- श्रीकृष्ण का ऐतिहासिक परिचय- 👇

(ख)- ऐतिहासिक परिचय-

यह भाग उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो भगवान श्रीकृष्ण को अनैतिहासिक मानकर श्रीकृष्ण को एक काल्पनिक (व्यक्ति) कैरेक्टर मानते हैं। जबकि उन लोगों को यह पता नहीं है कि श्रीकृष्ण की सत्ता काल्पनिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक है। इसी बात को अच्छी तरह से समझने के लिए इसे चार प्रमुख भागों में बाँटा गया है-
(क) पुरातात्विक परिचय (ख)- अभिलेखीय परिचय।
(ग) खगोलीय साक्ष्य (घ) साहित्यिक साक्ष्य


(क) पुरातात्विक परिचय


भगवान श्रीकृष्ण की ऐतिहासिकता एक ऐसा विषय है जहाँ आध्यात्मिक विश्वास और वैज्ञानिक शोध का मिलन होता है। आधुनिक इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के अनुसार, अब श्रीकृष्ण को केवल पौराणिक ही नहीं अपितु ऐतिहासिक भी मनना पडे़ेगा। क्योंकि कई ठोस साक्ष्य उनकी ऐतिहासिकता की ओर इशारा करते हैं। जैसे-


1. द्वारका नगरी की खोज (समुद्र के भीतर)

वर्तमान में श्रीकृष्ण की ऐतिहासिकता सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक प्रमाण गुजरात के तट पर बेट द्वारका में मिला है। इसके लिए 1980 के दशक में डॉ. एस.आर. राव (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) के नेतृत्व में समुद्र के भीतर खुदाई की गई जिसमें समुद्र के भीतर एक विशाल जलमग्न शहर के अवशेष मिले हैं। उन अवशेषों में शहर के किले की दीवारों, स्तम्भों और पत्थर के लंगर तथा मोहरें प्राप्त हुई हैं, जिनका काल 1500-1700 ईसा पूर्व के आसपास का बताया गया बताया गया है जो महाभारत काल से सम्बन्धित है।

फिर भी कुछ लोग कह सकते हैं कि डॉ. एस.आर. राव जिन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधीन रहकर समुद्र के भीतर जिस द्वारका नगरी की खोज किये हैं उसकी कितनी प्रमाणिकता है? तो इस तरह का प्रश्न उठना स्वाभाविक भी है और इसका समाधान करना आवश्यक भी है।

तो इस सम्बन्ध में बता दें कि- डॉ. एस.आर. राव (शिकारीपुरा रंगनाथ राव) को भारतीय पुरातत्व के क्षेत्र में एक अत्यन्त विश्वसनीय और प्रतिष्ठित नाम है। उनके ऐतिहासिक खोजें पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं है। क्योंकि उनके ऐतिहासिक शोधों की प्रमाणिकता को निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है-

(1) पहला यह कि- शिकारीपुरा रंगनाथ राव जी समुद्री पुरातत्व के जनक माने जाते हैं। क्योंकि भारत में 'समुद्री पुरातत्व' (Marine Archaeology) विषय को शुरू करने का श्रेय उन्हीं को जाता है। उन्होंने गोवा स्थित राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (NIO) में समुद्री पुरातत्व अनुसन्धान केंद्र की स्थापना की, जो आज एक विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त संस्थान है।

(2)- दूसरा यह कि उन्होंने ही सिन्धु घाटी सभ्यता के प्रसिद्ध बन्दरगाह शहर 'लोथल' की खोज और खुदाई का नेतृत्व किया था, जो विश्व इतिहास के सबसे प्राचीन बन्दरगाहों में से एक है। जो आज विश्व इतिहास के पन्नों में दर्ज है। हालांकि उनके निष्कर्षों (जैसे सिंधु लिपि को पढ़ना) पर कुछ विद्वानों के बीच अकादमिक बहस रही है, लेकिन एक पुरातत्वविद् के रूप में उनके द्वारा खोजे गए भौतिक अवशेषों की वैज्ञानिक प्रमाणिकता को पूरी दुनिया स्वीकार करती है।

(3)- तीसरा यह कि- उनकी खोजों के लिए उन्हें कई वैश्विक स्तर पर पुरस्कार भी मिले हैं। जिनमें 'वर्ल्ड शिप ट्रस्ट अवार्ड' (इंडिविजुअल अचीवमेंट इन मैरीटाइम आर्कियोलॉजी) और जवाहरलाल नेहरू फैलोशिप शामिल हैं।

(4) शिकारीपुरा रंगनाथ राव भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्य चुके हैं और सेवानिवृत्ति के बाद भी उनकी विशेषज्ञता के कारण भारत सरकार ने उन्हें पुनः महत्वपूर्ण परियोजनाओं का नेतृत्व करने के लिए आमन्त्रित किया।

अब इतने बड़े इतिहासकार की ऐतिहासिक शोधों पर वहीं लोग अविश्वास करतें हैं जो किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं या फिर मानसिक रूप से विक्षिप्त हैं।



(ख) अभिलेखीय परिचय।


भगवान श्रीकृष्ण की ऐतिहासिकता की पुष्टि पुरालेख और शिलालेखों से भी होती हैं। उनके कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं-

(1)- हेलियोडोरस का स्तम्भ- 

मध्य प्रदेश के विदिशा में 113 या 110 ईसा पूर्व का एक स्तंभ है। इसे एक यूनानी राजदूत हेलियोडोरस ने बनवाया था, जिसने खुद को 'भागवत' कहा और 'देवदेवस वासुदेव' (देवताओं के देव वासुदेव) की पूजा का उल्लेख किया। यह सिद्ध करता है कि उस समय तक कृष्ण की पूजा एक स्थापित ऐतिहासिक तथ्य थी।
हालांकि यह वैष्णव धर्म से अधिक जुड़ा है, लेकिन इसकी प्राचीनता (110 ईसा पूर्व) उस समय श्रीकृष्ण की लोकप्रियता को दर्शाती है जिसका विस्तार जैन साहित्य में भी उसी कालखंड में हुआ था।



जैन शिलालेखों में श्रीकृष्ण (वासुदेव) का उल्लेख-

श्रीकृष्ण का नाम केवल ग्रंथों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कुछ प्राचीन शिलालेखों में भी उनके अस्तित्व और जैन धर्म से उनके संबंध के प्रमाण मिलते हैं-

हाथीबाड़ा-घोसुंडी शिलालेख (राजस्थान)-

दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के इन शिलालेखों को भारत के सबसे प्राचीन संस्कृत शिलालेखों में गिना जाता है। कुछ इतिहासकारों का तर्क है कि ये शिलालेख जैन धर्म से संबंधित हो सकते हैं क्योंकि इनमें 'जिना' का उल्लेख मिलता है। इनमें संकर्षण (बलराम) और वासुदेव (कृष्ण) के लिए पूजा गृह (नारायण वाटिका) बनाने का वर्णन है।


मोरा पत्थर शिलालेख (मथुरा)-

यह शिलालेख मथुरा के पास मिला है। यह पहली शताब्दी ईसवी का शिलालेख है जो 'पांच वृष्णि नायकों' (Vrishni Heroes) का उल्लेख करता है, जिनमें श्रीकृष्ण (वासुदेव), बलराम (संकर्षण), प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और शाम्ब के नाम शामिल हैं। जैन धर्म में इन सभी को शलाका पुरुष या मोक्षगामी महापुरुष माना गया है।


कंकाली टीला (मथुरा)-

मथुरा के इस प्रसिद्ध जैन स्थल से प्राप्त शिलालेखों और मूर्तियों में यदुवंशी नायक कृष्ण और बलराम के चित्र तीर्थंकरों (विशेषकर भगवान नेमिनाथ) के साथ अंकित मिलते हैं, जो उनके ऐतिहासिक समकालीन होने की पुष्टि करते हैं।


(ग) खगोलीय साक्ष्य-

डॉ. एस. कल्याणरमन और अन्य शोधकर्ताओं ने 'प्लैनेटेरियम सॉफ्टवेयर' के माध्यम से महाभारत में वर्णित ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति का विश्लेषण किया है। उनके अनुसार, महाभारत युद्ध की खगोलीय गणना 3137 ईसा पूर्व के आसपास बैठती है, जो कृष्ण के समय की पुष्टि करती है। यह गणना कैसे की गई इसको नीचे बताया गया है।


महाभारत में महर्षि वेदव्यास ने युद्ध के समय ग्रहों और नक्षत्रों की जो विशिष्ट स्थितियाँ बताई हैं, वे किसी 'फिंगरप्रिंट' की तरह अद्वितीय हैं। सॉफ्टवेयर में मुख्य रूप से इन तीन तथ्यों का उपयोग किया गया है-

(1) अमावस्या और ग्रहण का संयोग-
महाभारत ग्रंथ में उल्लेख है कि युद्ध से ठीक पहले एक ही महीने में दो ग्रहण (सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण) लगे थे और अमावस्या के दिन युद्ध की तैयारी शुरू हुई थी।

(2) ग्रहों की वक्री चाल-
व्यास जी ने मंगल और शनि जैसे ग्रहों के नक्षत्रों के सापेक्ष पीछे की ओर चलने (वक्री होने) का सटीक वर्णन किया है। उदाहरण के लिए, 'मघा' नक्षत्र में मंगल और 'रोहिणी' में शनि की स्थिति।

(3) भीष्म पितामह का देह त्याग-
भीष्म पितामह ने सूर्य के 'उत्तरायण' होने की प्रतीक्षा की थी। सॉफ्टवेयर के माध्यम से उस विशेष दिन (शीतकालीन संक्रांति की गणना की गई जब चंद्रमा की स्थिति 'अष्टमी' थी।
खगोल वेत्ता- पुष्कर भटनागर और सरोज बाला ने अपने शोधों में इन्ही इनपुट्स को Voyager और Stellarium जैसे सॉफ्टवेयर में डालकर यह निष्कर्ष निकाला कि ये स्थितियाँ 3137 ईसा पूर्व या 3067 ईसा पूर्व (अलग-अलग मतों के अनुसार) में सटीक बैठती हैं।

जिस खगोलीय गणनाओं (Archaeo-astronomy) के आधार पर महाभारत युद्ध का समय निकाला गया है, उसी सिद्धांतों से पुष्कर भटनागर जैसे विद्वानों ने श्रीकृष्ण की जन्म तिथि को भी निर्धारित किया है। उन्होंने गणना करके बताया है कि- श्रीकृष्ण के जन्म के समय (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र) की थी। उसके अनुसार सबसे स्वीकृत तिथि निम्नलिखित है-

श्रीकृष्ण की जन्म तिथि-
🔆 तारीख: 27 जुलाई, 3112 ईसा पूर्व
🔆 समय: मध्यरात्रि (12:00 AM)
🔆 स्थान: मथुरा (77° 41' E, 27° 28' N)

सॉफ्टवेयर गणना के मुख्य आधार (Input Data):
सॉफ्टवेयर में महाभारत और पुराणों में वर्णित उस समय की ग्रह स्थितियों को फीड किया गया था वह निम्नलिखित है-

(1) नक्षत्र-
चंद्रमा 'रोहिणी' नक्षत्र में था।

(2) तिथि-
भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की 'अष्टमी' तिथि थी

(3) ग्रहों की स्थिति-
उस समय चंद्रमा, सूर्य, मंगल, बुध, गुरु और शुक्र अपने उच्च के या अनुकूल भावों में थे, जैसा कि प्राचीन ग्रंथों में 'असाधारण महापुरुष' के जन्म के लिए वर्णित है।

यदि उनका जन्म 3112 ईसा पूर्व में हुआ, तो उनका देह त्याग (निर्वाण) 3012-3102 ईसा पूर्व के आसपास माना जाता है, जिससे कलियुग के आरम्भ की गणना भी जुड़ी हुई है।

श्रीकृष्ण के जीवन काल की गणना-

पौराणिक साक्ष्यों के आधार पर यह माना जाता है कि श्रीकृष्ण लगभग 125 वर्ष तक पृथ्वी पर रहे। इस बात की पुष्टि -श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें  स्कन्ध के अध्याय-(६) के श्लोक संख्या -(२३) और (२५) में ब्रह्मा जी श्री कृष्ण से कहते हैं कि-

अवततीर्य यदोर्वंशे बिभ्रद् रुपमनुत्तमम्।
कर्माण्युद्दामवृत्तानि हिताय जगतोऽकृथाः।। २३।
यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरूषोत्तम।
शरच्छतं व्यतीताय पंचविंशाधिकं प्रभो।।२५।       
    
अनुवाद - आपने यह सर्वोत्तम रूप धारण करके यदुवंश में अवतार लिया और जगत् के हित के लिए उदारता और पराक्रम से भरी अनेक लीलाएँ कीं ।२३।
• पुरुषोत्तम सर्वशक्तिमान प्रभु ! आपको यदुवंश में अवतार ग्रहण किये "एक सौ पचीस वर्ष" बीत गए हैं।२५।

यदि पौराणिक और खगोलीय गणनाओं के अनुसार देखा जाए तो श्रीकृष्ण के देह त्याग और कलियुग के आरम्भ के बीच एक गहरा सम्बन्ध है, जिसे 'जीरो पॉइंट' माना जाता है। इसके लिए नीचे देखें-

निर्वाण और कलियुग का प्रारम्भ-
विष्णु पुराण और भागवत पुराण के अनुसार, जिस क्षण श्रीकृष्ण ने अपनी इहलीला समाप्त कर स्वधाम गमन किया, उसी क्षण से पृथ्वी पर कलियुग का प्रभाव शुरू हो गया। अब यह कितना सत्य है इसको भी जानना आवश्यक है।

सटीक समय (3102 ईसा पूर्व)- महान भारतीय गणितज्ञ आर्यभट्ट ने अपने ग्रन्थ 'आर्यभटीय' में उल्लेख किया है कि जब वे 23 वर्ष के थे, तब कलियुग के 3600 वर्ष बीत चुके थे। इस गणना के आधार पर कलियुग का प्रारम्भ 18 फरवरी, 3102 ईसा पूर्व (मध्यरात्रि) को हुआ माना जाता है। इसकी गणना कुछ इस से प्रकार की गई-

(1) खगोलीय साक्ष्यों के अनुसार, इस विशेष तिथि पर सौरमण्डल के सात प्रमुख ग्रह (सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि) एक ही राशि (मेष) और एक ही बिन्दु पर संरेखित (Align) थे। ऐसी दुर्लभ घटना हजारों वर्षों में एक बार होती है।
(2) द्वारका का डूबना- महाभारत के 'मौसल पर्व' के अनुसार, कृष्ण के देह त्याग के ठीक 7 दिन बाद विशाल समुद्री लहरों ने द्वारका नगरी को डुबो दिया था। डॉ. एस.आर. राव को समुद्र के नीचे जो अवशेष मिले, वे इस जलप्रलय की पुष्टि करते हैं। इस बात को हम पहले ही बता चुका हूँ।
इस प्रकार से श्रीकृष्ण का भू-लोक से अपने धाम गोलोक को जाना एक सामान्य घटना नहीं थी, बल्कि भारतीय काल-गणना के अनुसार एक युग परिवर्तन की घटना थी जो आज भी वैज्ञानिक व ऐतिहासिक दृष्टिकोण से ध्रुव सत्य है।



(घ) साहित्यिक साक्ष्य


(क) जैन ग्रंथों में श्रीकृष्ण नाम व चरित्र -

जैन ग्रंथ- हरिवंश पुराण, उत्तरपुराण और पांडवपुराण में श्रीकृष्ण का विस्तृत वर्णन मिलता है, जहाँ उन्हें एक शलाका पुरुष और अर्ध-चक्रवर्ती के रूप में पहचाना गया है। जैन धर्म में श्रीकृष्ण के नाम और पदवी के बारे में मुख्य तथ्य निम्नलिखित हैं-

(१) वासुदेव (नारायण)-  जैन आगमों के अनुसार, कृष्ण नौवें (अंतिम) वासुदेव हैं।

(२) शलाका पुरुष-  जैन धर्म के 63 विशिष्ट महापुरुषों (शलाका पुरुषों) में कृष्ण का स्थान महत्वपूर्ण है।

(३) अर्ध-चक्रवर्ती-  उन्हें 'अर्ध-चक्रवर्ती' कहा गया है क्योंकि उन्होंने आधे भारत (दक्षिण भारत) पर शासन किया था।

प्रमुख जीवन घटनाएँ और जानकारी-

जैन ग्रंथ हरिवंश पुराण के अनुसार भगवान नेमिनाथ और श्रीकृष्ण सगे चचेरे भाई थे। जैन धर्म में उन्हें अरिष्टनेमि के नाम से भी जाना जाता है और वे 24 तीर्थंकरों की श्रेणी में 22वें तीर्थंकर हैं।

जैन पुराणों में उल्लेख है कि श्रीकृष्ण ने ही भगवान नेमिनाथ का विवाह जूनागढ़ की राजकुमारी राजुल (राजीमती) से तय कराया था। विवाह के समय जब नेमिनाथ ने वध के लिए एकत्रित किए गए मूक (निर्दोष) पशुओं की चीख सुनी, तो उनका मन द्रवित हो गया और उन्होंने श्रीकृष्ण के सामने ही राजसी वैभव त्याग कर वैराग्य ले लिया।

उपर्युक्त प्रसंग श्रीकृष्ण और भगवान नेमिनाथ के बीच की शक्ति-परीक्षा और नेमिनाथ के वैराग्य से जुड़ा है। जैन ग्रंथों (जैसे हरिवंश पुराण) के अनुसार यह घटना काफी रोचक है। उसको निम्नलिखित घटना क्रम से जान सकते हैं-


(1) बल की परीक्षा (शंख वादन)

श्रीकृष्ण को अपनी शक्ति पर गर्व था, लेकिन उन्हें संदेह था कि उनके चचेरे भाई नेमिनाथ उनसे भी अधिक शक्तिशाली हैं। एक दिन श्रीकृष्ण के शस्त्रागार में रखा 'पञ्चजन्य' शंख (जिसे केवल वासुदेव ही बजा सकते थे) नेमिनाथ ने खेल-खेल में उठा लिया और उसे इतनी जोर से बजाया कि पूरी द्वारिका कांप उठी।
जब श्रीकृष्ण को पता चला कि यह उनके छोटे भाई नेमिनाथ ने किया है, तो उन्होंने उनकी शक्ति की परीक्षा लेने के लिए उन्हें मल्ल-युद्ध के लिए ललकारा। नेमिनाथ ने मुस्कुराते हुए केवल अपनी एक अंगुली श्रीकृष्ण के सामने रख दी और कहा कि यदि आप मेरी इस एक कनिष्ठा अंगुली को भी झुका देंगे, तो मैं हार मान लूँगा। श्रीकृष्ण ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी, लेकिन वे नेमिनाथ की अंगुली को टस से मस नहीं कर पाए।


(2) वैराग्य की ओर मोड़

श्रीकृष्ण ने सोचा कि यदि नेमिनाथ जैसे शक्तिशाली महापुरुष का विवाह नहीं हुआ, तो वे संसार त्याग कर मुनि बन जाएंगे। इसलिए श्रीकृष्ण ने ही नेमिनाथ का विवाह उग्रसेन की पुत्री राजुल (राजीमती) से तय करवाया।


(3) पशुओं की करुण पुकार

जब नेमिनाथ की बारात महल के द्वार पर पहुँची, तो उन्होंने बाड़े में बंद हजारों असहाय पशुओं को रोते और चिल्लाते देखा। पूछने पर पता चला कि ये पशु उन्हीं की बारात के भोजन के लिए मारे जाने वाले हैं।

यह सुनकर नेमिनाथ का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने तत्क्षण विवाह का विचार त्याग दिया और अपने आभूषण उतारकर श्रीकृष्ण को सौंप दिए। श्रीकृष्ण के समझाने के बावजूद, नेमिनाथ गिरनार पर्वत (जूनागढ़) पर चले गए और वहां तपस्या कर कैवल्य ज्ञान प्राप्त किया।

जैन ग्रंथों (जैसे हरिवंश पुराण और नेमिनाथ चरित) के अनुसार, भगवान नेमिनाथ के वैराग्य धारण करने के बाद राजकुमारी राजुल (राजीमती) का जीवन पूरी तरह बदल गया। उनकी कहानी त्याग और समर्पण की एक अद्भुत मिसाल है, इसको निम्नलिखित सन्दर्भों से समझा जा सकता है-

1- विलाप और दुख

जब राजुल को पता चला कि उनके होने वाले पति (नेमिनाथ) बारात के द्वार से ही लौट गए हैं और दीक्षा लेने गिरनार पर्वत चले गए हैं, तो वे गहरे शोक में डूब गईं। उन्होंने तय किया कि यदि वे नेमिनाथ की पत्नी नहीं बन सकीं, तो वे किसी अन्य पुरुष से विवाह नहीं करेंगी।


2- वैराग्य का मार्ग

राजुल ने संसार के भोग-विलास को त्यागने का निश्चय किया। उन्होंने अपने सुंदर वस्त्र और आभूषण उतार फेंके और अपनी सखियों के समझाने के बावजूद नेमिनाथ के मार्ग पर चलने का फैसला किया।


3- दीक्षा और साधना

वे गिरनार पर्वत पर गईं और भगवान नेमिनाथ के चरणों में दीक्षित होकर आर्यिका (जैन साध्वी) बन गईं। जैन परंपरा के अनुसार, वे भगवान नेमिनाथ के समवशरण (धर्म सभा) में प्रमुख साध्वी (गणिनी) बनीं।


4- मोक्ष की प्राप्ति

कठोर तपस्या और आत्म-साधना के बल पर राजुल ने अपने कर्मों का क्षय किया। अंत में, उन्होंने भी उसी गिरनार पर्वत से निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया, जहाँ से भगवान नेमिनाथ को मोक्ष मिला था।



जैन ग्रंथों में श्रीकृष्ण की पत्तियों का उल्लेख-


जैन आगम 'अंतकृतदशांग सूत्र' और 'हरिवंश पुराण' में श्रीकृष्ण की आठ प्रमुख रानियों (पटरानियों) का विस्तार से वर्णन मिलता है। जैन धर्म के अनुसार इन आठों रानियों ने अंत में भगवान नेमिनाथ से दीक्षा ली और मोक्ष प्राप्त किया।
इनके नाम इस प्रकार हैं-

रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, लक्ष्मणा, सुसीमा, गौरी
पद्मावती, और गांधारी।

जैन ग्रंथों के अनुसार श्रीकृष्ण की मृत्यु और द्वारिका के विनाश के बाद, इन सभी रानियों का संसार से मोह भंग हो गया। और वे भगवान नेमिनाथ के समवशरण (धर्म सभा) में राजुल (राजीमती) के पास जाकर जैन दीक्षा ग्रहण की और सभी एक साथ साध्वी बन गईं। तद्पोपरांत इन रानियों ने 'गुणरत्न संवत्सर' नामक बहुत ही कठिन उपवास और तपस्या की और अपनी साधना के बल पर इन सभी ने शत्रुंजय पर्वत (पालीताना, गुजरात) से निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया।


जैन ग्रंथों में श्रीकृष्ण के पुत्रों का उल्लेख-

जैन ग्रंथों (विशेषकर अंतकृतदशांग सूत्र) के अनुसार, श्रीकृष्ण के पुत्रों का वर्णन बहुत ही गौरवशाली है। उन्होंने न केवल युद्ध कौशल दिखाया, बल्कि अंत में आत्म-कल्याण का मार्ग चुनकर मोक्ष प्राप्त किया।
मुख्य रूप से प्रद्युम्न और शाम्ब का वर्णन इस प्रकार है-


(1) प्रद्युम्न कुमार

ये श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के पुत्र थे। इस बात की पुष्टि हिंदू पौराणिक ग्रन्थों से भी होती है। किन्तु हम यहाँ पर जैन ग्रंथ (विशेषकर अंतकृतदशांग सूत्र) के अनुसार, ही श्रीकृष्ण के पुत्रों का वर्णन करुंगा।

जैन ग्रंथ के अनुसार हुआ यह कि प्रद्युम्न कुमार के जन्म के तुरंत बाद एक देव ने इनका अपहरण कर लिया था, जिसके बाद इनका पालन-पोषण कालसंवर नामक राजा के यहाँ हुआ। बाद में इन्होंने अपनी शक्ति से सबको पराजित किया और द्वारिका लौटे।
श्रीकृष्ण के समझाने और भगवान नेमिनाथ के उपदेशों से प्रभावित होकर प्रद्युम्न ने संसार त्यागने का निर्णय लिया।
इसके बाद उन्होंने शत्रुंजय पर्वत (पालीताना) पर कठोर तपस्या की और वहीं से निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया। जैन धर्म में उन्हें 'कामदेव' की पदवी भी दी गई है।


(2) शाम्ब कुमार

जैन ग्रंथ अंतकृतदशांग सूत्र के अनुसार, शाम्ब कुमार श्रीकृष्ण की पत्नी जाम्बवती के पुत्र थे। (ऐसी बात हिंन्दू पौराणिक ग्रन्थों में भी मिलती है।)
शाम्ब और प्रद्युम्न की जोड़ी जैन पुराणों में बहुत प्रसिद्ध है। दोनों ने साथ में दीक्षा ली थी। इन्होंने भी मुनि बनकर घोर तप किया। कहा जाता है कि शत्रुंजय पर्वत पर इनके साथ साढ़े आठ करोड़ मुनियों ने मोक्ष प्राप्त किया था।


(3) श्रीकृष्ण के अन्य पुत्र और यादव कुमारों का उल्लेख-

जैन मान्यताओं के अनुसार, श्रीकृष्ण के कई अन्य पुत्रों (जैसे गद, सारण, अनिरुद्ध) ने भी भगवान नेमिनाथ से दीक्षा ली थी।
एक विशेष तथ्य:
जैन पुराणों के अनुसार, जब द्वारिका नगरी में आग लगी थी, तब श्रीकृष्ण ने अपने इन पुत्रों को मुनि धर्म का पालन करते देख संतोष व्यक्त किया था कि कम से कम वे तो जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो गए।




जैन ग्रंथों के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म और स्थान-

जैन ग्रंथों के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म शौरीपुर (मथुरा के पास) में राजा वसुदेव और देवकी के सातवें पुत्र के रूप में हुआ था। जैन दर्शन के अनुसार उनका जन्म श्रावण शुक्ला द्वादशी को हुआ था। तथा उनकी मृत्यु कौशांबी वन में जराकुमार (उनके भाई के पुत्र) के बाण लगने से हुई थी। मृत्यु के समय उन्होंने सोलहकारण भावनाओं का चिंतन किया था।

हिंदू धर्म से भिन्नता-

हिंदू धर्म में कृष्ण को परिपूर्णतम परमंब्रह्म माना गया है, जबकि जैन धर्म उन्हें एक ऐतिहासिक और शक्तिशाली महायोद्धा (कर्मवीर) के रूप में देखता है जो कर्म के नियमों के अधीन थे।



बौद्ध साहित्यों में श्रीकृष्ण का उल्लेख



जिस तरह से जैन साहित्यों में श्रीकृष्ण का उल्लेख मिलता है उसी तरह से बौद्ध साहित्यों में भी मिलता है, लेकिन उनका चित्रण हिंदू धर्म के पारंपरिक स्वरूप से काफी भिन्न है।

बौद्ध ग्रंथों में श्रीकृष्ण के उल्लेख के होने का मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं।


(1) घट जातक कथाएं

जातक कथाएं मूल रूप से लिखित ग्रंथों के रूप में पन्नों और पत्थरों दोनों रूपों में लिखी गई हैं। प्राचीन काल में जातक कथाओं को आम जनता तक पहुँचाने के लिए उन्हें स्तूपों की रेलिंग और तोरणों (द्वारों) पर उकेरा गया था। इसके प्रमुख उदाहरण भरहुत, सांची और अमरावती के स्तूपों में मिलते हैं, जहाँ इन कहानियों के दृश्यों को पत्थरों पर बहुत ही खूबसूरती से तराशा गया है। अजंता की गुफाओं की दीवारों पर भी इनके चित्र और नक्काशी मौजूद हैं।
पन्नों पर (साहित्यिक ग्रंथ): जातक कथाएं बौद्ध धर्म के पवित्र साहित्य का एक विशाल हिस्सा हैं। इन्हें मुख्य रूप से पालि भाषा में लिखा गया था और ये 'खुद्दक निकाय' नामक ग्रंथ का हिस्सा हैं। समय के साथ इन्हें ताड़ के पत्तों और बाद में कागज़ के पन्नों पर संकलित किया गया ताकि इन्हें पढ़ा और पढ़ाया जा सके।

संक्षेप में, जहाँ पत्थरों की नक्काशी ने इन्हें अमर बनाया और अनपढ़ लोगों तक पहुँचाया, वहीं लिखित ग्रंथों (पन्नों) ने इनके दार्शनिक और नैतिक संदेशों को सुरक्षित रखा।
श्रीकृष्ण से संबंधित कुछ जातक कथाओं का उल्लेख निम्नलिखित है-


घट जातक सबसे प्रमुख बौद्ध ग्रंथ है जिसमें कृष्ण की कहानी विस्तार से मिलती है। इसमें कृष्ण (जिन्हें 'कण्ह' कहा गया है) को 'वासुदेव' के रूप में चित्रित किया गया है। इस कथा के अनुसार, वे दस भाइयों (अंधकवेणु पुत्रों) में से एक थे जिन्होंने कंस का वध किया और द्वारका पर शासन किया।

घट जातक कथा में जिसमें श्रीकृष्ण (वासुदेव) और उनके भाइयों की कहानी को एक अलग दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है। यहाँ इस कथा के प्रमुख विस्तार दिए गए हैं।


(1) श्रीकृष्ण का जन्म और परिवार

हिंदू परंपरा के विपरीत, जहाँ मुख्य रूप से कृष्ण और बलराम की चर्चा होती है, घट जातक में वासुदेव (कृष्ण) 10 भाइयों में सबसे बड़े थे और उनकी एक बड़ी बहन भी थी। इन भाइयों के नाम अंधकवेणु पुत्र के रूप में प्रसिद्ध हैं। इनके जन्म के समय कंस द्वारा बच्चों को मारने का प्रसंग तो है, लेकिन जातक कथा के अनुसार कोई बच्चा मारा नहीं गया। प्रत्येक पुत्र के जन्म के समय उसे एक दासी (नंदगोपा) की पुत्री से बदल दिया गया था, जिससे वे सुरक्षित बच सके।


(2) ईश्वर नहीं वल्कि एक योद्धा और विजेता के रूप में श्रीकृष्ण का उल्लेख।

घट जातक कथा में कथा में कृष्ण को एक कोमल 'माखन चोर' के बजाय "विशाल, कठोर और भयंकर" योद्धा के रूप में चित्रित किया गया है।
वे और उनके भाई कुश्ती के एक मैच में राजा कंस को पराजित करते हैं और फिर पूरे जम्बुद्वीप पर विजय प्राप्त करते हैं।
उन्होंने अपनी राजधानी द्वारवती (द्वारका) बनाई। कथा के अनुसार, यह नगरी जादुई सुरक्षा से घिरी थी जो शत्रुओं के आने पर समुद्र में छिप सकती थी।


3. शोक और घट पण्डित (बुद्ध) का उपदेश

घट जातक कथा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा वासुदेव के पुत्र की मृत्यु के बाद उनके अत्यधिक शोक से जुड़ा है। जिसमें
कृष्ण के छोटे भाई, घट पण्डित (जो स्वयं भगवान बुद्ध का पूर्व जन्म थे), कृष्ण को इस शोक से बाहर निकालने के लिए 'पागलपन' का नाटक करते हैं।
वे चंद्रमा से खरगोश मांगते हैं। जब कृष्ण उनसे कहते हैं कि यह असंभव है, तब घट पण्डित उन्हें समझाते हैं कि मरे हुए व्यक्ति को वापस पाना भी उतना ही असंभव है।


(4) अंत और पुनर्जन्म का संबंध

घट जातक कथा में श्रीकृष्ण के वंश का अंत होने के कारण को जन्म और पुनर्जन्म के आधार पर बताया गया है। जिसमें बताया गया है कि मदिरा के प्रभाव में भाइयों के बीच हुए संघर्ष के कारण श्रीकृष्ण के वंश का विनाश हो जाता है। जिसमें वासुदेव (कृष्ण) की मृत्यु भी 'जरा' नामक शिकारी के तीर से होती है, जो उनके पैर में लगता है।

पहचान: इस जातक कथा के अंत में बुद्ध स्पष्ट करते हैं कि उस समय के वासुदेव उनके शिष्य सारिपुत्त थे और घट पंडित स्वयं बुद्ध थे।
यह कथा मुख्य रूप से अनित्यता और शोक पर नियंत्रण पाने का संदेश देने के लिए सुनाई गई है।

महायान बौद्ध धर्म में श्रीकृष्ण और उनके 'नारायण' स्वरूप का उल्लेख-


(1) कारण्डव्यूह सूत्र-

बौद्ध धर्म के महायान शाखा के प्रसिद्ध 'कारण्डव्यूह सूत्र'  में एक बहुत ही रोचक वर्णन है। इस ग्रंथ के अनुसार:
भगवान नारायण (विष्णु/कृष्ण) की उत्पत्ति ब्रह्मांड के संरक्षक बोधिसत्व अवलोकितेश्वर के हृदय से हुई है।
इस ग्रंथ में कहा गया है कि अवलोकितेश्वर ने संसार के कल्याण के लिए विभिन्न देवताओं का रूप धारण किया, जिनमें नारायण भी एक थे।
यहाँ कृष्ण/नारायण को एक स्वतंत्र ईश्वर के बजाय बुद्धत्व की राह पर चलने वाले एक शक्तिशाली बोधिसत्व के रूप में देखा गया है।


(2) ललितविस्तार सूत्र

इस ग्रंथ में बुद्ध के जीवन और उनकी शक्तियों का वर्णन है। यहाँ बुद्ध की महानता को दर्शाने के लिए कृष्ण का संदर्भ मिलता है। जिसमें बुद्ध की शारीरिक शक्ति और आध्यात्मिक प्रभाव की तुलना करते समय उन्हें "नारायण के समान पराक्रमी" बताया गया है। यह ग्रंथ कृष्ण को एक ऐसे महापुरुष के रूप में स्वीकार करता है जिनकी शक्ति और तेज सर्वविदित था।


(3) बोधिसत्व के रूप में श्रीकृष्ण का वर्णन

बोधिसत्व के रूप में कई महायान परंपराओं में कृष्ण को एक 'धर्मपाल' (धर्म का रक्षक) या उच्च श्रेणी का बोधिसत्व माना गया है। कुछ प्राचीन ग्रीको-बौद्ध (Indo-Greek) कलाकृतियों में कृष्ण को बुद्ध के रक्षक के रूप में भी दिखाया गया है।

विद्वानों का मानना है कि महायान बौद्ध धर्म में 'भक्ति' का जो तत्व आया, उस पर कृष्ण भक्ति परंपरा का गहरा प्रभाव था। जिस तरह कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण की बात कही गई, वैसी ही भक्ति महायान में बुद्ध और बोधिसत्वों के प्रति देखी जाती है।

संक्षेप में, महायान साहित्य कृष्ण को नकारता नहीं है, बल्कि उन्हें बुद्ध के ज्ञान और करुणा के एक विशेष प्रकटीकरण के रूप में आत्मसात करता है।

तिब्बती बौद्ध परंपरा में श्रीकृष्ण का उल्लेख

तिब्बती बौद्ध परंपरा में श्रीकृष्ण का उल्लेख बहुत ही विशिष्ट और सम्मानजनक है। यहाँ उन्हें केवल एक राजा ही नहीं, बल्कि एक सिद्ध पुरुष और धर्मरक्षक के रूप में देखा जाता है। जैसे इसके कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं-


(1) कृष्ण का नाम: 'कण्हपा'

तिब्बती बौद्ध धर्म में 84 महासिद्धों की सूची बहुत महत्वपूर्ण है। इनमें से एक प्रमुख सिद्ध का नाम 'कण्हपा' (कृष्णपाद) है। तिब्बती परंपरा इन्हें कृष्ण का ही एक तांत्रिक स्वरूप या उनसे प्रेरित महापुरुष मानती है।


(2) चक्रसंवर तंत्र

तिब्बती तंत्र साधनाओं में श्रीकृष्ण को 'विष्णु' के अवतार के रूप में पहचाना जाता है। कई तिब्बती ग्रंथों में कृष्ण को 'ऋषि' या 'विद्याधर' (ज्ञान धारण करने वाला) कहा गया है।
उन्हें एक ऐसे शक्तिशाली पुरुष के रूप में वर्णित किया गया है जिन्होंने अपनी योग शक्तियों से असुरों का दमन किया और धर्म की स्थापना की।


(3) रक्षक देवता के रूप में श्रीकृष्ण का वर्णन

तिब्बती बौद्ध विहारों में कई बार 'नारायण' या 'वासुदेव' को एक रक्षक देवता के रूप में चित्रित किया जाता है। माना जाता है कि उन्होंने बुद्ध के सामने धर्म की रक्षा करने की प्रतिज्ञा ली थी।


(4) कर्मफल का उपदेश

तिब्बती विद्वान (जैसे तारानाथ) अपनी इतिहास की पुस्तकों में कृष्ण की कहानी का संदर्भ देते हैं। वे कृष्ण और उनके वंश (यादवों) के विनाश की कथा का उपयोग यह समझाने के लिए करते हैं कि 'कर्म' का फल कितना अचूक होता है—चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसे अपने कर्मों का फल भुगतना पड़ता है।


(5) कला और थंगका पेंटिंग्स

कुछ विशेष तिब्बती थंगका चित्रों में बुद्ध के चारों ओर उपस्थित देवताओं की मंडली में नीले रंग के नारायण को भी स्थान दिया जाता है, जो उनकी शक्ति और सुरक्षा का प्रतीक हैं।
संक्षेप में: तिब्बती परंपरा में कृष्ण एक 'साधक' और 'विजेता' के प्रतीक हैं, जिन्होंने संसार को अधर्म से बचाने में बुद्ध के मार्ग की सहायता की।




कुछ प्राचीन ऐतिहासिक व पौराणिक ग्रंथों में श्रीकृष्ण का उल्लेख


(|) मेगस्थनीज की 'इंडिका-
यूनानी राजदूत मेगस्थनीज (300 ईसा पूर्व) ने लिखा है कि 'शौरसेनी' लोग (मथुरा के लोग) 'हेराक्लेस' की पूजा करते थे। इतिहासकारों के अनुसार, यह 'हेराक्लेस' शब्द श्रीकृष्ण (हरि-कृष्ण) के लिए प्रयुक्त हुआ था।


(||) छांदोग्य उपनिषद-
इसमें 'घोर अंगिरस' के शिष्य के रूप में 'देवकी-पुत्र कृष्ण' का स्पष्ट वर्णन मिलता है, जिसमें श्रीकृष्ण का उल्लेख सबसे प्राचीन माना जाता है। इस ग्रन्थ के अध्याय 3, खणड 17, श्लोक 6 में उनका विवरण इस प्रकार मिलता है-
देवकी-पुत्र: उपनिषद में उन्हें स्पष्ट रूप से 'देवकी का पुत्र' (कृष्णाय देवकीपुत्राय) कहा गया है।
घोर अंगिरस के शिष्य: उन्हें ऋषि घोर अंगिरस के शिष्य के रूप में वर्णित किया गया है।
यज्ञ का उपदेश: ऋषि घोर अंगिरस ने श्रीकृष्ण को जीवन को ही एक 'यज्ञ' के रूप में देखने की विद्या सिखाई थी। इस शिक्षा को ग्रहण करने के बाद श्रीकृष्ण 'अतृप्त' (जिज्ञासा से मुक्त या पूर्ण ज्ञानी) हो गए थे।
मृत्यु के समय का मंत्र: उन्हें यह उपदेश दिया गया था कि मृत्यु के समय मनुष्य को तीन मंत्रों का आश्रय लेना चाहिए: 'अक्षितमसि' (तुम अविनाशी हो), 'अच्युतमसि' (तुम अटल हो), और 'प्राणसंशितमसि' (तुम प्राणों का सार हो)।

विद्वानों का मत-
कई विद्वान और शोधकर्ता इस कृष्ण को महाभारत और भगवद्गीता के वासुदेव कृष्ण के समान मानते हैं क्योंकि नाम और माता का नाम (देवकी) मेल खाता है। हालांकि, कुछ विद्वान इसे एक ऐतिहासिक संदर्भ के रूप में देखते हैं जहाँ कृष्ण को एक दिव्य भगवान के बजाय एक ऋषि या साधक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

(1) संगम साहित्य

संगम साहित्य (प्राचीन तमिल साहित्य) में श्रीकृष्ण का उल्लेख बहुत महत्वपूर्ण और स्पष्ट है, जहाँ उन्हें 'मायोन' (काला रंग वाला) के रूप में पूजा गया है।
संगम साहित्य यह दर्शाता है कि दक्षिण भारत में कृष्ण की भक्ति अत्यंत प्राचीन है और उन्हें विष्णु के ही एक रूप में स्वीकार किया गया था। तमिल कवियों ने उन्हें एक रक्षक और प्रेमी के रूप में चित्रित किया है, जो बाद में चलकर अलवार संतों की भक्ति परंपरा का आधार बना। संगम साहित्य के विभिन्न ग्रंथों में श्रीकृष्ण के संदर्भ निम्नलिखित हैं-

(A) परिपाडल- 
इस ग्रंथ में श्रीकृष्ण और उनके भाई बलराम की स्तुति में कई गीत समर्पित हैं। यहाँ श्रीकृष्ण को 'मायोन' कहा गया है, जो चरागाहों और जंगलों के देवता (मुल्लई क्षेत्र) माने जाते हैं।

(B) अहनानूरु-
इस ग्रंथ में श्रीकृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र के युद्ध में पांडवों की सहायता करने और उनके द्वारा कंस के विनाश जैसी घटनाओं के संकेत मिलते हैं।

(C) शिलप्पादिकारम-

यद्यपि यह संगम काल के थोड़ा बाद का महाकाव्य माना जाता है, लेकिन इसमें 'आयचियर कुरवई' नामक नृत्य का वर्णन है, जो वृंदावन में कृष्ण और गोपियों के रासलीला जैसा ही है। इसमें कृष्ण की बाल लीलाओं, जैसे मक्खन चुराना और गोवर्धन पर्वत उठाने का उल्लेख है।

(D) पुरनानूरु-

इस संग्रह के गीतों में कृष्ण (मायोन) की तुलना राजाओं की शक्ति और गौरव से की गई है।

(E) शिलप्पादिकारम

इस महाकाव्य में कृष्ण के हल्लोन (हलधर बलराम) की प्रशंसा की गई है।

(F) आंडाल की भक्ति

तमिल की प्रसिद्ध वैष्णव कवयित्री आंडाल ने कृष्ण के वियोग में तिरुप्पावै और नाच्चिचार तिरूमोलि जैसे पद लिखे, जिनमें कृष्ण के प्रति उनकी गहन भक्ति और प्रेम व्यक्त किया गया है। वह कृष्ण को अपना पति मानती थीं और उनके साथ रासलीला की कल्पना करती थीं।



इस प्रकार से अध्याय (एक) का भाग (ख)- श्रीकृष्ण के ऐतिहासिक परिचय के साथ समाप्त हुआ। अब अगले अध्याय (दो) में गोप (यादव) की उत्पत्ति के बताया गया। उसे भी इस के साथ जोड़कर अवश्य पढ़ें।

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