रविवार, 29 अक्टूबर 2017

परिप्रेक्ष्य पर प्रहार ---

हमारे देश का उद्धार- कभी नहीं कर सकती सरकार ! जब तक कि हम स्वयं नहीं करेंगे विचार !!
और नहीं करेंगे कर्तव्य व्यवहार।
हमारे नेताओं का चरित्र क्या है ?
और हमारा भी चरित्र क्या है ?  कोई रढुआ मन बहलाता है ! पराई तिरियें को देख ! विवाहित भार उठाता है समझ के किस्मत का लेख !! ************************* *****
जिनको हम चुनते हैं...वो ही हमको धुनते हैं.. चाहे पत्नी हो या नेता...दोनो कहाँ सुनते हैं
"बुद्धि"का उपयोग करनेवाले जापान में...
603 किमी./घंटा रफ्तार वाली ट्रैन के बाद,
7G की टेस्टिंग शुरू हो चुकी है... इंडिया* में "पढ़े-लिखे" लोग Whatsapp पर 11 लोगों को ”ॐ नम: शिवाय:" भेजकर *फ्री बैलेंस* और *चमत्कार* की उम्मीद कर रहे हैं।।
और तो और ... नही भेजा तो ..... अप्रिय घटना की चेतावनी और दे देते है .।
😁😁😁😁 *अगरबत्ती* दो प्रकार की होती है... एक *भगवान* के लिए , एक *मच्छरों* के लिए... तकलीफ ये है कि... *भगवान* आते नहीं , *मच्छर* जाते नहीं ...
😃😜👍✍ *पेट खाली* है और ........ *योग* करवाया जा रहा है, *जेब खाली* और ....... *खाता* खुलवाया जा रहा है, रहने का *घर नहीं* और ....... *शौचालय* बनवाया जा रहा है. गाँवों मे *बिजली नही* और ... (डिजिटल India) बन रहा है. कंपनीया सारी *विदेशी* और ........मेक इन (India) कर रहा है. जाति की *गंदगी दिमाग में* है और ..... *स्वच्छ भारत* अभियान चल रहा है. *आटा* दिनो दिन महंगा हो रहा है, और ....... *डाटा* सस्ता कर रहे है. *सचमुच देश बदल रहा है.....!!!* कर्म भारतीय सनातन आर्य संस्कृति की वह अवधारणा है ! जो एक प्रणाली के माध्यम से कार्य-कारण के सिद्धांत की व्याख्या करती है, !! जहां पिछले हितकर कार्यों का हितकर प्रभाव और हानिकर कार्यों का हानिकर प्रभाव प्राप्त होता है, जो पुनर्जन्म का एक चक्र बनाते हुए आत्मा के जीवन में पुन: अवतरण या पुनर्जन्म की क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं की एक प्रणाली की रचना करती है। ....... कहा जाता है कि कार्य-कारण सिद्धांत न केवल भौतिक दुनिया में लागू होता है, बल्कि हमारे विचारों, शब्दों, कार्यों और उन कार्यों पर भी लागू होता है जो हमारे निर्देशों पर दूसरे किया करते हैं। जब पुनर्जन्म का चक्र समाप्त हो जाता है, तब कहा जाता है कि उस व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है, या संसार से मुक्ति मिलती है। सभी पुनर्जन्म मानव योनि में ही नहीं होते हैं। कहते हैं कि पृथ्वी पर जन्म और मृत्यु का चक्र 84 लाख योनियों में चलता रहता है, लेकिन केवल मानव योनि में ही इस चक्र से बाहर निकलना संभव है। चेतना के क्रमिक विकास का स्तर ही विभिन्न प्रकार की यौनियों का निर्धारक है . किये गए कृत्यों के निर्णायक प्रतिफल के सन्दर्भ में आत्मा के देहांतरण या पुनर्जन्म का सिद्धांत ऋगवेद में नहीं मिलता है। कर्म की अवधारणा सर्वप्रथम भगवद गीता (ई.पू. 3100) में सशक्त शब्दों में प्रकट हुई।
परन्तु कृष्ण की वाणी में भी
मिलाबट राम ने मिलाबट से बात बिगाड़ी ।।
पुराणों में कर्म के विषय का उल्लेख है।
कहते हैं कि कलियुग के दौरान ज्ञान को सुरक्षित रखने के लिए द्वापर युग के अन्त में सन्त व्यास द्वारा पुराण लिखे गये थे।
परन्तु पुराणों के नाम पर सब कुछ नया नया है ।
नमो बुद्धाय शुद्धाय दैत्य दानव द्रौहिणे ।
यादवों को शूद्र बना दिया बनके अहीर पिछड़े ।
वाल्मीकि-रामायण में राम ने बुद्ध को कह कर चोर दी गाली ।
यथा ही चौर स तथा हि बुद्धस्तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि" सब लगती है कथा ये ज़ाली ।।
कालान्तरण में बहुत से व्यास हो गये ।
दस्यु बन गये वे अहीर जिनके पूर्वज यदु दास हो गये ।
उत् दासा परिविषे स्मद्दिष्टी गोपरीणसा यदुस्तुर्वश्च च मामहे ।
ऋग्वेद के दशम् मण्डल के ६२वें सूक्त की ऋचा ऐसा कहे ।।
कहा जाता है कि पहले वही ज्ञान भिक्षुओं द्वारा याद रखा जाता था ।
और मौखिक रूप से दूसरों को दिया जाता था।  श्री भुक्तेश्वर के अनुसार, पिछ्ला कलियुग ई.पू. 700 में शुरू हुआ था। "कर्म" का शाब्दिक अर्थ है "काम" या "क्रिया" और भी मोटे तौर पर यह निमित्त और परिणाम तथा क्रिया और प्रतिक्रिया कहलाता है, जिसके बारे में प्रचीन भारतीयों का मानना है ।
अब वैरागी हूँ मैं ज्ञान की बात है इतनी ।
अहीरों की बुद्धि न सुधरी करते हैं तनातनी ।।

------- जीवन एक पुष्प है , प्रवृत्ति उसकी गन्ध ,तथा स्वभाव पराग के सदृश्य है 'रोहि' इन्हीं गन्ध और पराग के द्वारा प्रारब्ध के फल का निर्माण होता है कोई ...💐💐💐💐💐💐💐💐💐 विचार - विश्लेषण --- योगेश कुमार 'रोहि'
ग्राम -आज़ादपुर ।
पत्रालय -पहाड़ीपुर जनपद अलीगढ़.....

शनिवार, 28 अक्टूबर 2017

दाहिस्तान दास स्थान

This author concludes that a likely candidate of the region the ancient Dahi land is between today's Khujand in northern Tajikistan and Tashkent in eastern Uzbekistan. References Jus. Marcus Justinus (3rd cent. CE) in Epitome of the Philippic History of Pompeius Trogus, translated by the Rev. John Selby Watson (London, 1853). Isi. Parthian Stations (Mansiones Parthicae) was written sometime between 29 and 1 BCE. It lists all the supply stations, that is caravanserais maintained by the Parthavi (Parthian) Government for the convenience of merchants travelling along the caravan trail from Antioch, today a Mediterranean port in the southwest corner of Turkey, to the borders of India. With liberation from Macedonian rule, the Iranian-Aryans once again asserted control and facilitated trade along the Silk Roads. Str. Strabo (ca. 63/64 BCE - 24 CE) Geography, translated by H. C. Hamilton, Esq. and W. Falconer, M.A. Pol. Polybius (c 200-118 BCE) The Histories, was a Greek historian of the Hellenistic Period whose book covered history of the period of 220-146 BCE Additional reading: » The Seven Great Monarchies, Vol. 6, Parthia by George Rawlinson » Page 2 » Top • © Author: K. E. Eduljee, Zoroastrian Heritage, 2005-17 (researched from 1979 onwards) • Con

जादौन पठान राजपूतों का इतिहास

==वीर राजपूत यौद्धा वजीर रामसिंह पठानिया=========== वजीर राम सिंह पठानिया महान सपूतों में गिने जाते हैं।ईस्वी 1846 में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ क्रांति का ध्वजारोहण करने वाले त्याग, तपस्या व अद्भुत साहस के प्रतीक इस 24 वर्षीय नवयुवक ने अपने मुट्ठी भर साथियों के बल पर अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिला दी थी।किन्तु दुर्भाग्य से देशवासी इस महान राजपूत यौद्धा के बारे में नही जानते. जीवन परिचय----- वजीर राम सिंह पठानिया के पिता नूरपुर रियासत के राजा वीर सिंह (1789-1846) के वजीर थे।इस वीर सपूत का जन्म नूरपुर रियासत के वजीर श्याम सिंह के घर 10 अप्रैल 1824 को हुआ था। अंग्रेजो के विरुद्ध संघर्ष का कारण----- इतिहास के अनुसार नौ मार्च 1846 में अंग्रेज-सिक्ख संधि के कारण वर्तमान हिमाचल प्रदेश की अधिकांश रियासतें सीधे अंग्रेजी साम्राज्य के आधीन आ गई थीं। राजा वीर सिंह अपने दस वर्षीय बेटे राज कुमार जसवंत सिंह को नूरपुर की राजगद्दी का उत्तराधिकारी छोड़कर स्वर्ग सिधार गए, अंग्रेजों ने राजकुमार जसवंत सिंह की अल्पावस्था का लाभ उठाते हुए उन्हें केवल पांच हजार रुपये वार्षिक देकर उनके सारे अधिकार ले लिए और इस रियासत को अपने शासन में मिलाने की घोषणा कर दी।वीर राम सिंह पठानिया बाल्यकाल से ही पराक्रमी थे, अंग्रेजों के इस षड्यंत्र को सहन नहीं कर सका और उसने गुप्त रूप से रियासत के पठानिया व कटोच राजपूत नवयुवकों की एक सेना तैयार कर ली। रामसिंह पठानिया की वीरगाथा------- 1846 में जब दूसरा अंग्रेज-सिख युद्ध आरंभ हुआ, तो राम सिंह पठानिया ने अपने साथियों संग 14 अगस्त की रात्रि ममून कैंट लूटकर शाहपुरकंडी के दुर्ग पर धावा बोल दिया। इस आक्रमण से अंग्रेज बुरी तरह घबराकर भाग खड़े हुए। 15 अगस्त 1846 की सुबह राम सिंह पठानिया ने अपना केसरिया ध्वज यहां लहरा दिया और नूरपुर रियासत से अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने का ऐलान कर दिया। इसके साथ ही राजकुमार जसवंत सिंह को रियासत का राजा तथा खुद को उनका वजीर घोषित कर दिया। इस घोषणा से पहाड़ी राजाओं में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई तथा जसरोटा के करीब पांच सौ राजपूत योद्धा मंगल सिंह मिन्हास के नेतृत्व में वीर पठानिया के झंडे तले आ गए। स्थिति को गंभीरता से लेते हुए जालंधर के कमिश्नर हेनरी लारेंस तथा कांगड़ा के डिप्टी कमिश्नर वनिस फैजी दल-बल के साथ शाहपुरकंडी पहुंचे और आक्रमण कर दिया। ये युद्ध कुछ दिनों तक चलता रहा, परंतु अंत में वीर राम सिंह पठानिया को खाद्य सामग्री के अभाव में दुर्ग को खाली करना पड़ा तथा रानीताल अपने साथियों सहित निकलकर वह माओफोर्ट के जंगलों में चले गए और गोरिल्ला युद्ध करते रहे। अंग्रेजी सेना ने उनका बहुत पीछा किया, लेकिन वह उन्हें चकमा देकर गुजरात(पंजाब के)जा पहुंचे। वहां उन्होंने सिख सेना से फौजी दस्ते व गोला-बारूद लेकर अपनी ताकत को बढ़ाया। राम सिंह ने अन्य राजाओं व सिखों के साथ मिलकर अंग्रेजों को मैदानों व पहाड़ी इलाकों में अलग-अलग उलझाए रखने की योजना बनाई। इसी दौरान जसवान के राजा उमेद सिंह, दतारपुर के राजा जगत सिंह व ऊना के राजा संत सिंह बेदी ने भी अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। अंग्रेजों में खलबली मच गई और उसी साल उन्होंने पठानकोट पर आक्रमण कर दिया, लेकिन वीर राम सिंह ने साहस नहीं छोड़ा तथा अपना मोर्चा पठानकोट से उत्तर पश्चिम की ओर समुद्र तल से 2772 फुट की ऊंचाई पर स्थित डल्ले की धार पर लगाया। कुछ दिनों तक यहां पर भीषण युद्ध चला, इसमें अंतत: अंग्रेजी सेना को पीछे हटना पड़ा। रानी विक्टोरिया के एक रिश्तेदार राबर्ट पील के भतीजे जान पील ने वाहवाही बटोरने के लिए वीर राम सिंह के समीप पहुंचने का दु:स्साहस किया,लेकिन राम सिंह ने लैफ्टिनेंट जॉन पील व उसके अंग रक्षकों को मौत के घाट उतार दिया। डल्ले की धार पर जान पील की कब्र पर स्थित शिलालेख आज भी उस घटना की ऐतिहासिकता को दर्शाता है। रामसिंह पठानिया की गिरफ्तारी और दुखद अंत------ कहा जाता है कि वीर राम सिंह को अंग्रेजों ने उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब वह पूजा पाठ में व्यस्त थे।गिरफ्तार करके उन्हें कांगड़ा किले में रखा तथा घोर यातनाएं दी गईं। सशस्त्र क्रांति का अभियोग लगाकर उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाकर कालापानी भेज दिया गया, इस वीर की अंतिम इच्छा थी कि यदि अंग्रेजी सरकार उसे छोड़ दे तो भी वह आजादी के लिए तब तक लड़ता रहेगा, जब तक शरीर में प्राण बाकी हैं, लेकिन अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें रंगून जेल भेज दिया तथा रंगून जेल की यातनाएं सहते हुए यह वीर सपूत 11 नवंबर, 1849 को मातृभूमि की रक्षा करते हुए मात्र 24 वर्ष की आयु में ही देश की खातिर वीरगति को प्राप्त हो गया। "कोई किल्हा पठानिया जोर लडेया', 'कोई बेटा वजीर दा खूब लड़ेया' जैसी लोकगाथाओं के जरिये वीर शिरोमणी वजीर राम सिंह पठानिया को आज भी प्रथम सशस्त्र क्रांति के नायक के रूप में याद किया जाता है।1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से भी दस वर्ष पूर्व यह चिराग अंग्रेजी साम्राज्य के सामने चुनौती देकर बुझ गया,परंतु उस वीर योद्धा की राख में वे चिंगारियां थीं,जो आगे चलकर विस्फोटक बनकर तब तक फूटती रहीं, जब तक भारत आजाद नहीं हो गया. उनकी वीरता और लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें प्रथम स्वतंत्रता सेनानी घोषित कर पंजाब सरकार ने हर साल इस दिन को डल्ले की धार में वजीर राम सिंह पठानिया की याद में शहीदी दिवस मनाने की परंपरा शुरू की। मातृभूमि के चरणों में अपने प्राणों की आहुति देने वाले इस शूरवीर की वीर गाथाएं आज तक पूरे क्षेत्र में बड़े आदर से गाई जाती है। समस्त भारत के राजपूत समाज की और से वीर रामसिंह पठानिया को शत शत नमन..... जय राजपूताना........ सन्दर्भ सूची----- 1-http://en.wikipedia.org/wiki/Nurpur,_India 2-https://www.google.co.in/url… 3-http://m.jagran.com/news/other-11765197.html 4-http://www.fallingrain.com/world/IN/11/Nurpur.html
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चन्द्रवंशी पठानिया राजपूतों का सम्पूर्ण इतिहास

मित्रों आज हम आपको पंजाब,जम्मू,हिमाचल प्रदेश के चंद्रवंशी पठानिया राजपूतो(Tanwar/tomar rajput Clan Pathania) के बारे में विस्तृत जानकारी देंगे.यह वंश ईस्वी 1849 तक विदेशी आक्रमणकारियों के विरुध अपने संघर्षों के लिए जाना जाता है आक्रमणकारी चाहे मुसलमान हो या अंग्रेज। इस वंश के राम सिंह पठानिया अंग्रेजों के विरुद्ध अपनी वीरता के लिए विख्यात हैं.यह वंश इतना बहादुर व झुझारू है के आजादी के बाद भी पठानिया राजपूतों ने सेना में 3 महावीर चक्र प्राप्त किये.....
-------------------पठानिया वंश की उत्पत्ति-------------------

इस वंश की उत्पत्ति पर कई मत हैं,
श्री ईश्वर सिंह मढ़ाड कृत राजपूत वंशावली के पृष्ठ संख्या 181-182 के अनुसार पठानिया राजपूत बनाफर वंश की शाखा है,उनके अनुसार बनाफर राजपूत पांडू पुत्र भीम की हिडिम्बा नामक नागवंशी कन्या से विवाह हुआ था हिडिम्बा से उत्पन्न पुत्र घटोत्कच के वंशज वनस्पर के वंशज बनाफर राजपूत हैं,पंजाब के पठानकोट में रहने वाले बनाफर राजपूत ही पठानिया राजपूत कहलाते है.....
किन्तु यह मत सही प्रतीत नहीं होता ,क्योंकि पठानिया राजपूतो के बनाफर राजपूत वंश से सम्बंधित होने का कोई प्रमाण नही मिलता है,

श्री रघुनाथ सिंह कालीपहाडी कृत क्षत्रिय राजवंश के पृष्ठ संख्या 270-271 व 373 के अनुसार पठानिया राजपूत तंवर वंश की शाखा है,
नूरपुर के तंवर वंशी राजा बासु (1580-1613) ने अपने पुरोहित व्यास के साथ महाराणा मेवाड़ अमर सिंह से मुलाकात की थी,इसी व्यास का वंशज सुखानंद सम्वत 1941 वि० को उदयपुर आया था,बासु के समय के ताम्र पत्र के आधार पर सुखानंद के रिकॉर्ड में लिखा था कि "दिल्ली का राज छूटने के बाद राजा दिलीप के पुत्र जैतमल ने नूरपुर को अपनी राजधानी बनाया.
(वीर विनोदभाग-2 पृष्ठ संख्या 228)
निष्कर्ष---सभी वंशावलियों के रिकार्ड्स से भी यह वंश तंवर वंश की शाखा ही प्रमाणित होता है,,पंजाब में पठानकोट में रहने के कारण तंवर वंश की यह शाखा पठानिया के नाम से प्रसिद्ध हुई.वस्तुत: पठानकोट का प्राचीन नाम भी संभवत: पैटनकोट हो सकता है.
--------------पठानकोट एवं नूरपुर राज्य का इतिहास------------
Dynasty--Tanwar rajput Clan(Pathania)

Area--180 km² (1572)

राज्य का नाम--नूरपुर(पुराना नाम धमेरी)

------------इतिहास---------
पठानिया राजपूत तंवर राजा अनंगपाल तंवर के अनुज राजा जैतपाल के वंशज है जिन्होंने उत्तर भारत में धमेरी नाम के राज्य की स्थापना की और पठानकोट नामक शहर बसाया। धमेरी राज्य का नाम बाद में जा कर नूरपुर पड़ा। सं० 1849 में नूरपुर अंग्रेजो के अधीन हो गया।
इस राज्य कि स्थापना 11 वी सदी में (1095 ईस्वी)में दिल्ली के राजा अनंगपाल तंवर द्वित्य के छोटे भाई जैतपाल द्वारा की गई थी,जिन्होंने खुद को पठानकोट में स्थापित किया,उन्होंने यहाँ गजनवी काल से स्थापित मुस्लिम गवर्नर कुजबक खान को पराजित कर उसे मार भगाया और पठानकोट किला और राज्य पर अधिकार जमाया,इसके बाद जैतपाल तंवर और उनके वंशज पठानिया राजपूत कहलाने लगे,उनके बाद क्रमश: खेत्रपाल,सुखीनपाल,जगतपाल,रामपाल,गोपाल,अर्जुनपाल,वर्शपाल,जतनपाल,विदुरथपाल,किरतपाल,काखोपाल पठानकोट के राजा हुए.....
उनके बाद की वंशावली निम्नवत है------

राजा जसपाल(1313-1353)---इनके नो पुत्र हुए जिनसे अलग अलग शाखाएँ चल.
राजा कैलाश पाल(1353-1397)
राजा नागपाल(1397-1438)
राजा पृथीपाल(1438-1473)
राजा भीलपाल(1473-1513)
राजा बख्त्मल(1513-1558) ये अकबर के विरुद्ध शेरशाह सूरी के पुत्र सिकन्दर सूर के विरुद्ध लडे और 1558 ईस्वी में इनकी मृत्यु हुई.
राजा पहाड़ी मल(1558-1580)
राजा बासु देव(1580/1613)-----------
राजा बासु देव के समय उनसे पठानकोट का परगना छिन गया और राजधानी धमेरी स्थान्तरित हो गई,किन्तु बाद में राजा बासु ने अपनी स्थिति को मजबूत किया और अकबर के समय उन्हें 1500 का मंसब मिला जो जहाँगीर के समय बढ़कर 3500 हो गया.हालाँकि राजा बासु पर जहाँगीर को पूरा विश्वास नहीं था जिसका जिक्र तुजुक ए जहाँगीरी में मिलता है,राजा बासु ने नूरपुर धामेरी में बड़ा दुर्ग बनवाया जो आज भी स्थित है,शाहबाद के थाने में राजा बासु की ईस्वी 1613 में मृत्यु हो गई.
राजा सूरजमल(1613-1618)---राजा बासु ने अपने बड़े पुत्र जगत सिंह को राजा बनाया पर जहाँगीर ने उसके छोटे पुत्र सूरजमल को धमेरी का राजा बनाकर तीन हजार जात और दो हजार सवार का मनसबदार बना दिया,उनकी ईस्वी 1618 में चंबा में मृत्यु हो गई.
मियां माधो सिंह को जहागीर ने राजा का ख़िताब दिया उनकी ईस्वी 1623 में मृत्यु हो गई.
राजा जगत सिंह (1618-1646)---
शाहजहाँ के समय राजा जगत सिंह फिर से धामेरी के राजा बन गये.इन्हें पहले 300 का मनसब मिला बाद में बढ़कर 1000 आदमी और 500 घोड़े का थे
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शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2017

"आयौ घोष बड़ौ व्यौपारी"

घोषम्, क्ली, (घोषति शब्दायते इति । घुष विशब्दने + अच् ।) कांस्यम् । इति राजनिर्घण्टः ॥ घोषः, पुं, (घोषन्ति शब्दायन्ते गावो यस्मिन् । घुषिर् विशब्दने + “हलश्च ।” ३ । ३ । १२१ । इति घञ् ।) आभीरपल्ली । (यथा, रघुः । १ । ४५ । “हैयङ्गवीनमादाय घोषवृद्धानुपस्थितान् । नामधेयानि पृच्छन्तौ वन्यानां मार्गशाखिनाम् ॥” घोषति शब्दायते इति । घुष + कर्त्तरि अच् ।) गोपालः । (घुष + भावे घञ् ।) ध्वनिः । (यथा, मनुः । ७ । २२५ । “तत्र भुक्त्वा पुनः किञ्चित् तूर्य्यघोषैः प्रहर्षितः । संविशेत्तु यथाकालमुत्तिष्ठेच्च गतक्लमः ॥”) घोषकलता । कांस्यम् । मेघशब्दः । इति मेदिनी । षे । ११ ॥ मशकः । इति त्रिकाण्ड- शेषः ॥ (वर्णोच्चारणवाह्यप्रयत्नविशेषः । यदुक्तं शिक्षायाम् । २० । “संवृतं मात्रिकं ज्ञेयं विवृतं तु द्बिमात्रिकम् । घोषा वा संवृताः सर्व्वे अघोषा विवृताः स्मृताः ॥”) कायस्थादीनां पद्धतिविशेषः । (यथा, कुलदीपि- कायाम् । “वसुवंशे च मुख्यौ द्वौ नाम्ना लक्षणपूषणौ । घोषेषु च समाख्यातश्चतुर्भुजमहाकृती ॥”) अमरकोशः
व्रज में गोप अथवा आभीर घोष कहलाते हैं ।
संज्ञा स्त्री०[संघोष + कुमारी] गोपबालिका । गोपिका । उ०—प्रात समै हरि को जस गावत उठि घर घर सब घोषकुमारी ।—(भारतेंदु ग्रं० भा० २, पृ० ६०६ )
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संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० आभीरी] १. अहीर । ग्वाल । गोप — आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघ रुप जे । (राम चरित मानस । ७ । १३० )
तुलसी दास ने अहीरों का वर्णन भी विरोधाभासी रूप में किया है ।कभी अहीरों को निर्मल मन बताते हैं तो कभी अघ ( पाप ) रूप देखें -
"नोइ निवृत्ति पात्र बिस्वासा । निर्मल मन अहीर निज दासा- (राम चरित मानस, ७ ।११७ )
विशेष—ऐतिहासिकों के अनुसार भारत की एक वीर और प्रसिद्ध यादव जाति जो कुछ लोगों के मत से बाहर से आई थी ।
इस जातिवालों का विशेष ऐतिहसिक महत्व माना जाता है । कहा जाता है कि उनकी संस्कृति का प्रभाव भी भारतीय संस्कृति पर पड़ा । वे आगे चलकर आर्यों में घुलमिल गए । इनके नाम पर आभीरी नाम की एक अपभ्रंश (प्राकृत) भाषा भी थी । य़ौ०—आभीरपल्ली= अहीरों का गाँव । ग्वालों की बस्ती । २. एक देश का नाम । ३. एत छंद जिसमें ११ । मात्राएँ होती है और अंत में जगण होता है । जैसे—यहि बिधि श्री रघुनाथ । गहे भरत के हाथ । पूजत लोग अपार । गए राज दरबार । ४. एक राग जो भैरव राग का पुत्र कहा जाता है ।
संज्ञा पुं० [सं० आभीर] [स्त्री० अहीरिन] एक जाति जिसका काम गाय भौस रखना और दूध बेचना है । ग्वाला ।
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     यादव योगेश कुमार'रोहि'ग्राम-आज़ादपुर पत्रालय पहाड़ीपुर जनपद अलीगढ़ --

रविवार, 22 अक्टूबर 2017

टिप्पणी लेखन :-

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इस विषय में भी सुझावों का उल्लेख।
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(6) कार्यालय की ओर से लिखे जा रहे टिप्पण में उन सभी बातों या तथ्यों का सही-सही उल्लेख होना चाहिए जो उस पत्रावली के निस्तारण के लिए आवश्यक हों। (7) यथासम्भव एक विषय पर कार्यालय की ओर से एक ही टिप्पण लिखा जाना चाहिए। (8) जहाँ तक सम्भव हो, टिप्पण इस ढंग से लिखा जाना चाहिए कि पत्रावली में पत्र जिस क्रम से लगे हों, टिप्पण में भी उनका वही क्रम रहे। (9) टिप्पण सदा स्याही से लिखे या टंकित होने चाहिए। (10) लिपिक, सहायक और कार्यालय अधीक्षक को कागज की बाई ओर अपने नाम के प्रथमाक्षरों का ही प्रयोग करना चाहिए। उच्च अधिकारी को अपना पूरा नाम लिखना पड़ता है। (11) टिप्पणों में ऐसे शब्दों का प्रयोग कभी नहीं करना चाहिए, जिनके अर्थ समझने में कठिनाई हो। टिप्पण लेखन का उदाहरण विहार राज्य के एक स्कूल के प्रधानाध्यापक ने राज्यसभा सचिवालय के सचिव को पत्र लिखकर दिनांक १० अक्टूबर २०१७ को होनेवाले उपवेशन में अध्यापकों के नेतृत्व में 950 छात्रों के साथ उपस्थित होने के लिए प्रवेशपत्रों की व्यवस्था के सन्दर्भ में प्रार्थनापत्र लिखा। उस कार्यालय के लिपिक ने निम्नलिखित टिप्पण लिखा।
- प्राप्त पत्रसंख्या 8, पृष्ठांक 9 । टिप्पण- यह पत्र पटना विद्यालय, पाटिलीपुत्र , विहार राज्य के प्रधानाध्यापक ने भेजा है। इसमें प्रार्थना की गयी है कि उक्त विद्यालय के 950 छात्र थे । 5 अध्यापकों के लिए राज्यसभा के दिनांक १० अक्टूबर २०१७को होनेवाले उपवेशन में उपस्थित होने के लिए आवश्यक प्रवेशपत्रों की व्यवस्था की जाय। प्रवेशपत्र-वितरण-सम्बन्धी विनियम-संख्या 90 के अधीन हम उक्त प्रार्थना को स्वीकार कर सकते है। किन्तु हमें उक्त विद्यालय के प्रधानाध्यापक को यह सूचित करना होगा कि हमारी दर्शक दीर्घा (visitors gallery) में स्थान अत्यन्त सीमित है, अतः एक साथ केवल 25 छात्र ही दीर्घा में उपस्थित रह सकेंगे। इसके लिए इन छात्रों को 25-25 के 6 समूहों में विभक्त होकर ही दीर्घा में जाना होगा। हमें प्रार्थी को यह भी सूचित करना होगा कि जिन छात्रों के लिए प्रवेश-पत्रों की प्रार्थना की गयी है उनमें से प्रत्येक का नाम, पिता का नाम, स्थायी पता तथा दिल्ली में ठहरने का पता इत्यादि की सूचना प्राप्त होने पर ही प्रवेशपत्र जारी किये जा सकते है।
साथ ही, प्रत्येक छात्र के लिए पृथक प्रवेशपत्र जारी करने के स्थान पर यदि हम 25-25 के समूह के नाम एक-एक प्रवेशपत्र बना दें, तो इससे कार्य में अधिक सुविधा होगी। आदेशार्थ निवेदित डी०अवरसचिव: मैंने आलेख में कुछ परिवर्तन कर दिये है। टंकित आलेख प्रेषित करें।
'टिप्पण शब्द संस्कृत की 'टिप् धातु से बना है। 'टिप् का अर्थ है :--भेजना
तथा टिप्पणी का अर्थ है:- टीका।
इस प्रकार टिप्पण का अर्थ है. भेजे जाने वाली टीका। यह व्युत्पत्तिपरक अर्थ टिप्पणी शब्द के वर्तमान अर्थ का समानार्थी न होने पर भी उससे मिलता-जुलता अवश्य है।
संस्कृत भाषा में टिप्पनी शब्द का विकास इस प्रकार हुआ :- (टेपयति व्याख्यायतेऽनया अर्थात् इसके द्वारा व्याख्या की जाती है वह टिप्पणी है ।
टिप + करणे ल्युट् ङीप् च :- टिप्पनी  पृषोदरादित्वात् पस्य द्बित्वे साधुः ) :-- टीका ।
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यथा  - “श्रीमतङ्गाननं नत्वा लीलावत्याः सुटिप्पनी ।   भवेशेन सुबोधार्थं क्रियते यद्गुरोः श्रुतम् ।। ”)
टिप--क्विप् टिपा पन्यते स्तूयते पन--धञर्थे क गौरा० ङीष् । टीकायाम् । सा च टीकाव्याख्यारूप- तयैव व्यवह्रियते यथा चिन्तामणिटीकाया दीधितिव्या- ख्यायाः टीका जगदीशकृता गदाधरकृता च । यथा शारीरिकसूत्रभाव्यव्याख्या पञ्चपादिका भामती च । महाभाष्यव्याख्या कैयटकृता इत्यादि । प्रथमव्याख्याया- मपि क्वचित् प्रयुज्यते यथा “श्रीमतङ्गाननं नत्वा- लीलावत्याः सुटिप्पनी । भवेशेन सुबोधार्थं क्रियते यद्गुरोः श्रुतम्” “टिप्पनी दायझागस्य...
(वाचस्पत्यम् कोश )
संस्कृत भाषा में टिप् धातु का विकास क्रिया रूप में इस प्रकार है :--- - दाभयति दिम्भयति दभि इति नन्दी दम्भयति तेपयति टेपयति डेपयति स्तेपयति डबि डिबि इति चन्द्रः विडम्बयति आडम्बरः, डिम्बयति डिम्बं शस्त्रकलहः"
तथा इतर रूप
स्तिप् :--क्षेपे ( भेजने में ) भी प्रचलित है ।
'टिप्पण शब्द का प्रयोग अंग्रेजी शब्द( noting) के हिंदी पर्याय रूप में किया जाता है।
"a song, music, instrumental music; a musical note," from Latin nota "letter, character, note," originally "a mark, sign, means of recognition," which traditionally has been connected to notus,
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past participle of noscere (Old Latin *gnoscere) "to know,"
संस्कृत भाषा में ज्ञान रूप फ़ारसी ज़ान
ken
kɛn/
noun
noun: ken
one's range of knowledge or understanding.
"politics are beyond my ken"
समानार्थी:knowledge, awareness, perception, understanding, grasp, comprehension, realization, apprehension, appreciation, consciousness, recognition, notice
"their talk hinted at mysteries beyond my ken" (ज्ञान)
verb (SCOTTISHNORTHERN ENGLISH)
verb: ken; 3rd person present: kens; past tense: kenned; past participle: kenned; past tense: kent; past participle: kent; gerund or present participle: kenning
know. :- जानना
"d'ye ken anyone who can boast of that?"
recognize; identify.
"that's him—d'ye ken him?"
मूल
Old English cennan ‘tell, make known’, of Germanic origin; related to Dutch and German kennen ‘know, be acquainted with’, from an Indo-European root shared by can1 and know. Current senses of the verb date from Middle English; the noun from the mid 16th century.
ken का अनुवाद इस भाषा में करें:
1. केन
noun
1. ज्ञान
2. विद्या
3. संज्ञा का दायरा
verb
1. जानना
2. परिचित होना
पुरानी लैटिन भाषा की क्रिया नॉसेयर (noscere):--जानना , का पूर्ण भूत काल का रूप है ।
but de Vaan reports this is "impossible," and with no attractive alternative explanation, it is of unknown origin. Meaning "notice, attention, reputation" is early . Meaning "brief writing" is from
note (v.):-- "observe, take mental note of, mark carefully," from Old French noter "indicate, designate; take note of, write down," from Latin notare "to mark, note, make a note," from nota "mark, sign, note, character, letter" (see note (n.)). Meaning "to set in writing" is from early
Related: Noted; noting.
*gno- संस्कृत ज्ञा (जन् )
*gnō-, Proto-Indo-European root meaning "to know."
It forms all or part of: acknowledge; acquaint; agnostic; anagnorisis; astrognosy; (केन can (v.1) "have power to, be able;" अर्थात्  शक्ति धारण करना २:-  योग्यों होना । निश्चित रूप से ज्ञान ही संसार की सबसे बड़ी शक्ति है ।ये व्युत्पत्तियाँ इसी भाव को ध्वनित करती हैं ।
cognition; cognizance; con (n.2) "study;" connoisseur; could; couth; cunning; diagnosis; ennoble; gnome; (n.3) "short, pithy statement of general truth;" gnomic; gnomon; gnosis; gnostic; Gnostic; ignoble; ignorant; ignore; incognito; ken (n.1) "cognizance, intellectual view;" kenning; kith; know; knowledge; narrate; narration; nobility; noble; notice; notify; notion; notorious; physiognomy; prognosis; quaint; recognize; reconnaissance; reconnoiter; uncouth; Zend.
It is the hypothetical source of/evidence for its existence is provided by: Sanskrit jna- जना "know;" Avestan zainti- (जेन्ती ) "knowledge," Old Persian xšnasatiy "he shall know;"
Old Church Slavonic znati "recognizes," Russian znat "to know;" Latin gnoscere "get to know," nobilis "known, famous, noble;" Greek :- gignoskein "to know," gnotos "known," gnosis "knowledge, inquiry;" Old Irish gnath "known;" German kennen :-- "to know," Gothic:--- kannjan "to make known."
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औपचारिक सन्दर्भो में 'टिप्पण शब्द का प्रयोग मुख्यतया दो अर्थो में किया जाता है ,
प्रशासनिक कामकाज में किसी विचाराधीन पत्र या कागज के निपटान के लिए समय-समय पर जो अभ्युक्तियाँ  लिखी जाती हैं, उन्हें टिप्पण कहते हैं।
और किसी विचारयोग्य सामाजिक, साहित्यिक, शास्त्राीय विषय पर किसी विद्वान व्यक्ति द्वारा संक्षेप में प्रस्तुत विचार विमर्श या टीका को भी टिप्पण कहा जाता है।
''टिप्पण वे लिखित अभ्युक्तियाँ हैं ।
जो किसी विचाराधीन कागज के संबंध में लिखी जाती हैं, जिससे उसके निस्तारण में सुविधा हो सके।
ये टिप्पणियां दो प्रकार की होती हैं.संक्षिप्त और विस्तृत टिप्पणियां। संक्षिप्त टिप्पणियां प्राय: अधिकारियों द्वारा की जाती हैं। जैसे.'प्रारूप पर सहमति दी जा रही है या अनुमति देना लोकहित के प्रतिकूल होगा। 'प्रार्थना अस्वीकार कर दी जाए। आदि। विस्तृत टिप्पणियां प्राय: संबंधित अधीनस्थ कर्मचारियों द्वारा लिखी जाती हैं, जिनमें विचाराधीन विषय की पूरी जानकारी, सुझाव या समीक्षा आदि प्रस्तुत किए जाते हैं।
प्रशासनिक कार्यो से अलग.सामाजिक, साहित्यिक आदि विषयों पर लिखी जाने वाली टिप्पणी अलग प्रकार की होती है। इसमें लेखक विचारणीय विषय को पूरी तरह समझकर उसके संबन्ध में कुछ बिन्दुओं का निर्धारण करता है ,और इनकी समीक्षा करते हुए अपने दृष्टि-कोण के अनुसार टिप्पण प्रस्तुत करता है। अच्छी टिप्पणी की कुछ प्रमुख विशेषताएं मानी गर्इ हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं-
पूर्णता - अच्छी टिप्पणी विचारणीय विषय से जुड़ी सभी आवश्यक-व-महत्त्वपूर्ण बातों को स्पष्ट करती है।
समस्या का समाधन - टिप्पण लिखते समय विचारणीय समस्या के समाधन के लिए हल अवश्य सुझाना चाहिए। यदि समाधन के लिए कर्इ विकल्प हों तो सारे विकल्प बताते हुए उचित विकल्प को समाधन के रूप में देना चाहिए।
व्यक्ति गत आक्षेपों सें मुक्त - टिप्पणी औपचारिक कामकाज के लिए लिखी जाती है। उसमें किसी बड़े या छोटे अधिकारी या कर्मचारी पर व्यकितगत आक्षेप नहीं होने चाहिए।
संक्षिप्तता और तारतम्यता - टिप्पण में अनावश्यक या अप्रासंगिक बातें नहीं होनी चाहिए। अत्यन्त संक्षेप में तथ्यों को तारतम्य से बनाते हुए ऐसा विकल्प सुझाना चाहिए, जिससे लगे कि कार्यवाही के लिए यही निर्देश और समाधन सर्वोत्तम है।
संयत भाषा का प्रयोग - अलग-अलग विषयों पर टिप्पण की भाषा शैली में अंतर स्वाभाविक है। साहित्यिक विषयों की टिप्पणी में लक्षणा-व्यंजना युक्त भाषा का प्रयोग हो सकता है, जबकि वैज्ञानिक शास्त्राीय विषयों से संबन्धित टिप्पणी पारिभाषिक शब्दों से युक्त भाषा में लिखी हो सकती है। इसी प्रकार प्रशासनिक काम-काज से संबंधित टिप्पणी में अभिधात्मक शब्दों से युक्त, संयत और प्रभावशाली भाषाशैली का प्रयोग आवश्यक है।   
इसमें द्वयार्थक या व्यंग्यात्मक शब्दों का प्रयोग नहीं होना चाहिए।

रामायण एक परिचय :---

अनेक रामायण यथार्थ और विकृतियां - डा. रमानाथ त्रिपाठी मेरे कुछ प्रियजनों ने बताया दिल्ली विश्वविद्यालय के बी.ए. इतिहास आनर्स (द्वितीय वर्ष) के पाठयक्रम में श्री ए.के. रामानुजन का एक लम्बा शोध निबंध लगा हुआ है-थ्री हण्ड्रेड रामायनास। इसे लेकर विवाद छिड़ गया है। आप राम साहित्य के विशेषज्ञ हैं। आप इसका तर्क-संगत विवेचन कीजिए।" मैं उपर्युक्त निबंध पढ़ गया। मुझे लगा कि इस निबंध में रामकथा के भव्य रूप के विपरीत विकृतियां खोजकर उनका परिचय देने का प्रयास किया गया है। वाल्मीकि रामायण भारतीय संस्कृति का मूलाधार है। भारत की एक-एक इंच भूमि पर इसका प्रभाव है। जैसे-जैसे समय बीतता गया बाल्मीकि प्रणीत रामकथा का विकास होता गया। यह दो रूपों में हुआ- 1. आदि रामकथा को और भी सुन्दर और युग के अनुकूल बनाया गया। 2. इसे विकृत किया गया। समाज पर राम के उदात्त चरित्र का जबरदस्त प्रभाव देखकर एक-दो सम्प्रदायों के अनुयायियों ने अपने को राम से जोड़ने का प्रयास किया। उन्होंने अपने मत के सिद्धान्तों के अनुसार रामकथा को बदला हुआ रूप दिया। रामकथा को विकृत करने का एक और भी कारण था। यह जिस देश या प्रदेश में गयी वहीं के परिवेश और परम्परा में ढाल दी गयी। इन प्रदेशों का चिन्तन बहुत उच्च स्तर का नहीं था। रामानुजन ने अपनी रुचि बाल्मीकि रामायण के भव्य चित्रण की अपेक्षा उसकी विकृतियों में प्रस्तुत करने में अधिक दिखायी है। उन्होंने कई बातें कही हैं, मैं उनकी प्रमुख बातों का संक्षिप्त उत्तर दूंगा। बाल्मीकि से पार्थक्य दिखाने के लिए रामानुजन ने अपने कर्नाटक प्रदेश से एक रामकथा ली है। उन्होंने बताया है कि कन्नड़ भाषी अस्पृश्य जाति के भाट लोग रामकथा-विषयक लोकगीत का गायन किया करते हैं। नि:सन्तान रावण की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने योगी के रूप में प्रकट होकर उसे आम का फल देकर कहा, इसका गूदा मन्दोदरी को देना और तुम इसकी गुठली चूसना। रावण ने इसका उल्टा किया, फलत: उसे गर्भ रह गया। यह गर्भ नौ दिन में नौ मास का हो गया। रावण को छींक आयी, इससे कन्या का जन्म हो गया। यह सीता थी। कन्नड में सीता शब्द का अर्थ है "वह छींका।" इस शब्दार्थ को चरितार्थ करने के लिए यह लोककथा गढ़ी गयी। इस प्रकार की विकृत कथा को भाटों से कितने लोगों ने सुना होगा- हजार, दस हजार लोगों ने। कन्नड़ भाषा की प्रतिनिधि रामायण है तोरवे रामायण। इस रामायण का ढांचा बाल्मीकि रामायण का है। इसमें बाल्मीकि से पार्थक्य भी है। एक उदाहरण प्रस्तुत है- बाल्मीकि रामायण में लक्ष्मण पराक्रम के कारण मेघनाद को मारते हैं, तोरवे रामायण में संयम के कारण। उन्होंने 12 वर्ष तक भोजन और नींद का परित्याग किया था तथा ब्राहृचर्य व्रत का पालन किया था। किन्तु रामानुजन की रुचि शुभ नहीं, अशुभ के चित्रण में अधिक है। रामानुजन ने लिखा है कि सन्थालों की रामकथा में सीता असती हैं। लक्ष्मण और रावण उनके साथ व्याभिचार करते हैं। फादर कामिल बुल्के से सन्थालों में प्रचलित रामकथा का जो विवरण दिया है उसमें ऐसी सत्यानाशी बातें नहीं हैं। बुल्के ने बताया है कि सन्थालों में इस बात का प्रचार है कि रावण वध के बाद लौटकर राम ने सन्थालों के यहां ठहर कर एक शिव मन्दिर बनाया। वे नित्य प्रति सीता के साथ आकर पूजा किया करते थे। बाल्मीकि रामायण में लक्ष्मण सीता को देवी जैसा मानते थे और कभी आंख उठाकर उन्हें नहीं देखते थे। राम से प्रथम भेंट होने पर सुग्रीव ने सीता द्वारा फेंके गए गहने दिखाये थे। लक्ष्मण सीता के केवल नूपुर पहचान सके थे, क्योंकि नित्य प्रात: काल वे उनके पैर छूते थे। यह प्रसंग रामानुजन के प्रदेश की तोरवे रामायण में भी है। इस प्रसंग ने भारतीय समाज के समक्ष देवर-भाभी के पवित्र सम्बंध का आदर्श प्रस्तुत किया है, जो आज तक चला आ रहा है। प्राय: वनवासी लोग राम को अपना मानते हैं, क्योंकि दोनों ही धनुषधारी हैं और दोनों ही वनों से भटकते फिरते हैं। ये लोग सृष्टि में जो कुछ भी अच्छा देखते हैं उसे राम-सीता के वरदान के कारण मानते हैं और जो अच्छा नहीं है उसे राम-सीता के शाप का कारण बताते हैं। सन्थाल मानते हैं कि गिलहरी ने राम को सीता का पता बताया, अत: उन्होंने उसकी पीठ पर हाथ फेरा। फलस्वरूप उसकी पीठ पर धारियां हैं। बगुला ने राम को सीता का पता नहीं बताया, इसलिए लक्ष्मण ने उसकी गर्दन खींचकर लम्बी कर दी। मध्य भारत की परजा और जुआंग जनजाति की स्त्रियां नग्न रहती हैं। उनका कहना है कि जब सीता माता साधारण वस्त्र पहने यहां से निकलीं तो इनकी पूर्वजाओं ने अपने सुन्दर वस्त्रों पर गर्व करते हुए सीता का उपहास किया। सीता ने उन्हें शाप दिया "आज से तुम नग्न रहोगी।" तभी से ये स्त्रियां नग्न रहती हैं। जाड़े के रात ये आग तापकर बिताती हैं। कितनी श्रद्धा है सीता के प्रति कि ये शताब्दियों से उनका अभिशाप स्वेच्छा से ढ़ोती आ रही हैं। प्रत्येक भारतीय भाषा के कवियों ने प्रयास किया है कि सीता को अधिक से अधिक पवित्र दिखाया जाए। वे चरम पतिव्रत की साकार परिभाषा हैं। तुलसीदास के "मानस" में जब सजी-धजी सीता विवाह-मण्डप में आती हैं तो उनका अनुपम सौन्दर्य देख उपस्थित लोग मन ही मन प्रणाम कर उठते हैं। ऐसी सीता को लक्ष्मण और रावण की भोग्या बताने वाले प्रसंग छात्रों के सामने परोसे जा रहे हैं। रामानुजन ने थाई रामायण के अनुसार बताया कि इस ग्रन्थ में हनुमान प्रेमी के रूप में दिखाये गए हैं। इनको लंका के शयनग्रहों में ताक-झांक करने में कोई परहेज नहीं, साथ ही इन्हें सोती हुई परायी स्त्रियों के देखने में कोई बुराई नहीं दिखायी देती। बाल्मीकि रामायण के हनुमान तीनों वेदों के ज्ञाता, बहुभाषाविद्, संयमी, ब्राहृचरी, पराक्रमी और चतुर राजनीतिज्ञ हैं। वे जब सीता को खोजते हुए रावण के अन्त:पुर में गए तो अनेक अद्र्धनग्न स्त्रियों का सोता देख चिन्तित हो उठे। वे सोचने लगे कि इस प्रकार गहरी नींद में सोयी परायी स्त्रियों को देखना अच्छा नहीं है। इससे तो मेरे धर्म का विनाश होगा। अभी तक मेरी दृष्टि परायी स्त्रियों पर नहीं पड़ी थी। फिर उन्होंने सोचा, मैंने इन्हें देखा है, किन्तु मेरे मन में कोई विकार उत्पन्न नहीं हुआ। मैं माता सीता को स्त्रियों के बीच ही खोज सकता हूं। जीव की जो जाति होती है उसी में उसे खोजा जाता है। खोयी हुई स्त्री को हिरनियों के बीच तो नहीं खोजा जा सकता। मैंने रावण के अन्त:पुर में शुद्ध ह्मदय से खोज की है। (बा.रा.5,11) रामानुजन ने कहा है कि जैन राम-साहित्य में रावण को उदार, विद्वान और जैन मतावलम्बी दिखाया गया है। उन्होंने सीता के द्वारा रावण का चित्र बनाए जाने का भी उल्लेख किया है। वस्तुस्थिति यह है कि जैन कवि विमत सूरि (तीसरी-चौथी शती) ने अपने ग्रन्थ पउमचरियं में लिखा है कि सौतों के कहने से सीता ने रावण का चित्र बनाया और इसे राम को दिखाकर सीता के चरित्र पर सन्देह कराया। इस प्रसंग से राम पर दो आक्षेप हुए। 1. उनके कई पत्नियां थीं और 2. उन्होंने सीता के चरित्र पर सन्देह कर उन्हें निर्वासित किया। जैन राम-साहित्य के ये परिवर्तित प्रसंग एशियाई रामकथाओं में उपलब्ध हैं। जैन साहित्य के अनुसार राम और हनुमान की कई पत्नियां हैं। वाल्मीकि रामायण और उससे प्रभावित ग्रंथों में राम एक पत्नीव्रत धारी हैं। उन्होंने कभी सीता के चरित्र पर सन्देह नहीं किया। उन्होंने जनमत (प्रजा का मत) का सम्मान करते हुए बहुत व्यथित ह्मदय से सीता को निर्वासित किया था। सीता के अभाव में वे धार्मिक क्रियाएं बगल में सीता की स्वर्ण प्रतिमा स्थापित कर किया करते थे। उन्होंने किसी अन्य नारी से विवाह नहीं किया था। उनका दोष यही था कि वे आवश्यकता से अधिक कर्तव्य परायण शासक थे। चित्र प्रसंग और धोबी-प्रसंग वाल्मीकी रामायण में नहीं हैं। 1998 ई. में भारत सरकार ने मुझे मॉरिशस के अन्तरराष्ट्रीय रामायण सेमिनार में भाग लेने के लिए भेजा था। भाषण के लिए विषय दिया गया था- "एशियाई देशों में रामकथा का स्वरूप।" मैं इस विषय पर तुलसी मानस प्रतिष्ठान (भोपाल) और भारत विकास परिषद् (दिल्ली) के मंचों से भी बोल चुका हूं। रामानुजन ने जैसी बातें बतायी हैं उससे भी भयंकर बातें मैंने बतायी थीं। सुनकर श्रोता उत्तेजित हो उठते थे। लगता था कि वे मुझे बोलने से रोक देंगे। पर जब मैं समापन करता तो तालियों की गड़गड़ाहट होती। उत्तेजित लोग तुष्ट और प्रसन्न जान पड़ते। मेरे भाषण के तीन भाग होते थे। पहले भाग में, मैं बाल्मीकि के राम के उदात्त चरित्र का परिचय देता। दूसरे भाग में एशियाई देशों की विशेषताएं बताता। तीसरे भाग में निष्कर्ष देता कि एशियाई देशों ने पावन रामकथा को अपनी सोच और परिवेश के अनुसार ढाल लिया है। उन्होंने मनोरंजन के लिए रामकथा अपनायी थी। उसमें वे बाल्मीकि द्वारा प्रदत्त उच्च नैतिक मूल्य नहीं दे सके। हमें गर्व होना चाहिए कि इतने सारे देशों तक हमारे राम पहुंचे। हमें प्रेरणा अपनी पारम्परिक रामकथा से ही लेनी है। क्या रामानुजन ने ऐसा दृष्टिकोण अपनाया? वे तो केवल विकृतियां ही खोजते रहे। रामानुजन का यह आलेख बाउला रिचमैन 1942 में द्वारा सम्पादित पुस्तक "मैनी रामायनास-"दि डाइवर्सिटी आफ ए नैरिटिव ट्रैडिशन इन साउथ एशिया" का एक भाग है। लगता है कि पाउला रिचमैन ने बाल्मीकि-रामायण के प्रभाव को नकारने के लिए यह पुस्तक सम्पादित की है। मैं ऐसी पुस्तकों पर पाबंधी लगाने की बात कभी नहीं कहूंगा। ऐसी पुस्तकें केवल कुछ वयस्क प्रबुद्ध पढ़ेंगे और उनके मन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा। आपत्तिजनक बात है रामकथा के विकृत अंशों को बी.ए.के छात्रों पर थोप देना। उन्हें ये प्रसंग बलात पढ़ने पड़ेंगे। आदरणीय न्यायमूर्ति श्री हिदायतुल्ला खां ने अश्लीलता के सम्बंध में जो निर्णय दिया था उसे अंशत: यहां उद्धृत किया जा रहा है- "यदि आलोच्य पुस्तक कच्चे दिमाग वाले के हाथ में पड़े और उसको देखने-पढ़ने से वह चरित्र भ्रष्ट होता हो तो उसे अश्लील कहेंगे।.... लेखक का जीवन दर्शन इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना किशोर मति युवक-युवतियों पर इसका क्या असर पड़ेगा, यह देखना जरूरी हो जाता है।" (ईक्षा, अंक 5, वर्ष 2007 मैं प्रकाशित श्री अवध बिहारी ओझा का लेख) न्यायमूर्ति महोदय ने किशोरमति युवक युवतियों को ध्यान में रखकर जो कुछ कहा है वह इतिहास के पाठ्यक्रम के सम्बंध में भी लागू माना जा सकता है। अपसंस्कृति और अनास्था के इस युग में जीवन मूल्य ध्वस्त होते जा रहे हैं। ऐसे समाचार आते रहते हैं जिनसे ज्ञात होता है कि बाप-बेटी, भाई-बहिन और देवर-भाभी के पवित्र सम्बंध विनष्ट हो रहे हैं। आज (मान सेल्फिश, इण्टैलिजेण्ट, वाइल्ड वीस्ट) स्वार्थी, बुद्धिमान जंगली हिंस्र पशु बनता जा रहा है। ऐसे माहौल में विकसित बुद्धि के छात्रों के समक्ष बाल्मीकि रामायण का उज्ज्वल पक्ष रखा जाना चाहिए, न कि दक्षिण एशिया में प्रचारित रामकथा के विकृत अंश। हां, जो छात्र एम.ए.के परीक्षा उत्र्तीण कर इसी विषय पर शोध करना चाहे तो किसी को क्या आपत्ति हो सकती है। NEWS