फाल्गुन माह में ही उत्तर भारत में यादवों के एक और शक्ति संपन्न गुप्त राजवंश का अभ्युदय हुआ जिसने भारतवर्ष में पुनः वैदिक सनातन संस्कृति की स्थापना की। नेपाल के प्राचीन गोपाल यादव राजवंश की शाखा माने जाने वाले गुप्त साम्राज्य के सिरमौर सम्राट समुद्रगुप्त के प्रतापी धर्मनिष्ठ पुत्र चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने शकों आदि मल्लेच्छो का अंत कर "शकारी" पदवी धारण कर इंद्रप्रस्थ दिल्ली में लौह कीर्ती स्तंभ की स्थापना एवं शक संवत प्रारंभ किया।
ये वही सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य हैं जिन्होंने अपनी सत्ता का केंद्र उज्जैन नगरी को बनाया।
नरेंद्रसिंह, परम भागवत, विक्रमादित्य जैसी उपाधि धारण करने वाले चंद्रगुप्त द्वितीय को अनेकों प्रमाणित स्रोतों में चंद्रवंशी एवं यादव तक कहा गया जिसके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं।
📜 1️⃣ कलयुग मे संभावित घटनाओं का भविष्य पुराण में निरुपण करने वाले महर्षि वेदव्यास ने लिखा:
सोमवंशे महावीर्यो विक्रमादित्यसंज्ञकः ।
उज्जयिन्यां महाबाहुर्भविष्यति न संशयः ॥
📜 2️⃣ सोमवंशप्रसूतस्तु विक्रमादित्यभूपतिः ।
उज्जयिन्यां प्रतिष्ठाय धर्मेण पृथिवीं जयेत् ॥
📜 3️⃣ विक्रमार्क देवचरितम में :
यादवान्वयसंभूतो विक्रमादित्यभूपतिः ।
चन्द्रवंशसमुद्भूतः कीर्त्या लोकान् प्रकाशयन् ॥
📜 4️⃣ कल्हण के राजतरंगिणी में :
चन्द्रवंशोद्भवो राजा विक्रमादित्यसंज्ञकः ।
उज्जयिन्यां स्थितो नित्यं धर्मराज्यं चकार सः ॥
📜 5️⃣ स्कंद पुराण :
यादवो विक्रमादित्यः सोमवंशसमुद्भवः ।
म्लेच्छानां नाशकर्ता धर्मसंस्थापकः प्रभुः ॥
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