श्रीमद्भागवत पुराण के तृतीय स्कन्ध, अध्याय 29 के ये श्लोक (21-26) कपिल देव द्वारा अपनी माता देवहूति को दी गई 'भक्ति योग' की शिक्षा के अत्यंत महत्वपूर्ण अंश हैं। यहाँ भगवान के सर्वव्यापी स्वरूप और मूर्ति पूजा की सार्थकता का सुंदर विवेचन है।
इन श्लोकों का व्याकरणिक विश्लेषण और सरल हिन्दी अनुवाद नीचे दिया गया है:
श्लोक 21
अहं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मावस्थितः सदा ।
तं अवज्ञाय मां मर्त्यः कुरुतेऽर्चाविडम्बनम् ॥ २१ ॥
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व्याकरणिक विश्लेषण:
- अहम्: (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) - मैं।
- भूतात्मा + अवस्थितः: (सन्धि) - प्राणियों की आत्मा के रूप में स्थित।
- मर्त्यः: (प्रथमा विभक्ति) - मरणशील मनुष्य।
- अर्चा-विडम्बनम्: मूर्ति पूजा का ढोंग या प्रदर्शन।
- अनुवाद: मैं समस्त प्राणियों में उनकी आत्मा के रूप में सदैव स्थित हूँ। जो मनुष्य मेरी इस सर्वव्यापकता की अवहेलना (तिरस्कार) करके केवल मूर्तियों में मेरी पूजा करता है, वह केवल ढोंग करता है।
श्लोक 22
यो मां सर्वेषु भूतेषु सन्तमात्मानमीश्वरम् ।
हित्वार्चां भजते मौढ्याद् भस्मन्येव जुहोति सः ॥ २२ ॥
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व्याकरणिक विश्लेषण:
- हित्वा: (हा धातु + क्त्वा प्रत्यय) - छोड़कर।
- मौढ्यात्: (पञ्चमी विभक्ति) - मूर्खता के कारण।
- भस्वनि + एव: राख में ही।
- जुहोति: (हु धातु, लट् लकार) - आहुति देता है।
- अनुवाद: जो पुरुष समस्त भूतों में स्थित मुझ परमात्मा और ईश्वर को त्याग कर मूर्खतावश केवल प्रतिमा की पूजा करता है, उसकी वह पूजा 'राख में आहुति' देने के समान (व्यर्थ) है।
श्लोक 23
द्विषतः परकाये मां मानिनो भिन्नदर्शिनः ।
भूतेषु बद्धवैरस्य न मनः शान्तिमृच्छति ॥ २३ ॥
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व्याकरणिक विश्लेषण:
- द्विषतः: (द्विष् धातु) - द्वेष करने वाले का।
- भिन्नदर्शिनः: (षष्ठी विभक्ति) - भेदभाव रखने वाले का।
- न ऋच्छति: (ऋच्छ् धातु) - प्राप्त नहीं करता।
- अनुवाद: जो दूसरे के शरीर (प्राणी) में रहने वाले मुझ परमात्मा से द्वेष करता है और भेदभाव रखने वाला अभिमानी है, वह प्राणियों के प्रति वैर भाव रखने के कारण कभी मन की शांति प्राप्त नहीं कर पाता।
श्लोक 24
अहमुच्चावचैर्द्रव्यैः क्रिययोत्पन्नयानघे ।
नैव तुष्येऽर्चितोऽर्चायां भूतग्रामावमानिनः ॥ २४ ॥
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व्याकरणिक विश्लेषण:
- उच्चावचैः द्रव्यैः: (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) - उत्तम और निम्न अनेक प्रकार की सामग्रियों से।
- भूतग्राम-अवमानिनः: प्राणियों का अपमान करने वाले से।
- न एव तुष्ये: संतुष्ट नहीं होता।
- अनुवाद: हे निष्पाप माता! जो मनुष्य दूसरे प्राणियों का अपमान करता है, वह यदि विविध प्रकार की बहुमूल्य सामग्रियों और विधि-विधान से मेरी प्रतिमा की पूजा भी करे, तो भी मैं उससे संतुष्ट नहीं होता।
श्लोक 25
अर्चादौ अर्चयेत्तावद् ईश्वरं मां स्वकर्मकृत् ।
यावन्न वेद स्वहृदि सर्वभूतेष्ववस्थितम् ॥ २५ ॥
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व्याकरणिक विश्लेषण:
- अर्चयेत्: (विधिलिंग लकार) - पूजा करनी चाहिए।
- तावत्... यावत्: तब तक... जब तक।
- स्वकर्मकृत्: अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए।
- अनुवाद: मनुष्य को मूर्तियों में मेरी पूजा तब तक करनी चाहिए जब तक कि उसे अपने हृदय में और समस्त प्राणियों में स्थित मुझ ईश्वर का अनुभव न हो जाए।
श्लोक 26
आत्मनश्च परस्यापि यः करोत्यन्तरोदरम् ।
तस्य भिन्नदृशो मृत्युः विदधे भयमुल्बणम् ॥ २६ ॥
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व्याकरणिक विश्लेषण:
- अन्तरोदरम्: (अन्तरम्) - थोड़ा सा भी भेद।
- भिन्नदृशः: भेद बुद्धि रखने वाले का।
- उल्बणम्: भयंकर।
- विदधे: (वि + धा धातु) - देता हूँ या रचता हूँ।
- अनुवाद: जो व्यक्ति अपने और पराए (दूसरे जीव) के बीच थोड़ा सा भी अंतर या भेद करता है, उस भेद-दृष्टि रखने वाले पुरुष को मैं 'मृत्यु' के रूप में भयंकर भय देता हूँ।
निष्कर्ष:
इन श्लोकों का मुख्य सार यह है कि भगवान केवल मंदिर की मूर्तियों में ही नहीं, बल्कि संसार के प्रत्येक जीव में विद्यमान हैं। सच्ची भक्ति वही है जो प्राणियों की सेवा और सम्मान के साथ की जाए। बिना परोपकार और समत्व भाव के की गई पूजा को भगवान 'राख में डाली गई आहुति' कहते हैं।
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