ओ३म
आध्यात्मिक चेतना के उद्घोषक और स्वानुभूत सत्य के संवाहक यादव योगेश कुमार रोहि जी के अंतस से प्रस्फुटित विचार केवल शब्द नहीं, अपितु आत्मा के धरातल पर कसी गई कसौटियां हैं। साधना, कर्म और जीवन के अंतर्द्वंद्व को स्पष्ट करती उनकी यह विचार-शृंखला मानव मात्र के कल्याण के लिए एक अनुपम उपदेश है:
१. वैचारिक मंथन और ज्ञान की उत्पत्ति
"मन एक समुद्र है, जिसमें विचारों की लहरें निरंतर उद्वेलित होती रहती हैं। जब इन विचारों का आपस में आघात-प्रत्याघात (मंथन) होता है, तब ज्ञान के दिव्य बुलबुले उत्पन्न होते हैं; और इन बुलबुलों के भीतर 'सिद्धांत' की प्राणवायु (ऑक्सीजन) समाहित होती है।"
उपदेशपरक आलोक:
जैसे क्षीरसागर के मंथन से अमृत की प्राप्ति हुई थी, वैसे ही मानव का मन भी एक असीम समंदर है। सांसारिक द्वंद्वों, सुख-दुख और अनुभवों का जब इस मन में घर्षण होता है, तभी विवेक जागृत होता है। बिना वैचारिक मंथन के सच्चा ज्ञान संभव नहीं है। जब आपके विचार सिद्धांतों की कसौटी पर खरे उतरते हैं, तो वही ज्ञान जीवन को संजीवनी (ऑक्सीजन) प्रदान करता है। इसलिए, अपने भीतर चलने वाले विचारों के झंझावातों से डरें नहीं, बल्कि उन्हें मथकर सत्य के सिद्धांत को आत्मसात करें।
२. साधना, संयम और बाह्य स्वरूप का मर्म
साधना के पथ पर अग्रसर योगी के केश (बाल) केवल शारीरिक अंग नहीं, बल्कि एक निरंतर स्मरण कराने वाला आध्यात्मिक प्रतीक हैं। इस मर्म को कुंडलिया छंद के माध्यम से समझें:
उपदेशपरक आलोक:
संसार बाह्य वेशभूषा को देखकर पूजता है, किंतु वास्तविक सिद्धावस्था तब घटित होती है जब अंतःकरण शुद्ध हो। बढ़े हुए बाल साधक को तीन गुणों (सत्व, रज, तम) के संतुलन और नियंत्रण की याद दिलाते हैं। सच्ची साधना वह है जो मनुष्य को भौतिक भोगों और शारीरिक-मानसिक रोगों से मुक्त कर दे। यह संसार एक मायाजाल है जो पग-पग पर साधक को फांसने का यत्न करेगा, परंतु सिर के ये बढ़े हुए केश इस बात का साक्षात् प्रतीक हैं कि जैसे उलझे बालों को सुलझाया जाता है, वैसे ही संसार के तमाम जालों और विकारों को सुलझाते हुए निरंतर परमात्मा के पथ पर बढ़ते जाना है।
३. जन्म बनाम कर्म की महत्ता
"व्यक्ति का कर्म ही उसके उच्च और निम्न स्तर के मानक को सुनिश्चित करता है, न कि उसका जन्म। अभावों और विकटताओं में जन्म लेने वाले भी महान बन जाते हैं और सम्पन्नता तथा भोग-विलास में जीवन यापन करने वाले भी पतित और चरित्रहीन हो जाते हैं।"
उपदेशपरक आलोक:
सनातन सत्य साक्षी है कि आत्मा की कोई जाति या कुल नहीं होता। श्रेष्ठता की पहचान कुल की ऊंची दीवारों से नहीं, बल्कि कर्मों की पवित्रता से होती है। जो जीव अभावों, दुखों और कठिनाइयों की अग्नि में तपता है, वह कुंदन बनकर चमकता है और लोक-कल्याण करता है। इसके विपरीत, यदि जीवन में केवल भोग-विलास और वासना ही शेष रह जाए, तो ऊंचे महलों में रहने वाले भी चारित्रिक पतन के गर्त में गिर जाते हैं। अतः जन्म के अहंकार को त्यागकर अपने सत्कर्मों को सुदृढ़ करें, क्योंकि विधाता के दरबार में केवल कर्मों का लेखा-जोखा ही मान्य होता है।
४. संसार की असारता और छद्म भद्रलोक
"शराफत की दुहाई देने वाले अधिकतर दोषी निकले।
परिवार का जिनको हम समझ रहे वे पड़ोसी निकले।।"
उपदेशपरक आलोक:
यह संसार मोह और भटकाव का केंद्र है। यहाँ दिखाई देने वाला हर मुखौटा सत्य नहीं होता। आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले राही को यह भली-भांति समझ लेना चाहिए कि जो संसार बाहर से सदाचार और शराफत का ढोंग रचता है, भीतर से वही सबसे अधिक कलुषित और दोषी हो सकता है। जिन्हें हम अपना आत्मीय, अपना 'परिवार' मानकर बैठ जाते हैं, समय आने पर ज्ञात होता है कि वे आत्मिक स्तर पर पूरी तरह पराये (पड़ोसी) थे। इस जगत में केवल एक ही परम तत्व आपका अपना है—और वह है परमात्मा तथा आपका आत्म-विवेक। इसलिए सांसारिक संबंधों के मोह में फंसने के बजाय, अपनी आत्मा की पहचान (दर्द की पहचान) करें।
निष्कर्ष संदेश:
योगेश कुमार रोहि जी के ये स्वानुभूत विचार हमें सचेत करते हैं कि जीवन का वास्तविक ध्येय संसार के दिखावे में खोना नहीं, बल्कि विषमताओं के बीच भी अपने चरित्र को अडिग रखना, विकारों के जाल को सुलझाना और मानसिक मंथन से प्राप्त ज्ञानामृत से अपनी आत्मा को तृप्त करना है।
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