बुधवार, 7 जून 2023

पुरूरवा के पशुपालक वंशज और अहीर जाति का आदिम श्रोत-

मत्कृते येऽत्र शापिता शावित्र्या ब्राह्मणा सुरा:।
तेषां अहं करिष्यामि शक्त्या  साधारणां स्वयम्।।७।।
"अनुवाद:-मेरे कारण ये ब्राह्मण और देवगण सावित्री के द्वारा शापित हुए हैं‌। उन सबको  मैं (गायत्री ) अपनी शक्ति से साधारणत: पूर्ववत् कर दुँगी।।७।।

किसी के द्वारा दिए गये शाप को समाप्त कर समान्य करना और समान्य को फिर वरदान में बदल देना अर्थात जो शापित थे उनको वरदान देना यह कार्य आभीर कन्या गायत्री के द्वारा ही सम्भव हो सका । 

अन्यथा कोई देवता  किसी अन्य  के द्वारा दिए गये शाप का शमन नहीं कर सकता है।

अपूज्योऽयं विधिः प्रोक्तस्तया मन्त्रपुरःसरः॥
सर्वेषामेव वर्णानां विप्रादीनां सुरोत्तमाः॥८।

"अनुवाद:-यह ब्रह्मा ( विधि) अपूज्य हो यह उस सावित्री के द्वारा कहा गया था परन्तु  विप्रादि वर्णों के  मन्त्र का  पुर:सर( अगुआ)  ब्रह्मा ही हैं।

अनुवाद:-सावित्री ने कहा कि किसी वर्ण का मनुष्य मन्त्र विधि से ब्रह्मा का पूजन कभी न करे।८।

ब्रह्मस्थानेषु सर्वेषु समये धरणीतले ॥
न ब्रह्मणा विना किंचित्कृत्यं सिद्धिमुपैष्यति ॥९॥
"अनुवाद:-फिर भी मैं गायत्री कहती हूँ। सम्पूर्ण पृथ्वी पर ब्रह्मा के बिना ब्राह्मण आदि वर्णों का कोई कार्य सिद्ध नहीं होगा।

कृष्णार्चने च यत्पुण्यं यत्पुण्यं लिंग पूजने॥
तत्फलं कोटिगुणितं सदा वै ब्रह्मदर्शनात्॥
भविष्यति न सन्देहो विशेषात्सर्वपर्वसु।१०।

"अनुवाद:-कृष्ण ( विष्णु) अर्चना और लिंगार्चना से जो पुण्य मिलता है। ब्रह्मा के दर्शन मात्र से उसका करोड़ों गुना फल मिलेगा। इसमें कोई सन्देह नहीं है। विशेष कर पर्वों पर तो दर्शन जनित अत्यधिक फल लाभ होगा।१०।

त्वं च विष्णो तया प्रोक्तो मर्त्यजन्म यदाऽप्स्यसि॥
तत्रापि परभृत्यत्वं परेषां ते भविष्यति ॥११॥
"अनुवाद:-हे विष्णु आपको जो उस सावित्री के द्वारा यह शाप दिया कि मृत्युलोक में जन्म लेकर अन्य के दास होंगे ।११।

तत्कृत्वा रूपद्वितयं तत्र जन्म त्वमाप्स्यसि ॥
यत्तया कथितो वंशो ममायं गोपसंज्ञितः ॥
"अनुवाद:- तो इस सम्बन्ध में आपको सावित्री द्वारा जो यह शाप दिया है उसका मैं निवारण करती हूँ। 

कि आपके दो रूप होंगे ! मुझ गायत्री को  सावित्री ने गोप कुल में उत्पन्न कहा है इस सन्दर्भ में मेरा यह कथन है। कि हे विष्णु आप भी  गोप कुल को पवित्र करने के लिए मेरे ही गोपकुल में जन्म लेंगे।८-१२।
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एकः कृष्णाभिधानस्तु द्वितीयोऽर्जुनसंज्ञितः॥
तस्यात्मनोऽर्जुनाख्यस्य सारथ्यं त्वं करिष्यसि॥१३॥
"अनुवाद:- तब पृथ्वी पर जन्म लेने वाले आपके एक शरीर का नाम कृष्ण तथा दूसरे शरीर का नाम अर्जुन होगा। अपने उस दूसरे अर्जुन शरीर के लिए तुम सारथि बनोगे।

विशेष :- अहीर अथवा गोप जाति प्राचीनतम है  मत्स्य पुराण में उर्वशी अप्सराओं की स्वामिनी तथा सौन्दर्य की अधिष्ठात्री देवी के रूप में वर्णित पद्मसेन आभीर की पुत्री है । जिसने कल्याणनी नामक कठोर व्रत का सम्पादन किया और जो अप्सराओं की स्वामिनी तथा सौन्दर्य की अधिष्ठात्री देवी बन गयी यही कल्याणनि व्रत का फल था।

उधर ऋग्वेद के दशम मण्डल ते 95 वें सूक्त की 18 ऋचाऐं " पुरूरवा और उर्वशी के संवाद रूप में है। जिसमें पुरूरवा के विशेषण गोष ( घोष- गोप) तथा गोपीथ- है। अत: पुरुरवा गो- पालक राजा है।
पुरुरवा के आयुष और आयुष के नहुष तथा नहुष के पुत्र ययाति हुए जो गायत्री माता के नित्य उपासक थे ।
 इसी लिए रूद्रयामल तन्त्र ग्रन्थ में तथा देवी भागवत पराण के  गायत्री सहस्र नाम में गायत्री माता को ' ययातिपूजनप्रिया" कहा गया है।

अत्रि, चन्द्रमा और बुध का सम्बन्ध प्राय: आकाशीय ग्रह, उपग्रह आदि नक्षत्रीय पिण्डों से सम्बन्धित होने से ऐतिहासिक धरातल पर प्रतिष्ठित नहीं होता है। परन्तु पुरुरवा और उर्वशी ऐतिहासिक पात्र हैं। दौनों ही नायक नायिका का वर्ण आभीर तथा गोष( घोष) रूप में गोपालक जाति के आदि प्रवर्तक के रूप में इतिहास की युगान्तकारी खोज है। इतिहास मैं दर्ज है कि आर्य पशु पालक थे ।जिन्होंने कालान्तरण में कृषि कार्य किए ।

अहीर अथवा गोप ही आज के किसान हैं।
जिसमें कुछ कबीला जाटों में समाहित हुए कुछ गुर्जरों में भी समाहित हुए है।
राजपूत भी एक जातीयों का संघ है। जिसका विकास बहुत बाद में भारत में ६०६ ई से ६४७ ईस्वी के समय से हुआ।   और चरम विकास १६ वीं सदी तक हुआ ।
सम्भवत: इनमें भी अहीरों जाटों और गुर्जरो से निकल कर कुछ शाखाएं आज समाहित हो गयीं है।

जैसे  अहीरों से निकले राजपूत जादौन, चुडासमा , और जड़ैजा भाटी आदि -  परन्तु ये राजपूत अब स्वयं को अहीरों से अलग मानने का राग आलाप रहे हैं। 

अहीर अथवा गोप शब्द कई उतार-चढ़ावों के बाद आज तक समाज में यदुवंश को समाहित किए हुए है। यदुवंश के मूल प्रवर्तक यदु एक गोप अथवा पशपालक  होकर भी  लोकतान्त्रिक राजा थे।
यद्यपि यदु के अन्य भाई जैसे तुर्वसु और पुरु को भी शास्त्र पशु पालक के रूप में वर्णित करते हैं।
भारतीय पौराणिक कथा-कोश लक्षीनारायण संहिता में कुरुक्षेत्र का वर्णन करते हुए पुरु के वंशज कुरु को पशु पालक कहा है ।
गायत्री द्वारा विष्णु को गोप रूप में दो शरीर ( कृष्ण और अर्जुन ) के रूप में उत्पन्न होने को कहना भी अर्जुन का गोपालक रूप है।

कौसललिया अहीर स्वयं को पाण्डु का वंशज मानते हैं। परन्तु शास्त्र तथा समाज में आभीर शब्द केवल यदुवंश के गोपों के ही लिए रूढ़ हो गया। 

अर्जुन को पञ्चनद प्रदेश ( पंजाब) में परास्त करने वाले नारायणी सेना से सम्बन्धित वृष्णि कुल के आभीर थे । जिन्हें नारायणी सेना के गोप कहा गया है।
यादवों के लिए ही आभीर शब्द रूढ़ हो गया दरअसल आभीर एक जाति है जिसमें यदु वंश पुरु वंश और तुर्वशु वंश भी समाहित थे।


इस स्थान पर हम यह सिद्ध करेंगे कि जाट "गूजर और अहीरों का रक्त सम्बन्ध अधिक सन्निकट है ।
यद्यपि गूजर और जाटों के कुछ कबीले सपना सम्बन्ध सूर्यवंश से भी जोड़ रहे हैं।
फिर भी इनमें स्वयं को यदुवंश से जोड़ने वाले कबीलों का जैनेटिक मिलान अहीरों से है।

तीनों ही जातियों में गोत्र भी बहुत से समान हैं। सबसे बड़ी बात इनका ( डी॰ एन॰ ए॰)-जीवित कोशिकाओं के गुणसूत्रों में पाए जाने वाले तन्तुनुमा अणु हैं जिनको( डी-ऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल) या डी॰ एन॰ ए॰ कहते हैं।
 इसमें अनुवांशिक कूट( कोड) निबद्ध रहता है। इसी लिए गूजर जाट और अहीरों की प्रवृत्ति समान होती है । 

परन्तु इतना ध्यान रखना चाहिए की अहीर जाति सबसे प्राचीनतम है। जब गुर्जर और जाट जैसे शब्द भी नहीं थे तब आभीर थे ।

 इस प्रसंग में संस्कृत के पौराणिक कथा-कोश लक्ष्मीनारायण संहिता से उद्धृत निम्नलिखित तथ्य विचारणीय हैं। 

कि जब ययाति यदु से उनकी युवावस्था का अधिग्रहण करने को कहते हैं
तब यदु उनके इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं।

"यदुं प्राह प्रदेहि मे यौवनं भुंक्ष्व राष्ट्रकम् ।७२।    
अनुवाद:-उन ययाति ने यदु से कहा :-कि मुझे यौवन दो और राष्ट्र का भोग करो ।

यदुः प्राह न शक्नोमि दातुं ते यौवनं नृप।
जराया हेतवः पञ्च चिन्ता वृद्धस्त्रियस्तथा ।७३।

कदन्नं नित्यमध्वा च शीतजाठरपीडनम्।
सा जरा रोचते मे न भोगकालो ह्ययं मम ।७४।

 "अनुवाद:-यदु ने कहा-: हे राजा, मैं अपनी जवानी तुम्हें नहीं दे सकता। शरीर के जरावस्था( जर्जर होने  के पांच कारण होते हैं  १-चिंता और २-वृद्ध महिलाएं ३-खराब खानपान (कदन्न )और ४-नित्य सुरापान करने से पेट में (५-शीतजाठर की पीडा)। मुझे ये जरा( बुढ़ापा) अच्छा नहीं लगता यह मेरा भोग करने का समय है ।७३-।७४।

श्रुत्वा राजा शशापैनं राज्यहीनः सवंशजः।
तेजोहीनः क्षत्रधर्मवर्जितः पशुपालकः ।७५।

"अनुवाद:-यह सुनकर राजा ने उसे श्राप दे दिया और उसने अपने वंशजो सहित राज्य को छोड़ दिया  वह यदु राजकीय तेज से हीन और राजकीय क्षत्र धर्म से रहित पशुपालन से जीवन निर्वाह करने लगा।७५।

भविष्यसि न सन्देहो याहि राज्याद् बहिर्मम।
इत्युक्त्वा च पुरुं प्राह शर्मिष्ठाबालकं नृपः।७६।

"अनुवाद:-तुम्हारे वंशज कभी राजतन्त्र की प्रणाली से राजा नहीं होंगे इसमें सन्देह नहीं हेै यदु! मेरे राज्य से बाहर  चले जाओ। इस प्रकार कहकर और राजा ने फिर पुरू से कहा शर्मिष्ठा के बालक पुरु तुम राजा बनोगे।७६।

देहि मे यौवनं पुत्र गृहाण त्वं जरां मम ।
कुरुः प्राह करिष्यामि भजनं श्रीहरेः सदा ।७७।

"अनुवाद:-पुत्र मुझे यौवन देकर तुम मेरा जरा( बुढ़ापा) ग्रहण करो पुरु ( कुरु वंश के जनक) ने कहा  मैं हरि का  सदैव भजन करूँगा।७७।

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कः पिता कोऽत्र वै माता सर्वे स्वार्थपरा भुवि।
न कांक्षे तव राज्यं वै न दास्ये यौवनं मम ।७८।

"अनुवाद:-कौन पिता है कौन माता है यहाँ सब स्वार्थ में रत हैं इस संसार में न मैं  अब तुम्हारे राज्य की इच्छा करता हूँ और ना ही अपने यौवन की ही इच्छा करता हूँ यह बात  पुरु ने अपने पिता ययाति से कही ।७८।

इत्युक्त्वा पितरं नत्वा हिमालयवनं ययौ।
तत्र तेपे तपश्चापि वैष्णवो धर्मभक्तिमान् ।७९।

"अनुवाद:- इस प्रकार कहकर पिता को नमन कर पुरु हिमालय के वन को चला गया और वहाँ तप किया और वैष्णव धर्म का अनुयायी बन भक्ति को प्राप्त किया।७९।

कृषिं चकार धर्मात्मा सप्तक्रोशमितक्षितेः ।
हलेन कर्षयामास महिषेण वृषेण च ।८०।

"अनुवाद:-उस धर्मात्मा ने पृथ्वी को सात कोश नाप कर वहाँ हल के द्वारा कृषि कार्य भैंसा और बैल के द्वारा भी  किया।८०। 

आतिथ्यं सर्वदा चक्रे नूत्नधान्यादिभिः सदा ।
विष्णुर्विप्रस्वरूपेण ययौ कुरोः कृषिं प्रति ।८१।

"अनुवाद:-:- नवीन धन धान्य से वह सब प्रकार से अतिथियों का सत्कार करता तभी एक बार विष्णु भगवान विप्र के रूप धारण कर कुरु के पास गये और उन्हें कृषि कार्य के लिए प्रेरित किया। ८१।

आतिथ्यं च गृहीत्वैव मोक्षपदं ददौ ततः ।      कुरुक्षेत्रं च तन्नाम्ना कृतं नारायणेन ह ।।८२।।

"अनुवाद:-तब भगवान् विष्णु ने  कुरु का आतिथ्य सत्कार ग्रहण कर उसे मोक्ष पद प्रदान किया उस क्षेत्र का नाम नारायण के द्वारा कुरुक्षेत्र कर दिया गया।८२।

कुरुक्षेत्र के समीपवर्ती लोग सदीयों से कृषि और पशुपालन कार्य करते चले आ रहे हैं। आज कल ये लोग जाट " गूजर और अहीरों के रूप में वर्तमान में भी इस कृषि और पशुपालन व्यवसाय से जुड़े हुए हैं।८२। 

""सन्दर्भ:-
श्रीलक्ष्मीनारायणीयसंहितायां तृतीये द्वापरसन्ताने ययातेः स्वर्गतः पृथिव्यामधिकभक्त्यादिलाभ इति तस्य पृथिव्यास्त्यागार्थमिन्द्रकृतबिन्दुमत्याः प्रदानं पुत्रतो यौवनप्रप्तिश्चान्ते वैकुण्ठगमन चेत्यादिभक्तिप्रभाववर्णननामा त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७३ ।।

जाट इतिहास के महान अध्येता
राम स्वरूपजून (झज्जर , हरियाणा के प्रतिष्ठित जाट इतिहासकार थे । वह जाटों के इतिहास नामक पुस्तक के लेखक हैं ।

उनका जन्म हरियाणा के झज्जर जिले के नूना मजरा गांव में हुआ था ।

राम सरूप जून लिखते हैं कि .... उन्होंने 1900 ईस्वी में अपना पाठ शुरू किया जब वह उस क्षेत्र में पढ़ने वाले पहले स्कूलों में एक दशक में थे।

राम स्वरूप जून जाटों का रक्त सम्बन्ध अहीरों से निश्चित करते हैं।
 वे लिखते हैं कि  आज के अहीर ययाति  की यदु शाखा के हैं । वे यदु के दूसरे पुत्र सत्जित के वंशज हैं जबकि सभी गोत्र,  अहीरों के जाटों में भी पाए जाते हैं । दूसरे शब्दों में जाट और अहीर बहुत निकट संबंधी हैं।
 उनके गोत्रों को मिलाकर, जाट गोत्रों की कुल संख्या बढ़कर 700 हो जाती है। उत्तर पश्चिमी अहीरों में केवल 97 गोत्र हैं जिनमें 20 प्रतिशत जाट गोत्र भी शामिल हैं ।

अलवरूनी ने तहकीके हिन्द में वसुदेव को पशुपालक जाट कहकर वर्णित किया है।

वर्तमान में जाट और गुर्जर संघ हैं जिनमें अनेक देशी विदेशी जातियों का समावेश है। जो स्वयं को सूर्य वंशी या चन्द्र वंशी लिखते कुछ स्वयं को अग्नि वंशी भी लिखते हैं।

 परन्तु अहीर आज भी अपने मूल रूप में विद्यमान हैं अहीरों के विषय में गोप रूप में यह वर्णन समीचीन ही है।

स्कन्दपुराण- (नागरखण्डः) के अध्यायः 193 में वर्णन है कि 

"यत्तया कथितो वंशो ममायं गोपसंज्ञितः॥
तत्र त्वं पावनार्थाय चिरं वृद्धिमवाप्स्यसि ॥१२॥

एकः कृष्णाभिधानस्तु द्वितीयोऽर्जुनसंज्ञितः॥
तस्यात्मनोऽर्जुनाख्यस्य सारथ्यं त्वं करिष्यसि॥१३॥

"तेनाकृत्येऽपि रक्तास्ते गोपा यास्यंति श्लाघ्यताम्॥
सर्वेषामेव लोकानां देवानां च विशेषतः ॥१४॥
"अनुवाद:-उनके द्वारा किए गये कार्यों में तुम्हारे रक्त सम्बन्धी सजातीय ये गोप प्रशंसा को प्राप्त करेंगे।१४।

यत्रयत्र च वत्स्यंति मद्वं शप्रभवानराः ॥
तत्रतत्र श्रियो वासो वनेऽपि प्रभविष्यति ॥१५॥
 
विशेषत :- सावित्री के शाप का निवारण करते हुए आभीर कन्या गायत्री ने कहा था।
सभी लोकों और देवों में भी 
जहाँ जहाँ मेरे वंश जाति के अहीर  लोग निवास करेंगे वहीं वहीं लक्ष्मी निवास करेगी चाहें वह स्थान जंगल ही क्यों न हो।१३-१४-१५।
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इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां षष्ठेनागरखण्डे हाटकेश्वरक्षेत्रमाहात्म्ये गायत्रीवरप्रदानोनाम त्रिनवत्युत्तरशततमोऽध्यायः।१थे।

मंगलवार, 6 जून 2023

पारसी के चार वर्ण-

मुझे अक्सर अलग-अलग धर्मों के ग्रंथों को पढ़ने की बहुत रुचि है। इसी कड़ी मे काफी दिनों से मेरी इच्छा पारसी धर्मग्रंथ "अवेस्ता" को पढ़ने की थी।
अवेस्ता एक प्रकार से लुप्त किताब है, क्योंकि पारसी धर्म भी दुनिया मे लगभग समाप्त ही हो गया है।
पारसी इस समय दुनिया की माइक्रो मॉइनोरिटी मानी जाती है, जो भारत के गुजरात और महाराष्ट्र मे अभी भी मिलते हैं।

अवेस्ता को खोजते हुये मुझे गुजराती लिपि की काफी प्राचीन किताब मिली, जो 1880 मे प्रकाशित हुई थी।

वैसे लगभग सभी को यह पता ही है कि पहले ईरान मे पारसीधर्म था, बाद मे मुसलमानों के अतिक्रमण ने पारसियों और उनके धर्म को कुचल दिया, तथा कुछ पारसी किसी तरह अपनी जान बचाकर भारत (गुजरात) आ गये।

खैर, अब आते हैं अवेस्ता पर...
अवेस्ता की लेखनशैली वेदों से इतनी मिलती है कि आप यदि एक बार अवेस्ता पढ़ो तो आपको भ्रम हो जायेगा कि आप ऋगवेद ही पढ़ रहे हो! अवेस्ता मे वेदों की तरह ऋचायें तो हैं ही साथ ही इन्द्र, चन्द्र और मित्र जैसे देवताओं के नाम भी हैं।

यही नही, अवेस्ता मे चातुष्यवर्ण व्यवस्था भी है जो ऋग्वेद के पुरुषसूक्त मे भी लिखी है।
अवेस्ता के एक अध्याय जिसे "आफरीन अषो जरथुस्त्र" कहते हैं, उसमे लिखा है कि अवेस्ता का ईश्वर (अहुर मज्द) जरथुस्त्र (पारसी धर्म के प्रवर्तक) से कहते हैं कि "हमारे दस पुत्र हुये! उनमे से तीन अर्थवान (अथर्वऋषि जैसे ज्ञानी अर्थात ब्राह्मण) तीन रथेस्टार (क्षत्रिय) तीन वास्त्रेय (व्यापारी अर्थात वैश्य) हुये, और दसवां पुत्र हुतोक्ष (कुशल कारीगर अर्थात शूद्र) हुआ।
हांलाकि पारसियों के ईश्वर अहुर मज्द ने दसवें पुत्र की बहुत प्रशंसा भी की है और कहा कि मेरा यह पुत्र चन्द्रमा जैसा प्रकाशवान, अग्नि जैसा चमकदार, इन्द्र की तरह शत्रुओं का दमन करने वाला और राम की तरह आदरणीय होगा।"

अवेस्था कि वर्णव्यवस्था ठीक वेदों जैसी ही है, बस वैदिक-वर्णव्यवस्था मे शूद्र को निम्न दिखाया गया है, जबकि अवेस्ता का ईश्वर शूद्र को ही सबसे अधिक प्रेम करता है।

अब यहाँ सवाल यह उठता है कि अवेस्ता वेदों से इतनी अधिक मिलती कैसे है?
क्या वेदों की नकल करके अवेस्ता बनी, या अवेस्ता की नकल करके वेद बने?
वैसे भी ज्योतिबा फुले ने बहुत पहले अपनी किताब "गुलामगीरी" मे यह दावा किया था कि आर्य ईरान से भारत आये थे, जबकि दयानन्द सरस्वती का मानना था कि आर्य भारत से दूसरे देश जैसे कि ईरान वगैरह मे गये।
सच जो भी हो, पर वैदिकधर्म और पारसीधर्म का कहीं न कहीं गहरा सम्बन्ध जरूर हैं!

आज के बामसेफी भी यही कहते हैं कि ईरान से आर्यों की तीन जातियाँ (अथर्वा, रथाइस्ट और वस्तारिया) भारत मे आये!
रामायण की भी माने तो राजा दशरथ की पत्नि कैकेयी ईरान की ही थी। वही पुरातन शोधकर्ताओं की माने तो ब्रह्मा भी ईरान के एक प्रदेश (प्राचीन सुषानगर) के थे।

वैसे सच चाहे जो भी हो, पर भारतीय आर्यो और ईरानी आर्यों का गहरा सम्बन्ध जरूर है। अवेस्ता मे तो ईरान का प्राचीन नाम "अइर यान वेज" अर्थात "आर्यों का देश" बताया भी गया है।

राम का वनवास


दशहरे के दिन (अश्विन महीने के शुक्लपक्ष की दशमी) राम ने रावण को नही मारा था! अर्थात यह तो सरासर झूठ है कि विजयदशमी इसलिये मनायी जाती है क्योंकि इसी दिन रावण मारा गया था।
 रामायण के अनुसार राम को चैत्रमास (अयोध्याकाण्ड सर्ग-3, श्लोक-4, ) मे वनवास जाना पड़ा था।
चैत्रः श्रीमानयं मासः पुण्यः पुष्पितकाननः।
यौवराज्याय रामस्य सर्वमेवोपकल्प्यताम्॥ ४॥


क्योंकि इसी महीने मे दशरथ उनको राजा बनाने वाले थे, पर एक नाटकीय घटनाक्रम से उन्हे अगले ही दिन वन मे जाना पड़ गया। अब यदि राम वन चैत्रमास मे गये तो चौदह साल बाद वे चैत्रमास मे ही वापस अयोध्या आ सकते थे।

क्योंकि कैकेयी को दिये वचनानुसार उससे पहले उनका अयोध्या आना सम्भव ही नही था। अब इस तरह से तो कार्तिक मास मे जो दिपावली मनायी जाती है, वह भी राम के आगमन की वजह से सम्भव नही है, क्योंकि वनवास की अवधि से पाँच महीने पहले राम अयोध्या कैसे आ सकते हैंरामायण मे केवल इतना ही प्रमाण है कि राम चैत्रमास मे वन गये थे, पर वे वापस किस महीने मे आये इसका कोई वर्णन नही है। रामायण मे इतना जरूर लिखा है कि वे चौदह साल व्यतीत करने के बाद ही वापस आये थे, उससे पहले नही।
रामायण युद्धकाण्ड अध्याय-124/1 ) 

के अनुसार राम चौदह वर्ष बाद पंचमी तिथि को भारद्वाज के आश्रम और उसके अगले दिन छठीं तिथि को अयोध्या आये थे। हालाकि वे कौन से महीने मे आये यह तो नही लिखा है, पर इतना स्पष्ट है कि वे अमावश्या के दिन तो नही आये थे, जिस दिन दिपावली मनायी जाती है।

खैर, अब बात करते हैं दशहरे की! रामायण से एक बात तो साफ हो जाती है कि यदि राम चौदह साल बाद अर्थात चैत्र/वैशाख महीने मे वापस अयोध्या आये थे तो यह सम्भव ही नही है कि उन्होने रावण का वध अश्विन (क्वार) महीने मे किया होगा, क्योंकि युद्धकाण्ड मे साफ लिखा है कि रावण को मारने के तुरन्त बाद ही राम का वनवास खत्म हो चुका था, अतः शीघ्रता से आने के लिये उन्होने पुष्पक विमान का सहारा लिया था।
 वैसे उपरोक्त बातें केवल तर्क है कि राम ने दशहरे के दिन रावण का वध नही किया था, पर इसके अलावा एक मजबूत प्रमाण भी है।
पद्मपुराण को रामायण का अखिलभाग ही माना जाता है! पद्मपुराण मे रामायण की घटनाओं को बहुत आसान और तिथि/महीने के साथ लिखा गया है।

इसी पद्मपुराण पातालखण्ड अध्याय-117,  मे बहुत स्पष्ट लिखा है कि राम वन किस महीने मे गये? 
सूत उवाच-
एतां श्रुत्वा कथां रामः प्रहृष्टो मुनिभिर्वृतः ५९।
भारद्वाजं नमस्कृत्य प्रयाणाज्ञामयाचत ६०।
अथो भरद्वाजमुनिः प्रसन्नः शंभुं वसिष्ठं मुनिपुंगवं च ।
नारायणं चर्षिगणांश्च नत्वा व्यसर्जयत्तेऽपि ययुः प्रणम्य ६१।
नैमिषीया ऊचुः -
गत्वायोध्यां महातेजाः समस्तमुनिसंयुतः ।
किं चकार ततो रामः स च शंभुर्महायशाः ६२।
सूत उवाच-
कौसल्या मासिकश्राद्धमपरेऽहनि राघवः ।
चिकीर्षुर्द्विजप्रवरानृषिकल्पान्न्यमंत्रयत् ६३।
शंभुं समस्तत्त्वज्ञं नारदं रोमशं भृगुम् ।
विश्वामित्रमथो राम एकभक्तव्रती ततः ६४।
भूमौ सुखास्तृतायां च सुष्वापा व्याकुलेंद्रियः ।
परेद्युरथ संप्राप्ते प्रातःस्नात्वा विधानवित् ६५।
अन्नं शाकादिकं शुद्धं जनैरेवान्वकारयत् ।
नानान्नानि विचित्राणि चोष्याद्यानि तथैव च ६६।


सीता हरण कब हुआ? 
राम-रावण युद्ध कब शुरू हुआ?
रावण वध कब हुआ और राम अयोध्या वापस कब आये?
पद्मपुराण के अनुसार राम ने रावण से चैत्र शुक्लपक्ष की द्वादशी से लेकर कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तक लगातार अठारह दिन युद्ध किया और फिर अठारहवें दिन कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को ही रावण का वध किया।
  अर्थात राम ने चैत्रमास कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के दिन रावण को मारा था, फिर अश्विन महीने की शुक्लपक्ष की दशमी को "विजयदशमी" क्यों मनायी जाती है?
              अब सवाल यह है कि क्या सचमुच इसी दिन पुष्यमित्र शुंग ने वृहद्रथ की हत्या की थी, और अपनी इस खुशी को पड़े-पुरोहित रावणवध के रूप मे मनाते हैं?
या यह मान लिया जाये कि पुष्यमित्र शुंग ही राम थे, और वृहद्रथ ही रावण, क्योंकि रामायण वाला रावण तो इस दिन नही मरा था?

              दूसरी बात इसी पद्मपुराण मे यह भी लिखा है कि राम वैशाख शुक्लपक्ष की षष्ठी-तिथि को अयोध्या वापस आये थे, तो फिर कार्तिकमास के कृष्णपक्ष की अमावश्या को दिपावली क्यों मनायी जाती है?

         ऐसे बहुत से सवाल हैं, जिनका जवाब अब शायद पड़े-पुरोहितों के पास भी नही हैं, या तो अब वे इसका जवाब देना भी नही चाहते। पर आप जरूर सवाल करते रहो कि आखिर विजयदशमी क्यों और किसकी विजय पर मनायी जाती है।

शनिवार, 3 जून 2023

-नास्तिक की गति और मति-



नास्तिक व्यक्ति आत्म चिन्तन से विमुख तथा मन की स्वाभाविक वासनामूलक वृत्तियों की लहरों में उछलता -डूबता हुआ  कभी भी शान्ति को प्राप्त नहीं होता और जो शान्ति से रहित व्यक्ति   सुखी अथवा आनन्दित कैसे रह सकता है ? आनन्द रहित व्यक्ति नीरस और निराशाओं में जीवन में सदैव अतृप्त ही रह जीवन बिता देता है।

दर-असल नास्तिकता जन्म - जन्मान्तरों के सञ्चित अहंकार का घनीभूत रूप है। 

जिसकी गिरफ्त हुआ व्यक्ति कभी भी सत्य का दर्शन नहीं कर सकता यही अहंकार अन्त:करण की मलीनता( गन्दिगी) के लिए उत्तरदायी है।

अन्त:करण ( मन ,बुद्धि, चित्त ,और स्वत्वबोधकसत्ता का समष्टि रूप ) के शुद्ध होने पर ही सत्य का दर्शन होता है।

और इस  अहंकार का निरोध ही तो भक्ति है।
अहंकार व्यक्ति को सीमित और संकुचित दायरे में कैद कर देता है ।

वह भक्ति जिसमें सत्य को जानकर उसके अनुरूप सम्पूर्ण जीवन के कर्म उस परम शक्ति के प्रति समर्पित करना होता है। जो जन्म और मृत्यु के द्वन्द्व से परे होते हुए भी इन रूपों को अपने लीला हेतु अवलम्बित करता है। वह अनन्त और सनातन है।

मानवीय बुद्धि उसका एक अनुमान तो कर सकती है परन्तु अन्य पात्रता हीन व्यक्तियों के सामने व्याख्यान नहीं कर सकती हैं।


संसार में कर्म इच्छओं  से कभी रहित नहीं होता है 


कर्म में इच्छा और इच्छाओं के मूल में संकल्प और संकल्प अहंकार का विकार -है।

भक्ति में कर्म फल को भक्त ईश्वर के प्रति समर्पित कर देता है अत: ईश्वर स्वयं प्रेरणात्मक रूप से उसका मार्गदर्शन करता है ।

जब एक बार किसी के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो जाय तो जनसाधारण उनकी गलत बातों को भी सही मानते हैं। धर्म के क्षेत्र में यही सिद्धान्त लागू है।
क्योंकि श्रद्धा तर्क विचार और विश्लेषण के द्वार बन्द कर देती है।

जब जब व्यक्ति अपनी प्राप्तव्य वस्तु के अनुरूप योग्यता अर्जित कर लेता है वह वस्तु उसे प्राप्त हो के ही रहती है।
देर भले ही हो जाय !

प्रस्तुति करण :- यादव योगेश कुमार रोहि -

आपके द्वारा प्रस्तुत विचार अत्यंत गहन और दार्शनिक हैं। इसमें नास्तिकता, अहंकार, अंतःकरण की शुद्धि और भक्ति के मनोविज्ञान का सुंदर चित्रण किया गया है।

​इन भावों को अभिव्यक्त करने के लिए मैंने 'अनुष्टुप' छन्द का चयन किया है, जो संस्कृत वास्तमय में सबसे सरल और प्रभावशाली माना जाता है।

संस्कृत पद्य (छन्दबद्ध रूप)

नास्तिको नैव शान्तिं च लभते वासनावृतः।अशान्तस्य कुतः सौख्यं ह्यतृप्तो दुःखितो भवेत्।। 1 ।।

अहंकारमयी वृत्तिर्नास्तिकता दृढरूपिणी।मलिने चान्तःकरणे सत्यं नैव प्रकाशते।। 2 ।।

चित्तशुद्धिर्भवेत्सत्यं भक्तिस्त्वहंनिबोधनम्।परिच्छिन्नो ह्यहंकारः संकोचयति मानवम्।।3।।

समर्प्य सर्वकर्माणि तस्मै नित्याय भक्तितः।ईश्वरो मार्गदर्शकः फलत्यागे हि जायते।। 4 ।।

श्रद्धा तर्कं निरुद्धयेत विचारं नापेक्षते।योग्यतायां च लब्धायां प्राप्यं प्राप्नोति मानवः।। 5 ।।

व्याकरण सहित हिन्दी अनुवाद-

प्रथम श्लोक:

  • अनुवाद: वासनाओं से घिरा हुआ नास्तिक व्यक्ति कभी शांति प्राप्त नहीं करता। शांति रहित व्यक्ति को सुख कहाँ ? वह अतृप्त होकर दुखी ही रहता है।
  • व्याकरण: * नास्तिकः: नास्ति इति मतिर्यस्य सः (बहुव्रीहि समास)।
    • लभते: 'लभ्' धातु, लट् लकार, आत्मनेपद।
    • अशान्तस्य: न शान्तः (नञ् तत्पुरुष), षष्ठी विभक्ति।

द्वितीय श्लोक:

  • अनुवाद: नास्तिकता जन्म-जन्मान्तर के संचित अहंकार का ही घनीभूत रूप है। मलिन अन्तःकरण में सत्य का दर्शन कभी नहीं होता।
  • व्याकरण:
    • मलिने: सप्तमी विभक्ति (विशेषण)।
    • अन्तःकरणे: मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार का समूह।
    • प्रकाशते: 'प्रकाश' धातु, लट् लकार।

तृतीय श्लोक:

  • अनुवाद: अन्तःकरण की शुद्धि से ही सत्य का दर्शन होता है। अहंकार का निरोध (रोकना) ही भक्ति है। अहंकार मनुष्य को सीमित दायरे में कैद कर देता है।
  • व्याकरण:
    • चित्तशुद्धिः: चित्तस्य शुद्धिः (षष्ठी तत्पुरुष)।
    • संकोचयति: 'कुच्' धातु, णिच् प्रत्यय (प्रेरणार्थक)।

चतुर्थ श्लोक:

  • अनुवाद: अपने समस्त कर्मों को उस सनातन परमेश्वर को समर्पित कर देने पर, और फल का त्याग करने पर, ईश्वर स्वयं मार्गदर्शक बन जाता है।
  • व्याकरण:
    • समर्प्य: सम् + ऋ + ल्यप् प्रत्यय।
    • नित्याय: चतुर्थी विभक्ति (सम्प्रदान)।

पञ्चम श्लोक:

  • अनुवाद: श्रद्धा तर्क और विश्लेषण के द्वारों को बन्द कर देती है। अन्ततः, जब व्यक्ति पात्रता (योग्यता) अर्जित कर लेता है, तो उसे अभीष्ट वस्तु निश्चित ही प्राप्त होती है।
  • व्याकरण:
    • निरुद्धयेत: 'रुध्' धातु, विधिभक्ति (सम्भावना)।
    • लब्धायां: 'लभ्' + क्त प्रत्यय, स्त्रीलिंग सप्तमी।

विशेष टिप्पणी:

​आपने सही कहा है कि "श्रद्धा तर्क के द्वार बंद कर देती है।" संस्कृत में इसके लिए कहा गया है— 'श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्'। जहाँ तर्क समाप्त होता है, वहीं से आध्यात्मिक अनुभव का प्रारम्भ होता है। अहंकार का विसर्जन ही वास्तव में सत्य की उपलब्धि है।




यह बहुत ही गहरा और विचारोत्तेजक विचार है। आपने अहंकार, नास्तिकता और मानसिक अशांति के बीच के अंतर्संबंध को बहुत ही सटीक रूप से रेखांकित किया है।

​यहाँ आपके गद्य की व्याख्या और उसका संस्कृत छन्द में रूपांतरण प्रस्तुत है:

​गद्य की व्याख्या (Explanation)

​यह गद्य मानव मनोविज्ञान और आध्यात्मिक पतन की एक श्रृंखला को दर्शाता है:

  1. अहंकार और नास्तिकता: जब व्यक्ति के भीतर 'मैं' (अहंकार) प्रबल हो जाता है, तो वह स्वयं को ही सर्वोपरि मानने लगता है। इस स्थिति में वह किसी ईश्वरीय सत्ता या उच्चतर सत्य को स्वीकार नहीं कर पाता, जो उसे नास्तिकता की ओर ले जाता है।
  2. शान्ति और आनन्द का अभाव: नास्तिक व्यक्ति केवल भौतिक जगत को सत्य मानता है। चूँकि भौतिक वस्तुएँ नश्वर हैं, इसलिए उसे कभी स्थायी शान्ति या आत्मिक आनन्द की प्राप्ति नहीं होती।
  3. मरुस्थल जैसी स्थिति: जैसे मरुस्थल में हरियाली नहीं होती, वैसे ही अहंकारी का जीवन प्रेम और करुणा से रहित होकर नीरस हो जाता है।
  4. लोभ और पागलपन: आन्तरिक रिक्तता को भरने के लिए वह लोभ और लालच के चक्रव्यूह में फँस जाता है, जो अंततः उसे मानसिक विक्षिप्तता या अशांति की ओर धकेल देता है।

​संस्कृत छन्द रूपांतरण (Verse in Sanskrit)

​मैंने आपके भावों को अनुष्टुप छन्द (जो कि गीता का मुख्य छन्द है) में पद्यबद्ध किया है:

अहङ्कारप्रभावेण नास्तिको जायते नरः।

न शान्तिं न च विन्दति स आनन्दं कदाचन॥ १॥

मरुस्थलमिवासारं लोभग्रस्तेन चेतसा।

उन्मत्तः स भ्रमत्येव पाहि नः कृष्ण दुष्पथात्॥ २॥

​व्याकरण एवं शब्दार्थ (Grammar & Meaning)

​प्रथम श्लोक:

  • अहङ्कारप्रभावेण: (अहंकार के प्रभाव से) - अहंकार + प्रभावेण (तृतीया विभक्ति, एकवचन)।
  • नास्तिको जायते नरः: (मनुष्य नास्तिक हो जाता है) - 'जन' धातु, लट् लकार।
  • न शान्तिं न च विन्दति: (न शान्ति प्राप्त करता है और न ही...) - 'विद्' (लाभ) धातु, लट् लकार।
  • स आनन्दं कदाचन: (वह आनन्द को कभी भी [प्राप्त नहीं करता])।

​द्वितीय श्लोक:

  • मरुस्थलमिवासारं: (मरुस्थल की तरह सारहीन/नीरस) - मरुस्थलम् + इव + आसारम्।
  • लोभग्रस्तेन चेतसा: (लोभ से ग्रस्त चित्त/मन के द्वारा) - 'चेतस्' शब्द, तृतीया विभक्ति।
  • उन्मत्तः स भ्रमत्येव: (वह पागल होकर भटकता ही रहता है) - 'भ्रम्' धातु (भ्रमण करना)।
  • पाहि नः कृष्ण दुष्पथात्: (हे कृष्ण! हमें कुमार्ग/बुरी प्रवृत्तियों से बचाएँ) - 'पा' (रक्षणे) धातु, लोट् लकार (आज्ञा/प्रार्थना)। 'दुष्पथात्' में अपादान कारक (पञ्चमी विभक्ति) है।

निष्कर्ष: आपकी प्रार्थना "पाहि नः कृष्ण दुष्पथात्" (हे कृष्ण, हमें बुरे मार्ग से बचाओ) वास्तव में शरणागति का भाव है, जो अहंकार को नष्ट करने की पहली सीढ़ी है।


"अहंकार की अधिकता व्यक्ति को नास्तिक बना देती है। अर्थात जन्मजन्मातरों का सञ्चित अहंकार नास्तिकता में बदल जाता है  और नास्तिक  व्यक्ति न तो शान्ति प्राप्त करता है। और नही आनन्द   वह मरुस्थल की तरह नीरस होकर लोभ लालच और भौतिक चिन्ताओं के आगोश में आकर पागल हो जाता है। अत: हे प्रभु कृष्ण हम्हे  इस प्रकार की  दुष्प्रवृत्तीयों से बचाऐं !



शुक्रवार, 2 जून 2023

धर्म विश्लेषण-




बिना साधना के साधु और बिना शान्ति  के  सन्त बने हुए जो मण्डलेश्वर या धर्माचार्य हैं।
वे  वैसे ही प्रतीत होते हैं  जैसे  नकल करके कोई बिना योग्यता वाला व्यक्ति  डिग्री लेकर डिग्रीधारी हो जाता है।
यही धर्म की आड़ में समाज में यही लोग कभी मन्दिर निर्माण तो कभी कथा भगवत वक्ता तो कभी लोगों की पर्ची निकलकर समस्या का समाधान करने की बात करके केवल धनोपार्जन और भोग विलास का भौतिक इन्द्रियों जन्य सुख भोगते हैं।
जन साधारण इन्हीं छुपे रुस्तमों को पहचान नहीं पाता और इनके चाल और छल भरे
कारनामों को चमत्कार समझकर समर्पित हो जाता है।   
नास्तिक व्यक्ति इन पाखण्डियों को ही धर्माचार्य जानकर धर्म और की आलोचना करते रहते है।
दर असल नास्तिकता मलीन चरित्र से प्रभावित मन की अवधारणा है।

दर असल आज धर्म का स्वरूप पूर्ण परिवर्तित है आज का धर्म धर्म है  नहीं हैं और उसी वर्तमान रूप देख रहे व्यक्ति धर्म के प्रति भौतिक दृष्टिकोण रखता  है।
अत: नास्तिक अभी किनारे पर ही है जिसने दूसरे किनारे पर पहुँचने के लिए कोई प्रयास ही नहीं क्या है। और पाखण्डी ढ़ोंगी बीच में या मझधार में उछलते डूबते हुए के समान हैं। और जो दूसरी पार( किनारे पर पहुँच गया है वही पारंगत- व्यक्ति है।
आप कभी व्यक्तिगत रूप से गहराई में उतरे नहीं और बात करते हों समुद्र की गहराई को नाम न  की ! वस्तुत: धर्म 
सार्वजनिक न होकर व्यक्तिगत जीवन की एक साधना है जो साधना में सहायक हैं वे साधन और  साध्य है मन की शुद्धता मन शुद्ध होने पर ही ईश्वरीय ज्ञान का परावर्तन स्वत: ही चित्त पर होने लगता है। चित्त एक दर्पण है जिस पर कई जन्मों से वासना और अहंकार कालिख पिता हुई है‌।
मन के शुद्धिकरण का कारण धर्म है धर्म नें नियम- संयम और सदाचरण का समावेश है। व्रत भी सदाचरण का क्लिष्ट वर्जन है। 

परन्तु आज धर्म को धन्धा बनाया गया है। आज धर्म को बहुतायत चालाक लोगों ने अपने स्वार्थ की सिद्धि का साधन बनाया है 

आज धर्म की आड़ में व्यभिचार है अनाचार भी है। और भगवा पापों काले कारनामों को छुपाने का लबादा इससे ज्यादा कुछ नहीं 
वैसे प्रत्येक व्यावसायिक वर्ग या कम्पनी का अपना एक गणवेष या ड्रेस तो होती होती ही है।
जिससे उस व्यक्ति के व्यवसाय और कम्पनी की पहचान हो जाय - धर्म के क्षेत्र में भी यह नियम लागू है। परन्तु इस नियम की आड़ में खेल भी खूब हुआ है। अधिकतर लोग अपने पापों और गुनाहों को छुपाने के लिए भग वा धरी
 बन गये परन्तु सभी धार्मिक व्यक्ति भी भग वा धरी  होते हुए भी व्यभिचारी या अनाचारी नहीं  हैं।
यह भी सत्य का एक पक्ष है मान्यवर !धर्म एक व्यक्तिगत साधना है एकल साधना है सामाहुहिक या चौपाल की साधना तो कभी नहीं है।
दान दीन को दिया गया वह धन है जिसके दाता का कोई प्रचार न हो।

आज पाखण्ड और धर्म के विकृत रूप को देकर अशुद्ध अन्त करण वाले व्यक्ति नास्तिक और घोर निराशा वादी होते चले जा रहे हैं।

नास्तिक व्यक्ति आत्म चिन्तन से विमुख तथा मन की स्वाभाविक वासनामूलक वृत्तियों की लहरों में उछलता -डूबता हुआ  कभी भी शान्ति को प्राप्त नहीं होता और जो शान्ति से रहित व्यक्ति   सुखी अथवा आनन्दित कैसे रह सकता है ? आनन्द रहित व्यक्ति नीरस और निराशाओं में जीवन में सदैव अतृप्त ही रह जीवन बिता देता है।

दर-असल नास्तिकता जन्म - जन्मान्तरों के सञ्चित अहंकार का घनीभूत रूप है। 

जिसकी गिरफ्त हुआ व्यक्ति कभी भी सत्य का दर्शन नहीं कर सकता यही अहंकार अन्त:करण की मलीनता( गन्दिगी) के लिए उत्तरदायी है।

अन्त:करण ( मन ,बुद्धि, चित्त ,और स्वत्वबोधकसत्ता का समष्टि रूप ) के शुद्ध होने पर ही सत्य का दर्शन होता है।

और इस  अहंकार का निरोध ही तो भक्ति है।
अहंकार व्यक्ति को सीमित और संकुचित दायरे में कैद कर देता है ।

वह भक्ति जिसमें सत्य को जानकर उसके अनुरूप सम्पूर्ण जीवन के कर्म उस परम शक्ति के प्रति समर्पित करना होता है। जो जन्म और मृत्यु के द्वन्द्व से परे होते हुए भी इन रूपों को अपने लीला हेतु अवलम्बित करता है। वह अनन्त और सनातन है।

मानवीय बुद्धि उसका एक अनुमान तो कर सकती है परन्तु अन्य पात्रता हीन व्यक्तियों के सामने व्याख्यान नहीं कर सकती हैं।
संसार में कर्म इच्छओं  से कभी रहित नहीं होता है। 
कर्म में इच्छा और इच्छाओं के मूल में संकल्प और संकल्प अहंकार का विकार -है।
भक्ति में कर्म फल को भक्त ईश्वर के प्रति समर्पित कर देता है अत: ईश्वर स्वयं प्रेरणात्मक रूप से उसका मार्गदर्शन करता है ।



नास्तिक व्यक्ति आत्म चिन्तन से विमुख तथा मन की स्वाभाविक वासनामूलक वृत्तियों की लहरों में निरन्तर उच्छलता -डूबता हुआ  कभी भी शान्ति को प्राप्त नहीं होता है। 
और जो शान्ति से रहित व्यक्ति है  वह  कभी सुखी अथवा आनन्दित कैसे रह सकता है ?

दर- असल नास्तिकता व्यक्ति के  जन्म - जन्मान्तरों के सञ्चित अहंकार का घनीभूत रूप है। जिसकी गिरफ्त में  हुआ व्यक्ति कभी भी सत्य का दर्शन नहीं कर सकता यही अहंकार उसके अन्त:करण की गन्दिगी के लिए उत्तरदायी है।

अन्त:करण ( मन, बुद्धि, चित्त और स्वत्वबोधकसत्ता का समष्टि रूप (स्व:) के शुद्ध होने पर ही सत्य का दर्शन होता है।
यद्यपि अन्त:करण शुद्धि अहंकार के रहते नहीं होता आवश्यक है। 

और इस  अहंकार का निरोध ही तो भक्ति है।
वह भक्ति जिसमें सत्य को जानकर उसके अनुरूप सम्पूर्ण जीवन के कर्म उस परम शक्ति के प्रति समर्पित करना होता है जो जन्म और मृत्यु के द्वन्द्व से परे होते हुए भी इन रूपों को अपने लीला हेतु अवलम्बत करता है।
कर्म जीवन के अस्तित्व का आधार है।
कर्म में इच्छाऐं  और इच्छाओं के मूल में संकल्प है। और संकल्प अहंकार का विकार -है। अर्थात् बिना अहंकार के संयोग के कभी कोई संकल्प कर ही नहीं सकता है।

अहंकार का विरोध भक्ति ने किया है।
भक्ति में कर्म फल को भक्त ईश्वर के प्रति समर्पित कर देता है  अत: ईश्वर स्वयं प्रेरणात्मक रूप से उसका मार्गदर्शन करता है।

वर्तमान मिथकीय कथाऐं प्रागैतिहासिक कालीन हैं प्रतिबिम्ब है विष्णु इन्द्र अथवा अन्य देवी देवताओं का क्या चरित्र और चित्र था यह अज्ञात होते हुए भी अस्तित्व हीन तो नहीं है।
हाँ इतना अवश्य है कि व्यक्तियों ने इन देवी देवताओं का चरित्र अपनी मनोवृत्ति और अपने समय के समाज की गतिविधियों को दृष्टिगत करके रचा अत: ये मिथक मिथ्या होते हुए भी अस्तित्व हीन नहीं हैं।

कृष्ण को भी बलात्कारी बनाने के लिए कुछ इन्द्रोपासक अथवा कृष्ण द्रोही पुरोहितों ने अनेक आख्यान रच डाले हैं। यद्यपि कुछ पुरोहित भारत देश में ऐसे भी हुए की जिन्होंने सत्य नियम सयम  और दिखाबा या पाखण्ड का पुरजोर विरोध किया। यही लोग कृष्ण महावीर और बुद्ध के विचारों के समर्थक थे।

विष्णु सुमेरियन अर्द्ध नर मत्स्याकार देव था जिसे सुमेरियन में विक्सनु तथा सैमेटिक में दैवन कहा परन्तु भारती मिथकों में आते आते  चरित्र में भेद कर दिया। यह भेद सामाजिक प्रवृति और लाकाचारों के अनुरूप होता है।

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प्रस्तुति करण :- यादव योगेश कुमार रोहि -


गुरुवार, 1 जून 2023

सामवेद की मनुस्मृति कार ने ध्वनि अपवित्र बताकर की कृष्ण की अवहेलना -

जब कृष्ण ने सामवेद को अपनी विभूति बताया तो मनुस्मृति कार ने क्यों  सामवेद की ध्वनि को अपवित्र बता दिया। यह कैसा विरोधाभास शास्त्रों में निश्चित ही यह विरोधाभास कालान्तर में शास्त्रों में उनके पूर्ण रूप से पढ़े बिना जोड़े गये सिद्धान्त हीन श्लोकों के परिणाम स्वरूप भी हुआ।

"वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासव: । इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ।२२।
श्रीमद्भगवद्गीता के १०वें अध्याय के २२वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए कहते हैं-'मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इन्द्र हूँ, इन्द्रियों में मन हूँ और प्राणियों की चेतना अर्थात् जीवनी शक्ति हूँ ।

ऋग्वेदो देवदैवत्यो यजुर्वेदस्तु मानुषः ।
सामवेदः स्मृतः पित्र्यस्तस्मात्तस्याशुचिर्ध्वनिः । ४.१२४ ।
ऋग्वेद देवताओं से सम्बन्धित है तो यजुर्वेद यज्ञ से सम्बन्धित है जिस यज्ञ को द्वारा देवताओं को प्रसन्न किया जाता है।अत: यजुर्वेद भी परोक्ष रूप से देव विषयक वेद है। 

मनुस्मृति कार ने स्पष्ट शब्दों में सामवेद को पितरों से सम्बन्धित बताया जबकि साम वेद संगीत का वेद है और संगीत नाद ब्रह्म की प्रत्यक्ष उपासना और सृष्टि की आदिम विद्या है।
नवजात शिशु का प्रारम्भिक रुदन स्वरों का आलाप मयी प्रवाह है।

जबकि ऋग्वेद में भी पितरों से सम्बंधित ऋचाऐं हैं।देवता: यमः ऋषि: यमः छन्द: निचृत्त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

य॒मो नो॑ गा॒तुं प्र॑थ॒मो वि॑वेद॒ नैषा गव्यू॑ति॒रप॑भर्त॒वा उ॑ । यत्रा॑ न॒: पूर्वे॑ पि॒तर॑: परे॒युरे॒ना ज॑ज्ञा॒नाः प॒थ्या॒३॒॑ अनु॒ स्वाः ॥

ऋग्वेद / मण्डल:10/ सूक्त:14/ ऋचा 2  
पदों का अर्थ विश्लेषण:- (यमः नः गातुं प्रथमः विवेद) यम राज ने  हमारी शरीर को प्रथम से ही प्राप्त किया हुआ है, अत एव (एषा गव्यूतिः-न-अपभर्तवा-उ) यह मार्ग किसी तरह त्यागा नहीं जा सकता (यत्रा नः पूर्वे पितरः परेयुः) जिस मार्ग में हमसे पूर्व उत्पन्न जनक आदि पालक जन भी कुल परम्परा से यात्रा करते चले आये हैं और (एना जज्ञानाः स्वाः पथ्या-अनु) इसी मार्ग से उत्पन्न हुए सभी प्राणी और वनस्पति आदि पदार्थ निज मार्गो  का अनुगमन करते हैं, ॥२॥



सामवेद गीत-संगीत प्रधान है। प्राचीन आर्यों द्वारा साम-गान किया जाता था। सामवेद चारों वेदों में आकार की दृष्टि से सबसे छोटा है और इसके १८७५ मन्त्रों मे से ९९ को छोड़ कर सभी ऋगवेद के हैं। केवल १७ मन्त्र अथर्ववेद और यजुर्वेद के पाये जाते हैं। फ़िर भी इसकी प्रतिष्ठा सर्वाधिक है, जिसका एक कारण गीता में कृष्ण द्वारा वेदानां सामवेदोऽस्मि कहना भी है।

सामवेद का महत्व इसी से पता चलता है कि गीता में कहा गया है कि -वेदानां सामवेदोऽस्मि। । महाभारत में गीता के अतिरिक्त अनुशासन पर्व में भी सामवेेेद की महत्ता को दर्शाया गया है- सामवेदश्च वेदानां यजुषां शतरुद्रीयम्। ।अग्नि पुराण के अनुसार सामवेद के विभिन्न मंत्रों के विधिवत जप आदि से रोग व्याधियों से मुक्त हुआ जा सकता है एवं बचा जा सकता है, तथा कामनाओं की सिद्धि हो सकती है। सामवेद ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग की त्रिवेणी है। ऋषियों ने विशिष्ट मंत्रों का संकलन करके गायन की पद्धति विकसित की। अधुनिक विद्वान् भी इस तथ्य को स्वीकार करने लगे हैं कि समस्त स्वर, ताल, लय, छंद, गति, मन्त्र, स्वर-चिकित्सा, राग नृत्य मुद्रा, भाव आदि सामवेद से ही निकले हैं।

नामाकरण
सामवेद को उदगीथों का रस कहा गया है, छान्दोग्य उपनिषद में। अथर्ववेद के चौदहवें कांड, ऐतरेय ब्राह्मण (८-२७) और बृहदारण्यक उपनिषद (जो शुक्ल यजुर्वेद का उपनिषद् है, ६.४.२७), में सामवेद और ऋग्वेद को पति-पत्नी के जोड़े के रूप में दिखाया गया है -

अमो अहम अस्मि सात्वम् सामहमस्मि ऋक त्वम् , द्यौरहंपृथ्वीत्वं, ताविह संभवाह प्रजयामावहै।

अर्थात (अमो अहम अस्मि सात्वम् ) मैं -पति - अम हूं, सा तुम हो, (द्यौरहंपृथ्वीत्वं) मैं द्यौ (द्युलोक) हूं तुम पृथ्वी हो। (ताविह संभवाह प्रजयामावहै) हम साथ बढ़े और प्रजावाले हों। ।

जिस प्रकार से ऋग्वेद के मंत्रों को ऋचा कहते हैं और यजुर्वेद के मंत्रों को यजूँषि कहते हैं उसी प्रकार सामवेद के मंत्रों को सामानि कहते हैं। ऋगवेद में साम या सामानि का वर्णन २१ स्थलों पर आता है (जैसे ५.४४.१४, १.६२.२, २.२३.१७, ९.९७.२२)।
_________________________________
सामध्वनावृग्यजुषी नाधीयीत कदा चन ।
वेदस्याधीत्य वाप्यन्तं आरण्यकं अधीत्य च । । ४.१२३ । 

गंगानाथ झा द्वारा व्याख्यात्मक नोट्स
इस श्लोक का पहला भाग वीरमित्रोदय (संस्कार, पृष्ठ संख्या- 533) में इस प्रभाव के लिए उद्धृत किया गया है कि जिस समय के दौरान साम का उच्चारण किया जाता है, वह केवल ऋग्वेद और यजुर्वेद के पढ़ने के लिए अयोग्य होता है।

यह श्लोक स्मृतिचन्द्रिका (संस्कार, पृष्ठ संख्या. 160) में भी उद्धृत है ; - पुरुषार्थचिंतामणी में (पृष्ठ संख्या  443); - हेमाद्रि में (काल, पृष्ठ संख्या. 768); - और गदाधरपद्धति (काल, पृष्ठ संख्या 196) में भी है।

विभिन्न लेखकों द्वारा तुलनात्मक नोट्स
गौतम (16.21)।—'ऋक और यजुष श्लोकों का तब तक पठन नहीं होना चाहिए जब तक साम-गान की ध्वनि है।'

बौधायन (1.11.23)—'जब हवा में सड़न की गंध आती है, या जब कोहरा होता है, और जब साम की आवाजें आती हैं, तब तक यह अध्ययन के लिए अप्रकाशित रहता है। वे टिकाऊ हैं।'

आपस्तम्ब धर्मसूत्र (1.10.19) —'साम की ध्वनियाँ  अपित्र हैं।'

। (1.11.6)।—'उस दिन उस अध्याय का पाठ नहीं करना चाहिए जिसके उपाकर्म किए हों।'

विष्णु (30.26) — 'जब तक साम की ध्वनियाँ हैं, तब तक ऋग्वेद और यजुर्वेद को नहीं पढ़ा जाएगा।'

याज्ञवल्क्य (1.145.148) —'वेद को पूरा करने पर, और आरण्यक को पढ़ने के बाद, यह शेष दिन और रात के दौरान अध्ययन के लिए अनुपयुक्त होगा।
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 साथ ही जब कुत्ते की आवाजें आती हैं.......... और साम-गायन की तब ऋग्वेद और यजुर्वेद नही पढ़ना चाहिए ये दौनो ही अशुभ हैं।'

पारस्कर (2.11.6)। -'यह उस समय के दौरान अध्ययन के लिए अनुपयुक्त होगा जब ........... साम की ध्वनियाँ हों।'

अंगिरस (चतुर्वर्गचिंतामणि, परिभाष-काल, अध्याय 14)। - 'श्मशान-भूमि के पितर ( भूतप्रेत) के लिए जितना बलिदान सामवेद के साथ चढ़ाया जाता है,इस लिए इस वेद की ध्वनि अशुद्ध है।'

यम (वीरमित्रोदय-संस्कार, पृष्ठ 534) - 'ऋग्वेद और यजुर्वेद को तब तक नहीं पढ़ा जाना चाहिए जब तक कि साम-गान की ध्वनि  हो; या जब बहुत तेज हवा चल रही हो।'

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सामध्वनावृग्यजुषी नाधीयीत कदा चन।
वेदस्याधीत्य वाप्यन्तं आरण्यकं अधीत्य च ४/१२३/
अनुवाद:- जहाँ वह सामवेद के मन्त्रों का उच्चारण हो  ऋग्वेद और यजुर्वेद का पाठ नहीं करें ; न वेद के अंत को  अथवा आरण्यक को भी न  पढ़े।—(123)।

"ऋग्वेदो देवदैवत्यो यजुर्वेदस्तु मानुषः।
सामवेदः स्मृतः पित्र्यस्तस्मात्तस्याशुचिर्ध्वनिः ४/१२४

अनुवाद:-ऋग्वेद देवता संबंधित होता हैं यजुर्वेद मनुष्य संबंधित हैं सामवेद पितृसंबधित हैं इसलिए इनका ध्वनि अपवित्र होती हैं ।

तात्पर्य यही है कि मनुस्मृति कार ने साम वेद की ध्वनि को अपवित्र बता कर कृष्ण के विभूति स्वरूप की अवहेलना ही की है।

सामवेद की महत्ता को लेकर श्रीमद्भगवद् गीता और मनुःस्मृति का पारस्परिक विरोध सिद्ध करता है कि; या तो  मनुःस्मृति ही मनु की रचना नहीं है ।
या फिर  श्रीमद्भगवद् गीता कृ़ष्ण का उपदेश नहीं।

परन्तु इस बात के -परोक्षत: संकेत प्राप्त होते हैं कि कृष्ण देव संस्कृति के  विद्रोही  पुरुष थे।
इसी लिए उनके चरित्र-उपक्रमों  में इन्द्र -पूजा का विरोध परिलक्षित होता है ।👇

इसीलिए कृष्ण को ऋग्वेद के अष्टम मण्डल में अदेव
( देवों को न मानने वाला ) कहकर सम्बोधित किया गया है ।

श्रीमद्भगवद् गीता के कुछ पक्ष प्रबलत्तर हैं इस बात के  कि कृष्ण 
देव विषयक कर्मकाण्डों का विरोध करते हैं।

कारण यही था कि यज्ञ को नाम पर निर्दोष जीवों की हत्या होती थी।

श्रीमद्भागवतम्

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 5: नारद द्वारा वसुदेव को दी गई शिक्षाओं का समापन  »  श्लोक 13

श्लोक  11.5.13 भागवत पुराण 
"यद् घ्राणभक्षो विहित: सुराया-
स्तथा पशोरालभनं न हिंसा।
एवं व्यवाय: प्रजया न रत्या
इमं विशुद्धं न विदु: स्वधर्मम् ॥१३॥
 
शब्दार्थ:-यत्—चूँकि; घ्राण—सूँघ कर; भक्ष:—खाना; विहित:—वैध है; सुराया:—मदिरा का; तथा—उसी तरह; पशो:—बलि पशु का; आलभनम्—विहित वध; न—नहीं; हिंसा— हिंसा;वध  एवम्—इसी प्रकार से; व्यवाय:—यौन; प्रजया—सन्तान उत्पन्न करने के लिए; न—नहीं; रत्यै—इन्द्रिय-भोग के लिए; इमम्—यह  (जैसाकि पिछले श्लोक में कहा गया है); विशुद्धम्—अत्यन्त शुद्ध; न विदु:—वे नहीं समझ पाते; स्व-धर्मम्—अपने उचित कर्तव्य को ।.
 
अनुवाद:-वैदिक आदेशों के अनुसार, जब यज्ञोत्सवों में सुरा प्रदान की जाती है, तो उसको पीकर नहीं अपितु सूँघ कर उपभोग किया जाता है। इसी प्रकार यज्ञों में पशु-बलि की अनुमति है, किन्तु व्यापक पशु-हत्या के लिए कोई प्रावधान नहीं है। धार्मिक यौन-जीवन की भी छूट है, किन्तु विवाहोपरान्त सन्तान उत्पन्न करने के लिए, शरीर के विलासात्मक दोहन के लिए नहीं।

किन्तु दुर्भाग्यवश मन्द बुद्धि भौतिकतावादी जन यह नहीं समझ पाते कि जीवन में उनके सारे कर्तव्य नितान्त आध्यात्मिक स्तर पर सम्पन्न होने चाहिए।
 
तात्पर्य:- पशु-यज्ञ के सम्बन्ध में मध्वाचार्य ने निम्नलिखित कथन दिया है—
यज्ञेष्वालभनं प्रोक्तं देवतोद्देशत: पशो:।
हिंसानाम तदन्यत्र तस्मात् तां नाचरेद् बुध:॥

यतो यज्ञे मृता ऊर्ध्वं यान्ति देवे च पैतृके।
अतो लाभादालभनं स्वर्गस्य न तु मारणम् ॥

इस कथन के अनुसार कभी कभी  किसी देवता विशेष की तुष्टि के लिए पशु-यज्ञ करने की संस्तुति करते हैं। 
किन्तु यदि कोई व्यक्ति वैदिक नियमों का दृढ़ता से पालन न करते हुए अंधाधुंध पशु-वध करता है, तो ऐसा वध वास्तविक हिंसा है।

और किसी भी बुद्धिमान व्यक्ति द्वारा स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। 

यदि पशु-यज्ञ सही ढंग से सम्पन्न किया जाता है, तो बलि किया गया पशु तुरन्त देवलोक तथा पितृलोक को चला जाता है।

इसलिए ऐसा यज्ञ पशुओं का वध नहीं है, अपितु वैदिक मंत्रों की शक्ति-प्रदर्शन के लिए होता है, जिसकी शक्ति से बलि किया हुआ पशु, तुरन्त उच्च लोकों को प्राप्त होता है।

किन्तु चैतन्य महाप्रभु ने इस युग में ऐसे पशु-यज्ञ का पूर्ण  निषेध किया है,

क्योंकि मंत्रों का उच्चारण करने वाले योग्य ब्राह्मणों का अभाव है और तथाकथित यज्ञशाला सामान्य कसाई-घर का रूप धारण कर लेती है।

 इसके पूर्व के युग में जब पाखण्डी लोग वैदिक यज्ञों का गलत अर्थ लगाकर, यह सिद्ध करना चाहते थे कि पशु-वध तथा मांसाहार वैध है,

विचारणीय प्रश्न यह है कि मुसलमान भी कुरबानी अथवा हलाल कलमा पढकर करते हैं ।

क्या ईश्वर कुरबानी का भूखा है। देवता माँस भक्षी हैं क्या?

यद्यपि कृष्ण ने यज्ञ को नाम पर पशु वध का निषेध करते हुए ही देव यज्ञ को बन्द करा दिया था।
अधिकतर यज्ञों में पशुबध अनिवार्य था।

इसी लिए इस बोध को बन्द करने के लिए  स्वयं भगवान् बुद्ध ने अवतार लिया और उनकी घृणित उक्ति को अस्वीकार किया।
इसका वर्णन गीत गोविन्द कार  जयदेव ने किया है—
"निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातं सदयहृदय दर्शित पशुघातम्।
केशव धृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे ॥

अतस्तु भगवता कृष्णेन हिंसायज्ञं कलौ युगे समाप्य नवीनमतो विधीयते।3.4.19.६०।

अनुवाद:-इसी कारण से भगवान -कृष्ण ने सभी देव-यज्ञों में  विशेषत: इन्द्र के हिंसा पूर्ण यज्ञों पर रोक लगा दी  क्यों कि यज्ञों में निर्दोष  पशुओं की हिंसा होती। कृष्ण ने कलियुग में हिंसात्मक यज्ञों को समाप्त कर नये मत का विधान किया ।६०।

समाप्य कार्तिके मासि प्रतिपच्छुक्लपक्षके।अन्नकूटमयं यज्ञं स्थापयामास भूतले ।६१।
अनुवाद:- ★-
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा तिथि में भूतल पर कृष्ण ने अन्नकूट का  विधान किया।61

विशेष:- अन्नकूट-एक उत्सव जो कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से पूर्णिमा पर्यन्त यथारुचि किसी दिन (विशेषत? प्रतिपदा को वैष्णवों के यहाँ)होता है । उस दिन नाना प्रकार के भोजनों की ढेरी लगाकर भगवान को भोग लगाते हैं। यह त्यौहार कृष्ण द्वारा वैदिक हिंसा पूर्ण यज्ञों के विरोध में स्थापित किया गया विधान था।

देवराजस्तदा क्रुद्धो ह्यनुजं प्रतिदुःखितः ।  
वज्रं सप्लावयामास तदा कृष्णः सनातनीम् ।   प्रकृतिं स च तुष्टाव लोकमङ्गलहेतवे ।६२।
अनुवाद:-★
 कृष्ण द्वारा स्थापित इस अन्नकूट उत्सव से क्रोधित होकर देवराज इन्द्र ने सम्पूर्ण व्रजमण्डल को मेघ द्वारा डुबो देने का कार्य प्रारम्भ कर दिया। तब कृष्ण ने सनातन प्रकृति की आराधना की इससे वह भगवती प्रकृति लोक कल्याण के लिए प्रसन्न हो गयीं ।६२।    

तदा सा प्रकृतिर्माता स्वपूर्वाद्दिव्यविग्रहम् ।
राधारूपं महत्कृत्वा हदि कृष्णस्यचागता।६३।
अनुवाद:- ★
तभी अपने पूर्वाद्धदिव्य शरीर से महान राधा रूप धारण किया तथा कृष्ण के हृदय में प्रवेश कर गयीं।६३।    
            
तच्छक्त्या भगवान्कृष्णो धृत्वा गोवर्धनं गिरिम्। नाम्ना गिरिधरो देवः सर्वपूज्यो बभूव ह ।६४।अनुवाद:- ★
तब उस शक्ति द्वारा कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत धारण किया तब से उनका नाम गिरिधर हो गया और वे सबके पूज्य हो गये।64।
राधाकृष्णस्स भगवान्पूर्णब्रह्म सनातनः।       
अतः कृष्णो न भगवान्राधाकृष्णः परः प्रभुः।६५।
अनुवाद:-★ 
वे राधाकृष्ण भगवान् सनातन पूर्णब्रह्म हैं। तभी तो कृष्ण को केवल कृष्ण नहीं कहते हैं। वे राधाकृष्ण भगवान् कहे गये हैं यह संयुक्त नाम ही पूर्ण ब्रह्म का वाचक है।
 वे ही सबसे परे तथा प्रभु ( सर्व समर्थ) हैं।६५।
इति श्रुत्वा वचस्तस्य मध्वाचार्यो हरिप्रियः।    
शिष्यो भूत्वा स्थितस्तत्र कृष्णचैतन्यपूजकः।६६।
अनुवाद:- ★
यह सुनकर कृष्णप्रिय मध्वाचार्य ने चैतन्यमहाप्रभु का शिष्यत्व  ग्रहण किया तथा कृष्ण चैतन्य आराधना में रत हो गये।६६।
इति श्रीभविष्ये महापुराणे प्रतिसर्गपर्वणि चतुर्युगखण्डापरपर्याये कलियुगीयेतिहाससमुच्चये कृष्णचैतन्ययज्ञांशशिष्यबलभद्रविष्णुस्वामिमध्वाचार्यादिवृत्तान्तवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः।१९।

इस प्रकार श्रीभविष्य पुराण के प्रतिसर्गपर्व चतुर्थ खण्ड अपरपर्याय"कलियुगीन इतिहास का समुच्चय में कृष्ण चैतन्य यज्ञाञ्श तथा शिष्यबलभद्र-अंश विष्णु स्वामी तथा मध्वाचार्य वृतान्त वर्णन नामक उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ-★
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विचार विश्लेषण-
इन्द्र तथा इन्द्रोपासक पुरोहितो का कृष्ण से युद्ध ऐतिहासिक है। 
जिसके साक्ष्य जहाँ तहाँ पुराणों तथा वैदिक ऋचाओं में बिखरे पड़े हैं।
जिस समय देव-यज्ञ के नाम पर असाह्य और निर्दोष पशुओं की यज्ञों में निरन्तर हिंसा (कत्ल) हो रही थी और इस कारण से यज्ञ वेदियाँ रक्त-रञ्जित रहती थीं।
तब ऐसे कृष्ण ने सर्वप्रथम इन अन्ध रूढ़ियों का खण्डन व विरोध किया।
पुरोहितों की जिह्वालोलुपता, ब्राह्मण वादी वर्चस्व और देवपूजा के नाम पर व्यभिचार और हिंसा चरम पर थी  तब कृष्ण ने इन्द्र की हिंसापूर्ण यज्ञों को समस्त गोप-यादव समाज में  रोककर निषिद्ध दिया था। 
पुराणकारों ने भी जहाँ-तहाँ उन घटनाओं को वर्णित  भी किया ही है। भले ही रूपक-विधेय कोई भी हो-
जब कृष्ण ने सभी गोपों से कहा कि " देवों की यज्ञ करना व्यर्थ है। 
कृष्ण का स्पष्ट उद्घोषणा थी कि "जिस शक्ति मार्ग का वरण करके हिंसा द्वारा अश्वमेध आदि द्वारा देवों के यज्ञ किए जाते हैं तो उन देवों की पूजा व्यर्थ है।

कृष्ण की यह बात सुनकर शचीपुत्र यज्ञांश के बहाने से  रूढ़िवादी देवोपासक पुरोहितों के मन्तव्य को  हंसकर कहा जिसका आरोपण चैतन्य के रूप में हुआ है:-  कि  कृष्ण साक्षात् भगवान नहीं है ।
वह तामसी शक्ति से उत्पन्न है।

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यज्ञ से यद्यपि ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती 
यज्ञ केवल देवपूजा की प्रक्रिया है ।
यह देव पूजा के विधान कि सांकेतिक परम्परा मात्र बन रह गयी है।

श्रीमद्भगवत् गीता पाँचवीं सदी में रचित ग्रन्थ में जिसकी कुछ प्रकाशन भी है ।

यह अधिकाँशत: कृष्ण के सिद्धान्त व मतों की विधायिका है। 
अब कृष्ण जिस वस्तुत का समर्थन करते हैं
मनुःस्मृति उसका विरोध करती है ।

मनुःस्मृति में वर्णन है कि 👇
" सामवेद: स्मृत: पित्र्यस्तस्मात्तस्याशुचिर्ध्वनि:

( मनुःस्मृति चतुर्थ अध्याय 4/124 वाँ श्लोक )

अर्थात्‌ सामवेद का अधिष्ठात्री पितर देवता है ।
इस कारण इस साम वेद की ध्वनि
अपवित्र व अश्रव्य है ।

मनुःस्मृति में सामवेद को हेय
और ऋग्वेद को उपादेय माना ।

वस्तुत अब यह मानना पड़ेगा कि श्रीमद्भगवद् गीता और वेद या मनुःस्मृति एक ही ईश्वर की वाणी नहीं हैं ।
अथवा इनका प्रतिपाद्य विषय एक नहीं ।

क्यों कि श्रीमद्भगवद् गीता के दशवें अध्याय के बाइसवें श्लोक (10/22) में कृष्ण के मुखार-बिन्दु से नि:सृत वाणी है।👇

  "वेदानां सामवेदोऽस्मि = वेदों में सामवेद मैं हूँ" और इसके विरुद्ध  मनुःस्मृति में तो यहाँं तक वर्णन है कि "👇

सामध्वनावृग्ययजुषी नाधीयीत कदाचन" मनुःस्मृति(4/123)

सामवेद की ध्वनि सुनायी पड़ने पर ऋग्वेद और यजुर्वेद का अध्ययन कभी न करें !

अब तात्पर्य यह कि यहाँं अन्य तीनों वेदों को हेय और केवल सामवेद को उपादेय माना।

वैसे भी सामवेद संगीत का आदि रूप है ।
यूरोपीय भाषाओं में प्रचलित साँग (Song) शब्द भी साम शब्द से व्युपन्न है ।

पता होना चाहिए कि कृष्ण मुरली को बजाने  वाले और सबको नाच नचाने वाले श्रेष्ठ संगीतकार थे ।
परन्तु इनकी संगीत भी आध्यात्मिक नाद -ब्रह्म का गायन था ।👇

साम‘ शब्द का अर्थ है ‘गान‘। सामवेद में संकलित मंत्रों को देवताओं की स्तुति के समय गाया जाता था। सामवेद में कुल 1875 ऋचायें हैं। जिनमें 75 से अतिरिक्त शेष ऋग्वेद से ली गयी हैं। इन ऋचाओं का गान सोमयज्ञ के समय ‘उदगाता‘ करते थे। सामदेव की तीन महत्त्वपूर्ण शाखायें हैं-

  1. कौथुमीय,
  2. जैमिनीय एवं
  3. राणायनीय।

देवता विषयक विवेचन की दृष्ठि से सामवेद का प्रमुख देवता ‘सविता‘ या ‘सूर्य‘ है, इसमें मुख्यतः सूर्य की स्तुति के मंत्र हैं किन्तु इंद्र सोम का भी इसमें पर्याप्त वर्णन है। भारतीय संगीत के इतिहास के क्षेत्र में सामवेद का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इसे भारतीय संगीत का मूल कहा जा सकता है। सामवेद का प्रथम द्रष्टा वेदव्यास के शिष्य जैमिनि को माना जाता है।

  • सामवेद से तात्पर्य है कि वह ग्रन्थ जिसके मन्त्र गाये जा सकते हैं और जो संगीतमय हों।
  • यज्ञ, अनुष्ठान और हवन के समय ये मन्त्र गाये जाते हैं।
  • सामवेद में मूल रूप से 99 मन्त्र हैं और शेष ऋग्वेद से लिये गये हैं।
  • इसमें यज्ञानुष्ठान के उद्गातृवर्ग के उपयोगी मन्त्रों का संकलन है।
  • इसका नाम सामवेद इसलिये पड़ा है कि इसमें गायन-पद्धति के निश्चित मन्त्र ही हैं।
  • इसके अधिकांश मन्त्र ऋग्वेद में उपलब्ध होते हैं, कुछ मन्त्र स्वतन्त्र भी हैं।
  • सामवेद में ऋग्वेद की कुछ ॠचाएं आकलित है।
  • वेद के उद्गाता, गायन करने वाले जो कि सामग (साम गान करने वाले) कहलाते थे। उन्होंने वेदगान में केवल तीन स्वरों के प्रयोग का उल्लेख किया है जो उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित कहलाते हैं।
  • सामगान व्यावहारिक संगीत था। उसका विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं हैं।

प्रस्तुति करण :-यादव योगेश कुमार रोहि -


शूद्रस्य द्विजशुश्रूषा तयाजीवन् वणिग् भवेत् ।

प्रधानं क्षत्रिये कर्म प्रजानां परिपालनम् ।
कुसीदकृषिवाणिज्य- पाशुपाल्यं विशः स्मृतम् ॥ यास्मृ१.११९ ॥

शूद्रस्य द्विजशुश्रूषा तयाजीवन् वणिग् भवेत् ।
शिल्पैर् वा विविधैर् जीवेद् द्विजातिहितम् आचरन् ॥ यास्मृ१.१२० ॥