श्रीमद्भागवत पुराण के नवम स्कंध और ऋग्वेद के पुरुषसूक्त के वर्ण श्लोकों के बीच का अंतर वास्तव में भारतीय कालचक्र (युग व्यवस्था) की दार्शनिक समझ को स्पष्ट करता है।
1. काल-भेद
- भागवत पुराण कहता है, सतयुग वह काल है जहाँ पूर्ण धर्म, एकात्मकता और आध्यात्मिक शुद्धता थी। उस समय समाज का विभाजन कार्य या गुण के आधार पर न होकर, आध्यात्मिक चेतना के आधार पर था समाज के सभी मनुष्यों का एक वर्ण हंस था।
- 'हंस' अर्थ है— मनुष्य वह अवस्था जहाँ वह केवल परमात्मा (हंस) के साक्षात्कार में लीन था। उस समय का समाज एक 'आध्यात्मिक परिवार' जैसा था, जहाँ ऊँच-नीच या कार्य-विभाजन की आवश्यकता ही नहीं थी।
- परन्तु ऋग्वेद का पुरुष सूक्त (युग के संक्रमण/व्यावहारिक काल की दशा को वर्णन करता है वह 'सृष्टि की व्यवस्था' का वर्णन करता है। यह किसी एक विशेष युग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वह सनातन संरचना है जिसके आधार पर 'वर्णाश्रम धर्म' की स्थापना होती है। यह उस व्यवस्था को इंगित करता है जो त्रेतायुग और उसके बाद के समय में समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए अनिवार्य हो गई थी। गीता यह श्लोक कि " चातुर्वर्णयं मया सृष्टं गुण कर्म विभागस्" इस व्यवस्था का सम्यक प्रतिपादक है।
भागवत पुराण में वर्णित 'सतयुग' और पुरुषसूक्त में प्रतिपादित 'वर्ण व्यवस्था' का तुलनात्मक विश्लेषण एक अत्यंत महत्वपूर्ण दार्शनिक और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। इन दोनों अवधारणाओं का सूक्ष्म अवलोकन करने पर इनके उद्देश्यों और संरचना में मौलिक भिन्नता स्पष्ट होती है:
वैचारिक और दार्शनिक आधार
सतयुग की सामाजिक स्थिति 'निर्गुण' और 'एकीकृत' चेतना पर आधारित है, जहाँ समाज 'हंस' वर्ण की स्थिति में था। यहाँ वर्ण का अर्थ जन्मगत या कार्यात्मक विभाजन न होकर चेतना का उच्चतम स्तर है, जहाँ समस्त प्राणी ब्रह्म में स्थित होने के कारण एक समान थे। इसके विपरीत, पुरुषसूक्त में वर्णित वर्ण व्यवस्था 'सगुण' है, जो समाज को स्पष्ट और कार्यात्मक भागों में विभाजित करती है। जहाँ सतयुग का एकमात्र उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार और भगवत् प्राप्ति था, वहीं पुरुषसूक्त की वर्ण व्यवस्था का लक्ष्य सुव्यवस्थित सामाजिक ढाँचा, लोक-कल्याण और अनुशासन की स्थापना करना है।
कार्यात्मक और प्रेरणागत अंतर
इन दोनों व्यवस्थाओं में कार्य-विभाजन की प्रकृति भी भिन्न है। सतयुग में कार्य-विभाजन नगण्य था, क्योंकि समस्त जीव ब्रह्म में लीन थे और कर्म स्वतः स्फूर्त थे। यहाँ धर्म अपने पूर्ण और शुद्ध स्वरूप में विद्यमान था, जहाँ किसी बाह्य अनुशासन की आवश्यकता नहीं थी। दूसरी ओर, पुरुषसूक्त में कार्य-विभाजन अत्यंत स्पष्ट और व्यवस्थित है—ज्ञान (मुख), रक्षा (बाहु), पोषण (जंघा) और सेवा (चरण)। यहाँ समाज की प्रेरणा 'स्वतः स्फूर्त धर्म' के स्थान पर 'शास्त्र-सम्मत वर्णाश्रम धर्म' द्वारा निर्देशित होती है।
निष्कर्षतः, सतयुग की अवधारणा जहाँ पूर्णता और चेतना की एकरूपता को समाहित करती है, वहीं पुरुषसूक्त की वर्ण व्यवस्था सामाजिक स्थिरता और सहअस्तित्व के लिए एक आवश्यक कार्यात्मक ढांचा प्रदान करती है।
3. समीक्षा: विरोधाभास या विकास?
इसे विरोधाभास के बजाय 'मानवीय चेतना का पतन और सामाजिक संरचना का विकास' समझना चाहिए:
- चेतना का स्तर: सतयुग में लोगों की चेतना इतनी ऊँची थी कि उन्हें अनुशासन के लिए किसी बाहरी ढांचे (वर्ण व्यवस्था) की आवश्यकता नहीं थी। वे सहज ही 'हंस' (परम ज्ञानी) थे।
- व्यवस्था की आवश्यकता: जैसे-जैसे युग बदलते गए (त्रेता, द्वापर), लोगों की आध्यात्मिक शक्ति और 'सत्य' के प्रति निष्ठा कम होती गई। समाज में अव्यवस्था न फैले, इसके लिए 'पुरुषसूक्त' में वर्णित विराट पुरुष का दृष्टांत दिया गया। यह एक कार्यात्मक विभाजन (Functional Division) है, न कि जन्मजात श्रेष्ठता का। यद्यपि यह सूक्त व सम्बन्धित ऋचा कालान्तर में जोड़ी गयी है।
- पुरुषसूक्त का तात्पर्य: पुरुषसूक्त यह सिखाता है कि समाज एक 'विराट पुरुष' का शरीर है। जैसे शरीर के अंगों में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता—मुँह का काम बोलना और पैर का काम चलना है, दोनों के बिना जीवन असंभव है—उसी प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र एक ही परमात्मा के विभिन्न अंग हैं।
निष्कर्ष
श्रीमद्भागवत का श्लोक उस 'आदि स्थिति' की ओर संकेत करता है जहाँ हम सब 'एक' थे, जबकि पुरुषसूक्त उस 'प्रकट सामाजिक व्यवस्था' का आधार है जो हमें त्रेतायुग से कलयुग तक एक व्यवस्थित समाज में रहने की शिक्षा देती है।
अतः, सतयुग का 'हंस वर्ण' एक अवस्था है, और जबकि पुरुषसूक्त की वर्ण व्यवस्था एक प्रणाली है। जब मानव अपनी उस 'हंस' वाली चेतना को भूल गया, तब उसे व्यवस्थित रखने के लिए वर्ण व्यवस्था रूपी अनुशासन की आवश्यकता पड़ी परन्तु यह वर्ण व्यवस्था कर्म और प्रवृति अथवा स्वभाव के अनुरूप थी। जन्म से कोई महान नहीं होता ? सभी अपने अच्छे कर्मों से महानता को प्राप्त करते हैं।
यहाँ भ्रम का मुख्य कारण 'ज्ञान के आविर्भाव' और 'व्यवहार में आने' के बीच का अन्तर है। लोगों के नाम और उपाधि के अनुरूप उनके कर्म और गुण नहीं हैं। यह कलियुग कि प्रभाव है
इसे समझने के लिए हमें इन तीन बिंदुओं पर ध्यान देना होगा:
1. वेद शाश्वत हैं (अपौरुषेय)
जैसा कि आपने सही कहा, वेद सृष्टि के आरम्भ में ही परमात्मा से प्रकट हुए थे। भारतीय दर्शन के अनुसार, वेद न तो त्रेतायुग की वस्तु हैं और न ही किसी युग विशेष की; वे 'नित्य' (Eternal) हैं। सतयुग में भी वेद थे, लेकिन वे 'प्रणव' (ॐ) के रूप में एकीकृत (एकत्र) थे। इसे आप ऐसे समझें जैसे कोई विशाल फाइलबुक एक 'कंप्रेस्ड जिप फाइल' के रूप में हो, जिसे खोलने की आवश्यकता सतयुग में नहीं थी क्योंकि सतयुगी मनुष्यों की बुद्धि इतनी प्रखर थी कि वे 'ॐ' से ही सारा ज्ञान समझ लेते थे।
समय समय पर वेदों में जोड़ने और तोड़ने की प्रक्रिया भी तथाकथित लोगों द्वारा होती रही है। अत: वेदों की प्रमाणिकता संदिग्ध सी हो गयी है । यद्यपि भाषा विश्लेषण के द्वारा तथ्यों या अन्वेषण होना अपेक्षित है।
2. 'वेदत्रयी' का प्रादुर्भाव (त्रेतायुग का संदर्भ)
भागवत पुराण के जिस श्लोक (४९) की हम चर्चा कर रहे हैं, वह यह नहीं कहता कि वेद त्रेतायुग में 'बने'। वह कहता है कि त्रेता के प्रारम्भ में पुरूरवा के समय से 'वेदत्रयी' (ऋक्, यजु, साम) का आविर्भाव हुआ।
इसका अर्थ यह है:
- सतयुग: वेद अपने 'सूक्ष्म' और 'एकीकृत' रूप (प्रणव) में थे।
- त्रेतायुग: जैसे-जैसे काल चक्र आगे बढ़ा, मानवीय चेतना में थोड़ा संकोचन आया। अब वेदों के उस 'एकीकृत' ज्ञान को व्यवहार में लाने के लिए उसका 'विस्तार' या 'विभाजन' आवश्यक हो गया। अतः, त्रेतायुग में वेदों को अलग-अलग शाखाओं (ऋक्, यजु, साम) में वर्गीकृत किया गया ताकि सामान्य जन भी उन्हें समझ सकें।
वेद सतयुग की उपेक्षा नहीं करते, बल्कि वेद 'सृष्टि के सनातन विधान' हैं।और पुराण (जैसे भागवत) 'समय के साथ ज्ञान के व्यावहारिक उपयोग' (Application of Knowledge) का इतिहास बताते हैं।
अतः, वेद में वर्ण व्यवस्था का होना यह दर्शाता है कि यह व्यवस्था सृष्टि का आधारभूत सत्य है, और पुराण यह बताते हैं कि काल के प्रवाह में कैसे उस सत्य को मानव समाज ने अलग-अलग युगों में अपनी आवश्यकतानुसार 'प्रकट' (Manifest) किया। सतयुग में वह ज्ञान 'चेतना' में था, त्रेतायुग में वह 'अनुष्ठान' और 'सामाजिक व्यवस्था' में ढल गया और द्वापर में केवल दिखावा रह गया और आज कलियुग में सब विपरीत स्थिति में है।
वैदिक समाज को समझने के लिए एक सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है: ऋग्वेद के नवम मण्डल की इस ऋचा को-
कारुरहं ततो भिषगुपलप्रक्षिणी नना ।
नानाधियो वसूयवोऽनु गा इव तस्थिमेन्द्रायेन्दो परि स्रव।
अनुवाद
"मैं कारीगर (या कवि) हूँ, मेरे पिता वैद्य (चिकित्सक) हैं और मेरी माता पत्थर की चक्की पर अन्न पीसने वाली हैं। हम सभी अलग-अलग काम करते हैं, लेकिन जैसे गाएँ चारे के पीछे जाती हैं, वैसे ही हम सब धन (आजीविका) कमाने के लिए अपने-अपने कर्मों में लगे रहते हैं।
- कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था: यह मंत्र सिद्ध करता है कि ऋग्वेद काल में वर्ण व्यवस्था जन्म के आधार पर नहीं, बल्कि पूरी तरह कर्म और व्यवसाय के आधार पर थी।
- एक ही परिवार में अलग-अलग व्यवसाय: इस मंत्र में एक ही परिवार के तीन लोग (पुत्र, पिता और माता) तीन अलग-अलग वर्णों या व्यवसायों से जुड़े हैं। पुत्र शिल्पी है, पिता वैद्य हैं, और माता अन्न पीसने का श्रमसाध्य कार्य करती हैं।
- समानता का संदेश: अलग-अलग कार्यों में लगे होने के बाद भी वे सभी एक ही छत के नीचे एक प्रेमपूर्ण परिवार की तरह रहते थे। उस काल में किसी भी कार्य को छोटा या बड़ा नहीं माना जाता था।
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