आत्मानन्द जी:
अध्याय (8)-
प्रमुख क्रान्तिकारी यादव
इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य भारत के प्रमुख क्रान्तिकारी यादव स्वतन्त्रता सेनानियों के बारे में जानकारी देना है जो निम्नलिखित हैं -
1- राव तुला राम 2- राव गोपाल देव 3-प्राण सुख यादव
4- वीरन अलगु मुत्थु कोने 5- रघुवर प्रसाद यादव
6- ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव
1- राव तुला राम
राव तुला राम प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के एक महान नायक और हरियाणा के रेवाड़ी के राजा थे। वे यदुवंशी अहीर राजवंश से सम्बन्ध रखते थे और उन्हें हरियाणा का "राज्य नायक" के रूप में आज भी जाना जाता है।
स्वतंत्रता आंदोलन और योगदान
राव तुला राम 1857 की क्रान्ति में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और दक्षिण-पश्चिम हरियाणा में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका और 17 मई 1857 को रेवाड़ी पर कब्जा कर अपनी स्थानीय सरकार स्थापित की। उनके इस युद्ध अभियान में नसीबपुर (नारनौल) का युद्ध सबसे महत्वपूर्ण है। यह युद्ध 1857 की क्रांति के सबसे भीषण और निर्णायक युद्धों में से एक था। राव तुला राम ने इसमें एक चतुर रणनीतिकार की भूमिका निभाते हुए रामपुर किले में पारम्परिक कारीगरों की मदद से अपनी बंदूकें और गोला-बारूद बनाने का कारखाना स्थापित किया ताकि हमारे सैनिक युद्ध संसाधनों से आत्मनिर्भर हो जायं। उनकी इस रणनीति से सेना युद्ध के शुरुआती चरण में ब्रिटिश सेना को भारी नुकसान हुआ। उन्होंने ब्रिटिश कमाण्डर कर्नल जॉन ग्रांट गेरार्ड और कैप्टन वालेस को मार गिराया, जिससे दुश्मन सेना में हड़कम्प मच गया। किन्तु दुर्भाग्य रहा कि पटियाला, जींद और नाभा जैसी रियासतों ने अंग्रेजों से मिल गये। इन रियासतों की अतिरिक्त मदद मिलने से ब्रिटिश सेना का पलड़ा भारी हो गया परिणामस्वरूप सफलता नहीं मिली।
फिर भी वे हार नहीं माने और अंग्रेजों के खिलाफ मदद माँगने के लिए ईरान, अफगानिस्तान और रूस के शासकों से मिलने निकल पड़े। वे मुंबई से समुद्री रास्ते से बुखारा पहुँचे और वहाँ से रूसी साम्राज्य के अधिकारियों से सम्पर्क साधा। उन्होंने रूसी जार अलेक्जेंडर द्वितीय को भारत की स्थिति पर एक विस्तृत पत्र लिखा, जो आज भी रूस के सेंट पीटर्सबर्ग संग्रहालय में सुरक्षित है। इस कार्य के लिए रूस उन्हें "भारत का पहला राजदूत" माना।
इसके बाद उन्होंने ईरान के शाह और अफगानिस्तान के अमीर दोस्त मोहम्मद खान से भी मुलाकात की। अफगानिस्तान के शासक ने अंग्रेजों के खिलाफ सहयोग का आश्वासन दिया और भारतीय विद्रोही सैनिकों को काबुल में इकट्ठा करना शुरू कर दिया था। दुर्भाग्यवश जब वे एक बड़ी सेना तैयार करने के करीब थे, तभी 23 सितंबर 1863 को काबुल में संक्रमण (पेचिश/डिसेंट्री) के कारण उनका देहान्त हो गया।
उनकी याद और सम्मान में हर साल 23 सितंबर को हरियाणा में 'शहीदी दिवस' मनाया जाता है। भारत सरकार ने 2001 में उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया था। इसके साथ ही दिल्ली में उनके नाम पर एक प्रसिद्ध सड़क 'राव तुला राम मार्ग' और एक कॉलेज स्थित है।
राव तुलाराम की वंशावली-
राव तुलाराम की वंशावली का प्रारम्भ राजस्थान के तिजारा से शुरू होता है। उनके पूर्वज महाराजा राव चारो सिंह थे और अफरिया गोत्र के इन यदुवंशियों का मूल स्थान मथुरा माना जाता है। राव हरपाल सिंह ने तिजारा से आकर रेवाड़ी में अपनी जागीर स्थापित की तथा
राव तुला राम का जन्म 9 दिसंबर 1825 को रेवाड़ी के राजा राव पूर्ण सिंह और रानी ज्ञान कौर के घर हुआ था। राव गोपाल देव: राव तुला राम के चचेरे भाई और उनके सेनापति थे, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में उनका कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया था।
राव तुला राम के निधन के बाद भी उनका परिवार भारतीय राजनीति और समाज सेवा में सक्रिय रहा:
पुत्र (राव युधिष्ठिर सिंह): उनके पुत्र राव युधिष्ठिर सिंह को 1877 में अंग्रेजों ने 'अहीरवाल' का प्रमुख स्वीकार किया था। उन्होंने रेवाड़ी में विश्व की पहली आधुनिक गौशाला का निर्माण करवाया था।
राव तुला राम के वंशज राव वीरेंद्र सिंह हरियाणा के दूसरे मुख्यमन्त्री बने थे तथा राव तुला राम के प्रपौत्र राव इंद्रजीत सिंह आज रेवाड़ी के यादव वंश परम्परा को आगे बढ़ाते हुए वर्तमान में भारत सरकार में सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मन्त्रालय में राज्य मन्त्री (स्वतन्त्र प्रभार) हैं। उनकी बेटी राव आरती सिंह एक प्रसिद्ध निशानेबाज हैं।
2- राव गोपाल देव-
राव गोपाल देव का जन्म 1829 में रेवाड़ी में हुआ था। वह राव नाथूराम के पुत्र और प्रसिद्ध अहीर शासक राव शाहबाज सिंह के वंशज थे। 1855 में पिता की मृत्यु के बाद उन्हें रेवाड़ी की जागीर विरासत में मिली।
राव गोपाल देव 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम के नायक थे। उन्होंने अपने चचेरे भाई राव तुला राम के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व किया था। इन्होंने 17 मई 1857 को राव तुला राम के साथ मिलकर रेवाड़ी पर कब्जा कर लिया और स्थानीय तहसीलदार को पद से हटा दिया और लगभग 5000 सैनिकों की फौज तैयार की और हथियारों व गोला-बारूद के लिए अपनी कार्यशाला (वर्कशॉप) स्थापित की।
राव गोपाल देव रेवाड़ी रियासत की सशस्त्र सेनाओं के कमांडर-इन-चीफ थे। उन्होंने नारनौल के पास नसीबपुर के ऐतिहासिक युद्ध में ब्रिटिश सेना का डटकर मुकाबला किया। यह युद्ध हरियाणा में 1857 की क्रांति की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक माना जाता है।
इसी युद्ध के बाद 1859 में अंग्रेजों ने उनकी जागीर और सम्पत्तियाँ जब्त कर लीं। विद्रोह के दौरान संघर्ष करते हुए 1862 में उनका निधन हो गया।
3- प्राण सुख यादव-
क्रान्तिकारी प्राण सुख यादव का सम्बन्ध राजस्थान के अलवर जिले से था। उन्होंने महाराजा रणजीत सिंह की सिख खालसा सेना को प्रशिक्षित किया और वे प्रसिद्ध सिख कमांडर हरी सिंह नलवा के करीबी मित्र थे। उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध प्रथम और द्वितीय आंग्ल-सिख युद्धों में भी भाग लिया था। इसके बाद 1857 की क्रान्ति के दौरान प्राण सुख यादव राव तुला राम के साथ मिलकर नारनौल के समीप नसीबपुर की लड़ाई में ब्रिटिश सेना का डटकर मुकाबला किया। इस युद्ध प्राण सुख यादव ने ही अपनी पसंदीदा राइफल से ब्रिटिश कर्नल गेरार्ड को मार गिराया था। इस युद्ध के बाद वे कुछ समय तक गुप्त रहे और अन्ततः अपने पैतृक गाँव निहालपुर वापस आ गए। जीवन के अन्तिम वर्षों में वे स्वामी दयानन्द सरस्वती के सम्पर्क में आए और आर्य समाज के अनुयायी बनकर समाज सुधार के कार्यों में लग गए।
4- वीरन अलगु मुत्थु कोने
वीरन अलगु मुत्थु का जन्म 11 जुलाई 1710 को थूथुकुडी जिले के कट्टलंकुलम में हुआ था। वे यादव (कोनार) समुदाय से थे और एट्टयपुरम के सैन्य नेता व कट्टलंकुलम के शासक थे। ये भारत के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी माने जाते हैं। उन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लगभग 100 वर्ष पहले ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूँका था तथा अंग्रेजों द्वारा लगाए गए कर (टैक्स) का विरोध किया और 1750-1759 के दौरान प्रेसीडेंसी सेनाओं के खिलाफ युद्ध छेड़ा।
1759 में उन्हें अंग्रेजों ने छल से बन्दी बना लिया था। जब उन्होंने आत्मसमर्पण करने और माफ़ी माँगने से इनकार कर दिया, तो उन्हें तोप के मुंह पर बाँधकर उड़ा दिया गया।
इनके सम्मान में भारत सरकार ने 2015 में डाक टिकट जारी किया था। तमिलनाडु सरकार हर साल 11 जुलाई को उनकी जयन्ती मनाती है।
5- रघुवर प्रसाद यादव-
उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के रघुवर प्रसाद यादव एक स्वतन्त्रता सेनानी थे, जिन्होंने 1941-42 के भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। उन्होंने महात्मा गाँधी द्वारा शुरू किए गए भारत छोड़ो आन्दोलन (1942) के दौरान ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष किया। हाल के वर्षों में स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासन द्वारा उनकी स्मृति में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं, जिसमें उन्हें एक सच्चे राष्ट्रभक्त के रूप में याद किया जाता है।
6- ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव
योगेंद्र सिंह यादव का जन्म 10 मई 1980 में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के औरंगाबाद अहीर गाँव में हुआ था। वे 16 साल और 5 महीने की उम्र में सेना में भर्ती हो गए। परमवीर चक्र विजेता योगेंद्र सिंह यादव अभी जीवित हैं।
सूबेदार मेजर और मानद कैप्टन योगेंद्र सिंह यादव भारतीय सेना के 18 ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट के एक असाधारण वीर योद्धा हैं। इनकी ख्याति 1999 में तब हुई जब वे टाइगर हिल के के कारगिल विजय के लिए उन्हें 'घातक' प्लाटून का हिस्सा बनाकर टाइगर हिल पर स्थित तीन रणनीतिक बंकरों पर कब्जा करने का कार्य सौंपा गया था। तब उन्होंने बर्फ से ढकी पहाड़ी पर रस्सी के सहारे चढ़ाई कर ही रहे थे कि आधे रास्ते में दुश्मन की गोलीबारी में उनके प्लाटून कमाण्डर और साथी शहीद हो गए और योगेंद्र सिंह यादव को उसी समय दुश्मनों की ताबड़तोड़ 17 गोलियाँ लगी। फिर भी घायल अवस्था में रेंगते हुए दुश्मन के बंकर पर ग्रेनेड फेंका और चार पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया, जिससे बाकी प्लाटून के लिए रास्ता साफ हो गया।
उनकी इस वीरता और अदम्य साहस के लिए भारत सरकार ने अबतक के सबसे कम उम्र (19 साल) में उन्हें भारत का सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से नवाजा।
हरियाणा क्षेत्र के यादवों को प्रमुख रूप से- राव, राय, कृष्णौत, मझरौट, यादव, अहीर, अहीरवाल। इत्यादि नामों से जाना जाता है।
3- पंजाब और दिल्ली
पंजाब और दिल्ली के यादवों को प्रमुख रूप से- राव, राय साहब अहीर, और यादव इत्यादि नामों से जाना जाता है।
4- राजस्थान-
राजस्थान के यादवों को प्रमुख रूप से- ढढोर, अहीर, यादव, राव, चौधरी इत्यादि नामों से जाना जाता है।
5- मध्यप्रदेश
मध्यप्रदेश के यादवों को प्रमुख रूप से- यादव, अहीर, ग्वाला, राव, राय, चौधरी, ढढोर इत्यादि नामों से जाना जाता है।
6- बुन्देलखण्ड
बुन्देलखण्ड के यादवों को प्रमुख रूप से- कमरिया, बनाफर अहीर, नागिल, पवार, भट्टी, जाटव, तोमर, ढढोर इत्यादि नामों से जाना जाता है।
7- गुजरात-
गुजरात के यादवों को प्रमुख रूप से-अहीर और यादव नाम से जाना जाता है।
8- महाराष्ट्र-
महाराष्ट्र के यादवों को प्रमुख रूप से- जाधव, गवली, धनगर, गायकवाड़, और खेदकर इत्यादि नामों से जाना जाता है।
9- तमिलनाडु-
तमिलनाडु के यादवों को प्रमुख रूप से- कोनार, आयर, इडैयर, और पिल्लई इत्यादि नामों से जाना जाता है।
10-आंध्र प्रदेश और तेलंगाना-
आंध्र प्रदेश के यादवों को प्रमुख रूप से- गोल्ला, कुरुबा, और यादवुलु इत्यादि नामों से जाना जाता है।
11- कर्नाटक
कर्नाटक के यादवों को प्रमुख रूप से- कुरुबा, गोल्ला, और वाडियार इत्यादि नामों से जाना जाता है।
12- केरल
केरल के यादवों को प्रमुख रूप से- मणियानी और एरुमकर इत्यादि नामों से जाना जाता है।
13- बंगाल
बंगाल में यादवों को घोष और सदगोप इत्यादि नामों से जाना जाता है।
14- ओडिशा
ओडिशा के यादवों को प्रमुख रूप से- बेहेरा, गोपाल, गौड़ा, महाकुल, राउत इत्यादि नामों से जाना जाता है।
विशेष- यादवों का सरनेम अभी शोध का विषय है। क्योंकि अधिकांश प्रान्तों में यादवों के कुछ ऐसे सरनेम हैं जिनको हम और आप अभी तक नहीं जानते हैं।
इस प्रकार से यह अध्याय यादवों के सरनेम की जानकारी के साथ समाप्त हुआ। अब इसके अगले अध्याय (10) में प्रमुख यादव राजनेताओं के बारे में जानकारी दी गई है।
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