बुधवार, 27 जनवरी 2021

देश का परेशान किसान !


कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यस्य परिकीर्तितं । 
(अग्निपुराण 151/9)


कृषि, गोपालन और व्यापार वैश्य के कर्म हैं !
कृषि करना वैश्य का काम है! 
यह भारतीय शास्त्रों का विधान हैं ।

मनुस्मृति में वर्णन है कि
वैश्यवृत्त्यापि जीवंस्तु ब्राह्मणः क्सत्रियोऽपि वा ।हिंसाप्रायां पराधीनां कृषिं यत्नेन वर्जयेत् ।।10/83

ब्राह्मण व क्षत्रिय भी वैश्य के धर्म से निर्वाह करते हुये जहाँ तक सम्भव हो कृषि (खेती) ही न करें  जो कि हल के आधीन है अर्थात् हल आदि के बिना कुछ फल प्राप्त नहीं होता।

अर्थात कृषि कार्य वैश्य  ब्राह्मण और क्षत्रिय के लिए भी निषिद्ध ही है ।

निश्चित रूप से यहाँ कृषि कार्य केवल शूद्र वर्ण का विधान है ।

जैसा कि नृसिंह पुराण में शूद्रों को निर्देश है !

दासवद्ब्राह्मणानां च विशेषेण समाचरेत ।
अयाचितं प्रदातव्यम् कृषिं वृत्यर्थमाचरेत् ।।११।

 शूद्र  दासों के समान ब्राह्मणों की विशेष रूप से सेवा करे !  विना कुछ माँगे हुए और अपनी ही सम्पत्ति का दान करे 
और जीविका उपार्जन के लिए कृषि कर्म करे ।।११।
     (नृसिंह पुराण अध्याय 58 का 11वाँ श्लोक)
_________   
परन्तु व्यास, पराशर और वैजयंती में एक कृषि वर्ग का उल्लेख है जिन्हें ‘कुटुम्बी’ कहा गया है। 
इन्हें शूद्रों के अन्तर्गत रखा गया है।

इस काल में एक और वर्ग कीनाश का उल्लेख आता है प्राचीन ग्रंथों में कीनाश वैश्य थे किन्तु आठवीं शताब्दी के नारद स्मृति के टीकाकार  ने कीनाशों को शूद्र बताया है।

परन्तु कोई वणिक कभी कृषि कार्य करते हुए नहीं देखा 
सिवाय व्यापार के सायद यही कारण है ।
किसान जो भारत के सभी समाजों को अन्न उत्पादन करता है ।

और पशुपालन के द्वारा दुग्ध सबको उपलब्ध कराता है 
वही किसान जो जीवन के कठिनत्तम संघर्षों से गुजर कर भी  अनाज उत्पन्न करता है ।
उस किसान की शान में भी यह  शासन की गुस्ताखी है ।

किसान से शक्तिशाली और जीवन का बलिदान करने वाला  सायद दूसरा कोई नहीं  इस संसार में !
परन्तु उसके बलिदान कि कोई प्रतिमान नहीं !

 फिर भी किसान जो कभी वाणिज्यिक गतिविधियों से अलग थलग ही रहता है  कभी बेईमानी नही करता कभी ठगाई नहीं करता और वणिक जिसे कभी हल चलाते और फसल उगाते नहीं देखा ; 

सिवाय ठगाई और व्यापार के और तब भी किसान और वणिक को  वर्ण-व्यवस्था के अन्तर्गत दौंनों को समान रूप में परिभाषित करने वाले धूर्तों ने  किसान को शूद्र और वैश्य को हल न पकड़ने का विधान बना डाला और  अन्तत: शूद्र  वर्ण में समायोजित कर दिया है ।

यह आश्चर्य ही है । किसानों को विधान बनाने वाले भी किसान की ही रोटी से पेट भरते हैं  ।

परन्तु गुण कर्म के आधार भी धर्म शास्त्रों में  निराधार ही थे ।

किसान भोला- है यह तो जानते सब ; परन्तु यह भाला भी बन सकता है इसे भी जानते तो अच्छा होता है ।

किसान आज मजदूर से भी आर्थिक स्तर पर पिछड़ा है ।
रूढ़िवादी समाज में व्यक्ति का आकलन रूढ़िवादी विधानों से ही होता है ।

वर्ण- व्यवस्था में कृषि गोपालन को भी वणिक से भी निम्न स्तर का माना है परन्तु ये निम्न लगभग शूद्र के स्तर पर ।

यही कारण है कि कृषकों का सामाजिक स्तर शास्त्र वेत्ता  ब्राह्मण की  दृष्टि में निम्न ही है ।
हिन्दू धर्म की नीतियों का पालन करने वाले 
 कितने किसान स्वयं को क्षत्रिय मानते हैं ?  विचार कर ले !

श्रीमद्भगवद्गीता जो पञ्चम सदी में वर्ण-व्यवस्था की भेट चढ़ी उसके अष्टादश अध्याय में भी लिख डाला है । कि

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥44॥

कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य- भूमि में हल चलाने का नाम ‘कृषि’ है, गौओं की रक्षा करनने वाला ‘गोरक्ष’ है, उसका भाव ‘गौरक्ष्य’ यानी पशुओं को पालना है तथा क्रय-विक्रय रूप वणिक् कर्म का नाम ‘वाणिज्य’ है- ये तीनों वैश्यकर्म हैं अर्थात् वैश्यजाति के स्वाभाविक कर्म हैं।

वैसे ही शूद्र का भी परिचर्यात्मक अर्थात् सेवरूप कर्म स्वाभाविक है।।44।।

पुरोहितों का कहना है कि जाति के उद्देश्य से कहे हुए इन कर्मों का भली प्रकार अनुष्ठान किये जाने पर स्वर्ग की प्राप्ति रूप स्वाभाविक फल होता है।

परन्तु किसान के लिए यह दुर्भाग्य ही है ।

किसान का जीवन आर्थिक रूप से सदैव से संकट में रहा उसकी फसल का मूल्य व्यापारी ही तय करता है ।
उसके पास कठिन श्रम करने के उपरान्त भी उनका अभाव ही रहा !

परन्तु खाद और बीज का मूल्य भी व्यापारी उच्च दामों पर तय करता है ; और ऊपर से प्राकृतिक आपदा और ईति, के प्रकोप का भी किसान भाजन होता रहता है ।

ईति खेती को हानि पहुँचानेवाले वे उपद्रव है ।
जो किसान का दुर्भाग्य बनकर आते हैं ।

 इन्हें  शास्त्रों में छह प्रकार का बताया गया था :
अतिवृष्टिरनावृष्टि: शलभा मूषका: शुका:।
प्रत्यासन्नाश्च राजान: षडेता ईतय: स्मृता:।।
(अर्थात् अतिवृष्टि,(अधिक वर्षा) अनावृष्टि(सूखा), टिड्डी पड़ना, चूहे लगना, पक्षियों की अधिकता तथा दूसरे राजा की चढ़ाई।)

परन्तु अब ईति का पैटर्न ही बदल गया है। 
गाय, नीलगाय और सूअर ।
माऊँ खर पतवार ।

खेती बाड़ी के चक्कर में 
कृषक आज बीमार !!
यद्यपि गायों के लिए कुछ मूर्ख किसान ही दोषी हैं 
जो दूध पीकर गाय दूसरों के नुकसान के लिए छोड़ देते हैं 
परन्तु सब किसान नहीं हर समाज वर्ग में कुछ अपवाद होते ही हैं ।

अब प्रश्न यह बनता है कि जो किसान अन्न और दुग्ध सबको कहें कि पूरे देश को मुहय्या कराता है; वह वैश्य या शूद्र धर्मी है ?
परन्तु वह शूद्र ही है । फिर भी उसका ही अन्न खाकर पाप नहीं लगता ,?

इसी लिए कोई ब्राह्मण अथवा जो  स्वयं को क्षत्रिय या वणिक मानने वाला उसके अधिकार पाने के समर्थन में साथ नहीं  होता है क्योंकि यह कृषक अब शूद्र ही है ।
और शूद्रों के अधिकारों का कोई मूल्य नहीं होता है 
धर्म शास्त्रों के अनुसार !

भारतीय राजनीति विशेषत: भारतीय जानता पार्टी जो आर. एस. एस . तथा धर्मशास्त्रों की अनुक्रियायों का पालन करना अपना आदर्श मानती है ।

वही लोग किसानों के अधिकार जब्त करने के षड्यंत्र लोकतांत्रिक रूप में बना रहे हैं ।

परन्तु समय, स्थान और परिस्थितियों के अनुसार सिद्धांत और नियम भी बदलने चाहिए जोकि बदलते भी हैं  ।
परन्तु रूढ़िवादी समाज इस विचार का विरोधी ही है ।

 यह सर्व विदित है वर्तमान में इस सरकार की नीतियों में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णों के प्रति वफादारी और शूद्रों के प्रति गद्दारी का भाव निहित है ।

सड़क ,घर और अब किसानों की जमीन भी सरकार के अधीन कुछ कूटनीतिपरक नियमों के तहत होगी ।
एसी सरकार की योजना है ।

 वर्तमान केन्द्र सरकार किसानों की कृषि सम्पदा को अपने अधीन करने के लिए एक कपटमूर्त विधेयक लाई थी जिस पर राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद वे कानून भी बन गया है । 

लेकिन किसानों के लिए बने ये कानून है । जो उसकी अस्मिता का संवैधानिक खून ही है  ।

परोक्ष रूप से इन कानूनों से किसानों को नुकसान और निजी खरीदारों व बड़े कॉरपोरेट घरानों को फायदा होगा.
जो सरकार की नीतियों में शरीक है, सामिल है

 किसानों को फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म हो जाएगा। और मजबूर किसान मिट्टी भाव में अपनी उपज व्यापारियों को बेचने पर मजबूर होगा ।

 देश के करीब 500 अलग-अलग संगठनों ने मिलकर संयुक्त किसान मोर्चे  के बैनर तले संगठित होकर सरकार के काले कानून के  विरोध में लाम बन्द  होकर आन्दोलन जारी कर दियाहैं ।,  

परन्तु उनके इस आन्दोलन को विरोधी आतंकवादी कारनामा करार दे रहे हैं ।
ये तीन काले कानून ये हैं 
____________________________________________
(1). किसान उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) विधेयक 2020: इसका उद्देश्य विभिन्न राज्य विधानसभाओं द्वारा गठित कृषि उपज विपणन समितियों (एपीएमसी) द्वारा विनियमित मंडियों के बाहर कृषि उपज की बिक्री की अनुमति देना है.

ताकि मजबूर किसान की फसल का मूल्य मनमाने तरीके व्यापारी तय करेंगे ।

सरकार का कहना है कि किसान इस कानून के जरिये अब (एपीएमसी) मंडियों के बाहर भी अपनी उपज को ऊंचे दामों पर बेच पाएंगे. निजी खरीदारों से बेहतर दाम प्राप्त कर पाएंगे.

परन्तु चालवाजी की भी सरहद पार कर दी यह तो भोले किसान को भरमाकर 
उसे ठगा जाना है क्योंकि विदेश से अनाज आयात या  मंगा कर  भारतीय किसान की  फसल को मूल्य हीन कर दिया जाएगा। ।

लेकिन, सरकारी  दिखावा और दावा मात्र छलाबा है ।

 सरकार ने इस कानून के जरिये( एपीएमसी) मंडियों को एक सीमा में बांध दिया है. एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी (APMC) के स्वामित्व वाले अनाज बाजार (मंडियों) को उन बिलों में शामिल नहीं किया गया है. 

इसके जरिये बड़े कॉरपोरेट खरीदारों को समझौते के तहत खुली छूट दी गई है. ताकि बिना किसी पंजीकरण और बिना किसी कानून के दायरे में आए हुए वे किसानों की उपज खरीद-बेच सकते हैं.।
परोक्ष रूप से सरकार का समर्थन कॉरपोरेट खरीददारों को रहेगा ।

सरकार धीरे-धीरे न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म कर सकती है, जिस पर सरकार किसानों से अनाज खरीदती है. 

और किसान परेशान और बे शान होकर अपने अस्मिता को खो देगा ।

2. किसान (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) मूल्य आश्वासन अनुबंध एवं कृषि सेवाएं विधेयक: - इस कानून का उद्देश्य अनुबंध खेती यानी (कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग) की अनुुुमति देना है. आप की जमीन को एक निश्चित राशि पर एक पूंजीपति या ठेकेदार किराये पर लेगा और अपने हिसाब से फसल का उत्पादन कर बाजार में बेचेगा.
तब किसान के पास झुनझुना होगा 

और किसान पैसे की तंगी से मजबूर होकर यह करेगा ही और फसल की कीमत तय करने व विवाद की स्थिति का बड़ी कंपनियां लाभ उठाने का प्रयास करेंगी और छोटे किसानों के साथ समझौता नहीं करेंगी किसान खुद बर्बाद हो जाएगा।

तीसरा कानून. (आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक) यह कानून अनाज, दालों, आलू,लहसुन प्याज और खाद्य तिलहन जैसे खाद्य पदार्थों के उत्पादन, आपूर्ति, वितरण को विनियमित (exchanged) करता है. 

यानी इस तरह के खाद्य पदार्थ आवश्यक वस्तु की सूची से बाहर करने का प्रावधान है. इसके बाद युद्ध व प्राकृतिक आपदा जैसी आपात स्थितियों को छोड़कर भंडारण की कोई सीमा नहीं रह जाएगी.

 इसके चलते कृषि उपज जुटाने की कोई सीमा नहीं होगी. उपज जमा करने के लिए निजी निवेश को छूट होगी और सरकार को पता नहीं चलेगा कि किसके पास कितना स्टॉक है और कहां है ?  
किसान की कृषि सम्पदा का मूल्यांकन निरस्त ही हो जाएगा ।

 नए कानूनों के तहत कृषि क्षेत्र भी पूंजीपतियों या कॉरपोरेट घरानों के हाथों में चला जाएगा और इसका नुकसान किसानों को ही होगा.

 लेकिन केंद्र सरकार साफ कर चुकी है कि किसी भी कीमत पर कृषि कानून को न तो वापस लिया जाएगा और न ही उसमें कोई फेरबदल किया जाएगा. 

सरकार की यह दमन नीति कानून के तहत काम करेगी 

–  ये सरकारी कानून किसानों के हित में नहीं है और कृषि के निजीकरण को प्रोत्साहन देने वाले हैं. 
 इनसे होर्डर्स( जमा खोरी )और बड़े कॉरपोरेट.(निगमित या समष्टिगत) घरानों को ही फायदा होगा.

किसान मजदूर भी नहीं रहेगा क्योंकि कृषि कार्य नयी तकनीक की मशीनों से ही होगा । 

 होर्डस :- किसी वस्तु की जमाखोरी, नाश या बेचने या बिक्री के लिए उपलब्ध करने से इनकार या किसी सेवा को प्रदान करने से इनकार, यदि ऐसी ज़माखोरी, नाश अथवा इनकार उस या उस जैसी वस्तुओं या सेवाओं की लागत को बढ़ाता है अथवा बढ़ाने की ओर प्रवृत्त करता है।
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   प्रस्तुति करण:- यादव योगेश कुमार रोहि

यदायदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति यादव ।।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजत्यसौ ।। ८ ।।

( विष्णु धर्मोत्तर पुराण) प्रथम भाग के १७२वें अध्याय का आठवाँ श्लोक)
_____________________________________
      (श्रीमद्गभगवत गीता का श्लोक)
यदायदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति यादव ।।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजत्यसौ ।। ८ ।।

देवतिर्यङ्मनुष्येषु गन्धर्वोरगपक्षिषु ।।
योनिष्वन्येष्वपि तथा बुद्ध्वा कार्यबलाबलम् ।। ९ ।।

यस्यां यस्यां यदा योनौ प्रादुर्भवति कारणात् ।।
तद्योनिसदृशं तत्स तदा लोके विचेष्टते ।। 1.172.१० ।।

संहर्तुं जगदीशानः समर्थोऽपि तदा नृप ।।
तद्योनिसदृशोपायैर्वध्यान्हिंसति यादव ।। ११ ।।

हार्दं तमस्तथा नैशं मूर्तं च पुरुषोत्तमः ।।
एक एव स लोकानां नाशयत्यमलद्युतिः ।। १२ ।।

हार्दं ध्वस्तं तमस्तेन जगतो देवमूर्तिना ।।
ज्योतीरूपेण च ध्वस्तं तमो नैशं सुदारुणम् ।। १३ ।।

तमो नाशयितुं मूर्तं प्रादुर्भावगतः सदा ।।
मूर्तं तमश्च राजेन्द्र दैत्यदानवराक्षसाः ।। १४ ।।

वन्ध्यानामपि दैत्यानां देहस्थोऽपि जनार्दनः ।।
न विमुञ्चति देहानि युक्त्या तांश्च जिघांसति ।। १५ ।।

दैवतानां गुरूणां च द्विजानां च गुरुप्रियः ।।
शास्त्रदृष्टेन विधिना भवत्याराधने रतः ।। १६ ।।

न च तस्यास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।।
नैवानाप्तमवाप्तव्यं वर्ततेऽथ च कर्मसु ।। १७ ।।

सर्वज्ञः सर्वदर्शी च सर्वशक्तिरपि प्रभुः ।।
तथाप्यधीते यजते तपस्तप्यति पार्थिव ।। १८ ।।

मर्यादास्थापनार्थाय जगतो हितकाम्यया ।।
करोति राजन्कर्माणि कीनाश इव दुर्बलः ।। १९ ।।

       (श्रीमद्गभगवत गीता का श्लोक)
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनु वर्तते ।। 1.172.२० ।।

मंगलवार, 26 जनवरी 2021

पशु पाल और क्षेत्रपाल सहस्रबाहू...

              ||मार्कण्डेय उवाच।।

सोमवंशसमुत्पन्नो ययातिर्नाम पार्थिवः ।।
तस्यापि( संहतः ) पुत्रो बभूव पृथिवीपतिः ।। ८ ।।

सहस्रजित्सुतस्तस्य नभजित्तस्य चात्मजः ।।
तस्यापि हैहयः पुत्रः कुन्तिस्तस्यापि चात्मजः ।। ९ ।।

तस्यापि संहतः पुत्रो महिष्मांऽस्तस्य चात्मजः ।।
माहिष्मती कृता येन नगरी सुमनोहरा ।। 1.23.१० ।।

भद्रश्रेण्यः सुतस्तस्य दुर्मदस्तस्य चात्मजः ।।
कनकस्तत्सुतो राजा कृतवीर्यस्तदात्मजः ।।१ १।।

अर्जुनस्तनयस्तस्य सप्तद्वीपेश्वरोऽभवत्।।
दत्तात्रेयोऽथ भगवान्विष्णुरूपानुरूपधृक्।।१२।।

आराध्य तपसा येन प्राप्तं राज्यं सुदुर्लभम् ।।
तथा बाहुसहस्रं च मतिं धर्मे तथोत्तमाम् ।। १३ ।।

अधर्मे वर्त्तमानस्य मरणं च जनार्दनात् ।।
युद्धेन पृथिवीं जित्वा धर्मेणैवानुरंजयन् ।। १४ ।।

 तेनेयं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपत्तना ।।
सप्तोदधिपरिक्षिप्ता क्षात्रेण विधिना जिता ।। १५ ।।

पातालनगरे शैले वसुधायां रसातले ।।
तस्य पार्थिवसिंहस्य चक्रं न प्रतिहन्यते ।।१६।।

द्वीपेषु स हि सर्वेषु खातं खातमथाऽकरोत् ।।
यूपचिह्नानि च तथा खड्गी शतशनी रथी ।। १७ ।।


सोमवंशसमुत्पन्नो ययातिर्नाम पार्थिवः ।।
तस्यापि( संहतः ) पुत्रो बभूव पृथिवीपतिः ।। ८ ।।

सहस्रजित्सुतस्तस्य नभजित्तस्य चात्मजः ।।
तस्यापि हैहयः पुत्रः कुन्तिस्तस्यापि चात्मजः ।। ९ ।।

तस्यापि संहतः पुत्रो महिष्मांऽस्तस्य चात्मजः ।।
माहिष्मती कृता येन नगरी सुमनोहरा ।। 1.23.१० ।।

भद्रश्रेण्यः सुतस्तस्य दुर्मदस्तस्य चात्मजः ।।
कनकस्तत्सुतो राजा कृतवीर्यस्तदात्मजः ।।१ १।।

अर्जुनस्तनयस्तस्य सप्तद्वीपेश्वरोऽभवत्।।
दत्तात्रेयोऽथ भगवान्विष्णुरूपानुरूपधृक्।।१२।।

__________ (पशुपाल सहस्र बाबू)_____________
देशाननुचरन्योगात्सदा पश्यति तस्करान्।।
स एव पशुपालोभूत्क्षेत्रपालः स एव च ।। १८ ।।

स एव वृष्ट्या पर्जन्यो योगित्वादर्जुनोऽभवत् ।।
स तु बाहुसहस्रेण ज्याघातकठिनत्वचा ।। १९ ।।

भाति रश्मिसहस्रेण शारदेनेव भास्करः ।।
राक्षसा निर्जितास्तेन तेन बद्धश्च रावणः ।। 1.23.२० ।

जित्वा भोगवती तेन कर्कोटकसुता हृता ।।
तस्य बाहुसहस्रेण क्षोभ्यमाणे महोदधौ ।।
भवन्ति लीना निश्चेष्टाः पातालस्था महासुराः ।। २१ ।।

मन्दरक्षोभचकिता अमृतोत्पादशङ्किताः ।।
नतनिश्चलमूर्धानो भवन्ति च महोरगाः ।। २२ ।।

दशयज्ञसहस्राणि तेनेष्टानि महीक्षिता ।।
द्वीपे द्वीपे महाराज धर्मज्ञेन महात्मना ।। २३ ।।

सर्वे यज्ञा महाराज तस्यासन्भूरिदक्षिणाः ।।
सर्वे काञ्चनवेदीकाः सर्वे यूपैश्च काञ्चनैः ।।२४ ।।

द्विजानां परिवेष्टारस्तस्य यज्ञेषु देवताः ।।
स्वयमासन्महाराज स्वयं भागहरास्तथा ।। २५ ।।

तस्य यज्ञे जगौ गाथा नारदस्सुमहत्तपाः ।।
न नूनं कार्तवीर्यस्य गतिं यास्यन्ति पार्थिवाः ।। २६ ।।

यज्ञैर्दानैस्तपोभिर्वा विक्रमेण श्रुतेन वा ।। २७ ।।
___________________________________
पञ्चाशीतिसहस्राणि वर्षाणां स महीपतिः ।।
सप्तद्वीपेश्वरः सम्राट् चक्रवर्त्ती बभूव ह ।।२८।।

तस्य राज्ञस्तु वसुधा बहुपार्थिवसङ्कुला ।।
भाराक्रान्ता विलुलिता बभूव पृथिवीपते।।२९।।

तस्य राज्ञो गतातङ्कैर्बहुपुत्रैर्नरोत्तम ।।
तेजोयुक्तैः समाकीर्णा वसुधा वसुधाधिप ।। 1.23.३० ।।

बहुनागाश्वसंकीर्णा बहुगोकुलसङ्कुला ।।
न शक्ता नृपते सोढुं तेजस्तदतिमानुषम् ।। ३१ ।।

ज्वालावलिवपुः श्रान्ता खिन्ना नाकमुपागता ।। ३२ ।।
एवं प्रभावे नरदेवनाथे पृथ्वीं समग्रां परिपाल्यमाने ।।
भारेण सन्ना पृथिवी जगाम महेन्द्रलोकं मुनिदेवजुष्टम् ।। ३३ ।।
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पशुपाल सहस्र बाहू)
_____________
देशाननुचरन्योगात्सदा पश्यति तस्करान्।।
स एव पशुपालोभूत्क्षेत्रपालः स एव च ।। १८ ।।

स एव वृष्ट्या पर्जन्यो योगित्वादर्जुनोऽभवत् ।।
स तु बाहुसहस्रेण ज्याघातकठिनत्वचा ।। १९ ।।

भाति रश्मिसहस्रेण शारदेनेव भास्करः ।।
राक्षसा निर्जितास्तेन तेन बद्धश्च रावणः ।। 1.23.२० ।
इति श्रीविष्णुधर्मोत्तरे प्रथमखण्डे मार्कण्डेयवज्रसंवादेऽर्जुनोपाख्यानं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ।। २३ ।।

कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यस्य परिकीर्तितं । (

कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यस्य परिकीर्तितं । 
(अग्निपुराण 151/9)

कृषि, गोपालन और व्यापार वैश्य के कर्म हैं !
कृषि करना वैश्य का काम है! 
यह भारतीय शास्त्रों का विधान हैं ।
किसान जो भारत के सभी समाजों को अन्न उत्पादन करता है ।
और पशुपालन के द्वारा दुग्ध सबको उपलब्ध कराता है 
वही किसान जो जीवन के कठिनत्तम संघर्षों से गुजर कर अनाज उत्पन्न करता है ।
किसान से शक्तिशाली और जीवन का बलिदान करने वाला दूसरा नहीं फिर भी किसान जो कभी वाणिज्यिक गतिविधियों से अलग रहता है और वणिक जिसे कभी हल चलाते और फसल उगाते नहीं देखा और  वर्ण-व्यवस्था के अन्तर्गत दौंनों को समान रूप में परिभाषित करने वाले धूर्तों ने  किसान को शूद्र और वैश्य वर्ण में समायोजित कर दिया यही कारण है कि कृषक का सामाजिक स्तर ब्राह्मणों की दृष्टि में निम्न ही है ।
हिन्दू धर्म की नीतियों का पालन करने वाले 
 कितने किसान क्षत्रिय है ?

श्रीमद्भगवद्गीता के शांकर भाष्य में 
अष्टादश अध्याय में भी लिखा है ।

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥44॥


कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं कृषिः च गौरक्ष्यं च वाणिज्यं च कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं कृषिः भूमेः विलेखनं गौरक्ष्यं गा रक्षति इति गोरक्षः तद्भावो गौरक्ष्यं पाशुपाल्यं वाणिज्यं वणिक्कर्म क्रयविक्रयादिलक्षणं वैश्यकर्म वैश्यजातेः कर्म वैश्यकर्म स्वभावजम्।

परिचर्यात्मकं शुश्रूषास्वभावं कर्मम शूद्रस्य अपि स्वभावजम्।।44।।

एतेषां जातिविहितानां कर्मणां सम्यगनुष्ठितानां स्वर्ग प्राप्तिः फलं स्वभावतः।

‘वर्ण आश्रमाश्च स्वकर्मनिष्ठाः प्रेत्य कर्मफल मनुभूय ततः शेषेण विशिष्टदेशजातिकुलधर्मायुः श्रुतवृत्तसुखमेधसो जन्म प्रतिपद्यन्ते’ [1]
इत्यादिस्मृतिभ्यः पुराणे च वर्णिनाम् आश्रमिणां च लोकफलभेद विशेषस्मरणात्।

कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य- भूमि में हल चलाने का नाम ‘कृषि’ है, गौओं की रक्षा करनने वाला ‘गोरक्ष’ है, उसका भाव ‘गौरक्ष्य’ यानी पशुओं को पालना है तथा क्रय-विक्रय रूप वणिक् कर्म का नाम ‘वाणिज्य’ है- ये तीनों वैश्यकर्म हैं अर्थात् वैश्यजाति के स्वाभाविक कर्म हैं।

वैसे ही शूद्र का भी परिचर्यात्मक अर्थात् सेवरूप कर्म स्वाभाविक है।।44।।

जाति के उद्देश्य से कहे हुए इन कर्मों का भली प्रकार अनुष्ठान किये जाने पर स्वर्ग की प्राप्ति रूप स्वाभाविक फल होता है।

क्योंकि ‘अपने कर्मों में तत्पर हुए वर्णाश्रमावलम्बी मरकर, परलोक में कर्मों का फल भोगकर, बचे हुए कर्मफल के अनुसार श्रेष्ठ देश, काल, जाति, कुल, धर्म, आयु, विद्या, आचार, धन, सुख और मेधा आदि से युक्त, जन्म ग्रहण करते हैं’ इत्यादि स्मृति वचन हैं और पुराण में भी वर्णाश्रमियों के लिए अलग-अलग लोक प्राप्तिरूप फलभेद बतलाया गया है।

अब प्रश्न यह बनता है कि जो किसान अन्न और दुग्ध सबको मुहय्या कराता है वह वैश्य या शूद्र धर्मी है ?
इसी लिए कोई ब्राह्मण अथवा जो  स्वयं को क्षत्रिय या वणिक मानने वाला उसके अधिकार पाने के समर्थन में नही  क्योंकि यह अब शूद्र ही है ।



कूर्मपुराणम्-उत्तरभागः/पञ्चविंशतितमोऽध्यायः

एष वोऽभिहितः कृत्स्नो गृहस्थाश्रमवासिनः ।
द्विजातेः परमो धर्मो वर्त्तनानि निबोधत ।। २५.१

द्विविधस्तु गृही ज्ञेयः साधकश्चाप्यसाधकः ।
अध्यापनं याजनं च पूर्वस्याहुः प्रतिग्रहम् ।
कुसीदकृषिवाणिज्यं प्रकुर्वन्तः स्वयंकृतम् ।। २५.२

कृषेरभावे वाणिज्यं तदभावे कुसीदकम् ।
आपत्कल्पस्त्वयं ज्ञेयः पूर्वोक्तो मुख्य इष्यते ।। २५.३

स्वयं वा कर्षणाकुर्याद् वाणिज्यं वा कुसीदकम् ।
कष्टा पापीयसी वृत्तिः कुसीदं तद्विवर्जयेत् ।। २५.४

क्षात्रवृत्तिं परां प्रहुर्न स्वयं कर्षणं द्विजैः ।
तस्मात् क्षात्रेण वर्त्तेत वर्त्ततेऽनापदि द्विजः ।। २५.५

तेन चावाप्यजीवंस्तु वैश्यवृत्तिं कृषिं व्रजेत् ।
न कथंचन कुर्वीत ब्राह्मणः कर्म कर्षणम् ।। २५.६

लब्धलाभः पितॄन् देवान् ब्राह्मणांश्चापि पूजयेत् ।
ते तृप्तास्तस्य तं दोषं शमयन्ति न संशयः ।। २५.७

देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च दद्याद् भागं तु विंशकम् ।
त्रिंशद्भागं ब्राह्मणानां कृषिं कुर्वन् न दुष्यति ।। २५.८

वणिक् प्रदद्याद् द्विगुणं कुसीदी त्रिगुणं पुनः ।
कृषीपालान्न दोषेण युज्यते नात्र संशयः ।। २५.९

शिलोञ्छं वाप्याददीत गृहस्थः साधकः पुनः ।
विद्याशिल्पादयस्त्वन्ये बहवो वृत्तिहेतवः ।। २५.१०

असाधकस्तु यः प्रोक्तो गृहस्थाश्रमसंस्थितः ।
शिलोञ्छे तस्य कथिते द्वे वृत्ती परमर्षिभिः ।। २५.११

अमृतेनाथवा जीवेन्मृतेनाप्यथवा यदि ।
अयाचितं स्यादमृतं मृतं भेक्षं तु याचितम् ।। २५.१२

कुशूलधान्यको वा स्यात् कुम्भीधान्यक एव वा ।
त्र्यह्निको वापि च भवेदश्वस्तनिक एव च ।। २५.१३

चतुर्णामपि वै तेषां द्विजानां गृहमेधिनाम् ।
श्रेयान् परः परो ज्ञेयो धर्मतो लोकजित्तमः ।। २५.१४

षट्‌कर्मको भवेत्तेषां त्रिभिरन्यः प्रवर्त्तते ।
द्वाभ्यामेकश्चतुर्थस्तु ब्रह्मसत्रेण जीवति ।। २५.१५

वर्त्तयंस्तु शिलोञ्छाभ्यामग्निहोत्रपरायणः ।
इष्टिः पार्वायणान्तायाः केवला निर्वपेत् सदा ।। २५.१६

न लोकवृतिं वर्त्तेत वृत्तिहेतोः कथंचन ।
अजिह्मामशठां शुद्धां जीवेद् ब्राह्मणजीविकाम् ।। २५.१७

याचित्वा वाऽपि सद्भ्योऽन्नं पितॄन्देवांस्तु तोषयेत् ।
याचयेद् वा शुचिं दान्तं तेन तृप्येत स्वयं ततः ।। २५.१८

यस्तु द्रव्यार्जनं कृत्वा गृहस्थस्तोषयेन्न तु ।
देवान् पितृंश्च विधिना शुनां योनिं व्रजत्यधः ।। २५.१९

धर्मश्चार्थश्च कामश्च श्रेयो मोक्षश्चतुष्टयम् ।
धर्माद्विरुद्‌धः कामः स्याद् ब्राह्मणानां तु नेतरः ।। २५.२०

योऽर्थो धर्माय नात्मार्थं सोऽर्थोऽनार्थस्तथेतरः ।
तस्मादर्थं समासाद्य दद्याद् वै जुहुयाद् द्विजः।। २५.२१

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्‌साहस्त्र्यां संहितायामुपरिविभागे पञ्चविंशोऽध्यायः ।।


सोमवार, 25 जनवरी 2021

एकैव वंश जाते: तिस्रविशेषणा: वृत्ते: प्रवृत्तेश्च वंशानाम् प्रकारा: सन्ति ! द्वितीय भागे ....


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           (कृष्णावतारकथोपक्रमवर्णनम्)

                   (व्यास उवाच)
शृण भारत वक्ष्यामि भारावतरणं तथा ।
कुरुक्षेत्रे प्रभासे च क्षपितं योगमायया ॥१॥


यदुवंशे समुत्पत्तिर्विष्णोरमिततेजसः ।
भृगुशापप्रतापेन महामायाबलेन च ॥ २॥


क्षितिभारसमुत्तारनिमित्तमिति मे मतिः।
मायया विहितो योगो विष्णोर्जन्म धरातले॥३॥


किं चित्रं नृप देवी सा ब्रह्मविष्णुसुरानपि ।
नर्तयत्यनिशं माया त्रिगुणानपरान्किमु ॥ ४॥


गर्भवासोद्‌भवं दुःखं विण्मूत्रस्नायुसंयुतम् ।
विष्णोरापादितं सम्यग्यया विगतलीलया ॥ ५ ॥


पुरा रामावतारेऽपि निर्जरा वानराः कृताः ।
विदितं ते यथा विष्णुर्दुःखपाशेन मोहितः ॥ ६ ॥


अहं ममेति पाशेन सुदृढेन नराधिप ।
योगिनो मुक्तसङ्गाश्च भुक्तिकामा मुमुक्षवः ॥ ७ ॥


तामेव समुपासन्ते देवीं विश्वेश्वरीं शिवाम् ।
यद्‌भक्तिलेशलेशांशलेशलेशलवांशकम् ॥ ८ ॥


लब्ध्वा मुक्तो भवेज्जन्तुस्तां न सेवेत को जनः ।
भुवनेशीत्येव वक्त्रे ददाति भुवनत्रयम् ॥ ९ ॥


मां पाहीत्यस्य वचसो देयाभावादृणान्विता ।
विद्याविद्येति तस्या द्वे रूपे जानीहि पार्थिव ॥ १० ॥


विद्यया मुच्यते जन्तुर्बध्यतेऽविद्यया पुनः ।
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च सर्वे तस्या वशानुगाः ॥ ११ ॥


अवताराः सर्व एव यन्त्रिता इव दामभिः ।
कदाचिच्च सुखं भुंक्ते वैकुण्ठे क्षीरसागरे ॥ १२ ॥


कदाचित्कुरुते युद्धं दानवैर्बलवत्तरैः ।
हरिः कदाचिद्यज्ञान्वै विततान्प्रकरोति च ॥ १३ ॥


कदाचिच्च तपस्तीव्रं तीर्थे चरति सुव्रत ।
कदाचिच्छयने शेते योगनिद्रामुपाश्रितः ॥ १४ ॥


न स्वतन्त्रः कदाचिच्च भगवान्मधुसूदनः ।
तथा ब्रह्मा तथा रुद्रस्तथेन्द्रो वरुणो यमः ॥ १५ ॥


कुबेरोऽग्नी रवीन्दू च तथान्ये सुरसत्तमाः ।
मुनयः सनकाद्याश्च वसिष्ठाद्यास्तथापरे ॥ १६ ॥


सर्वेऽम्बावशगा नित्यं पाञ्चालीव नरस्य च ।
नसि प्रोता यथा गावो विचरन्ति वशानुगाः ॥ १७ ॥


तथैव देवताः सर्वाः कालपाशनियन्त्रिताः ।
हर्षशोकादयो भावा निद्रातन्द्रालसादयः ॥ १८ ॥


सर्वेषां सर्वदा राजन्देहिनां देहसंश्रिताः ।
अमरा निर्जराः प्रोक्ता देवाश्च ग्रन्थकारकैः ॥ १९ ॥


अभिधानतश्चार्थतो न ते नूनं तादृशाः क्वचित् ।
उत्पत्तिस्थितिनाशाख्या भावा येषां निरन्तरम् ॥ २० ॥


अमरास्ते कथं वाच्या निर्जराश्च कथं पुनः ।
कथं दुःखाभिभूता वा जायन्ते विबुधोत्तमाः ॥ २१ ॥


कथं देवाश्च वक्तव्या व्यसने क्रीडनं कथम् ।
क्षणादुत्पत्तिनाशश्च दृश्यतेऽस्मिन्न संशयः ॥ २२ ॥


जलजानां च कीटानां मशकानां तथा पुनः ।
उपमा न कथं चैषामायुषोऽन्ते मराः स्मृताः ॥ २३ ॥


ततो वर्षायुषश्चापि शतवर्षायुषस्तथा ।
मनुष्या ह्यमरा देवास्तस्माद्‌ ब्रह्मापरः स्मृतः ॥ २४ ॥


रुद्रस्तथा तथा विष्णुः क्रमशश्च भवन्ति हि ।
नश्यन्ति क्रमशश्चैव वर्धन्ति चोत्तरोत्तरम् ॥ २५ ॥


नूनं देहवतो नाशो मृतस्योत्पत्तिरेव च ।
चक्रवद्‌ भ्रमणं राजन् सर्वेषां नात्र संशयः ॥ २६ ॥


मोहजालावृतो जन्तुर्मुच्यते न कदाचन ।
मायायां विद्यमानायां मोहजालं न नश्यति ॥ २७ ॥


उत्पित्सुकाल उत्पत्तिः सर्वेषां नृप जायते ।
तथैव नाशः कल्पान्ते ब्रह्मादीनां यथाक्रमम् ॥ २८ ॥


निमित्तं यस्तु यन्नाशे स घातयति तं नृप ।
नान्यथा तद्‌भवेन्नूनं विधिना निर्मितं तु यत् ॥ २९ ॥


जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखं वा सुखमेव वा ।
तत्तथैव भवेत्कामं नान्यथेह विनिर्णयः ॥ ३० ॥


सर्वेषां सुखदौ देवौ प्रत्यक्षौ शशिभास्करौ ।
न नश्यति तयोः पीडा क्यचित्तद्वैरिसम्भवा ॥ ३१ ॥


भास्करस्य सुतो मन्दः क्षयी चन्द्रः कलङ्कवान् ।
पश्य राजन् विधेः सूत्रं दुर्वारं महतामपि ॥ ३२ ॥

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वेदकर्ता जगत्स्रष्टा बुद्धिदस्तु चतुर्मुखः ।
सोऽपि विक्लवतां प्राप्तो दृष्ट्वा पुत्रीं सरस्वतीम्।३३।


शिवस्यापि मृता भार्या सती दग्ध्वा कलेवरम् ।
सोऽभवद्दुःखसन्तप्तः कामार्तश्च जनार्तिहा ॥३४॥


कामाग्निदग्धदेहस्तु कालिन्द्यां पतितः शिवः ।
सापि श्यामजला जाता तन्निदाघवशान्नृप ॥ ३५ ॥


कामार्तो रममाणस्तु नग्नः सोऽपि भृगोर्वनम् ।
गतः प्राप्तोऽथ भृगुणा शप्तः कामातुरो भृशम् ॥३६॥


पतत्वद्यैव ते लिङ्गं निर्लज्जेति भृशं किल ।
पपौ चामृतवापीञ्च दानवैर्निर्मितां मुदे ॥३७॥


इन्द्रोऽपि च वृषो भूत्वा वाहनत्वं गतः क्षितौ ।
आद्यस्य सर्वलोकस्य विष्णोरेव विवेकिनः ॥ ३८ ॥


सर्वज्ञत्वं गतं कुत्र प्रभुशक्तिः कुतो गता ।
यद्धेममृगविज्ञानं न ज्ञातं हरिणा किल ॥ ३९ ॥


राजन् मायाबलं पश्य रामो हि काममोहितः ।
रामो विरहसन्तप्तो रुरोद भृशमातुरः ॥ ४० ॥


योऽपृच्छत्पादपान्मूढः क्व गता जनकात्मजा ।
भक्षिता वा हृता केन रुदन्नुच्चतरं ततः ॥ ४१ ॥


लक्ष्मणाहं मरिष्यामि कान्ताविरहदुःखितः ।
त्वं चापि मम दुःखेन मरिष्यसि वनेऽनुज ॥ ४२ ॥


आवयोर्मरणं ज्ञात्वा माता मम मरिष्यति ।
शत्रुघ्नोऽप्यतिदुःखार्तः कथं जीवितुमर्हति ॥ ४३ ॥


सुमित्रा जीवितं जह्यात्पुत्रव्यसनकर्शिता ।
पूर्णकामाथ कैकेयी भवेत्पुत्रसमन्विता ॥ ४४ ॥


हा सीते क्व गतासि त्वं मां विहाय स्मरातुरा ।
एह्येहि मृगशावाक्षि मां जीवय कृशोदरि ॥ ४५ ॥


किं करोमि क्व गच्छामि त्वदधीनञ्च जीवितम् ।
समाश्वासय दीनं मां प्रियं जनकनन्दिनि ॥ ४६ ॥


एवं विलपता तेन रामेणामिततेजसा ।
वने वने च भ्रमता नेक्षिता जनकात्मजा ॥ ४७ ॥


शरण्यः सर्वलोकानां रामः कमललोचनः ।
शरणं वानराणां स गतो मायाविमोहितः ॥ ४८ ॥


सहायान्वानरान्कृत्वा बबन्ध वरुणालयम् ।
जघान रावणं वीरं कुम्भकर्णं महोदरम् ॥ ४९ ॥


आनीय च ततः सीतां रामो दिव्यमकारयत् ।
सर्वज्ञोऽपि हृतां मत्वा रावणेन दुरात्मना ॥ ५० ॥


किं ब्रवीमि महाराज योगमायाबलं महत् ।
यया विश्वमिदं सर्वं भ्रामितं भ्रमते किल ॥ ५१ ॥

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 ( शाप वश विष्णु भी इस संसार में अनेक वार आते हैं )

एवं नानावतारेऽत्र विष्णुः शापवशं गतः ।
करोति विविधाश्चेष्टा दैवाधीनः सदैव हि ॥ ५२ ॥


तवाहं कथयिष्यामि कृष्णस्यापि विचेष्टितम् ।
प्रभवं मानुषे लोके देवकार्यार्थसिद्धये ॥ ५३ ॥

(देवीभागवतपुराणम् (स्कन्धः -चतुर्थ )अध्यायः(२०)


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  अब देखें निम्न रूप नें  

श्रीविष्णुधर्मोत्तरे प्रथमखण्डे मार्कण्डेयवज्रसंवादेऽर्जुनोपाख्यानं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ।। २३ ।।


सोमवंशसमुत्पन्नो ययातिर्नाम पार्थिवः ।।
तस्यापि( संहतः) पुत्रो बभूव पृथिवीपतिः ।।८।।

सहस्रजित्सुतस्तस्य नभजित्तस्य चात्मजः ।।
तस्यापि हैहयः पुत्रः कुन्तिस्तस्यापि चात्मजः ।। ९ ।।

तस्यापि संहतः पुत्रो महिष्मांऽस्तस्य चात्मजः ।।
माहिष्मती कृता येन नगरी सुमनोहरा ।।1.23.१०।।

भद्रश्रेण्यः सुतस्तस्य दुर्मदस्तस्य चात्मजः ।।
कनकस्तत्सुतो राजा कृतवीर्यस्तदात्मजः ।।१ १।।

अर्जुनस्तनयस्तस्य सप्तद्वीपेश्वरोऽभवत्।।
दत्तात्रेयोऽथ भगवान्विष्णुरूपानुरूपधृक्।।१२।।

__________ (पशुपाल सहस्र बाबू)_____________
देशाननुचरन्योगात्सदा पश्यति तस्करान्।।
स एव पशुपालोभूत्क्षेत्रपालः स एव च ।। १८ ।।

स एव वृष्ट्या पर्जन्यो योगित्वादर्जुनोऽभवत् ।।
स तु बाहुसहस्रेण ज्याघातकठिनत्वचा ।। १९ ।।

भाति रश्मिसहस्रेण शारदेनेव भास्करः ।।
राक्षसा निर्जितास्तेन तेन बद्धश्च रावणः।1.23.२०।

जित्वा भोगवती तेन कर्कोटकसुता हृता ।।
तस्य बाहुसहस्रेण क्षोभ्यमाणे महोदधौ ।।
भवन्ति लीना निश्चेष्टाः पातालस्था महासुराः ।। २१ ।।

मन्दरक्षोभचकिता अमृतोत्पादशङ्किताः ।।
नतनिश्चलमूर्धानो भवन्ति च महोरगाः ।। २२ ।।

दशयज्ञसहस्राणि तेनेष्टानि महीक्षिता ।।
द्वीपे द्वीपे महाराज धर्मज्ञेन महात्मना ।। २३ ।।

सर्वे यज्ञा महाराज तस्यासन्भूरिदक्षिणाः ।।
सर्वे काञ्चनवेदीकाः सर्वे यूपैश्च काञ्चनैः ।।२४ ।।

द्विजानां परिवेष्टारस्तस्य यज्ञेषु देवताः ।।
स्वयमासन्महाराज स्वयं भागहरास्तथा ।। २५ ।।

तस्य यज्ञे जगौ गाथा नारदस्सुमहत्तपाः ।।
न नूनं कार्तवीर्यस्य गतिं यास्यन्ति पार्थिवाः ।। २६ ।।

यज्ञैर्दानैस्तपोभिर्वा विक्रमेण श्रुतेन वा ।। २७ ।।
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पञ्चाशीतिसहस्राणि वर्षाणां स महीपतिः ।।
सप्तद्वीपेश्वरः सम्राट् चक्रवर्त्ती बभूव ह ।।२८।।

तस्य राज्ञस्तु वसुधा बहुपार्थिवसङ्कुला ।।
भाराक्रान्ता विलुलिता बभूव पृथिवीपते।।२९।।

तस्य राज्ञो गतातङ्कैर्बहुपुत्रैर्नरोत्तम ।।
तेजोयुक्तैः समाकीर्णा वसुधा वसुधाधिप ।।1.23.३०।।

बहुनागाश्वसंकीर्णा बहुगोकुलसङ्कुला ।।
न शक्ता नृपते सोढुं तेजस्तदतिमानुषम् ।। ३१ ।।

ज्वालावलिवपुः श्रान्ता खिन्ना नाकमुपागता ।। ३२ ।।
एवं प्रभावे नरदेवनाथे पृथ्वीं समग्रां परिपाल्यमाने ।।
भारेण सन्ना पृथिवी जगाम महेन्द्रलोकं मुनिदेवजुष्टम्।३३।
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           (पशुपाल सम्राट सहस्रबाहू का वर्णन)
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देशाननुचरन्योगात्सदा पश्यति तस्करान्।।
स एव पशुपालोभूत्क्षेत्रपालः स एव च ।। १८ ।।

स एव वृष्ट्या पर्जन्यो योगित्वादर्जुनोऽभवत् ।।
स तु बाहुसहस्रेण ज्याघातकठिनत्वचा ।। १९ ।।

भाति रश्मिसहस्रेण शारदेनेव भास्करः ।।
राक्षसा निर्जितास्तेन तेन बद्धश्च रावणः।1.23.२० ।

इति श्रीविष्णुधर्मोत्तरे प्रथमखण्डे मार्कण्डेयवज्रसंवादेऽर्जुनोपाख्यानं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ।।२३।।
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_अब देखें निम्न रूप में -

इति श्रमिद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे कृष्णावतारकथोपक्रमवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥ में वर्णन है कि


कालिन्दीपुलिने रम्ये ह्यासीन्मधुवनं पुरा ।
लवणो मधुपुत्रस्तु तत्रासीद्दानवो बली ॥ ५४ ॥

•-प्राचीन  समय की बात है यमुना नदी के सुंदर तट पर मधुवन नाम का एक वन था; वहां लवणासुर नाम से प्रसिद्ध प्रतापी एक दानव रहता था।


द्विजानां दुःखदः पापो वरदानेन गर्वितः ।
निहतोऽसौ महाभाग लक्ष्मणस्यानुजेन वै ॥ ५५ ॥

शत्रुघ्नेनाथ संग्रामे तं निहत्य मदोत्कटम्।वासिता (मथुरा) नाम पुरी परमशोभना ॥ ५६ ॥

(उसके पिता का नाम मधु )  वरदान पाकर वह  पापी और घमंडी हो गया था और सब प्रकार से ब्राह्मणों को सताया करता था ;  हे  महाभाग ! उसे लक्ष्मण के छोटे भाई शत्रुघ्न ने युद्ध में मारकर वहां मथुरा नाम की एक सुंदर नगरी बसाई ।।

स तत्र पुष्कराक्षौ द्वौ पुत्रौ शत्रुनिषूदनः। निवेश्य राज्ये मतिमान्काले प्राप्ते दिवं गतः ॥ ५७ ॥

सूर्यवंशक्षये तां तु यादवाः प्रतिपेदिरे ।
मथुरां मुक्तिदा राजन् ययातितनयः पुरा ॥ ५८ ॥

उस समय मेधावी शत्रुघ्न (सुबाहु  और श्रुतसेन) इन अपने दोनों पुत्रों को राज्य देकर स्वर्गवासी हो गए कालान्तरण में सूर्यवंश के नष्ट हो जाने पर मुक्तिदायिनी मथुरा नगरी ययाति पुत्र यदु के वंशज यादवों के हाथ में आ गई ।।

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शूरसेनाभिधः शूरस्तत्राभून्मेदिनीपतिः ।
माथुराञ्छूरसेनांश्च बुभुजे विषयान्नृप ॥ ५९ ॥

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तत्रोत्पन्नः कश्यपांशः शापाच्च वरुणस्य वै ।
वसुदेवोऽतिविख्यातः शूरसेनसुतस्तदा ॥ ६० ॥

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वैश्यवृत्तिरतः सोऽभून्मृते पितरि माधवः ।
उग्रसेनो बभूवाथ कंसस्तस्यात्मजो महान् ॥ ६१ ॥

तब वहाँ के शूर पराक्रमी राजा शूरसेन नाम से हुए। और वहां की सारी संपत्ति भोगने का शुभ अवसर उन्हें प्राप्त हुआ  ! 

तब वहाँ वरुण के शाप के कारण कश्यप अपने अंश रूप में शूरसेन के पुत्र वसुदेव के रूप में उत्पन्न हुए और कालान्तरण में पिता के स्वर्गवासी हो जाने पर वासुदेव ने वेश्य-वृति (कृषि गोपालन आदि ) से अपना जीवन निर्वाह करने लगे ।

 उन दिनों उग्रसेन भी जो मथुरा के एक भाग पर राज्य करते थे !  वास्तव में (शूरसेन और अग्रसेन दोनों ही बड़े प्रतापी राजा हुए) कुछ दिनों बाद उग्रसेन का पुत्र कंस हुआ जो उस समय के अत्याचारी राजाओं में बड़ा पराक्रमी कहा जाता था।

अदितिर्देवकी जाता देवकस्य सुता तदा ।
शापाद्वै वरुणस्याथ कश्यपानुगता किल ॥ ६२ ॥

अदिति ही देवक की पुत्री देवकी के रूप में उत्पन्न हुई !और तभी कश्यप भी वरुण के कहने पर ब्रह्मा के शाप से  शूरसेन के पुत्र वसुदेव रुप में हुए।


दत्ता सा वसुदेवाय देवकेन महात्मना ।
विवाहे रचिते तत्र वागभूद्‌ गगने तदा ॥ ६३ ॥

वह देवकी देवक महात्मा के द्वारा वसुदेव से को विवाही गयीं तब उस समय आकाशवाणी हुई ।


कंस कंस ! महाभाग देवकीगर्भसम्भवः ।
अष्टमस्तु सुतः श्रीमांस्तव हन्ता भविष्यति ॥ ६४ ॥

कंस कंस हे महाभाग ! देवकी के गर्भ से उत्पन्न आठवाँ पुत्र श्रीमान तेरा हनन करने‌ वाला होगा।


तच्छ्रुत्वा वचनं कंसो विस्मितोऽभून्महाबलः ।
देववाचं तु तां मत्वा सत्यां चिन्तामवाप सः ॥ ६५ ॥


किं करोमीति सञ्चिन्त्य विमर्शमकरोत्तदा ।
निहत्यैनां न मे मृत्युर्भवेदद्यैव सत्वरम् ॥ ६६ ॥


उपायो नान्यथा चास्मिन्कार्ये मृत्युभयावहे ।
इयं पितृष्वसा पूज्या कथं हन्मीत्यचिन्तयत् ॥ ६७ ॥


पुनर्विचारयामास मरणं मेऽस्त्यहो स्वसा ।
पापेनापि प्रकर्तव्या देहरक्षा विपश्चिता ॥ ६८ ॥


प्रायश्चित्तेन पापस्य शुद्धिर्भवति सर्वदा ।
प्राणरक्षा प्रकर्तव्या बुधैरप्येनसा तथा ॥ ६९ ॥


विचिन्त्य मनसा कंसः खड्गमादाय सत्वरः ।
जग्राह तां वरारोहां केशेष्वाकृष्य पापकृत् ॥ ७० ॥


कोशात्खड्गमुपाकृष्य हन्तुकामो दुराशयः ।
पश्यतां सर्वलोकानां नवोढां तां चकर्ष ह ॥ ७१ ॥


हन्यमानाञ्च तां दृष्ट्वा हाहाकारो महानभूत् ।
वसुदेवानुगा वीरा युद्धायोद्यतकार्मुकाः ॥ ७२ ॥


मुञ्च मुञ्चेति प्रोचुस्तं ते तदाद्‌भुतसाहसाः ।
कृपया मोचयामासुर्देवकीं देवमातरम् ॥ ७३ ॥


तद्युद्धमभवद्‌ घोरं वीराणाञ्च परस्परम् ।
वसुदेवसहायानां कंसेन च महात्मना ॥ ७४ ॥


वर्तमाने तथा युद्धे दारुणे लोमहर्षणे ।
कंसं निवारयामासुर्वृद्धा ये यदुसत्तमाः ॥ ७५ ॥


पितृष्वसेयं ते वीर पूजनीया च बालिशा ।
न हन्तव्या त्वया वीर विवाहोत्सवसङ्गमे ॥ ७६ ॥


स्त्रीहत्या दुःसहा वीर कीर्तिघ्नी पापकृत्तमा ।
भूतभाषितमात्रेण न कर्तव्या विजानता ॥ ७७ ॥


अन्तर्हितेन केनापि शत्रुणा तव चास्य वा ।
उदितेति कुतो न स्याद्वागनर्थकरी विभो ॥ ७८ ॥


यशसस्ते विघाताय वसुदेवगृहस्य च ।
अरिणा रचिता वाणी गुणमायाविदा नृप ॥ ७९ ॥


बिभेषि वीरस्त्वं भूत्वा भूतभाषितभाषया ।
यशोमूलविघातार्थमुपायस्त्वरिणा कृतः ॥ ८० ॥


पितृष्वसा न हन्तव्या विवाहसमये पुनः ।
भवितव्यं महाराज भवेच्च कथमन्यथा ॥ ८१ ॥


एवं तैर्बोध्यमानोऽसौ निवृत्तो नाभवद्यदा ।
तदा तं वसुदेवोऽपि नीतिज्ञः प्रत्यभाषत ॥ ८२ ॥


कंस सत्यं ब्रवीम्यद्य सत्याधारं जगत्त्रयम् ।
दास्यामि देवकीपुत्रानुत्पन्नांस्तव सर्वशः ॥ ८३ ॥


जातं जातं सुतं तुभ्यं न दास्यामि यदि प्रभो ।
कुम्भीपाके तदा घोरे पतन्तु मम पूर्वजाः ॥ ८४ ॥


श्रुत्वाथ वचनं सत्यं पौरवा ये पुरःस्थिताः ।
ऊचुस्ते त्वरिताः कंसं साधु साधु पुनः पुनः ॥ ८५ ॥


न मिथ्या भाषते क्वापि वसुदेवो महामनाः ।
केशं मुञ्च महाभाग स्त्रीहत्या पातकं तथा ॥ ८६ ॥


                   (व्यास उवाच)

एवं प्रबोधितः कंसो यदुवृद्धैर्महात्मभिः ।
क्रोधं त्यक्त्वा स्थितस्तत्र सत्यवाक्यानुमोदितः ॥ ८७ ॥


ततो दुन्दुभयो नेदुर्वादित्राणि च सस्वनुः ।
जयशब्दस्तु सर्वेषामुत्पन्नस्तत्र संसदि ॥ ८८ ॥


प्रसाद्य कंसं प्रतिमोच्य देवकीं
     महायशाः शूरसुतस्तदानीम् ।
जगाम गेहं स्वजनानुवृत्तो
     नवोढया वीतभयस्तरस्वी ॥ ८९ ॥
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इति श्रमिद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे कृष्णावतारकथोपक्रमवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥


वसुदेव को बहुतायत पुराणों में गोप रूप में महर्षि कश्यप का वरुण के शाप वश जन्म लेने का वर्णन किया गया है ।

गोप कृषि, गो पालन आदि के कारण से वैश्य वर्ण में समायोजित किये गये हैं ।

जो कि असंगत व पूर्व दुराग्रह वश ही है ।

देवीभागवत पुराण के चतुर्थ स्कन्ध के बीसवें 

अध्याय में वसुदेव के वैश्य वर्ण में आने का वर्णन किया है । जो वर्ग मूलक या व्यवसाय मूलक परम्परा है ।

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तत्रोत्पन्नः कश्यपांशः शापाच्च वरुणस्य वै ।
वसुदेवोऽतिविख्यातः शूरसेनसुतस्तदा ॥ ६० ॥

वैश्यवृत्तिरतः सोऽभून्मृते पितरि माधवः। उग्रसेनो बभूवाथ कंसस्तस्यात्मजो महान् ॥ ६१ ॥

अर्थ•- तब वहाँ वरुण के शाप के कारण कश्यप अपने अंश रूप में शूरसेन के पुत्र वसुदेव के रूप में उत्पन्न हुए ।६०।

और कालान्तरण में पिता के मृत्यु हो जाने पर वासुदेव ने वेश्य-वृति (कृषि गोपालन आदि ) से अपना जीवन निर्वाह करने लगे । और उसी समय उग्रसेन हुए जिनका कंस नाम से एक महा पराक्रमी पुत्र हुआ ।६१।

चैतन्य महाप्रभु की शिष्य परम्परा में प्रतिष्ठित बंगाल के वैष्णव सन्त और पुराणों के ज्ञाता "श्रीजीवगोस्वामी" द्वारा रचित चम्पूमहाकाव्य "गोपालचम्पू" में नन्दवंश का देवमीढ पूर्व तक वर्णन किया ।

 जिसका यथावत् प्रस्तुति करण करते हैं 

यह कथा तृतीय पूरण में पूर्व चम्पू के अन्तर्गत है 

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                    (अथ कथारम्भ:)   

" यथा-अथ सर्वश्रुतिपुराणादिकृतप्रशंसस्य  वृष्णिवंशस्य वतंस: देवमीढनामा परमगुणधामा मथुरामध्यासामास । तस्य चार्याणां  शिरोमणेभार्याद्वयासीत् । प्रथमाद्वितिया (क्षत्रिय)वर्णा द्वितिया तु तृतीय (वेश्य)वर्णेति ।

तयोश्च क्रमेण यथा वदाह्वयं  पुत्रद्वयं प्रथमं बभूव-शूर:, पर्जन्य इति । तत्र शूरस्य श्रीवसुदेवाय: समुदयन्ति स्म ।  श्रीमान् पर्जन्यस्तु ' मातृ वर्ण -संकर: इति न्यायेन वैश्यताममेवाविश्य ,गवामेवैश्यं वश्यं चकार; बृहद्-वन एव च वासमा चचार । स चार्य  बाल्यादेव ब्राह्मण दर्शं पूजयति, मनोरथपूरं देयानि वर्षति, वैष्णववेदं स्नह्यति, यावद्वेदं 

 व्यवहरति यावज्जीवं हरिमर्चयति स्म। तस्य मातुर्वंशश्च व्याप्तसर्वदिशां विशां वतंसतया परं शंसनीय:, आभीर विशेषतया सद्भिरुदीरणादेष हि विशेषं भजते स्म ।।२३।।

अर्थ-० समस्त श्रुतियाँ एवं पुराणादि शास्त्र जिनकी भूरि भूरि प्रशंसा करते रहते हैं ; उसी यदुवंश के शिरोमणि और विशिष्ट गुणों के स्थान स्वरूप श्री देवमीढ़ राजा श्री मथुरा पुरी  में निवास करते थे ; उन्हीं  क्षत्रिय शिरोमणि महाराजाधिराज के दो पत्नी यह की थीं , पहली क्षत्रिय वर्ण की,  दूसरी वैश्य वर्ण की  थी, दोनों रानियों के क्रम से यथायोग्य दो पुत्र उत्पन्न हुए जिनमें से एक का नाम शूरसेन दूसरे का नाम पर्जन्य था ; उन दौनों में से शूरसेन जी के श्री वासुदेव आदि पुत्र उत्पन्न हुए किंतु श्री पर्जन्य बाबा तो  (मातृवद् वर्ण संकर) इस न्याय के कारण वैश्य जाति को प्राप्त होकर गायों के आधिपत्य को ही अधीन कर गए अर्थात् उन्होंने अधिकतर गो प्रतिपालन रूप धर्म को ही स्वीकार कर लिया एवं वे महावन में ही निवास करते थे और वे बाल्यकाल से ही ब्राह्मणों की दर्शन मात्र से पूजा करते थे एवं उन ब्राह्मणों के मनोरथ पूर्ति पर्यंत देय वस्तुओं की वृष्टि करते थे वह वैष्णवमात्र को जानकर उस से स्नेह करते थे; 

 जितना लाभ होता था उसी के अनुसार व्यवहार करते थे तथा आजीवन श्रीहरि की पूजा करते थे, उनकी माता का वंश भी सब दिशाओं में समस्त वैश्य जाति का भूषण स्वरूप होकर परम प्रशंसनीय था। विज्ञपंडित जन भी जिनकी माता के वंश को (आभीर-विशेष) कहकर पुकारते थे इसीलिए यह माता का वंश उत्कर्ष विशेष को प्राप्त कर गया ।२३।।

तथा च मनुस्मृति:-(१०/१५)-ब्राह्मणादुग्रकन्यायामावृतो नाम जायते ।आभीरो८म्बष्ठकन्यायामायोगव्यान्तु धिग्वण:।। इति।। अम्बष्ठस्तु विश: पुत्र्यां ब्राह्ममणाज्जात उच्यते। इति चान्यत्र । अत: पाद्मे सृष्टि खण्डादौ यज्ञं कुर्वता ब्रह्मणापि आभीरपर्याय-गोपकन्याया: पत्नीत्वेन स्वीकार: प्रसिद्ध: । एष एव च गोप वंश:श्रीकृष्णलीलायां सवलनमाप्स्यतीति; सृष्टि खण्ड एव तत्र स्पष्टीकृतमस्ति । तस्मात् परमशंसनीय एवासौ वैश्यान्त:पाति महा-आभीर द्विज वंश: इति।।२४।।

इस विषय में मनु जी भी कहते हैं यथा 10/15 क्षत्रिय द्वारा शूद्र कन्या से उत्पन्न उग्रा कहलाती है ब्राह्मण के द्वारा उसी उग्रा कन्या के गर्भ से आवृत नामक पुत्र उत्पन्न होता है ; ब्राह्मण के द्वारा वैश्य पुत्री में उत्पन्न  कन्या को अम्बष्ठा कहते हैं उसी अवस्था के गर्भ से ब्राह्मण द्वारा आभीर जाति का जन्म होता है शूद्र द्वारा वैश्य पुत्री में 

उत्पन्न कन्या को आयोगवी कहते हैं उसी आयोगवी के गर्भ से ब्राह्मण द्वारा धिग्वण का जन्म होता है; अन्यत्र भी देखा जाता है कि वैश्य पुत्री से ब्राह्मण के द्वारा जिस पुत्री का जन्म होता है उसका नाम अम्बष्ठ  होता है अतः पद्म पुराण में सृष्टि खण्ड के आदि में कहा गया है कि ब्रह्मा जी ने जिस समय यज्ञ किया उस समय उन्होंने आभीर पर्याय गोप कन्या को पत्नी रूप से ग्रहण किया यही बात प्रसिद्ध है यही गोपवंश श्री कृष्ण में सम्मेलन प्राप्त करेगा यह बात भी वही सृष्टि खंड में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है। इस कारण से वैश्यजाति के अन्तर्गत यह महा -आभीर जाति द्विजवंश हो गई, अत: यह गोपवंश भी परम प्रशंसनीय है।।२४।।

अथ स्निग्धकण्ठेन चान्तश्चिन्तितम्-"एवमपि केचिदहो एषां द्विजतायां सन्देहमपि देहयिष्यन्ति- ये खलु श्रीमद्भागवते ( १०/८/१०) कुरु द्विजातिसंस्कारम् इति गर्ग प्रति श्रीव्रजराजवचने ( भा०१०/२४/२०-२१)वैश्यस्तु वार्तया जीवेत्' इत्यारभ्य कृषि, वाणिज्य-गोरक्षा, कुसीदं तुर्यमुच्यते ।  वार्ता चतुर्विधा तत्र वयं गोवृत्तयो८निशम्।। इति व्रजराजं प्रति श्रीकृष्णवचने, तथैव, (भा०१०/४६/१२) अग्न्यर्कातिथिगो-विप्र' इति श्रीशुककृत-गोपावासवर्णने, व्यतिरेकस्तु धर्मराजचपतायामपि विदुरस्य शूद्रगर्भोद्भवतयान्यथाव्यवहार   श्रवणे८प्यधिकं वधिरायिष्यन्ते" इति  ।२५।।

अर्थ-• तदनंतर स्निग्ध-कंठ ने अपने मन में बेचारा की अहो कैसा आश्चर्य !  का विषय है कि कोई कोई जन तो इन गोपों की द्विजता में भी संदेह बढ़ाते रहेंगे और जो श्रीमद्भागवत में श्री गर्गाचार्य के प्रति नंद जी का वचन है कि आप हमारे दोनों पुत्रों का भी  द्विजाती संस्कार कीजिए तथा वैश्य तो वार्ता द्वारा अपनी जीविका चलाता है यहां से आरंभ करके कृषि वाणिज्य गोरक्षा और कुसीद अर्थात् ब्याज लेना वैश्य की यह चार प्रकार की वृत्ति होती है उनमें से हम तो निरंतर गौरक्षा वृत्ति द्वारा अपनी जीविका चलाते हैं इस प्रकार श्री बृजराज के प्रति श्री कृष्ण के वाक्य में तथा श्री सुकदेव द्वारा गोपावास वर्णन के प्रसंग में सूर्य, अग्नि अतिथि गो ब्राह्मण आदि के पूजन में गोपों का आवास स्थान मनोहर है इत्यादि एवं इसके व्यतिरेक से तो पूर्व जन्म में जो धर्मराज में थे वही विदुर जी शूद्रा के गर्भ से उत्पन्न होकर भी अन्यथा व्यवहार करेंगे अर्थात ज्ञान उपदेश आदि द्वारा लोगों का उद्धार रूप ब्राह्मण का कार्य करेंगे या कर चुके हैं। संदेह करने वाले जन इन सब बातों को सुनने में तो बिल्कुल बहरे ही हो जाएंगे अर्थात् विदुर जी के ब्राह्मणत्व सुन भी ना सकेंगे।२५।।

अथ स्फुटमूचे-" ततस्तत:?" ।।२६।। 

अर्थ•- पुन: स्पष्ट बोला भाई !  मधुकण्ठ! आगे की चर्चा सुनाइये।।२६।

मधुकण्ठ उवाच- " स च श्रीमान् पर्जन्य: सौजन्यवर्येणार्जितेन निजैश्वर्येणापि वैश्यन्तरसाधारण्यमतीयाय, तच्चनाश्चर्यम्; यत: स्वाश्रितदेशपालकता-मान्यतया वदान्यतया क्षीरवैभवप्लावितसर्वजनतालब्ध-प्राधान्यतया च पर्जन्य सामान्यतामाप;-य: खलु प्रह्लाद: श्रवसि , ध्रुव: प्रतिश्रुति, पृथुर्महिमनि, भीष्मो दुर्हृदि, शंकर: सुहृदि , स्वम्भूर्गरिमणि, हरिस्तेजसि बभूव ; यस्य च सर्वैरपि कृतगुणेन गुणगणेन वशिता: सहस्रसंख्याभिरप्यनवसिता मातामह महावंशप्रभवा: सर्वथा प्रभवस्ते गोपा: सोपाध्याया:स्वयमेव समाश्रिता बभूवु:;   तत्सम्बन्धिवृदानि च वृन्दश:;यं खलु श्रीमदुग्रसेनीय-यदुसंसदग्रण्यस्ते समग्र गुणगरिमण्यग्रगण्यमवलोकयन्त: सकलगोपलोकराजराजतासम्बलकेन तिलकेनसम्भावयामासु:; यस्यच प्रेयसीसकलगुणवरीयसी वरीयसीनामासीत्;। यस्य च  श्रीमदुपनन्दादय:पञ्चनन्दाना जगदेवानन्दयामासु:।" तथा च वन्दिनस्तस्य श्लोकों श्लोकतामानयन्ति-।।२७।। 

मधुकण्ठ बोला- वे ही श्रीमान् पर्जन्य जी उत्तम सौजन्य एवं स्वयं उपार्जित ऐश्वर्य द्वारा अन्यान्य साधारण वैश्यजाति को अतिक्रमण कर गये थे , यह आश्चर्य नहीं क्यों कि देखो-वे अपने देश के पालन करने से सभी के माननीय होकर तथा दानशीलता के कारण दुग्ध सम्पत्ति द्वारा सब लोकों कोआप्लावित करके सबकी अपेक्षा प्रधानता को प्रप्त करके भी मेघ की समानता को प्राप्त कर गये एवं जो निश्चय ही यश में प्रह्लाद, प्रतिज्ञा में ध्रुव महिमा में पृथु शत्रुओं के प्रति भीष्म, मित्रों के प्रति शंकर गौरव में ब्रह्मा तेज में श्रीहरि के तुल्य थे ।अपिच सभी लोग जिनके गुणों की आवृत्ति करते रहते हैं ऐसे उनके गुणों के वशीभूत होकर हजारों की संख्या से भी  अधिक नाना(मातामह)  के विशाल वंश में उत्पन्न होने वाले ऐश्वर्यशाली गोपगण भी  उपाध्याय के सहित स्वयं ही जिनके आश्रित हो गये थे। उनके सम्बन्धीय स्वजाति के वृन्द (समूह) भी बहुत से  हैंं निश्चय ही जिनको 

श्रीमान् उग्रसेन प्रभृति यदि सभा के अग्रगण्य व्यक्तियों ने सम्पूर्ण-गुणगौरव विषय में अग्रगण्य देखते हुए समस्त गोपजनों के सुन्दर राजत्वसूचक तिलक द्वारा सम्मानित किया अर्थात् उग्रसेन आदि सभी यदुवंशियों ने जिनको गोपों का सम्राट बना दिया जिनकी प्रिया भार्या  स्त्रीयों के सभी गुणों में श्रेष्ठ थीं ।

 अतएव जिनका (वरीयसी) नाम सार्थक था । जिनके श्रीमान उपनन्द आदि पाँच पुत्रों ने  जगत को ही आनन्दित कर दिया । अधिक क्या कहें ? देखो जिनके यश को वन्दीजन श्लोकबद्ध करके वर्णन करते हैं ।२७।।- ( तृतीय पूरण)

अन्यस्तु  जल-पर्जन्य: सुखपर्जन्य एष तु।सदा यो धिनुतेसृष्टैरुपनन्दादिभिर्जनम्।।

पर्जन्य: कृषिवृत्तीनां भुवि लक्ष्यो व्यलक्ष्यत।तदेतन्नाद्भुतं स्थूललक्ष्यतां यदसौ गत: ।।२८।।

अर्थ- देखो ! जल पर्जन्य (मेघ) तो दूसरा है किन्तु यह तो सुखपर्जन्य है। कारण यह ! पर्जन्य तो स्वयं उत्पादित उपनन्दादि  पाँच पुत्रों द्वारा सभी जनों को सदैव परितृप्त करना चाहता है परन्तु मेघरूपी पर्जन्य कृषिजीवी सभी दरिद्रियों के दृष्टिगोचर होकर  भूतल पर देखा जाता है ।

किन्तु यह अद्भुत नहीं है कारण यह पर्जन्य गोपराज तो दानवीरता या बहुदातृता को प्राप्त होकर स्थूल दृष्टि वालों को भी लाखों रूप में दिखाई पढ़ता है ।।२८।।

उपमान्ति च- उपनन्दादयश्चैते पितु: पञ्चैव मूर्तय: ।यथानन्दमयस्यामी वेदान्तेषु प्रियादय:।।२९।।

अर्थ-• वन्दीजन श्रीपर्जन्य बाबा की इस प्रकार उपमा भी देते है ; यथा - जिस प्रकार वेदान्त शास्त्र में आनन्दमय परब्रह्म के " प्रिय, आमोद,प्रमोद, आनन्द ,ब्रह्म ये पाँच स्वरूप हैं ।  उसी प्रकार ये उपनन्द, अभिनन्द, नन्द,सन्ननन्द, और नन्दन इत्यादि  पाँचों भी पिता पर्जन्य के मूर्तिविशेष जानों ।२९। 

उत्प्रेक्ष्यन्ते च- उपनन्दो८भिनन्दश्च नन्द: सन्नन्द-नन्दनौ । इत्याख्या: कुर्वता पित्रा नन्देरर्थ: सुदण्डित:।।३० ।।

अर्थ- इस विषय में उनकी उत्प्रेक्षा भी करते हैं यथा उपनंद अभिनंद नंदन नंद एवं नंदन इत्यादि नामकरण करते हुए इनके पिता ने समृद्धि अर्थक नंद धातु के आनंद रूप अर्थ को अच्छी प्रकार वश में कर लिया है अर्थात् नंद धातु का अर्थ पर्जन्य बाबा के उपनंद आज पांच पुत्रों के रूप में मूर्तमान दिखाई देता है।३०।।

मधुकण्ठ-उवाच - तदेवं सति नाम्ना केचन गोपानां मुखेन तस्मै परमधन्या कन्या दत्ता,-या खलु स्वगुणवशीकृतस्वजना यशांसि ददाति श्रृण्वद्भ्य:,किमुत् पश्यद्भ्य: किमुततरां भक्तिमद्भ्य: । ततश्च तयो: साम्प्रतेन दाम्पत्येन सर्वेषामपि सुखसम्पत्तिरजायत, किमुत मातरपितरादीनाम् ।।३६।।

अर्थ• मधुकण्ठ बोला ! उसके अनंतर गोपों में प्रधान (सुमुख) नामक किसी गोप ने अपनी परमधन्या एक कन्या उन श्रीनंद जी के लिए समर्पित की, वह कन्या अपने गुणों से अपने जनों को वश में करके सुनने वाले को भी यश प्रदान करती हैं एवं जो उनके दर्शन करते हैं उनको भी यश देती हैं तथा जो इस कन्या की भक्ति करते हैं उनको भी यशसमूह प्रदान करती हैं इस विषय में तो कहना ही क्या ?  तदनंतर  उन दोनों के सुयोग्य  दांपत्य संबंधों से सभी लोगों की  सुखसम्पत्ति उत्पन्न होगयी तब उनके माता-पिता की सुखसम्पत्ति का कौन वर्णन कर सकता है ? ।।३६ ।

तदेवमानन्दित-सर्वजन्युर्विगतमन्यु: पर्जन्य: सर्वतो धन्य: स्वयमपि भूय: सुखमवुभूय चाभ्यागारिकतायाम् अभ्यागतम्मन्य: श्रीगोविन्दपदारविन्द-भजनमात्रान्वितां देहयात्रामाभीष्टां मन्यमाना: सर्वज्यायसे ज्यायसे स्वक-कुलतिलकतां दातुं तिलकं दातुमिष्टवान्, श्रीवसुदेवादि नरदेव-गर्गदि भूदेवकृतप्रभां दत्तवांश्च।।३७।।

अर्थ•- इस प्रकार श्री पर्जन्य बाबा ने प्राणी मात्र को आनंदित करते हुए शोक रहित हो एवं सब की अपेक्षा धन्य होकर स्वयं भी अनेक सुखों का अनुभव कर कुटुंब केेेे पालन-पोषण व्यापार में अनासक्त होकर केवल श्री गोविंद पदारविंद के भजन मात्र से युक्त देह यात्रा को ही अपनी अभीष्ट मानते हुए  सबसे बड़े एवं श्रेेेष्ठ

 उपनन्द जी को ही स्वकुल की प्रधानता देने के लिए राजतिलक देने की अभिलाषा की।  पश्चात् श्री वसुदेव आदि राजाओं एवं श्रीगर्गाचार्य आदि  ब्राह्मणों द्वारा सुशोभित सभा की रचना करके श्री उपनन्द जी को राजतिलक दे दिया ।।३७।। 

" स पुन: पितुराज्ञाम् अंगीकृत्य कृतकृत्यस्तस्यामेव श्रीवसुदेवादि-संवलितमहानुभावानां सभायामाहूय सभावमुत्संसंगिनं विधाय मध्यममेव निजानुजं तेन तिलकेन गोकुलराजतया सभाजयामास।।३८।

अर्थ•-पश्चात  उन श्री उप नन्द जी ने भी  पिता की आज्ञा को अंगीकार कर अपने को कृत कत्य मानकर उसी वसुदेव आदि से युक्त सभा में बुलाकर भावपूर्वक 

अपनी गोद में बैठा कर अपने मझेले भाई नन्दजी को ही उस तिलक द्वारा गोकुल के राजा रूप में सम्मानित कर दिया अर्थात् उन्ही को व्रज का राजा बना दिया ।३८।

(तृतीय-पूरण श्रीगोपालचम्पू (श्रीकृष्णनन्दिनीहिन्दीटीका वनमालिदासशास्त्री-कृत ) 

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तस्मिन्नेव दिवसे८वगतदोषे प्रदोषे समुद्भट-कंसरोषेण जातचित्तशोषेण कृतपरिदेवेन वसुदेवेन प्रहिता व्रजहिता वडवारोहिणी रोहिणीगुप्तमाजगामम; यस्यामागतायां परमपति-व्रतायां सर्व एव व्रजराजराजसमाज: शुभशकुनसंकुलशकुनादिसमजेन सममुल्ललास। तत्र चानन्दमोहिन्यौ श्रीयशोदा-रोहिण्यौ यमुना-गंगे  इव संगतसंगे परस्परं परेभ्यश्च सुखसमूहमूहतु:।।६७।।

अर्थ •- उसी दिन दोषरहित प्रदोषकाल में भयंकर कंस के कोप से सूखगयाहै चित जिनका एवं विलाप करने वाले श्री वासुदेवजी के द्वारा भेजी हुई व्रज की हितकारिणी श्री रोहिणी जी घोड़ी पर चढ़कर गुप्तरूपसे महावन में आगई । परमपतिव्रता श्री रोहिणी जी के आने मात्र से व्रजराज का सारा राजसमाज शुभशकुनसूचक  पक्षियों के समूह के सहित परमप्रसन्न होगया । वहाँ पर ।  श्री यशोदा एवं रोहिणी जी तो आनन्द विभोर होकर श्रीगंगा-यमुना की तरह दौनों मिलकर आपस में एवं दूसरों के लिए भी सुखसमुुदाय की वृष्टि करने लग गईं ।।६७।। 

तृतीय-पूरण श्रीगोपालचम्पू (श्रीकृष्णनन्दिनीहिन्दीटीका वनमालिदासशास्त्री-कृत ) 

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योग्य एव परयोग्यताकर ,-स्ताद्दशत्वमपि वेदवेदजम्। त्वन्तु वेदविदुषांवरस्तत:, संस्करु द्विजजनुस्तनु अमू ।।६५।  

अर्थ •- योग्य जन ही दूसरे को योग्य बना सकता है  ।दूसरों को योग्य बनाने की योग्यता वेदों के ज्ञान से उत्पन्न होती है ; तिसमें भी आप तो वेदज्ञ विद्वानों में श्रेष्ठ हो । अत: द्वि जों की जाति में प्रकट हैं शरीर जिनका ऐसे इन दोनो बालकों का संस्कार करो ।तात्पर्य-ब्राह्मणक्षत्रियविशस्त्रयो वर्णा द्विजातय:" ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन तीनों वर्णों को ही द्विजाति या द्विज कहते हैं तथा देवमीढ़ राजा की वैश्य वर्ण वली  पत्नी (गुणवती) से उत्पन्न महावनवासी श्रीपर्जन्य के पुत्र, गोपजाति श्रीनन्द जी का द्विजत्व तीसरे पूरण में श्री रूप स्वामी जी विचारपूर्वक प्रमाण प्रमेय से सिद्ध कर चुके हैं अत: श्रीनन्दजीने द्विजाति संस्कार करने की प्रार्थना की ।।६५।।

गर्ग उवाच---भवन्तो यदुबीज्यत्वे८पि वैश्यततीज्यमातृवंशान्वयिता तद्गुरुपदव्या- गतैरेव कर्म कारयितव्या: न तु मया।।६६।

अर्थ •- श्री गर्ग-आचार्य बोले --आप सबके यदुवंश में उत्पन्न होने पर भी वैश्य गणों के पूज्य ,एवं माता के वंश का सम्बन्ध रहने के कारण से आप विशिष्ट वैश्य है। ।अत: जो ब्राह्मण वैश्य गणों के गुरुपद ( पुरोहिताई) पर आरूढ़ है वे ही आपका संस्कार कार्य करेंगे , किन्तु मेरे द्वारा होना उचित नहीं ।।६६।


व्रजराज उवाच- भवेदेवं किन्तु क्वचित्सर्गो८प्यपवादवर्ग बाधते८धिकारिवििशेषश्लेषमासाद्य।यथैवाहिंसानिवृत्तकर्मणि बद्धश्रद्धं प्रति यज्ञे८पि पशुहिंसां तस्माद्भवतां ब्राह्मण-भावादुत्सर्गसिद्धा 

गुरुता श्रृद्धाविशेषवतामस्माकं कुले कथं लघुतामाप्नोतु ? तत्रापि भवत: सर्वप्रमाणत: समधिकता समधिगता; तस्मादन्यथा मा स्म मन्यथा:। एतदुपरिनिजपुरोहिता-नामपि हितमपि-हितमहसा करिष्याम:।।६७।।

अर्थ •- श्री बृजराज बोले भगवन  आपका कहना ठीक है किंतुु किसी सामान्य विधि भी विशेषविधि को बाध लेती है । जैसे  अहिंसारूप निवृत्तिमार्ग में जो व्यक्ति विशेष श्रृद्धा रखता है, उस व्यक्ति के उद्देश्य में यज्ञकार्यमें भी, अहिंसा द्वारा पशुहिंसा का बाध हो जाता है। अत: आपका ब्राह्मणता के नाते सामान्य विधि द्वारा सर्वगुरुत्व तो सिद्ध ही है फिर गुरुमात्र के प्रति श्रृद्धा विशेष रखने वाले हमारे कुल में वह गुरुत्व लघुत्व को कैसे प्राप्त कर सकता है ? उसमें भी सब प्रकार के प्रमाणों से आपकी अधिकता को मैं जान चुका हूँ । अत: आप कोई अन्यथा। विचार न करें । आपके द्वारा नामकरण संस्कार । होते ही अपने पुरोहितों का भी स्पष्ट रूप से उत्सव द्वारा विशेष हित कर कार्य कर देंगे।।६७।

(श्रीगोपालचम्पू- (षष्ठपूरण) शकटभञ्जनादि अध्याय)

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अम् +क्विप् =अम् रोग: - 

ब =वरुणनाम्नाचिकिसतसया देव:+ स्थ = तिष्ठन्ति

अम: निदानानय बं वरुणं ध्याने तिष्ठन्ति योऽम्बष्ठ: कथ्यते।

किंवा 

अम्बाय चिकित्सकबब्दाय तत्प्रख्यापनार्थं तिष्ठते- ऽभिप्रैति स्था--क पत्वम् । चिकित्सके “विप्रात् वैश्य- कन्यायां जाते १ सङ्कीर्णवर्णे, “ब्राह्मणाद्वैश्यकन्यायामम्ब- ष्ठोनाम जायते मनुः “सजातिजानन्तरजाः षट्सुता द्विजधर्मिण” इति मनूक्तेः “द्विजातीनां समानजाती- यासु जाताः तथानुलोम्येनोत्पन्नाः ब्राह्मणेन क्षत्रि- यावैश्ययोः, क्षत्रियेण वैश्यायामेवं षट् पुत्रा द्विज धर्म्मिणः उपनेयाः ताननन्तरजनाम्न इति यदुक्तं तत् तज्जातिव्यपदेशार्थं न संस्कारार्थमिति कस्यचिद्भ्रमः स्यात् अत एषां द्विजातिसंस्कारार्थवचनमिति” कुल्लू० उक्तेश्च अम्बष्ठादीनामुपनयनसंस्कारसत्त्वेऽपि इदानीन्तनानां संस्कारलोपेन शूद्रत्वम् अतएव इदानीं क्षत्रियादीनां शुद्रत्वमेवमम्बष्ठादीनामपि” इति रघु० ये तु व्रात्य- दोषप्रायश्चित्तमाचरन्ति तेषामुपनयनयोग्यता भवत्येव “येषां पित्रादयोप्यनुपनीतास्तेषामापस्तम्बोक्तम् “यस्य पिता पितामहावनुपनीतौ स्यातान्तस्य संवत्सरं त्रैविद्य- कम्ब्रह्मचर्य्यं यस्य प्रपितामहादीनां नानुस्मर्य्यते उपनयनन्तस्य द्वादशवार्षिकं त्रैविद्यकम्ब्रह्मचर्य्यमिति” मिता० उक्तेः । “सूतानामश्वसारथ्यमम्बष्ठानां चिकित्सितम्” मनूक्ता तेषां वृत्तिः । २ देशभेदे, ३ हस्तिपके च । ४ यूथि- कायां स्त्री । स्वार्थे कनि ह्रस्वे अत इत्त्वे । अम्बष्ठिका- प्यत्रैव (वामनहाटीति) प्रसिद्धायां ५ ब्राह्मीलतायाञ्च ।


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अम्बष्ठ] [स्त्री० अम्बष्ठा] १. एक देश का नाम पंजाब के मध्य भाग का पुराना नाम। २. अंबष्ठ देश में बसनेवाला मनुष्य। ३. ब्राह्मण पुरुष और वैश्य स्त्री से उत्पन्न एक जाति। इस जाति के लोग चिकित्सक होते थे। ४. महावत। हाथीवान। फीलवान। हस्तिपक। ५. कायस्थों का एक भेद।


अम्बष्ठ गण (तृतीय-चतुर्थ शताब्दी ईसा पूर्व) चिनाब और सिन्धु नदी के आस-पास रहते थे। इनका निवास विशेष रूप से भारत का पश्चिमोत्तर क्षेत्र था। सिकंदर ने जब पंजाब पर आक्रमण किया, तब अम्बष्ठ गण अपना क़बाइली जीवन सुचारु रूप से जी रहे थे। इनका, चिनाब और सिन्धु के उत्तरी हिस्से में रहने का उल्लेख सिकंदर के आक्रमण के समय का ही मिलता है। यह वह स्थान था, जो इन नदियों के संगम स्थल से उत्तर में पड़ता था।

उल्लेख

इनका उल्लेख 'अम्बप्टनोई' भी मिलता है किन्तु यह नाम यूनानी इतिहासकारों का दिया हुआ है। यूनानियों द्वारा संस्कृत भाषा के अम्बष्ठ को ज्यों का त्यों लिख-बोल न पाने के कारण यह नाम बदल गया। संस्कृत भाषा के जिन ग्रंथों में इनका उल्लेख मिलता है, उनमें प्रमुख हैं-

ऐतरेय ब्राह्मण

महाभारत

बार्हस्पत्य अर्थशास्त्र


【अ】- [२८]

     (अंबष्ठ)

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विजयेन्द्र कुमार माथुर ने लेख किया है ...अंबष्ठ नाम के एक प्राचीन जनपद तथा जाति का उल्लेख संस्कृत और पालि साहित्य में अनेक स्थलों पर मिलता है। यह पंजाब का प्राचीन जनपद था। 'महाभारत' में इसका उल्लेख इस प्रकार है- 

'वशातय: शाल्वका: केकयाश्च तथा अंबष्ठा ये त्रिगर्ताश्च मुख्या: (महाभारत उद्योग पर्व २३, ३०)

'विष्णुपुराण' (२,३,१७) में भी अंबष्ठों का मद्र और आराम जनपद के वासियों के साथ वर्णन है-

 'माद्रारामास्तथाम्बष्ठा पारसीकादयस्तथा'

'बार्हस्पत्य अर्थशास्त्र' (टॉमस, पृ. २१) में अंबष्ठों के राष्ट्र का वर्णन कश्मीर, हूण देश और सिन्ध के साथ है।

अलक्षेन्द्र के आक्रमण के समय अंबष्ठनिवासियों के पास शक्तिशाली सेना थी। टॉलमी ने इनको अंबुटाई कहा है।

सिकन्दर के इतिहास से सम्बन्धित कतिपय ग्रीक और रोमन लेखकों की रचनाओं में भी अंबष्ठ जाति का वर्णन हुआ है। दिओदोरस, कुर्तियस, जुस्तिन तथा तालेमी ने विभिन्न उच्चारणों के साथ इस शब्द का प्रयोग किया है। प्रारम्भ में अंबष्ठ जाति युद्धोपजीवी थी। सिकन्दर के समय (३२७ ई. पू.) उसका एक गणतन्त्र था और वह चिनाब के दक्षिणी तट पर निवास करती थी। आगे चलकर अंबष्ठों ने सम्भवत चिकित्साशास्त्र को अपना लिया, जिसका परिज्ञान हमें 'मनुस्मृति' से होता है।

सन्दर्भ:-

ऐतिहासिक स्थानावली: विजयेन्द्र कुमार माथुर पृष्ठ क्र- ७

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(अंबष्ठ- उल्लेख १)

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अम्बष्ठ एक बहुविकल्पी शब्द है। अन्य अर्थों के लिए देखें:- (अम्बष्ठ- उल्लेख ४)


अम्बष्ठ हिन्दू मान्यताओं और पौराणिक महाकाव्य 'महाभारत' के उल्लेखानुसार सिन्ध के उत्तर का एक प्रजातन्त्र राज्य था, जिसे यूनानी लेखकों ने अम्बस्तई या अम्बस्तनोई लिखा है। इसका उल्लेख संस्कृत और पालि साहित्य में अनेक स्थलों पर मिलता है।

'अम्बस्तनोई' नाम यूनानी इतिहासकारों का दिया हुआ है। यूनानियों द्वारा संस्कृत भाषा के अम्बष्ठ को ज्यों का त्यों लिख-बोल न पाने के कारण यह नाम बदल गया।

संस्कृत भाषा के जिन ग्रन्थों में अम्बष्ठ उल्लेख मिलता है, उनमें प्रमुख हैं-

'ऐतरेय ब्राह्मण', 'महाभारत' व 'बार्हस्पत्य अर्थशास्त्र'

अम्बष्ठ पंजाब का प्राचीन जनपद था। 'महाभारत' में इसका उल्लेख इस प्रकार है-

'वशातय: शाल्वका: केकयाश्च तथा अम्बष्ठा ये त्रिगर्ताश्च मुख्या:'

'विष्णुपुराण' में भी अम्बष्ठों का मद्र और आराम जनपद के वासियों के साथ वर्णन है-

'माद्रारामास्तथाम्बष्ठा पारसीकादयस्तथा'

'बार्हस्पत्य अर्थशास्त्र' में अम्बष्ठों के राष्ट्र का वर्णन कश्मीर, हूण देश और सिन्ध के साथ है।

अलक्षेन्द्र (सिकन्दर) के आक्रमण के समय अम्बष्ठनिवासियों के पास शक्तिशाली सेना थी। टॉलमी ने इनको 'अंबुटाई' कहा है।

सिकन्दर के इतिहास से सम्बन्धित कतिपय ग्रीक और रोमन लेखकों की रचनाओं में भी अम्बष्ठ जाति का वर्णन हुआ है। दिओदोरस, कुर्तियस, जुस्तिन तथा तालेमी ने विभिन्न उच्चारणों के साथ इस शब्द का प्रयोग किया है।

प्रारंभ में अम्बष्ठ जाति युद्धोपजीवी थी। सिकंदर के समय (327 ई. पू.) उसका एक गणतन्त्र था और वह चिनाब के दक्षिणी तट पर निवास करती थी।

आगे चलकर अम्बष्ठों ने सम्भवत चिकित्साशास्त्र को अपना लिया, जिसका परिज्ञान हमें 'मनुस्मृति' से होता है

टीका टिप्पणी और सन्दर्भ:-

*महाभारत शब्दकोश |लेखक: एस. पी. परमहंस |प्रकाशक: दिल्ली पुस्तक सदन, दिल्ली |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: १४ |

*महाभारत उद्योग पर्व २३,३०

*विष्णुपुराण २,३,१७

*टॉमस, पृ. २१

(कृष्णकोश से साभार)

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(अंबष्ठ- उल्लेख २)

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अम्बष्ठ गण (तृतीय-चतुर्थ शताब्दी ईसा पूर्व) चिनाब और सिन्धु नदी के आस-पास रहते थे। इनका निवास विशेष रूप से भारत का पश्चिमोत्तर क्षेत्र था। सिकन्दर ने जब पंजाब पर आक्रमण किया, तब अम्बष्ठ गण अपना क़बाइली जीवन सुचारु रूप से जी रहे थे। इनका, चिनाब और सिन्धु के उत्तरी हिस्से में रहने का उल्लेख सिकन्दर के आक्रमण के समय का ही मिलता है। यह वह स्थान था, जो इन नदियों के संगम स्थल से उत्तर में पड़ता था।


इनका उल्लेख 'अम्बप्टनोई' भी मिलता है किन्तु यह नाम यूनानी इतिहासकारों का दिया हुआ है। यूनानियों द्वारा संस्कृत भाषा के अम्बष्ठ को ज्यों का त्यों लिख-बोल न पाने के कारण यह नाम बदल गया। संस्कृत भाषा के जिन ग्रन्थों में इनका उल्लेख मिलता है, उनमें प्रमुख हैं-

ऐतरेय ब्राह्मण, महाभारत और बार्हस्पत्य अर्थशास्त्र।

अम्बष्ठ गण प्रारम्भिक समय में अपनी जीविका के लिए युद्धों पर निर्भर थे। इसलिए इन्हें एक युद्ध-प्रिय जाति माना गया है। कालान्तर में इन्होंने धार्मिक अनुष्ठानों को अपनाया। धीरे-धीरे खेती को अपना कर इन्होंने स्वयम् को कृषक जाति के रूप में भी पारंगत कर लिया। वैद्यों के उल्लेख भी अम्बष्ठों के पाए जाते हैं। अम्बष्ठों ने जिस प्रकार समय-समय पर अपनी जीवन शैली को बदला वह बहुत विचित्र लगता है।


(भारतकोश से साभार)

{अंबष्ठ (हिन्दी) भारतखोज। अभिगमन तिथि: १२  फरवरी २०१५}

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(अंबष्ठ- उल्लेख ३)

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प्रकाशित कोशों से अर्थ:-


अंबष्ठ- संज्ञा पुं॰ [सं॰ अम्बष्ठ] [स्त्री॰ अम्बष्ठा] 

१. एक देश का नाम। पंजाब के मध्य भाग का पुराना नाम।

२. अंबष्ठ देश में बसनेवाला मनुष्य।

३. ब्राह्मण पुरुष और वैश्य स्त्री से उत्पन्न एक जाति। इस जाति के लोग चिकित्सक होते थे।

४. महावत। हाथीवान। पीलवान। हस्तिपक।

५. कायस्थों का एक भेद।


(शब्दसागर से साभार)

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राजपूतों की उत्पत्ति और मुगलों से उनके वैवाहिक सम्बन्ध-


"भारतीय धरापर अनादि काल से अनेक जनजातियों का आगमन हुआ।

छठी सातवीं ईस्वी में भी अनेक जन-जातीयाँ का भारत में आगमन हुआ। जो या तो यहाँ व्यापार करने के लिए आये अथवा इस देश को लूटने के लिए आये। 

कुछ चले भी गये तो कुछ अन्त में यहीं के होकर रह गये।

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वास्तव में भारतीय प्राचीन पौराणिक ग्रन्थों में ग्रन्थों के मिथकों के प्राचीनतम होने से उन आगन्तुक मानव जातियों का वर्णन भी नहीं मिलता है ।                              
कालान्तर में जब भारतीय संस्कृति में अनेक विजातीय तत्वों का समावेश हुआ तो परिणाम स्वरूप उनकी वंशावली का निर्धारण हुआ ताकि उन्हें  किसी प्रकार भारतीयता से सम्बद्ध किया जाये  ?  अथवा इन वंशों को प्राचीनता का पुट देने के लिए सूर्य और चन्द्र वंश की कल्पना इनके साथ कर दी गयी ।
जो  वास्तविक रूप से  हिब्रू संस्कृति के साम और हाम का ही भारतीय रूपान्तरण  है ।

भारतीय धरा पर उभरती नवीन जातियों ने भी राजपूतों के रूप में कभी अपने को सूर्यवंश से जोड़ा तो कभी चन्द्रवंश से  यद्यपि यादवों को सोमवंश और राम के  वंशजो को सूर्यवंश से सम्बन्धित होना तो भारतीय पुराणों में वर्णित किया गया है ।
परन्तु राम का वंश और जीवन चरित्र प्रागैतिहासिकता के गर्त में समाविष्ट है । फले ही जातीय स्वाभिमान के लिए कोई स्वयं को राम से जोड़ ले परन्तु राम का वर्णन अनेक संस्कृतियों में मिथकीय रूप में हुआ है।

राम के जीवन " जन्म तथा वंश का कोई कालक्रम भारतीय सन्दर्भ में समीचीन या सम्यक्‌  रूप से नहीं हैं ।

अनेक पूर्वोत्तर और पश्चिमी देशों की संस्कृति में राम का वर्णन उनकी सांस्कृतिक परम्पराओं के अनुरूप है ।

मिश्र, थाइलैंड, खेतान, ईरान- ईराक (मेसोपोटामिया) दक्षिणी अमेरिका, इण्डोनेशिया तथा भारत में भी राम कथाओं का विस्तार अनेक रूपों में हुआ है।
भले ही भारत में आज कुछ लोग स्वयं को राम का वंशज कह कर सूर्य वंश से जोड़े परन्तु यह सब निराधार ही है।

हाँ चन्द्र वंश या कहें सोम वंश जिसके  सबसे प्राचीन वंश धारक यादव लोग हैं।
साम से सोम शब्द कि रूपांतरण हुआ जिसे दैवीय रूप देने को लिए सोम( चन्द्र) बना दिया

वे आज भी अहीरों, गोपों और घोष आदि के रूप में गोपालक को रूप में अब तक पशुपालन में संलग्न हैं।
पौराणिक सन्दर्भों से विशेषत: पद्मपुराण सृष्टि- खण्ड स्कन्दपुराण (नागर-खण्ड ) तथा नान्दीपुराण से प्राप्त जानकारी के अनुसार वेदों की अधिष्ठात्री देवी गायत्री एक आभीर जाति के परिवार से सम्बन्धित कन्या थी।


117. वही (सहस्रबाहू) पशुओ का पालक (रक्षक) और भूमि में बीज वपन करने वाला हुआ; वही निश्चित रूप ही खेतों का रक्षक और कृषक था; वह अकेले ही अपने योगबल के माध्यम से वर्षा के लिए बादल बन गया सब कुछ अर्जन करने से अर्जुन बन गया।
(पद्मपुराण सृष्टिखण्ड अध्याय १२)-
इस प्रकार आर्य शब्द भी कृषि से सम्बन्धित था। जैसा कि वैदिक सन्दर्भों में अब भी है।
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आधुनिक राजपूत शब्द एक जाति से अब संघ या वाचक बन गया है।
जबकि क्षत्रिय आज भी एक वर्णव्यवस्था का अंग है।  
पुराणों में राजपूतों का वर्णन होने से ये छठी सातवीं सदी के  तो हैं ही 
अधिकतर पुराण इस काल तक लिखे जाते रहे हैं।
परन्तु पद्म पुराण का सृष्टि खण्ड सबसे प्राचीन है।जिसमें वर्णन है कि अहीर (आभीर) जाति कि कन्या गायत्री सा विवाह यज्ञ कार्य हेतु विष्णु भगवान द्वारा   पुष्कर क्षेत्र में ब्रह्मा से पाणिग्रहण संस्कार सम्पन्न कराया गया  और अन्त में सभी अहीरों को विदाई के समय विष्णु भगवान द्वारा आश्वस्त करते हुए अहीर जाति के यदुवंश में द्वापर युग में अपने अवतरण लेने की बात कहीं।
_
तथा अन्य पुराण देवीभागवत मार्कण्डेय और हरिवंश पुराण आदि में वरुण प्रेरित ब्रह्मा के आदेश द्वारा कश्यप को वसुदेव गोप के रूप में मथुरा नगरी में जन्म लेने के लिए कहा ।
देवीभागवत पुराण के द्वादश स्कन्ध में वसुदेव स्वयं पिता कि मृत्यु के पश्चात कृषि और गोपालन से जीविका निर्वहन करते हैं।
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परन्तु आज जो जनजातियाँ पौराणिक सन्दर्भों में वर्णित नहीं हैं ।
वे स्वयं को कभी सूर्य वंश से जोड़ती हैं तो कभी चन्द्र वंश से और  इस प्रकार पतवार विहीन नौका के समान इधर से उधर भटकते हुए किनारों से परे ही रहती हैं। 

 आज ये जनजातियाँ स्वयं को राजपूत मानती हैं और यदुवंश से सम्बन्धित करने के लिए पूरा जोर लगा रहीं हैं ।

परन्तु हम आपके संज्ञान में यह तथ्य प्रेषित कर दें कि ययाति के शाप के परिणाम-स्वरूप यादवों में लोकतन्त्र शासन की व्यवस्था का परम्परागत स्थापन हुआ ।
"प्रसन्नशुक्रवचनाज्व जरां संकामयितुं ज्येष्ठं पुत्रं यदुमुवाच,--त्वन्माता महशापादियमकालेनैव जरा मामुपस्थिता । तानहं तस्यैवानुग्रहादू भवतः सञ्च रायाम्येकं वर्षसहस्त्रम्, त तृप्तोऽस्मि विषयेषु, त्वदूयसा विषयानह भोक्तुमिच्छामि ।। ४-१०-४ ।।

नात्र भवता प्रत्याख्यानं कर्त्तव्यमित्युक्तः स नैच्छत् तां जरामादातुम ।तञ्चपि पिता शशाप,--त्वत प्रसूतिर्न राज्यार्हा भविष्यतीति ।। ४-१०-५ ।।                    (विष्णु पुराण 

चतुर्थांश अध्याय दस)

न हि राज्येन मे कार्यं नाप्यहं नृप काङ्क्षितः ।

न चापि राज्यलुब्धेन मया कंसो निपातितः ।। ४८।
किं तु लोकहितार्थाय कीर्त्यर्थं च सुतस्तव ।
व्यङ्गभूतः कुलस्यास्य सानुजो विनिपातितः ।। ४९।
अहं स एव गोमध्ये गोपैः सह वनेचरः ।
प्रीतिमान् विचरिष्यामि कामचारी यथा गजः ।। 2.32.५० ।।
एतावच्छतशोऽप्येवं सत्येनैतद् ब्रवीमि ते ।
न मे कार्यं नृपत्वेन विज्ञाप्यं क्रियतामिदम् ।। ५१ ।
भवान राजास्तु मान्यो मे यदूनामग्रणीः प्रभुः ।
विजयायाभिषिच्यस्व स्वराज्ये नृपसत्तम ।। ५२ ।।
यदि ते मत्प्रियं कार्यं यदि वा नास्ति ते व्यथा ।
मया निसृष्टं राज्यं स्वं चिराय प्रतिगृह्यताम् ।। ५३ 
।।( हरिवंशपुराण विष्णुपर्व अध्याय ३२)।

"नरेश्वर! मुझे राज्य से कोई प्रयोजन नहीं है। न तो मैं राज्य का अभिलाषी हूँ और न राज्य के लोभ से मैंने कंस को मारा ही है। मैंने तो केवल लोकहित के लिये और कीर्ति के लिये भाई सहित तुम्हारे पुत्र को मार गिराया है। जो इस कुल का विकृत (सड़ा हुआ) अंग था। मैं वही वनेचर होकर गोपों के साथ गौओं के बीच प्रसन्नतापूर्वक विचरूंगा, जैसे इच्छानुसार विचरने वाला हाथी वन में स्वच्छन्दक घूमता है मैं सत्य की शपथ खाकर इन बातों को सौ-सौ बार दुहराकर आपसे कहता हूं, मुझे राज्य से कोई काम नहीं है, आप इसका विज्ञापन कर दीजिये आप यदुवंशियों के अग्रगण्य स्वामी तथा मेरे लिये भी माननीय हैं, अत: आप ही राजा हो। नृपश्रेष्ठ! अपने राज्यों पर अपना अभिषेक कराइये, आपकी विजय हो यदि आपको मेरा प्रिय कार्य करना हो अथवा आपके मन में मेरी ओर से कोई व्यथा न हो तो मेरे द्वारा लौटाये गये इस राज्य को दीर्घकाल के लिये ग्रहण करें।' ।

श्रीमद्भागवतपुराणम्/स्कन्धः १०/पूर्वार्धः/अध्यायः ४५

←  श्रीमद्भागवतपुराणम्
       अध्यायः ४५

वसुदेवदेवकी सान्त्वनम्; उग्रसेनस्य राज्याभिषेकः; रामकृष्णयोरुपनयनं विद्याध्ययनं, गुरुर्मृतपुत्रस्यानयनं च -

अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः
श्रीशुक उवाच
पितरावुपलब्धार्थौ विदित्वा पुरुषोत्तमः
मा भूदिति निजां मायां ततान जनमोहिनीम् ।१।
उवाच पितरावेत्य साग्रजः सात्वर्षभः
प्रश्रयावनतः प्रीणन्नम्ब तातेति सादरम्। २।
नास्मत्तो युवयोस्तात नित्योत्कण्ठितयोरपि
बाल्यपौगण्डकैशोराः पुत्राभ्यामभवन्क्वचित् ।३।
न लब्धो दैवहतयोर्वासो नौ भवदन्तिके
यां बालाः पितृगेहस्था विन्दन्ते लालिता मुदम् ।४।
सर्वार्थसम्भवो देहो जनितः पोषितो यतः
न तयोर्याति निर्वेशं पित्रोर्मर्त्यः शतायुषा। ५।
यस्तयोरात्मजः कल्प आत्मना च धनेन च
वृत्तिं न दद्यात्तं प्रेत्य स्वमांसं खादयन्ति हि ।६।
मातरं पितरं वृद्धं भार्यां साध्वीं सुतं शिशुम्
गुरुं विप्रं प्रपन्नं च कल्पोऽबिभ्रच्छ्वसन्मृतः ।७।
तन्नावकल्पयोः कंसान्नित्यमुद्विग्नचेतसोः
मोघमेते व्यतिक्रान्ता दिवसा वामनर्चतोः ।८।
तत्क्षन्तुमर्हथस्तात मातर्नौ परतन्त्रयोः
अकुर्वतोर्वां शुश्रूषां क्लिष्टयोर्दुर्हृदा भृशम् ।९।
श्रीशुक उवाच
इति मायामनुष्यस्य हरेर्विश्वात्मनो गिरा
मोहितावङ्कमारोप्य परिष्वज्यापतुर्मुदम् ।१०।
सिञ्चन्तावश्रुधाराभिः स्नेहपाशेन चावृतौ
न किञ्चिदूचतू राजन्बाष्पकण्ठौ विमोहितौ ।११।
एवमाश्वास्य पितरौ भगवान्देवकीसुतः
मातामहं तूग्रसेनं यदूनामकरोन्नृपम् ।१२।
आह चास्मान्महाराज प्रजाश्चाज्ञप्तुमर्हसि
ययातिशापाद्यदुभिर्नासितव्यं नृपासने ।१३।
मयि भृत्य उपासीने भवतो विबुधादयः
बलिं हरन्त्यवनताः किमुतान्ये नराधिपाः ।१४।
सर्वान्स्वान्ज्ञातिसम्बन्धान्दिग्भ्यः कंसभयाकुलान्

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यदु वंश में कभी भी कोई पैत्रक या वंशानुगत रूप से राजा नहीं हुआ राजतन्त्र प्रणाली को यादवों ने कभी नही आत्मसात् किया चाहें वह त्रेता युग का सम्राट सहस्रबाहू अर्जुन हो अथवा शशिबिन्दु  ये सम्राट अवश्य बने परन्तु लोकतन्त्र प्रणाली से अथवा अपने पौरुषबल से ही बने पिता की विरासत से नही इसी प्रकार वर्ण -व्यवस्था भी यादवों ने कभी नहीं स्वीकार की ।

अत: राजा सम्बोधन यादवों के लिए कभी नहीं रहा कृष्ण को कब राजा कहा गया 

राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध मे इतिहास में कई मत प्रचलित हैं।
कुछ इतिहासकारों का मानना है कि राजपूत संस्कृत के राजपुत्र शब्द का अपभ्रंश है; राजपुत्र शब्द हिन्दू धर्म ग्रंथों में कई स्थानों पर देखने को मिल जायेगा लेकिन वह जातिसूचक के रूप में नही होता अपितु  किसी भी राजा के संबोधन सूचक शब्द के रूप में होता है । 

परन्तु  अध्ययन करने पर हम पाते हैं कि पुराणों में एक स्थान पर राजपुत्र जातिसूचक शब्द के रूप में आया है जो कि इस प्रकार है-👇
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भावार्थ:- क्षत्रिय से करण-कन्या(वैश्य पुरुष और शूद्र कन्या से ) में राजपुत्र और राजपुत्र की कन्या में करण द्वारा 'आगरी' उत्पन्न हुआ।

राजपुत्र के क्षत्रिय पुरुष द्वारा करण कन्या के गर्भ में उत्पन्न होने का वर्णन (शब्दकल्पद्रुम) में भी आया है- "करणकन्यायां क्षत्त्रियाज्जातश्च इति पुराणम् ॥"
अर्थात:- क्षत्रिय पुरुष द्वारा करण कन्या में उतपन्न संतान...

यूरोपीय विश्लेषक मोनियर विलियमस् ने भी लिखा है कि-
A rajpoot,the son of a vaisya by an ambashtha or the son of Kshatriya by a karan...
~A Sanskrit English Dictionary:Monier-Williams, page no. 873

शब्दकल्पद्रुम व वाचस्पत्य में भी एक अन्य स्थान पर भी राजपुत्र शब्द जातिसूचक शब्द के रूप में आया है; जो कि इस प्रकार है:-

 ३- वर्णसङ्करभेदे राजपुत्र “वैश्यादम्बष्ठकन्यायां
राजपुत्रस्य सम्भवः” इति पराशरःसंहिता ।
अर्थात:- वैश्य पुरुष के द्वारा अम्बष्ठ कन्या में राजपूत उतपन्न होता है।

राजपूत सभा के अध्यक्ष श्री गिर्राज सिंह लोटवाड़ा जी के अनुसार राजपूत शब्द रजपूत शब्द से बना है जिसका अर्थ वे मिट्टी का पुत्र बतलाते हैं...

थोड़ा अध्ययन करने के बाद ये रजपूत शब्द हमें स्कंद पुराण के सह्याद्री खण्ड में देखने को मिलता है जो कि इस प्रकार एक वर्णसंकर जाति के अर्थ में है-



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 उपर्युक्त सन्दर्भ:-
(स्कन्दपुराण- आदिरहस्य सह्याद्रि-खण्ड- व्यास देव व सनत्कुमार का संकर जाति विषयक संवाद नामक २६ वाँ अध्याय-श्लोक संख्या- ४७,४८,४९ पर राजपूतों की उत्पत्ति वर्णसंकर के रूप में है ।भावार्थ:-क्षत्रिय से शूद्र जाति की स्त्री में राजपूत उत्पन्न होता है यह भयानक, निर्दय , शस्त्रविद्या और रण में चतुर तथा शूद्र धर्म वाला होता है ;और शस्त्र- वृत्ति से ही अपनी जीविका चलाता है )
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कुछ विद्वानों के अनुसार राजपूत क्षत्रिय शब्द का पर्यायवाची है...
लेकिन अमरकोष में राजपूत और क्षत्रिय शब्द को परस्पर पर्यायवाची नही बतलाया है; स्वयं देखें-
अर्थात:- मूर्धाभिषिक्त,राजन्य,बाहुज,क्षत्रिय,विराट्,राजा,राट्,पार्थिव,क्ष्माभृत्,नृप,भूप,और महिक्षित ये क्षत्रिय शब्द के पर्याय है।
इसमें 'राजपूत' शब्द या तदर्थक कोई अन्य शब्द नहीं आया है।


पुराणों के निम्न श्लोक को पढ़ें-
-ब्रह्मवैवर्तपुराणम्/खण्डः १ (ब्रह्मखण्डः)/अध्यायः १०/श्लोकः (९९)
भावार्थ:-क्षत्रिय के बीज से राजपुत्र की स्त्री में तीवर उतपन्न हुआ।वह भी व्याभिचार दोष के कारण पतित कहलाया।

यदि क्षत्रिय और राजपूत परस्पर पर्यायवाची शब्द होते तो क्षत्रिय पुरुष और राजपूत स्त्री की संतान राजपूत या क्षत्रिय ही होती न कि तीवर या धीवर!!

इसके अतिरिक्त शब्दकल्पद्रुम में राजपुत्र को वर्णसंकर जाति लिखा है जबकि क्षत्रिय वर्णसंकर नही...
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Manohar Laxman  varadpande(1987). History of Indian theatre: classical theatre. Abhinav Publication. Page number 290

"The word kshatriya is not synonyms with Rajput."
अर्थात- क्षत्रिय शब्द राजपूत का पर्यायवाची नहीं है।

मराठी इतिहासकार कालकारंजन  ने अपनी पुस्तक (प्राचीन- भारताचा इतिहास) के हर्षोत्तर उत्तर भारत नामक विषय के प्रष्ठ संख्या ३३४ में राजपूत और वैदिक क्षत्रिय भिन्न भिन्न बतलाये हैं।

वैदिक क्षत्रियों द्वारा पशुपालन करने का उल्लेख धर्म ग्रंथों में स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है जबकि राजपूत जाति पशुपालन को अत्यंत घृणित दृष्टि से देखती है और पशुपालन के प्रति संकुचित मानसिकता रखती है...

महाभारत में जरासंध पुत्र सहदेव द्वारा गाय भैंस भेड़ बकरी को युधिष्ठिर को भेंट करने का उल्लेख मिलता है;युधिष्ठिर जो कि एक क्षत्रिय थे पशु पालन करते होंगे तभी कोई भेंट में पशु देगा-


~महाभारतम्/ सभापर्व(जरासंध वध पर्व)/अध्याय: २४/ श्लोक: ४१

सहदेव ने कहा- प्रभो! ये गाय, भैंस, भेड़-बकरे आदि पशु, बहुत से रत्न, हथी-घोड़े और नाना प्रकार के वस्त्र आपकी सेवा में प्रस्तुत हैं। गोविन्द! ये सब वस्तुएँ धर्मराज युधिष्ठिर को दीजिये अथवा आपकी जैसी रुचि हो, उसके अनुसार मुझ सवा के लिये आदेश दीजिये।।

इसके अतिरिक्त कृष्ण यजुर्वेद तैत्तिरीय संहिता ७/१/४/९ में क्षत्रिय को भेड़ पालने के लिए कहा गया है

कुछ विद्वानों के अनुसार राजपूत एक संघ है 
जिसमें अनेक जन-जातियों का समायोजन है-

Brajadulal Chattopadhyay 1994; page number 60-
प्रारंभिक मध्ययुगीन साहित्य बताता है कि इस नवगठित राजपूत में कई जातियों के लोग शामिल थे।

भारतीय तथा यूरोपीय विद्वानों ने इस ऐतिहासिक तथ्य का पूर्णतः पता लगा लिया है कि जिस काल में इस जाति का भारत के राजनैतिक क्षेत्र में पदार्पण हुआ था, उस काल में यह एक नवागन्तुक जाति समझती जाती थी।
बंगाल के अद्वितीय विद्वान स्वर्गीय श्री रमेशचंद्र दत्त महोदय अपने (Civilization in Ancient India) नामक प्रसिद्ध ग्रंथ के भाग-२ , प्रष्ठ १६४ में लिखते है-
आठवीं शताब्दी के पूर्व राजपूत जाति हिंदू आर्य नहीं समझी जाती थी।देश के साहित्य तथा विदेशी पर्यटकों के भृमण वृत्तान्तों में उनके नाम का उल्लेख हम लोगों को नहीं मिलता और न उनकी किसी पूर्व संस्कृति के चिन्ह देखने में आते हैं।डॉक्टर एच० एच० विल्सन् ने यह निर्णय किया है कि ये(राजपूत)उन शक आदि विदेशियों के वंशधर है जो विक्रमादित्य से पहले,सदियों तक भारत में झुंड के झुंड आये थे।

विदेशी जातियां शीघ्र ही हिंदू बन गयी।वे जातियाँ अथवा कुटुम्ब जो शासक पद को प्राप्त करने में सफल हुए हिंदुओं की राज्यशासन पद्धति में क्षत्रिय बनकर तुरन्त प्रवेश कर गए।इसमें कोई संदेह नहीं कि उत्तर के परिहार तथा अनेक अन्य राजपूत जातियों का विकास उन बर्बर विदेशियों से हुआ है, जिनकी बाढ़ पाँचवीं तथा छठी शताब्दीयों में भारत में आई थी।

इतिहास-विशारद स्मिथ साहब अपने Early History of India including Alexander's Compaigns, second edition,page no. 303 and 304 में लिखते हैं-

आगे दक्षिण की ओर से बहुत सी आदिम अनार्य जातियों ने भी हिन्दू बनकर यही सामाजिक उन्नति प्राप्त कर ली,जिसके प्रभाव से सूर्य और चंद्र के साथ सम्बन्ध  जोड़ने वाली वंशावलियों से सुसज्जित होकर गोड़, भर,खरवार आदि क्रमशः चन्देल, राठौर,गहरवार तथा अन्य राजपूत जातियाँ बनकर निकल पड़े।

इसके अतिरिक्त स्मिथ साहब अपने The Oxford student's history of India, Eighth Edition, page number 91 and 92 में लिखते हैं-

उदाहरण के लिए अवध की प्रसिद्ध राजपूत जाति जैसों को लीजिये।ये भरों के समीपी सम्बन्धी अथवा अन्य इन्हीं की संतान हैं।आजकल इन भरों की प्रतिनिधि, अति ही नीची श्रेणी की एक बहुसंख्यक जाति है।

जस्टिस कैम्पबेल साहब ने लिखा है कि प्राचीन-काल की रीति-रिवाजों (आर्यों की) को मानने वाले जाट, नवीन हिन्दू-धर्म के रिवाजों को मानने पर राजपूत हैं।
जाटों से राजपूत बने हैं न कि राजपूतों से जाट।

जबकि स्व० प्रसिद्ध इतिहासकार  शूरवीर पँवार ने अपने एक शोध आलेख में गुर्जरों को राजपूतों का पूर्वज माना है।

मुहम्मद कासिम फरिश्ता ने भी राजपूतों की उत्पत्ति के विषय में फ़ारसी में अपनी पुस्तक
 "तारीक ऐ फरिश्ता" में अपना मत प्रस्तुत किया है इस पुस्तक का अंग्रेजी में अनुवाद किया Lt Colonel John Briggs ने जो मद्रास आर्मी में थे, किताब के पहले वॉल्यूम ( Volume - 1 ) के Introductory Chapter On The Hindoos में पेज नंबर 15 पर लिखा है-
The origion of Rajpoots is thus related The rajas not satisfied with their wives, had frequently children by their female slaves who although not legitimate successors to the throne ,were Rajpoots or the children of the rajas "
अर्थात:- राजा अपनी पत्नियों से संतुष्ट नहीं थे, उनकी महिला दासियो द्वारा अक्सर बच्चे होते थे, जो सिंहासन के लिए वैध उत्तराधिकारी नहीं थे, लेकिन इनको राजपूत या राजा के बच्चे या राज पुत्र कहा जाता था ।

प्रसिद्ध इतिहासकार ईश्वरी प्रसाद जी ने अपनी पुस्तक
 "A Short History Of Muslim Rule In India" के पेज नंबर 19 पर बताया है की राजपुताना में किसको बोला जाता है राजपूत-
The word Rajput in comman paralance,in certain states of Rajputana is used to denote the illegitimate sons of a Ksatriya chief or a jagirdar.
अर्थात:-राजपुताना के कुछ राज्यों में आम बोल चाल में राजपूत शब्द का प्रयोग एक क्षत्रिय मुखिया या जागीरदार के नाजायज बेटों को सम्बोधित करने के लिए प्रयोग किया जाता है।

विद्याधर महाजन जी ने अपनी पुस्तक "Ancient India" जो की 1960 से दिल्ली विश्वविद्यालय में पढाई जा रही है ,  के पेज 479 पर लिखा है:-
The word Rajput is used in certain parts of Rajasthan to denote the illegitimate sons of a Kshatriya Chief ar Jagirdar. अर्थात:- राजपूत शब्द राजस्थान के कुछ हिस्सों में एक क्षत्रिय प्रमुख या जागीरदार के नाजायज बेटों को निरूपित करने के लिए उपयोग किया जाता है।

History of Rise of Mohammadan power in India, volume 1, chapter 8
The Rajas, not satisfied with their wives, had frequently children by their female slaves, who, although not legitimate successors to the throne,were styled rajpoots, or the children of the rajas. 
The muslim Invaders took full advantage of this realy bad and immoral practice popular among indian kings, to find a good alley among hindoos and to also satisfy their own lust and appointed those son of kings as their Governors.

History of Rajsthan book "He was son of king but not from the queen."

राजस्थान का इतिहास भाग-1:-गोला का अर्थ दास अथवा गुलाम होता है। 

भीषण दुर्भिक्षों के कारण राजस्थान में गुलामों की उत्पत्ति हुई थी। इन अकालों के दिनों में हजारों की संख्या में मनुष्य बाजारों में दास बनाकर बेचे जाते थे। 
पहाड़ों पर रहने वाली पिंडारी और दूसरी जंगली जातियों के अत्याचार बहुत दिनों तक चलते रहे और उन्हीं जातियों के लोगों के द्वारा बाजारों में दासों की बिक्री होती थी, वे लोग असहाय राजपूतों को पकड़कर अपने यहाँ ले जाते थे और उसके बाद बाजारों में उनको बेच आते थे। 
इस प्रकार जो निर्धन और असहाय राजपूत खरीदे और बेचे जाते थे, उनकी संख्या राजस्थान में बहुत अधिक हो गयी थी और उन लोगों की जो संतान पैदा होती थी, वह गोला के नाम से प्रसिद्ध हुई। 

इन गुलाम राजपूतों को गोला और उनकी स्त्रियों तथा लड़कियों को गोली कहा जाता था। 
इन गोला लोगों में राजपूत, मुसलमान और अनेक दूसरी जातियों के लोग पाये जाते हैं।

बाजारों में उन सबका क्रय और विक्रय होता है। बहुत से राजपूत सामन्त इन गोला लोगों की अच्छी लड़कियों को अपनी उपपत्नी बना लेते हैं और उनसे जो लड़के पैदा होते हैं, वे सामन्तों के राज्य में अच्छे पदों पर काम करने हेतु नियुक्त कर दिये जाते हैं।

 देवगढ़ का स्वर्गीय सामन्त जब उदयपुर राजधानी में आया करता था तो उसके साथ तीन सौ अश्वारोही गोला सैनिक आया करते थे। उन सैनिकों के बायें हाथ एक-एक साने का कडा होता था 

जैसा कि राजस्थान का इतिहास नामक पुस्तक में लिखा है कि इन्हें अच्छे पदों पर काम करने के हेतु नियुक्त किया जाता था और history of Rise of Mohammadan में भी लिखा कि मुगल काल में ये शक्तिशाली होने लगे तब इन्होंने सत्ता के लिए लड़ना प्रारम्भ कर दिया जैसा कि ऐतिहासिक ग्रंथो में ऐसे राजाओं के प्रमाण मिल जायेंगे जो जीवन भर सत्ता के लिए लड़ते रहे
जैसा कि कर्नल टॉड की किताब राजस्थान का इतिहास में कन्नौज और अनहिलवाडा के राजाओं ने सत्ता के लिए पृथ्वीराज चौहान को शक्तिहीन करने के लिए गजनी के शाहबुद्दीन को आमंत्रित किया !

और अजीत सिंह ने सत्ता के लिए राजा दुर्गादास राठौर को राज्य से निष्कासित करवा दिया।
राणा सांगा के बड़े भाई पृथ्वीराज के दासी पुत्र बनवीर ने सत्ता के लिए विक्रमादित्य की हत्या करवाई...
इतिहासकार गोपीनाथ शर्मा की एक पुस्तक में प्रताप सिंह द्वारा सत्ता के लिए जगपाल को मारने का उल्लेख मिलता है।

पृथ्वीराज उड़ाना और राणा सांगा के मध्य सत्ता के लिए खुनी झगड़ा होने का ऐतिहासिक पुस्तको में जिक्र मिलता है और इसी झगड़े में राणा सांगा अपनी एक आँख और हाथ खो देते है और पृथ्वीराज उड़ाना को मरवा देते है।

कैसे सत्ता के लिए राजकुमार रणमल राठौर राणा मोकल को रेकय से निकलवा देता है और राणा राघव देव की हत्या करवा देता है!!

ऐसे करके ये सत्ता में बने रहे और इनकी वित्तीय स्थिति काफी मजबूत हो गयी...
भावार्थ:-कलयुग में जिसके पास धन होगा,उसी को लोग कुलीन,सदाचारी और सद्गुणी मानेंगे।जिसके हाथ में शक्ति होगी वही धर्म और न्याय की व्यवस्था अपने अनुकूल करा सकेगा।

राजपूतों ने मुगलों को तो अपनी बेटियाँ दीं राजसत्ताओं के लालच में क्यों कन्या अथवा स्त्री इनके लिए भोग के ही साधन थे हिन्दु स्मृति- ग्रन्थों को आधार मानकर स्त्रियों के प्रति तत्कालीन पुरोहित और राजपूत समाज का दृष्टि कोण  समतामूलक नहीं था लैंगिक स्तर पर स्त्री का बजूद सन्तान उत्पादिका और उपभोग हेतु था 

जब राजपूत और राजपूताना के इतिहास पर चर्चा होती है तो उस काल मे राजपूत शासकों के आश्रित एवं स्वतन्त्र रूप से लिखी गई ख्यातों से तमाम ऐतिहासिक साक्ष्य लिए जाते हैं ।

तथा उनकी पुष्टि करण हेतु अन्य स्रोतों से साम्य करने के बाद उसे इतिहास की शक्ल या प्रारूप दिया जाता है। 
ऐसी ही एक ख्यात का ज़िक्र लेखक और पत्रकार नज़ीर मलिक साहब के हरा ले की जानिब से है जिसमें राष्ट्रकवि "रामाधारी सिंह दिनकर" ने अपनी पुस्तक 
"संस्कृति के चार अध्याय' के पृष्ठ संख्या 232-33 पर दिया है , जिससे पता चलता है कि मुगलों की इच्छा के बाद भी उनकी लड़कियाँ राजपूतों से क्यों नही ब्याही जा सकीं, जब कि राजपूतों की लड़कियां मुगकों के घर आती रहीं।

स्वर्गीय दिनकर जी ने राजस्थान की प्रसिद्ध ख्यात "वीर विनोद" के हवाले से लिखा है कि जब हुमायूँ  अचानक सूरी से हार कर ईरान में शरण लिए हुए था तो एक दिन शेरशाह ने ईरान में हुमायूं से पूछा कि मुगल अपनी बेटियों की शादियां हिन्दुस्न की किसी वीर जाति से की है या नहीं।  
इस पर मुगल शासक हुमायूँ ने बादशाह से कहा कि पठान तो हमारे शत्रु हैं,  और राजपूत हमसे बेटी लेंगे नहीं।  
ये बात हुमायूँ को खटक रही  थी अतः मरने से पूर्व उसने अकबर को आदेश दिया कि वह राजपूतों से दोस्ती करने के लिए उससे रोटी-बेटी का सम्बंध बनाने का प्रयास ज़रूर करे। 
हुमायूँ की इसी वादीयत के मुताबिक अकबर ने कई राजपूत सरदारों से कहा कि वे मुगलों की बेटी से शादिया करें। 
लेकिन अकबर का यह प्रस्ताव राजपूत सरदारों के गले नही उतरा। 

राजपूतों का विचार था। कि अगर उन्होंने मुगल शहज़ादियों से शादियां की तो हिन्दू शास्त्र के अनुसार वे सब भ्रष्ट हो जाएँगे और मुसलमान मान लिए जाएँगे। 

"इसलिए आपस मे सोच विचार कर उन्होंने निर्णय लिया कि राजपूत भले अपनी बेटी मुगलों को व्याह कर उसे त्याग देंगे मगर वे मुगलों की बेटी नही लाएंगे। 
सन्दर्भ- (वीर विनोद, द्वितीय खंड, भाग एक, पृष्ठ 170 की पाद टिप्पणी से )

वीर विनोद नामक ख्यात में लिखी बात की पुष्टि करते हुए राजपूतों की वीरता और वफादारी पर कुछ और भी लिखा है जिसे अकबरकालीन किताब "महसिरुल उमरा" से लिया है।

इन बातों से पता चलता है कि मुगलो की ज़्यादातर शहजादियाँ कुँवारी क्यों राह जाती थी ? दूसरी बात यह कि तत्कालीन हिन्दू धर्म पर बंदिशें कितनी सख्त थीं कि वहाँ किसी मुलिम को हिन्दू धर्म मे शामिल करने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी।                                                  जबकि हिन्दू मुस्लिम तो बन सकता था ।
सती प्रथा बालकन्याविवाह आदि कुप्रथाऐं उपभोगात्मक और निज भोगारक्षण को दृष्टि गत करके बनायी गयी थीं ।
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16वीं शताब्दी के मध्यकालीन समय के बाद, कई राजपूत शासकों ने मुगल सम्राटों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए और विभिन्न क्षमताओं से उनकी सेवा की। राजपूतों के समर्थन के कारण ही अकबर भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखने में सक्षम हुआ था।राजपूत रईसों ने अपने राजनैतिक उद्देश्यों के लिए मुगल बादशाहों और उनके राजकुमारों से अपनी बेटियों की शादी करवाई थी।

 उदाहरण के लिए, अकबर ने अपने लिए और अपने पुत्रों व पौत्रों के लिए 40 शादियां सम्पन्न कीं, जिनमें से 17 राजपूत-मुगल गठबंधन थे। मुगल सम्राट अकबर के उत्तराधिकारी, उनके पुत्र जहाँगीर और पोते शाहजहाँ की माताएँ राजपूत थीं।

मेवाड़ के सिसोदिया राजपूत परिवार ने मुगलों के साथ वैवाहिक संबंधों में नहीं जुड़ने को सम्मान की बात बना दिया और इस तरह से वे अन्य सभी राजपूत कुलों से विपरीत खड़े रहे थे।

इस समय के पश्चात राजपुतों और मुगलों के बीच वैवाहिक संबंधों में कुुछ कमी आई।

राजपूतों के साथ अकबर के संबंध तब शुरू हुए थे जब वह 1561 में आगरा के पश्चिम में सीकरी के चिस्ती सूफी शेख की यात्रा से लौटा था। तभी बहुत राजपूत राजकुमारियों ने अकबर से शादी रचाई थी।

राजपूत-मुग़ल वैवाहिक संबंधों की सूची-

मुख्य राजपूत-मुग़ल वैवाहिक संबंधों की सूची

  • जनवरी 1562, अकबर ने राजा भारमल की बेटी से शादी की. (कछवाहा-अंबेर)
  • 15 नवंबर 1570, राय कल्याण सिंह ने अपनी भतीजी का विवाह अकबर से किया (राठौर-बीकानेर)
  • 1570, मालदेव ने अपनी पुत्री रुक्मावती का अकबर से विवाह किया. (राठौर-जोधपुर)
  • 1573, नगरकोट के राजा जयचंद की पुत्री से अकबर का विवाह (नगरकोट)
  • मार्च 1577, डूंगरपुर के रावल की बेटी से अकबर का विवाह (गहलोत-डूंगरपुर)
  • 1581, केशवदास ने अपनी पुत्री का विवाह अकबर से किया (राठौर-मोरता)
  • 16 फरवरी, 1584, राजकुमार सलीम (जहांगीर) का भगवंत दास की बेटी से विवाह (कछवाहा-आंबेर)
  • 1587, राजकुमार सलीम (जहांगीर) का जोधपुर के मोटा राजा की बेटी से विवाह (राठौर-जोधपुर)
  • 2 अक्टूबर 1595, रायमल की बेटी से दानियाल का विवाह (राठौर-जोधपुर)
  • 28 मई 1608, जहांगीर ने राजा जगत सिंह की बेटी से विवाह किया (कछवाहा-आंबेर)
  • 1 फरवरी, 1609, जहांगीर ने राम चंद्र बुंदेला की बेटी से विवाह किया (बुंदेलाओर्छा)
  • अप्रैल 1624, राजकुमार परवेज का विवाह राजा गज सिंह की बहन से (राठौर-जोधपुर)
  • 1654, राजकुमार सुलेमान शिकोह से राजा अमर सिंह की बेटी का विवाह(राठौर-नागौर)
  • 17 नवंबर 1661, मोहम्मद मुअज्जम का विवाह किशनगढ़ के राजा रूप सिंह राठौर की बेटी से(राठौर-किशनगढ़)
  • 5 जुलाई 1678, औरंगजेब के पुत्र मोहम्मद आजाम का विवाह कीरत सिंह की बेटी से हुआ. कीरत सिंह मशहूर राजा जय सिंह के पुत्र थे. (कछवाहा-आंबेर)
  • 30 जुलाई 1681, औरंगजेब के पुत्र काम बख्श की शादी अमरचंद की बेटी से हुए(शेखावत-मनोहरपुर)[13][14][15]

सन्दर्भ★-

  1.  Richards, John F. (1995). The Mughal Empire. Cambridge University Press. पपृ॰ 22–24. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-521-25119-8.
  2.  Bhadani, B. L. (1992). "The Profile of Akbar in Contemporary Literature". Social Scientist20 (9/10): 48–53. JSTOR 3517716डीओआइ:10.2307/3517716.
  3.  Chaurasia, Radhey Shyam (2002). History of Medieval India: From 1000 A.D. to 1707 A.D. Atlantic Publishers & Dist. पपृ॰ 272–273. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-269-0123-4.
  4.  Dirk H. A. Kolff 2002, पृ॰ 132.
  5.  Smith, Bonnie G. (2008). The Oxford Encyclopedia of Women in World History. Oxford University Press. पृ॰ 656. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-19-514890-9. मूल से 2 सितंबर 2016 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 11 जुलाई 2020.
  6.  Richards, John F. (1995). The Mughal Empire. Cambridge University Press. पृ॰ 23. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-521-56603-2. मूल से 16 जून 2020 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 11 जुलाई 2020.
  7.  Lal, Ruby (2005). Domesticity and Power in the Early Mughal World. Cambridge University Press. पृ॰ 174. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-521-85022-3.
  8.  Vivekanandan, Jayashree (2012). Interrogating International Relations: India's Strategic Practice and the Return of History War and International Politics in South Asia. Routledge. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-136-70385-0.
  9.  Hansen, Waldemar (1972). The peacock throne : the drama of Mogul India (1. Indian ed., repr. संस्करण). Delhi: Motilal Banarsidass. पपृ॰ 12, 34. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-208-0225-4.
  10.  Barbara N. Ramusack 2004, पृ॰प॰ 18–19.
  11.  Chandra, Satish (2007). Medieval India: From Sultanat to the Mughals Part-II. Har Anand Publications. पृ॰ 124. मूल से 23 दिसंबर 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 11 जुलाई 2020.
  12.  David O. Morgan, Anthony Reid, (2010). The New Cambridge History of Islam: Volume 3, The Eastern Islamic World, Eleventh to Eighteenth Centuries. Taylor and Francis. पृ॰ 213.
  13.  "मुगल नहीं राजपूत थे शाहजहां, ताज पर सवाल क्‍यों?"News18India. 2017-11-01. मूल से 14 मई 2020 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2020-07-12.
  14.  "राजपूत मां का बेटा शाहजहां सिर्फ़ मुसलमान कैसे"News18India. 2017-10-30. मूल से 11 जुलाई 2020 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2020-07-12.
  15.  "पद्मावती : जिनके लिए लड़ रहे हो वो तो आपस में मौज से रहते थे"iChowk.in. 2017-11-26. अभिगमन तिथि 2020-07-12.
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