मंगलवार, 15 सितंबर 2026

बोल आजादपुर वाली मइया की जय! बोल आजादपुर वाली मइया की जय!

जनपद अलीगढ़ के गाँव आजादपुर में काली नदी के समीप एक सिद्ध पीठ है -आजादपुर वाली मइया को समर्पित यह भक्ति गीत-

यादव योगेश कुमार रोहि द्वारा सर्जित है।

​राजस्थानी-हिमांचली लोक-कव्वाली: "तिश्नगी के बहाव"

विशेष संगीत संयोजन: राजस्थानी लोक संगीत (खड़ताल, मोरचंग, ढोलक की थाप) और हिमांचली लोक संगीत (बांसुरी, रबाब और नगाड़े की गूंज) के अनूठे मेल पर आधारित।

अंदाज: सूफी-कव्वाली, जिसमें बीच-बीच में लोक-लावणी और व्याख्यात्मक पुट (पैरोडी/कलाम) शामिल है।

​🎵 प्रस्तावना / टेक (आगाज)

(सांझा संगीत गूंजता है—राजस्थानी कालबेलिया धुन के साथ  तेजा जी गीत शैली का लम्हिबा आलाप-मांचली पहाड़ी हारमोनियम और बांसुरी की सुरीली तान। कव्वाल की आवाज़ गूंजती है...)

कव्वाल (मुख्य आवाज़):

साधु जो साधना करे, रोहि सन्त वही जो शान्त!

मुनि मनन मन से करे ! कुछ तपने के उपरान्त।

तपन जपन और साधु पन, तब पराजित होते सब आक्रन्त...

और मइया के दरबार में अर्जी लगाते हुए रोहि कहते हैं—

बोल आजादपुर वाली मइया की जय!

​🎶 मुखड़ा (स्थायी)

(ढोलक की द्रुत गति और खड़ताल की खनक के साथ कोरस गूंजता है)

​ईमान डिग जाते हैं रोहि ,जब तिश्नगी के बहावो में!

नूर-ए-सीरत मिट जाती है, तब सूरत के भावों में।

आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत होती है,

एक खोखलापन रह जाता है उसके  दावों में!

(संगीत का एक खूबसूरत लोक-अंतराल: राजस्थान की रेगिस्तानी प्यास और हिमाचल की ठंडी बयार का आभास कराता हुआ)

​📜 अन्तरा - 1 (व्याख्यात्मक पुट के साथ)

(हिमांचली लोक शैली के उतार-चढ़ाव में कव्वाल बोलता है)

​अय्याश की आश, जैसे अग्नि की प्यास!

शान्त होती नहीं कभी भी, न रहता होश-हबास।

मन को साधते रहो, निरन्तर करते रहो प्रयास! जरूर उपलब्धि होगी तुम्हें कोई खास ।।

कव्वाल की गुफ़्तगू (व्याख्या):

"अरे बंधु! इंसान जब अपनी असलियत भूलकर दिखावे की आग में कूदता है, तो उसे होश ही नहीं रहता कि वो खुद को जला रहा है या जिला रहा है..."


​आग ज़िंदा है अब तक, देखो आफताबों में!

ईमान डिग जाते हैं, जब तिश्नगी के बहावों में।

नूर-ए-सीरत मिट जाती है, रोहि तब सूरत के भावों में।

आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत हो गई है,

एक खोखलापन रह रह जाता है, उसके दावों में!

​📜 अन्तरा - 2

(राजस्थानी मांड शैली की महक के साथ)

​मन ही गुनाह-ओ-कुसूर का सबब है, रोहि इस मुल्को जहान में!

मन से दिक्कतें, मन से वरक्कतें, मन के ही किरदार, इन्सान में।

"रियाज़त-ए-ख़ुदा के सबक हैं, बस कन्हैया की किताबों में!"

​ईमान डिग जाते हैं, जब तिश्नगी के बहावों में।

नूर-ए-सीरत मिट जाती है, रोहि तब सूरत के भावों में।

आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत हो गई है,

एक खोखलापन रह रह जाता है, उसके दावों में

​📜 अन्तरा - 3

(पहाड़ी लोक धुन की तान और नगाड़े की गूंज)

​मोह और माया के जाल में, उलझ-उलझ कर हारा आदमी!

कहता मैंने खरीदा है आसमान और जमीं, है अक्ल का मारा आदमी।

बच नहीं पाया है हवश की आग से कोई, पतंगे सा झुलस गया ये आवारा आदमी!

कव्वाल की गुफ़्तगू (व्याख्या):

"चेहरे पर हँसी और दिल में लंपटता... यही आज के इस दौर का सबसे बड़ा सच बन गया है!"


​ढूँढता है सुकून, पर एक लम्पटता है इसके हाव-भावों में!

ईमान डिग जाते हैं रोहि, जब तिश्नगी के बहावों में।

नूर-ए-सीरत मिट जाती है रोहि, तब सूरत के भावों में।

आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत होती है,

एक खोखलापन होता है उसके सारे दावों में!

​📜 अन्तरा - 4

(ढोलक की थाप तेज होती है, कव्वाली अपने शबाब पर)

​झूठे रिश्तों की आड़ में, करता रहता है छल ये पल-पल!

पल-पल बदलता है ये मुखौटे, जब जाते हैं इसके मतलब निकल।

मौत का खौफ़ भी छुप जाता है, इसका मन्दिर की मूर्त के चढ़ावों में!

​ईमान डिग जाते हैं रोहि, जब तिश्नगी के बहावों में।

नूर-ए-सीरत मिट जाती है रोहि, तब सूरत के भावों में।

आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत होती है,

एक खोखलापन रह रह जाता है, उसके दावों में

​📜 अन्तरा - 5 (समापन)

(राजस्थानी और हिमांचली दोनों वाद्यों का सम्मिलित तीव्र नाद)

​दुनियाँ की चौखट पर जो लोग सिर झुकाते हैं,

वे भीख मांगते हैं भिखारियों से गिड़गिड़ाते हैं।

वह लोग ईश्वर को रोहि, कहाँ ढूँढ़ पाते हैं?

​आदमी की जिन्दगी ढल जाती है, बस दिखावों में!

ईमान डिग जाते हैं रोहि, जब तिश्नगी के बहावों में।

नूर-ए-सीरत मिट जाती है रोहि, सूरत के भावों में।

आदमी की अक़्ल बिल्कुल विपरीत होती है,

एक खोखलापन रह रह जाता है, उसके दावों में!

(संगीत की अंतिम लंबी गूंज और कोरस के साथ समापन)

स्क्रिप्ट के अनुरूप ताल व लय में कब्बाली ऑडियो जनरेट करें !

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