{अध्याय प्रथम }
(श्रीकृष्ण का परिचय-)यह अध्याय उनके लिए आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है जो भगवान श्रीकृष्ण को काल्पनिक और अनैतिहासिक मानकर उनकी सत्ता को मानने से अस्वीकार करते हैं। किन्तु उन्हें यह पता नहीं कि भगवान श्रीकृष्ण वैदिक, पौराणिक और ऐतिहासिक तीनों ही रुपों में स्थित अर्थात् (विद्यमान) हैं। इसको अच्छी तरह समझने के लिए इस अध्याय को मुख्यतः तीन भागों में विभाजित किया गया है -
(क)- श्रीकृष्ण का वैदिक परिचय-
(ख)- श्रीकृष्ण का पौराणिक परिचय-
(ग)- ऐतिहासिक परिचय- के अन्तर्गत-
(३)- खगोलीय साक्ष्य- (४)- साहित्यिक साक्ष्य-
(क)- श्रीकृष्ण का वैदिक परिचय-
इस भाग में श्रीकृष्ण का वैदिक परिचय अर्थात् ऋग्वेद में श्रीकृष्ण का कब और किस रूप में और कहाँ उल्लेख हुआ है ? उसके विषय में विस्तार पूर्वक जानकारी दी गई है। जिसमें सबसे पहले वेदों में वर्णित श्रीकृष्ण के गोलोक धाम के बारे में जानकारी दी गई है। इसके पश्चात् वेदों में वर्णित कृष्ण से इन्द्र के उस युद्ध के बारे में जानकारी दी गई है। जो यमुना अर्थात् (अँशुमती) नदी के तट पर हुआ था। कि किस तरह भाष्यकारों ने उस युद्ध वाले प्रसंग की ऋचाओं में आये कुछ शब्दों के अर्थों को पूर्वदुराग्रह से ग्रस्त होकर अनर्थ करके कृष्ण को असुर या अदेव रूप में प्रस्तुत किया है।
(1) वेदों में श्रीकृष्ण के गोलोक और उनके गोपों का वर्णन-
साक्ष्य के रूप निम्नलिखित ऋचा देखें-
"ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयास:। अत्राह तदुरुगायस्य वृष्ण: परमं पदमव भाति भूरि॥६।।ऋग्वेद-१/१५४/६
अत: यह बात वेदों से भी सुनिश्चित है कि - परमेश्वर श्रीकृष्ण का सनातन निवास स्थान गोलोक है, जहाँ वे गोप-वेष में अपनी गायों तथा गोपों के साथ रहते हैं, और वे ही भगवान भूतल पर अपने गोपों के यहाँ गोप-वेष में ही समय समय पर अवतरित होकर धर्म की पुन: पुन: स्थापना करते हैं।
(2) वेदों में श्रीकृष्ण के लिए "विष्णुर्गोपा" विशेषण शब्द का प्रयोग-
वेद में कृष्ण को 'अवतारी परम पुरुष' के रूप में भी दर्शाया गया है। इसके लिए ऋग्वेद (1/22/18) में श्रीकृष्ण के लिए "विष्णुर्गोपा" पद का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ "अवतारी परम पुरुष जो विष्णु नाम से गोप वेष में रहते हैं।, पुराणों में जिसे श्रीकृष्ण का रूप माना जाता है। और वे ही विष्णु (श्रीकृष्ण) वहाँ गोप रूप में अहिंस्य (अवध्य) हैं, गोलोक वासी विष्णु ही स्वराट-विष्णु हैं। और ये ही श्रीकृष्ण, वासुदेव, नारायण आदि नामों से परवर्ती युग में लोकप्रिय हुए हैं।"त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः।
अतो धर्माणि धारयन् ॥१८॥
(ऋग्वेद १/२२/१८)
भावार्थ:- यह मन्त्र दर्शाता है कि गोपेश्वर श्रीकृष्ण न केवल सृष्टि का निर्माण करते हैं, बल्कि वे इसके रक्षक भी हैं। उनके 'तीन पगों' को प्रायः पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक( स्वर्ग लोक) के रूप में समझा जाता है।
वेदों में कृष्ण का ही गोप रूप वास्तव में स्वराट् विष्णु का नामान्तरण है।
ऋग्वेद- (१/१०/३/) तथा यजुर्वेद- (८/३४) में भगवान कृष्ण का वर्णन केशी नामक दैत्य का वध करने वाला बताया गया है। और हम यहाँ पर ऋग्वेद का सन्दर्भ लेते हैं-
"युक्ष्वा हि केशिना हरी वृष॑णा कक्ष्यप्रा।
अथा॑ न इन्द्र सोमपा गिरामुप॑श्रुतिं चर।।3.।।
हिंदी अनुवाद:
"हे सोमपान करने वाले (सोमपा) इन्द्र! आप अपने उन दोनों घोड़ों (हरी) को रथ में जोड़िए जो लम्बी अयाल वाले (केशिना), जिसके शक्तिशाली (वृषणा) और रथ के जुए को भरने वाले (कक्ष्यप्रा) हैं। उसके बाद आप हमारी स्तुतियों (गिराम्) को सुनने के लिए हमारे समीप आइए।3।
श्लोक में प्रयुक्त पदों का व्याकरणिक विश्लेषण -
शृणु शक्र गिरं नस्त्वं, दूतः कृष्णाय वै भव॥
यह पंक्तियाँ श्रीमद्भागवत पुराण के प्रसंगों और वैदिक शैली के आह्वान का मिश्रण रूप प्रतीत होती हैं। केशी वध का प्रसंग कृष्ण लीला का अत्यन्त महत्वपूर्ण अवयव है।
अन्यत्र भी इससे सम्बन्धित श्लोक विद्यमान हैं।
उपर्युक्त ऋग्वेद के श्लोक पर सायण भाष्य के विपरीत निम्नलिखित श्लोकों में गोपाचार्य हंस योगेश रोहि वर्णन करते हैं।
(अनुष्टुप छन्द)
"केशिनं हन्तृहरिणा, सक्तो भवतु मे मनः। मुष्कौ कक्षौ च संगृह्य, येन क्षिप्तो महासुरः॥२
हे सोमप इन्द्र देव, श्रुतं मे स्तुतिगीतकम। कृष्णाय प्रेषय दूतं, मयि प्रीतो भव प्रभो॥३।
-अनुवाद -अनुवाद:
1. केशी वध का पराक्रम:-
केशी दैत्य घोड़े के रूप में आया था। पौराणिक प्रसंगो भगवान कृष्ण ने उसके मुख में अपनी भुजा डालकर उसका श्वास रोक दिया था, किन्तु आपकी स्तुति में उनके मल्लयुद्ध के पराक्रम का वर्णन है जहाँ उन्होंने दैत्य के अंगों (मुष्क और कक्ष) को पकड़कर उसे विदीर्ण कर दिया था।
2. इन्द्र का दूत कर्म-
यहाँ इन्द्र को 'सोमप' कहकर सबोधित किया गया है। भक्त इन्द्र से प्रार्थना कर रहा है कि उसकी स्तुति को भगवान कृष्ण तक पहुँचाने के लिए वे दूत (Messenger) की भूमिका निभाएं, जो भक्त और भगवान के बीच एक सेतु का कार्य करता है।।
-काव्य संरचना का सार-
यह श्लोक छन्द 'अनुष्टुप' में है, जिसे पढ़ना और याद रखना सरल है। इसमें प्रत्येक चरण में (८) वर्ण होते हैं। यह भक्ति रस और वीर रस का सम्मिश्रण है।
- हस्तद्वयेन: हस्त (हाथ) + द्वय (दो) + एन (तृतीया विभक्ति, एकवचन)। यहाँ 'हस्तद्वय' शब्द में षष्ठी तत्पुरुष समास है और पूर्ण पद में करण कारक है।
- जग्राह: 'ग्रह' (पकड़ना) धातु, लिट् लकार (परोक्ष अनद्यतन भूतकाल), प्रथम पुरुष, एकवचन।
- केशिनम्: 'केशिन्' (केशी दैत्य) शब्द, द्वितीया विभक्ति, एकवचन (कर्म कारक)।
- केशव: 'केशव' (श्रीकृष्ण) शब्द, प्रथमा विभक्ति, एकवचन (कर्ता कारक)।
- वृषणौ: 'वृषण' शब्द, द्वितीया विभक्ति, द्विवचन।
- कक्षदेशम्: 'कक्ष' (कांख) + 'देश' (स्थान), द्वितीया विभक्ति, एकवचन।
- चिक्षेप: 'क्षिप' (फेंकना) धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।
- गिरा: 'गिरि' (पर्वत) शब्द, तृतीया विभक्ति, एकवचन (पर्वत के द्वारा या पर्वत पर)।
- अति: यह एक अव्यय है जो 'अत्यधिक' या 'वेग' के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
वृषणौ कक्षदेशं च चिक्षेप च गिरौ रसात्।।
नायं कृष्णो ह्ययं शक्र: सोमपाश्च सुरेश्वर:।। (अनुष्टुप छन्द)
अर्थात् प्रत्येक चरण का 5 वाँ वर्ण 'लघु' और दूसरे व चौथे चरण का 7वाँ वर्ण 'लघु' होना चाहिए।
- प्रथम पंक्ति: आपके मूल वाक्य में 'केशव:' के बाद विसर्ग था। लय बनाए रखने के लिए हमने 'तदा' (तब) अव्यय जोड़ा है ताकि चरण 8 वर्णों का पूरा हो सके।
- द्वितीय पंक्ति: 'गिरावति' व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध था। 'गिरि' शब्द का सप्तमी एकवचन का रूप 'गिरौ' (पर्वत पर) होता है। अन्त में 'रसात्' (वेग से/बल से) शब्द जोड़ा गया है ताकि छन्द की लय (8 वर्ण) पूर्ण हो।
- तृतीय पंक्ति: 'सोमपा' को विशेषण के रूप में व्यवस्थित करने के लिए 'ह्ययं' (ही + अयम्) और 'सुरेश्वर:' का प्रयोग किया गया है, जिससे यह पूर्ण अर्थवान् अनुष्टुप् श्लोक बन गया है।
- भावार्थ: भक्त इन्द्र से प्रार्थना करता है कि वे अपने श्रेष्ठ रथ पर सवार होकर आएं ताकि वे भक्त की स्तुतियों को प्रत्यक्ष रूप से सुन सकें।
- अलंकार: इस मन्त्र में लुप्तोपमा अलंकार का प्रयोग माना जाता है।
युक्ष्वा हि केशिना हरी वृषणा कक्ष्यप्रा ।
अथा न इन्द्र सोमपा गिरामुपश्रुतिं चर ॥३॥
तस्यास्ये भगवान् बाहुं प्रविष्टं तद्द्विषोऽनघ ।
वर्धयामास सहसा विदीर्णमुखमण्डनः॥ (१०.३७.७)
"वैदिक वाङ्मय में श्रीकृष्ण का गोप एवं धर्म-रक्षक का स्वरूप-
ऋग्वेद के कतिपय सूक्तों में श्रीकृष्ण के 'गोप' ( आभीर) और 'धर्म-संस्थापक' स्वरूप के बीज सन्ननिहित हैं। विशेषकर प्रथम मण्डल का 'अस्य वामीय सूक्त' आध्यात्मिक और दार्शनिक दृष्टि से एक अक्षय निधि है।
१. गोप रूप में परमात्मा का वर्णन (ऋग्वेद १.१६४)
ऋग्वेद के (१६४)वें सूक्त की ऋचा -२१ और ३१ में 'गोपा' शब्द का प्रयोग उस परम तत्व के लिए हुआ है जो विश्व का संरक्षक व गोप वेषधारी है।
(क) ऋचा २१: अमृतत्व और ज्ञान के अधिष्ठाता-
"यत्रा सुपर्णा अमृतस्य भागमनिमेषं विदथाभिस्वरन्ति।इनो विश्वस्य भुवनस्य गोपाः स मा धीरः पाकमत्रा विवेश॥२१॥
- पदच्छेद एवं व्याकरणिक विश्लेषण-:
- यत्र: (अव्यय) जहाँ (परम पद में)।
- सुपर्णाः: (प्रथमा, बहुवचन) शोभनपक्षाः पक्षिणः (सुन्दर पंखों वाले पक्षी/जीवात्मा अथवा किरणें)।
- अमृतस्य भागम्: मोक्ष का अंश।
- अनिमेषम्: (क्रिया-विशेषण) अपलक, निरन्तर।
- विदथा: (तृतीया एकवचन/वेदवचनात्) ज्ञान के द्वारा।
- अभिस्वरन्ति: (अभि + स्वृ + लट्) स्तुति करते हैं।
- इनः समर्थ स्वामी।
- गोपाः (गुप् + विच्) रक्षक, गोप वेषधारी परमात्मा।
- पाकम्: परिपक्व बुद्धि वाले (साधक को)।
- विवेश: (विश + लिट्) प्रविष्ट हुआ।
- विश्लेषणात्मक भावार्थ: उस परमधाम में, जहाँ मुक्त आत्माएँ (सुपर्ण) निरन्तर सजग रहकर ज्ञान के माध्यम से परमानन्द का अनुभव करती हैं, उस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का स्वामी और 'गोप'( गोपालक) स्वरूप धैर्यवान परमात्मा मुझ परिपक्व जिज्ञासु के अन्तःकरण में प्रविष्ट हो गया है। यहाँ 'गोपा' शब्द श्रीकृष्ण के उस स्वरूप की ओर संकेत करता है जो एक गोप को रूप में चराचर जगत का पालन करता है।
(ख) ऋचा ३१: सर्वव्यापी अच्युत गोप
अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम् । स सध्रीचीः स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः॥३१॥
- व्याकरणिक वैशिष्ट्य:
- अपश्यम्: मैंने साक्षात्कार किया (दृश् + लङ्)।
- गोपाम्: उस रक्षक/गोप रूप परमात्मा को।
- अनिपद्यमानम्: जिसका पतन नहीं होता, जो कभी थकता नहीं (अच्युत)।
- आ च परा च: इहलोक और परलोक में, सर्वत्र।
- पथिभिः चरन्तम्: विभिन्न मार्गों से संचरण ( गमन) करते हुए।
- आ वरीवर्ति: (वृत् + यङ् लुगन्त), पुनः-पुनः अवतार लेता है/ प्रकट होता है।
- विश्लेषणात्मक भावार्थ: ऋषि कहते हैं कि मैंने उस 'अविनाशी गोप' को देखा है, जो कभी विचलित नहीं होता। वह नाना प्रकार के मार्गों से इस संसार में आता-जाता ( (अवतार ग्रहण करता) है। वह अपनी समस्त शक्तियों (कलाओं) को धारण कर सम्पूर्ण लोकों के भीतर निरन्तर विद्यमान रहता है।
२. ऋग्वेद में धर्म-रक्षक के रूप में कृष्ण-अर्जुन का वर्णन (ऋग्वेद १०.२१.३)
ऋग्वेद के (१०) वें मण्डल में अग्नि की स्तुति के माध्यम से कृष्ण और अर्जुन (नर-नारायण) के धर्म-रक्षक स्वरूप का वर्णन प्राप्त होता है।
"त्वे धर्माण आसते जुहूभिः सिञ्चतीरिव। कृष्णा रूपाण्यर्जुना वि वो मदे विश्वा अधि श्रियो धिषे विवक्षसे ॥
इस ऋचा के भाव को गोपाचार्य हंस श्रीयोगेश कुमार रोहि ने निम्नलिखित श्लोकों में व्याख्यायित किया है:
"यथा जुह्विर्घृतं वह्नौ त्वयि धर्मास्तथा स्थिताः। त्वं धारयसि धर्मान् वै विश्वं स्वस्ति च विन्दति॥ कृष्णार्जुनस्वरूपेण बहुधा वदसि प्रभो। धर्मान् सनातनांश्चापि नमोऽस्तु परमात्मने॥
- व्याकरणिक विश्लेषण:
- जुह्विः/जुहूभिः: यज्ञपात्र या आहुति देने की क्रिया के द्वारा।
- वह्नौ: अग्नि में (सप्तमी विभक्ति)।
- कृष्णार्जुनस्वरूपेण: कृष्ण और अर्जुन के नर-नारायण स्वरूपों के द्वारा।
- स्वस्ति: कल्याण।
- विन्दति: प्राप्त करता है (विद् लाभे)।
- अर्थ-संक्षेप: जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि में आहुति सुरक्षित रहती है, वैसे ही समस्त सनातन धर्म आपमें (श्रीकृष्ण में) स्थित हैं। हे प्रभु ! आप ही 'कृष्ण' और 'अर्जुन' के रूप में प्रकट होकर धर्म का उपदेश देते हैं और लोक का कल्याण करते हैं।
३. गीता से समन्वय (ऐतिहासिक एवं दार्शनिक निष्कर्ष)-
ऋग्वेद की इन ऋचाओं का सीधा सम्बन्ध श्रीमद्भगवद्गीता के निम्नलिखित प्रसिद्ध श्लोक से जुड़ता है:
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ (गीता ४.७)
निष्कर्ष:-वैदिक ऋचाओं में 'गोपा' और 'कृष्ण-अर्जुन' का उल्लेख यह सिद्ध करता है कि श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व मात्र पौराणिक नहीं, अपितु वेदों के दार्शनिक धरातल पर प्रतिष्ठित है।
वे गोप होने के साथ साथ 'धर्म-गोप्ता' (धर्म के रक्षक) भी हैं, जो युग-युग में सत्य की पुनर्स्थापना के लिए 'आ वरीवर्ति' (बार-बार) गडेरिया अथवा गोप रूप में प्रकट होते हैं।
ऋग्वेद के अष्टम मण्डल के (96)वें सूक्त की ऋचाओं (13- 14 और 15) में वर्णित इन्द्र-कृष्ण युद्ध का प्रसंग भारतीय इतिहास और अध्यात्म में एक विवादास्पद किन्तु महत्वपूर्ण विमर्श का केंद्र बिन्दु रहा है।
ऋग्वेद की इन तीन ऋचाओं में एक ऐतिहासिक युद्ध का चित्रण है। सायण के अनुसार इस घटनाक्रम को दो मुख्य दृष्टिकोणों से देखा गया है:
क. सायण का प्राथमिक मत (ऐतिहासिक/आख्यानपरक)-
- पात्र: 'कृष्ण' नामक एक शक्तिशाली असुर, जो 10,000 अनुयायियों के साथ 'अंशुमती' नदी के तट पर स्थित था।
- घटना: इन्द्र ने बृहस्पति और मरुद्गणों की सहायता से इस 'कृष्ण' असुर का पता लगाया, जो जल के भीतर या किसी दुर्गम स्थान पर छिपा हुआ था।
- परिणाम: इन्द्र ने अपनी शक्ति (शच्या) से उस असुर की हिंसक सेनाओं का संहार किया और अन्ततः उसका वध कर दिया।
ख. 'बृहद्देवता' का वैकल्पिक मत (सोम परक)
- यहाँ 'द्रप्स' का अर्थ जल की बूँद या 'सोम' लिया गया है।
- वृत्र के डर से सोम 'अंशुमती' नदी में छिप गया था। इन्द्र और बृहस्पति ने उसे खोज निकाला और बलपूर्वक स्वर्ग ले आए, जहाँ देवताओं ने उसका पान कर असुरों को पराजित किया। (हालाँकि सायण ने इस मत को मूल ऋषियों के अभिप्राय के विरुद्ध मानकर अस्वीकार कर दिया है)।
2. ऋचाओं का विस्तृत विश्लेषण-
ऋचा संख्या | मुख्य बिन्दु | सायण द्वारा किया गया अर्थ |
|---|---|---|
13- | कृष्ण की स्थिति- | कृष्ण 10,000 सैनिकों के साथ अंशुमती नदी के तट पर था। इन्द्र ने अपनी बुद्धि और शक्ति से उसे खोजा और उसकी सेना को नष्ट किया। |
14- | इन्द्र का आह्वान- | इन्द्र मरुतों से कहते हैं: "मैंने उस द्रुतगामी कृष्ण को देख लिया है, जो आकाश में सूर्य की तरह चमक रहा है और गुप्त स्थान पर छिपा है। हे वीरों! युद्ध करो।" |
15- | युद्ध का अन्त- | कृष्ण ने अंशुमती के तट पर अपना शरीर (सेना) फैलाया था। इन्द्र ने बृहस्पति की सहायता से उन 'अदेवी' (देव विरोधी) सेनाओं को परास्त किया। |
3. विवादास्पद शब्द और वैचारिक मतभेद-
लेख में स्पष्ट किया गया है कि भाष्यकारों ने कुछ शब्दों की व्याख्या अपने पूर्वग्रहों (Prejudices) के आधार पर की है, जिससे अर्थ का अनर्थ हुआ है।
- 'अदेव' पद का विश्लेषण:- वेदों में कृष्ण के लिए 'अदेव' शब्द आया है। सायण जैसे भाष्यकारों ने इसका अर्थ 'असुर' या 'देव-विरोधी' कर दिया। इसे असीरिया (ईरान-इराक) की 'असुर' संस्कृति से जोड़ने का प्रयास किया गया, जबकि कृष्ण का असीरिया से कोई सम्बन्ध सिद्ध नहीं होता।
- कृष्ण की वैदिक उपस्थिति: यह सूक्त सिद्ध करता है कि कृष्ण की सत्ता वैदिक काल में भी उतनी ही प्रभावी थी कि इन्द्र जैसे देव को उनके विरुद्ध युद्ध की नीति बनानी पड़ी।
4. दार्शनिक एवं ऐतिहासिक विमर्श-
ऐतिहासिक दृष्टिकोण:-
यह युद्ध देवो और असुरो के दो समूहों या वैदिक देव-संस्कृति बनाम एक स्वतंत्र शक्तिशाली स्थानीय नायक (कृष्ण) के बीच के संघर्ष को दर्शा सकता है। '10,000' की संख्या उनकी विशाल सैन्य शक्ति का प्रतीक है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण:-
कृष्ण का 'सूर्य की तरह चमकना' (नभो न...) उनके तेजस्वी स्वरूप को दर्शाता है। यह युद्ध केवल विनाश का नहीं, बल्कि वैचारिक प्रधानता का भी हो सकता है। भाष्यकारों द्वारा 'कृष्ण' को असुर घोषित करना सम्भवतः बाद के युगों में इन्द्र की सर्वोच्चता स्थापित करने का एक प्रयास रहा हो।
निष्कर्ष: ऋग्वेद की ये ऋचाएं कृष्ण की प्राचीनता और उनके शौर्य का अकाट्य प्रमाण हैं। यद्यपि सायण भाष्य उन्हें 'असुर' की संज्ञा देता है, किन्तु ऋचाओं में वर्णित उनका तेज और प्रभाव उन्हें एक साधारण असुर से कहीं ऊपर एक महामानव या एक महान जननायक के रूप में स्थापित करता है।
सायण भाष्य के 'असुर' वाले संकीर्ण अर्थ से इतर, जब हम ऋग्वेद के इन मन्त्रों (8.96.13-15) का वास्तविक, आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विश्लेषण करते हैं, तो श्रीकृष्ण का एक अत्यन्त तेजस्वी और मर्यादित रूप उभर कर आता है। यहाँ सायण द्वारा थोपे गए "असुर" भाव के विरुद्ध गोपाचार्य हंस योगेश कुमार रोहि का तार्किक और भाषाई विश्लेषण प्रस्तुत है
(6)- वेदों में श्रीकृष्ण के साथ इन्द्र के युद्ध का
वर्णन-
ऋग्वेद के मण्डल अष्टम (8) के सूक्त (96) की ऋचा संख्याएँ क्रमशः ( 13 -14 -और 15 ) में कृष्ण से इन्द्र के युद्ध होने का वर्णन मिलता है। जिससे कृष्ण की वैदिक कालीन उपस्थिति( सत्ता) सिद्ध होती है। जो ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टिकोणों से अतीव महत्वपूर्ण हैं। किन्तु इन भाष्यकारों ने युद्ध वाले प्रसंग की ऋचाओं में आये कुछ शब्दों के अर्थ का पूर्वदुराग्रह से ग्रस्त होकर अनर्थ करके कृष्ण को असुर या अदेव रूपों में दर्शाया है।
"गोपाचार्य हंस योगेश कुमार रोहि का मत है कि -
"यद्यपि ऋग्वेद की मूल ऋचा में कृष्ण को कहीं भी असुर नहीं कहा गया है परन्तु उन्हें अदेव पद से अवश्य सम्बोधित किया गया है। जिसे आधार मान कर वेदों में सायण आदि भाष्यकर्ताओं ने उसी "अदेव" को असुर अथवा दैत्यों के परवर्ती व पौराणिक अर्थ में देव जाति के विपरीत एक असीरिया के जनसमुदाय विशेष से सम्बन्धित कर अर्थ ग्रहण किया है।ज्ञात हो- असीरिया के मूल निवासी असुर ही थे। जो दजला और फरात नदीयों के दुआव में स्थित असीरिया देश में रहते थे जो आजकल ईरान और ईराक का मिश्रित भूभाग है। परन्तु कृष्ण असीरियन अथवा असुर कभी नहीं थे।
तो सबसे पहले ऋग्वेद के मण्डल- (8) सूक्त (96) की उन तीनों ऋचाओं (13-14-15) को देखें, जिसमे कृष्ण और इन्द्र के युद्ध को दर्शाया गया है। ऋचाओं का संयुक्त सन्दर्भ और अनुवाद सायण भाष्य पर ही आधारित है। पहले हम उसको प्रस्तुत करेंगे उसके बाद हम उन ऋचाओं के वास्तविक अर्थ और अनुवाद को प्रस्तुत करेंगे।
"अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः।आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त ॥१३॥
सायण भाष्य का मूल सस्कृत रूप--अत्रेतिहासमाचक्षते किल। कृष्णो नामासुरो दशसहस्रसंख्यैरसुरैः परिवृतः सन्नंशुमतीनामधेयाया नद्यास्तीरेऽतिष्ठत् । तत्र तं कृष्णमुदकमध्ये स्थितमिन्द्रो बृहस्पतिना सहागच्छत्। आगत्य तं कृष्णं तस्यानुचरांश्च बृहस्पतिसहायो जघानेति।
केचिदन्यथा वदन्ति । तेषां कथा हेतुः । द्रप्स इत्युदककणोऽभिधीयते स तु सोमो ‘द्रप्सश्चस्कन्द '(ऋ. सं. १०/ १७/११ ) इत्यादिषु सोमपरत्वेनोक्तत्वात्। एतत्पदमाश्रित्याहुः- ‘अपक्रय तु देवेभ्यः सोमो वृत्रभयार्दितः॥ नदीमंशुमतीं नामाभ्यतिष्ठत् कुरून प्रति। तं बृहस्पतिनैकेन सोऽभ्ययाद्वृत्रहा सह॥ योत्स्यमानः सुसंहृष्टैर्मरुद्भिर्विविधायुधैः। दृष्ट्वा तानायतः सोमः स्वबलेन व्यवस्थितः॥ मन्वानो वृत्रमायान्तं जिघांसुमरिसेनया । व्यवस्थितं धनुष्मन्तं तमुवाच बृहस्पतिः॥ मरुत्पतिरयं सोम प्रेहि देवान् पुनर्विभो। सोऽब्रवीन्नेति तं शक्रः स्वर्ग एव बलाद्बली। इयाय देवानादाय तं पपुर्विधिवत्सुराः॥ जघ्नुः पीत्वा च दैत्यानां समरे नवतीर्नव। तदव द्रप्स इत्यस्मिन् तृचे सर्वं निगद्यते' (बृहद्दे. ६. १०९-११५ ) । एतदनार्षत्वेनानादरणीयं भवति । एषोऽर्थः क्रमेणर्क्षु वक्ष्यते । तथा चास्या ऋचोऽयमर्थः। “द्रप्सः । द्रुतं सरति गच्छतीति द्रप्सः। पृषोदरादिः। द्रुतं गच्छन् "दशभिः “सहसैः दशसहस्रसंख्यैरसुरैः “इयानः “कृष्णः एतन्नामकोऽसुरः "अंशुमतीं नाम नदीम् “अव “अतिष्ठत् अवतिष्ठते । ततः “शच्या कर्मणा प्रज्ञानेन वा “धमन्तम् उदकस्यान्तरुच्छ्वसन्तं यद्वा जगद्भीतिकरं शब्दं कुर्वन्तं “तं कृष्णमसुरम् “इन्द्रः मरुद्भिः सह “आवत् प्राप्नोत् । पश्चात्तं कृष्णमसुरं तस्यानुचरांश्च हतवानिति वदति । “नृमणाः नृषु मनो यस्य सः । यद्वा । कर्मनेतृष्वृत्विक्ष्वेकविधं मनो यस्य स तथोक्तः । तादृशः सन् “स्नेहितीः । स्नेहतिर्वधकर्मसु पठितः । सर्वस्य हिंसित्रीस्तस्य सेनाः “अप “अधत्त । अपधानं हननम् । अवधीदित्यर्थः । ‘अप स्नीहितिं नृमणा अधद्राः' (सा. सं. १. १.४.४.१) इति छन्दोगाः पठन्ति । तस्यानुचरान् हत्वा तं द्रुतं गच्छन्तमसुरमपाधत्त । हतवान् ॥
"सायण भाष्य का हिन्दी अनुवाद-
इस विषय में एक प्राचीन इतिहास (कथा) कही जाती है। कृष्ण नाम का एक असुर दस हजार असुरों के साथ अंशुमती नाम की नदी के तट पर खड़ा था। वहाँ जल के बीच स्थित उस कृष्णासुर के पास इन्द्रदेव बृहस्पति जी के साथ आए। आकर बृहस्पति की सहायता से इन्द्रदेव ने उस कृष्ण और उसके अनुचरों (साथियों) का वध कर दिया।
कुछ लोग इसे दूसरी तरह से कहते हैं। उनके अनुसार कथा का आधार यह है: 'द्रप्स' शब्द का अर्थ "जल की बूँद" है, लेकिन 'द्रप्सश्चस्कन्द' (ऋग्वेद १०.१७.११) आदि मन्त्रों में इसका प्रयोग सोम के लिए हुआ है। इस पद का सहारा लेकर वे कुछ विद्वान कहते हैं—कि "वृत्र के भय से पीड़ित सोम सभी देवताओं को छोड़कर कुरुक्षेत्र की ओर अञ्शुमती नदी में जाकर छिप गया। वृत्रहन्ता इन्द्र अकेले बृहस्पति के साथ वहाँ पहुँचे। युद्ध के लिए तैयार और विविध शस्त्रों से सुसज्जित मरुद्गणों को देखकर, सोम ने अपनी सेना के साथ मोर्चा संभाल लिया। उस (सोम को) धनुष ताने खड़ा देख, बृहस्पति ने उसे शत्रु की सेना समझकर मारने की इच्छा से कहा— 'हे समर्थ सोम ! यह मरुतों के स्वामी इन्द्र हैं, तुम पुनः देवताओं के पास चलो।' सोम ने मना कर दिया, तब बलवान इन्द्र उसे बलपूर्वक स्वर्ग ले आए। देवताओं ने विधिपूर्वक उसका पान किया और उसे पीकर युद्ध में निन्यानवे (९९) असुरों को मार गिराया। यह सब 'द्रप्स' से शुरू होने वाली तीन ऋचाओं में कहा गया है।" (बृहद्देवता ६.१०९-११५)।
किन्तु, यह मत (बृहद्देवता वाला) ऋषियों के मूल अभिप्राय के अनुकूल न होने के कारण स्वीकार करने योग्य नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ ऋचाओं के क्रम के अनुसार आगे बताया जाएगा।
इस ऋचा (मन्त्र) का अर्थ इस प्रकार है: 'द्रप्सः' का अर्थ है शीघ्र जाने वाला। वह 'दशभिः सहसैः' अर्थात् दस हजार असुरों के साथ 'इयानः' (जाता हुआ) 'कृष्णः' नाम का असुर 'अंशुमतीम्' नाम की नदी के पास 'अव अतिष्ठत्' (ठहरा हुआ था)। तब 'शच्या' अर्थात् अपनी शक्ति या बुद्धि से, 'धमन्तम्' (जल के भीतर श्वास लेते हुए या संसार को डराने वाला शब्द करते हुए) उस कृष्ण असुर को इन्द्र ने मरुतों के साथ 'आवत्' (प्राप्त किया/खोज निकाला)। इसके बाद उन्होंने उस कृष्ण और उसके साथियों का वध कर दिया।
'नृमणाः' (मनुष्यों या ऋत्विजों के प्रति हितकारी मन वाले इन्द्र ने) 'स्नेहितीः' अर्थात् हिंसा करने वाली उसकी (कृष्ण असुर की) सेनाओं को 'अप अधत्त' (नष्ट कर दिया या मार डाला)। छन्दोग (सामवेदी) इसे 'अप स्नीहितिं नृमणा अधद्राः' पढ़ते हैं। तात्पर्य यह है कि उसके साथियों को मारकर, इन्द्र ने उस तेजी से भागते हुए असुर का वध कर दिया।
"द्रप्समपश्यं विषुणे चरन्तमुपह्वरे नद्यो अंशुमत्याः। नभो न कृष्णमवतस्थिवांसमिष्यामि वो वृषणो युध्यताजौ ॥१४॥
सायण भाष्य का संस्कृत रूप-तुरीयपादो मारुतः । मरुतः प्रति यद्वाक्यमिन्द्र उवाच तदत्र कीर्त्यते । हे मरुतः “द्रप्सं द्रुतगामिनं कृष्णमहम् “अपश्यम् अदर्शम् । कुत्र वर्तमानम् । “विषुणे विष्वगञ्चने सर्वतो विस्तृते देशे । यद्वा । विषुणो विषमः । विषमे परैरदृश्ये गुहारूपे देशे। “चरन्तं परितो गच्छन्तम् । किञ्च “अंशुमत्याः एतन्नामिकायाः “नद्यः नद्याः “उपह्वरे अत्यन्तं गूढे स्थाने “नभो “न नभसि यथादित्यो दीप्यते तद्वत्तत्र दीप्यमानम् “अवतस्थिवांसम् उदकस्यान्तरवस्थितं “कृष्णम् एतन्नामकमसुरमपश्यम् । तस्मिन् दृष्टे सति हे “वृषणः कामानामुदकानां वा सेक्तारो मरुतः “वः युष्मान् युद्धार्थम् “इष्यामि अहमिच्छामि । ततो यूयं तमिमं कृष्णम् "आजौ । अजन्ति गच्छन्त्यत्र योद्धार आयुधानि प्रक्षेपयन्तीति वाजिः संग्रामः । तस्मिन् "युध्यत संहरत । वाक्यभेदादनिघातः । केचित् इष्यामि वो मरुतः इति पठन्ति । तत्र हे मरुतः वो युष्मानिच्छामीत्यर्थो भवति।
सायण भाष्य का हिन्दी अनुवाद-
"ऋचा का चतुर्थ पाद (तुरीयपाद) 'मारुतः' है। इन्द्र ने मरुतों के प्रति जो वाक्य कहा, उसका यहाँ वर्णन किया जा रहा है। हे मरुतों ! मैंने 'द्रप्सं' अर्थात् तीव्र गति वाले 'कृष्णम्' (कृष्ण नामक असुर) को 'अपश्यम्' (देखा)। वह कहाँ स्थित था ? 'विषुणे' अर्थात् चारों ओर फैले हुए विस्तृत प्रदेश में। अथवा, 'विषुण' का अर्थ विषम भी है; अर्थात् शत्रुओं के लिए अदृश्य, गुफा रूपी दुर्गम स्थान में। वह वहाँ 'चरन्तं' (विचरण करते हुए को)। इसके अलावा, 'अंशुमत्याः' इस नाम वाली 'नद्यः' (नदी) के 'उपह्वरे' अर्थात् अत्यन्त गोपनीय स्थान पर, 'नभो न' (आकाश में सूर्य के समान) चमकते हुए और जल के भीतर 'अवतस्थिवांसम्' (स्थित) उस 'कृष्ण' नामक असुर को मैंने देखा। उसके दिखने पर, हे 'वृषणः' (कामनाओं या जल की वर्षा करने वाले मरुतों), मैं 'वः' (तुम्हें) युद्ध के लिए 'इष्यामि' (चाहता हूँ/प्रेरित करता हूँ)। अतः तुम सब उस कृष्ण को 'आजौ' (युद्ध क्षेत्र में, जहाँ योद्धा और अस्त्र चलते हैं) 'युध्यत' (उससे युद्ध करो)। यहाँ वाक्य भेद होने के कारण (इष्यामि में) निघात स्वर नहीं हुआ है। कुछ लोग 'इष्यामि वो मरुतः' ऐसा पाठ पढ़ते हैं, जिसका अर्थ है—हे मरुतों, मैं तुम्हारी इच्छा करता हूँ।"
"अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थेऽधारयत्तन्वं तित्विषाणः।विशो अदेवीरभ्याचरन्तीर्बृहस्पतिना युजेन्द्रः ससाहे ॥१५॥
अध अथ “द्रप्स सः द्रुतगामी कृष्णः “अंशुमत्याः नद्याः “उपस्थे समीपे “तित्विषाणः दीप्यमानः सन् “तन्वम् आत्मीयं शरीरम् “अधारयत् । परैरहिंस्यत्वेन बिभर्ति । यद्वा । बलप्राप्त्यर्थं स्वशरीरमाहारादिभिरपोषयत् । तत्र “इन्द्रः गत्वा “बृहस्पतिना एतन्नामकेन देवेन “युजा सहायेन “अदेवीः अद्योतमानाः । कृष्णरूपा इत्यर्थः । यद्वा । पापयुक्तत्वादस्तुत्याः । “आचरन्तीः आगच्छन्तीः “विशः= असुरसेनाः "अभि "ससहे जघान । तमवधीदित्यर्थः प्रसङ्गादवगम्यते ।
सायण भाष्य का हिन्दी अनुवाद-
फिर वह द्रुतगामी कृष्ण (असुर) 'अंशुमती' नदी के किनारे दीप्तिमान होकर अपने शरीर को धारण किए हुए था (अर्थात् शत्रुओं द्वारा अपराजित होकर खड़ा था। अथवा, बल प्राप्ति के लिए अपने शरीर को आहार आदि से पुष्ट कर रहा था)। वहाँ इन्द्र ने जाकर बृहस्पति नामक देव की सहायता से, उन प्रकाशहीन (अंधकारमय या पापयुक्त होने के कारण स्तुति के अयोग्य) और अपनी ओर बढ़ती हुई कृष्ण असुर की सेनाओं को पराजित किया (अर्थात् उनका संहार किया, यह अर्थ प्रसंग से समझा जाता है)।"
उपरिलिखित ऋचाओं का संयुक्त सन्दर्भ और अनुवाद सायण भाष्य पर ही आधारित है ।
सायण भाष्य के अनुयायी
इन ऋचाओं में प्रयुक्त हुए निम्नलिखित शब्दों के दार्शनिक और प्रतीकात्मक अर्थ इस प्रकार करते हैं-
1. द्रप्स-
साधारण अर्थ में इसका अर्थ 'बूँद' या 'कण' होता है, लेकिन यहाँ यह 'गतिशील तत्व' के लिए सायण ने इसका अर्थ किया है। दार्शनिक रूप से यह उस भटकती हुई शक्ति का प्रतीक है जो अभी स्थिर नहीं हुई है। कुछ विद्वान इसे 'सोम' की बूँद( Drops) मानते हैं, तो कुछ इसे 'अन्धकार का पुञ्ज' अथवा कृष्ण के विशेषण रूप में ग्रहण करते हैं।
2. अंशुमती-
'अंशु' का अर्थ है किरण। अंशुमती का अर्थ हुआ 'किरणों वाली' या 'प्रकाशमयी' होता है। भौतिक स्तर पर: यह कुरुक्षेत्र के पास की यमुना का विशेषण है। आध्यात्मिक स्तर पर: यह 'बुद्धि' या 'चेतना' का प्रतीक है। जब ज्ञान की किरणें (अंशु) मन में बहती हैं, तो वह अंशुमती है।
3. कृष्ण-
ऋग्वेद के इस सूक्त में 'कृष्ण' किसी व्यक्ति के बजाय 'अन्धकार' का प्रतीक है।
यह वह अवरोध है जो प्रकाश को रोकता है। दस हजार (दशभिः सहस्रैः) सेनाऐं हमारी अनगिनत वृत्तियों या बुराइयों को दर्शाती हैं जो चेतना के तट पर घेरा डाले रहती हैं।
4. इन्द्र और बृहस्पति का योग -
सायण आदि भाष्य कर्ताओं के अनुसार इन्द्र 'संकल्प शक्ति' हैं और बृहस्पति 'ज्ञान/वाणी'। ऋचा संख्या (१५) स्पष्ट करती है कि केवल बल से काम नहीं चलता, जब संकल्प को ज्ञान (बृहस्पति) का साथ मिलता है, तभी भीतर के 'अदेव' (अन्धकारमयी) तत्वों पर विजय मिलती है।
5-विश-वेदों में सायण ने विश विशेषण पद का अर्थ "विशो अदेवीर्" के रूप में देवों को न मानने वाले की प्रजा से किया है। सायण उन्होंने "विश" पद को केवल प्रजा मात्र मान लिया है। और विशो अदेवीर् पद का भाष्य असुरों की प्रजा अथवा असुर-सेना से किया है।
इतिहासकारों,भाष्यकारों और शोधकर्ताओं ने ऋग्वेद की इन ऋचाओं (8/96/13-14-15) को अलग-अलग दृष्टिकोण (एंगल) से देखा है। इस कारण मुख्य रूप से दो बड़े ऐतिहासिक मत उभरकर सामने आते हैं-
1- जनजातीय संघर्ष का मत-
डी.डी. कौशाम्बी और कई अन्य इतिहासकारों का मानना है कि ऋग्वेद के 'कृष्ण' एक आर्य-पूर्व (Non-Aryan) जनजातीय नायक या नेता थे। उनके अनुसार 'अंशुमती' सम्भवतः यमुना नदी का ही प्राचीन नाम है।
कृष्ण की शक्ति- उपर्युक्त ऋचा में 'दशभिः सहस्रैः' (दस हजार के द्वारा ) पद का उल्लेख यह संकेत देता है कि कृष्ण एक शक्तिशाली स्थानीय राजा या कबीले के प्रधान थे।
ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचाऐं इन्द्र (जो ऋग्वेद में किलों को तोड़ने वाले 'पुरन्दर' कहे गए हैं) और स्थानीय कृष्ण कबीले के बीच हुए वास्तविक ऐतिहासिक युद्ध की स्थिति को दर्शाती हैं।
2- पौराणिक विकास का मत-
कुछ शोधकर्ता इसे 'पौराणिक कृष्ण' के चरित्र निर्माण का प्रारम्भिक सोपान मानते हैं। किन्तु आश्चर्य और दिलचस्प बात यह है कि ऋग्वेद में इन्द्र 'कृष्ण' को हरा रहे हैं, जबकि पुराणों (जैसे गोवर्धन लीला) आदि के प्रकरण में श्रीकृष्ण इन्द्र के अहंकार को चूर कर रहे हैं। कृष्ण और इन्द्र के चरित्र तथा पौरुष को लेकर यहाँ दो विरोधाभासी बातें ही प्रकाशित हो रही हैं।
इन ऋचाओं के प्रति इतिहासकारों, भाष्यकारों और शोधकर्ताओं के बीच अर्थ विन्यास को लेकर जो मत-मतान्तर पूर्वाग्रह से युक्त हैं, वह सब सायण भाष्य से ही प्रेरित है। इस पर कुछ इतिहासकारों का तो मानना यह भी हैं कि समय के साथ समाज की धार्मिक मान्यताओं में बदलाव आया। जिसके परिणामस्वरूप जो 'कृष्ण' ऋग्वेद में एक असुर या अदेव के रूप में चित्रित थे, वे ही बाद में भागवत धर्म के उदय के साथ सर्वोच्च देवता (भगवान श्रीकृष्ण) के रूप में स्थापित हुए।
3- भाषाविद् और निरुक्तकारों का विचार-
वेदों के भाष्यकार सायणाचार्य ने स्पष्ट किया है कि वैदिक 'कृष्ण' एक असुर का नाम है। उनके अनुसार, 'कृष्ण' शब्द का अर्थ 'काले रंग वाला' है, जो किसी व्यक्ति विशेष के बजाय अन्धकार के समूह या काले मेघों की ओर इशारा करता है इन्द्र पद प्रकाश का वाचक है।
कुल मिलाकर यदि भाष्यकार सायणाचार्य की मानें तो ऋग्वेद के कृष्ण गोपेश्वर श्रीकृष्ण नहीं बल्कि कोई काले शरीर का असुर है। और ऐसे में भाष्यकार सायणाचार्य श्रीकृष्ण का वर्णन वेदों में नहीं मानते हैं।
सायण भाष्य की समीक्षा और वास्तविक समाधान का सारांश- गोपाचार्य हंस योगेश कुमार रोहि के द्वारा-
यह समीक्षाएँ पूरी तरह से सायण भाष्य के विपरीत है। इसे स्वयं भाषाविज्ञान के विशेषज्ञ व संस्कृत व्याकरणज्ञ और भारोपीय परिवार की भाषाओं के विश्लेषक- गोपाचार्य हंस श्री योगेश कुमार रोहि जी ने प्रस्तुत किया है। जो निम्नलिखित है-
गोपाचार्य हंस श्री योगेश कुमार रोहि जी का मनना है कि "वैदिक ऋचाओं में जिस कृष्ण का उल्लेख हुआ है, वह गोपेश्वर श्रीकृष्ण के लिए ही हुआ है। हाँ ये बात अलग है कि भाष्यकार सायणाचार्य ने श्रीकृष्ण के लिए प्रयुक्त अदेव पद को असुर के अर्थ में भाष्य कर उसे पौराणिक व परवर्ती दैत्य अर्थ में ग्रहण किया है। जोकि अप्रासंगिक व कालवाधित है।
जिसे व्याकरणीय दृष्टि से भी पूर्णतया स्वीकार्य नहीं किया जा सकता।" क्योंकि इन ऋचाओं में आये कुछ प्रमुख शब्दों को देखा जाए तो उनके व्याकरणीय अर्थ निम्नलिखित हैं-
सर्व प्रथम हम असुर शब्द को ही अपने विश्लेषण का विषय बनाएँ
जैसा कि आपलोगों ने उपर्युक्त सन्दर्भों में देखा कि सारण ने अपने भाष्य में श्रीकृष्ण को असुर बनाने का भरसक प्रयास किया है। श्रीकृष्ण कृष्ण के लिए असुर शब्द को लेकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि पुराणों में केवल श्रीकृष्ण को ही असुर नहीं कहा गया है बल्कि वरुण, अग्नि, सूर्य, शिव (रूद्र) और इन्द्र का भी असुर कहा गया है। और यह भी सत्य है कि ऋग्वेद में 'असुर' शब्द का प्रयोग लगभग (105 ) बार हुआ है। इनमें से अधिकांश स्थानों पर (लगभग 90 बार) प्रयोग हुआ है जो मुख्य रूप से इन्द्र, वरुण, अग्नि और रूद्र (शिव) जैसे देवों के विशेषण के रूप में उनकी दिव्य शक्ति औरसामर्थ्य को दर्शाने के लिए हुआ है। ऋग्वेद के उत्तरार्द्ध (विशेषकर दसवें मण्डल) में ही यह शब्द धीरे-धीरे नकारात्मक अर्थों (राक्षस या देव-विरोधी) शक्तियों में प्रयुक्त होने लगा था।
पुराणों में असुर शब्द कब और किसके लिए प्रयुक्त हुआ है उसे क्रमशः नीचे उद्धृत किया जा रहा है।
स्वयं सायण ऋग्वेद के दशम मण्डल के सूक्त संख्या (10) की ऋचा संख्या (2) में असुर शब्द का अर्थ वरुण देव के अर्थ में करते हैं। जैसे-
(क) वरुण देव के लिए असुर शब्द-
"न ते सखा सख्यं वष्ट्येतत्सलक्ष्मा यद्विषुरूपा भवाति ।महस्पुत्रासो असुरस्य वीरा दिवो धर्तार उर्विया परि ख्यन् ॥२॥
यह मन्त्र ऋग्वेद के 10वें मण्डल के 10वें सूक्त (यम-यमी संवाद) का 11वां मन्त्र है। इसमें यमी (बहन) यम (भाई) से शारीरिक सम्बन्ध बनाने का आग्रह करती है, जिस पर यम उन्हें अनैतिकता और पाप से सचेत करते हैं।
ऋग्वेद 10.10.11
न ते सखा सख्यं वष्ट्येतत्सलक्ष्मा यद्विषुरूपा भवाति ।
महस्पुत्रासो असुरस्य वीरा दिवो धर्तार उर्विया परि ख्यन् ॥
1. हिन्दी अनुवाद-
यम यमी से कहते हैं:
"हे यमी! जो साथ में पैदा हुए (सहोदर) होने के बावजूद भी विषमरूप (विपरीत चरित्र वाले) हो जाते हैं, वैसा सख्य (मैत्री या शारीरिक सम्बन्ध) सखा (भाई) नहीं चाहता है। महान असुर (द्युलोक के स्वामी, परमेश्वर) के पुत्र और वीर, जो द्युलोक (स्वर्ग/आकाश) को धारण करने वाले हैं, वे हर जगह (हमारा पाप) देख रहे हैं।"
अर्थ: यम समझाते हैं कि सहोदर भाई-बहन का शारीरिक संबंध पापपूर्ण है और आकाश में रहने वाले दिव्य पुरुष (देवता) इसे देख रहे हैं, इसलिए हमें मर्यादा में रहना चाहिए।
ऋग्वेदः - मण्डल १० सूक्त १० ऋचा २- का
सायण भाष्य के असुर मूलक अंश- महः= महतः( महान) “असुरस्य= प्राणवतः प्रज्ञावतो वा प्रजापतेः( प्राणवान प्रज्ञावान वरुण प्रजापति के “पुत्रासः =पुत्रभूताः “वीराः पुत्रगण।
ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचा में
प्राण और प्रज्ञा (तीव्र बुद्धि) से सम्पन्न वरुण देव को ही असुर कहा गया है। जो नैतिकता और धर्म के अधिष्ठाता हैं।
(ख) अग्नि देव के लिए असुर शब्द-
ऋग्वेद में अग्नि देव को कई स्थानों पर 'असुर' शब्द से सम्बोधित किया गया है। जिसका अर्थ यहाँ शक्तिशाली, प्राणदाता या प्रज्ञा शक्ति से युक्त होता है, न कि दैत्य अथवा राक्षस। अग्नि के लिए 'असुर' शब्द का प्रयोग करने वाली प्रमुख ऋचा अथवा मन्त्र निम्नलिखित हैं:
मूल ऋचा -
प्र वेधसे कवये वेद्याय गिरं भरे यशसे पूर्व्याय।
घृतप्रसत्तो असुरः सुशेवो रायो धर्ता धरुणो वस्वो अग्निः॥ऋग्वेद-१/१५/१
पदों का (अर्थ)-
"मैं (यजमान) मेधावी (विवेकशील), सर्वज्ञ, स्तुति के योग्य और अनादि (प्राचीन) अग्निदेव के लिए अपनी स्तुति (वाणी) को प्रविष्ट (अर्पित) करता हूँ। वे अग्निदेव घृत (घी) से प्रसन्न होने वाले, प्राणदाता (असुरः - बलवान्), कल्याणकारी, धन के धारण करने वाले और वसु (धन/ऐश्वर्य) के आधार हैं।"
वस्वो (संज्ञा): 'वसु' (धन/ऐश्वर्य), षष्ठी विभक्ति, एकवचन।
अग्निः (संज्ञा): 'अग्नि' शब्द, प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
ऋग्वेद 3/3/4 इसमें भी अग्नि को 'असुर' के रूप में सम्बोधित किया गया है: "पिता यज्ञानाम्-असुरो विपश्चितां विमानमग्निर्वयुनं च वाघताम्। आ विवेश रोदसी भूरिवर्पसा पुरुप्रियो भन्दते धामभिः कविः॥४॥
हिन्दी अनुवाद-
"यज्ञों के जनक, विद्वानों के प्राणदाता (असुर), देवताओं के रथ-स्वरूप, स्तोताओं के ज्ञान और कर्म के आधार अग्नि देव ने अपने महान वैभव के साथ आकाश और पृथ्वी में प्रवेश किया है। सबको प्रिय लगने वाले वे ज्ञानी (कवि) अग्नि देव अपने विविध दिव्य धामों (तेजों) के साथ शोभायमान हो रहे हैं।"
संस्कृत के प्रख्यात कोशकार वी. एस. आप्टे व मोनियर विलियम्स ने भी "असु" का अर्थ "प्राण" प्रज्ञा ( मेधा शक्ति) किया है।
दरअसल हिंदी और संस्कृत का "असुर" शब्द इसी "असु" (प्राण) शब्द से निर्मित हुआ है।"असुर का निर्माण "असु + र" से हुआ है जबकि अज्ञानियों ने इसे "अ+सुर" से निर्मित माना है। जो कि एक भ्रान्ति है।
त्वमग्ने रुद्रो असुरो महो दिवस्त्वं शर्धो मारुतं पृक्ष ईशिषे (ऋग्वेद 2.1.6)
ऋग्वेद 2/1/6 इस ऋचा में भी अग्नि को असुर कहा गया है
त्वमग्ने रुद्रो असुरो महो दिवस्त्वं शर्धो मारुतं पृक्ष ईशिषे । त्वं वातैररुणैर्यासि शंगयस्त्वं पूषा विधतः पासि नु त्मना ॥६॥
-
त्वम् (आप) शंगयः (सुखपूर्वक जाने वाले/सुख के दाता) अरुणैः वातैः (लाल रंग के वायुओं-वेगवान अश्वों के साथ) यासि (गमन करते हैं/विद्यमान हैं)। त्वम् (आप) पूषा (पुष्टि करने वाले/पोषणकर्ता) [असि] नु (निश्चित रूप से) विधतः (यज्ञ-अनुष्ठान करने वाले यजमानों की) त्मना (स्वयं) पाससि (रक्षा करते हैं)।
भावार्थ: हे अग्निदेव ! आप महान आकाश के तेजस्वी और रुद्र (भयानक/दुःखनाशक) शक्ति हैं। आप मरुद्गणों (वायुदेवों) की शक्ति और अन्न के स्वामी हैं। आप वायु के समान तीव्र और कल्याणकारी वेग से गमन करते हैं। आप पूषा (पोषण करने वाले) रूप में, यज्ञ करने वाले भक्तों की स्वयं रक्षा करते हैं।
वैदिक साहित्य में "असुर" का अर्थ प्रारम्भ में ' प्राणवान्' और प्रज्ञावान् ही रहा है, जो बाद के समय में नकारात्मक अर्थों में प्रयुक्त होने लगा है।
(ग) इन्द्र के लिए असुर शब्द-
इन्द्र के लिए असुर विशेषण पद का प्रयोग भी वैदिक है। देखें निम्नलिखित ऋचा जो इन्द्र को असुर रूप में दर्शाती है।
तमु त्वा नूनमसुर प्रचेतसं राधो भागमिवेमहे ।
महीव कृत्तिः शरणा त इन्द्र प्र ते सुम्ना नो अश्नवन् ॥ (ऋग्वेद ८/९०/६)
सायण भाष्य के अंश "हे असुर बलवन् प्राणवन् हे इन्द्र य उक्तगुणोऽस्ति"
(घ) शिव के लिए असुर शब्द-
वेदों (विशेषकर ऋग्वेद) में 'असुर' शब्द का प्रयोग शिव के वैदिक स्वरूप रुद्र के लिए भी कई स्थानों पर हुआ है, लेकिन यहाँ इसका अर्थ 'राक्षस' न होकर 'अत्यन्त शक्तिशाली', 'प्राणवान' या 'दैवीय गुणों से युक्त' जनसमुदाय से है।
वेदों में रूद्र के लिए प्रयुक्त असुर शब्द के प्रमुख सन्दर्भ निम्नलिखित हैं:
ऋग्वेद- ऋग्वेद में रुद्र (शिव) को असुर और देव दोनों ही विशेषणों से सम्बोधित किया गया गया है। ऋग्वेद में रुद्र को (6) बार असुर के रूप में महिमामण्डित किया गया है।
प्र सा क्षितिरसुर या महि प्रिय ऋतावानावृतमा घोषथो बृहत् ।
युवं दिवो बृहतो दक्षमाभुवं गां न धुर्युप युञ्जाथे अपः ॥ ऋग्वेद १/१५१/४
हिन्दी अनुवाद:
हे (ऋतावाना) सत्यपालक मित्र और वरुण! (असुर) हे बलशाली देवो! (या) जो (महि) महान (क्षितिः) भूमि/स्थान (प्रिय) आपको प्रिय है, उस (सा) प्रसिद्ध यज्ञ-भूमि को आप (बृहत्) बहुत ज्यादा (आ घोषथः) प्रख्यात/सुशोभित करते हैं।
(युवम्) तुम दोनों (बृहतः दिवः) महान प्रकाशमान आकाश से (आभुवम्) उत्तम (दक्षम्) सामर्थ्य/बल को लाते हो, और (गाम् न) बैल के समान (धुरि) धुरी पर (अपः) कर्मों/यज्ञ को (उप युञ्जाथे) नियुक्त करते हो।
असुर का वैदिक अर्थ: वेदों के प्रारम्भिक काल में, असुर शब्द का प्रयोग अग्नि, वरुण, सूर्य और रुद्र जैसे देवताओं के लिए किया जाता था, जो 'असु' (प्राण) देने वाले या प्रज्ञा (ज्ञान) के स्वामी होते थे।
निष्कर्ष:-
वेदों में शिव (रुद्र) के लिए 'असुर' शब्द का प्रयोग अत्यन्त दिव्य शक्ति के सन्दर्भ में हुआ है, न कि नकारात्मक अर्थ में अत: सायण ने "असुर" शब्द को दो विरोधी अर्थों में प्रस्तुत किया है-
"को ददर्श प्रथमं जायमानमस्थन्वन्तं यदनस्था बिभर्ति ।
भूम्या असुरसृगात्मा क्व स्वित्को विद्वांसमुप गात्प्रष्टुमेतत् ॥४।
ऋग्वेदः - मण्डल (१/१६४/४) उपर्युक्त इस ऋचा में असुर पद प्राणों वाली आत्मा का वाची है।
प्रसंग के अनुरूप वैदिक ऋचाओं में असुर का अर्थ "प्राण व प्रज्ञा से सम्पन्न व्यक्ति" के लिए ही अधिक मान्य है। परन्तु दशम मण्डल के कुछ उत्तरकालीन सूक्तो में तथा लौकिक संस्कृत भाषा में असुर पद शक्ति के प्राचुर्य व भयंकरता के कारण दैत्यों का वाचक भी बन गया है। परन्तु ऋग्वेद में सायण ने इस अर्थ परिवर्तन क्रम को अनदेखा किया है। जो अनर्थ का कारण बना।
इस प्रकार से आप लोगों ने वेदों में असुर शब्द की महत्ता और वास्तविकता को जाना कि असुर शब्द- दैत्य इत्यादि का वाचक न होकर प्राण देने वाले या प्रज्ञा (ज्ञान) का वाचक था जिसे सायण जैसे भाष्यकारों ने दैत्यों के लिए परिभाषित किया जो किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं है।
ईरानी पुराकथाओ ( Mythology) में वैदिक कालीन असुर शब्द अहुर हो गया है जिसे ईरान के सर्वोच्च ईश्वरीय शक्ति( अहुरमज्दा) में देखा जा सकता है। अब हमलोग उपर्युक्त ऋचा में हम , विश, द्रप्स , कृष्ण, शचि, और बृहस्पति आदि पदों के आधार पर कृष्ण के वैदिक और पौराणिक काल की विवेचना अथवा समीक्षा करेंगे हमारी यह प्रतिक्रिया सायण भाष्य के सापेक्ष होगी !
(१) विश शब्द की समीक्षा-
विश- शब्द भी वैदिक ऋचाओं में प्रयुक्त है विशेषत: उपर्युक्त ऋचा में विश कृष्ण के अनुयायी गोप जन समुदाय का वाचक है। परन्तु इसका अर्थ तृतीय वर्ण के व्यक्ति वैश्य अथवा कृषि कर्म और गोपालन करने वाले के अर्थ को ध्वनित करता है। गोप ही ये सब कार्य (कृषि और गोपालन) करने वाले हैं।
समीक्षा-वेदों में विश' एक अत्यन्त महत्वपूर्ण और प्राचीन शब्द है,और जो वैदिक सामाजिक संरचना का आधार स्तम्भ था। इसका अर्थ केवल साधारण जनसमूह ही नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित सामाजिक इकाई से था जो वंश परम्परागत रूप से कृषि और गोपलन करती है अत: विश का अर्थ वैश्यवृत्ति (कृषि औक गोपालन) करने वाले गोपों से है।।
यह श्लोक पद्मपुराण (स्वर्गखण्ड -26) का है, जिसमें वैश्य वर्ण के लक्षण, आचरण और कर्तव्यों का वर्णन किया गया है।
विशत्याशु पशुभ्यश्च कृष्यादानरुचिः शुचिः ।वेदाध्ययनसम्पन्नः स वैश्य इति संज्ञितः ॥
अनुवाद-
वह व्यक्ति जो पशुपालन में लगा हो, जिसकी रुचि कृषि और व्यापार (क्रय-विक्रय) में हो, जो स्वभाव से शुद्ध और पवित्र हो, तथा जिसने वेदों का अध्ययन किया हो—उसे ही वास्तव में 'वैश्य' कहा जाता है।
वैश्य के कर्म: इस श्लोक के अनुसार वैश्य के मुख्य कर्म कृषि (खेती), पशुपालन और वाणिज्य (व्यापार) हैं।
गुण: वैश्य का 'शुचि' (पवित्र) होना और वेदों का ज्ञान रखना अनिवार्य बताया गया है।
यद्यपि विश गोपों का विशेषण होते हुए भी गोपों को ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था में सम्मिलित नहीं किया जा सकता है।
क्योंकि ये ब्रह्मा की सृष्टि नहीं हैं। तो भी इनके गोपालन और कृषि व्यवसाय परक होने से इन्हें विश कहा जाता रहा है।
वेदों में विश के मुख्य प्राचीन अर्थ निम्नलिखित हैं:-
ऋग्वेद में 'विश' का प्रयोग सामान्य जनसमुदाय के लिए किया गया है, जो एक जन (कबीले) का हिस्सा होते थे।
वैश्य वर्ग पुरुषसूक्त (ऋग्वेद) के अनुसार, विश से ही वैश्य वर्ण की उत्पत्ति मानी गई है। वेदों में विश का अर्थ कृषि,और पशुपालन से सम्बंधित जन समुदाय से है जो समाज की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ होते थे।
बस्ती या ग्राम (Settlement/Village): विश' का एक अर्थ उस स्थान या बस्ती से भी है जहाँ लोग रहते थे, जिसे बाद में 'ग्राम' के रूप में जाना गया। यह ग्राम या कबीले का निवास स्थान होता था।
संस्कृत शब्द ग्राम का मूल अर्थ भी ग्रास भूमि( घास के मैदान) से ही है। जहाँ कालान्तर में गोप और उनके पशु स्थाई रूप से रहने लगे। और वह घास का मैदान ग्राम के रूप में रूढ़ हो गया जहाँ कृषक और उनके पशु रहते हैं।
बहुत ही सटीक और भाषा-वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु की ओर संकेत किया है। 'ग्राम' शब्द की विकास यात्रा वास्तव में मानव सभ्यता के खानाबदोश (Nomadic) जीवन से स्थायी कृषि जीवन की ओर बढ़ने की कहानी है।
संस्कृत शब्द 'ग्राम' की व्युत्पत्ति और गोप (पशुपालक) संस्कृति के साथ इसके अंतर्संबंधों का विश्लेषण निम्नलिखित है:
1. ग्राम शब्द की व्युत्पत्ति (Etymology)-
व्युत्पत्ति शास्त्र के अनुसार 'ग्राम' शब्द 'ग्रस्' धातु से निकला माना जाता है, जिसका अर्थ है 'भक्षण करना' या 'खाना'।
- मूल अर्थ: प्रारम्भ में, 'ग्राम' का अर्थ केवल वह भूमि थी जिसे पशु चरते थे (ग्रास भूमि या चारागाह)।
- समूहवाचक संज्ञा: धीरे-धीरे इसका अर्थ 'समूह' हो गया। निरुक्त के अनुसार, "ग्रामः गमनात्" अर्थात् जहाँ लोग अपनी आवश्यकता के अनुसार आते-जाते रहते थे।
- विकास: वह स्थान जहाँ पशुओं के समूह को 'ग्रास' (चारा) उपलब्ध होता था, वह 'ग्राम' कहलाया। कालान्तर में जहाँ उन पशुओं के रक्षक (गोप) और कृषक बस गए, वह स्थान स्थायी बस्ती बन गया।
2. गोप संस्कृति और ग्राम का समन्वय-
प्राचीन भारतीय संस्कृति, विशेषकर वैदिक युग में, धन का मुख्य स्रोत 'गोधन' (गाय) था। इस आधार पर ग्राम और गोप संस्कृति के बीच गहरा आन्तरिक समन्वय दिखता है-
पक्ष समन्वय का आधार-
निवास की संरचना प्राचीन ग्राम केवल घरों का समूह नहीं थे, बल्कि वे 'गोष्ठ' (बाड़े) के चारों ओर विकसित हुए थे। जहाँ गोप अपने पशुओं को सुरक्षित रखते थे, वही केंद्र ग्राम की धुरी बना।
गतिशीलता से स्थायित्व गोप पहले चारे की खोज में भ्रमणशील थे। जब उन्होंने घास के उत्तम मैदानों (ग्राम) को पहचान कर वहाँ खूँटा गाड़ दिया, तो वह 'ग्राम' एक स्थायी सामाजिक इकाई बन गया।
आर्थिक आधार गोप संस्कृति में 'गो-रस' (दूध, दही, घी) मुख्य था। कृषि के आगमन के बाद, जब पशुओं का उपयोग हल चलाने में होने लगा, तो 'ग्राम' कृषक और गोप के साझा सहयोग का स्थल बन गया।
नेतृत्व (ग्रामणी) जैसे गायों के रक्षक को 'गोप' कहा गया, वैसे ही पूरे समूह या ग्राम के मुखिया को 'ग्रामणी' कहा गया। यह पद गोप संस्कृति की संगठित शक्ति का प्रतीक था।
3. सांस्कृतिक एवं दार्शनिक पहलू-
गोप संस्कृति में 'गौ' केवल एक पशु नहीं, बल्कि पृथ्वी और पोषण का प्रतीक थी। जब आप कहते हैं कि 'ग्राम' शब्द 'ग्रास' से निकला है, तो यह इस सत्य को पुष्ट करता है कि:
"जहाँ जीवन का आधार (पोषण/घास) उपलब्ध था, वहीं मानवीय संस्कृति (ग्राम) का अंकुरण हुआ।"
आज भी ग्रामीण परिवेश में 'गौचर' (गायों के चरने की भूमि) ग्राम का अनिवार्य हिस्सा मानी जाती है, जो इस प्राचीन भाषाई और सांस्कृतिक जड़ से आज भी जुड़ी हुई है। इसी समन्वय ने 'ग्राम' को केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि एक जीवंत 'पारिस्थितिक तन्त्र' (Ecosystem) बनाया।
प्रजा राजा या कबीले के नेता (जनस्य गोपा) के सन्दर्भ में, 'विश' का अर्थ उनकी प्रजा या सामान्य नागरिक होता था, जो राजा को कर (बल) देते थे।
वैदिक सामाजिक संरचना: ऋग्वैदिक काल में, समाज में 'जन' (कबीला) के बाद 'विश' सबसे महत्वपूर्ण इकाई थी। ऋग्वेद में 'विशाम्पति' शब्द का प्रयोग प्रजा के रक्षक या राजा के लिए किया गया
निष्कर्ष: वेदों में विश का अर्थ केवल जन विशेष ही नहीं, बल्कि एक उत्पादक, कृषि-पशुपालक वर्ग से है जो अपनी बस्ती में निवास करता था और कबीलाई व्यवस्था में आर्थिक और सामाजिक योगदान देता था। "विश-यह शब्द गोप जाति का समानार्थी व कृषि और गोपालन की गतिविधियों से सम्बन्धित जन समुदाय का वाचक रहा है।
विश" शब्द का अर्थ "गोपालक" या "पशुपालक" मुख्य रूप से ऋग्वेद और अन्य वैदिक साहित्य में पाया जाता है।
वैदिक काल में "विश" शब्द के प्रयोग और सन्दर्भ के बारे में कुछ मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
मूल अर्थ: ऋग्वेद में "विश" का प्रयोग सामान्य जनमानस या प्रजा के लिए किया गया है। उस समय समाज मुख्य रूप से पशुपालक (Pastoral) था, इसलिए विश का संबंध सीधे तौर पर गौ-पालन और कृषि से था।
"गोपालक के रूप में: वैदिक संस्कृत में "विश" का एक अर्थ "पशुपालक" या "गोपालक" भी होता है, क्योंकि उस काल में धन और संपत्ति का मुख्य आधार पशुधन (विशेषकर गायें) ही थे।
सामाजिक संरचना: वैदिक काल में समाज के तीन मुख्य स्तर थे: ब्राह्मण (पुरोहित), क्षत्र (योद्धा) और विश (सामान्य जन, जिसमें किसान और गोपालक शामिल थे)। यही "विश" शब्द आगे चलकर "वैश्य" वर्ण का आधार बना, जिनका प्राथमिक कर्तव्य पशुपालन, कृषि और व्यापार था।
(२) "द्रप्स" शब्द की समीक्षा-
नि:सन्देह सायण ने अपने वैदिक ऋचाओं के भाष्य में "द्रप्स" पद का वैकल्पिक व आनुमानित अर्थ ही ग्रहण किया हैं।
परन्तु हमारी जानकारी और शोधों के अनुसार "द्रप्स" पद भारोपीय परिवार की भाषाओं में अंग्रेज़ी शब्द (Drops)के समानार्थी है। जिसका अर्थ "जल-बिन्दु" होता है। वैदिक संस्कृत में भी द्रप्स पद जल बन्दु का ही अर्थ प्रकाशक है।
अत: द्रप्स पद का रूढ़ अर्थ ही ग्रहण करना चाहिए।
(३) अंशुमती शब्द की समीक्षा-
अंशुमती पर सायण का भाष्य भी अभिधा शब्द शक्ति मूलक है। रूढ़ अर्थ युक्त नहीं है जोकि वैदिक कथाओं के अनुरूप होना चाहिए था। पुराण वेदों की ही व्याख्याऐं हैं- पुराणों में अंशुमती पद यमुना नदी का वाचक व उसके लिए ही रूढ़ है। क्योंकि वह सूर्य की पुत्री बतायी जाती है। यमुना नदी को अंशुमति (और मुख्य रूप से सूर्यसुता, कहने के पीछे पौराणिक और धार्मिक कारण हैं, जो यमुना नदी को सूर्य देव से जोड़ते हैं:
सूर्य देव की पुत्री यमुना - पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यमुना सूर्य देव और संज्ञा की पुत्री हैं। अंशु का अर्थ 'किरण' होता है और अंशुमति का अर्थ 'किरणों वाली' या 'सूर्य की पुत्री' के रूप में लिया जाता है, जो सीधे सूर्य देव से उनके सम्बन्ध को दर्शाता है।
(४) कृष्ण शब्द की समीक्षा-
उपर्युक्त ऋचा में आया हुआ कृष्णपद भी लाक्षणिक शब्द शक्ति मूलक है। कृष्ण का धातुज अर्थ "कर्षण- अर्थात(कृषि -कार्य करने वाला अथवा आकर्षण करने वाला" ही है। और कृषि करने वाले कृषक भी जलवायु और उष्णता के प्रभाव से श्याम वर्ण( साँवले रंग ) के ही होते हैं। और पौराणिक पात्र कृष्ण भी श्यामल (साँवले) रंग के थे जो यमुना की तलहटी में प्राय: गायें चराया करते थे।
(५) इन्द्र और शचि शब्द की समीक्षा-
सर्वविदित है कि इन्द्र और शचि दोनों पति- पत्नी के रूप में पौराणिक पात्र हैं जो उपर्युक्त ऋचा में प्रयुक्त हुए हैं। इन्द्र एक पौराणिक पात्र है वेदों में भी एक देव विशेष का नाम इन्द्र है जो कृष्ण का प्रतिद्वन्द्वी है। अत: उपर्युक्त ऋचा में इन्द्र का वही अर्थ ग्रहण करना चाहिए जो पौराणिक ग्रन्थों में ग्रहण किया जाता है। और बृहस्पति इन्द्र के गुरु भी पौराणिक पात्र ही हैं।
अब हम ऋग्वेद की क्रमशः तीनों ऋचाओं में कृष्ण और इन्द्र सम्बन्धी युद्ध की सम्यक भाष्य और विवेचना प्रस्तुत करते हैं। ताकि आप लोग सायण और मेरे भाष्य की सम्यक तुलना करके कृष्ण और इन्द्र सम्बन्धी युद्ध की वास्तविकता को जान सकें।
"अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियान: कृष्णो दशभि: सहस्रै: आवत्तमिन्द्रःशच्याधमन्तमपस्नेहितीर्नृमणा अधत्त॥१३॥
ऋग्वेद_८/९६/१३/अथर्ववेद-(20/137/7)
पदों का हिन्दी अर्थ-
(इयानः)= चलता हुआ (अंशुमतीम्)= विभागवाली [सीमावाली यमुना नदी पर (अव अतिष्ठत्)= ठहरा है। (नृमणाः)= नरों के समान मनवाले (इन्द्रः) =इन्द्र ने (तम् धमन्तम्)= उस हाँफते अथवा हुंकारते हुए को (शच्या)= शचि के साथ (आवत्)= युद्ध किया और (स्नेहितीः)= स्नेहयुक्त (सिञचन करने वाला /भीगे हुए) (अप अधत्त)= हटा लिया है ॥१३॥
टिप्पणी:-
(धमन्तम्)= उच्छ्वसन्तम्। परिश्रमेण दीर्घं श्वसन्तम्= थकान के द्वारा लम्बी- लम्बी श्वास लेता हुआ। (स्नेहितीः) = सिञ्चन करने वाला।
(नृमणाः) नेतृतुल्यमनस्कः= नेत्रों के समान (अप अधत्त) = उपहार दत्तवान् ।
शब्दार्थ व व्याकरणिक विश्लेषण- १-अव= तुम रक्षा करो लोट्लकर मध्यम पुरुष एकवचन।
२-द्रप्स:= जल से द्रप्स् का पञ्चमी एकवचन यहाँ करण कारक के रूप में ।
३- अंशुमतीम् = यमुनाम् –यमुना को अथवा यमुना के पास द्वितीया यहाँ करण कारक के रूप में ।
४-अवतिष्ठत् = अव उपसर्ग पूर्वक (स्था धातु का तिष्ठ आदेश लङ्लकार रूप) =स्थित हुए।
५- इन्द्र: शच्या -स्वपत्न्या= इन्द्र: पद में प्रथमा विभक्ति एकवचन कर्ता करक तथा शच्या में शचि के तृत्तीया विभक्ति करणकारक का रूप शचि इन्द्र: की पत्नी का नाम है यह सर्व विदित है।
६-धमन्तं=अग्निसंयोगम् कुर्वन्तं कोलाहलकुर्वन्तंवा। चमकते हुए को अथवा हल्ला करते हुए को। (ध्मा धातु का धम आदेश तथा +शतृ(अत्) प्रत्यय कर्मणि द्वित्तीया का रूप एक वचन धमन्तं कृष्ण का विशेषण है ।
७-अप स्नेहिती: = जल में भीगते हुए का।
८-नृमणां( धनानां)
९-अधत्त= उपहार या धन दिया ।(डुधाञ् (धा)=दानधारणयोर्लङ्लकारे आत्मनेपदीय अन्यपुरुषएकवचने)
अब देखा जाए तो अथर्ववेद में भी ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचा निम्न क्रम में है। जिसमें "अदेवी" पद कृष्ण के लिए ही है। जो कभी देवों की सर्वोपरिता स्वीकार नहीं करता है।
विशेषटिप्पणी- यद्यपि संस्कृत लौकिक साहित्य में "अव" धातु के अनेक अर्थ विकसित हुए हैं- जो ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचा "अव द्रप्सो..... में आया हआ
अव क्रियापद- प्राप्त करो" के अर्थ में है।
"अव" धातु के लौकिक संस्कृत भाषाओं में अनेक अर्थ विकसित हुए हैं-
अव् – एक परस्मैपदीय धातु है और धातुपाठ में इसके अनेक अर्थ हैं ।
१०-अव्=१- रक्षण २-गति ३-कान्ति ४-प्रीति ५-तृप्ति ६-अवगम (प्राप्ति) ७-प्रवेश ८-श्रवण ९- स्वाम्यर्थ १०-याचन ११-क्रिया। १२ -इच्छा १३- दीप्ति १४-अवाप्ति १५-आलिङ्गन १६-हिंसा १७-दान १८-वृद्धिषु।
परन्तु हमें प्रकरण अथवा प्रसंग के अनुरूप ही यहाँ अव धातु का अर्थ ग्रहण करना चाहिए । यहाँ अव धातु का अर्थ- "प्राप्त करना" है जो प्रथम पुरुष एक वचन का लङ् लकार-अनद्यतन भूूूतकाल का रूप है। (आवत् = प्राप्त किया)।
"गोपाचार्य हंस योगेश कुमार रोहि अपने उपर्युक्त ऋचा संख्या (१३) का भाष्य का विस्तार करते हुए कहते हैं-
"अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियान: कृष्णो दशभि: सहस्रै: आवत्तमिन्द्रःशच्याधमन्तमपस्नेहितीर्नृमणा अधत्त॥
(ऋग्वेद८/९६/१३/)
उपर्युक्त ऋचा पर योगेश रोहि का भाष्य-
कृष्णो दशसहस्रैर्गोपैः परिवृतः सन्नंशुमतीनामधेयाया नद्या यमुनाया वा तटेऽतिष्ठत्। तत्र कृष्णस्य नाम्नः प्रसिद्धं तं गोपं नद्या जले मध्ये स्थितमिन्द्रो ददर्श। स इन्द्रः स्वपत्न्या शच्या सार्धमागत्य जले स्निग्धे तं गोपं कृष्णं तस्यानुचरानुपगोपांश्चातीवानि धनानि अदात्।
दस हजार गोपों (ग्वालों) से घिरे हुए श्रीकृष्ण यमुना नदी के तट पर स्थित अँशुमती नामक नदी अथवा यमुना के किनारे ठहरे थे। वहां कृष्ण के नाम से प्रसिद्ध उस गोप (कृष्ण) को नदी के जल के बीच स्थित (बैठा हुआ) इन्द्र ने देखा। इन्द्र ने अपनी पत्नी शची के साथ आकर जल के बीच उस स्नेही (या स्निग्ध/शान्त) जलाभिषिक्त गोप कृष्ण और उनके अनुचर (साथी) उपगोपों को बहुत सारा धन दिया।
द्रप्समपश्यं विषुणे चरन्तमुपह्वरे नद्यो अंशुमत्याः।
नभो न कृष्णमवतस्थिवांसमिष्यामि वो वृषणो युध्यताजौ ॥१४॥ ऋग्वेद ८/९६/१४
योगेश रोहि का भाष्य-
मया खलु यमुनाजलस्य विविधानि रूपाणि दृष्टानि, तथैव अञ्शुमत्याः निर्जने प्रदेशे चरन् एको वृषभोऽपि दृष्टः। अहं तं वृषभं युध्यन्तं कृष्णेन सह द्रष्टुम् इच्छामि। अर्थात् सो वृषभः स्थान-अडिग-स्थित-कृष्णेन सह युद्धं करोतु, एतादृशं मया वाञ्छितम्। सः स्थानो यत्र जलम् मेघश् च न भवेत् (इन्द्रः कृष्णस्य शक्तिमापनार्थम् एतत् इच्छति)।"
भाष्यानुवाद :-
इन्द्र कहता है कि विभिन्न रूपों में मैंने यमुना के जल को देखा और वहीं अंशुमती नदी के निर्जन प्रदेश में चरते हुए एक बैल अथवा साँड़ को भी देखा और इस साँड को युद्ध में लड़ते हुए मैं कृष्ण के साथ देखना चाहूँगा । अर्थात यह साँड अपने स्थान पर अडिग खडे़ हुए कृष्ण से युद्ध करे ऐसा होते हुए मैं चाहूँगा। वह स्थान जहाँ जल और- (नभ) बादल भी न हो (अर्थात कृष्ण की शक्ति मापन के लिए इन्द्र यह सब इच्छा जाहिर करता है )।१४।
हिन्दी भावार्थ-इन्द्र कहता है कि विभिन्न रूपों में मैंने यमुना के जल को देखा और वहीं अंशुमती नदी के निर्जन प्रदेश में चरते हुए एक बैल अथवा साँड़ को भी देखा और इस साँड को युद्ध में लड़ते हुए मैं कृष्ण के साथ देखना चाहूँगा । अर्थात यह साँड अपने स्थान पर अडिग खडे़ हुए कृष्ण से युद्ध करे ऐसा होते हुए मैं चाहूँगा। वह स्थान जहाँ जल और (नभ) बादल भी न हो
(अर्थात कृष्ण की शक्ति मापन के लिए इन्द्र यह सब इच्छा जाहिर करता है )।१४।
अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थेऽधारयत्तन्वं तित्विषाणः ।
विशो अदेवीरभ्याचरन्तीर्बृहस्पतिना युजेन्द्रः ससाहे ॥१५॥
योगेश कुमार रोहि का संस्कृत भाष्य-
विशेष-
पुराणों में भी कृष्ण समस्त देवों के यज्ञों को बन्द करा देते हैं। क्योंकि उन यज्ञों में निरीह पशुओं का वध होता है। जो विशेष रूप से इन्द्र देव को लक्ष्य करके किए जाते हैं।
इसी सन्दर्भ में हम यह भी सुनिश्चित कर दें की कृष्ण को वैदिक ऋचाओं में असुर कहीं नहीं कहा गया है। ऋग्वेद की मूल ऋचा में उपस्थित अदेवी पद का की सायण ने भाष्य "असुर" के समानार्थक किया है। उसी को आधार मान कर वेदों का हिन्दी अनुवाद पढ़ने वाले जन- साधारण ने कृष्ण को असुर मान लिया है।
सारांश-
असुर शब्द का प्रयोग तो कृष्ण के लिए सायण ने अपने भाष्य में ही किया है। अन्यथा मूल ऋचा में असुर पद न. होकर अदेव पद है जैसा हम पूर्व में बता चुके हैं।
परन्तु वैदिक सन्दर्भ में असुर का प्रारम्भिक अर्थ प्रज्ञा तथा प्राणों से युक्त मानवेतर प्राणियों को कहा गया है। इसी कारण सायण आचार्य ने कृष्ण को ऋग्वेद के अष्टम् मण्डल के सूक्त संख्या (96) की कुछ ऋचाओं की अपने भाष्य में अदेवी: पद के आधार पर (13,14,15,) में कृष्ण को असुर अथवा "अदेव कहकर कृष्ण का युद्ध इन्द्र से हुआ ऐसा वर्णित किया है। सायण का सम्पूर्ण भाष्य इस "अदेवी" पद को लेकर भ्रान्तिजनक है।
परन्तु वैदिक सन्दर्भ में असुर का प्रारम्भिक अर्थ "प्रज्ञा तथा प्राणों से युक्त मानवेतर प्राणियों से है। इन्द्र, वरुण और शिव को भी वेदों में असुर कहा गया है।
अतः उपर्युक्त ऋचा के अनुसार स्पष्ट हुआ कि कृष्ण यमुना की तलहटी में इन्द्र से युद्ध करते हैं। और यह बात वैदिक सत्य है। किन्तु श्रीकृष्ण तो वैदिक काल से भी प्राचीन हैं।
कुल मिलाकर अन्ततोगत्वा यहीं निष्कर्ष निकलता है कि सायण जैसे भाष्यकारों द्वारा श्रीकृष्ण से सम्बन्धित शब्दों के अर्थ का अनर्थ करके वेदों से श्रीकृष्ण की सत्ता को समाप्त करने को जो खड्यन्त्र किया गया हैं उसमें वे सफल नहीं हो सके। क्योंकि गोपेश्वर श्रीकृष्ण किसी न किसी रूप में वेदों में सदैव उपस्थित रहे और रहेंगे, यह ध्रुव सत्य है।
इस प्रकार से अध्याय-एक का भाग (क) समाप्त हुआ। अब इसके अगले भाग (ख) में श्रीकृष्ण का पौराणिक परिचय बताया गया है। इसे भी इस भाग के साथ जोड़कर अवश्य पढ़ें।
भाग (ख)श्रीकृष्ण का पौराणिक परिचय-
(1)- गोलोक में श्रीकृष्ण का परिचय-
(1)- गोलोक में श्रीकृष्ण का परिचय-
भगवान श्रीकृष्ण का गोलोक धाम शाशत और सनातन है। वहीं पर उनका मूल स्थान है जो समस्त ब्रह्माण्डों से पच्चास करोड़ योजन उपर है। वहाँ वे अपने गोप और गोपियों के साथ सदैव गोप वेष में रहते हैं। इस बात की पुष्टि- ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय (दो) के श्लोक (२१) से होती है जिसमें बताया गया है कि -
स्वेच्छामयं सर्वबीजं सर्वाधारं परात्परम्।
किशोरवयसं शश्वद्गोपवेषविधायकम्।२१।
अनुवाद - वे ही प्रभु स्वेच्छामयी सभी के मूल- (आदि-कारण) सर्वाधार तथा परात्पर- परमात्मा हैं। उनकी नित्य किशोरावस्था रहती है और वे प्रभु गायों के उस लोक (गोलोक) में सदा गोप (आभीर)- वेष में रहते हैं।२१।
इसी तरह से ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय- (२८) के श्लोक - ६१ से ६५ में लिखा गया है कि -
एवंरूपमरूपं तं मुने ध्यायन्ति वैष्णवाः।६१॥
सततं ध्येयमस्माकं परमात्मानमीश्वरम्।।
अक्षरं परमं ब्रह्म भगवन्तं सनातनम्।६२।।
स्वेच्छामयं निर्गुणं च निरीहं प्रकृतेः परम्।।
सर्वाधारं सर्वबीजं सर्वज्ञं सर्वमेव च।६३।।
सर्वेश्वरं सर्वपूज्यं सर्वसिद्धिकरं प्रदम्।।
स एव भगवानादिर्गोलोके द्विभुजः स्वयम्।६४।
गोपवेषश्च गोपालैः पार्षदैः परिवेष्टितः।।
परिपूर्णतमः श्रीमान् श्रीकृष्णो राधिकेश्वरः।६५।
अनुवाद -६१-६५-
• मुने ! वैष्णवजन उन निराकार परमात्मा का इस रूप में ध्यान किया करते हैं। वे परमात्मा ईश्वर हम सब लोगों के सदा ही ध्येय हैं। उन्हीं को अविनाशी परब्रह्म कहा गया है।६१-६२।
• वे ही दिव्य स्वेच्छामय शरीरधारी सनातन भगवान हैं। वे निर्गुण, निरीह और प्रकृति से परे हैं। सर्वाधार, सर्वबीज, सर्वज्ञ,सर्वस्वरुप है।६३।।
• सर्वेश्वर, सर्वपूज्य तथा सम्पूर्ण सिद्धियों को हाथ में देने वाले हैं। वे आदि पुरुष भगवान स्वयं ही द्विभुज रूप धारण करके गोलोक में निवास करते हैं।६४।
•उनकी वेशभूषा भी ग्वालों (अहीरों) के समान होती है और वे अपने पार्षद गोपालों (गोपों) से घिरे रहते हैं। उन परिपूर्णतम भगवान को श्रीकृष्ण कहते हैं। वे सदा श्रीजी (श्रीराधा) के साथ रहने वाले और श्रीराधिका के प्राणेश्वर हैं।६५।
(2)- भूलोक में श्रीकृष्ण का परिचय-
जिस तरह से भगवान श्रीकृष्ण का परिचय गोलोक में है उसी तरह से इनका परिचय भूतल पर भी है। क्योंकि सर्वविदित है कि भगवान श्रीकृष्ण गोलोक से जब भी भू-तल पर भूमि भार हरण के लिए अवतरित होते हैं, तो वे अपने समस्त गोप-गोपियों के साथ ही गोपकुल में गोपों के यहाँ ही अवतरित होते हैं।
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।७।
(श्रीमद्भागवत गीता अध्याय- ४/७)
अनुवाद:-
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं- "जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने आप को साकार रूप से प्रकट करता हूँ अर्थात् भूतल पर शरीर रूप धारण करता हूँ"।
इसी सत्य को चरितार्थ करने के लिए परमेश्वर श्रीकृष्ण अपने गोलोक से धरा-धाम पर गोप जाति के यादव वंश में अवतरित होते हैं।
"भूमेर्भरावतरणाय यदुष्वजन्मा जातः करिष्यति सुरैरपि दुष्कराणि।
वादैर्विमोहयति यज्ञकृतोऽतदर्हान् शूद्रान कलौ क्षितिभुजो न्यहनिष्यदन्ते।।२२।
अनुवाद - अजन्मा होने पर भी पृथ्वी का भार उतारने के लिए वे ही भगवान यदुवंश में जन्म लेंगे और ऐसे-ऐसे कर्म करेंगे, जिन्हें बड़े-बड़े देवता भी नहीं कर सकते।
इसी तरह से श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कन्ध के अध्याय-(६) के श्लोक संख्या -(२३) और (२५) में ब्रह्मा जी श्री कृष्ण से कहते हैं कि-
अवततीर्य यदोर्वंशे बिभ्रद् रुपमनुत्तमम्।
कर्माण्युद्दामवृत्तानि हिताय जगतोऽकृथाः।। २३।
यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरूषोत्तम।
शरच्छतं व्यतीताय पञ्चविञ्शाधिकं प्रभो।।२५।
अनुवाद - आपने यह सर्वोत्तम रूप धारण करके यदुवंश में अवतार लिया और जगत् के हित के लिए उदारता और पराक्रम से भरी अनेक लीलाएँ कीं ।२३।
• पुरुषोत्तम सर्वशक्तिमान प्रभु ! आपको यदुवंश में अवतार ग्रहण किये "एक सौ पचीस वर्ष" बीत गए हैं।२५।
▪️इसी तरह से हरिवंश पुराण के हरिवंश पर्व के अध्याय- (५५) के श्लोक-१७ में गोपेश्वर श्रीकृष्ण, ब्रह्माजी से पूछा कि- आप मुझे यह बताएं कि मैं किस प्रदेश में कैसे प्रकट होकर अथवा किस वेष में रहकर उन सब असुरों का समर भूमि में संहार करूँगा ? इस पर ब्रह्माजी श्लोक संख्या- (१८ से २०) में कहा -
नारायणेमं सिद्धार्थमुपायं श्रृणु मे विभो।
भुवि यस्ते जनयिता जननी च भविष्यति।। १८।
यत्र त्वं च महाबाहो जात: कुलकरो भुवि।
यादवानां महद वंशमखिलं धारयिष्यसि।।१९।
ताश्चासुरान् समुत्पाट्य वंशं कृत्वाऽऽत्मननो महत्।
स्थापयिष्यसि मर्यादां नृणां तन्मे निशामय।।२०।
अनुवाद - सर्वव्यापी नारायण ! आप मेरे इस उपाय को सुनिए, जिसके द्वारा सारा प्रयोजन सिद्ध हो जाएगा। हे महाबाहो ! भूतल पर जो आपके पिता होंगे,जो माता होगीं और जहाँ जन्म लेकर आप अपने कुल की वृद्धि करते हुए यादवों के सम्पूर्ण विशाल वंश को धारण करेंगे तथा उन समस्त असुरों का संहार करके अपने वंश का महान विस्तार करते हुए जिस प्रकार मनुष्यों के लिए धर्म की मर्यादा स्थापित करेंगे, वह सब बताता हूँ सुनिए।१८-१९-२०।
▪️इसी तरह से गोपेश्वर श्रीकृष्ण को यदुवंश में जन्म लेने की पुष्टि- गर्ग संहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय- (१४) के श्लोक संख्या- (४१) से होती है। जिसमें त्रेता-युग के रावण का भाई विभीषण जो अमर होकर लंका का राजा द्वापर युग तक जीवित था। उसी समय यादव अपनी विशाल सेना के साथ विश्वजीत युद्ध के लिए निकले थे। उसी समय दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य ने विभीषण को बताया कि-
असंख्यब्राह्मण्डपतिर्गोलोकेश: परात्पर:।
जातस्तयोर्वधाथार्य यदुवंशे हरि: स्वयंम्।।४१।
यादवेन्द्रो भूरिलीलो द्वारकायां विराजते। ४२/२
अनुवाद - असंख्य ब्रह्माण्डपति परात्पर गोलोकनाथ श्रीकृष्ण यदुवंश में अवतीर्ण हुए हैं। वे यादवेंद्र बहुत सी लीलाएँ करते हुए इस समय द्वारिका में विराजमान है।४१-४२/२।
यादवों के उसी विश्वजीत युद्ध के समय मुनि वामदेव ने राजा गुणाकर को भी भगवान श्रीकृष्ण को यादव कुल में उत्पन्न होने की बात बहुत ही अच्छे ढंग से बताया है। जिसका वर्णन गर्ग संहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय- (२८) के श्लोक संख्या (४५) व (४६) में कुछ इस प्रकार लिखा गया है-
राजंस्त्वं हि न जानसि परिपूर्णतमं हरिम्।
सुराणां महदर्थाय जातं यदुकुले स्वयंम्।
भुवो भारावताराय भक्तानां रक्षणाय च।।४५।
भूत्वा यदुकुले साक्षाद् द्वारकायां विराजते।
तेन कृष्णेन पुत्रोऽयं प्रदुम्नो यादवेश्वरः।
उग्रसेनमखार्थाय जगज्नेतुं प्रणोदित:।।४६।
अनुवाद - राजन ! तुम नहीं जानते कि परिपूर्णतम परमात्मा श्रीहरि, देवताओं का महान कार्य सिद्ध करने के लिए यदुकुल में अवतीर्ण हुए हैं। पृथ्वी का भार उतरने और भक्तों की रक्षा करने के लिए यदुकुल में अवतीर्ण हो वे साक्षात भगवान द्वारिकापुरी में विराजते हैं। उन्हीं श्रीकृष्ण ने उग्रसेन के यज्ञ की सिद्धि के लिए सम्पूर्ण जगत को जीतने के निमित्त अपने पुत्र यादवेश्वर प्रद्युम्न को भेजा है।४५- ४६।
▪यादवों के उसी विश्वजित् युद्ध के समय जब श्रीकृष्ण के द्वारा महान बलशाली दैत्यराज शकुनि मारा गया तब उसकी पत्नी मदालसा ने हाथ जोड़कर श्रीकृष्ण से जो कुछ कहा उससे भी सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण गोप जाति के यदुकुल में अवतीर्ण हुए थे। जिसका वर्णन गर्गसंगीता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय- (४२) के श्लोक संख्या- (६) और (७) में कुछ इस प्रकार लिखा गया है-
"भारावताराय भुवि प्रभो त्वं जातो यदूनां कुल आदिदेव।
ग्रसिष्यसे पासि भवं निधाय गुणैर्न लिप्तोऽसि नमामितुभ्यम्।। ६।
मदात्मजं पालय भीत-भीतममुष्य हस्तं कुरु शीर्षि्ण देव।
भर्त्रा कृते में किल तेऽपराधं क्षमस्व देवेश जगन्निवास।। ७।
अनुवाद- (६-७)
प्रभो आदि देव ! आप भूतल का भार उतारने के लिए यदुकुल में अवतरित हुए हैं। आप ही संसार के स्रष्टा एवं पालक है, और प्रलयकाल आनेपर आप ही इसका संहार भी करते हैं। किन्तु आप कभी भी गुणों में लिप्त नहीं होते। मैं आपकी अनुकूलता प्राप्त करने के लिए आपके चरणों को प्रणाम करती हूँ। मेरा पुत्र बहुत डरा हुआ है। आप इसकी रक्षा कीजिए। देव ! इसके मस्तक पर अपना वरद हस्त रखिए। देवेश ! जगन्निवास ! मेरे पति ने जो अपराध किया है उसे क्षमा कीजिए।
▪️इसी तरह से जब सभी देव मिलकर ब्रह्माजी का विवाह अहीर कन्या गायत्री से भगवान् विष्णु के निर्देशन में कराते हैं, तब ब्रह्माजी की पत्नी सावित्री क्रोध से तिलमिलाकर अहीर कन्या गायत्री सहित देवताओं को शापित करती हैं। उसी समय वहाँ उपस्थित विष्णु को भी सावित्री शाप दे देती हैं। उसी शाप के विधान से भी गोपेश्वर श्रीकृष्ण को यदुकुल में जन्म लेना पड़ता। इस बात की पुष्टि- पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय- (१७) के श्लोक संख्या-(१६१) से होती है। जिसमें सावित्री विष्णु को शाप देते हुए कहती हैं कि-
यदा यदुकुले जातः कृष्णसंज्ञो भविष्यसि।
पशूनां दासतां प्राप्य चिरकालं गोप रूपेण भ्रमिष्यसि ।।१६१।
अनुवाद - हे विष्णु ! जब तुम यदुवंश में जन्म लोगे, तो तुम कृष्ण के नाम से जाने जाओगें। उस समय तुम पशुओं (गायों) के सेवक बनकर लम्बे समय तक इधर-उधर भ्रमण करोगे।१६१।
▪️इसी तरह से बलरामजी को भी यदुकुल में उत्पन्न होने की पुष्टि गर्गसंहिता के बलभद्र खण्ड के श्लोक संख्या -(१३) और (१४) से होती है। जिसमें बलराम जी स्वयं अपने पार्षदों से कहते हैं कि -
हे हलमुसले यदा-यदा युवयोः स्मरणंं करिष्यमि।
तदा तदा मत्युर आविर्भूते भवतम्।। १३।
भो वर्म त्वमपि चाविर्भव। हे मुनयः पाणिन्यादयो हे व्यासादयो हे कुमुदादयो हे कोटिशो रुद्रा हे भवानीनाथ हे एकादश रुद्रा हे गन्धर्वा, हे वासुक्यादिनागेन्द्रा, हे निवातकवचा हे वरुण, हे कामधेनो मूम्यां भारतखण्डे यदुकुलेऽवतरन्तं मां यूयं सर्वे सर्वदा एत्य मम दर्शनं कुरुत।।१४।
अनुवाद - हे हल और मुसल! मैं जब-जब तुम्हारा स्मरण करूँ, तब-तब तुम मेरे सामने प्रकट हो जाना।
हे कवच ! तुम भी वैसे ही प्रकट हो जाना। हे पाणिनि, व्यास तथा कुमुद आदि मुनियों ! हे कोटि-कोटि रूद्रों ! गिरिजापति शंकर जी ! ग्यारह रुद्रों ! गन्धर्वों ! वासुकि आदि नागराजों ! निवातकवच आदि दैत्यों ! हे वरूण और कामधेनु! मैं भूमण्डल पर भारतवर्ष में यदुकुल में अवतार लूँगा। तुम सब वहाँ आकर सदा सर्वदा मेरा दर्शन करना।१३-१४।
✳️ अतः उपर्युक्त सभी श्लोकों से सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण गोप अथवा आभीर जाति के यदुवंश के वृष्णि कुल में हुआ है। किन्तु इस सम्बन्ध में ज्ञात हो कि- यदुवंश - वैष्णव वर्ण के गोपजाति का ही प्रमुख वंश है। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण को जब वंश में जन्म लेने की बात कही जाती है तब उनके लिए यदुवंश का नाम लिया जाता है। किन्तु जब भगवान श्रीकृष्ण को जाति में जन्म लेने की बात कही जाती है तो उनके लिए गोपजाति या आभीर (आहिर) जाति का नाम लिया जाता है। इसमें दोनों तरह से बात एक ही है। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण को अनेक बार यदुवंश के साथ-साथ गोपजाति में भी जन्म लेने की बात कही गई है। जैसे-
गोपेश्वर श्रीकृष्ण को गोपजाति में जन्म लेने की बात हरिवंश पुराण के विष्णु पर्व के ग्यारहवें अध्याय के श्लोक संख्या -५८ में कही गई है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि-
एतदर्थं च वासोऽयंव्रजेऽस्मिन् गोपजन्म च।
अमीषामुत्पथस्थानां निग्रहार्थं दुरात्मनाम्।।५८।
अनुवाद - इसीलिए व्रज में मेरा यह निवास हुआ है ; और इसीलिए मैंने गोपों में अवतार ग्रहण किया है।
▪️भगवान श्रीकृष्ण को भू-तल पर गोपकुल में अवतीर्ण होने की बात गायत्री संग ब्रह्माजी के विवाह के समय तब होती है जब इन्द्र गोप कन्या गायत्री को लेकर ब्रह्माजी से विवाह हेतु यज्ञ स्थल पर ले गए थे। तब सभी गोप अपना मुख्य शस्त्र लकुटि- दण्ड (लाठी- डण्डा) के साथ अपनी कन्या गायत्री को खोजते हुए ब्रह्मा के यज्ञ स्थल में पहुँचे। वहाँ पहुँच कर गायत्री के माता-पिता ने पूछा कि- मेरी कन्या को कौन यहाँ लाया है ? तब उनकी यह बात सुनकर तथा उनके क्रोध का अन्दाजा लगाकर वहाँ उपस्थित सभी देवता और ऋषि मुनि भयभीत हो गए। तभी वहाँ उपस्थित विष्णु भगवान् गोपों के सामने उपस्थित हो गए और उस अवसर पर जो कुछ गोपों से कहा उसका वर्णन पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय- (१७) के श्लोक संख्या -(१६) से (२०) में मिलता है। जिसमें भगवान्- विष्णु यज्ञ-स्थल में सबके समक्ष गोपों से कहते हैं कि -
युष्माभिरनया आभीरकन्याया
तारितो गच्छ ! दिव्यान्लोकान्महोदयान्।
युष्माकं च कुले चापि देवकार्यार्थसिद्धये।१६।
अवतारं करिष्येहं सा क्रीडा तु भविष्यति।
यदा नन्दप्रभृतयो ह्यवतारं धरातले।१७।
करिष्यन्ति तदा चाहं वसिष्ये तेषु मध्यतः।
युष्माकं कन्यकाः सर्वा वसिष्यन्ति मया सह।। १८।
तत्र दोषो न भविता न द्वेषो न च मत्सरः।
करिष्यन्ति तदा गोपा भयं च न मनुष्यकाः।।१९।
न चास्याभविता दोषः कर्मणानेन कर्हिचित्।
श्रुत्वा वाक्यं तदा विष्णोः प्रणिपत्य ययुस्तदा ।।२०।
अनुवाद:- हे आभीरों (गोपों) इस तुम्हारी आभीर कन्या गायत्री के द्वारा उद्धार किये गये तुम सब लोग दिव्यलोकों को जाओ तुम्हारी अहीर जाति के यदुकुल के अन्तर्गत वृष्णिकुल में देवों के कार्य की सिद्धि के लिए मैं अवतरण करुँगा।१६।
• और वहीं मेरी लीला (क्रीडा) होगी। उसी समय धरातल पर नन्द आदि का भी अवतरण होगा।१७।
• तब मैं उनके बीच रहूँगा। तुम्हारी सभी पुत्रियाँ मेरे साथ ही रहेंगी।१८।
• तब वहाँ कोई पाप, द्वेष और ईर्ष्या नहीं होगी। गोप (आभीर) लोग भी किसी को भय नहीं देंगे।१९।
• इस कार्य (ब्रह्मा से विवाह करने) के फलस्वरूप इस (तुम्हारी पुत्री को) कोई पाप नहीं लगेगा। विष्णु के ये वचन सुनकर वे सभी उन्हें प्रणाम करके वहाँ से चले गए।२०।
किन्तु जाते समय गोपगणों ने भी विष्णु से यह वचन करवाया कि आप निश्चित रूप से गोपकुल में ही जन्म लेंगे। जिसका वर्णन इसी अध्याय के श्लोक -२१ में है जिसमें गोपगण भगवान-विष्णु से कहते हैं कि -
एवमेष वरो देव यो दत्तो भविता हि मे।
अवतारः कुलेऽस्माकंं कर्तव्योधर्मसाधनः।। २१।
अनुवाद - हे देव ! यहीं हो। आपने जो वर दिया, वैसा ही हो। आप हमारे कुल में धर्मसाधन के कर्तव्य के लिए अवश्य अवतार लेंगे।२१।
तब विष्णु ने भी गोपों को ऐसा ही वचन दिया। तत्पश्चात सभी गोप प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने घर चले गए।
उसी समय अहीर कन्या गायत्री ने ब्रह्माजी की प्रथम पत्नी सावित्री जो विष्णु को यह शाप दे चुकी थी कि- हे विष्णु ! जब तुम यदुवंश में जन्म लोगे, तो तुम कृष्ण के नाम से जाने जाओगे। उस समय तुम पशुओं (गायों) के सेवक बन कर लम्बे समय तक इधर-उधर भटकते रहोगे। उस शाप को गायत्री ने वरदान में बदलते हुए विष्णु से जो कहा उसका वर्णन- स्कन्द पुराण खण्ड- (६) के नागर खण्ड के अध्याय- १९३ के श्लोक -(१४) और (१५) में मिलता है। जिसमें गायत्री विष्णु से कहतीं हैं कि -
तेनाकृत्येऽपि रक्तास्ते गोपा यास्यन्ति श्लाघ्यताम्॥
सर्वेषामेव लोकानां देवानां च विशेषतः ॥१४॥
यत्रयत्र च वत्स्यंन्ति मद्वं शप्रभवानराः॥
तत्रतत्र श्रियो वासो वनेऽपि प्रभविष्यति॥१५॥
अनुवाद -(१४-१५)
• आभीर कन्या गायत्री विष्णु से कहती है- हे विष्णो ! (श्रीकृष्ण) तुम्हारे रक्त सम्बन्धी (blood relative) सभी गोप बिना कुछ किये ही तुम्हारे द्वारा प्रसिद्धि को प्राप्त हो जाऐंगे। और इनकी प्रशंसा विशेषतः देवताओं सहित सभी लोकों में होगी।
• पुन: गायत्री विष्णु से कहती हैं- मेरे गोप वंश के लोग जहाँ भी रहेंगे वहाँ श्री (सौभाग्य और समृद्धि) विद्यमान रहेगी, चाहे वह स्थान जंगल ही क्यों न हो।१५।
✳️ ज्ञात हो उपर्युक्त श्लोकों में गायत्री द्वारा जिस विष्णु को सम्बोधित किया जा रहा है वह छूद्र (छोटे) विष्णु हैं जो परमेश्वर श्रीकृष्ण के एक अंश से भूतल पर श्रीकृष्ण का ही प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ऐसे ही अनन्त ब्रह्माण्ड में अनन्त छूद्र (छोटे) विष्णु हैं जो परमेश्वर श्रीकृष्ण के एक-एक अंश से प्रतिनिधित्व किया करते हैं। अतः गायत्री द्वारा भूलोक पर विष्णु नाम का वास्तविक सम्बोधन परमेश्वर श्रीकृष्ण के लिए ही है।
अतः उपर्युक्त सभी महत्वपूर्ण श्लोकों के आधार पर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि- गोपों में श्रीकृष्ण का रक्त सम्बन्ध है और धर्म स्थापना हेतु गोपेश्वर श्रीकृष्ण का जन्म या अवतरण, वैष्णव वर्ण के अन्तर्गत गोप जाति (अहीर जाति) के यादव वंश में ही होता है जहाँ उनके रक्त सम्बन्धी हैं। अन्य किसी जाति या वंश में नहीं।
यही कारण है कि भगवान श्रीकृष्ण, चाहे गोलोक में हों या भूलोक में हों, वे सदैव गोपवेष में गोपों के ही साथ ही रहते हैं, और सभी लीलाएँ उन्हीं के साथ ही करते हैं। इसीलिए गोपों को श्रीकृष्ण का सहचर (सहगामी) अर्थात् साथ-साथ चलने वाला भी कहा जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण को सदैव गोपवेष में गोपों के साथ रहने की पुष्टि - हरिवंश पुराण के विष्णुपर्व के अध्याय -(३) के श्लोक -(३४) से होती है। जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अपने जन्म से पूर्व योग माया से कहते हैं कि-
मोहहित्वा च तं कंसमेका त्वं भोक्ष्यसे जगत्।
अहमप्यात्मनो वृत्तिं विधास्ये गोषु गोपवतः।। ३४।
अनुवाद - तुम उस कंस को मोह में डालकर अकेली ही सम्पूर्ण जगत का उपभोग करोगी। और मैं भी व्रज में गौओं के बीच में रहकर गोपों के समान ही अपना व्यवहार बनाऊँगा।
ये तो रही बात भूलोक की। किन्तु गोपेश्वर श्रीकृष्ण गोलोक में भी अपने गोपों के साथ सदैव गोपवेष में ही रहते हैं। इस बात की पुष्टि -ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्म-खण्ड के अध्याय
(२)- के श्लोक -(२१) से होती है। जिसमें लिखा गया है कि -
स्वेच्छामयं सर्वबीजं सर्वाधारं परात्परम्।
किशोरवयसं शश्वद्गोपवेषविधायकम्।।२१।
अनुवाद- वे ही प्रभु स्वेच्छामयी सभी के मूल- (आदि-कारण) सर्वाधार तथा परात्पर- परमात्मा हैं। उनकी नित्य किशोरावस्था रहती है और वे प्रभु गायों के उस लोक (गोलोक) में सदा गोप (आभीर) भेष में रहते हैं।२१।
अतः इस उपर्युक्त श्लोक से सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण चाहे गोलोक में हों या भूलोक, दोनों स्थानों पर वे सदैव गोपवेष में गोपों के साथ ही रहते हैं।
यही कारण है कि भगवान श्रीकृष्ण के एक हजार नामों में एक नाम "गोपवेशः" और गोपकृत भी है जिसका क्रमशः अर्थ है- सर्वदा गोप (अहीर) वेश में रहने वाला तथा नूतन गोपों का निर्माण करने वाला
इसकी पुष्टि- गर्गसंहिता के अश्वमेधखण्ड के अध्याय -(५९) के श्लोक- (३०) से होती है।
बकारिः सुरैः पूजितोऽघारिनामा ।
वने वत्सकृद्गोपकृद्गोपवेषः*
कदा ब्रह्मणा संस्तुतः पद्मनाभः ॥ ३०
गोपकृत - अर्थात् = नूतन गोपों का निर्माण करने वाला।
गोपवेशः - अर्थात् = सर्वदा गोप (अहीर) वेश में रहने वाला
इसी तरह से हरिवंश पुराण के भविष्य पर्व के अध्याय- (१००) के श्लोक - (२६) और (४१) में भगवान श्रीकृष्ण को गोप और यादव दोनों होने की पुष्टि पौण्ड्रक-श्रीकृष्ण के समय होती है। उस युद्ध के मध्य श्रीकृष्ण से पौण्ड्रक कहता है कि-
स ततः पौण्ड्रको राजा वासुदेवमुवाच ह।
भो भो यादव गोपाल इदानिं क्व गतो भवात।। २६।
गोपोऽहं सर्वदा राजन् प्राणिनां प्राणदः सदा।
गोप्ता सर्वेषु लोकेषु शास्ता दुष्टस्य सर्वदा।। ४१।
अनुवाद - ओ यादव ! ओ गोपाल ! इस समय तुम कहाँ चले गए थे ? आजकल मैं ही वासुदेव नाम से विख्यात हूंँ।२६।
तब भगवान श्रीकृष्ण ने पौण्ड्रक से कहा-
• राजन मैं सर्वदा गोप हूँ, प्राणियों का सदा प्राण दान करने वाला हूँ, तथा सम्पूर्ण लोकों का रक्षक तथा सर्वदा दुष्टों का शासक हूँ। ४१
इसी प्रकार से एक बार श्रीकृष्ण की तरह-तरह की अद्भुत लीलाओं को देखकर गोपों को संशय होने लगा कि कृष्ण कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। ये या तो कोई देव हैं या कोई ईश्वरीय शक्ति। और इस रहस्य को श्रीकृष्ण अपने गोपों से गुप्त रखना चाहते थे, ताकि मेरी बाल-लीला बाधित न हो। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण उनके संशय को दूर करने के लिए हरिवंश पुराण के विष्णुपर्व के अध्याय- (२०) के श्लोक- (११) में अपने सजातीय गोपों से कहते हैं कि-
मन्यते मां यथा सर्वे भवन्तो भीमविक्रमम्।
तथाहं नावमन्तव्यः स्वजातीयोऽस्मि बान्धवः।।११।
अनुवाद - आप सब लोग मुझे जैसा भयानक पराक्रमी समझ रहे हैं, वैसा मानकर मेरा अनादर न करें। मैं तो आप लोगों का सजातीय (गोप जाति का) भाई बन्धु ही हूँ।
इस प्रकार से यह अध्याय (एक) का भाग (ख) इस जानकारी के साथ समाप्त हुआ कि- गोपेश्वर श्रीकृष्ण गोलोक और भू-लोक दोनों स्थानों पर सदैव गोपवेष में अपने गोपकुल के गोपों के साथ ही रहते हैं। अब इसके अगले भाग (ग) में श्रीकृष्ण के ऐतिहासिक परिचय के बारे में बताया गया है। उसको भी इस अध्याय के साथ जोड़कर पढे़ें ।
(ग)- ऐतिहासिक परिचय-
यह भाग उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो भगवान श्रीकृष्ण को अनैतिहासिक मानकर श्रीकृष्ण को एक काल्पनिक (व्यक्ति) कैरेक्टर मानते हैं। जबकि उन लोगों को यह पता नहीं है कि श्रीकृष्ण की सत्ता काल्पनिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक है। इसी बात को अच्छी तरह से समझने के लिए इसे चार प्रमुख भागों में बाँटा गया है-
(क) पुरातात्विक परिचय (ख)- अभिलेखीय परिचय।
(ग) खगोलीय साक्ष्य (घ) साहित्यिक साक्ष्य
(क) पुरातात्विक परिचय-
भगवान श्रीकृष्ण की ऐतिहासिकता एक ऐसा विषय है जहाँ आध्यात्मिक विश्वास और वैज्ञानिक शोध का मिलन होता है। आधुनिक इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के अनुसार, अब श्रीकृष्ण को केवल पौराणिक ही नहीं अपितु ऐतिहासिक भी मनना पडे़ेगा। क्योंकि कई ठोस साक्ष्य उनकी ऐतिहासिकता की ओर संकेत करते हैं। जैसे-
सिन्धु सभ्यता की मोहन-जोदारो की खुदाई में भी कृष्ण चरित्र से सम्बम्धित "ओखल बन्धन" और यमलार्जुन वृक्षों के दृश्यों से अंकित पत्थर मिले हैं।
"मोहनजो-दारो" सिंधी शब्द है। जिसका अर्थ है 'मृतकों का टीला' और कभी-कभी इसका अर्थ 'मोहन का टीला' भी होता है। और यह मोहन कौन था ? सभी जानते हैं।
पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त में एक पुरातात्विक स्थल है मोहन -जोदारो। लगभग 2500 ईसा पूर्व निर्मित, यह प्राचीन काल की सबसे बड़ी बस्ती थी सिन्धु घाटी सभ्यता, और जो दुनिया के शुरुआती प्रमुख शहरों में से एक, प्राचीन मिस्र, मेसोपोटामिया, यूनान की मिनोअन क्रेते और नॉर्टे चिको की सभ्यताओं के समकालीन है। कम से कम 40,000 लोगों की अनुमानित आबादी के साथ, मोहनजो-दारो लगभग (1700) ईसा पूर्व तक समृद्ध रहा।
सिन्धु घाटी की सभ्यता सम्भवतः ईसा पूर्व नवम सदी तक जीवन्त रही होगी। कृष्ण, शिव, दुर्गा, जैसे पौराणिक पात्रों की प्रतिमाएँ भी यहाँ भी मिली हैं। इसके साथ ही मोहनजो-दारो, लरकाना जिले, सिन्ध (अब पाकिस्तान में) के पुरातात्विक स्थल है जहाँ से खोदाई में एक साबुन की टेबलेट मिली है। जिसे सोपस्टोन या सोपरॉक के नाम से भी जाना जाता है। यह टेबलेट भगवान कृष्ण के जीवन की एक महत्वपूर्ण कहानी के साथ अद्भुत समानता को दर्शाता है।जिसमें एक बालक को दो पेड़ों को उखाड़ते हुए दिखाया गया है। इन दोनों पेड़ों से दो मानव आकृतियाँ निकल रही हैं और कुछ पुरातत्वविदों इसे भगवान कृष्ण से जुड़ी तारीखें तय करने के लिए एक दिलचस्प पुरातात्विक खोज करार दे रहे हैं। यह छवि यमलार्जुन प्रकरण- (भागवत और हरिवंश पुराण दोनों में उल्लिखित) से मिलती जुलती है। जिसमें मौजूद युवा लड़के के भगवान कृष्ण होने की बहुत संभावना है, और पेड़ों से निकलने वाले दो मानव दो शापित गन्धर्व हैं, जिन्हें नलकूबर और मणिग्रीव के रूप में पहचाना जाता है।
(स्रोत - मैके की रिपोर्ट, भाग 1, पृष्ठ 344-45, भाग 2, प्लेट 90, वस्तु संख्या। डीके 10237.)
दिलचस्प बात यह है कि मोहनजो-दारो में खुदाई करने वाले डॉ. ईजेएच मैके" ने भी इस छवि की तुलना भारतीय पुराणों में वर्णित "यमलार्जुन प्रकरण से की है। इस विषय के एक अन्य विशेषज्ञ प्रो. वीएस अग्रवाल ने भी इस पहचान को स्वीकार किया है। इसलिए, यह काफी सम्भव है कि सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग भगवान कृष्ण की कहानियों से अवगत थे। नि:सन्देह, इस तरह का एक और पृथक साक्ष्य तथ्यों को स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता है। हालाँकि, सबूतों को भी नज़रअंदाज़ अथवा उपेक्षित नहीं किया जा सकता। इस सन्दर्भ में और अधिक अध्ययन किये जाने की आवश्यकता है।
विशेष- हड़प्पा सभ्यता की तिथि कार्बन डेटिंग पद्धति द्वारा 2500 ई०पूर्व से (1750) ई० पूर्व तक निर्धारित की जती है।
1. द्वारका नगरी की खोज (समुद्र के भीतर)
वर्तमान में श्रीकृष्ण की ऐतिहासिकता सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक प्रमाण गुजरात के तट पर बेट द्वारका में मिला है। इसके लिए 1980 के दशक में डॉ. एस.आर. राव (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) के नेतृत्व में समुद्र के भीतर खुदाई की गई जिसमें समुद्र के भीतर एक विशाल जलमग्न शहर के अवशेष मिले हैं। उन अवशेषों में शहर के किले की दीवारों, स्तम्भों और पत्थर के लंगर तथा मोहरें प्राप्त हुई हैं, जिनका काल 1500-1700 ईसा पूर्व के आसपास का बताया गया बताया गया है जो महाभारत काल से सम्बन्धित है।
फिर भी कुछ लोग कह सकते हैं कि डॉ. एस.आर. राव जिन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधीन रहकर समुद्र के भीतर जिस द्वारका नगरी की खोज किये हैं उसकी कितनी प्रमाणिकता है? तो इस तरह का प्रश्न उठना स्वाभाविक भी है और इसका समाधान करना आवश्यक भी है।
तो इस सम्बन्ध में बता दें कि- डॉ. एस.आर. राव (शिकारीपुरा रंगनाथ राव) को भारतीय पुरातत्व के क्षेत्र में एक अत्यन्त विश्वसनीय और प्रतिष्ठित नाम है। उनके ऐतिहासिक खोजें पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं है। क्योंकि उनके ऐतिहासिक शोधों की प्रमाणिकता को निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है-
(1) पहला यह कि- शिकारीपुरा रंगनाथ राव जी समुद्री पुरातत्व के जनक माने जाते हैं। क्योंकि भारत में 'समुद्री पुरातत्व' विषय को शुरू करने का श्रेय उन्हीं को जाता है। उन्होंने गोवा स्थित राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (NIO) में समुद्री पुरातत्व अनुसन्धान केंद्र की स्थापना की, जो आज एक विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त संस्थान है।
(2)- दूसरा यह कि उन्होंने ही सिन्धु घाटी सभ्यता के प्रसिद्ध बन्दरगाह शहर 'लोथल' की खोज और खुदाई का नेतृत्व किया था, जो विश्व इतिहास के सबसे प्राचीन बन्दरगाहों में से एक है। जो आज विश्व इतिहास के पन्नों में दर्ज है। हालांकि उनके निष्कर्षों (जैसे सिन्धु लिपि को पढ़ना) पर कुछ विद्वानों के बीच अकादमिक बहस रही है, लेकिन एक पुरातत्वविद् के रूप में उनके द्वारा खोजे गए भौतिक अवशेषों की वैज्ञानिक प्रमाणिकता को पूरी दुनिया स्वीकार करती है।
(3)- तीसरा यह कि- उनकी खोजों के लिए उन्हें कई वैश्विक स्तर पर पुरस्कार भी मिले हैं। जिनमें 'वर्ल्ड शिप ट्रस्ट अवार्ड' (इण्डिविजुअल अचीवमेंट इन मैरीटाइम आर्कियोलॉजी) और जवाहरलाल नेहरू फैलोशिप शामिल हैं।
(4) शिकारीपुरा रंगनाथ राव भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्य चुके हैं और सेवानिवृत्ति के बाद भी उनकी विशेषज्ञता के कारण भारत सरकार ने उन्हें पुनः महत्वपूर्ण परियोजनाओं का नेतृत्व करने के लिए आमन्त्रित किया।
अब इतने बड़े इतिहासकार की ऐतिहासिक शोधों पर वहीं लोग अविश्वास करतें हैं जो किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं या फिर मानसिक रूप से विक्षिप्त होते हैं।
(ख) अभिलेखीय परिचय-
भगवान श्रीकृष्ण की ऐतिहासिकता की पुष्टि पुरालेख और शिलालेखों से भी होती हैं। उनके कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं-
(1)- हेलियोडोरस का स्तम्भ-
मध्य प्रदेश के विदिशा में (113 या 110) ईसा पूर्व का एक स्तम्भ है। इसे एक यूनानी राजदूत हेलियोडोरस ने बनवाया था, जिसने खुद को 'भागवत' कहा और 'देवदेवस वासुदेव' (देवताओं के देव वासुदेव) की पूजा का उल्लेख किया। यह सिद्ध करता है कि उस समय तक कृष्ण की पूजा एक स्थापित ऐतिहासिक तथ्य थी।
हालांकि यह वैष्णव धर्म से अधिक जुड़ा है, लेकिन इसकी प्राचीनता (110 ईसा पूर्व) उस समय श्रीकृष्ण की लोकप्रियता को दर्शाती है जिसका विस्तार जैन साहित्य में भी उसी कालखण्ड में हुआ था।
एलोरा की गुफाओं में श्रीकृष्ण उल्लेख-
दशावतार गुफा (गुफा संख्या 15)
यह गुफा भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों को समर्पित है जैसे -
गोवर्धनधारी कृष्ण-
यहाँ श्रीकृष्ण को गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाए हुए दिखाया गया है, जो इन्द्र के प्रकोप से गोकुलवासियों की रक्षा का प्रतीक है।
अन्य अवतार-
इसी गुफा में विष्णु के शेषशायी (शेषनाग पर लेटे हुए), वराह (सूअर अवतार), नृसिंह (आधा शेर, आधा मनुष्य) और वामन अवतारों की विशाल मूर्तियाँ भी हैं।
कृष्ण के बचपन के दृश्य-
गुफा संख्या 15 में श्रीकृष्ण के बचपन (बाल-लीलाओं) से जुड़े 12 अलग-अलग प्रसंगों का सुन्दर नक्काशीदार चित्रण मिलता है।
जैन शिलालेखों में श्रीकृष्ण (वासुदेव) का उल्लेख-
श्रीकृष्ण का नाम केवल ग्रन्थों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कुछ प्राचीन शिलालेखों में भी उनके अस्तित्व और जैन धर्म से उनके सम्बन्ध के प्रमाण मिलते हैं। जैसे-
हाथीबाड़ा-घोसुण्डी शिलालेख (राजस्थान)-
दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के इन शिलालेखों को भारत के सबसे प्राचीन संस्कृत शिलालेखों में गिना जाता है। कुछ इतिहासकारों का तर्क है कि ये शिलालेख जैन धर्म से सम्बन्धित हो सकते हैं क्योंकि इनमें 'जिना' का उल्लेख मिलता है। इनमें संकर्षण (बलराम) और वासुदेव (कृष्ण) के लिए पूजा गृह (नारायण वाटिका) बनाने का वर्णन है।
मोरा पत्थर शिलालेख (मथुरा)-
यह शिलालेख मथुरा के पास मिला है। यह पहली शताब्दी ईसवी का शिलालेख है जो 'पाँच वृष्णि नायकों' का उल्लेख करता है, जिनमें श्रीकृष्ण (वासुदेव), बलराम (संकर्षण), प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और शाम्ब के नाम शामिल हैं। जैन धर्म में इन सभी को शलाका पुरुष या मोक्षगामी महापुरुष माना गया है।
कंकाली टीला (मथुरा)-
मथुरा के इस प्रसिद्ध जैन स्थल से प्राप्त शिलालेखों और मूर्तियों में यदुवंशी नायक कृष्ण और बलराम के चित्र तीर्थंकरों (विशेषकर भगवान नेमिनाथ) के साथ अंकित मिलते हैं, जो उनके ऐतिहासिक समकालीन होने की पुष्टि करते हैं।
(ग) खगोलीय साक्ष्य-
डॉ. एस. कल्याणरमन और अन्य शोधकर्ताओं ने 'प्लैनेटेरियम सॉफ्टवेयर' के माध्यम से महाभारत में वर्णित ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति का विश्लेषण किया है। उनके अनुसार, महाभारत युद्ध की खगोलीय गणना 3137 ईसा पूर्व के आसपास बैठती है, जो कृष्ण के समय की पुष्टि करती है। यह गणना कैसे की गई इसको नीचे बताया गया है।
महाभारत में महर्षि वेदव्यास ने युद्ध के समय ग्रहों और नक्षत्रों की जो विशिष्ट स्थितियाँ बताई हैं, वे किसी 'फिंगरप्रिंट' की तरह अद्वितीय हैं। सॉफ्टवेयर में मुख्य रूप से इन तीन तथ्यों का उपयोग किया गया है-
(1) अमावस्या और ग्रहण का संयोग-
महाभारत ग्रंथ में उल्लेख है कि युद्ध से ठीक पहले एक ही महीने में दो ग्रहण (सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण) लगे थे और अमावस्या के दिन युद्ध की तैयारी शुरू हुई थी।
(2) ग्रहों की वक्री चाल-
व्यास जी ने मंगल और शनि जैसे ग्रहों के नक्षत्रों के सापेक्ष पीछे की ओर चलने (वक्री होने) का सटीक वर्णन किया है। उदाहरण के लिए, 'मघा' नक्षत्र में मंगल और 'रोहिणी' में शनि की स्थिति।
(3) भीष्म पितामह का देह त्याग-
भीष्म पितामह ने सूर्य के 'उत्तरायण' होने की प्रतीक्षा की थी। सॉफ्टवेयर के माध्यम से उस विशेष दिन (शीतकालीन संक्रांति की गणना की गई जब चन्द्रमा की स्थिति 'अष्टमी' थी।
खगोल वेत्ता- पुष्कर भटनागर और सरोज बाला ने अपने शोधों में इन्ही इनपुट्स को Voyager और Stellarium जैसे सॉफ्टवेयर में डालकर यह निष्कर्ष निकाला कि ये स्थितियाँ 3137 ईसा पूर्व या 3067 ईसा पूर्व (अलग-अलग मतों के अनुसार) में सटीक बैठती हैं।
जिस खगोलीय गणनाओं (Archaeo-astronomy) के आधार पर महाभारत युद्ध का समय निकाला गया है, उसी सिद्धान्तों से पुष्कर भटनागर जैसे विद्वानों ने श्रीकृष्ण की जन्म तिथि को भी निर्धारित किया है। उन्होंने गणना करके बताया है कि- श्रीकृष्ण के जन्म के समय (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र) की थी। उसके अनुसार सबसे स्वीकृत तिथि निम्नलिखित है-
श्रीकृष्ण की जन्म तिथि-
🔆 तारीख: 27 जुलाई, 3112 ईसा पूर्व
🔆 समय: मध्यरात्रि (12:00 AM)
🔆 स्थान: मथुरा (77° 41' E, 27° 28' N)
सॉफ्टवेयर गणना के मुख्य आधार-
सॉफ्टवेयर में महाभारत और पुराणों में वर्णित उस समय की ग्रह स्थितियों को फीड किया गया था वह निम्नलिखित है-
(1) नक्षत्र-
चन्द्रमा 'रोहिणी' नक्षत्र में था।
(2) तिथि-
भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की 'अष्टमी' तिथि थी
(3) ग्रहों की स्थिति-
उस समय चन्द्रमा, सूर्य, मंगल, बुध, गुरु और शुक्र अपने उच्च के या अनुकूल भावों में थे, जैसा कि प्राचीन ग्रन्थो में 'असाधारण महापुरुष' के जन्म के लिए वर्णित है।
यदि श्रीकृष्ण का जन्म 3112 ईसा पूर्व में हुआ, तो उनका देह त्याग (निर्वाण) 3012-3102 ईसा पूर्व के आसपास माना जाता है, जिससे कलियुग के आरम्भ की गणना भी जुड़ी हुई है।
श्रीकृष्ण के जीवन काल की गणना-
पौराणिक साक्ष्यों के आधार पर यह माना जाता है कि श्रीकृष्ण लगभग (125) वर्ष तक पृथ्वी पर रहे। इस बात की पुष्टि -श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कन्ध के अध्याय-(६) के श्लोक संख्या -(२३) और (२५) में ब्रह्मा जी श्री कृष्ण से कहते हैं कि-
अवततीर्य यदोर्वंशे बिभ्रद् रुपमनुत्तमम्।
कर्माण्युद्दामवृत्तानि हिताय जगतोऽकृथाः।। २३।
यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरूषोत्तम।
शरच्छतं व्यतीताय पञ्चविञ्शाधिकं प्रभो।।२५।
अनुवाद - आपने यह सर्वोत्तम रूप धारण करके यदुवंश में अवतार लिया और जगत् के हित के लिए उदारता और पराक्रम से भरी अनेक लीलाएँ कीं ।२३।
• पुरुषोत्तम सर्वशक्तिमान प्रभु ! आपको यदुवंश में अवतार ग्रहण किये "एक सौ पचीस वर्ष" बीत गए हैं।२५।
यदि पौराणिक और खगोलीय गणनाओं के अनुसार देखा जाए तो श्रीकृष्ण के देह त्याग और कलियुग के आरम्भ के बीच एक गहरा सम्बन्ध है, जिसे 'जीरो पॉइंट' माना जाता है। इसके लिए नीचे देखें-
निर्वाण और कलियुग का प्रारम्भ-
विष्णु पुराण और भागवत पुराण के अनुसार, जिस क्षण श्रीकृष्ण ने अपनी इहलीला समाप्त कर स्वधाम गमन किया, उसी क्षण से पृथ्वी पर कलियुग का प्रभाव शुरू हो गया। अब यह कितना सत्य है इसको भी जानना आवश्यक है।
सटीक समय (3102 ईसा पूर्व)- महान भारतीय गणितज्ञ आर्यभट्ट ने अपने ग्रन्थ 'आर्यभटीय' में उल्लेख किया है कि जब वे 23 वर्ष के थे, तब कलियुग के 3600 वर्ष बीत चुके थे। इस गणना के आधार पर कलियुग का प्रारम्भ 18 फरवरी, 3102 ईसा पूर्व (मध्यरात्रि) को हुआ माना जाता है। इसकी गणना कुछ इस से प्रकार की गई-
(1) खगोलीय साक्ष्यों के अनुसार, इस विशेष तिथि पर सौरमण्डल के सात प्रमुख ग्रह (सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि) एक ही राशि (मेष) और एक ही बिन्दु पर संरेखित थे। ऐसी दुर्लभ घटना हजारों वर्षों में एक बार होती है।
(2) द्वारका का डूबना- महाभारत के 'मौसल पर्व' के अनुसार, कृष्ण के देह त्याग के ठीक 7 दिन बाद विशाल समुद्री लहरों ने द्वारका नगरी को डुबो दिया था। डॉ. एस.आर. राव को समुद्र के नीचे जो अवशेष मिले, वे इस जलप्रलय की पुष्टि करते हैं। इस बात को हम पहले ही बता चुका हूँ।
विशेष- श्रीकृष्ण का भू-लोक से अपने धाम गोलोक को जाना एक सामान्य घटना नहीं थी, बल्कि भारतीय काल-गणना के अनुसार एक युग परिवर्तन की घटना थी जो आज भी वैज्ञानिक व ऐतिहासिक दृष्टिकोण से ध्रुव सत्य है।
श्रीकृष्ण के जन्म की यथार्थ तिथि निर्णय क्या है ?
सनातन धर्म में श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का पूर्ण अवतार माना जाता है। इन पूर्ण विष्णु को ही स्वराट विष्णु कहते हैं। विष्णु के तीन भेदों में यह सर्वोच्च स्वरूप है। भगवान विष्णु श्रीकृष्ण के रूप में द्वापर युग में अवतार लेते हैं। और धर्म की संस्थापना के लिए दुष्टों का संहार करते हैं। आम तौर पर श्रीकृष्ण के अवतरण या जन्म की तिथि भाद्रपद के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि की अर्द्ध-रात्रि को माना जाता है । लेकिन इसको लेकर भी पुराणों में मतभेद है। जिस पर एक विश्लेषण अपेक्षित है।
क्या श्रीकृष्ण का जन्म भादो के महीने में हुआ था ?
श्रीकृष्ण के चरित्र को लेकर सबसे ज्यादा प्रामाणिक ग्रन्थों में महाभारत, देवीभागवत महापुराण और हरिवंश पुराण को माना जाता है । हरिवंश पुराण को महाभारत का अवशिष्ट ( बचा हुआ) भाग भी माना जाता है जिसमें भगवान विष्णु के सभी अवतारों विशेष कर भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और कार्यों का विस्तार से वर्णन है।
महाभारत में श्रीकृष्ण के जन्म की तिथि और उनके बाल्यकाल का कोई विवरण नहीं मिलता है श्रीमद्भावगत महापुराण के दशम स्कन्ध में अवश्य भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का विवरण मिलता है लेकिन आश्चर्यजनक रूप से भगवान श्रीकृष्ण का जन्म किस महीने में हुआ था ,इसको लेकर श्रीमद्भभावगत महापुराण भी मौन है।
हरिवंश पुराण में भी श्रीकृष्ण के जन्म की कथा मिलती है लेकिन यहाँ भी ये नहीं बताया गया है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म किस महीने में हुआ था श्रीमद्भावत महापुराण में केवल ये बताया गया है कि श्रीकृष्ण का जन्म रात्रि के पहर में शुभ नक्षत्र था और ग्रह और तारे सभी शुभता के साथ स्थित थे। हरिवंश पुराण में भी यही कहा गया है कि श्रीकृष्ण का जन्म एक शुभ रात्रि में एक विशेष मूहूर्त में हुआ था । लेकिन इन दोनों ही ग्रन्थो में श्रीकृष्ण के जन्म का महीना नहीं बताया गया है ।
क्या श्रीकृष्ण का जन्म सावन के महीने में हुआ था ?
यद्यपि महाभारत श्रीकृष्ण के जन्म की घटना का कोई विवरण नही देता , श्रीमद्भावतम और महाभारत का खिल (परिशिष्ट) भाग हरिवंश पुराण में भी श्रीकृष्ण के जन्म के महीने का कोई श्लोक या विवरण नहीं मिलता , फिर भी आज के भारतीय भादों के महीने में ही श्रीकृष्ण का जन्म मनाते हैं।
लेकिन अगर कुछ और ग्रन्थो के श्लोकों को पढ़ा जाए तो उनमें ये कहा गया है कि सावन के महीने में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था।
श्रावणे मासि पक्षे च कृष्णेऽष्टम्यां प्रजापतेः।
नक्षत्रे वसुदेवस्य देवक्यां भगवान् हरिः१६/६५॥
सर्वलोकहितार्थाय भूमेर्भारावतारणम्।
कर्तुमाविरभूद्भूमौ मध्यरात्रे महामते।।१६/६६॥
(विश्वामित्रसंहिता, अध्याय – १६, श्लोक – ६५-६६)
पुराणों में श्रीकृष्ण के जन्म को लेकर मतभेद-
विश्वामित्र संहिता का ये श्लोक ये कहता है कि श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जब प्रजापति (ब्रह्मा) का नक्षत्र था, तब आधी रात को सभी लोकों का कल्याण करने के लिए और पृथ्वी का भार कम करने के लिए वसुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से भगवान का अवतार हुआ ।६५-६६।
द्वापरे समनुप्राप्ते विरोधिवत्सरे शिवे।
श्रावणे चाष्टमी शुक्ला बुधरोहिणीसंयुता॥६३।
वज्रयोगे मध्यरात्रौ पूर्णः कृष्णो हरिः स्वयम्।
कंसस्य च वधार्थाय अर्जुनस्य हिताय च॥६४
(शक्तिसंगम महातन्त्र राज, छिन्नमस्ताखण्ड, पटल – 06, श्लोक – 63-64)
शक्ति संगम महातंत्र का ये श्लोक कहता है कि द्वापरयुग के आने पर विरोधी नामक सम्वत्सर में जब सावन के महीने के शुक्लपक्ष की अष्टमी की तिथि थी और वो दिन बुधवार का था और उस वक्त आधी रात को रोहिणी नक्षत्र का शुभ समय था उस वक्त वज्रयोग जैसे अति शुभ योग में आधी रात को ही स्वयं भगवान श्रीहरि विष्णु अवतार लेकर कंस का वध करने और अर्जुन का हित करने के लिए श्रीकृष्ण रुप में पधारे।
स्कन्द पुराण जो सभी पुराणों में सबसे बड़ा माना जाता है , उसमें में सावन के महीने में ही भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बारे में श्लोक मिलते हैं
जयं पुण्यञ्च कुरुते जयन्तीमिति तां विदुः।
रोहिणीसहिता कृष्णमासे च श्रावणेऽष्टमी॥
अर्द्धरात्रादधश्चोर्द्ध्वं कलयापि यदा भवेत्।
जयन्ती नाम सा प्रोक्ता सर्वपापप्रणाशिनी॥
स्कन्द पुराण के इस श्लोक के अनुसार सावन के महीने की अष्टमी तिथि थी, रात का वक्त था और आकाश में रोहिणी नक्षत्र विराजमान था, उस पुण्य काल में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था।
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म किस तिथि को हुआ था ?
श्रीमद्भागवत महापुराण और हरिवंश पुराण भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की तिथि के बारे में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहते । श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से संबंधित दो श्लोक महत्वपूर्ण हैं –
अथ सर्वगुणोपेतः कालः परमशोभनः।
यर्हि एव अजनजन्मर्क्षं शान्तर्क्ष-ग्रहतारकम।।
(श्रीमद्भागवत पुराण, स्कंध 10, अध्याय 3, श्लोक 1)
इस श्लोक में शुकदेव जी राजा परीक्षित को कहते हैं कि – “अब समस्त शुभ गुणों से युक्त शुभ समय आया जब उसका जन्म होने वाला था जो अजन्मा ( श्रीकृष्ण) है । इस काल में सभी नक्षत्र, ग्रह और तारे शान्त और सौम्य हो रहे थे।“
इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण का जब जन्म होता है तो इस समय के बारे में श्रीमद्भागवत महापुराण का ये श्लोक कुछ ऐसा कहता है –
(निशीथे तम उद्भूते जायमाने जनार्दन।) देवक्यां देवरूपिण्यां विष्णु: सर्वगुहाशय: आविरासीद् यथा प्राच्यां दिशि इन्दुरिव पुष्कल:।। ८।
(श्रीमद्भागवत पुराण, स्कन्ध 10, अध्याय 3, श्लोक 8) श्रीमद्भागवत महापुराण के दसवें स्कन्ध के अध्याय 3 के श्लोक 8 में ये कहा गया है कि – “ उस रात में उन जनार्दन ( विष्णु) के जन्म का समय आया। चारों तरफ अन्धकार का साम्राज्य था। उसी समय सबके ह्दय में विराजमान विष्णु देवरुपिणी देवकी के गर्भ से प्रगट हुए , जैसे पूर्व दिशा में सोलहों कलाओं से पूर्ण चन्द्रमा का उदय हुआ हो।“
स्पष्ट है कि श्रीमद्भागवत महापुराण में श्रीकृष्ण के न तो जन्म की तिथि बताई गई है और न ही उनके जन्म का नक्षत्र , लेकिन श्री हरिवंश पुराण श्रीकृष्ण के जन्म का नक्षत्र. मुहूर्त दोनों के बारे में बताता है –
अभिजिन्नाम नक्षत्रं जयन्ती नाम शर्वरी।
मुहूर्तो विजयो नाम यत्र जातो जनार्दनः॥
(हरिवंशपुराण, विष्णुपर्व, अध्याय – 04 – श्लोक – 17)
हरिवंश पुराण के इस श्लोक के अनुसार जब भगवान् जनार्दन (विष्णु) का अवतार हो रहा था, उस नक्षत्र का नाम अभिजित्, रात्रि का नाम जयन्ती और मुहूर्त का नाम विजय था। लेकिन आश्चर्य की बात यहां भी यही है कि श्रीकृष्ण के जन्म की तिथि नहीं बताई गई है और न ही महीना बताया गया है ।
यद्यपि हमनें इस लेख में विश्वामित्र संहिता और स्कन्द पुराण और कुछ ग्रन्थों के अनुसार ये दिखाया है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म सावन के महीने में अष्टमी की तिथि को ही हुआ था। ये भी स्पष्ट नहीं है कि अष्टमी की तिथि शुक्लपक्ष की है या फिर कृष्ण पक्ष की।
ये हो सकता है कि महीने और पक्षो में कुछ हजार सालो में परिवर्तन होता रहता हो और इसलिए ये भ्रम आज भी बना हुआ है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म आखिरकार किसी तिथि और किस महीने हुआ था। इस पर शोध सतत जारी है ।
ब्रह्मपुराण -
“अथ भाद्रपदे मासि कृष्णाष्टम्यां कलौ युगे । अष्टाविंशतिमे जातः कृष्णोऽसौ देवकीसुतः” । परं कस्मिन्नेव कलौ प्रादुर्बभूव भगवानिति जिज्ञासायां वैवस्वतमन्वन्तरीयाष्टाविंशतिमे युगे इत्युक्त्या वर्त्तमानकलेः प्रथम एव निर्णीयते । तथा च उच्चस्थाः शशिभौमचान्द्रिशनय इति । खमाणिक्यनामज्योतिर्ग्रन्थोक्तेः कलियुगस्य ।६४७।
वर्षेषु गतेषु एतत्समयस्य सम्भवः ततः पूर्ब्बं कलौ तादृशसमयासम्भवात् । किञ्च राजतरङ्गिण्याम् । १ । ५१
📚: वृषभानुपुराद्याता क्रीडार्थं राधिका स्वयम्।।पारावारेति विख्यातं स्थानं तस्मात् समागता:।।५४।।
कृष्ण यामल तन्त्र-📚
बिम्बाधरेण मुरली कररी विलासी।मायूरपिच्छपरिलाञ्छित चारचूड:।आभीरबालककुलेन विहारकारी।। राधापतिर्मम पुनर्भविताऽनुकूल:।।१५८।
कृष्ण यामल तन्त्र-📚
📚: एक: कृष्णो द्विधाभूतो मुमुक्षुभजनैषिणो:। उपकाराय शुद्धात्मा वेदविद्भि: स गीयते।मुक्तोब्रृह्मपदंयाति तदंगं ज्योतिरुत्तमम्।।८/२६ ख –८/२७ क।(कृष्ण यामल तन्त्र)
📚: गोकुले वसुदेवस्य भार्या वै रोहिणी स्थिता।तस्याः प्रसूतिसमये गर्भो नेयस्त्वयोदरम्।। १८१.४० ।।
सप्तमो भोजराजस्य भयाद्रोधोपरोधतः। देवक्याः पतितो गर्भ इति लोको वदिष्यति।।१८१.४१ ।।
गर्भसंकर्षणात्सोऽथ लोके संकर्षणेति वै।संज्ञामवाप्स्यते वरीः श्वेताद्रिशिखरोपमः।। १८१.४२ ।।
ततोऽहं संभविष्यामि देवकीजठरे शुभे। गर्भे त्वया यशोदाया गन्तव्यमविलम्बितम्।।१८१.४३ ।।
प्रावृट्काले च नभसि कृष्णाष्टम्यामहं निशि।उत्पत्स्यामि नवम्यां च प्रसूतिं त्वमवाप्स्यसि।। १८१.४४ ।।
यशोदाशयने मां तु देवक्यास्त्वामनिन्दिते।मच्छक्तिप्रेरितमतिर्वसुदेवो नयिष्यति।१८१.४५।
कंसश्च त्वामुपादाय देवि शैलशिलातले।प्रक्षेप्स्यत्यन्तरिक्षे च त्वं स्थानं समवाप्स्यसि।। १८१.४६ ।।
श्रीमहापुराणे (ब्रह्मपुराणे) आदिब्राह्मे हरेरंशावतारनिरूपणं नामैकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः।। १८१ ।।
📚: व्यास उवाच
एवं संस्तूयमानस्तु भगवान्परमेश्वरः।उज्जहाराऽऽत्मनः केशौ सितकृष्णौ द्विजोत्तमाः।। १८१.२६ ।।
उवाच च सुरानेतै मत्केशौ वसुधातले। अवतीर्य भुवो भारक्लेशहानिं करिष्यतः।।१८१.२७।।
सुराश्च सकलाः स्वांशैरवतीर्य महीतले। कुर्वन्तु युद्धमुन्मत्तैः पूर्वोत्पन्नैर्महासुरैः।।१८१.२८।।
ततः क्षयमशेषास्ते दैतेया धरणीतले। प्रयास्यन्ति न संदेहो नानायुधविचूर्णिताः।।१८१.२९।।
वसुदेवस्य या पत्नी देवकी देवतोपमा। तस्या गर्भोऽष्टमोऽयं तु मत्केशो भविता सुराः।१८१.३०।
अवतीर्य च तत्रायं कंसं घातयिता भुवि।कालनेमिसमुद्भूतमित्युक्त्वाऽन्तर्दधे हरिः।। १८१.३१ ।।
अदृश्याय ततस्तेऽपि प्रणिपत्य महात्मने। मेरुपृष्ठं सुरा जग्मुरवतेरुश्च भूतले।।१८१.३२।।
कंसाय चाष्टमो गर्भो देवक्या धरणीतले।भविष्यतीत्याचचक्षे भगवान्नारदो मुनिः।। १८१.३३ ।।
कंसोऽपि तदुपश्रुत्य नारदात्कुपितस्ततः। देवकीं वसुदेवं च गृहे गुप्तावधारयत्।।१८१.३४ ।
जातं जातं च कंसाय तेनैवोक्तं यथा पुरा। तथैव वसुदेवोऽपि पुत्रमर्पितवान्द्विजाः।१८१.३५ ।
श्रीमहापुराणे (ब्रह्मपुराणे) आदिब्राह्मे हरेरंशावतारनिरूपणं नामैकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः।। १८१ ।।
___________
अब विष्णु पुराण से समान श्लोक उद्धृत कर निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत हैं।
श्रीपराशर उवाच
एवं संस्तूयमानस्तु भगवान्परमेश्वरः ।
उज्जहारात्मनः केशौ सितकृष्णौ महामुने ॥ ५,१.६० ॥
उवाच च सुरानेतौ मत्केशौ वसुधातले ।
अवतीर्य भुवो भारक्लेशहानिं करिष्यतः ॥ ५,१.६१ ॥
सुराश्च सकलाःस्वांशैरवतीर्य महीतले ।
कुर्वन्तु युद्धमुन्मत्तैः पूर्वोत्पन्नैर्महासुरैः ॥५,१.६२ ॥
ततः क्षयमशेषास्ते दैतेया धरमीतले ।
प्रयास्यन्ति न संदेहो मद्दृपातविचूर्णिताः ॥ ५,१.६३॥
वसुदेवस्य या पत्नी देवकी देवतोपमा ।
तत्रायमष्टमो गर्भो मत्केशो भविता सुराः ॥ ५,१.६४ ॥
अवतीर्य च तत्रायं कंसं घातयिता भुवि ।
कालनेमीं समुद्भूतमित्युक्त्वान्तर्दधे हरिः ॥ ५,१.६५ ॥
अदृश्याय ततस्तस्मै प्रणिपत्य महामुने ।
मेरुपृष्ठं सुरा जग्मुरवतेरुश्च भूतले ॥ ५,१.६६ ॥
कंसाय चाष्टमो गर्भो देवक्या धरणीधरः ।
भविष्यतीत्याच चक्षे भगवान्नारदो मुनिः ॥ ५,१.६७ ॥
कंसोऽपि तदुपश्रुत्य नारदात्कुपितस्ततः ।
देवकीं वसुदेवं च गृहे गुप्तावधारयत् ॥ ५,१.६८ ॥
वसुदेवेन कंसाय तेनैवोक्तं यथा पुरा ।
तथैव वसुदेवोऽपि पुत्रमर्पितवान् द्विज ॥ ५,१.६९॥
हिरण्यकशिपोः पुत्राःषड्गर्भा इति विश्रुताः ।
विष्णुप्रयुक्ता स्तान्निद्राक्रमाद्गर्भानयोजयत् ॥ ५,१.७० ॥
योगनिद्रा महामाया वैष्णवी मोहितं यया ।
अविद्यया जगत्सर्वं तामाह भगवान्हरिः ॥५,१.७१॥
श्रीभगवानुवाच
निद्रे गच्छ ममादेशात्पातालातलसंश्रयान् ।
एकैकत्वेन षड्गर्भान्देवकीजठरं नय ॥ ५,१.७२ ॥
हतेषु तेषु कंसेन शेषाख्योंशस्ततो मम ।
अंशांशोनादरे तस्याःसप्तमः संभविष्यति ॥ ५,१.७३ ॥
गोकुले वसुदेवस्य भार्यान्या रोहिणी स्थिता ।
तस्याःस सम्भूतिसमं देवि नेयस्त्वयोदरम् ॥ ५,१.७४ ॥
सप्तमो भोजराजस्य भयाद्रोधोपरोधतः ।
देवक्याः पितितो गर्भ इति लोको वदिष्यति ॥ ५,१.७५ ॥
गर्भसंकर्षणात्सोऽथ लोके संकर्षणेति वै ।
संज्ञामवाप्स्यते वीरः श्वेताद्रिशिखरोपमः ॥ ५,१.७६ ॥
ततोऽहं संभविष्यामि देवकीजठरे शुभे ।
भर्गं त्वया यशोदाया गन्तव्यमविलंबितम् ॥ ५,१.७७ ॥
*****
प्रावृट्काले च नभसि कृष्णाष्टम्यामहं निशि ।
उत्पत्स्यामि नवम्यां तु प्रसूतिं त्वमवाप्स्यसि ॥ ५,१.७८ ॥
यशोदाशयने मां तु देवक्यास्त्वामनिन्दिते ।
मच्छक्तिप्रोरितमतिर्वसुदेवो नयिष्यति ॥५,१.७९ ॥
कंसश्च त्वामुपादाय देवि शैलशिलातले ।
प्रक्षेप्स्यत्यन्तारिक्षे च संस्थानं त्वमवाप्स्यसि ॥ ५,१.८० ॥
ततस्त्वां शतदृक्छक्रः प्रणम्य मम गौरवात् ।
प्रणिपातानतशिरा भगिनीत्वे ग्रहीष्यति ॥५,१.८१।
त्वं च शुंभनिशुंभादीन्हत्वा दैत्यान्सहस्रशः ।
स्थानैरनेकैः पृथिवीमशेषां मण्डयिष्यसि ॥ ५,१.८२ ॥
त्वं भूतिः सन्नतिः क्षान्तिः कान्तिर्द्यौः पृथिवी धृतिः
लज्जापुष्टी रुषा या तु काचिदन्या त्वमेव सा ॥ ५,१.८३ ॥
ये त्वामार्येति दुर्गेति वेदगर्भांबिकेति च ।
भद्रेति भद्रकालीति क्षेमदा भग्यदेति च ॥ ५,१.८४॥
प्रातश्चैवापराह्ने च स्तोष्यन्त्यानम्रमूर्तयः ।
तेषां हि प्रार्थितं सर्वं मत्प्रसादाद्भविष्यति ॥ ५,१.८५ ॥
सुरामांसोपहरैश्च भक्ष्यभोज्यैश्च पूजिता ।
नॄणामशेषसामांस्त्वं प्रसन्ना संप्रदास्यसि ॥ ५,१.८६ ॥
ते सर्वे सर्वदा भद्रे मत्प्रसादादसंशयम् ।
असंदिग्धा भविष्यन्ति गच्छ देवि यथोदितम् ।
इति विष्णुमहापुराणे पञ्चमांशे प्रथमोऽध्यायः (१)
***************
अनुवाद:-
श्री पराशर जी बोले ;- हे महामुने ! इस प्रकार स्तुति किये जानेपर भगवान परमेश्वर ने अपने श्याम और श्वेत दो केश उखाड़े ॥ ५ ९॥
और देवताओं से बोले-मेरे ये दोनों केश पृथ्वी पर अवतार लेकर पृथिवी के भाररूप कष्ट को दूर करेंगे ॥ ६० ॥
सब देवगण अपने-अपने अंशों से पृथ्वी पर अवतार लेकर अपने से पूर्व उत्पन्न हुए उन्मत्त दैत्यों के साथ युद्ध करें।६१॥
तब मेरे दृष्टिपात से दलित होकर पृथिवी तलपर सम्पूर्ण दैत्यगण निस्सन्देह क्षीण हो जाएँगे ॥६२।।
वसुदेवजी की जो देवी के समान देवकी नाम की भार्या है उसके आठवें गर्भ से मेरा यह (श्याम ) केश अवतार लेगा ॥६३॥
और इस प्रकार वहाँ अवतार लेकर यह कालनेमि का अवतार कंस का वध करेगा।' ऐसा कहकर श्रीहरि अन्तर्धान हो गये ॥६४॥
हे महामुने ! भगवान के अदृश्य हो जानेपर उन्हें प्रणाम करके देवगण सुमेरु पर्वत पर चले गये और फिर पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए ॥ ६५ ॥
इसी समय भगवान नारदजी ने कंस से आकर कहा कि देवकी के आठवें गर्भ में भगवान धरणी धर जन्म लेंगे ॥६६॥
नारद जी से यह समाचार पाकर कंस ने कुपित होकर वसुदेव और देवकी को कारागृह में बंद कर दिया ॥ ६७ ॥
द्विज ! वसुदेव जी भी, जैसा कि उन्होंने पहले कह दिया था, अपना प्रत्येक पुत्र कंस को सौंपते रहे ॥६८ ॥
*********************************
ऐसा सुना जाता है कि ये छः गर्भ पहले हिरण्य कशिपु के पुत्र थे। भगवान विष्णु की प्रेरणा से योगनिद्रा उन्हें क्रमशः गर्भ में स्थित करती रही ।।६९॥
*******
विशेष- परन्तु देवीभागवतपुरण के अनुसार ये छै: पुत्र अदिति के थे। और सातवाँ बलराम रूप शेषनाग कद्रु के पुत्र थे। परन्तु अदिति रूप देवकी के छ: स्थापित पुत्र और सप्तम गर्भविस्थापित पुत्र बलराम थे।
(जाता विनश्येरंस्तव पुत्रास्तु सप्त वै" - देवी भागवत महापुराण)
अत: देवीभागवत पुराण का वर्णन सत्य तथा तर्कसंगत है। जबकि विष्णु पुराण और ब्रह्मपुराण का वर्णन प्रक्षेप है।
जिस अविद्या-रूपिणी से सम्पूर्ण जगत् मोहित हो रहा है, वह योगनिद्रा भगवान विष्णु के महामाया है उससे भगवान श्री हरि ने कहा--॥ ७०॥
श्रीभगवान् बोले - हे निद्रे ! जा, मेरी आज्ञा से तू पाताल में स्थित छः गर्भ को एक-एक करके देवकी की कुक्षि में स्थापित कर दे॥७१।।
कंस द्वारा उन सबके मारे जानेपर शेषनामक मेरा अंश अपने अंशांश देवकी के सातवें गर्भ में स्थित होगा ॥ ७२ ॥
हे देवि ! गोकुल में वसुदेवजी की जो रोहिणी नामकी दूसरी भार्या रहती है उसके उदर में उस सातवें गर्भ को ले जाकर तू इस प्रकार स्थापित कर देना जिससे वह उसी के जठर से उत्पन्न हुए के समान जान पड़े ॥७३॥
उसके विषय में संसार यही कहेगा कि कारागार में बन्द होने के कारण भोजराज कंस के भय से देवकी का सातवाँ गर्भ गिर गया ॥७४॥
वह श्वेत शैलशिखर के समान वीर पुरुष गर्भ से आकर्षण किये जाने के कारण संसार में 'सङ्गर्षण' नाम से प्रसिद्ध होगा॥ ७५॥
तदनन्तर, हे शुभे ! देवकी के आठवें गर्भ में मैं स्थित होऊँगा । उस समय तू भी तुरन्त ही यशोदा के गर्भ में चली जाना ॥७६॥
********
वर्षा ऋतु में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की रात्रि के समय मैं जन्म लूंगा और तू नवमी को उत्पन्न होगी। ७७ ॥
हे अनिन्दिते ! उस समय मेरी शक्ति से अपनी मति फिर जाने के कारण वसुदेव जी मुझे तो यशोदा के और तुझे देवकी के शयनगृह में ले जाएंगे ॥७८॥
तब, हे देवि ! कंस तुझे पकड़कर पर्वत-शिलापर पटक देगा; उसके पटकते ही तू आकाश में स्थित हो जायगी ॥ ७९ ।।
उस समय मेरे गौरव से सहस्रनयन इन्द्र शिर झुकाकर प्रणाम करनेके अनन्तर तुझे भगिनी रूप से स्वीकार करेगा॥ ८० ॥
तू भी शुम्भ, निशुम्भ आदि ,सहस्र दैत्यों को मारकर अपने अनेक स्थानों से समस्त पृथ्वी को सुशोभित करेगी॥८१॥
तू ही भूति, सन्नति, क्षान्ति और कन्ति है; तू ही आकाश, पृथिवी, धृति, लज्जा, पुष्टि और उषा है; इनके अतिरिक्त संसारमें और भी जो कोई शक्ति है वह सब तू ही है॥ ८२॥
जो लोग प्रातः काल और सायंकाल में अत्यन्त नम्रतापूर्वक तुझे आर्या, दुर्गा, वेदगर्भा, अम्बिका, भद्रा, भद्रकाली, क्षेमदा और भाग्यदा आदि कहकर तेरी स्तुति करेंगे उनकी समस्त कामनाएँ मेरी कृपा से पूर्ण हो जायँगी ॥८३-८४ ॥
*********
मदिरा और मांस की भेंट चढ़ाने से तथा भक्ष्य और भोज्य पदार्थो द्वारा पूजा करने से प्रसन्न होकर तू मनुष्यों की सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण कर देगी ॥८५॥
तेरे द्वारा दी हुई वे समस्त कामनाएँ मेरी कृपा से निस्सन्देह पूर्ण होंगी। हे देवि ! अब तू मेरे बतलाये हुए स्थानको जा ॥८६॥
ऊपर कही हुई कहानी विष्णुमहापुराण के पञ्चमांश प्रथमोऽध्याय में तथा ब्रह्मा के विधि-विधानों पर केन्द्रित ब्रह्मपुराण( महापुराण) के (181) वें अध्याय में उल्लिखित है। दोनो पाठ एक दूसरे की नकल हैं। यह यज्ञ मूलक कर्मकाण्डों के समर्थ पुरोहितो द्वारा आरोपित हैं । यह सभी क्षेपक ही है।
*********************************
स्कन्द पुराणकार भी राधा जी के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए उन्हें आदि शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करता है। देखे निम्नलिखित श्लोकों को-
श्रीकृष्णस्य मनश्चंद्रो राधास्यप्रभयान्वितः ।।तद्विहारवनं गोभिर्मण्डयन्रोचते सदा ।।५।।
कृष्णचन्द्रः सदा पूर्णस्तस्य षोडश याः कलाः ।।चित्सहस्रप्रभाभिन्ना अत्रास्ते तत्स्वरूपता ।। ६ ।।
एवं वज्रस्तु राजेन्द्र प्रपन्नभयभञ्जकः।।श्रीकृष्णदक्षिणे पादे स्थानमेतस्य वर्तते ।।७।।
अवतारेऽत्र कृष्णेन योगमायाऽति भाविता ।।तद्बलेनात्मविस्मृत्या सीदन्त्येते न संशयः ।। ८।।
श्लोकार्थ -
श्रीकृष्ण का मनरूपी चन्द्रमा राधा के मुख की प्रभारूप चाँदनी से युक्त हो उनकी लीलाभूमि वृन्दावन को अपनी किरणों से सुशोभित करता हुआ यहाँ सदा प्रकाशमान रहता है ।।५।।
श्रीकृष्णचन्द्र नित्य परिपूर्ण हैं, प्राकृत चन्द्रमा की भाँति उनमें वृद्धि और क्षयरूप विकार नहीं होते। उनकी जो सोलह कलाएँ हैं, उनसे सहस्रों चिन्मय किरणें निकलती रहती हैं; इससे उनके सहस्रों भेद हो जाते हैं। इन सभी कलाओं से युक्त, नित्य परिपूर्ण श्रीकृष्ण इस व्रजभूमि में सदा ही विद्यमान रहते हैं; इस भूमि में और उनके स्वरूप में कुछ अन्तर नहीं है ।।६।।
राजेन्द्र परीक्षित् ! इस प्रकार विचार करने पर सभी व्रजवासी गोप भगवान् के अंग में स्थित हैं। शरणागतों का भय दूर करनेवाले जो ये वज्रनाभ हैं, इनका स्थान श्रीकृष्ण के दाहिने चरण में है ।।७।।
इस अवतार में भगवान् श्रीकृष्ण ने इन सबको अपनी योगमाया से अभिभूत कर लिया है, उसी के प्रभाव से ये अपने स्वरूप को भूल गये हैं और इसी कारण सदा दुःखी रहते हैं। यह बात निस्सन्देह ऐसी ही है ।।८।।
___________________
श्रीस्कान्दे महापुराणे एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां द्वितीये वैष्णवखण्डे परीक्षिदुद्धवसंवादे श्रीभागवतमाहात्म्ये तृतीयोऽध्यायः।।३।।
† श्रीकृष्ण जन्माष्टमी †
पद संख्या (231) से (240) तक / तुलसीदास विनयपत्रिका /
बायों दियो बिभव कुरूपति को, भोजन जाइ बिदुर-घर कीन्हो।3।
व्याख्या:
१. ब्रह्मपुराण
२. विष्णुपुराण
३. अग्निपुराण
४. ब्रह्मवैवर्तपुराण
५. पद्मपुराण
६. भविष्यपुराण
७. भविष्योत्तरपुराण
| श्रीकृष्णका प्राकट्य- |
श्रीगौड़ीय सम्प्रदाय के अनुयायी सन्तों की मान्यता है कि जिस समय कारागार में श्रीवसुदेव-देवकी के सम्मुख चतुर्भुजरूप में भगवान् प्रकट हुए थे, उसी समय नन्दबाबा के घर पर भी यशोदानन्दन के रूप में द्विभुजरूप में भगवान प्रकट हुए थे।
और यशोदा माता ने जुड़वाँ रूप में दो सन्तानों को जन्म दिया था पुत्र का नाम गोविन्द और पुत्री का नाम अम्बिका था। विदित हो कि भगवान का द्विभुजधारी गोप रूप गोलोक का शाश्वत रूप है। जबकि चतुर्भुज रूप वैकुण्ठ वासी विष्णु रूप है।
श्रीमद्भागवत, दशमस्कन्ध के पञ्चम अध्याय के प्रथम श्लोक में वर्णन आया है--
नन्दस्त्वात्मज उत्पन्ने जाताह्नादो महामनाः।
- जब नन्द के पुत्र का जन्म हुआ।
- जाताह्लादो महामनाःमहान मन वाले नन्द आनन्दित हुए।
- आहूय विप्रान् वेदज्ञान्:उन्होंने वेदों को जानने वाले ब्राह्मणों को बुलाकर।
- स्नातः शुचिरलङ्कृतः:उन्होंने स्नान किया, शुद्ध हुए और अलंकार धारण किए।
- नन्द ने तत्पश्चात विधिवत जातकर्मादि संस्कार करवाए और पितृ-देवताओं का पूजन किया। उन्होंने ब्राह्मणों को अलंकरणों से युक्त दस लाख गायें और सात रत्न तथा रेशमी वस्त्रों से युक्त तिलाद्रि (तिलों से भरे पर्वत) दान किए।
श्रीनन्दजी के आत्मज स्वयं से उत्पन्न (पुत्र) होने पर उन महामना को परमाह्लाद हुआ।'
श्रीनन्दजी के यहाँ भगवान् पुत्ररूप में जन्म न लेते तो शुकदेव जी 'आत्मज उत्पन्ने' पुत्र पैदा हुआ पद न कहकर 'स्वात्मजं मत्वा' ' अपना पुत्र मानकर ' वाक्यपद कहते। जो उन्होंने ऐसा नहीं कही कहा। अत: व्याकरण की दृष्टि से भी कृष्ण गोविन्द नन्द के पुत्र हैं।
*********
कृष्ण यामल तन्त्र नामक ग्रन्थ में वर्णन है कि नन्द की पत्नी यशोदा के जुड़वां सन्तानें हुई एक लड़का हुआ और एक लड़की । लड़के का नाम गोविन्द और लड़की का नाम अम्बिका रखा गया जो मथुरा को चली गयी।५।
नन्दपत्न्यां यशोदायां मिथुनं सञ्जायत: । गोविन्दाख्यः पुमान् कन्या साम्बिका च मथुरां गता ।।५।
(कृष्ण यामल तन्त्र)
इतना ही नहीं विष्णु यामल में वर्णन है कि वसुदेव द्वारा ले जाए ग॒ए वासुदेव कृष्ण निश्चय ही नन्द पुत्र की आत्मा में विलीन हो गयी जैसे मेघों में बिजली समा जाती है।
वसुदेव: समानीतो वासुदेव किलात्मनि लीनो नन्दसुते राजन् घने सौदामिनी यथा।।६।
अनुवाद:-वसुदेव द्वारा लाये गये वासुदेव श्रीकृष्ण स्वयं नन्द पुत्र में लीन हो गये जैसे बिजली मेघों में विलीन हो जाती है।६।
(विष्णु यामल-तत्र)
इन महानुभावों का कहना है कि श्रीवसुदेव-देवकी की भक्ति ऐश्वर्यमिश्रित वात्सल्यमयी थी और श्रीनन्दयशोदा की भक्ति ऐश्वर्यगन्धशून्य विशुद्ध वात्सल्यमयी।
इसी से वसुदेव-देवकी के सामने भगवान् शंख-चक्र-गदापद्मधारी चतुर्भुज अद्भुत बालक के रूप में आविर्भूत हुए। भगवान् के इस ऐश्वर्यमय रूप को देखकर उन्होंने समझा कि श्रीभगवान् नारायण हमारे पुत्ररूप में प्रकट हुए हैं; अतएव उन्होंने हाथ जोड़कर इनकी स्तुति की और भगवान ने भी पूर्व-जन्मों की स्मृति दिलाकर अपने साक्षात् भगवान् होने का परिचय दिया।
इसमें ऐश्वर्य प्रत्यक्ष है। तदनन्तर वात्सल्य-भाव का उदय होनेपर कंस के भयसे उन्होंने भगवान्से बार-बार चतुर्भुजरूप को छिपाकर द्विभुज साधारण शिशु बनने के लिये अनुरोध किया।
इससे यह सिद्ध है कि श्रीवसुदेव-देवकी का वात्सल्य-प्रेम-ऐश्वर्यमिश्रित था और भगवान् का ऐश्वर्यमय चतुर्भुजरूप ही उनका आराध्य था तथा वे उसको पुत्ररूप में प्राप्त करना तथा देखना चाहते थे।
परन्तु इसके विपरीत श्रीनन्द-यशोदा का वात्सल्य-प्रेम विशुद्ध था, उसमें ऐश्वर्य-ज्ञान का तनिक भी सम्बन्ध नहीं था; इससे उनके सामने भगवान् द्विभुज प्राकृत बालक के रूप में ही आविर्भूत हुए और उन्होंने कोई स्तुति-प्रार्थना भी नहीं की। यह द्विभुज रूप ही गोलोक का गोप रूप है। इसी रूप को
पुत्र समझकर गोद में उठा लिया और नवजात बालक के कल्याणार्थ जातकर्मादि करवाये।
***
नन्दपत्नयां यशोदायां मिथुन: समपद्यत:। गोविन्दाख्यः पुमान् कन्या साम्बिका मथुरां गता॥
यह प्रसिद्ध ही है कि भगवान् उसी रूप में भक्त के सामने प्रकट होते हैं, जो रूप भक्त के मन में होता है। श्रीभागवत में श्रीब्रह्माजी ने कहा है--
त्वं भक्तियोगपरिभावितहृत्सरोज ।
आस्से श्रुतेक्षितपथो ननु नाथ पुंसाम् ।
यद् यद् धिया ते उरुगाय विभावयन्ति ।
तत्तद् वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥११॥
(भागवतपुराण-३/९/११)
भगवन् ! आपके भक्त जिस स्वरूप की निरन्तर भावना करते हैं, आप आप उसी रूप में प्रकट होकर भक्तों की कामना पूर्ण करते हैं।'
श्रीमद्भागवत में जो यह स्पष्ट वर्णन नहीं आया है--इसका कारण यह बताया जाता है कि श्रीशुकदेवजी भक्तराज परीक्षित् को कथा सुना रहे थे। परीक्षित् का सम्बन्ध वसुदेवजी से था। अतः उन्हें विशेष आनन्द देने के लिये शुकदेवजी ने नन्दालय में भी भगवान् के प्रकट होने का स्पष्ट वर्णन नहीं किया; परन्तु उनका प्रेमपूर्ण हृदय माना नहीं और इस श्लोक में उनके श्रीमुखसे “नन्दस्त्वात्मज उत्पन्ने ' के रूप में रहस्य प्रकट हो ही गया।
श्रीमद्भागवतमें और भी संकेत है--कंस ने जब गोकुल से लायी हुई यशोदा की कन्या को देवकी की कन्या समझकर उसे मारने के लिये शिलापर पटकना चाहा, तब वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में चली गयी और देवीरूप से प्रकट हुई । उस समय भागवत में उसके लिये 'अदृश्यतानुजा विष्णो: ' अर्थात् 'कंस ने भगवान्की अनुजा (छोटी बहिन)-को देखा '-यों लिखा है। पर यदि भगवान् श्रीकृष्ण केवल श्रीदेवकी के पुत्र होते तो यशोदा की कन्या को भगवान् की 'अनुजा' कहना युक्तियुक्त तथा सत्य न होता किन्तु परमानन्दघनविग्रह भक्तवाञ्छाकल्पत भक्तवाञ्छाकल्पतरु श्रीभगवान् जिस समय कंस-कारागार में वसुदेव-आत्मजरूप में प्रकट हुए थे, ठीक उसी समय गोकुल में नन्दात्मज के रूप में भी वही भगवान् प्रकट हुए थे तथा उसी के थोड़ी देर बाद योगमाया कन्या के रूप में प्रकट हुई थीं।
___________________
श्रीहरिवंश में आया है-
गर्भकाले त्वसम्पूर्णे अष्टमे मासि ते स्त्रियौ। देवकी च यशोदा च सुषुवाते समं तदा ।११।
हरिवंशपुराण विष्णुपर्व अध्याय (4)
अर्थात् गर्भकाल पूरा होने के पहले ही आठवें महीने में 'देवकी और यशोदा दोनों ने एक ही साथ प्रसव किया था।'
इस तथ्य पर यह कहा जा सकता है कि “जिस समय देवकी जी के भगवान् पुत्ररूप में प्रकट हुए, उसी समय यशोदाजी के योगमाया प्रकट हुईं।'
पर ऐसा कहना बनता नहीं; क्योंकि श्रीमद्भागवत (१०। ३। ४७) -में यह स्पष्ट उल्लेख है कि “' श्रीभगवान् से प्रेरित वसुदेवजी ने पुत्र को गोद में लेकर कारागार से बाहर निकलने की इच्छा की, उस समय “योगमाया ' प्रकट हुईं।'
अतएव कारागार में भगवान का और गोकुल में योगमाया का प्राकट्य आगे-पीछे हुआ, एक ही समय नहीं हुआ था। इस तथ्य पर भी यह कहा जा सकता है कि गोकुलमें ' भगवान् प्रकट हुए ! इसमें स्पष्ट प्रमाण क्या है ? तो इसके समाधान में ' श्रीकृष्णयामल तन्त्र' नामक ग्रन्थ का कहना है कि नन्द पत्नी यशोदा के यमज( जुड़वाँ) संतान हुई थी; पहले एक पुत्र हुआ, तदनन्तर एक कन्या हुई पुत्र साक्षात् श्रीगोविन्द थे और कन्या थी स्वयं अम्बिका (योगमाया)।
यशोदा की इस कन्या को ही वसुदेवजी मथुरा ले गये थे-
इस स्पष्टोक्ति से योगमायाको 'श्रीकृष्ण की अनुजा'(छोटी बहिन) कहा जाना भी सार्थक हो गया।
इस विषय पर फिर कहा जा सकता है--' श्रीवसुदेव जी जब शिशु श्रीकृष्ण को लेकर गोकुल गये, तब वहाँ उन्हें केवल शिशु बालिका ही क्यों दिखायी दी, बालक क्यों नहीं दिखायी दिया ? और बालक भी था तो फिर वह बालक कहाँ गया ? वहाँ दो बालक होने चाहिये।'
इस शंका का समाधान यह है कि इनके वहाँ पहुँचते ही उसी क्षण इन वसुदेव बालक उस नन्दबालक में विलीन हो गया। इन्हें पता ही नहीं लगा कि वहाँ कोई बालक और भी था। वरिष्ठ महानुभावों ने यहाँ तक माना है कि जिस समय कंस के कारागार में देवकी ने यह प्रबल इच्छा की कि श्रीभगवान् के चतुर्भुजरूप का गोपन हो जाय, उसी समय यशोदा हृदयस्थ भगवान् का द्विभुज बालकरूप उस चतुर्भुजरूप को छिपाकर देवकी के सामने आविर्भूत हो गया (यदा स्वाविर्भूतचतुर्भुजरूपाच्छादनाय श्रीदेवकीच्छाजायत, तदा यशोदाहदयस्थद्विभुजरूपस्य तद्रूपाच्छादनपूर्वकाविर्भावस्तत्रासीदिति गम्यते--'वैष्णवतोषिणी')।
यशोदा के यहाँ प्रकट भगवान् वहाँ से तुरन्त यहाँ आकर प्रकट हो गये और उनमें भगवान् का शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी चतुर्भुजरूप तुरन्त वैसे ही विलीन हो गया, जैसे बादल में बिजली विलीन हो जाती है-
वसुदेवसुतः श्रीमान् वासुदेवोऽखिलात्मनि। लीनो नन्दसुते राजन ! घने सौदामनी यथा॥ 6। (श्रीकृष्णयामल तन्त्र )
देवक्यां देवरूपिण्यां. विष्णु: सर्वगुहाशयः। आविरासीद् यथा प्राच्यां दिशीन्दुरिव पुष्कलः॥ भागवत पुराण-(१०। ३। ८)
यहाँ 'देवकी' शब्द 'देहली-दीपक' न्याय से श्रीदेवकीजी और श्रीयशोदाजी दोनोंका ही वाचक है; क्योंकि यशोदाजीका भी दूसरा नाम 'देवकी' था।
श्रीहरिवंशपुराण में आया है-
द्वे नाम्नी नन्दभार्याया यशोदा देवकीति च। अतः सख्यमभूत्तस्या देवक्या शौरिजायया॥ अनुवाद:-“नन्दभार्या यशोदा के यशोदा और देवकी-दो नाम थे, इसीलिये उनका नामसाम्य के कारण वसुदेव-पत्नी देवकी से सख्यभाव था।'
इस वाक्य से भी यह कहा जा सकता है कि सांकेतिक भाषा में श्रीशुकदेवजीने दोनों जगह भगवान् के प्राकट्य की बात कह दी। एक अस्पष्ट संकेत और भी है-
यशोदा नन्दपत्नी च जातं॑ परमबुध्यत। न तल्लिड्रं परिश्रान्तना निद्रयापगतस्मृतिः॥
(श्रीमद्भागवत पुराण- १०। ३। ५३)
नन्दपत्नी यशोदा को यह तो ज्ञात हुआ कि संतान हुई है; परंतु श्रम और निद्रा (भगवत्प्रेरित स्वजनमोहिनी माया)-के कारण अचेत होने से वे यह न जान सकीं कि पुत्र है या कन्या! इससे भी नन्दालय में भगवान् के प्राकट्य का संकेत है। महानुभावों का कहना है कि भगवान् के दो रूप हैं--'ऐश्वर्य सम्पन्न' और 'ब्राह्म सम्पन्न। 'ऐश्वर्य' मायायुक्त है और “ब्राह्म' स्वरूप मायातीत है। अचिन्त्यानन्त-अतुलनीय-कल्याण-गुणगणसम्पन्न स्वमायाविशिष्ट ' ऐश्वर्य' रूप के द्वारा इस विश्वब्रह्माण्ड का सृजन-पालन आदि होता है। भगवान्का शुद्ध ब्रह्मस्वरूप उत्पादन-पालनादि लीलाओं से रहित, केवल आनन्दप्रेममय है। अत: वसुदेवजी के यहाँ जिस रूप का प्राकट्य हुआ था, वह “ऐश्वर्य"' रूप था और “नन्दात्मज' रूप से ब्रह्मस्वरूप गोलोक रूप से भगवान् अवतरित हुए थे। श्रीवसुदेवजीके यहाँ आविर्भूत 'ऐश्वर्य ' रूप और नन्दात्मज ब्राह्मस्वरूप में ब्राह्मस्वरूप गोपनरूप से गोपांगनाओं के साथ ब्रजमण्डल में रह गया। यही “वृन्दावन परित्यज्य पादमेक॑ न गच्छति' का रहस्य है।
यद्यपि श्रीभागवतमें इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं है तथा यह क्लिष्ट कल्पना-सी भी है, तथापि महानुभावोंके उपर्युक्त विवेचनके अनुसार श्रीभगवान् “नन्दात्मज' रूपमें भी अवतीर्ण हुए हों तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध के तीसरे अध्याय का यह ४८वाँ श्लोक अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भगवान श्रीकृष्ण के अवतार और गोकुल में योगमाया के प्राकट्य की संधि को दर्शाता है।
१. श्लोक का पूर्ण पाठ
ततश्च शौरिर्भगवत्प्रचोदितः प्रगृह्य पुत्रं जनकागृहान्यगात् ।
नन्दस्य पत्न्यां विविशे प्रसूतिगां यत्तत्र जातेत्यभवत् स्वरूपिणी ॥ नन्दपत्नयां यशोदायां मिथुनं समपद्यत ।
२. शब्दार्थ और सन्दर्भ
- नन्दपत्नयां यशोदायां: नन्द की पत्नी यशोदा में।
- मिथुनं: जोड़ा (एक पुत्र और एक कन्या)।
- समपद्यत: उत्पन्न हुआ या प्रकट हुआ।
नन्दस्त्वात्मज उत्पन्ने जाताह्लादो महामनाः ।
आहूय विप्रान् वेदज्ञान् स्नातः शुचिरलङ्कृतः ॥
(अथवा इसी प्रसंग के अन्य संस्करणों में— नन्दपत्नयां यशोदायां मिथुनं समपद्यत)
- अर्थ: इस अंश का अर्थ है कि "नन्द की पत्नी यशोदा से दो संतानों (मिथुन) का जन्म हुआ।"
- प्रसंग: यह उस समय का वर्णन है जब भगवान कृष्ण का जन्म गोकुल में यशोदा के गर्भ से (योगमाया के साथ) हुआ था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यशोदा ने एक पुत्र (कृष्ण) और एक पुत्री (योगमाया) को जन्म दिया था, जिसे 'मिथुन' (जोड़ा) कहा गया है। हालांकि, लोककथाओं और कुछ टीकाओं में इसे कृष्ण और योगमाया के एक साथ जन्म लेने के संदर्भ में देखा जाता है।
- ग्रन्थ: श्रीमद्भागवत महापुराण (दसवां स्कन्ध, अध्याय ५)।
- संस्करण/टीका: यह विशिष्ट पाठ मध्व संप्रदाय के विद्वान श्री विजयध्वज तीर्थ द्वारा रचित 'पद-रत्नावली' टीका में मिलता है। अन्य प्रचलित संस्करणों (जैसे श्रीधर स्वामी की टीका) में इस स्थान पर "नन्दस्त्वात्मज उत्पन्ने..." श्लोक मिलता है।
- अर्थ: "नन्द की पत्नी यशोदा से दो संतानों (मिथुन - एक पुत्र और एक पुत्री) का जन्म हुआ।"
- विशेषता: यह श्लोकांश इस दार्शनिक मत का समर्थन करता है कि श्री कृष्ण और योगमाया दोनों का जन्म माता यशोदा के गर्भ से ही हुआ था, जबकि प्रचलित कथा के अनुसार कृष्ण का जन्म देवकी के गर्भ से और योगमाया का यशोदा के गर्भ से हुआ था।
जब मथुरा के कारागार में भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ, तब भगवान की प्रेरणा से वसुदेव जी उन्हें गोकुल ले जाने के लिए उद्यत हुए। उसी समय योगमाया ने नन्द बाबा के घर यशोदा जी के गर्भ से जन्म लिया।
विद्वानों और टीकाकारों (जैसे श्रीधर स्वामी) के अनुसार, यहाँ 'मिथुनं' शब्द का प्रयोग यह दर्शाने के लिए किया गया है कि यशोदा जी के यहाँ एक पुत्र और एक पुत्री दोनों ने जन्म लिया था। पुत्र स्वयं 'कृष्ण' थे और पुत्री 'योगमाया' थीं। वसुदेव जी जब वहां पहुँचे, तो उन्होंने कन्या को उठा लिया, जबकि पुत्र (कृष्ण) वहीं अदृश्य रूप से समाहित हो गए।
३. आध्यात्मिक महत्व
यह श्लोक सिद्ध करता है कि:
- ईश्वरीय विधान: भगवान का गोकुल पहुँचना और योगमाया का मथुरा आना एक पूर्व-नियोजित दैवीय योजना थी।
- भक्ति का फल: नन्द-यशोदा के वात्सल्य प्रेम के कारण साक्षात् परब्रह्म उनके आंगन में प्रकट हुए।
- श्रीमद्भागवत की प्रामाणिकता: यह श्लोक कृष्ण जन्म की सूक्ष्म घटनाओं (जैसे योगमाया का साथ जन्म लेना) की पुष्टि करता है।
(घ) साहित्यिक साक्ष्य-
(क) जैन ग्रन्थों में श्रीकृष्ण नाम व चरित्र -
जैन ग्रन्थ- हरिवंश पुराण, उत्तरपुराण और पाण्डवपुराण में श्रीकृष्ण का विस्तृत वर्णन मिलता है, जहाँ उन्हें एक शलाका पुरुष और अर्ध-चक्रवर्ती के रूप में पहचाना गया है। जैन धर्म में श्रीकृष्ण के नाम और पदवी के बारे में मुख्य तथ्य निम्नलिखित हैं-
(१) वासुदेव (नारायण)- जैन आगमों के अनुसार, कृष्ण नौवें (अंतिम) वासुदेव हैं।
(२) शलाका पुरुष- जैन धर्म के 63 विशिष्ट महापुरुषों (शलाका पुरुषों) में कृष्ण का स्थान महत्वपूर्ण है।
(३) अर्ध-चक्रवर्ती- उन्हें 'अर्ध-चक्रवर्ती' कहा गया है क्योंकि उन्होंने आधे भारत (दक्षिण भारत) पर शासन किया था।
प्रमुख जीवन घटनाएँ और जानकारी-
जैन ग्रन्थ हरिवंश पुराण के अनुसार भगवान नेमिनाथ और श्रीकृष्ण सगे चचेरे भाई थे। जैन धर्म में उन्हें अरिष्टनेमि के नाम से भी जाना जाता है और वे 24 तीर्थंकरों की श्रेणी में 22वें तीर्थंकर हैं।
जैन पुराणों में उल्लेख है कि श्रीकृष्ण ने ही भगवान नेमिनाथ का विवाह जूनागढ़ की राजकुमारी राजुल (राजीमती) से तय कराया था। विवाह के समय जब नेमिनाथ ने वध के लिए एकत्रित किए गए मूक ( मोन व निर्दोष) पशुओं की चीख सुनी, तो उनका मन द्रवित हो गया और उन्होंने श्रीकृष्ण के सामने ही राजसी वैभव त्याग कर वैराग्य ले लिया।
उपर्युक्त प्रसंग श्रीकृष्ण और भगवान नेमिनाथ के बीच की शक्ति-परीक्षा और नेमिनाथ के वैराग्य से जुड़ा है। जैन ग्रंथों (जैसे हरिवंश पुराण) के अनुसार यह घटना काफी रोचक है। उसको निम्नलिखित घटना क्रम से जान सकते हैं-
(1) बल की परीक्षा (शंख वादन)-
श्रीकृष्ण को अपनी शक्ति पर गर्व था, लेकिन उन्हें संदेह था कि उनके चचेरे भाई नेमिनाथ उनसे भी अधिक शक्तिशाली हैं। एक दिन श्रीकृष्ण के शस्त्रागार में रखा 'पञ्चजन्य' शंख (जिसे केवल वासुदेव ही बजा सकते थे) नेमिनाथ ने खेल-खेल में उठा लिया और उसे इतनी जोर से बजाया कि पूरी द्वारिका कांप उठी।
जब श्रीकृष्ण को पता चला कि यह उनके छोटे भाई नेमिनाथ ने किया है, तो उन्होंने उनकी शक्ति की परीक्षा लेने के लिए उन्हें मल्ल-युद्ध के लिए ललकारा। नेमिनाथ ने मुस्कुराते हुए केवल अपनी एक अंगुली श्रीकृष्ण के सामने रख दी और कहा कि यदि आप मेरी इस एक कनिष्ठा अंगुली को भी झुका देंगे, तो मैं हार मान लूँगा। श्रीकृष्ण ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी, लेकिन वे नेमिनाथ की अंगुली को टस से मस नहीं कर पाए।
(2) वैराग्य की ओर प्रवृत होना-
श्रीकृष्ण ने सोचा कि यदि नेमिनाथ जैसे शक्तिशाली महापुरुष का विवाह नहीं हुआ, तो वे संसार त्याग कर मुनि बन जाएंगे। इसलिए श्रीकृष्ण ने ही नेमिनाथ का विवाह उग्रसेन की पुत्री राजुल (राजीमती) से तय करवाया।
(3) पशुओं की चीत्कार( करुण पुकार)-
जब नेमिनाथ की बारात महल के द्वार पर पहुँची, तो उन्होंने बाड़े में बन्द हजारों असहाय पशुओं को रोते और चिल्लाते देखा। पूछने पर पता चला कि ये पशु उन्हीं की बारात के भोजन के लिए मारे जाने वाले हैं।
यह सुनकर नेमिनाथ का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने तत्क्षण विवाह का विचार त्याग दिया और अपने आभूषण उतारकर श्रीकृष्ण को सौंप दिए। श्रीकृष्ण के समझाने के बावजूद, नेमिनाथ गिरनार पर्वत (जूनागढ़) पर चले गए और वहाँ तपस्या कर कैवल्य ज्ञान प्राप्त किया।
जैन ग्रन्थों (जैसे हरिवंश पुराण और नेमिनाथ चरित) के अनुसार, भगवान नेमिनाथ के वैराग्य धारण करने के बाद राजकुमारी राजुल (राजीमती) का जीवन पूरी तरह बदल गया। उनकी कहानी त्याग और समर्पण की एक अद्भुत मिसाल है, इसको निम्नलिखित सन्दर्भों से समझा जा सकता है-
1- विलाप और दुख-
जब राजुल को पता चला कि उनके होने वाले पति (नेमिनाथ) बारात के द्वार से ही लौट गए हैं और दीक्षा लेने गिरनार पर्वत चले गए हैं, तो वे गहरे शोक में डूब गईं। उन्होंने तय किया कि यदि वे नेमिनाथ की पत्नी नहीं बन सकीं, तो वे किसी अन्य पुरुष से विवाह नहीं करेंगी।
2- वैराग्य का मार्ग-
राजुल ने संसार के भोग-विलास को त्यागने का निश्चय किया। उन्होंने अपने सुंदर वस्त्र और आभूषण उतार फेंके और अपनी सखियों के समझाने के बावजूद नेमिनाथ के मार्ग पर चलने का फैसला किया।
3- दीक्षा और साधना-
वे गिरिनार पर्वत पर गईं और भगवान नेमिनाथ के चरणों में दीक्षित होकर आर्यिका (जैन साध्वी) बन गईं। जैन परम्परा के अनुसार, वे भगवान नेमिनाथ के समवशरण (धर्म सभा) में प्रमुख साध्वी (गणिनी) बनीं।
4- मोक्ष की प्राप्ति-
कठोर तपस्या और आत्म-साधना के बल पर राजुल ने अपने कर्मों का क्षय किया। अन्त में, उन्होंने भी उसी गिरिनार पर्वत से निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया, जहाँ से भगवान नेमिनाथ को मोक्ष मिला था।
जैन ग्रन्थों में श्रीकृष्ण की पत्तियों का उल्लेख-
जैन आगम 'अन्तकृतदशांग सूत्र' और 'हरिवंश पुराण' में श्रीकृष्ण की आठ प्रमुख रानियों (पटरानियों) का विस्तार से वर्णन मिलता है। जैन धर्म के अनुसार इन आठों रानियों ने अंत में भगवान नेमिनाथ से दीक्षा ली और मोक्ष प्राप्त किया।
इनके नाम इस प्रकार हैं-
रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, लक्ष्मणा, सुसीमा, गौरी
पद्मावती, और गान्धारी।
जैन ग्रन्थों के अनुसार श्रीकृष्ण की मृत्यु और द्वारिका के विनाश के बाद, इन सभी रानियों का संसार से मोह भंग हो गया। और वे भगवान नेमिनाथ के समवशरण (धर्म सभा) में राजुल (राजीमती) के पास जाकर जैन दीक्षा ग्रहण की और सभी एक साथ साध्वी बन गईं। तद्पोपरान्त इन रानियों ने 'गुणरत्न संवत्सर' नामक बहुत ही कठिन उपवास और तपस्या की और अपनी साधना के बल पर इन सभी ने शत्रुंजय पर्वत (पालीताना, गुजरात) से निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया।
जैन ग्रन्थों में श्रीकृष्ण के पुत्रों का उल्लेख-
जैन ग्रन्थों (विशेषकर अन्तकृतदशांग सूत्र) के अनुसार, श्रीकृष्ण के पुत्रों का वर्णन बहुत ही गौरवशाली है। उन्होंने न केवल युद्ध कौशल दिखाया, बल्कि अन्त में आत्म-कल्याण का मार्ग चुनकर मोक्ष प्राप्त किया।
मुख्य रूप से प्रद्युम्न और शाम्ब का वर्णन इस प्रकार है-
(1) प्रद्युम्न कुमार-
ये श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के पुत्र थे। इस बात की पुष्टि हिन्दू पौराणिक ग्रन्थों से भी होती है। किन्तु हम यहाँ पर जैन ग्रन्थ (विशेषकर अंतकृतदशांग सूत्र) के अनुसार, ही श्रीकृष्ण के पुत्रों का वर्णन करुंगा।
जैन ग्रन्थ के अनुसार हुआ यह कि प्रद्युम्न कुमार के जन्म के तुरन्त बाद एक देव ने इनका अपहरण कर लिया था, जिसके बाद इनका पालन-पोषण कालसंवर नामक राजा के यहाँ हुआ। बाद में इन्होंने अपनी शक्ति से सबको पराजित किया और द्वारिका लौटे।
श्रीकृष्ण के समझाने और भगवान नेमिनाथ के उपदेशों से प्रभावित होकर प्रद्युम्न ने संसार त्यागने का निर्णय लिया।
इसके बाद उन्होंने शत्रुंजय पर्वत (पालीताना) पर कठोर तपस्या की और वहीं से निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया। जैन धर्म में उन्हें 'कामदेव' की पदवी भी दी गई है।
(2) शाम्ब कुमार-
जैन ग्रन्थ अंतकृतदशांग सूत्र के अनुसार, शाम्ब कुमार श्रीकृष्ण की पत्नी जाम्बवती के पुत्र थे। (ऐसी बात हिंन्दू पौराणिक ग्रन्थों में भी मिलती है।)
शाम्ब और प्रद्युम्न की जोड़ी जैन पुराणों में बहुत प्रसिद्ध है। दोनों ने साथ में दीक्षा ली थी। इन्होंने भी मुनि बनकर घोर तप किया। कहा जाता है कि शत्रुंजय पर्वत पर इनके साथ साढ़े आठ करोड़ मुनियों ने मोक्ष प्राप्त किया था।
(3) श्रीकृष्ण के अन्य पुत्र और यादव कुमारों का उल्लेख-
जैन मान्यताओं के अनुसार, श्रीकृष्ण के कई अन्य पुत्रों (जैसे गद, सारण, अनिरुद्ध) ने भी भगवान नेमिनाथ से दीक्षा ली थी।
एक विशेष तथ्य:
जैन पुराणों के अनुसार, जब द्वारिका नगरी में आग लगी थी, तब श्रीकृष्ण ने अपने इन पुत्रों को मुनि धर्म का पालन करते देख संतोष व्यक्त किया था कि कम से कम वे तो जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो गए।
जैन ग्रन्थों के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म और स्थान-
जैन ग्रन्थों के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म शौरीपुर (मथुरा के पास) में राजा वसुदेव और देवकी के सातवें पुत्र के रूप में हुआ था। जैन दर्शन के अनुसार उनका जन्म श्रावण शुक्ला द्वादशी को हुआ था। तथा उनकी मृत्यु कौशांबी वन में जराकुमार (उनके भाई के पुत्र) के बाण लगने से हुई थी। मृत्यु के समय उन्होंने सोलहकारण भावनाओं का चिंतन किया था।
भारतीय सनातन धर्म से भिन्नता-
भारतीय सनातन धर्म में कृष्ण को परिपूर्णतम परमंब्रह्म माना गया है, जबकि जैन धर्म उन्हें एक ऐतिहासिक और शक्तिशाली महायोद्धा (कर्मवीर) के रूप में देखता है जो कर्म के नियमों के अधीन थे।
बौद्ध साहित्यों में श्रीकृष्ण का उल्लेख-
जिस तरह से जैन साहित्यों में श्रीकृष्ण का उल्लेख मिलता है उसी तरह से बौद्ध साहित्यों में भी मिलता है, लेकिन उनका चित्रण हिन्दू धर्म के पारम्परिक स्वरूप से काफी भिन्न है।
बौद्ध ग्रन्थों में श्रीकृष्ण के उल्लेख के होने का मुख्य बिन्दु निम्नलिखित हैं।
(1) घट जातक कथाएँ -
जातक कथाएँ मूल रूप से लिखित ग्रन्थों के रूप में पन्नों और पत्थरों दोनों रूपों में लिखी गई हैं। प्राचीन काल में जातक कथाओं को आम जनता तक पहुँचाने के लिए उन्हें स्तूपों की रेलिंग और तोरणों (द्वारों) पर उकेरा गया था। इसके प्रमुख उदाहरण भरहुत, सांची और अमरावती के स्तूपों में मिलते हैं, जहाँ इन कहानियों के दृश्यों को पत्थरों पर बहुत ही खूबसूरती से तराशा गया है। अजंता की गुफाओं की दीवारों पर भी इनके चित्र और नक्काशी मौजूद हैं।
पन्नों पर (साहित्यिक ग्रन्थ)-
जातक कथाएँ बौद्ध धर्म के पवित्र साहित्य का एक विशाल हिस्सा हैं। इन्हें मुख्य रूप से पालि भाषा में लिखा गया था और ये 'खुद्दक निकाय' नामक ग्रन्थ का हिस्सा हैं। समय के साथ इन्हें ताड़ के पत्तों और बाद में कागज़ के पन्नों पर संकलित किया गया ताकि इन्हें पढ़ा और पढ़ाया जा सके।
संक्षेप में, जहाँ पत्थरों की नक्काशी ने इन्हें अमर बनाया और अनपढ़ लोगों तक पहुँचाया, वहीं लिखित ग्रंथों (पन्नों) ने इनके दार्शनिक और नैतिक संदेशों को सुरक्षित रखा।
श्रीकृष्ण से सम्बन्धित कुछ जातक कथाओं का उल्लेख निम्नलिखित है-
घट जातक सबसे प्रमुख बौद्ध ग्रन्थ है जिसमें कृष्ण की कहानी विस्तार से मिलती है। इसमें कृष्ण (जिन्हें 'कण्ह' कहा गया है) को 'वासुदेव' के रूप में चित्रित किया गया है। इस कथा के अनुसार, वे दस भाइयों (अंधकवेणु पुत्रों) में से एक थे जिन्होंने कंस का वध किया और द्वारका पर शासन किया।
घट जातक कथा में जिसमें श्रीकृष्ण (वासुदेव) और उनके भाइयों की कहानी को एक अलग दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है। यहाँ इस कथा के प्रमुख विस्तार दिए गए हैं।
(1) श्रीकृष्ण का जन्म और परिवार-
हिन्दू परम्परा के विपरीत, जहाँ मुख्य रूप से कृष्ण और बलराम की चर्चा होती है, घट जातक में वासुदेव (कृष्ण)(10)भाइयों में सबसे बड़े थे और उनकी एक बड़ी बहन भी थी। इन भाइयों के नाम अंधकवेणु पुत्र के रूप में प्रसिद्ध हैं। इनके जन्म के समय कंस द्वारा बच्चों को मारने का प्रसंग तो है, लेकिन जातक कथा के अनुसार कोई बच्चा मारा नहीं गया। प्रत्येक पुत्र के जन्म के समय उसे एक दासी (नन्दगोपा) की पुत्री से बदल दिया गया था, जिससे वे सुरक्षित बच सके।
(2) ईश्वर नहीं वल्कि एक योद्धा और विजेता के रूप में श्रीकृष्ण का उल्लेख।
घट जातक कथा में कथा में कृष्ण को एक कोमल 'माखन चोर' के बजाय "विशाल, कठोर और भयंकर" योद्धा के रूप में चित्रित किया गया है।
वे और उनके भाई कुश्ती के एक मैच में राजा कंस को पराजित करते हैं और फिर पूरे जम्बुद्वीप पर विजय प्राप्त करते हैं।
उन्होंने अपनी राजधानी द्वारवती (द्वारका) बनाई। कथा के अनुसार, यह नगरी जादुई सुरक्षा से घिरी थी जो शत्रुओं के आने पर समुद्र में छिप सकती थी।
3. शोक और घट पण्डित (बुद्ध) का उपदेश
घट जातक कथा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा वासुदेव के पुत्र की मृत्यु के बाद उनके अत्यधिक शोक से जुड़ा है। जिसमें
कृष्ण के छोटे भाई, घट पण्डित (जो स्वयं भगवान बुद्ध का पूर्व जन्म थे), कृष्ण को इस शोक से बाहर निकालने के लिए 'पागलपन' का नाटक करते हैं।
वे चन्द्रमा से खरगोश मांगते हैं। जब कृष्ण उनसे कहते हैं कि यह असम्भव है, तब घट पण्डित उन्हें समझाते हैं कि मरे हुए व्यक्ति को वापस पाना भी उतना ही असम्भव है।
(4) अन्त और पुनर्जन्म का सम्बन्ध
घट जातक कथा में श्रीकृष्ण के वंश का अन्त होने के कारण को जन्म और पुनर्जन्म के आधार पर बताया गया है। जिसमें बताया गया है कि मदिरा के प्रभाव में भाइयों के बीच हुए संघर्ष के कारण श्रीकृष्ण के वंश का विनाश हो जाता है। जिसमें वासुदेव (कृष्ण) की मृत्यु भी 'जरा' नामक शिकारी के तीर से होती है, जो उनके पैर में लगता है।
विशेष- देखा जाए तो जातक कथा के अन्त में बुद्ध स्पष्ट करते हैं कि उस समय के वासुदेव उनके शिष्य सारिपुत्त थे और घट पण्डित स्वयं बुद्ध थे।
यह कथा मुख्य रूप से अनित्यता और शोक पर नियन्त्रण पाने का सन्देश देने के लिए सुनाई गई है
महायान बौद्ध धर्म में श्रीकृष्ण और उनके 'नारायण' स्वरूप का उल्लेख-
(1) कारण्डव्यूह सूत्र-
बौद्ध धर्म के महायान शाखा के प्रसिद्ध 'कारण्डव्यूह सूत्र' में एक बहुत ही रोचक वर्णन है। इस ग्रन्थ के अनुसार:
भगवान नारायण (विष्णु/कृष्ण) की उत्पत्ति ब्रह्माण्ड के संरक्षक बोधिसत्व अवलोकितेश्वर के हृदय से हुई है।
इस ग्रन्थ में कहा गया है कि अवलोकितेश्वर ने संसार के कल्याण के लिए विभिन्न देवताओं का रूप धारण किया, जिनमें नारायण भी एक थे।
यहाँ कृष्ण/नारायण को एक स्वतन्त्र ईश्वर के बजाय बुद्धत्व की राह पर चलने वाले एक शक्तिशाली बोधिसत्व के रूप में देखा गया है।
(2) ललितविस्तार सूत्र-
इस ग्रन्थ में बुद्ध के जीवन और उनकी शक्तियों का वर्णन है। यहाँ बुद्ध की महानता को दर्शाने के लिए कृष्ण का सन्दर्भ मिलता है। जिसमें बुद्ध की शारीरिक शक्ति और आध्यात्मिक प्रभाव की तुलना करते समय उन्हें "नारायण के समान पराक्रमी" बताया गया है। यह ग्रन्थ कृष्ण को एक ऐसे महापुरुष के रूप में स्वीकार करता है जिनकी शक्ति और तेज सर्वविदित था।
(3) बोधिसत्व के रूप में श्रीकृष्ण का वर्णन-
बोधिसत्व के रूप में कई महायान परम्पराओं में कृष्ण को एक 'धर्मपाल' (धर्म का रक्षक) या उच्च श्रेणी का बोधिसत्व माना गया है। कुछ प्राचीन ग्रीको-बौद्ध (Indo-Greek) कलाकृतियों में कृष्ण को बुद्ध के रक्षक के रूप में भी दिखाया गया है।
विद्वानों का मानना है कि महायान बौद्ध धर्म में 'भक्ति' का जो तत्व आया, उस पर कृष्ण भक्ति परम्परा का गहरा प्रभाव था। जिस तरह कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण की बात कही गई, वैसी ही भक्ति महायान में बुद्ध और बोधिसत्वों के प्रति देखी जाती है।
संक्षेप में, महायान साहित्य कृष्ण को नकारता नहीं है, बल्कि उन्हें बुद्ध के ज्ञान और करुणा के एक विशेष प्रकटीकरण के रूप में आत्मसात करता है।
तिब्बती बौद्ध परम्परा में श्रीकृष्ण का उल्लेख-
तिब्बती बौद्ध परम्परा में श्रीकृष्ण का उल्लेख बहुत ही विशिष्ट और सम्मानजनक है। यहाँ उन्हें केवल एक राजा ही नहीं, बल्कि एक सिद्ध पुरुष और धर्मरक्षक के रूप में देखा जाता है। जैसे इसके कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं-
(1) कृष्ण का नाम: 'कण्हपा'
तिब्बती बौद्ध धर्म में 84 महासिद्धों की सूची बहुत महत्वपूर्ण है। इनमें से एक प्रमुख सिद्ध का नाम 'कण्हपा' (कृष्णपाद) है। तिब्बती परम्परा इन्हें कृष्ण का ही एक तान्त्रिक स्वरूप या उनसे प्रेरित महापुरुष मानती है।
(2) चक्रसंवर तन्त्र-
तिब्बती तन्त्र साधनाओं में श्रीकृष्ण को 'विष्णु' के अवतार के रूप में पहचाना जाता है। कई तिब्बती ग्रंथों में कृष्ण को 'ऋषि' या 'विद्याधर' (ज्ञान धारण करने वाला) कहा गया है।
उन्हें एक ऐसे शक्तिशाली पुरुष के रूप में वर्णित किया गया है जिन्होंने अपनी योग शक्तियों से असुरों का दमन किया और धर्म की स्थापना की।
(3) रक्षक देवता के रूप में श्रीकृष्ण का वर्णन-
तिब्बती बौद्ध विहारों में कई बार 'नारायण' या 'वासुदेव' को एक रक्षक देवता के रूप में चित्रित किया जाता है। माना जाता है कि उन्होंने बुद्ध के सामने धर्म की रक्षा करने की प्रतिज्ञा ली थी।
(4) कर्मफल का उपदेश-
तिब्बती विद्वान (जैसे तारानाथ) अपनी इतिहास की पुस्तकों में कृष्ण की कहानी का सन्दर्भ देते हैं। वे कृष्ण और उनके वंश (यादवों) के विनाश की कथा का उपयोग यह समझाने के लिए करते हैं कि 'कर्म' का फल कितना अचूक होता है—चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसे अपने कर्मों का फल भुगतना पड़ता है।
(5) कला और थंगका पेण्टिंग्स-
कुछ विशेष तिब्बती थंगका चित्रों में बुद्ध के चारों ओर उपस्थित देवताओं की मण्डली में नीले रंग के नारायण को भी स्थान दिया जाता है, जो उनकी शक्ति और सुरक्षा का प्रतीक हैं।
संक्षेप में: तिब्बती परम्परा में कृष्ण एक 'साधक' और 'विजेता' के प्रतीक हैं, जिन्होंने संसार को अधर्म से बचाने में बुद्ध के मार्ग की सहायता की।
कुछ प्राचीन ऐतिहासिक व पौराणिक ग्रन्थों में श्रीकृष्ण का उल्लेख-
(|) मेगस्थनीज की 'इण्डिका-
यूनानी राजदूत मेगस्थनीज (300 ईसा पूर्व) ने लिखा है कि 'शौरसेनी' लोग (मथुरा के लोग) 'हेराक्लेस' की पूजा करते थे। इतिहासकारों के अनुसार, यह 'हेराक्लेस' शब्द श्रीकृष्ण (हरि-कृष्ण) के लिए प्रयुक्त हुआ था।
(||) छान्दोग्य उपनिषद-
इसमें 'घोर अंगिरस' के शिष्य के रूप में 'देवकी-पुत्र कृष्ण' का स्पष्ट वर्णन मिलता है, जिसमें श्रीकृष्ण का उल्लेख सबसे प्राचीन माना जाता है। इस ग्रन्थ के अध्याय- 3, खण्ड -17, श्लोक 6 में उनका विवरण इस प्रकार मिलता है-
देवकी-पुत्र: उपनिषद में उन्हें स्पष्ट रूप से 'देवकी का पुत्र' (कृष्णाय देवकीपुत्राय) कहा गया है।
घोर अंगिरस के शिष्य: उन्हें ऋषि घोर अंगिरस के शिष्य के रूप में वर्णित किया गया है।
यज्ञ का उपदेश: ऋषि घोर अंगिरस ने श्रीकृष्ण को जीवन को ही एक 'यज्ञ' के रूप में देखने की विद्या सिखाई थी। इस शिक्षा को ग्रहण करने के बाद श्रीकृष्ण 'अतृप्त' (जिज्ञासा से मुक्त या पूर्ण ज्ञानी) हो गए थे।
मृत्यु के समय का मन्त्र-
उन्हें यह उपदेश दिया गया था कि मृत्यु के समय मनुष्य को तीन मन्त्रों का आश्रय लेना चाहिए: 'अक्षितमसि' (तुम अविनाशी हो), 'अच्युतमसि' (तुम अटल हो), और 'प्राणसंशितमसि' (तुम प्राणों का सार हो)।
विद्वानों का मत-
कई विद्वान और शोधकर्ता इस कृष्ण को महाभारत और भगवद्गीता के वासुदेव कृष्ण के समान मानते हैं क्योंकि नाम और माता का नाम (देवकी) मेल खाता है। हालाँकि, कुछ विद्वान इसे एक ऐतिहासिक सन्दर्भ के रूप में देखते हैं जहाँ कृष्ण को एक दिव्य भगवान के बजाय एक ऋषि या साधक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
(1) संगम साहित्य-
संगम साहित्य (प्राचीन तमिल साहित्य) में श्रीकृष्ण का उल्लेख बहुत महत्वपूर्ण और स्पष्ट है, जहाँ उन्हें 'मायोन' (काला रंग वाला) के रूप में पूजा गया है।
संगम साहित्य यह दर्शाता है कि दक्षिण भारत में कृष्ण की भक्ति अत्यंत प्राचीन है और उन्हें विष्णु के ही एक रूप में स्वीकार किया गया था। तमिल कवियों ने उन्हें एक रक्षक और प्रेमी के रूप में चित्रित किया है, जो बाद में चलकर अलवार संतों की भक्ति परम्परा का आधार बना। संगम साहित्य के विभिन्न ग्रन्थों में श्रीकृष्ण के सन्दर्भ निम्नलिखित हैं-
(A) परिपाडल-
इस ग्रन्थ में श्रीकृष्ण और उनके भाई बलराम की स्तुति में कई गीत समर्पित हैं। यहाँ श्रीकृष्ण को 'मायोन' कहा गया है, जो चरागाहों और जंगलों के देवता (मुल्लई क्षेत्र) माने जाते हैं।
(B) अहनानूरु-
इस ग्रन्थ में श्रीकृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र के युद्ध में पाण्डवों की सहायता करने और उनके द्वारा कंस के विनाश जैसी घटनाओं के संकेत मिलते हैं।
(C) -
यद्यपि यह संगम काल के थोड़ा बाद का महाकाव्य माना जाता है, लेकिन इसमें 'आयचियर कुरवई' नामक नृत्य का वर्णन है, जो वृन्दावन में कृष्ण और गोपियों के रासलीला जैसा ही है। इसमें कृष्ण की बाल लीलाओं, जैसे मक्खन चुराना और गोवर्धन पर्वत उठाने का उल्लेख है।
(D) पुरनानूरु-
इस संग्रह के गीतों में कृष्ण मोहन- (मायोन) की तुलना राजाओं की शक्ति और गौरव से की गई है।
(E) शिलप्पादिकारम-
इस महाकाव्य में कृष्ण के हल्लोन (हलधर बलराम) की प्रशंसा की गई है।
(F) आण्डाल की भक्ति-
तमिल की प्रसिद्ध वैष्णव कवयित्री आण्डाल ने कृष्ण के वियोग में "तिरुप्पावै और नाच्चिचार तिरूमोलि" जैसे पद लिखे, जिनमें कृष्ण के प्रति उनकी गहन भक्ति और प्रेम व्यक्त किया गया है। वह कृष्ण को अपना पति मानती थीं और उनके साथ रासलीला की कल्पना करती थीं।
यह एक अत्यन्त शोधपूर्ण और महत्वपूर्ण आलेख है जो तमिल संस्कृति, साहित्य और इतिहास में भगवान कृष्ण (कन्नन) की गहरी जड़ों को रेखांकित करता है। इस दुर्लभ जानकारी को कृष्ण-भक्ति और महाबलिपुरम् के सन्दर्भ में भावपूर्ण और क्रमबद्ध तरीके से यहाँ सम्पादित किया गया है-
तमिल संस्कृति और साहित्य में भगवान कृष्ण: एक ऐतिहासिक यात्रा-
तमिलनाडु की पावन धरती पर कृष्ण भक्ति का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। संगम काल से लेकर आधुनिक काल तक, कृष्ण यहाँ की जनमानस और साहित्य के केंद्र में रहे हैं। उन्हें यहाँ प्रेम और श्रद्धा से 'कन्नन' या 'माल' (नील वर्ण वाले) कहा जाता है।
1. प्राचीन संगम साहित्य में कृष्ण (कन्नन)-
विश्व की सबसे प्राचीन जीवित शास्त्रीय भाषा 'तमिल' के शुरुआती ग्रंथों में कृष्ण के प्रति गहरा अनुराग मिलता है
- प्राचीन नाम: संस्कृत के 'कृष्ण' शब्द का प्राकृत और प्राचीन तमिल रूप 'कन्नन' संगम साहित्य में बहुतायत से मिलता है।
- मिथकों का अस्तित्व: अगनानुरु जैसे ग्रंथों में कृष्ण की लीलाओं, विशेषकर यमुना (तोलुनाई) के तट पर गोपिकाओं के साथ उनके प्रसंगों का वर्णन है। यह सिद्ध करता है कि कृष्ण की स्मृतियाँ प्राचीन यादव समुदायों द्वारा दक्षिण तक लाई गईं और सँजोई गईं।
- प्रतीक चिन्ह: तमिल कवियों ने कृष्ण के वाहनों और गरुड़ ध्वज का सूक्ष्म वर्णन किया है, जो उस काल के व्यापक धार्मिक ज्ञान को दर्शाता है।
2. तमिल महाकाव्यों और भक्ति का उत्कर्ष-
- शिलप्पादिकारम: इस महान महाकाव्य में न केवल कृष्ण, बल्कि उनके भ्राता बलराम (हल्लोन) की भी स्तुति की गई है।
- आण्डाल की अनन्य भक्ति: प्रसिद्ध वैष्णव सन्त कवयित्री आण्डाल ने तिरुप्पावै के माध्यम से कृष्ण को अपना पति स्वीकार किया। उनके पदों में रासलीला की जो आध्यात्मिक कल्पना है, वह तमिल भक्ति साहित्य का शिखर है।
ऐतिहासिक एवं भाषाई परिप्रेक्ष्य: तमिल और वडासोल-
साहित्यिक शोध यह स्पष्ट करता है कि तमिल एक स्वतंत्र और समृद्ध भाषा रही है:
- प्राचीनता: तमिल लिपि (तमिलज़ी) के साक्ष्य 690 ईसा पूर्व (सालुवांकुप्पम) और 350 ईसा पूर्व (कीलझाड़ी) से मिलते हैं।
- भाषाई शुद्धता: ऋषि अगस्त्य के अकथियम और थोलकाप्पियार के थोलकाप्पियम (300 ईसा पूर्व) में शब्दों को श्रेणियों में बांटा गया है। इसमें संस्कृत शब्दों को 'वडासोल' कहा गया।
- आंकड़े: शोध के अनुसार, 3.8 लाख तमिल शब्दों में से मात्र 1833 शब्द (0.5% से कम) ही बाहरी या वडासोल हैं। यह तमिल की मौलिकता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
महाबलिपुरम् (मामल्लपुरम): पत्थरों में उकेरी गई कृष्ण गाथा-
पल्लव राजाओं की यह प्राचीन राजधानी द्रविड़ वास्तुकला का साक्षात स्वर्ग है। यहाँ कृष्ण की लीलाओं को पत्थरों पर जीवंत किया गया है:
प्रमुख आकर्षण एवं कृष्ण संदर्भ:
- कृष्ण मण्डपम्: यह यहाँ के सबसे प्राचीन गुफा मंदिरों में से एक है। इसकी दीवारों पर ग्रामीण जीवन और गोवर्धन पर्वत को उंगली पर उठाए हुए कृष्ण का अत्यंत मनमोहक दृश्य उकेरा गया है।
- पाण्डव रथ: एकल चट्टानों को काटकर बनाए गए ये पाँच रथ महाभारत के नायक पांडवों और द्रौपदी को समर्पित हैं, जो कृष्ण के साथ उनके अटूट संबंध को दर्शाते हैं।
- तट मंदिर (Shore Temple): आठवीं शताब्दी का यह मंदिर भगवान विष्णु (शयन मुद्रा) और शिव को समर्पित है, जो समुद्र की लहरों के बीच पल्लव वैभव का गवाह है।
- वराह गुफा: यहाँ भगवान विष्णु के वराह और वामन अवतार की विस्तृत नक्काशी है।
साहित्यिक विश्लेषण: संगम कविता 'अकाम (59)' और कृष्ण
कवि मदुरै मारुतन इलानाकन द्वारा रचित अकाम (59) भारतीय साहित्य की एक दुर्लभ कड़ी है।
यमुना (तोलुनाई) तट का प्रसंग:-
इस कविता में कृष्ण (माल) का एक विशेष प्रसंग आता है, जहाँ वे यमुना में स्नान कर रही गोपिकाओं के वस्त्रों का संचय करते हैं। जब बलराम उस ओर आते हैं, तो कृष्ण गोपिकाओं की लज्जा की रक्षा हेतु 'कुरुंथा' (जंगली नींबू) के वृक्ष की डालियों को नीचे झुका देते हैं ताकि वे छिप सकें।
विशेषता: * डॉ. कामिल ज़्वेलेबिल और प्रोफेसर जॉर्ज एल. हार्ट के अनुसार, यह प्रसंग भागवत पुराण या विष्णु पुराण से भी पुराना हो सकता है।
- यह दर्शाता है कि उत्तर भारत के कृष्ण मिथक संगम काल तक तमिल काव्य परंपरा का अभिन्न अंग बन चुके थे और उन्हें तमिल परिवेश (जैसे पत्तों के वस्त्र भेंट करना) में ढाला गया था।
निष्कर्ष-
महाबलिपुरम् की चट्टानें और संगम साहित्य की पंक्तियाँ एक ही सत्य की घोषणा करती हैं—कृष्ण केवल उत्तर भारत के नहीं, बल्कि प्राचीन काल से ही तमिल हृदय के 'कन्नन' रहे हैं।
इस प्रकार से अध्याय (एक) का भाग (ख)- श्रीकृष्ण के ऐतिहासिक परिचय के साथ समाप्त हुआ। अब अगले अध्याय (दो) में गोप (यादव) की उत्पत्ति के बारे में बताया गया। उसे भी इस के साथ जोड़कर अवश्य पढ़ें।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें