मंगलवार, 19 मई 2026

यदुवंश संहित-ा (अध्याय सप्तम)

आत्मानन्द जी:
अध्याय-7 भाग-(क)

(6) यदु पुत्र- कार्तवीर्य अर्जुन का परिचय


जैसा की इसके पिछले भाग में बताया जा चुका है कि यदु के चार प्रमुख पुत्र - सहस्रजित, क्रोष्टा, नल, और रिपु थे। जिसमें सहस्रजित यदु के पुत्रों में सबसे ज्येष्ठ थे। उसके आगे- सहस्रजित से शतजित का जन्म हुआ। शतजित के तीन पुत्र- महाहय, वेणुहय और हैहय हुए। जिसमें यदु के प्रपौत्र हैहय से धनक हुए और धनक के कुल चार पुत्र- कृतवीर्य, कृताग्नि, कृतवर्मा, और कृतौजा हुए। कृतवीर्य के पुत्र - सहस्त्रबाहु अर्जुन हुए। सहस्त्रबाहु अर्जुन का जन्म महाराज हैहय की दसवीं पीढ़ी में माता पद्मिनी के गर्भ से हुआ था। राजा कृतवीर्य की सन्तान होने के कारण इन्हें कार्तवीर्य अर्जुन और भगवान दत्तात्रेय से एक हजार बाहुबल के वरदान के उपरान्त उन्हें सहस्त्रबाहु अर्जुन कहा गया।  
महाराज कार्तवीर्य अर्जुन का जन्म कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को श्रावण नक्षत्र में प्रात: काल के मुहूर्त में हुआ था। इसी तिथि को उनकी जयन्ती मनाई जाती है। इसके साथ ही कार्तवीर्य अर्जन सुदर्शन चक्र के अवतार भी थे। इसके बारे में आगे बताया गया है।      
सहस्त्रबाहु अर्जुन अपने समय के सबसे बलशाली,  धर्मवत्सल, कुशल कृषक, प्रजापालक और गोपालक चक्रवर्ती अहीर सम्राट थे। इस बात की पुष्टि- मत्स्यपुराण के अध्याय-४३ के- १८ से २८ तक के श्लोकों से होती है। जिसमें कार्तवीर्यार्जुन के महत्व को एक नारद नामक गन्धर्व नें उनके यज्ञ में कुछ इस प्रकार गुणगान किया था -

'तेनेयं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपर्वता।
समोदधिपरिक्षिप्ता क्षात्रेण विधिना जिता।।१८।।

जज्ञे बाहुसहस्रं वै इच्छत स्तस्य धीमतः।
रथो ध्वजश्च सञ्जज्ञे इत्येवमनुशुश्रुमः।।१९ ।।

दशयज्ञसहस्राणि राज्ञा द्वीपेषु वै तदा।
निरर्गला निवृत्तानि श्रूयन्ते तस्य धीमतः।। २० ।।

सर्वे यज्ञा महाराज्ञस्तस्यासन् भूरिदक्षिणाः।
सर्वेकाञ्चनयूपास्ते सर्वाः काञ्चनवेदिकाः।।२१।।

सर्वे देवैः समं प्राप्तै र्विमानस्थैरलङ्कृताः।
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च नित्यमेवोपशोभिताः।२ ।

तस्य यो जगौ गाथां गन्धर्वो नारदस्तथा।
कार्तवीर्य्यस्य राजर्षेर्महिमानं निरीक्ष्य सः।।२३ ।।

न नूनं कार्तवीर्य्यस्य गतिं यास्यन्ति क्षत्रियाः।
यज्ञैर्दानै स्तपोभिश्च विक्रमेण श्रुतेन च।।२४ ।।

स हि सप्तसु द्वीपेषु, खड्गी चक्री शरासनी।
रथीद्वीपान्यनुचरन् योगी पश्यति तस्करान्।।२५।।

पञ्चाशीतिसहस्राणि वर्षाणां स नराधिपः।
स सर्वरत्नसम्पूर्ण श्चक्रवर्त्ती बभूव ह।२६ ।।

स एव पशुपालोऽभूत् क्षेत्रपालः स एव हि।
स एव वृष्ट्या पर्जन्यो योगित्वादर्ज्जुनोऽभवत्।२७।

योऽसौ बाहु सहस्रेण ज्याघात कठिनत्वचा।
भाति रश्मिसहस्रेण शारदेनैव भास्करः।। २८ ।।

अनुवाद- १८-२८

भावी क्षत्रिय नरेश निश्चय ही यज्ञ, दान, तप, पराक्रम और शास्त्रज्ञान के द्वारा कार्तवीर्यार्जुन की समकक्षता को नहीं प्राप्त होंगे। योगी कार्तवीर्यार्जुन रथ पर आरूढ़ हो हाथ में खङ्ग, चक्र और धनुष धारण करके सातों दीपों में भ्रमण करता हुआ चोरों- डाकुओं पर कड़ी दृष्टि रखता था। राजा कार्तवीर्यार्जुन पचासी हजार वर्षों तक भू-तल पर शासन करके समस्त रत्नों से परिपूर्ण हो चक्रवर्ती सम्राट बना रहा। राजा कार्तवीर्यार्जुन ही अपने योग बल से पशुपालक (गोप) था। वही खेतों का भी रक्षक था और वही समयानुसार मेंघ बनकर वृष्टि भी करता था। प्रत्यञ्चा के आघात से कठोर हुई त्वचाओं वाली अपनी सहस्र भुजाओं से वह उसी प्रकार शोभा पता था, जिस प्रकार सहस्रों किरणों से युक्त शारदीय सूर्य शोभित होता है। १८-२८।
         
ज्ञात हो- अयोध्यापति श्रीराम, लंकापति रावण और महिष्मतिपुरी (आधुनिक नाम मध्यप्रदेश का महेश्वर जो नर्मदा नदी के किनारे स्थित है।) के चक्रवर्ती अहीर सम्राट कार्तवीर्यार्जुन लगभग एक ही समय के राजा थे। और
जिस रावण को वश में करने और परास्त करने के लिए श्रीराम ने सम्पूर्ण जीवन दाँव पर लगा दिया था, उस रावण को अभीर सम्राट कार्तवीर्यार्जुन ने मात्र पाँच वाणो में परास्त कर बन्दी बना लिया था।

इस बात की पुष्टि- मत्स्यपुराण के अध्याय-(४३) के- (३७ से ३९) तक के श्लोकों से होती है। जिसमें एक नारद नाम का एक गंधर्व कार्तवीर्यार्जुन का गुणगान करते हुए कहा -

एवं बध्वा धनुर्ज्यायामुत्सिक्तं पञ्चभिः शरैः।
लङ्कायां मोहयित्वा तु सबलं रावणं बलात्।। ३७।  
                             
निर्जित्य बध्वा चानीय माहिष्मत्यां बबन्ध च।
ततो  गत्वा   पुलस्त्यस्तु अर्जुनं  संप्रसादयत्।। ३८।   
                        
मुमोच रक्षः पौलस्त्यं पुलस्त्येनेह सान्त्वितम्।    तस्य   बाहुसहस्रेण   बभूव  ज्यातलस्वनः।।३९।

अनुवाद- ३७-३९

इसी प्रकार अर्जुन ने एक बार लंका में जाकर अपने पाँच बाणों द्वारा सेना सहित रावण को मोहित कर दिया, और उसे बलपूर्वक जीत कर अपने धनुष की प्रत्यञ्चा में बांँध लिया, फिर माहिष्मती पुरी में लाकर उसे बन्दी बना लिया। यह सुनकर महर्षि पुलस्त्य (रावण के पितामह) ने माहिष्मती पुरी में जाकर अर्जुन को अनेकों प्रयास से समझा बुझाकर प्रसन्न किया। तब सहस्रबाहु- अर्जुन ने  महर्षि पुलस्त्य को सान्त्वना देकर उनके पौत्र  राक्षस राज रावण को बन्धन मुक्त कर दिया।३७-३९।              

                 
कार्तवीर्यार्जुन कोई साधारण पुरुष नहीं थे। वे साक्षात भगवान श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र के अवतार थे। इस बात की पुष्टि- नारदपुराणम्- पूर्वभाग अध्यायः (७६) के श्लोक-( ४ ) से होती है। जिसमें नारद जी कार्तवीर्यार्जुन के बारे में कहते हैं कि -


यः सुदर्शनचक्रस्यावतारः पृथिवीतले।
दत्तात्रेयं समाराध्य लब्धवांस्तेज उत्तमम्।। ४।

अनुवाद- ये (कार्तवीर्यार्जुन) पृथ्वी लोक पर सुदर्शन चक्र के अवतार हैं। इन्होंने महर्षि दत्तात्रेय की आराधना से उत्तम तेज प्राप्त किया। ४

कार्तवीर्यार्जुन सुदर्शन चक्र का अवतार होने के साथ-साथ दत्तात्रेय का वर पाकर अजेय हो गये थे। उस समय कार्तवीर्यार्जुन और परशुराम से कई बार युद्ध हुआ। जिसमें दिव्य शक्ति सम्पन्न कार्तवीर्यार्जुन ने परशुराम का बध भी कर दिया था। किन्तु यह बात कथाकारों को बर्दाश्त नहीं हुई। परिणामतः  इसके उलट कार्तवीर्यार्जुन को ही परशुराम द्वारा वध करने की पुराणों में एक नई कथा जोड़ दिया।
      
अब सवाल यह है कि क्या वास्तव में कार्तवीर्यार्जुन ने परशुराम का वध किया कि परशुराम ने कार्तवीर्यार्जुन का वध किया, इसकी सच्चाई तभी उजागर हो सकती है जब दोनों के बीच युद्धों का निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए। क्योंकि कि इसमें बहुत घाल- मेल किया गया है। दोनों के बीच हुए युद्धों का वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण के गणपतिखण्ड के अध्याय- ४० के कुछ प्रमुख श्लोकों से होती है। जिसको नीचे उद्धत किया जा रहा है -

"पतिते तु सहस्राक्षे कार्तवीर्य्यार्जुनः स्वयम्।।
आजगाम महावीरो द्विलक्षाक्षौहिणीयुतः।।३।।

सुवर्णरथमारुह्य रत्नसारपरिच्छदम् ।।
नानास्त्रं परितः कृत्वा तस्थौ समरमूर्द्धनि।।४।।

समरे तं परशुरामो राजेन्द्रं च ददर्श ह ।।
रत्नालंकारभूषाढ्यै राजेन्द्राणां च कोटिभिः ।।५।।

रत्नातपत्रभूषाढ्यं रत्नालंकारभूषितम् ।।
चन्दनोक्षितसर्वांगं सस्मितं सुमनोहरम् ।। ६ ।।

राजा दृष्ट्वा मुनीन्द्रं तमवरुह्म रथादहो ।।
प्रणम्य रथमारुह्य तस्थौ नृपगणैः सह ।। ७ ।।

ददौ शुभाशिषं तस्मै रामश्च समयोचितम् ।।
प्रोवाच च गतार्थं तं स्वर्गं गच्छेति सानुगः।।८।।

उभयोः सेनयोर्युद्धमभवत्तत्र नारद।
पलायिता रामशिष्या भ्रातरश्च महाबलाः ।।
क्षतविक्षतसर्वाङ्गाः कार्त्तवीर्य्यप्रपीडिताः।।९।

नृपस्य शरजालेन रामः शस्त्रभृतां वरः ।।
न ददर्श स्वसैन्यं च राजसैन्यं तथैव च ।।१०।

चिक्षेप रामश्चाग्नेयं बभूवाग्निमयं रणे ।।
निर्वापयामास राजा वारुणेनैव लीलया ।।११।।

चिक्षेप रामो गान्धर्वं शैलसर्पसमन्वितम् ।।
वायव्येन महाराजः प्रेरयामास लीलया ।१२।

चिक्षेप रामो नागास्त्रं दुर्निवार्य्यं भयंकरम् ।।
गारुडेन महाराजः प्रेरयामास लीलया ।।१३।

माहेश्वरं च भगवांश्चिक्षेप भृगुनन्दनः ।।
निर्वापयामास राजा वैष्णवास्त्रेण लीलया ।।१४ ।।

ब्रह्मास्त्रं चिक्षिपे रामो नृपनाशाय नारद ।।
ब्रह्मास्त्रेण च शान्तं तत्प्राणनिर्वापणं रणे ।। १५ ।।

दत्तदत्तं च यच्छूलमव्यर्थं मन्त्रपूर्वकम् ।।
जग्राह राजा परशुरामनाशाय संयुगे ।। १६ ।।

शूलं ददर्श रामश्च शतसूर्य्यसमप्रभम् ।।
प्रलयाग्रिशिखोद्रिक्तं दि रि नि वाक्य सुरैरपि ।। १७ ।।

पपात शूलं समरे रामस्योपरि नारद ।।
मूर्च्छामवाप स भृगुः पपात च हरिं स्मरन् ।।१८।।

पतिते तु तदा रामे सर्वे देवा भयाकुलाः ।।
आजग्मुः समरं तत्र ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।।१९।

शङ्करश्च महाज्ञानी महाज्ञानेन लीलया ।।
ब्राह्मणं जीवयामास तूर्णं नारायणाज्ञया ।। 3.40.२० ।।

भृगुश्च चेतनां प्राप्य ददर्श पुरतः सुरान् ।।
प्रणनाम परं भक्त्या लज्जानम्रात्मकन्धरः।।२१ ।।

राजा दृष्ट्वा सुरेशांश्च भक्तिनम्रात्मकन्धरः ।।
प्रणम्य शिरसा मूर्ध्ना तुष्टाव च सुरेश्वरान् ।।२२।

तत्राजगाम भगवान्दत्तात्रेयो रणस्थलम् ।।
शिष्यरक्षानिमित्तेन कृपालुर्भक्तवत्सलः ।२३।

भृगुः पाशुपतास्त्रं च सोऽग्रहीत्कोपसंयुतः ।।
दत्तदत्तेन दृष्टेन बभूव स्तम्भितो भृगुः ।।२४।।

ददर्श स्तम्भितो रामो राजानं रणमूर्द्धनि ।।
नानापार्षदयुक्तेन कृष्णेनाऽऽरक्षितं रणे ।।२५।।

सुदर्शनं प्रज्वलन्तं भ्रमणं कुर्वता सदा ।।
सस्मितेन स्तुतेनैव ब्रह्मविष्णुमहेश्वरैः ।।२६।

गोपालशतयुक्तेन गोपवेषविधारिणा ।।
नवीनजलदाभेन वंशीहस्तेन गायता ।२७।

एतस्मिन्नन्तरे तत्र वाग्बभूवाशरीरिणी ।।
दत्तेन दत्तं कवचं कृष्णस्य परमात्मनः ।। २८ ।।

राज्ञोऽस्ति दक्षिणे बाहौ सद्रत्नगुटिकान्वितम् ।।
गृहीतकवचे शम्भौ भिक्षया योगिनां गुरौ ।।२९ ।।

तदा हन्तुं नृपं शक्तो भृगुश्चेति च नारद ।।
श्रुत्वाऽशरीरिणीं वाणीं शङ्करो द्विजरूपधृक्।। ३०।।

भिक्षां कृत्वा तु कवचमानीय च नृपस्य च।।
शम्भुना भृगवे दत्तं कृष्णस्य कवचं च यत् ।। ३१।।

रामस्ततो राजसैन्यं ब्रह्मास्त्रेण जघान ह ।।
नृपं पाशुपतेनैव लीलया श्रीहरिं स्मरन् ।।७२ ।।

अनुवाद- ३ से ७२ तक

• सहस्राक्ष के गिर जाने पर महाबली कार्तवीर्यार्जुन दो लाख अक्षौहिणी सेना के साथ स्वयं युद्ध करने के लिए आया।

•वह रत्ननिर्मित खोल से आच्छादित स्वर्णमय रथपर सवार हो अपने चारों ओर नाना प्रकार के अस्त्रों को सुसज्जित करके रण के मुहाने पर डटकर खड़ा हो गया।

• इसके बाद वहाँ दोनों सेनाओं में युद्ध होने लगा तब परशुराम के शिष्य तथा उसके महाबली भाई कार्तवीर्य से पीड़ित होकर भाग खड़े हुए।

•उस समय उनके सारे अंग घायल हो गए थे। राजा के बाणसमूह से अच्छादित होने के कारण शास्त्रधारियों में श्रेष्ठ परशुराम को अपनी तथा राजा की सेना भी नहीं दिख रही थी।

• फिर तो परस्पर घोर दिव्यास्त्रों का प्रयोग होने लगा। अन्त में राजा (कार्तवीर्य) ने दत्तात्रेय के दिए हुए अमोघ शूल को यथाविधि मन्त्रों का पाठ करके परशुराम पर छोड़ दिया।

• उस सैकड़ों सूर्य के समान प्रभावशाली एवं प्रलयाग्नि की शिखा के सदृश शूल के लगते ही परशुराम धराशायी हो गये।

• तदनन्तर भगवान शिव ने वहाँ जाकर परशुराम को पुनर्जीवनदान दिया (पुनः जीवित किया)।

• इसी समय वहाँ युद्ध स्थल में भक्तवत्सल कृपालु भगवान दत्तात्रेय अपने शिष्य (कार्तवीर्य) की रक्षा करने के लिए आ पहुँचे। फिर परशुराम ने क्रुद्ध होकर पाशुपतास्त्र हाथ में लिया, परन्तु दत्तात्रेय की दृष्टि पड़ने से वह (परशुराम) पाशुपत अस्त्र सहित रणभूमि में स्तम्भित (जड़वत्) हो गये।

• तब रणके मुहाने पर स्तम्भित हुए परशुराम ने देखा कि जिनके शरीर की कान्ति नूतन जलधार के सदृश्य है, जो हाथ में वँशी लिए बजा रहे हैं, सैकड़ो गोप जिनके साथ हैं, जो मुस्कुराते हुए राजा कार्तवीर्यार्जुन की रक्षा के लिए अपने प्रज्वलित सुदर्शन चक्र को निरन्तर घुमा रहे हैं।

•और अनेकों पार्षदों से गिरे हुए हैं, एवं ब्रह्मा, विष्णु, और महेश्वर जिनका स्तवन कर रहे हैं, वे गोपवेषधारी श्रीकृष्ण युद्ध क्षेत्र में राजा (कार्तवीर्य) की रक्षा कर रहे हैं।

• उसी समय वहाँ यूं आकाशवाणी हुई- दत्तात्रेय के द्वारा दिया हुआ परमात्मा श्रीकृष्ण का कवच उत्तम रत्न की गुटका के साथ राजा की दाहिनी भुजा पर बँधा हुआ है, अतः योगियो के गुरु शंकर भिक्षारूप से जब उस कवच को माँग लेंगे, तभी परशुराम राजा कार्तवीर्यार्जुन का वध करने में समर्थ हो सकेंगे।

• नारद ! उस आकाशवाणी को सुनकर शंकर जी एक ब्राह्मण का रूप धारण करके गए और राजा से याचना करके उसका कवच माँग लाये। फिर शम्भू ने श्रीकृष्ण का वह कवच परशुराम को दे दिया।

• तत्पश्चात परशुराम ने श्रीहरि का स्मरण करते हुए ब्रह्मास्त्र द्वारा राजा की सेना का सफाया कर दिया और फिर लीलापूर्वक पशुपतास्त्र का प्रयोग करके राजा कार्तवीर्यार्जुन की जीवन लीला समाप्त कर दी।

युद्ध विश्लेषण-

यदि उपर्युक्त श्लोक संख्या- (२५ से २८) पर विचार किया जाए तो रणभूमि में कार्तवीर्यार्जुन की रक्षा परमेश्वर श्रीकृष्ण स्वयं अपने सैकड़ो गोपों एवं पार्षदों के साथ कर रहे होते हैं। तो उस स्थिति में ब्रह्माण्ड का न दैत्य, न देवता, न किन्नर, न गन्धर्व, और ना ही कोई मनुष्य कार्तवीर्यार्जुन का बाल बाँका कर सकता था। परशुराम की बात करना तो बहुत दूर है।

• दूसरी बात यह कि- श्लोक संख्या - (१८ से २०) में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि- युद्ध में कार्तवीर्यार्जुन के भयंकर शूल के आघात से परशुराम मारे जाते हैं। किन्तु शिव जी द्वारा उन्हें पुनः जीवित कर दिया जाता है।
अब यहाँ सोचने वाली बात है कि कोई मरने के बाद पुनः जीवित होता है क्या ? जवाब होगा नहीं। तो फिर परशुराम  जीवित कैसे हो गये ? यह बात भी हजम नहीं होती।

• तीसरी बात यह कि- श्लोक संख्या (२८ से २९) में लिखा गया है कि- परमात्मा श्रीकृष्ण का कवच जो कार्तवीर्यार्जुन की दाहिनी भुजा में बँधा हुआ था उसी से कार्तवीर्यार्जुन की रणभूमि में रक्षा हो रही होती है, और उसे शिवजी ब्राह्मण वेष में आकर भिक्षा के रूप में माँगते हैं और राजा कार्तवीर्यार्जुन उस कवच को सहर्ष दे देते हैं।

अब यहाँ पर विचारणीय बात यह है कि- क्या राजा को उस समय इतना ज्ञान नहीं था कि युद्धभूमि में अचानक एक ब्रह्मण भिखारी भिक्षा में धन दौलत न माँगकर रक्षा कवच क्यों माँग रहा है ? और सोचने वाली बात यह है की जिस कार्तवीर्यार्जुन की रक्षा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कर रहे हों उस समय कोई भिखारी उसके प्राणों के समान कवच माँगे और अन्तर्यामी भगवान मूकदर्शक बने रहे। यह सम्भव नहीं लगता ? और ना ही यह बात किसी भी तरह

से हजम हो सकती है।

चौथी बात यह कि- अगर कार्तवीर्यार्जुन का वध हुआ होता तो शास्त्रों में उनकी पूजा का विधान कभी नहीं होता।  और न ही उनकी जयंती मनाई जाती। जबकि कार्तवीर्यार्जुन का विधिवत पूजा करने का शास्त्रों में विधान किया गया है। इसके लिए निम्नलिखित संदर्भ देखें-


कार्तवीर्यार्जुन की पूजन विधि और उनकी जयंती -

पूराणों में सहस्रबाहू अर्जुन की पूजा करने के विधान की पुष्टि- श्रीबृहन्नारदीयपुराण पूर्वभागे बृहदुपाख्यान तृतीयपाद कार्तवीर्यमाहात्म्यमन्त्रदीपकथनं नामक - (७६) वें अध्याय से होती है। परन्तु परशुराम कि पूजा का विधान किसी पुराण में नहीं है। नारद पूराण में सहस्रबाहू अर्जुन की पूजा करने का विधान नारद और सनत्कुमार संवाद के रूप में जाना जाता है। जिसमें नारद के पूछे जाने पर सनत्कुमार जी कहते हैं-

                  "नारद उवाच।
"कार्तवीर्यतप्रभृतयो नृपा बहुविधा भुवि।
जायन्तेऽथ प्रलीयन्ते स्वस्वकर्मानुसारतः।। १।

तत्कथं राजवर्योऽसौ लोकेसेव्यत्वमागतः।
समुल्लंघ्य नृपानन्यानेतन्मे नुद संशयम्।। २।

अनुवाद:-
• देवर्षि नारद कहते हैं ! पृथ्वी पर कार्तवीर्य आदि राजा अपने कर्मानुगत होकर उत्पन्न होते और विलीन हो जाते हैं।

• तब उन्हीं सभी राजाओं को लाँघकर कार्तवीर्य किस प्रकार सन्सार में पूज्य हो गये यही मेरा संशय है। १-२।

                  "सनत्कुमार उवाच"
श्रृणु  नारद !  वक्ष्यामि सन्देहविनिवृत्तये।
यथा सेव्यत्वमापन्नः कार्तवीर्यार्जुनो भुवि।।३

अनुवाद:- सनत्कुमार ने कहा ! हे नारद ! मैं आपके संशय की निवृति हेतु वह तथ्य कहता हूँ। जिस प्रकार से कार्तवीर्य अर्जुन पृथ्वी पर पूजनीय (सेव्यमान) कहे गये हैं सुनो ! । ३।

यः सुदर्शनचक्रस्यावतारः  पृथिवीतले।
दत्तात्रेयं समाराध्य लब्धवांस्तेज उत्तमम्।। ४।

तस्य  क्षितीश्वरेंद्रस्य   स्मरणादेव   नारद।
शत्रूञ्जयति संग्रामे नष्टं प्राप्नोति सत्वरम्।। ५।

तेनास्य मन्त्रपूजादि   सर्वतन्त्रेषु   गोपितम्।
तुभ्यं प्रकाबशयिष्येऽहं सर्वसिद्धिप्रदायकम्।। ६।


अनुवाद:- ४ से ६

• ये सहस्रबाहु अर्जुन पृथ्वी लोक पर सुदर्शन चक्र के अवतार हैं। इन्होंने महर्षि दत्तात्रेय की आराधना से उत्तम तेज प्राप्त किया।
हे नारद ! कार्तवीर्य अर्जुन के स्मरण मात्र से ही पृथ्वी पर विजय लाभ की प्राप्ति होती है। शत्रु पर युद्ध में विजय प्राप्त होती है। तथा शत्रु का नाश भी शीघ्र ही हो जाता है।

• कार्तवीर्य अर्जुन का मन्त्र सभी तन्त्रों में गुप्त है। मैं सनत्कुमार आपके लिए इसे आज प्रकाशित करता हूँ। जो सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाला है। ४ से ६।

वह्नितारयुता रौद्री लक्ष्मीरग्नींदुशान्तियुक्।वेधाधरेन्दुशांत्याढ्यो निद्रयाशाग्नि बिंदुयुक्।। ७।

पाशो मायांकुशं पद्मावर्मास्त्रे कार्तवीपदम्।
रेफोवा द्यासनोऽनन्तो वह्निजौ कर्णसंस्थितौ।। ८।

मेषः सदीर्घः पवनो मनुरुक्तो हृदंतिमः।
ऊनर्विशतिवर्णोऽयं तारादिर्नखवर्णकः।। ९।

दत्तात्रेयो मुनिश्चास्यच्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम्।
कार्तवीर्यार्जुनो देवो  बीजशक्तिर्ध्रुवश्च हृत्।। १०।

शेषाढ्यबीजयुग्मेन   हृदयं    विन्यसेदधः।
शान्तियुक्तचतुर्थेन कामाद्येन शिरोंऽगकम्। ११।

इन्द्वाढ्यं   वामकर्णाद्यमाययोर्वीशयुक्तया।
शिखामंकुशपद्माभ्यां सवाग्भ्यां वर्म विन्यसेत्।।१२।

वर्मास्त्राभ्यामस्त्रमुक्तं शेषार्णैर्व्यापकं पुनः।
हृदये    जठरे    नाभौ   जठरे   गुह्यदेशतः।। १३।

दक्षपादे वामपादे सक्थ्नि जानुनि जङ्घयोः। विन्यसेद्बीजदशकं  प्रणवद्वयमध्यगम् ।।१४ ।।

ताराद्यानथ   शेषार्णान्मस्तके   च   ललाटके।
भ्रुवोः श्रुत्योस्तथैवाक्ष्णोर्नसि वक्त्रे गलेंऽसके ।।१५ ।।

सर्वमन्त्रेण सर्वांगे कृत्वा व्यापकमादृतः।
सर्वेष्टसिद्धये ध्यायेत्कार्तवीर्यं जनेश्वरम् ।। १६।।

उद्यद्रर्कसहस्राभं  सर्वभूपतिवन्दितम् ।
दोर्भिः पञ्चाशता दक्षैर्बाणान्वामैर्धनूंषि च।।१७ ।।

दधतं स्वर्णमालाढ्यं  रक्तवस्त्रसमावृतम्।
चक्रावतारं श्रीविष्णोर्ध्यायेदर्जुनभूपतिम् ।१८।


अनुवाद- ७ से १८

इनकी कान्ति (आभा) हजारों उदित सूर्यों के समान है। सन्सार के सभी राजा इनकी वन्दना अर्चना करते हैं। सहस्रबाहु के (500) दक्षिणी हाथों में वाण और (500) उत्तरी (वाम) हाथों में धनुष हैं। ये स्वर्ण मालाधारी तथा रक्वस्त्र (लाल वस्त्र) से समावृत (लिपटे हुए) हैं। ऐसे श्रीविष्णु के चक्रावतार राजा सुदर्शन का ध्यान करें।

• इनका वह मन्त्र उन्नीस अक्षरों का है‌ यह मूल में "श" तक वर्णित है। इसका मन्त्रोद्धार विद्वान जन करें अत: इसका अनुवाद करना भी त्रुटिपूर्ण होगा इस मन्त्र के जनक ऋषि दत्तात्रेय हैं। छन्द अनुष्टुप् और देवाता हैं कार्तवीर्य अर्जुन "बीज" है ध्रुव- तथा शक्ति है हृत् - शेषाढ्य बीज द्वय से हृदय न्यास करें।  शन्तियुक्त- चतुर्थ मन्त्रक्षर से शिरोन्यास इन्द्राढ्यम् से वाम कर्णन्यास अंकुश तथा पद्म से शिखान्यास वाणी से कवचन्यास करें हुँ फट् से अस्त्रन्यास

करें। तथा शेष अक्षरों से पुन: व्यापक न्यास करना चाहिए इसके बाद सर्व सिद्धि हेतु जनेश्वर (लोगों के ईश्वर) कार्तवीर्य का चिन्तन करें।७-१८।

उपर्युक्त दर्शायी गयी पौराणिक घटना के समान तथ्य अन्य पौराणिक ग्रन्थों में भी मिलता है। जैसे-
लक्ष्मीनारायणसंहिता - खण्ड प्रथम (कृतयुगसन्तानः) अध्यायः (४५८ ) में परशुराम और सहस्रबाहू युद्ध का वर्णन इस प्रकार किया गया है। वहाँ से भी इसकी जानकारी ली जा सकती है।


सम्पूर्ण निष्कर्ष - इन तमाम तर्कों एवं सन्दर्भों के आधार पर सिद्ध होता है कि निश्चय ही कार्तवीर्यार्जुन नें परशुराम का वध कर दिया था। किन्तु यह बात कथाकारों को गले से नींचे नहीं उतरी। परिणाम यह हुआ कि कथाकारों नें एक नई कहानी जोड़कर इसके उलट कार्तवीर्यार्जुन का ही वध परशुराम से उसी तरह से करा दिया जिस तरह से भगवान श्रीकृष्ण को एक बहेलिया से करा दिया है। ऐसे झूठे और छद्म कथकारों को परमेश्वर कभी क्षमा नहीं करते।

इस प्रकार से कार्तवीर्यार्जुन की जानकारी के साथ यह भाग समाप्त हुआ। अब इसके अगले भाग-(7) में देवमीढ के बारे में बताया गया है। उसको भी इस भाग के साथ जोड़कर अवश्य पढ़ें।

अध्याय-7 भाग-क (7,8)


(7)- देवमीढ का परिचय-


हृदीक पुत्र- महाराज देवमीढ को जानने से पूर्व संक्षेप में इनके पूर्वजों का जानना होगा तभी पूरी बात समझ में आएगी। देवमीढ के पूर्वज- सात्वत के सात पुत्रों में वृष्णि (द्वितीय) के दो पुत्र- सुमित्र और युद्धाजित हुए। जिसमें युद्धाजित के शिनि और अनमित्र दो पुत्र हुए। फिर अनमित्र के तीन पुत्र- निघ्न, शिनि (द्वितीय) और वृष्णि (तृतीय) हुए। इस तृतीय वृष्णि के भी दो पुत्र- श्वफलक और चित्ररथ हुए।
जिसमें श्वफलक की पत्नी गान्दिनी से अक्रूर जी का जन्म हुआ जो यादवों की सुरक्षा को लेकर सदैव तत्पर रहते थे। उसी क्रम में श्वफलक के भाई चित्ररथ के भी दो पुत्र - पथ और विदुरथ हुए। फिर इस विदुरथ के शूर, हुए। शूर के भजमान (द्वितीय), भजमान (द्वितीय) के शिनि (तृतीय), शिनि (तृतीय) के स्वयमभोज, स्वयमभोज के हृदीक, हृदीक के देवमीढ हुए।

महाराज देवमीढ की तीन पत्नियाँ-

अश्मिका, सतप्रभा और गुणवती थीं। जिसमें देवमीढ की  पत्नी सतप्रभा से एक कन्या- सतवती हुई। पुनः उसी क्रम में अश्मिका से शूरसेन का जन्म हुआ। इस शूरसेन की पत्नी का नाम मारिषा था, जिससे कुल दस पुत्र हुए। उन्हीं दस पुत्रों में धर्मवत्सल वसुदेव जी भी थे। जिसमें वसुदेव जी की बहुत सी पत्नियाँ थीं, किन्तु मुख्य रूप से दो ही पत्नियाँ- देवकी और रोहिणी प्रसिद्ध थीं। जिसमें वसुदेव और देवकी से गोपेश्वर श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। तथा वासुदेव जी की दूसरी पत्नी रोहिणी से बलराम जी का जन्म हुआ।

वहीं दूसरी तरफ देवमीढ की दूसरी पत्नी- गुणवती से- अर्जन्य, पर्जन्य और राजन्य नाम के तीन पुत्र हुए। जिसमें पर्जन्य की पत्नी  का नाम वरियसी था। इसी वरियसी और पर्जन्य से कुल पाँच पुत्र- उपनन्द, अभिनन्द, नन्द (नन्दबाबा), सुनन्द, और नन्दन हुए। पर्जन्य के कुल पाँच पुत्रों में नन्दबाबा अधिक लोकप्रिय थे। नन्दबाबा की पत्नी का नाम यशोदा था। जिससे विन्ध्यवासिनी (योगमाया) अथवा एकानशा नाम की एक अद्भुत कन्या का जन्म हुआ।

विशेष- पारिवारिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो वसुदेव जी और नन्द बाबा एक ही परिवार से थे, जिसमें दोनों के पितामह देवमीढ थे। इस हिसाब से नन्दबाबा और वासुदेव जी आपस के भाई हुए, क्योंकि वसुदेव जी नन्द बाबा के सगे चाचा (सुरसेन) के पुत्र थे।

देवमीढ के बारे में तथा उनके "वंश वृक्ष" को और विस्तार से इस पुस्तक के परिशिष्ट- (9) में बताया गया है। अधिक जानकारी के लिए उस परिशिष्ट को अवश्य पढ़ें।





(8) योगमाया विंध्यवासिनी का परिचय-

योगमाया विंध्यवासिनी स्वयं गोप कुल में नन्द बाबा के यहाँ  जन्म लेने को पूर्वकाल में ही कह चुकीं थीं। इसकी पुष्टि- श्रीमार्कण्डेय पुराण के देवीमाहात्म्य अध्याय- ११ के श्लोक- ४१-४२ से होती है। जिसमें योगमाया कहती हैं कि -

वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते अष्टाविंशतिमे युगे ।
शुम्भो निशुम्भश्चैवान्यावुत्पत्स्येते महासुरौ ॥४१॥

नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा ।
ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी ॥ ४२॥

अनुवाद- ४१-४२

• वैवस्वत मन्वन्तर में अठाईसवां द्वापर युग आने पर शुम्भ और निशुम्भ जैसे दूसरे महासुर उत्पन्न होंगे ।

• तब नन्दगोप के घर में यशोदा के गर्भ से उत्पन्न हो विन्ध्याचल निवासिनी के रूप में उन दोनों का नाश करुँगी।

विशेष- योगमाया को जन्म लेते ही वसुदेव जी अपने नवजात शिशु श्रीकृष्ण को योगमाया के स्थान पर रखकर योगमाया को लेकर कंस के बन्दीगृह में पुनः पहुँच गए। और जब कंस को यह पता चला कि देवकी को आठवीं सन्तान पैदा हो चुकी है तो वह बन्दीगृह में पहुँच कर योगमाया को ही देवकी का आठवाँ पुत्र समझकर पत्थर पर पटक कर मारना चाहा, किन्तु योगमाया उसके हाथ से छुटकर कंस को यह कहते हुए आकाश मार्ग से विन्ध्याचल पर्वत पर चली गईं कि- तुझे मारने वाला पैदा हो चुका है। वही योगमाया विन्ध्याचल पर्वत पर आज भी यादवों की प्रथम कुल देवी के रूप विराजमान है।
       
      इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण भक्त गोपाचार्य हँस श्रीमाता प्रसाद जी कहना है कि- "कुलदेवी या कुल देवता उसी को कहा जाता है जो कुल की रक्षा करते हैं।

योगमाया विन्ध्यवासिनी को श्रीकृष्ण सहित समस्त यादवों की रक्षा करने वाली कुल देवी और श्रीकृष्ण को कुल देवता होने की पुष्टि - हरिवंश पुराण के विष्णुपर्व के अध्याय- ४ के श्लोक- ४६, ४७ और ४८ से होती है। जिसमें लिखा गया है कि -

सा कन्या ववृधे तत्र वृष्णिसंघसुपूजिता ।
पुत्रवत् पाल्यमाना सा वसुदेवाज्ञया तदा।४६ ।

विद्धि चैनामथोत्पन्नामंशाद् देवीं प्रजापतेः ।
एकानंशां योगकन्यां रक्षार्थं केशवस्य तु ।४७ ।

तां वै सर्वे सुमनसः पूजयन्ति स्म यादवाः ।
देववद् दिव्यवपुषा कृष्णः संरक्षितो यया ।४८।


अनुवाद- ४६ से ४८

• वहाँ (विन्ध्याचल पर्वतपर) वृष्णी वंशी यादवों के समुदाय से भली-भाँति पूजित हो वह कन्या बढ़ने लगी। वसुदेव की आज्ञा से उसका पुत्रवत पालन होने लगा।

• इस देवी (विंध्यवासिनी) को प्रजा पलक भगवान विष्णु के अंश से उत्पन्न हुई समझो। वह एक होती हुई अनंंशा (अंश रहित) अर्थात अविभक्त थी, इसीलिए एकानंशा कहलाती थी। योग बल से कन्या रूप में प्रकट हुई वह देवी भगवान श्री कृष्ण की रक्षा के लिए आविर्भूत हुई थी।

• यदुकुल में उत्पन्न सभी लोग उस देवी को आराध्य देव के समान पूजन करते थे, क्योंकि उसने अपनी दिव्यदेह से श्रीकृष्ण की भी रक्षा की थी।


विशेष- तभी से समस्त यादव समाज विंध्यवासिनी योगमाया को प्रथम कुल देवी तथा गोपेश्वर श्रीकृष्ण को कुल देवता मानकर परम्परागत रूप से पूजते हैं। नन्दबाबा को योगमाया विन्ध्यवासिनी के अतिरिक्त एक भी पुत्र नहीं हुआ। इसलिए उनका वंश आगे तक नहीं चल सका। इस लिए किसी को नन्दवंशी यादव कहना उचित नहीं है।


निष्कर्ष- यदि अध्याय (7) के सम्पूर्ण संदर्भों को देखा जाए तो अन्ततोगत्वा यहीं निष्कर्ष निकालाता है कि अहीर (गोप) जाती के अन्तर्गत यादव वंश में महाराज देवमीढ का जन्म हुआ था। और देवमीढ के एक पुत्र- पर्जन्य से नन्द बाबा का जन्म हुआ। वहीं दूसरी तरफ देवमीढ के दूसरे पुत्र- शूरसेन का जन्म हुआ। इसी सुरसेन से वसुदेव जी का जन्म हुआ था। अतः पारिवारिक रिश्तों के आधार पर नन्द बाबा और वसुदेव जी आपस के भाई हुए  क्योंकि वसुदेव जी नन्द बाबा के सगे चाचा (सुरसेन) के पुत्र थे।
इतना नजदीकी पारिवारिक रिश्ता होने के बाद भी कुछ अज्ञानी तथा धुर्थ कथा वाचक नन्द बाबा और वसुदेव जी को अलग अलग बताकर ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था में वर्ण भेद करते हुए नन्द बाबा को वैष्य तथा वसुदेव जी को क्षत्रिय बता कर यादवों में विघटन पैदा करने के भरसक प्रयास करते हैं जो बिल्कुल ही असम्भव, निराधार और तर्कहीन है।

(ख)- ऐतिहासिक यादव राजा-

इस भाग का मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित ऐतिहासिक यादव राजाओं के बारे में जानकारी देना है-

(1)- वीर अहीर लोरिक
(2)- आल्हा-ऊदल
(3)- अहीर देवायत बोदर
(4)- देवगिरी के यादव राजा-
(A)- भिल्लम पंचम (B)- सिंघण द्वितीय (C)- रामचंद्र यादव इत्यादि।

(5)- विजयनगर के यादव राजा-
(A) हरिहर एवं बुक्का
(B)- कृष्णदेवराय

(6)- दक्कन के अहीर राजा-  ईश्वरसेन अहीर
(7)- वाडियार के यादव राजा- देवराज वाडियार




(1)- वीर अहीर लोरिक

वीर अहीर लोरिक- 5वीं-6वीं शताब्दी के एक महान अहीर योद्धा थे, जो अपनी अदम्य शक्ति और वीरता के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी वीरगाथा 'लोरिकायन' के रूप में भोजपुरी लोकगीतों और उत्तर प्रदेश व बिहार की लोक संस्कृति में आज भी जीवंत है। अहीर समाज में लोरिकायन को 'अहीरों की रामायण' कहा जाता है।
लोरिक का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के सिकंदरपुर तहसील के गौरा गाँव में एक अहीर परिवार में हुआ था।
अपार शक्ति: लोककथाओं के अनुसार, वीर लोरिक की विशाल तलवार का नाम बिजुली था, जो लगभग 3400 किलो की थी। लोरिक के गुरु अजयी धोबी थे जो कुस्ती के हर दांव पेंच में पारंगत थे।

लोरिकायन के अनुसार वीर लोरिक की वीरता से प्रभावित होकर महर नाम के एक अहीर ने अपनी पुत्री मंजरी (चन्दा) का विवाह लोरिक से तय (निश्चित) कर दिया। इस बात की जानकारी जब अगोरी (वर्तमान नाम सोनभद्र) के राजा मोलागत को हुई तो वह मंजरी से जबरन विवाह करने लिए बाध्य करने लगा। राजा से परेशान होकर मंजरी के पिता महर ने लोरिक से जाकर अपनी सारी व्यथा कह सुनाई। मंजरी के पिता की दुःख भरी बातों को सुनकर वीर लोरिक क्रोध से तिलमिला उठा और अपने वीर जांबाज अहिर सेना को लेकर अपनी प्रेयसी मंजरी को लेने निकल पड़ा। उधर राजा मोलागत भी अपने किला की सुरक्षा के लिए सैनिकों के साथ सोन नदी के तट पर आ डटा। फिर तो दोनों पक्षों में भयानक युद्ध होने लगा। यह युद्ध इतना भयानक था कि युद्ध भूमि पर खून की धारा बहने लगी। उस खून की धारा को आज भी रूधिरा नाला के नाम से जाना जाता है। अन्ततोगत्वा राजा मोलागत युद्ध भूमि में मारा गया। इसके बाद लोरिक अपनी प्रेयसी मंजरी को प्रेम पूर्वक लेकर सोनभद्र की पहाड़ियों के बीच से निकल ही रहा था कि अचानक एक घटना घटी। मंजरी अचानक रुकी और लोरिक से प्रेम पूर्वक बोली- "हे वीर ! आप मेरे मायके (नैहर) के इस क्षेत्र में कुछ ऐसा कीजिए कि आपकी वीरता और अदम्य साहस को लोग युगों युगों तक याद करते रहें तथा हम दोनों का यह प्रेम विवाह अमिट निशानी बन जाय। वीर लोरिक मंजरी की तरफ देखा और मुस्कराते हुए कहा- प्रिये! बताओ मैं ऐसा क्या करूँ ? इस पर मंजरी बोली हे मेरे स्वामी ! आप इस विशाल पर्वत की चट्टान को अपनी तलवार से एक ही बार में दो टुकडा़ कर दीजिए और तुरन्त इसके लाल चूर्ण से मेरी मांग भरिये। वीर लोरिक अपनी प्रेयसी की बात सुनकर तुरन्त अपनी तलवार से सामने पड़ी उस विशाल पर्वत की चट्टान को पलक भजते ही एक ही बार में दो टुकड़ा कर दिया।
तत्पश्चात अपनी कुल देवी विंध्यवासिनी को साक्षी मानकर उस पत्थर के लाल चूर्ण को सिंदूर मानकर अपनी प्रेयसी मंजरी की मांग भर दी और मंजरी के साथ अपने गौरा गाँव को प्रस्थान किया।


वीर लोरिक का ऐतिहासिक कालक्रम-
ऐतिहासिक विद्वानों ने लोरिक के समय को अलग-अलग कालखण्डों से जोड़ा है जैसे-
डॉ. भोला शंकर व्यास ने वीर लोरिक को गुप्त कालीन  (5वीं-6वीं शताब्दी) का माना है।
वहीं दूसरी तरफ डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी के ऐतिहासिक उपन्यास 'पुनर्नवा' के आधार पर लोरिक को सम्राट समुद्रगुप्त (335–380 ईस्वी) का समकालीन बताया है।कुछ गाथाओं के अनुसार, वे समुद्रगुप्त के सेनापति भी थे।
डॉ. रामकुमार वर्मा ने अपनी पुस्तक 'हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास' में उन्हें राजा भोज के समकालीन 10वीं-11वीं शताब्दी का माना है।


पुरातात्विक साक्ष्य-

सोनभद्र में जिस पत्थर को वीर लोरिक ने दो टुकडो़ में विभाजित कर दिया था वह आज भी पुरातात्विक साक्ष्य के रूप में सोनभद्र के मारकुण्डी पहाड़ी पर स्थित है।


साहित्यिक साक्ष्य-
लोरिकायन वीर लोरिक की गाथा को पहली बार 1379 ईस्वी में सूफी कवि मुल्ला दाऊद ने 'चन्दायन' (या लोरिकायन) के नाम से लिखा था। यह इस बात को प्रमाणित करती है कि 14 वीं शताब्दी तक लोरिक की कथा ऐतिहासिक महाकाव्य बन चुकी थी। जो उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में अहीरों की रामायण के रूप में प्रसिद्ध है।





(2)- आल्हा-ऊदल-

आल्हा और ऊदल 12वीं सदी के बुन्देलखण्ड के दो महान योद्धा थे। जिनकी वीरता की गाथाएँ आज भी उत्तर भारत में बड़े प्रेम से गाई जाती हैं। इनके बारे में मुख्य बातें निम्नलिखित हैं-

ऐतिहासिक परिचय-

आल्हा और ऊदल महोबा के चंदेल राजा परमाल के सेनापति दशराज के पुत्र थे, जो बनाफरी अहीर थे। क्योंकि लोक कथाओं और ऐतिहासिक तथा पौराणिक ग्रन्थों में उन्हें अहीर कहा गया है। इसके लिए निम्नलिखित साक्ष्य प्रस्तुत हैं -

1. भविष्य पुराण-
भविष्य पुराण (प्रतिसर्ग पर्व, खण्ड 2) के अनुसार, आल्हा और ऊदल की माता देवकी (या देवला) अहीर जाति से थीं।
ग्रन्थ में उल्लेख है कि उनके नाना, ग्वालियर के राजा दलपत सिंह, अहीर (आभीर) समुदाय के थे।
इसी पुराण के अनुसार, आल्हा के पिता दशराज को भी कुछ स्थानों पर अहीर पृष्ठभूमि से जोड़ा गया है और उनकी दादी भी बक्सर के एक अहीर परिवार से थीं।

एतस्मिन्नन्तरे विप्र यथा जातं शृणुष्व तत् ।।
आभीरी वाक्सरे ग्रामे व्रतपा नाम विश्रुता ।।२२।।

अनुवाद- इसके उपरान्त हे ब्राह्मण जो हुआ वह सुन ! बक्सर (आधुनिक बिहार का एक जिला) नामक गाँव में एक व्रतपा नामकी अहीराणी प्रसिद्ध थी।२२।

नवदुर्गाव्रतं श्रेष्ठं ? नववर्षं चकार ह ।।
प्रसन्ना चण्डिका प्राह वरं वरय शोभने ।।२३ ।।

अनुवाद- उसने नवदुर्गा का व्रत नौ वर्ष तक किया तत्पश्चात प्रसन्न हो कर देवी दुर्गा ने उससे कहा हे प्रिया ! वरदान माँग ।२३।

साह तां यदि मे मातर्वरो देयस्त्वयेश्वरि।।
रामकृष्णसमौ बालौ भवेयाः ममान्वये।।२४ ।।

अनुवाद- तब व्रतपा ने कहा ! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो हे देवी बलराम और कृष्ण के समान दो पुत्र मेरे वंश में उत्पन्न हों ।२४।

तथेत्युक्त्वा तु सा देवी तत्रैवान्तरधीयत।।
वसुमान्नाम नृपतिस्तस्या रूपेण मोहितः।।२५।।

अनुवाद - ऐसा ही हो कहकर वह देवी अन्तर्ध्यान हो गयी  वसुमान नामक राजा ने उस व्रतपा के रूप पर मोहित होकर उसके साथ विवाह किया।२५।

उद्वाह्य धर्मतो भूपः स्वगेहे तामवासयत् ।।
तस्यां जातौ नृपात्पुत्रौ देशराजस्तु तद्वरः।२६।।

अनुवाद:-विवाह कर धर्म पूर्वक वह राजा उसे अपने घर ले जाकर प्रसन्नता पूर्वक रहने लगा। उस व्रतपा के गर्भ से उस वसुमान राजा के दो श्रेष्ठ पुत्र देशराज और वत्सराज हुए  ।२६।

आवार्य वत्सराजश्च शतहस्तिसमो बले ।।
जित्वा तौ मागधान्देशान्राज्यवन्तौ बभूवतुः।२७।।

अनुवाद- उन दोनों ( व्रतपा और वसुमान) उत्पन्न हुए उन दोनों नें  मगध( पश्चिमी बिहार) को जीतकर उसपर शासन किया ।२७।

इति श्रीभविष्ये महापुराणे प्रतिसर्गपर्वणि चतुर्युगखण्डापरपर्याये कलियुगीयेतिहासमुच्चये चतुर्थोऽध्यायः।।४।।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI)- अलेक्जेंडर कनिंघम और एच.बी.डब्ल्यू. गैरिक द्वारा 1881 में लिखी गई रिपोर्ट (Report of a Tour through Bihar, Central India, etc.) में आल्हा और ऊदल को "अहीर सरदार" के रूप में वर्णित किया गया है। तथा ब्रिटिश राजपत्रों और जनगणना रिपोर्टों में उनको बनाफर वंशी अहीर जाती का माना गया है।


साहित्यिक साक्ष्य-

कवि जगनिक द्वारा रचित 'आल्हा-खंड' (या परमाल रासो) में उनकी वीरता का सजीव वर्णन मिलता है। जिसे अहीर समाज सदियों से आल्हा खण्ड का गायन करता आ रहा है और उन्हें अपना पूर्वज मानता है। पुरानी प्रतियों में ऊदल के चचेरे भाई मलखान सिंह को "आभीर कुंवर" या "यादव राय" कहकर सम्बोधित किया गया है। आल्हा खण्ड की गणना दुनिया के सबसे लम्बे युद्ध-काव्यों में की जाती है, जिसको आज भी उत्तर भारत में बड़े चाव से गाया जाती हैं। जिसे सुनकर लोगों में जोश भर जाता है।



(3)- अहीर देवायत बोदर-


अहीर देवायत बोदर गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के एक महान अहीर (यादव) योद्धा थे। उन्हें उनकी अदम्य वीरता, त्याग और शरणागत की रक्षा के लिए जाना जाता है। एक समय की बात है- रा' नवघन की रक्षा: जब पाटन के सोलंकी राजा दुर्लभराज ने जूनागढ़ पर आक्रमण कर राजा रा' दियास की हत्या कर दी, तब रानी ने अपने छोटे पुत्र रा' नवघन को सुरक्षित रखने के लिए देवायत बोदर को यह कहते हुए सौंप दिया की आप इस बच्चे को पुत्र की तरह पालन करना। देवायत बोदर ने वैसा ही किया और नवघन को अपने पुत्र की तरह पाला।
किन्तु जब सोलंकी राजा को भनक लगी कि नवघन जीवित है, तो उसने देवायत बोदर की परीक्षा ली। उस समय अपने वचन और शरणागत की रक्षा के लिए देवायत बोदर ने अपने सगे पुत्र उगा (वासना) का बलिदान दे दिया ताकि दुश्मन को लगे कि नवघन मारा गया है। उनकी पत्नी सोनल ने भी इस कठिन परीक्षा में साहस दिखाया।
कुछ समय बाद देवायत बोदर ने अहीर सेना को संगठित किया और सोलंकी राजा को पराजित कर रा' नवघन को जूनागढ़ के सिंहासन पर बिठाया। उनके इसी त्याग के कारण गुजरात में "अहीर नो आसरो"  कहावत प्रसिद्ध हुई, जिसका अर्थ है कि विपत्ति के समय अहीर की शरण सबसे सुरक्षित होती है।

(4)- देवगिरी के यादव राजा

देवगिरी के निम्नलिखित तीन प्रमुख यादव राजा थे-
(A)- भिल्लम पञ्चम (B)- जैतुगी (जैत्रपाल) (C)- सिंघण द्वितीय और (D)- रामचन्द्र यादव। इन तीनों प्रमुख यादव राजाओं के बारे में विस्तार से जानकारी देना ही इस भाग का मुख्य उद्देश्य है।

(A)- भिल्लम पंचम


इतिहास के पन्नों में यादवों की प्रथम कीर्तिमान स्थापित करने का श्रेय भिल्लम पञ्चम को ही दिया जाता है। इनका शासनकाल- 1175–1191 ई० तक तक माना जाता है। भिल्लम पंचम दक्षिण भारत के सेउना (यादव) राजवंश के प्रथम स्वतंत्र और सम्प्रभु सम्पन्न शासक थे। भिल्लम पंचम के बारे में निम्नलिखित ऐतिहासिक तथ्य प्रस्तुत हैं-
(क) भिल्लम पञ्चम ने सबसे पहले कल्याणी के चालुक्यों की अधीनता को त्याग कर 1187 ई. के आसपास एक स्वतंत्र यादव साम्राज्य की नींव रखी।

(ख) भिल्लम पञ्चम ही एक ऐसा यादव राजा हुआ जिसने देवगिरि (वर्तमान महाराष्ट्र का दौलताबाद) शहर बसाया और उसे अपनी राजधानी बनाया तथा प्रसिद्ध देवगिरि किले के निर्माण किया। निर्माण: भिल्लम पञ्चम ने 1187 ई. में इस किले का निर्माण 1187 ई० में एक ऊंची पहाड़ीयों पर करवाया था जो अपनी जटिल रक्षा प्रणाली के लिए प्रसिद्ध है। जिसमें अभेद्य तीन सुरक्षा दीवारें (कोट), गहरी खाइयाँ और 'अन्धेरी गुफा (एक भूलभुलैया जैसा अन्धेरा रास्ता) आज भी प्रसिद्ध हैं। यह किला अभेद्य कवच के समान था जिसको तोड़ पाना दुश्मन के लिए असम्भव था।

(ग) भिल्लम पञ्चम गुजरात के चालुक्यों, मालवा के परमारों और दक्षिण के होयसल राजाओं के खिलाफ कई सफल अभियान चलाए। 1189 ई. में सोरातुर के युद्ध में उन्होंने होयसल राजा बल्लाल द्वितीय को हराया था। उसके इसी ऐतिहासिक अभियान के उपरान्त शिलालेखों में 'चक्रवर्ती यादव' के नाम से सम्बोधित किया गया है।

विशेष- भिल्लम पञ्चम वैज्ञानिकों, कवियों और विद्वानों का विशेष आदर करते थे। इनके ही यादव साम्राज्य में प्रसिद्ध गणितज्ञ नागार्जुन के गुरु भास्कर फले फूले थे। देवगिरी के यादव राजवंश में और भी महत्वपूर्ण राजा हुए। जिनके बारे में क्रमशः नीचे बताया गया है।


(B)जैतुगी (जैत्रपाल)-
जैतुगी जिन्हें जैत्रपाल नाम से भी जाना जाता है। ये अपने पिता भिल्लम पञ्चम के उत्तराधिकारी थे। इन्होंने होयसलों और काकतीयों को हराकर साम्राज्य को और सुदृढ़ किया।




(C)- सिंघण द्वितीय

सिंघण द्वितीय के पिता का नाम जैतुगी (जैतुगीदेव प्रथम) था। तथा इनकी माता का नाम भागीरथीबाई था। सिंघण द्वितीय देवगिरी के यादव राजवंश का सबसे प्रतापी और शक्तिशाली शासक थे। इनका कार्यकाल- 1210–1247 ई. तक माना जाता है। सिंघण द्वितीय का साम्राज्य विस्तार नर्मदा नदी से तुंगभद्रा नदी तक था। इनके ही दरबार में दरबार में प्रसिद्ध संगीतज्ञ शार्ङ्गदेव रहा करते थे, जिन्होंने 'संगीत रत्नाकर' जैसी महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना किया जो भारतीय शास्त्रीय संगीत का महत्वपूर्ण ग्रन्थ माना जाता है।



(D)- रामचन्द्र यादव


देवगिरी के यादव राजा रामचन्द्र यादव जिनका दूसरा नाम रामदेव था। ये देवगिरी के यादव सम्राट कृष्ण के पुत्र थे। पिता कृष्ण की मृत्यु के समय रामचन्द्र बहुत छोटे थे, इसलिए उनके चाचा महादेव सिंहासन पर बैठे। महादेव के बाद जब उनके पुत्र यानी रामचन्द्र के चचेरे भाई अम्माना राजा बने। किन्तु कुछ ही समयं बाद रामचन्द्र ने तख्तापलट कर 1271 ई. मे देवगिरी का राजा हुए। रामचन्द्र यादव देवगिरि के अन्तिम महान यादव राजा थे। इनका शासनकाल- 1271–1311 ई. तक माना जाता है।

इनके ही शासनकाल 1296 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने देवगिरि पर आक्रमण किया, जो दक्षिण भारत पर दिल्ली सल्तनत का पहला सफल अभियान था। अलाउद्दीन खिलजी के देवगिरि पर आक्रमणों से दक्षिण भारत में दिल्ली सल्तनत का विस्तार हुआ तथा यादव साम्राज्य का अन्त हुआ। अलाउद्दीन खिलजी यादवों की अपार सम्पत्तियों को लूटा और मलिक काफूर के नेतृत्व में दक्कन पर वर्चस्व स्थापित किया। राजा रामचन्द्र देव के अधीनता स्वीकार करने से दक्षिण का द्वार खुल गया और यादव राजधानी देवगिरि जो बाद में दौलताबाद दिल्ली का प्रमुख केंद्र बनी।
कुछ समय पश्चात 1327 ई. में मुहम्मद बिन तुगलक ने पुनः देवगिरि को दिल्ली के स्थान पर अपनी राजधानी बनाया और इसका नाम बदलकर दौलताबाद ('धन का शहर') रख दिया। वर्तमान में महाराष्ट्र सरकार ने दौलताबाद किले का नाम बदलकर पुनः 'देवगिरी' करने का निर्णय लिया है।
विशेष- देवगिरी के यादव काल में मराठी साहित्य और संस्कृत को विशेष प्रोत्साहन मिला। संत ज्ञानेश्वर और नामदेव के समय भक्ति आन्दोलन का उदय देवगिरी यादव शासकों के संरक्षण में हुआ। अब हमलोग इसी क्रम में विजयनगर के प्रमुख यादव राजाआओं के बारे में जानेंगे।



(5)- विजयनगर के यादव राजा-

इतिहास के पन्नों में जिस तरह से देवगिरी के यादव राजाओं का वर्णन मिलता है उसी तरह से विजयनगर के यादव राजाओं का भी वर्णन मिलता है। जिसे इतिहास में संगम वंश या संगम काल के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि विजयनगर साम्राज्य  (संगम वंश) की स्थापना 1336 में हरिहर और बुक्का ने की थी, जो भावना संगम के पुत्र थे, इसलिए इसे संगम वंश कहा गया। विजयनगर साम्राज्य का इतिहास यादव संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भों के अनुसार, इसके संस्थापक और सबसे महान शासक स्वयं को यादव कुल का मानते थे। शिलालेखों और साहित्यिक साक्ष्यों जैसे- कृष्णदेव राय की (अमुक्तमाल्यदा) के अनुसार- ये शासक खुद को यादव कुरुबा (अहीर) समुदाय से जुड़ा बताते थे। कुछ इतिहासकार इन्हें मूल रूप से कर्नाटक का कुरुबा (अहीर जाती) के यादव मानते हैं। ये लोग उस समय अपने नाम के आगे राय और यादव टाईटिल लगाते थे, जो आज भी भारत के अनेकों प्रान्तों में अहीर जाती के लोग राव और यादव टाईटिल लगाते हैं। विजयनगर के प्रमुख यादव राजाओं का वर्णन निम्नलिखित हैं-




(A) हरिहर एवं बुक्का


हरिहर प्रथम-

हरिहर प्रथम ने ही होयसल 1336 ई.में होयसल राज्य को जीतकर संगम साम्राज्य की नींव रखी और हम्पी को अपनी शक्ति का केंद्र बनाया। इन्होंने 1377–1404 ई. में 'महाराजाधिराज' की उपाधि धारण की और साम्राज्य का विस्तार गोवा से बेलगाम तक किया।

बुक्का प्रथम-
बुक्का प्रथम हरिहर प्रथम के सगे भाई थे। दोनों भाइयों की युगल जोड़ी ने मदुरै सल्तनत का अन्त किया और दक्षिण भारत में हिंदू धर्म का संरक्षण किया। चूँकि दोनों भाई कोई भी कार्य एक साथ मिलकर करते थे इसलिए इतिहास में इन दोनों का नाम एक दूसरे के साथ ही लिया जाता है। बुक्का अपने साम्राज्य का खूब विस्तार किया और 'वेद मार्ग प्रतिस्थापक' की उपाधि धारण की।

हरिहर द्वितीय-

संगम वंश के प्रसिद्ध शासक बुक्का प्रथम के पुत्र हरिहर द्वितीय थे। इनकी माता का नाम गौराम्बिका था। 1377 ईस्वी में अपने पिता बुक्का प्रथम की मृत्यु के बाद वे सिंहासन पर बैठे। इनका शासन काल 1377–1404 ई. तक रहा। हरिहर द्वितीय पहले ऐसे विजयनगर के शासक थे जिन्होंने 'महाराजाधिराज' और 'राजपरमेश्वर' जैसी भव्य उपाधियाँ धारण की थीं।

देवराय प्रथम-

विजयनगर साम्राज्य के देवराय प्रथम संगम वंश के सम्राट हरिहर द्वितीय के पुत्र थे। 1404 ईस्वी में हरिहर द्वितीय की मृत्यु के बाद उनके पुत्रों के बीच सत्ता के लिए संघर्ष हुआ, जिसमें अंततोगत्वा देवराय प्रथम विजयी हुए। इनके शासन काल में शासनकाल में प्रसिद्ध इतालवी यात्री निकोलो कोंटी विजयनगर आया था। देवराय प्रथम ने तुंगभद्रा नदी पर विशाल बांध बनवाया। इन्हें 'इम्मादि देवराय' और 'गजबेटकर' (हाथियों का शिकार करने वाला) भी कहा जाता था।


देवराय द्वितीय-

देव राय द्वितीय संगम वंश के सबसे महान शासक थे और संगम वंश के सबसे शक्तिशाली राजा थे। इन्होंने अपनी सेना का विस्तार किया तथा सेना को अत्याधुनिक बनाया और विदेशी व्यापार को खूब बढ़ावा दिया। देवराय द्वितीय के सेनापति लक्कन दंडेश ने 15वीं शताब्दी में विरुपाक्ष मन्दिर का निर्माण कराया जो हम्पी का सबसे पवित्र और प्राचीन मन्दिर है, जो भगवान शिव को समर्पित है। इसका 50 मीटर ऊँचा गोपुरम (प्रवेश द्वार) इसकी भव्यता का प्रतीक है। बाद में कृष्णदेवराय ने 1510 ई. को मन्दिर में केंद्रीय स्तम्भों वाला हॉल और पूर्वी गोपुरम (गेटवे) का निर्माण करवाया था। देवराय द्वितीय के समय 1443 में अब्दुल रज्जाक ईरानी यात्री आया था। जिसने विजय नगर के बारे में कहा कि-"दुनिया में विजयनगर जैसी सुन्दर जगह न तो आँखों द्वारा देखी गई और न ही कानों द्वारा सुनी गई।"


मल्लिकार्जुन राय

मल्लिकार्जुन राय सम्राट देवराय द्वितीय के पुत्र थे। इनको 'प्रौढ़ देवराय' के नाम से भी जाना जाता है। ये अपने पिता देवराय द्वितीय की मृत्यु के बाद सिंहासन संभाला, जिनका शासनकाल को विजयनगर का स्वर्ण युग माना जाता है। इनका शासन काल 1446–1465 ईस्वी तक रहा। इनके शासनकाल में बहमनी सुल्तानों और ओडिशा के गजपति शासकों के आक्रमणों का सामना करना पड़ा, जिससे विजयनगर की शक्ति धीरे-धीरे कम होने लगी। मल्लिकार्जुन के बाद उनके भतीजे (या भाई) विरुपाक्ष राय द्वितीय शासक बने। विरूपाक्ष राय द्वितीय संगम वंश के अंतिम शासक थे, जिनकी हत्या के बाद सालुव वंश की स्थापना हुई।
हम्पी और तिरुपति के शिलालेखों में प्रसिद्ध राजा कृष्णदेवराय को तुलुव वंशीय यादव रत्न के रूप में वर्णन किया गया है।


कृष्णदेव राय

कृष्णदेवराय विजयनगर के सबसे प्रतापी राजा थे।  हम्पी और तिरुपति के शिलालेखों में तुलुव वंशीय कृष्णदेवराय को यादव रत्न के रूप में वर्णन किया गया है। कई ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विवरणों में उन्हें यदुवंश का गौरव बताया गया है। सम्राट कृष्णदेव राय ने ओडिशा के गजपति शासक प्रतापरुद्र देव को हराकर उदयगिरि और कोंडाविदु के किलों पर अधिकार किया तथा बीजापुर के सुल्तान इस्माइल आदिल शाह को निर्णायक रूप से हराकर रायचूर दोआब पर कब्जा किया। उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारियों के अनुसार, उनकी वंशावली भी यादव परम्पराओं से जुड़ी मानी जाती है। उनके शासनकाल को दक्षिण भारत का 'स्वर्ण युग' कहा जाता है। कृष्णदेव राय कला, साहित्य और वास्तुकला के महान संरक्षक थे। इन्होंने ही प्रसिद्ध विट्ठल मन्दिर का निर्माण कराया जो 56 संगीतमय स्तम्भों' और प्रसिद्ध शिला-रथ के लिए जाना जाता है। इसके स्तम्भों को थपथपाने पर विभिन्न वाद्ययन्त्रों की ध्वनियाँ निकलती हैं। इसके अलावा कृष्ण देव ने हजारा राम मन्दिर का निर्माण कराया था जो राजा का निजी मन्दिर था, जिसकी दीवारों पर रामायण के प्रसंगों को पत्थर पर उकेरा गया है।  कृष्णदेव राय ने स्वयं 'अमुक्तमाल्यद' नामक महान ग्रन्थ की रचना की थी। इनके दरबार में 'अष्टदिग्गज' (आठ महान कवि) रहते थे, जिनमें तेनालीराम सबसे प्रसिद्ध थे।इनका शासन काल 1509–1529 ई० तक रहा।


विजय नगर साम्राज्य का अन्त

विजय नगर साम्राज्य के पतन का कारण तालीकोटा युद्ध  को माना जाता है। जो 23 जनवरी 1565 ई० को हुआ था। यह युद्ध विजयनगर साम्राज्य के लिए निर्णायक और विनाशकारी साबित हुआ।

तालीकोटा युद्ध होने का कारण-

तालीकोटा युद्ध होने का मुख्य कारण बताया जाता है कि - राम राय सल्तनतों को आपस में लड़ाने की हमेशा कूटनीतिक चालें चलते थे। जिसका परिणाम यह हुआ कि एक दिन उनकी ही चाल उन्हीं पर भारी पड़ी। जिसका परिणाम यह हुआ कि चारों सल्तनतें विजयनगर के खिलाफ एकजुट होकर ताकोटा युद्ध किया। इसे राक्षसी-तांगड़ी या बनीहट्टी का युद्ध भी कहा जाता है। जिसमें विजयनगर की तरफ से आलिया राम राय (यादव) नेतृत्व कर रहे थे और दूसरी तरफ दक्कन की चार सल्तनत- बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुंडा और बीदर का संयुक्त गठबन्धन था।

युद्ध परिणाम-

युद्ध के दौरान विजयनगर की सेना के दो मुस्लिम कमाण्डरों गिलानी बन्धु ने अन्तिम समय में पाला बदल लिया और राम राय के साथ विश्वासघात किया। राम राय पकड़े गए और उनकी हत्या कर दी गई। अन्ततोगत्वा युद्ध का परिणाम यह हुआ कि विजयनगर की राजधानी हम्पी को छह महीनों तक बेरहमी से लूटा गया और और उसे नष्ट कर दिया गया। इसके साथ ही दक्षिण भारत में हिन्दू राजनीतिक प्रभुत्व का पतन शुरू हो गया। विजयनगर साम्राज्य का अवशेष अरविडु वंश के तहत पेनुकोंडा से कुछ समय तक चलता रहा किन्तु वह पहले जैसा शक्तिशाली कभी नहीं हो सका।
विजयनगर का पतन भारतीय इतिहास की एक दुखद घटना मानी जाती है जिसमें यादवों की उन्नत सभ्यता और उच्च कोटि का संस्कृतिक केंद्र सदा सदा के लिए खण्डहरों में बदल गया।



(6)- दक्कन के अहीर राजा-

पुराणों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, दक्कन साम्राज्य में लगभग 10 अहीर राजाओं ने शासन किया। जिसमें मुख्य रूप पर से ईश्वरसेन अहीर थे।


राजा ईश्वरसेन अहीर

दक्कन साम्राज्य के राजा ईश्वरसेन, आभीर शिवदत्त के पुत्र थे। उन्होंने तीसरी शताब्दी (लगभग 248-249 AD) में दक्कन में एक स्वतन्त्र आभीर साम्राज्य की नींव रखी। जिनको 'राजन' और 'महाक्षत्रप' जैसी प्रतिष्ठित उपाधियां को धारण किया। राजा ईश्वरसेन ने अपने राज्याभिषेक की स्मृति में एक नए संवत की शुरुआत की, जिसे बाद में 'कलचुरी-चेदी संवत' के नाम से जाना गया। जिसे चेदि संवत या हैहय संवत भी कहा जाता है प्राचीन भारत की एक महत्वपूर्ण काल-गणना पद्धति है। जर्मन विद्वान एफ. कीलहॉर्न के अनुसार, यह संभवतः सितंबर 248 ईस्वी के आश्विन महीने से शुरू हुआ था। शुरुआत में इसे "आभीर संवत" कहा जाता था, लेकिन बाद में कलचुरी शासकों द्वारा व्यापक रूप से उपयोग किए जाने के कारण इसका नाम कलचुरी संवत पड़ा। इस संवत का उपयोग 5वीं शताब्दी से लेकर 13वीं शताब्दी ईस्वी तक के शिलालेखों और ताम्रपत्रों में मिलता है। इसे त्रैकूटक, कलचुरी और गुर्जर-प्रतिहार जैसे राजवंशों ने अपने अभिलेखों में अपनाया था।



साम्राज्य का विस्तार-

दक्कन के अहीर राजाओं ने सातवाहनों के पतन के बाद पश्चिमी भारत के एक बड़े भूभाग पर शासन किया। उनके साम्राज्य में आधुनिक महाराष्ट्र, कोंकण, गुजरात (सौराष्ट्र), खानदेश और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्से शामिल थे। ऐतिहासिक शिलालेखों के अनुसारन नासिक और उसके आसपास का क्षेत्र उनके शासन का मुख्य केंद्र था। राजा ईश्वरसेन के शिलालेखों से पता चलता है कि वे उदार शासक थे। उन्होंने बौद्ध भिक्षुओं के इलाज के लिए औषधियों हेतु व्यापारिक श्रेणियों में धन निवेश किया था।

दक्कन के अहीर राजाओं का असीरगढ़ का किला प्रसिद्ध है। जिसका निर्माण राजा आशा अहीर  द्वारा करवाया गया था, जो इसी परंपरा के एक शक्तिशाली शासक माने जाते हैं।राजा आशा अहीर असीरगढ़ के शासक थे जिनका इतिहास मध्यकालीन भारत से जुड़ा है। दक्कन के अहीर राजा स्वयं को पौराणिक यदुवंशी क्षत्रिय और भगवान कृष्ण के वंशज मानते थे।

मन्दिरों का निर्माण

कलचुरी शासक मुख्यतः शैव धर्म (भगवान शिव के उपासक) के अनुयायी थे, इसलिए उनके द्वारा निर्मित अधिकांश मन्दिर शिव को समर्पित हैं

चौसठ योगिनी मन्दिर- यह भेड़ाघाट जबलपुर का मन्दिर है, इसका निर्माण 10वीं-11वीं शताब्दी में राजा युवराज देव ने करवाया था। यह एक गोलाकार मन्दिर है जिसमें योगिनियों की सुन्दर मूर्तियाँ हैं।


अमरकंटक मन्दिर समूह-  ये सभी मन्दिर नर्मदा नदी के उद्गम स्थल पर स्थित कलचुरी स्थापत्य के बेहतरीन उदाहरण हैं, जिन्हें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित किया गया है।


महामाया मन्दिर- यह मन्दिर रतनपुर में स्थित है जिसक निर्माण राजा रत्नदेव प्रथम ने  कराया। यह मन्दिर छत्तीसगढ़ के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है।


विष्णु वराह मन्दिर- इस मन्दिर का निर्माण राजा लक्ष्मणराज द्वितीय के मंत्री सोमेश्वर ने कराया था। इस मन्दिर में विष्णु के वराह अवतार को दर्शाया गया है।

(7)- वाडियार के यादव राजा-


वाडियार के यादव राजवंश की उत्पत्ति-

राजा वाडियार प्रथम (1578-1617) ने ही इस वंश को एक स्वतन्त्र और शक्तिशाली पहचान दिलाई थी। उन्होंने ही मैसूर की राजधानी को श्रीरंगपट्टनम स्थानांतरित किया और विजयनगर के पतन के बाद अपनी सम्प्रभुता घोषित की।

कुछ लोगों का मानना है वाडियार के यादव राजवंश की उत्पत्ति- 1399 ईस्वी में उस समय हुई जब द्वारका (गुजरात) के दो यादव राजकुमार, यदुराय और कृष्णराय, दक्षिण भारत की तीर्थयात्रा पर निकले थे। जब वे मैसूर पहुंचे, तो उन्होंने पाया कि वहाँ की रानी मुसीबत में है। यदुराय ने शत्रुओं को पराजित कर राज्य की रक्षा की और यहीं से वाडियार के यादव राजवंश की नींव पड़ी। वाडियार राजवंश अपनी वंशावली को भगवान श्रीकृष्ण से जोड़ते हैं जो मूलतः द्वारका के निवासी हैं।
वाडियार राजवंश के साथ एक रहस्यमयी शाप की कहानी भी जुड़ी है। कहा जाता है कि राजा वाडियार प्रथम के समय, अलमेलम्मा नाम की एक महिला ने शाप दिया था कि इस वंश के राजाओं को प्राकृतिक उत्तराधिकारी (सन्तान) नहीं मिलेगी। आश्चर्य की बात है कि लगभग 400 वर्षों तक वाडियार राजाओं को अक्सर गोद लिए हुए पुत्रों को ही उत्तराधिकारी बनाना पड़ा।

वाडियार राजवंश आभीर जाति के शासकों द्वारा शासित एक भारतीय हिन्दू राजवंश था जिसने 1399 से 1947 तक मैसूर राज्य पर शासन किया। ब्रिटिश शासन से स्वतन्त्रता के बाद इस राज्य को भारत के डोमिनियन में शामिल कर लिया गया। कन्नड़ में, "वडियार" शब्द का अर्थ "स्वामी" होता है। मैसूर के वाडियार यादव राजवंश के प्रसिद्ध शासकों में चिक्का देवराज वाडियार का नाम सबसे प्रमुखता से लिया जाता है, जिन्हें अक्सर "राजा देवराज" के रूप में याद किया जाता है। वे मैसूर के 14वें महाराजा थे। उनके शासनकाल की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं-

(क) प्रशासनिक क्षेत्र में चिक्का देवराज वाडियार ने पहली बार एक व्यवस्थित नौकरशाही की नींव रखी जिसमें प्रशासन को 18 विभागों में विभाजित किया, जिन्हें 'चावड़ी' या 'अठारह कचहरी' कहा जाता था। इससे शासन व्यवस्था में पारदर्शिता और दक्षता आई।

(ख)-  आर्थिक क्षेत्र के विद्वान नवककोटि नारायण देवराज वाडियार एक कुशल वित्त प्रबन्धक थे। उन्होंने राज्य के खजाने को इतना समृद्ध किया कि लोग उन्हें सम्मान से 'नवककोटि नारायण' (नौ करोड़ की संपत्ति का स्वामी) कहने लगे थे। ये अपनी कूटनीतिक चाल से बेंगलुरु को लगभग 330 साल पहले मुगलों (मराठों से जीतकर मुगलों के पास आए हिस्से) से बेंगलुरु को 3 लाख रुपये में खरीदा था।

(ग)-  चिक्का देवराज वाडियार
राजा वाडियार प्रथम (1578-1617) ने ही इस वंश को एक स्वतन्त्र और शक्तिशाली पहचान दिलाई थी। उन्होंने ही मैसूर की राजधानी को श्रीरंगपट्टनम स्थानान्तरित किया और विजयनगर के पतन के बाद अपनी सम्प्रभुता घोषित की।
ने जनकल्याण और कृषि को बढ़ावा देने के लिए श्रीरंगपट्टनम के पास कावेरी नदी पर बांध बनवाया और नहरें निकलवाईं तथा धार्मिक क्षेत्र में चामुण्डी पहाड़ियों पर स्थित नन्दी की विशाल अखण्ड मूर्ति का निर्माण डोड्डा देवराज वाडियार ने शुरू किया था, उसे नारायण देवराज वाडियार ने पूरा किया।


विश्वविख्यात दशहरा की शुरुआत

मैसूर के यादव राजवंश के राजाओं ने परम्परागत दशहरा की शुरुआत किया जो विश्वविख्यात है। इस दशहरे की औपचारिक शुरुआत राजा वाडियार प्रथम ने 1610 ईस्वी में श्रीरंगपट्टनम में की थी जो विजयनगर साम्राज्य की परम्पराओं से प्रेरित था। राजा ने आदेश दिया कि दशहरे के मौके पर देवी चामुंडेश्वरी (महिषासुरमर्दिनी) की विशेष पूजा की जाए क्योंकि ये हमारे राजवंश की कुलदेवी हैं। इस मौके पर हाथियों का जुलूस निकलता है जिसे 'जम्बू सवारी' कहते हैं। इसमें 750 किलो सोने के हौदे में देवी चामुंडेश्वरी की मूर्ति को रखा जाता है।



विशेष निष्कर्ष-  विजयनगर, देवगिरी और वाडियार के यादवों का इतिहास उन धुर्त और अज्ञानी लोगों के दोनों गालों पर जोरदार तमाचा है जो अक्सर चट्टी-चौराहे पर मुंह उठाकर बोला करते हैं कि- अहीर लोग- यादव महासभा के प्रथम अधिवेशन (सन् 1924) के बाद से यादव टाईटिल लगाना प्रारम्भ किया। उसके पहले अहीर जाती के लोग यादव टाईटिल नहीं लगाते थे। उन बेवकूफों को इतना ज्ञान नहीं कि- अहीर पूर्व काल से ही यादव सरनेम से जाने जाते थे और आज भी जानें जाते हैं।

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