प्राचीन भारत में वर्णों के प्रतिनिधि लोग पञ्च नाम से जाने जाते थे। वदों में पञ्चजन पद भी पञ्चों का ही पूर्वरूप हैं।
"आ दधिक्राः शवसा पञ्चकृष्टीः सूर्य इव ज्योतिषापस्ततान। ऋग्वेद ४/३८/१०
तथा
उत यज्ञियास: पञ्चजना मम होत्रं जुषध्वम् ॥ ऋग्वेद-१०/५३/४।
उपर्युक्त वैदिक ऋचाओं में 'पञ्चकृष्टी' और पञ्चजन' जैसे पद प्राचीन भारतीय समाज में स्थापित पाँच वर्णों का उद्घोष करते हैं।
ऋग्वेद में पञ्चजन: और पञ्चकृष्टी संज्ञा पद बताते हैं कि समाज में पाँच प्रकार के व्यक्ति थे ,जिनका समाज में वर्चस्व होता था। ऋग्वेद में उल्लिखित पञ्चजना: शब्द पाँच जातियों के प्रतिनिधियों का ही वाचक है।
इसी बात को (ब्रह्मवैवर्तपुराण, ब्रह्मखण्ड, एकादश अध्याय, सात्वतीय टीका के अनुसार सुनें)
"ब्राह्मण क्षत्त्रिय वैश्य शूद्राश्चतस्रो जातयो यथा।तथा स्वतन्त्रा जातिरेका आभीरा च तस्या वर्ण अस्मिन् विश्वे वैष्णवाभिधा।।
ब्रह्मवैवर्तपुराण के इस श्लोक में चार वर्णों की व्यवस्था के अतिरिक्त पाँचवे वैष्णव वर्ण की सत्ता को भी दर्शाया गया है। जैसे समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चार वर्ण हैं, वैसे ही विश्व में वैष्णव नाम का एक स्वतन्त्र और सर्वोच्च वर्ण है। जिसकी जाति अहीर (गोप ) है।
पद्मपुराण के उत्तरखण्ड (अध्याय -६८) में स्वयं महादेव कहते हैं कि जो विष्णु से सम्बन्धित है वह वैष्णव है , समस्त वर्णों में वैष्णव वर्ण ही श्रेष्ठ हैं।
विष्णोरयं यतो ह्यासीत्तस्माद्वैष्णव उच्यते।
सर्वेषां चैव वर्णानां वैष्णवः श्रेष्ठ उच्यते।३।
इस वैष्णव वर्ण के अन्तर्गत आभीर यादव अथवा गोप को एक स्वतन्त्र और विशेष जाति के रूप में उल्लेखित किया गया है, जो गोप (आभीर) जाति भगवान स्वराट्- विष्णु से उत्पन्न होकर उनकी सनातन भक्ति में ही लीन रहती है। वह वर्ण से वैष्णव है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण (अध्याय ५, श्लोक- ४१) में साक्षात् उल्लेख है:
कृष्णस्य लोमकूपेभ्य: सद्यो गोपगणो मुने:।आविर्बभूव रूपेण वैशैनेव च तत्सम: ॥
अर्थ- गोलोकवासी श्रीकृष्ण के रोमकूपों से जिन गोपों की उत्पत्ति हुई, वे रूप, वेश और गुण में साक्षात् श्रीकृष्ण के ही समान थे।
गर्गसंहिता के विश्वजित् खण्ड (अध्याय- ११) में साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण सुधर्मा सभा में राजा उग्रसेन से कहते हैं
ममांशा यादवाः सर्वे लोकद्वयजिगीषवः।जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम् ॥७॥
अर्थ- समस्त यादव मेरे ही अंश से प्रकट हुए हैं। वे दोनों लोकों को जीतने की सामर्थ्य रखते हैं और दिग्विजय करके संपूर्ण दिशाओं से उपहार लाएंगे।
अहीरो ! तुम्हारा धर्म भागवत तुम्हारा वर्ण वैष्णव और तुम सबका जनन गोत्र कार्ष्ण है। तुम ब्रह्मा के चार वर्णों से परे स्वराट् विष्णु के हृदयरोमकूपों से उत्पन्न हो ! तुम अपने स्वरूप को पहचानों सत्य को जानो !
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