मंगलवार, 19 मई 2026

यदुवंश संहिता ( अध्याय- परिशिष्ट कथा एक नवम तक-


गोपों (यादवों) की परिशिष्ट कथाएँ।

इस पुस्तक की परिशिष्ट कथा का मुख्य उद्देश्य विशेष रूप से पौराणिक यादवों की लोकप्रिय कथाओं की जानकारी देना है जैसे- (1) श्रीकृष्ण की नारायणी सेना  (2)- यादवों का विश्वजीत युद्ध  (3)- गोपों की सत्यनारायण व्रत कथा (4)- वेदमाता गायत्री की कथा (5)- गोपी स्वाहा और स्वधा की कथा (6)- ब्रह्माण्ड विदुषी गोपी शतचन्द्रानना की कथा (7)- गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था। (8) चंद्रमा और उसके वंश की उत्पत्ति।
(9)- देवमीढ की वंशावली।




(1) श्रीकृष्ण की नारायणी सेना


भूत-तल के भार (पाप) को दूर करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने नारायणी सेना (गोप सेना या 'यादव सेना') का गठन किया था जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अजेय और अविनाशी थी। इस बात की पुष्टि- श्रीमद्भागवत पुराण के स्कंध-12 अध्याय (2) के श्लोक- 22 और 23 से होती है जिसमें लिखा गया है कि- कलयुग के अन्त में जब धर्म लुप्त हो जाएगा, तब भगवान स्वराट विष्णु (श्रीकृष्ण) 'कल्कि' रूप में प्रकट होंगे और उनके साथ 'सत्य संध' (नारायणी सेना) होगी जिसमें सत्य का पालन करने वाले दिव्य गोप योद्धा होंगे।

तेषां प्रजाविसर्गश्च स्थाविष्ठः सम्भविष्यति।
वासुदेवे भगवति सत्त्वमूर्तौ हृदि स्थिते।।२२

यदावतीर्णो भगवान् काल्किर्धर्मपतिर्हरिः।
कृतं भविष्यति तदा प्रजासूतिश्च सात्त्विकी‌।।२३

अनुवाद - २२,२३ " उनके यानी कल्कि के पवित्र हृदय में सत्त्वमूर्ति भगवान वासुदेव विराजमान होंगे और फिर उनकी सन्तान (गोप) पहले की ही भाँति (नारायणी सेना के लिए) हृष्ट-पुष्ट और बलवान होने लगेंगी। २२
प्रजा के नयन-मनोहारी हरि (श्रीकृष्ण) ही धर्म के रक्षक और स्वामी हैं। वे ही भगवान जब कल्कि के रूप में अवतार ग्रहण करेंगे, उसी समय सतयुग का प्रारम्भ हो जाएगा और प्रजा की सन्तान-परम्परा स्वयं ही सत्तवगुण से युक्त हो जाएगी।२३

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि मौसल पर्व में यादवों सहित नारायणी सेना का भी अन्त हो गया था। किन्तु ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उपर्युक्त साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि श्रीकृष्ण की नारायणी सेना और उसके गोप योद्धाओं का कभी अन्त नहीं होता, क्योंकि नारायणी सेना की 'अजेय शक्ति' सूक्ष्म रूप में परमेश्वर श्रीकृष्ण में विलीन हो गई थी, वहीं हर युग में उनके ईश्वरीय अवतार के समय पुनः भौतिक रूप धारण करती है। इसीलिए नारायणी सेना को अक्षय, अविनाशी और अजेय कहा जाता है। और जब भी धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब भगवान श्रीकृष्ण अपने आप को तथा अपनी दिव्य शक्ति रुपी (नारायणी सेना) को साकार रूप से प्रकट करते हैं और पुनः धर्म की स्थापना करते हैं। इस बात की पुष्टि- श्रीमद्भागवत गीता ४/७ से होती है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहे हैं कि -

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। ७
                       
अनुवाद- "जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने आप को साकार रूप से प्रकट करता हूँ अर्थात् भूतल पर शरीर रूप धारण करता हूँ।"


यादवेश्वर श्रीकृष्ण अपनी नारायणी सेना की विशालता और उसके अजेय गोप योद्धाओं के बारे में महाभारत के उद्योग पर्व के सेनोद्योग नामक उपपर्व के सप्तम अध्याय के श्लोक संख्या- (१८) और (१९) में कहे हैं कि-

"मत्सहननं तुल्यानां ,गोपानाम् अर्बुदं महत्।
नारायणा इति ख्याता: सर्वे संग्रामयोधिन:।१८।

अनुवाद - मेरे पास दस करोड़ गोपों की विशाल सेना है, जो सबके सब मेरे जैसे ही बलिष्ठ शरीर वाले हैं। उन सबकी 'नारायण' संज्ञा है। अर्थात् वे सभी नारायण नाम से जानें जाते हैं। वे सभी युद्ध में डटकर मुकाबला करने वाले हैं।।१८।।

अब यहाँ पर कुछ लोगों को संशय अवश्य हुआ होगा कि नारायणी सेना से सम्बम्धित उपर्युक्त सभी श्लोकों में तो केवल गोपों का नाम है यादवों का नहीं। तो इस सम्बन्ध में ज्ञात हो कि नारायणी सेना के गोप ही यादव है और यादव ही गोप हैं। क्योंकि नारायणी सेना के उन्हीं गोप योद्धाओं के बारे में भगवान श्रीकृष्ण यादव नाम से भी सम्बोधित किये हैं।
जिसकी पुष्टि- गर्गसंहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय-(२) के श्लोक संख्या- (७) से होती है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण उग्रसेन से कहते हैं कि-

ममांशा यादवा: सर्वे लोकद्वयजिगीषव:।
जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम्।।७।    
   
अनुवाद - समस्त यादव मेरे अंश से प्रकट हुए हैं। वे लोक, परलोक दोनों को जीतने की इच्छा करते हैं। वे दिग्विजय के लिए यात्रा करके शत्रुओं को जीत कर लौट आएंगे और सम्पूर्ण दिशाओं से आपके लिए भेंट और उपहार लायेंगे।

कुल मिलाकर नारायणी सेना के वे गोप योद्धा जो कभी पराजित नहीं होते और अपने योग बल से 'सिद्ध' और अजेय अवस्था में सदैव श्रीकृष्ण के साथ ही रहते हैं, जो हर युग में भगवान श्रीकृष्ण के धर्म स्थापना अभियान का हिस्सा होते हैं। पौराणिक ग्रन्थों में उनके धर्म स्थापना अभियान को ही यादवों का विश्वजीत युद्ध कहा गया। जिसके बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी इसकी अगली कथा (दो) शीर्षक- यादवों का विश्वजीत युद्ध में दी गई है। जिसमें बताया गया है कि धर्म की स्थापना के लिए यादवों ने किस प्रकार विश्वजीत युद्ध किया।


नारायणी सेना की कुछ खास विशेषताएँ-

(1)- यह सेना केवल योद्धाओं का समूह नहीं थी, बल्कि इसमें दिव्य शक्तियों और विशेष युद्ध कलाओं का समावेश था, जिसमें लगभग 10 लाख से अधिक योद्धा थे जो सभी गोप यानी यादव थे। इस विशाल सेना में कुल 11 अक्षौहिणी टुकड़ियाँ थीं।  (ज्ञात हो- एक अक्षौहिणी में 21,870 रथ, 21,870 हाथी, 65,610 घुड़सवार और 1,09,350 पैदल सैनिक होते हैं।)

(2)- नारायणी सेना में श्रीकृष्ण के 18,000 भाई और चचेरे भाई शामिल थे। सेना में 7 महारथी और 7 अतिरथी योद्धा भी थे।

(3)-  नारायणी सेना के सैनिकों को स्वयं श्रीकृष्ण ने युद्ध नीति और कलारिपयट्टू (युद्धक्षेत्र की कलाओं का अभ्यास) जैसी प्राचीन मार्शल आर्ट में प्रशिक्षित किये थे। इस सेना प्रत्येक योद्धा मायावी अस्त्रों के प्रयोग और शत्रुओं की मानसिकता को प्रभावित करने में सक्षम थे। इस सेना का प्रत्येक सैनिक बिना किसी प्रश्न के भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा का पालन करने के लिए समर्पित थे।

(4)-  नारायणी सेना महाभारत जैसे भयंकर युद्ध में केवल 1 या 2 अक्षौहिणी ही प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया था। शेष सेना बलराम जी के आदेश पर युद्ध से अलग रही।

(5)-  नारायणी सेना के अजेय गोप योद्धाओं ने अपने विश्व युद्ध अभियान में मगध, हस्तिनापुर, गंधार, कलिंग जैसे कई बड़े साम्राज्यों के साथ ही बहुत से दैत्य, देव, दानव गंधर्व इत्यादि को पराजित करके पुनः धर्म को स्थापित किया।


अब हमलोग इसी क्रम में नारायणी सेना के यादवों के विश्वजीत युद्ध अभियान को जानेंगे।





  (2)- यादवों का विश्वजीत युद्ध



पौराणिक ग्रन्थों की मानें तो ब्रह्माण्ड का सबसे सबसे भयंकर युद्ध यादवों का 'विश्वजीत युद्ध' माना जाता है, जो महाभारत युद्ध से कुछ ही समय पहले भगवान श्री कृष्ण के आदेश पर हुआ था, जिसका मुख्य उद्देश्य राजा उग्रसेन के राजसूय यज्ञ के लिए कर (Tax) एकत्रित करना और इसी बहाने भूतल के समस्त पापी एवं दुष्ट मनुष्यों तथा दैत्यों आदि का वध करके पृथ्वी के भार को दूर करना था।

युद्ध की औपचारिक घोषणा-

यादवों के विश्वजीत युद्ध के बारे में विस्तार पूर्वक वर्णन गर्ग संहिता के विश्वजीत खण्ड में (१-५०) तक के अध्यायों में वर्णित है। जिसमें राजा उग्रसेन ने सुधर्मा सभा में राजसूय यज्ञ करने की इच्छा व्यक्त की और समस्त यादवों को पान का बीड़ा रखकर चुनौती दी कि जो समरांगन में जंबूद्वीप के समस्त नरेशों को जीत सके, वह यह पानी का बीड़ा उठाए।

तब भगवान श्रीकृष्ण उस सभा में युद्ध की औपचारिक घोषणा करते हुए जो कुछ कहा उसका वर्णन गर्गसंहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय-(२) के श्लोक संख्या- (७) में कुछ इस प्रकार से लिखा गया है-

ममांशा यादवा: सर्वे लोकद्वयजिगीषव:।
जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम्।।७।    
   
अनुवाद - समस्त यादव मेरे अंश से प्रकट हुए हैं। वे लोक, परलोक दोनों को जीतने की इच्छा करते हैं। वे दिग्विजय के लिए यात्रा करके शत्रुओं को जीत कर लौट आएंगे और सम्पूर्ण दिशाओं से आपके लिए भेंट और उपहार लायेंगे।

तब रुक्मिणी नन्दन प्रद्युम्न (भगवान श्री कृष्ण के पुत्र) ने सबसे पहले यह पान का बीड़ा उठाया और दिग्विजय की चुनौती स्वीकार की। इसके बाद उन्हीं के अगुआई में यादवों का विश्वजीत युद्ध प्रारम्भ हुआ।

इस युद्ध के दौरान यादवों ने न केवल मनुष्यों बल्कि यक्षों और गंधर्वों की सेनाओं को भी पराजित किया, जिससे स्वर्ग और पाताल तक उनकी कीर्ति फैली।


विजय अभियान और युद्ध परिणाम


युद्ध के दर्म्म्यान, कुछ देशों ने बिना युद्ध किए स्वेच्छा से संधि स्वीकार करके यज्ञ के लिए भेंट दी (जैसे कच्छा, कर्नाटक, मिथिला), वहीं कुछ से बलपूर्वक भेंट लेनी पड़ी (जैसे कलिंग, मरुधर, अवन्ती पुरी इत्यादि)।

कई भयंकर युद्ध हुए-



🔆 बाणासुर और अन्य: बाणासुर, दंतवक्र, शाल्व और कलिंग के राजाओं को पराजित कर यादवों ने अपनी सैन्य श्रेष्ठता सिद्ध की।


🔆 मगध के राजा जरासंध से घनघोर युद्ध हुआ। वह रण छोड़कर भाग गया। अंततः यादवों की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी और उसके पुत्र सहदेव ने यादवों को कर भेंट किया।

🔆 करु देश के राजा वृद्ध शर्मा के पुत्र दन्तवक्र से भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें दन्तवक्र पराजित हुआ।

🔆 कामरूप के राजा पूर्णरूप ने मायावी विद्या से युद्ध किया। अन्त में उसकी भी पराजय हुई।

🔆 अलकापुरी के अधिपति कुबेर और उनके गणों (यक्षों) से भी युद्ध हुआ, जिसमें गणेश जी भी शामिल थे। युद्ध यादवों के पक्ष में रहा।

🔆 हीरे देश के विशालकाय वानरों से विचित्र युद्ध हुआ, जिसमें हनुमान जी को प्रकट होकर शान्ति स्थापित करनी पड़ी।

🔆 चन्द्रावती पुरी के राक्षस राज शकुनि से भयंकर युद्ध हुआ, जहाँ भगवान श्री कृष्ण को भी प्रकट होना पड़ा। अन्त में शकुनी मारा गया।

🔆 गंधर्वों से भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें बलराम जी को प्रकट होना पड़ा। जिसमें गंधर्वों ने यादवों कर देना स्वीकार किया।

🔆 हस्तिनापुर से युद्ध एक महत्वपूर्ण युद्ध था। उद्धव को दूत बनाकर कौरवों से भेंट की मांग की गई, जिसे कौरवों ने अस्वीकार कर दिया तब यादवों का हस्तिनापुर से भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में प्रद्युम्न ने दुर्योधन को अपने तीखे बाणों से घायल कर दिया। बाद में अनिरुद्ध ने भीष्म के धनुष को काटकर उन्हें मूर्छित कर दिया। जब युद्ध और भयानक रूप लेने लगा, तो बलराम जी और भगवान श्री कृष्ण स्वयं प्रकट हुए और युद्ध को रोककर कौरवों तथा यादवों में मैत्री स्थापित की।

🔆 एक स्वयंवर के दौरान देवताओं से भी युद्ध हुआ, जिसमें यादवों ने देवताओं सहित  इन्द्र को भी पराजित किया।

युद्ध का परिणाम-

यादवों के इस विश्वजीत युद्ध से भूतल के समस्त राजाओं, दैत्यों, गंधर्वों और देवताओं का मानमर्दन हुआ, और यह पृथ्वी के भार को उतारने में सफल रहा।
युद्ध समाप्त होने के बाद, प्रद्युम्न अपनी यादव सेना के साथ द्वारिका पुरी लौटे और उग्रसेन को सम्पूर्ण भेंट प्रदान की, इसके पश्चात यादवों का यज्ञ प्रारम्भ हुआ।


युद्ध से हमें क्या सीख मिलती है-


1- यह युद्ध सिखाता है कि जब समाज में अधर्म और अहंकार बढ़ जाता है, तो सत्य और धर्म की रक्षा के लिए शक्ति का प्रयोग अनिवार्य हो जाता है। यादवों ने अपनी सेना का उपयोग व्यक्तिगत लालच के लिए नहीं, बल्कि न्याय की स्थापना के लिए किया।

2- प्रद्युम्न और अनिरुद्ध के नेतृत्व में यादवों की सफलता यह दर्शाती है कि यदि युवा नेतृत्व कुशल हो और उसे अनुभवी मार्गदर्शकों (जैसे कृष्ण और बलराम) का साथ मिले, तो असंभव लक्ष्य भी प्राप्त किए जा सकते हैं।

3- बाणासुर और जरासंध जैसे शक्तिशाली राजाओं की पराजय यह सिद्ध करती है कि चाहे व्यक्ति कितना भी बलशाली या वरदान प्राप्त क्यों न हो, यदि वह अहंकारी है, तो उसका पतन निश्चित है।

4-  यादवों ने राजाओं को पराजित करने के बाद उनके राज्यों को पूरी तरह नष्ट नहीं किया, बल्कि उन्हें कर देने और धर्म के मार्ग पर चलने के लिए विवश किया। यह सिखाता है कि विजेता को क्रूर नहीं, बल्कि न्यायप्रिय होना चाहिए।

5- राजसूय और विश्वजीत यज्ञ की पूर्णता के लिए यादवों ने हर बाधा (यक्ष, गंधर्व और असुर) का सामना किया। यह बाधाओं के बावजूद अपने संकल्प को पूरा करने की सीख देता है।

विशेष- यादवों के विश्वजीत युद्ध को यदि आप यूट्यूब पर देखना चाहते हैं तो- यादव सम्मान चैनल पर, (यादवों का विश्वजीत युद्ध) वाले विडियो के शीर्षक में देख सकते हैं।

इस प्रकार से आपलोग श्रीकृष्ण की नारायणी सेना और यादवों के विश्वजीत युद्ध को जाना। अब इसकी अगली परिशिष्ट कथा (3) में गोपों की सत्यनारायण व्रत कथा को जानेंगे।

(3)- गोपों की सत्यनारायण व्रत कथा

                  
वास्तव में देखा जाए तो पूर्व काल में गोपों ने ही परमेश्वर श्रीकृष्ण (सवराट विष्णु) की सार्वजनिक कथा को सत्यनारायण व्रत कथा के नाम से प्रतिष्ठित किया जो आज भी भारतीय समाज में प्रचलित है। गोपों की सत्यनारायण व्रत कथा का सर्वप्रथम वर्णन श्रीस्कन्दपुराण के अवन्ति खण्ड के उपखण्ड रेवाखण्ड के अध्याय-(२३३ से २३७) में मिलता है, जिसे हम और आप बचपन से ही इस विष्णु कथा को सुनते आयें हैं। किन्तु इस बात को कम ही लोग जानते हैं कि इस सत्यनारायण व्रत कथा के मुख्य पात्र गोप ही हैं, जो इस कथा के माध्यम से अनेकों भक्तों का तारण करते हैं। इस बात की पुष्टि सत्यनारायण व्रत कथा के मुख्य स्रोत श्रीस्कन्दपुराण के रेवाखण्ड के अध्याय-(२३३) से (२३७) से होती है। जो सत्यनारायण व्रत कथा के नाम से स्थापित है। जानकारी के लिए उसे नीचे उद्धृत किया गया है।

                      "सूत उवाच"
अथान्यच्च प्रवक्ष्यामि शृणुध्वं मुनिसत्तमाः।
आसीत् तुङ्गध्वजो राजा प्रजापालनतत्परः॥१॥

प्रसादं सत्यदेवस्य त्यक्त्वा दुःखमवाप सः।
एकदा स वनं गत्वा हत्वा बहुविधान् पशून्॥२॥

आगत्य वटमूलं च  दृष्ट्वा   सत्यस्य  पूजनम्।
गोपाः कुर्वन्ति संतुष्टा भक्तियुक्ताः सबान्धवाः॥३॥

राजा दृष्ट्वा तु दर्पेण न गतो न ननाम सः।
ततो गोपगणाः सर्वे  प्रसादं नृपसन्निधौ ॥४॥

संस्थाप्य पुनरागत्य भुक्त्वा सर्वे यथेप्सितम्।
ततः प्रसादं संत्यज्य राजा दुःखमवाप सः॥५॥

"अनुवाद- १-५

• श्रीसूतजी बोले- हे श्रेष्ठ मुनियो ! अब इसके बाद मैं एक अन्य कथा कहूँगा, आप उसे सुनें। अपनी प्रजा का पालन करने में तत्पर (तैयार रहने वाला) तुङ्गध्वज नाम का एक राजा था।१।

• उसने सत्यदेव (सत्यनारायण) के प्रसाद का परित्याग करके दुःख प्राप्त किया। एक बार वह वन में जाकर और वहाँ बहुत-से पशुओं को मारकर।२।

• वह वट वृक्ष के नीचे आया तो वहाँ उसने देखा कि गोपगण (अहीर लोग) बन्धु-बान्धवों के साथ सन्तुष्ट होकर भक्तिपूर्वक भगवान् सत्यदेव (सत्यनारायण) की पूजा करतें हैं।३।

• राजा यह देखकर भी अहंकार (दर्प) वश न तो वह वहाँ गया और न ही उसने भगवान् सत्यनारायण को प्रणाम ही किया। इसके बाद (पूजन के पश्चात) सभी गोपगण भगवान् सत्य नारायण का प्रसाद राजा के समीप में।४।

• रखकर वहाँ से पुन: लौट कर और इच्छानुसार उन सभी ने भगवान्‌ का प्रसाद ग्रहण किया। इधर राजा को प्रसाद का परित्याग करने से बहुत दुःख भोगना पड़ा ॥ ५॥


तस्य पुत्रशतं नष्टं धनधान्यादिकं च यत्।
सत्यदेवेन तत्सर्वं नाशितं मम निश्चितम्॥६॥

अतस्तत्रैव गच्छामि यत्र देवस्य पूजनम्।
मनसा तु विनिश्चित्य ययौ गोपालसन्निधौ॥७॥

ततोऽसौ सत्यदेवस्य पूजां गोपगणैः सह।
भक्तिश्रद्धान्वितो भूत्वा चकार विधिना नृपः॥८॥

सत्यदेवेन प्रसादेन धनपुत्रान्वितोऽभवत् ।
इहलोके सुखं भुक्त्वा चान्ते सत्यपुरं ययौ॥ ९॥

"अनुवाद  ६-९

•उसका सम्पूर्ण धन-धान्य एवं सभी सौ पुत्र नष्ट हो गये। राजा ने मन में यह निश्चय किया कि अवश्य हो भगवान् सत्यनारायण ने हमारा नाश कर दिया है।६।

•इसलिये मुझे वहीं जाना चाहिये जहाँ श्रीसत्यनारायण का पूजन हो रहा था। ऐसा मन में निश्चय करके वह राजा गोपगणों (अहीरों) के समीप गया।७।

•और उसने गोपगणों के साथ भक्ति-श्रद्धा से युक्त होकर विधिपूर्वक भगवान् सत्यदेव की पूजा की।८।

• भगवान् सत्यदेव की कृपा से वह पुनः धन और पुत्रों से सम्पन्न हो गया तथा इस लोक में सभी सुखों को उपभोगकर अन्त में सत्यपुर (वैकुण्ठलोक)- को चला गया॥९॥

य इदं कुरुते  सत्यव्रतं  परमदुर्लभम्      
शृणोति च कथां पुण्यां भक्तियुक्तः फलप्रदाम् ॥१०॥

धनधान्यादिकं तस्य भवेत् सत्यप्रसादतः।
दरिद्रो लभते वित्तं बद्धो मुच्येत् बन्धनात्॥ ११॥

भीतो भयात् प्रमुच्येत् सत्यमेव न संशयः।
ईप्सितं च फलं भुक्त्वा चान्ते सत्यपुरं व्रजेत्॥ १२॥

इति वः कथितं विप्राः सत्यनारायणव्रतम्।
यत् कृत्वा सर्वदुः खेभ्यो मुक्तो भवति मानवः॥१३॥

"अनुवाद:- १०- १३

• सूत जी कहते हैं- जो व्यक्ति इस परम दुर्लभ श्रीसत्यनारायण के व्रत को करता और पुण्यमयी तथा फलप्रदायिनी कथा को भक्तियुक्त होकर सुनता है।१०।

• उसे भगवान् सत्यनारायण की कृपा से धन-धान्य आदि की प्राप्ति होती है। दरिद्र के घर में धन हो जाता है, बन्धन में पड़ा हुआ बन्धन से छूट जाता है।११।

• डरा हुआ व्यक्ति भय से मुक्त हो जाता है। यह सत्य बात है, इसमें संशय नहीं। (इस लोक में वह सभी इच्छित फलों का भोग प्राप्त करके अन्त में सत्यपुर (वैकुण्ठलोक) को जाता है।१२।

• हे ब्राह्मणो ! इस प्रकार मैंने आप लोगों से भगवान् सत्यनारायण के व्रत को कहा, जिसे करके मनुष्य सभी दुःखों से मुक्त हो जाता है॥१३॥


विशेषतः कलियुगे  सत्यपूजा  फलप्रदा।
केचित् कालं वदिष्यन्ति सत्यमीशं तमेव च॥१४॥

सत्यनारायणं केचित् सत्यदेवं तथापरे।
नानारूपधरो भूत्वा सर्वेषामीप्सितप्रदम् ॥१५॥

भविष्यति कलौ सत्यव्रतरूपी सनातनः।
श्रीविष्णुना धृतं रूपं सर्वेषामीप्सितप्रदम्॥१६॥

य इदं पठेत् नित्यं शृणोति मुनिसत्तमाः।
तस्य नश्यन्ति पापानि सत्यदेवप्रसादतः॥१७॥

व्रतं वैस्तु कृतं पूर्व सत्यनारायणस्य च।
तेषां त्वपरजन्मानि कथयामि मुनीश्वराः॥१८॥


"अनुवाद:- १४-१८

• कलियुग में तो भगवान् सत्यदेव (सत्यनारायण) की पूजा विशेष फल प्रदान करने वाली है। स्वराट विष्णु (परमेश्वर श्रीकृष्ण) को ही कुछ लोग काल, कुछ लोग सत्य, कोई ईश।१४।

•  और कोई सत्यदेव तथा दूसरे लोग सत्यनारायण नाम से कहेंगे। अनेक रूप धारण करके भगवान् सत्यनारायण सभी का मनोरथ सिद्ध करते हैं।१५।

• कलियुग में सनातन भगवान् विष्णु ही सत्यव्रत-रूप धारण करके सभी का मनोरथ पूर्ण करनेवाले होंगे।१६।

• हे श्रेष्ठ मुनियो ! जो व्यक्ति नित्य भगवान् सत्यनारायण की इस व्रत-कथा को पढ़ता है, सुनता है, भगवान् सत्यनारायण की कृपा से उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।१७।

• हे मुनीश्वरो ! पूर्वकाल में जिन लोगों ने भगवान् सत्यनारायण का व्रत किया था, उनके अगले जन्म का वृत्तान्त कहता हूँ, आप लोग उसे सुनें॥१८।


"शतानन्दो महाप्राज्ञः सुदामा ब्राह्मणो ह्यभूत्।
तस्मिञ्जन्मनि श्रीकृष्णं ध्यात्वा मोक्षमवाप ह ॥१९॥

"काष्ठभारवहो   भिल्लो   गुहराजो   बभूव ह।
तस्मिञ्जन्मनि श्रीरामं सेव्य मोक्षं जगाम वै ॥२०॥

"उल्कामुखो महाराजो नृपो दशरथोऽभवत्।
श्रीरङ्गनाथं सम्पूज्य श्रीवैकुण्ठं तदागमत् ॥२१॥

"धार्मिकः सत्यसन्धश्च साधुर्मोरध्वजोऽभवत्।
देहार्धं क्रकचैश्छित्त्वा दत्त्वा मोक्षमवाप ह॥२२॥

"तुङ्गध्वजो महाराजः स्वायम्भुवोऽभवत् किल।
सर्वान् भागवतान् कृत्वा श्रीवैकुण्ठं तदाऽगमत्॥ २३॥


अनुवाद:- १९-२३

• महान् प्रज्ञासम्पन्न शतानन्द नाम के ब्राह्मण [सत्यनारायणका व्रत करनेके प्रभावसे] दूसरे जन्म में सुदामा नामक ब्राह्मण हुए और उस जन्म में भगवान् श्रीकृष्ण का ध्यान करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया।१९।

• लकड़‌हारा भिल्लों का राजा गुहराज हुआ और अगले जन्ममें उसने भगवान् श्रीराम की सेवा करके मोक्ष प्राप्त किया।२०।

• महाराज उल्कामुख [दूसरे जन्म में] राजा दशरथ हुए, जिन्होंने श्रीरङ्गनाथ (विष्णु) की पूजा करके अन्त में वैकुण्ठ प्राप्त किया।२१।

• इसी प्रकार धार्मिक और सत्यव्रती साधु [ पिछले जन्म के सत्यव्रत के प्रभाव से दूसरे जन्म में ] मोरध्वज नाम का राजा हुआ। उसने आरे से चीरकर अपने पुत्र की आधी देह भगवान् विष्णुको अर्पित कर मोक्ष प्राप्त किया।२२।

• महाराज तुङ्गध्वज पूर्व जन्म में स्वायम्भुव मनु के रूप में हुए थे और भगवत्सम्बन्धी सम्पूर्ण कार्यों का अनुष्ठान करके वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुए। २३।

"भूत्वा गोपाश्च ते सर्वे  व्रजमण्डलवासिनः।
निहत्य राक्षसान् सर्वान् गोलोकं तु तदा ययुः॥२४॥

अनुवाद -

और जो गोपगण थे, वे सब जन्मान्तर में व्रजमण्डल में निवास करने वाले गोप हुए और सभी राक्षसों का संहार करके भगवान के शाश्वतधाम- गोलोक को प्राप्त किया ॥ २४॥

श्लोक २४ का शब्दार्थ :-
सत्यनारायण की वन में कथा करने वाले वे सभी गोपगण ही  व्रजमण्डल में (भूत्वा = जन्म लेकर /होकर )
गोपा: = गोप गण। ते सर्वे= वे सब। व्रजमण्डलवासिनः= व्रजमण्डल के निवासी।
निहत्य= मारकर। राक्षसान् सर्वान् = सभी राक्षसों को ।


✳️  किन्तु आश्चर्य इस बात यह है कि- इस सत्यनारायण व्रत कथा में गोपों से सम्बन्धित सबसे महत्वपूर्ण श्लोक- ।२४ को-

"भूत्वा गोपाश्च  ते  सर्वे  व्रजमण्डलवासिनः।
निहत्य राक्षसान् सर्वान् गोलोकं तु तदा ययुः"॥२४।

स्कन्दपुराण के रेवाखण्ड के अध्याय-(२३६) से कथाकारों
ने इर्ष्या बस निकलवा दिया है। अब वहाँ पर (२४) श्लोक न होकर केवल (२३) श्लोक ही शेष रह गए हैं। गोपों के इस (२४ वें) महत्वपूर्ण श्लोक अब वर्तमान समय में गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित "सत्यनारायण व्रत कथा" में मिलता है। इसके अलावा "शब्द कल्पद्रुम" (खण्ड- ५ पृष्ठ संख्या- २२९) में गोपों का यह महत्वपूर्ण श्लोक आज भी सुरक्षित है।

कुल मिलाकर सत्यनारायण व्रत कथा से यह सिद्ध होता है कि गोप प्रारम्भ से ही धार्मिक, धर्मवत्सल, तथा वैष्णव धर्म के प्रबल प्रचारक रहे हैं।

गोपों के इसी गुण विशेष के कारण भगवान श्रीकृष्ण के सामने श्रीराधा जी ने गोपों को सबसे बड़ा धर्मवत्सल कहा इस बात की पुष्टि - गर्गसंहिता के वृन्दावन खण्ड के अध्याय-१८ के श्लोक संख्या -२२ से होती है। जिसमें राधा जी श्रीकृष्ण से कहती हैं कि-

"गा: पालयन्ति सततं रजसो गवां च गङ्गां स्पृशन्ति च जपन्ति गवां सुनाम्नाम।
प्रेक्षन्त्यहर्निशमलं सुमुखं गवां च जाति: परा न विदिता भुवि गोपजाते:।।२२।

अनुवाद - गोप सदा गौओं का पालन करते हैं। गोरज की  गङ्गा में नहाते हैं, उनका स्पर्श करते हैं तथा गौओं के उत्तम नाम का जाप करते हैं। इतना ही नहीं उन्हें दिन- रात गौओं के सुन्दर मुख का दर्शन होता है। मेरी समझ में तो इस भूतल पर गोप जाति से बढ़ कर दूसरी कोई जाति ही नहीं है।

इस प्रकार से गोपों की सत्यनारायण व्रत कथा समाप्त हुई। अब इसकी अगली परिशिष्ट कथा (4) में वेदमाता गायत्री की कथा को जानेंगे।

(4)- वेदमाता गायत्री की कथा


ज्ञान की देवी जगत कल्याणिनी माता गायत्री भी एक गोप यानी अहीर कन्या हैं, जिनका विवाह पूर्व काल में ब्रह्माजी के उस तत्कालिक महान यज्ञ को सम्पन्न करने के लिए हुआ था, जिसको ब्रह्माजी ने अपनी प्रथम सृष्टि सृजन के उपरान्त भू-तल पर पुष्कर में किया था। या कहें कि अहीर कन्या गायत्री का विवाह ब्रह्मा जी से केवल यज्ञ सम्पादन और संसार में आध्यात्मिक ज्ञान के प्रसारण के लिए ही है। सांसारिक सृष्टि उत्पादन के लिए नहीं।


देवी गायत्री का पारिवारिक परिचय-

पौराणिक साक्ष्यों की मानें तो देवी गायत्री की माता का नाम "गोविला" और पिता का नाम "गोविल" था। जो दोनो ही नाम परमेश्वर श्रीकृष्ण के परमधाम गोलोक से सम्बन्धित है। गायत्री के पिता-गोविल को नन्दसेन,अथवा नरेन्द्र सेन आभीर नाम से भी जाना जाता है। जो आनर्त देश, वर्तमान नाम (गुजरात) के रहने वाले थे। इस बात की पुष्टि-
लक्ष्मीनारायणी-संहिता के खण्ड (एक) के अध्याय-(५०९) के प्रमुख श्लोकों से होती है,जो इस प्रकार हैं -

"ब्रह्मणं यज्ञमिमं ज्ञात्वा शुद्धः स्नात्वा समागतः।
गोपकन्या नित्यं या शुद्धात्मा वैष्णव जातिका।।६२।।

श्री विष्णो वै तमुवाच प्रत्युत्तरं शृणु प्रिये ।
जाल्म एषाऽस्ति वीराण्याभीराणी जातितोऽस्ति वै ।।६४।।

शृणु जानामि तद्वृत्तं नान्ये जानन्त्येतद्विदः।
पुरा सृष्टे समारम्भे गोलोके श्रीकृष्णेन परात्मना सुघटिता।६५।

अमुना स्वांशरूपा हि सावित्री स्वमूर्तेः प्रकटीकृता।
अथ द्वितीया रूपा कन्या च गायत्र्याभिधा कृता।।६६।

सावित्री श्रीहरिणैव गोलोके एव सन्निधौ।
अथ भूलोके यज्ञप्रवाहार्थं  ब्रह्माणं ववल्हे।।६८।

पृथिव्यां मर्त्यरूपेण तत्र मानुषविग्रहा ।
पत्नी यज्ञस्य कार्यार्थमपेक्षिता बभूव।।६९।

हेतुनाऽनेन कृष्णेन सावित्र्याज्ञापिता तदा ।
द्वितीयेन स्वरूपेण त्वया गन्तव्यमेव ह गायत्री नाम्ना।। ७०।

अनुवाद:-
• इस ब्रह्मा के यज्ञसत्र को जानकर शुद्ध स्नान करके आयी हुई गोप कन्या नित्य जो शुद्धात्मा और वैष्णव जाति (अभीर जाति) की है।६२।

• श्रीकृष्ण ने उत्तर देते हुए उस गोप-कन्या को कहा ! सुन प्रिये ! ये बात छिपी हुई नही है कि ये वीराणी जाति से निश्चय ही अहीराणी है।६४।

• सुनो ! मैं जानाता हूँ वह वृत (इतिहास) कोई अन्य विद्वान नहीं जानता यह सत्य पूर्वकाल में सृष्टि के प्रारम्भ में श्रीकृष्ण परमात्मा के द्वारा गोलोक में सुघटित हुआ।।६५।

• उस परमात्मा के द्वारा अपने ही अंश से सावित्री और दूसरी कन्या को गायत्री नाम से प्रकट किया गया।६६।

• सावित्री श्रीहरि के द्वारा ही गोलोक में प्रभु के सानिन्ध्य में भूलोक में यज्ञ प्रवाहन के लिए ब्रह्माजी को प्रदान की गयीं ।६८।

• पृथ्वी पर मनुष्य रूप में वहाँ मानव शरीर में ब्रह्मा की पत्नी रूप में यज्ञ कार्य के लिए अवतरित  हुईं।६९।

• उस कारण से कृष्ण के द्वारा सावित्री को आज्ञा दी गयी। तब द्वित्तीय स्वरूप में तुमको गायत्री नाम से जानना चाहिए।७०।
        


वैवाहिक सम्बन्ध

अहीर कन्या गायत्री का विवाह ब्रह्मा जी से हुआ था। किन्तु उनका विवाह एक आकस्मिक घटना का परिणाम था जो अचानक घटित हुआ और इत्तेफाक से गायत्री का विवाह ब्रह्मा जी से हो गया। उनके विवाह के सम्बन्ध में न तो ब्रह्मा जी की कोई पूर्व योजना थी और ना ही गायत्री के परिवार वालों को इसकी जानकारी थी। उनके वैवाहिक घटनाक्रम का वर्णन पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय- 16 और 17 में मिलता है। वहीं से गायत्री के वैवाहिक घटनाक्रम को उद्धृत किया गया है जो निम्नलिखित है-


पद्मपुराण (सृष्टि खण्ड अध्याय- 16)


द्वाराध्यक्षं तथा शक्रं वरुणं रसदायकम्।
वित्तप्रदं वैश्रवणं पवनं गंधदायिनम्।१११।
उद्योतकारिणं सूर्यं प्रभुत्वे माधवः स्थितः।
सोमः सोमप्रदस्तेषां वामपक्ष पथाश्रितः११२।

उस पुष्कर यज्ञ में-  ब्रह्मा ने शंकर और इन्द्र को द्वारपाल नियुक्त किया, वरुण को जल देने का, कुबेर को धन वितरित करने का, वायु को सुगन्ध प्रदान करने का, सूर्य को प्रकाश व्यवस्था करने का और विष्णु को मुख्य अधिकारी के रूप में नियुक्त किया। सोम दाता चन्द्रमा ने बाईं ओर के मार्ग का सहारा लिया। १११-११२

सुसत्कृता च पत्नी सा सवित्री च वरांगना।
अध्वर्युणा समाहूता एहि देवि त्वरान्विता११३।
उत्थिताश्चाग्नयः सर्वे दीक्षाकाल उपागतः।
व्यग्रा सा कार्यकरणे स्त्रीस्वभावेन नागता११४।
इहवै न कृतं किंचिद्द्वारे वै मंडनं मया।
भित्त्यां वैचित्रकर्माणि स्वस्तिकं प्रांगणेन तु११५।
प्रक्षालनं च भांडानां न कृतं किमपि त्विह।
लक्ष्मीरद्यापि नायाता पत्नीनारायणस्य या११६।

अग्नेः पत्नी तथा स्वाहा धूम्रोर्णा तु यमस्य तु।
वारुणी वै तथा गौरी वायोर्वै सुप्रभा तथा११७।
ऋद्धिर्वैश्रवणी भार्या शम्भोर्गौरी जगत्प्रिया।
मेधा श्रद्धा विभूतिश्च अनसूया धृतिः क्षमा११९।
गंगा सरस्वती चैव नाद्या याताश्च कन्यकाः।
इंद्राणी चंद्रपत्नी तु रोहिणी शशिनः प्रियाः१२०।
अरुंधती वसिष्ठस्य सप्तर्षीणां च याः स्त्रियः।
अनसूयात्रिपत्नी च तथान्याः प्रमदा इह१२१।
वध्वो दुहितरश्चैव सख्यो भगिनिकास्तथा।
नाद्यागतास्तु ताः सर्वा अहं तावत्स्थिता चिरं१२२।
नाहमेकाकिनी यास्ये यावन्नायांति ता स्त्रियः।
ब्रूहि गत्वा विरंचिं तु तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम्१२३।
सर्वाभिः सहिता चाहमागच्छामि त्वरान्विता।
सर्वैः परिवृतः शोभां देवैः सह महामते१२४।
भवान्प्राप्नोति परमां तथाहं तु न संशयः।
वदमानां तथाध्वर्युस्त्यक्त्वा ब्रह्माणमागतः१२५।

उनकी सुंदर पत्नी सावित्री, जो बहुत सम्मानित थीं, को अध्वर्यु ने आमंत्रित किया : “महोदया, जल्दी आइए, सभी अग्नि प्रज्वलित हो गई हैं (अर्थात अच्छी तरह प्रज्वलित हैं), दीक्षा का समय निकट आ गया है।” वह किसी काम में तल्लीन होने के कारण, जैसा कि आमतौर पर महिलाओं के साथ होता है,उसी प्रकार सावित्री के साथ हुआ जो  तुरन्त नहीं आईं। “मैंने यहाँ द्वार पर कोई सजावट नहीं की है; मैंने दीवार पर चित्र नहीं बनाए हैं; मैंने आँगन में स्वस्तिक नहीं बनाया है । यहाँ बर्तनों की सफाई भी नहीं की गई है। नारायण की पत्नी लक्ष्मी अभी तक नहीं आई हैं। अग्नि की पत्नी स्वाहा ; यम की पत्नी धूम्रोर्णा ; वरुण की पत्नी गौरी ; कुबेर की पत्नी ऋद्धि ; शंभू की पत्नी गौरी, जो संसार को प्रिय हैं। मेधा , श्रद्धा , विभूति , अनसूया , धृति , क्षमा और गंगा एवं सरस्वती नदियाँ भी अभी तक नहीं आई हैं।”सावित्री ने इस प्रकार अधर्वु से कहा - आओ। इंद्राणी , और चंद्रमा की प्रिय पत्नी रोहिणी । इसी प्रकार वशिष्ठ की पत्नी आरुंधती; सात ऋषियों की पत्नियाँ, और अत्रि की पत्नी अनसूया और अन्य देवियाँ, बहुएँ, पुत्रियाँ, मित्राएँ, बहनें अभी तक नहीं आई हैं।
मैं अकेले ही यहाँ (उनकी प्रतीक्षा में) बहुत समय से रुकी हुई हूँ। उन देवियों के आने तक मैं अकेले नहीं जाऊँगी। जाओ और ब्रह्मा से कहो कि वे थोड़ी देर प्रतीक्षा करें। मैं उन सभी (देवियों) के साथ शीघ्र ही आऊँगी; हे उच्च बुद्धि वाले, देवताओं से घिरे हुए, आपको महान कृपा प्राप्त होगी; मुझे भी होगी; इसमें कोई संदेह नहीं है।” उसे इस प्रकार बोलते हुए सावित्री को छोड़कर अध्वर्यु ब्रह्मा के पास आ गया। ११३-१२५


सावित्री व्याकुला देव प्रसक्ता गृहकर्माणि।
सख्यो नाभ्यागता यावत्तावन्नागमनं मम१२६।
एवमुक्तोस्मि वै देव कालश्चाप्यतिवर्त्तते।
यत्तेद्य रुचितं तावत्तत्कुरुष्व पितामह१२७।
एवमुक्तस्तदा ब्रह्मा किंचित्कोपसमन्वितः।

“हे भगवान, सावित्री व्यस्त हैं; वे घरेलू कामों में लगी हैं। उन्होंने मुझसे कहा है कि जब तक मेरी अन्य सखियाँ नहीं आ जाती, मैं नहीं आऊँगी। हे प्रभु, समय बीत रहा है। हे दादाजी, अब आप जो करना चाहें करें।” १२६-१२७

पत्नीं चान्यां मदर्थे वै शीघ्रं शक्र इहानय१२८।
यथा प्रवर्तते यज्ञः कालहीनो न जायते।
तथा शीघ्रं विधित्स्व त्वं नारीं कांचिदुपानय१२९।
यावद्यज्ञसमाप्तिर्मे वर्णे त्वां मा कृथा मनः।
भूयोपि तां प्रमोक्ष्यामि समाप्तौ तु क्रतोरिह१३०।


ब्रह्मा, इस प्रकार सम्बोधित किए जाने पर थोड़ा क्रोधित हुए और इन्द्र से बोले, “हे शक्र, मेरे लिए शीघ्र ही दूसरी पत्नी का प्रबन्ध कीजिए। वह कार्य शीघ्र कीजिए जिससे यज्ञ सुचारू रूप से सम्पन्न हो और विलम्ब न हो; यज्ञ समाप्त होने तक मेरे लिए कोई स्त्री लाइए; मैं आपसे विनती कर रहा हूँ; मेरे लिए निर्णय कीजिए; यज्ञ समाप्त होने के बाद मैं उसे फिर से मुक्त कर दूँगा।” १२८-१३०

एवमुक्तस्तदा शक्रो गत्वा सर्वं धरातलं।
स्त्रियो दृष्टाश्च यास्तेन सर्वाः परपरिग्रहाः१३१।

131. इस प्रकार सम्बोधित होकर, इन्द्र ने पूरी पृथ्वी पर घूमकर स्त्रियों का अवलोकन किया, (परन्तु) वे सब दूसरों की पत्नियाँ थीं।

आभीरकन्या रूपाढ्या सुनासा चारुलोचना।
न देवी न च गंधर्वी नासुरी न च पन्नगी१३२।
न चास्ति तादृशी कन्या यादृशी सा वरांगना।
ददर्श तां सुचार्वंगीं श्रियं देवीमिवापराम्१३३।
संक्षिपन्तीं मनोवृत्ति विभवं रूपसंपदा।
यद्यत्तु वस्तुसौंदर्याद्विशिष्टं लभ्यते क्वचित्१३४।
तत्तच्छरीरसंलग्नं तन्वंग्या ददृशे वरम्।
तां दृष्ट्वा चिंतयामास यद्येषा कन्यका भवेत्१३५।
तन्मत्तः कृतपुण्योन्यो न देवो भुवि विद्यते।
योषिद्रत्नमिदं सेयं सद्भाग्यायां पितामहः१३६।
सरागो यदि वा स्यात्तु सफलस्त्वेष मे श्रमः।
नीलाभ्र कनकांभोज विद्रुमाभां ददर्श तां१३७।
त्विषं संबिभ्रतीमंगैः केशगंडे क्षणाधरैः।
मन्मथाशोकवृक्षस्य प्रोद्भिन्नां कलिकामिव१३८।
प्रदग्धहृच्छयेनैव नेत्रवह्निशिखोत्करैः।
धात्रा कथं हि सा सृष्टा प्रतिरूपमपश्यता१३९।
कल्पिता चेत्स्वयं बुध्या नैपुण्यस्य गतिः परा।

एक अहीर की पुत्री थी, जो अत्यन्त सुन्दर, सुडौल नाक और आकर्षक आँखों वाली थी। कोई देवी, कोई गन्धर्व स्त्री, कोई राक्षसी, कोई नाग स्त्री, कोई कन्या उस उत्तम स्त्री के समान नहीं थी। उसने उसे एक अन्य देवी लक्ष्मी के समान आकर्षक रूप में देखा, और वह अपनी सुन्दरता के बल पर मन की क्रियाओं को वश में कर लेती थी।
सौन्दर्य से परिपूर्ण जो भी वस्तुएँ कहीं भी पाई जाती हैं, वैसी ही उत्तम वस्तुएँ सुडौल शरीर वाली स्त्री से जुड़ी हुई प्रतीत हुईं। उन्हें देखकर इन्द्र ने सोचा: 'यदि वह कन्या है, तो पृथ्वी पर मुझसे अधिक गुणवान देवता कोई नहीं है। यह वह अनमोल स्त्री है, जिसके लिए यदि दादाजी की इच्छा हो, तो मेरा यह प्रयास फलदायी होगा।'
उसने उसे नीले आकाश, सुनहरे कमल और मूंगे जैसी सुंदरता से युक्त देखा, उसके अंगों, बालों, गालों, आँखों और होठों में चमक थी और वह सेब के पेड़ या अशोक के पेड़ की अंकुरित कली जैसी थी। उसे 'सृष्टिकर्ता ने कैसे बनाया, जिसके हृदय में जलता हुआ बाण था और आँखों में कामना की) आग की लपटें थीं, बिना उसकी कोई छवि देखे? १३२-१३९


उत्तुंगाग्राविमौ सृष्टौ यन्मे संपश्यतः सुखं१४०।
पयोधरौ नातिचित्रं कस्य संजायते हृदि।
रागोपहतदेहोयमधरो यद्यपि स्फुटम्१४१।
तथापि सेवमानस्य निर्वाणं संप्रयच्छति।
वहद्भिरपि कौटिल्यमलकैः सुखमर्प्यते१४२।
दोषोपि गुणवद्भाति भूरिसौंदर्यमाश्रितः।
नेत्रयोर्भूषितावंता वाकर्णाभ्याशमागतौ१४३।


181-183. कमल भी उसकी आँखों के समान नहीं होता। जल शंख की तुलना उसके शंख जैसे कानों से कैसे की जा सकती है? यहाँ तक कि मूंगा भी उसके होंठों के समान नहीं होता। उसमें अमृत निवास करता है। वह निश्चित रूप से अमृत का प्रवाह उत्पन्न करता है। यदि मैंने अपने सैकड़ों पूर्व जन्मों में कोई शुभ कर्म किया है, तो उसकी शक्ति से, जिसे मैं चाहूँ, वही मेरा पति हो।

कारणाद्भावचैतन्यं प्रवदंति हि तद्विदः।
कर्णयोर्भूषणे नेत्रे नेत्रयोः श्रवणाविमौ१४४।
कुंडलांजनयोरत्र नावकाशोस्ति कश्चन।
न तद्युक्तं कटाक्षाणां यद्द्विधाकरणं हृदि१४५।
तवसंबंधिनोयेऽत्र कथं ते दुःखभागिनः।
सर्वसुंदरतामेति विकारः प्राकृतैर्गुणैः१४६।
वृद्धे क्षणशतानां तु दृष्टमेषा मया धनम्।
धात्रा कौशल्यसीमेयं रूपोत्पत्तौ सुदर्शिता१४७।
करोत्येषा मनो नॄणां सस्नेहं कृतिविभ्रमैः।
एवं विमृशतस्तस्य तद्रूपापहृतत्विषः१४८।
निरंतरोद्गतैश्छन्नमभवत्पुलकैर्वपुः।
तां वीक्ष्य नवहेमाभां पद्मपत्रायतेक्षणाम्१४९।
देवानामथ यक्षाणां गंधर्वोरगरक्षसाम्।
नाना दृष्टा मया नार्यो नेदृशी रूपसंपदा१५० 1.16.150।
त्रैलोक्यांतर्गतं यद्यद्वस्तुतत्तत्प्रधानतः।
समादाय विधात्रास्याः कृता रूपस्य संस्थितिः१५१।


यदि भगवान ने उसे अपने विचार के अनुसार गढ़ा है, तो यह उसकी कला का सर्वोच्च उत्पाद है। ये ऊंचे स्तन उसी ने गढ़े हैं; इन्हें देखकर मुझे आनन्द मिल रहा है। इन्हें देखकर किसके हृदय में विस्मय उत्पन्न नहीं होगा? यद्यपि इस होंठ का आकार स्पष्ट रूप से कामना (और लालिमा) से भरा हुआ है, फिर भी यह देखने वाले को अपार आनन्द देगा। बाल, टेढ़े-मेढ़े होने के बावजूद (अर्थात घुंघराले बाल), आनन्द दे रहे हैं। यहाँ तक कि दोष भी, जब प्रचुर सुन्दरता के साथ मिल जाता है, तो गुण प्रतीत होता है। उसकी आँखों के सजे हुए कोने उसके कानों तक पहुँच गए हैं; और इसी कारण विशेषज्ञ *सुंदरता को प्रेम की आत्मा कहते हैं।* उसकी आँखें उसके कानों के आभूषण हैं और उसके कान उसकी आँखों के आभूषण हैं। यहाँ न तो कान की बालियों की कोई आवश्यकता है और न ही काजल की। उसकी निगाहें हृदय को दो भागों में बांटने के लिए उपयुक्त नहीं हैं। जो लोग आपके सम्पर्क में आते हैं, वे कैसे दुःख का अनुभव कर सकते हैं? प्राकृतिक गुणों के सम्पर्क में आने पर कुरूपता भी अत्यन्त सुन्दर हो जाती है। मैंने अपनी सैकड़ों विशाल आँखों का अनमोल खजाना देखा है। सृष्टिकर्ता ने इस सुन्दर रूप को बनाने में अपनी कुशलता का अद्भुत प्रदर्शन किया है। अपनी मनमोहक गतिविधियों से वह मनुष्यों के मन में प्रेम उत्पन्न करती है।' इस प्रकार सोचते समय जिसकी चमक छिन गई थी, उसका शरीर लगातार रोंगटे खड़े होने से ढक गया। नए सोने के समान आकर्षण और कमल के पत्तों जैसी लंबी आँखों वाली उस स्त्री को देखकर उसने सोचा: 'मैंने देवताओं, यक्षों, गंधर्वों, नागों और राक्षसों की कई देवियाँ देखी हैं, पर कहीं भी इतनी सुन्दरता नहीं देखी। सृष्टिकर्ता ने तीनों लोकों में मौजूद सभी चीजों को विशेष रूप से एकत्रित करके उसका रूप गढ़ा है।' १४०-१५१

इन्द्र उवाच।
कासि कस्य कुतश्च त्वमागता सुभ्रु कथ्यताम्।

एकाकिनी किमर्थं च वीथीमध्येषु तिष्ठसि१५२।
यान्येतान्यंगसंस्थानि भूषणानि बिभर्षि च।
नैतानि तव भूषायै त्वमेतेषां हि भूषणम्१५३।
न देवी न च गंधर्वी नासुरी न च पन्नगी।
किन्नरी दृष्टपूर्वा वा यादृशी त्वं सुलोचने१५४।
उक्ता मयापि बहुशः कस्माद्दत्से हि नोत्तरम्।
त्रपान्विता तु सा कन्या शक्रं प्रोवाच वेपती१५५।


इन्द्र ने गोप कन्या से  कहा :
152-155. हे आकर्षक भौंहों वाली, मुझे बताओ—तुम कौन हो? तुम किसकी पुत्री हो? तुम कहाँ से आई हो? तुम सड़क के बीचों बीच क्यों खड़ी हो? ये आभूषण जो तुम्हारे शरीर को और भी आकर्षक बनाते हैं और जिन्हें तुमने पहना है, वे तुम्हें नहीं, बल्कि तुम ही उन्हें सुशोभित करती हो। हे सुंदर नेत्रों वाली, न कोई देवी, न कोई गंधर्व स्त्री, न कोई राक्षसी, न कोई नाग, न कोई किन्नर स्त्री तुम्हारे समान सुंदर देखी गई है। बार-बार कहने पर भी तुम उत्तर क्यों नहीं देती? तब वह कन्या (गायत्री), लज्जा और भय से अभिभूत होकर, इन्द्र से बोली-


गोपकन्या त्वहं वीर विक्रीणामीह गोरसम्।
नवनीतमिदं शुद्धं दधि चेदं विमंडकम्१५६।

दध्ना चैवात्र तक्रेण रसेनापि परंतप।
अर्थी येनासि तद्ब्रूहि प्रगृह्णीष्व यथेप्सितम्१५७।



“हे वीर, मैं एक आभीर (अहीर) कन्या हूँ; मैं दूध, यह शुद्ध मक्खन और मलाई से भरा दही बेचती हूँ। आपको जो भी स्वाद चाहिए- दही का या छाछ का मुझे बताएँ, जितना चाहें उतना ले लें।” १५६-१५७


एवमुक्तस्तदा शक्रो गृहीत्वा तां करे दृढम्।
अनयत्तां विशालाक्षीं यत्र ब्रह्मा व्यवस्थितः१५८।
नीयमाना तु सा तेन क्रोशंती पितृमातरौ।
हा तात मातर्हा भ्रातर्नयत्येष नरो बलात्१५९।
यदि वास्ति मया कार्यं पितरं मे प्रयाचय।
स दास्यति हि मां नूनं भवतः सत्यमुच्यते१६०।
का हि नाभिलषेत्कन्या भर्तांरं भक्तिवत्सलम्।
नादेयमपि ते किंचित्पितुर्मे धर्मवत्सल१६१।
प्रसादये तं शिरसा मां स तुष्टः प्रदास्यति।
पितुश्चित्तमविज्ञाय यद्यात्मानं ददामि ते१६२।
धर्मो हि विपुलो नश्येत्तेन त्वां न प्रसादये।
भविष्यामि वशे तुभ्यं यदि तातः प्रदास्यति१६३।


इस प्रकार (उसके द्वारा) सम्बोधित किए जाने पर, इन्द्र ने दृढ़ता से उसका हाथ पकड़ लिया और उस बड़ी आँखों वाली महिला (गायत्री) को उस स्थान पर ले आए जहाँ ब्रह्मा स्थित थे।
जिसे इन्द्र ले जा रहा था, वह अपने माता-पिता के लिए रो रही थी। 'हे पिता, हे माता, हे भाई, यह आदमी मुझे जबरदस्ती ले जा रहा है।'
उसने इन्द्र से कहा- “यदि आपको मुझसे कुछ काम करवाना है, तो मेरे पिता से निवेदन कीजिए। वे मुझे आपको सौंप देंगे; मैं सत्य कह रही हूँ। कौन सी कन्या स्नेही पति की कामना नहीं करती ? हे धर्मनिष्ठ, मेरे पिता आपसे कुछ भी स्वीकार नहीं करेंगे।”
मैं अपना सिर झुकाकर उसे प्रसन्न करूँगा, और प्रसन्न होकर वह मुझे आपके समक्ष प्रस्तुत करेगा। यदि मैं अपने पिता के मन को जाने बिना स्वयं को आपके समक्ष प्रस्तुत करूँ, तो मेरे बहुत से धार्मिक पुण्य नष्ट हो जाएँगे और इसलिए मैं आपको प्रसन्न नहीं कर पाऊँगा। मैं आपके समक्ष तभी स्वयं को समर्पित करूँगा जब मेरे पिता मुझे आपके समक्ष प्रस्तुत करेंगे। १५८-१६३



इत्थमाभाष्यमाणस्तु तदा शक्रोऽनयच्च ताम्।
ब्रह्मणः पुरतः स्थाप्य प्राहास्यार्थे मयाऽबले१६४।
आनीतासि विशालाक्षि मा शुचो वरवर्णिनि।
गोपकन्यामसौ दृष्ट्वा गौरवर्णां महाद्युतिम्१६५।
कमलामेव तां मेने पुंडरीकनिभेक्षणाम्।
तप्तकांचनसद्भित्ति सदृशा पीनवक्षसम्१६६।
मत्तेभहस्तवृत्तोरुं रक्तोत्तुंग नखत्विषं।
तं दृष्ट्वाऽमन्यतात्मानं सापि मन्मनथचरम्१६७।
तत्प्राप्तिहेतु क धिया गतचित्तेव लक्ष्यते।
प्रभुत्वमात्मनो दाने गोपकन्याप्यमन्यत१६८।


यद्यपि शक्र को वह इस प्रकार संबोधित कर रही थी, फिर भी उसने उसे अपने साथ ले लिया और ब्रह्मा के समक्ष रखकर कहा: “हे बड़ी आँखों वाली स्त्री, मैं तुम्हें इस (स्वामी) के लिए लाया हूँ; हे उत्तम रंग वाली, दुखी मत हो।” गोरी और तेज से भरी ग्वालिन पुत्री को देखकर ब्रह्मा ने कमल के समान आँखों वाली उसे स्वयं लक्ष्मी समझा। गर्म सोने की दीवार के एक भाग के समान, वह भी उसे मजबूत सीने, मदहोश हाथियों के सूंड के समान गोल जांघों और लाल और चमकदार नाखूनों से युक्त देखकर प्रेम से ओतप्रोत प्रतीत हुई। उसे (पति के रूप में) प्राप्त करने की इच्छा से गोपी बेसुध सी प्रतीत हुई। उसने यह भी सोचा कि उसे स्वयं को (उसे) अर्पित करने का अधिकार है। १६४-१६८

उसने मन ही मन कहा-
यद्येष मां सुरूपत्वादिच्छत्यादातुमाग्रहात्।
नास्ति सीमंतिनी काचिन्मत्तो धन्यतरा भुवि१६९।
अनेनाहं समानीता यच्चक्षुर्गोचरं गता।

अस्य त्यागे भवेन्मृत्युरत्यागे जीवितं सुखम्१७०।
भवेयमपमानाच्च धिग्रूपा दुःखदायिनी।
दृश्यते चक्षुषानेन यापि योषित्प्रसादतः१७१।
सापि धन्या न संदेहः किं पुनर्यां परिष्वजेत्।
जगद्रूपमशेषं हि पृथक्संचारमाश्रितम्१७२।
लावण्यं तदिहैकस्थं दर्शितं विश्वयोनिना।
अस्योपमा स्मरः साध्वी मन्मथस्य त्विषोपमा१७३।
तिरस्कृतस्तु शोकोयं पिता माता न कारणम्।
यदि मां नैष आदत्ते स्वल्पं मयि न भाषते१७४।
अस्यानुस्मरणान्मृत्युः प्रभविष्यति शोकजः।
अनागसि च पत्न्यां तु क्षिप्रं यातेयमीदृशी१७५।
कुचयोर्मणिशोभायै शुद्धाम्बुज समद्युतिः।
मुखमस्य प्रपश्यंत्या मनो मे ध्यानमागतम्१७६।
अस्यांगस्पर्शसंयोगान्न चेत्त्वं बहु मन्यसे।
स्पृशन्नटसि तर्हि न त्वं शरीरं वितथं परम्१७७।
अथवास्य न दोषोस्ति यदृच्छाचारको ह्यसि।
मुषितः स्मर नूनं त्वं संरक्ष स्वां प्रियां रतिम्१७८।
त्वत्तोपि दृश्यते येन रूपेणायं स्मराधिकः।
ममानेन मनोरत्न सर्वस्वं च हृतं दृढम्१७९।
शोभा या दृश्यते वक्त्रे सा कुतः शशलक्ष्मणि।
नोपमा सकलं कस्य निष्कलंकेन शस्यते१८०।


अनुवाद- १६९-१८०

(उसने मन ही मन कहा-) 'यदि वह मेरी सुन्दरता के कारण मुझे पाने की ज़िद करता है, तो मुझसे अधिक भाग्यशाली कोई स्त्री नहीं है। उसने मुझे देखते ही अपना लिया। यदि मैं उसे छोड़ दूँ तो मेरी मृत्यु हो जाएगी; यदि मैं उसे नहीं छोड़ूँ तो मेरा जीवन सुखमय होगा; और अपमान के कारण—अपने निंदित रूप से—मैं (दूसरों को) दुःख पहुँचाऊँगी; जिस भी स्त्री पर उसकी नज़र कृपा करे, वह भी धन्य होगी। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है; (तो) उस स्त्री का क्या होगा जिसे वह गले लगाएगा? संसार की सारी सुन्दरता अनेक दिशाओं में विचरण कर चुकी है (अर्थात् विभिन्न स्थानों में विद्यमान रही है); (अब) ब्रह्माण्ड के स्रोत (अर्थात् सृष्टिकर्ता) ने सुन्दरता को केवल एक ही स्थान पर प्रकट किया है। वह केवल कामदेव के समान है; उसकी चमक के कारण कामदेव से तुलना करना उचित है। मैं अपने इस दुःख को त्याग देती हूँ। न तो पिता और न ही माता (जीवन में जो कुछ भी मिलता है) का कारण होते हैं। यदि वह मुझे स्वीकार न करे या मुझसे थोड़ी भी बात न करे, तो मैं उसके लिए तड़पते हुए दुःख से मर जाऊँगी।' जब यह निष्कलंक अपनी पत्नी के पास जाता है (अर्थात अपनी पत्नी के प्रति पति का आलिंगन करता है), तो शुद्ध कमलों के समान तेज उसके स्तनों पर रत्नों की शोभा बढ़ा देता है। उसे देखकर मेरा मन चिंतन में लीन हो गया है। (वह मन ही मन कहती है:) यदि तुम उसके शरीर के स्पर्श और संपर्क को महत्व नहीं देते, तो तुम ऐसे उत्तम शरीर को स्पर्श न करके व्यर्थ ही भटक रहे हो। या यह उसकी गलती नहीं है; क्योंकि तुम अपनी इच्छा से भटकते हो। हे कामदेव, तुम सचमुच लूटे गए हो। अपनी प्रिय रति की रक्षा करो , क्योंकि हे कामदेव, वह सुन्दरता में तुमसे श्रेष्ठ प्रतीत होता है। उसने निश्चय ही मेरे मन का रत्न और मेरी समस्त संपत्ति छीन ली है। उसके चेहरे पर जो सौंदर्य दिखाई देता है, वह चन्द्रमा पर कैसे पाया जा सकता है? दागदार वस्तु और बेदाग वस्तु की तुलना करना उचित नहीं है।

समानभावतां याति पंकजं नास्य नेत्रयोः।
कोपमा जलशंखेन प्राप्ता श्रवणशंङ्खयोः१८१।
विद्रुमोप्यधरस्यास्य लभते नोपमां ध्रुवम्।
आत्मस्थममृतं ह्येष संस्रवंश्चेष्टते ध्रुवम्१८२।
यदि किंचिच्छुभं कर्म जन्मांतरशतैः कृतम्।
तत्प्रसादात्पुनर्भर्ता भवत्वेष ममेप्सितः१८३।
एवं चिंतापराधीना यावत्सा गोपकन्यका।
तावद्ब्रह्मा हरिं प्राह यज्ञार्थं सत्वरं वचः१८४।
देवी चैषा महाभागा गायत्री नामतः प्रभो।
एवमुक्ते तदा विष्णुर्ब्रह्माणं प्रोक्तवानिदम्१८५।
तदेनामुद्वहस्वाद्य मया दत्तां जगत्प्रभो।
गांधर्वेण विवाहेन विकल्पं मा कृथाश्चिरम्१८६।
अमुं गृहाण देवाद्य अस्याः पाणिमनाकुलम्।
गांधेर्वेण विवाहेन उपयेमे पितामहः१८७।


184-187. जब वह गोपी चिंतन में लीन होकर व्याकुल हो गई, तो ब्रह्मा ने यज्ञ को शीघ्र सम्पन्न कराने के लिए विष्णु से ये शब्द कहे: “हे प्रभु, यह अत्यन्त धन्य देवी गायत्री हैं।” ये शब्द सुनकर विष्णु ने ब्रह्मा से ये शब्द कहे: “हे जगत के स्वामी, आज ही गांधर्व विधि से उनका विवाह कीजिए, जिन्हें मैंने आपको दिया है। अब और संकोच न कीजिए। हे प्रभु, बिना विचलित हुए उनका हाथ स्वीकार कीजिए।” (तब) दादाजी ने उनका गांधर्व विधि से विवाह किया।


तामवाप्य तदा ब्रह्मा जगादाद्ध्वर्युसत्तमम्।
कृता पत्नी मया ह्येषा सदने मे निवेशय१८८।
मृगशृंगधरा बाला क्षौमवस्त्रावगुंठिता।
पत्नीशालां तदा नीता ऋत्विग्भिर्वेदपारगैः१८९।
औदुंबेरण दंडेन प्रावृतो मृगचर्मणा।
महाध्वरे तदा ब्रह्मा धाम्ना स्वेनैव शोभते।१९०।

प्रारब्धं च ततो होत्रं ब्राह्मणैर्वेदपारगैः।
भृगुणा सहितैः कर्म वेदोक्तं तैः कृतं तदा।
तथा युगसहस्रं तु स यज्ञः पुष्करेऽभवत्।१९१।

188-191. उसे (अपनी पत्नी के रूप में) प्राप्त करने के बाद, ब्रह्मा ने श्रेष्ठ अध्वर्यु पुरोहितों से कहा, “मैंने इस स्त्री को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया है; इसे मेरे घर में रख दीजिए।” वेदों के ज्ञाता पुरोहितों ने हिरण का सींग धारण किए और रेशमी वस्त्र पहने उस युवती को यज्ञकर्ता की पत्नी के लिए निर्धारित कक्ष में ले गए। ब्रह्मा औदुंबरा दंड हाथ में लिए और हिरण की खाल से ढके हुए यज्ञ में अपने ही तेज से चमक रहे थे। तब ब्राह्मणों ने भृगु के साथ वेदों में वर्णित विधि के अनुसार यज्ञ प्रारम्भ किया। तब वह यज्ञ पुष्कर- तीर्थ में एक हजार युगों तक चला ।

अब इसके आगे जो हुआ उसका वर्णन अध्याय- 17 में कुछ इस प्रकार है।

उधर गायत्री हरण को जानकर समस्त गोप और गोपियाँ उसे को खोजते हुए पुष्कर यज्ञ में ब्रह्मा के पास आए और इसके बाद जो धटना घटी उसके बारे में पद्मपुराण सृष्टि खण्ड के अध्याय- 17 में कुछ इस प्रकार लिखा गया है-



गोप्यश्च तास्तथा सर्वा आगता ब्रह्मणोंतिकम् दृष्ट्वा तां मेखलाबद्धां यज्ञसीमव्यस्थिताम्।७।

हा पुत्रीति तदा माता पिता हा पुत्रिकेति च स्वसेति बान्धवाः सर्वे सख्यः सख्येन हा सखि।८।

केन त्वमिह चानीता अलक्ताङ्का तु सुन्दरी शाटीं निवृत्तां कृत्वा तु केन युक्ता च कम्बली।९।

केन चेयं जटा पुत्रि रक्तसूत्रावकल्पिता एवंविधानि वाक्यानि श्रुत्वोवाच स्वयं हरिः।१०।

इह चास्माभिरानीता पत्न्यर्थं विनियोजिता ब्रह्मणालम्बिता बाला प्रलापं मा कृथास्त्विह।११।

पुण्या चैषा सुभाग्या च सर्वेषां कुलनन्दिनी पुण्या चेन्न भवत्येषा कथमागच्छते सदः।१२।



अनुवाद:- ७-१२
गोप और गोपियों ने गायत्री हरण की बात जानी तो वे सब के सब ब्रह्मा जी के पास आये। वहाँ उन्होंने देखा कि यह गोपकन्या (अभीरकन्या) कमर में मेखला (करधनी) बाँधे यज्ञ भूमि की सीमा में स्थित है।७।
यह देखकर उसके माता-पिता हाय पुत्री ! कहकर चिल्लाने लगे उसके भाई (बान्धव) स्वसा (बहिन) कहकर तथा सभी सखियाँ सखी- सखी कहकर चिल्ला रह थी ।८।
और किस के द्वारा तुम यहाँ लायी गयीं महावर (अलक्तक) से अंकित तुम सुन्दर साड़ी उतारकर किस के द्वारा  कम्बल से युक्त कर दी गयीं ‌? ।९।
हे पुत्री ! किसके द्वारा तुम्हारे केशों की जटा (जूड़ा) बनाकर लालसूत्र से बाँध दिया गया ? (अहीरों की) इस प्रकार की बातें सुनकर श्रीहरि भगवान विष्णु ने उनसे स्वयं कहा-।१०।
यहाँ यह हमारे द्वारा लायी गयी हैं और इसे पत्नी के रूप के लिए नियुक्त किया गया है। अर्थात ब्रह्मा जी ने इसे अपनी पत्नी रूप में अधिग्रहीत किया है अर्थात् यह बाला ब्रह्मा पर आश्रिता है अत: यहाँ प्रलाप अथवा दु:खपूर्ण रुदन मत करो ।११।
यह अत्यन्त पुण्यशालिनी सौभाग्यवती तथा तुम्हारे सबके जाति-कुल को आनन्दित करने वाली है। यदि यह पुण्यशालिनी नहीं होती तो यह ब्रह्मा की सभा (यज्ञ) में कैसे आ सकती थी ?।१२।


एवं ज्ञात्वा महाभाग न त्वं शोचितुमर्हसि कन्यैषा ते महाभागा प्राप्ता देवं विरिंचनम्।१३।

योगिनो योगयुक्ता ये ब्राह्मणा वेदपारगाः न लभन्ते प्रार्थयन्तस्तां गतिं दुहिता गता।१४।

धर्मवन्तं सदाचारं भवन्तं धर्मवत्सलम्मया ज्ञात्वा ततः कन्या दत्ता चैषा विरञ्चये।१५।

अनया तारितो गच्छ दिव्यान्लोकान्महोदयान्
युष्माकं च कुले  चापि  देवकार्यार्थसिद्धये अवतारं करिष्येहं ।१६।

सा क्रीडा तु भविष्यति यदा नन्दप्रभृतयो ह्यवतारं धरातले।
१७।

करिष्यन्ति तदा चाहं वसिष्ये तेषु मध्यतः युष्माकं कन्यकाः सर्वा वसिष्यन्ति मया सह।१८।

तत्र दोषो न भविता न द्वेषो न च मत्सरः करिष्यन्ति तदा गोपा भयं च न मनुष्यकाः।१९।

न चास्या भविता दोषः कर्मणानेन कर्हिचित्श्रुत्वा वाक्यं तदा विष्णोः प्रणिपत्य ययुस्तदा।२०


अनुवाद- १३-२०

इसलिए हे महाभाग अहीरों ! इस बात को जानकर आप लोगों शोक करने के योग्य नहीं होते हो ! यह कन्या परम सौभाग्यवती है इसने स्वयं ब्रह्मा जी को (पति के रूप में) प्राप्त किया है ।१३।   
तुम्हारी इस कन्या ने जिस गति को प्राप्त किया है उस गति को योग करने वाले योगी और प्रार्थना करने वाले वेद पारंगत ब्राह्मण भी प्राप्त नहीं कर पाते हैं ।१४।
(भगवान विष्णु अहीरों से बोले ! हे गोपों) मेरे द्वारा यह जानकर धार्मिक' सदाचरण करने वाली और धर्मवत्सला के रूप पात्र है यह कन्या तब मेरे द्वारा ही ब्रह्मा को दान (कन्यादान) की गयी है ।१५।
द्विव्य लोकों को गये हुए महोदयों को इसके द्वारा तारदिया गया है। तुम्हारे कुल में और भी देव-कार्य की सिद्धि के लिए में मैं अवतरण करुँगा अर्थात इस कन्या के द्वारा तुम्हारी जाति- कुल के दिवंगत पितरों का भी उद्धार कर दिया गया और भी देवों के कार्य की सिद्धि के लिए मेैं भी तुम्हारे कुल में ही अवतरण करुँगा ।१६।
और वे तब मेरे साथ भविष्य में क्रीडा (रास नृत्य करेंगीं जब नन्द आदि का अवतरण भूलोक पर होगा।१७।
मैं भी उस समय गोप रूप में तुम्हारी कन्याओं के साथ (रास अथवा हल्लीसम्) खेल करुँगा और वे सब कन्या मेरे साथ रहेंगीं।१८।
उस समय न तो कोई दोष होगा और न किसी को इसका द्वेष होगा और न कोई किसी से क्रोध करेगा उस समय आभीर लोग भी किसी प्रकार का भय नहीं करेंगे अर्थात् निर्भीक रहेंगे।१९।
इस कार्य से इनको भी कोई पाप नहीं लगेगा। भगवान विष्णु की ये आश्वासन पूर्ण बातें सुनकर सभी अहीर उन विष्णु को प्रणाम किया और सभी अपने घरों को चले गये ।२०।


एवमेष वरो देव यो दत्तो भविता हि मे अवतारः कुलेस्माकं कर्तव्यो धर्मसाधनः।२१।

भवतो दर्शनादेव भवामः गोलोक वासिनः शुभदा कन्यका चैषा तारिणी मे कुलैः सह।२२।

एवं भवतु देवेश वरदानं विभो तव। अनुनीतास्तदा गोपाः स्वयं देवेन विष्णुना।२३।

ब्रह्मणाप्येवमेवं तु वामहस्तेन भाषितम् । त्रपान्विता दर्शने तु बन्धूनां वरवर्णिनी ॥ २४॥

कैरहं तु समाख्याता येनेमं देशमागताः दृष्ट्वा तु तांस्ततः प्राह गायत्री गोपकन्यका।२५।

वामहस्तेन तान्सर्वान्प्राणिपातपुरःसरम्। अत्र चाहं स्थिता मातर्ब्रह्माणं समुपागता।२६।

भर्ता लब्धो मया देवः सर्वस्याद्यो जगत्पतिः नाहं शोच्या भवत्या तु न पित्रा न च बांधवैः।२७।

सखीगणश्च मे यातु भगिन्यो दारकैः सह सर्वेषां कुशलं वाच्यं स्थितास्मि सह दैवतैः।२८।

गतेषु तेषु सर्वेषु गायत्री सा सुमध्यमा ब्रह्मणा सहिता रेजे यज्ञवाटं गता सती।२९।

याचितो ब्राह्मणैर्ब्रह्मा वरान्नो देहि चेप्सितान्। यथेप्सितं वरं तेषां तदा ब्रह्माप्ययच्छत।३०।


अनुवाद:- २१-३०
उन सभी अहीरों ने जाने से पहले भगवान विष्णु से कहा कि हे देव ! आपने जो वरदान हम्हें दिया है वह निश्चय ही हमारा होकर रहे ! आप ही हमारे जाति कुल (वंश) में धर्म के सिद्धिकरण के लिए आप अवतार करने योग्य है ।२१।
आपका दर्शन करके ही हम सब लोग दिव्य होकर गोलोक के निवासी बन गये हैं। शुभ देने वाली ये कन्या भी हम लोगों के जाति कुल का तारण करने वाली बन गयी है ।२२।
हे देवों के स्वामी हे विभो ! आपका ऐसा ही वरदान हो ! इसके बाद स्वयं भगवान विष्णु द्वारा अहीरों को अनुनय पूर्वक आश्वस्त किया गया ।२३।
ब्रह्मा जी द्वारा भी अपने बाँये हाथ से सूचित करते हुए कहा गया कि ऐसा ही हो ! उसके दौरान लज्जित होने के कारण वह वर का वरण करने वाली कन्या गायत्री अपने बान्धवों को भी नहीं देख पा रही थी।२४।
किसके द्वारा मैं बता दी गयी जिस कारण ये इस देश को आगये। उन सबको (अपने भाई बन्धू माता पिता) को देखकर गोपकन्या यह बोली ।२५।
बाँयें हाथ के द्वारा उन सबको सामने से प्रणाम करती हुई उन अपने माता-पिता के पास जाकर कहा- मैंने सर्वप्रथम पति रूप में देव ब्रह्मा को प्राप्त कर लिया है। आप लोगों और मेरे माता-पिता और बान्धवों ! मेरे विषय में अब तुम सब को कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिए ।२७।
मेरी सखीयाँ', मेरी बहने और उनके पुत्र -पुत्रीयाँ सभी से मेरा कुशल आप लोग कहेंगे मैं देवताओं (देवीयों) के साथ हूँ।२८।
तत्पश्चात् उन सभी गोपों के अपने घर चले जाने पर अत्यन्ता सुन्दरी गायत्री देवी ब्रह्मा जी के साथ यज्ञ शाला में जाते हुए सुशोभित हुयीं ।२९।



किन्तु इसके बाद जो धटना घटी वह आश्चर्य जनक और सबको अचम्भित कर देने वाली वाली थी। हुआ यह कि उस दरम्यान यज्ञ को पूर्ण करने के लिए देवताओं और ऋषियों ने ब्रह्मा जी की पत्नी सावित्री के विकल्प में गोप कन्या गायत्री को स्थापित कर यज्ञ की सारी औपचारिकताएँ पूर्ण करने लगे। तभी ब्रह्मा जी की पत्नी सावित्री अपनी सखियों के साथ यज्ञशाला में उपस्थित हुईं। उसके बाद की धटना को नीचे उद्धृत किया जा रहा है -

कालहीनं न कर्तव्यं कृतं न फलदं यतः।
वेदेष्वेवमधीकारो दृष्टःसर्वैर्मनीषिभिः।१३१।
प्रावर्ग्ये क्रियमाणे तु ब्राह्मणैर्वेदपारगैः।
क्षीरद्वयेन संयुक्त शृतेनाध्वर्युणा तथा।१३२।
उपहूतेनागते नचाहूतेषु द्विजन्मसु।
क्रियमाणे तथाभक्ष्ये दृष्ट्वा देवी रुषान्विता।१३३।

उवाच देवी ब्रह्माणं सदोमध्ये तु मौनिनम्।
किमेतद्युज्यते देव कर्तुमेतद्विचेष्टितम्।१३४।
मां परित्यज्य यत्कामात्कृतवानसि किल्बिषम्।
नतुल्यापादरजसा ममैषा या शिरः कृता।१३५।
यद्वदन्ति जनास्सर्वे संगताः सदसि स्थिताः।
आज्ञामीश्वरभूतानां तां कुरुष्व यदीच्छसि।१३६।

131-136. तब यज्ञ में आहुति का अंश प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले देवताओं ने कहा: “(बलि) में देरी नहीं करनी चाहिए; (किसी कार्य के लिए) देर से किया हुआ, उसका (वांछित) फल नहीं देता; यही नियम वेदों में सभी विद्वानों द्वारा देखा गया है।” जब दो दूध के बर्तन तैयार हो गए, तो भोजन संयुक्त रूप से पकाया गया, और जब ब्राह्मणों को आमंत्रित किया गया, तो अध्वर्युजिसे आहुति दी गई थी, वह वहाँ आया था, और प्रवर्ग्य वेदों में कुशल ब्राह्मणों द्वारा किया गया था; खाना बन रहा था. देवी
(सावित्री) ने यह देखकर क्रोध से ब्रह्मा से कहा, जो (यज्ञ) सत्र में चुपचाप बैठे थे: “तुम यह क्या दुष्कर्म करने जा रहे हो, कि वासना के कारण तुमने मुझे त्याग दिया और पाप किया? वह, जिसे तुमने अपने सिर पर रखा है (अर्थात जिसे तुमने इतना महत्व दिया है) वह मेरे पैर की धूल से भी तुलनीय नहीं है। (यज्ञ-सभा में एकत्र हुए लोग यही कहते हैं।) यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा हो तो उन देवताओं की आज्ञा का पालन करो।

भवता रूपलोभेन कृतं लोकविगर्हितम्।
पुत्रेषु नकृतालज्जा पौत्रेषुचन तेप्रभो।१३७।

कामकारकृतं मन्य एतत्कर्मविगर्हितम्।
पितामहोसि देवानामृषीणां प्रपितामहः।१३८।

कथं न ते त्रपा जाता आत्मनःपश्यतस्तनुम्।
लोकमध्येकृतं हास्यमहं चापकृता प्रभो।१३९।

यद्येष ते स्थिरो भावस्तिष्ठ देव नमोस्तुते।
अहंकथंसखीनांतु दर्शयिष्यामि वैमुखम्।१४०।
भर्त्रा मे विधृता पत्नी कथमेतदहं वदे।

ऋत्विग्भिस्त्वरितश्चाहं दीक्षाकालादनंतरम्।१४१। (१४८)
पत्नीं विना न होमोत्र शीघ्रं पत्नीमिहानय।

137-141. सौन्दर्य की अभिलाषा के द्वारा तू ने वह किया है, जिसकी लोग निन्दा करते हैं; हे प्रभु, तू न तो अपने बेटों से लज्जित हुआ और न अपने पोतों से; मैं समझता हूँ कि तुमने आवेश में आकर यह निंदनीय कार्य किया है; आप देवताओं के पौत्र और ऋषियों के प्रपौत्र हैं! जब तुमने अपना शरीर देखा तो तुम्हें शर्म कैसे नहीं आई? तुम लोगों के लिए हास्यास्पद बन गये हो और तुमने मुझे हानि पहुँचायी है। यदि यह तुम्हारी दृढ़ भावना है, तो हे भगवान, (अकेले) जियो; तुम्हें नमस्कार (अलविदा); मैं अपने दोस्तों को अपना चेहरा कैसे दिखा पाऊँगी और कैसे लोगों को यह बतापाऊँगी कि मेरे पति ने (किसी दूसरी स्त्री को) अपनी पत्नी बना लिया है?”

इस पर ब्रह्मा जी ने सावित्री से कुछ इस प्रकार कहा-

शक्रेणैषा समानीता दत्तेयं मम विष्णुना।१४२।
गृहीता च मया सुभ्रु क्षमस्वैतं मया कृतम्।

न चापराधं भूयोन्यं करिष्ये तव सुव्रते।१४३।
पादयोः पतितस्तेहं क्षमस्वेह नमोस्तुते।।


142-143. दीक्षा के तुरन्त बाद, पुजारियों ने मुझसे कहा कि- पत्नी के बिना यज्ञ नहीं किया जा सकता; अपनी पत्नी को जल्दी लाओ. यह (दूसरी) पत्नी इन्द्र द्वारा लाई गई थी, और विष्णु द्वारा मुझे प्रदान की गई थी; (तो) मैंने उसे स्वीकार कर लिया; हे सुन्दर भौहों वाली, मैंने जो किया उसके लिए मुझे क्षमा करें। हे उत्तम प्रतिज्ञा करने वाली, मैं फिर तुझ पर ऐसा अन्याय न करूँगा। मुझे क्षमा करना, मैं तुम्हारे चरणों पर गिर पड़ा हूँ; आपको मेरा प्रणाम.

▪️ब्रह्मा जी के इस प्रकार सम्बोधित करने पर सावित्री और क्रोधित हो गयी और उनको कुछ इस प्रकार से श्राप देते हुए कहीं कि-


यदि मेस्ति तपस्तप्तं गुरवो यदि तोषिताः।
सर्वब्रह्मसमूहेषु स्थानेषु विविधेषु च।१४५।

नैव ते ब्राह्मणाः पूजां करिष्यंति कदाचन।ॠते तु कार्तिकीमेकां पूजां सांवत्सरीं तव।१४६।

करिष्यंति द्विजाः सर्वे मर्त्या नान्यत्र भूतले।एतद्ब्रह्माणमुक्त्वाह शतक्रतुमुपस्थितम्।१४७।


145-147. "यदि मैंने तपस्या की है, यदि मैंने ब्राह्मणों के समूहों में और विभिन्न स्थानों पर अपने गुरुओं को प्रसन्न किया है, तो ब्राह्मण कभी भी आपकी पूजा नहीं करेंगे, सिवाय कार्तिक के महीने में आपकी वार्षिक पूजा (जो कि ब्राह्मणों द्वारा की जाती है) को छोड़कर (अकेले) पेशकश करें, लेकिन पृथ्वी पर किसी अन्य स्थान पर अन्य पुरुषों को नहीं।”


वहीं पास में मौजूद इन्द्र को भी सावित्री ने शाप देते हुए कहा कि-

भोभोः शक्र त्वयानीता आभीरी ब्रह्मणोन्तिकम्।
यस्मात्ते क्षुद्रकंकर्मतस्मात्वं लप्स्यसे फलम्।१४८।

यदा संग्राममध्ये त्वं स्थाता शक्र भविष्यसि।
तदा त्वं शत्रुभिर्बद्धो नीतः परमिकां दशाम्।१४९।

यदा संग्राममध्ये त्वं स्थाता शक्र भविष्यसि।
तदा त्वं शत्रुभिर्बद्धो नीतः परमिकां दशाम्।१४९।

अकिंचनो नष्टसत्वः शत्रूणां नगरे स्थितः।
पराभवं महत्प्राप्य न चिरादेव मोक्ष्यसे।१५०।

अकिंचनो नष्टसत्वः शत्रूणां नगरे स्थितः।
पराभवं महत्प्राप्य न चिरादेव मोक्ष्यसे।१५०।

हे शक्र (इन्द्र), आप चरवाहे (गोपी,अहीर कन्या) को ब्रह्मा के पास ले आए, यह तुमरा नीच कर्म था इसलिए तुम्हें इसका फल अवश्य मिलेगा।१४८
जब तुम युद्ध में खड़े होगे (लड़ने को तैयार होगे) तो उसी समय शत्रुओं द्वारा बाँध दिये जाओगे और बहुत (दयनीय) दुर्दशा में पहुँच जाओगे। १४९
तथा बिना किसी सम्पत्ति के होने के कारण, अपनी ऊर्जा खोकर, आप एक बड़ी हार का सामना करने के बाद, अपने दुश्मन के शहर में रहेंगे, लेकिन जल्द ही रिहा कर दिए जाओगे। १५०



🔆 इसके उपरान्त सावित्री ने वहीं पर खड़े विष्णु को भी शाप देते हुए कुछ इस तरह के शब्द कही-

शक्रं शप्त्वा तदा देवी विष्णुं वाक्यमथाब्रवीत्।
भृगुवाक्येन ते जन्म यदा मर्त्ये भविष्यति।१५१।

भार्यावियोगजं दुःखं तदा त्वं तत्र भोक्ष्यसे।
हृतातेशत्रुणा पत्नी परे पारो महोदधेः।१५२।

न च त्वं ज्ञास्यसे नीतां शोकोपहतचेतनः।
भ्रात्रा सह परं कष्टामापदं प्राप्य दुःखितः।१५३।

यदा यदुकुले जातः कृष्णसंज्ञो भविष्यसि।
पशूनां दासतां प्राप्य चिरकालं भ्रमिष्यसि।१५४।

हे विष्णु !"जब तुम भृगु के शाप के कारण नश्वर संसार में जन्म लोगे, तो वहाँ तुम्हें (अर्थात उस अस्तित्व में) अलगाव की पीड़ा का अनुभव होगा।" तेरी पत्नी को तेरा शत्रु (रावण) महासागर के उसपार (लंका में) ले जाएगा; तब दुःख से व्याकुल मन के कारण तुम्हें पता नहीं चलेगा कि (किसके द्वारा तुम्हारी पत्नी को ले जाया गया है) और तुम एक महान विपत्ति का सामना करते हुए अपने भाई के साथ दुखी होगे। और उसके बाद (द्वापरयुग) जब तुम यदुकुल में जन्म लोगे तो तुम्हारा नाम कृष्ण रखा जायेगा; तब तुम पशुओं का सेवक (गोपालक) होकर बहुत दिनों तक भटकते रहेगो।” १५१-१५४

विशेष- भगवान श्रीकृष्ण को भू-तल पर गोपकुल यानी यादव वंश में अवतरित होने की घटना क्रम में सावित्री के शाप की अहम भूमिका मानी जाती है। जो आगे चलकर भृगु के शाप से श्री राम की पत्नी सीता का रावण द्वारा हरण हुआ और राम को बहुत कष्ट हुआ। उसके पश्चात द्वापरयुग में भगवान श्रीकृष्ण का गोपों (आभीरों) यानी यादवों के यहाँ गोपालक के रूप में जन्म हुआ। तब उन्हीं गोपों को साथ लेकर नारायणी सेना बनाई और उन्हीं को लेकर बड़े से बड़े युद्ध को जीत कर पृथ्वी के भार को दूर किया और धर्म को पुनर्स्थापित किया।


इसके बाद सावित्री ने क्रोधित होकर शिव जी को भी शाप देते हुए कही कि-

तदाह रुद्रं कुपिता यदा दारुवने स्थितः।
तदा त ॠषयः क्रुद्धाःशापं दास्यंतिवै हर।१५५।
भोभोः कापालिक क्षुद्र स्त्रीरस्माकं जिहीर्षसि।
तदेतद्दर्पितं तेद्य भूमौ लिगंपतिष्यति।१५६।

“हे रुद्र, जब तुम दारुवन में रहोगे, तब क्रोधित ऋषि तुम्हें शाप देंगे कि- हे खोपड़ीवाले, नींच, तू हमारे बीच में से एक स्त्री को छीन लेना चाहता है; अत: तुम्हारा यह अभिमानी जनन अंग आज भूमि पर गिर पड़ेगा।


यह कहकर सावित्री यज्ञस्थली से बहुत दूर एकान्त में चली गई। तब उसी समय अहीर कन्या गायत्री ने ब्रह्माजी की प्रथम पत्नी सावित्री ने जो विष्णु को यह शाप दे चुकी थी कि- हे विष्णु ! जब तुम यदुवंश में जन्म लोगे, तो तुम कृष्ण के नाम से जाने जाओगे। उस समय तुम पशुओं (गायों) के सेवक बन कर लम्बे समय तक इधर-उधर भटकते रहोगे। उस शाप को गायत्री ने वरदान में बदलते हुए विष्णु से जो कहा उसका वर्णन- स्कन्द पुराण खण्ड- (६) के नागर खण्ड के अध्याय- १९३ के श्लोक -(१४) और (१५) में मिलता है। जिसमें गायत्री विष्णु से कहतीं हैं कि -

तेनाकृत्येऽपि  रक्तास्ते  गोपा यास्यन्ति श्लाघ्यताम्।
सर्वेषामेव लोकानां देवानां च विशेषतः ॥१४॥
यत्रयत्र  च वत्स्यंन्ति  मद्वं शप्रभवानराः।
तत्रतत्र श्रियो वासो वनेऽपि प्रभविष्यति॥१५॥

अनुवाद -(१४-१५)
• आभीर कन्या गायत्री विष्णु से कहती है- हे विष्णो ! (श्रीकृष्ण) तुम्हारे रक्त सम्बन्धी (blood relative) सभी गोप बिना कुछ किये ही तुम्हारे द्वारा प्रसिद्धि को प्राप्त हो जाऐंगे। और इनकी प्रशंसा विशेषतः देवताओं सहित सभी लोकों में होगी।
•  पुन: गायत्री विष्णु से कहती हैं- मेरे गोप वंश के लोग जहाँ भी रहेंगे वहाँ श्री (सौभाग्य और समृद्धि) विद्यमान रहेगी, चाहे वह स्थान जंगल ही क्यों न हो।१५।

विशेष- ज्ञात हो उपर्युक्त श्लोकों में गायत्री द्वारा जिस विष्णु को सम्बोधित किया जा रहा है वह छूद्र (छोटे) विष्णु हैं जो परमेश्वर श्रीकृष्ण के एक अंश से भूतल पर श्रीकृष्ण का ही प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ऐसे ही अनन्त ब्रह्माण्ड हैं और उन सभी में श्रीकृष्ण के एक-एक अंश से उन सभी ब्रह्माण्डों में उतने ही छूद्र (छोटे) विष्णु रहते हैं जो परमेश्वर श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व किया

करते हैं। अतः गायत्री द्वारा भूलोक पर विष्णु नाम का वास्तविक सम्बोधन परमेश्वर श्रीकृष्ण के लिए ही है।

इस प्रकार से आप लोग- ब्रह्मा जी का पुष्कर यज्ञ, अहीर कन्या देवी गायत्री तथा उनके वैवाहिक सम्बन्धों जाना। जिसका सम्पूर्ण निष्कर्ष निम्नलिखित है-

.पहली बात यह कि- ब्रह्मा की पत्नी गायत्री केवल यज्ञ सम्पादन और संसार में आध्यात्मिक ज्ञान के प्रसारण के लिए ही है। सांसारिक सृष्टि उत्पादन के लिए नहीं।

• दूसरी बात यह कि- गोपों से बड़ा कोई धार्मिक, सदाचारी एवं धर्मवत्सल नहीं है। इस बात को जानकर ही भगवान विष्णु ने गोपों की कन्या- देवी गायत्री को ब्रह्माजी को कन्यादान किया। और ब्रह्माजी ने उसे अपनी पत्नी स्वीकार किया।

• तीसरी बात यह सिद्ध होती है कि- आभीर कन्या देवी गायत्री उस स्थान और पद को प्राप्त हुई। जिसे योगी तथा वेदज्ञ ब्राह्मण, प्रार्थना करने के बाद भी नहीं पाते। अब इससे बड़ा ब्राह्मणत्व कर्म वैष्णव वर्ण के गोपों के लिए और क्या हो सकता है।

• चौथी बात यह कि- देवी गायत्री महती विदुषी और कठिन व्रतों का पालन करने वाली प्रथम अहीर कन्या थीं। जिसकी  प्रसंशा भगवान विष्णु ने ब्रह्माजी के यज्ञ-सत्र में की और गायत्री को ही ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी पद पर नियुक्त किया। जो आज भी यह मान्यता है कि संसार का सम्पूर्ण ज्ञान गायत्री से नि:सृत होता है।

और पांचवीं सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि- गोपों अर्थात् आभीरों में श्रीकृष्ण का रक्त सम्बन्ध है।



विशेष- किन्तु उस यज्ञ में एक और घटना घटी, जिसमें ब्राह्मणों ने शिव जी को इतना परेशान किया कि अन्त में शिव जी बाध्य होकर ब्राह्मणों को ऐसा शाप दिया कि उसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। उसको भी जान लेना आवश्यक है। तो उस घटना का वर्णन इसी अध्याय के श्लोक- ३२ से ७५ में कुछ इस प्रकार से लिखा गया है-


दिव्यंवर्षशतं साग्रं स यज्ञो ववृधे तदायज्ञवाटं कपर्दी तु भिक्षार्थं समुपागतः।३२ या ३४।

अनुवाद:-वह यज्ञ दिव्य सौ वर्षों से भी अधिक वर्षों तक चलता रहा उसी समय यज्ञशाला में भगवान रूद्र भिक्षा प्राप्त करने के लिए आये ।३२।

बृहत्कपालं सङ्गृह्य पञ्चमुण्डैरलङ्कृतः ऋत्विग्भिश्च सदस्यैश्च दूरात्तिष्ठन्जुगुप्सितः।३३।
अनुवाद:-वे अपने हाथ में बहुत बड़ा कपाल लिए हुए और पाँच मुण्डों की माला धारण किए हुए थे उन्हें दूर से उठते हुए देखकर ऋत्विक् और सदस्य उनकी निन्दा करने लगे ३३।

कथं त्वमिह सम्प्राप्तो निन्दितो वेदवादिभिः एवं प्रोत्सार्यमाणोपि निन्द्यमानः स तैर्द्विजैः।३४।

अनुवाद:-
अरे ! तुम यहाँ कैसे आ गये ? वेदज्ञ पुरुष तुम्हारे इस आचरण और स्वरूप की निन्दा करते हैं । इस प्रकार शिव को उन पुरोहितों द्वारा  दूर किये जाते हुए और निन्दा किये जाते हुए  ।३४।

उवाच तान्द्विजान्सर्वान्स्मितं कृत्वा महेश्वरः अत्र पैतामहे यज्ञे सर्वेषां तोषदायिनि।३५।

अनुवाद:-शंकर ने मुस्कराकर उन ब्राह्मणों के प्रति कहा यहाँ सभी को सन्तुष्ट करने वाले ब्रह्मा जी का यज्ञ है ।३५।

कश्चिदुत्सार्य तेनैव ऋतेमां द्विजसत्तमाः उक्तः स तैः कपर्दी तु भुक्त्वा चान्नं ततो व्रज।३६।

अनुवाद:-हे द्विज श्रेष्ठो ! तुम किसी के द्वारा मुझे ही दूर हटाया जा रहा है। अर्थात हे ब्राह्मण श्रेष्ठो ! केवल मुझको ही भगाया जा रहा है ? इसके पश्चात वे पुरोहित बोले ! ठीक है तुम भोजन करके चले जाना ।३६।

कपर्दिना च ते उक्ता भुक्त्वा यास्यामि भो द्विजाः एवमुक्त्वा निषण्णः स कपालं न्यस्य चाग्रतः।३७।

अनुवाद:-इसके प्रत्युत्तर में शंकर जी ने कहा – ब्राह्मणों ! मैं भोजन करके चला जाऊँगा इस तरह से कहकर शंकर जी अपने सामने कपाल रखकर बैठ गये ।३७।

तेषां निरीक्ष्य तत्कर्म चक्रे कौटिल्यमीश्वरः मुक्त्वा कपालं भूमौ तु तान्द्विजानवलोकयन्।३८।

अनुवाद:-उन ब्राह्मणों के उस कर्म को देखकर शंकर जी ने भी कुटिलता की और कपाल को भूमि पर रखकर उन लोगों को देखते रहे ।३८।

उवाच पुष्करं यामि स्नानार्थं द्विजसत्तमाः तूर्णं गच्छेति तैरुक्तः स गतः परमेश्वरः।३९।

अनुवाद:-उन्होंने कहा श्रेष्ठ ब्राह्मणों ! मैं पुष्कर में स्नान करने के लिए जा रहा हूँ । ब्राह्मणों ने कहा शीघ्र जाओ ! यह सुनकर परमेश्वर शंकर वहाँ से चले गये।३९।

वियत्स्थितः कौतुकेन मोहयित्वा दिवौकसः स्नानार्थं पुष्करं याते कपर्दिनि द्विजातयः।४०।

अनुवाद:-वे देवताओं को मोहित करके आकाश में वहीं स्थित हो गये; कौतुक के साथ शंकर जी के पुष्कर चले जाने पर ब्राह्मणों ने परस्पर कहा ।४०।

कथं होमोत्र क्रियते कपाले सदसि स्थिते कपालान्तान्यशौचानि पुरा प्राह प्रजापतिः।४१।

अनुवाद:-जब इस यज्ञ सभा मेंं कपाल विद्यमान है ; तो फिर होम कैसे किया जा सकता है ? कपाल के भीतर रहने वाली वस्तुएँ अपवित्र होती हैं ऐसा स्वयं ब्रह्मा जी ने पूर्व काल में कहा था

विप्रोभ्यधात्सदस्येकः कपालमुत्क्षिपाम्यहं उद्धृतं तु सदस्येन प्रक्षिप्तं पाणिना स्वयम्।४२।

अनुवाद:-उस सभा में एक ब्राह्मण ने कहा कि मैं इस कपाल को उठाकर फैंक देता हूँ। और स्वयं सदस्य द्वारा अपने हाथ में उठाकर उसे फैंक दिए जाने पर ।४२।

तावदन्यत्स्थितं तत्र पुनरेव समुद्धृतमेवं  द्वितीयं तृतीयं विंशतिस्त्रिंशदप्यहो।४३।

अनुवाद:-वहाँ दूसरा कपाल निकल आया फिर उसके भी फैंक दिये जाने पर तीसरा बींसवाँ तीसवाँ भी कपाल ब्राह्मण द्वारा फैंका गया ।४३।

पञ्चाशच्च शतं चैव सहस्रमयुतं तथा एवं नान्तः कपालानां प्राप्यते द्विजसत्तमैः।४४।

अनुवाद:-पचासवाँ' सौंवाँ 'हजारवाँ 'दश हजारवाँ 'भी उसी तरह उठाकर फैंका गया इस तरह वे ब्राह्मण कपालों का अन्त नहीं कर पाते थे ।४४।

नत्वा कपर्दिनं देवं शरणं समुपागताः पुष्करारण्यमासाद्य जप्यैश्च वैदिकैर्भृशम्।४५।

अनुवाद:-इसके पश्चात शंकर जी को नमस्कार करके वे ब्राह्मण शंकर जी की शरण में उनके पास गये पुष्कर वन में जाकर वैदिक स्त्रोतों द्वारा उन ब्राह्मणों ने शंकर (रूद्र) की अत्यधिक स्तुति की।४५।

तुष्टुवुः सहिताः सर्वे तावत्तुष्टो हरः स्वयं  ततः सदर्शनं प्रादाद्द्विजानां भक्तितःशिवः।४६।

अनुवाद:-परिणामस्वरूप शिव जी प्रसन्न हो गये और ब्राह्मणों की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें साक्षात् दर्शन दिया।४५-४६।

उवाच तांस्ततो देवो भक्तिनम्रान्द्विजोत्तमान् पुरोडाशस्य निष्पत्तिः कपालं न विना भवेत्।४७।

अनुवाद:- उसके पश्चात शंकर की भक्ति से नम्र बने रहे ब्राह्मणों से शंकर जी ने कहा ! ब्राह्मणों कपाल के विना पुरोडास की सिद्धि अथवा निष्पत्ति नहीं होती है ।४७।

विशेष- यव (जौ)आदि के आटे की बनी हुई टिकिया जो कपाल में पकाई जाती थी।
विशेषत:— यह आकार में लम्बाई लिए गोल और बीच में कुछ मोटी होती थी। यज्ञों में इसमें से टुकड़ा काटकर देवताओं के लिये मन्त्र पढ़कर आहुति दी जाती थी।
अत: यह यज्ञ का अंग है। यही हवि है अर्थात वह हवि या पुरोडाश जो यज्ञ से बच रहे।
वह वस्तु जो यज्ञ में होम की जाय। यज्ञभाग।. सोमरस को भी पुरोडाश कहा जाता था आटे की चौंसी

कुरुध्वं वचनं विप्राः भागः स्विष्टकृतो मम एवं कृते कृतं सर्वं मदीयं शासनं भवेत्।४८।

अनुवाद:-हे ब्राह्मणों ! मेरी बात मानों स्विष्टकृत (अच्छे यज्ञ) का भाग मेरा होता है ऐसा करने से मेरी सभी आज्ञाओं का पालन अथवा शास्त्रीय विधान हो जाता है ।४८।
विशेष- सु+इष्ट= स्विष्ट इज्यते इष्यते वा यज इष वा + भावे क्त ।) इष्ट– यज्ञादिकर्म्म ।

तथेत्यूचुर्द्विजाश्शंभुं कुर्मो वै तव शासनम्।कपालपाणिराहेशो भगवंतं पितामहम्।।४९।

अनुवाद:-तब सभी द्विज बोले ! हे शम्भु ! आप जो भी आदेश दोगे हम करेगें। अर्थात् ब्राह्मणों ने तथास्तु ! कह कर शंकर जी से कहा कि- हम आपकी आज्ञाओं का पालन करेंगे हाथ में कपाल लेकर शिवजी ने ब्रह्मा जी से कहा ।।४९।

वरं वरय भो ब्रह्मन्हृदि यत्ते प्रियं स्थितम् । सर्वं तव प्रदास्यामि अदेयं नास्ति मे प्रभो।५०।

अनुवाद:-हे ब्रह्मा ! आपके हृदय में जो वरदान की प्रिय इच्छा हो वह माँग लीजिए आपको अदेय कुछ भी नहीं है प्रभो !।५०।

ब्रह्मोवाच न ते वरं ग्रहीष्यामि दीक्षितोहं सदः स्थितः सर्वकामप्रदश्चाहं यो मां प्रार्थयते त्विह।५१।

अनुवाद:-ब्रह्मा जी ने कहा हे शंकर मैं आपसे वरदान नहीं मागूँगा मैं दीक्षा लेकर इस सभा में उपस्थित हूँ । यहाँ कोई भी मुझसे जो याचना करता है मैं उसकी सारी कामनाऐं पूर्ण कर देता हूँ।५१।

एवं वदन्तं वरदं क्रतौ तस्मिन्पितामहम्।तथेति चोक्त्वा रुद्रः स वरमस्मादयाचत।५२।

अनुवाद:-उस यज्ञ में इस प्रकार कहने वाले और वरदान देने वाले ब्रह्मा जी से शंकर ने वरदान माँगा ।५२।

ततो मन्वन्तरेतीते पुनरेव प्रभुः स्वयम्।ब्रह्मोत्तरं कृतं स्थानं स्वयं देवेन शम्भुना।५३।

अनुवाद:- इसके बाद मन्वन्तर बीत जाने पर स्वयं प्रभु शिव ने ब्रह्मोत्तर स्थान पर स्वयं का स्थान बनाया ।।५३।

चतुर्ष्वपि हि वेदेषु परिनिष्ठां गतो हि यः तस्मिन्काले तदा देवो नगरस्यावलोकने।५४।

अनुवाद:- चारों वेदोंं के जानकार ब्राह्मण उस समय निश्चय ही वे तब देव नगरों को देखने के लिए गये ।५४।

सम्भाषणे द्विजानां तु कौतुकेन सदो गतः तेनैवोन्मत्तवेषेण हुतशेषे महेश्वरः।५५।

अनुवाद:-शिवजी को सभा में उन्मत्त वेष में गया हुआ देखकर ब्राह्मणों को शिव जी ने कौतूहल से बात करते देखा।५५।

प्रविष्टो ब्रह्मणः सद्म दृष्टो देवैर्द्विजोत्तमैः प्रहसन्ति च केप्येनं केचिन्निर्भर्त्सयंति च।५६।

अनुवाद:-शंकर जी उस उन्मत्त वेष से ब्राह्मणों के घर में घुस गये। उस समय ब्राह्मणों ने उनको देखकर कुछ ने उनका उपहास किया तो कुछ ने निन्दा की ।५६।

अपरे पान्सुभिः सिञ्चन्त्युन्मत्तं तं तथा द्विजाः लोष्टैश्च लगुडैश्चान्ये शुष्मिणो बलगर्विताः।५७।

अनुवाद:-दूसरे ब्राह्मण उन्मत्त शंकर के ऊपर धूल फेंकने लगे। बल के गर्व से कुछ ब्राह्मण प्रचण्ड बने थे कुछ ब्राह्मण शंकर को ढ़ेले और लकुटी से मारने लगे ।५७।

प्रहरन्ति स्मोपहासं कुर्वाणा हस्तसंविदम्।ततोन्ये वटवस्तत्र जटास्वागृह्य चान्तिकम्।५८।

अनुवाद:-कुछ उपहास करते हुए शंकर पर मुक्कों से प्रहार करते हैं तत्पश्चात कुछ अन्य ब्रह्मचारी (वटव) वहाँ उनकी जटा पकड़कर उनके पास जाते हैं।५८।

पृच्छन्ति व्रतचर्यां तां केनैषा ते निदर्शिता अत्र वामास्त्रियः सन्ति तासामर्थेत्वमागतः।५९।

अनुवाद:-यह व्रतचर्या किससे तुमने पूछी और किसके द्वारा इसको निर्देशित किया गया है यहाँ सुन्दर स्त्रियाँ हैं उनको पाने के लिए तुम यहाँ आये हो।५९।

केनैषा दर्शिता चर्या गुरुणा पापदर्शिना येनचोन्मत्तवद्वाक्यं वदन्मध्ये प्रधावसि।६०।

अनुवाद:-तुम्हें यह वृतचर्या किस पापदर्शी गुरु के द्वारा दिखाई गयी है ? किस पापी गुरु ने तुमको यह आचरण बताया है किसके कहने से पागल के समान बोलते हुए तुम सबके बीच में दौड़ रहे हो।६०।

शिश्नं मे ब्रह्मणो रूपं भगं चापि जनार्दनः उप्यमानमिदं बीजं लोकः क्लिश्नाति चान्यथा।६१।

अनुवाद:-शंकर ने कहा मेरा लिंग ब्रह्म स्वरूप है और भग (योनि) भी जनार्दन है अन्यथा यह संसार बीज वपन करते हुए कष्ट अनुभव करता।६१।
विशेष- जनान् लोकान् अर्द्दति गच्छति प्राप्नोति रक्षणार्थं पालकत्वादिति जनार्द्दनः । ” इत्यमरटीकायां भरतः
(जन: जननं अर्द्दति प्राप्नोति इति जनार्दन-यौनि).     

मयायं जनितः पुत्रो जनितोनेन चाप्यहम्।महादेवकृते सृष्टिः सृष्टा भार्या हिमालये।६२।

अनुवाद:-मैने इसे पुत्र रूप से उत्पन्न किया और इसने मुझे उत्पन्‍न किया है महादेव के द्वारा सृष्टि किये जाने पर उसकी पत्नी की सृष्टि हिमालय से हुई।६२।

उमादत्ता तु रुद्रस्य कस्य सा तनया वद मूढा यूयं न जानीथ वदतां भगवांस्तु वः।६३।

अनुवाद:-उमा का विवाह शंकर से हुआ बताओ यह किस की पुत्री है। तुम लोग मूर्ख हो नहीं जानते हो जाकर इस बात को ब्राह्मा जी से पूछो ।६३।

ब्रह्मणा न कृता चर्या दर्शिता नैव विष्णुना गिरिशेनापि देवेन ब्रह्मवध्या कृते न तु।६४।

अनुवाद:-इस आचरण को ब्रह्मा ने नहीं किया यह आचरण विष्णु के द्वारा भी नहीं दर्शाया गया है। पर्वत पर सोने वाले देव के द्वारा यह ब्रह्म हत्या करने के निमित्त तो नहीं ! ।६४।

कथंस्विद्गर्हसे देवं वध्योस्माकं त्वमद्य वै एवं तैर्हन्यमानस्तु ब्राह्मणैस्तत्र शङ्करः।६५।

अनुवाद:-अरे तुम लोग ब्रह्मा जी की निन्दा कर रहे हो आज तुम हम लोगों के बाध्य हो इस तरह से उन ब्राह्मणों द्वारा कहकर मारे जाते हुए है वहाँ शंकर । ६५।

स्मितं कृत्वाब्रवीत्सर्वान्ब्राह्मणान्नृपसत्तम किं मां न वित्थ भो विप्रा उन्मत्तं नष्टचेतनम्।६६।

अनुवाद:-हे नृप श्रेष्ठ शंकर ने मुस्कराते हुए उन ब्राह्मणों से कहा ब्राह्मणों ! क्या तुम लोग अज्ञानी और उन्मत्त मुझको नहीं जानते हो ।६६।

यूयं कारुणिकाः सर्वे मित्रभावे व्यवस्थिताः वदमानमिदं छद्म ब्रह्मरूपधरं हरम्।६७।

अनुवाद:-बनाबटी ब्रह्म-रूपधारी शंकर को इस तरह से कहते हुए कि आप लोग दयालु और मेरे मित्र हैं  ।६७।

मायया तस्य देवस्य मोहितास्ते द्विजोत्तमाः कपर्दिनं निजघ्नुस्ते पाणिपादैश्च मुष्टिभिः।६८।

अनुवाद:-शंकर की माया से मोहित वे ब्राह्मण शंकर को हाथ' पैैर' मुुुक्कोंं से मारते हैं ।६८।

दण्डैश्चापि च कीलैश्च उन्मत्तवेषधारिणम्पीड्यमानस्ततस्तैस्तु द्विजैः कोपमथागमत्।६९।

अनुवाद:-उन्मत्त वेष धारी शंकर को वे डण्डों और कीलों से पीडित करने लगे तब उन सबके द्वारा पीटे जातेे हुए शंकर क्रोधित हो गये ।६९।

ततो देवेन ते शप्ता यूयं वेदविवर्जिताः ऊर्ध्वजटाः क्रतुभ्रष्टाः परदारोपसेविनः।७०।

अनुवाद:-इसके बाद ने उन ब्राह्मणों को शंकर जी ने शाप दे दिया कि तुम सब वेदज्ञानविहीन, ऊपर की ओर जटा रखने वाले, और  यज्ञाधिकार से रहित परस्त्रीगामी हो जाओ ।७०।

वेश्यायां तु रता द्यूते पितृमातृविवर्जिताः न पुत्रः पैतृकं वित्तं विद्यां वापि गमिष्यति।७१।

अनुवाद:- तुम सब ब्राह्मण वेश्या- प्रेमी' द्यूतक्रीडाप्रेमी, और माता-पिता से रहित हो जाओगे  तथा तुम लोगों का पुत्र पिता की सम्पत्ति अथवा विद्या को नहीं प्राप्त कर पायेगा।७१।

सर्वे च मोहिताः सन्तु सर्वेन्द्रियविवर्जिताः रौद्रीं भिक्षां समश्नन्तु परपिण्डोपजीविनः।७२।

अनुवाद:-तुम सब लोग अज्ञानी तथा शिथिल इन्द्रियों वाले हो जाओगे, रूद्र की भिक्षा को खाने के लिए दूसरों के द्वारा दिये गये अन्न पर ही जीवन धारण करोगे। ७२।

आत्मानं वर्तयन्तश्च निर्ममा धर्मवर्जिताः कृपार्पिता तु यैर्विप्रैरुन्मत्ते मयि साम्प्रतम्।७३।

तेषां धनं च पुत्राश्च दासीदासमजाविकम् । कुलोत्पन्नाश्च वै नार्यो मयि तुष्टे भवन्विह।७४।

अनुवाद:-उन ब्राह्मणों के यहाँ धन पुत्र दासी 'दास बकरी" भेड़ आदि पशु हों मेरी कृृृृपा से उनके यहाँ कुलीन (सदकुुुल) में उत्पन्न नारियाँ हों ।७४।


एवं शापं वरं चैव दत्वांतर्द्धानमीश्वरः गतो द्विजागते देवे मत्वा तं शंकरं प्रभुम्।७५।

अनुवाद:- इस तरह से ब्राह्मणों को शाप और वरदान देकर अर्द्ध नारीश्वर शंकर जी अन्तर्ध्यान हो गये उनके चले जाने पर ब्राह्मणों ने जाना कि ये तो भगवान शंकर थे ।७५।


इस प्रकार से परिशिष्ट (4) गायत्री कथा के साथ समाप्त हुआ। अब इसके अगले परिशिष्ट (5) में गोप कन्या स्वाहा और स्वधा के बारे में जानकारी दी गई है।

परिशिष्ट (5)


गोपी स्वाहा और स्वधा की कथा।


देवी गायत्री के समान ही गोप कुल की देवी दक्षिणा, देवी स्वाहा और स्वधा भी हैं। जिनका यज्ञ, हवन और पित्र- पूजन में विशेष भूमिका रहती है। क्योंकि यज्ञ और हवन के दरम्यान जो स्वाहा नाम के उच्चारण से हवन कुण्डों में नैवेद्य अर्पण किया जाता है, और यज्ञ समाप्ति के बाद जो दान दक्षिणा दिया जाता है, वह सब देवी स्वाहा और दक्षिण के माध्यम से ही फलीभूत होता है। और ये देवी स्वाहा, स्वधा और दक्षिणा दोनों ही गोपेश्वर श्रीकृष्ण के गोलोक की गोपी सुशीला के ही अंशावतार है। जो कभी गोलोक में श्रीराधा के शाप से गोपी सुशील को भूतल पर स्वाहा, स्वधा और दक्षिणा के रूप में आना पड़ा था।

जिसमें सुशीला के गोपी होने का प्रमाण तथा सुशीला को
यज्ञ पुरुष की पत्नी दक्षिणा के रूप में उत्पन्न होने का वर्णन देवी भागवत पुराण के नवम स्कन्ध के अध्याय- (४५) के निम्नलिखित श्लोकों में मिलता है -

गोपी सुशीला गोलोके पुराऽऽसीत्प्रेयसी हरेः।
राधा प्रधाना सध्रीची धन्या मान्या मनोहरा।२।

अतीव सुन्दरी रामा सुभगा सुदती सती ।
विद्यावती गुणवती चातिरूपवती सती॥३।

अनुवाद - प्राचीन काल में गोलोक में भगवान् श्रीकृष्ण की प्रेयसी सुशीला नामक एक गोपी थी। परमधन्या, मान्या तथा मनोहरा वह गोपी भगवती राधा की प्रधान सखी थी। वह अत्यन्त सुन्दर, लक्ष्मी के लक्षणों से सम्पन्न, सौभाग्यवती, उज्ज्वल दाँतों वाली, परम पतिव्रता साध्वी, विद्या गुण तथा रूप से अत्यधिक सम्पन्न थी।२-३।

रसज्ञा रसिका रासे रासेशस्य रसोत्सुका ।
उवासादक्षिणे क्रोडे राधायाः पुरतः पुरा ॥७॥

सम्बभूवानम्रमुखो भयेन मधुसूदनः ।
दृष्ट्वा राधां च पुरतो गोपीनां प्रवरोत्तमाम् ॥८।

अनुवाद- वह रसज्ञान से परिपूर्ण, रासक्रीडा की रसिक तथा रासेश्वर श्रीकृष्णके प्रेमरसहेतु लालायित रहनेवाली वह गोपी सुशीला एक बार राधा के सामने ही भगवान् श्रीकृष्ण के वाम अंक (बगल) में बैठ गयी ॥ ७-८।

कामिनीं रक्तवदनां रक्तपङ्‌कजलोचनाम् ।
कोपेन कम्पिताङ्‌गीं च कोपेन स्फुरिताधराम्॥९॥

वेगेन तां तु गच्छन्तीं विज्ञाय तदनन्तरम् ।
विरोधभीतो भगवानन्तर्धानं चकार सः॥१०॥

अनुवाद- तब मधुसूदन श्रीकृष्ण ने गोपिकाओं में परम श्रेष्ठ राधा की ओर देखकर भयभीत हो अपना मुख नीचे कर लिया। उस समय पत्नी राधा का मुख लाल हो गया और उनके नेत्र रक्तकमल के समान हो गये। क्रोध से उनके अंग काँप रहे थे तथा ओठ प्रस्फुरित हो रहे थे। तब उन राधा को बड़े वेग से जाती देखकर उनके विरोध से अत्यन्त डरे हुए भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये ॥९-१०॥

पलायन्तं च कान्तं च विज्ञाय परमेश्वरी।
पलायन्तीं सहचरीं सुशीलां च शशाप सा॥ १५॥

अद्यप्रभृति गोलोकं सा चेदायाति गोपिका ।
सद्यो गमनमात्रेण भस्मसाच्च भविष्यति ॥१६॥

  अनुवाद-  १५-१६
• परमेश्वरी राधा ने अपने कान्त श्रीकृष्ण को अन्तर्धान तथा सहचरी सुशीला को पलायन करते देखकर उन्हें शाप दे दिया कि-  यदि गोपिका सुशीला आज से गोलोक में आयेगी, तो वह आते ही भस्मसात् हो जायगी।१५-१६।

✳️  इस सम्बन्ध में ज्ञात होगा कि भगवान नारायण ने ही उस सुशीला का नाम दक्षिणा रखा इसके लिए नीचे के ये श्लोक कुछ इसी प्रकार का संकेत दे रहे हैं-

नालभंस्ते फलं तेषां विषण्णाः प्रययुर्विधिम्।
विधिर्निवेदनं श्रुत्वा देवादीनां जगत्पतिम्॥३७॥

दध्यौ च सुचिरं भक्त्या प्रत्यादेशमवाप सः।
नारायणश्च भगवान् महालक्ष्याश्च देहतः॥३८॥

विनिष्कृष्य मर्त्यलक्ष्मीं ब्रह्मणे दक्षिणां ददौ।
ब्रह्मा ददौ तां यज्ञाय पूरणार्थं च कर्मणाम्॥ ३९॥

अनुवाद -  जिसे भगवान नारायण ने महालक्ष्मी के विग्रह से मर्त्यलक्ष्मी को प्रकट किया और उसका दक्षिणा नाम रखकर उसे ब्रह्माजी को सौंप दिया। तब ब्रह्माजी ने यज्ञ सम्बन्धी समस्त कार्यों की सम्पन्नता के लिए देवी दक्षिणा को यज्ञ पुरुष के हाथ में दे दिया।३७-३८-३९।
            
तब यज्ञपुरुष ने देवी दक्षिणा के पूर्व काल की बातों का स्मरण दिलाते हुए देवी दक्षिणा से कहा कि-

पुरा गोलोकगोपी त्वं गोपीनां प्रवरा वरा॥ ७१॥
राधासमा तत्सखी च श्रीकृष्णप्रेयसी प्रिया।

अनुवाद - हे महाभागे! तुम पूर्वकाल में गोलोक की एक गोपी थी और गोपियों में परमश्रेष्ठा थीं। श्रीकृष्ण तुमसे अत्यधिक प्रेम करते थे और तुम राधा के समान ही उन श्रीकृष्ण की प्रिय सखी थीं।७१।

कार्तिकीपूर्णिमायां तु रासे राधामहोत्सवे ॥७२॥
आविर्भूता दक्षिणांसाल्लक्ष्म्याश्च तेन दक्षिणा।

पुरा त्वं च सुशीलाख्या ख्याता शीलेन शोभने॥ ७३॥
लक्ष्मीदक्षांसभागात्त्वं राधाशापाच्च दक्षिणा ।

गोलोकात्त्वं परिभ्रष्टा मम भाग्यादुपस्थिता ॥७४॥
कृपां कुरु महाभागे मामेव स्वामिनं कुरु ।


अनुवाद-७३,७३,७४

एक बार कार्तिक पूर्णिमा को राधामहोत्सव के अवसर पर रासलीला में तुम भगवती लक्ष्मी के दक्षिणांश से प्रकट हो गयी थीं, उसी कारण तुम्हारा नाम दक्षिणा पड़ गया। हे शोभने ! इससे भी पहले अपने उत्तम शील के कारण तुम सुशीला नाम से प्रसिद्ध थी तुम भगवती राधिका के शाप से गोलोक से च्युत (पतित) होकर और पुनः देवी लक्ष्मी के दक्षिणांश से आविर्भूत हो। अब देवी दक्षिणाके रूप में मेरे सौभाग्यसे मुझे प्राप्त हुई हो। हे महाभागे ! मुझपर कृपा करो और मुझे ही अपना स्वामी बना लो॥ ७२,-७४।

फिर यज्ञपुरुष ने उस देवी से कहा-
कृपां कुरु महाभागे मामेव स्वामिनं कुरु।
कर्मिणां कर्मणां देवी त्वमेव फलदा सदा॥७५॥

त्वया विना च सर्वेषां सर्वं कर्म च निष्फलम्।
त्वया विना तथा कर्म कर्मिणां च न शोभते॥७६॥ 

ब्रह्मविष्णुमहेशाश्च दिक्पालादय एव च ।
कर्मणश्च फलं दातुं न शक्ताश्च त्वया विना ॥ ७७॥

अनुवाद- ७५,७६,७७

तुम्हीं यज्ञ करने वालों को उनके कर्मों का सदा फल प्रदान करने वाली देवी हो। तुम्हारे बिना सम्पूर्ण प्राणियों का सारा कर्म निष्फल हो जाता है और तुम्हारे बिना अनुष्ठानकर्ताओं का कर्म शोभा नहीं पाता है।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश, दिक्पाल आदि भी तुम्हारे बिना प्राणियों को कर्मका फल प्रदान करने में समर्थ नहीं हैं।

अतः यहाँ सिद्ध होता है कि गोपकन्या- दक्षिणा ही कर्म फलों की विधायिका हैं।

और इस सम्बन्ध में सबसे महत्वपूर्ण बात श्रीमद्देवी भागवत पुराण के नवम् स्कन्ध के अध्याय-(४३) के श्लोक संख्या-(३८) में लिखी गई है, जिसमें बताया गया है कि यज्ञ, हवन के मध्य गोपी सुशीला की अंशस्वरूपा देवी स्वाहा का कितना महत्व है-

दक्षिणाग्निगार्हपत्याहवनीयान् क्रमेण च।
ऋषियो मुनयश्चैव ब्राह्मणा: क्षत्रियादय:।३८।

स्वाहान्तं मन्त्रमुच्चार्य हविर्दानं च चक्रिरे।
स्वाहायुक्तं च मन्त्रं च यो गृह्णाति प्रशस्तकम्।।३९।

अनुवाद - तभी से ऋषि, मुनि, ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि मन्त्र के अन्त में स्वहा शब्द जोड़कर मन्त्रोच्चारण करके अग्नि में हवन करने लगे। और जो मनुष्य स्वाहा युक्त प्रशस्त मन्त्र का उच्चारण करता है, उसे सभी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती है।




परिशिष्ट (6)

ब्रह्माण्ड विदुषी गोपी शतचन्द्रानना की कथा
                    

शतचन्द्रानना गोलोक  की एक धन्या और मान्या विदुषी गोपी है, जो गोलोक के सोलहवें द्वार की सदैव रक्षा में तत्पर रहती है। गोपी शतचन्द्रानना को ब्रह्माण्ड विदुषी होने का परिचय उस समय मिलता है जब समस्त देवता भगवान नारायण के कहने पर पृथ्वी के भार को दूर करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण के परमधाम गोलोक को प्रस्थान करते हैं। किन्तु जब देवता लोग गोलोक के सोलहवें द्वार पर पहुँचे तो वहाँ द्वार की रक्षा में नियुक्त गोपी शतचन्द्रानना उनसे कुछ प्रश्न पूछकर अन्दर जाने से रोक दिया। तब देवताओं ने जो कुछ कहा उसका सारा वृत्तान्त गर्गसंहिता के गोलोकखण्ड के अध्याय- (२) के प्रमुख श्लोकों में कुछ इस प्रकार मिलता है।

तत्र कन्दर्पलावण्याः श्यामसुन्दरविग्रहाः।
द्वरि गन्तुं चाभ्यदितान् न्यषेधन् कृष्णपार्षदाः।२०।

अनुवाद - वहाँ कामदेव के समान मनोहर रूप लावण्य शालिनी श्यामसुन्दर विग्रह श्रीकृष्ण पार्षदा (शतचन्द्रानना) द्वारपाल का कार्य करती थीं। देवताओं को द्वारा के भीतर जाने के लिए उद्यत देख उन्होंने मना किया।

             "श्रीदेवा ऊचुः
लोकपाला वयं सर्वे ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।
श्रीकृष्णदर्शनार्थाय शक्राद्या आगता इह॥२१॥

अनुवाद - देवता बोले- हम सभी ब्रह्मा" विष्णु शंकर नाम के लोकपाल और इन्द्र आदि देवता हैं भगवान श्रीकृष्ण के दर्शनार्थ यहाँ आए हैं।

तच्छ्रुत्वा तदभिप्रायं श्रीकृष्णाय सखीजनाः।
ऊचुर्देवप्रतीहारा गत्वा चान्तःपुरं परम्॥२२॥

तदा विनिर्गता काचिच्छतचन्द्रानना सखी।
पीतांबरा वेत्रहस्ता सापृच्छद्वाञ्छितं सुरान्॥ २३॥

अनुवाद - २२-२३

देवताओं की बात सुनकर उन सखियों ने जो श्रीकृष्ण की द्वारपालिकाऐं थी, श्रेष्ठ अन्तःपुर में जाकर देवताओं की बात कह सुनाईं। तभी एक सखी जो शतचन्द्रानना नाम से विख्यात थी उनके वस्त्र पीले थे और जो हाथ में बेंत की छड़ी लिए थी, बाहर आयीं और उन देवताओं से उनका अभीष्ट प्रयोजन पूछा।२२-२३।

                श्रीशतचन्द्राननोवाच -
कस्याण्डस्याधिपा देवा यूयं सर्वे समागताः।
वदताशु गमिष्यामि तस्मै भगवते ह्यहम् ॥२४॥

अनुवाद - शतचन्द्रानना बोली - यहाँ पधारे हुए आप सब देवता किस ब्रह्माण्ड के अधिपति हैं ? यह शीघ्र बताइये। तब मैं भगवान श्रीकृष्ण को सूचित करने के लिए उनके पास जाऊँगी। २४

                     "श्रीदेवा ऊचुः -
अहो अण्डान्युतान्यानि नास्माभिर्दर्शितानि च।
एकमण्डं प्रजानीमोऽथोऽपरं नास्ति नः शुभे॥२५॥

अनुवाद - तब देवताओं नें कहा - अहो ! यह तो बहुत आश्चर्य की बात है, क्या अन्यान्य ब्रह्माण्ड भी हैं ? हमनें तो उन्हें कभी नहीं देखा। शुभे ! हम तो यही जानते हैं कि एक ही ब्रह्माण्ड है, इसके अतिरिक्त दूसरा कोई है ही नहीं।२५।

              "श्रीशतचन्द्राननोवाच -
ब्रह्मदेव लुठन्तीह कोटिशो ह्यण्डराशयः।
तेषां यूयं यथा देवास्तथाण्डेऽण्डे पृथक् पृथक्॥ २६॥

नामग्रामं न जानीथ कदा नात्र समागताः।
जडबुद्ध्या प्रहृष्यध्वे गृहान्नापि विनिर्गताः॥२७॥

ब्रह्माण्डमेकं जानन्ति यत्र जातास्तथा जनाः।
मशका च यथान्तःस्था औदुंबरफलेषु वै॥२८॥

अनुवाद - २६-२८

तब शतचन्द्रानना उन देवताओं से बोलीं - ब्रह्मदेव ! यहाँ (गोलोक) में करोड़ों  ब्रह्माण्ड  इधर-उधर लुढ़क रहे हैं। उनमें भी आप जैसे ही पृथक पृथक देवता वास करते हैं। अरे ! क्या आप लोग अपना नाम गाँव तक नहीं जानते ? जान पड़ता है की कभी यहाँ आए नहीं है, अपनी थोड़ी सी जानकारी में ही हर्ष से फूल उठे हैं। जान पड़ता है कभी घर से बाहर निकले ही नहीं। जैसे गूलर के फूलों में रहने वाले कीड़े जिस फल में रहते हैं, उसके सिवा दूसरे को नहीं जानते, उसी प्रकार आप जैसे साधारण जन जिसमें उत्पन्न होते हैं, एक मात्र उसी को ब्रह्माण्ड समझते हैं। २६-२८।

                 "श्रीनारद उवाच -
उपहास्यं गता देवा इत्थं तूष्णीं स्थिताः पुनः।
चकितानिव तान् दृष्ट्वा विष्णुर्वचनमब्रवीत्॥२९॥

                   श्रीविष्णुरुवाच -
यस्मिन्नण्डे पृश्निगर्भोऽवतारोऽभूत्सनातन।
त्रिविक्रमनखोद्‌भिन्ने तस्मिन्नण्डे स्थिता वयम्॥ ३०॥

                   "श्रीनारद उवाच -
तच्छ्रुत्वा तं च संश्लाघ्य शीघ्रमन्तःपुरं गता
पुनरागत्य देवेभ्योऽप्याज्ञां दत्त्वा गताः पुरम्॥३१॥

अथ देवगणाः सर्वे गोलोकं ददृशुः परम् ।
तत्र गोवर्धनो नाम गिरिराजो विराजते॥३२॥

अनुवाद - २९- ३२

• इस प्रकार उपहास के पात्र बने हुए सब देवता चुपचाप खड़े रहे, कुछ बोल ना सके। तब उन्हें चकित से देखकर भगवान विष्णु ने शतचन्द्रानना से कहा- जिस ब्रह्माण्ड़ में भगवान पृश्निगर्भ का सनातन अवतार हुआ है तथा त्रिविक्रम (विराट रूपधारी वामन) के नख से ब्रह्माण्ड़ में विवर बन गया है वहीं हम निवास करते हैं।२९-३०।

• तब भगवान विष्णु की यह बात सुनकर शतचन्द्रानना ने उनकी भूरि भूरि प्रशंसा की और स्वयं भीतर चली गयी। फिर शीघ्र ही आयी और सबको अन्तःपुर में पधारने की आज्ञा देकर वापस चली गयी। तदनन्तर सम्पूर्ण देवताओं ने परम सुन्दर धाम गोलोक का दर्शन किया। वहाँ गोवर्धन नामक गिरिराज शोभा पर रहे थे। २९-३२।


अतः उपरोक्त प्रसंग से सिद्ध होता है कि गोपी शतचन्द्रानना जैसी विदुषी की तुलना सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में किसी अन्य से नही की जा सकती। क्योंकि इसकी विद्वता के सामने ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा समस्त देवताओं को लज्जित होना पड़ा।


इस तरह से देखा जाए तो गोप और गोपियाँ ही एकमात्र धर्मज्ञ ज्ञान से परिपूर्ण सारे कर्म-विधान और फल के नियामिका हैं। इनके ही माध्यम से ज्ञान की अविरल धारा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रवाहित होती है। और सारे धार्मिक कर्म- विधान इन्हीं के द्वारा सम्पन्न एवं फलित होते हैं, चाहे वह यज्ञ हो या पूजा पाठ में हवन इत्यादि ही क्यों न हो। और इन्हीं गोप-गोपियों को आधार मानकर ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य के कर्मकाण्डी ब्राह्मण लोग ब्राह्मणत्व कर्म करते हैं। किन्तु उनके सभी कर्मफलों व परिणामों में गोपों की ही भूमिका रहती है। इसीलिए गोपों को श्रेष्ठ व धर्मवत्सल जानकर ही गर्गसंहिता के अश्वमेधखण्ड  के अध्याय (६०) के श्लोक -संख्या (४१) में गोपों को पापों से मुक्ति दिलाने वाला कहा गया है-

य: श्रृणोति चरित्रं वै गोलोकारोहणं हरे:।
मुक्तिं यदुनां गोपानां सर्वपापै: प्रमुच्यते।।४१।

अनुवाद - जो लोग श्रीहरि के गोलोक धाम पधारने का चरित्र सुनते हैं, तथा यादव गोपों की मुक्ति का वृत्तान्त पढ़ते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो जाते हैं।४१।

परिशिष्ट (7)

गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था।


गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था (G.S.S.K.S) की स्थापना 20 नवंबर 2023 को गोपाष्टमी के दिन श्री आत्मानन्द जी महाराज ने अपने दो सहयोगियों (मता प्रसाद और योगेश कुमार रोही) को लेकर किया। उसी समय उन्होंने (मता प्रसाद और योगेश कुमार रोही) दोनों को एक ही साथ औपचारिक घोषणा करते हुए संस्था के गोपाचार्य हंस पद अभिषिक्त किया और अपने स्वयं गोपाचार्य हंस पद पर आसीन हुए। तभी से इन तीनों को गोपाचार्य हंस पदनाम नाम से जाना जाता है। ज्ञात हो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ऐसा पदनाम कहीं नहीं है। यह आत्मानन्द जी महाराज के अन्तर्मन की उपज है, जो अपने आप में यूनिक (Unique) यानी इकलौता नाम है। गोपाचार्य नाम के बारे में उन्होंने स्वयं कहा है कि- गोपाचार्य नाम इसलिए इकलौता नाम है, क्योंकि यह पदनाम सिर्फ गोपों यानी यादवों के आचार्य या गुरु से ही सम्बन्धित है अन्य किसी से नहीं है, या कहें गोपाचार्य पदनाम का सम्बन्ध ब्राह्मी व्यवस्था के किसी भी व्यास पीठ, संकराचार्य या अखाड़े इत्यादि से नहीं है। इसलिए यह पदनाम अपने आप में यूनिक (Unique) यानी इकलौता है जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में यादव कथावाचकों के अतिरिक्त और किसी का नहीं है।


संस्था के उद्देश्य एवं उसके द्वारा सृजित प्रमुख पद

गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था (G.S.S.K.S) का मुख्य उद्देश्य विद्वान गोपाचार्यों द्वारा वैश्विक स्तर पर श्रीकृष्ण कथा का प्रचार-प्रसार करना तथा भारत के प्रत्येक ग्राम सभा स्तर पर राधा कृष्ण मंदिर का निर्माण करना है। संस्था अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए निम्नलिखित पद सृजित किया है -

(1)- अध्यक्ष और उपाध्यक्ष-

राष्ट्रीय स्तर पर संस्था का एक अध्यक्ष और उसके विकल्प में एक उपाध्यक्ष पद होगा जो राष्ट्रीय स्तर पर संस्था के निर्देशन में कार्य करेगा और श्रीकृष्ण कथा की व्यवस्था व संचालन में सहयोग करेगा। इसी तरह से भारत के प्रत्येक राज्यों के लिए एक राज्य- अध्यक्ष और क्रमशः जिला- अध्यक्ष होंगे। जो राष्ट्रीय अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के निर्देशन में काम करेंगे।
वर्तमान में इस संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष- गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष गोपाचार्य हंस श्री माता प्रसाद एवं उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष- गोपाचार्य हंस श्री योगेश कुमार रोही जी हैं।


(2)- मंत्री-

संस्था का एक मंत्री पद होगा जिसका मुख्य कार्य निम्नलिखित होगा-

(क) सहमति के आधार पर संस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए समय-समय पर आवश्यक नियम बनाना और स्वीकृति प्रदान करना।

(ख) समयं समयं पर संस्था के पदाधिकारियों की बैठकों का आयोजन करना तथा उनके कार्यों की समीक्षा करके राष्ट्रीय अध्यक्ष (संस्था प्रमुख) को सूचित करना।

(ग) संस्था के पदाधिकारिओं और सदस्यों की प्रत्येक गतिविधियों पर पैनी नजर रखना मंत्री पद का मुख्य कार्य होगा। यदि कोई पदाधिकारी या सदस्य संस्था के नियमों के विपरीत कार्य करता है या कोई ऐसा षड्यंत्र रचता है जिससे संस्था की गरिमा प्रभावित हो सकती है, तो मंत्री को यह सर्वाधिकार होगा कि ऐसे सदस्य को राष्ट्रीय अध्यक्ष की अनुमति से उसकी सदस्यता और उसके पद से बिना देरी किए तत्काल प्रभाव से हटा सकता है। वर्तमान में इस संस्था के मंत्री- श्री श्रवण कुमार यादव जी हैं।


(3)- कोषाध्यक्ष- 

संस्था का एक धनकोष होगा जो भारत के किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में संस्था के नाम से एक खाता के रूप में होगा। जिसकी निगरानी यादव (गोप) समाज का एक पदेन कोषाध्यक्ष करेगा। संस्था के बैंक खाते से धन तभी निकला जा सकेगा जब कोषाध्यक्ष सहित संस्था के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, मंत्री और कोई एक गोपाचार्य हंस, इन तीनों का एक साथ हस्ताक्षर होगा।

संस्था के धन की आय-व्यय की आडिट वर्ष में एक बार संस्था की "निगरानी समिति" द्वारा की जाएगी जिसमें संस्था के पांच पदेन सदस्य- राष्ट्रीय अध्यक्ष, एक गोपाचार्य हंस, एक गोपाचार्य, कोषाध्यक्ष, और मंत्री होंगे। वर्तमान में इस संस्था के कोषाध्यक्ष- श्री पंकज सिंह यादव हैं।



(4)- संस्था के पदेन कथावाचक-

वैश्विक स्तर पर श्रीकृष्ण कथा का प्रचार-प्रसार करने के लिए संस्था अनिवार्य रूप से यादव समाज से (दो) तरह के कथावाचकों का चयन करेगी जो पूरी तरह से संस्था के नियमों से प्रतिबद्ध होंगे।

(क)- पहले प्रकार के कथावाचकों में गोपाचार्य हंस होंगे जो श्रीकृष्ण कथा के समय दूध का दूध और पानी का पानी करने की क्षमता रखते हो अर्थात् परम् सत्य की वास्तविकता का बोध कराने की क्षमता रखते हों। गोपाचार्य हंस संस्था के नियमानुसार सफेद वस्त्र व सफेद पगड़ी या साफा को धारण कर कथामंच से गोपेश्वर श्रीकृष्ण के गूढ़ रहस्यों और उनके परम् स्वरुप तथा उनकी लीलाओं इत्यादि का वर्णन करेंगे।  अभी वर्तमान में केवल तीन गोपाचार्य हंस- श्री आत्मानन्द जी, श्री योगेश कुमार

रोही और श्री माता प्रसाद जी हैं। भविष्य में इनकी संख्या बढ़ सकती है।




(ख)- दूसरे प्रकार के कथावाचक "गोपाचार्य" होंगे जो ज्ञान, अनुभव और श्रीकृष्ण के गूढ़ रहस्यों को जानने से थोड़ी बहुत पीछे रह गए हैं किन्तु संस्था के प्रति अत्यधिक समर्पित हैं, वे सभी गोपाचार्य होंगे और गोपाचार्य हंस की अनुपस्थिति में संस्था के नियमानुसार हल्के पीले रंग वस्त्र व पगड़ी को धारण कर कथामंच से गोपेश्वर श्रीकृष्ण की कथा कहेंगे।

भविष्य में तीन गोपाचार्य हंसों के द्वारा इनके ज्ञान और अनुभव की परीक्षा लेकर इनको भी गोपाचार्य हंस पद पर अभिषिक्त किया जा सकेगा। वर्तमान में 15 से अधिक गोपाचार्य हैं।


(5)- संस्था के सदस्य-

संस्था के अनन्त सदस्य होंगे जो हर वर्ग से होंगे। इनकी कोई निश्चित सीमा नहीं होगी। जो भी श्रीकृष्ण भक्त स्वेच्छा से संस्था की सदस्यता लेना चाहते हैं वे कम से कम 1000₹ की सदस्तायता शुल्क देकर सदस्यता ले सकते है। यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से अधिक सदस्तायता शुल्क देकर सदस्यता ग्रहण करना चाहता है तो उसके लिए संस्था आभार प्रकट करेगी। प्रत्येक सदस्यता ग्रहण करने वाले सदस्यों को सदस्यता प्रमाण पत्र के साथ एक अच्छा सा पहचान पत्र भी मिलेगा जो मौके पर गले मे धारण करने योग्य होगा।

कोई भी व्यक्ति संस्था की सदस्यता ग्रहण कर सकता है किन्तु संस्था को यह आशंका हो जाए कि वह व्यक्ति संस्था के प्रति उतना समर्पित नहीं है जितना चाहिए। तो ऐसे व्यक्ति को किसी (दो) सोशल मीडिया (ह्वाट्सएप और फेसबुक) पर प्रत्यक्ष रूप से यह घोषणा करनी होगी कि-
"मैं......आज दिनांक....को परमेश्वर श्रीकृष्ण को शाक्षी मानकर यह घोषणा करता हूँ कि गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था के प्रति निष्ठा भाव से समर्पित होकर काम करूँगा तथा संस्था के प्रत्येक नियमों का अक्षरशः पालन करूँगा"।
उसके उपरान्त संस्था उसकी सदस्यता स्वीकार करेगी और भविष्य में आवश्कतानुसार उसे किसी पद पर भी अभिषिक्त कर सकेगी।

परिशिष्ट (8)


चन्द्रमा और उसके वंश की उत्पत्ति

इस परिशिष्ट कथा का मुख्य उद्देश्य समालोचना और तार्किक आधार पर यह बताना है कि- पौराणिक ग्रन्थों में आकाशीय पिण्ड चन्द्रमा और उसके वंश की उत्पत्ति कैसे हुई? उसी क्रम में यह बताना है कि बृहस्पति की पत्नी तारा कैसे आकाशीय पिण्ड चन्द्रमा की पत्नी होकर एक आकाशीय पिण्ड बुध को जन्म दिया। उसके उपरान्त यह जानकारी देना है कि चन्द्रमा के पुत्र बुध से इला नाम की एक अपूर्ण स्त्री (किन्नर) कैसे गर्भवती होकर प्राकृतिक विधान के विपरीत एक माह में ही भू-तल के प्रथम सम्राट पुरुरवा को जन्म देकर चन्द्रवंश का विस्तार किया।



चन्द्रमा की उत्पत्ति-

पौराणिक ग्रन्थों के हिसाब से चन्द्रमा की उत्पत्ति सर्वप्रथम परमेश्वर श्रीकृष्ण के सोलहवें अंश से उत्पन्न विराट विष्णु यानी गर्भोदकशायी विष्णु से हुई है, यह ध्रुव सत्य है। किन्तु कथाकारों को यह सत्य हज़म नहीं हुआ। तब इसके उलट  उन्होंने चन्द्रमा को ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था में या कहें चन्द्रमा को ब्राह्मीकरण करने के उद्देश्य से उसको एक ब्राह्मण ऋषि "अत्रि" से उत्पन्न करा दिया।
चन्द्रमा उत्पत्ति की वास्तविकता को आप लोग मेरे "यादव सम्मान" चैनल पर "वैष्णव वर्ण के अहीर जाती के यादव वंश की वंशावली" नाम के विडियो में देख सकते हैं। जिसमें बड़े ही स्पष्ट रूप से चल चित्रों के माध्यम से समझाया गया है।

फिर भी यहाँ पर चन्द्रमा की वास्तविक उत्पत्ति की जानकारी के लिए निम्नलिखित सन्दर्भ प्रस्तुत किया जा रहा हैं-


ऋग्वेद के (१०/९०/१३ और १४) ऋचा में चन्द्रमा और सूर्य की उत्पत्ति को ब्राह्मण ऋषि अत्रि से नहीं बल्कि विराट विष्णु बताई गई है।

चन्द्रमा मनसो जातश्वक्षोः सूर्यो अजायत।
मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च  प्रणाद्वायुरजायत।।१३।

नाभ्यां आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत ।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन् ॥१४॥


अनुवाद- १३-१४

महाविष्णु के मन से चन्द्रमा, नेत्रों से सूर्य और ज्योति, मुख से तेज और अग्नि का प्राकट्य हुआ।१३

उसकी नाभि से अन्तरिक्ष की उत्पत्ति हुई, उसके सिर से स्वर्ग( द्यौलोक) की उत्पत्ति हुई, उसके पैरों से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई, उसके कानों से दिशाओं की उत्पत्ति हुई, इस प्रकार इन सबसे मिलकर संसार का निर्माण हुआ। १४


इसी तरह से विराट विष्णु से चन्द्रमा को उत्पन्न होने की पुष्टि-श्रीमद् भागवत गीता के अध्याय- ११ के श्लोक- (१९) में  उस समय होती है जब भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपना विराट रुप दिखाया। उसी समय अर्जुन उस विराट रूप में सम्पूर्ण सृष्टि का सृजन और विलय देखा। जिसमें उन्होंने ने यह भी देखा कि- उस विराट स्वरूप से सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि क्रमशः उत्पन्न होकर अन्ततोगत्वा उसी विराट पुरुष (श्रीकृष्ण) में विलीन हो रहे हैं।


"अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रंस्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्।।

अनुवाद- आपको मैं आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त प्रभावशाली, अनन्त भुजाओं वाले, चन्द्र और सूर्यरूप नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्नि रूप मुख वाले और अपने तेज से इस संसार को तपाते हुए देख रहा हूँ।१९।

✳️ चूँकि पौराणिक ग्रन्थों के हिसाब से चन्द्रमा विराट विष्णु से उत्पन्न हुआ है इस लिए वह प्रथम वैष्णव है। यह ध्रुव सत्य है, किन्तु यह सत्य कथाकारों को किसी भी तरह से हज़म नहीं हुआ। परिणाम यह हुआ कि कथाकारों ने चन्द्रमा को ब्राह्मीकरण करने के लिए अत्रि नाम के एक ब्राह्मण से, तो कभी किसी स्त्री से, तो कभी समुद्र मंथन से उत्पन्न होने की बहुत सी कथाएँ लिखकर चन्द्रमा की वास्तविक उत्पत्ति से लोगों को भ्रमित कर दिया। जैसे-

विष्णु पुराण, प्रथम अंश, अध्याय- ९ के श्लोक संख्या- ९६ और ९७ में चन्द्रमा को समुद्र से उत्पन्न होने को बताया गया है।


रुपौदार्यगुणोपेतस्तथा चाप्सरसां गणः।
क्षीरोदधेः समुत्पन्नो मैत्रेय परमाद्भुतः।। ९६

ततः शीतांशुरभवज्जगृहे तं महेश्वरः।
जगृहुश्च विषं नागाः क्षीरोदाब्धिसमुत्थितम्।। ९७

अनुवाद- ९६-९७

"हे मैत्रेय ! फिर समुद्र से अत्यन्त सुन्दर और अद्भुत रूप एवं उदारता के गुणों से युक्त अप्सराओं का समूह प्रकट हुआ। ९७
उसके बाद शीतांश (चन्द्रमा) प्रकट हुए, जिन्हें भगवान शिव (महेश्वर) ने ग्रहण किया और क्षीरसमुद्र से निकले विष को नागों ने ग्रहण कर लिया।

इसी तरह से ब्रह्माण्ड पुराण मध्यभाग तृतीय उपोद्धातपाद- के श्लोक में चन्द्रमा उत्पत्ति के सम्बन्ध में लिखा गया है कि-

मद्रायां जनयामास सोमं पुत्रं यशस्विनम् ।
स्वर्भानुना हते सूर्ये पतमाने दिवो महीम् ॥ २/८/७७॥

"अनुवाद:- उन प्रभाकर अत्रि ने मद्रा नामक पत्नी से प्रसिद्ध पुत्र सोम (चन्द्रमा) को जन्म दिया। जब सूर्य पर स्वर्भानु (राहु) का प्रहार हुआ, जब वह सूर्य  स्वर्ग से पृथ्वी पर गिर रहे था।७७

कुछ इसी तरह की बातें श्रीमद्भागवत पुराण खण्ड-२ स्कन्ध- ९ अध्याय के अध्याय (१४)श्लोक-2 से 3  में भी कथाकारों नें चन्द्रमा को ब्रह्मा के पुत्र अत्रि से उत्पन्न होने को बताया है।


सहस्रशिरसः पुंसो नाभिह्रद सरोरुहात् ।
जातस्यासीत् सुतो धातुः अत्रिः पितृसमो गुणैः ॥ २ ॥

तस्य दृग्भ्योऽभवत् पुत्रः सोमोऽमृतमयः किल ।
विप्रौषध्युडुगणानां ब्रह्मणा कल्पितः पतिः ॥ ३ ॥


अनुवाद- २-३
सहस्रों सिर वाले विराट् पुरुष नारायणके नाभि सरोवर कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। उसी ब्रह्मा जी के पुत्र हुए अत्रि। वे (अत्रि) अपने गुणों के कारण ब्रह्माजी के ही समान थे।२।
उन्हीं अत्रि के नेत्रों से अमृतमय चन्द्रमाका जन्म हुआ। तब ब्रह्माजी ने चन्द्रमा को ब्राह्मण, ओषधि और नक्षत्रोंका अधिपति बना दिया।३

विशेष- अब यहाँ पर यदि उपर्युक्त श्लोक संख्या-(३) पर विचार किया जाए तो कथाकारों ने प्राकृतिक नियमानुसार चंद्रमा को ओषधियों और नक्षत्रों का अधिपति बनाया यहाँ तक तो ठीक है। किन्तु उसी के साथ बड़ी चालाकी से सम्पूर्ण मानव जाती को छोड़ कर चन्द्रमा को केवल ब्राह्मणों का अधिपति बनाकर चंद्रमा को पूरी तरह से ब्राह्मीकरण कर दिया।
जबकि यह ध्रुव सत्य है कि प्रकृति की प्रत्येक वस्तुओं पर हर मनुष्यों का समान अधिकार होता है। किन्तु इस प्राकृतिक विधान के विपरीत कथाकारों ने चंद्रमा को केवल ब्राह्मणों का अधिपति बनाया। यह कितनी प्रक्षिप्त और हास्यास्पद स्थिति है।

तब ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कथाकारों ने ऐसा क्यों किया ? तो इसका उत्तर है- कथाकारों को ऐसा करने का एकमात्र उद्देश्य किसी भी तरह से भू-तल के प्रथम सम्राट पुरुरवा की अहीर जाती की पहचान को सदा के लिए मिटाकर चन्द्रवंश के वास्तविक इतिहास से लोगों को भ्रमित करना था।

इसके लिए कथाकारों ने पौराणिक कथाओं में एक ऐसी काल्पनिक स्त्री को चुना जो एक माह स्त्री होकर पुनः एक माह के लिए पुरुष हो जाया करती थी। उसी एक माह की स्त्री ने भू-तल के प्रथम सम्राट पुरुरवा को जन्म दिया। इस प्रक्षिप्त कथा की पुष्टि कई पुराणों से होती है। जानकारी के लिए उनमें से कुछ प्रमुख पौराणिक कथाओं का वर्णन क्रमशः नींचे उद्धृत है।


(१)- श्रीमद्भागवतपुराण के स्कन्धः ९ अध्यायः (१) के अनुसार -  (सुद्युम्न) इला नाम की एक माह वाली स्त्री का वर्णन।

अप्रजस्य मनोः पूर्वं वसिष्ठो भगवान् किल ।
मित्रावरुणयोः इष्टिं प्रजार्थं अकरोद् विभुः ॥१३॥

तत्र श्रद्धा मनोः पत्‍नी होतारं समयाचत ।
दुहित्रर्थं उपागम्य प्रणिपत्य पयोव्रता ॥ १४ ॥

प्रेषितोऽध्वर्युणा होता ध्यायन् तत् सुसमाहितः ।
हविषि व्यचरत् तेन वषट्कारं गृणन् द्विजः ॥१५॥

होतुस्तद् व्यभिचारेण कन्येला नाम साभवत् ।
तां विलोक्य मनुः प्राह नाति हृष्टमना गुरुम् ॥१६॥

भगवन् किमिदं जातं कर्म वो ब्रह्मवादिनाम् ।
विपर्ययं अहो कष्टं मैवं स्याद् ब्रह्मविक्रिया ॥ १७।।

यूयं मंत्रविदो युक्ताः तपसा दग्धकिल्बिषाः ।
कुतः संकल्पवैषम्यं अनृतं विबुधेष्विव ॥ १८ ॥

निशम्य तद्वचः तस्य भगवान् प्रपितामहः ।
होतुर्व्यतिक्रमं ज्ञात्वा बभाषे रविनन्दनम् ॥ १९ ॥

एतत् संकल्पवैषम्यं होतुस्ते व्यभिचारतः ।
तथापि साधयिष्ये ते सुप्रजास्त्वं स्वतेजसा ॥ २०॥


अनुवाद- १३-२०

वैवस्वत मनु पहले सन्तानहीन थे उस समय सर्वसमर्थ भगवान् वसिष्ठने उन्हें सन्तान प्राप्ति करानेके लिये मित्रावरुणका यज्ञ कराया था ॥ 13 ॥
यज्ञके आरम्भ में केवल दूध पीकर रहने वाली वैवस्वत मनुकी धर्मपत्नी श्रद्धाने अपने होताके पास जाकर प्रणाम पूर्वक याचना की कि मुझे कन्या ही प्राप्त हो 14
तब अध्वर्युकी प्रेरणासे होता बने हुए ब्राह्मणने श्रद्धाके कथनका स्मरण करके एकाग्र चित्तसे वषट्कार का उच्चारण  करते हुए यज्ञकुण्डमें आहुति दी ।। 15 ।
जब होताने इस प्रकार विपरीत कर्म किया, तब यज्ञके फलस्वरूप पुत्र के स्थानपर इला नामकी कन्या हुई। उसे देखकर श्राद्धदेव मनु का मन कुछ विशेष प्रसन्न नहीं हुआ। उन्होंने अपने गुरु वसिष्ठजी से कहा- 16
'भगवन् ! आपलोग तो ब्रह्मवादी हैं, आपका कर्म इस प्रकार विपरीत फल देनेवाला कैसे हो गया ? अरे, यह तो बड़े दुःख की बात है। वैदिक कर्म का ऐसा विपरीत फल तो कभी नहीं होना चाहिये 17॥
आप लोगों का मन्त्र ज्ञान तो पूर्ण है ही इसके अतिरिक्त आप लोग जितेन्द्रिय भी है तथा तपस्या के कारण निष्पाप हो चुके है देवताओं में सत्य की प्राप्ति के समान आपके संकल्प का यह उलटा फल कैसे हुआ ?' 18
परीक्षित् ! हमारे वृद्ध प्रपितामह भगवान् वसिष्ठ ने उनकी यह बात सुनकर जान लिया कि होता ने विपरीत संकल्प किया है। इसलिये उन्होंने चैवस्वत मनुसे कहा- ॥ 19 ॥
'राजन् ! तुम्हारे होताके विपरीत संकल्पसे ही हमारा संकल्प ठीक-ठीक पूरा नहीं हुआ। फिर भी अपने तपके प्रभावसे मैं तुम्हें श्रेष्ठ पुत्र दूँगा' ॥ 20 ॥

एवं व्यवसितो राजन् भगवान् स महायशाः ।
अस्तौषीद् आदिपुरुषं इलायाः पुंस्त्वकाम्यया ॥ २१ ॥

तस्मै कामवरं तुष्टो भगवान् हरिरीश्वरः ।
ददौ इविलाभवत् तेन सुद्युम्नः पुरुषर्षभः ॥ २२ ॥

स एकदा महाराज विचरन् मृगयां वने ।
वृतः कतिपयामात्यैः अश्वं आरुह्य सैन्धवम् ॥२३॥

प्रगृह्य रुचिरं चापं शरांश्च परमाद्‍भुतान् ।
दंशितोऽनुमृगं वीरो जगाम दिशमुत्तराम् ॥ २४ ॥

सु कुमातो वनं मेरोः अधस्तात् प्रविवेश ह ।
यत्रास्ते भगवान् शर्वो रममाणः सहोमया ॥ २५ ॥

तस्मिन् प्रविष्ट एवासौ सुद्युम्नः परवीरहा ।
अपश्यत् स्त्रियमात्मानं अश्वं च वडवां नृप ॥२६॥

तथा तदनुगाः सर्वे आत्मलिङ्‌ग विपर्ययम् ।
दृष्ट्वा विमनसोऽभूवन् वीक्षमाणाः परस्परम् ॥ २७ ॥


अनुवाद- २१- २७

परीक्षित्! परम यशस्वी भगवान् वसिष्ठने ऐसा निश्चय करके उस इला नामकी कन्याको ही पुरुष बना देने के लिये पुरुषोत्तम भगवान् नारायण की स्तुति की। 21
सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरिने सन्तुष्ट होकर उन्हें मुँहमाँगा वर दिया, जिसके प्रभावसे वह कन्या ही सुद्युम्न नामक श्रेष्ठ पुत्र बन गयी। 22
महाराज! एक बार राजा सुद्युन शिकार खेलनेके लिये सिन्धुदेश के घोड़ेपर सवार होकर कुछ मन्त्रियोंके साथ वनमें गये। 23
वीर सुद्युम्न कवच पहनकर और हाथमें सुन्दर धनुष एवं अत्यन्त अद्भुत वाण लेकर हरिनोंका पीछा करते हुए उत्तर दिशामें बहुत आगे बढ़ गये। 24
अन्तमें सुधुम्र मेरुपर्वतकी तलहटीके एक वनमें चले गये। उस वनमें भगवान् शङ्कर पार्वतीके साथ विहार करते रहते हैं। 25
उसमें प्रवेश करते ही वीरवर सुद्युम्नने देखा कि मैं स्त्री हो गया हूँ और मेरा घोड़ा घोड़ी हो गया है। 26
परीक्षित् ! साथ ही उनके सब अनुचरोंने भी अपनेको स्त्रीरूपमें देखा। वे सब एक-दूसरेका मुँह देखने लगे, उनका चित्त बहुत उदास हो गया। 27


श्रीराजोवाच-

कथं एवं गुणो देशः केन वा भगवन् कृतः ।
प्रश्नमेनं समाचक्ष्व परं कौतूहलं हि नः ॥ २८ ॥

श्रीशुक उवाच-

एकदा गिरिशं द्रष्टुं ऋषयस्तत्र सुव्रताः ।
दिशो वितिमिराभासाः कुर्वन्तः समुपागमन् ॥२९।।

तान् विलोक्य अम्बिका देवी विवासा व्रीडिता भृशम् । भर्तुरङ्‌गात समुत्थाय नीवीमाश्वथ पर्यधात् ॥ ३० ॥

ऋषयोऽपि तयोर्वीक्ष्य प्रसङ्‌गं रममाणयोः ।
निवृत्ताः प्रययुस्तस्मात् नरनारायणाश्रमम् ॥ ३१।।

तदिदं भगवान् आह प्रियायाः प्रियकाम्यया ।
स्थानं यः प्रविशेदेतत् स वै योषिद् भवेदिति ॥ ३२ ॥

तत ऊर्ध्वं वनं तद्वै पुरुषा वर्जयन्ति हि ।
सा चानुचरसंयुक्ता विचचार वनाद् वनम् ॥ ३३ ॥


अनुवाद- २८-३३

राजा परीक्षितने पूछा- भगवन् ! उस भूखण्ड में ऐसा विचित्र गुण कैसे आ गया ? किसने उसे ऐसा बना दिया था ? आप कृपा कर हमारे इस प्रश्नका उत्तर दीजिये; क्योंकि हमें बड़ा कौतूहल हो रहा है। 28

श्रीशुकदेवजीने कहा- परीक्षित्! एक दिन भगवान् शङ्करका दर्शन करनेके लिये बड़े-बड़े व्रतधारी ऋषि अपने तेजसे दिशाओंका अन्धकार मिटाते हुए उस वनमें गये। 29
उस समय अम्बिका देवी वस्त्रहीन थीं। ऋषियोंको सहसा आया देख वे अत्यन्त लज्जित हो गयीं। झटपट उन्होंने भगवान् शङ्करकी गोदसे उठकर वस्त्र धारण कर लिया।30

ऋषियोंने भी देखा कि भगवान् गौरी-शङ्कर इस समय विहार कर रहे हैं, इसलिये वहाँसे लौटकर वे भगवान् नर-नारायणके आश्रमपर चले गये। 31

उसी समय भगवान् शङ्करने अपनी प्रिया भगवती अम्बिकाको प्रसन्न करनेके लिये कहा कि 'मेरे सिवा जो भी पुरुष इस स्थानमें प्रवेश करेगा, वहीं स्त्री हो जायेगा। 32

परीक्षित्! तभीसे पुरुष उस स्थानमें प्रवेश नहीं करते। अब सुद्युम्न स्त्री हो गये थे। इसलिये वे अपने स्त्री बने हुए अनुचरोंके साथ एक वनसे दूसरे वनमें विचरने लगे। 33


अथ तां आश्रमाभ्याशे चरन्तीं प्रमदोत्तमाम् ।
स्त्रीभिः परिवृतां वीक्ष्य चकमे भगवान् बुधः ॥ ३४ ॥

सापि तं चकमे सुभ्रूः सोमराजसुतं पतिम् ।
स तस्यां जनयामास पुरूरवसमात्मजम् ॥ ३५ ॥

एवं स्त्रीत्वं अनुप्राप्तः सुद्युम्नो मानवो नृपः ।
सस्मार स कुलाचार्यं वसिष्ठमिति शुश्रुम ॥ ३६ ॥

स तस्य तां दशां दृष्ट्वा कृपया भृशपीडितः ।
सुद्युम्नस्याशयन् पुंस्त्वं उपाधावत शंकरम् ॥३७ ॥

तुष्टस्तस्मै स भगवान् ऋषये प्रियमावहन् ।
स्वां च वाचं ऋतां कुर्वन् इदमाह विशाम्पते ॥३८ ॥

मासं पुमान् स भविता मासं स्त्री तव गोत्रजः ।
इत्थं व्यवस्थया कामं सुद्युम्नोऽवतु मेदिनीम् ॥ ३९ ॥

आचार्यानुग्रहात् कामं लब्ध्वा पुंस्त्वं व्यवस्थया ।
पालयामास जगतीं नाभ्यनन्दन् स्म तं प्रजाः ॥ ४० ॥

तस्योत्कलो गयो राजन् विमलश्च सुतास्त्रयः ।
दक्षिणापथराजानो बभूवुः धर्मवत्सलाः ॥ ४१ ॥

ततः परिणते काले प्रतिष्ठानपतिः प्रभुः ।
पुरूरवस उत्सृज्य गां पुत्राय गतो वनम् ॥ ४२ ॥


अनुवाद- ३४-४२

उसी समय शक्तिशाली बुधने देखा कि मेरे आश्रमके पास ही बहुत-सी स्त्रियोंसे घिरी हुई एक सुन्दरी स्त्री विचर रही है। उन्होंने इच्छा की कि यह मुझे प्राप्त हो जाय। 34

उस सुन्दर स्त्री ने भी चन्द्रकुमार बुधको पति बनाना चाहा। इसपर बुधने उसके गर्भ से पुरूरवा नामका पुत्र उत्पन्न किया।35

इस प्रकार मनुपुत्र राजा सुद्युम्न स्त्री हो गये। ऐसा सुनते हैं कि उन्होंने उस अवस्थामें अपने कुलपुरोहित वसिष्ठजीका स्मरण किया। 36

सुद्युम्न की यह दशा देखकर वसिष्ठजीके हृदयमें कृपावश अत्यन्त पीड़ा हुई। उन्होंने सुद्युम्न को पुनः पुरुष बना देनेके लिये भगवान् शङ्करकी आराधना की। 37
भगवान् शङ्कर वसिष्ठजीपर प्रसन्न हुए। परीक्षित् । उन्होंने उनकी अभिलाषा पूर्ण करनेके लिये अपनी वाणीको सत्य रखते हुए ही यह बात कही- 38

'वसिष्ठ ! तुम्हारा यह यजमान एक महीने तक पुरुष रहेगा और एक महीने तक स्त्री। इस व्यवस्था से सुद्युम्न इच्छानुसार पृथ्वीका पालन करे'। 39

इस प्रकार वसिष्ठजीके अनुग्रहसे व्यवस्थापूर्वक अभीष्ट पुरुषत्व लाभ करके सुद्युम्न पृथ्वीका पालन करने लगे। परन्तु प्रजा उनका अभिनन्दन नहीं करती थी। 40

(पुरुष रुप में उनकी पत्नी से) उनको तीन पुत्र हुए- उत्कल, गय और विमल। परीक्षित् ! वे सब दक्षिणापथके राजा हुए। 41

बहुत दिनोंके बाद वृद्धावस्था आनेपर प्रतिष्ठान नगरीके अधिपति सुद्युम्न ने अपने पुत्र पुरूरवा को राज्य दे दिया और स्वयं तपस्या करने के लिये वन की यात्रा की। 42

विशेष - ज्ञात हो राजा सुद्युम्न को जब स्त्री और पुरुष होने की धटना नहीं घटी थी, उस समय उनकी किसी पत्नी से तीन पुत्र हुए- उत्कल, गय और विमल। किन्तु जब उनके लिए एक-एक महिने के लिए स्त्री और पुरुष होने की धटना घटी तब उनके स्त्री रुप में आकाशीय पिण्ड बुध से पुरुरवा का जन्म हुआ।

अब वहाँ पर बुध के बारे में जानना आवश्यक हो गया कि बुध कौन हैं जिन्होंने एक महीने के लिए स्त्री हुए राजा सुद्युम्न से पुरुरवा को जन्म दिया।


तो सूर्य पुत्र बुध का वर्णन भागवत पुराण स्कन्ध (९) के अध्याय १४ के निम्नलिखित श्लोकों में मिलता है। जिसमें बताया गया है कि-


श्रीशुक उवाच ।
अथातः श्रूयतां राजन् वंशः सोमस्य पावनः।
यस्मिन्नैलादयो भूपाः कीर्त्यन्ते पुण्यकीर्तयः ॥१॥

सहस्रशिरसः पुंसो नाभिह्रद सरोरुहात्।
जातस्यासीत् सुतो धातुः अत्रिः पितृसमो गुणैः॥२॥

तस्य दृग्भ्योऽभवत् पुत्रः सोमोऽमृतमयः किल ।
विप्रौषध्युडुगणानां ब्रह्मणा कल्पितः पतिः॥३॥

सोऽयजद् राजसूयेन विजित्य भुवनत्रयम्।
पत्‍नीं बृहस्पतेर्दर्पात् तारां नामाहरद् बलात्॥ ४ ॥

यदा स देवगुरुणा याचितोऽभीक्ष्णशो मदात्।
नात्यजत् तत्कृते जज्ञे सुरदानवविग्रहः॥ ५ ॥

निवेदितोऽथाङ्‌गिरसा सोमं निर्भर्त्स्य विश्वकृत्।
तारां स्वभर्त्रे प्रायच्छद् अन्तर्वत्‍नीमवैत् पतिः॥ ८ ॥

त्यज त्यजाशु दुष्प्रज्ञे मत्क्षेत्रात् आहितं परैः।
नाहं त्वां भस्मसात्कुर्यां स्त्रियं सान्तानिकः सति॥ ९ ॥

तत्याज व्रीडिता तारा कुमारं कनकप्रभम्।
स्पृहामाङ्‌गिरसश्चक्रे कुमारे सोम एव च॥ १० ॥

ममायं न तवेत्युच्चैः तस्मिन् विवदमानयोः।
पप्रच्छुः ऋषयो देवा नैवोचे व्रीडिता तु सा ॥ ११ ॥

कुमारो मातरं प्राह कुपितोऽलीकलज्जया ।
किं न वोचस्यसद्‌वृत्ते आत्मावद्यं वदाशु मे ॥ १२ ॥

ब्रह्मा तां रह आहूय समप्राक्षीच्च सान्त्वयन् ।
सोमस्येत्याह शनकैः सोमस्तं तावदग्रहीत् ॥ १३ ॥

तस्यात्मयोनिरकृत बुध इत्यभिधां नृप ।
बुद्ध्या गम्भीरया येन पुत्रेणापोडुराण्मुदम् ॥ १४॥


अनुवाद- १-१४

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! अब मैं तुम्हें चन्द्रमा के पावन वंश का वर्णन सुनाता हूँ। इस वंश में पुरूरवा आदि बड़े-बड़े पवित्रकीर्ति राजाओं का कीर्तन किया जाता है। 1

सहस्त्रों सिर वाले विराट् पुरुष नारायण के नाभि से  कमल की उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजी के पुत्र अत्रि हुए। वे अपने गुणों कारण ब्रह्माजी के समान ही थे॥ 2 ॥

उन्हीं अत्रि के नेत्रों से अमृतमय चन्द्रमा का जन्म हुआ। ब्रह्माजी ने चन्द्रमा को ब्राह्मण, ओषधि और नक्षत्रों का अधिपति बना दिया ॥ 3 ॥

तब चंद्रमा तीनों लोकों पर विजय प्राप्त की और राजसूय यज्ञ किया। इससे उनका घमंड बढ़ गया और उन्होंने बलपूर्वक बृहस्पति की पत्नी तारा को हर लिया ॥ 4 ॥

देवगुरु बृहस्पति ने अपनी पत्नी को लौटा देने के लिये उनसे बार-बार याचना की, परन्तु वे इतने मतवाले हो गये थे उन्होंने किसी प्रकार उनकी पत्नी को नहीं लौटाया। ऐसी परिस्थिति में उसके लिये देवता और दानवमें घोर संग्राम छिड़ गया ॥ 5 ॥

तब अङ्गिरा ऋषिने ब्रह्माजी के पास जाकर यह युद्ध बंद कराने की प्रार्थना की। इस पर ब्रह्माजीने चन्द्रमा को बहुत डाँटा-फटकारा और तारा को उसके पति बृहस्पतिजी के हवाले कर दिया। जब बृहस्पतिजीको यह मालूम हुआ कि तारा तो गर्भवती है, तब उन्होंने कहा- ॥ 8 ॥

दुष्टे ! मेरे क्षेत्रमें यह तो किसी दूसरेका गर्भ है। इसे तू अभी त्याग दे, तुरन्त त्याग दे। डर मत, मैं तुझे जलाऊँगा नहीं। क्योंकि एक तो तू स्त्री है और दूसरे मुझे भी सन्तान की कामना है। देवी होने के कारण तू निर्दोष भी है ही ।। 9 ।।

अपने पति की बात सुनकर तथ अत्यन्त लज्जित हुई। उसने सोनेके समान चमकता हुआ एक बालक अपने गर्भसे अलग कर दिया। उस बालकको देखकर बृहस्पति और चन्द्रमा दोनों ही मोहित हो गये और चाहने लगे कि यह हमें मिल जाय ॥ 10 ॥

अब वे एक दूसरेसे इस प्रकार जोर-जोर से झगड़ा करने लगे कि यह तुम्हारा नहीं, मेरा है।' ऋषियों और देवताओंने तारासे पूछा कि 'यह किसका लड़का है।परन्तु ताराने लज्जावश कोई उत्तर न दिया ॥ 11 ॥

बालकने अपनी माताको झूठी लज्जा से क्रोधित होकर कहा-'दुष्टे तू बतलाती क्यों नहीं ? तू अपना कुकर्म मुझे शीघ्र से शीघ्र बतला दे ॥ 12 ॥

उसी समय ब्रह्माजीने ताराको एकान्तमें बुलाकर बहुत कुछ समझा-बुझाकर पूछा। तब ताराने धीरेसे कहा कि 'चन्द्रमा का।' इसलिये चन्द्रमा ने उस बालक को ले लिया। 13

परीक्षित् ! ब्रह्माजीने उस बालकका नाम रखा 'बुध', क्योंकि उसकी बुद्धि बड़ी गम्भीर थी। ऐसा पुत्र प्राप्त करके चन्द्रमाको बहुत आनन्द हुआ। 14

इस प्रकार से आप लोगों ने संक्षेप में चन्द्रमा पुत्र बुध को जो आगे चलकर इसी बुध और इला से पुरुरवा का जन्म हुआ।अब हम पुनः इला के बारे में दूसरे पुराण से बताएंगे।


[2]-  हरिवंश पुराण, हरिवंशपर्व के अध्याय- (10) के अनुसार- (सुद्युम्न) इला नाम की एक माह वाली स्त्री का वर्णन।


वैशम्पायन उवाच
मनोर्वैवस्वतस्यासन् पुत्रा वै नव तत्समाः ।
इक्ष्वाकुश्चैव नाभागो धृष्णुः शर्यातिरेव च ।। १

नरिष्यंश्च तथा प्रांशुर्नाभागारिष्टसप्तमाः ।
करूषश्च पृषध्रश्च नवैते भरतर्षभ ।। २ ।।

अकरोत् पुत्रकामस्तु मनुरिष्टिं प्रजापतिः ।
मित्रावरुणयोस्तात पूर्वमेव विशाम्पते ।। ३ ।।

अनुत्पन्नेषु नवसु पुत्रेष्वेतेषु भारत ।
तस्यां तु वर्तमानायामिष्ट्यां भरतसत्तम ।। ४ ।।

मित्रावरुणयोरंशे मुनिराहुतिमाजुहोत् ।
आहुत्यां हूयमानायां देवगन्धर्वमानुषाः ।। ५ ।।

तुष्टिं तु परमां जग्मुर्मुनयश्च तपोधनाः । अहोऽस्य तपसो वीर्यमहोऽस्य श्रुतमद्भुतम् ।। ६ ।।

तत्र दिव्याम्बरधरा दिव्याभरणभूषिता। दिव्यसंहनना चैव इला जज्ञे इति श्रुतिः ।। ७ ।।

तामिलेत्येव होवाच मनुर्दण्डधरस्तदा ।
अनुगच्छस्व मां भद्रे तमिला प्रत्युवाच ह ।
धर्मयुक्तमिदं वाक्यं पुत्रकामं प्रजापतिम् ।। ८ ।।

इलोवाच
मित्रावरुणयोरंशे जातास्मि वदतां वर ।
तयोः सकाशं यास्यामि न मां धर्मो हतोऽवधीत्।। ९ ।।

1-2. वैशम्पायन ने कहा: - हे भरतश्रेष्ठ , विवस्वत मनु के नौ पुत्र हुए - इक्ष्वाकु , नाभाग , धृष्णु , शर्याति , नरिष्यन, प्राञ्शु, नाभागरिष्ठ, कौरुष और पृषध्र ।

3. हे राजा, संतान की इच्छा से प्रेरित होकर कुलपति मनु ने मित्र और वरुण के समक्ष यज्ञ किया ।

4-6. हे भरत वंशज , अपने इन नौ पुत्रों के जन्म से पहले, मुनि ने इस यज्ञ में मित्र और वरुण के अंशों को आहुति दी। जब यह आहुति दी गई, तो देवताओं, गंधर्वों , मनुष्यों और तपस्वियों को अत्यंत प्रसन्नता हुई और वे कहने लगे, "हे भगवान! उनकी तपस्या कितनी अद्भुत है ! हे भगवान! शास्त्रों का उनका ज्ञान कितना अद्भुत है!"

7. परम्परा यह है कि उस बलिदान में इला का जन्म हुआ, जो दिव्य वस्त्रों से सजी, दिव्य आभूषणों से सुशोभित और दिव्य कवच से सुसज्जित थी।

8. मनु ने हाथ में दंड  लिए उससे कहा: "हे सुंदरी, मेरे पीछे आओ।" उसने संतान की इच्छा रखने वाले उस कुलपति को निम्नलिखित नैतिक उत्तर दिया।

9. इला ने कहा:—"हे श्रेष्ठ वक्ता, मैं मित्र और वरुण की शक्ति से उत्पन्न हुई हूँ, इसलिए मैं उनके(वरुण) के पास ही जाऊँगी। मेरी नैतिकता को नष्ट मत करो।"


सैवमुक्त्वा मनुं देवं मित्रावरुणयोरिला ।
गत्वान्तिकं वरारोहा प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ।। 1.10.१० ।।

अंशेऽस्मि युवयोर्जाता देवौ किं करवाणि वाम्।
मनुना चाहमुक्ता वै अनुगच्छस्व मामिति ।। ११ ।।

तां तथावादिनीं साध्वीमिलां धर्मपरायणाम् ।
मित्रश्च वरुणश्चोभावूचतुर्यन्निबोध तत् ।। १२ ।।

अनेन तव धर्मेण प्रश्रयेण दमेन च ।
सत्येन चैव सुश्रोणि प्रीतौ स्वो वरवर्णिनि ।। १३ ।।

आवयोस्त्वं महाभागे ख्यातिं कन्येति यास्यसि ।
मनोर्वंशधरः पुत्रस्त्वमेव च भविष्यसि ।। १४ ।।

सुद्युम्न इति विख्यातस्त्रिषु लोकेषु शोभने ।
जगत्प्रियो धर्मशीलो मनोर्वंशविवर्धनः ।। १५ ।।

निवृत्ता सा तु तच्छुत्वा गच्छन्ती पितुरन्तिकम्।
बुधेनान्तरमासाद्य मैथुनायोपमन्त्रिता ।। १६ ।।

सोमपुत्राद् बुधाद् राजंस्तस्यां जज्ञे पुरूरवाः ।
जनयित्वा सुतं सा तमिला सुद्युम्नतां गता ।।१७ ।।

सुद्युम्नस्य तु दायादास्त्रयः परमधार्मिकाः ।
उत्कलश्च गयश्चैव विनताश्वश्च भारत ।। १८

उत्कलस्योत्कला राजन् विनताश्वस्य पश्चिमा।
दिक् पूर्वा भरतश्रेष्ठ गयस्य तु गया पुरी ।। १९ ।।

प्रविष्टे तुं मनौ तात दिवाकरमरिंदम ।
दशधा तद्दधत्क्षत्रमकरोत् पृथिवीमिमाम् ।। 1.10.२० ।।


10-11. मनु से यह कहकर इला, मित्र और वरुण के पास गई और उस सुन्दर स्त्री ने हाथ जोड़कर उनसे कहा, "मैं आपकी ही ऊर्जा से उत्पन्न हुई हूँ; मनु ने मुझे अपने पीछे आने को कहा है। मुझे बताइए कि मुझे क्या करना चाहिए।"

राजन्! इला के इस प्रकार कहने पर मित्र और वरुण ने उससे जो कहा था, उसे सुनो

13. हे सुंदर कमर वाली स्त्री, हम तुम्हारे सद्गुण, विनम्रता, आत्मसंयम और सत्यनिष्ठा से प्रसन्न हुए हैं।

14-15. इसलिए हे महान देवी, आप हमारी पुत्री के रूप में प्रसिद्ध होंगी, हे सुंदरी, आप मनु की पुत्री होंगी, उनके वंश को आगे बढ़ाएंगी, तीनों लोकों में सुद्युम्न नाम से प्रसिद्ध होंगी । आप धर्मपरायण होंगी, जगत की प्रिय होंगी और मनु के वंश को बढ़ाएंगी।

16. यह सुनकर जब वह अपने पिता (मनु) के पास लौटने ही वाली थी, तभी रास्ते में बुध ने उसे वैवाहिक उद्देश्यों के लिए आमन्त्रित किया।

17. फिर सोम के पुत्र बुध ने उससे पुरुरवा को जन्म दिया । उस पुत्र को जन्म देने के बाद इला सुद्युम्न बन गई।

मानवेयो महाराज स्त्रीपुंसोर्लक्षणैर्युतः ।
धृतवान् य इलेत्येव सुद्युम्नश्चातिविश्रुतः ।। २७ ।।

27. हे महाराज, मनु के उस पुत्र को, जो पुरुष और स्त्री दोनों के गुणों से युक्त था। उसने (स्त्री रुप में) इला नाम धारण किया और सुद्युम्न नाम से उनको प्रसिद्धि मिली।

मत्स्यपुराण, अध्यायः (१२) के अनुसार-
सुद्युम्न (इला) नाम की एक माह वाली स्त्री का वर्णन।


सूत उवाच।
अथान्विषन्तो राजानं भ्रातरस्तस्य मानवाः। इक्ष्वाकु प्रमुखा जग्मुस्तदा शरवणान्तिकम्।। १

ततस्ते दद्रृशुः सर्वे वडवामग्रतः स्थिताम्।रत्नपर्याणकिरणदीप्तकायामनुत्तमाम्।। २

पर्याणप्रत्यभिज्ञानात् सर्वे विस्मयमागताः। अयं चन्द्रप्रभो नाम वाजीतस्य महात्मनः।। ३

अगमद्वडवा रूपमुत्तमं केन हेतुना। ततस्तु मैत्रावरुणिं पप्रच्छुस्ते पुरोधसम्।। ४

किमित्येतदभूच्चित्रं वद योग विदाम्वर। वशिष्ठश्चाब्रवीत् सर्वं द्रृष्ट्वा तद्ध्यानचक्षुषा।। ५

समयः शम्भुदयिता कृतः शरवणे पुरा। यः पुमान् प्रविशेदत्र स नारीत्वमवाप्स्यति।। ६

अयमश्वोऽपि नारीत्वमगाद्राज्ञा सहैवतु। पुनः पुरुषतामेति यथासौ धनदोपमः।। ७

तथैव यत्नः कर्तव्य चाराध्यैव पिनाकिनम्। ततस्ते मानवा जग्मुर्यत्र देवो महेश्वरः।। ८

तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैः पार्वतीपरमेश्वरौ। तावूचतुरलङ्घ्योऽयं समयः किन्तु साम्प्रतम्।। ९

इक्ष्वाकोरश्वमेधेन यत्‌ फलं स्यात्तदावयोः। दत्त्वा किम्पुरुषो वीरः स भविष्यत्यसंशयम्।। १०

तथेत्युक्तास्ततस्तेस्तु जग्मुर्वैवस्वतात्मजाः। इक्ष्वाकोश्चाश्वमेधेन चेलः किम्पुरुषोऽभवत्।। ११

मासमेकम्पुमान्वीरः स्त्री च मासमभूत् पुनः। बुधस्य भवने तिष्ठन्निलो गर्भधरोऽभवत्।। १२

अजीजनत् पुत्रमेकमनेक गुणसंयुतम्। बुधश्चोत्पाद्य तं पुत्रं स्वर्लोकमगमत्ततः।। १३


अनुवाद- १-१३

सूतजी कहते हैं-
ऋपियो बहुत दिनोंतक राजा इल (सुद्युम्न) के राजधानी न लौटनेपर सशङ्कित होकर उनके छोटे भाई मनु-पुत्र इक्ष्वाकु आदि राजा इल (सुद्युम्र) का अन्वेषणः करते हुए उसी शरवण के निकट जा पहुँचे। वहाँ उन सभीने मार्गके अग्रभाग में खड़ी हुई एक अनुपम घोड़ी को देखा, जिसका शरीर रत्ननिर्मित जीन की किरणोंसे उद्दीप्त हो रहा था। तत्पश्चात् जीन को पहचानकर वे सभी बन्धु आश्चर्यचकित हो गये, और परस्पर कहने लगे 'अरे ! यह तो हमारे भाई महात्मा राजा इल का चन्द्रप्रभ नामक घोड़ा है। किस कारण यह सुन्दर घोड़ी के रूप में परिणत हो गया। तब वे सभी लौटकर अपने कुल पुरोहित महर्षि वसिष्ठ के पास जाकर पूछने लगे 'योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे ! ऐसी आश्चर्यजनक घटना क्यों घटित हुई ? इसका रहस्य हमें बतलाइये। तब महर्षि वसिष्ठ ध्यानदृष्टि द्वारा सारा वृत्तान्त जानकर इक्ष्वाकु आदि से बोले- 'राजपुत्रो ! पूर्वकालमें शम्भु पत्नी उमा ने इस शरवण के विषय में ऐसा नियम और शर्त निर्धारित कर रखा है कि 'जो पुरुष इस शरवण में प्रवेश करेगा, वह स्त्री रूप में परिवर्तित हो जायगा। इसी कारण राजा इल के साथ ही साथ यह घोड़ा भी स्त्रीत्व को प्राप्त हो गया है। अब जिस प्रकार राजा इल कुबेर की भाँति पुनः पुरुषत्वको प्राप्त कर सकें, तुमलोगों को पिनाकधारी शंकर की आराधना करके वैसा ही प्रयत्न करना चाहिये।' महर्षि वसिष्ठ की आज्ञा पाकर वे सभी मनु-पुत्र वहाँ गये, जहाँ देवाधिदेव महेश्वर विराजमान थे। वहाँ उन्होंने विभिन्न स्तोत्रोंद्वारा पार्वती और परमेश्वर का स्तवन किया। उस स्तवन से प्रसन्न होकर पार्वती और परमेश्वरने कहा- 'राजकुमारो यद्यपि मेरे इस नियम (शर्त) का उल्लङ्घन नहीं किया जा सकता, फिर भी इस समय उसके निवारण के लिये मैं एक उपाय बतला रहा हूँ। यदि इक्ष्वाकु द्वारा किये गये अश्वमेध यज्ञका जो कुछ फल हो, वह सारा का सारा हम दोनों को समर्पित कर दिया जाय तो राजा इल निःसंदेह किम्पुरुष (किन्नर, अर्ध नारी) हो जायेंगे। यह सुनकर 'बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा'- यों कहकर वैवस्वत मनुके वे सभी पुत्र राजधानी को लौट आये। घर आकर इक्ष्वाकु ने अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान किया और उसका पुण्य फल पार्वती परमेश्वर को अर्पित कर दिया। जिसके परिणामस्वरूप इल किम्पुरुष (किन्नर) हो गये। वहाँ वे एक मास पुरुषरूप में रहकर पुनः एक मास स्त्री हो जाते थे। बुध के भवन में स्त्री रूप से रहते समय इल ने गर्भ धारण कर लिया था। उस गर्भ से अनेक गुणों से सम्पन्न एक पुत्र (पुरुरवा) उत्पन्न हुआ। उस पुत्र को उत्पन्न कर बुध भूलोक से पुन: स्वर्ग लोक को चले गये॥


कथा की वास्तविकता-


वास्तव में देखा जाए तो चंद्रमा और उससे उत्पन्न चंद्रवंश से सम्बन्धित उपर्युक्त जितने भी साक्ष्य विशेष रूप से इला से सम्बन्धित संदर्भ प्रस्तुत किया गया है, उनमें सोची-समझी साजिश और शास्त्रीय षड्यंत्र के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। यानी अधिकांश सन्दर्भों में सत्यता कम असत्यता (कपोल-कल्पना) अधिक है।

अब कुछ लोग कह सकते हैं कि शास्त्रों में लिखी गई बातें कैसे असत्य हों सकतीं हैं। तो इसके लिए बता दें कि शास्त्रों या किसी भी ग्रन्थ की प्रामाणिकता तभी मानी जा सकती है, जब उसके पीछे लिखने वाले की शुद्ध मंशा, निस्वार्थ भाव और सत्य को उजागर करने की निष्पक्षता हो। यदि लेखक का विचार कलुषित हैं, तो निश्चय ही उसका परिणाम भ्रामक होगा। इतना ही नहीं जब लेखक के मन में व्यक्तिगत

स्वार्थ, पूर्वाग्रह या किसी विशेष प्रयोजन (hidden agenda) का समावेश हो जाता है तब वह तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है जिससे उसकी लेखनी में सत्य पीछे छूट जाता है। तब उससे उसकी लेखनी की सत्यता के बारे में पूछा जाता है तो वह हर बार एक नया झूठ बोलता है। परिणाम यह होता है उसका झूठ पकड़ा जाता है। क्योंकि सत्य झूठ से परे, निर्विवाद और अपरिवर्तनीय रूप से अपने एक ही रुप में सदैव अडिग (स्थिर) रहता है। यदि सत्य के बारे में एक बार नहीं हजार बार पूछा जाए तो वह हर बार वही कहेगा जो पहली बार कहा था।

गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज का कथन है कि- "वास्तव में सत्य को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि आचरण और अंतरात्मा की शुद्धता में उतारना ही  आध्यात्मिकता मूल है।"


कथा की समालोचना

अब हम लोग क्रमशः शुद्ध अंतरात्मा से पौराणिक ग्रन्थों का सम्मान करते हुए विचार करेंगे कि चन्द्रमा और उसके वंश की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जो शास्त्रों (पौराणिक ग्रन्थों) में बातें लिखी गई है वह कितनी संगत और असंगत हैं।


(1) पौराणिक ग्रन्थों में पहली विसंगति चन्द्रमा की उत्पत्ति को लेकर होती है। जैसे-  श्रीमद्भागवत गीता और चार वेदों के अनुसार चन्द्रमा की उत्पत्ति को सर्वप्रथम परमेश्वर श्रीकृष्ण (विराट विष्णु) से बताई गई है। इस बात को मैं पहले ही बता चुका हूँ। चूँकि यह उत्पत्ति सबसे पहले और  प्राचीनतम ग्रन्थों में बताई गई है इसलिए यही शास्वत और सार्वभौमिक सत्य है। किन्तु यदि इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो चन्द्रमा की उत्पत्ति सूर्य से हुई है। यह भी ध्रुव सत्य है। किन्तु यहाँ पर हम पौराणिक सन्दर्भों की ही बात करेंगे। इस क्रम में देखा जाए तो वेदों के बाद जो पुराण लिखे गए, उन सभी में पुराणकारों ने अपने नीजी स्वार्थ से प्रेरित होकर चन्द्रमा को कभी "अत्रि" से, तो कभी समुद्र से, तो कभी त्रिपुर सुन्दरी की बाईं आँख से उत्पन्न कराकर चन्द्रमा की वास्तविक उत्पत्ति से लोगों को भ्रमित कर दिया। इस सम्बन्ध में समाज में एक कहावत प्रचलित है कि- एक झूठ को छुपाने के लिए हजार झूठ बोला जाए तब भी सत्य नहीं हो सकता। अर्थात झूठ सत्य का विकल्प कभी नहीं हो सकता।



(2)- पौराणिक ग्रन्थों में दूसरी विसंगति राजा सुद्युम्न (इला) की कथाओं में मिलती है, जो पूरी तरह से प्रक्षिप्त, निराधार, और अवैज्ञानिक है। क्योंकि आजतक ऐसा नहीं देखा गया कि कोई व्यक्ति एक माह के लिए स्त्री हो जाए और पुनः एक माह के लिए पुरुष हो जाए और उसी एक माह के स्त्रित्व काल में गर्भवती होकर एक ही माह में पुत्र पैदा करें। यह सम्भव हो ही नहीं सकता। जबकि पुराणकारों ने कुछ इसी तरह की कथा राजा सुद्युम्न (इला) के लिए लिखा है। वह कथा किसी भी तरह से सत्य की कसौटी पर खरी नहीं उतर सकती, क्योंकि यह प्राकृति विधानों के बिल्कुल विपरीत है। सुद्युम्न (इला) नाम की एक माह वाली स्त्री की घटनाक्रम को हम अलग अलग पुराणों के हिसाब से पहले ही बता चुका हूँ।


(3) पौराणिक ग्रन्थों में चंद्रमा से सम्बन्धित तीसरी विसंगति या कहें सर्वाधिक आश्चर्यजनक और दिलचस्प बात यह है कि- चंद्रमा की 27 पत्नियाँ हैं। किन्तु चंद्रमा एक ऐसे शाप और रोग से ग्रसित है जिसके कारण वह न तो कभी पत्नी का सुख प्राप्त कर सकता और न ही वह सन्तान पैदा कर सकता। इस बात की पुष्टि- भागवतपुराण स्कन्ध-६ के अध्याय (६) के श्लोक संख्या- २३-२४ से होती है। जिसमें लिखा गया है कि-

कृत्तिकादीनि नक्षत्राणीन्दोः पत्न्यस्तु भारत।
दक्षशापात् - सोऽनपत्यस्तासु यक्ष्मग्रहार्दितः ।।२३।

पुनः प्रसाद्य तं सोमः कला लेभे क्षये दिताः।
श्रृणु नामानि लोकानां मातॄणां शङ्कराणि च ।।२४।


अनुवाद- २३-२४

कृतिका आदि सत्ताईस नक्षत्राभिमानी चन्द्रमा की सत्ताईस पत्नियाँ हैं। दक्ष के शाप से वह (चन्द्रमा) यक्ष्मा रोग यानी टी.बी. से ग्रसित होने के कारण सन्तान हीन ही रहा।२३।

उस चन्द्रमा ने पुन: दक्ष को प्रसन्न  करके कृष्ण पक्ष की क्षीण कलाओं के शुक्ल पक्ष में पूर्ण होने का वरदान तो माँग लिया (परन्तु नक्षत्राभिमानी पत्नियों से चन्द्रमा को कोई सन्तान नहीं हुई। २४


अतः उपर्युक्त श्लोकों से स्पष्ट होता है कि चन्द्रमा की (27) पत्नियों से चंद्रमा को कोई सन्तान नहीं हुई। दूसरी दिलचस्प बात यह है कि चन्द्रमा खुद (टी.बी.) जैसे असाध्य रोग से ग्रसित है फिर भी वह इतना कामुक है कि सत्ताईस पत्नीयों का पति होते हुए भी वह कामवासना से तृप्त नहीं हो सका। जिसका परिणाम यह हुआ कि वह अपने गुरु की पत्नी तारा का ही हरण कर लिया और उससे बुध नाम का एक पुत्र पैदा किया।

अब सोचने वाली बात यह है कि क्या चंद्रमा इतना कामुक था कि चन्द्रमा अपनी सत्ताईस पत्नियों से सन्तुष्ट नहीं हो सका कि वह अपने गुरु या पुरोहित कि पत्नी से सम्भोग किया? जबकि इसके पहले दक्ष प्रजापति ने चन्द्रमा को यह शाप दिया था कि उसको कोई सन्तान नहीं होगी। फिर भी वह शाप की मर्यादा और नैतिकता को तार तार करके ऐसा घृणित कर्म किया जो शास्त्र के विवेचन से पाप है



अब सवाल यह है कि पौराणिक कथाओं में ऐसी बातें क्यों लिखी गई ? तो इसका स्पष्ट उत्तर है- कथाकारों को ऐसा करने का एकमात्र उद्देश्य किसी भी तरह से भू-तल के प्रथम सम्राट पुरुरवा को पूरी तरह से ब्राह्मीकरण करके  उसकी अहीर जाती की पहचान को सदा के लिए मिटाकर चन्द्रवंशी अहीर जाती के वास्तविक इतिहास से लोगों को भ्रमित करना था।
इसके लिए उन्होंने सबसे पहले आकाशीय पिण्ड चन्द्रमा को एक ब्राह्मण अत्रि से उत्पन्न कराकर ब्राह्मीकरण किया, फिर चन्द्रमा और किसी तारा (Star) से आकाशीय पिण्ड बुध को उत्पन्न किया। पुनः चन्द्रमा के पुत्र- बुध से एक माह स्त्री और एक माह पुरुष हो जाने वाले काल्पनिक पुरुष सुद्युम्न (इला) से भू-तल के प्रथम चन्द्रवंशी सम्राट पुरुरवा तथा उसकी अहीर जाती को ब्राह्मीकरण के लिए तरह-तरह के शास्त्रीय षड्यंत्र रचा। जो किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं है।




कथा का सम्पूर्ण समाधान-


तो इस सम्बन्ध में बता दें कि पौराणिक ग्रन्थों के हिसाब से सृष्टि की रचना दो तरह से बाताई गई है। इन दोनों तरह की सृष्टि रचना को जानने के बाद सारे प्रश्नों का समाधान स्वतः हो जाएगा।

(1) पहली सृष्टि रचना-
सृष्टि की प्रथम सर्जना परमेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा हुई है। जिसमें परमेश्वर श्रीकृष्ण ने सर्वप्रथम नारायण, शिव, ब्रह्मा इत्यादि के साथ ही गोप और गोपियों को उत्पन्न किया। इस बात की पुष्टि ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय-(३) के निम्नलिखित श्लोकों से होती है। जिसमें लिखा गया है कि-


आविर्बभूवुः सर्गादौ पुंसो दक्षिणपार्श्वतः ।
भवकारणरूपाश्च मूर्तिमन्तस्त्रयो गुणाः।४।

ततो महानहङ्कारः पञ्चतन्मात्र एव च।
रूपरसगन्धस्पर्शशब्दाश्चैवेतिसंज्ञकाः।५।

आविर्बभूव पश्चात्स्वयं नारायणः प्रभुः ।
श्यामो युवा पीतवासा वनमाली चतुर्भुजः।६।

शंखचक्रगदापद्मधरः स्मेरमुखाम्बुजः।।
रत्नभूषणभूषाढ्यः शार्ङ्गी कौस्तुभभूषणः।७।


सबसे पहले उन परम पुरुष श्रीकृष्ण के दक्षिणपार्श्व से जगत के कारण रूप तीन मूर्तिमान गुण प्रकट हुए। उन गुणों से महत्तत्व, अहंकार, पाँच तन्मात्राऐं तथा रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, और शब्द-ये पाँच विषय क्रमशः प्रकट हुए।४-५।

• तदनन्तर श्रीकृष्ण से साक्षात भगवान नारायण का प्रादुर्भाव हुआ जिनकी अंग-कान्ति श्याम थी वे नित्य तरुण पीताम्बर धारी तथा वनमाला से विभूषित थे। उनकी चार भुजाऐं थीं, उन्होंने अपने हाथ में क्रमशः शञ्ख, चक्र, गदा, और पद्म धारण कर रखे थे।६-७।

आविर्बभूव तत्पश्चादात्मनो वामपार्श्वतः।
शुद्धस्फटिकसङ्काशः पञ्चवक्त्रो दिगम्बरः।। १८।

तत्पश्चात परमात्मा श्रीकृष्ण के वामपार्श्व से भगवान शिव प्रकट हुए। उनकी अंककान्ति शुद्ध स्फटिकमणि के समान निर्मल एवं उज्जवल थी। उनके पाँच मुख थे और दिशाऐं ही उनके लिए वस्त्र थीं अर्थात् वे निर्वस्त्र थे।१८।


आविर्वभूव तत्पश्चात्कृष्णस्य नाभिपङ्कजात्।
महातपस्वी वृद्धश्च कमण्डलुकरो वरः।३०।

शुक्लवासाः शुक्लदन्तः शुक्लकेशश्चतुर्मुखः।
योगीशः शिल्पिनामीशः सर्वेषां जनको गुरुः।३१।


• तत्पश्चात श्री कृष्ण के नाभि कमल से बड़े- बूढ़े महातपस्वी ब्रह्माजी प्रकट हुए। उन्होंने अपने हाथ में कमण्डलु लिया था। उनके वस्त्र, दाँत और केश सभी श्वेत (सफेद) थे। और उनके चार मुख थे। ३०-३१।
  

                 
फिर सृष्टि- सर्जन के उसी क्रम में ब्रह्मा, शिव नारायण आदि की उत्पत्ति के समय ही गोपों (आभीरों) की भी उत्पत्ति हुई। जिसकी पुष्टि- ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय-(5) के श्लोक संख्या- २५, (४० और ४२) से होती है, जिसमें लिखा गया है कि -

"आविर्बभूव कन्यैका कृष्णस्य वामपार्श्वतः।
धावित्वा पुष्पमानीय ददावर्घ्यं प्रभोः पदे।२५।

तस्या राधायाश्च लोमकूपेभ्यः सद्योगोपाङ्गनागणः।
आविर्बभूव रूपेण वेशेनैव च तत्समः।४०।

कृष्णस्य लोमकूपेभ्यः सद्यो गोपगणो मुने।
आविर्बभूव रूपेण वेषेणैव च तत्समः।४२।


अनुवाद -
गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण के वाम-पार्श्व से वामा के रूप में एक कामनाओं की प्रतिमूर्ति- प्रकृति रूपा कन्या उत्पन्न हुई जो कृष्ण के ही समान किशोर-वय थी।२५।
• फिर तो उस किशोरी अर्थात् श्रीराधा के रोमकूपों से तत्काल ही अनेक गोपांगनाओं की उत्पत्ति हुई; जो रूप और वेष में राधा के ही समान थीं। ४०।
• उसी क्षण श्रीकृष्ण के रोमकूपों से भी अनेक गोप-गणों का आविर्भाव हुआ जो रूप और वेष रचना में श्रीकृष्ण के ही समान थे।४२।

इसी तरह से गोपों की उत्पत्ति के बारे में श्रीमद्देवी भागवत पुराण के नवम् स्कन्ध अध्याय-(२) के श्लोक- ६०-६१ में लिखा गया है कि -

अथगोलोकनाथस्य लोमनां विवरतो मुने।
भूताश्चासंख्यगोपाश्च वयसा तेजसा समाः।। ६०

रुपेण च गुणेनैव बलेन विक्रमेण च।
प्राणतुल्यप्रियाः सर्वे भभूवः पार्षदा विभोः।। ६१

अनुवाद- ६०-६१
हे मुने ! गोलोकनाथ श्रीकृष्ण के रोमकूपों (कोशिकाओं) से असंख्य गोपगण प्रकट हुए, जो वय, तेज, रुप, गुण, बल तथा पराक्रम में उन्हीं के समान थे। वे सभी परमेश्वर श्रीकृष्ण के प्राणों के समान प्रिय पार्षद बन गये।


गोपों यानी यादवों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में भगवान श्रीकृष्ण भू-तल पर उस समय कहें हैं- जब वे स्वयं भूतल पर गोप जाति के यदुवंश के अन्तर्गत वृष्णि कुल में अवतरित होते थे। और कुछ समय पश्चात कंस का वध करके मथुरा के सिंहासन पर पुन: कंस के पिता उग्रसेन को अभिषिक्त करते हैं। और इसके कुछ समय पश्चात उग्रसेन भगवान श्रीकृष्ण से राजसूय यज्ञ के आयोजन का परामर्श करते हैं।। उसी प्रसंग के क्रम में स्वयं श्रीकृष्ण उग्रसेन से कहते हैं कि- "सभी यादव मेरे अंश हैं"। श्रीकृष्ण के इस कथन की पुष्टि गर्गसंहिता के विश्वजितखण्ड के अध्याय (२) के श्लोक संख्या- (७) से होती है, जिसमें लिखा गया है कि-

ममांशा यादवाः सर्वे लोकद्वयजिगीषवः॥ जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम्॥७॥

समस्त यादव मेरे ही अंश से प्रकट हुए हैं, और वे लोक,परलोक दोनों को जीतने की इच्‍छा रखने वाले हैं। वे दिग्विजय के लिये यात्रा करके, शत्रुओं को जीतकर लौट आयेंगे और सम्‍पूर्ण दिशाओं से आपके लिये भेंट और उपहार लायेंगे।

विशेष- गोप और गोपियाँ श्रीकृष्ण और श्रीराधा के समरूप इसलिए थे, क्योंकि इनकी उत्पत्ति श्रीकृष्ण और श्रीराधा की सूक्ष्मतम इकाई (कोशिका) अर्थात उनके क्लोन से हुई हैं। इसलिए सभी गोप श्रीकृष्ण के समरूप तथा सभी गोपियों श्रीराधा के समरूप उत्पन्न हुईं हैं। इस बात को आज विज्ञान भी स्वीकारता है कि- समरूपण अर्थात क्लोनिंग विधि से उत्पन्न जीव उसी के समरूप होता है, जिससे उसकी क्लोनिंग की गई होती है। और विज्ञान के इसी समरूपण सिद्धान्त से परमेश्वर श्रीकृष्ण और श्रीराधा ने पूर्व काल में ही अपनी सूक्ष्मतम इकाइयों से समरूपण विधि द्वारा गोलोक में गोप-गोपियों की उत्पत्ति कीं थीं।
अतः स्पष्ट होता है प्रथम सर्जनकर्ता परमेश्वर श्रीकृष्ण ही है। उन्होंने अपनी  प्रथम सृष्टि रचना में नारायण, शिव, ब्रह्मा आदि देवताओं की उत्पत्ति के साथ ही गोप और गोपियों की भी उत्पत्ति की है। इस लिए उत्पत्ति विशेष के कारण गोप और गोपियाँ ब्रह्मा के जन्म के समय से सृष्टि में उसी तरह से विद्यमान है जैसे ब्रह्मा, नारायण और शिव विद्यमान हैं। अतः यहाँ यह भी सिद्ध होता है कि गोप ब्रह्मा जी की सृष्टि रचना के भाग नहीं हैं। चूँकि गोप यानी यादव विष्णु (श्रीकृष्ण) से उत्पन्न हैं इसलिए इनका वर्ण "वैष्णव" हैं। यह ध्रुव सत्य है।  जिसकी पुष्टि आगे स्वतः हो जाएगी।



(2) दूसरी सृष्टि रचना ब्रह्मा जी द्वारा-

गोलोक में जब भगवान श्रीकृष्ण ब्रह्मा, नारायण, शिव तथा देवों की उत्पत्ति कर लेते हैं, उसके पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ब्रह्माजी को बुलाकर उनके कर्म- एवं दायित्वों को निश्चित करते हुए ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्म खण्ड के अध्याय-(६ ) के श्लोक संख्या-(७१) और-(७२) में कहते हैं-

"मदीयं च तपः कृत्वा दिव्यं वर्षसहस्रकम् ।
सृष्टिं कुरु महाभाग विधे नानाविधां पराम् ।७१।

इत्युक्त्वा ब्रह्मणे कृष्णो ददौ मालां मनोरमाम्।
जगाम सार्द्धं गोपीभिर्गोपैर्वृन्दावनं वनम् ।७२।

अनुवाद- 71-72
• महाभाग विधे ! अर्थात ब्रह्माजी ! तुम सहस्र दिव्य वर्षों तक मेरी प्रसन्नता के लिए तप करके नाना प्रकार की उत्तम सृष्टि करो।
• ऐसा कह कर श्रीकृष्ण ने ब्रह्माजी को एक मनोरमा माला दी। फिर गोप- गोपियों के साथ वे नित्य नूतन दिव्य वृन्दावन में चले गए।
(ध्यान रहे गोलोक में भी वृन्दावन है। यहाँ उसी वृन्दावन का वर्णन है )

इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण का आदेश पाकर ब्रह्माजी विविध प्रकार की उत्तम सृष्टि रचना का कार्य प्रारम्भ करते हैं। जिसकी पुष्टि- ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय-५ के श्लोक -१२ से १७ में  भी होती है
जो इस प्रकार है-

"ब्राह्मवाराहपाद्माश्च त्रयः कल्पा निरूपिताः।
कल्पत्रये यथा सृष्टिः कथयामि निशामय।१२।

"ब्राह्मे च मेदिनीं सृष्ट्वा स्रष्टा सृष्टिं चकार सः।
मधुकैटभयोश्चैव मेदसा चाज्ञया प्रभोः।१३।

"वाराहे तां समुद्धृत्य लुप्तां मग्नां रसातलात् ।
विष्णोर्वराहरूपस्य द्वारा चातिप्रयत्नतः।१४।

"पाद्मे विष्णोर्नाभिपद्मे स्रष्टा सृष्टिं विनिर्ममे ।
त्रिलोकीं ब्रह्मलोकान्तां नित्यलोकत्रयं विना।१५।

'एतत्तु कालसंख्यानमुक्तं सृष्टिनिरूपणे।
किंचिन्निरूपणं सृष्टे किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।१६।

"अतः परं किं चकार भगवान्सात्वतांपतिः।
एतान्सृष्ट्वा किं चकार तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ।१७।
  
अनुवाद -( १२ से १७ ) तक-
ब्रह्मकल्प में मधु-कैटभ के मेद (चर्बी) से मेदिनी (पृथ्वी) की सृष्टि करके स्रष्टा ने भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा ले सृष्टि रचना की थी। फिर वाराहकल्प में जब पृथ्वी एकार्णव के जल में डूब गई थी, तब वाराहरूपधारी भगवान विष्णु के द्वारा अत्यन्त प्रयत्न पूर्वक रसातल से उसका उद्धार करवाया और सृष्टि रचना की।
तत्पश्चात पाद्मकल्प में सृष्टि- कर्ता ब्रह्मा ने विष्णु के नाभि- कमल पर सृष्टि का निर्माण किया। ब्रह्मलोक पर्यन्त जो त्रिलोकी (तीन लोक) हैं  उसकी  रचना की। किन्तु उसके ऊपर जो नित्य तीन लोक (शिवलोक, वैकुण्ठलोक, और उससे भी ऊपर गोलोक है ) उसकी रचना ब्रह्मा ने नहीं की।    
कुल मिलाकर ब्रह्मा जी सभी की सृष्टि करते हैं किन्तु उनकी भी कुछ मर्यादाऐं हैं- जैसे वे सत्य सनातन एवं चिर-स्थाई- वैकुण्ठ लोक, शिवलोक, और सबसे ऊपर गोलोक और उसमें रहने वाले गोप और गोपियों की सृष्टि नहीं करते।

क्योंकि गोप और गोपियों की उत्पत्ति तो भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराधा के रोम-कूपों से उसी समय हो जाती है जिस समय नारायण, शिव और ब्रह्मा की उत्पत्ति होती है। तो ऐसे में ब्रह्माजी, गोपों की उत्पत्ति दुबारा (पुनः) कैसे कर सकते हैं ?


ब्रह्मा जी की सृष्टि रचना की विशेषताएँ-


(१)- श्रीकृष्ण की प्रथम सृष्टि सृजन के बाद गोपेश्वर श्रीकृष्ण के आदेश पर ब्रह्माजी विविध प्रकार की उत्तम सृष्टि रचना का कार्य किया इसलिए ब्रह्माजी को द्वितीयक सृष्टि रचनाकार भी कहा जाता है, जिसमें ब्रह्माजी अपनी मर्यादा में रहकर ही सृष्टि की रचना किया। जिसमें वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अनन्त लोकों की रचना करते हुए उनमें जड़, जीव, जगत इत्यादि की सुन्दर रचना करते हैं। उसी क्रम में ब्रह्मा जी मानवीय सृष्टि के चातुर्यवर्णों की भी रचना की है। जिसमे- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों की सामाजिक स्थितियाँ बनी है। किन्तु ब्रह्माजी सबसे ऊपर वाले गोलोक और उससे क्रमशः नीचे स्थित शिव लोक और वैकुण्ठ लोक तथा गोप और गोपियों की सृष्टि रचना नहीं करते हैं। यहीं कारण है कि गोपों को ब्रह्माजी की सृष्टि रचना का भाग नहीं माना जाता है। इन सभी बातों को प्रमाण सहित पहले ही बता दिया गया है ताकि किसी को किसी प्रकार का संशय न रह जाए। क्योंकि हम आगे ब्रह्मा जी की सृष्टि रचना की मनुवादी व्यवस्था के उपरान्त गोपेश्वर श्रीकृष्ण की उस वैष्णवी व्यवस्था के बारे में बताऊँगा जिसके प्रवर्तक चन्द्रवंशी अहीर सम्राट पुरुरवा हैं।

(2)- ब्रह्मा जी अपनी मानवीय सृष्टि रचना में चार वर्ण-  (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों) की रचना की। जिसके परिणामस्वरूप मानव समाज में चार तरह की सामाजिक स्थितियाँ बनी है। इसी समाजिक स्थिति को मनुवादी व्यवस्था कहा जाता है। इस व्यवस्था के प्रथम प्रवर्तक महाराज मनु थे जो ब्रह्मा जी के शरीर के दाएँ भाग से तथा उनकी पत्नी शतरूपा ब्रह्मा जी के बाएँ भाग से प्रकट हुई थीं। फिर ब्रह्मा जी की अगली सृष्टि रचना में यहीं मनु, सूर्य (विवस्वान) के पुत्र हुए। इस लिए उनको वैवस्वत मनु कहा गया। इसी मनु महाराज को ब्राह्मी व्यवस्था के अन्तर्गत सूर्यवंश के प्रथम सम्राट, सूर्यवंश के प्रथम देवता और रक्षक इत्यादि सबकुछ माना गया है।

ब्रह्मा जी की सृष्टि रचना में हर मन्वंतर में अलग अलग मनु होते हैं। इस समय सातवें मनु: वैवस्वत मनु (वर्तमान मनु) हैं जो वर्तमान मन्वंतर के अधिपति हैं। इस वैवस्वत मनु के 10 पुत्र थे, उन्हीं से सूर्यवंश का आरम्भ मना जाता है। उनके नाम इस प्रकार हैं- नृग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यंत, दिष्ट (नाभानेदिष्ट), करुष, पृषध्र, नभग, कवि (या प्रांशु)।
मनु की एक पुत्री भी थी जिसका नाम इला (सुद्युम्न) था। जिसके बारे में हम पहले ही बता चुका हूँ कि- वह न तो स्त्री था और न ही पुरुष, फिर भी वह सूर्यपुत्र मनु के पुत्रों से ही सम्बन्धित था। कहने का मतलब यह है कि सूर्य पुत्र मनु का पुत्र ही सुद्युम्न और इला दोनों ही था, जो एक माह के लिए स्त्री और एक माह के लिए पुरुष हो जाया करता था। उसी एक माह के स्त्रित्व काल में उसने पुरुरवा को जन्म दिया। इस बात को भी हम पहले ही बता चुका हूँ।
और इस बात को भी सदैव के लिए याद कर लीजिए कि- इसी एक माह की स्त्री वाली मनगढ़ंत कहानी से चन्द्रवंशी अहीर सम्राट पुरुरवा को ब्रह्मा जी की सृष्टि रचना की सूर्यवंश की मनुवादी व्यवस्था में शास्त्रीय षड्यंत्र द्वारा घसीट लिया गया।

जबकि पूरुरवा और उसकी पत्नी उर्वशी दोनों ही वैष्णव वर्ण की अभीर जाति से सम्बन्धित थे। जिनका साम्राज्य भूलोक से स्वर्गलोक तक था। इन दोनों को वैष्णव वर्ण के अहीर (गोप) जाति से सम्बन्धित होने की पुष्टि- सर्वप्रथम ऋग्वेद के दशम मण्डल के (९५) वें सूक्त की ऋचा- (३) से होती है, जो पुरूरवा-उर्वशी संवाद के रूप में है। जिसमें पुरूरवा के विशेषण गोष (घोष-गोप) तथा गोपीथ हैं। नीचे सन्दर्भ देखें-

"इषुर्न श्रिय इषुधेरसना गोषाः शतसा न रंहिः।
अवीरे क्रतौ वि दविद्युतन्नोरा न मायुं चितयन्त धुनयः॥३।।
(ऋग्वेद-10/95/3)
            
अर्थानुवाद: हे गोपिके ! तेरे सहयोग के बिना- तुणीर से फेंका जाने वाला बाण भी विजयश्री में समर्थ नहीं होता। (गोषाः शतसा) मैं सैकड़ो गायों का सेवक तुझ भार्या उर्वशी के सहयोग के बिना वेगवान भी नहीं हूँ। (अवीरे) हे आभीरे ! विस्तृत कर्म में या संग्राम में भी अब मेरा वेग (बल) प्रकाशित नहीं होता है। और शत्रुओं को कम्पित करने वाले मेरे सैनिक भी अब मेरे आदेश (वचन अथवा हुंक्कार) को नहीं मानते हैं।३।

ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचा का हम नीचे संस्कृत भाष्य हिन्दी अनुवाद सहित प्रस्तुत कर रहे हैं।

भाष्य- हिन्दी अनुवाद सहित-
"अनया उर्वश्या प्रति पुरूरवाः स्वस्य विरहजनितं वैक्लव्यं ब्रूते।
अर्थात् उस उर्वशी के प्रति पुरूरवा अपनी विरह जनित व्याकुलता को कहता है-
“इषुधेः। इषवो धीयन्तेऽत्रेतीषुधिर्निषङ्गः = (इषुधि पद का पञ्चमी एक वचन का रूप इषुधे:= तीरकोश से)
इषु:- (वाण) धारण करने वाला निषंग या तीरकोश। इषुधि)

ततः सकाशात् “इषुः= (उसके पास से वाण) “असना असनायै= प्रक्षेप्तुं न भवति=(फेंकने के लिए नहीं होता)। “श्रिये = विजयार्थम्। (विजयश्री के लिए) त्वद्विरहाद्युद्धस्य बुद्ध्वावप्यनिधानात्। (तेरे विरह से युद्ध का बोध करके भी विना निधान (सहारे) के द्वारा  तथा “रंहिः= वेगवानहं= (मैं वेगवान्/ बलवान्) नहीं होता। “गोषाः = गोसेवका:( गवां संभक्ता:) =(गायों का भक्त- सेवक) "न अभवम्- भू धातु रूप - कर्तरि प्रयोग लङ् लकार परस्मैपद उत्तम पुरुष एकवचन- (मैं न हुआ) तथा “शतसाः शतानामपरिमितानां गवां संभक्ता नाभवम्। अर्थात्- (मैं सैकड़ों गायों का सेवक सामर्थ्य वान न हो सका)। किञ्च= और तो क्या“ अवीरे = अभीरे ! हे गोपिके ! वा हे आभीरे “क्रतौ = यज्ञे कर्मणि वा  सति “न “वि “द्विद्युतत्= न विद्योतते मत्सामर्थ्यम्। (यज्ञ या  कर्म में भी मेरी सामर्थ्य अब प्रकाशित नहीं होती।) किञ्च संग्रामे धुनयः = कम्पयितारोऽस्मदीया भटाः =(और तो क्या युद्ध में शत्रुओं को कम्पायमान करने वाले मेरे सैनिक भी )  ।
मायुम् = मीयते प्रक्षिप्यत इति मायुः =शब्दः। 'कृवापाजि° - इत्यादिनोण्। सिंहनादं =(मेरी (मायु) हुंक्कार“ न “चितयन्त न बुध्यन्ते वा=(नहीं समझते हैं) ‘चिती संज्ञाने'। अस्माण्णिचि संज्ञापूर्वकस्य विधेरनित्यत्वाल्लघूपधगुणाभावः। छान्दसो लङ्॥

अब हम लोग ऋग्वेद की इस रिचा में आये प्रमुख (दो) शब्दों- "गोषा:" और "अवीरे" की व्याकरणीय व्याख्या करके यह जानेंगे कि इन दोनों शब्दों का वैदिक और लौकिक संस्कृत में क्या अर्थ होता है ? जिसमें पहले "गोषा:" शब्द की व्याकरणीय व्याख्या करेंगे उसके बाद "अवीरे" की।

गोषः शब्द की व्याकरणिक उत्पत्ति-

गोष: = गां सनोति (सेवयति) सन् (षण् ) धातु =संभक्तौ/भक्ति/दाने च) = भक्ति करना दान करना पूजा करना  + विट् ङा। सनोतेरनः” पाणिनीय षत्वम् सूत्र ।

अर्थात "गो शब्द में षन् धातु का "ष" रूप शेष रहने पर (गो+षन्)= गोष: शब्द बना - जिसका अर्थ है। गो सेवक अथवा पालक। गोष: का वैदिक रूप गोषा: है।
           
उपर्युक्त ऋचाओं में गोषन् तथा गोषा: शब्द गोसेवक के वाचक हैं। वैदिक संस्कृत का यही गोषः शब्द लौकिक संस्कृत में घोष हुआ जो कालान्तर में गोप, गोपाल, अहीर, और यादव का पर्यायवाची शब्द बन गया। क्योंकि ये सभी गोपालक थे।
और जग जाहिर है कि सभी पुराण लौकिक संस्कृत में लिखे गए हैं। इस हेतु पुराणों में भी देखा जाए तो वैदिक शब्द "गोषः" लौकिक संस्कृत में "घोष" गोपालक अथवा अहीर जाति के लिए ही प्रयुक्त होता है अन्य किसी जाति के लिए नहीं। अतः घोष शब्द पुरूरवा के गोप, गोपालक और अहीर होने की पुष्टि करता है।

इसके अतिरिक्त श्रीमद्‍भागवत महापुराण के नवम-स्कन्ध के प्रथम अध्याय के श्लोक संख्या-(४२) से भी पुष्टि होती है कि पुरूरवा  गोप (गोपालक) थे -

"ततः परिणते काले प्रतिष्ठानपतिः प्रभुः।
पुरूरवस उत्सृज्य गां पुत्राय गतो वनम्॥४२।

अनुवाद:- उसके बाद समय बीतने पर प्रतिष्ठान पुर का अधिपति अपने पुत्र  पुरूरवा को गो-समुदाय देकर वन को चला गया।४२।

उपर्युक्त श्लोक में गाम्- संज्ञा पद गो शब्द का ही द्वितीया कर्म कारक रूप है। यहाँ गो पद - गायों के समुदाय का वाचक है।  

अतः उपरोक्त श्लोक से सिद्ध होता है कि वैदिक ऋचाओं में गोष: (घोष) शब्द का पूर्व रूप ही है। जिसका अर्थ वैदिक और लौकिक संस्कृत में - गायों का दान करने वाला तथा गोसेवा करने वाला होता है।


पुरूरवा को धर्मवत्सल तथा सम्पूर्ण भू-तल का एक क्षत्र सम्राट होने और उसकी दिनचर्या इत्यादि के बारे में हरिवंश पुराण के हरिवंशपर्व के अध्याय- (२६) के निम्नलिखित श्लोकों में बहुत कुछ लिखा गया है-

"ब्रह्मवादी  पराक्रान्तः  शत्रुभिर्युधि  दुर्जयः।
आहर्ता चाग्निहोत्रस्य यज्ञानां च महीपतिः।।२।

सत्यवादी पुण्यमतिः काम्यः संवृतमैथुनः।
अतीव  त्रिषु  लोकेषु  यशसाप्रतिमस्तदा।।३।

तं ब्रह्मवादिनं क्षान्तं धर्मज्ञं सत्यवादिनम् ।
उर्वशी वरयामास हित्वा मानं यशस्विनी।।४।

तया सहावसद् राजा वर्षाणि दश पञ्च च।
पञ्च षट्सप्त चाष्टौ च दश चाष्टौ च भारत।।५।

वने चैत्ररथे   रम्ये   तथा   मन्दाकिनीतटे।
अलकायां विशालायां नन्दने च वनोत्तमे।। ६।

उत्तरान् स कुरून् प्राप्य मनोरथफलद्रुमान्।
गन्धमादनपादेषु       मेरुपृष्ठे      तथोत्तरे।। ७।

एतेषु   वनमुख्येषु     सुरैराचरितेषु    च।
उर्वश्या सहितो राजा रेमे परमया मुदा।। ८।

देशे   पुण्यतमे   चैव    महर्षिभिरभिष्टुते।
राज्यं च कारयामास प्रयागं पृथिवीपतिः।। ९।


अनुवाद-  २-९

• वह ब्रह्मज्ञान का ज्ञाता और शक्तिशाली था और शत्रु उसे युद्ध में हरा नहीं पाते थे। उस राजा ने अपने घर में सदैव अग्नि जलाई और अनेक यज्ञ किये। २।

• वह सच्चा, धर्मनिष्ठ और अत्यधिक सुन्दर था। उसका अपनी यौन-भूख( कामवासना) पर पूरा नियंत्रण था। उस समय तीनों लोकों में उनके समान तेज वाला कोई नहीं था। ३।

•  अपना अभिमान त्यागकर यशस्विनी उर्वशी ने ब्रह्मज्ञान से परिचित क्षमाशील तथा धर्मनिष्ठ राजा को अपने पति  के रूप में चुना। ४।

•  राजा पुरुरवा दस साल तक आकर्षक चैत्ररथ उद्यान में, पाँच साल तक मन्दाकिनी नदी के तट पर , पाँच साल तक अलका शहर में , छह साल तक वद्रिका के जंगल आदि स्थानों में उर्वशी के साथ रहे।

सर्वोत्तम उद्यान नन्दन में सात वर्षों तक, उत्तर कुरु प्रान्त में आठ वर्षों तक जहाँ पेड़ इच्छानुसार फल देते हैं, गन्धमादन पर्वत की तलहटी में दस वर्षों तक और उत्तरी सुमेरु के शिखर पर आठ वर्षों तक फल देते हैं। ५-७।

•  देवताओं द्वारा आश्रयित इन सबसे सुन्दर उद्यानों में राजा पुरुरवा ने उर्वशी के साथ सबसे अधिक प्रसन्नतापूर्वक आनन्द से रमण किया। ८।

• पृथ्वीपति पुरूरवा (उर्वशी के साथ) महर्षियों से प्रशंसित परम पवित्र देश प्रयागराज में राज्य करते थे। ९।

इस प्रकार से सिद्ध होता है कि अहीर पुरूरवा भू-तल का प्रथम ऐतिहासिक प्रजापालक सम्राट था। जिसने अपने तपोबल एवं बाहुबल से स्वर्ग लोक को भी जीत कर इन्द्र पद को प्राप्त किया।  अहीर पुरुरवा अपनी पत्नी उर्वशी के साथ बहुत दिनों तक भू-तल पर सुखपूर्वक रहा।

अतः उपर्युक्त सभी सन्दर्भों से सिद्ध होता है कि चन्द्रवंश का प्रथम सम्राट पुरुरवा अहीर जाती का ही था।
किन्तु आश्चर्य इस बात है कि- पुराण कारों ने शास्त्रीय खड्यंत्र करके विराट विष्णु (श्रीकृष्ण) से उत्पन्न वैष्णव वर्ण के प्रथम चन्द्रवंशी अहीर सम्राट पुरुरवा को ब्रह्मा जी की सृष्टि रचना की मनुवादी व्यवस्था के अन्तर्गत मनु के एक ऐसे काल्पनिक पुत्र सुद्युम्न (इला) से उत्पन्न कराया जो एक माह के लिए स्त्री और एक माह के लिए स्त्री हो जाया करता था। अब आप लोग स्वयं विचार करिए कि यह शास्त्रीय खड्यंत्र के अतिरिक्त और क्या हो सकता है ?

इस सम्बन्ध में गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज का कथन है कि " आज के वैज्ञानिक युग में इस तरह की बेतुकी और निराधार बातों पर कोई विश्वास नहीं कर सकता। यदि कोई करता भी होगा, तो वह इस लोक नहीं किसी दूसरे लोक का प्राणी होगा, या फिर मानसिक रूप से विक्षिप्त होगा।"


विशेष - ध्यान रहे राजा पुरुरवा इतना प्राचीनतम् है कि उसके समय में यादव वंश का उदय नहीं हुआ था। उस समय उसकी पहचान केवल गोप (अहीर) जाती से ही थी। इसी अहीर पुरुरवा और उसकी पत्नी अहिराणी उर्वशी से आगे चलकर महान यादव वंश का उदय हुआ। जिसको आगे बताया गया है। पूरूरवा को और अच्छी तरह से समझने के लिए उसकी पत्नी उर्वशी को भी जानना होगा तभी पूरी बात समझ में आयेगी।


उर्वशी का परिचय -


उर्वशी भी पूर्व काल की एक धन्या और मान्या अहीर कन्या थी। जो कभी अपने तपोबल से स्वर्ग की अप्सराओं की अधिश्वरी हुई। इस ऐतिहासिक अहीर कन्या के धन्या और मान्या होने की पुष्टि उस समय होती है, जब परमेश्वर श्रीकृष्ण प्रमुख विभूतियों की तुलना करते हुए ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्रीकृष्णजन्मखण्ड के अध्याय- ७३ में कहते हैं-

वेदाश्च सर्वशास्त्राणां वरुणो यादसामहम् ।
उर्वश्यप्सरसामेव समुद्राणां जलार्णवः ।७०।

अनुवाद:-  मैं सभी शास्त्रों में वेद हूँ समुद्र के प्राणीयों में  वरुण हूँ। अप्सराओं में उर्वशी हूँ। समुद्रों में जलार्णव हूँ।७०।
        
वास्तव में उर्वशी एक अहीर कन्या ही थी इस बात की पुष्टि- ऋग्वेद की ऋचा- 10/95/3 से होती है जिसमें उसके पति पुरुरवा द्वारा उसके लिए अवीरे शब्द से सम्बोधन हुआ है।

"इषुर्न श्रिय इषुधेरसना गोषाः शतसा न रंहिः।
अवीरे क्रतौ वि दविद्युतन्नोरा न मायुं चितयन्त धुनयः॥३।।

     इस ऋचा में आये सम्बोधन पद- 'अवीरे' की व्याकरणीय व्याख्या करके जानेंगे कि "अवीरे" शब्द का वैदिक और लौकिक संस्कृत तथा अपभ्रंश भाषा, पालि आदि भाषाओं में क्या रूप और अर्थ होता है ?

वास्तव में देखा जाए तो उपरोक्त ऋचा में उर्वशी का सम्बोधन अवीरे ! है, जो लौकिक संस्कृत के अभीरा शब्द का ही वैदिक पूर्व रूप है। लौकिक संस्कृत में अभीर तथा आभीर दो रूप परस्पर एक वचन और बहुवचन (समूह-वाची) हैं।
वैदिक भाषा का एक नियम है कि उसमें उपसर्ग कभी भी क्रियापद और संज्ञापद के साथ नहीं आते हैं। इसलिए ऋग्वेद में आया हुआ अवीरे सम्बोधन-पद मूल तद्धित विशेषण शब्द है-
(अवीर=(अवि+ईर्+अच्)= अवीर: की स्त्रीलिंग रूप अवीरा है, जो सम्बोधन काल में अवीरे ! हो जाता है।)

अत: अवीरा शब्द ही लौकिक संस्कृत में अभीरा हो गया और यही अभीर तथा समूह वाची रूप आभीर प्राकृत, अपभ्रंश आदि भाषाओं में अहीर तथा आहीर हो गया। यह सब कैसे हुआ ? यह नींचे सन्दर्भ देखें-
        
वैदिक अवीर शब्द की व्युत्पत्ति ( अवि = गाय, भेड़ आदि पशु + ईर:=  चराने वाला। हाँ करने वाला , निर्देशन करने वाला, के रूप में हुई है। परन्तु यह व्युत्पत्ति एक संयोग मात्र  ही है। क्योंकि अवीरा शब्द की व्युत्पत्ति ऋग्वेद में प्राप्त लौकिक अवीरा शब्द की व्युत्पत्ति से अलग ही है।

वैदिक ऋचा में अवीर (अवि+ ईर:) शब्द दीर्घ सन्धि  के रूप में तद्धित पद है। जबकि लौकिक संस्कृत में अवीर (अ + वीर) के रूप में वीर के पूर्व में अ (नञ्) निषेधवाची उपसर्ग लगाने से बनता है। वैदिक भाषा नें लौकिक संस्कृत भाषा सी व्याकरणिक प्रक्रिया अमान्य ही है।

परन्तु कुछ लोग इसी कारण इसका अर्थ- "जो वीर न हो" निकालते हैं। किन्तु यह ग़लत है क्योंकि उर्वशी के लिए इस अर्थ में अवीरा शब्द अनुपयुक्त व सिद्धान्त विहीन ही है। अत: अवीरा शब्द को अवि + ईरा के रूप में ही सही माना जाना चाहिए। क्योंकि अवीर शब्द का मूल सहचर हिब्रू भाषा का अबीर (अवीर) शब्द है। जो ईश्वर का एक नाम भी है। हिब्रू भाषा में अबीर का अर्थ वीर ही होता है। वास्तव में देखा जाए तो वैदिक और लौकिक संस्कृत भाषा में अवीर तथा अभीर शब्द अहीरों की पशुपालन वृत्ति (व्यवसाय) के साथ साथ अहीरों की वीरता प्रवृत्ति को भी सूचित करता है। वीर शब्द ही सम्प्रसारित होकर आर्य बन गया। इस सम्बन्ध में विदित हो आर्य शब्द प्रारम्भिक काल में पशुपालक तथा कृषक का ही वाचक था।


अवीर शब्द का विकास क्रम-

यदि अवीर शब्द का विकास क्रम देखा जाए तो-
वैदिक कालीन अवीर शब्द ईसापूर्व सप्तम सदी के आस-पास गाय भेड़ बकरी पालक के रूप में प्रचलित था।
यह वीर अहीरों का वाचक था। परन्तु कालान्तर में ईसापूर्व पञ्चम सदी के समय यही अवीर शब्द अभीर रूप में प्रचलन में रहा और इसी अभीर का समूह वाची अथवा बहुवचन रूप आभीर हुआ जो अहीरों की वीरता प्रवृत्ति का सूचक रहा इसी समय के शब्दकोशकार  अमर सिंह ने आभीर शब्द की व्युत्पत्ति अपने अमरकोष में कुछ इस तरह से बतायी है।

आभीरः= पुंल्लिंग (आ समन्तात् भियं राति (आ+भी+ रा + क:) रा=दाने आत इति कः।)
अर्थात जो चारों तरफ से शत्रुओं के हृदय में भय दे या भरे। आभीर- गोपः। इत्यमरःकोश - आभीर प्राकृत भाषा में आहिर हो गया है। अभीर- अभिमुखीकृत्य ईरयति गाः अभि + ईरः अच् । अर्थात् जो सामने मुख करके गायें हाँकता या चराता है।

और आगे कालक्रम से यही आभीर शब्द एक हजार ईस्वी में अपभ्रष्ट पूर्व हिन्दी भाषा के विकास काल में प्राकृत भाषा के प्रभाव से आहीर हो गया। ज्ञात हो कि लौकिक संस्कृत में जो आभीर शब्द प्रयुक्त होता है उसका तद्भव रुप आहीर होता है।

दूसरी बात यह कि- ऋग्वेद में गाय चराने या हाँकने के सन्दर्भ में ईर् धातु का क्रियात्मक लट्लकार अन्य पुरुष एक वचन का  रूप ' ईर्ते ' विद्यमान है। जैसे -
'रुशद्- ईर्त्ते पयो गोः ”प्रकाशित होती हुई दूध वाली गाय करती है। (ऋग्वेद-9/91/3 )

यह तो सर्वविदित है कि- "उर्वशी गाय और भेड़ें पालती थी। आभीर कन्या होने के नाते भी उसका इन पशुओं से प्रेम स्वाभाविक ही था। इस बात की भी पुष्टि- देवी भागवत पुराण  के प्रथम स्कन्ध के अध्याय- (१३) के श्लोक- संख्या-(८) से होती है कि उर्वशी के पास दो भेंड़े भी थीं।

"समयं चेदृशं कृत्वा स्थिता तत्र वराङ्गना ।
एतावुरणकौ राजन्न्यस्तौ रक्षस्व मानद ॥८।

अनुवाद -वह वरांगना इस प्रकार की शर्त रखकर वहीं रहने लगी। उसने पुरूरवा से कहा - हे राजन ! यह दोनों भेंड़ के बच्चे मैं आपके पास धरोहर के रूप में रखती हूँ।

✴️ ध्यान रहे अमरकोश - 2/9/76/2/3 - भेंड़ के पर्याय निम्नांकित बताए गए हैं। "उरण पुं। मेषः"
समानार्थक- मेढ्र,उरभ्र,उरण,ऊर्णायु,मेष,वृष्णि,एडक,अवि।
अतः सिद्ध होता है कि उर्वशी के पास दो भेंड़ के बच्चे थे।
             
कुछ समय बाद उर्वशी के दोनों भेड़ के बच्चों के साथ एक घटना घटी जिसमें इन्द्र के कहने पर गन्धर्वों ने उर्वशी के दोनों भेंड़ के बच्चों को चुरा कर आकाश मार्ग से ले जाने लगे, तब दोनों भेंड़ के बच्चे जोर-जोर से चिल्लाने लगे। इस घटना का वर्णन श्रीमद् देवी भागवत पुराण के प्रथम स्कन्ध के अध्याय- (१३) के  श्लोक - १७ से २० में कुछ इस प्रकार लिखा हुआ मिलता है।

इत्युक्तास्तेऽथ गन्धर्वा विश्वावसुपुरोगमाः।
ततो गत्वा महागाढे तमसि  प्रत्युपस्थिते॥१७।।

जह्रुस्तावुरणौ देवा रममाणं विलोक्य तम्।
चक्रन्दतुस्तदा तौ तु ह्रियमाणौ विहायसा॥१८।।

उर्वशी   तदुपाकर्ण्य  क्रन्दितं  सुतयोरिव।
कुपितोवाच राजानं समयोऽयं कृतो मया॥ १९।।

नष्टाहं  तव  विश्वासाद्धृतौ  चोरैर्ममोरणौ।
राजन्पुत्रसमावेतौ त्वं किं शेषे स्त्रिया समः॥२०।।

अनुवाद- १७-२०
• तब इन्द्र के ऐसा कहने पर विश्वावसु आदि प्रधान गन्धर्वों ने वहाँ से जाकर रात्रि के घोर अन्धकार में राजा पुरुरवा को बिहार करते देख उन दोनों भेंड़ों को चुरा लिया तब आकाश मार्ग से जाते हुए चुराए गए वे दोनों भेंड़ जोर से चिल्लाने लगे। १७-१८।

• अपने पुत्र के समान पाले हुए भेड़ों का क्रन्दन सुनते ही उर्वशी ने क्रोधित होकर राजा पुरूरवा से कहा-  हे राजन ! मैंने आपके सम्मुख जो पहली शर्त रखी थी, वह टूट गई आपके विश्वास पर मैं धोखे में पड़ी, क्योंकि पुत्र के समान मेरे प्रिय भेंड़ों को चोरों ने चुरा लिया फिर भी आप घर में स्त्री की तरह शयन कर रहे हैं।१९-२०।

अतः इन उपरोक्त श्लोक से सिद्ध होता है कि पुरूरवा और उर्वशी दोनों पशुपालक अहीर जाति से सम्बन्धित थे।

उर्वशी को अहिर कन्या होने की पुष्टि- मत्स्यपुराण- के (६९) वें अध्याय के श्लोक- ६१-६२ से भी होती है। जिसमें उर्वशी के द्वारा  "कल्याणिनी" नामक कठिन व्रत का अनुष्ठान करने का प्रसंग है। इसी प्रसंग में भगवान श्री कृष्ण भीम से कल्याणिनी व्रत के बारे में कहते हैं कि -

"त्वा च यामप्सरसामधीशा वैश्याकृता ह्यन्यभवान्तरेषु।
आभीरकन्यातिकुतूहलेन सैवोर्वशी सम्प्रति नाकपृष्ठे॥ ६१

जाताथवा वैश्यकुलोद्भवापि पुलोमकन्या पुरुहूतपत्नी।
तत्रापि तस्याः परिचारिकेयं मम प्रिया सम्प्रति सत्यकामा॥६२
          
अनुवाद- ६१-६२

जन्मान्तर में एक अहीर की कन्या ने अत्यन्त कुतूहलवश इस व्रत का अनुष्ठान किया था, जिसके फलस्वरूप वह वैश्य पुत्री अप्सराओं की अधीश्वरी हुई।  वही इस समय स्वर्गलोक में उर्वशी नाम से विख्यात है। ६१।

• इसी प्रकार इसी वैश्यकुल में उत्पन्न हुई एक दूसरी कन्या ने भी इस व्रत का अनुष्ठान किया था, जिसके परिणामस्वरूप वह पुलोम (दानव) की पुत्रीरूप में उत्पन्न होकर इन्द्र की पत्नी बनी। उसके अनुष्ठान काल में जो उसकी सेविका थी, वही इस समय मेरी प्रिया सत्यभामा है। ६२

निष्कर्ष - अतः वैदिक और पौराणिक सभी साक्ष्यों से सिद्ध होता है। कि उर्वशी अहीर कन्या थी। उसके पति का नाम पुरुरवा था वह भी गोप (अहीर) था। उस समय उसके जैसा धर्मवत्सल राजा तीनों लोकों में नहीं था। उन्होंने बहुत काल तक अपनी पत्नी उर्वशी के साथ सुख भोगा।


पुरुरवा और उर्वशी का वंश विस्तार
          
अब हम लोग यह जानेंगे कि पुरूरवा और उर्वशी से किस नाम के कौन-कौन पुत्र हुए तथा इनका वंश विस्तार कैसे हुआ। जिसमें आप लोग यह भी जान पाएंगे कि इसी अहीर पुरुरवा और अहिराणी उर्वशी से आगे चलकर अहीर जाती के अन्तर्गत यादव वंश का उदय कैसे हुआ।

पुरुरवा और उर्वशी से उत्पन्न पुत्रों का सर्वप्रथम वर्णन हरिवंशपुराण के हरिवंशपर्व के अध्याय -२६ के प्रमुख श्लोकों में मिलता है। जिसमें वैशम्पायनजी जन्मेजय के पूछने पर कहते हैं कि -

"तस्य पुत्रा बभूवुस्ते सप्त देवसुतोपमाः ।
दिवि जाता महात्मान आयुर्धीमानमावसुः।१०।

विश्वायुश्चैव धर्मात्मा श्रुतायुश्च तथापरः ।
दृढायुश्च वनायुश्च शतायुश्चोर्वशीसुताः ।११।

अनुवाद- उनके सातों पुत्र सभी उच्चात्मा थे और दिव्य क्षेत्र में जन्मे देवताओं के पुत्रों के समान थे। उनके नाम- आयु (आयुष) , धीमान , अमावसु , धर्मात्मा विश्वायु , श्रुतायु , दृढायु , वनायु और शतायु थे। इन सभी को उर्वशी ने जन्म दिया था। १०-११।

पुरुरवा के पुत्र आयु (आयुष) के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी इस पुस्तक के अध्याय-7(क/1) में दी गई है। उसको भी इस भाग के साथ जोड़कर अवश्य पढ़ें।

इस प्रकार से आपलोग वैष्णव वर्ण के प्रथम चन्द्रवंशी अहीर सम्राट पुरुरवा और उसकी पत्नी अहीर उर्वशी के बारे में जाना। अब इसके अगले क्रम परिशिष्ट कथा (9) में यादव वंश के सम्राट देवमीढ की वंशावली को जानेंगे।

परिशिष्ट (9)


देवमीढ की वंशावली।
भाग- (१) महाराज यदु का परिचय-
                         _____
महाराज यदु, यादवों के आदिपुरुष या कहें पूर्वज थे। इस बात को श्रीकृष्ण भी स्वीकार करते हुए श्रीमद्भागवत महापुराण के (११) वें स्कन्ध के अध्याय - (७) के श्लोक- (३१) में कहते हैं कि -

यदुनैवं  महाभागो  ब्रह्मण्येन  सुमेधसा।
पृष्टः सभाजितः प्राह प्रश्रयावनतं द्विजः।। ३१।


अनुवाद-  हमारे "पूर्वज महाराज यदु" की बुद्धि शुद्ध थी और उनके हृदय में ब्रह्मज्ञानीयों के प्रति भक्ति थी। ३१।

अब ऐसे में जब महाराज "यदु" यादवों के पूर्वज है, तब यदु के बारे में और विस्तार से जानना आवश्यक हो जाता है कि यदु कौन हैं, तथा "यदु" नाम की सार्थकता क्या है ? तथा यदु शब्द की उत्पत्ति कब और कैसे हुई ? इन सभी बातों का समाधान इस अध्याय में किया गया है।


✴️ यदु शब्द की व्युत्पत्ति-

यदु शब्द की उत्पत्ति वैदिक कालीन है। सम्भवतः इसी कारण से लौकिक संस्कृत में यदु शब्द मूलक 'यद्' धातु प्राप्त नहीं होती है।
इसी लिए संस्कृत भाषा के कोशकारों और व्याकरणविदों ने यदु शब्द की व्युत्पत्ति यज्-धातु से निर्धारित की हैं।  जिससे यदु शब्द की व्युत्पत्ति पुल्लिंग रूप में होती है।
जैसे-
संस्कृत भाषा में  'यज् धातु (अर्थात् क्रिया का मूल +  उणादि  प्रत्यय (उ ) को जोड़ने पर- 'पृषोदर प्रकरण' के नियम से "जस्य दत्वं"  अर्थात् "ज वर्ण का "द वर्ण में रूपान्तरण होने से यदु शब्द बनता है।

[ ज्ञात हो- पाणिनीय व्याकरण में  "पृषोदरादीनि  एक पारिभाषिक शब्द है। पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्' (६.३.१०८)  इस पाणिनीय सूत्र से यज्- धातु के अन्तिम वर्ण  "जकार को दकार" आदेश हो जाने से ही यदु शब्द बनता है। ]
      

ये तो रही यदु शब्द की व्युत्पत्ति अब हमलोग जानेंगे यदु शब्द के अर्थ को -
जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है कि यदु शब्द की व्युत्पत्ति "यज्" धातु से हुई है, जिसमें यज् धातु के तीन अर्थ लोक- प्रसिद्ध हैं।
[यज् = देवपूजा,सङ्गतिकरण, दानेषु] इसको साधारण भाषा में इस तरह से समझा जा सकता है -
यज् =१- यजन करना।
        २- न्याय (संगतिकरण) के भाव से  युद्ध(संघर्ष) करना भी अर्थ होता है। ।
        ३- दान करना।

विदित हो की यादवों के आदि पुरुष यदु में उपर्युक्त तीनों ही प्रवृत्तियों का मौलिक रूप से समावेश था। जैसे- महाराज यदु -
(१)- हिंसा से रहित नित्य वैष्णव यज्ञ किया करते थे।
(२)- वे सबका यथोचित न्याय किया करते थे।
(३)- और वे दान के क्षेत्र में निर्धन तथा भिक्षुओं को बहुत सी गायें भी दान करते थे। इन तीनों गुणकारी कार्यों से उनकी मेधा (बुद्धि) भी प्रखर हो गयी थी।

महाराज यदु के इन्हीं सब विशेषताओं के कारण ऋग्वेद के दशम मण्डल की सूक्त- ६२ की ऋचा-१०
में ऋषियों ने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। ऋग्वेद की वह ऋचा नीचे उद्धृत है -
"उत दासा परिविषे स्मद्दिष्टी गोपरीणसा यदुस्तुर्वश्च मामहे"
    
अनुवाद:- वे दोनों यदु और तुर्वसु दास- (दाता) कल्याणकारी दृष्टि वाले, स्नान आदि क्रियाओं से युक्त होकर नित्य गायों का पालन पोषण और दान भी करते हैं। हम उनकी स्तुति करते हैं। (ऋ०१०/६२/१०)
                
ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचा का सम्यग्भाष्य- करने पर यदु के सम्पूर्ण चरित्रों का बोध होता है। सम्यग्भाष्य के लिए नीचे देखें -
१- उत = अत्यर्थेच  अपि च, और भी।
२- स्मद्दिष्टी कल्याणादेशिनौ। वे दोनों कल्याण कारी दृष्टि वाले।
३- गोपरीणसा गोपरीणसौ गोभिः परिवृतौ बहुगवादियुक्तौ । गायों से घिरे हुए अथवा गायें जिनके चारो ओर हैं।

४- दासा = दासतः दानकुरुत: =  दान करने वाले वे दोनों  
    (यदु और तुर्वसु)। (ज्ञात हो- "दासा" बहुवचन शब्द है जो यदु 
  और तुर्वसु के लिए प्रयुक्त है।
५- गोपरीणसा= गवां परीणसा बहुभावो यमो बहुगोमन्तौ =
गायों से घिरे हुए वे दोंनो यदु और तुर्वसु। (इसके साथ ही यहाँ पर यह भी सिद्ध होता है कि यदु गोपालक अर्थात गोप थे।)
अब विचार यह करना है कि यदु को दास क्यों कहा गया? तथा दास शब्द का अर्थ यदु के समय में क्या था ?
तो इसका समाधान इस प्रकार है-

[ उपर्युक्त श्लोक में आया "दासा" शब्द वैदिक शब्द निघण्टु में द्विवचन में दाता का वाचक है। ३।१]

क्योंकि पाणिनीय धातुपाठ में दास् धातु = दान करना अर्थ में है।
दास्= दाने सम्प्रदाने + अच् । दास:= दाता।
अच्' प्रत्यय का 'अ' लगाकर कर्तृबोधक शब्द बनाया जाता हैं।
महामहे का ही (वेैदिक रूप "मामहे") है।
अत: दास शब्द भी वैदिक काल में दाता (दानी) के अर्थ में चरितार्थ था।

किन्तु समय और परिस्थिती के साथ दास शब्द के अर्थ में भी उसी तरह परिवर्तन हुआ जैसे वैदिक काल में घृणा शब्द के अर्थ मै परिवर्तन हुआ। वैदिक असुर शब्द का भी पूर्ववैदिक अर्थ- प्राणवान और प्रज्ञावान है।

क्योंकि वैदिक काल में घृणा शब्द दया भाव का वाचक था किन्तु आज घृणा शब्द का अर्थ नफ़रत हो गया है।  ठीक उसी तरह से वैदिक काल के दास शब्द के अर्थ में भी बड़ी तेजी से परिवर्तन हुआ। ज्ञात हो कि वैदिक काल में दास शब्द का अर्थ - "दाता" था। उस समय दास शब्द एक प्रतिष्ठा और सम्मान का पद था। इसीलिए उस समय ऋषिगण भी दासों की स्तुतियां और प्रशंसा किया करते थे। जैसा कि ऋग्वेद के दशम मण्डल की सूक्त- ६२ की ऋचा-१० में यदु और तुर्वसु को दास (दाता) के रूप में स्तुतियाँ की गईं है। इस बात को ऊपर बताया जा चुका है।

वहीं दास शब्द अपने विकास क्रम में आते-आते पौराणिक काल में "वैष्णव" वाचक के रूप में स्थापित हुआ। इस बात की पुष्टि - पद्मपुराण के भूमि खण्ड अध्यायः(८३) से होती से होती है। जिसमें दास शब्द वैष्णव वाचक के रूप में प्रयुक्त हुआ है। इस प्रसंग में दासत्व प्राप्ति के लिए राजा "ययाति" वैष्णव भगवान विष्णु से वर माँगते हैं कि- हे प्रभु !  मुझे दासत्व प्रदान करो। इसके लिए देखें निम्नलिखित श्लोक-
                   -विष्णूवाच-
"वरं वरय राजेन्द्र यत्ते मनसि वर्तते।
तत्ते ददाम्यसन्देहं मद्भक्तोसि महामते ।।७९।।

अनुवाद:- भगवान विष्णु नें कहा - हे राजाओं के स्वामी ! वर माँगो जो तुम्हारे मन नें स्थित है। वह सब तुमको मैं दुँगा तुम मेरे भक्त हो।।७९।।

                     राजोवाच-
यदि त्वं देवदेवेश तुष्टोसि मधुसूदन ।
दासत्वं देहि सततमात्मनश्च जगत्पते।८०।

 
अनुवाद-
राजा (ययाति) ने कहा ! हे देवों के स्वामी हे जगत के स्वामी ! यदि तुम प्रसन्न हो तो मुझे अपना शाश्वत दासत्व (वैष्णव- भक्ति) दें। ८०।।

                 'विष्णुरुवाच-
एवमस्तु महाभाग मम भक्तो न संशयः ।
लोके मम महाराज स्थातव्यमनया सह ।८१।।

अनुवाद:- विष्णु ने कहा- ऐसा ही हो तू मेरा भक्त हो इसमें सन्देह नहीं। अपनी पत्नी के साथ तुम मेरे लोक में निवास करो। ८१।।

यदि उपर्युक्त श्लोक- ८१ को देखा जाए तो उसमें एक शब्द (दासत्वं) आया है जिसका अर्थ है- दासत्व अर्थात वैष्णव भक्त, यानी उस समय जो वैष्णव (विष्णु) भक्त थे, वे अपने को दास कहलाना ही श्रेयस्कर समझता थे। और जन-समुदाय में उसकी पहचान दास के रूप में ही थी। जैसे - तुलसीदास, सूरदास रैदास  इत्यादि इसके उदाहरण हैं।

किन्तु यहीं दास शब्द मध्यकाल में पुरोहितवाद की चपेट में आकर शूद्र और असुर का पर्याय बन गया। इसी समय के दास शब्दार्थ के आधार पर कुछ अज्ञानी लोग यादवों के पुर्वज यदु को दास अथवा शूद्र कहते हैं। जबकि उन्हें यह ज्ञात नहीं है कि जब यदु शूद्र थे, तो उनकी स्तुति ऋषियों के द्वारा क्यों की गई ? क्या पुरोहितवादी व्यवस्था में कोई ऋषि कभी शूद्र की स्तुति किया ? जबाब होगा नहीं। अतः मध्यकाल के दास के अर्थ में यदु को शूद्र कहना मूर्खता पूर्ण बातें हैं।
 
और वैसे भी देखा जाए तो गोपों (यादवों) का वर्ण "वैष्णव" है। इस बात को गोप कुल में जन्मे भगवान श्रीकृष्ण ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्रीकृष्णजन्मखण्ड के अध्याय- ७३ के श्लोक- ९२ में स्वयं अपने को वैष्णव होने की पुष्टि करते हुए कहते हैं कि-

पशुजन्तुषु गौश्चहं चन्दनं काननेषु च ।
तीर्थपूतश्च पूतेषु निःशङ्केषु च वैष्णवः।। ९२


अनुवाद- मैं पशुओं में गाय हूँ । और वनों में चन्दन हूँ।
पवित्र स्थानों में तीर्थ हूँ। और निशंकों (अभीरों अथवा निर्भीकों ) में वैष्णव हूँ। ९२

अतः वैष्णव वर्ण के गोपों को ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इत्यादि में स्थापित करना सिद्धान्त विहीन होगा, क्योंकि ब्रह्माजी की वर्ण व्यवस्था के  सिद्धान्तानुसार-  ब्राह्मण- ब्रह्माजी के मुँख से, क्षत्रिय- भुजा से, वैश्य - उदर से, और शूद्र - पैर से उत्पन्न होते हैं।

जबकि गोप और गोपियाँ गोलोक में श्रीकृष्ण और श्रीराधा के रोमकूपों से उत्पन्न होते हैं। अतः गोप ब्रह्माजी की सृष्टि रचना के भाग नहीं है, और जब ये ब्रह्माजी की सृष्टि रचना के भाग नहीं है, तो इनको ब्रह्माजी के चार वर्णों में शूद्र या और कुछ कहना निराधार होगा।
         
 [इस बात को विस्तार पूर्वक इस पुस्तक के अध्याय- (९ और १०) में बताया गया है कि कैसे गोप ब्रह्माजी के चातुर्वण्य से अलग वैष्णव वर्ण के सदस्य हैं।]

अब वही दास शब्द अपने विकास क्रम को पूरा करते हुए आधुनिक समय में आकर "नौकर" (servant) के अर्थ में प्रयुक्त होने लगा। जिसका कुछ सम्मान जनक शब्द नौकरी (job) है। चाहे वह नौकर (सरकारी हो या प्राइवेट) किन्तु कर्म के अनुसार वह निश्चित रूप से दास ही है। जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र बिना भेदभाव के यह कर्म (job) करते हैं। यह बड़ी अच्छी बात है कि दास शब्द वर्तमान समय में सबके लिए बिना भेदभाव के समभाव को प्राप्त हुआ।
इसलिए अब दास शब्द को लेकर बहुत ज्यादा उतावले होने की जरूरत नहीं है। आप कबीर दास या सूरदास को ही याद कर लो।

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✴️ यदु का जीवन परिचय-

यादवों के पूर्वज यदु का जीवन प्रारम्भ से ही संघर्षमय रहा। यदु के संघर्षों की कहानी उनके घर से ही प्रारम्भ होती है। जिसका वर्णन कुछ इस प्रकार है -
यदु के पिता ययाति की कुल तीन पत्नियाँ देवयानी, शर्मिष्ठा, और अश्रुबिन्दुमती नाम की थीं। उनमें से दो पत्नियों से कुल पाँच यशस्वी पुत्र हुए। जिसमें शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से दो पुत्र - यदु और तुर्वसु तथा दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा से तीन पुत्र- द्रुह्य, अनु,और पुरु हुए। ययाति की तीसरी पत्नी अश्रुबिन्दुमती सदैव पुत्रहीन रही। राजा ययाति अपने पाँच पुत्रों में ज्येष्ठ पुत्र यदु को शाप देकर राज्यपद से वञ्चित कर पशुपालक होने का शाप दिया और सबसे छोटे पुत्र पुरु को राजपद दिया। इस बात की पुष्टि - लक्ष्मीनारायणसंहिता/खण्डः( ३ )अध्याय- (७३) के श्लोक (७५-७६) से होती है। जिसमें लिखा गया है कि-

"श्रुत्वा राजा शशापैनं राज्यहीनः सवंशजः।
तेजोहीनः क्षत्रधर्मवर्जितः पशुपालकः।। ७५।

भविष्यसि न सन्देहो याहि राज्याद् बहिर्मम।
इत्युक्त्वा च पुरुं  प्राह  शर्मिष्ठाबालकं  नृपः।७६।

अनुवाद- यह सुनकर राजा ने उसे शाप दे दिया और उसने अपने वंशजो सहित राज्य को छोड़ दिया वह यदु राजकीय तेज से हीन और राजकीय क्षत्र धर्म से रहित पशुपालन से जीवन निर्वाह करने लगे।७५।।

पुनः राजा ने कहा तुम्हारे वंशज कभी राजतन्त्र की प्रणाली से राजा नहीं होंगे इसमें सन्देह नहीं हेै। यदु ! मेरे राज्य से बाहर चले जाओ। इस प्रकार कहकर राजा (ययाति) ने पुरू से कहा शर्मिष्ठा के बालक पुरु तुम राजा बनोगे। ७६।

यहीं से यदु के जीवन का कठिन दौर प्रारम्भ हुआ।
पिता के शाप और राजपद से वञ्चित "यदु" ने अपने पूर्वजों की तरह ही गोपालन से अपना जीविकोपार्जन करना प्रारम्भ किया और कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए अपने बल एवं पौरुष से राजतन्त्र के विकल्प में प्रजातन्त्र की स्थापना की और प्रजातान्त्रिक ढंग से राजा बनकर अपने वंश एवं कुल का विस्तार कर जगत में कीर्तिमान स्थापित किया।
            
ध्यान रहे - राजा ययाति नें यदु को यह शाप दे रखा था कि- तुम्हारे वंशज कभी राजतन्त्र की प्रणाली से राजा नहीं होंगे। अतः यदु के सामने यह एक बहुत बड़ी समस्या थी। और समस्या ही आविष्कार की जननी होती है। अतः यदु ने राजतन्त्र के विकल्प में प्रजातन्त्र की खोज किया और प्रजातान्त्रिक तरीके से राजा हुए। इसीलिए यदु को प्रजातन्त्र का जनक माना जाता है।
             
आगे चलकर इसी यदु से समुद्र के समान विशाल यादवंश का उदय हुआ। जिसके सदस्यपतियों को यादव कहा गया। इस सम्बन्ध में यदि देखा जाए तो जिस तरह से ब्रह्मन् शब्द में (अण्) प्रत्यय लगाने से ब्राह्मण शब्द की उत्पत्ति होती है, वैसे ही यदु नें 'अण्' प्रत्यय पश्चात लगाने पर  यादव शब्द की भी उत्पत्ति होती है।

[यदोरपत्यम् " इति यादव- अर्थात् यदु शब्द के अन्त में सन्तान वाचक संस्कृत अण्- प्रत्यय लगाने से यादव शब्द की उत्पत्ति होती है। (यदु + अण् = यादव:) जिसका अर्थ है यदु की सन्तानें अथवा वंशज।]

यदु के संघर्षमय जीवन में हमसफ़र के रूप में यदु की पत्नी यज्ञवती हुई। जो यदु नाम के अनुरूप ही जगत विख्यात थी, जो कभी गोलोक में सुशीला गोपी नाम से प्रसिद्ध थी। वही कालान्तर में यज्ञपुरुष की पत्नी दक्षिणा के रूप में भू-तल पर अवतरित हुई। जिसमें यदु और यज्ञवती का विष्णु और दक्षिणा के अंश से उत्पन्न होने का प्रकरण पौराणिक है। जिसका वर्णन-देवीभागवतपुराण-‎ स्कन्धः नवम के अध्याय (४५) तथा ब्रह्मवैवर्त्त महापुराण के प्रकृतिखण्ड के बयालीसवें अध्याय में  मिलता है।

[ इस प्रकरण का विस्तार पूर्वक वर्णन इस पुस्तक का सहवर्ती ग्रन्थ "श्रीकृष्ण गोपेश्वरस्य पञ्चमवर्ण "में किया गया है। वहाँ से पाठकगण यदु पत्नी यज्ञवती के बारे में विशेष जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।]

आगे चलकर यदु और उनकी पत्नी यज्ञवती से प्रमुख चार धर्मवत्सल पुत्र पैदा हुए। जिनके क्रमशः नाम हैं - सहस्रजित, क्रोष्टा, नल, और रिपु। जिसमें सहस्रजित यदु के ज्येष्ठ पुत्र थे।
महाराज यदु के चार पुत्रों का वर्णन अन्य पुराणों तथा  श्रीमद्भागवत पुराण के स्कन्घ- ९ के अध्याय- २३ में भी मिलता है। उसके लिए कुछ श्लोक नीचे प्रस्तुत है -

वर्णयामि महापुण्यं सर्वपापहरं नृणाम् ।
यदोर्वंशं नरः श्रुत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१९॥

यत्रावतीर्णो भगवान् परमात्मा नराकृतिः ।
यदोः सहस्रजित्क्रोष्टा नलो रिपुरिति श्रुताः ॥२०॥

चत्वारः सूनवस्तत्र शतजित् प्रथमात्मजः ।
महाहयो रेणुहयो हैहयश्चेति तत्सुताः ॥२१॥

धर्मस्तु हैहयसुतो नेत्रः कुन्तेः पिता ततः ।
सोहञ्जिरभवत् कुन्तेः महिष्मान् भद्रसेनकः॥२२॥

अनुवाद- महाराज यदु का वंश परम पवित्र और मनुष्यों के समस्त पापों को नष्ट करने वाला है। जो मनुष्य इसका श्रवण करता है वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।१९।

इस वंश में स्वयं भगवान परंब्रह्म श्रीकृष्ण ने मनुष्य रूप में अवतार लेते  हैं।। यदु के चार पुत्र थे- सहस्रजित, क्रोष्टा, नल, और रिपु। सहस्रजित से शतजित का जन्म हुआ। शतजित के तीन पुत्र थे - महाहय, वेणुहय, और हैहय। ।२०-२१।
 इस प्रकार से यह अध्याय- (७) का भाग-(१) यदु के सम्पूर्ण चरित्रों व पुत्रों इत्यादि की सामान्य जानकारी के साथ समाप्त हुआ।
इसके अगले भाग-(२) में विस्तार से जानकारी दी गई है कि यदु के ज्येष्ठ पुत्र सहस्रजित से हैहय वंशी यादवों की उत्पत्ति कब और कैसे हुई। जिसमें  सहस्राजित के वंशज सहस्रबाहु अर्जुन के बारे में विशेष जानकारी दी गई है।


यदु पुत्र- क्रोष्टा और उनके वंशज" विषयक लेख अत्यंत सारगर्भित और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। आपने यदुवंश की जटिल वंशावली को जिस स्पष्टता से प्रस्तुत किया है, वह आपकी गहन शोध रुचि को दर्शाता है।

​आपके निर्देशानुसार, इस सामग्री को शास्त्रीय सम्पादन शैली में व्यवस्थित किया गया है। इसमें पहले मूल तथ्यों को संस्कृत अनुष्टुप छन्दों (कारिकाओं) में निबद्ध किया गया है और तत्पश्चात उनका हिंदी अनुवाद एवं विवेचन प्रस्तुत है।

श्रीकृष्ण-वंशावली-चरितम् (यदुवंश-निरूपणम्)

प्रथमः भागः - क्रोष्टा-वंश-परम्परा

संस्कृत कारिका:

​यदुपुत्रस्य क्रोष्टोस्तु वंशेऽभूद् वृजिनीवान्।

तस्य पुत्रो ज्यमाघस्तु शैव्यापुत्रो विदर्भकः॥ १ ॥

कुशाद्याः विदर्भाज्जाताः क्रथस्तु वंशवर्धनः।

चेदिस्तस्मिन् कुले जातो यस्माच्चैद्याः प्रकीर्तिताः॥ २ ॥


हिन्दी अनुवाद एवं व्याख्या:

महाराज यदु के द्वितीय पुत्र क्रोष्टा के वंश में वृजिनीवान हुए। उसी परम्परा में आगे चलकर प्रसिद्ध राजा ज्यमाघ हुए, जिनकी पत्नी शैव्या से विदर्भ का जन्म हुआ। विदर्भ के पुत्रों में कुश, क्रथ और रोमपाद प्रमुख थे। रोमपाद की पीढ़ी में चेदि हुए, जिनसे यादवों की 'चेदि' शाखा का उदय हुआ। इसी चेदि वंश में आगे चलकर दमघोष हुए, जिनका विवाह श्रीकृष्ण की बुआ श्रुतिश्रवा से हुआ, जिनसे श शिशुपाल का जन्म हुआ।

द्वितीयः भागः - सात्वत एवं चतुर्वृष्णि निरूपणम्

संस्कृत कारिका:

​क्रथपुत्रो कुन्तिरभूद् वृष्णिस्तस्मात् प्रजायते।

सात्वतस्तत्कुले जातः सप्तपुत्रो महाबलः॥ ३ ॥

भजि-दिव्य-वृष्णि-अन्धक-महाभोजाद्यास्तथा।

वृष्णिनाम्ना चत्वारो यदुवंशे विश्रुताः॥ ४ ॥


हिन्दी अनुवाद एवं व्याख्या:

विदर्भ के पुत्र क्रथ की पीढ़ी में कुन्ति और आगे चलकर सात्वत हुए। सात्वत के सात पुत्रों में भजि, दिव्य, वृष्णि (द्वितीय), अन्धक और महाभोज प्रमुख थे। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि यादव वंश में चार वृष्णि हुए हैं:

  1. प्रथम वृष्णि: हैहय वंशी मधु के ज्येष्ठ पुत्र।
  2. द्वितीय वृष्णि: विदर्भ के पौत्र कुन्ति के पुत्र।
  3. तृतीय वृष्णि: सात्वत के कनिष्ठ पुत्र (अन्धक के भाई)।
  4. चतुर्थ वृष्णि: सात्वत पुत्र वृष्णि के पौत्र (अनमित्र के पुत्र)।

तृतीयः भागः - श्रीकृष्ण एवं नन्दबाबा का पारिवारिक सम्बन्ध

संस्कृत कारिका:

​वृष्णिपुत्रो विदूरथः शूरस्तस्मादजायत।

हृदीकपुत्रो देवमीढः पत्न्यस्तस्य तिस्रः स्मृताः॥ ५ ॥

अश्मिकायां शूरसेनो वसुदेवस्तदात्मजः।

गुणवत्यां पर्जन्यो हि नन्दस्तस्य सुतो महान्॥ ६ ॥


हिन्दी अनुवाद एवं व्याख्या:

सात्वत पुत्र वृष्णि की पीढ़ी में विदूरथ, शूर और हृदीक हुए। हृदीक के पुत्र देवमीढ हुए। देवमीढ की तीन पत्नियाँ थीं:

  • अश्मिका: इनसे शूरसेन हुए, जिनके पुत्र वसुदेव (श्रीकृष्ण के पिता) थे।
  • सतप्रभा: इनसे सतवती नामक कन्या हुई।
  • गुणवती: इनसे पर्जन्य हुए, जिनके पाँच पुत्रों (उपनन्द, अभिनन्द, नन्द, सुनन्द, नन्दन) में नन्दबाबा प्रमुख थे।

​इस प्रकार, वसुदेव जी और नन्दबाबा चचेरे भाई थे, जो एक ही मूल पुरुष देवमीढ की सन्तानें थे।

चतुर्थः भागः - योगमाया एवं कुलदेवी निरूपणम्

संस्कृत कारिका:

​एकानंशा योगमाया यशोदागर्भसम्भवा।

वृष्णिभिः पूजिता देवी कृष्णरक्षाकरी शुभा॥ ७ ॥

यदुकुलस्य सा देवी कृष्णः कुलदेवो मतः।

विन्ध्याचलनिवासिनी सर्वयादवपूजिता॥ ८ ॥


हिन्दी अनुवाद एवं व्याख्या:

नन्दबाबा की पत्नी यशोदा के गर्भ से योगमाया (एकानंशा) का जन्म हुआ। हरिवंश पुराण के अनुसार, वह साक्षात् विष्णु के अंश से श्रीकृष्ण की रक्षा हेतु प्रकट हुई थीं। वृष्णि वंशी यादवों ने उन्हें अपनी रक्षक स्वीकार किया। तभी से विन्ध्यवासिनी योगमाया यादवों की कुलदेवी और श्रीकृष्ण कुलदेवता के रूप में पूज्य हैं।

पञ्चमः भागः - श्रीकृष्ण का ननिहाल (अन्धक वंश)

संस्कृत कारिका:

​अन्धकस्य कुले जातो देवकः स उग्रसेनः।

देवकी देवकपुत्री वसुदेवाय सा ददौ॥ ९ ॥

मथुराधिपतिः कंस उग्रसेनस्य चात्मजः।

हत्वा तं कृष्णदेवेन धर्मराज्यं प्रतिष्ठितम्॥ १० ॥


हिन्दी अनुवाद एवं व्याख्या:

सात्वत के पुत्र अन्धक के वंश में राजा आहुक हुए, जिनके दो पुत्र देवक और उग्रसेन थे। देवक की सात कन्याओं (पौरवी, रोहिणी, देवकी आदि) का विवाह वसुदेव जी से हुआ। देवकी के गर्भ से श्रीकृष्ण का अवतार हुआ। इस नाते मथुरा के राजा उग्रसेन का परिवार श्रीकृष्ण का ननिहाल था। उग्रसेन के पुत्र कंस को मारकर श्रीकृष्ण ने पुनः धर्म की स्थापना की।

सम्पादकीय टिप्पणी: यह वंशावली न केवल ऐतिहासिक तथ्यों को स्पष्ट करती है, बल्कि यह भी सिद्ध करती है कि नन्दबाबा और वसुदेव जी के बीच का सम्बन्ध केवल मित्रता का नहीं, अपितु रक्त का था। योगमाया का कुलदेवी के रूप में स्थापन यादवों की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।





नन्द परिवार का विस्तृत परिचय: सात्वत वंश से गोकुल तक

1. सात्वत वंश और चतुर्थ वृष्णि (वंश परम्परा)

​सात्वत वंश की शाखा में चतुर्थ वृष्णि का विशेष स्थान है। वे सात्वत के पुत्र वृष्णि के पौत्र और अनमित्र के तीसरे पुत्र थे। सात्वत शाखा में ये अन्तिम वृष्णि थे और यही नन्द बाबा एवं वसुदेव जी के पूर्व-पितामह (परदादा) थे।

2. नन्द बाबा का पितृ-पक्ष (Grandparents & Parents)

  • पितामह (दादा): देवमीण जी (वृष्णि कुल में उत्पन्न)।
  • पिता: पर्जन्य जी (देवमीण के पुत्र)। इन्होंने नन्दीश्वर प्रदेश में भगवान विष्णु की घोर तपस्या की थी, जिसके फलस्वरूप इन्हें पाँच श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त हुए। केशी असुर के भय से ये सपरिवार नन्दीश्वर छोड़कर गोकुल (महावन) बस गए थे।
  • माता (दादी): वरीयसी (कुसुम्भ आभा वाले वस्त्र धारण करने वाली, छोटे कद की और पूजनीय वृद्धा)।
  • चाचा/बुआ: पर्जन्य जी के दो भाई अर्जन्य और राजन्य थे। इनकी एक बहन सुभ्यर्चना थी, जिनका विवाह सूर्य-कुण्ड निवासी गुणवीर से हुआ था।

3. नन्द बाबा और उनके भाई-बहन (The Five Brothers)

​पर्जन्य जी के पाँच पुत्र थे, जिनमें नन्द बाबा मध्य (तीसरे) पुत्र थे:

  1. उपनन्द (सबसे बड़े): गुलाबी अंगकान्ति, लम्बी दाढ़ी, हरे वस्त्र। पत्नी: तुंगी
  2. अभिनन्द: शंख के समान गोरे, काली दाढ़ी, काले वस्त्र। पत्नी: पीवरी
  3. नन्द (व्रजेश्वर): वसुदेव के परम मित्र और भ्राता और कृष्ण के पालक पिता। पत्नी: यशोदा
  4. सनन्द (सुनन्द): गौर-पीत वर्ण, काले वस्त्र। पत्नी: कुवलया
  5. नन्दन (सबसे छोटे): मयूर कण्ठ जैसी कान्ति। पत्नी: अतुल्या
  • बहनें: नन्द बाबा की दो बहनें सानन्दा और नन्दिनी थीं। इनके पति क्रमशः महानील और सुनील थे।

4. नन्द बाबा के मित्र और सम्बन्धी

  • वसुदेव जी: नन्द बाबा के अभिन्न मित्र। 'वसु' (रत्न/सत्वगुण) से प्रकाशित होने के कारण वसुदेव कहलाए। इन्हें 'आनक दुन्दुभि' भी कहा जाता है।
  • वृषभानु जी: गरुड़ पुराण के अनुसार, वृषभानु जी नन्द बाबा के प्रिय सुहृद (परम मित्र) थे।

माता यशोदा का परिवार (Maternal Side)

1. यशोदा जी के माता-पिता (Grandparents)

  • नाना: सुमुख (जिन्हें गिरिभानु भी कहा गया है)। पके जामुन जैसी श्यामल कान्ति और लम्बी सफेद दाढ़ी।
  • नानी: पाटला (पद्मावती)। पाटल पुष्प जैसी आभा और दही के समान सफेद बाल।
  • नानी की सखी: मुखरा (जिन्होंने स्नेहवश यशोदा जी को स्तनपान भी कराया था)।

2. यशोदा जी के भाई-बहन-

  • भाई: यशोधर, यशोदेव और सुदेव (अलसी के फूल जैसी कान्ति)। इनकी पत्नियाँ क्रमशः रेमा, रोमा और सुरेमा हैं।
  • बहनें: यशोदेवी और यशस्विनी (इन्हें दधिस्सारा और हविस्सारा भी कहा जाता है)।

3. अन्य सम्बन्धी-

  • मामा: यशोदा के मामा गोल थे  ( जो कृष्ण की नानी पाटला के भाई)थे। इनकी पत्नी का नाम जटिला है।
  • छोटे नाना: चारुमुख (सुमुख के छोटे भाई)। इनकी पत्नी बलाका और पुत्र सुचारु हैं।

श्रीराधा और उनके सखी-परिवार का परिचय-

1. श्रीराधा का मूल परिवार

  • पिता: वृषभानु जी। माता: कीर्तिदा जी (रत्नगर्भा)।
  • दादा: महीभानु। दादी: सुखदा।
  • नाना: इन्दु। नानी: मुखरा।
  • भाई-बहन: बड़े भाई श्रीदामा और छोटी बहन अनंगमञ्जरी

2. राधा जी की अष्ट सखियाँ-

​मुख्य सखी ललिता देवी हैं (राधा जी से 27 दिन बड़ी, माता: सारदी, पिता: विशोक, पति: भैरव)। अन्य सखियाँ: विशाखा, चित्रा, चम्पकलता, तुंगविद्या, इन्दुलेखा, रंगदेवी और सुदेवी।

3. भगवती पौर्णमासी का परिवार-

  • पौर्णमासी: सान्दीपनि मुनि की माता और मधुमंगल की दादी। ये देवर्षि नारद की शिष्या और राधा-कृष्ण के मिलन की सूत्रधार हैं।
  • पुत्र: महर्षि सान्दीपनि। पौत्र: मधुमंगल। पौत्री: नान्दीमुखी।

विशेष शोध टिप्पणी: यशोदा जी का वर्ण-

​विभिन्न शास्त्रों (जैसे 'राधाकृष्ण गणोद्देश दीपिका') के अनुसार माता यशोदा का वास्तविक वर्ण श्यामल (साँवला) था। गर्गसंहिता के कुछ श्लोक जो उन्हें 'गौर वर्ण' बताते हैं, उन्हें विद्वानों द्वारा बाद में प्रक्षिप्त (जोड़ा गया) माना जाता है, ताकि कृष्ण के श्याम वर्ण को 'विलक्षण' सिद्ध किया जा सके।

श्रेणी

नन्द बाबा का परिवार (गोकुल)

श्री वृषभानु का परिवार (बरसाना)

कुल/वंश-

सात्वत-वृष्णि वंश (यदु शाखा)

वृषभानु वंश (गोप कुल)

मुखिया (पिता)-

पर्जन्य जी (महान तपस्वी)

महीभानु जी (पितामह)

माता-

वरीयसी (दादी)

सुखदा (दादी)

मुख्य पुरुष-

नन्द बाबा (व्रजेश्वर)

श्री वृषभानु जी (नन्द के परम मित्र)

मुख्य स्त्री- -

माता यशोदा (श्यामल वर्ण)

माता कीर्तिदा (रत्नगर्भा)

सन्तान-

श्रीकृष्ण (पुत्र), सुभद्रा (पुत्री)

श्रीराधा (पुत्री), श्रीदामा (पुत्र)

भाई-

उपनन्द, अभिनन्द, सनन्द, नन्दन

रत्नभानु, सुभानु, भानु

बहनें-

सानन्दा, नन्दिनी

भानुमुद्रा (बुआ)

प्रमुख पारिवारिक कड़ियाँ (Main Connections)

1. नन्द और वृषभानु का मित्रता सम्बन्ध:

  • गरुड़ पुराण के अनुसार, नन्द बाबा और वृषभानु जी केवल पड़ोसी नहीं, बल्कि "प्रिय सुहृदर:" (परम प्रिय मित्र) थे। इनके परिवारों के बीच का प्रेम ही कृष्ण और राधा के मिलन का आधार बना।

2. यशोदा जी का ननिहाल पक्ष:

  • ​यशोदा जी के पिता सुमुख (गिरिभानु) थे और माता पद्मावती
  • ​यशोदा जी के नाना का परिवार भी व्रज के अत्यंत प्रतिष्ठित गोपों में से था, जिससे नन्द परिवार और गोप समुदाय के अन्य परिवारों के बीच वैवाहिक और सामाजिक संतुलन बना रहता था।

3. पौर्णमासी और सान्दीपनि की भूमिका-

  • भगवती पौर्णमासी (जो सान्दीपनि मुनि की माता और मधुमंगल की दादी हैं) इन दोनों परिवारों के बीच की आध्यात्मिक कड़ी थीं। वे नन्द बाबा की पूज्या थीं और श्रीराधा-कृष्ण के मिलन की प्रमुख सूत्रधार भी।

4. सखियों और मित्रों का जाल-

  • ​नन्द बाबा के पुत्र (कृष्ण) के सखा मधुमंगल की दादी स्वयं पौर्णमासी थीं।
  • ​राधा जी की सखी ललिता के पति भैरव, गोवर्धन गोप के सखा थे, जो नन्द बाबा के गोप समुदाय का हिस्सा थे।

वंशवृक्ष का सारांश (Tree Hierarchy)

  • सात्वत वंश \rightarrow चतुर्थ वृष्णि \rightarrow देवमीण \rightarrow पर्जन्य \rightarrow नन्द बाबा \rightarrow श्रीकृष्ण
  • वृषभानु वंश \rightarrow महीभानु \rightarrow वृषभानु \rightarrow श्रीराधा

नन्द बाबा के पितामह और पिता का परिचय-

वृष्णे: कुले उत्पन्नस्य देवमीणस्य पर्जन्यो नाम्न: सुतो।  वरिष्ठो बहुशिष्टो व्रजगोष्ठीनां स कृष्णस्य पितामह॥१॥

  • अनुवाद: यदुवंश के वृष्णि कुल में देवमीण जी के पुत्र 'पर्जन्य' नाम से प्रसिद्ध हुए। वे अत्यन्त शिष्ट, महान और समस्त व्रज समुदाय के रक्षक थे। वे ही श्रीकृष्ण के पितामह (दादा) अर्थात नन्द बाबा के पिता थे।                                  संस्कृत अनुवाद:
    "यदुवंशस्य वृष्णिकुले देवमीढस्य पुत्रः 'पर्जन्य' नाम्ना प्रसिद्धः अभवत्। सः अत्यन्तं शिष्टः, महान्, समस्तस्य व्रजसमुदायस्य रक्षकश्च आसीत्। सः एव श्रीकृष्णस्य पितामहः अर्थात् नन्दगोपस्य पिता आसीत्।"

    व्याकरण विश्लेषण:
    1. यदुवंशस्य वृष्णिकुले: 'यदुवंश के वृष्णि कुल में'—यहाँ 'यदुवंश' में षष्ठी विभक्ति (सम्बन्ध) और 'वृष्णिकुल' में सप्तमी विभक्ति (अधिकरण) का प्रयोग हुआ है।
    2. देवमीढस्य पुत्रः: 'देवमीढ के पुत्र'—सम्बन्ध अर्थ में षष्ठी विभक्ति।
    3. नाम्ना प्रसिद्धः अभवत्: 'नाम से प्रसिद्ध हुए'—'नाम्न्' शब्द में तृतीया विभक्ति। 'अभवत्' भू धातु का लङ् लकार (भूतकाल) है।
    4. समस्तस्य व्रजसमुदायस्य: 'समस्त व्रज समुदाय के'—दोनों पदों में षष्ठी विभक्ति है क्योंकि ये 'रक्षक' के विशेषण हैं।
    5. रक्षकश्च आसीत्: 'रक्षक और थे'—'रक्षकः + च' में विसर्ग सन्धि हुई है। 'आसीत्' अस् धातु का लङ् लकार है।
    6. पितामहः / पिता: ये दोनों शब्द प्रथमा विभक्ति एकवचन में हैं। 'पिता' मूल शब्द 'पितृ' (ऋकारान्त) का रूप है।
यदुवंश के इस वृत्तान्त को अनुष्टुप छन्द में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:
यदुवंशे ह्यभूच्छ्रेष्ठो देवमीढसुतः सुधीः।
पर्जन्य इति विख्यातो रक्षकः सर्वव्रजस्य च॥
नन्दगोपपिता चैव कृष्णस्य च पितामहः।
शिष्टः सर्वगुणैर्युक्तो महान् स पुरुषोत्तमः॥
भावार्थ:
यदुवंश में देवमीढ के पुत्र, बुद्धिमान और शिष्ट गुणों से युक्त 'पर्जन्य' नाम के महान पुरुष हुए। वे समस्त व्रज समुदाय के रक्षक, नन्द बाबा के पिता और भगवान श्रीकृष्ण के पितामह (दादा) थे।
क्या आप इस प्रसंग से संबंधित अन्य पात्रों या नन्द वंश के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं?
श्लोक
यदुवंशे ह्यभूच्छ्रेष्ठो देवमीढसुतः सुधीः।
पर्जन्य इति विख्यातो रक्षकः सर्वव्रजस्य च॥
नन्दगोपपिता चैव कृष्णस्य च पितामहः।
शिष्टः सर्वगुणैर्युक्तो महान् स पुरुषोत्तमः॥
1. पद-परिच्छेद एवं संधि-विच्छेद
  • यदुवंशे: यदुवंश (अकारान्त पुल्लिंग) + सप्तमी विभक्ति, एकवचन।
  • ह्यभूच्छ्रेष्ठो: हि + अभूत् + श्रेष्ठः।
    • हि + अभूत्: 'यण् सन्धि' ().
    • अभूत् + श्रेष्ठः: 'श्चुत्व सन्धि' ().
    • श्रेष्ठः: विसर्ग का 'ओ' (उत्व सन्धि).
  • देवमीढसुतः: देवमीढस्य सुतः (षष्ठी तत्पुरुष समास).
  • पर्जन्य इति: पर्जन्यः + इति (विसर्ग लोप संधि)।
  • सर्वव्रजस्य: समस्त व्रज का (षष्ठी विभक्ति, एकवचन).
  • चैव: च + एव (वृद्धि संधि: ).
  • सर्वगुणैर्युक्तो: सर्वगुणैः + युक्तः (ऋत्व संधि - विसर्ग का 'र' और उत्व संधि - विसर्ग का 'ओ').
2. अन्वय (वाक्य रचना)
अन्वय: (पुरा) यदुवंशे हि देवमीढसुतः सुधीः श्रेष्ठः पर्जन्यः इति विख्यातः अभूत्। सः शिष्टः, सर्वगुणैः युक्तः, महान्, पुरुषोत्तमः, सर्वव्रजस्य रक्षकः, नन्दगोपपिता च कृष्णस्य पितामहः एव (आसीत्)।
3. व्याकरणिक टिप्पणियाँ
  • छन्द: यह अनुष्टुप छन्द है, जिसके प्रत्येक चरण में 8 वर्ण होते हैं। इसका लक्षण है— "श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम्" (अर्थात् पाँचवाँ वर्ण लघु और छठा गुरु होता है).
  • विभक्ति प्रयोग:
    • प्रथमा विभक्ति (कर्ता/विशेषण): सुधीः, श्रेष्ठः, विख्यातः, रक्षकः, शिष्टः, युक्तः, महान्, पितामहः। ये सभी 'पर्जन्य' के विशेषण हैं.
    • षष्ठी विभक्ति (सम्बन्ध): कृष्णस्य, सर्वव्रजस्य। 'कृष्ण के' और 'समस्त व्रज के'.
  • क्रिया पद: 'अभूत्' (भू धातु, लुङ् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) - जिसका अर्थ है 'हुआ 
  •  ​2. नन्द बाबा के जन्म का सन्दर्भ (तपस्या का फल)

तपसानेन धन्येन भाविन: पुत्रा वरीयान्। पञ्च ते मध्यमस्तेषां नन्दनाम्ना जजान॥३॥

  • अनुवाद: पर्जन्य जी की महान तपस्या के फलस्वरूप उन्हें पाँच श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त हुए, जिनमें से मध्यम (तीसरे) पुत्र का नाम 'नन्द' था।

3. श्रीकृष्ण की दादी (पर्जन्य जी की पत्नी)

कृष्णस्य पितामही महीमान्या कुसुम्भाभा हरित्पटा।वरीयसीति वर्षीयसी विख्याता खर्वा: क्षीराभ लट्वा॥५॥

  • अनुवाद: श्रीकृष्ण की दादी 'वरीयसी' पूरे गोकुल में अत्यंत सम्मानित थीं। वे कुसुम्भ (सिंदूरी/नारंगी) आभा वाले और हरे वस्त्र धारण करती थीं। वे छोटे कद की थीं, उनके बाल दूध के समान श्वेत थे और वे अधिक वृद्धा थीं।

4. नन्द बाबा के भाई और बहन

उपनन्दानुजो नन्दो वसुदेवस्य सुहृत्तम:।

नन्दयशोदे च कृष्णस्य पितरौ व्रजेश्वरौ॥८॥

  • अनुवाद: उपनन्द के छोटे भाई नन्द, वसुदेव जी के परम मित्र थे। नन्द और यशोदा दोनों ही श्रीकृष्ण के माता-पिता और व्रज के स्वामी (व्रजेश्वर) के रूप में प्रसिद्ध हैं।

5. माता यशोदा का स्वरूप और परिचय

माता गोपान् यशोदात्री यशोदा श्यामलद्युति:।

मूर्ता वत्सलते! वासौ इन्द्रचापनिभाम्बरा॥११॥


  • अनुवाद: गोप जाति को यश प्रदान करने के कारण वे 'यशोदा' कहलाती हैं। उनकी अंग-कान्ति श्यामल (साँवली) है, वे साक्षात् वात्सल्य की प्रतिमूर्ति हैं और उनके वस्त्र इंद्रधनुष के समान रंग-बिरंगे हैं।

6. नन्द और यशोदा के गोरे वर्ण पर विवाद (गर्गसंहिता खंडन)

गौरवर्णा यशोदे त्वं नन्द त्वं गौरवर्णधृक्।

अयं जातः कृष्णवर्ण एतत्कुलविलक्षणम्॥५॥


  • अनुवाद (गर्गसंहिता के अनुसार): "हे यशोदा, तुम गोरी हो, नन्द बाबा भी गोरे हैं, किंतु यह बालक (कृष्ण) काला जन्मा है, जो इस कुल के लिए असामान्य है।"
  • विशेष टिप्पणी: जैसा कि आपके लेख में उल्लेख है, विद्वानों का मत है कि माता यशोदा का वर्ण श्यामल ही था और ये श्लोक बाद में जोड़े गए (फर्जी) प्रतीत होते हैं।

7. आदि पुराण के अनुसार यशोदा जी का दूसरा नाम

आदिपुराणे प्रोक्तं द्वे नाम्नी नन्दभार्याया यशोदा देवकी-इति च।

अत: सख्यमभूत्तस्या देवक्या: शौरिजायया॥१२॥


  • अनुवाद: आदि पुराण में कहा गया है कि नन्द की पत्नी के दो नाम हैं—यशोदा और देवकी। इसी नाम की समानता के कारण वसुदेव की पत्नी देवकी के साथ उनका स्वाभाविक सख्य (मित्रता) भाव था।

8. नन्द बाबा के अन्य भाइयों का परिचय

उपनन्दोऽभिनन्दश्च पितृव्यौ पूर्वजौ पितु:।

पितृव्यौ तु कनीयांसौ स्यातां सनन्द नन्दनौ॥१३॥


  • अनुवाद: श्रीकृष्ण के पिता (नन्द) के दो बड़े भाई 'उपनन्द' और 'अभिनन्द' हैं, तथा दो छोटे भाई 'सनन्द' और 'नन्दन' हैं। ये चारों श्रीकृष्ण के पितृव्य (ताऊ और चाचा) हैं।

नन्द बाबा (पितृ-पक्ष) एवं परिवार वंशावली-


संबंध

नाम

विशेष विवरण

पर-पितामह

चतुर्थ वृष्णि

सात्वत वंश की अंतिम शाखा के प्रमुख

पितामह (दादा)

देवमीण जी

वृष्णि कुल के प्रतिष्ठित पुरुष

पिता

पर्जन्य जी

नन्दीश्वर के निवासी, श्रीकृष्ण के पितामह

माता (दादी)

वरीयसी जी

छोटे कद की, दूध जैसे श्वेत बाल, हरे वस्त्र

मुख्य (पिता)

नन्द बाबा

व्रज के स्वामी (व्रजेश्वर), गौर वर्ण

बड़े भाई (ताऊ)

उपनन्द, अभिनन्द

उपनन्द (गुलाबी कान्ति), अभिनन्द (श्वेत कान्ति)

छोटे भाई (चाचा)

सनन्द, नन्दन

सनन्द (पीताभ श्वेत), नन्दन (मयूर कण्ठ आभा)

बहनें (बुआ)

सानन्दा, नन्दिनी

श्वेत कान्ति, रंग-बिरंगे वस्त्र



माता यशोदा (मातृ-पक्ष) वंशावली-


संबंध

नाम

विशेष विवरण

नाना

सुमुख (गिरिभानु)

पके जामुन जैसी श्यामल कान्ति, श्वेत दाढ़ी

नानी

पाटला (पद्मावती)

पाटल पुष्प जैसी आभा, दही जैसे श्वेत बाल

माता

यशोदा जी

श्यामल कान्ति, वात्सल्य की प्रतिमूर्ति

भाई (मामा)

यशोधर, यशोदेव, सुदेव

अलसी के फूल जैसी कान्ति, श्वेत वस्त्र

बहनें (मौसी)

यशोदेवी, यशस्वनी

इन्हें दधिसारा और हविसारा भी कहा जाता है।

श्रीराधा जी का परिवार (वृषभानु वंश)-


संबंध

नाम

विशेष विवरण

पिता

वृषभानु जी

सूर्य के समान तेजस्वी, नन्द बाबा के परम मित्र

माता

कीर्तिदा जी

रत्नगर्भा के नाम से विख्यात

बड़े भाई

श्रीदामा

श्रीकृष्ण के सखा

छोटी बहन

अनंगमञ्जरी

राधा जी की अनुजा

दादा/नाना

महीभानु / इन्दु

क्रमशः पिता के पिता और माता के पिता

दादी/नानी

सुखदा / मुखरा

क्रमशः पिता की माता और माता की माता




क्या आप इनमें से किसी विशिष्ट श्लोक की व्याकरण सहित व्याख्या या किसी अन्य पात्र (जैसे श्रीराधा के परिवार) के श्लोकों का विवरण भी चाहेंगे?



संस्कृत श्लोक:
सात्वतस्य सुतो वृष्णिः, तस्माज्जातोऽनमित्रकः।
तत्पुत्रस्तु तृतीयो यः, स चतुर्थो वृष्णिः स्मृतः॥
स एव सात्वतकुले, वृष्णिर्नाम्ना च पश्चिमः।१।
छन्द और शब्द विश्लेषण:
  • छन्द: यह अनुष्टुप छन्द में है, जिसमें प्रत्येक चरण में ८ वर्ण होते हैं। यह संस्कृत का सबसे सरल और लोकप्रिय छन्द है।
  • पश्चिमः (अन्तिम): संस्कृत काव्य में 'अन्तिम' के लिए 'पश्चिम' शब्द का प्रयोग किया जाता है।
  • तस्माज्जातोऽनमित्रकः: तस्मात् (उनसे) + जातः (उत्पन्न हुए) + अनमित्रकः। यहाँ सन्धि और छन्द की लय के लिए 'अनमित्र' को 'अनमित्रक' किया गया है।
अन्वय (भावार्थ):
सात्वत के पुत्र वृष्णि थे, उनसे अनमित्र पैदा हुए। अनमित्र के जो तीसरे पुत्र थे, उन्हें 'चतुर्थ वृष्णि' कहा गया है। सात्वत कुल में वृष्णि नाम के वे ही अन्तिम पुरुष थे।


संस्कृत श्लोक (अनुष्टुप छन्द):
वृष्णिगोत्रसमुद्भूतः पर्जन्यो देवमीढजः।
नन्दतातः स सच्छीलः सर्वव्रजहिताग्रणीः॥

व्याकरणिक विश्लेषण:
अनुष्टुप छन्द के प्रत्येक चरण में ८ वर्ण होते हैं। इसका लक्षण है— "पञ्चमं लघु सर्वत्र सप्तमं द्विचतुर्थयोः। गुरु षष्ठं च जानीयादेतच्छन्दस्य लक्षणम्॥"
  1. वृष्णिगोत्रसमुद्भूतः (८ वर्ण):
    • वृष्णि-गोत्र-सम्-उद्-भूतः: वृष्णि वंश में उत्पन्न। (विभक्ति: प्रथमा, एकवचन)।
  2. पर्जन्यो देवमीढजः (८ वर्ण):
    • पर्जन्यः: मूल नाम। (सन्धि के कारण 'पर्जन्यो' हुआ)।
    • देवमीढ-जः: देवमीढ के पुत्र (ज = उत्पन्न)।
  3. नन्दतातः स सच्छीलः (८ वर्ण):
    • नन्द-तातः: नन्द बाबा के पिता।
    • सः: वह।
    • सत्-शीलः: श्रेष्ठ चरित्र वाले (शिष्ट)।
  4. सर्वव्रजहिताग्रणीः (८ वर्ण):
    • सर्व-व्रज-हित-अग्रणीः: समस्त ब्रज समुदाय के हितैषी और उनके मार्गदर्शक/महान।
भावार्थ:
वृष्णि कुल में उत्पन्न देवमीढ के पुत्र पर्जन्य थे। वे श्रेष्ठ आचरण वाले, समस्त ब्रज के हितैषी और भगवान श्रीकृष्ण के पितामह (नन्द बाबा के पिता) थे।




योगेश जी को लिखना है.........✍️

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