प्रसून-पुष्पे पृथु-पराग-पङ्कजे,
चकास्ति गन्धश्चतुरैर्विचिन्त्यते।
तथा हि विश्वे जड-भौतिकांशके,
विभाति सूक्ष्मं परमार्थ-कारणम् ॥
प्रपञ्च-पाशं कलयन्ति वैज्ञानिकाः,
प्रबोध-पूर्णाः प्रविलोकयन्ति तत्।
विचित्र-विश्वस्य विधान-वैभवं,
विशुद्ध-बोधेन विमृश्यते बुधैः ॥
व्याख्या
जिस प्रकार पराग से युक्त पुष्पों में सुगन्ध व्याप्त रहती है जिसे केवल सूक्ष्म दृष्टि वाले ही समझ पाते हैं, उसी प्रकार इस दृश्यमान भौतिक जगत के कण-कण में वह 'परमार्थ तत्व' (Metaphysical cause) विद्यमान है। जहाँ सामान्य वैज्ञानिक केवल बाह्य प्रपञ्च (तन्त्र) को ही सत्य मानकर उसमें उलझे रहते हैं, वहीं प्रबुद्ध जन अपनी विशुद्ध प्रज्ञा से उस परम ऐश्वर्य और विधान को देख लेते हैं जो इस सृष्टि का आधार है।
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