सोमवार, 30 अक्टूबर 2023
दातव्यं दानं तु दीयते दीनं दयनीयं
"दातव्यं दानं तु दीयते दीनं दयनीयं वा।
उच्च दानं दातुः इच्छानुरूपं सुप्रभा।
भिक्षितव्य भिक्षा भिक्षुकस्य इच्छानुरूपा
पुण्यरहिता तुच्छा हीना इयं किंवा ।१।
अनुवाद:-
"दान देना ही कर्तव्य है" - तो दान दीन को देना चाहिए जो दया का पात्र होता है यह दान उच्च और दाता की इच्छा के अनुसार होता है।
भीख भिखारी की इच्छा के अनुसार और दान की अपेक्षा तुच्छ व हीन होती है इसका कोई पुण्य नही होता है।१।
आभीर संहिता-
यान्ति देवव्रता देवान् पितृ़न्यान्ति पितृव्रताः।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।।
(श्रीमद्भगवद्गीता-9/25)
अनुवाद:-
देवताओं का पूजन करनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं। पितरों का पूजन करने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं। भूत-प्रेतों का पूजन करने वाले भूत-प्रेतों को ही प्राप्त होते हैं।
परन्तु हे अर्जुन! मेरा पूजन करने वाले वैष्णव भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।
____________________
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।
-श्रीमद्भगवद्गीता-(18.66)
अनुवाद:-
सब धर्मां का परित्याग करके मुझ एक की शरण में आ जा। मैं तुझे सारे पापों से छुड़ा दूँगा। तू शोक मत कर।66।
दातव्यमिति यद्दानं
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।।17.20।।
(श्रीमद्भगवद्गीता १७/२०)
अनुवाद:-
"दान देना ही कर्तव्य है" - इस भाव से जो दान देश, काल को देखकर ऐसे (योग्य) पात्र (व्यक्ति) को दिया जाता है, जिससे प्रत्युपकार की अपेक्षा नहीं होती है, वह दान सात्त्विक माना गया है।१७।
रविवार, 29 अक्टूबर 2023
एकानंशां च कन्यां
*प्रद्युम्नाख्यान-वर्णन, श्रीकृष्ण का सोलह हजार आठ रानियों के साथ विवाह और उनसे संतानोत्पत्ति का कथन, दुर्वासा का द्वारका में आगमन और वसुदेव कन्या एकानंशा के साथ विवाह, श्रीकृष्ण के अद्भुत चरित्र को देखकर दुर्वासा का भयभीत होना, श्रीकृष्ण का उन्हें समझना और दुर्वासा का पत्नी को छोड़कर तप के लिए जाना
एकदा द्वारकां रम्यां दुर्वासा मुनिपुंगवः ।
शिष्यैस्त्रिकोटिभिः सार्धमाजगामावलीलया ।४०।
राजा महोग्रसेनश्च सपुत्रः सपुरोहितः ।
वसुदेवो वासुदेवोऽप्यक्रूरश्चोद्धवस्तथा ।। ४१ ।।
नीत्वा षोडशोपचारं प्रणेमुर्मुनिपुंगवम् ।
शुभार्शिषं च प्रददौ तेभ्यो ब्रह्मन्पृथक्पृथक् ।४२ ।।
एकानंशां च कन्यां तां ददौ तस्मै शुभक्षणे।
मुक्तामाणिक्यङीरांश्च रत्नं च यौतकं ददौ।४३।
स रेमे रामया सार्ध माहेन्द्रे रत्नमन्दिरे ।
रत्नेन्द्रसारनिर्माणं ददौ तस्मै शुभाश्रमम् ।४४ ।।
एकदा स मुनिश्रेष्ठः समालोच्य स्वचेतसा ।
शयानं कृत्रचिद्रम्यपर्यङ्के रत्ननिर्मिते ।। ४५ ।।
श्रुतवन्तं पुराणं च श्रद्धया कुत्रचिद्धिभुम् ।
महोत्सवे नियुक्तं च कुत्रचित्प्राङ्गणे शुभे ।। ४६ ।।
तामबूलं भुक्तवन्तं च भक्त्या दत्तं च सत्यया ।
कुत्रचित्सेवितं तल्पे रुक्मिण्या श्चेतचामरैः ।४७ ।।
कालिन्दीसेपितपदं शयानं कुत्रचिन्मुदा ।
सर्वत्र समसंभाषां चकार भगवान्मुनिम् ।। ४८ ।।
विस्मयं प्रययौ विप्रौ दृष्ट्वा तत्परमाद्भुतम् ।
तुष्टाव जगतीनाथं रुक्मिणीमन्दिरे पुनः
वसन्तं च सुधर्मायां सतां संसदि सुन्दरम् ।। ४९ ।।
"दुर्वासा उवाच
जय जय जगतां नाथ जितसर्व जनार्दन सर्वात्मक
सर्वेश सर्वबीज पुरातन निर्गुण निरीह ।। ५० ।।
निर्लिप्त निरञ्जन निराकार भक्तानुग्रहविग्रह सत्यम्वरूपसनातन निःस्वरूप नित्यनूतन ।५१ ।।
ब्रह्मेशशेषधनेशवन्दित पद्मया सेवितपादपद्म ब्रह्मज्योतिरनिर्वचनीय वेदाविदितगुणरूप महाकाशसंमाननीय परमात्मन्नमोऽस्तु ते ।५२ ।।
इत्येवमुक्त्वा मनसा हरेरनुमतेन च ।
प्रणम्य तस्थौ विप्रेन्द्रस्तत्रैव पुरतो हरेः ।। ५३ ।।
तमुवाच जगन्नाथो हितं सत्यं पुरातनम् ।
ज्ञानं च वेदविहितं सर्वेषां च सतां मतम् ।। ५४ ।।
"श्रीभगवानुवाच
मा भेर्विप्र शिवांशस्त्वं किं न जानासि ज्ञानतः ।
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।। ५५ ।।
अहमात्मा च सर्वेषां शावाः सर्वे मया विना ।
प्राणिदेहान्मयि गते यान्त्येव सर्वशक्तयः ।। ५६ ।।
जातावप्येक एवाहं व्यक्तावेव पृथक्पृथक् ।
यो भुङ्क्ते तस्य तृप्तिः स्यान्नान्येषां च कदाचन ।। ५७ ।।
पृथग्जीवादिसर्वेषां प्रतिमानं च प्राणिनाम् ।
परिपूर्णतमोऽहं च गोलोके रासमण्डले ।५८ ।।
श्रीदामशापाद्राधा सा मां द्रष्टुमक्षमाऽधुना ।
सर्वे चैवांशरूपेणा कलया च तदंशतः । ५९ ।।
रुक्मिणीमन्दिरे चांशोऽप्यन्यासां मन्दिरे कलाः ।
ममापि कुत्रचिच्चांशं कुत्र चिच्च कलाकलाः।६०।
कलाकलांशाः कुत्रापि प्रतिमासु च देहिषु ।
इत्युक्त्वा जगतां नाथो गृहस्याभ्यन्तरं ययौ
दुर्वासाश्च प्रियां त्यक्त्वा श्रीहरेस्तपसे गतः।६१ ।।
इति श्रीब्रह्मo महाo श्रीकृष्णजन्मखo उत्तo नारदनाo मुनिकृष्णसंo
द्वादशाधिकाशततमोऽध्यायः ।। ११२ ।।
शिष्यैस्त्रिकोटिभिः सार्धमाजगामावलीलया ।४०।
राजा महोग्रसेनश्च सपुत्रः सपुरोहितः ।
वसुदेवो वासुदेवोऽप्यक्रूरश्चोद्धवस्तथा ।। ४१ ।।
नीत्वा षोडशोपचारं प्रणेमुर्मुनिपुंगवम् ।
शुभार्शिषं च प्रददौ तेभ्यो ब्रह्मन्पृथक्पृथक् ।४२ ।।
एकानंशां च कन्यां तां ददौ तस्मै शुभक्षणे।
मुक्तामाणिक्यङीरांश्च रत्नं च यौतकं ददौ।४३।
स रेमे रामया सार्ध माहेन्द्रे रत्नमन्दिरे ।
रत्नेन्द्रसारनिर्माणं ददौ तस्मै शुभाश्रमम् ।४४ ।।
एकदा स मुनिश्रेष्ठः समालोच्य स्वचेतसा ।
शयानं कृत्रचिद्रम्यपर्यङ्के रत्ननिर्मिते ।। ४५ ।।
श्रुतवन्तं पुराणं च श्रद्धया कुत्रचिद्धिभुम् ।
महोत्सवे नियुक्तं च कुत्रचित्प्राङ्गणे शुभे ।। ४६ ।।
तामबूलं भुक्तवन्तं च भक्त्या दत्तं च सत्यया ।
कुत्रचित्सेवितं तल्पे रुक्मिण्या श्चेतचामरैः ।४७ ।।
कालिन्दीसेपितपदं शयानं कुत्रचिन्मुदा ।
सर्वत्र समसंभाषां चकार भगवान्मुनिम् ।। ४८ ।।
विस्मयं प्रययौ विप्रौ दृष्ट्वा तत्परमाद्भुतम् ।
तुष्टाव जगतीनाथं रुक्मिणीमन्दिरे पुनः
वसन्तं च सुधर्मायां सतां संसदि सुन्दरम् ।। ४९ ।।
"दुर्वासा उवाच
जय जय जगतां नाथ जितसर्व जनार्दन सर्वात्मक
सर्वेश सर्वबीज पुरातन निर्गुण निरीह ।। ५० ।।
निर्लिप्त निरञ्जन निराकार भक्तानुग्रहविग्रह सत्यम्वरूपसनातन निःस्वरूप नित्यनूतन ।५१ ।।
ब्रह्मेशशेषधनेशवन्दित पद्मया सेवितपादपद्म ब्रह्मज्योतिरनिर्वचनीय वेदाविदितगुणरूप महाकाशसंमाननीय परमात्मन्नमोऽस्तु ते ।५२ ।।
इत्येवमुक्त्वा मनसा हरेरनुमतेन च ।
प्रणम्य तस्थौ विप्रेन्द्रस्तत्रैव पुरतो हरेः ।। ५३ ।।
तमुवाच जगन्नाथो हितं सत्यं पुरातनम् ।
ज्ञानं च वेदविहितं सर्वेषां च सतां मतम् ।। ५४ ।।
"श्रीभगवानुवाच
मा भेर्विप्र शिवांशस्त्वं किं न जानासि ज्ञानतः ।
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।। ५५ ।।
अहमात्मा च सर्वेषां शावाः सर्वे मया विना ।
प्राणिदेहान्मयि गते यान्त्येव सर्वशक्तयः ।। ५६ ।।
जातावप्येक एवाहं व्यक्तावेव पृथक्पृथक् ।
यो भुङ्क्ते तस्य तृप्तिः स्यान्नान्येषां च कदाचन ।। ५७ ।।
पृथग्जीवादिसर्वेषां प्रतिमानं च प्राणिनाम् ।
परिपूर्णतमोऽहं च गोलोके रासमण्डले ।५८ ।।
श्रीदामशापाद्राधा सा मां द्रष्टुमक्षमाऽधुना ।
सर्वे चैवांशरूपेणा कलया च तदंशतः । ५९ ।।
रुक्मिणीमन्दिरे चांशोऽप्यन्यासां मन्दिरे कलाः ।
ममापि कुत्रचिच्चांशं कुत्र चिच्च कलाकलाः।६०।
कलाकलांशाः कुत्रापि प्रतिमासु च देहिषु ।
इत्युक्त्वा जगतां नाथो गृहस्याभ्यन्तरं ययौ
दुर्वासाश्च प्रियां त्यक्त्वा श्रीहरेस्तपसे गतः।६१ ।।
इति श्रीब्रह्मo महाo श्रीकृष्णजन्मखo उत्तo नारदनाo मुनिकृष्णसंo
द्वादशाधिकाशततमोऽध्यायः ।। ११२ ।।
नारद ! एक समय की बात है। मुनिवर दुर्वासा अनायास घूमते-घूमते रमणीय द्वारकापुरी में आये। उस समय उनके साथ तीन करोड़ शिष्य भी थे। उन्हें आया देखकर पुत्र और पुरोहित के साथ महाराज उग्रसेन, वसुदेव, श्रीकृष्ण, अक्रूर तथा उद्धव षोडशोपचार द्वारा मुनिवर की पूजा करके उन्हें प्रणाम किया। ब्रह्मन!
तब मुनिवर ने उन्हें पृथक-पृथक शुभाशीर्वाद दिये। तदनन्तर वसुदेव जी ने अपनी कन्या एकानंशा को शुभ मुहूर्त में महर्षि दुर्वासा को दान कर दिया और बहुत से मोती, माणिक्य, हीरे तथा रत्न दहेज में दिये।
उन्होंने दुर्वासा को बहुमूल्य रत्नों द्वारा निर्मित एक सुंदर आश्रम भी दिया।
एक बार मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा ने अपने मन में विचारकर देखा कि कहीं तो श्रीकृष्ण रत्ननिर्मित मनोहर पलंग पर शयन कर रहे हैं, कहीं वे सर्वव्यापी प्रभु श्रद्धापूर्वक पुराण की कथा सुन रहे हं, कहीं सुन्दर आँगन में महोत्सव मनाने में संलग्न हैं, कहीं सत्या द्वारा भक्तिपूर्वक दिया गया ताम्बूल चबा रहे हैं, कहीं शय्या पर पौढ़े हैं और रुक्मिणी श्वेत चँवरों द्वारा उनकी सेवा कर रही हैं, कहीं आनन्दपूर्वक शयन कर रहे हैं और कालिन्दी उनके चरण दबा रही हैं; फिर सुधर्मा सभा में सुंदर रूप धारण करके सत्यसमाज के मध्य विराज रहे हैं।
ऐश्वर्यशाली मुनि ने सर्वत्र उनके साथ समान रूप से सम्भाषण किया।
इस परम अद्भुत दृश्य को देखकर विप्रवर दुर्वासा को महान विस्मय हुआ।
तब वे पुनः रुक्मिणी के महल में उन जगदीश्वर की स्तुति करने लगे
"सा कन्या ववृधे तत्र वृष्णिसंघसुपूजिता ।
पुत्रवत् पाल्यमाना सा वसुदेवाज्ञया तदा ।४६ ।
विद्धि चैनामथोत्पन्नामंशाद् देवीं प्रजापतेः ।
एकानंशां योगकन्यां रक्षार्थं केशवस्य तु ।४७ ।
तां वै सर्वे सुमनसः पूजयन्ति स्म यादवाः।
देववद् दिव्यवपुषा कृष्णः संरक्षितो यया।४८।
तस्यां गतायां कंसस्तु तां मेने मृत्युमात्मनः ।
विविक्ते देवकीं चैव व्रीडितः समभाषत ।। ४९ ।।
" कंस उवाच!
मृत्योः स्वसः कृतो यत्नस्तव गर्भा मया हताः ।
अन्य एवान्यतो देवि मम मृत्युरुपस्थितः ।2.4.५०।
हरिवंश पुराण: विष्णु पर्व: चतुर्थ अध्याय: श्लोक 21-38 का हिन्दी अनुवाद:-
भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य होते ही सम्पूर्ण जगत में हर्षोल्लास छा गया। देवताओं के साथ इन्द्र ने उन भगवान मधुसूदन की स्तुति की। वसुदेव ने भी रात्रि में प्रकट हुए अपने पुत्ररूप भगवान अधोक्षज का स्वातन किया। उन्हें श्रीवत्स के चिह्न और दिव्य लक्षणों से सम्पन्न देखकर वसुदेव ने कहा- 'प्रभो! आप अपने स्वरूप को समेट लीजिये। देव! मैं कंस के भय से डरा हुआ हूँ, इसीलिये ऐसी बात कहता हूँ। कमलनयन! उसने मेरे बहुत-से पुत्र मार डाले हैं, जो तुमसे जेठे थे।' वैशम्पायन जी कहते हैं- जनमेजय वसुदेव का यह वचन सुनकर भगवान अच्युत ने पिता होने के कारण उनकी आज्ञा स्वीेकार कर ली और उनसे कहा, 'आप मुझे नन्दगोप के घर पहुँचा दीजिये (तथा उनकी नवजात कन्या को यहाँ उठा लाइये)'। ऐसा कहकर उन्होंने अपने चतुर्भुज रूप का उपसंहार कर लिया।
तब पुत्रवत्सल वसुदेव शीघ्र ही उस बालक को गोद में लेकर रात के समय यशोदा के घर में घुस गये। यशोदा को उनके आने का कुछ पता न चला। वहाँ उन्होंने अपने बालक को रख दिया और उस कन्या को लेकर अपने निवास स्थान में आने के बाद उसे देवकी की शय्या पर सुला दिया। इस प्रकार उन दोनों नवजात बालकों की अदला-बदली करके कृतार्थ हुए वसुदेव जी भय से व्याकुल हो उस घर से बाहर निकल गये। आनकदुन्दुभि नाम से प्रसिद्ध वसुदेव ने उग्रसेनपुत्र कंस के पास जाकर उसे अपनी सुन्दर कन्या के जन्म का समाचार निवेदन किया।
यह सुनकर पराक्रमी कंस बड़ी उतावली के साथ पैर बढ़ाता हुआ वेगशाली रक्षकों के साथ लिये वसुदेव के गृह के द्वार पर आया।
वहाँ द्वार पर पहुँचते ही उसने तुरंत पूछा- ‘कौन-सा बच्चा पैदा हुआ है? उसे शीघ्र मेरे हवाले कर दो’ ऐसी बातें कहकर वह वह वहाँ जोर-जोर से गर्जन-तर्जन करने लगा। तब देवकी के घर में एकत्रित हुई सारी स्त्रियां हाहाकार करने लगीं। देवकी ने अत्यन्त दीन होकर अश्रु गद्गद वाणी में कहा- 'प्रभो! यह तो कन्या पैदा हुई है', ऐसा कहकर वह कंस से उसके लिये याचना करती हुई बोली- 'भैया! तुमने मेरे सात तेजस्वी पुत्र जो अभी गर्भावस्था में ही थे, मार डाले हैं। यह तो कन्या है यह बेचारी आप ही मरी हुई है, देखो! यदि समझ में आये तो मेरी बात मान लो (यह कन्या मुझे दे दो)।' कंस उस कन्या को देखकर उसकी ओर आकृष्ट हुआ और मन-ही-मन प्रसन्नता का अनुभव करने लगा।
उसने कहा- 'जब कन्या मरी हुई है, तब इसे पैदा हुई कहकर इसकी ओर मन चलाना व्यर्थ है'। वह कन्या अभी गर्भ शय्या पर क्लेशपूर्वक लेटी हुई थी। अभी उसके केश गर्भस्थ जल से भीगे हुए थे। उसी अवस्था में वह कंस के आगे रख दी गयी। उस समय वह पृथ्वी के समान ही जान पड़ती थी। उस दुरात्मा पुरुष कंस ने उसे पकड़कर घुमाया और तुच्छ मानकर ऊपर से ही सहसा शिला पर दे मारा।
वह शिला पृष्ठ पर फेंकी गयी, उस गर्भ देह को त्यागकर कंस को ललकारती हुई वह सहसा आकाश में जा पहुँची। उस समय उसके लम्बे-लम्बे केश खुले हुए थे। दिव्य फूलों के हार और अनुलेपन उसकी शोभा बढ़ाते थे। हारों से उसके समस्त अंगों की शोभा बढ़ गयी थी। मस्तक पर उज्ज्वल मुकुट से विभूषित हो वह देवी सदा के लिये कन्या (कुमारी) ही रह गयी। उसकी आकृति दिव्य थी और सब देवता उसकी स्तुति करते थे।
______________
वहाँ वृष्णिवंशियों के समुदाय से भलीभाँति पूजित हो वह कन्या बढ़ने लगी। वसुदेव की आज्ञा से उस समय उसका पुत्रवत पालन होने लगा।[1]
जनमेजय! तुम इस देवी को प्रजापालक भगवान विष्णु के अंश से उत्पन्न हुई समझो। वह एक होती हुई अनंशा अंशरहित अर्थात अविभक्त थी, इसलिये एकानंशा कहलाती थी।
योगबल से कन्या रूप में प्रकट हुई वह देवी भगवान श्रीकृष्ण की रक्षा के लिये आविर्भूत हुई थी। यदुकुल में उत्पन्न हुए समस्त देवता उस देवी का आराध्य देव के समान पूजन करते थे; क्योंकि उसने अपने दिव्य देह से श्रीकृष्ण की रक्षा की थी। उसके चले जाने पर कंस ने उसे ही अपनी मृत्यु समझा और एकान्त में देवकी के पास जाकर लज्जित हो वह इस प्रकार बोला।
कंस ने कहा- 'बहिन! मैंने मृत्यु को टालने का प्रयत्न किया और इसी धोखे में तुम्हारे बच्चों को मार डाला, परन्तु देवि! कोई दूसरा ही दूसरी जगह से मेरी मृत्यु बनकर उपस्थित हो गया है। मैंने क्रूरतापूर्वक अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिये प्रयास किया; किन्तु जो मेरे अपने जन थे, उन पर ही मैं प्रहार कर बैठा।
मैं दैव के विधान को अपने पुरुषार्थ से लांघ न सका। बहिन! अपने गर्भों के लिये चिन्तन न करो। पुत्रों की मृत्यु के कारण होने वाले शोक-संताप को त्याग दो। काल ही उनके विपरीत हो गया था।
मैं तो उनके वध में केवल निमित्त मात्र बन गया हूँ। काल ही मनुष्यों का शत्रु है, काल ही एक अवस्था से दूसरी अवस्था में ला देता है और काल ही सबको संसार से उठा ले जाता है। मेरे-जैसा व्यक्ति तो इसमें निमित्तमात्र ही होता है। देवि! अपने भाग्य या कर्म के अनुसार उपद्रव तो आयेंगे ही, किंतु कष्ट की बात तो यह है कि जीव इसमें अपने को ही कर्ता मानने लगता है'।
टिप्पणी:-जैसे वात्सल्यभाव रखने वाले उपासक भगवान के बाल-विग्रह की उपासना या पूजा करते समय प्यार करते, लाड़ लड़ाते और उनके पालन-पोषण एवं संवर्धन का ध्यान रखते हैं, उसी प्रकार वसुदेव की आज्ञा से उस चिदानन्दमयी देवी का कन्या रूप से यादवों के यहाँ पूजन होने लगा।
यह टिप्पणी गीताप्रेस की है। परन्तु जब कंस ने नन्द पुत्री को मार दिया अथवा वह आकाश में उड़ गयी तो वसुदेव की पुत्री कब हुईं जिसका विवाह दुर्वासा के साथ किया गया।
यद्यपि वह आकाश में चली गयी तो भी उनके आवाहन करने पर उनके यहाँ पधारकर उनके वात्सल्य और लाड़-प्यार को वह ग्रहण करती रही। ऐसा समझना चाहिये। पर ये समझना क्यों चाहिए?
क्या उपर्युक्त प्रकरण प्रक्षेप नहीं !
| स्कन्दपुराणम्/खण्डः ५ (अवन्तीखण्डः)/अवन्तीक्षेत्रमाहात्म्यम् अध्यायः १८ वेदव्यासः | अध्यायः १९ → |
।। सनत्कुमार उवाच ।। ।।
एकानंशां नमस्कृत्य देवीं त्रैलोक्यविश्रुताम् ।।
पूजां कृत्वा विधानेन सर्वसिद्धिफलं लभेत् ।। १ ।।
अणिमादिगुणान्सर्वान्गुटिकासिद्धिमंजनम् ।।
खड्गं च पादुके चैव विलवासं रसायनम् ।।
सर्वं तुष्टा प्रयच्छेत नात्र कार्या विचारणा ।। २ ।।
सुरामांसोपहारैश्च भक्ष्यभोज्यैश्च पूजिता ।।
सर्वान्कामान्नृणां देवी तुष्टा दद्याच्च सर्वदा ।। ३ ।।
महानवम्यां यो देवीं महिषेण प्रपूजयेत् ।।
मेषेण वा यथालाभं सर्वान्कामानवाप्नुया त् ।। ४ ।।
।। व्यास उवाच ।। ।।
कथं देवी समुत्पन्ना एकानंशेति विश्रुता ।।
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि सर्वपापप्रणाशिनी ।। ५ ।। ।।
।। सनत्कुमार उवाच ।। ।।
पुरा कृतयुगस्यादौ ब्रह्मा लोकपितामहः ।।
निशां सस्मार भगवान्स्वां तनूं पूर्वसंभवाम् ।। ६ ।।
ततो भगवती रात्रिरुपतस्थे पितामहम् ।।
तां विविक्ते समालोक्य ब्रह्मोवाच विभावरीम् ।। ७ ।।
।। ब्रह्मोवाच ।। ।।
विभावरी महामाये विबुधानामुपस्थितम् ।।
यत्कर्तव्यं त्वया देवि शृणु चार्थस्य निश्चयम्।। ८ ।।
तारकोनाम दैत्येंद्रः सुरशत्रुरनिर्जितः ।।
तस्य भयेन वै देवास्त्रस्ताः सर्वे दिवौकसः ।। ९।।
तस्माद्भद्रे महेशो वै जनयिष्यति चेद्वरम् ।।
सुतं स भविता तस्य तारकस्यांतकः किल ।। 5.1.18.१० ।।
शंकरम्याभवत्पत्नी सती दक्षसुता तु या ।।
सा पितुः कुपिता भद्रे कस्मिंश्चित्कारणांतरे ।। ११ ।।
भवित्री हिमशैलस्य दुहिता लोकपावनी ।।
विरहेण हरस्तस्या मत्वा शून्यंजगत्त्रयम् ।। १२ ।।
अतपद्धिमशैलस्य कंदरे सिद्धसेविते ।।
प्रतीक्षमाणस्तज्जन्म किंचित्कालं वसिष्यति ।। १३ ।।
तस्मात्सुतप्ततपसोर्भविता यो महाप्रभुः ।।
स भविष्यति दैत्यस्य तारकस्य निवारकः ।। १४ ।।
जातमात्रा तु सा देवी स्वल्पसंज्ञैव भामिनी ।।
विरहोत्कंठिता गाढं हरसंगमलालसा ।। १५ ।।
तयोः सुतप्ततपसोः संयोगः स्यात्सुयुक्तयोः ।।
पार्वतीहरयोस्तस्मात्सुरतं शक्तिकारणम् ।। १६ ।।
भवेत्तत्र सुराणां च कार्यार्थे विप्रमाचर ।।
विघ्नं त्वया विधातव्यं यथा ताभ्यां तथा शृणु ।। १७ ।।
गर्भस्थानेऽथ तां मातः स्वेन रूपेण रंजय ।।
ततो रहसि शर्वस्तां बिभ्रदानंदपूर्वकम् ।।१८।।
हासयिष्यति कालीति ततः सा कुपिता सती ।।
प्रयास्यति तपः कर्तुं ततः सा तपसा युता ।। १९ ।।
जनयिष्यति यं शर्वादिंदुवज्ज्योतिमंड लम् ।।
स भविष्यति हंता वै सुरारीणां न संशयः ।। 5.1.18.२० ।।
स्कन्दपुराणम्/खण्डः ५ (अवन्तीखण्डः)/अवन्तीक्षेत्रमाहात्म्यम्/अध्यायः १८
लक्ष्मी नारायण संहिता- श्लोक( 1.476.124)
"अथ कालान्तरे तप्त्वा तपश्च क्रोधनो मुनिः।
एकांशां प्राप पत्नीं वासुदेवसुतां पुनःप्राप्ति ॥ 124 ॥
शनिवार, 28 अक्टूबर 2023
विश्लेषण गोलोक का( यम और सावित्री का संवाद:- श्रीकृष्ण सर्वस्वम्-
परिपूर्णतमं सिद्धं सिद्धेशं सिद्धिकारकम् ।
ध्यायन्ते वैष्णवाः शश्वद्देवदेवं सनातनम् ॥२२॥
जन्ममृत्युजराव्याधिशोकभीतिहरं परम् ।
ब्रह्मणो वयसा यस्य निमेष उपचर्यते ॥२३॥
स चात्मा स परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते ।
कृषिस्तद्भक्तिवचनो नश्च तद्दास्यवाचकः ॥२४॥
भक्तिदास्यप्रदाता यः स च कृष्णः प्रकीर्तितः।
कृषिश्च सर्ववचनो नकारो बीजमेव च ॥ २५ ॥
स कृष्णः सर्वस्रष्टाऽऽदौ सिसृक्षन्नेक एव च ।
सृष्ट्युन्मुखस्तदंशेन कालेन प्रेरितः प्रभुः ॥२६॥
स्वेच्छामयः स्वेच्छया च द्विधारूपो बभूव ह ।
स्त्रीरूपो वामभागांशो दक्षिणांशः पुमान्स्मृतः।२७।
दृष्ट्वा तां तु तया सार्धं रासेशो रासमण्डले ।
रासोल्लासे सुरसिको रासक्रीडाञ्चकार ह।३६।
नानाप्रकारशृङ्गारं शृङ्गारो मूर्तिमानिव ।
चकार सुखसम्भोगं यावद्वै ब्रह्मणो दिनम्।३७।
ततः स च परिश्रान्तस्तस्या योनौ जगत्पिता ।
चकार वीर्याधानं च नित्यानन्दे शुभक्षणे ॥ ३८ ॥
गात्रतो योषितस्तस्याः सुरतान्ते च सुव्रत ।
निःससार श्रमजलं श्रान्तायास्तेजसा हरेः ॥३९॥
महाक्रमणक्लिष्टाया निःश्वासश्च बभूव ह ।
तदा वव्रे श्रमजलं तत्सर्वं विश्वगोलकम् ॥४०॥
स च निःश्वासवायुश्च सर्वाधारो बभूव ह ।
निःश्वासवायुः सर्वेषां जीविनां च भवेषु च ॥४१॥
बभूव मूर्तिमद्वायोर्वामाङ्गात्प्राणवल्लभा ।
तत्पत्नी सा च तत्पुत्राःप्राणाःपञ्च च जीविनाम्।४२।
प्राणोऽपानः समानश्चोदानव्यानौ च वायवः ।
बभूवुरेव तत्पुत्रा अधः प्राणाश्च पञ्च च ॥ ४३॥
घर्मतोयाधिदेवश्च बभूव वरुणो महान् ।
तद्वामाङ्गाच्च तत्पत्नी वरुणानी बभूव सा।४४।
अथ सा कृष्णचिच्छक्तिः कृष्णगर्भं दधार ह ।
शतमन्वन्तरं यावज्ज्वलन्ती ब्रह्मतेजसा ॥ ४५ ॥
कृष्णप्राणाधिदेवी सा कृष्णप्राणाधिकप्रिया ।
कृष्णस्य सङ्गिनी शश्वत्कृष्णवक्षःस्थलस्थिता।४६।
शतमन्वन्तरान्ते च कालेऽतीते तु सुन्दरी ।
सुषाव डिम्भं स्वर्णाभं विश्वाधारालयं परम्।४७।
दृष्ट्वा डिम्भं च सा देवी हृदयेन व्यदूयत ।
उत्ससर्ज च कोपेन ब्रह्माण्डगोलके जले।४८।
___________
अथ कालान्तरे सा च द्विधारूपो बभूव ह ।
वामार्धाङ्गाच्च कमला दक्षिणार्धाच्च राधिका ॥५४॥
एतस्मिन्नन्तरे कृष्णो द्विधारूपो बभूव सः ।
दक्षिणार्धश्च द्विभुजो वामार्धश्च चतुर्भुजः।५५।
एवं लक्ष्मीं च प्रददौ तुष्टो नारायणाय च ।
स जगाम च वैकुण्ठं ताभ्यां सार्धं जगत्पतिः।५७।
अनपत्ये च ते द्वे च जाते राधांशसम्भवे ।
भूता नारायणाङ्गाच्च पार्षदाश्च चतुर्भुजाः॥५८॥
तेजसा वयसा रूपगुणाभ्यां च समा हरेः ।
बभूवुः कमलाङ्गाच्च दासीकोट्यश्च तत्समाः। ५९॥
अथ गोलोकनाथस्य लोम्नां विवरतो मुने ।
भूताश्चासंख्यगोपाश्च वयसा तेजसा समाः।६०।
रूपेण च गुणेनैव बलेन विक्रमेण च ।
प्राणतुल्यप्रियाः सर्वे बभूवुः पार्षदा विभोः।६१।
___________
एतस्मिन्नन्तरे तत्र सस्त्रीकश्च चतुर्मुखः ।
पद्मनाभेर्नाभिपद्मान्निःससार महामुने ॥ ७८ ॥
एतस्मिन्नन्तरे कृष्णो द्विधारूपो बभूव सः।
वामार्धाङ्गो महादेवो दक्षिणे गोपिकापतिः
८२।
प्रतिविश्वेषु सन्त्येवं ब्रह्मविष्णुशिवादयः।
पातालाद् ब्रह्मलोकान्तं ब्रह्माण्डं परिकीर्तितम् ।८।
तत ऊर्ध्वं च वैकुण्ठो ब्रह्माण्डाद् बहिरेव सः।
तत ऊर्ध्वं च गोलोकः पञ्चाशत्कोटियोजनः।९।
नित्यः सत्यस्वरूपश्च यथा कृष्णस्तथाप्ययम् ।
सप्तद्वीपमिता पृध्वी सप्तसागरसंयुता।१०।
ऊनपञ्चाशदुपद्वीपासंख्यशैलवनान्विता ।
ऊर्ध्वं सप्त स्वर्गलोका ब्रह्यलोकसमन्विताः।११।
पातालानि च सप्ताधश्चैवं ब्रह्माण्डमेव च ।
ऊर्ध्वं धराया भूर्लोको भुवर्लोकस्ततः परम्।१२।
ततः परश्च स्वर्लोको जनलोकस्तथा परः ।
ततः परस्तपोलोकः सत्यलोकस्ततः परः।१३।
ततः परं ब्रह्मलोकस्तप्तकाञ्चनसन्निभः ।
एवं सर्वं कृत्रिमं च बाह्याभ्यन्तरमेव च ।१४।
तद्विनाशे विनाशश्च सर्वेषामेव नारद ।
जलबुद्बुदवत्सर्वं विश्वसंघमनित्यकम्।१५।
__________
नित्यौ गोलोकवैकुण्ठौ प्रोक्तौ शश्वदकृत्रिमौ ।
प्रत्येकं लोमकूपेषु ब्रह्माण्डं परिनिश्चितम् ।१६।
एषां संख्यां न जानाति कृष्णोऽन्यस्यापि का कथा
प्रत्येकं प्रतिब्रह्माण्डं ब्रह्मविष्णुशिवादयः।१७।
तिस्रः कोट्यः सुराणां च संख्या सर्वत्र पुत्रक ।
दिगीशाश्चैव दिक्पाला नक्षत्राणि ग्रहादयः।१८।
मन्त्रं दत्त्वा तदाहारं कल्पयामास वै विभुः ।
श्रूयतां तद् ब्रह्मपुत्र निबोध कथयामि ते।२८।
प्रतिविश्वं यन्नैवेद्यं ददाति वैष्णवो जनः ।
तत्षोडशांशो विषयिणो विष्णोः पज्वदशास्य वै। २९।
निर्गुणस्यात्मनश्चैव परिपूर्णतमस्य च ।
नैवेद्ये चैव कृष्णस्य न हि किञ्चित्प्रयोजनम्।३०।
यद्यद्ददाति नैवेद्यं तस्मै देवाय यो जनः ।
स च खादति तत्सर्वं लक्ष्मीनाथो विराट् तथा।३१।
"श्रीकृष्ण उवाच !
सुचिरं सुस्थिरं तिष्ठ यथाहं त्वं तथा भव ।
ब्रह्मणोऽसंख्यपाते च पातस्ते न भविष्यति।४१।
अंशेन प्रतिब्रह्माण्डे त्वं च क्षुद्रविराड् भव ।
त्वन्नाभिपद्माद् ब्रह्मा च विश्वस्रष्टा भविष्यति।४२।
______________________________
ललाटे ब्रह्मणश्चैव रुद्राश्चैकादशैव ते ।
शिवांशेन भविष्यन्ति सृष्टिसंहरणाय वै।४३।
कालाग्निरुद्रस्तेष्वेको विश्वसंहारकारकः ।
पाता विष्णुश्च विषयी रुद्रांशेन भविष्यति। ४४***
मद्भक्तियुक्तः सततं भविष्यसि वरेण मे ।
ध्यानेन कमनीयं मां नित्यं द्रक्ष्यसि निश्चितम् ।४५।
मातरं कमनीयां च मम वक्षःस्थलस्थिताम् ।
यामि लोकं तिष्ठ वत्सेत्युक्त्वा सोऽन्तरधीयत।४६।
गत्वा स्वलोकं ब्रह्माणं शङ्करं समुवाच ह ।
स्रष्टारं स्रष्टुमीशं च संहर्तुं चैव तत्क्षणम् ॥ ४७ ॥
"श्रीभगवानुवाच
सृष्टिं स्रष्टुं गच्छ वत्स नाभिपद्मोद्भवो भव ।
महाविराड् लोमकूपे क्षुद्रस्य च विधे शृणु ।४८।
गच्छ वत्स महादेव ब्रह्मभालोद्भवो भव ।
अंशेन च महाभाग स्वयं च सुचिरं तप।४९।
इत्युक्त्वा जगतां नाथो विरराम विधेः सुत ।
जगाम ब्रह्मा तं नत्वा शिवश्च शिवदायकः ॥ ५० ॥
महाविराड् लोमकूपे ब्रह्माण्डगोलके जले ।
बभूव च विराट् क्षुद्रो विराडंशेन साम्प्रतम् ॥ ५१ । ( नारायण वर्णन-‡)
महाविराड् लोमकूपे ब्रह्माण्डगोलके जले ।
बभूव च विराट् क्षुद्रो विराडंशेन साम्प्रतम्।५१।
श्यामो युवा पीतवासाः शयानो जलतल्पके ।
ईषद्धास्यः प्रसन्नास्यो विश्वव्यापी जनार्दनः।५२।
"श्रीकृष्ण उवाच
सुचिरं सुस्थिरं तिष्ठ यथाहं त्वं तथा भव ।
ब्रह्मणोऽसंख्यपाते च पातस्ते न भविष्यति ।४१।
अंशेन प्रतिब्रह्माण्डे त्वं च क्षुद्रविराड् भव ।
त्वन्नाभिपद्माद् ब्रह्मा च विश्वस्रष्टा भविष्यति।४२।
ललाटे ब्रह्मणश्चैव रुद्राश्चैकादशैव ते ।
शिवांशेन भविष्यन्ति सृष्टिसंहरणाय वै ।४३।
_________________________________________
कालाग्निरुद्रस्तेष्वेको विश्वसंहारकारकः ।
पाता विष्णुश्च विषयी रुद्रांशेन भविष्यति ॥ ४४ ॥
(ब्रह्म वैवर्त- प्रकृति खण्ड अध्याय -३)
कालाग्निरुद्रस्तेष्वेको विश्वसंहारकारकः ।
पाता विष्णुश्च विषयी रुद्रांशेन भविष्यति ॥ ४४ ॥
(देवीभागवतपुराण नवम स्कन्ध अध्याय -३ )
__________________________________
कान्ते कान्तं च मां कृत्वा यदि स्थातुमिहेच्छसि ।
त्वत्तो बलवती राधा न भद्रं ते भविष्यति ॥१५॥
यो यस्माद् बलवान्वापि ततोऽन्यं रक्षितुं क्षमः ।
कथं परान्साधयति यदि स्वयमनीश्वरः॥१६॥
सर्वेशः सर्वशास्ताहं राधां बाधितुमक्षमः ।
तेजसा मत्समा सा च रूपेण च गुणेन च ॥१७॥
प्राणाधिष्ठातृदेवी सा प्राणांस्त्यक्तुं च कः क्षमः।
प्राणतोऽपि प्रियः पुत्रः केषां वास्ति च कश्चन॥ १८॥
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भूमण्डल-में की बात-
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मद्भक्तियुक्तः सततं भविष्यसि वरेण मे ।
ध्यानेन कमनीयं मां नित्यं द्रक्ष्यसि निश्चितम्।४५।
मातरं कमनीयां च मम वक्षःस्थलस्थिताम् ।
यामि लोकं तिष्ठ वत्सेत्युक्त्वा सोऽन्तरधीयत।४६।
गत्वा स्वलोकं ब्रह्माणं शङ्करं समुवाच ह ।
स्रष्टारं स्रष्टुमीशं च संहर्तुं चैव तत्क्षणम् ॥४७॥
"श्रीभगवानुवाच
सृष्टिं स्रष्टुं गच्छ वत्स नाभिपद्मोद्भवो भव ।
महाविराड् लोमकूपे क्षुद्रस्य च विधे शृणु ॥४८।
गच्छ वत्स महादेव ब्रह्मभालोद्भवो भव ।
अंशेन च महाभाग स्वयं च सुचिरं तप ॥ ४९ ॥
इत्युक्त्वा जगतां नाथो विरराम विधेः सुत ।
जगाम ब्रह्मा तं नत्वा शिवश्च शिवदायकः ॥ ५० ॥
__________________________________
★ नारायण उत्पत्ति★
महाविराड् लोमकूपे ब्रह्माण्डगोलके जले ।
बभूव च विराट् क्षुद्रो विराडंशेन साम्प्रतम्।५१।
श्यामो युवा पीतवासाः शयानो जलतल्पके ।
ईषद्-हास्यः प्रसन्नास्यो विश्वव्यापी जनार्दनः।५२।
तन्नाभिकमले ब्रह्मा बभूव कमलोद्भवः ।
सम्भूय पद्मदण्डे च बभ्राम युगलक्षकम् ।५३।
नान्तं जगाम दण्डस्य पद्मनालस्य पद्मजः ।
नाभिजस्य च पद्मस्य चिन्तामाप पिता तव।५४।
स्वस्थानं पुनरागम्य दध्यौ कृष्णपदाम्बुजम् ।
ततो ददर्श क्षुद्रं तं ध्यानेन दिव्यचक्षुषा ।५५।
शयानं जलतल्पे च ब्रह्माण्डगोलकाप्लुते ।
यल्लोमकूपे ब्रह्माण्डं तं च तत्परमीश्वरम् ॥५६॥
श्रीकृष्णं चापि गोलोकं गोपगोपीसमन्वितम् ।
तं संस्तूय वरं प्राप ततः सृष्टिं चकार सः॥५७॥
बभूवुर्ब्रह्मणः पुत्रा मानसाः सनकादयः ।
ततो रुद्रकलाश्चापि शिवस्यैकादश स्मृताः।५८।
बभूव पाता विष्णुश्च क्षुद्रस्य वामपार्श्वतः ।********************************
चतुर्भुजश्च भगवान् श्वेतद्वीपे स चावसत् ॥५९ ॥
_________________________
क्षुद्रस्य नाभिपद्मे च ब्रह्मा विश्वं ससर्ज ह ।
स्वर्गं मर्त्यं च पातालं त्रिलोकीं सचराचराम्।६०।
एवं सर्वं लोमकूपे विश्वं प्रत्येकमेव च ।
प्रतिविश्वे क्षुद्रविराड् ब्रह्मविष्णुशिवादयः।६१।
__________________
इत्येवं कथितं ब्रह्मन् कृष्णसङ्कीर्तनं शुभम् ।
सुखदं मोक्षदं ब्रह्मन्किं भूयः श्रोतुमिच्छसि।६२।
____________________________________
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे ब्रह्मविष्णुमहेश्वरादिदेवतोत्पत्तिवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥३॥
___________________________________
इन्द्रायुश्चैव दिव्यानां युगानामेकसप्ततिः ।
अष्टाविंशे शक्रपाते ब्रह्मणश्च दिवानिशम् ॥ ५०॥
एवं त्रिंशद्दिनैर्मासो द्वाभ्यामाभ्यामृतुः स्मृतः ।
ऋतुभिः षड्भिरेवाब्दं ब्रह्मणो वै वयः स्मृतम्।५१।
ब्रह्मणश्च निपाते च चक्षुरुन्मीलनं हरेः।
चक्षुरुन्मीलने तस्य लयं प्राकृतिकं विदुः।५२।
प्रलये प्राकृते सर्वे देवाद्याश्च चराचराः ।
लीना धाता विधाता च श्रीकृष्णनाभिपङ्कजे ।५३।
विष्णुः क्षीरोदशायी च वैकुण्ठे यश्चतुर्भुजः।*********************************
विलीना वामपार्श्वे च कृष्णस्य परमात्मनः।५४।
यस्य ज्ञाने शिवो लीनो ज्ञानाधीशः सनातनः ।
दुर्गायां विष्णुमायायां विलीनाः सर्वशक्तयः।५५।
सा च कृष्णस्य बुद्धौ च बुद्ध्यधिष्ठातृदेवता ।
नारायणांशः स्कन्दश्च लीनो वक्षसि तस्य च ।५६।
श्रीकृष्णांशश्च तद्बाहौ देवाधीशो गणेश्वरः ।
पद्मांशाश्चैव पद्मायां सा राधायां च सुव्रते ॥५७॥
गोप्यश्चापि च तस्यां च सर्वाश्च देवयोषितः ।
कृष्णप्राणाधिदेवी सा तस्य प्राणेषु संस्थिता।५८।
सावित्री च सरस्वत्यां वेदाः शास्त्राणि यानि च ।
स्थिता वाणी च जिह्वायां यस्य च परमात्मनः।५९।
गोलोकस्य च गोपाश्च विलीनास्तस्य लोमसु ।
तत्प्राणेषु च सर्वेषां प्राणा वाता हुताशनाः ॥६०॥
जठराग्नौ विलीनाश्च जलं तद्रसनाग्रतः ।
वैष्णवाश्चरणाम्भोजे परमानन्दसंयुताः ॥६१॥
सारात्सारतरा भक्तिरसपीयूषपायिनः ।
विराडंशाश्च महति लीनाः कृष्णे महाविराट्। ६२।*****************
यस्यैव लोमकूपेषु विश्वानि निखिलानि च ।
यस्य चक्षुष उन्मेषे प्राकृतः प्रलयो भवेत् ॥६३॥
चक्षुरुन्मीलने सृष्टिर्यस्यैव पुनरेव सः ।
यावत्कालो निमेषेण तावदुन्मीलनेन च ॥६४॥
____________
ब्रह्मणश्च शताब्दे च सृष्टेः सूत्रलयः पुनः ।
ब्रह्मसृष्टिलयानां च संख्या नास्त्येव सुव्रते ॥ ६५ ॥
यथा भूरजसां चैव संख्यानं नैव विद्यते ।
चक्षुर्निमेषे प्रलयो यस्य सर्वान्तरात्मनः ॥ ६६ ॥
उन्मीलने पुनः सृष्टिर्भवेदेवेश्वरेच्छया ।
स कृष्णः प्रलये तस्यां प्रकृतौ लीन एव हि ॥६७॥
__________
एकैव च परा शक्तिर्निर्गुणः परमः पुमान् ।
सदेवेदमग्र आसीदिति वेदविदो विदुः ॥६८॥
मूलप्रकृतिरव्यक्ताप्यव्याकृतपदाभिधा ।
चिदभिन्नत्वमापन्ना प्रलये सैव तिष्ठति ॥ ६९ ॥
तद्गुणोत्कीर्तनं वक्तुं ब्रह्माण्डेषु च कः क्षमः ।
मुक्तयश्च चतुर्वेदैर्निरुक्ताश्च चतुर्विधाः ॥ ७० ॥
तत्प्रधाना देवभक्तिर्मुक्तेरपि गरीयसी ।
सालोक्यदा भवेदेका तथा सारूप्यदा परा।७१।
सामीप्यदाथ निर्वाणप्रदा मुक्तिश्चतुर्विधा ।
भक्तास्ता न हि वाञ्छन्ति विना तत्सेवनं विभोः॥ ७२॥
शिवत्वममरत्वं च ब्रह्मत्वं चावहेलया ।
जन्ममृत्युजराव्याधिभयशोकादिकं धनम् ॥७३॥
दिव्यरूपधारणं च निर्वाणं मोक्षणं विदुः ।
मुक्तिश्च सेवारहिता भक्तिः सेवाविवर्धिनी ॥ ७४ ॥
भक्तिमुक्त्योरयं भेदो निषेकखण्डनं शृणु ।
विदुर्बुधा निषेकं च भोगं च कृतकर्मणाम् ॥ ७५ ॥
तत्खण्डनं च शुभदं श्रीविभोः सेवनं परम् ।
तत्त्वज्ञानमिदं साध्वि स्थिरं च लोकवेदयोः।७६।
निर्विघ्नं शुभदं चोक्तं गच्छ वत्से यथासुखम् ।
इत्युक्त्वा सूर्यपुत्रश्च जीवयित्वा च तत्पतिम्।७७।
तस्यै शुभाशिषं दत्त्वा गमनं कर्तुमुद्यतः ।
दृष्ट्वा यमं च गच्छन्तं सा सावित्री प्रणम्य च।७८।
रुरोद चरणौ धृत्वा साधुच्छेदेन दुःखिता ।
सावित्रीरोदनं श्रुत्वा यमश्चैव कृपानिधिः ॥ ७९ ॥
तामित्युवाच सन्तुष्टः स्वयं चैव रुरोद ह ।
धर्मराज उवाच-
लक्षवर्षं सुखं भुक्त्वा पुण्यक्षेत्रे च भारते ॥८० ॥
अन्ते यास्यसि तल्लोकं यत्र देवी विराजते ।
गत्वा च स्वगृहं भद्रे सावित्र्याश्च व्रतं कुरु ॥ ८१ ॥
द्विसप्तवर्षपर्यन्तं नारीणां मोक्षकारणम् ।
ज्येष्ठशुक्लचतुर्दश्यां सावित्र्याश्च व्रतं शुभम् ।८२।
शुक्लाष्टम्यां भाद्रपदे महालक्ष्या यथा व्रतम् ।
द्व्यष्टवर्षं व्रतं चैव प्रत्यादेयं शुचिस्मिते।८३।
करोति भक्त्या या नारी सा याति च विभोः पदम् ।
प्रतिमङ्गलवारे च देवीं मङ्गलदायिनीम् ॥ ८४ ॥
प्रतिमासं शुक्लषष्ठ्यां षष्ठीं मङ्गलदायिनीम् ।
तथा चाषाढसङ्क्रान्त्यां मनसां सर्वसिद्धिदाम् ॥ ८५ ॥
_________________
राधां रासे च कार्तिक्यां कृष्णप्राणाधिकप्रियाम् ।
उपोष्य शुक्लाष्टम्यां च प्रतिमासं वरप्रदाम् ।८६।
विष्णुमायां भगवतीं दुर्गां दुर्गतिनाशिनीम् ।
प्रकृतिं जगदम्बां च पतिपुत्रवतीषु च ॥ ८७ ॥
पतिव्रतासु शुद्धासु यन्त्रेषु प्रतिमासु च ।
या नारी पूजयेद्भक्त्या धनसन्तानहेतवे ॥ ८८ ॥
इहलोके सुखं भुक्त्वा यात्यन्ते श्रीविभोः पदम् ।
एवं देव्या विभूतीश्च पूजयेत्साधकोऽनिशम् ।८९।
सर्वकालं सर्वरूपा संसेव्या परमेश्वरी ।
नातः परतरं किञ्चित्कृतकृत्यत्वदायकम् ॥ ९० ॥
इत्युक्त्वा तां धर्मराजो जगाम निजमन्दिरम् ।
गृहीत्वा स्वामिनं सा च सावित्री च निजालयम् । ९१॥
सावित्री सत्यवांश्चैव प्रययौ च यथागमम् ।
अन्यांश्च कथयामास स्ववृत्तान्तं हि नारद ॥९२॥
सावित्रीजनकः पुत्रान् सम्प्राप्तः प्रक्रमेण च ।
श्वशुरश्चक्षुषी राज्यं सा च पुत्रान् वरेण च ॥ ९३ ॥
लक्षवर्षं सुखं भुक्त्वा पुण्यक्षेत्रे च भारते ।
जगाम स्वामिना सार्धं देवीलोकं पतिव्रता ॥ ९४ ॥
सवितुश्चाधिदेवी या मन्त्राधिष्ठातृदेवता ।
सावित्री ह्यपि वेदानां सावित्री तेन कीर्तिता ।९५।
इत्येवं कथितं वत्स सावित्र्याख्यानमुत्तमम् ।
जीवकर्मविपाकं च किं पुनः श्रोतुमिच्छसि।९६।
__________________
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे नारायणनारदसंवादे सावित्र्युपाख्यानवर्णनं नामाष्टत्रिलोऽध्यायः ।३८।
हिन्दी अनुवाद:-
[देवी भागवत महापुराण
स्कन्ध (9) अध्याय 38 -
धर्मराज का सावित्री से संवाद-
सर्वात्मा, सबके भगवान्, सभी कारणों के भी कारण, सर्वेश्वर, सबके आदिरूप, सर्वज्ञ, परिपालक, नित्यस्वरूप, नित्य देहवाले, नित्यानन्द निराकार, स्वतन्त्र, निशंक, निर्गुण, निर्विकार, अनासक, सर्वसाक्षी, सर्वाधार, परात्पर तथा मायाविशिष्ट परमात्मा ही मूलप्रकृतिके रूपमें अभिव्यक्त हो जाते हैं; सभी प्राकृत पदार्थ उन्हीं से आविर्भूत हैं ।25-27।
स्वयं परम पुरुष ही प्रकृति हैं। वे दोनों परस्पर उसी प्रकार अभिन्न हैं, जैसे अग्निसे उसकी शक्ति कुछ भी भिन्न नहीं है ॥ 28 ॥
वे ही सच्चिदानन्दस्वरूपिणी शक्ति महामाया हैं। वे निराकार होते हुए भी भक्तों पर कृपा करने के लिये रूप धारण करती हैं ॥ 29 ॥
उन भगवती ने सर्वप्रथम गोपालसुन्दरी का रूप धारण किया था। वह रूप अत्यन्त कोमल, सुन्दर तथा मनोहर था।
कृष्ण का किशोर गोपवेषवाला वह रूप नवीन मेघके समान श्याम वर्ण का था वह करोड़ों कामदेवों के समान सुन्दर था, वह मनोहर लीलाधामस्वरूप था उस विग्रहके नेत्र शरद ऋतुके मध्याहकालीन कमलोंकी शोभाको तुच्छ बना देनेवाले थे, मुख शरत्पूर्णिमाके करोड़ों चन्द्रमाकी शोभाको तिरस्कृत कर देनेवाला था, अमूल्य रत्नोंसे निर्मित अनेक प्रकारके आभूषणोंसे उनका विग्रह सुशोभित था, मुसकानयुक्त मुखमण्डलवाला वह विग्रह निरन्तर अमूल्य पीताम्बर से शोभित हो रहा था,।
परब्रह्मस्वरूप वह विग्रह ब्रह्मतेजसे प्रकाशित था, वह रूप देखने में बड़ा ही सुखकर था, वह शान्तरूपराधाको अत्यधिक प्रसन्न करने वाला था, मुसकराती वह हुई गोपियाँ उस रूपको निरन्तर निहार रही थीं, भगवदविग्रह रासमण्डलके मध्य रत्नजटित सिंहासनपर विराजमान था, उनकी दो भुजाएँ थीं, वे वंशी बजा रहे थे, उन्होंने वनमाला धारण कर रखी थी, उनके वक्षःस्थलपर मणिराज श्रेष्ठ कौस्तुभमणि निरन्तर प्रकाशित हो रही थी, उनका विग्रह कुमकुम अगुरु-कस्तूरीसे मिश्रित दिव्य चन्दनसे लिप्त था वह चम्पा और मालतीकी मनोहर मालाओंसे सुशोभित था, वह कान्तिमान् चन्द्रमाकी शोभासे परिपूर्ण तथा मनोहर चूडामणिसे सुशोभित था । भक्तिरससे आप्लावित भक्तजन उनके इसी रूपका ध्यान करते हैं ll 30-38 ॥
जगत्की रचना करनेवाले ब्रह्मा उन्हींके भय से सृष्टिका विधान करते हैं तथा कर्मानुसार सभी प्राणियोंके कर्मका उल्लेख करते हैं और उन्हींकी आज्ञासे वे मनुष्योंको तपों तथा कमका फल देते हैं।
उन्होंके भयसे सभी प्राणियोंके रक्षक भगवान् विष्णु सदा रक्षा करते हैं और उन्होंके भयसे कालाग्निके समान भगवान् रुद्र सम्पूर्ण जगत्का संहार करते हैं।
ज्ञानियोंके गुरुके भी गुरु मृत्युंजय शिव उसी परब्रह्मरूप विग्रह को जान लेनेपर ज्ञानवान्, योगीश्वर, ज्ञानविद् परम आनन्दसे परिपूर्ण तथा भक्ति-वैराग्यसे सम्पन्न हो सके हैं ।।39-42 ॥
__________
हे साध्वि ! उन्हींके भयसे तीव्र चलनेवालोंमें प्रमुख पवनदेव प्रवाहित होते हैं और उन्हों के भय से सूर्य निरन्तर तपते रहते हैं ॥ 43 ॥
उन्हींकी आज्ञा से इन्द्र वृष्टि करते हैं, मृत्यु प्राणियोंपर अपना प्रभाव डालती है, उन्हींकी आज्ञासे अग्नि जलाती है और जल शीतल करता है॥ 44 ॥
उन्होंकि आदेश से भयभीत दिक्पालगण दिशाओंकी रक्षा करते हैं और उन्होंके भयसे ग्रह तथा राशियाँ अपने मार्ग पर परिभ्रमण करती हैं ।। 45 ।।
उन्होंके भयसे वृक्ष फलते तथा फूलते हैं और उन्हींकी आज्ञा स्वीकार करके भयभीत काल निश्चित समय पर प्राणियों का संहार करता है ॥ 46॥
उनकी आज्ञाके बिना जल तथा स्थल में रहनेवाले कोई भी प्राणी जीवन धारण नहीं कर सकते और संग्राम में आहत तथा विषम स्थितियों में पड़े प्राणी की भी अकाल मृत्यु नहीं होती ll 47 ॥
उन्हों की आज्ञा से वायु जलराशिको जल कच्छप को, कच्छप शेषनागको, शेष पृथ्वी को और पृथ्वी सभी समुद्रों तथा पर्वतोंको धारण किये रहती है।
__________________
जो सब प्रकारसे क्षमाशालिनी हैं, वे पृथ्वी उन्हींकी आज्ञासे नानाविध रत्नोंको धारण करती हैं। उन्हींकी आज्ञासे पृथ्वीपर सभी प्राणी रहते हैं तथा नष्ट होते हैं ll 48-49 ।।
_____________________
हे साध्वि ! देवताओं के इकहत्तर युगों की इन्द्र की आयु होती है; ऐसे अट्ठाईस इन्द्रों के समाप्त होने पर ब्रह्मा का एक दिन-रात होता है।
_______
ऐसे तीस दिनों का एक महीना होता है और इन्हीं दो महीनोंकी एक ऋतु कही गयी है। इन्हीं छः ऋतुओं का एक वर्ष होता है और ऐसे (सौ वर्षों) की ब्रह्माकी आयु कही गयी है ।50-51l
ब्रह्मा की आयु समाप्त होनेपर श्रीहरि आँखें मूँद लेते हैं। श्रीहरिके आँखें मूंद लेनेपर प्राकृत प्रलय हो जाता है। उस प्राकृतिक प्रलय के समय समस्त चराचर प्राणी, देवता, विष्णु तथा ब्रह्मा ये सब श्रीकृष्ण के नाभिकमलमें लीन हो जाते हैं ।। 52-53 ll
क्षीरसागरमें शयन करनेवाले तथा वैकुण्ठवासी चतुर्भुज भगवान् श्रीविष्णु (नारायण) प्रलयके समय परमात्मा श्रीकृष्ण के वाम पार्श्वमें विलीन होते हैं।
ज्ञानके अधिष्ठाता सनातन शिव उनके ज्ञान में विलीन हो जाते हैं। सभी शक्तियाँ विष्णुमाया दुर्गा में समाविष्ट हो जाती हैं और वे बुद्धि की अधिष्ठात्री देवता दुर्गा भगवान् श्रीकृष्णकी बुद्धिमें प्रविष्ट हो जाती हैं।
***********************************
नारायण के अंश स्वामी कार्तिकेय उनके वक्षःस्थलमें लीन हो जाते हैं ll54-56 ॥
हे सुव्रते। श्रीकृष्णके अंशस्वरूप तथा गणोंके स्वामी देवेश्वर गणेश श्रीकृष्णकी दोनों भुजाओं में समाविष्ट हो जाते हैं।
श्रीलक्ष्मीकी अंशस्वरूपा देवियाँ भगवती लक्ष्मीमें तथा वे देवी लक्ष्मी राधा में विलीन हो जाती हैं। इसी प्रकार समस्त गोपिकाएँ तथा देवपत्नियाँ भी उन्हीं श्रीराधा में अन्तर्हित हो जाती हैं और श्रीकृष्णके प्राणों की अधीश्वरी वे राधा उन श्रीकृष्णके प्राणोंमें अधिष्ठित हो जाती हैं ।57-58।
___________________________
सावित्री तथा जितने भी वेद और शास्त्र हैं, वे सब सरस्वतीमें प्रवेश कर जाते हैं और सरस्वती उन परमात्मा श्रीकृष्ण की जिह्वा में विलीन हो जाती हैं ॥ 59 ॥
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गोलोक के सभी गोप उनके रोमकूपों में प्रवेश कर जाते हैं। सभी प्राणियों की प्राणवायु उन श्रीकृष्णके प्राणों में, समस्त अग्नियाँ उनकी जठराग्नि में तथा जल उनकी जिह्वा के अग्रभाग में विलीन हो जाते हैं। सारके भी सारस्वरूप तथा भक्तिरसरूपी अमृतका पान करनेवाले वैष्णवजन परम आनन्दित होकर उनके चरण कमल में समाहित हो जाते हैं ।60-61॥
विराट्के अंशस्वरूप क्षुद्रविराट् महाविराट्में और महाविराट् उन श्रीकृष्णमें विलीन हो जाते हैं,
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जिनके रोमकूपोंमें सम्पूर्ण विश्व समाहित हैं, जिनके आँख मीचने पर प्राकृतिक प्रलय हो जाता है और जिनके नेत्र खुल जानेपर पुनः सृष्टि कार्य आरम्भ हो जाता है।
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जितना समय उनके पलक गिरने में लगता है, उतना ही समय उनके पलक उठाने में लगता है। ब्रह्माके सौ वर्ष बीत जानेपर सृष्टिका सूत्रपात और पुनः लय होता है।
हे सुव्रते! जैसे पृथ्वी के रजः कणों की संख्या नहीं है, वैसे ही ब्रह्माकी सृष्टि तथा प्रलयकी कोई संख्या नहीं है ।। 62-65 ॥
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जिन सर्वान्तरात्मा परमेश्वर की इच्छा से उनके पलक झपकते ही प्रलय होता है तथा पलक खोलते ही पुनः सृष्टि आरम्भ हो जाती है, वे श्रीकृष्ण प्रलयके समय उन परात्पर मूलप्रकृति में लीन हो जाते हैं; उस समय एकमात्र पराशक्ति ही शेष रह जाती है, यही निर्गुण परम पुरुष भी है। यही सत्स्वरूप तत्त्व सर्वप्रथम विराजमान था - ऐसा वेदों के ज्ञाताओं ने कहा है ।66-68।
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अव्यक्तस्वरूपी मूलप्रकृति 'अव्याकृत' नामसे कही जाती हैं। चैतन्यस्वरूपिणी वे ही केवल प्रलयकालमें विद्यमान रहती हैं। उनके गुणोंका वर्णन करने में ब्रह्माण्डमें कौन समर्थ है ? । 69।
चारों वेदों ने चार प्रकार को मुक्तियाँ बतलायी हैं। भगवान्की भक्ति प्रधान है; क्योंकि वह मुक्तिसे श्रेष्ठ है। एक मुक्ति सालोक्य प्रदान करने वाली, दूसरी सारूप्य देनेवाली तीसरी सामीप्य की प्राप्ति कराने वाली और चौथी निर्वाण प्रदान करने वाली है; इस प्रकार मुक्ति चार तरह की होती है। भक्तजन उन परमात्मप्रभु की सेवा छोड़कर उन मुक्तियोंकी कामना नहीं करते हैं। वे शिवत्व, अमरत्व तथा ब्रह्मत्व तक की अवहेलना करते हैं। वे जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि, भय, शोक, धन, दिव्यरूप धारण करना, निर्वाण तथा मोक्षकी अवहेलना करते हैं। मुक्ति सेवारहित है तथा भक्ति सेवाभावमें वृद्धि करनेवाली है-भक्ति तथा मुक्तिमें यही भेद है; अब निषेक खण्डन का प्रसंग सुनो। 70-74।
विद्वान् पुरुषोंने निषेक (जन्म) एवं भोग के खण्डनका कल्याणकारी उपाय श्रीप्रभु की एकमात्र परम सेवाको ही कहा है। हे साध्वि! यह तत्त्वज्ञान लोक और वेदमें प्रतिष्ठित है।
इसे विघ्नरहित तथा शुभप्रद बताया गया है। हे वत्से ! अब तुम सुखपूर्वक जाओ ।। 75-76 ll
ऐसा कहकर सूर्यपुत्र धर्मराज उसके पतिको जीवितकर और उसे आशीर्वाद प्रदान करके वहाँसे जानेके लिये उद्यत हो गये। धर्मराजको जाते देखकर सावित्री उन्हें प्रणाम करके उनके दोनों चरण पकड़कर साधुवियोगके कारण उत्पन्न दुःखसे व्याकुल हो रोने लगी ।। 77-78॥
सावित्रीका विलाप सुनकर कृपानिधि धर्मराज भी स्वयं रोने लगे और सन्तुष्ट होकर उससे इस प्रकार कहने लगे- ।79 ॥
धर्मराज बोले- [हे] सावित्रि।] तुम पुण्यक्षेत्र भारतवर्ष में एक लाख वर्ष तक सुखका भोग करके अन्त में उस लोकमें जाओगी, जहाँ साक्षात् भगवती विराजमान रहती हैं ॥ 80 ॥
हे भद्रे अब तुम अपने घर जाओ और स्त्रियोंके लिये मोक्षके कारणरूप सावित्रीव्रत का चौदह वर्ष तक पालन करो। ज्येष्ठमास के शुक्लपक्षकी चतुर्दशी तिथिको किया गया सावित्रीव्रत उसी प्रकारअत्यन्त मंगलकारी होता है, जैसे भाद्रपद महीनेके शुक्लपक्षकी अष्टमी तिथिको महालक्ष्मीव्रत कल्याणप्रद होता है।
हे शुचिस्मिते। इस महालक्ष्मीव्रतको सोलह वर्षतक करना चाहिये। जो स्त्री इस व्रतका अनुष्ठान करती है, वह भगवान् श्रीहरिके चरणोंकी सन्निधि प्राप्त कर लेती है। ll81-82 ll
प्रत्येक मंगलवारको मंगलकारिणी भगवती मंगलचण्डिकाका व्रत करना चाहिये। प्रत्येक मासकी शुक्तपष्ठी के दिन व्रतपूर्वक मंगलदायिनी देवी पष्ठी को पूजा करनी चाहिये।
उसी प्रकार आषाढ़ की-संक्रान्ति के अवसर पर समस्त सिद्धियाँ प्रदान करनेवाली देवी मनसा की पूजा करनी चाहिये ।। 84-85 ।।
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कार्तिक पूर्णिमा को रास के अवसर पर श्रीकृष्ण के लिये प्राणों से भी अधिक प्रिय श्रीराधाकी उपासना करनी चाहिये।
प्रत्येक मासके शुक्लपक्षको अष्टमी तिथिको उपवासपूर्वक व्रत करके वर प्रदान करनेवाली भगवती दुर्गाकी पूजा करनी चाहिये।
पति-पुत्रवती तथा पुण्यमयी पतिव्रताओं, प्रतिमाओं तथा यन्त्रों दुर्गतिनाशिनी विष्णुमाया भगवती दुर्गाकी भावना करके जो स्त्री धन-सन्तानकी प्राप्ति के लिये भक्ति पूर्वक उनका पूजन करती है, वह इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें ऐश्वर्यमयी भगवतीके परम पदको प्राप्त होती है।
इस प्रकार साधकको भगवतीकी विभूतियोंकी निरन्तर पूजा करनी चाहिये।
उन सर्वरूपा परमेश्वरीकी निरन्तर उपासना करनी चाहिये; इससे बढ़कर कृतकृत्यता प्रदान करनेवाला और नहीं है ll 86 - 90 ll
[ हे नारद!] उससे ऐसा कहकर धर्मराज अपने लोकको चले गये और अपने पतिको साथ लेकर सावित्री भी अपने घर चली गयी ॥ 91 ॥
हे नारद! सावित्री और सत्यवान् जब घरपर आ गये तब सावित्रीने अपने अन्य बन्धु सारा वृत्तान्त कहा ॥ 92 ॥
बान्धवोंसे यह धर्मराजके वरके प्रभावसे सावित्रीके पिताने पुत्र प्राप्त कर लिये, उसके ससुरको दोनों आँखें ठीक हो गर्यो और उन्हें अपना राज्य मिल गया तथा उस सावित्री को भी पुत्रोंकी प्राप्ति हुई। इस प्रकार पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें एक लाख वर्षतक सुख भोगकर वह पतिव्रता सावित्री अपने पतिके साथ देवीलोक चली गयी ।93-94 ॥
सविता की अधिष्ठात्री देवी होने अथवा सूर्यके ब्रह्मप्रतिपादक गायत्री मन्त्रकी अधिदेवता होने तथा सम्पूर्ण वेदों की जननी होनेसे ये जगत् में सावित्री नामसे प्रसिद्ध हैं ॥95॥
हे वत्स ! इस प्रकार मैंने सावित्रीके श्रेष्ठ उपाख्यान तथा प्राणियोंके कर्मविपाक का वर्णन कर दिया, अब आगे क्या सुनना चाहते हो ॥ 96।
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे नारायणनारदसंवादे सावित्र्युपाख्यानवर्णनं नामाष्टत्रिलोऽध्यायः ।३८।
"श्रीकृष्ण उवाच -
गच्छ नन्द यशोदे त्वं पुत्रबुद्धिं विहाय च।
गोलोकं परमं धाम सार्धं गोकुलवासिभिः॥१५॥
गच्छ नन्द यशोदे त्वं पुत्रबुद्धिं विहाय च।
गोलोकं परमं धाम सार्धं गोकुलवासिभिः॥१५॥
अग्रे कलियुगो घोरश्चागमिष्यति दुःखदः।
यस्मिन्वै पापिनो मर्त्या भविष्यन्ति न संशयः।१६।
स्त्रीपुंसोर्नियमो नास्ति वर्णानां च तथैव च ।
तस्माद्गच्छाशु मद्धाम जरामृत्युहरं परम् ॥१७॥
इति ब्रुवति श्रीकृष्णे रथं च परमाद्भुतम् ।
पञ्चयोजनविस्तीर्णं पञ्चयोजनमूर्ध्वगम् ॥१८॥
वज्रनिर्मलसंकाशं मुक्तारत्नविभूषितम् ।
मन्दिरैर्नवलक्षैश्च दीपैर्मणिमयैर्युतम् ॥१९॥
सहस्रद्वयचक्रं च सहस्रद्वयघोटकम् ।
सूक्ष्मवस्त्राच्छादितं च सखीकोटिभिरावृतम्।२०।
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गोलोकादागतं गोपा ददृशुस्ते मुदान्विताः।
एतस्मिन्नंतरे तत्र कृष्णदेहाद्विनिर्गतः॥२१॥
गोलोकादागतं गोपा ददृशुस्ते मुदान्विताः।
एतस्मिन्नंतरे तत्र कृष्णदेहाद्विनिर्गतः॥२१॥
देवश्चतुर्भुजो राजन्कोटिमन्मथसन्निभः।
शंखचक्रधरः श्रीमाँल्लक्ष्म्या सार्धं जगत्पतिः।२२।
क्षीरोदं प्रययौ शीघ्रं रथमारुह्य सुन्दरम् ।
तथा च विष्णुरूपेण श्रीकृष्णो भगवान् हरिः॥२३॥
लक्ष्म्या गरुडमारुह्य वैकुण्ठं प्रययौ नृप ।
ततो भूत्वा हरिः कृष्णो नरनारायणावृषी ॥२४॥
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कल्याणार्थं नराणां च प्रययौ बद्रिकाश्रमम् ।
परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो राधया युतः ॥२५॥
कल्याणार्थं नराणां च प्रययौ बद्रिकाश्रमम् ।
परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो राधया युतः ॥२५॥
गोलोकादागतं यानमारुरोह जगत्पतिः ।
सर्वे गोपाश्च नन्दाद्या यशोदाद्या व्रजस्त्रियः।२६।
त्यक्त्वा तत्र शरीराणि दिव्यदेहाश्च तेऽभवन् ।
स्थापयित्वा रथे दिव्ये नन्दादीन्भगवान्हरिः।२७।
गोलोकं प्रययौ शीघ्रं गोपालो गोकुलान्वितः ।
ब्रह्मांडेभ्यो बहिर्गत्वा ददर्श विरजां नदीम्।२८।
शेषोत्संगे महालोकं सुखदं दुःखनाशनम् ।
दृष्ट्वा रथात्समुत्तीर्य सार्धं गोकुलवासिभिः।२९।
विवेश राधया कृष्णः पश्यन्न्यग्रोधमक्षयम् ।
शतशृङ्गं गिरिवरं तथा श्रीरासमण्डलम् ॥ ३०॥
ततो ययौ कियद्दूरं श्रीमद्वृन्दावनं वनम् ।
वनैर्द्वादशभिर्युक्तं द्रुमैः कामदुघैर्वृतम् ॥३१॥
नद्या यमुनया युक्तं वसंतानिलमंडितम् ।
पुष्पकुञ्जनिकुञ्जं च गोपीगोपजनैर्वृतम् ॥३२॥
तदा जयजयारावः श्रीगोलोके बभूव ह ।
शून्यीभूते पुरा धाम्नि श्रीकृष्णे च समागते ॥३३॥
ततश्च यदुपत्न्यश्च चितामारुह्य दुःखतः ।
पतिलोकं ययुः सर्वा देवक्याद्याश्च योषितः॥३४॥
बंधूनां नष्टगोत्राणां चकार सांपरायिकम् ।
गीताज्ञानेन स्वात्मानं शांतयित्वा स दुःखतः॥३५।
अर्जुनः स्वपुरं गत्वा तमुवाच युधिष्ठिरम् ।
स राजा भ्रातृभिः सार्धं ययौ स्वर्गं च भार्यया॥ ३६॥
प्लावयद्द्वारकां सिन्धू रैवतेन समन्विताम् ।
विहाय नृपशार्दूल गेहं श्रीरुक्मणीपतेः ॥ ३७ ॥
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अद्यापि श्रूयते घोषो द्वार्वत्यामर्णवे हरेः ।
अविद्यो वा सविद्यो वा ब्राह्मणो मामकी तनुः ॥
अद्यापि श्रूयते घोषो द्वार्वत्यामर्णवे हरेः ।
अविद्यो वा सविद्यो वा ब्राह्मणो मामकी तनुः ॥
३८ ॥
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ब्राह्मणवाद की दुर्गन्ध-
विष्णुस्वामी रवेरंशः कलेरादौ महार्णवे ।
गत्वा नीत्वा हरेरर्चां द्वार्वत्यां स्थापयिष्यति॥३९॥
तं द्वारकेशं पश्यंति मनुजा ये कलौ युगे ।
सर्वे कृतार्थतां यांति तत्र गत्वा नृपेश्वरः ॥ ४०॥
यः शृणोति चरित्रं वै गोलोकारोहणं हरेः ।
मुक्तिं यदूनां गोपानां सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥४१॥
इति श्रीमद्गर्गसंहितायामश्वमेधखण्डे
राधाकृष्णयोर्गोलोकारोहणं नाम षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६०॥
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अनुवाद:-
कौरवों के संहार, पाण्डवों के स्वर्गगमन तथा यादवों के संहार आदि का संक्षिप्त वृत्तान्त-
श्रीराधा तथा व्रजवासियों सहित भगवान श्रीकृष्ण का गोलोकधाम में गमन:-
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श्रीगर्ग जी कहते हैं- राजन् ! व्यासजी के मुख से इस प्रकार श्रीकृष्ण सहस्त्रनाम का निरूपण सुनकर यादवेन्द्र उग्रसेन ने उनकी पूजा करके भगवान श्रीकृष्ण में भक्तिपूर्वक मन लगाया। तदनन्तर भगवान श्रीकृष्ण ने मिथिला में जाकर राजा बहुलाश्व तथा श्रुतदेव को दर्शन दिया। इसके बाद वे द्वारकापुरी को लौट आये। तत्पश्चात समस्त पाण्डव अपनी पत्नी द्रौपदी के साथ द्वारका से निकलकर वन-वन में विचरने लगे। नरेश्वर ! वनवास और अज्ञातवास का कष्ट भोगकर वे सब सेना सहित विराट नगर में एकत्र हुए। इधर श्रीकृष्ण के प्रार्थना करने पर भी समस्त कौरवों ने पाण्डवों को उनके राज्य के आधे के आधे का आधा भी नहीं दिया। तब पाण्डवों और कौरवों में युद्ध होना अनिवार्य हो गया। यह जानकर श्रीकृष्ण ने हथियार न उठाने की प्रतिज्ञा कर ली और बलरामजी तीर्थ यात्रा को चले गये। उसी यात्रा में उन्होंने रोमहर्षण सूत और बल्वल को मार डाला।
इसके बाद समस्त कौरव और पाण्डव धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में प्रविष्ट हो परस्पर युद्ध करने लगे। श्रीकृष्ण की कृपा से पाण्डवों की विजय हुई तथा पापी और अपराधी सब कौरव महाभारत युद्ध में मारे गये।
नरेश्वर ! तदनन्तर धर्मराज युधिष्ठिर ने नौ वर्षों तक राज्य किया। इस बीच में उन्होंने तीन अश्वमेध यज्ञ किये, जिससे वे ज्ञाति-बन्धुओं के वध के दोष से श्रीकृष्ण की इच्छा से ही समस्त यादवों के लिये ब्रह्मर्षियों का महान शाप प्राप्त हुआ।
शाप के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने शरणागत भक्त उद्धव को अश्वत्थ वृक्ष के नीचे परम उत्तम श्रीमद्भागवत धर्म का उपदेश दिया।
कुछ दिनों के बाद यादवों में परस्पर संग्राम छिड़ गया। वे प्रभास क्षेत्र में नाना प्रकार के शस्त्रों द्वारा एक-दूसरे पर प्रहार करके मारे गये। बलरामजी मानव-शरीर को छोड़ कर अपने धाम को चले गये। वहाँ देवताओं को आया देख श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये।
व्रज में जाकर श्रीहरि ! नन्द, यशोदा, राधिका तथा गोपियों सहित गोपों से मिले और उन प्रेमी भगवान ने अपने प्रियजनों से प्रेमपूर्वक इस प्रकार कहा। श्रीकृष्ण बोले- नन्द और यशोदे ! अब तुम मुझ में पुत्र बुद्धि छोड़कर समस्त गोकुल वासियों के साथ मेरे परमधाम गोलोक को जाओ।
अब आगे सबको दु:ख देने वाला घोर कलियुग आयेगा, जिसमें मनुष्य प्राय: पापी हो जायेगा; इसमें संशय नहीं है।
उस समय परस्पर संपर्क स्थापित करने के लिये स्त्री-पुरुष का तथा वर्ण का कोई नियम नहीं रह जायेगा।
इसलिये जरा और मृत्यु को हर लेने वाले मेरे उत्तम गोलोक में तुम लोग शीघ्र चले जाओ। श्रीकृष्ण इस प्रकार कह ही रहे थे कि गोलोक से एक परम अद्भुत रथ उतर आया जिसे गोपों ने बड़ी प्रसन्नता के साथ देखा।
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उसका विस्तार पाँच योजन का था और ऊँचाई भी उतनी ही थी। वह व्रजमणि (हीरे) के समान निर्मल और मुक्ता-रत्नों से विभूषित था। उसमें नौ लाख मन्दिर थे और उन घरों में मणिमय दीप जल रहे थे। उस रथ में दो हजार पहिये लगे थे और दो ही हजार घोड़े जुते हुए थे। उस रथ पर महीन वस्त्र का आच्छादन (परदा) पड़ा था। करोड़ों सखियां उसे घेरे हुए थीं ।
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गोलोकादागतं गोपा ददृशुस्ते मुदान्विताः ।
एतस्मिन्नंतरे तत्र कृष्णदेहाद्विनिर्गतः ॥ २१ ॥
देवश्चतुर्भुजो राजन्कोटिमन्मथसन्निभः ।
शंखचक्रधरः श्रीमाँल्लक्ष्म्या सार्धं जगत्पतिः॥२२॥
क्षीरोदं प्रययौ शीघ्रं रथमारुह्य सुंदरम् ।
तथा च विष्णुरूपेण श्रीकृष्णो भगवान् हरिः॥२३॥
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लक्ष्म्या गरुडमारुह्य वैकुण्ठं प्रययौ नृप ।
ततो भूत्वा हरिः कृष्णो नरनारायणावृषी ॥ २४ ॥
कल्याणार्थं नराणां च प्रययौ बद्रिकाश्रमम् ।
परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो राधया युतः ॥२५ ॥
अश्वमेध खण्ड : अध्याय (60)
राजन् ! इसी समय श्रीकृष्ण के शरीर से करोड़ों कामदेवों के समान सुन्दर चार भुजाधारी ‘श्रीविष्णु‘ प्रकट हुए, जिन्होंने शंख और चक्र धारण कर रखे थे। २१-२२।
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वे जगदीश्वर विष्णु श्रीमान् लक्ष्मी★ के साथ एक सुन्दर रथ पर आरूढ़ हो शीघ्र ही क्षीरसागर को चल दिये।२३।
इसी प्रकार ‘नारायण’ रूपधारी भगवान श्रीकृष्ण हरि महालक्ष्मी★ के साथ गरुड़ पर बैठकर वैकुण्ठधाम को चले गये।२४।
नरेश्वर !
इसके बाद श्रीकृष्ण हरि ‘नर और नारायण’- दो ऋषियों के रूप में अभिव्यक्त हो मानवों के कल्याणार्थ बदरिकाश्रम को गये।२५।
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तदनन्तर साक्षात् परिपूर्णतम जगत्पति भगवान श्रीकृष्ण श्रीराधा के साथ गोलोक से आये हुए रथ पर आरूढ़ हुए। नन्द आदि समस्त गोप तथा यशोदा आदि व्रजांगनाएं सब-के-सब वहाँ भौतिक शरीरों का त्याग करके दिव्य देहधारी हो गये।
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तब गोपाल भगवान श्रीहरि नन्द आदि को उस दिव्य रथ पर बिठाकर गोकुल के साथ शीघ्र ही गोलोकधाम को चले गये। ब्रह्माण्डों से बाहर जाकर उन सबने विरजा नदी को देखा। साथ ही शेषनाग की गोद में महालोक दृष्टिगोचर हुआ, जो दु:खो का नाशक तथा परम सुखदायक है।
उसे देखकर गोकुलवासियों सहित श्रीकृष्ण उस रथ से उतर पड़े और श्रीराधा के साथ अक्षय वट का दर्शन करते हुए उस परमधाम में प्रविष्ट हुए।
गिरिवर शतश्रृंग तथा श्रीरासमण्डल को देखते हुए वे कतिपय द्वारों से सुशोभित श्रीमद्वृन्दावन में गये, जो बारह वनों से संयुक्त तथा कामपूरक वृक्षों से भरा हुआ था।
यमुना नदी उसे छूकर बह रही थी। वसन्त–ऋतु और मलयानिल उस वन की शोभा बढ़ा रहे थे। वहाँ फूलों से भरे कितने ही कुंज और निकुंज थे। वह वन गोपियों और गोपों से भरा था। जो पहले सूना सा लगता था, उस श्रीगोलोकधाम में श्रीकृष्ण के पधारने पर जय-जयकार की ध्वनि गूंज उठी। तदनन्तर द्वारका में यदुकुल की पत्नियों-देवकी आदि सभी स्त्रियां दु:ख से व्याकुल हो चिता पर चढ़कर पतिलोक को चली गयीं।
जिनके गोत्र नष्ट हो गये थे, उन यादव-बन्धुओं का पारलौकिक कृत्य अर्जुन ने किया। वे गीता के ज्ञान से अपने मन को शान्त करके बड़े दु:ख से सबका अन्त्येष्टि संस्कार कर सके। जब अर्जुन ने अपने निवास स्थान हस्तिनापुर में जाकर राजा युधिष्ठिर को यह सब समाचार बताया तब वे पत्नी और भाइयों के साथ स्वर्गलोक को चले गये। नृपश्रेष्ठ ! इधर समुद्र ने रैवतक पर्वत सहित श्रीरुक्मिणीवल्लभ श्रीकृष्ण के निवास गृह को छोड़ शेष सारी द्वारकापुरी को अपने जल में डुबोकर आत्मसात कर लिया।
आज भी द्वारका के समुद्रों में श्रीहरि का यह घोष सुनायी पड़ता है कि ‘ब्राह्मण विद्यमान हो या विद्याहीन, वह मेरा ही शरीर है’ (अविद्यो वा सविद्यो वा ब्राह्मणो माम की तनु:)।
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कलियुग के प्रारम्भिक काल में ही श्रीहरि के अंशावातार विष्णुस्वामी महासागर में जाकर श्रीहरि की प्रतिमा को प्राप्त करेंगे और द्वारकापुरी में उसकी स्थापना कर देंगे। नृपेश्वर ! कलियुग में उन द्वारकानाथ का जो मनुष्य वहाँ जाकर दर्शन करते हैं, वे सब कृतार्थ हो जाते हैं। जो श्रीहरि के गोलोकधाम पधारने का चरित्र सुनते हैं तथा यादल गोपों की मुक्ति का वृत्तान्त पढ़ते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो जाते हैं।
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इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अन्तर्गत अश्वमेध खण्ड में ‘श्रीराधा और श्रीकृष्ण का गोलोकाहरण’ नामक साठवां अध्याय पूरा हुआ।
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सूक्ष्मवस्त्राच्छादितं च गोपीकोटीभिरावृतम् ।
गोलोकादागतं तूर्णं ददृशुः सहसा व्रजे ।।४१।।
श्रीकृष्णमनसा जाता मर्त्यलक्ष्मीर्मनोहरा ।
श्वेतद्वीपं गते विष्णौ जगत्पालनकर्तरि ।६३ ।।
शुद्धसत्त्वस्वरूपे च द्विधारूपो बभूव सः ।
दक्षिणांशश्च द्विभुजो गोपबालकरूपकः ।। ६४ ।।
नपीनजलदश्यामः शोभितः पीतवाससा ।
श्रीवंशवदनः श्रीमान्सस्मितः पद्मलोचनः ।। ६५ ।।
शतकोटीन्दुसौन्दर्यं शतकोटिस्मरप्रभाम् ।
दधानः परमानन्दः परिपूर्णतमः प्रभुः ।। ६६ ।।
परं धाम परं ब्रह्मस्वरूपो निर्गुणः स्वयम् ।
परमात्मा च सर्वेषां भक्तानुग्रहविग्रहः ।। ६७ ।।
नित्यदेहश्च भगवानीश्वरः प्रकृतेः परः ।
योगिनो यं वदन्त्येवं ज्योतीरूपं सनातनम् ।६८।
ज्योतिरम्यन्तरे नित्यरूपं भक्ता विदन्ति यम् ।
वेदा वदन्ति सत्यं यं नित्यमाद्यं विचक्षणाः।६९।
यं वदन्ति सुराः सर्वे परं स्वेच्छामयं प्रभूम् ।
सिद्धेन्द्रा मुनयः सर्वे सर्वरूपं वदन्ति यम् ।७० ।।
यमनिर्वचनीयं च योगीन्द्रः शंकरो वदेत् ।
स्वयं विधाता प्रवदेत्कारणानां च कारणम् ।७१ ।।
शेषो वदेदनन्तं यं नवधारूपमीश्वरम् ।
तर्काणामेव षण्णां च षड्विधं रूपमीप्सितम्।७२।
वैष्णवानामेकरूपं वेदानामेकमेव च ।
पुराणानामेकरूपं तस्मान्नवविधं स्मृतम् ।७३।
न्यायोऽनिर्वचनीयं च यं मतं शंकरो वदेत् ।
नित्यं वैशेषिकाश्चाऽऽद्यं तं वदन्ति विचक्षणाः।७४।
सांख्य वदन्ति तं देवं ज्योतीरूपं सनातनम् ।
मीमांसा सर्वरूपं च वेदान्तः सर्वकारणम् ।७५।
पातञ्जलोऽप्यनन्तं च वेदाः सत्यस्वरूपकम् ।
स्वेच्छामयं पुराणं च भक्ताश्च नित्यविग्रहम् ।७६।
सोऽयं गोलोकनाथश्च राधेशो नन्दनन्दनः ।
गोकुले गोपवेषश्च पुण्ये वृन्दावने वने ।। ७७ ।।
चतुर्भुजश्च वैकुण्ठे महालक्ष्मीपतिः स्वयम् ।
नारायणश्च भगवान्यन्नाम मुक्तिकारणम् ।। ७८ ।।
सकृन्नारायणेत्युक्त्वा पुमान्कल्पशतत्रयम् ।
गङ्गादिसर्वतीर्थेषु स्नातो भवति नारद ।। ७९ ।।
सुनन्दनन्दकुमुदैः पार्षदैः परिवारितः ।
शङ्खचक्रगदापद्मधरः श्रीवत्सलाञ्छनः ।। ८० ।।
कौस्तुभेन मणीन्द्रेण भूषितो वनमालया ।
देवैः स्तुतश्च यानेन वैकुण्ठं स्वपदं ययौ ।। ८१ ।।
गते वैकुण्ठनाथे च राधेशश्च स्वयं प्रभुः ।
चकार वंशीशब्दं च त्रैलोक्यमोहनं परम् ।। ८२ ।।
मूर्च्छांप्रापुर्देवगणा मुनयश्चापि नारद ।
अचेतना बभूवुश्च मायया पार्वतीं विना ।८३ ।।
उवाच पार्वती देवी भगवन्तं सनातनम् ।
विष्णुमाया भगवती सर्वरूपा सनातनी ।। ८४ ।।
परब्रह्मस्वरूपा या परमात्मस्वरूपिणी ।
सगुणा निर्गुणा सा च परा स्वेच्छामयी सती।८५।
"पार्वत्युवाच
एकाऽहं राधिकारूपा गोलोके रासमण्डले ।
रासशून्यं च गोलोकं परिपूर्ण कुरु प्रभो ।। ८६ ।।
गच्छ त्वं रथमारुह्य मुक्तामाणिक्यभूषितम् ।
परिपूर्णतमाऽहं च तव वङःस्थलस्थिता ।। ८७ ।।
तवाऽऽज्ञया महालक्ष्मीरहं वैकुण्ठगामिनी ।
सरस्वती च तत्रैव वामे पार्श्वे हरेरपि ।। ८८ ।।
तवाहं मनसा जाता सिन्धुकन्या तवाऽऽज्ञया ।
सावित्री वेदमाताऽहं कलया विधिसंनिधौ ।८९ ।।
तैजःसु सर्वदेवानां पुरा सत्ये तवाऽऽज्ञया ।
अधिष्ठानं कृत तत्र धृतं देव्या शरीरकम् ।। ९० ।।
शुम्भादयश्च दैत्याश्च निहताश्चावलीलया ।
दुर्ग निहत्य तुर्गाऽहं त्रिपुरा त्रिपुरे वधे ।। ९१ ।।
निहत्य रक्तबीजं च रक्तबीजविनाशिनी ।
तवाऽऽज्ञया दक्षकन्या सती सत्यस्वरूपिणी।९२ ।
तैजःसु सर्वदेवानां पुरा सत्ये तवाऽऽज्ञया ।
अधिष्ठानं कृत तत्र धृतं देव्या शरीरकम् ।। ९० ।।
शुम्भादयश्च दैत्याश्च निहताश्चावलीलया ।
दुर्ग निहत्य दुर्गाऽहं त्रिपुरा त्रिपुरे वधे ।। ९१ ।।
निहत्य रक्तबीजं च रक्तबीजविनाशिनी ।
तवाऽऽज्ञया दक्षकन्या सती सत्यस्वरूपिणी ।९२।
योगेन त्यक्त्वा देहं च शैलजाऽहं तवाऽऽज्ञया ।
त्वया दत्तवा (त्ताः शंकराय गोलोके रासमण्डले।९३।
विष्णुभक्तिरहं तेन विष्णुमाया च वैष्णवी ।
नारायणस्य मायाऽहं तेन नारायणी स्मृता ।९४।
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कृष्णप्राणाधिकाऽहं च प्राणाधिष्ठातृदेवता ।
महाविष्णोश्च वासोश्च जननी राधिका स्वयम् ।९५।
तवाऽऽज्ञया पञ्चधाऽहं पञ्चप्रकृतिरूपिणी ।
कलाकलांशयाऽहं च देवपत्नयो गृहे गृहे ।। ९६ ।।
शीघ्रं गच्छ महाभाग तत्राऽहं विरहातुरा ।
गोपीभिः सहिता रासं भ्रमन्ती परितः सदा ।९७।
पार्वतीवचनं श्रुत्वा प्रहस्य रसिकेश्वरः ।
रत्नयानं समारुह्य ययौ गोलोकमुत्तमम् ।। ९८ ।।
पार्वती बोधयामास स्वयं देवगणं तथा ।
मायावंशीरवाच्छन्नं विष्णुमाया सनातनी ।९९।
कृत्वा ते हरिशब्दं च स्वगृहं विस्मयं ययुः ।
शिवेन सार्धं दुर्गा सा प्रहृष्टा स्वपुरं ययौ ।१००।
अथ कृष्णं समायान्तं राधा गोपीगणैः सह।
अनुव्रजं ययौ हृष्टा सर्वज्ञा प्राणवल्लभम् ।१०१।
दृष्ट्वा समीपमायान्तमवरुह्य रथात्सती ।
प्रणनाम जगन्नाथं सिरसा सखिभिः सह।१०२।
गोपा गोप्यश्च मुदिताः प्रफुल्लवदनेक्षणाः ।
दुन्दुभिं वादयामासुरीश्वरागमनोत्सुकाः।१०३।
विरजां च समुत्तीर्य दृष्ट्वा राधां जगत्पतिः ।
अवरुह्य रथात्तूर्णं गृहीत्वा राधिकाकरम् ।१०४।
शतशृङ्गं च बभ्राम सुरम्यं रासमण्डलम् ।
दृष्ट्वाऽक्षयवटं पुण्यं पुण्यं वृन्दावनं ययौ।१०५।
तुलसीकाननं दृष्ट्वा प्रययौ मालतीवनम् ।
वामे कृत्वा कुन्दवनं माधवीकाननं तथा।१०६।
चकार दक्षिणे कृष्णश्चम्पकारण्यमीप्सिनम् ।
चकार पश्चात्तूर्णं च चारुचन्दनकाननम् ।१०७।
ददर्श पुरतो रम्यं राधिकाभवनं परम् ।
उवास राधया सार्धं रत्नसिंहासने वरे ।१०८।
सकर्पूरं च ताम्बूलं बुभुजे वासितं जलम् ।
सुष्वाप पुष्पतल्पे च सुगन्धिचन्दनार्चिते ।१०९।
स रेमे रामया सार्धं निमग्नो रससागरे ।
इत्येवं कथितं सर्वं धर्मवक्त्राच्च यच्छ्रुतम् ।११०।
गोलोकारोहणं रम्यं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।। १११ ।
इति श्रीब्रह्मवैवर्त महापुराण श्रीकृष्णजन्मखण्ड उत्तरार्द्ध नारदनारायणसंवाद गोलोकारोहणं
नामैकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः।१२९।
गुरुवार, 26 अक्टूबर 2023
नारद पुराण ब्रह्म वैवर्त- पुराण और गर्गसंहिता- ते समान सन्दर्भ-
"श्रीनारायण उवाच
नित्य आत्मा नभो नित्यं कालो नित्यो दिशो यथा
विश्वानां गोलकं नित्यं नित्यो गोलोक एव च ॥५॥
भगवान नारायण बोले– नारद ! आत्मा, आकाश, काल, दिशा, गोकुल तथा गोलोकधाम– ये सभी नित्य हैं। कभी इनका अन्त नहीं होता। गोलोकधाम का एक भाग जो उससे नीचे है, वैकुण्ठधाम है।
वह भी नित्य है। ऐसे ही प्रकृति को भी नित्य माना जाता है।
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ब्रह्मा की आयु इनके एक निमेष की तुलना में है। ये ही ये आत्मा परब्रह्म श्रीकृष्ण कहलाते हैं।
स कृष्णः सर्वस्रष्टाऽऽदौ सिसृक्षन्नेक एव च।
सृष्ट्युन्मुखस्तदंशेन कालेन प्रेरितः प्रभुः॥२६।
स्वेच्छामयः स्वेच्छया च द्विधारूपो बभूव ह ।
स्त्रीरूपो वामभागांशो दक्षिणांशः पुमान्स्मृतः ॥२७॥
श्रीकृष्ण ही आदिमें सर्वप्रपंचके स्रष्टा तथा सृष्टिके एकमात्र बीजस्वरूप हैं। उनमें जब सृष्टिकी इच्छा उत्पन्न हुई, तब उनके अंशभूत कालके द्वारा प्रेरित होकर स्वेच्छामय वे प्रभु अपनी इच्छासे दो रूपोंमें विभक्त हो गये। उनका वाम भागांश स्त्रीरूप तथा दक्षिणांश पुरुषरूष कहा गया है ।। 26-27 ॥
__________
अतिमात्रं तया सार्द्धं रासेशो रासमण्डले ।।
रासोल्लासेषु रहसि रासक्रीडां चकार ह।।३८।।
नानाप्रकारशृंगारं शृङ्गारो मूर्त्तिमानिव।।
चकार सुखसम्भोगं यावद्वै ब्रह्मणो वयः।३९।
ततः स च परिश्रान्तस्तस्या योनौ जगत्पिता ।।
चकार वीर्य्याधानं च नित्यानन्दः शुभक्षणे ।। 2.2.४० ।।
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गात्रतो योषितस्तस्याः सुरतान्ते च सुव्रत।
निस्ससार श्रमजलं श्रान्तायास्तेजसा हरेः। ४१।।
महासुरतखिन्नाया निश्वासश्च बभूव ह ।
तदाधारश्रमजलं तत्सर्वं विश्वगोलकम् । ४२५।
अथ सा कृष्णशक्तिश्च कृष्णाद्गर्भं दधार ह ।।
शतमन्वन्तरं यावज्ज्वलन्तो(ती?) ब्रह्मतेजसा ।४७।
कृष्णप्राणाधिदेवी सा कृष्णप्राणाधिकप्रिया ।
कृष्णस्य सङ्गिनी शश्वत्कृष्णवक्षस्थलस्थिता । ४८।
शतमन्वन्तरातीते काले परमसुन्दरी ।।
सुषावाण्डं सुवर्णाभं विश्वाधारालयं परम् । ४९।
दृष्ट्वा चाण्डं हि सा देवी हृदयेन विदूयता ।।
उत्ससर्ज च कोपेन तदण्डं गोलके जले ।। 2.2.५० ।।
दृष्ट्वा कृष्णश्च तत्त्यागं हाहाकारं चकार द।।।
शशाप देवीं देवेशस्तत्क्षणं च यथोचितम् ।। ५१ ।।
यतोऽपत्यं त्वया त्यक्तं कोपशीले सुनिष्ठुरे ।।
भव त्वमनपत्याऽपि चाद्यप्रभृति निश्चितम् ।। ५२।
या यास्त्वदंशरूपाश्च भविष्यन्ति सुरस्त्रियः ।।
अनपत्याश्च ताः सर्वास्त्वत्समा नित्ययौवनाः ।। ५३ ।।
एतस्मिन्नन्तरे देवी जिह्वाग्रात्सहसा ततः ।।
आविर्बभूव कन्यैका शुक्लवर्णा मनोहरा ।५४
पीतवस्त्रपरीधाना वीणापुस्तकधारिणी ।।
रत्नभूषणभूषाढ्या सर्वशास्त्राधिदेवता । ५९।
अथ कालान्तरे सा च द्विधारूपा बभूव ह ।।
वामार्द्धाङ्गा च कमला दक्षिणार्द्धा च राधिका ।। ५६ ।
एतस्मिन्नन्तरे कृष्णो द्विधारूपो बभूव ह ।।
दक्षिणार्द्धस्स्याद्द्विभुजो वामार्द्धश्च चतुर्भुजः ।५७।
उन्हें देखकर रासेश्वर तथा परम रसिक श्रीकृष्ण ने उनके साथ रासमण्डलमें उल्लासपूर्वक रासलीला की। ब्रह्माके दिव्य दिवस की अवधि तक नाना प्रकारकी श्रृंगारचेष्टाओं से युक्त उन्होंने मूर्तिमान् श्रृंगाररस के समान सुखपूर्वक क्रीड़ा की। तत्पश्चात् थके हुए उन जगत्पिता ने नित्यानन्द मय शुभ मुहूर्तमें देवी के क्षेत्र में तेज का आधान किया। हे सुव्रत क्रीडा के अन्तमें हरि के तेज से परिश्रान्त उन देवी के शरीर से स्वेद निकलने लगा और महान् परिश्रम से खिन्न उनका श्वास भी वेग से चलने लगा। तब वह सम्पूर्ण स्वेद विश्वगोलक बन गया और वह निःश्वास वायु जगत् में सब प्राणियोंके जीवनका आधार बन गया ॥ 36–41
______________________
उस मूर्तिमान् वायु के वामांग से उसकी प्राणप्रिय पत्नी प्रकट हुईं, पुनः उनके पाँच पुत्र उत्पन्न हुए
जो जीवों के प्राणके रूपमें प्रतिष्ठित हैं। प्राण, अपान,
समान, उदान तथा व्यान-ये पाँच वायु और उनके पाँच
अधोगामी प्राणरूप पुत्र भी उत्पन्न हुए ॥ 42-43 ॥
स्वेदके रूपमें निकले जलके अधिष्ठाता महान् वरुणदेव हुए। उनके वामांगसे उनकी पत्नी वरुणानी प्रकट हुई। श्रीकृष्णकी उन चिन्मयी शक्तिने उनके गर्भ को धारण किया। वे सौ मन्वन्तरोंतक ब्रह्मतेज से | देदीप्यमान बनी रहीं। वे श्रीकृष्णके प्राणों की अधिष्ठातृदेवी हैं, कृष्ण को प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं। वे कृष्णकी सहचरी हैं और सदा उनके वक्षःस्थल पर विराजमान रहती हैं। सौ मन्वन्तर बीतनेपर उन सुन्दरी ने स्वर्ण की कान्तिवाले, विश्वके आधार तथा निधानस्वरूप श्रेष्ठ बालक को जन्म दिया ॥ 44-47 ॥
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उस बालक को देखकर उन देवी का हृदय अत्यन्त दुःखित हो गया और उन्होंने उस बालक को कोपपूर्वक उस ब्रह्माण्डगोलक में छोड़ दिया। बालक के उस त्यागको देखकर देवेश्वर श्रीकृष्ण हाहाकार करने लगे और उन्होंने उसी क्षण उन देवी को समयानुसार शाप दे दिया- हे कोपशीले! हे निष्ठुरे ! तुमने पुत्र को त्याग दिया है, इस कारण आज से तुम निश्चित ही सन्तानहीन रहोगी तुम्हारे अंश से जो जो देवपत्नियाँ प्रकट होंगी, वे भी तुम्हारी तरह सन्तानरहित तथा नित्ययौवना रहेंगी ।
48-51॥
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उवाच वाणीं श्रीकृष्णस्त्वमस्य भव कामिनी।।
अत्रैव मानिनी राधा नैव भद्रं भविष्यति । ५८।
एवं लक्ष्मीं संप्रदौ तुष्टो नारायणाय वै ।।
संजगाम च वैकुण्ठं ताभ्यां सार्द्धं जगत्पतिः। ५९।
अनपत्ये च ते द्वे च यतो राधांशसम्भवे।।
नारायणाङ्गादभवन्पार्षदाश्च चतुर्भुजाः ।। 2.2.६०।
तेजसा वयसा रूपगुणाभ्यां च समा हरेः ।।
बभूवुः कमलाङ्गाच्च दासीकोट्यश्च तत्समाः ।। ६१।
अथ गोलोकनाथस्य लोमाविवरतो मुने ।।
आसन्नसंख्यगोपाश्च वयसा तेजसा समाः ।। ६२।
रूपेण सुगुणेनैव वेषाद्वा विक्रमेण च ।।
प्राणतुल्याः प्रियाः सर्वे बभूवुः पार्षदा विभोः ।६३।
राधाङ्गलोमकूपेभ्यो बभूवुर्गोपकन्यकाः ।।
राधातुल्याश्च सर्वास्ता नान्यतुल्याः प्रियंवदाः ।। ६४ ।।
रत्नभूषणभूषाढ्याः शश्वत्सुस्थिरयौवनाः ।।
अनपत्याश्च ताः सर्वाः पुंसः शापेन सन्ततम् । ६५।
एतस्मिन्नन्तरे विप्र सहसा कृष्णदेहतः ।।
आविर्बभूव सा दुर्गा विष्णुमाया सनातनी ।६६।
देवी नारायणीशाना सर्वशक्तिस्वरूपिणी ।।
बुद्ध्यधिष्ठातृदेवी सा कृष्णस्य परमात्मनः ।।६७।।
इसके बाद देवीके जिह्वाग्रसे सहसा ही एक सुन्दर गौरवर्ण कन्या प्रकट हुई। उन्होंने श्वेत वस्त्र धारण कर रखा था तथा वे हाथ में वीणा पुस्तक लिये हुए थीं। सभी शास्त्रोंकी अधिष्ठात्री वे देवी रत्नोंके आभूषण से सुशोभित थीं। कालान्तरमें वे भी द्विधारूपसे विभक्त हो गयीं। उनके वाम अर्धागसे कमला तथा दक्षिण अर्धागसे राधिका प्रकट हुई। ll 52-54॥
_______________________
इसी बीच श्रीकृष्ण भी द्विधारूपसे प्रकट हो गये। उनके दक्षिणार्धसे द्विभुज रूप प्रकट हुआ तथा वामार्धसे चतुर्भुज रूप प्रकट हुआ।
तब श्रीकृष्णने उन सरस्वती देवी से कहा कि तुम इस (चतुर्भुज) विष्णुकी कामिनी बनो। ये मानिनी राधा इस द्विभुजके साथ यहीं रहेंगी।
तुम्हारा कल्याण होगा। इस प्रकार प्रसन्न होकर उन्होंने लक्ष्मीको नारायणको समर्पित कर दिया। तत्पश्चात् वे जगत्पति उन दोनों के साथ वैकुण्ठ को चले गये ।। 55-57 ॥
राधा के अंश से प्रकट वे दोनों लक्ष्मी तथा सरस्वती निःसन्तान ही रहीं।
_____________________
भगवान् नारायण के अंगसे चतुर्भुज पार्षद प्रकट हुए। वे तेज, वय, रूप और गुणोंमें नारायणके समान ही थे उसी प्रकार लक्ष्मीके अंगसे उनके ही समान करोड़ों दासियाँ प्रकट हो गयीं ॥ 58-59 ॥
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हे मुने! गोलोकनाथ श्रीकृष्णके रोमकूपोंसे असंख्य गोपगण प्रकट हुए; जो वय, तेज, रूप, गुण, बल तथा पराक्रममें उन्हींके समान थे। वे सभी परमेश्वर श्रीकृष्णके प्राणोंके समान प्रिय पार्षद बन गये ।। 60-61 ॥
श्रीराधाके अंगोंके रोमकूपोंसे अनेक गोपकन्याएँ प्रकट हुईं। वे सब राधा के ही समान थीं तथा उनकी प्रियवादिनी दासियोंके रूपमें रहती थीं। वे सभी रत्नाभरणोंसे भूषित और सदा स्थिर यौवना थीं, किंतु परमात्माके शापके कारण वे सभी सदा सन्तानहीन रहीं।
हे विप्र इसी बीच श्रीकृष्णकी उपासना करनेवाली सनातनी विष्णुमाया दुर्गा सहसा प्रकट हुईं।
वे देवी सर्वशक्तिमती, नारायणी तथा ईशाना हैं और परमात्मा श्रीकृष्णकी बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी हैं ॥ 62-65 ll
देवीनां बीजरूपा च मूलप्रकृतिरीश्वरी।।
परिपूर्णतमा तेजःस्वरूपा त्रिगुणात्मिका ।६८।
सा च संस्तूय सर्वेशं तत्पुरः समुपस्थिता ।।
रत्नसिंहासनं तस्यै प्रददौ राधिकेश्वरः ।। ७९ ।
एतस्मिन्नन्तरे तत्र सस्त्रीकश्च चतुर्मुखः ।।
पद्मनाभो नाभिपद्मान्निस्ससार पुमान्मुने ।। 2.2.८० ।।
कमण्डलुधरः श्रीमांस्तपस्वी ज्ञानिनां वरः।
चतुर्मुखस्तं तुष्टाव प्रज्वलन्ब्रह्मतेजसा ।८१।
सुदती सुन्दरी श्रेष्ठा शतचन्द्रसमप्रभा ।
वह्निशुद्धांशुकाधाना रत्नभूषणभूषिता । ८२ ।
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रत्नसिंहासने रम्ये स्तुता वै सर्वकारणम् ।
उवास स्वामिना सार्द्ध कृष्णस्य पुरतो मुदा । ८३।
एतस्मिन्नन्तरे कृष्णो द्विधारूपो बभूव सः ।।
वामार्द्धांगो महादेवो दक्षिणो गोपिकापतिः। ८४।।
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा– 'वत्स! मेरी ही भाँति तुम भी बहुत समय तक अत्यन्त स्थिर होकर विराजमान रहो। असंख्य ब्रह्माओं के जीवन समाप्त हो जाने पर भी तुम्हारा नाश नहीं होगा। प्रत्येक ब्रह्माण्ड में अपने क्षुद्र अंश से तुम विराजमान रहोगे
भगवान श्रीकृष्ण बोले– 'वत्स! सृष्टि रचने के लिये जाओ। विधे! मेरी बात सुनो, महाविराट के एक रोमकूप में स्थित क्षुद्र विराट पुरुष के नाभिकमल से प्रकट होओ।' फिर रुद्र को संकेत करके कहा– ‘वत्स महादेव! जाओ। महाभाग! अपने अंश से ब्रह्मा के ललाट से प्रकट हो जाओ और स्वयं भी दीर्घकाल तक तपस्या करो।’
इति श्रीब्रह्मवैवर्त महापुराण द्वि० प्रकृति खण्ड नारायणनारदसंवादे देवदेव्युत्पत्तिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः ।२।
महाविराट पुरुष के रोमकूप में जो ब्रह्माण्ड-गोलक का जल है, उसमें वे महाविराट पुरुष अपने अंश से क्षुद्र विराट पुरुष हो गये, जो इस समय भी विद्यमान हैं। इनकी सदा युवा अवस्था रहती है। इनका श्याम रंग का विग्रह है। ये पीताम्बर पहनते हैं।
जलरूपी शैय्या पर सोये रहते हैं। इनका मुखमण्डल मुस्कान से सुशोभित है। इन प्रसन्न मुख विश्वव्यापी प्रभु को ‘जनार्दन’ कहा जाता है। इन्हीं के नाभि कमल से ब्रह्मा प्रकट हुए और उसके अन्तिम छोर का पता लगाने के लिये वे उस कमलदण्ड में एक लाख युगों तक चक्कर लगाते रहे।
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श्रीबृहन्नारदीय पुराण पूर्वभाग बृहदुपाख्यान तृतीयपाद पञ्चप्रकृतिमन्त्रादिनिरूपणं नामक त्र्यशीतितमोऽध्यायः।८३।
"श्रीशौनक उवाच'
साधु सूत महाभागः जगदुद्धारकारकम् ।
महातन्त्रविधानं नः कुमारोक्तं त्वयोदितम्।१।
अलभ्यमेतत्तंत्रेषु पुराणेष्वपि मानद ।
यदिहोदितमस्मभ्यं त्वयातिकरुणात्मना ।२।
नारदो भगवान्सूत लोकोद्धरणतत्परः ।।
भूयः पप्रच्छ किं साधो कुमारं विदुषां वरम्।३।
"सूत उवाच।
श्रुत्वा स नारदो विप्राः युग्मनामसहस्रकम्।
सनत्कुमारमप्याह प्रणम्य ज्ञानिनां वरम् ।४।
"नारद उवाच ।
ब्रह्मंस्त्वया समाख्याता विधयस्तंत्रचोदिताः।
तत्रापि कृष्णमंत्राणां वैभवं ह्युदितं महत् ।५।
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या तत्र राधिकादेवी सर्वाद्या समुदाहृता ।
तस्या अंशावताराणां चरितं मंत्रपूर्वकम् ।६।
तन्त्रोक्तं वद सर्वज्ञ त्वामहं शरणं गतः।
शक्तेस्तन्त्राण्यनेकानि शिवोक्तानि मुनीश्वर।७।
यानि तत्सारमुद्धृत्य साकल्येनाभिधेहि नः।
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य नारदस्य महात्मनः।८।
सनत्कुमारः प्रोवाच स्मृत्वा राधापदाम्बुजम् ।
"सनत्कुमार उवाच ।
श्रृणु नारद वक्ष्यामि राधाञ्शानां समुद्भवम् ।९।
शक्तीनां परमाश्चर्यं मन्त्रसाधनपूर्वकम् ।।
या तु राधा मया प्रोक्ता कृष्णार्द्धांगसमुद्भवा ।१०।
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गोलोकवासिनी सा तु नित्या कृष्णसहायिनी ।
तेजोमण्डलमध्यस्था दृश्यादृश्यस्वरूपिणी।११।
कदाचित्तु तया सार्द्धं स्थितस्य मुनिसत्तम ।।
कृष्णस्य वामभागात्तु जातो नारायणः स्वयम्।१२।
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राधिकायाश्च वामांगान्महालक्ष्मीर्बभूव ह।
ततः कृष्णो महालक्ष्मीं दत्त्वा नारायणाय च।१३।
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वैकुण्ठे स्थापयामास शश्वत्पालनकर्मणि ।।
अथ गोलोकनाथस्य लोम्नां विवरतो मुने ।१४।
जातुश्चासंख्यगोपालास्तेजसा वयसा समाः।
प्राणतुल्यप्रियाः सर्वे बभूवुः पार्षदा विभोः ।१५।
राधांगलोमकूपेभ्ये बभूवुर्गोपकन्यकाः।
राधातुल्याः सर्वतश्च राधादास्यः प्रियंवदाः।१६।
एतस्मिन्नंतरे विप्र सहसा कृष्णदेहतः।
आविर्बभूव सा दुर्गा विष्णुमाया सनातनी।१७।
देवीनां बीजरूपां च मूलप्रकृतिरीश्वरी ।।
परिपूर्णतमा तेजः स्वरूपा त्रिगुणात्मिका ।१८।
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सहस्रभुजसंयुक्ता नानाशस्त्रा त्रिलोचना ।।
या तु संसारवृक्षस्य बीजरूपा सनातनी।१९ ।
रत्नसिंहासनं तस्यै प्रददौ राधिकेश्वरः।
एतस्मिन्नंतरे तत्र सस्त्रीकस्तु चतुर्मुखः।२०।
ज्ञानिनां प्रवरः श्रीमान् पुमानोंकारमुच्चरन् ।।
कमण्डलुधरो जातस्तपस्वी नाभितो हरेः ।२१।
स तु संस्तूय सर्वेशं सावित्र्या भार्यया सह।
निषसादासने रम्ये विभोस्तस्याज्ञया मुने।२२।
अथ कृष्णो महाभाग द्विधारूपो बभूव ह ।
वामार्द्धांगो महादेवो दक्षार्द्धो गोपिकापतिः।२३।
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पञ्चवक्त्रस्त्रिनेत्रोऽसौ वामार्द्धागो मुनीश्वः ।।
स्तुत्वा कृष्णं समाज्ञप्तो निषसाद हरेः पुरः ।२४ ।
अथ कृष्णश्चतुर्वक्त्रं प्राह सृष्टिं कुरु प्रभो ।
सत्यलोके स्थितो नित्यंगच्छ मांस्मर सर्वदा।२५।
एवमुक्तस्तु हरिणा प्रणम्य जगदीश्वरम् ।
जगाम भार्यया साकं स तु सृष्टिं करोति वै ।२६।
पितास्माकं मुनिश्रेष्ठ मानसीं कल्पदैहिकीम् ।
ततः पश्चात्पंचवक्त्रं कृष्णं प्राह महामते ।२७।
दुर्गां गृहाण विश्वेश शिवलोके तपेश्वर ।।
यावत्सृष्टिस्तदन्ते तु लोकान्संहर सर्वतः ।२८।
सोऽपि कृष्णं नमस्तृत्य शिवलोकं जगाम ह ।।
ततः कालान्तरे ब्रह्मन्कृष्णस्य परमात्मनः।२९।
वक्त्रात्सरस्वती जाता वीणापुस्तकधारिणी ।
तामादिदेश भगवान् वैकुण्ठं गच्छ मानदे ।३०।
लक्ष्मीसमीपे तिष्ठ त्वं चतुर्भुजसमाश्रया ।।
सापि कृष्णं नमस्कृत्य गता नारायणान्तिकम् ।३१।
एवं पञ्चविधा जाता सा राधा सृष्टिकारणम् ।
आसां पूर्णस्वरूपाणां मन्त्रध्यानार्चनादिकम् ।३२।
वदामि श्रृणु विप्रेद्रं लोकानां सिद्धिदायकम् ।
तारः क्रियायुक् प्रतिष्ठा प्रीत्याढ्या च ततः परम् ।३३ ।
ज्ञानामृता क्षुधायुक्ता वह्निजायान्तकतो मनुः।
सुतपास्तु ऋषिश्छन्दो गायत्री देवता मनोः ।३४।
राधिका प्रणवो बीजं स्वाहा शक्तिरुदाहृता ।
षडक्षरैः षडंगानि कुर्याद्विन्दुविभूषितैः ।३५।
ततो ध्यायन्स्वहृदये राधिकां कृष्णभामिनीम् ।
श्वेतचंपकवर्णाभां कोटिचन्द्रसमप्रभाम् ।३६।
शरत्पार्वणचन्द्रास्यां नीलेंदीवरलोचनाम् ।
सुश्रोणीं सुनितंबां च पक्वबिंबाधरांबराम् ।३७।
मुक्ताकुन्दाभदशनां वह्निशुद्धांशुकान्विताम् ।।
रत्नकेयूरवलयहारकुण्डलशोभिताम् ।३८।
गोपीभिः सुप्रियाभिश्च सेवितां श्वेतचामरैः ।।
रासमण्डलमध्यस्थां रत्नसिंहासनस्थिताम् ।३९।
ध्यात्वा पुष्पाञ्जलिं क्षिप्त्वा पूजयेदुपचारकैः ।।
लक्षषट्कं जपेन्मंत्रं तद्दशांशं हुनेत्तिलैः।४० ।
आज्याक्तैर्मातृकापीठे पूजा चावरणैः सह ।।
षट्कोणेषु षडंगानि तद्बाह्येऽष्टदले यजेत् ।४१।
मालावतीं माधवीं च रत्नमालां सुशीलिकाम् ।।
ततः शशिकलां पारिजातां पद्मावतीं तथा ।४२।
सुन्दरीं च क्रमात्प्राच्यां दिग्विदिक्षु ततो बहिः ।
इन्द्राद्यान्सायुधानिष्ट्वा विनियोगांस्तु साधयेत् ।४३।
राधा कृष्णप्रिया रासेश्वरी गोपीगणाधिपा ।
निर्गुणा कृष्णपूज्या च मूलप्रकृतिरीश्वरी ।४४।
सर्वेश्वरी सर्वपूज्या वैराजजननी तथा ।
पूर्वाद्याशासु रक्षंतु पांतु मां सर्वतः सदा ।४५।
त्वं देवि जगतां माता विष्णुमाया सनातनी ।।
कृष्णमायादिदेवी च कृष्णप्राणाधिके शुभे।४६।
कष्णभक्तिप्रदे राधे नमस्ते मंगलप्रदे।
इति सम्प्रार्थ्य सर्वेशीं स्तुत्वा हृदि विसर्जयेत् ।४७।
एवं यो भजते राधां सर्वाद्यां सर्वमंगलाम् ।
भुक्त्वेह भोगानखिलान्सोऽन्ते गोलोकमाप्नुयात् ।४८।
अथ तुभ्यं महालक्ष्म्या विधानं वच्मि नारद ।।
यदाराधनतो भूयात्साधको भुक्तिमुक्तिमान् ।४९ ।
लक्ष्मीमायाकामवाणीपूर्वा कमलवासिनी ।
ङेंता वह्निप्रियांतोऽयं मन्त्रकल्पद्रुमः परः ।५० ।
ऋषिर्नारायणश्चास्य छन्दो हि जगती तथा ।।
देवता तु महालक्ष्मीर्द्विद्विवर्णैः षडंगकम् ।५१।
श्वेतचम्पकवर्णाभां रत्नभूषणभूषिताम् ।।
ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां भक्तानुग्रहकातराम् ।५२।
बिभ्रतीं रत्नमालां च कोटिचंद्रसमप्रभाम् ।।
ध्यात्वा जपेदर्कलक्षं पायसेन दशांशतः ।५३ ।
जुहुयादेधिते वह्नौ श्रीदृकाष्टैः समर्चयेत् ।।
नवशक्तियुते पीठे ह्यंगैरावरणैः सह ।५४ ।
विभूतिरुन्नतिः कान्तिः सृष्टिः कीर्तिश्च सन्नतिः ।।
व्याष्टिरुत्कृष्टिर्ऋद्धिश्च संप्रोक्ता नव शक्तयः ।५५।
अत्रावाह्य च मूलेन मूर्तिं संकल्प्य साधकः।
षट् कोणेषु षडंगानि दक्षिणे तु गजाननम् ।५६।
वामे कुसुमधन्वानं वसुपत्रे ततो यजेत् ।।
उमां श्रीं भारतीं दुर्गां धरणीं वेदमातरम् ।५७ ।
देवीमुषां च पूर्वादौ दिग्विदिक्षु क्रमेण हि ।।
जह्नुसूर्यसुते पूज्ये पादप्रक्षालनोद्यते ।५८।
शंखपद्मनिधी पूज्यौ पार्श्वयोर्घृतचामरौ ।।
धृतातपत्रं वरुणं पूजयेत्पश्चिमे ततः ।५९।
संपूज्य राशीन्परितो यथास्थानं नवग्रहान् ।।
चतुर्दन्तैरावतादीन् दिग्विदिक्षु ततोऽर्चयेत् ।६० ।
तद्बहिर्लोकपालांश्च तदस्त्राणि च तद्बहिः ।।
दूर्वाभिराज्यसिक्ताभिर्जुहुयादायुषे नरः ।६१।
गुडूचीमाज्यसंसिक्तां जुहुयात्सप्तवासरम् ।।
अष्टोत्तरसहस्रं यः स जीवेच्छरदां शतम् ।६२।
हुत्वा तिलान्घृताभ्यक्तान्दीर्घमायुष्यमाप्नुयात् ।।
आरभ्यार्कदिनं मंत्री दशाहं घृतसंप्लुतः ।६३।
जुहुयादर्कसमिधः शरीरारोग्यसिद्धये ।।
शालिभिर्जुह्वतो नित्यमष्टोत्तरसहस्रकम् ।६४।
अचिरादेव महती लक्ष्मी संजायते ध्रुवम् ।।
उषाजा जीनालिकेररजोभिर्गृतमिश्रितैः ।६५ ।
हुनेदष्टोत्तरशतं पायसाशी तु नित्यशः ।।
मण्डलाज्जायते सोऽपि कुबेर इव मानवः ।। ८३-६६ ।।
हविषा गुडमिश्रेण होमतो ह्यन्नवान्भवेत् ।।
जपापुष्पाणि जुहुयादष्टोत्तरसहस्रकम् ।६७।
ताम्बूलरससम्मिश्रं तद्भस्मतिलकं चरेत् ।।
चतुर्णामपि वर्णानां मोहनाय द्विजोत्तमः।।६८।
एवं यो भजते लक्ष्मीं साधकेंद्रो मुनीश्वर ।।
सम्पदस्तस्य जायंते महालक्ष्मीः प्रसीदति ।६९ ।।
देहान्ते वैष्णवं धाम लभते नात्र संशयः ।।
या तु दुर्गा द्विजश्रेष्ठ शिवलोकं गता सती ।७० ।।
सा शिवाज्ञामनुप्राप्य दिव्यलोकं विनिर्ममे ।।
देवीलोकेति विख्यातं सर्वलोकविलक्षणम् ।७१ ।।
तत्र स्थिता जगन्माता तपोनियममास्थिता ।।
विविधान् स्वावतारान्हि त्रिकाले कुरुतेऽनिशम् ।७२ ।
मायाधिका ह्लादिनीयुक् चन्द्राढ्या सर्गिणी पुनः ।।
प्रतिष्ठा स्मृतिसंयुक्ता क्षुधया सहिता पुनः।७३ ।
ज्ञानामृता वह्निजायांतस्ताराद्यो मनुर्मतः ।।
ऋषिः स्याद्वामदेवोऽस्य छंदो गायत्रमीरितम् ।७४।
देवता जगतामादिर्दुर्गा दुर्गतिनाशिनी ।।
ताराद्येकैकवर्णेन हृदयादित्रयं मतम् ७५ ।।
त्रिभिर्वर्मेक्षण द्वाभ्यां सर्वैरस्त्रमुदीरितम् ।।
महामरकतप्रख्यां सहस्रभुजमंडिताम् ।७६ ।।
नानाशस्त्राणि दधतीं त्रिनेत्रां शशिशेखराम् ।।
कंकणांगदहाराढ्यां क्वणन्नूपुरकान्विताम् ।७७ ।।
किरीटकुंडलधरां दुर्गां देवीं विचिंतयेत् ।७८
वसुलक्षं जपेन्मंत्रं तिलैः समधुरैर्हुनेत ।।
पयोंऽधसा वा सहस्रं नवपद्मात्मके यजेत् ७९।
प्रभा माया जया सूक्ष्मा विशुद्धानं दिनी पुनः ।।
सुप्रभा विजया सर्वसिद्धिदा पीठशक्तयः ।८०।
अद्भिर्ह्रस्वत्रयक्लीबरहितैः पूजयेदिमाः।
प्रणवो वज्रनखदंष्ट्रायुधाय महापदात् ।८१ ।।
सिंहाय वर्मास्त्रं हृञ्च प्रोक्तः सिंहमनुर्मुने ।।
दद्यादासनमेतेन मूर्तिं मूलेन कल्पयेत् ।८२ ।
अङ्गावृर्त्तिं पुराभ्यार्च्य शक्तीः पत्रेषु पूजयेत् ।।
जया च विजया कीर्तिः प्रीतिः पश्चात्प्रभा पुनः।८३।
श्रद्धा मेधा श्रुतिश्चैवस्वनामाद्यक्षरादिकाः ।
पत्राग्रेष्वर्चयेदष्टावायुधानि यथाक्रमात् ।८४ ।
शंखचक्रगदाखङ्गपाशांकुशशरान्धनुः ।।
लोकेश्वरांस्ततो बाह्ये तेषामस्त्राण्यनंतरम् ।८५ ।
इत्थं जपादिभिर्मंत्री मंत्रे सिद्धे विधानवित् ।।
कुर्यात्प्रयोगानमुना यथा स्वस्वमनीषितान् ।८६ ।
प्रतिष्ठाप्य विधानेन कलशान्नवशोभनान् ।।
रत्नहेमादिसंयुक्तान्घटेषु नवसु स्थितान् ।८७ ।
मध्यस्थे पूजयेद्देवीमितरेषु जयादिकाः ।।
संपूज्य गन्धपुष्पाद्यैरभिषिंचेन्नराधिपम् ।८८ ।
राजा विजयते शत्रून्योऽधिको विजयश्रियम् ।।
प्राप्नोत्रोगो दीर्घायुः सर्वव्याधिविवर्जितः ।८९ ।
वन्ध्याभिषिक्ता विधिनालभते तनयं वरम् ।।
मन्त्रेणानेन संजप्तमाज्यं क्षुद्रग्रहापहम् ।९०।
गर्भिणीनां विशेषेण जप्तं भस्मादिकं तथा ।।
जृंभश्वासे तु कृष्णस्य प्रविष्टेराधिकामुखम् ।९१ ।
या तु देवी समुद्भूता वीणापुस्तकधारिणी ।।
तस्या विधानं विप्रेंद्र श्रृणु लोकोपकारकम् ।९२ ।।
प्रणवो वाग्भवं माया श्रीः कामः शक्तिरीरिता ।।
सरस्वती चतुर्थ्यंता स्वाहांतो द्वादशाक्षरः ।९३।
मनुर्नारायण ऋषिर्विराट् छन्दः समीरितम् ।।
महासरस्वती चास्य देवता परिकीर्तिता ।९४ ।।
वाग्भवेन षडंगानि कृत्वा वर्णान्न्यसेद् बुधः ।।
ब्रह्मरंध्रे न्यसेत्तारं लज्जां भ्रूमध्यगां न्यसेत् ।९५ ।।
मुखनासादिकर्णेषु गुदेषु श्रीमुखार्णकान् ।।
ततो वाग्देवतां ध्यायेद्वीणापुस्तकधारिणीम् ।९६।
कर्पूरकुंदधवलां पूर्णचंद्रोज्ज्वलाननाम् ।।
हंसाधिरूढां भालेंदुदिव्यालंकारशोभिताम् ।९७ ।।
जपेद्द्वादशलक्षाणि तत्सहस्रं सितांबुजैः ।।
नागचंपकपुष्पैर्वा जुहुयात्साधकोत्तमः ।९८ ।।
मातृकोक्ते यजेत्पीठे वक्ष्यमाणक्रमेण ताम् ।।
वर्णाब्जेनासनं दद्यान्मूर्तिं मूलेन कल्पयेत् ।९९ ।।
देव्या दक्षिणतः पूज्या संस्कृता वाङ्मयी शुभा ।।
प्राकृता वामतः पूज्या वाङ्मयीसर्वसिद्धिदा।१००।
पूर्वमंगानि षट्कोणे प्रज्ञाद्याः प्रयजेद्बहिः ।।
प्रज्ञा मेधा श्रुतिः शक्तिः स्मृतिर्वागीश्वरी मतिः ।१०१।
स्वस्तिश्चेति समाख्याता ब्रह्माद्यास्तदनंतरम् ।।
लोकेशानर्चयेद्भूयस्तदस्त्राणि च तद्बहिः ।१०२।
एवं संपूज्य वाग्देवीं साक्षाद्वाग्वल्लभो भवेत् ।।
ब्रह्मचर्यरतः शुद्धः शुद्धदंतनखा दिकः ।१०३।
संस्मरन् सर्ववनिताः सततं देवताधिया ।।
कवित्वं लभते धीमान् मासैर्द्वादशभिर्ध्रुवम् ।१०४।
पीत्वा तन्मंत्रितं तोयं सहस्रं प्रत्यहं मुने ।।
महाकविर्भवेन्मंत्री वत्सरेण न संशयः ।१०५ ।।
उरोमात्रोदके स्थित्वा ध्यायन्मार्तंडमंडले ।।
स्थितां देवीं प्रतिदिनं त्रिसहस्रं जपेन्मनुम् ।१०६।
लभते मंडलात्सिद्धिं वाचामप्रतिमां भुवि ।।
पालाशबिल्वकुसुमैर्जुहुयान्मधुरोक्षितैः ।१०७ ।
समिद्भिर्वा तदुत्थाभिर्यशः प्राप्नोति वाक्पतेः ।।
राजवृक्षसमुद्भूतैः प्रसूनैर्मधुराप्लुतैः ।१०८ ।
सत्समिद्भिश्च जुहुयात्कवित्वमतुलं लभेत् ।।
अथ प्रवक्ष्ये विप्रेंद्र सावित्रीं ब्रह्मणः प्रियाम् ।१०९।
यां समाराध्य ससृजे ब्रह्मा लोकांश्चराचरान् ।।
लक्ष्मी माया कामपूर्वा सावित्री ङेसमन्विता ।११०।
स्वाहांतो मनुराख्यातः सावित्र्या वसुवर्णवान् ।।
ऋषिर्ब्रह्मास्य गायत्री छंदः प्रोक्तं च देवता ।१११।
सावित्री सर्वदेवानां सावित्री परिकीर्तिता ।।
हृदंतिकैर्ब्रह्म विष्णुरुद्रेश्वरसदाशिवैः ।११२।
सर्वात्मना च ङेयुक्तैरंगानां कल्पनं मतम् ।।
तप्तकांचनवर्णाभां ज्वलंतीं ब्रह्मतेजसा ।११३।
ग्रीष्ममध्याह्नमार्तंडसहस्रसमविग्रहाम् ।।
ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां रत्नभूषणभूषिताम् ।११४ ।।
बह्निशुद्धांशुकाधानां भक्तानुग्रहकातराम् ।।
सुखदां मुक्तिदां चैव सर्वसंपत्प्रदां शिवाम् ।११५।
वेदबीजस्वरूपां च ध्यायेद्वेदप्रसूं सतीम् ।।
ध्यात्वैवं मण्डले विद्वान् त्रिकोणोज्ज्वलकर्णिके ।११६ ।।
सौरे पीठे यजेद्देवीं दीप्तादिनवशक्तिभिः ।।
मूलमंत्रेण क्लृप्तायां मूर्तौ देवीं प्रपूजयेत् ।११७ ।।
कोणेषु त्रिषु संपूज्या ब्राहृयाद्याः शक्तयो बहिः ।।
आदित्याद्यास्ततः पूज्या उषादिसहिताः क्रमात् ।११८।
ततः षडंगान्यभ्यर्च्य केसरेषु यथाविधि ।।
प्रह्लादिनीं प्रभां पश्चान्नित्यां विश्वंभरां पुनः ।११९।
विलासिनीप्रभावत्यौ जयां शांतां यजेत्पुनः ।।
कांतिं दुर्गासरस्वत्यौ विद्यारूपां ततः परम् ।१२०।
विशालसंज्ञितामीशां व्यापिनीं विमलां यजेत् ।।
तमोपहारिणीं सूक्ष्मां विश्वयोनिं जयावहाम्
१२१।
पद्नालयां परां शोभां ब्रह्मरूपां ततोऽर्चयेत् ।।
ब्राह्ययाद्याः शारणा बाह्ये पूजयेत्प्रोक्तलक्षणाः।१२२।
ततोऽभ्यर्च्येद् ग्रहान्बाह्ये शक्राद्यानयुधैः सह ।।
इत्थमावरणैर्देवीः दशभिः परिपूजयेत् ।१२३ ।।
अष्टलक्षं जपेन्मंत्रं तत्सहस्रं हुनेत्तिलैः ।।
सर्वपापुविनिर्मुक्तो दीर्घमायुः स विंदति ।१२४ ।।
अरुणाब्जैस्त्रिमध्वक्तैर्जुहुयादयुतं ततः ।।
महालक्ष्मीर्भवेत्तस्य षण्मासान्नात्र संशयः ।१२५ ।।
ब्रह्मवृक्षप्रसूनैस्तु जुहुयाद्बाह्यतेजसे ।।
बहुना किमिहोक्तेन यथावत्साधिता सती ।१२६ ।।
साधकानामियं विद्या भवेत्कामदुधा मुने ।।
अथ ते संप्रवक्ष्यामि रहस्यं परमाद्भुतम् ।१२७ ।।
सावित्रीपंजरं नाम सर्वरक्षाकरं नृणाम् ।।
व्योमकेशार्लकासक्तां सुकिरीटविराजिताम् ।१२८।
मेघभ्रुकुटिलाक्रांतां विधिविष्णुशिवाननाम् ।।
गुरुभार्गवकर्णांतां सोमसूर्याग्निलोचनाम् ।१२९ ।
इडापिंगलिकासूक्ष्मावायुनासापुटान्विताम् ।।
संध्याद्विजोष्ठपुटितां लसद्वागुपजिह्विकाम् ।१३०।
संध्यासूर्यमणिग्रीवां मरुद्बाहुसमन्वितान् ।।
पर्जन्यदृदयासक्तां वस्वाख्यप्रतिमंडलाम् ।१३१।
आकाशोदरविभ्रांतां नाभ्यवांतरवीथिकाम् ।।
प्रजापत्याख्यजघनां कटींद्राणीसमाश्रिताम् ।१३२।
ऊर्वोर्मलयमेरुभ्यां शोभमानां सरिद्वराम् ।।
सुजानुजहुकुशिकां वैश्वदेवाख्यसंज्ञिकाम् ।१३३।
पादांघ्रिनखलोमाख्यभूनागद्रुमलक्षिताम् ।।
ग्रहराश्यर्क्षयोगादिमूर्तावयवसंज्ञिकाम् ।१३४।
तिथिमासर्तुपक्षाख्यैः संकेतनिमिषात्मिकाम् ।।
मायाकल्पितवैचित्र्यसंध्याख्यच्छदनावृताम् ।१३५।
ज्वलत्कालानलप्रख्यों तडित्कीटिसमप्रभाम् ।।
कोटिसूर्यप्रतीकाशां शशिकोटिसुशीतलाम् ।१३६।।
सुधामंडलमध्यस्थां सांद्रानंदामृतात्मिकाम् ।।
वागतीतां मनोऽगर्म्या वरदां वेदमातरम् ।१३७।
चराचरमयीं नित्यां ब्रह्माक्षरसमन्विताम् ।।
ध्यात्वा स्वात्माविभेदेन सावित्रीपंजरं न्यसेत् ।१३८।
पञ्चरस्य ऋषिः सोऽहं छंन्दो विकृतिरुच्यते ।।
देवता च परो हंसः परब्रह्मादिदेवता ।१३९ ।
धर्मार्थकाममोक्षाप्त्यै विनियोग उदाहृतः ।।
षडंगदेवतामन्त्रैरंगन्यासं समाचरेत् ।१४० ।।
त्रिधामूलेन मेधावी व्यापकं हि समाचरेत् ।।
पूर्वोक्तां देवातां ध्यायेत्साकारां गुणसंयुताम्।१४१।
त्रिपदा हरिजा पूर्वमुखी ब्रह्मास्त्रसंज्ञिका ।।
चतुर्विशतितत्त्वाढ्या पातु प्राचीं दिशं मम ।१४२।
चतुष्पदा ब्रह्मदंडा ब्रह्माणी दक्षिणानना ।।
षड्विंशतत्त्वसंयुक्ता पातु मे दक्षिणां दिशम्।१४३।
प्रत्यङ्मुखी पञ्चपदी पञ्चाशत्तत्त्वरूपिणी ।।
पातु प्रतीचीमनिशं मम ब्रह्मशिरोंकिता ।१४४।
सौम्यास्या ब्रह्मतुर्याढ्या साथर्वांगिरसात्मिका ।।
उदीचीं षट्पदा पातु षष्टितत्त्वकलात्मिका।१४५।
पञ्चाशद्वर्णरचिता नवपादा शताक्षरी ।।
व्योमा संपातु मे वोर्द्ध्वशिरो वेदांतसंस्थिता।१४६।
विद्युन्निभा ब्रह्मसन्ध्या मृगारूढा चतुर्भुजा ।।
चापेषुचर्मासिधरा पातु मे पावकीं दिशम् ।१४७ ।
ब्रह्मी कुमारी गायत्री रक्तांगी हंसवाहिनी ।।
बिभ्रत्कमंडलुं चाक्षं स्रुवस्रुवौ पातु नैर्ऋतिम्।१४८।
शुक्लवर्णा च सावित्री युवती वृषवाहना ।
कपालशूलकाक्षस्रग्धारिणी पातु वायवीम् ।१४९।
श्यामा सरस्वती वृद्धा वैष्णवी गरुडासना ।।
शंखचक्राभयकरा पातु शैवीं दिशं मम।१५० ।
चतुर्भुजा देवमाता गौरांगी सिंहवाहना ।।
वराभयखङ्गचर्मभुजा पात्वधरां दिशम्।१५१।।
तत्तत्पार्श्वे स्थिताः स्वस्ववाहनायुधभूषणाः ।।
स्वस्वदिक्षुस्थिताः पातुं ग्रहशक्त्यंगसंयुताः।१५२।
मंत्राधिदेवतारूपा मुद्राधिष्ठातृदेवताः ।।
व्यापकत्वेन पांत्वस्मानापादतलमस्तकम्।१५३ ।
इदं ते कथितं सत्यं सावित्रीपंजरं मया ।।
संध्ययोः प्रत्यहं भक्त्या जपकाले विशेषतः।१५४।
पठनीयं प्रयत्नेन भुक्तिं मुक्तिं समिच्छता ।।
भूतिदा भुवना वाणी महावसुमती मही ।१५५।
हिरण्यजननी नन्दा सविसर्गा तपस्विनी ।
यशस्विनी सती सत्या वेदविच्चिन्मयी शुभा ।१५६।
विश्वा तुर्या वरेण्या च निसृणी यमुना भुवा ।।
मोदा देवी वरिष्ठा च धीश्च शांतिर्मती मही ।१५७ ।।
धिषणा योगिनी युक्ता नदी प्रज्ञाप्रचोदनी ।।
दया च यामिनी पद्मा रोहिणी रमणी जया।१५८ ।।
सेनामुखी साममयी बगला दोषवार्जिता ।।
माया प्रज्ञा परा दोग्ध्री मानिनी पोषिणी क्रिया १५९ ।
ज्योत्स्ना तीर्थमयी रम्या सौम्यामृतमया तथा ।।
ब्राह्मी हैमी भुजंगी च वशिनी सुंदरी वनी।१६० ।।
ॐकारहसिनी सर्वा सुधा सा षड्गुणावती ।।
माया स्वधा रमा तन्वी रिपुघ्नी रक्षणणी सती ।१६१।
हैमी तारा विधुगतिर्विषघ्नी च वरानना ।।
अमरा तीर्थदा दीक्षा दुर्धर्षा रोगहारिणी ।१६२ ।
नानापापनृशंसघ्नी षट्पदी वज्रिणी रणी ।।
योगिनी वमला सत्या अबला बलदा जया।१६३ ।।
गोमती जाह्नवी रजावी तपनी जातवेदसा ।।
अचिरा वृष्टिदा ज्ञेया ऋततंत्रा ऋतात्मिका ।१६४।
सर्वकामदुधा सौम्या भवाहंकारवर्जिता ।।
द्विपदा या चतुष्पदा त्रिपदा या च षट्पदा ।१६५।
अष्टापदी नवपदी सहस्राक्षाक्षरात्मिका ।।
अष्टोत्तरशतं नाम्नां सावित्र्या यः पठेन्नरः ।१६६ ।।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ।।
एतत्ते कथितं विप्र पंचप्रकृतिलक्षणम् ।१६७ ।।
मंत्राराधनपूर्वं च विश्वकामप्रपूरणम् ।१६८।
इति श्रीबृहन्नारदीय पुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे पञ्चप्रकृतिमन्त्रादिनिरूपणं नाम त्र्यशीतितमोऽध्यायः ।८३।
ब्रह्मवैवर्तपुराणम्/खण्डः २ (प्रकृतिखण्डः)/अध्यायः ०३
< ब्रह्मवैवर्तपुराणम् | खण्डः २ (प्रकृतिखण्डः)
← अध्यायः ०२ ब्रह्मवैवर्तपुराणम्
अध्यायः ०३
वेदव्यासः अध्यायः ०४ →
श्रीनारायण उवाच ।।
अथाण्डं तज्जलेऽतिष्ठद्यावद्वै ब्रह्मणो वयः ।।
ततः स्वकाले सहसा द्विधारूपो बभूव सः ।।१।।
तन्मध्ये शिशुरेकश्च शतकोटिरविप्रभः।।
क्षणं रोरूयमाणश्च स शिशुः पीडितः क्षुधा।।२।।
पितृमातृपरित्यक्तो जलमध्ये निराश्रयः ।।
नैकब्रह्माण्डनाथो यो ददर्शोर्ध्वमनाथवत् ।। ३ ।।
स्थूलात्स्थूलतमः सोऽपि नाम्ना देवो महाविराट् ।।
परमाणुर्यथा सूक्ष्मात्परः स्थूलात्तथाऽप्यसौ ।। ४ ।।
तेजसां षोडशांशोऽयं कृष्णस्य परमात्मनः ।।
आधारोऽसंख्यविश्वानां महाविष्णुस्सुरेश्वरः ।। ५ ।।
प्रत्येकं रोमकूपेषु विश्वानि निखिलानि च ।।
अद्यापि तेषां संख्यां च कृष्णो वक्तुं न हि क्षमः ।। ६ ।।
यथाऽस्ति संख्या रजसां विश्वानां न कदाचन ।।
ब्रह्मविष्णुशिवादीनां तथा संख्या न विद्यते ।। ७ ।।
प्रतिविश्वेषु सन्त्येवं ब्रह्मविष्णुशिवादयः ।।
पातालाद्ब्रह्मलोकान्तं ब्रह्माण्डं परिकीर्त्तितम् ।। ८ ।।
तत ऊर्ध्वे च वैकुण्ठो ब्रह्माण्डाद्बहिरेव सः ।।
स च सत्यस्वरूपश्च शश्वन्नारायणो यथा ।। ९ ।।
तदूर्ध्वे गोलकश्चैव पञ्चाशत्कोटियोजनात् ।।
नित्यः सत्यस्वरूपश्च यथा कृष्णस्तथाप्ययम् ।। 2.3.१० ।।
सप्तद्वीपमिता पृथ्वी सप्तसागरसंयुता ।।
एकोनपञ्चाशदुपद्वीपाऽसंख्यवनान्विता ।। ११ ।।
ऊर्ध्वं सप्त सुवर्लोका ब्रह्मलोकसमन्विताः ।।
पातालानि च सप्ताधश्चैवं ब्रह्माण्डमेव च ।। १२ ।।
ऊर्ध्वं धराया भूर्लोको भुवर्लोकस्ततः परः ।।
स्वर्लोकस्तु ततः पश्चान्महर्लोकस्ततो जनः ।। १३ ।।
ततः परस्तपोलोकः सत्यलोकस्ततः परः ।।
ततः परो ब्रह्मलोकस्तप्तकाञ्चननिर्मितः ।। ।।१४ ।।
एवं सर्वं कृत्रिमं तद्बाह्याभ्यन्तर एव च ।।
तद्विनाशे विनाशश्च सर्वेषामेव नारद ।। १९ ।।
जलबुदुदवत्सर्वं विश्वसंघमनित्यकम् ।।
नित्यौ गोलोकवैकुण्ठौ सत्यौ शश्वदकृत्रिमौ ।। १६ ।।
लोमकूपे च विध्यण्डं प्रत्येकं तस्य निश्चितम् ।।
एषां संख्यां न जानाति कृष्णोऽन्यस्यापि का कथा ।। १७ ।।
प्रत्येकं प्रतिविध्यण्डे ब्रह्मविष्णुशिवादयः ।।
तिस्रः कोट्यः सुराणां च संख्या सर्वत्र पुत्रक ।। १८ ।।
दिगीशाश्चैव दिक्पाला नक्षत्राणि ग्रहादयः ।।
भुवि वर्णाश्च चत्वारोऽधो नागाश्च चराचराः ।। १९ ।।
अथ कालेन स विराडूर्ध्वं दृष्ट्वा पुनः पुनः ।।
डिम्भान्तरं च शून्यं च न द्वितीयं कथंचन ।। 2.3.२० ।।
चिन्तामवाप क्षुद्युक्तो रुरोद च पुनः पुनः ।।
ज्ञानं प्राप्य तदा दध्यौ कृष्णं परमपूरुषम् ।। २१ ।।
ततो ददर्श तत्रैव ब्रह्म ज्योतिः सनातनम् ।।
नवीननीरदश्यामं द्विभुजं पीतवाससम् ।। २२ ।।
सस्मितं मुरलीहस्तं भक्तानुग्रहकारकम् ।।
जहास बालकस्तुष्टो दृष्ट्वा जनकमीश्वरम् ।। २३ ।।
वरं तस्मै ददौ तुष्टो वरेशः समयोचितम्।।
मत्समो ज्ञानयुक्तश्व क्षुत्पिपासाविवर्जितः ।। २४ ।।
ब्रह्माण्डासंख्यनिलयो भव वत्स लयावधि ।।
निष्कामो निर्भयश्चैव सर्वेषां वरदो वरः ।।
रोगमृत्युजराशोकपीडादिपरिवर्जितः ।। २५ ।।
इत्युक्त्वा तद्दक्षकर्णे महामन्त्रं षडक्षरम् ।।
त्रिः कृत्वा प्रजजापादौ वेदाङ्गमवरं परम् ।। २६ ।।
प्रणवादिचतुर्थ्यन्तं कृष्ण इत्यक्षरद्वयम् ।।
वह्निज्वालान्तमिष्टं च सर्वविघ्नहरं परम् ।। २७ ।।
मन्त्रं दत्त्वा तदाहारं कल्पयामास वै प्रभुः।।
श्रूयतां तद्ब्रह्मपुत्र निबोध कथयामि ते ।। २८ ।।
प्रतिविश्वेषु नैवेद्यं दद्याद्वै वैष्णवो जनः ।।
षोडशांशं विषयिणो विष्णोः पञ्चदशास्य वै ।। २९ ।।
निर्गुणस्यात्मनश्चैव परिपूर्णतमस्य च ।।
नैवेद्येन च कृष्णस्य नहि किञ्चित्प्रयोजनम् ।। 2.3.३० ।।
यद्ददाति व नैवेद्यं यस्मै देवाय यो जनः ।।
स च खादति तत्सर्वं लक्ष्मीदृष्ट्या पुनर्भवेत् ।। ३१ ।।
तं च मन्त्रं वरं दत्त्वा तमुवाच पुनर्विभुः ।।
अन्यो वरः क इष्टस्ते तं मे ब्रूहि ददामि ते ।। ३२ ।।
कृष्णस्य वचनं श्रुत्वा तमुवाच महाविराट् ।।
अदन्तो बालकस्तत्र वचनं समयोचितम् ।। ३३ ।।
महाविराडुवाच ।।
वरं मे त्वत्पदाम्भोजे भक्तिर्भवतु निश्चला ।।
सन्ततं यावदायुर्मे क्षणं वा सुचिरं च वा ।। ३४ ।।
त्वद्भक्तियुक्तो यो लोके जीवन्मुक्तः स सन्ततम् ।।
त्वद्भक्तिहीनो मूर्खश्च जीवन्नपि मृतो हि सः ।। ३५ ।।
किं तज्जपेन तपसा यज्ञेन यजनेन च ।।
व्रतेनैवोपवासेन पुण्यतीर्थनिषेवया ।। ३६ ।।
कृष्णभक्तिविहीनस्य पुंसः स्याज्जीवनं वृथा ।।
येनात्मना जीवितश्च तमेव नहि मन्यते ।। ३७ ।।
यावदात्मा शरीरेऽस्ति तावत्स्याच्छक्तिसंयुतः ।।
पश्चाद्यान्ति गते तस्मिन्न स्वतन्त्राश्च शक्तयः ।।३८।।
स च त्वं च महाभाग सर्वात्मा प्रकृतेः परः ।।
स्वेच्छामयश्च सर्वाद्यो ब्रह्म ज्योतिः सनातनः ।। ३९ ।।
इत्युक्त्वा बालकस्तत्र विरराम च नारद ।।
उवाच कृष्णः प्रत्युक्तिं मधुरां श्रुतिसुन्दरीम् ।। 2.3.४० ।।
श्रीकृष्ण उवाच ।।
सुचिरं सुस्थिरं तिष्ठ यथाऽहं त्वं तथा भव ।।
असंख्यब्रह्मणां पाते पातस्ते न भविष्यति ।। ४१ ।।
अंशेन प्रतिविध्यण्डे त्वं च पुत्र विराड् भव ।।
त्वन्नाभिपद्मे ब्रह्मा च विश्वस्रष्टा भविष्यति ।। ४२ ।।
ललाटे ब्रह्मणश्चैव रुद्राश्चैकादशैव तु ।।
शिवांशेन भविष्यन्ति सृष्टिसंचरणाय वै ।। ४३ ।।
कालाग्निरुद्रस्तेष्वेको विश्वसंहारकारकः ।।
पाता विष्णुश्च विषयी क्षुद्रांशेन भविष्यति।। ।। ४४ ।।
मद्भक्तियुक्तः सततं भविष्यसि वरेण मे ।।
ध्यानेन कमनीयं मां नित्यं द्रक्ष्यसि निश्चितम् ।। ४५ ।।
मातरं कमनीयां च मम वक्षःस्थलस्थिताम् ।।
यामि लोकं तिष्ठ वत्सेत्युक्त्वा सोऽन्तरधीयत ।। ४६ ।।
गत्वा च नाकं ब्रह्माणं शङ्करं स उवाच ह ।।
स्रष्टारं स्रष्टुमीशं च संहर्तारं च तत्क्षणम्।।४७।।
श्रीकृष्ण उवाच ।।
सृष्टिं स्रष्टुं गच्छ वत्स नाभिपद्मोद्भवो भव।।
महाविराड् लोमकूपे क्षुद्रस्य च विधेः शृणु ।। ४८ ।।
गच्छ वत्स महादेव ब्रह्मभालोद्भवो भव ।।
अंशेन च महाभाग स्वयं च सुचिरं तपः ।। ४९ ।।
इत्युक्त्वा जगतां नाथो विरराम विधेः सुतः ।।
जगाम नत्वा तं ब्रह्मा शिवश्च शिवदायकः ।। 2.3.५० ।।
महाविराड् लोमकूपे ब्रह्माण्डे गोलके जले ।।
स बभूव विराट्क्षुद्रो विराडंशेन साम्प्रतम् ।। ५१ ।।
श्यामो युवा पीतवासाः शयानो जलतल्पके।।
ईषद्धासः प्रसन्नास्यो विश्वरूपी जनार्दनः ।। ५२ ।।
तन्नाभिकमले ब्रह्मा बभूव कमलोद्भवः ।।
संभूय पद्मदण्डं च बभ्राम युगलक्षकम् ।। ५३ ।।
नान्तं जगाम दण्डस्य पद्मनाभस्य पद्मजः ।।
नाभिजस्य च पद्मस्य चिन्तामाप पितामहः ।। ५४ ।।
स्वस्थानं पुनरागत्य दध्यौ कृष्णपदाम्बुजम् ।।
ततो ददर्श क्षुद्रं तं ध्यात्वा तद्दिव्यचक्षुषा ।। ५५ ।।
शयानं जलतल्पे च ब्रह्माण्डपिण्डमावृते ।।
यल्लोमकूपे ब्रह्माण्डं तं च तत्परमीश्वरम् ।। ५६ ।।
श्रीकृष्णं चापि गोलोकं गोपगोपीसमन्वितम् ।।
तं संस्तूय वरं प्राप ततः सृष्टिं चकार सः ।। ५७ ।।
बभूवुर्ब्रह्मणः पुत्रा मानसाः सनकादयः ।।
ततो रुद्राः कपालाच्च शिवस्यैकादश स्मृताः ।। ५८ ।।
बभूव पाता विष्णुश्च वामे क्षुद्रस्य पार्श्वतः ।।
चतुर्भुजश्च भगवाञ्श्वेतद्वीपनिवासकृत् ।। ५९ ।।
क्षुद्रस्य नाभिपद्मे च ब्रह्मा विश्वं ससर्ज सः ।।
स्वर्गं मर्त्यं च पातालं त्रिलोकं सचराचरम् ।। 2.3.६० ।।
एवं सर्वं लोमकूपे विश्वं प्रत्येकमेव च ।।
प्रतिविश्वं क्षुद्रविराड् ब्रह्म विष्णुशिवादयः ।६१ ।।
इत्येवं कथितं वत्स कृष्णसङ्कीर्त्तनं शुभम् ।।
सुखदं मोक्षदं सारं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।६२ ।।
इति श्रीब्रह्मवैवर्त्ते महापुराणे द्वितीये प्रकृतिखण्डे नारदनारायणसंवादे विश्वब्रह्माण्डवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः।।३।।
_______________________
ब्रह्मवैवर्तपुराणम्/खण्डः ३ (गणपतिखण्डः)अध्यायः (७)
"नारायण उवाच।
हरेराज्ञां समादाय हरः संहृष्टमानसः ।।
उवाच पार्वतीं प्रीत्या हरिसंलापमङ्गलम् ।।१।।
शिवाज्ञां च समादाय शिवा संहृष्टमानसा ।।
वाद्यं च वादयामास मंगलं मगलव्रते ।। २ ।।
सुस्नाता सुदती शुद्धा बिभ्रती धौतवाससी ।।
संस्थाप्य रत्नकलशं शुक्लधान्योपरि स्थिरम् ।३।
आम्रपल्लवसंयुक्तं फलाक्षतसुशोभितम् ।।
चन्दनागुरुकस्तूरीकुंकुमेन विराजितम् ।। ४ ।।
रत्नासनस्था रत्नाढ्या रत्नोद्भवसुता सती ।।
रत्नसिंहासनस्थांश्च संपूज्य मुनिपुंगवान् ।।५।।
रत्नसिंहासनस्थं च संपूज्य सुपुरोहितम् ।।
चन्दनागुरुकस्तूरीरत्नभूषणभूषितम् ।। ६ ।।
संस्थाप्य पुरतो भक्त्या दिक्पालान्रत्नभूषितान् ।।
देवान्नरांश्च नागांश्च समर्च्य विधिबोधितम् ।। ७ ।।
समर्च्य परया भक्त्या ब्रह्मविष्णुमहेश्वरान् ।।
चन्दनागुरुकस्तूरीकुंकुमेन विराजितान् ।। ८ ।।
वह्निशुद्धैस्सुवस्त्रैश्च सद्रत्नैर्भूषणैस्तथा ।।
पूजाद्रव्यैश्च विविधैः पूजितान्पुण्यके मुने ।।
समारेभे व्रतं देवी स्वस्तिवाचनपूर्वकम् ।। ९ ।।
आवाह्याभीष्टदेवं तं श्रीकृष्णं मंगले घटे ।।
भक्त्या ददौ क्रमेणैव चोपचारांस्तु षोडश ।१०।
यानि व्रते विधेयानि देयानि विविधानि च ।।
प्रददौ तानि सर्वाणि प्रत्येकं फलदानि च ।। ११ ।।
व्रतोक्तमुपहारं च दुर्लभं भुवनत्रये ।।
तच्च सर्वं ददौ भक्त्या सुव्रते सुव्रता सती ।।१२ ।।
दत्त्वा द्रव्याणि सर्वाणि वेदमन्त्रेण सा सती ।।
होमं च कारयामास त्रिलक्षं तिलसर्पिषा ।।
ब्राह्मणान्भोजयामास पूजयित्वाऽतिथींस्तथा।। १३।।
भोजयामास सा देवी सुव्रते सुव्रता सती ।।
प्रत्यहं सविधानं च चक्रे सा पूर्णवत्सरम् ।। १४ ।।
समाप्तिदिवसे विप्रस्तमुवाच पुरोहितः ।।
सुव्रते सुव्रते मह्यं देहि त्वं पतिदक्षिणाम् ।। १५ ।।
इति तद्वचनं श्रुत्वा विलप्य सुरसंसदि ।।
मूर्च्छां प्राप महामाया मायामोहितचेतसा ।।१६।।
तां च ते मूर्च्छितां दृष्ट्वा प्रहस्य मुनिपुंगवाः ।।
शङ्करं प्रेषयामास ब्रह्मा विष्णुश्च नारद ।। १७ ।।
संप्रार्थितः सभासद्भिः शिवां बोधयितुं तदा ।।
शिवः समुद्यमं चक्रे प्रवक्तुं वदतां वरः ।।१८।।
"श्रीमहादेव उवाच ।।
उत्तिष्ठ भद्रे भद्रं ते भविष्यति न संशयः ।।
साम्प्रतं चेतनं कृत्वा मदीयं वचनं शृणु ।।१९।।
शिवःशिवां तामित्युक्त्वा शुष्ककण्ठौष्ठतालुकाम्।।
वक्षसि स्थापयामास कारयामास चेतनाम् ।।२०।।
हितं सत्यं मितं सर्वं परिणामसुखावहम् ।।
यशस्करं च फलदं प्रवक्तुमुपचक्रमे ।।२१ ।।
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि यद्वेदेन निरूपितम् ।।
सर्वसम्मतमिष्टं च धर्मार्थं धर्म्मसंसदि ।। २२ ।।
सर्वेषां कर्म्मणां देवि सारभूता च दक्षिणा ।।
यशोदा फलदा नित्यं धर्मिष्ठे धर्मकर्मणि ।। २३ ।।
दैवं वा पैतृकं वाऽपि नित्यं नैमित्तिकं प्रिये ।।
यत्कर्म्म दक्षिणाहीनं तत्सर्वं निष्फलं भवेत् ।।
दाता च कर्म्मणा तेन कालसूत्रं व्रजेद्ध्रुवम् ।२४।
अथान्ते दैन्यमाप्नोति शत्रुणा परिपीडितः ।।
दक्षिणा विप्रमुद्दिश्य तत्कालं तु न दीयते ।।२९।।
तन्मुहूर्ते व्यतीते तु दक्षिणा द्विगुणा भवेत् ।।
चतुर्गुणा दिनातीते पक्षे शतगुणा भवेत् ।। २६ ।।
मासे पञ्चशतघ्ना स्यात्षण्मासे तच्चतुर्गुणा ।।
संवत्सरे व्यतीते तु कर्म्म तन्निष्फलं भवेत् ।।२७।।
दाता च नरकं याति यावद्वर्षसहस्रकम् ।।
पुत्रपौत्रधनैश्वर्य्यं क्षयमाप्नोति पातकात् ।।
धर्मो नष्टो भवेत्तस्य धर्म्महीने च कर्म्मणि ।।२८।।
"श्रीविष्णुरुवाच।।
रक्ष स्वधर्मं धर्मिष्ठे धर्मज्ञे धर्मकर्मणि ।।
सर्वेषां च भवेद्रक्षा स्वधर्मपरिपालने ।।२९ ।।
"ब्रह्मोवाच ।।
यश्च केन निमित्तेन न धर्मं परिरक्षति ।।
धर्मे नष्टे च धर्मज्ञे तस्य कर्ता विनश्यति ।।३०।।
"धर्म उवाच ।।
मां रक्ष यत्नतः साध्वि प्रदाय पतिदक्षिणाम् ।।
मयि स्थिते महासाध्वि सर्वं भद्रं भविष्यति ।।३१।।
"देवा ऊचुः ।।
धर्मं रक्ष महासाध्वि कुरु पूर्णं व्रतं सति ।।
वयं तव व्रते पूर्णे कुर्मस्त्वां पूर्णमानसाम् ।।३२।।
"मुनय ऊचुः ।।
कृत्वा साध्वि पूर्णहोमं देहि विप्राय दक्षिणाम् ।।
स्थितेष्वस्मासु धर्मज्ञे किमभद्रं भविष्यति ।।३३।।
"सनत्कुमार उवाच ।।
शिवे शिवं देहि मह्यं न चेद्व्रतफलं त्यज ।।
सुचिरं संचितस्यापि स्वात्मनस्तपसः फलम् ।३४।।
कर्मण्यदक्षिणे साध्वि यागस्याहं तु तत्फलम् ।।
प्राप्स्यामि यजमानस्य संपूर्णं कर्मणः फलम् ।। ३५।।
"पार्वत्युवाच ।।
किं कर्म्मणा मे देवेशाः किं मे दक्षिणया मुने ।।
किं पुत्रेण च धर्मेण यत्र भर्त्ता च दक्षिणा ।। ३६ ।।
वृक्षार्चने फलं किं वै यदि भूमिर्न चार्च्यते ।।
गते च कारणे कार्य्यं कुतः सस्यं कुतः फलम्।।३७।
प्राणास्त्यक्ताः स्वेच्छया चेद्देहैस्स्यात्किं प्रयोजनम्।
दृष्टिशक्तिविहीनेन चक्षुषा किं प्रयोजनम् ।।३८।।
शतपुत्रसमः स्वामी साध्वीनां च सुरेश्वराः ।।
यदि भर्त्ता व्रते देयः किं व्रतेन सुतेन वा ।।३९।।
भर्तुर्वंशश्च तनयः केवलं भर्तृमूलकः ।।
यत्र मूलं भवेद्भ्रष्टं तद्वाणिज्यं च निष्फलम् ।।४०।।
"श्रीविष्णुरुवाच ।।
पुत्रादपि परः स्वामी धर्मश्च स्वामिनः परः ।।
नष्टे धर्मे च धर्मिष्ठे स्वामिना किं सुतेन वा ।। ४१।।
"ब्रह्मोवाच ।।
स्वामिनश्च परो धर्मो धर्मात्सत्यं च सुव्रते।।
सत्यं संकल्पितं कर्म न तु भ्रष्टं कुरु व्रतम्।।४२।।
"पार्वत्युवाच।।
निरूपितश्च वेदेषु स्वशब्दो धनवाचकः।।
तद्यस्यास्तीति स स्वामी वेदज्ञ शृणु मद्वचः।।४३।।
________________________
तस्य दाता सदा स्वामी न च स्वस्वामितां लभेत्।।
अहोऽव्यवस्था भवतां वेदज्ञानामबोधतः ।।४४।।
"धर्म्म उवाच ।।
पत्नी विनाऽन्यं स्वं साध्वि स्वामिनं दातुमक्षमा ।।
दम्पती ध्रुवमेकाङ्गौ द्वयोर्दाने द्वकौ समौ ।। ४५ ।।
"पार्वत्युवाच ।।
पिता ददाति जामात्रे स च गृह्णाति तत्सुताम् ।।
न श्रुतं विपरीतं च श्रुतौ श्रुतिपरायणाः ।। ४६ ।।
"देवा ऊचुः ।।
बुद्धिस्वरूपा त्वं दुर्गे बुद्धिमन्तो वयं त्वया ।।
वेदज्ञे वेदवादेषु के वा त्वां जेतुमीश्वराः।।४७।।
निरूपिता पुण्यके तु व्रते स्वामी च दक्षिणा ।।
श्रुतौ श्रुतो यः स धर्मो विपरीतो ह्यधर्मकः ।।४८।।
"पार्वत्युवाच ।।
केवलं वेदमाश्रित्य कः करोति विनिर्णयम् ।।
बलवाँल्लौकिको वेदाल्लोकाचारं च कस्त्यजेत्।४९।
वेदे प्रकृतिपुंसोश्च गरीयान्पुरुषो ध्रुवम् ।।
निबोधत सुराः प्राज्ञा बालाहं कथयामि किम्।५०।
"बृहस्पतिरुवाच ।।
न पुमांसं विना सृष्टिर्न साध्वि प्रकृतिं विना ।।
श्रीकृष्णश्च द्वयोः स्रष्टा समौ प्रकृतिपूरुषौ।५१।
पार्वत्युवाच ।।
सर्वस्रष्टा च यः कृष्णः सोंऽशेन सगुणः पुमान्।
पुमान्गरीयान्प्रकृतेस्तथैव न ततश्च सा ।।५२।।
एतस्मिन्नन्तरे देवा मुनयस्तत्र संसदि ।।
रत्नेन्द्रसाररचितमाकाशे ददृशू रथम् ।। ५३ ।।
पार्षदैस्संपरिवृतं युतं श्यामैश्चतुर्भुजैः ।।
वनमालापरिवृतै रत्नभूषणभूषितैः ।।
अवरुह्य मुदा यानादाजगाम सभातलम् ।। ५४ ।।
तुष्टुवुस्तं सुरेन्द्रास्ते देवं वैकुण्ठवासिनम् ।।
शंखचक्रगदापद्मधरमीशं चतुर्भुजम् ।। ५५ ।।
लक्ष्मीसरस्वतीकान्तं शान्तं तं सुमनोहरम् ।।
सुखदृश्यमभक्तानामदृश्यं कोटिजन्मभिः ।। ५६ ।।
कोटिकन्दर्पलावण्यं कोटिचन्द्रसमप्रभम् ।।
अमूल्यरत्नरचितचारुभूषणभूषितम् ।।५७ ।।
सेव्यं ब्रह्मादिदेवैश्च सेवकैः सततं स्तुतम् ।।
तद्भासा संपरिच्छन्नैर्वेष्टितं च सुरर्षिभिः ।। ५८ ।।
वासयामास तं ते च रत्नसिंहासने वरे ।।
तं प्रणेमुश्च शिरसा ब्रह्मशक्तिशिवादयः ।। ५९ ।।
तं प्रणेमुश्च शिरसा ब्रह्मशक्तिशिवादयः
सम्पुटाञ्जलयः सर्वे पुलकाङ्गाश्रुलोचनाः ।। ६०।।
सस्मितस्तांश्च पप्रच्छ सर्वं मधुरया गिरा ।।
प्रबोधितः सुबोधज्ञः प्रवक्तुमुपचक्रमे ।। ६१ ।।
_श्रीनारायण उवाच ।।
सह बुद्ध्या बुद्धिमन्तो न वक्तुमुचितं सुराः।।
सर्वे शक्त्या यया विश्वे शक्तिमन्तो हि जीविनः।।६२।
ब्रह्मादितृणपर्य्यन्तं सर्वं प्राकृतिकं जगत्।।
सत्यं सत्यं विना मां च मया शक्तिः प्रकाशिता ।। ६३।
आविर्भूता च सा मत्तः सृष्टौ देवी मदिच्छया ।।
तिरोहिता च सा शेषे सृष्टिसंहरणे मयि ।। ६४ ।।
प्रकृतिः सृष्टिकर्त्री च सर्वेषां जननी परा ।।
मम तुल्या च मन्माया तेन नारायणी स्मृता।।६५।।
सुचिरं तपसा तप्तं शंभुना ध्यायता च माम् ।।
तेन तस्मै मया दत्ता तपसां फलरूपिणी ।।६६।।
व्रतं च लोकशिक्षार्थमस्या न स्वार्थमेव च ।।
स्वयं व्रतानां तपसां फलदात्री जगत्त्रये ।। ६७ ।।
मायया मोहिताः सर्वे किमस्या वास्तवं व्रतम् ।।
साध्यमस्य व्रतफलं कल्पे कल्पे पुनः पुनः ।।६८।।
सुरेश्वरा मदंशाश्च ब्रह्मशक्तिमहेश्वराः ।।
कलाः कलांशरूपाश्च जीविनश्च सुरादयः ।। ६९ ।।
मृदा विना घटं कर्त्तुं कुलालश्च यथाऽक्षमः ।।
विना स्वर्णं स्वर्णकारः कुण्डलं कर्त्तुमक्षमः ।। ७० ।
विना शक्त्या तथाऽहं च स्वसृष्टिं कर्तुमक्षमः ।।
शक्तिप्रधाना सृष्टिश्च सर्वदर्शनसम्मता ।। ७१ ।।
अहमात्मा हि निर्लिप्तोऽदृश्यः साक्षी च देहिनाम्।
देहाः प्राकृतिकाः सर्वे नश्वराः पाञ्चभौतिकाः ।। ७२ ।।
अहं नित्यः शरीरी च भानुविग्रहविग्रहः ।।
सर्वाधारा सा प्रकृतिः सर्वात्माऽहं जगत्सु च ।।७३।।
अहमात्मा मनो ब्रह्मा ज्ञानरूपो महेश्वरः ।।
पञ्च प्राणाः स्वयं विष्णुर्बुद्धिः प्रकृतिरीश्वरी ।। ।। ७४ ।।
मेधा निद्रादयश्चैताः सर्वाश्च प्रकृतेः कलाः ।।
सा च शैलेन्द्रकन्यैषा त्विति वेदे निरूपितम् । ७९।
अहं गोलोकनाथश्च वैकुण्ठेशः सनातनः ।।
गोपीगोपैः परिवृतस्तत्रैव द्विभुजः स्वयम् ।।
_________________________________
चतुर्भुजोऽत्र देवेशो लक्ष्मीशः पार्षदैर्वृतः ।। ७६ ।।
ऊर्ध्व परश्च वैकुण्ठात्पञ्चाशत्कोटियोजने ।।
ममाश्रयश्च गोलोके यत्राहं गोपिकापतिः।७७।
___________________________________
व्रताराध्यस्स द्विभुजः स च तत्फलदायकः।।
यद्रूपं चिन्तयेद्यो हि तच्च तत्फलदायकः।।७८।।
व्रतं पूर्णं कुरु शिवे शिवं दत्त्वा च दक्षिणाम्।।
पुनः समुचितं मूल्यं दत्त्वा नाथं ग्रहीष्यसि।।७९।।
विष्णुदेहा यथा गावो विष्णुदेहस्तथा शिवः ।।
द्विजाय दत्त्वा गोमूल्यं गृहाण स्वामिनं शुभे।।८०।।
यज्ञपत्नीं यथा दातुं क्षमः स्वामी सदैव तु ।।
तथा सा स्वामिनं दातुमीश्वरीति श्रुतेर्मतम्।।८१।।
इत्युक्त्वा स सभामध्ये तत्रैवान्तरधीयत ।।
हृष्टास्ते सा च संहृष्टा दक्षिणां दातुमुद्यता ।। ८२ ।।
कृत्वा शिवा पूर्णहोमं सा शिवं दक्षिणां ददौ ।
स्वस्तीत्युक्त्वा च जग्राह कुमारो देवसंसदि ।८३।
उवाच दुर्गा संत्रस्ता शुष्ककण्ठौष्ठतालुका ।।
कृत्वाञ्जलिपुटा विप्रं हृदयेन विदूयता ।८४।
" पार्वत्युवाच ।
गोमूल्यं मत्पतिसममिति वेदे निरूपितम्।।
गवां लक्षं प्रयच्छामि देहि मत्स्वामिनं द्विज।।८५।।
तदा दास्यामि विप्रेभ्यो दानानि विविधानि च।।
आत्महीनो हि देहश्च कर्म्म किं कर्तुमीश्वरः।।८६।।
"सनत्कुमार उवाच ।।
गवां लक्षेण मे देवि वल्गुना किं प्रयोजनम् ।।
दत्तस्यामूल्य रत्नस्य गवां प्रत्यर्पणेन च।।८७।।
स्वस्य स्वस्य स्वयं दाता लोकः सर्वो जगत्त्रये।।
कर्त्तुरेवेप्सितं कर्म भवेत्किं वा परेच्छया ।। ८८ ।।
दिगम्बरं पुरः कृत्वा भ्रमिष्यामि जगत्त्रयम्।।
बालकानां बालिकानां समूहस्मितकारणम्।।८९।।
इत्युक्त्वा ब्रह्मणः पुत्रो गृहीत्वा शङ्करं मुने।।
सन्निधौ वासयामास तेजस्वी देवसंसदि।।९०।।
दृष्ट्वा शिवं गृह्यमाणं कुमारेण च पार्वती।।
समुद्यता तनुं त्यक्तुं शुष्ककण्ठौष्ठतालुका।।९१ ।।
विचिन्त्य मनसा साध्वीत्येवमेव दुरत्ययम् ।।
न दृष्टोऽभीष्टदेवश्च न च प्राप्तं फलं व्रते ।।९२।।
एतस्मिन्नन्तरे देवाः पार्वतीसहितास्तदा ।।
सद्यो ददृशुराकाशे तेजसां निकरं परम् ।। ९३ ।।
कोटिसूर्य्यप्रभोर्ध्वं च प्रज्वलन्तं दिशो दश ।।
कैलासशैलपुरतः सर्वदेवादिभिर्युतम् ।। ९४ ।।
सर्वाश्रयं गणाच्छन्नं विस्तीर्णं मण्डलाकृतिम् ।।
तच्च दृष्ट्वा भगवतस्तुष्टुवुस्ते क्रमेण च ।।९५ ।।
"विष्णुरुवाच ।।
ब्रह्माण्डानि च सर्वाणि यल्लोमविवरेषु च ।।
सोऽयं ते षोडशांशश्च के वयं यो महाविराट् ।।९६।।
__________________
"ब्रह्मोवाच ।।
वेदोपयुक्तं दृश्यं यत्प्रत्यक्षं द्रष्टुमीश्वर ।।
स्तोतुं तद्वर्णितुमहं शक्तः किं स्तौमि तत्परः।९७।
"श्रीमहादेव उवाच ।।
ज्ञानाधिष्ठातृदेवोऽहं स्तौमि ज्ञानपरं च किम् ।।
सर्वानिर्वचनीयं तं त्वां च स्वेच्छामयं विभुम् ।९८।
"धर्म उवाच।
अदृश्यमवतारेषु यद्दृश्यं सर्वजन्तुभिः ।।
किं स्तौमि तेजोरूपं तद्भक्तानुग्रहविग्रहम् । ९९।
"देवा उचुः।।
के वयं त्वत्कलांशाश्च किं वा त्वां स्तोतुमीश्वराः ।।
स्तोतुं न शक्ता वेदा यं न च शक्ता सरस्वती ।। १००।
"मुनय उचुः ।।
वेदान्पठित्वा विद्वांसो वयं किं वेदकारणम् ।।
स्तोतुमीशा न वाणी च त्वां वाङ्मनसयोः परम् ।। १०१ ।।
"सरस्वत्युवाच ।।
वागधिष्ठातृदेवीं मां वदन्ते वेदवादिनः ।।
किञ्चिन्न शक्ता त्वां स्तोतुमहो वाङ्मनसोः परम् ।। १०२ ।।
"सावित्र्युवाच ।।
वेदप्रसूरहं नाथ सृष्ट्वा त्वत्कलया पुरा ।।
किं स्तौमि स्त्रीस्वभावेन सर्वकारणकारणम्।।१०३।।
लक्ष्मीरुवाच ।।
त्वदंशविष्णुकान्ताहं जगत्पोषणकारिणी।।
किं स्तौमि त्वत्कलासृष्टा जगतां बीजकारणम् ।। १०४ ।।
हिमालय उवाच ।।
हसन्ति सन्तो मां नाथ कर्मणा स्थावरं परम्।।
स्तोतुं समुद्यतं क्षुद्रः किं स्तौमि स्तोतुमक्षमः ।। १०५ ।।
क्रमेण सर्वे तं स्तुत्वा देवा विररमुर्मुने ।।
देव्यश्च मुनयः सर्वे पार्वती स्तोतुमुद्यता ।। १०६ ।।
धौतवस्त्रा जटाभारं बिभ्रती सुव्रता व्रते ।।
प्रेरिता परमात्मानं व्रताराध्यं शिवेन च ।।१०७।।
ज्वलदग्निशिखारूपा तेजोमूर्तिमती सती ।।
तपसां फलदा माता जगतां सर्वकर्मणाम् ।१०८।
पार्वत्युवाच ।।
कृष्ण जानासि मां भद्रं नाहं त्वां ज्ञातुमीश्वरी ।।
के वा जानन्ति वेदज्ञा वेदा वा वेदकारकाः ।।१०९।।
त्वदंशास्त्वां न जानन्ति कथं ज्ञास्यन्ति ते कलाः।।
त्वं चापि तत्त्वं जानासि किमन्ये ज्ञातुमीश्वराः ।। ११० ।।
सूक्ष्मात्सूक्ष्मतमोऽव्यक्तः स्थूलात्स्थूलतमो महान्।
विश्वस्त्वं विश्वरूपश्च विश्वबीजं सनातनः ।।१११।
कार्य्यं त्वं कारणं त्वं च कारणानां च कारणम् ।।
तेजस्स्वरूपो भगवान्निराकारो निराश्रयः ।।११२।
निर्लिप्तो निर्गुणः साक्षी स्वात्मारामः परात्परः ।।
प्रकृतीशो विराड्बीजं विराड्रूपस्त्वमेव च ।।
सगुणस्त्वं प्राकृतिकः कलया सृष्टिहेतवे ।। ११३।
प्रकृतिस्त्वं पुमांस्त्वं च वेदाऽन्यो न क्वचिद्भवेत् ।।
जीवस्त्वं साक्षिणो भोगी स्वात्मनः प्रतिबिम्बकम् ।। ११४ ।।
कर्म त्वं कर्मबीजं त्वं कर्मणां फलदायकः ।।
ध्यायन्ति योगिनस्तेजस्त्वदीयमशरीरि यत् ।।
केचिच्चतुर्भुजं शान्तं लक्ष्मीकान्तं मनोहरम् ।। ११५ ।।
वैष्णवाश्चैव साकारं कमनीयं मनोहरम् ।।
शङ्खचक्रगदापद्मधरं पीताम्बरं परम् ।।११६।।
द्विभुजं कमनीयं च किशोरं श्यामसुन्दरम् ।।
शान्तं गोपाङ्गनाकान्तं रत्नभूषणभूषितम् ।।११७।।
एवं तेजस्विनं भक्ताः सेवन्ते सन्ततं मुदा ।।
ध्यायन्ति योगिनो यत्तत्कुतस्तेजस्विनं विना ।। १३।।
तत्तेजो बिभ्रतां देव देवानां तेजसा पुरा ।।
आविर्भूता सुराणां च वधाय ब्रह्मणा स्तुता ।।११९।।
नित्या तेजस्त्वरूपाऽहं धृत्वा वै विग्रहं विभो ।।
स्त्रीरूपं कमनीयं च विधाय समुपस्थिता ।१२०।
मायया तव मायाऽहं मोहयित्वाऽसुरान्पुरा ।।
निहत्य सर्वाञ्छैलेन्द्रमगमं तं हिमालयम् ।१२१।
ततोऽहं संस्तुता देवैस्तारकाक्षेण पीडितैः ।।
अभवं दक्षजायायां शिवस्त्री भवजन्मनि ।।१२२।।
त्यक्त्वा देहं दक्षयज्ञे शिवाऽहं शिवनिन्दया ।।
अभवं शैलजायायां शैलाधीशस्य कर्मणा ।१२३।
अनेकतपसा प्राप्तः शिवश्चात्रापि जन्मनि ।।
पाणिं जग्राह मे योगी प्रार्थितो ब्रह्मणा विभुः ।। १२४ ।।
शृङ्गारजं च तत्तेजो नालभं देवमायया ।।
स्तौमि त्वामेव तेनेश पुत्रदुःखेन दुःखिता।१२५।
व्रते भवद्विधं पुत्रं लब्धुमिच्छामि साम्प्रतम् ।।
देवेन विहिता वेदे सांगे स्वस्वामिदक्षिणा ।१२६ ।।
श्रुत्वा सर्वं कृपासिन्धो कृपां मे कर्तुमर्हसि ।।
इत्युक्त्वा पार्वती तत्र विरराम च नारद ।। १२७ ।।
भारते पार्वतीस्तोत्रं यः शृणोति सुसंयतः ।।
सत्पुत्रं लभते नूनं विष्णुतुल्यपराक्रमम् ।। १२८ ।।
संवत्सरं हविष्याशी हरिमभ्यर्च्य भक्तितः ।।
सुपुण्यकव्रतफलं लभते नात्र संशयः ।। १२९ ।।
विष्णुस्तोत्रमिदं ब्रह्मन्सर्वसम्पत्तिवद्धर्नम् ।।
सुखदं मोक्षदं सारं स्वामिसौभाग्यवर्द्धनम् ।।१३०।।
सर्वसौन्दर्य्यबीजं च यशोराशिविवर्द्धनम् ।।
हरिभक्तिप्रदं तत्त्वज्ञानबुद्धिसुखप्रदम् ।।१३१ ।।
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इति श्रीब्रह्मवैवर्त्ते महापुराणे तृतीये गणपतिखण्डे नारदनारायणसंवादे पुण्यकव्रते पतिदाने पार्वतीकृतं श्रीकृष्णस्तोत्रकथनं नाम सप्तमोऽध्यायः।७।
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