सोमवार, 29 नवंबर 2021

सूरदास बाबा इरिखिनी वाले -



मनुष्य की जितनी पूजा, भजन ,तपस्या और साधना है वह केवल अन्त:करण शुद्धि के साधन मात्र हैं जैसे दर्पण को स्वच्छ करने पर प्रकाश स्वत: ही परावर्तित होेने लगता है
ठीक उसी प्रकार सत्य ज्ञान रूपी प्रकाश मन दर्पण पर परावर्तित होने लगता है !
महावीर बुद्ध और कबीर आदि जितने भी साधक हुए सबने यही उपक्रम किया

ये सभी साधन मनुष्य में पात्रता ही उत्पन्न करते हैं
अन्यथा इनकी क्या उपयोगिता यदि पूजा भजन और साधना या गंगा आदि के नहाने से अन्त: करण का शुद्धि करण ही नहो तो ये सब मूर्खता पूर्ण आचरण ही हैं

जब व्यक्ति पात्र अर्थात् अन्त:करण चतुष्टय ( मन बुद्धि अहंकाऱ और चित से शुद्ध हो जाता है) तो उसे अपूर्णता का एहसास कभी नहीं होता है और इच्छाऐं ही अपूर्णता का एहसास कराने वाली मनो तरंगे हैं
ये अपूर्णता से प्रेरित मन के आवेग- संवेग है !
इच्छाओं के संवेग ही अन्त:करण को धूमिल करने वाला धुँआ हैं !

और लक्ष्मी या दौलत उपलब्ध हो जाने पर इच्छाऐं उमड़ने ही लगती हैं
लक्ष्मी का एक नाम कामिनी भी है और कामना इसकी पुत्री और काम इसका पुत्र है
जहाँ कामना होगी वहाँ काम का आवेग भी होगा
कामनाऐं साँसारिक उपभोग की पिपासा या प्यास ही हैं

कामनाओं के आवेग ही संसार रूपी सिन्धु की उद्वेलित लहरें हैं
इनके आवेगों से उत्पन्न मोह के भँवर और लोभ के गोते भी मनुष्य को अपने आगोश में समेटते और अन्त में मेटते ही हैं !

अन्त: करण चतुष्टय में अहंकार का शुद्धिकरण होने का अर्थ है उसका स्व के रूप में परिवर्तन स्व ही आत्मसत्ता की विश्व व्यापी अनुभूति है
और जब यही सीमित और एकाकी हो जाती है तो इसे ही अहंकार कहा जाता है और यही अहंकार क्रोधभाव से समन्वित होकर संकल्प को उत्पन्न करता है और संकल्प से इच्छा का जन्म होता है
यही इच्छा अज्ञानता से प्रेरित संसार का उपभोग करने के लिए उतावली होकर जीव को अनेक अच्छे बुरे कर्म करने को बाध्य करती है
यही इच्छ प्रवृत्तियों के साँचे में अपने को ढाल लेती हैं
अहंकार से संकल्प की उत्पत्ति और यही संकल्प संवेगित होकर इच्छा का रूप धारण करता है ...
और इच्छाऐं अनन्त कभी तृप्त न होने वाली हैं

सब कुछ उपभोग करने बाद भी हम आज भी हम सब अकिंचन या अभाव ग्रस्त ही हैं

इसी लिए मेरी कभी भी ये इच्छा नहीं रही की मेरे पास अकूत सम्पत्ति हो
हाँ अपनी कुछ भौतिक आवश्यकताओं की सिद्धि का साधन धन अवश्य माना
और जो केवल लोक मान्यता से ही समाज में मान्य है

ये सांसारिक सम्पत्तियाँ आपत्तियों का कारण ही बनती हैं
बुद्धिमानी यही है कि साँसारिक इच्छाओं को संतुलित करते हुए मनुष्य ज्ञान पूर्वक भक्ति का आश्रय ले
क्यों जीवन को जानना ही परम लक्ष्य है !

अर्थात् मौलिक भौतिक आवश्यकताओं की आपूर्ति का साधन ही धन है .
और केवल उसी धन तक अपना पुरुषार्थ करे
परन्तु पारलौकिक यात्रा में सद्कर्म अथवा आध्यात्मिक ज्ञान ही सिद्धिदायक है

इच्छाओं की धारा में मनुष्य दु:ख सुख का मन अनुभव करता है
सुख मिलते दु:ख होत है और दु:ख मिले सुख होत
अन्त में केवल दु:ख मिले तो जाते हैं सब रोत !!

परन्तु आनन्द का कोई सापेक्षिक भाव नहीं ये आत्मा की मौलिकता और हृदय की अनुभूति है और यहाँ सारे द्वन्द्वात्मक भेद तिरोहित हो जाते हैं
व्यक्ति के आनन्द के श्रोत उसके अन्त:करण की शुद्धता है सभी सदाचरण और आध्यात्मिक उपकरण मात्र अन्त:करण की शुद्धता के लिए ही हैं

पात्रता का तात्पर्य अधिकारी होना है और जो कर्तव्य को ईश्वर में समर्पण करते हुए करता है तो वह निष्काम कर्म करने से कभी कर्म के द्वन्द्वात्मक फल का भागी और भोगी नहीं होता है

अधिकारी का तात्पर्य ही कर्तव्य का पालन करने वाला है ...
दुनियाँ की सारी समस्याऐं तब खड़ी होती हैं जब हम कर्तव्य छोड़ कर केवल अधिकार की ही बात करते रहते हैं ..

†प्रस्तुति करण†
यादव योगेश कुमार रोहि 

रविवार, 28 नवंबर 2021

वेदों यदु और तुर्वसु का देवों को न मानने वालों के रूप में वर्णन- नकारात्मक वर्णन-

अ॒ग्निना॑ तु॒र्वशं॒ यदुं॑ परा॒वत॑ उ॒ग्रादे॑वं हवामहे। अ॒ग्निर्न॑य॒न्नव॑वास्त्वं बृ॒हद्र॑थं तु॒र्वीतिं॒ दस्य॑वे॒ सहः॑॥ऋ-१/३६/१८

___________________________________
"पदपाठ-

अ॒ग्निना॑ । तु॒र्वश॑म् । यदु॑म् । प॒रा॒वतः॑ । उ॒ग्रदे॑वम् । ह॒वा॒म॒हे॒ । अ॒ग्निः । न॒य॒त् । नव॑वास्त्वम् । बृ॒हत्र॑थम् । तु॒र्वीति॑म् । दस्य॑वे । सहः॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:36» ऋचा 18|

अर्थान्वय- -(अग्निना) तृतीया विभक्ति करण।कारक। अग्नि के द्वारा ।  (उग्रादेवम्) कर्म।कारक।  (उग्रा +अदेवम् = दीर्घसन्धि) उग्र  और देवों को ना मानने वाले को। (तुर्वशम्) तुरवसु को। (यदुम्) यादवों के आदि पूर्वज यदु को  (परावतः)दूरदेशात्- दूसरे देश से (हवामहे) युद्ध के लिये बुलाते हैं ।  (दस्यवे) दस्युओं के लिए  सह:= मर्षण /दमन को। (नववास्त्वम्) नवीन घर बनाने को(बृहद्रथम्) बड़े रथ को वाले (तुर्वीतिम्) हिंसको को  (नयत्) = नयतु - पकड़े /उनका प्रापण करें     ॥१८॥

               
                     
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वेदों में यदु और तुर्वसु का नकारात्मक वर्णन-

स॒त्यं तत्तु॒र्वशे॒ यदौ॒ विदा॑नो अह्नवा॒य्यं ।  व्या॑नट् तु॒र्वणे॒ शमि॑ ॥२७।

(ऋग्वेद 8/45/27) 

(पद-पाठ)

स॒त्यम् । तत् । तु॒र्वशे॑ । यदौ॑ । विदा॑नः । अ॒ह्न॒वा॒य्यम् ।वि । आ॒न॒ट् । तु॒र्वणे॑ । शमि॑ ॥२७।।

(सायण-भाष्य)

“तुर्वशे राज्ञि “यदौ च यदुनामके च राज्ञि “तत् प्रसिद्धं यागादिलक्षणं “शमि कर्म  शची शमी' इति कर्मनामसु पाठात् । "सत्यं परमार्थं "विदानः जानंस्तयोः प्रीत्यर्थम् अह्नवाय्यम् अह्नवाय्यनामकं तयोः शत्रुं 

“तुर्वणे= संग्रामे “व्यानट्= व्याप्तवान् ।।

_________

अग्निना । तुर्वशम् । यदुम् । पराऽवतः । उग्रऽदेवम् । हवामहे ।                  अग्निः । नयत् । नवऽवास्त्वम् । बृहत्ऽरथम् । तुर्वीतिम् । दस्यवे । सहः ॥१८।।

“अग्निना सहावस्थितान् तुर्वशनामकं यदुनामकम् उग्रदेवनामकं च  शासकान्  "परावतः =दूरदेशात् "हवामहे =आह्वयामः ।                                  स च "अग्निः नववास्तुनामकं बृहद्रथनामकं तुर्वीतिनामकं च राजान् "नयत्= इहानयतु । कीदृशोऽग्निः ।                                       "दस्यवे "सहः अस्मदुपद्रवहेतोश्चोरस्याभिभविता ॥{ नयत् । ‘णीञ् प्रापणे'। लेटि अडागमः  इतश्च लोपः' इति इकारलोपः  } नववास्त्वम् । नवं वास्तु यस्यासौ नववास्तुः । ‘ वा छन्दसि' इत्यनुवृत्तेः अमि पूर्वत्वाभावे यणादेशः । बृहद्रथम् । बहुव्रीहौ पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वम् ॥

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। प्रियासः । इत् । ते । मघऽवन् । अभिष्टौ । नरः । मदेम । शरणे । सखायः । नि । तुर्वशम् । नि । याद्वम् । शिशीहि । अतिथिऽग्वाय । शंस्यम् । करिष्यन् ॥८।

अथर्ववेद में भी (काण्ड २० /अध्याय ५/ सूक्त ३७/ ऋचा ७) हे इन्द्र !  हम तुम्हारे मित्र रूप यजमान 

अपने घर में प्रसन्नता से रहें; तथा

तुम अतिथिगु को सुख प्रदान करो ।

और तुम तुर्वसु और यादवों को क्षीण करने वाले बनो। अर्थात् उन्हें परास्त करने वाले बनो ! 

ऋग्वेद-7/19 /8

हे "मघवन्= धनवन्निन्द्र “ते =तव "अभिष्टौ =अभ्येषणे "नरः =स्तोत्राणां नेतारो वयं "सखायः समानख्यातयः “प्रियासः =प्रियाश्च सन्तः “शरणे ="इत् गृह एव “मदेम= मोदेम ।                    किञ्च “अतिथिग्वाय । पूजयातिथीन् गच्छतीत्यतिथिग्वः । 

तस्मै सुदासे दिवोदासाय= वास्मदीयाय राज्ञे “शंस्यं= शंसनीयं सुखं "करिष्यन् =कुर्वन् 

 "तुर्वशं राजानं "नि "शिशीहि =वशं कुरु । "याद्वं च राजानं “नि शिशीहीत्यर्थः ॥

सायण-भाष्यम् ★-

तृतीयेऽनुवाके सप्त सूक्तानि । तत्र ‘अया वीती' इति त्रिंशदृचं प्रथमं सूक्तम् । अमहीयुर्नामाङ्गिरस ऋषिः । गायत्री छन्दः । पवमानः सोमो देवता । तथा चानुक्रान्तम्- अया वीती त्रिंशदमहीयुः' इति । उक्तो विनियोगः ॥

अ॒या वी॒ती परि॑ स्रव॒ यस्त॑ इंदो॒ मदे॒ष्वा ।अ॒वाह॑न्नव॒तीर्नव॑ ॥१।।

पुरः॑ स॒द्य इ॒त्थाधि॑ये॒ दिवो॑दासाय॒ शंब॑रं ।अध॒ त्यं तु॒र्वशं॒ यदुं॑ ॥२।

(ऋग्वेद9/61/1-2)

हे सोम ! तुम्हारे किस रस ने दासों के निन्यानवे पुरों अर्थात् नगरों) को तोड़ा था। उसी रस से युक्त होकर तुम इन्द्र के पीने के लिए प्रवाहित हो जाओ। १।

शम्बर के नगरों को तोड़ने वाले ! सोम रस ने ही तुर्वसु की सन्तानों तथा यदु की सन्तान यादवों को शासन अथवा (वश) में किया ।२।

पदपाठ-

अ॒या । वी॒ती । परि॑ । स्र॒व॒ । यः । ते॒ । इ॒न्दो॒ इति॑ । मदे॑षु । आ ।अ॒व॒ऽअह॑न् । न॒व॒तीः । नव॑ ॥१।।

(सायण-भाष्य)

हे “इन्दो= सोम “अया =अनेन रसेन “वीती= वीत्या इन्द्रस्य भक्षणाय “परि “स्रव =परिक्षर । कीदृशेन रसेनेत्यत आह । “ते= तव “यः रसः “मदेषु= संग्रामेषु “नवतीर्नव इति नवनवतिसंख्याकाश्च शत्रुपुरीः “अवाहन =जघान । अमुं सोमरसं पीत्वा मत्तः सन्निन्द्र उक्तलक्षणाः शत्रुपुरीर्जघानेति कृत्वा रसो जघानेत्युपचारः ॥

_____________________________________

पुरः॑ स॒द्य इ॒त्थाधि॑ये॒ दिवो॑दासाय॒ शंब॑रं ।अध॒ त्यं तु॒र्वशं॒ यदुं॑ ॥२।

शम्बर के नगरों को तोड़ने वाले ! सोम रस ने ही तुर्वसु की सन्तानों तथा यदु की सन्तान यादवों को शासन अथवा (वश) में किया ।२।

पुरः॑ । स॒द्यः । इ॒त्थाऽधि॑ये । दिवः॑ऽदासाय । शम्ब॑रम् ।

अध॑ । त्यम् । तु॒र्वश॑म् । यदु॑म् ॥२।

(पद का अर्थान्वय)

 (इत्थाधिये दिवोदासाय) दिवोदास के लिए(शम्बरम्) शम्बर को (त्यम् तुर्वशम् यदुम्) और यदु और तुर्वसु को (अध) (पुरः) पुर को ध्वंसन करो ॥२॥

(ऋग्वेद9/61/1-2)

“सद्यः एकस्मिन्नेवाह्नि “पुरः =शत्रूणां पुराणि सोमरसोऽवाहन् । “इत्थाधिये सत्यकर्मणे “दिवोदासाय राज्ञे “शम्बरं शत्रुपुराणां स्वामिनम् "अध अथ =“त्यं तं “तुर्वशं तुर्वशनामकं राजानं दिवोदासशत्रुं “यदुं यदुनामकं राजानं च वशमानयञ्च । 

अत्रापि सोमरसं पीत्वा मत्तः सन्निन्द्रः सर्वमेतदकार्षीदिति सोमरसे कर्तृत्वमुपचर्यते ॥

ऋग्वेद के दशम् मण्डल के ६२वें सूक्त की १० वीं ऋचा में यदु और तुर्वसु को स्पष्टत: दास के रूप में सम्बोधित किया गया है।  वह भी गोपों को रूप में 

 " उत् दासा परिविषे स्मद्दिष्टी गोपरीणसा यदुस्तुर्वश्च च मामहे ।। 

(ऋग्वेद १०/६२/१०)

यदु और तुर्वसु नामक दौनों दास ( देवो को न मानने वाले ) जो गायों से घिरे हुए हैं 

हम उन सौभाग्य शाली दौनों दासों की वर्णन करते हैं ।



"प्रियास इत् ते मघवन् अभीष्टौ 

  नरो मदेम शरणे सखाय:।

नि तुर्वशं नि यादवं शिशीहि 

अतिथिग्वाय शंस्यं करिष्यन् ।।

(ऋग्वेद ७/१९/८ ) में भी यही ऋचा)


"सत्यं तत् तुर्वशे यदौ विदानो अह्नवाय्यम् ।व्यानट् तुर्वशे शमि । (ऋग्वेद ८/४६/२७

हे इन्द्र! तुमने यादवों के प्रचण्ड कर्मों  को सत्य (अस्तित्व) में मान कर संग्राम में अह्नवाय्यम् को प्राप्त कर डाला ;अर्थात् उनका हनन (शमन) कर डाला ।

अह्नवाय्य :- ह्नु--बा० आय्य न० त० ।

निह्नवाकर्त्तरि ।

“सत्यं तत्तुर्वशे यदौ विदानो अह्नवाय्यम्” ऋ० ८, ४५, २७ अथर्ववेद तथा ऋग्वेद में यही ऋचांश बहुतायत से है 

किम् अंगत्वा मघवन् भोजं आहु: शिशीहि मा शिशयं त्वां श्रृणोमि ।।

अथर्ववेद का० २०/७/ ८९/३/

हे इन्द्र तुम भोग करने वाले हो ।

तुम शत्रु को क्षीण करने वाले हो । 

तुम मुझे क्षीण न करो 

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शतमहं तिरिन्दिरे सहस्रं पर्शावा ददे ।
राधांसि याद्वानाम् ॥४६॥+ऋग्वेद ८/६/४६)

श॒तम॒हं ति॒रिन्दि॑रे स॒हस्रं॒ पर्शा॒वा द॑दे ।

राधां॑सि॒ याद्वा॑नाम् ॥४६।।


(सायण-भाष्य)

इदमादिकेन तृचेन तिरिन्दिरस्य राज्ञो दानं स्तूयते । “पर्शौ परशुनाम्नः पुत्रे । उपचारज्जन्ये जनकशब्दः । “तिरिन्दिरे एतत्संज्ञे राजनि “याद्वानाम् । यदुरिति मनुष्यनाम । यदव एव याद्वाः । स्वार्थिकस्तद्धितः । तेषां मध्ये “अहं “शतं शतसंख्याकानि “सहस्रं सहस्रसंख्याकानि च “राधांसि धनानि “आ “ददे स्वीकरोमि । यद्वा । याद्वानां यदुकुलजानामन्येषां राज्ञां स्वभूतानि राधांसि बलादपहृतानि तिरिन्दिरे वर्तमानान्यहं प्राप्नोमि ।।


त्रीणि शतान्यर्वतां सहस्रा दश गोनाम् ।
ददुष्पज्राय साम्ने ॥४७॥ऋग्वेद ८/६/

_______________________________

त्रीणि॑ श॒तान्यर्व॑तां स॒हस्रा॒ दश॒ गोना॑म् ।

द॒दुष्प॒ज्राय॒ साम्ने॑ ॥४७।।

सायण-भाष्य-

पूर्वस्यामृचि स्वसंप्रदानकं दानमुक्तम् । अधुनान्येभ्योऽप्यृषिभ्यस्तिरिन्दिरो बहु धनं दत्तवानित्याह । 

“अर्वतां गन्तॄणामश्वानां “त्रीणि "शतानि "गोनां गवां “दश दशगुणितानि "सहस्रा सहस्राणि च "पज्राय स्तुतीनां प्रार्जकाय “साम्ने एतत्संज्ञायर्षये । यद्वा । साम्ने । साम स्तोत्रम् । तद्वते पज्राय पज्रकुलजाताय कक्षीवते । “ददुः तिरिन्दिराख्या राजानो दत्तवन्तः ।।

उदानट् ककुहो दिवमुष्ट्राञ्चतुर्युजो ददत् ।
श्रवसा याद्वं जनम् ॥४८॥(ऋग्वेद ८/६/४८)

उत् । आ॒न॒ट् । क॒कु॒हः । दिव॑म् । उष्ट्रा॑न् । च॒तुः॒ऽयुजः॑ । दद॑त् ।

श्रव॑सा । याद्व॑म् । जन॑म् ॥४८।।

सायण-भाष्य-

अयं राजा “ककुहः उच्छ्रितः सन् “श्रवसा कीर्त्या “दिवं स्वर्गम् "उदानट् उत्कृष्टतरं व्याप्नोत् । किं कुर्वन् । "चतुर्युजः चतुर्भिः स्वर्णभारैर्युक्तान् “उष्ट्रान् “ददत् प्रयच्छन् । तथा “याद्वं “जनं च द्रासत्वेन प्रयच्छन् ॥ ॥ १७ ॥

__________   

यदु वंशीयों में परशु के पुत्र तिरिन्दर से सहस्र संख्यक धन मैने प्राप्त किया !

ऋग्वेद ८/६/४६

त्वं धुनि॑रिन्द्र॒ धुनि॑मतीरृ॒णोर॒पः सी॒रा न स्रव॑न्तीः ।

प्र यत्स॑मु॒द्रमति॑ शूर॒ पर्षि॑ पा॒रया॑ तु॒र्वशं॒ यदुं॑ स्व॒स्ति ॥१२।।

पदपाठ-

त्वम् । धुनिः । इन्द्र । धुनिऽमतीः । ऋणोः । अपः । सीराः । न । स्रवन्तीः ।

प्र । यत् । समुद्रम् । अति । शूर । पर्षि । पारय । तुर्वशम् । यदुम् । स्वस्ति ॥१२

हे "इन्द्र “धुनिः शत्रूणां कम्पयिता “त्वं “धुनिमतीः धुनिर्नामासुरो यासु निरोधकतया विद्यते ताः “अपः उदकानि "सीरा “न नदीरिव “स्रवन्तीः प्रवहन्तीः “ऋणोः अगमयः ।

धुनिं हत्वा तेन निरोधितान्युदकानि प्रवाहयतीत्यर्थः ।

 हे “शूर वीरेन्द्र “यत् यदा “समुद्रम् “अति अतिक्रम्य “प्र “पर्षि प्रतीर्णो भवसि तदा समुद्रपारे तिष्ठन्तौ “तुर्वशं “यदुं च "स्वस्ति क्षेमेण “पारय अपारयः । समुद्रमतारयः ।।

हमारे कल्याण के लिए यदु और तुर्वसु को समुद्र के दूसरी पार करते हो।

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य आनयत्परावतः सुनीती तुर्वशं यदुम् ।
इन्द्रः स नो युवा सखा ॥१॥

 (ऋग्वेद-6/45/1)

इन्द्रः॑। सः। नः॒ । युवा॑। सखा॑ ॥१

यः । आ । अनयत् । पराऽवतः । सुऽनीती । तुर्वशम् । यदुम् ।

यः इन्द्रः "तुर्वशं “यदुं चैतत्संज्ञौ राजानौ शत्रुभिर्दूरदेशे प्रक्षिप्तौ “सुनीती सुनीत्या शोभनेन नयनेन “परावतः तस्माद्दूरदेशात् “आनयत् अनीतवान् “युवा तरुणः “सः “इन्द्रः “नः अस्माकं “सखा भवतु ।।

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बुधवार, 24 नवंबर 2021

भारतेन्दु हरिश्चंद्र - प्रेममाधुरी- कक्षा नौ-




 भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (काव्य-खण्ड).

(विस्तृत उत्तरीय प्रश्न)

प्रश्न 1. निम्नलिखित पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए तथा काव्यगत सौन्दर्य भी स्पष्ट कीजिए :

( प्रेम-माधुरी )

1. कूकै लगीं ……….…………………………………………………….. बरसै लगे।
शब्दार्थ- कुकै लगीं = कूकने लगीं। पात = पत्ते । सरसै लगे = सुशोभित होने लगे। दादुर = मेंढक। मयूर = मोर। सँजोगी जन = अपने प्रिय के साथ रहनेवाले लोग। हरसै = हर्षित। सीरी = शीतल । हरिचंद = कवि हरिश्चन्द्र, श्रीकृष्ण। निगोरे = निगोड़े, ब्रज की एक गाली जिसका अर्थ विकलांग होता है।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्यांश पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी काव्य’ में कवित्त-छन्द भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की रचना है जो कि उनके ‘प्रेममाधुरी’ शीर्षक के अन्तर्गत संगृहीत छन्दों से उधृत है।
प्रसंग- कवि ने इस छन्द में वर्षा-ऋतु के आगमन पर दृष्टिगोचर होने वाले विविध प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन किया है।
व्याख्या- वर्षा-ऋतु आने पर कोयलें फिर कदम्ब के वृक्षों पर बैठकर कूकने लगी हैं। वर्षा के जल से धुले हुए वृक्षों के पत्ते वायु में हिलते हुए शोभा पाने लगे हैं। मेंढक बोलने (UPBoardSolutions.com) लगे हैं, मोर नाचने लगे हैं और अपने प्रियजनों के समीप स्थित लोग इस वर्षा-ऋतु के दृश्यों को देख-देखकर प्रसन्न होने लगे हैं। सारी भूमि हरियाली से भर गयी है, शीतल वायु चलने लगी है और हरिश्चन्द्र (श्रीकृष्ण) को देखकर हमारे प्राण मिलने को फिर तरसने लगे हैं। झूमते हुए बादलों के साथ यह वर्षा-ऋतु फिर आ गयी और ये निगोड़े बादल फिर धरती पर झुक झुककर बरसने लगे हैं।
काव्यगत सौन्दर्य- 

  1. कवि ने वर्षा के मनोहारी दृश्यों को शब्द-चित्रों में उतारा है।
  2. भाषा में सरसता एवं प्रवाह है।
  3. शैली वर्णनात्मक तथा शब्द चित्रात्मक है।
  4. अलंकार- अनुप्रास तथा पुनरुक्ति अलंकार हैं। रस-शृंगार।

2. जिय पै जु…………………………………………………………………………….. कै बिसारिए।

शब्दार्थ- निरधारिये = निर्धारित कीजिए, निश्चित कीजिए। जिय = हृदय। श्रोत = कान। उतै = उधर, कृष्ण की ओर। पराई = परवश। निषारिये = रोकिये। ताहि = उसे । बिसारिए = भुलाइये।
सन्दर्भ- प्रस्तुत छन्द ‘हिन्दी काव्य’ में संकलित एवं कवि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के ‘प्रेम-माधुरी’ काव्य संग्रह से उद्धृत है।
प्रसंग- गोपियाँ उद्धव के सम्मुख अपनी कृष्ण-प्रेमजनित विवशता का वर्णन कर रही हैं।
व्याख्या- गोपियाँ कहती हैं-हे उद्धव। यदि हमारा अपने मन पर अधिकार हो तभी तो हम लोक-लज्जा तथा अच्छे-बुरे आदि का निर्धारण कर सकती हैं। पर हमारे नेत्र, कान, (UPBoardSolutions.com) हाथ, पैर सभी तो परवश हो चुके हैं। ये तो बार-बार कृष्ण की ओर ही आकर्षित होते चले जाते हैं। हम तो सब प्रकार से परवश हो चुकी हैं। अब हमें ज्ञान का उपदेश देकर आप कृष्ण से विमुख कैसे कर पायेंगे। अरे। जो मन में बसा हो उसे तो भुलाया भी जा सकता है, किन्तु स्वयं मन जिसमें बसा हुआ हो उसे कैसे भुलाया जा सकता है।
काव्यगत सौन्दर्य-

  1. भारतेन्दु जी ने गोपियों की प्रेम-विवशता को बड़े मार्मिक शब्दों में प्रस्तुत किया है।
  2. भाषी भावानुरूप है।
  3. शैली भावुकता से सिंचित है।
  4. अलंकार-अनुप्रास अलंकार की योजना है। छन्द-कवित्त।

3. यह संग में………………………………………………………………..………….. नहिं मानती हैं।
शब्दार्थ-  लागिये = लगी हुई। आनती हैं = लाती हैं, धारण करती हैं। छिनहू = क्षण-भर को भी। चाल प्रलै की = आँसू बहाना । बरुनी = बरौनी । थिरें = स्थिर रहतीं । झपैं = बन्द होती हैं। उझपैं = खुलती हैं। पल = पलक। समाइबौ = बन्द होना । निहारे = देखे।
सन्दर्भ – प्रस्तुत सवैया-छन्द ‘हिन्दी काव्य’ में संकलित है जो कवि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की ‘प्रेम-माधुरी’ को प्रसाद है।
प्रसंग- कवि ने वियोगिनी गोपियों के नेत्रों की विवशता को मार्मिक वर्णन किया है।
व्याख्या- गोपियाँ कहती हैं-हे प्रिय । हमारी ये आँखें सदा आपके संग-संग ही लगी रही हैं। आपको देखे बिना इनको चैन ही नहीं पड़ता। यदि कभी क्षणभर को भी आपसे वियोग (UPBoardSolutions.com) हो जाता है तो ये आँखें प्रलय की ठान लेती हैं अर्थात् आँसू बरसाना प्रारम्भ कर देती हैं। ये कभी बरौनियों में स्थिर नहीं रह पातीं। कभी बन्द होती हैं तो कभी खुलती हैं। पलकों में बन्द होना तो जैसे इनको आता ही नहीं है। हमारे प्यारे, हे प्रिय । आपको देखे बिना हमारी आँखें मानती ही नहीं।
काव्यगत सौन्दर्य-

  1. आँखों का मिलन-आकुलता का कवि ने बड़ा हृदयस्पर्शी वर्णन प्रस्तुत किया है। ‘प्रिय प्यारे…..नहीं मानती है’ पंक्ति के चारों ओर ही पूरे छन्द को बुना गया है।
  2. भाषा ब्रज है।
  3. शैली चमत्कारिक और आलंकारिक है।
  4. मुहावरों का मुक्त भाव से प्रयोग हुआ है जैसे-संग लगे डोलना, धीरज न लाना, प्रलय की चाल ठानना आदि । रस-वियोग श्रृंगार । गुण-माधुर्य, छन्द-सवैया।

4. पहिले बहु भाँति……..…………………………………………………………. अब आपुहिं धावती हैं।
शब्दार्थ- भरोसो = आश्वासन। जुदा = अलग।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी काव्य’ में संकलित एवं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित ‘प्रेम माधुरी’ पाठ से उधृत है।
प्रसंग- इस सवैये में श्रीकृष्ण के वियोग में व्याकुल एक गोपी अपनी सखियों के समझाने पर उपालम्भ दे रही है
व्याख्या- हे सखि । पहले तो तुम हमें तरह-तरह से भरोसा दिलाती थीं कि हम अभी श्रीकृष्ण को लाकर तुमसे मिला देती हैं। जो मेरी अपनी सखियाँ कहलाती हैं, मैं उनके ही (UPBoardSolutions.com) विश्वास पर बैठी रही, लेकिन अब वही मुझसे अलग हो गयी हैं। श्रीकृष्ण को मिलाने की अपेक्षा वे उल्टा मुझे ही समझाती हैं। अरी सखी । इन्होंने पहले तो मेरे हृदय में प्रेम की आग भड़का दी और अब उसे बुझाने के लिए स्वयं ही जल लेने को दौड़ी जाती हैं। यह कहाँ का न्याय है?
काव्यगत सौन्दर्य- 

  1. यहाँ कवि ने सखियों के प्रति गोपी की खीझ का सुन्दर चित्रण किया है।
  2. भाषा- ब्रजे ।
  3. शैली- मुक्तक।
  4. रस- विप्रलम्भ श्रृंगार।
  5. छन्द- सवैया।
  6. अलंकार- अनुप्रास। गुण- प्रसाद।

 5. ऊधौ जू सूधो गहो……………………………………………………………….. यहाँ भाँग परी है।

शब्दार्थ- गहो = पकड़ो। सिख = शिक्षा। खरी = पक्की।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी काव्य’ में संकलित एवं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित ‘प्रेम माधुरी’ से उधृत है।
प्रसंग- इस सवैये में गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि वे किसी प्रकार भी उनके निराकार ब्रह्म के उपदेश को ग्रहण नहीं कर सकतीं।
व्याख्या- हे उद्धव। तुम उस मार्ग पर सीधे चले जाओ, जहाँ तुम्हारे ज्ञान की गुदड़ी रखी हुई है। यहाँ पर तुम्हारे उपदेश को कोई गोपी ग्रहण नहीं करेगी; क्योंकि सभी श्रीकृष्ण के प्रेम में विश्वास रखती हैं। हे उद्धव । ये सभी ब्रजबालाएँ एक-सी हैं, कोई भिन्न प्रकृति की नहीं हैं। इनकी तो पूरी मण्डली (UPBoardSolutions.com) ही बिगड़ी हुई है। यदि किसी एक गोपी की बात होती तो तुम उसे ज्ञान का उपदेश देते किन्तु यहाँ तो कुएँ में ही भाँग पड़ी हुई है अर्थात् सभी श्रीकृष्ण के प्रेम-रस में सराबोर होकर पागल-सी हो गयी हैं। इसलिए तुम्हारा उपदेश देना व्यर्थ होगा।
काव्यगत सौन्दर्य-

  1. यहाँ कवि ने श्रीकृष्ण के प्रति गोपियों का अनन्य प्रेम प्रकट किया है।
  2. भाषा- मुहावरेदार, सरस ब्रज।
  3. शैली- मुक्तक।
  4. छन्द- सवैया।
  5. अलंकार- अनुप्रास, रूपक। रस- शृंगार।

6. सखि आयो बसन्त ………………………………………………….. पाँय पिया परसों।
शब्दार्थ-   रितून को कन्त = ऋतुओं को स्वामी बसन्त । वर = श्रेष्ठ। समीर = वायु । गर सों = गले तक, पूरी तरह। परसों = (1) स्पर्श करूँ, (2) आने वाख्ने कल के बाद का दिन।
सन्दर्भ- प्रस्तुतः पद्य हमारी पाठ्यपुस्तक हिद्धी काव्य में भ्रारतेन्दु हुश्चिन्द्र द्वाह चूित ग्रेस धुमाढले अधूख है।
प्रसंग- इस सवैये में बसन्त ऋतु के आगमन पर गोपियों की विरह-व्यथा का चित्रण किया गया है।
व्याख्या- एक गोपी कृष्ण-विरह से पीड़ित होकर दूसरी सखी से अपनी मनोव्यथा को व्यक्त करती हुई कहती है कि हे सखि । ऋतुओं का स्वामी बसन्त आ गया है। चारों दिशाओं में पीली-पीली सरसों फूल रही है। अत्यन्त सुन्दर, शीतल, मन्द और सुगन्धित वायु बह रही है किन्तु बसन्त ऋतु का (UPBoardSolutions.com) मादक वातावरण श्रीकृष्ण के बिना मुझे पूर्णरूप से कष्टदायक प्रतीत हो रहा है। नन्दनन्दन श्रीकृष्ण हमसे यह बताकर गये थे कि मैं परसों तक मथुरा से लौट आऊँगा, परन्तु उन्होंने परसों के स्थान पर न जाने कितने वर्ष व्यतीत कर दिये और अभी तक लौटकर नहीं आये। मैं तो अपने प्रियतम कृष्ण के चरणों का स्पर्श करने के लिए तरस रही हूँ, पता नहीं कब उनके दर्शन हो सकेंगे?
काव्यगत सौन्दर्य- 

  1. बसन्त ऋतु का सुहावना वातावरण गोपियों की विरह-व्यथा को और भी अधिक बढ़ाता है।
  2. भाषा- ब्रज।
  3. शैली- वर्णनात्मक, मुक्तक।
  4. रस- वियोग शृंगार।
  5. छन्द- सवैया।
  6. अलंकार- यमक, अनुप्रास । गुण- माधुर्य ।

7. इन दुखियान को…………………………………………………………………….रहि जायँगी।
शब्दार्थ-   चैन = शान्ति, सुख । बिकल = बेचैन। औधि = अवधि। जौन-जौन = जिस-जिस।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी काव्य’ में संकलित एवं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित ‘प्रेम माधुरी’ पाठ से अवतरित है।
प्रसंग- इस सवैये में श्रीकृष्ण के विरह में व्याकुल गोपियों के नेत्रों की व्यथा का मार्मिक चित्रण किया गया है।
व्याख्या- विरहिणी गोपियाँ कहती हैं कि प्रियतम श्रीकृष्ण के विरह में आकुल इन नेत्रों को स्वप्न में भी शान्ति नहीं मिल पाती है; क्योंकि इन्होंने कभी स्वप्न में भी श्रीकृष्ण के दर्शन नहीं किये। इसलिए ये सदा प्रिय-दर्शन के लिए व्याकुल होते रहेंगे। प्रियतम के लौट आने की अवधि को बीतती (UPBoardSolutions.com) हुई जानकर मेरे प्राण इस शरीर से निकलकर जाना चाहते हैं, परन्तु मेरे मरने पर भी ये नेत्र प्राणों के साथ नहीं जाना चाहते हैं; क्योंकि इन्होंने अपने प्रियतम कृष्ण को जी भरकर नहीं देखा है। इसलिए जिस किसी भी लोक में ये नेत्र जायेंगे, वहाँ पश्चाताप ही करते रहेंगे। हे उद्धव। तुम श्रीकृष्ण से कहना कि हमारे नेत्र मृत्यु के पश्चात् भी तुम्हारे दर्शन की प्रतीक्षा में खुले रहेंगे।
काव्यगत सौन्दर्य-

  1. गोपियों के एकनिष्ठ प्रेम का चित्रण है।
  2. भाषा- ब्रज।‘सपनेहुँ चैन न मिलना’, ‘देखो एक बारहू न नैन भरि’-मुहावरों का सुन्दर प्रयोग है।
  3. शैली- मुक्तक।
  4. रस- वियोग श्रृंगार।
  5. छन्द- सवैया।
  6. अलंकार- अनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश।
  7. भाव-साम्य- सूर की अँखियाँ भी हरि-दर्शन की भूखी हैं –

अँखियाँ हरि दरसन की भूखी।
कैसे रहति रूप-रस राँची,ये बतियाँ सुनि रूखी॥

प्रश्न 2. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के जीवन-परिचय एवं रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
अथवा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की साहित्यिक सेवाओं का उल्लेख करते हुए उनके जीवन-परिचय पर प्रकाश 
डालिए।
अथवा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की कृतियों का उल्लेख करते हुए उनकी भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।

           भारतेन्दु हरिश्चन्द्र 

( स्मरणीय तथ्य )

जन्म- सन् 1850 ई०, काशी। मृत्यु- सन् 1885 ई० । पिता- बाबू गोपालचन्द्र।
रचनाएँ- प्रेम-माधुरी, प्रेम-तरंग, प्रेम-फुलवारी, श्रृंगार सतसई आदि।
काव्यगत विशेषताएँ
वण्र्य-विषय- श्रृंगार, प्रेम, ईश्वर-भक्ति, राष्ट्रीय प्रेम, समाज-सुधार आदि।
भाषा- गद्य-खड़ीबोली, पद्य-ब्रजभाषा में उर्दू, अंग्रेजी आदि के शब्द मिश्रित हैं और व्याकरण की अशुद्धियाँ हैं।
शैली- उद्बोधन, भावात्मक, व्यंग्यात्मक।
छन्द- गीत, कवित्त, कुण्डलिया, लावनी, गजल, छप्पय, दोहा आदि।
रस तथा अलंकार- नव रसों का प्रयोग।

  • जीवन-परिचय- बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म काशी के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में सन् 1850 ई० में हुआ था। इनके पिता बाबू गोपालचन्द्र जी (गिरधरदास) ब्रजभाषा के अच्छे कवि थे। इन्हें काव्य की प्रेरणा पिता से ही मिली थी। पाँच वर्ष की अवस्था में ही एक दोहा लिखकर बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने पिता से कवि होने का आशीर्वाद प्राप्त कर लिया था। दुर्भाग्य से भारतेन्दु जी की स्कूली शिक्षा सम्यक् प्रकार से नहीं हो सकी थी। इन्होंने घर पर ही हिन्दी, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी और संस्कृत भाषाओं का ज्ञान स्वाध्याय से प्राप्त किया था। भारतेन्दु जी साहित्य स्रष्टा होने के साथ-साथ साहित्यकारों और कलाकारों को खूब (UPBoardSolutions.com) सम्मान करते थे। ये अत्यन्त ही मस्तमौला स्वभाव के व्यक्ति थे और इसी फक्कड़पन में आकर इन्होंने अपनी सारी पैतृक सम्पत्ति को बर्बाद कर दिया था जो बाद में इनके पारिवारिक कलह का कारण बना। सन् 1885 ई० में इनका देहान्त राजयक्ष्मी की बीमारी से हो गया। 35 वर्ष के अल्पकाल में ही भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने हिन्दी के सर्वतोन्मुखी विकास के लिए जो प्रयास किया वह अद्वितीय । था। इन्होंने पत्रिका प्रकाशन के साथ-साथ लेखकों का एक दल तैयार किया और निबन्ध, कहानी, उपन्यास, नाटक, कविता आदि हिन्दी की विभिन्न विधाओं में साहित्य प्रणयन को प्रेरणा प्रदान की। भारतेन्दु की साहित्यिक सेवाओं का ही परिणाम है कि उनके युग को ‘भारतेन्दु युग’ कहा गया है।
  • रचनाएँ- बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की प्रसिद्ध काव्य-रचनाएँ हैं-प्रेम-माधुरी, प्रबोधिनी, प्रेम-सरोवर, प्रेम-फुलवारी, सतसई श्रृंगार, भक्तमाल, विनय, प्रेम पचीसी आदि । काशी नागरी प्रचारिणी सभा से प्रकाशित तीन खण्डों में भारतेन्दु ग्रन्थावली’ नाम से इनकी सस्त रचनाओं का (UPBoardSolutions.com) संकलन हुआ है। भारतेन्दु जी की रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्होंने रीतिकालीन काव्यधारा को राजदरबारी विलासिता के वातावरण से मुक्त कराकर स्वतन्त्र जन-जीवन के साथ विचरण करने की नयी दिशा प्रदान की। इनकी रचनाओं में प्रेम और भक्ति के साथ-साथ राष्ट्रीयता, समाज-सुधार, राष्ट्रभक्ति और देश-प्रेम के व्यापक स्वरूप के दर्शन होते हैं। इन्होंने रीतिकालीन कवियों की भाँति प्रेम और श्रृंगार की भी सरल एवं भावपूर्ण मार्मिक रचनाएँ की हैं।

काव्यगत विशेषताएँ

  • (क) भाव-पक्ष-
    1. भारतेन्दु जी को हिन्दी के आधुनिक काल का प्रथम राष्ट्रकवि नि:संकोच कहा जा सकता है। क्योंकि सर्वप्रथम इन्होंने ही साहित्य में राष्ट्रीयता, समाज-सुधार, राष्ट्रभक्ति तथा देश-भक्ति के स्वर मुखर किये।
    2. गद्यकार के रूप में तो आप आधुनिक हिन्दी गद्य के जनक ही माने जाते हैं।
    3. कविवचन सुधा और हरिश्चन्द्र सुधा आदि पत्रिकाओं के माध्यम से भारतेन्दु जी ने हिन्दी के लेखकों और कवियों को प्रेरणा प्रदान की तथा पद्य की विविध विधाओं का मार्ग निर्देशन किया।
  • (ख) कला-पक्ष-
    1. भाषा-शैली- भारतेन्दु जी की काव्य की भाषा ब्रज़ी और गद्य की भाषा खड़ीबोली है। इन्होंने भाषा का पर्याप्त संस्कार किया है। बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की काव्यगत शैलियों को निम्नलिखित चार श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है- (1) भावात्मक शैली, (2) अलंकृत शैली, (३) उद्बोधन शैली तथा (4) व्यंजनात्मक शैली ।। इसके अतिरिक्त गद्य के क्षेत्र में परिचयात्मक, विवेचनात्मक तथा भावात्मक, तीन प्रकार की रचनाएँ प्रयुक्त हुई हैं।
    2. रस-छन्द-अलंकार- बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की रचनाओं में भक्ति, श्रृंगार, हास्य, वीभत्स और करुण आदि रसों को विशेष रूप से प्रयोग हुआ है। इन्होंने गीति काव्य के अतिरिक्त कवित्त, सवैया, छप्पय, कुण्डलिया, लावनी, गजल, दोहे आदि सभी प्रचलित (UPBoardSolutions.com) छन्दों का प्रयोग अपनी रचनाओं में किया है। उपमा, रूपक, सन्देह, अनुप्रास, श्लेष, यमक इनके प्रिय अलंकार हैं।
  • साहित्य में स्थान- आपको हिन्दी का युग-निर्माता कहा जाता है। आपने अपनी प्रतिभा से हिन्दी साहित्य को एक नया मोड़ दिया। इस दृष्टि से आधुनिक काल के साहित्यकारों में आपका एक विशिष्ट स्थान है।

प्रश्न 3. ‘प्रेम माधुरी’ के सम्बन्ध में भारतेन्दु के विचारों को अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर- ‘प्रेम माधुरी’ कविता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित है। इस कविता में कवि ने गोपिकाओं की विरह दशा का वर्णन किया है।
सारांश- वर्षा ऋतु आने पर कोयलें फिर कदम्ब के वृक्षों पर बैठकर कूकने लगी हैं। मेंढक बोलने लगे हैं, मोर नाचने लगे। हैं और अपने प्रियजनों के समीप स्थित लोग इस वर्षा-ऋतु के दृश्यों को देख-देखकर प्रसन्न होने लगे हैं।
                   भगवान् श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने पर उनके वियोग में गोपिकाएँ अत्यन्त दु:खी हैं। मथुरा जाते समय श्रीकृष्ण ने गोपिकाओं से वादा किया था कि परसों आ (UPBoardSolutions.com) जायँगे। परसों की जगह बरसों बीत गये लेकिन श्रीकृष्ण भगवान् वापस नहीं आये। उद्धव गोपिकाओं को निर्गुण ब्रह्म की उपासना का सन्देश देते हैं। इसके उत्तर में गोपिकाएँ कहती हैं कि हम लोगों का मन पूरी तरह से श्रीकृष्ण में लीन है, अत: भगवान् श्रीकृष्ण से अलग नहीं हो सकता।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. ‘प्रलय’ की चाल से कवि का क्या तात्पर्य है?
उत्तर- प्रलयकाल में भयंकर वर्षा होती है, पृथ्वी पानी में डूब जाती है। प्रलय की चाल से कवि का तात्पर्य है कि आँखों से बहुत आँसू बहते हैं।

प्रश्न 2. श्रीकृष्ण को भूलने में गोपियाँ अपने को असमर्थ क्यों पाती हैं?
उत्तर- गोपियाँ श्रीकृष्ण को भूलने में अपने को इसलिए असमर्थ पाती हैं, क्योंकि उनका स्वयं मन ही जाकर श्रीकृष्ण में बस गया था।

प्रश्न 3. ‘कूप ही में यहाँ भाँग परी है’ से कवि का क्या तात्पर्य है?

उत्तर- इस पंक्ति में गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि यहाँ तो कुएँ में ही भाँग पड़ी हुई है; अर्थात् सारे ब्रजवासियों पर श्रीकृष्ण के प्रेम का नशा चढ़ा हुआ है।

प्रश्न 4. निगोड़े का अर्थ स्पष्ट करते हुए बताइए कि बादलों को निगोड़े क्यों कहा गया है?
उत्तर- बादलों को देखकर गोपियों की विरह-वेदना और तेज हो गयी। विरहिणी ने बादल को निगोड़ा इसलिए कहा है। क्योंकि बादलों ने उमड़-घुमड़ कर ऐसा वातावरण निर्मित कर दिया है कि उनकी विरह वेदना और बढ़ गयी है। बादलों ने उनके साथ ऐसा करके दुष्टता का काम किया है।

प्रश्न 5. ‘आग लगा कर पानी के लिए दौड़ने’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- आग लगाकर पानी के लिए दौड़ने का आशय अपनी की हुई गलत्री को छिपाना है। आग लगाकर पानी के लिए दौड़नेवाला यह दिखाना चाहता है कि आग उसने नहीं (UPBoardSolutions.com) लगायी, बल्कि वह तो आग से बचाना चाहता है। विरहिणी गोपी को उसकी सखी ने पहले प्रिय से मिलाने का वायदा किया और उसके मन में उत्कण्ठा पैदा की और फिर उसे समझाने लगी।

प्रश्न 6. वियोगिनी गोपियों की आँखों को सदैव पश्चात्ताप क्यों रहेगा?

उत्तर- गोपियों की आँखें कृष्ण को नयन भरकर नहीं देख पायीं; अत: उनके वियोग में मरने के उपरान्त जिस-जिस लोक में वे जायेंगी, उन्हें पश्चात्ताप रहेगा।

प्रश्न 7. कृष्ण के रूप-सौन्दर्य को देखे बिना गोपियों के नेत्रों की क्या दशा हो रही है?
उत्तर- गोपियों के नेत्रों को स्वप्न में भी चैन प्राप्त नहीं है। श्रीकृष्ण के वियोग में गोपियों के प्राण निकलना चाहते हैं; किन्तु नेत्र उनके साथ नहीं जाना चाहते । अपने नेत्रों की व्याकुलता का वर्णन करती हुई गोपियाँ कहती हैं कि श्रीकृष्ण के दर्शन के अभाव में मरने पर भी हमारी आँखें खुली-की-खुली रह जायेंगी।

प्रश्न 8. भारतेन्दु जी के लेखन की भाषा बताइए। 

उत्तर- भारतेन्दु जी के लेखन की भाषा ब्रजभाषा एवं खड़ीबोली हिन्दी है।

प्रश्न 9. ‘उतै चलि जात’ में किधर जाने की ओर संकेत है?
उत्तर- जिधर श्रीकृष्ण गये (मथुरा की ओर) उधर जाने का संकेत है।

प्रश्न 10. रितून को कंत’ किसे और क्यों कहा गया है?

उत्तर- ‘रितून को कंत’ बसंत को कहा गया है क्योंकि चारों तरफ सरसों के फूल खिले हुए हैं।

प्रश्न 11. गोपियाँ उद्धव से ज्ञान का उपदेश वापस ले जाने के लिए क्यों कह रही हैं?
उत्तर- गोपियाँ उद्धव से ज्ञान का उपदेश वापस लेने को इसलिए कह रही हैं क्योंकि ब्रज में उसको कोई ग्रहण नहीं करेगा। उनका मन श्रीकृष्ण के साथ चला गया है फिर वे कौन-से मन से उनके उपदेश को ग्रहण करें।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र किस युग के साहित्यकार हैं?
उत्तर- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र भारतेन्दु युग के साहित्यकार हैं।

प्रश्न 2. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को ‘भारतेन्दु’ की उपाधि से किसने सम्मानित किया?
उत्तर- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को ‘भारतेन्दु’ की उपाधि से तत्कालीन पत्रकारों ने सम्मानित किया।

 3. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की किन्हीं दो रचनाओं के नाम लिखिए।

उत्तर- ‘प्रेम-माधुरी’ और ‘प्रेम-तरंग’ ।

प्रश्न 4. ‘प्रेम-माधुरी’ भारतेन्दु जी की किस भाषा की रचना है?
उत्तर- ‘प्रेम माधुरी’ की रचना ब्रजभाषा में की गयी है।

प्रश्न 5. भारतेन्दु युग के उस कवि का नाम बताइए, जिसे खड़ीबोली को जनक कहा जाता है।
उत्तर- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ।

प्रश्न 6. निम्नलिखित में से सही उत्तर के सम्मुख सही (√) का चिह्न लगाइए-

(अ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र शुक्ल युग के कवि हैं।                                  (×)
(ब) अपनी भाषा में व्यक्त बातों को सभी समझ लेते हैं।                   (√)
(स) अपनी मातृभाषा ही सभी उन्नति का मूल है।                             (√)
(द) ‘कविवचन सुधा’ पत्रिका के सम्पादक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र थे।       (√)

काव्य-सौन्दर्य एवं व्याकरण-बोध

प्रश्न 1. निम्नलिखित पंक्तियों का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए-
(अ) परसों को बिताय दियो बरसों तरसों कब पांय पिया परसों।
(ब) पिय प्यारे तिहारे निहारे बिना, अँखियाँ दुखियाँ नहीं मानती हैं।
(स) बोलै लगे दादुर मयूर लगे नाचै फेरि ।
       देखि के संजोगी जन हिय हरसै लगे।
उत्तर-

  • (अ) काव्य-सौन्दर्य- 
    1. यहाँ पर कवि ने बसंत ऋतु के आगमन का सुन्दर वर्णन करते हुए गोपियों की विरह अवस्था का मर्मस्पर्शी चित्रण किया है। प्रकृति के उद्दीपन रूप का सजीव चित्रण है।
    2. अलंकार- अन्त्यानुप्रास, वृत्त्यनुप्रास।
    3. रस- विप्रलम्भ श्रृंगार।
    4. भाषा- साहित्यिक ब्रजभाषा।
    5. शैली- भावात्मक।
    6. छन्द- सवैया।
    7. गुण- माधुर्य ।
  • (ब) काव्य-सौन्दर्य- 
    1. यहाँ गोपियों की श्रीकृष्ण दर्शन की तीव्र लालसा का सुन्दर चित्रण है।
    2. अलंकार- अनुप्रास
    3. रस- वियोग श्रृंगार ।
    4. भाषा- साहित्यिक ब्रजभाषा।
    5. गुण- माधुर्य ।
    6. शैली- भावात्मक।
    7. छन्द- सवैया।
  • (स) काव्य-सौन्दर्य- 
    1. वर्षा ऋतु विरही जन के लिए दु:खद होती है। यह उद्दीपन का कार्य करती है। तुलसी ने भी कहा है

“घन घमण्ड नभ, गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा।”

प्रश्न 2. ‘कुकै लग कोइलैं कदंबन पै बैठि फेरि’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर- ‘कूकै लगीं’ कोइलैं कदंबन पै बैठि फेरि’ में वृत्त्यनुप्रास अलंकार है।

समुद्र में लहरों को ढूँढना- प्रेम के पथ भ्रान्तियों से भरे है ।

शनिवार, 20 नवंबर 2021

द्रोपदी के अतिरिक्त पाण्डवों की अन्य पत्नियाँ-

मुझे इस तस्वीर से आपत्ति है... मुझे तस्वीर में दर्शाया गया झूठ से आपत्ति है !

द्रौपदी को दांव पर लगाया गया यह सच है. लेकिन भरी सभा में भरी दरबार में उसे नग्न किया गया यह सरासर झूठ है !

ध्यान रखना भरी सभा में द्रौपदी, युवराज सूर्योधन को कटघरे में नही खड़ी कर रही है. द्रौपदी अपने जेष्ठ पति जुआरी युधिष्ठिर को कटघरे में खड़ी कर रही है. द्रौपदी के कुछ वाजिब सवाल ?

1 - क्या दांव पर लगाने से पहले पांचों भाईयों ने उससे स्वीकृति ली ?
2 - जो व्यक्ति खुद हार गया हो, जीतने वाले का दास गुलाम बन गया हो. भला एक हारा हुआ व्यक्ति किसी दूसरे को कैसे दांव पर लगा सकता है ?

प्रश्न तो मेरे मन में भी उठ रहा है. शराबी जुआड़ी युधिष्ठिर ने केवल द्रौपदी को क्यों दांव पर क्यों लगाया ?. युधिष्ठिर ने अपनी पत्नी देविका को क्यों नही दांव पर लगाया. चलो मान लेते हैं द्रौपदी को जुआ में हार गया. द्रौपदी को हारने के बाद देविका, बलंधरा, करेनुमाती, विजया, सुभद्रा, उलूपी और चित्रांगदा को क्यों नही दांव पर लगाया ?

युधिष्ठिर ने यह क्यों कहा जुआ में दांव पर लगाने के लिए अब उसके पास कुछ नही है !

भीम की पत्नी - बलंधरा. नकुल की पत्नी - करेनुमाती. सहदेव की पत्नी - विजया. अर्जुन की पत्नी - सुभद्रा, उलूपी और चित्रांगदा थी. इन पांचों भाइयों ने दूसरी तीसरी ना जाने कितनी शादियां की थी !

पांचों भाईयों ने द्रौपदी के अलावा अन्य किसी महिला को साझा नही किया. इसका अर्थ है पांचों की नजर में द्रौपदी रखैल थी. जिसकी कोई इज्जत नही, जिसकी इज्जत जाने से कोई फर्क ना पड़ता हो !

पांचों भाई कोई दूध पीते बच्चे तो नही थे. उन्हें भली भांति पता था जुआ में किसी स्त्री को हरने का अर्थ है जितने वाला पुरुष जीती हुई स्त्री से संभोग करेगा, बलात्कार करेगा. यह सब करने के लिए स्त्री को नग्न करना आवश्यक है !

लेकिन ऐसा कुछ हुआ नही. द्रौपदी जुआ के दांव पेंच में हार गई यह हक़ीक़त है. इस हक़ीक़त को ब्राह्मण लेखकों सही से लिखा इसमें मिलावट हो ही नही सकती. परंतु हारने के बाद दुख यातना पर लिखने के लिए लेखक को यहां थोड़ी स्वतंत्रता मिल जाती है. इसी फायदा ब्राह्मण लेखकों ने उठाया !

अपनी कलम से द्रौपदी को भरी सभा में दुशासन के हाथों नग्न कर दिया. द्रौपदी तो उसी वक़्त नग्न कर दी गई जब पांचों जुआड़ी भाइयों ने अपनी अपनी पत्नियों की रक्षा कर द्रौपदी को दांव पर लगा दिया !

युवराज सूर्योधन के बिनती पर सम्राट धृतराष्ट्र ने पांचों भाईयों को हारा हुआ सब कुछ, अस्त्र शस्त्र धन संपत्ति सब लौटा दिया !

जिन्होंने इन पांचों भाईयों, इनकी आने वाली पीढ़ी को गुलामी प्रथा से आज़ाद कर दिया. उस परिवार का एहसानमंद होने के बजाय राज्य धन संपत्ति के लिए खून के प्यासे बन गए !


महाभारत भारत के इतिहास का एक खंड है।
* इस रहस्यमयी ग्रंथ में उलझे हुए रिश्तों की कहानियां है।
* जानिए द्रौपदी के पुत्र और पांडवों के अन्य पुत्र एवं पत्नियों के नाम।
* द्रौपदी ने पांच पांडवों से विवाह किया था।
* उन्होंने एक-एक वर्ष के अंतराल से पांचों पांडव के एक-एक पुत्र को जन्म दिया था।
* द्रौपदी से जन्मे युधिष्ठिर के पुत्र का नाम प्रतिविन्ध्य था। द्रौपदी से जन्मे भीमसेन से उत्पन्न पुत्र का नाम सुतसोम था।
* द्रौपदी से जन्मे अर्जुन के पुत्र का नाम श्रुतकर्मा था।
* द्रौपदी से जन्मे नकुल के पुत्र का नाम शतानीक था। और
* द्रौपदी से जन्मे सहदेव के पुत्र का नाम श्रुतसेन था।
 
''पांच पांडवों की अन्य पत्नियां''
 
1. युधिष्ठिर :
युधिष्ठिर की दूसरी पत्नी देविका थी। देविका से धौधेय नाम का पुत्र जन्मा।
2. अर्जुन :
द्रौपदी के अलावा अर्जुन की सुभद्रा, उलूपी और चित्रांगदा नामक तीन और पत्नियां थीं।
सुभद्रा से अभिमन्यु, उलूपी से इरावत, चित्रांगदा से वभ्रुवाहन नामक पुत्रों का जन्म हुआ।
3. भीम :
द्रौपदी के अलावा भीम की हिडिम्‍बा और बलन्धरा नामक दो और पत्नियां थीं।
हिडिम्‍बा से घटोत्कच और बलन्धरा से सर्वंग का जन्म हुआ।
4. नकुल :
द्रौपदी के अलावा नकुल की करेणुमती नामक पत्नी थीं।
करेणुमती से निरमित्र नामक पुत्र का जन्म हुआ।
5. सहदेव :
सहदेव की दूसरी पत्नी का नाम विजया था जिससे इनका सुहोत्र नामक पुत्र



गुरुवार, 18 नवंबर 2021

आर्य का अर्थ योद्धा श्रीमद्भगवद्गीता में


श्लोकःश्रीमद्भगवद्गीता-

सञ्जय उवाच.                                             तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥ १ ॥

पदच्छेदः

तम्, तथा, कृपया, आविष्टम्, अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । विषीदन्तम्, इदम्, वाक्यम्, उवाच, मधुसूदनः ॥

अन्वयः

मधुसूदनः तथा कृपया आविष्टम् अश्रुपूर्णाकुलेक्षणं विषीदन्तं तम् इदं वाक्यम् उवाच ।

शब्दार्थः



अन्वयः
विवरणम्संस्कृत में अर्थ
मधुसूदनःअ.पुं.प्र.एक.श्रीकृष्णः
तथाअव्ययम्तेन प्रकारेण
कृपयाआ.स्त्री.तृ.एक.दयया
आविष्टम्अ.नपुं.द्वि.एक.आक्रान्तम्
अश्रुपूर्णाकुल ईक्षणम्अ.नपुं.द्वि.एक.बाष्पपूर्णनेत्रम्
विषीदन्तम्विषीदत्-त.पुं.द्वि.एक.दुःखितम्
तम्तद्-द.सर्व.पुं.द्वि.एक.तम् (अर्जुनम् )
इदम्इदम्-म.सर्व.नपुं.द्वि.एक.एतत्
वाक्यम्अ.नपुं.द्वि.एक.वचनम्
उवाच√वच् परिभाषणे-पर.कर्मणि, लिट्.प्रपु.एक.अवदत् ।

व्याकरणम्-

सन्धिः- 

  1. कृपयाविष्टम् = कृपया + आविष्टम् - सवर्णदीर्घसन्धिः

समासः

  1. अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् = अश्रुभिः पूर्णे अश्रुपूर्णे – तृतीयातत्पुरुषः ।
  2. अश्रुपूर्णे च आकुले च = अश्रुपूर्णाकुले – कर्मधारयः ।

कृदन्तः

  1. विषीदन्तम् = वि + सद् + शतृ (कर्तरि) तम् ।
  2. आविष्टम् = आ + विश् + क्त (कर्तरि) तम् ।
  3. मधुसूदनः = मधुं (तन्नामकं) दैत्यं सूदयति इति मधुसूदनः ।
  4. मधु + सूद् + णिच् (स्वार्थे) + ल्यु (अन)

अर्थः

भगवान् श्रीकृष्णः अर्जुनस्य शोचनीयाम् अवस्थां दृष्टवान् । ततः दयया आक्रान्तं शोकं च अनुभवन्तं तं सः एवम् उक्तवान् ।

भावार्थः-

'तं तथा कृपयाविष्टम्' – अर्जुनः रथे सारथित्वेन स्थितं श्रीकृष्णम् आज्ञापयति यत्, "हे अच्युत ! रथं मे उभयोः सेनयोः मध्ये स्थापय, येनाहं विरोधपक्षस्य के योद्धारः मया सह योत्स्यन्ति इति द्रष्टुं शक्नोमि" इति । अर्थात् मत्सदृशेन शूरवीरेण सह के योद्धुं साहसं कुर्वन्तः सन्ति ? स्वकालं (मां) सम्मुखं दृष्ट्वापि के योद्धुं तत्पराः सन्ति ? एतादृशेन उत्साहेन परिपूर्णः अर्जुनः स्वपरिवारस्य जनानां मृत्योः आशङ्कायां मोहग्रसितः अभवत् । मोहग्रसितस्य शोकातुरस्य तस्य शरीरं दुर्बलम् अभवत्, तस्य मुखं शुष्कं जातं, शरीरे कम्पनम् उद्भूतं, हस्तात् धनुः अस्रंसत च । अत्र "न दैन्यं न पलायनम्" इति स्वभावयुक्तः अर्जुनः कापुरुषत्वं प्रदर्श्य व्याकुलतया सह रथस्य पृष्ठभागे अवस्थितः इति आश्चर्यभावः सञ्जयेन बहुधा रक्षितः ।

पूर्वमपि अर्जुनस्य भावान् प्रत्यक्षीकुर्वन् सञ्जयः अर्जुनस्य कृते "कृपया परयाविष्ट" इत्यस्य पदस्य उपयोगम् अकरोत् । अत्र "अश्रूपूर्णकुलेक्षणम्" इत्यनेन पदेन महतः शूरवीरस्य अर्जुनस्य मनसि अपि कौटुम्बिकः मोहः समुद्भूतः इति प्रदर्शितम् । सः मोहः अपि सामान्यः न । तेन मोहेन ग्रस्तस्य तस्य शूरवीरस्य नेत्रयोः अश्रूणि निर्गतानि । अश्रूपूर्णनेत्राभ्यां सः किमपि स्पष्टतया द्रष्टुम् असमर्थः अभवत् ।

"विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः" – एवं कापुरुषतायाः कारणेन शोकमग्नम् अर्जुनं मधुसूदनः एतादृशानि वचनानि अकथयत् । अत्र "विषीदन्तमुवाच" इत्युक्ते एव "इदं वाक्यम्" इत्यस्यार्थः अन्तर्भवति । यतः "उवाच" इत्यनेन क्रियापदेन एव "वाक्यम्" इत्यस्य अवबोधः जायते एव । तर्हि अत्र "वाक्यम्" इत्यस्य पदस्य भिन्नतया उपयोगस्य किं प्रयोजनम् ? अस्य प्रश्नस्य उत्तरमस्ति यत्, भगवतः वचनानि अद्भुतानि सन्ति । अर्जुनस्य मनसि धर्मस्य आवरणं धृत्वैव कर्तव्यत्यागरूपी दोषः समुद्भूतः अस्ति । तस्मिन् दोषे भगवतः एतानि वचनानि साक्षादाघातं करिष्यन्ति । भगवतः वचनानि अर्जुनस्य मनसि स्वदोषस्य अनुभूतिं कारयित्वा स्वकल्याणस्य जिज्ञासाम् उद्भावयिष्यन्ति । भगवतः गभीरवचनानि श्रुत्वैव अग्रे अर्जुनः शिष्यत्वेन श्रीकृष्णस्य सान्निध्यं स्वीकरोति  ।

सञ्जयः अस्मिन् श्लोके श्रीकृष्णस्य कृते "मधुसूदनः" इति पदम् उपायुङ्क्त । तस्य तात्पर्यम् अस्ति यत्, भगवान् श्रीकृष्णः "मधु"-आख्यस्य राक्षसस्य हन्ता अस्ति । अर्थात् दुष्टस्वभावयुक्तानां संहारकः अस्ति । अतः सः दुष्टस्वभावयुक्तानां दुर्योधनादीनां नाशं कारयिष्यति एव इति ततात्पर्यम् ।

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              ।श्रीभगवानुवाच |

(कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् |
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन || 2||)

परमात्मा ने कहा: तुझको कहाँ से यह मूर्च्छा विषम परिस्थितियों में उत्पन्न हुई है। 

यह अनार्य (जो वीर न हो) उसके अनुकूल है। यह न  स्वर्ग को देने वाला और नहीं यश को देने वाला।   

 शब्द का अर्थ:-

श्रीभगवानुवाच  -  परमात्मा ने कहा
कुतः - कहां से
त्वां - आप को
कश्मल -पाप ।
इदं - यह
विषमे - विषम स्थति में।
समुपस्थितम् -। उपस्थित हुए को।
अनार्य - ।कायर अनाड़ी जो युद्ध से भागे।
जुष्टम - । अवशिष्ट
अस्वर्ग्यम - जो उच्च निवास स्थान स्वर्ग को  नहीं देता है
अकीर्तिकरम -! अपयश करने वाले को।  
अर्जुन - हे अर्जुन !


श्रीमद्भगवद्गीतायाः श्लोकाः
Orange animated left arrow.gif★-श्रीमद्भगवद्गीता।

सोमवार, 15 नवंबर 2021

वेद में पत्थर पूजा और सूर्यग्रहण का वर्णन-

       

वेद स्वयं मूर्तिपूजा के समर्थक हैं । अनेक वेद-मंत्र इसकी साक्षी देते है।
देखिये – अथर्ववेद 3/10/3 में उल्लेख है-

(संवत्सरस्य प्रतिमा याँ त्वा रात्र्युपास्महे।           सा न आयुश्मतीं प्रजाँ रायस्पोशेण संसृज॥”)

“अर्थात् “ हे रात्रे ! संवत्सर की प्रतिमा ! हम तुम्हारी उपासना करते हैं। तुम हमारे पुत्र-पौत्रादि को चिर आयुष्य बनाओ और पशुओं से हमको सम्पन्न करो।”

अथर्ववेद 2/13/4 में प्रार्थना है-

(एह्याश्मा तिष्ठाश्मा भवतु ते तनूः )

  “हे भगवान! आइये और इस पत्थर की बनी मूर्ति में अधिष्ठित होइये। आपका यह शरीर पत्थर की बनी मूर्ति हो जाये।”

(मा असि प्रमा असि प्रतिमा असि | [तैत्तीरिय प्रपा० अनु ० ५ ])

हे महावीर तुम ईश्वर की प्रतिमा हो |

(सह्स्त्रस्य प्रतिमा असि | [यजुर्वेद १५.६५]) 

हे परमेश्वर , आप सहस्त्रो की प्रतिमा [मूर्ति ] हैं |

(अर्चत प्रार्चत प्रिय्मेधासो अर्चत | (अथर्ववेद-20.92.5)

हे बुद्धिमान मनुष्यों उस प्रतिमा का पूजन करो,भली भांति पूजन करो |

 (ऋषि नाम प्रस्त्रोअसि नमो अस्तु देव्याय प्रस्तराय| [अथर्व ० १६.२.६ ]) 

हे प्रतिमा,, तू ऋषियों का पाषण है तुझ दिव्य पाषण के लिए नमस्कार है |

गणपति अथर्व शीर्षम् की फलश्रुती है-

(“सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासन्निधौ वा जप्त्वा सिद्धमनत्रो भवति ।।”)

– सूर्यग्रहणके समय महानदीमें अथवा प्रतिमा के निकट इस उपनिषद्का जप करके साधक सिद्धमन्त्र हो जाता है ।

इसी प्रकार देवी अथर्वशीर्षम् की फलश्रुती है –

(निशीथे तुरीयसन्ध्यायां जप्त्वा वाक्सिद्धिर्भवति । नूतनायां प्रतिमायां जप्त्वा देवतासान्निध्यं भवति । प्राणप्रतिष्ठायां जप्त्वा प्राणानां प्रतिष्ठा भवति ।।)

प्रतिमा में शक्ति का अधिष्ठान किया जाता है, प्राणप्रतिष्ठा की जाती है। सामवेद के 36 वें ब्राह्मण में उल्लेख है-

(“देवतायतनानि कम्पन्ते दैवतप्रतिमा हसन्ति। रुदान्त नृत्यान्त स्फुटान्त स्विद्यन्त्युन्मालान्त निमीलन्ति॥)

अर्थात्- देवस्थान काँपते हैं, देवमूर्ति हँसती, रोती और नृत्य करती हैं, किसी अंग में स्फुटित हो जाती है, वह पसीजती है, अपनी आँखों को खोलती और बन्द भी करती है।

“कपिल तंत्र” में इस भाव की पुष्टि करते हुए कहा गया है-”जिस तरह गाय के सारे शरीर में उत्पन्न होने वाला दुग्ध केवल उसके स्तनों के द्वारा ही बाहर निकलता है, इसी तरह परमात्मा की सर्वव्यापक शक्ति का अधिष्ठान मूर्ति में होता है।

 इस तरह से साधक यह विचार करता है कि वह उस पत्थर निर्मित मूर्ति की उपासना नहीं कर रहा है, वरन् वह उस अनन्त शक्ति की पूजा कर रहा है जो उस मूर्ति में विद्यमान है। बाह्य दृष्टि से दिखाई देता है कि वह प्रतिमा की पूजा कर रहा है परन्तु वास्तव में तो वह उस सर्वव्यापी शक्ति की उपासना कर रहा होता है।

इसके अतिरिक्त वैदिक ऋचाओं में भी ग्रावण को देवता ही मान लया
 है।
ऋग्वेद में 'सोमलता' को कूटकर उससे 'सोमरस' निकाले जाने का स्थान स्थान पर उल्लेख है। सोमलता को कूटने वाले पत्थरों (सिलबट्टा) को 'ग्रावाण्' कहा गया है। 

ग्रावा को देवता मानते हुए उनकी स्तुति में रचा गया 10 वें मण्डल का सूक्त-
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निम्नलिखित ऋचा में ग्रावाण् देवता की स्तुति है 
सोम लता को पीसने वाला प्रस्तर ही यहाँ ग्रावाण् है ।
पद पाठ

प्र । वः॒ । ग्रा॒वा॒णः॒ । स॒वि॒ता । दे॒वः । सु॒व॒तु॒ । धर्म॑णा । धूः॒ऽसु । यु॒ज्य॒ध्व॒म् । सु॒नु॒त ॥ १०.१७५.१

ऋग्वेद †  मण्डल:10★सूक्त:175★ ऋचा:1 
 
-(ग्रावाणः) हे प्रस्तरो ! (वः) तुम्हें (सविता देवः) सूर्यदेव। ।
 (धर्मणा) धर्म से (प्र सुवतु) प्रसव करे (धूर्षु) धुराओं में (युज्यध्वम्) नियुक्त हो जाओ। (सुनुत) अभिषवन करो ॥१॥
_____________
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ग्रावा॑णो॒ अप॑ दु॒च्छुना॒मप॑ सेधत दुर्म॒तिम् । उ॒स्राः क॑र्तन भेष॒जम् ॥

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:175» ऋचा:2 

पदान्वय व अनुवाद:
 -(ग्रावाणः) हे प्रस्तरो ! (दुच्छुनाम्)दुत्+शुनाम् दुष्ट कुत्तों को  (अपसेधत) दूर भगाओ (दुर्मतिम्-अप) उसकी दुर्मति का नाश करो (उस्राः) गौवों के लिए (भेषजम्) स्वास्थ्य (कर्तन) करो ॥२॥

ग्रावा॑ण॒ उप॑रे॒ष्वा म॑ही॒यन्ते॑ स॒जोष॑सः । वृष्णे॒ दध॑तो॒ वृष्ण्य॑म् ॥

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:175» ऋचा3 |

 -(ग्रावाणः)  हे सिलबट्टो! (सजोषसः) समानप्रीतियुक्त हुए (वृष्णे) वृषभ के लिए (वृष्ण्यम्) बल को (दधतः) धारण कराते हुए प्रदान कराते हुए (उपरेषु) उपरी  स्थानों पर (आ महीयन्ते) स्तुति करते हैं ॥३॥

स+जुष--भावे घञ् । १ प्रीतौ २ सेवने च “को वां जोष उभयोः” ऋ० १ । १२० । १ । ३ सुखे न० शब्दरत्नावलि ।

ग्रावन्= ग्रसते ग्रस--ड ग्रः आवनति वन--संभक्तौ विच् कर्म० । १ प्रस्तरे, २ पर्व्वते, अमरः ३ मेघे घिश्वः । ३ दृढ़े त्रि० शब्दरत्नावलि । 
“श्रोता ग्रावाणोविदुषो न यज्ञम्” यजु० ६ । २६ । “मूर्द्ध्नि ग्राव्णां जर्जरा निर्झरौवाः” माघः । “ग्रावसु संमुखेष्वधिनिदधाति क्षत्रं वै सोमोविशोग्रावाणः” शत० व्रा० ३ । ९ । ३ । ३ ।
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संज्ञा पुं० [सं० ग्रावन्] १. पत्थर । ओला । बिनौरी । ३. पर्वत । पहाड़ । ४. बादल
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दे
अर्बुदः कार्द्रवेयः


प्र वो ग्रावाणः सविता देवः सुवतु धर्मणा ।
धूर्षु युज्यध्वं सुनुत ॥१॥


ग्रावाणो अप दुच्छुनामप सेधत दुर्मतिम् ।
उस्राः कर्तन भेषजम् ॥२॥


ग्रावाण उपरेष्वा महीयन्ते सजोषसः ।
वृष्णे दधतो वृष्ण्यम् ॥३॥


ग्रावाणः सविता नु वो देवः सुवतु धर्मणा ।
यजमानाय सुन्वते ॥४॥

सायणभाष्यम्

‘प्र वः' इति चतुर्ऋचं चतुर्विंशं सूक्तं गायत्रम् । अर्बुदस्य सर्पर्षेः पुत्र ऊर्ध्वग्रावा नामर्षिः । सोमाभिषवार्था ग्रावाणो देवता । तथा चानुक्रान्तं-प्र वश्चतुष्कमूर्ध्वग्रावार्बुदिर्ग्राव्णोऽस्तौद्गायत्रम्' इति । ग्रावस्तोत्र एतत्सूक्तम् । सूत्रितं च--- आ व ऋञ्जसे प्र वो ग्रावाण इति सूक्तयोः' ( आश्व. श्रौ. ५. १२) इति । यद्वा । इदमेकमेव सूक्तं ग्रावस्तोत्रम् । सूत्र्यते हि---* प्र वो ग्रावाण इत्येक उक्तं सर्पणम्' (आश्व. श्रौ. ५. १२ ) इति । ।


प्र वो॑ ग्रावाणः सवि॒ता दे॒वः सु॑वतु॒ धर्म॑णा ।

धू॒र्षु यु॑ज्यध्वं सुनु॒त ॥१

प्र । वः॒ । ग्रा॒वा॒णः॒ । स॒वि॒ता । दे॒वः । सु॒व॒तु॒ । धर्म॑णा ।

धूः॒ऽसु । यु॒ज्य॒ध्व॒म् । सु॒नु॒त ॥१

प्र । वः । ग्रावाणः । सविता । देवः । सुवतु । धर्मणा ।

धू:ऽसु । युज्यध्वम् । सुनुत ।। १ ॥

हे vग्रावाणः सोमाभिषवार्थाः पाषाणाः वः युष्मान् सविता प्रेरकः "देवः vधर्मणा आत्मीयेन धारणेन कर्मणा vप्र vसुवतु अभिषवार्थं प्रेरयतु । ' षू प्रेरणे' । तौदादिकः । यूयं च "धूर्षु अभिषवस्थानेषु प्राच्यादिमहादिक्षु "युज्यध्वं युक्ता भवत । अनन्तरं सुनुत अभिषुणुत सोमम् ॥


ग्रावा॑णो॒ अप॑ दु॒च्छुना॒मप॑ सेधत दुर्म॒तिम् ।

उ॒स्राः क॑र्तन भेष॒जम् ॥२

ग्रावा॑णः । अप॑ । दु॒च्छुना॑म् । अप॑ । से॒ध॒त॒ । दुः॒ऽम॒तिम् ।

उ॒स्राः । क॒र्त॒न॒ । भे॒ष॒जम् ॥२

ग्रावाणः । अप। दुच्छुनाम् । अप । सेधत । दुःऽमतिम् ।

उस्राः । कर्तन । भेषजम् ।।२।।

हे "ग्रावाणः vदुच्छुनां दुःखकारिणीं शत्रुभूतां प्रजाम् अप vसेधत अस्मत्तोऽपगमयत । * षिधु गत्याम्'। तथा दुर्मतिं दुष्टाभिसंधिं च vअप सेधत । vभेषजं सुखमस्माकं यथा भवति तथा vउस्राः गाः vकर्तन कुरुत ॥ करोतेश्छान्दसो विकरणस्य लुक् ।' तप्तनप्तनथनाश्च' इति तनबादेशः ॥


ग्रावा॑ण॒ उप॑रे॒ष्वा म॑ही॒यन्ते॑ स॒जोष॑सः ।

वृष्णे॒ दध॑तो॒ वृष्ण्य॑म् ॥३

ग्रावा॑णः । उप॑रेषु । आ । म॒ही॒यन्ते॑ । स॒ऽजोष॑सः ।

वृष्णे॑ । दध॑तः । वृष्ण्य॑म् ॥३

ग्रावाणः । उपरेषु । आ । महीयन्ते । सजोषसः ।

वृष्णे । दधतः । वृष्ण्यम् ।। ३ ।।

vग्रावाणः दिक्ष्ववस्थिताः पाषाणाः सजोषसः सह प्रीयमाणाः संगताः सन्तो वा उपरेषु । उपरो नामाभिषवाय चतुर्णां ग्राव्णां मध्ये स्थापितो विस्तृतः पाषाणः । प्रदेशापेक्षं बहुवचनम् । उपरस्य प्रान्तेषु vमहीयन्ते प्रकाशन्ते । आकारः पूरणः । किं कुर्वन्तः । Vवृष्णे वर्षित्रे सोमाय vवृष्ण्यं वीर्यं दधतः प्रयच्छन्तः ॥


ग्रावा॑णः सवि॒ता नु वो॑ दे॒वः सु॑वतु॒ धर्म॑णा ।

यज॑मानाय सुन्व॒ते ॥४

ग्रावा॑णः । स॒वि॒ता । नु । वः॒ । दे॒वः । सु॒व॒तु॒ । धर्म॑णा ।

यज॑मानाय । सु॒न्व॒ते ॥४

ग्रावाणः । सविता । नु। वः । देवः । सुवतु । धर्मणा ।

यजमानाय । सुन्वते ।। ४ ।।

vदेवः दानादिगुणयुक्तः सविता हे ग्रावाणः Vवः युष्मान् vधर्मणा आत्मीयेन धारणेन 'नु क्षिप्रं "सुवतु अभिषवे प्रेरयतु । किमर्थम् । सुन्वते सोमाभिषवं कुर्वते यजमानाय यजमानार्थम् । तस्य'आओ! वेद को जानें' (2)

      "ऋग्वेद में सूर्यग्रहण"     

ऋग्वेद के पाँचवें मण्डल के चालीसवें सूक्त की ऋचा संख्या 5 से 9 तक में सूर्यग्रहण से सम्बन्धित उल्लेख मिलता है।


"यत्त्वा सूर्य स्वर्भानुस्तमसाविध्यदासुरः ।
अक्षेत्रविद्यथा मुग्धो भुवनान्यदीधयुः ॥५॥

स्वर्भानु: राहु का एक नाम है , जो व्यक्ति आरोही नोड, ग्रहण का कारण है; वह कश्यप का एक पुत्र था , जो दानवों या असुरों की माता दनु द्वारा दिया गया था ; हिरण्यकशिपु की बहन सिंहिका द्वारा एक और संबंधपरक तर्क उसे विप्रचिती का पुत्र बनाता है।

अर्थ- हे सूर्य! जब स्वर्भानु नामक असुर ने तुम्हें माया निर्मित अन्धकार से ढक लिया था, तब सभी लोक अंधकार पूर्ण हो गए थे। वहाँ के निवासी मूढ़ होकर अपने-2 स्थान को भी नहीं जा पा रहे थे।

स्वर्भानोरध यदिन्द्र माया अवो दिवो वर्तमाना अवाहन् ।
गूळ्हं सूर्यं तमसापव्रतेन तुरीयेण ब्रह्मणाविन्ददत्रिः ॥६॥

अर्थ- हे इन्द्र ! जब तुमने सूर्य के नीचे वाले स्थान में फैली हुई स्वर्भानु की दिव्य माया को दूर भगा दिया था, तब अन्धकार में ढके सूर्य को अत्रि ऋषि ने चार ऋचाएँ बोलकर प्राप्त किया था।

मा मामिमं तव सन्तमत्र इरस्या द्रुग्धो भियसा नि गारीत् ।
त्वं मित्रो असि सत्यराधास्तौ मेहावतं वरुणश्च राजा ॥७॥

अर्थ- सूर्य ने अत्रि से कहा- "हे अत्रि! इस प्रकार की अवस्था में पड़ा हुआ मै तुम्हारा सेवक हूँ। इस अन्न की इच्छा वाले असुर भयजनक अन्धकार द्वारा मुझे न निगल लें। तुम मेरे मित्र और सत्य का पालन करने वाले हो। तुम मेरी रक्षा करो।

ग्राव्णो ब्रह्मा युयुजानः सपर्यन्कीरिणा देवान्नमसोपशिक्षन् ।
अत्रिः सूर्यस्य दिवि चक्षुराधात्स्वर्भानोरप माया अघुक्षत् ॥८

यं वै सूर्यं स्वर्भानुस्तमसाविध्यदासुरः ।
अत्रयस्तमन्वविन्दन्नह्यन्ये अशक्नुवन् ॥९॥

ऋग्वेदः मण्डल_5/40/5 

उपर्युक्त ऋचाओं में निसन्देह सूर्यग्रहण का ही उल्लेख है। जिसे तब खगोलीय ज्ञान के अभाव में  आसुरी  प्रकोप माना गया है। और जिसका निवारण भी तंत्र-मंत्र में ही तलाशा गया है। सूर्य से हटती छाया को अनुष्ठानिक प्रभाव का प्रतिफल माना जाता रहा होगा। आज भी वैदिक मान्यताओं का पोषक समाज, समस्याओं के निदान हेतु यज्ञादि अनुष्ठानों में दैवीय शक्ति व दैवीय चमत्कार में विश्वास रखता है। जबकि हक़ीक़त में ऐसा कुछ भी नहीं होता. यागनिष्पत्तय इत्यर्थः ॥३

वस्तुतः यज्ञ आदि क्रियाओं का मूल्यांकन आध्यात्मिक स्तर पर कदापि नहीं करना चाहिए क्योंकि अध्यात्म कर्मकाण्ड रहित मनस्साधना है।

िसके लिए आचरण और विचारों की पवित्रता आवश्यक है।

सायणभाष्य-

ऋग्वेद का अध्ययन करते हुए अन्ततः पाँचवें मण्डल के चालीसवें सूक्त की ऋचा संख्या 5 से 9 तक में सूर्यग्रहण से सम्बन्धित उल्लेख है 

(५)अर्थ- हे सूर्य! जब स्वर्भानु नामक असुर ने तुम्हें माया निर्मित अन्धकार से ढक लिया था, तब सभी लोक अंधकार पूर्ण हो गए थे। वहाँ के निवासी मूढ़ होकर अपने-2 स्थान को भी नहीं जा पा रहे थे।

(६)अर्थ- हे इन्द्र! जब तुमने सूर्य के नीचे वाले स्थान में फैली हुई स्वर्भानु की दिव्य माया को दूर भगा दिया था, तब अन्धकार में ढके सूर्य को अत्रि ऋषि ने चार ऋचाएँ बोलकर प्राप्त किया था।

(७)अर्थ- सूर्य ने अत्रि से कहा- "हे अत्रि! इस प्रकार की अवस्था में पड़ा हुआ मै तुम्हारा सेवक हूँ। इस अन्न की इच्छा वाले असुर भयजनक अन्धकार द्वारा मुझे न निगल लें। तुम मेरे मित्र और सत्य का पालन करने वाले हो। तुम मेरी रक्षा करो।

(८)अर्थ- ब्राह्मण अत्रि ने सूर्य को उपदेश दिया। इन्द्र के निमित्त सोम निचोड़ने हेतु पत्थरों को आपस में रगड़ा। स्तोत्रों द्वारा देवों की सेवा एवं अपने मन्त्रों के बल से सूर्य रूपी नेत्र को अंतरिक्ष में स्थापित किया। अत्रि ने स्वर्भानु की माया को दूर कर दिया।


(९)अर्थ- स्वर्भानु नामक असुर ने जिस सूर्य को अन्धकार द्वारा जकड़ लिया था, अत्रि ने उसे स्वतन्त्र किया। अन्य किसी में इतनी शक्ति नहीं थी।

उपर्युक्त ऋचाओं में निसन्देह सूर्यग्रहण का ही उल्लेख है।

 जिसे तब खगोलीय ज्ञान के अभाव में दैवीय असुर का प्रकोप माना गया है। और जिसका निवारण भी तंत्र-मंत्र में ही तलाशा गया है। सूर्य से हटती छाया को अनुष्ठानिक प्रभाव का प्रतिफल माना जाता रहा होगा। आज भी वैदिक मान्यताओं का पोषक समाज, समस्याओं के निदान हेतु यज्ञादि अनुष्ठानों में दैवीय शक्ति व दैवीय चमत्कार में विस्वास रखता है। जबकि हक़ीक़त में ऐसा कुछ भी नहीं होता.

(1)

हे इन्द्र “आ “याहि अस्मद्यज्ञमागच्छ । आगत्य च हे “सोमपते सोमस्य स्वामिन्निन्द्र “अद्रिभिः ग्रावभिः “सुतं अभिषुतं “सोमं पिब । हे "वृषन् फलस्य वर्षयितः “वृत्रहन्तम अतिशयेन शत्रूणां हन्तृतम "वृषभिः वर्षकैर्मरुद्भिः सहा याहि पिब च।

(2)

“ग्रावा अभिषवसाधनः पाषाणः “वृषा वर्षकः सोमरसस्य फलस्य वा। "मदः सोमपानेन जनितः “वृषा वर्षकः । “अयं "सुतः अभिषुतः “सोमः "वृषा तं सोमं “वृषभिः सह पिब ।।

(3)

हे “वज्रिन् वज्रवन् “इन्द्र “वृषा सोमरसस्य सेक्ताहं “वृषणं त्वां “हुवे आह्वयामि । किमर्थम् । “चित्राभिः चायनीयाभिः "ऊतिभिः रक्षाभिर्निमित्तभूताभिः । शिष्टं गतम् ॥

‘ऋजीषी वज्री ' इत्येषा ब्राह्मणाच्छंसिनः शस्त्रयाज्या।' ऋजीषी वज्री वृषभस्तुराषाळिति याज्या ' ( आश्व. श्रौ. ५, १६ ) इति हि सूत्रितम् ॥

(4)

“ऋजीषी । सवनद्वयेऽभिषुतस्य गतसारस्य सोमस्य तृतीयसवने आप्यायाभिषुतः योऽस्ति स ऋजीषः सोमः । सोऽस्यास्तीत्यृजीषी । “वज्री वज्रवान् “वृषभः वर्षिता “तुराषाट् तुराणां त्वरमाणानां शत्रूणां सोढा “शुष्मी बलवान् “राजा ईश्वरः सर्वस्य "वृत्रहा वृत्रस्य हन्ता “सोमपावा सोमरसस्य पाता एवं महानुभाव इन्द्रः “हरिभ्यां “युक्त्वा रथं योजयित्वा “उप “यासत् उपगच्छतु । "अर्वाङ् अस्मदभिमुखमागच्छतु । आगत्य च “माध्यंदिने “सवने मत्सत् माद्यतु सोमेन “इन्द्रः ॥

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(5)

इदमादिचतुर्भिर्मन्त्रैः अत्रीणां कर्म कीर्त्यते । हे “सूर्य प्रेरक देव “त्वा त्वां “यत् यदा "आसुरः असुरस्य प्राणापहर्तुरसुर्या वा पुत्रः “स्वर्भानुः स्वर्भानुसंज्ञकः “तमसा मायानिर्मितेन “अविध्यत् आवृणोदित्यर्थः । तदा “भुवनानि सर्वाणि "अदीधयुः दृश्यन्ते । “यथा तत्रत्यः सर्वो जनः “अक्षेत्रवित् स्वस्वस्थानमजानन् “मुग्धः मूढो भवति तथा ॥११ ॥

(6)

“अध अथ जगन्मौढ्यानन्तरं “स्वर्भानोः असुरस्य “यत् याः “मायाः सन्ति । कीदृश्यस्ताः ।। “दिवः द्योतमानादादित्यात् “अवः अवस्तात् वर्तमानाः । तदुपरितिरोधानासामर्थ्यादिति भावः । हे "इन्द्र ताः सर्वाः "अवाहन अवहंसि । अथात्रेरेव परोक्षवादः । "तमसा अन्धकारेण "अपव्रतेन अपगतकर्मणा "गूळ्हं "सूर्यम् । अन्धकारस्यावरणरूपत्वादपव्रतत्वम् । तथाविधं "तुरीयेण “ब्रह्मणा ‘ग्राव्णो ब्रह्मा' इत्यनेन "अत्रिः "अविन्दत् लब्धवान् । आवरणापगमोपायं निरावरणं शुद्धं वा सूर्यमिति । पूर्वमन्त्रापेक्षया अस्य तुरीयत्वम् । एकैकं मायांशमेकैकेन मन्त्रेणापनोद्य चतुर्थेन मन्त्रेण निलीनं तमोऽप्यनुददित्यर्थः ॥

(7)

इदं सूर्यवाक्यम् । हे "अत्रे मामिमम् ईदृगवस्थं मां “तव "सन्तं तव स्वभूतम् “इरस्या अन्नेच्छया "द्रुग्धः द्रोग्धासुरः "भियसा भयजनकेन तमसा “मा “नि “गारीत् मा गिरतु । किंच हे मित्र “त्वं “मित्रः असि । प्रमीतेः सकाशात् त्राता भवसि । "सत्यराधाः सत्यधनश्च । "तौ “राजा “वरुणश्च त्वं च तौ युवां “मा माम् "इहावतं रक्षतम् । यद्वा । अत्रिरेव मित्र उच्यते । स च वरुणश्च युवाम् ॥

(8)

"ब्रह्मा ब्राह्मणः "अत्रिः “ग्राव्णः अभिषवसाधनानि "युयुजानः युञ्जन् । इन्द्रार्थं सोममभिषुण्वन्नित्यर्थः। तथा "कीरिणा । कीर्यते विक्षिप्यते इति कीरि स्तोत्रम् । तेन "देवान् "सपर्यन् पूजयन् किंच "नमसा अनेन हविर्लक्षणेन नमस्कारेण वा “उपशिक्षन् । शिक्षतिर्दानार्थोऽत्र प्रसाधने वर्तते । प्रसाधयन् एवमुक्तैः साधनैः "सूर्यस्य सर्वप्रेरकस्य "चक्षुः सर्वस्य ख्यापकं मण्डलं "दिवि अन्तरिक्षे “आधात् । निस्तमस्कं कृतवानित्यर्थः । तदेव स्पष्टयति । "स्वर्भानोः एतन्नामकस्यासुरस्य "मायाः । स्वाश्रयमव्यामोहयन्ती परांस्तु तथा कुर्वती मायेत्युच्यते । तादृशीर्मायाः। यत्तुरीयेण ब्रह्मणेत्युक्तम् । तदेतदुक्तं तुरीयं ब्रह्म । तेनात्रिसहाय इन्द्रः "अप "अघुक्षत् अपजुगोप न्यवारयदित्यर्थः । अथवा तृतीयपाद एवं व्याख्येयः । सूर्यस्य दिवि पूर्वमावृते प्रकाशे तदपनोद्य स्वकीयं चक्षुराधात् । निरावरणं तेजःसंस्त्यायं दृष्टवानित्यर्थः । स्वर्भानुमायया सूर्यस्यावृतिर्हारिद्रविके समाम्नाता--- ‘स्वर्भानुश्चासुरः सूर्यं तमसाविध्यत्तस्मै देवाः प्रायश्चित्तमैच्छन् तस्य यत्प्रथमं तमोऽपाघ्नन् सा कृष्णाविरभवत् यद् द्वितीयं सा फाल्गुनी यत्तृतीयं सा वलक्षी यदध्यस्थादपाकृन्तन्' इत्यादि ।

(9)

अत्रिकृतं सामर्थ्यमनुवदति “यं "वै "सूर्यम् इति । निगदव्याख्यैषा । "अत्रयस्तं सूर्यम् “अन्वविन्दन् इन्द्रार्थं सोमयागदेवतास्तुतिनमस्कारैरनुक्रमेणेषदीषत् तमोऽवरुध्य लब्धवन्त इत्यर्थः । “अन्ये "नहि "अशक्नुवन् न लब्धवन्तः खलु ॥ ॥ १२ ॥

मण्डल