शनिवार, 19 सितंबर 2020

स्वर्ग की खोज ओर सुर और असुर का रहस्य ...

स्वर्ग की खोज और देवों का रहस्य....
· 🌓⚡⛅..स्वर्ग की खोज और देवों का रहस्य .....यथार्थ के धरा तल पर प्रतिष्ठित एक आधुनिक शोध है | ...🌓⚡⛅
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आज से दश सहस्र ( दस हज़ार )वर्ष पूर्व मानव सभ्यता की व्यवस्थित संस्था  देवजाति का प्रस्थान स्वर्ग से भू- मध्य रेखीय स्थल अर्थात् आधुनिक भारत में हुआ था |
यद्यपि अपनी यात्रा काल में अनेक पढ़ावों का आश्रय भी लिया |

यद्यपि अवान्तर यात्रा काल में सुमेरियन तथा बैवीलॉनियन संस्कृतियों से भी साक्षात्कार हुया ।
परन्तु फिर अपनी प्रारम्भिक स्मृतियों को सँजोए रखा ।

स्वर्ग और नरक की धारणाऐं सुमेरियन संस्कृति में शियोल और नरगल के रूप में अवशिष्ट रहीं ,
सुमेरियन लोगों ने शियॉल नाम से एक काल्पनिक लोग की कल्पना की थी ।
जहाँ मृत्यु के बाद आत्माऐं प्ररस्थान करती हैं ।
हमारा वर्ण्य- विषय भी स्वर्ग और नरक ही है ।
स्वर्ग नरक की मान्यताओं का विस्तार पौराणिक काल में भारत में अधिक हुआ !

हमारा यह तथ्य अपने आप में यथार्थ होते हुए भी रूढ़िवादी जन समुदाय की चेतनाओं में समायोजित होना कठिन है !

फिर भी प्रमाणों के द्वारा इस तथ्य को सिद्ध किया गया है ! यह नवीन शोध 
यादव योगेश कुमार "रोहि "की दीर्घ कालिक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक साधनाओं का परिणाम है .विश्व इतिहास में यह अब तक का सबसे नवीनत्तम और अद्भुत शोध है !

निश्चित रूप से रूढ़िवादी जगत् के लिए यह शोध एक बबण्डर सिद्ध होगा बुद्धि जीवियों तक यह सन्देश न पहँच पाए इस हेतु के लिए अनिष्ट कारी शक्तियों ने अनेक विघ्न उत्पन्न किए हैं तीन वार यह विघ्न उत्पन्न हुआ है !

 पूरा सन्देश डिलीट कर दिया गया है परन्तु वह कारक अज्ञात ही था जिसके द्वारा यह संदेश नष्ट किया गया था फिर ईश्वर की कृपा निरन्तर बनी रही 

आर्य संस्कृति का प्रादुर्भाव देवों अथवा स्वरों { सुरों} से हुआ है |
यह भारतीय संस्कृति की दृढ़ मान्यता है , सुर { स्वर } जिस स्थान { रज} पर पर रहते थे उसे ही स्वर्ग कहा गया है --- 
"स्वरा: सुरा:वा राजन्ते यस्मिन् देशे तद् स्वर्गम् कथ्यते "....जहाँ छःमहीने का दिन और छःमहीने की रातें होती हैं वास्तव में आधुनिक समय में यह स्थान स्वीडन
 { Sweden} है जो उत्तरी ध्रुव पर हैमर पाष्ट के समीप है प्राचीन नॉर्स भाषाओं में स्वीडन को ही स्वरगे 
{ Svirge } कहा है!

भारतीय देव संस्कृतियों के अनुयायीयों को इतना स्मरण था कि उनके पूर्वज सुर { देव} उत्तरी ध्रुव के समीप स्वेरिगी में रहते थे इस तथ्य के भारतीय सन्दर्भ भी विद्यमान् हैं |
बुद्ध के परवर्ती काल खण्ड में लिपि बद्ध ग्रन्थ मनु स्मृति में वर्णित है| 
दैवे रात्र्यहनी वर्षं प्रविभागस्तयोः पुनः ।
अहस्तत्रोदगयनं रात्रिः स्याद्दक्षिणायनम् । ।1/67
अर्थ:-
वर्षम्) मनुष्यों का एक वर्ष (दैवे रात्र्यहनी) देवताओं के एक दिन - रात होते हैं (तयोः पुनः प्रविभागः) उनका भी फिर विभाग है (तत्र उदगयनम् अहः) उनमें ‘उत्तरायण’ देवों का दिन है, और (दक्षिणायनम् रात्रिः स्यात्) ‘दक्षिणा-यन’ देवों की रात है ।
ब्राह्मस्य तु क्षपाहस्य यत्प्रमाणं समासतः ।
एकैकशो युगानां तु क्रमशस्तन्निबोधत । ।1/68
 (ब्राह्मस्य तु क्षपा - अहस्य) परमात्मा के दिन - रात का तु तथा एकैकशः युगानाम् एक - एक युगों का यत् प्रमाणम् जो कालपरिमाण है तत् उसे क्रमशः क्रमानुसार और समासतः संक्षेप से निबोधत सुनो । 
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्साणां तत्कृतं युगम् ।
तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः । ।1/69

तत् चत्वारि सहस्त्राणि वर्षाणां कृतं युगम् आहुः उन देवताओं ६७ वें में जिनके दिन - रातों का वर्णन है के चार हजार दिव्य वर्षों का एक ‘सतयुग’ कहा है (तस्य) इस सतयुग की यावत् शती सन्ध्या उतने ही सौ वर्ष की अर्थात् ४०० वर्ष की संध्या होती है और तथाविधः उतने ही वर्षों का अर्थात् संध्यांशः संध्याशं का समय होता है ।

इतरेषु ससंध्येषु ससंध्यांशेषु च त्रिषु ।
एकापायेन वर्तन्ते सहस्राणि शतानि च । ।1/70
च और इतरेषु त्रिषु शेष अन्य तीन - त्रेता, द्वापर, कलियुगों में ससंध्येषु संसध्यांशेषु ‘संध्या’ नामक कालों में तथा ‘संध्यांश’ नामक कालों में सहस्त्राणि च शतानि एक - अपायेन क्रमशः एक हजार और एक - एक सौ घटा देने से वर्तन्ते उनका अपना - अपना कालपरिमाण निकल आता है अर्थात् ४८०० दिव्यवर्षों का सतयुग होता है, उसकी संख्याओं मं एक सहस्त्र और संध्या व संध्यांश में एक - एक सौ घटाने से ३००० दिव्यवर्ष + ३०० संध्यावर्ष + ३०० संध्यांशवर्ष - ३६०० दिव्यवर्षों का त्रेतायुग होता है । इसी प्रकार - २०००+२००+२००- २४०० दिव्यवर्षों का द्वापर और १०००+१००+१०० - १२०० दिव्यवर्षों का कलियुग होता है ।

 अहो रात्रे विभजते सूर्यो मानुष देैविके !! 
देवे रात्र्यहनी वर्ष प्र वि भागस्तयोःपुनः || 
अहस्तत्रोदगयनं रात्रिः स्यात् दक्षिणायनं 
मनु स्मृति १/६७ ...अर्थात् देवों और मनुष्यों के दिन रात का विभाग सूर्य करता है मनुष्य का एक वर्ष देवताओं का एक दिन रात होता है अर्थात् छः मास का दिन .जब सूर्य उत्तारायण होता है ! 

और छःमास की ही रात्रि होती है जब सूर्य दक्षिणायनहोता है !
 प्रकृति का यह दृश्य केवल ध्रुव देशों में ही होता है ! वेदों का उद्धरण भी है |
."अस्माकं वीरा: उत्तरे भवन्ति " हमारे वीर उत्तर में हुए इतना ही नहीं भारतीय पुराणों मे वर्णन है कि कि स्वर्ग उत्तर दिशा में है !!
 वेदों में भी इस प्रकार के अनेक संकेत हैं |

अदि॑ते॒ मित्र॒ वरु॑णो॒त मृ॑ळ॒ यद्वो॑ व॒यं च॑कृ॒मा कच्चि॒दागः॑। उ॒र्व॑श्या॒मभ॑यं॒ ज्योति॑रिन्द्र॒ मा नो॑ दी॒र्घा अ॒भि न॑श॒न्तमि॑स्राः॥ (ऋग्वेद 2/27/14)

हे सूर्य शक्ति सम्पन्न इन्द्र  मित्र और वरुण !

हमको सुखी करो जो तुम्हारा कुछ भी बड़ा हम अपराध करें तो उसो क्षमा करो और हम भय रहित होकर ज्योतिर्मयी दिनों को देखें और ये लम्बी राते हम्हारी कटें अर्थात् ये दीर्घ रातें हम्हें कष्टदायी हैं 

-हे (अदिते) अखण्डित स्वरूप और विज्ञानवाली न्यायकर्त्री राज्ञी तथा हे (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त (मित्र) सबके सखा (उत) और (वरुण) सबसे उत्तम राजन् आप हमको (मृळ) सुखी करो (यत्) जो (वः) तुम्हारा (कश्चित्) कुछ (उरु) बड़ा (आगः) अपराध (वयम्) हम (चकृम) करें उसको क्षमा करो जिससे (अभयम्) भयरहित (ज्योतिः) प्रकाशयुक्त दिन को (अश्याम्) प्राप्त होऊँ और (नः) हमारी (दीर्घाः) बड़ी (तमिस्राः) रात्री (मा) (न) (नशन्) काटें ॥१४॥

(मा नो दीर्घा अभिनशन् तमिस्राः ) ऋग्वेद २/२७/१४ वैदिक काल के ऋषि उत्तरीय ध्रुव से निम्मनतर प्रदेश बाल्टिक सागर के तटों पर अधिवास कर रहे थे ,
 उस समय का यह वर्णन है !
बाल्टिक भाषा में आज भी वैदिक भाषा के समान द्विवचन रूप होतें अर्थात् संस्कृत वैदिक और लिथुऑनियन भाषा मे तीन व्कयाकरणीय वचन होते हैं 
बाल्टिक का को लेट्टटिक भी कहते हैं इसकी तीन साखाऐं हैं १- प्राचीन प्राशन यद्यपि 17वीं सदी में यह समाप्त हो गयी इसका क्षेत्र बाल्टिक तट पर विश्चुला और नीमेन नदियों के बीच में स्थित प्रशा प्रदेश था  15वीं सदी के आरम्भ तक सौलहवीं सदी में लिखी कुछ पुस्तकें
मिली हैं बाल्टिक की दूसरी भाषा लिथुआनियन है 
यह भाषा वैदिक भाषा के समान बड़ी वैज्ञानिक है 
यह मूल भारोपीय भाषा के सन्निकट है 
संस्कृत का अस्ति इसमें इसमें एष्टि है जीवा: रूप भी है 
वैदिक भाषा के समान संगीतात्ममकता और व्याकरणिक रूप समान हैं 
अब यह रूसी परिवार की भाषा है अर्थात यह अब रूसी क्षेत्र  है तीसरी लेटविया रूस के पश्चिमी भाग लेटविया राज्य की भाषा है ! यह "स्लाव" से मिलती भाषा है 

 लम्बी रातें हम्हें अभिभूत न करें ....वैदिक पुरोहित भय भीत रहते थे, कि प्रातः काल होगा भी अथवा नहीं , क्यों कि रात्रियाँ छः मास तक लम्बी रहती थीं !
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रात्रि र्वै चित्र वसुख्युष्ट़इ्यै वा एतस्यै पुरा ब्राह्मणा अभैषुः --- तैत्तीरीय (संहित्ता १ ,५, ७, ५ )
अर्थात् चित्र वसु रात्रि है अतः ब्राह्मण भयभीत है कि सुबह ( व्युष्टि ) न होगी !!! आशंका है 
ध्यातव्य है कि ध्रुव बिन्दुओं पर ही दिन रात क्रमशःछः छः महीने के होते है | 

परन्तु उत्तरीय ध्रुव से नीचे क्रमशः चलने पर भू - मध्य रेखा पर्यन्त स्थान भेद से दिन रात की अवधि में भी भेद हो जाता है . और यह अन्तर चौबीस घण्टे से लेकर छः छः महीने का हो जाता है | 

अग्नि और सूर्य की महिमा आर्यों को उत्तरीय ध्रुव के शीत प्रदेशों में ही हो गयी थी !
अतः अग्नि - अनुष्ठान वैदिक सांस्कृतिक परम्पराओं का अनिवार्यतः अंग
था .जो परम्पराओं के रूप में यज्ञ के रूप में रूढ़ हो गया अग्निम् ईडे पुरोहितम् यज्ञस्य देवम् ऋतुज्यं होतारं रत्नधातव  ...ऋग्वेद १/१/१ ........
अग्नि के लिए २००सूक्त हैं ।
अग्नि और वस्त्र शीत प्रदेश में रहने वाले देव जातियों की  अनिवार्य आवश्यकताऐं थी |

वास्तव में तीन लोकों का तात्पर्य पृथ्वी के तीन रूपों से ही था |
उत्तरीय ध्रुव उच्चत्तम स्थान होने से स्वर्ग है ! 
जैसा कि जर्मन सुर जनजाति की मान्यता थी 
उन्होंने स्वेरिकी या स्वेरिगी को अपने पूर्वजों का प्रस्थान बिन्दु माना ; यह स्थान आधुनिक स्वीडन { Sweden} ही था |
प्राचीन नॉर्स भाषाओं में स्वीडन का ही प्राचीन नाम स्वेरिगे { Sverige } है !

यह स्वेरिगे Sverige } देव संस्कृति का आदिम स्थल था,  वास्तव में स्वेरिगे (Sverige )शब्द के नाम करण का कारण भी उत्तर पश्चिम जर्मनी आर्यों की स्वीअर
 { Sviar } नामकी जन जाति थी .अतः स्वेरिगे शब्द की व्युत्पत्ति भी सटीक है  Sverige is The region of sviar This is still the formal Names for Sweden in old Swedish Language..Etymological form Svea ( स्वः + Rike - Region रीजन अर्थात् रज = स्थान तथा शासन क्षेत्र |
 संस्कृत तथा ग्रीक /लैटिन शब्द लोक के समानार्थक है "रज् प्रकाशने अनुशासने च"पुरानी नॉर्स (Risa) गौथ भाषा में (Reisan) अंग्रेजी (Rise)  पाणिनीय धातु पाठ देखें लैटिन फ्रेंच तथा जर्मन वर्ग की भाषाओं में लैटिन ...Regere = To rule अनुशासन करना इसी का present perfect रूप Regens ,तथ regentis आदि हैं Regence = goverment राज प्रणाली .. जर्मनी भाषा में Rice तथा reich रूप हैं !!

 पुरानी फ्रेंच में Regne (reign) लैटिन रूप Regnum = to rule  संस्कृत लोक शब्द लैटिन फ्रेंच आदि में Locus के रूप में है जिसका अर्थ होता है प्रकाश और स्थान ..तात्पर्य स्वर अथवा सुरों ( आर्यों ) का राज ( अनुशासन क्षेत्र ) ही स्वर्ग स्वः रज ..समाक्षर लोप से सान्धिक रूप हुआ स्वर्ग 
स्वर्ग उत्तरीय ध्रुव पर स्थित पृथ्वी का वह उच्चत्तम भू - भाग है जहाँ छःमास का दिन और छःमास की दीर्घ रात्रियाँ होती हैं भौगोलिक तथ्यों से यह प्रमाणित हो गया है दिन रात की एसी दीर्घ आवृत्तियाँ केवल ध्रुवों पर ही होती हैं इसका कारण पृथ्वी अपने अक्ष ( धुरी ) पर २३ १/२ ° अर्थात् तैईस सही एक बट्टे दो डिग्री अंश दक्षिणी शिरे पर झुकी हुई है |
 अतः उत्तरीय शिरे पर उतनी ही उठी हुई है ! 
और भू- मध्य स्थल दौनो शिरों के मध्य में है पृथ्वी अण्डाकार रूप में सूर्य का परिक्रमण करती है जो ऋतुओं के परिवर्तन का कारण है अस्तु स्वर्ग को ही संस्कृत के श्रेण्य साहित्य में पुरुः 
और ध्रुवम् भी कहा है पुरुः शब्द प्राचीनत्तम भारोपीय शब्द है |
 जिसका ग्रीक / तथा लैटिन भाषाओं में Pole रूप प्रस्तावित है पॉल का अर्थ हीवेन (Heaven) या (Sky) है Heaven = to heave उत्थान करना उपर चढ़ना ।
संस्कृत भाषा में भी उत्तर शब्द यथावत है जिसका मूल अर्थ है अधिक ऊपर।

Utter-- Extreme = अन्तिम उच्चत्तम विन्दु ।
अपने प्रारम्भिक प्रवास में स्वीडन ग्रीन लेण्ड ( स्वेरिगे ) आदि स्थलों परआर्य लोग बसे हुए थे । 
 यूरोपीय भाषा में भी इसी अर्थ को ध्वनित करता है ।

हम बताऐं की नरक भी यहीं स्वीलेण्ड ( स्वर्ग) के दक्षिण में स्थित था ।
Narke ( Swedish pronunciation) is a swedish traditional province or landskap situated in Sviar-land in south central ...sweden
  नरक शब्द नॉर्स के पुराने शब्द नार( Nar )
से निकला है, जिसका अर्थ होता है - संकीर्ण अथवा तंग narrow
  ग्रीक भाषा में नारके Narke तथा narcotic जैसे शब्दों का विकास हुआ ।
ग्रीक भाषा में नारके Narke शब्द का अर्थ जड़ ,सुन्न ( Numbness, deadness है ।
संस्कृत भाषा में नड् नल् तथा नर् जैसे शब्दों का मूल अर्थ बाँधना या जकड़ना है ।
इन्हीं से संस्कृत का नार शब्द जल के अर्थ में विकसित हुआ ।
संस्कृत धातु- पाठ में नी तथा  नृ धातुऐं हैं  आगे ले जाने के अर्थ में - नये ( आगे ले जाना ) नरयति / नीयते वा इस रूप में है ।
अर्थात् गतिशीलता जल का गुण है ।
   उत्तर दिशा के वाचक  नॉर्थ शब्द नार मूलक ही है
क्योंकि यह दिशा हिम और जल से युक्त है ।
भारोपीय धातु स्नर्ग  *(s)nerg- To turn, twist
अर्थात् बाँधना या लपेटना से  भी सम्बद्ध माना जाता है
परन्तु जकड़ना बाँधना ये सब शीत की गुण क्रियाऐं हैं ।

अत: संस्कृत में नरक शब्द यहाँ से आया और इसका अर्थ है --- वह स्थान जहाँ जीवन की चेतनाऐं जड़ता को प्राप्त करती हैं ।
    वही स्थान नरक है ।
निश्चित रूप से नरक स्वर्ग ( स्वीलेण्ड)या  स्वीडन के दक्षिण में स्थित था !
स्वर्ग का और नरक का वर्णन तो हमने कर दिया
परन्तु भारतीय संस्कृति में जिसे स्वर्ग का अधिपति
माना गया उस इन्द्र का वर्णन न किया जाए तो
  पाठक- गण हमारे शोध को कल्पनाओं की उड़ान
और निर् धार ही मानेंगे ----
अत: हम आपको ऐसी अवसर ही प्रदान नहीं करें
    
यूरोपीय पुरातन कथाओं में इन्द्र को एण्ड्रीज (Andreas) के रूप में वर्णन किया गया है ।
जिसका अर्थ होता है शक्ति सम्पन्न व्यक्ति ।
    🌅
Andreas - son of the river god peneus and founder of  orchomenos in Boeotia-----
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Andreas Ancient Greek - German was the son of river god peneus in  Thessaly
from whom the district About orchomenos in Boeotia was called Andreas in Another passage pousanias speaks of Andreas( it is , however uncertain whether he means the same man as the former) as The person who colonized the island of Andros ....
अर्थात् इन्द्र थेसिली में एक नदी देव पेनियस का पुत्र था
जिससे एण्ड्रस नामक द्वीप नामित हुआ ..
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 "डायोडॉरस के अनुसार .."
ग्रीक पुरातन कथाओं के अनुसार एण्ड्रीज (Andreas)
रॉधामेण्टिस (Rhadamanthys) से सम्बद्ध था ।
  रॉधमेण्टिस ज्यूस तथा यूरोपा का पुत्र और मिनॉस (मनु) का भाई था ।
       ग्रीक पुरातन कथाओं में किन्हीं विद्वानों के अनुसार एनियस (Anius) का पुत्र एण्ड्रस( Andrus)
के नाम से एण्ड्रीज  प्रायद्वीप का नामकरण हुआ ..जो अपॉलो का पुजारी था ।
परन्तु पूर्व कथन सत्य है ।
ग्रीक भाषा में इन्द्र शब्द  का अर्थ
शक्ति-शाली  पुरुष है ।
जिसकी व्युत्पत्ति- ग्रीक भाषा के ए-नर (Aner)
शब्द से हुई है ।
जिससे एनर्जी (energy) शब्द विकसित हुआ है।
संस्कृत भाषा में अन् श्वसने प्राणेषु च
के रूप में धातु विद्यमान है ।जिससे प्राण तथा अणु जैसे शब्दों का विकास हुआ...
कालान्तरण में संस्कृत भाषा में नर शब्द भी इसी रूप से व्युत्पन्न हुआ....
वेल्स भाषा में भी नर  व्यक्ति का वाचक है ।
फ़ारसी मे नर शब्द तो है ।
परन्तु इन्द्र शब्द नहीं है ।
  वेदों में इन्द्र को वृत्र का शत्रु बताया है ।
जिसे केल्टिक माइथॉलॉजी मे ए-बरटा ( Abarta )
कहा है ।
जो दनु और त्वष्टा परिवार का सदस्य है ।
  इन्द्रस् आर्यों का नायक अथवा वीर यौद्धा था ।
भारतीय पुरातन कथाओं में त्वष्टा को इन्द्र का पिता बताया है ।

शम्बर को ऋग्वेद के द्वित्तीय मण्डल के
सूक्त १४ / १९ में कोलितर कहा है पुराणों में इसे दनु
       का पुत्र कहा है ।
जिसे इन्द्र मारता है ।
ऋग्वेद में इन्द्र पर आधारित २५० सूक्त हैं ।
यद्यपि कालान्तरण मे आर्यों अथवा सुरों के नायक को ही इन्द्र उपाधि प्राप्त हुई ...

       अत: कालान्तरण में भी  जब ईरान होते हुए ये भारत आये तो इन्होंने आर्हय विशेषण वीरता सूचक विशेषण के रूप में ग्रहण किया भू-मध्य रेखीय भारत भूमि में आये  जहाँ भरत अथवा वृत्र की अनुयायी व्रात्य ( वारत्र )नामक जन जाति पूर्वोत्तरीय स्थलों पर निवास कर रही थी 
जो भारत नाम का कारण बना ...
इन से आर्यों को युद्ध करना पड़ा ...
     भारत में भी यूरोप से आगत आर्यों की सांस्कृतिक मान्यताओं में भी स्वर्ग उत्तर में है ।

और नरक दक्षिण में है । 
स्मृति रूप में अवशिष्ट रहीं ...
और विशेष तथ्य यहाँ यह है कि नरक के स्वामी यम हैं
यह मान्यता भी यहीं से मिथकीय रूप में स्थापित हुई ..
नॉर्स माइथॉलॉजी प्रॉज-एड्डा में नारके का अधिपति यमीर को बताया गया है ।
    यमीर यम ही है ।
हिम शब्द संस्कृत में यहीं से विकसित है
यूरोपीय लैटिन आदि भाषाओं में हीम( Heim)
शब्द हिम के लिए यथावत है।
नॉर्स माइथॉलॉजी प्रॉज-एड्डा में यमीर (Ymir)
Ymir is a primeval being , who was born from venom that dripped from the icy - river ......
earth  from  his flesh and  from his blood the ocean , from his bones the hills from his hair  the trees  from his brains the clouds from his skull the heavens from his eyebrows middle realm in which mankind lives"
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               (Norse mythology prose adda)
    अर्थात् यमीर ही सृष्टि का प्रारम्भिक रूप है।

यह हिम नद से उत्पन्न ,  नदी और समुद्र का अधिपति हो गया ।
पृथ्वी इसके माँस से उत्पन्न हुई ,इसके रक्त से समुद्र और इसकी अस्थियाँ पर्वत रूप में परिवर्तित हो गयीं इसके वाल वृक्ष रूप में परिवर्तित हो गये ,मस्तिष्क से बादल और कपाल से स्वर्ग और भ्रुकुटियों से मध्य भाग  जहाँ मनुष्य रहने लगा उत्पन्न हुए ...
    ऐसी ही धारणाऐं कनान देश की संस्कृति में थी ।
वहाँ यम को यम रूप में ही ..नदी और समुद्र का अधिपति माना गया है।
     जो हिब्रू परम्पराओं में या: वे अथवा यहोवा हो गया
उत्तरी ध्रुव प्रदेशों में ...
जब शीत का प्रभाव अधिक हुआ तब नीचे दक्षिण की ओर ये लोग आये जहाँ आज बाल्टिक सागर है,
यहाँ भी धूमिल स्मृति उनके ज़ेहन ( ज्ञान ) में विद्यमान् थी ।
बाल्टिक सागर के तट वर्ती प्रदेशों पर दीर्घ काल तक क्रीडाएें करते रहे .पश्चिमी बाल्टिक सागर के तटों पर इन्हीं आर्यों ने मध्य जर्मन स्केण्डिनेवीया द्वीपों से उतर कर बोल्गा नदी के द्वारा दक्षिणी रूस .त्रिपोल्जे आदि स्थानों पर प्रवास किया आर्यों के प्रवास का सीमा क्षेत्र बहुत विस्तृत था ।
देव संस्आकृति के अनुयायीयों की  बौद्धिक सम्पदा यहाँ आकर विस्तृत हो गयी थी ..🐌🌠🌚🌝मनुः जिसे जर्मन आर्यों ने मेनुस् (Mannus) कहा आर्यों के पूर्व - पिता के रूप में प्रतिष्ठित थे !
मेन्नुस mannus थौथा (त्वष्टा)--- 
(Thautha ) की प्रथम सन्तान थे !
मनु के विषय में रोमन लेखक टेकिटस
यूरोपीय इतिहास कार (tacitus) के अनुसार----
Tacitus wrote that mannus was the son of  tuisto and
The progenitor of the three germanic tribes ---ingeavones--Herminones and istvaeones ....
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    in ancient lays, their only type of historical tradition they celebrate tuisto , a god  brought forth from the earth they attribute to him a son mannus, the  source and founder of their people and to mannus three sons from whose names those nearest the ocean are called ingva eones , those in the middle Herminones, and the rest istvaeones some  people inasmuch as anti quality gives free rein to speculation , maintain that there were more tribal designations-
Marzi, Gambrivii, suebi and vandilii-__and that those names are genuine and Ancient Germania
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 Chapter 2
  ग्रीक पुरातन कथाओं में मनु को मिनॉस (Minos)कहा गया है ।
जो ज्यूस तथा यूरोपा का पुत्र तथा क्रीट का प्रथम राजा था
जर्मन जाति का मूल विशेषण डच (Dutch)
था ।
जो त्वष्टा नामक इण्डो- जर्मनिक देव पर आधारित है ।
टेकिटिस लिखता है , कि
Tuisto ( or tuisto) is the divine encestor of German peoples......

   ट्वष्टो tuisto---tuisto--- शब्द की व्युत्पत्ति- भी जर्मन भाषाओं में
   *Tvai----" two and derivative *tvis --"twice " double" thus giving tuisto---
The Core meaning -- double
अर्थात् द्वन्द्व -- अंगेजी में कालान्तरण में एक अर्थ
   द्वन्द्व- युद्ध (dispute / Conflict )भी होगया
यम और त्वष्टा दौनों शब्दों का मूलत: एक समान अर्थ था 
इण्डो-जर्मनिक संस्कृतियों में ..
मिश्र की पुरातन कथाओं में त्वष्टा को (Thoth)  अथवा  tehoti ,Djeheuty कहा गया
जो ज्ञान और बुद्धि का अधिपति देव था ।
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आर्यों में यहाँ परस्पर सांस्कृतिक भेद भी उत्पन्न हुए विशेषतः जर्मन आर्यों तथा फ्राँस के मूल निवासी गॉल ( Goal ) के प्रति जो पश्चिमी यूरोप में आवासित ड्रूयूडों की ही एक शाखा थी l
जो देवता जर्मनिक जन-जातियाँ के थे लगभग वही देवता ड्रयूड पुरोहितों के भी थे ।
यही ड्रयूड( druid ) भारत में द्रविड कहलाए इन्हीं की उपशाखाऐं  वेल्स wels केल्ट celt तथा ब्रिटॉन Briton के रूप थीं जिनका तादात्म्य (एकरूपता ) भारतीय जन जाति क्रमशः भिल्लस् ( भील ) किरात तथा भरतों से प्रस्तावित है ये भरत ही व्रात्य ( वृत्र के अनुयायी ) कहलाए आयरिश अथवा केल्टिक संस्कृति में वृत्र का रूप अवर्टा ( Abarta ) के रूप में है यह एक देव है जो थौथा (thuatha) (जिसे वेदों में त्वष्टा कहा है !) 

और दि - दानन्न ( वैदिक रूप दनु ) की सन्तान है .Abarta an lrish / celtic god amember of the thuatha त्वष्टाः and De- danann his name means = performer of feats अर्थात् एक कैल्टिक देव त्वष्टा और दनु परिवार का सदस्य वृत्र या Abarta जिसका अर्थ है कला या करतब दिखाने बाला देव यह अबर्टा ही ब्रिटेन के मूल निवासी ब्रिटों Briton का पूर्वज और देव था इन्हीं ब्रिटों की स्कोट लेण्ड ( आयर लेण्ड ) में शुट्र--- 
(shouter )नाम की एक शाखा थी , जो पारम्परिक रूप से वस्त्रों का निर्माण करती थी । वस्तुतःशुट्र फ्राँस के मूल निवासी गॉलों का ही वर्ग था , जिनका तादात्म्य भारत में शूद्रों से प्रस्तावित  है , ये कोल( कोरी) और शूद्रों के रूप में है ।
जो मूलत: एक ही जन जाति के विशेषण हैं
एक तथ्य यहाँ ज्ञातव्य है कि प्रारम्भ में जर्मन आर्यों

और गॉलों में केवल सांस्कृतिक भेद ही था जातीय भेद कदापि नहीं ।
क्योंकि आर्य शब्द का अर्थ यौद्धा अथवा वीर होता है ।
यूरोपीय लैटिन आदि भाषाओं में इसका यही अर्थ है ।
.......
बाल्टिक सागर से दक्षिणी रूस के पॉलेण्ड त्रिपोल्जे आदि स्थानों पर बॉल्गा नदी के द्वारा कैस्पियन सागर होते हुए भारत ईरान आदि स्थानों पर इनका आगमन हुआ ।

आर्यों  देव संस्केकृति के अनुयायीयों के कुछ क़बीले इसी समय हंगरी में दानव नदी के तट पर परस्पर सांस्कृतिक युद्धों में रत थे ; 
भरत जन जाति यहाँ की पूर्व अधिवासी थी संस्कृत साहित्य में भरत का अर्थ जंगली या असभ्य किया है ।

और भारत देश के नाम करण कारण यही भरत जन जाति थी ।
भारतीय प्रमाणतः जर्मन आर्यों की ही शाखा थे जैसे यूरोप में पाँचवीं सदी में जर्मन के एेंजीलस कबीले के आर्यों ने ब्रिटिश के मूल निवासी ब्रिटों को परास्त कर ब्रिटेन को एञ्जीलस - लेण्ड अर्थात् इंग्लेण्ड कर दिया था 
और ब्रिटिश नाम भी रहा जो पुरातन है ।
 इसी प्रकार भारत नाम भी आगत आर्यों से पुरातन है 
 दुष्यन्त और शकुन्तला पुत्र भरत की कथा बाद में जोड़ दी गयी
जैन साहित्य में एक भरत ऋषभ देव परम्परा में थे।
जिसके नाम से भारत शब्द बना।

विशेष :- भारत तथा यूरोप की लगभग सभी मुख्य भाषाओं में आर्य शब्द यौद्धा अथवा वीर के अर्थ में प्राचीनत्तम काल से व्यवहृत है । नि: सन्देह यह जन-जाति विशेष का सूचक नहीं था ।

क्योंकि असीरियन संस्कृति में में भी आर्य शब्द आल्ल (आला)रूप में प्राप्त है ।
पारसीयों के पवित्र धर्म ग्रन्थ अवेस्ता में अनेक स्थलों पर आर्य शब्द आया है जैसे: –सिरोज़ह प्रथम- के यश्त संख्या  9 पर, तथा सिरोज़ह प्रथम के यश्त संख्या 25 पर है ।
अवेस्ता में आर्य शब्द का अर्थ है । 

…तीव्र वाण (Arrow ) चलाने वाला यौद्धा से है ।—यश्त 9 में  स्वयं ईरान शब्द आर्यन् शब्द का तद्भव रूप है ..
ईरानी असुर संस्कृति के उपासक असीरियननों से सम्बन्धित लोग थे ।
परन्तु भारतीय देव संस्कृति के लोग ---जो  अपने युद्ध निपुणता के कारण स्वयं को वीर: अथवा आर्य: कहते थे ये ईरानियों के चिर सांस्कृतिक प्रतिद्वन्द्वी  थे !!
ये असुर संस्कृति के उपासक आर्य थे।
देव शब्द का अर्थ भी ईरानियों की भाषाओं में निम्न व दुष्ट अर्थों में व्यवहृत है ।
…परन्तु अग्नि के अखण्ड उपासक आर्य तो ईरानी भी थे । स्वयं ऋग्वेद में असुर शब्द उच्च और पूज्य अर्थों में है :-जैसे वृहद् श्रुभा असुरो वर्हणा कृतः ऋग्वेद १/५४/३. तथा और भी महान देवता वरुण के रूप में …त्वम् राजेन्द्र ये च देवा रक्षा नृन पाहि .असुर त्वं अस्मान् —ऋ० १/१/७४ तथा प्रसाक्षितः असुर यामहि –ऋ० १/१५/४. ऋग्वेद में और भी बहुत से स्थल हैं जहाँ पर असुर शब्द सर्वोपरि शक्तिवान् ईश्वर का वाचक है |
पारसीयों ने असुर शब्द का उच्चारण अहुर के रूप में किया है |
अतः आर्य विशेषण असुर और देव दौनो ही संस्कृतियों के उपासकों का था ।
…और उधर यूरोप में द्वित्तीय महा -युद्ध का महानायक ऐडोल्फ हिटलर( Adolf-Hitler )स्वयं को शुद्ध नारादिक (nordic )आर्य कहता था;
और स्वास्तिक का चिन्ह अपनी युद्ध ध्वजा पर अंकित करता था ; विदित हो कि जर्मन भाषा में स्वास्तिक को हैकैन- क्रूज. (Haken- cruez) कहते थे !

जर्मन वर्ग की भाषाओं में आर्य शब्द के बहुत से रूप हैं । ..ऐरे Ehere जो कि जर्मन लोगों की एक सम्माननीय उपाधि है।  ..जर्मन भाषाओं में ऐह्रे (Ahere) तथा (Herr) शब्द स्वामी अथवा उच्च व्यक्तिों के वाचक थे ।
आयर लेण्ड की भाषा में आयर ire शब्द का अर्थ स्वतन्त्र (आवारा) भी है । तमिल शब्द अय्यर और संस्कृत शब्द आभीर शब्दों स्वातन्त्र्तय वीरत्व व घुमक्कड़ता का भाव निहित है ।
और इसी हर्र Herr शब्द से यूरोपीय भाषाओं में प्रचलित सर (Sir )…..शब्द का विकास हुआ ।
---जो  पुल्लिंग में मैडम (madam) शब्द के समानान्तर प्रयुक्त होता है ।
और आरिश (Arisch) शब्द तथा आरिर् (Arier) स्वीडिश ,डच आदि जर्मन भाषाओं में श्रेष्ठ और वीरों का विशेषण है ।
इधर एशिया माइनर के पार्श्व वर्ती यूरोप के प्रवेश -द्वार ग्रीक अथवा आयोनियन भाषाओं में भी आर्य शब्द आर्च (Arch (तथा आर्क Arck तथा eirean के रूप मे है |
हिब्रू बाइबिल में अबीर Abeer शब्द वीर अथवा यौद्धा अथवा सामन्त का वाचक है- जिसका सम्बन्ध हिब्रू क्रिया अ- बिर( ए-बिर )से है ।  संस्कृत भाषा आगात अभीर शब्द का विकास भी वीर का हिब्रू करण है
क्योंकि ए (e) उपसर्ग (Prifix) का सेमेटिक भाषाओं स्वत: आगम है । जैसे संस्कृत भाषा का ब्रह्मा हिब्रू ए-ब्राह्म संस्कृत बल: हिब्रू ए-विल संस्कृत लघु  ग्रीक ए-लखुस आदि रूप ..
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ग्रीक मूल का शब्द हीरों (Hero) भी वेरोस् अथवा वीरः शब्द का ही विकसित रूप है; और वीरः शब्द स्वयं आर्य शब्द का प्रतिरूप है | वीर शब्द का विकास पहले हुआ फिर उसी से आर्य शब्द का विकास
जर्मन वर्ग की भाषा ऐंग्लो -सेक्शन में वीर शब्द वर( Wer) के रूप में है |

 तथा रोम की सांस्कृतिक भाषा लैटिन में यह वीर शब्द (Vir) के रूप में है |
आर्य शब्द का अपेक्षा वीर शब्द प्राचीनत्तम है ।
ईरानी आर्यों की संस्कृति में भी वीर शब्द आर्य शब्द का विशेषण है यूरोपीय भाषाओं में भी आर्य और वीर शब्द समानार्थक रहे हैं ! हम यह स्पष्ट करदे कि आर्य शब्द किन किन संस्कृतियों में प्रचीन काल से आज तक विद्यमान है |
लैटिन वर्ग की भाषा आधुनिक फ्रान्च में…(Arien) तथा (Aryen )दौनों रूपों में …इधर दक्षिणी अमेरिक की ओर पुर्तगाली तथा स्पेन भाषाओं में यह शब्द आरियो (Ario) के रूप में है पुर्तगाली में इसका एक रूप ऐरिऐनॉ (Ariano) भी है और फिन्नो-उग्रियन शाखा की फिनिश भाषा में Arialainen ऐरियल-ऐनन के रूप में है | रूस की उप शाखा पॉलिस भाषा में (Aryika) के रूप में है।
कैटालन भाषा में (Ari )तथा (Arica) दौनो रूपों में है स्वयं रूसी भाषा में आरिजक (Arijec )अथवा आर्यक के रूप में है इधर पश्चिमीय एशिया की सेमेटिक शाखा आरमेनियन तथा हिब्रू और अरबी भाषा में क्रमशः (Ariacoi )तथा(Ari )तथा अरबी भाषा मे हिब्रू प्रभाव से म-अारि. M(ariyy तथा अरि दौनो रूपों में.. तथा ताज़िक भाषा में ऑरियॉयी (Oriyoyi )रूप. …इधर बॉल्गा नदी के मुहाने वुल्गारियन संस्कृति में आर्य शब्द ऐराइस् (Arice) के रूप में है |
वेलारूस की भाषा में (Aryeic )तथा (Aryika) दौनों रूप में..पूरबी एशिया की जापानी कॉरीयन और चीनी भाषाओं में बौद्ध धर्म के प्रभाव से आर्य शब्द .(Aria–iin)के रूप में है ।
अनुभावास्तु तत्र स्युः सहायान्वेषणादयः ।
सञ्चारिणस्तु धृतिमति- गर्वस्मृतितर्करोमञ्चाः ।
स च दानधर्मयुद्धैर्दयथा च समन्वितश्चतुर्द्धा स्यात्” ।
स च वीरः ।
दानवीरो धर्म- वीरा दयावीरो भुद्धवीरश्चेति चतुर्विधः” साहित्य दर्पण३ पृ० ।
मूल भारोपीय शब्द (wihros) विहिरॉस: -  जिसके दो रूप विकसित हुए हिरॉस् तथा विर संस्कृत: - वीरा, अवेस्तान: - वीरा, लैटिन: - vir,
Umbrian: - viru, लिथुआनियाई: - वेरस, लातवियाई: - वीर, टोचिरियन: - wir, जर्मन: - wer / Werwolf, गॉथिक: - वायर, पुराना नॉर्स: -वर, अंग्रेजी: -वेर / वेयरवोल्फ, ओल्ड फ्रुशियन: -विर  आयरिश: - fer / fear, वेल्श: -ग्राऊर, गोलियाँ: -इइरो-, अल्बेनियाई: - बुरे, कुर्द: -मिरो...
वीरम्, क्ली, (अज् + “स्फायितञ्चिवञ्चीति ।” उणा० १ । १३ । इत्यादिना रक् । अजे- र्वीभावः । वीर + अच् वा ।) शृङ्गी । नडः । इति मेदिनी । रे, ६७ ॥ 

मरिचम् । पुष्कर- मूलम् । काञ्जिकम् । उशीरम् । आरूकम् । इति राजनिर्घण्टः ॥ वीर शब्दो मेदिन्यां पव- र्गीयवकारादौ दृष्टोऽपि वीरधातोरन्तःस्थवका- रादौ दर्शनादत्र लिखितः ॥

वीरः, पुं, (वीरयतीति ।
वीर विक्रान्तौ + पचा- द्यच् । यौद्वा, विशेषेण ईरयति दूरीकरोति शत्रून् ।
वि + ईर + इगुपधात् कः ।
यद्वा, अजति क्षिपति शत्रून् ।
अज + स्फायितञ्चीत्यादिना रक् ।
अजेर्व्वीः  शौर्य्यविशिष्टः । तत्पर्य्यायः । शूरः २ विक्रान्तः ३ । इत्यमरः  कोश । २ । ८ । ७७ ॥ गण्डीरः ४ तरस्वी ५ । इति जटाधरः ॥ (यथा, महाभारते । १ । १४१ । ४५ । “मृगराजो वृकश्चैव बुद्धिमानपि मूषिकः ।
निर्ज्जिता यत्त्वया वीरास्तस्माद्वीरतरो भवान् ॥
” यथा च ऋग्वेदे । १ । ११४ । ८ । “वीरान्मानो रुद्रभामितो वधीर्हविष्यन्तः सद्मि त्वा हवामहे ॥
” “वीरान् वीक्रान्तान् ।” इति सायणः ॥ पुत्त्रः । यथा, ऋग्वेदे । ५ । २० । ४ । “वीरैः स्याम सधमादः ॥” “वीरैः पुत्त्रैश्च सधमादः सहमाद्यन्तः स्याम तथा कुरु ।” इति तद्भाष्ये सायणः ॥ * 

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परन्तु सुमेरियन हुर्रीयन (हुर्री) हुर्रियन शब्द का  विकास अवेस्ता में लिखित (हुर) शब्द से है जो संस्कृत (सुर) शब्द का प्रतिरूप है।

आर्य से इसका कौई सम्बन्ध नहीं 


अरब़ी मूल में आज़र भी इसी से सम्बन्धित है
यद्यपि ये भी देव संस्कृति से सम्बद्ध थे ।

आर्य शब्द के विषय में इतने तथ्य अब तक हमने दूसरी संस्कृतियों से उद्धृत किए हैं परन्तु जिस भारतीय संस्कृति का प्रादुर्भाव देव संस्कृति से हुआ |


आधुनिक इतिहास कारों ने आर्य शब्द जन-जाति विशेष के अर्थ मे रूढ़ कर दिया है ।
_________________________________________ उस के विषय में हम कुछ कहते हैं ।
विदित हो कि यह समग्र तथ्य" 📖

"यादव योगेश- कुमार 'रोहि' " के शोधों पर आधारित हैं | भारोपीय आर्यों के सभी सांस्कृतिक शब्द समान ही हैं ।
जैसा कि निम्न तथ्यों में दिग्दर्शन किया गया है। स्वयं आर्य शब्द का धात्विक-अर्थ :- Rootnal-Mean .."आरम् धारण करने वाला वीर ।
संस्कृत तथा यूरोपीय भाषाओं में आरम् (Arrown) =अस्त्र तथा शस्त्र धारण करने वाला यौद्धा अथवा वीरः । आर्य शब्द की व्युत्पत्ति Etymology संस्कृत की अर् (ऋृ) धातु मूलक है—अर् धातु के तीन प्राचीनत्तम हैं .. १–गमन करना To go २– मारना to kill ३– हल (अरम्) चलाना (Harrow ) मध्य इंग्लिश—रूप Harwe कृषि कार्य करना |


प्राचीन विश्व में सुसंगठित रूप से कृषि कार्य करने वाले प्रथम मानव आर्य ही थे ।

 इस तथ्य के प्रबल प्रमाण भी हमारे पास हैं ! पाणिनि तथा इनसे भी पूर्व ..कात्स्न्र्यम् धातु पाठ में :-ऋृ (अर्) धातु कृषिकर्मे गतौ हिंसायाम् च..परस्मैपदीय रूप :-ऋणोति अरोति वा अन्यत्र ऋृ गतौ धातु पाठ .३/१६ प० इयर्ति -जाता है वास्तव में संस्कृत की अर् धातु का तादात्म्य (identity.) यूरोप की सांस्कृतिक भाषा लैटिन की क्रिया -रूप इर्रेयर Errare =to go से प्रस्तावित है जर्मन भाषा में यह शब्द आइरे irre =togo के रूप में है पुरानी अंग्रेजी में जिसका प्रचलित रूप एर Err है। 

इसी अर् धातु से विकसित शब्द लैटिन तथा ग्रीक भाषाओं में क्रमशःAraval तथा Aravalis हैं ;अर्थात् कृषि कार्य.सम्बन्धी देवों की संस्कृति ग्रामीण जीवन मूलक है और कृषि विद्या के  जनक देव संस्कृति के आर्य ही थे सर्व-प्रथम अपने द्वित्तीय पढ़ाव में मध्य -एशिया में ही कृषि कार्य आरम्भ कर दिया था ।
आर्य स्वभाव से ही युद्ध-प्रिय व घुमक्कड़ थे कुशल चरावाहों के रूप में यूरोप तथा सम्पूर्ण एशिया की धरा पर अपनी महान सम्पत्ति गौओं के साथ कबीलों के रूप में यायावर जीवन व्यतीत करते थे ।


यहीं से इनकी ग्राम - सभ्यता का विकास हुआ था । अपनी गौओं के साथ साथ विचरण करते हुए .जहाँ जहाँ भी ये विशाल ग्रास-मेदिनी(घास के मैदान ) देखते और उसी स्थान पर अपना पढ़ाव डाल देते थे । संस्कृत तथा यूरोप की सभी भाषाओं में ग्राम शब्द का मूल अर्थ ग्रास-भूमि तथा घास है ।

सुर शब्द की भारतीय  व्युतपत्तियाँ 

वाल्मीकि-रामायण में असुर की उत्पत्ति का उल्लेख :-
वाल्मीकि रामायण कार ने वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड सर्ग 45 के 38 वें छन्द में )
सुर-असुर की परिभाषा करते हुये लिखा है-
“सुरा पीने वाले सुर और सुरा नहीं पीने वाले असुर कहे गये l”
सुराप्रतिग्रहाद् देवा: सुरा इत्याभिविश्रुता:. अप्रतिग्रहणात्तस्या दैतेयाश्‍चासुरा: स्मृता:॥
उक्त श्‍लोक के अनुसार सुरा का अर्थ ‘मादक द्रव्य-शराब’ है. चूंकि आर्य लोग मादक तत्व सुरा का प्रारम्भ से पान (सेवन) करते थे

वाल्मीकि रामायण
बालकाण्ड का पैतालीसवां सर्ग श्लोक संख्या ३६ से ३८ ,प्रसंग
समुद्र मंथन.)
विश्वामित्र राम लक्ष्मण को कुछ वेद पुराण सुना रहे हैं और उसी के तहत समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों के बारे बताते हुए कहते हैं ....
असुरास्तेंन दैतेयाः   सुरास्तेनादितेह सुताः
हृष्टा: प्रमुदिताश्चासन वारुणीग्रह्नात सुराः (३८)
('सुरा से रहित होने के कारण ही दैत्य 'असुर ' कहलाये
और सुरा-सेवन के कारण ही अदिति के पुत्रों की 'सुर' संज्ञा हुई.
वारुणी को   ग्रहण करने से देवतालोग हर्ष से उत्फुल्ल एवं आनंदमग्न हो गए )
इसके पहले और बाद के दो श्लोकों में समुद्रमंथन से वरुण की कन्या वारुणी "जो सुरा की अभिमानिनी देवी थी"
के प्रकट होने और दैत्यों द्वारा उसे ग्रहण न करने और देवों द्वारा इन अनिनद्य सुन्दरी को ग्रहण करने का उल्लेख है....
तो अब हमें कोई रोके टोके न हम सुर हैं,देवता है और  धरती के सुर -भूसुर अर्थात ब्राह्मण तो बेरोक टोक सुरापान करे -हमारा शास्त्र  इसकी खुली  अनुमति देता है ।

सुरा पान यूरोपीय सांस्कृतिक परम्परा उनकी शीत प्रधान जलवायु के अनुरूप थी 
वीर और आर्य शब्द असुरों का ही विशेषण है ⬇

इन्द्रा॑विष्णू दृंहि॒ताः शम्ब॑रस्य॒ नव॒ पुरो॑ नव॒तिं च॑ श्नथिष्टम् । श॒तं व॒र्चिन॑: स॒हस्रं॑ च सा॒कं ह॒थो अ॑प्र॒त्यसु॑रस्य वी॒रान् ॥

पद पाठ

इन्द्रा॑विष्णू॒ इति॑ । दृं॒हि॒ताः । शम्ब॑रस्य । नव॑ । पुरः॑ । न॒व॒तिम् । च॒ । श्न॒थि॒ष्ट॒म् । श॒तम् । व॒र्चिनः॑ । स॒हस्र॑म् । च॒ । सा॒कम् । ह॒थः । अ॒प्र॒ति । असु॑रस्य । वी॒रान् ॥ ७.९९.५

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:99» मन्त्र:5 

पदार्थान्वयभाषाः -(इन्द्राविष्णू) हे  इन्द्र और   विष्णु  आप (दृंहिताः) दृढ़ से दृढ़ (शम्बरस्य) शम्बर  के (नवनवतिं) निन्यानवे (च) और उस (वर्चिनः) मायावी पुरुष के (शतं) सैकड़ों (च) और (सहस्रं) हजारों (पुरीः) दुर्गों को (श्नथिष्टं) नाश करें तथा (साकं) शीघ्र ही (अप्रत्यसुरस्य) उस असुर के (वीरान्)  को (हथः) हनन करो ॥५॥
विदित हो कि ईसा पूर्व अष्टम सदी ईरानी अहुरमज्दा असुर महत्) के उपासकों का देव संस्स्कृति के अनुयायीयों से सांस्कृतिक युद्ध हुआ 
ईरानीयों देव का अर्थ दएव के रूप में दुष्ट और व्यभिचारी किया तो देव-संस्कृति के अनुयायीयों असुर ता अर्थ ही विकृत कर दिया 
ऋग्वेद में असुर का अर्थ प्रतिभावान् और बलवान है 
स्वयं वैदिक शब्द कोश निघण्टु में असुर के पूर्ववर्ती अर्थे है ⬇

असुर: सोमे वरुणे च मेघा: ६२
असुर -दात्रारिव्याप्त्याम् ७४६
असुर: बले ४२२
असुर :प्रज्ञायाम् 
असुर :ऋत्विजि 
परवर्ती अर्थ दैत्ये 
(माधवीय पदानुक्रमणिका  वैदिक निघण्टु )

वेदों में कृष्ण को असुर कहा ⬇
देवता: इन्द्र: ऋषि: कुत्स आङ्गिरसः छन्द: निचृज्जगती स्वर: निषादःℹ

प्र म॒न्दिने॑ पितु॒मद॑र्चता॒ वचो॒ यः कृ॒ष्णग॑र्भा नि॒रह॑न्नृ॒जिश्व॑ना।
 अ॒व॒स्यवो॒ वृष॑णं॒ वज्र॑दक्षिणं म॒रुत्व॑न्तं स॒ख्याय॑ हवामहे ॥

ऋग्वेद  मण्डल:1 सूक्त:101 मन्त्र:1 | 


संस्कृत भाषा में सुरा शब्द का केवल एक ही रूढ़ अर्थ प्राप्त है ।
_________________________________________
(सु अभिषवे + क्रन् । 
स्त्रियां टाप् । इत्युणादिवृत्तौ उज्ज्वलः ।  २ ।  २४ ।  यद्वा   सुष्ठु रायन्त्यनयेति ।
सु + रै शब्दे +  “ आतश्चोप- सर्गे ।  ३ ।  ३ ।  ११६ ।  इत्यङ् ।  टाप् । )
चषकम् ।  मद्यम् ।  इति मेदिनी ॥ 

 अस्याः पर्य्यायगुणादि मदिराशब्दे मद्यशब्द च द्रष्टव्यम् ।  सुराया विशेषगुणा यथा   --
  “ कृशानां सक्तमूत्राणां ग्रहण्यर्शोविकारिणाम् सुरा प्रशस्ता वातघ्नी स्तन्यरक्तक्षयेषु च ॥
“ इति राजवल्लभः ॥ 

तत्पानप्रायश्चित्तं यथा   “ ब्रह्मघ्रश्च सुरापश्च स्तेयी च गुरुतल्पगः ।
सेतु दृष्ट्वा विशुध्यन्ते तत्संयोगी च पञ्चमः । 

ततो धेनुशतं दद्यात् ब्राह्यणानान्तु भोजनम् ॥
“ इति गारुडे २२६ अध्यायः  ॥
तत्पाने शुक्राचार्य्यशापो यथा   -- 
“ सुरापानाद्वञ्चनां प्रापयित्वा संज्ञानाशं 

चैनमस्यातिघोरम् ।
दृष्ट्वा कचञ्चापि तथापि रूपं पीत तथा 

सुरया मोहितेन ॥
समन्युरुत्थाय महानुभाव स्तदोशना विप्रहितं चिकीर्षुः । काव्यः स्वयं वाक्यमिदं जगाद सुरापानं प्रति वै जातशङ्कः ॥


यो ब्राह्मणोऽद्यप्रभृतीह कश्चित् मोहात् सुरां पास्यति मन्दबुद्धिः ।
अपेतधर्म्मा ब्रह्महा चैव स स्यात् अस्मिन् लोके गर्हितः स्यात् परे च ॥
मया चेमां विप्रधर्म्मोक्तसीमां मर्य्यादां वै स्थापितां सर्व्वलोके ।

 सन्तो विप्राः शुश्रुवांसो गुरूणां देवा दैत्याश्चोपशृण्वन्तु सर्व्वे ॥ 
“ इति महाभारते । १ ।  ७६ ।  ५९ -- ६२ ॥ 

ब्राह्मणक्षत्त्रियवैश्यानां त्रिविधसुरापानप्राय- श्चित्तादि यथा   -- 
“ सुरां पीत्वा द्विजो मोहादग्निवर्णां सुरां पिबेत् । 

तथा स्वकाये निर्दग्धे मुच्यते किल्विषात्ततः ॥
गोमूत्रमग्निवर्णं वा पिबेदुदकमेव वा ।
पयो घृतं वा मरणाद्गोसकृद्रसमेव वा ॥

 कणान् वा भक्षयेदब्दं पिण्याकं वा सकृन्निशि ।
सुरापानापनुत्त्यर्थं बालवासा जटी ध्वजी ॥
सुरा वै मलमन्नानां पाप्मा च मलमुच्यते । तस्माद्ब्राह्मणराजन्यौ वैश्यश्च न सुरां पिबेत् ॥
गौडी पैष्टी च माध्वी च विज्ञेया त्रिविधा सुरा ।
यथैवैका तथा सर्व्वा न पातव्या द्विजोत्तमैः ॥ यक्षरक्षःपिशाचान्नं मद्यं मांसं सुरासवम् ।
तद्ब्राह्मणेन नात्तव्यं देवानामश्नता हविः ॥
अमेध्ये वा पतेन्मत्तो वैदिकं वाप्युदाहरेत् । 

अकार्य्यमन्यत् कुर्य्याद्वा ब्राह्मणो मदमोहितः ॥
यस्य कायगतं ब्रह्म मद्येनाप्लाव्यते सकृत् ।
तस्य व्यपैति ब्राह्मण्यं शूद्रत्वञ्च स गच्छति ॥
एषा विचित्राभिहिता सुरापानस्य निष्कृतिः ॥
इति मानवे ११ । ९१ -- ९९ ॥

 सौत्रामणियज्ञेऽपि तत्पाननिषेधो यथा  “ यद्घ्राणमक्षो विहितः सुरायास्तथा पशोरालभनं न हिंसा । 

एवं व्यवायः प्रजया न रत्यै इमं विशुद्धं न विदुः स्वधर्म्मम् ॥ 
“ इति श्रीभागवते ।  ११ ।  ५ ।  १३ ॥“ यस्मात् सुराया घ्राणभक्षः अवघ्राणं स एव विहितः न पानं तथा पशोरपि आलभनमेव विहितं न तु हिंसा ।
  अतो न यथेष्टभक्षणाभ्यनुज्ञेत्यर्थः ।

  व्यवायोऽपि प्रजया निमित्तभूतया न रत्यै ।

  अतो मनोरथवादिन इमं विशुद्धं स्वधर्म्मं न विदुरिति ।  “  इति तट्टीकायां श्रीधरस्वामी ॥

 अन्यत् प्रायश्चित्तशब्दे द्रष्टव्यम् ॥ 

 सुरापाने वर्णनीयानि यथा  --सुरापाने विकलता स्खलनं वचने गतौ ।

 लज्जा मानच्यु तिः प्रेमाधिक्यं रक्ताक्षता भ्रमः ॥ “ इति कविकल्पतायां

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    प्रस्तुत शोध ---
            योगेश कुमार रोहि के द्वारा
   प्रमाणित श्रृंखलाओं पर आधारित है !
अत: इनसे सम्पर्क करने के लिए ...
   सम्पर्क - सूत्र ----8077160219 ...

पुरातत्तवेत्ता (अरनेष्ट मैके ) के प्रमाणों के अनुसार कृष्ण का समय ई०पू० 900 कुछ वर्ष पूर्व सिद्ध होता है ।

पुरातत्तवेत्ता (अरनेष्ट मैके ) के प्रमाणों के अनुसार  कृष्ण का समय ई०पू० 900 कुछ वर्ष पूर्व सिद्ध होता  है ।

सिन्धु घाटी की सभ्यता के उत्खनन के सन्दर्भ कृष्ण की यमलार्जुन  वृक्षो में समन्वित उलूखल दमोदर मूर्ति की प्राप्त हुयी है  जिसकी कार्बन क्षरण डेटिंग ईसा पूर्व नवम सदी के कुछ पूर्व  है ...

और देव संस्कृति के अनुयायीयों का आगमन ई०पू०
 1200 से 1000 में मैसोपोटामिया के क्षेत्रों से होते हुए 
ईरान ईराक मार्ग से हुआ ...
विदित हो कि ईसा पूर्व अष्टम सदी ईरानी अहुरमज्दा असुर महत्) के उपासकों का देव संस्स्कृति के अनुयायीयों से सांस्कृतिक युद्ध हुआ 
ईरानीयों देव का अर्थ दएव के रूप में दुष्ट और व्यभिचारी किया तो देव-संस्कृति के अनुयायीयों असुर ता अर्थ ही विकृत कर दिया 
ऋग्वेद में असुर का अर्थ प्रतिभावान् और बलवान है 
स्वयं वैदिक शब्द कोश निघण्टु में असुर के पूर्ववर्ती अर्थे है ⬇

असुर: सोमे वरुणे च मेघा: ६२
असुर -दात्रारिव्याप्त्याम् ७४६
असुर: बले ४२२
असुर :प्रज्ञायाम् 
असुर :ऋत्विजि 
परवर्ती अर्थ दैत्ये 
(माधवीय पदानुक्रमणिका  वैदिक निघण्टु )

वेदों में कृष्ण को असुर कहा ⬇
देवता: इन्द्र: ऋषि: कुत्स आङ्गिरसः छन्द: निचृज्जगती स्वर: निषादःℹ

प्र म॒न्दिने॑ पितु॒मद॑र्चता॒ वचो॒ यः कृ॒ष्णग॑र्भा नि॒रह॑न्नृ॒जिश्व॑ना।
 अ॒व॒स्यवो॒ वृष॑णं॒ वज्र॑दक्षिणं म॒रुत्व॑न्तं स॒ख्याय॑ हवामहे ॥

ऋग्वेद  मण्डल:1 सूक्त:101 मन्त्र:1 | 

 पंजाब और सिन्धु नदी के समीपवर्ती क्षेत्रों में हुआ  । 
सिन्धु के सहवर्ती छ: नदीयाँ  हैं  गंगा, गोदावरी, यमुना,  सरस्वती, कावेरी,नर्मदा आदि प्रमुख नदियों का उल्लेख है।

 सप्त सैंधव भारतवर्ष का उत्तर पश्चिमि भाग था। इसे आर्यों का आदिदेश कहा गया है।

 और थी अत: सप्त सिन्धव नाम ऋग्वेद में है .

पाणिनीय कालीन पुष्य-मित्र सुंग ई०पू० 184 में वैदिक भाषा को परिमार्जित शुद्धीकरण किया गया व्याकरण के निश्चित नियम बनाए गये ...

अतः वैदिक भाषा से लौकिक संस्कृत का विकास हुआ ।
ईसा पूर्व  अष्टम सदी से पञ्चम सदी तक वैदिक भाषा के दो समानान्तरणरूप विकसित हुए ...

एक पल्लि ग्रामीण अथवा पालों की भाषा पालि और दूसरी नगरी या नागरिक भाषा संस्कृत जो वैदिक भाषा के यथावत रूप को कुछ नियमों के निश्चित क्रम के साथ संस्कारित करके प्रस्तुत करती है 
तभी से संस्कृत नाम करण हुआ ..

पालि ही प्रथम प्राकृत भाषा है 
यह मध्य कालीन भारतीय भाषा है इसे देश भाषा या प्रथम प्राकृत भी कहा जाता है 
इसका समय कुछ विद्वानों के अनुसार पाँचवीं या छठी  सदी ईसा पूर्व से प्रथम ईस्वी तक है  तो कुछ के अनुसार दूसरी सदी ईसा पूर्व तक है 
अहीरों की शौरसेनी का विकास भी  पालि कालीन स्थानीय वोली से हुआ शौरसैनी का प्राचीनत्तम रूप अश्वघोष के नाटको़ में मिलता है 
कर्पूर मञ्जरी का गद्य इसी में है 
दिगम्बर जैनों ने अपने ग्रन्थों में इसका प्रयोग किया शौरसेनी प्राकृत का 
पिशेल के अनुसार शौरसेनी के अन्य रूप आभीरी अवन्ती आदि हैं ( भोलानाथ तिवारी भाषाविज्ञान कोश पृष्ठ संख्या४९४)

ऋग्वेद की लिपि देवनागरी है ।

परन्तु देवनागरी भी ब्राह्मी लिपि की एक विकसित शाखा है ।

और ये दौनों ही लिपियाँ  वेदों में वर्णित पणि लोगों की फोनिशियन लिपि से विकसित हुई है ।
फोनिशियन सैमेटिक लिपि है 
अलक से अ वर्ण की आकृति का विकास हुआ 
अलिफ सैमेटिक भाषा में ैल का वाचक है 
बैल के सिर की आकृति के सादृश्य पर अलेफ का विकास हुआ ...

और सम्भवतया पश्चिमीय एशिया तथा यूरोप की बहुतायत लिपियाँ फोनिशियन लिपि का ही विकसित रूप हैं ।

भाषा के सन्दर्भ में कहें तो वेदों की भाषा इण्डो-सुमेरियन भी है । अधिकतर देव सूची की वृद्धि यहीं से हुई ।

जैसे कनानी संस्कृतियों से यम , वल, विष्णु , ब्रह्मा आदि -- परन्तु ये देव संस्कृति के अनुयायी स्वीडन स्वर्ग से भू-मध्य सागरीय क्षेत्रों में आते गये कबीलों के रूप में ई०पू० १५००से ई०पू० १००० तक के काल में ---


कृष्ण और समस्त यादवों का भारत में प्रथम पढाब यमुना का एक समीप वर्ती मधुपुरा: खण्ड था जिसे गायों के चरने के लिए उपयुक्त माना गया परिणाम स्वरूप व्रज मण्डल नामकरण गायों के बाड़े के रूप में रूढ़ हो गया 
 
यद्यपि काशी नगरी में भी यादवों की कुछ शाखाओं आगमन हुआ परन्तु कृष्ण और देव संस्कृति के नायक इन्द्र का युद्ध यमुना की तल हटी में ही हुआ ऋग्वेद में इसके सन्दर्भ हैं क्यों की ऋग्वेद का लेखन तो ईसा • पूर्व• सप्तम सदी तक हुआ 

यह केवल मगध तथा उत्तर-भारत की भाषा थी ।
और वैदिक भाषा के 90℅शब्द यूरोपीय भाषाओं से साम्य रखते हैं ।
तीन हजार शब्द तो हमने ही आज तक शोध किए हैं ।

ऋग्वेद ई०पू० 1500 से ई०पू० 500 तक लिखा जाता रहा है ।
अतः ऋग्वेद में कुछ ऋचाओं का समय प्राचीनत्तम है ।
ऋग्वेद के अष्टम मण्डल में कृष्ण का वर्णन भी है।

छान्दोग्योपनिषद में भी कृष्ण का वर्णन है 

कौषीतकी ब्राह्मण में कृष् का वर्णन है ...
पौराणिक काल में भी कृष्ण और इन्द्र का युद्ध सर्व विदित है ...

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कृष्ण के  शास्त्रीय सन्दर्भ 

 छान्दोग्य उपनिषद [[छान्दोग्य उपनिषद अध्याय-3, खण्ड-17, श्लोक 6 पर देवकी पुत्र कृष्ण का वर्णन

 छान्दोग्य उपनिषद (3,17,6)

 महाभारत, उद्योगपर्व, 130-131, द्रोणपर्व 79
 महाभारत, सभापर्व, अध्याय 38
 हरिवंश पुराण, विष्णुपर्व 8-9
 श्रीमद् भागवत 3।3।-,10।28।-,10।44।
 कुछ को विशेष प्रसिद्धि नहीं प्राप्त हुई, वे यहाँ उल्लिखित हैं।

 श्रीमद् भागवत 10।56, 57, 58
 श्रीमद् भागवत 10।82-84)
 श्रीमद् भागवत ।10।86।13
 श्रीमद् भागवत 11।13।15-42/- 11।30/-
 भागवत, 4।20-25
 भागवत, 8/3
 शिव पुराण, 44 ।7। 26

 ऋग्वेद 8।85।1-9
 ऋग्वेद 1।116।7,23
 ऋग्वेद 8।86।1-5

 ऋग्वेद 1।101।1
 छान्दोग्य उपनिषद 3।17।4-6)

 कौशीतकी ब्राह्मण 30।9
 आर्केलाजिकल सर्वे रिपोर्ट

 1926-27, 1905-6 तथा 1928-29 ई.
 बुद्धिचरित (1-5)

 'गाहासत्तसई' 1।29, 5।47, 2।12, 2।14

 श्री कृष्ण एक ऐतिहासिक पुरुष हुए हैं ।
जिनका सम्बन्ध असीरियन तथा द्रविड सभ्यता से भी है । ऋग्वेद के अष्टम मण्डल में कृष्ण को यमुना की तलहटी में गाय चराने वाले असुर ( अदेव )विशेषण से सम्बोधित किया गया है अत: ये गोप ,गौश्चर अथवा अभीर जन-जाति से सम्बद्ध थे।

और द्रविड (तमिल) रूप अय्यर अहीर से विकसित रूप है। 
अहीर शब्द संस्कृत अभीर से तद्भूत है ।
तथा अभीर का सम्बन्ध हिब्रू बाइबिल में वर्णित अबीर( Abeer )शब्द से है; और इसका भी सम्बन्ध सैमेटिक शब्द " बर " से और बर का अर्थ हिब्रू भाषा में शक्ति-शाली होता है।

वस्तुत यह "बर" शब्द इण्डो-ईरानी और इण्डो- यूरोपीयन शब्द वीर (vir)से सम्बद्ध है और वीर का सम्प्रसारित रूप है आर्य ।

अब आय्यर वस्तुत:आर्य्य: ही है ।
 इस लिए कुछ निश्पक्ष इतिहास विदों ने अहीरों का मिलान आदि आर्य्य चरावाहों के रूप में किया --जो बाद में कृषि के जनक माने गये । _________________________________________________
यद्यपि कुछ इतिहास कार अपने पूर्व दुराग्रहों से आर्य्य: शब्द को देव संस्कृति के अनुयायीयों के विशेषण रूप में मान्य करने पर तुले हैं ।

आर्य शब्द का अर्थ है अरि: से सम्बद्ध ।
वैदिक सन्दर्भों में अरि ईश्वर वाची है ।
मेसोपोटेमिया की पुरालिपियों में अलि एल अथवा इलु असीरियन सैमेटिक जन-जातियों का सबसे बड़ा युद्ध का अधिष्ठात्री देवता है ।

जिसके अवशेष ई०पू० 800 में यूनानीयों के पुराणों में एरीज़ युद्ध देवता के रूप में सुरक्षित हैं ।

परन्तु आर्य्य शब्द असुर संस्कृति के अनुयायी ईरानीयों का प्रथम प्रमाणित वाचक है ।

जिन्होने देव ( दएव ) शब्द का अर्थ "दुष्ट " व्यभिचारी" किया है ।
आर्य, आयर जो केवल अहीरों का मूल रूप है । विश्व की सभी संस्कृतियों में प्राप्त है ।

ऋग्वेद-- में कृष्ण नाम का उल्लेख दो रूपों में मिलता है—एक कृष्ण आंगिरस, जो सोमपान के लिए अश्विनी कुमारों का आवाहन करते हैं (ऋग्वेद 8।85।1-9) 

और दूसरे कृष्ण नाम का एक असुर, जो अपनी दस सहस्र सेनाओं के साथ अंशुमती (जमुना नदी ) के तटवर्ती प्रदेश में रहता हुआ गाय चराता था) ।
और इन्द्र द्वारा पराभूत हुआ  था।

परन्तु पराभूत होने में अतिरञ्जना व पूर्व दुराग्रह है ।
पुराण इन्द्र को कृष्ण से पराजित दर्शाते हैं.

 ऋग्वेद के अष्टम् मण्डल के सूक्त संख्या 96 की ऋचा संख्या (13,14,15,)पर असुर अथवा अदेव कृष्ण का युद्ध इन्द्र से हुआ है ऐसी वर्णित है । ______________________________________________
" आवत् तमिन्द्र: शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त । द्रप्सम पश्यं विषुणे चरन्तम् उपह्वरे नद्यो अंशुमत्या: न भो न कृष्णं अवतस्थि वांसम् इष्यामि ।
वो वृषणो युध्य ताजौ ।14।

अध द्रप्सम अंशुमत्या उपस्थे$धारयत् तन्वं तित्विषाण: विशो अदेवीरभ्या चरन्तीर्बृहस्पतिना युज इन्द्र: ससाहे ।।15।। ____________________________________________
ऋग्वेद में वर्णित है :-" कि कृष्ण नामक असुर अंशुमती अर्थात् यमुना नदी के तटों पर दश हजार सैनिको के साथ रहता था ।
उसे अपने बुद्धि -बल से इन्द्र ने खोज लिया , और उसकी सम्पूर्ण सेना तथा गोओं का हरण कर लिया ।

इन्द्र कहता है कि कृष्ण नामक असुर को मैंने देख लिया है । 
जो यमुना के एकान्त स्थानों पर गायें चराता हुआ रहता है ।
👇 यहाँं > चरन्तं क्रिया-पद विचारणीय है । 
--जो कृष्ण का चरावाह (गोपालन करने वाला )होना सूचित करता है ।
_________________________________________ एक स्थान पर ऋग्वेद के दशम् मण्डल के ६२वें सूक्त का १०वाँ श्लोक प्रमाण रूप में है " कि यदु जो कृष्ण के आदि पूर्वज हैं ।

उनको तुर्वशु के साथ दास अथवा असुर के रूप में वर्णित किया गया है ।👇 ________________________________________
 उत् दासा परिविषे स्मद्दिष्टी गोपरीणसा यदुस्तुर्वश्च च मामहे । ऋग्वेद-१०/ ६२ /१० ______________________________________________
असुर शब्द दास का पर्याय वाची है । 
क्योंकि ऋग्वेद के द्वित्तीय मण्डल के २/३/६ में शम्बर नामक असुर को दास कह कर वर्णित किया गया है । ________________________________________________
उत् दासं कौलितरं बृहत पर्वतात् अधि आवहन् इन्द्र: शम्बरम् (ऋग्वेद-२ /३ /६) _______________________________________________
असुर संस्कृति में दास शब्द का अर्थ--श्रेष्ठ तथा कुशल होता है ।
ईरानी आर्यों ने दास शब्द का उच्चारण दाहे के रूप में किया है ।
वेदिक निघण्टु में  दास शब्द  दाता और त्राता का वाचक है  ↘⬇
इसी प्रकार "असुर" शब्द को "अहुर" के रूप में वर्णित किया है।
असुर शब्द का प्रयोग ऋग्वेद के अनेक स्थलों पर वरुण ,अग्नि , तथा सूर्य के विशेषण रूप में हुआ है ।पाणिनीय ने असुर शब्द की व्युपत्ति की है ।👇 ____________________________________________
पाणिनीय व्याकरण के अनुसार असु :-(प्राण-तत्व) से युक्त ईश्वरीय सत्ता को असुर कहा गया है । _________________________________________________
परन्तु ये लोग असीरियन ही थे ।
जो सुमेरियन , बैबीलॉनियन सभ्यताओं के निर्माता थे । मिश्र की पुरातन संस्कृति से भी असुर (असीरियन ) प्रभावित रहे हैं ।
👇 दास अथवा दस्यु तथा दक्ष जैसे शब्द परस्पर एक ही मूल से व्युत्पन्न हैं ।
ईरानी असुर संस्कृति के उपासक थे ।
और यहूदीयों के ये सहवर्ती थे ।
 यहूदी जन-जाति प्राचीन पश्चिमीय एशिया की एक महान जन-जाति रही है ।
कृष्ट (Christ) अर्थात् यीशु मसीह का जन्म भी यहूदीयों की जन-जाति में हुआ था । अनेक स्तरों पर कृष्ट और कृष्ण के आध्यात्मिक चरित्र में साम्य परिलक्षित होता है ।👇 _________________________________________________
जैसे दौनों का जन्म गोपालक परिवार में गायों के सानिध्य में होना ... यीशु मसीह को एञ्जिल (Angelus) फ़रिश्ता द्वारा ईश्वरीय ज्ञान प्रदान करना ।
 तथा कृष्ण के गुरु घोर-आंगीरस होना कमसे कम उन दौनों के कुछ चरित्र गत समान बिन्दुओं को सूचित करता है। _______________________________________________
आंगीरस तथा एञ्जिल (Angelus) शब्द भी मूलत:एक ही शब्द के रूपान्तरण हैं ।
यहुदह् और तुरबजु के रूप में वर्णित बाइबिल में पुरुष पात्र ... निश्चित रूप से यदु: और तुर्वसु नामक वैदिक पात्र हैं। यहुदह् शब्द की व्युत्पत्ति हिब्रू शब्दकोश में यद् क्रिया से दर्शायी है :-जिसका अर्थ है --धन्यवाद देना, स्तुति करना ।
संस्कृत भाषा में भी यदु शब्द यज् धातु से व्युत्पन्न है । जिसका अर्थ है --यज्ञ करना , ईश्वर स्तुति करना आदि ______________________________________________
अवेस्ता ए जेन्द़ में असुर शब्द का अर्थ = श्रेष्ठ तथा देव का अर्थ = दुष्ट है । _________________________________________________
ऋग्वेद के दशम् मण्डल के ६२वें सूक्त का १०वाँ श्लोक प्रमाण रूप में प्रस्तुत है ।
कि यदु स्वयं गोप अथवा चरावाहे का जीवन व्यतीत कर रहे थे ।
कृष्ण और कृष्ट दौनों का सम्बन्ध क्रमश: अभीर और अबीर जन-जातियों से रहा और --जो मूलत: एक ही थीं दौनों ने ईश्वर की एकरूपता तथा दुखीयों को एक सम्बल प्रदान किया।
उपनिषदों का वर्ण्य- विषय श्रीमद्भगवद् गीता के सादृश्य ही भक्ति मूलक है । _____________________________________________
कृष्ण का स्पष्ट प्रमाण हमें छान्दोग्य उपनिषद के एक श्लोक में मिलता है। 👇 ________________________________________________
छान्दोग्य उपनिषद :--(3.17.6 ) कल्पभेदादिप्रायेणैव “तद्धैतत् घोर आङ्गिरसः कृष्णाय देवकीपुत्रायोक्त्वोवाच” इत्युक्तम् ।
वस्तुतस्तस्य भगवदवतारात् भिन्नत्वमेव तस्य घोरा- ङ्गिरसशिष्यत्वोक्ते:👇

उपर्युक्त गद्यांश में कहा गया है कि " देवकी पुत्र श्रीकृष्ण को महर्षि घोर- आंगिरस् ने निष्काम कर्म रूप भक्ति- उपासना की शिक्षा दी थी !
जिसे ग्रहण कर श्रीकृष्ण 'तृप्त' अर्थात पूर्ण पुरुष हो गए थे।
श्रीकृष्ण का जीवन, जैसा कि महाभारत में वर्णित है, इसी शिक्षा से अनुप्राणित था ; 

और गीता में उसी शिक्षा का प्रतिपादन उनके ही माध्यम से किया गया है।
परन्तु वर्तमान में प्राप्त महाभारत के भीष्म पर्व में सम्पादित श्रीमद्भगवद् गीता कृष्ण के सिद्धान्तों का आंशिक दिग्दर्शन तो है ही।
परन्तु श्रीमद्भगवत् गीता का समायोजन शान्ति पर्व में होना चाहिए

--जो तथ्यों अध्यात्म मूलक हैं वही कृष्ण के सिद्धान्तों का दिग्दर्शन अवश्य करते हैं ।
परन्तु पुष्यमित्र सुंग ई०पू०१४८ के अनुयायी ब्राह्मणों ने वर्ण-व्यवस्था और ब्राह्मण- वाद के समर्थन में कुछ बातें श्रीमद्भगवद् गीता में इस प्रकार से समायोजित की हैं या जोड़ दी हैं ; कि श्रृद्धा प्रवण भक्त उन्हें भी सहज स्वीकार कर लेता है ।
भक्ति सम्प्रदाय का प्रादुर्भाव भागवत धर्म से हुआ है । और भक्ति की भी अनेक धाराऐं प्रस्फुटित हुईं 👇 ________________________________________________
भक्तों के अनुसार भक्ति नौ प्रकार की होती है जिसे नवधा भक्ति कहते हैं।
वे नौ प्रकार ये हैं— श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन। १४. जैन मतानुसार वह ज्ञान जिसमें निरतिशय आनन्द हो और जो सर्वप्रिय, अनन्य, प्रयोजन विशिष्ट तथा वितृष्णा का उदयकारक हो भक्ति है ।

👇 भागवत धर्म वस्तुत: निष्काम भक्ति का ही प्रतिपादन करने वाला प्रथम धर्म है ।
अर्थात्‌ अहंकार शून्य होकर भगवान् के प्रति समर्पण भाव ही भक्ति है ।
दक्षिण भारत में द्रविड़ो के द्वारा भक्ति का प्रादुर्भाव निश्चित रूप से हुआ है ।
दक्षिण भारत के अय्यर सन्तों ने भक्ति को जन्म दिया और आलावार सन्तों ने इस परम्परा को आगे बढ़ाया आलवार शब्द का तमिल अर्थ:- भगवान में लीन ' आलावार तमिल भक्त-कवि एवं सन्त थे। इनका काल छठवीं से नौवीं शताब्दी के बीच रहा।
उनके पदों का संग्रह "दिव्य प्रबन्ध" कहलाता है जो 'वेदों' के तुल्य माना जाता है।

आलवार सन्त भक्ति आन्दोलन के जन्मदाता माने जाते हैं। विष्णु या नारायण की उपासना करने वाले भक्त 'आलवार' कहलाते हैं। इनकी संख्या 12 हैं। उनके नाम इस प्रकार है. ________________________________________________

(1) पोरगे आलवार (2) भूतत्तालवार (3) मैयालवार (4) तिरुमालिसै आलवार (5) नम्मालवार (6) मधुरकवि आलवार (7) कुलशेखरालवार (8) पेरियालवार (9) आण्डाल (10) तांण्डरडिप्पोड़ियालवार (11) तिरुरपाणोलवार (12) तिरुमगैयालवार। इन बारह आलवारों ने घोषणा की कि भगवान की भक्ति करने का सबको समान रूप से अधिकार प्राप्त है। _________________________________________________

इन सन्तों द्वारा वर्ण-व्यवस्था और कर्मकाण्ड परक विधानों का निषेध कर दिया गया क्यों कि 'वह अनन्त आदि और अन्त से परे ईश्वर के भावों की शुद्धता और आत्म - समर्पण से अन्त:करण के स्वच्छ होने पर अनुभूति गम्य होता है ।
नकि कृत्रिम रूप से बनायी वर्ण-व्यवस्था के द्वारा यज्ञ , हवन ,कर्म काण्डों से स्वर्ग की प्राप्ति का प्रयत्न है ।
 और भागवत धर्म स्वर्ग से भी उच्चत्तम स्थिति का प्रतिपादन करने वाला है ।

और तो और ब्राह्मणों की दृष्टि में निम्न समझी जाने वाली कतिपय जातियों के लोग भी इसमें स्वीकार हैं ब्राह्मणों की वर्ण-व्यवस्था गत मान्यताओं का खण्डन करते हुए इन आलावार सन्तों ने समस्त तमिल प्रदेश में पदयात्रा कर भक्ति का प्रचार किया। 
इनके भावपूर्ण लगभग 4000 गीत मालायिर दिव्य प्रबन्ध में संग्रहित हैं। दिव्य प्रबन्ध भक्ति तथा ज्ञान का अनमोल भण्डार है। __________________________________________________
अनेक पुष्ट प्रमाणों के द्वारा प्रतिष्ठित है कि गुप्त सम्राट् अपने को 'परम भागवत' की उपाधि से विभूषित करने में गौरव का अनुभव करते थे।
फलत: उनके शिला लेखों में यह उपाधि उनके नामों के साथ अनिवार्य रूप से उल्लिखित है।
कृष्ण की मूर्तियों का निर्माण भी गुप्त काल में सबसे अधिक हुआ ।
विक्रमपूर्व प्रथम तथा द्वितीय शताब्दियों में भागवत धर्म की व्यापकता तथा लोकप्रियता शिलालेखों के साक्ष्य पर निर्विवाद सिद्ध होती है। ________________________________________________

और ये कर्म-वाद में भी विश्वास करते थे । भारत में इस कर्म-वाद मूलक भागवत धर्म का उल्लेख सर्वप्रथम छठी ई.पू. के आस-पास के उपनिषदों में मिलता है। वासुदेव द्वारा प्रतिपादित यह धर्म व्यक्तिगत उपासना को महत्व देता है।
 महाभारत काल में कृष्ण का तादात्म्य विष्णु से कर दिये जाने के कारण भागवत धर्म वैष्णव धर्म भी कहलाया। वस्तुत विष्णु भी सुमेरियन माइथॉलॉजी में वर्णित (Pisk-nu=पिस्क- नु ) से है ।👇 ________________________________________ Vish-nu " is seen to be the equivalent of the Sumerian Pisk-nu,(पिस्क- नु ) and to mean " The reclining Great Fish (-god) of the Waters " (हिष्ट्री ऑफ सुमेरियन माइथॉलॉजी) विष्णु का सुमेरियन संस्कृति में वर्णन --- 82 Number. .... ( INDO-SUMERIAN SEALS DECIPHERED) भारतीय तथा सुमेरियन महरों ( उत्कीर्ण )तथ्यों पर अर्थ-वत्ता पूर्ण विश्लेषण) 👇 _______________________________________________

डैगन ( फॉनीशियन भाषा में का शब्द है । तो दागुन ; हिब्रू : भाषा में और डेओजोगोन तिब्बती भाषा में रूपान्तरण है।
देगन वस्तुत यह एक मेसोपोटामियन (सुमेरियन) और प्राचीन कनानी देवता है।
ऐसा लगता है कि इसे एब्ला , अश्शूर (असुर), उगारिट और एमोरियों (मरुद्गण) जन-जातियों में से एक ने प्रजनन देवता के रूप में इसकी मान्यता की है।
देगन का प्रारम्भिक क्षेत्र प्राचीन मेसोपोटामिया और प्राचीन कनान देश ही है ।
इसकी माता को शाला या अशेरा और पिता एल के रूप में स्वीकृत किया गया हैं।👇
शाला अनाज की प्राचीन सुमेरियन देवी और करुणा की भावना की प्रति मूर्ति थी। अनाज और करुणा के प्रतीकों ने सुमेर की पौराणिक कथाओं में कृषि के महत्व को प्रतिबिंबित करने के लिए गठबंधन किया है ! और यह विश्वास व्यक्त किया है ।
कि एक प्रचुर मात्रा में फसल देवताओं से करुणा का कार्य नि:सृत होता था।
कुछ परम्पराऐं शाला, शिला या (श्री वैदिक रूप) को प्रजनन देवता देगन (विक्सनु )की पत्नी के रूप में पहचानती हैं!
या तूफान देवता हदाद( हैड )के पत्नी को इश्तर भी कहा जाता है। प्राचीन चित्रणों में, वह शेर के सिर से सजाए गए डबल-हेड मैस या स्किमिटार रखती है। कभी-कभी उसे एक या दो शेरों के ऊपर पैदा होने के रूप में चित्रित किया जाता है।
बहुत शुरुआती समय से, वह नक्षत्र कन्या से जुड़ी हुई है ;और उसके साथ जुड़े प्रतीकवाद के निवासी, वर्तमान समय के लिए नक्षत्र के प्रतिनिधित्व में बनते हैं।
जैसे अनाज के कान देवता के नाम को संस्कृति में बदल गया हो।
भारतीय पुराणों में श्री कृषि की अधिष्ठात्री देवी और विष्णु की पत्नी के रूप में वर्णित है । ( शिल्-क-टाप् ) = शिला ।
गृहीतशस्यात् क्षेत्रात्कणशोमञ्जर्य्या दानरूपायां । १ वृत्तौ उञ्छशब्दे १०७० पृष्ठ दृश्यम् ।
२ पाषाणे ३ द्वाराधःस्थितकाष्ठखण्डे च (गोवराट) स्त्री अमरः ।
४ स्तम्भशीर्षे ५ मनःशिलायां स्त्री मेदिनी कोश । अर्थात् शिला का अर्थ अन्न जो खेतों में से बीना जाता है । वीनस पर एक पर्वत शाला मॉन्स का नाम उसके नाम पर रखा गया है।
सुमेरियन माइथॉलॉजी में एल और अशेरा अथवा ईष्टर ( ईश्तर) जो कि वैदिक शब्द अरि-(ईश्वर) तथा स्त्री के प्रतिरूप हैं यद्यपि स्त्री ही कालान्तरण में श्री के रूप में उदित हुआ _________________________________________________

जिसे ईसाईयों तथा यहूदियों में ईष्टर भी कहा गया । अथिरत एष्ट्रो (सम्भवतः) हिब्रू बाइबल में उन्हें अश्दोद और गाजा में कहीं और मन्दिरों के साथ पलिश्तियों या फलिस्तीनियों के राष्ट्रीय देवता के रूप में उल्लेख किया गया है। श्री' स्त्री या अशेरा प्रजनन , कृषि प्रेम आदि की अधिष्ठात्री देवी हैं ।
और अरि लौकिक संस्कृत भाषा में हरि तो कहीं अलि के रूप में प्रकट हुआ ।
"मछली" के लिए एक कनानी शब्द के साथ एक लम्बे समय से चलने वाला संगठन (जैसा कि हिब्रू में : दाग , तिब्ब । / Dɔːg / ), शायद लौह युग में वापस जा रहा है। इस शब्द ने "मछली-देवता" के रूप में एक व्याख्या की है। --जो विष्णु की मत्स्य अवतार की परिकल्पना का जन्म - सूत्र है ।
और अश्शूर कला में " मर्मन (मत्स्य -मानव) के " प्रारूपों का सहयोग (जैसे 1840 के दशक में ऑस्टेन हेनरी लेर्ड द्वारा पाया गया "डैगन" राहत से है ) यद्यपि, भगवान का नाम "अनाज (सेरियस)" के लिए एक शब्द से अधिक सम्भवतः प्राप्त हुआ हैं , जिसमें यह सुझाव दिया गया था कि वह प्रजनन और कृषि से जुड़ा हुआ था। _______________________________________________
इस प्रकार "विष्णु" नाम सुमेरियन "पिस्क-नु" के बराबर माना जाता है, और " जल कीे बड़ी मछली (-गोड) को रीलिंग करना; और यह निश्चित रूप से सुमेरियन में उस पूर्ण रूप के पाए जाने पर खोजा जाएगा।
और ऐसा प्रतीत होता है कि "शुरुआती अवतार" के लिए विष्णु के इस शुरुआती "मछली" का उपदेश भारतीय ब्राह्मणों ने अपने बाद के "अवतारों" में भी मत्स्य अवतार के रूप में ग्रहण किया।
सूर्य-देवता को स्वर्ग में (पिक्स-नु)के रूप में लागू किया है।।
वास्तव में "महान मछली" के लिए सुमेरियन मूल रूप पीश या पीस अभी भी संस्कृत में पिसीर "(मछली) के रूप में जीवित है।
--जो यूरोपीय भाषाओं में फिश (Fish) से साम्य रखता है । "यह नाम इस प्रकार कई उदाहरणों में से एक है ! इस संकेत को" बड़ी हुई मछली "(कुआ-गनु, अर्थात, खाद-गनू, बी, (6925) कहा जाता है! 

जिसमें उल्लेखनीय रूप से सुमेरियन व्याकरणिक शब्द बंदू जिसका अर्थ है "वृद्धि" जैसा कि संयुक्त संकेतों पर लागू होता है, इसका साम्य संस्कृत व्याकरणिक शब्दों के साथ समान रूप से होता है।
विसारः, पुंल्लिंग रूप (विशेषेण सरतीति विसार। सृ गतौ “व्याधिमत्स्यबलेष्विति वक्तव्यम् ” ३।३।१७ ।
इत्यस्य वार्त्तिकोक्त्या घञ् ) मत्स्यः (मछली)। इति अमर कोश ॥ _________________________________________________
विसार शब्द ऋग्वेद में आया है ।
जो मत्स्य का वाचक है ।👇 ऋग्वेदे ।१।७९।१। “हिरण्यकेशो रजसो विसारेऽर्हिर्धुनिर्वात इव ध्रजीमान् ॥
“रजस उदकस्य विसारे विसरणे मेघार्न्निर्गमने ।
” इति तद्भाष्ये - वासुदेव कृष्ण का सर्वप्रथम उल्लेख छान्दोग्य उपनिषद् में देवकी के पुत्र एवं आंगिरस के शिष्य के रूप में हुआ। मेगस्थनीज ने कृष्ण को हेराक्लीज "हरिकृष्ण"नाम से उल्लेख किया है।

👇 विदित होना चाहिए कि जीजस क्राइष्ट को ज्ञान देने वाले फरिश्ते को बाइबिल में एञ्जीलस(Angelus) के रूप में वर्णित किया है ।
और बाइबिल नाम तो लैटिन और यूनानी है ।
अञ्जील नाम यहूदियों का- यह एञ्जीलस Angelus वस्तुत: वैदिक आंगीरस् का रूपान्तरण है । “येऽस्याङ्गाराआसंस्तेऽङ्गिरसोऽभवन्निति” (ऐतरेय ब्राह्मण) _________________________________________________
भागवत धर्म भक्ति मूलक धर्म है ।
जहाँ वर्ण-व्यवस्था और ब्राह्मणों के क्लिष्ट रूढ़िवादी कर्म काण्डों को कोई स्थान नहीं है।
गुप्त काल में इस धर्म की प्रतिष्ठा हुई गुप्त वस्तुत मिश्र में आवासित कॉप्ट (Copt) जन-जाति से सम्बद्ध हैं --जो यहूदियों की एक सोने-चाँदी का व्यवसाय करने वाली शाखा है। और विदित होना चाहिए कि गुप्त "गुप्ता" वणिकों का व्यवसाय गत विशेषण है ।॰
--जो गोप मूलक है ।
गुप्त या गुप्ता वणिकों का व्यवसाय गत विशेषण है। ये वणिक वैदिक पणियों से सम्बद्ध है ।
वैदिक धातु पाठ में पण् स्तुतौ व्यवहारे च पणित विशेषण स्तुतम् 👇
समानार्थक: रूप में निम्न रूप में अनेक शब्द हैं । ईलित,शस्त,पणायित,पनायित,प्रणुत,पणित, पनित,गीर्ण,वर्णित,अभिष्टुत,ईडित,स्तुत 3।1।109।2।6 सङ्गीर्णविदितसंश्रुतसमाहितोपश्रुतोपगतम्. ईलितशस्तपणायितपनायितप्रणुतपणितपनितानि -- जो फोनेशियन थे वही द्रविड़ो के रूप में भी प्रकट हुए पणि का बहुवचन रूप - पणयः- ऋग्वेद में 16 बार प्रयुक्त बहुवचनान्त पणयः शब्द तथा चार बार एकवचनान्त पणि शब्द का प्रयोग है।
ऋग्वेद में पणि नाम से ऐसे व्यक्ति अथवा समूह का बोध होता है, जो कि धनी है किन्तु देवताओं का यज्ञ नहीं करते तथा पुरोहितों को दक्षिणा नहीं देता। देव संस्कृति के विरोधी हैं। पणियों के इष्ट "वल " तथा "मृलीक" थे । --जो देवों के प्रतिद्वन्द्वीयों मे परिगणित हैं।
अतएव यह वेदमार्गियों की घृणा का पात्र है। देवों को पणियों के ऊपर आक्रमण करने के लिए कहा गया है। ऋग्वेद में दस्यु, मृधवाक् एवं ग्रथिन के रूप में भी इनका वर्णन है।
पणि कौन थे इसको लिए फॉनिशियन जन-जाति की इतिहास बोध अपेक्षित है ।
राथ के मतानुसार यह शब्द 'पण्=विनिमय' से बना है तथा पणि वह व्यक्ति है, जो कि बिना बदले के कुछ नहीं दे सकता।
इस मत का समर्थन "जिमर" तथा "लुड्विग" ने भी किया है।
लड्विग ने इस पार्थक्य के कारण पणिओं को यहाँ का आदिवासी व्यवसायी माना है।
ये अपने समुद्रीय पोत अरब, पश्चिमी एशिया, तथा उत्तरी अफ़्रीका में भेजते थे और अपने धन की रक्षा के लिए बराबर युद्ध करने को प्रस्तुत रहते थे।
लेबनान तथा कार्थेज में इनके उपनिवेष स्थापित थे । दस्यु अथवा दास शब्द के प्रसंगों के आधार पर उपर्युक्त मत पुष्ट होता है।
कि --जो दास या दस्यु ब्राह्मणों की वर्ण-व्यवस्था में निम्न व हेय माने गये वही दास शब्द भागवत धर्म में भक्त का वाचक बन गया । भागवत धर्म के अनेक सन्तों ने अपने नाम के साथ दास शब्द लगा लिया । _______________________________________________
द्रविड़ अथवा पणि एक थे ! आर्य और अनार्य दोनों हो सकते हैं।
वास्तव में आर्य और अनार्य सभी भी जन-जाति गत नहीं रहे ।
हिलब्रैण्ट ने इन्हें स्ट्राबो द्वारा उल्लिखित पर्नियन जाति के तुल्य माना है।
जिसका सम्बन्ध दहा (दास) लोगों से था। फ़िनिशिया इनका पश्चिमी उपनिवेश था, जहाँ ये भारत से व्यापारिक वस्तुएँ, लिपि, कला आदि ले गए। कुछ भी सही परन्तु भाषा लिपि और भक्ति का प्रादुर्भाव इन्हीं पणियों के द्वारा हुआ । इसी लिए भारत में वणिक समाज द्वारा कृष्ण की अत्यधिक मान्यताऐं हैं । विशेषत: वार्ष्णेय समाज --जो बरसाने से सम्बद्ध वैश्य वर्ग है। अत: बारहसैनी नाम भी बरसाने से सम्बद्ध होने के कारण पड़ा। वर्तमान में कृष्ण के चरित्र-उपक्रमों का वर्णन करने वाले ग्रन्थ भागवतपुराण में 👇 ________________________________________________

एकादश स्कन्ध में (5.38-40) कावेरी, ताम्रपर्णी, कृतमाला आदि द्रविड़ देशीय नदियों के जल पीनेवाले व्यक्तियों को भगवान्‌ वासुदेव का अमलाशय भक्त बतलाया गया है।
इसे विद्वान्‌ लोग तमिल देश के आलवारों (वैष्णवभक्तों) का स्पष्ट संकेत मानते हैं।
भागवत में दक्षिण देश के वैष्णव तीर्थों, नदियों तथा पर्वतों के विशिष्ट संकेत होने से कतिपय विद्वान्‌ तमिलदेश को भागवत और भक्ति के उदय का स्थान मानते हैं।
--जो यथार्थ की मीमांसा है ।
यद्यपि भागवतपुराण में 'बहुत से प्रक्षिप्त व विरोधाभासी तथ्यों का समायोजन इसकी प्रमाणिकता व प्राचीनता को सन्दिग्ध करता है । काल के विषय में भी पर्याप्त मतभेद है।
इतना निश्चित है कि बोपदेव (13वीं शताब्दी का उत्तरार्ध, जिन्होंने भागवत से संबद्ध 'हरिलीलामृत', 'मुक्ताफल' तथा 'परमहंसप्रिया' का प्रणयन किया तथा जिनके आश्रयदाता, देवगिरि के यादव राजा थे ), महादेव (सन्‌ 1260-71) तथा राजा रामचन्द्र (सन्‌ 1271-1309) के करणाधिपति तथा मंत्री, प्रख्यात धर्मशास्त्री हेमाद्रि ने अपने 'चतुर्वर्ग चिन्तामणि' में भागवत के अनेक वचन उधृत किए हैं।👇 _________________________________________________
शंकराचार्य के दादा गुरु गौड़पादाचार्य ने अपने 'पञ्चीकरणव्याख्या' ग्रन्थ में 'जगृहे पौरुषं रूपम्‌' (भागवतपुराण 1.3.1)
तथा 'उत्तरगीता टीका' में 'श्रेय: स्रुतिं भक्ति मुदस्य ते विभो' (भागवतपुराण 10.14.4) भागवत पुराण के दो श्लोकों को उद्धृत किया है। इससे भागवत की रचना सप्तम शती से अर्वाचीन (बाद की) नहीं मानी जा सकती। 👇
महर्षि दयान्द सरस्वती ने इसे तेरहवीं शताब्दी की रचना बताया है, पर अधिकांश विद्वान इसे छठी शताब्दी का ग्रन्थ मानते हैं।
इसे किसी दक्षिणात्य सन्त विद्वान की रचना माना जाता है। भागवत धर्म भारत के पश्चिमोत्तर प्रदेश तक फैला हुआ था और यह विदेशी यूनानियों के द्वारा समादृत होता था।
पातञ्जल महाभाष्य से प्राचीनतर महर्षि पाणिनि के सूत्रों की समीक्षा भागवत धर्म की प्राचीनता सिद्ध करने के लिए नि:संदिग्ध प्रमाण है।
भागवत धर्म के संस्थापक आभीर जन-जाति के लोग हैं । जिन्हें दक्षिणी भारत में द्रविड़ो के रूप में अय्यर अथवा आयर नाम से जाना जाता है ।
अय्यर उपनाम का उद्भव तमिल के अय्या शब्द से हुआ है, और यह शब्द संस्कृत के आर्य से निकला है। आर्य का अर्थ होता है :- वीर अथवा यौद्धा परवर्ती अर्थ श्रेष्ठता को ध्वनित करने वाला हुआ ।
स्वयं आर्य शब्द संस्कृत भाषा के अतिरिक्त हिब्रू बाइबिल में भी अबर और बर से सम्बद्ध है।👇
आर्य और वीर शब्दों का विकास परस्पर सम्मूलक है । और पश्चिमीय एशिया तथा यूरोप की समस्त भाषाओं में ये दौनों शब्द प्राप्त हैं ।
परन्तु आर्य शब्द वीर शब्द का ही सम्प्रसारित रूप है । अत: शब्द ही प्रारम्भिक है ।
आभीर शब्द हिब्रू बाइबिल में अबीर (ईश्वरीय शक्ति) के रूप में है 👇
बाइबिल में अबीर नाम की उत्पत्ति मूलक अवधारणा । अबीर नाम जीवित अथवा अस्तित्वमान् ईश्वर के खिताब में से एक है।
किसी कारण से इसका आमतौर पर अनुवाद किया जाता है (किसी कारण से सभी भगवान के नाम आमतौर पर अनुवादित होते हैं ।
और आमतौर पर बहुत सटीक नहीं होते हैं। और कुछ अपनी पसन्द का अनुवाद आमतौर पर ताकतवर होता है, जो बहुत सटीक नहीं होता है।
अवर (our )नाम बाइबिल में छह बार होता है लेकिन कभी अकेला नहीं होता; पांच बार यह जैकब नाम और एक बार इज़राइल के साथ मिलकर है। ______________________________________________
यशायाह 1:24 में हमें तेजी से उत्तराधिकार में भगवान के चार नाम मिलते हैं क्योंकि यशायाह ने रिपोर्ट की: "इसलिए 1-अदन, 2-(यह्व )YHWH , 3-सबाथ , 4-अबीर इज़राइल घोषित करता है । यशायाह 49:26 में एक और पूर्ण कॉर्ड होता है: सभी माँश (आदमी )यह जान लेंगे कि मैं, हे प्रभु, आपका उद्धारकर्ता और आपका उद्धारक, अबीर याकूब हूं, "और जैसा यशायाह 60:16 में समान है।
पूरा नाम अबीर याकूब स्वयं पहली बार याकूब द्वारा बोला जाता था।
अपने जीवन के अन्त में, याकूब ने अपने बेटों को आशीर्वाद दिया और जब यूसुफ की बारी थी तो उसने अबीर याकूब (उत्पत्ति खण्ड बाइबिल अध्याय 49:24) के हाथों से आशीर्वादों से बात की। कई सालों बाद, स्तोत्रवादियों ने राजा दाऊद को याद किया, जिन्होंने अबीर जैकब द्वारा शपथ ली थी कि वह तब तक सोएगा जब तक कि उसे (YHWH )के लिए जगह नहीं मिली; अबीर याकूब के लिए एक निवास स्थान (भजन 132: 2-5)। ________________________________________________
अबीर नाम की भाषिक व्युपत्ति अबीर नाम हिब्रू धातु उबर ('बर ) से आता है, जिसका मोटे तौर पर अर्थ होता है मजबूत सन्दर्भ:- देखें- बाइबिल हिब्रू शब्दकोश:-אבר रूट אבר ('br) एक उल्लेखनीय जड़ है ! जो सभी सेमिटिक भाषा स्पेक्ट्रम पर होती है। मूल रूप से बाइबल में क्रिया के रूप में नहीं होता है लेकिन अश्शूर (असीरियन भाषा )में इसका अर्थ मजबूत या दृढ़ होना है। हिब्रू में स्पष्ट रूप से कई शब्द हैं जिन्हें ताकत के साथ प्रयोग करना हुआ है, लेकिन यह एक विशिष्ट प्रकार की शक्ति को दर्शाता है। _________________________________________________

यह लेख सांस्कृतिक और ऐैतिहासिक अवधारणाओं पर तो आधारित है ।
यह वर्तमान इतिहास कारों की दुराग्रहों से निर्मुक्त एक सम्यक् गवेषणा को निर्देशित भी करता है । "आर्य" और "आर्यन" के अन्य उपयोगों के लिए, आर्य शब्द का प्रयोग ईरानीयों के धर्म ग्रन्थों में विशेषत: अवेस्ता ए जैन्द में देेखा जा सकता है । परन्तु वीर शब्द भी परवर्ती काल में आर्य शब्द के समानान्तरण प्रचलन में रहा है । प्रस्तुत है एक संक्षिप्त विवेचना----👇 __________________________________________
"आर्यन" (ग्रीक रूप ɛəriən ) एक शब्द है जिसका उपयोग भारत-ईरानी लोगों द्वारा आत्म-पदनाम के रूप में किया जाता रहा है ।
इस शब्द का उपयोग भारत में वैदिक काल के सिन्धु नदी के तटवर्ती लोगों द्वारा जातीय स्तर के रूप में किया जाता था ।
परन्तु इसको जातिगत रूप देने में पाश्चात्य इतिहास विदों का बड़ी योग है ।
परन्तु प्रारम्भिक सन्दर्भों में आर्य शब्द यौद्धा का वाचक था ।
और बहुत बाद में पाश्चात्य इतिहास विदों ने आर्य शब्द का प्रयोग देव संस्कृति के अनुयायी यूरोपीय इण्डो-जर्मन जन-जातियों के लिए किया ।
जो बाल्टिक सागर पर अपने आव्रजन काल से पूर्व एससाथ थे ।
असीरियन जन-जाति में प्राय: यौद्धा वर्ग स्वयं के लिए इस शब्द का प्रयोग करता था ।
और ईरानी संस्कृति में भी इसका यही रूप तीरंदाजों के अर्थ में रूढ़ हो गया ।
और कालान्ततरण में यौद्धा वर्ग के साथ-साथ भौगोलिक क्षेत्र को सन्दर्भित करने के लिए भी किया जाने लगा है।
जहांँ भारत-आर्य शब्द देव संस्कृति पर आधारित है। निकटतम ईरानी लोगों ने अवेस्ता शास्त्र में स्वयं के लिए एक जातीय लेबल (स्तर)के रूप में आर्यन शब्द का उपयोग किया । और इस शब्द के आधार पर देश के ईरान नाम की व्युत्पत्ति निर्धारित हुई है। 19 वीं शताब्दी में यह माना जाता था कि आर्यन भी सभी प्रोटो-इण्डो-यूरोपियन द्वारा उपयोग किए जाने वाले आत्म-पदनाम थे । ______________________________________________

परन्तु इस सिद्धान्त को अब पीछे छोड़ दिया गया है। विद्वान बताते हैं कि, प्राचीन काल में भी, "आर्यन" होने का विचार धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषाई था, नस्लीय नहीं। 19 वीं शताब्दी में पश्चिमी विद्वानों द्वारा ऋग्वेद में गलत व्याख्या किए गए सन्दर्भों पर चित्रण करते हुए, "आर्यन" शब्द को आर्थर डी गोबिनाऊ के कार्यों के माध्यम से एक नस्लीय श्रेणी के रूप में अपनाया गया था ।
जिनकी विचारधारा गोरा उत्तरी यूरोपीय "आर्यों के विचार पर आधारित थी " जो स्थानीय आबादी के साथ नस्लीय मिश्रण के माध्यम से अपमानित होने से पहले, दुनिया भर में स्थानान्तरित हो गया था । और सभी प्रमुख सभ्यताओं की स्थापना में समाविष्ट हो गया था। ह्यूस्टन स्टीवर्ट चेम्बरलेन के कार्यों के माध्यम से, गोबिनेउ के विचारों ने बाद में नाजी नस्लीय विचारधारा को प्रभावित किया, जिसमें "आर्यन लोग" को अन्य मूलवादी नस्लीय समूहों के लिए बेहतर रूप से श्रेष्ठ माना गया। __________________________________________________

इस नस्लीय विचारधारा के नाम पर किए गए अत्याचारों ने शिक्षाविदों को "आर्यन" शब्द से बचने के लिए प्रेरित किया है, जिसे ज्यादातर मामलों में "भारत-ईरानी" द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है। यह शब्द अब केवल "इण्डो-आर्य भाषा" के सन्दर्भ में दिखाई देता है। _______________________________________________
व्युत्पत्ति मूलक दृष्टि कोण से आर्य शब्द हिब्रू बाइबिल में वर्णित एबर से भी सम्बद्ध है । 👇

लैटिन वर्ग की भाषा आधुनिक फ्राञ्च में आर्य शब्द…Arien तथा Aryen दौनों रूपों में।
…इधर दक्षिणी अमेरिक की ओर पुर्तगाली तथा स्पेनिश भाषाओं में यह शब्द आरियो Ario के रूप में विद्यमान है। पुर्तगाली में इसका एक रूप ऐरिऐनॉ Ariano भी है और फिन्नो-उग्रियन शाखा की फिनिश भाषा में Arialainen (ऐरियल-ऐनन) के रूप में है।
रूस की उप शाखा पॉलिस भाषा में (Aryika) के रूप में है।
कैटालन भाषा में (Ari )तथा (Arica) दौनों रूपों में है।
स्वयं रूसी भाषा में आरिजक (Arijec) अथवा आर्यक के रूप में यह आर्य शब्द है विद्यमान है।
इधर पश्चिमीय एशिया की सेमेटिक शाखा आरमेनियन तथा हिब्रू और अरबी भाषा में भी यह आर्य शब्द क्रमशः Ariacoi तथा Ari तथा अरबी भाषा में हिब्रू प्रभाव से म-आरि. M(ariyy -तथा अरि दौनो रूपों में है ।
तथा ताज़िक भाषा में ऑरियॉयी (Oriyoyi )रूप में है …इधर बॉल्गा नदी मुहाने वुल्गारियन संस्कृति में आर्य शब्द ऐराइस् Arice के रूप में है।
वेलारूस की भाषा में Aryeic तथा Aryika दौनों रूप में; पूरबी एशिया की जापानी ,कॉरीयन और चीनी भाषाओं में बौद्ध धर्म के प्रभाव से आर्य शब्द . Aria–iin..के रूप में है । _______________________________________________

आर्य शब्द के विषय में इतने तथ्य अब तक हमने दूसरी संस्कृतियों से उद्धृत किए हैं।
परन्तु जिस भारतीय संस्कृति का प्रादुर्भाव देव संस्कृति के उपासक आर्यों की संस्कृति से हुआ ।
उनका वास्तविक चित्रण होमर ने ई०पू० 800 के समकक्ष इलियड और ऑडेसी महाकाव्यों में ही किया है ट्रॉय युद्ध के सन्दर्भों में- ग्राम संस्कृति के जनक देव संस्कृति के अनुयायी यूरेशियन लोग थे। तथा नगर संस्कृति के जनक द्रविड अथवा ड्रयूड (Druids) लोग उस के विषय में हम कुछ कहते है ।👇

विदित हो कि यह समग्र तथ्य यादव योगेश कुमार 'रोहि' के शोधों पर आधारित हैं।
भारोपीय आर्यों के सभी सांस्कृतिक शब्द समान ही हैं स्वयं आर्य शब्द का धात्विक-अर्थ Rootnal-Mean . .आरम् धारण करने वाला वीर संस्कृत तथा यूरोपीय भाषाओं में आरम् Arrown =अस्त्र तथा शस्त्र धारण करने वाला यौद्धा ….अथवा वीरः |
आर्य शब्द की व्युत्पत्ति( Etymology ) संस्कृत की अर् (ऋृ) धातु मूलक है— अर् धातु के तीन अर्थ सर्व मान्य है । १–गमन करना To go २– मारना to kill ३– हल (अरम्) चलाना …. Harrow मध्य इंग्लिश—रूप Harwe कृषि कार्य करना । ..प्राचीन विश्व में सुसंगठित रूप से कृषि कार्य करने वाले प्रथम मानव आर्य ही थे । इस तथ्य के प्रबल प्रमाण भी हमारे पास हैं ! पाणिनि तथा इनसे भी पूर्व ..कार्तसन धातु पाठ में …ऋृ (अर्) धातु कृषिकर्मे गतौ हिंसायाम् च के रूप में परस्मैपदीय रूप —-ऋणोति अरोति वा .अन्यत्र ऋृ गतौ धातु पाठ .३/१६ प० इयर्ति -जाता है ।
वास्तव में संस्कृत की अर् धातु का तादात्म्य. identity. यूरोप की सांस्कृतिक भाषा लैटिन की क्रिया -रूप इर्रेयर Errare =to go से प्रस्तावित है । 

जर्मन भाषा में यह शब्द आइरे irre =to go के रूप में है पुरानी अंग्रेजी में जिसका प्रचलित रूप एर (Err) है । इसी अर् धातु से विकसित शब्द लैटिन तथा ग्रीक भाषाओं में क्रमशः Araval तथा Aravalis हैं । अर्थात् कृषि कार्य भी ड्रयूडों की वन मूलक संस्कृति से अनुप्रेरित है देव संस्कृति के उपासक आर्यों की संस्कृति ग्रामीण जीवन मूलक है और कृषि विद्या के जनक आर्य थे ।
परन्तु आर्य विशेषण पहले असुर संस्कृति के अनुयायी ईरानीयों का था। _________________________________________________
इसके अलावा अयंगर शब्द उन लोगों के लिए प्रयुक्त किया जाता था जिन्होंने शुद्धिकरण के पांचों स्तर पार कर लिए हों। पाणिनि ने 'वासुदेवार्ग्जुनाभ्यां बुन्‌' (4.3.98) सूत्र में वासुदेव की भक्ति करनेवाले व्यक्ति के अर्थ में बुन्‌ (अक) प्रत्यय का विधान किया है जिससे वासुदेव भक्त (वासुदेवो भक्तिरस्य) के लिए 'वासुदेवक' शब्द निष्पन्न होता है। इस सूत्र के भाष्य तथा प्रदीप के अनुशीलन से 'वासुदेव' का अर्थ नि:संदिग्ध रूप से परमात्मा ही होता है, वसुदेव नामक क्षत्रिय का पुत्र नहीं : संज्ञैषा तत्र भगवत: (महाभाष्य) नित्य: परमात्मदेवताविशेष इह वासदेवो गृह्यते (प्रदीप) कैयट का कथन है कि यहाँ नित्य परमात्मा देवता ही 'वासुदेव' शब्द से गृहीत किया गया है।

काशिका इसी अर्थ की पुष्टि करती है । (संज्ञैषा देवताविशेषस्य न क्षत्रियाख्या, 4.3.98 सूत्र पर काशिका) तत्वबोधिनी में इसी परम्परा में 'वासुदेव' का अर्थ परमात्मा किया गया है।
पतञ्जलि के द्वारा 'कंसवध' तथा 'बलिबन्धन' नाटकों के अभिनय का उल्लेख स्पष्टत: कृष्ण वासुदेव का ऐक्य 'विष्णु' के साथ सिद्ध कर रहा है : इसे वेबर, कीथ, ग्रियर्सन आदि पाश्चात्य विद्वान्‌ भी मानते हैं। इन प्रमाणों से सिद्ध होता है कि पाणिनि के युग में (ई. पूर्व षष्ठ शती में) भागवत धर्म प्रतिष्ठित हो गया था। इतना ही नहीं, उस युग में देवों की प्रतिमा भी मंदिरों में या अन्यत्र स्थापित की जाती थी।
ऐसी परिस्थिति में पाणिनि से लगभग तीन सौ वर्ष पीछे चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार का यूनानी राजदूत मेगस्थीनीज जब मथुरा तथा यमुना के साथ संबद्ध 'सौरसेनाई' (शौरसेन) नामक भारतीय जाति में 'हेरिक्लीज़' नामक देवता की पूजा का उल्लेख करता है, हमें आश्चर्य करने का अवसर नहीं होता।
'हेरिक्लीज़' शौर्य का प्रतिमान बनकर संकर्षण का द्योतक हो, चाहे कृष्ण का।
उनकी पूजा भागवत धर्म का प्रचार तथा प्रसार का संशयहीन प्रमाण है। भागवत धर्म अपनी उदारता और सहिष्णुतावृत्ति के कारण अत्यंत प्रख्यात है।
इस धर्म में दीक्षित होने का द्वार किसी के लिए कभी बंद नहीं रहा।
भगवान्‌ वासुदेव के प्रति प्रेम रखनेवाला प्रत्येक जीव इस धर्म में आ सकता है, चाहे वह जात्या कोई भी हो तथा गुणत: कितना भी नीच हो।
भागवत पुराण का यह प्रख्यात कथन भागवत धर्म के औदार्य का स्पष्ट परिचायक है : किरात हूणध्रां पुलिंद पुल्कसा आभीरकंका यवना खशादय:।
येऽन्ये पापा यदुपाश्रयाश्रया:
शुध्यंति तस्मै प्रभविष्णवे नम:।।
(भागवतपुराण ) श्लोक का तात्पर्य है कि किरात, हूण, आंध्र, पुलिंद, पुल्कस, आभीर, कंक, यवन, खश आदि जंगली तथा विधर्मी जातियों ने और अन्य पापी जनों ने भगवान्‌ के भक्तों का आश्रय लेकर शुद्धि प्राप्त की है। यद्यपि स्वयम् श्रीकृष्ण का जन्म भी गोपोंं अथवा आभीरों के घर में हुआ था।👇 ________________________________________ गोपायनं य: कुरुते जगत: सर्वलौककम् ।
स कथं गां गतो देशे विष्णु: गोपत्वम् आगत ।।९। (हरिवंश पुराण "संस्कृति-संस्थान " ख्वाजा कुतुब वेद नगर बरेली संस्करण अनुवादक पं० श्री राम शर्मा आचार्य) अर्थात् :- जो प्रभु विष्णु पृथ्वी के समस्त जीवों की रक्षा करने में समर्थ है । वही गोप (आभीर) के घर (अयन)में गोप बनकर आता है ।९।
हरिवंश पुराण १९ वाँ अध्याय ।
तथा और भी देखें---यदु को गायों से सम्बद्ध होने के कारण ही यदुवंशी (यादवों) को गोप कहा गया है ।
देखें--- महाभारत का खिल-भाग हरिवंश पुराण __________________________________________ 

" इति अम्बुपतिना प्रोक्तो वरुणेन अहमच्युत ।
गावां कारणत्वज्ञ: सतेनांशेन जगतीं गत्वा गोपत्वं एष्यति ।।२२।।
द्या च सा सुरभिर्नाम् अदितिश्च सुरारिण: ते$प्यमे तस्य भुवि संस्यते ।।२४।।
वसुदेव: इति ख्यातो गोषुतिष्ठति भूतले ।
गुरु गोवर्धनो नामो मधुपुर: यास्त्व दूरत:।।२५।। सतस्य कश्यपस्य अंशस्तेजसा कश्यपोपम:। तत्रासौ गोषु निरत: कंसस्य कर दायक:
तस्य भार्या द्वयं जातमदिति: सुरभिश्चते ।।२६।। ________________________________________
अर्थात् हे विष्णु ! महात्मा वरुण के एैसे वचन सुनकर तथा कश्यप के विषय में सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करके उनके गो-अपहरण के अपराध के प्रभाव से कश्यप को व्रज में गोप (आभीर) का जन्म धारण करने का शाप दे दिया ।।२६।। कश्यप की सुरभि और अदिति नाम की पत्नीयाँ क्रमश: रोहिणी और देवकी हुईं ।

👇👇 गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्री रामनायण दत्त शास्त्री पाण्डेय ' राम' द्वारा अनुवादित हरिवंश पुराण में वसुदेव को गोप ही बताया है इसमें यह 55 वाँ अध्याय है ।
"पितामह वाक्य" नाम- से पृष्ठ संख्या [ 274 ] ( यादव योगेश कुमार'रोहि' की शोध श्रृंखला) _ अब कृष्ण का जन्म हरिवंश पुराण---जो महाभारत का खिल-भाग (अवशिष्ट) है । उसमें कृष्ण का जन्म आभीर (गोप) कबींले में बताया है ।
देखें--- 👇 _________________________________________ अर्थात् हे विष्णु ! महात्मा वरुण के एैसे वचन सुनकर तथा कश्यप के विषय में सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करके उनके गो-अपहरण के अपराध के प्रभाव से कश्यप को व्रज में गोप (आभीर) का जन्म धारण करने का शाप दे दिया ।।२६।। कश्यप की सुरभि और अदिति नाम की पत्नीयाँ क्रमश: रोहिणी और देवकी हुईं ।
गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्री रामनायण दत्त शास्त्री पाण्डेय ' राम' द्वारा अनुवादित हरिवंश पुराण में वसुदेव को गोप ही बताया है इसमें यह 55 वाँ अध्याय है । पितामह वाक्य नाम- से पृष्ठ संख्या [ 274 ] _________________________________________ षड्यन्त्र पूर्वक पुराणों में कृष्ण को गोपों से पृथक दर्शाने के लिए कुछ प्रक्षिप्त श्लोक समायोजित किये गये हैं । --जो अपनी पूर्व पृष्ठभूमि से अन्वय शव जैसे भागवतपुराण दशम् स्कन्ध के आठवें अध्याय में 👇 यदूनामहमाचार्य: ख्यातश्च भुवि सर्वत: ।
सुतं मया मन्यते देवकी सुतम् ।।७।
अर्थात् गर्गाचार्य जी कहते हैं कि नन्द जी मैं सब जगह यादवों के आचार्य रूप में प्रसिद्ध हूँ ।
यदि मैं तुम्हारे पुत्र का संस्कार करुँगा ।
तो लोग समझेगे यह तो वसुदेव का पुत्र है ।७।
एक श्लोक और "
अयं हि रोहिणी पुत्रो रमयन् सुहृदो गुणै: ।
आख्यास्यते राम इति बलाधिक्याद् बलं विदु:।
यदूनाम् अपृथग्भावात् संकर्षणम् उशन्ति उत ।।१२
अर्थात् गर्गाचार्य जी ने कहा :-यह रोहिणी का पुत्र है ।इस लिए इसका नाम रौहिणेय ।
यह अपने लगे सम्बन्धियों और मित्रों को अपने गुणों से आनन्दित करेगा।
भागवत मत में अहिंसा का साम्राज्य है।
भागवत मत वैदिक यज्ञयागों के अनुष्ठानों का विरोधी नहीं है, परन्तु वैदिक यज्ञों में यह हिंसा का प्रबल विरोधी है। नारायणीय पर्व के भगवद्भक्त राजा उपरिचर का आख्यान इसी सिद्धान्त को पुष्ट करता है।
उस नरपति ने महान्‌ अश्वमेध किया, परन्तु उसमें किसी प्रकार के पशु का हिंसन तथा बलिदान नहीं किया गया (सम्भूता : सर्वसम्भारास्तमिन्‌ राजन्‌ महाक्रतौ। न तत्र पशुघातोऽभूत्‌ स राजैवं स्थितोऽभवत्‌। :
शान्तिपर्व, अध्याय 336, श्लो.10)। 'मा हिंस्यात्‌ सर्वा भूतानि' इस श्रुतिवाक्य का अक्षरश: अनुगमन भागवतों ने ही सर्वप्रथम किया तथा इसका पालन अपने आचारानुष्ठानों में किया। ________________________________________
साध्य पक्ष :- कृष्ण का सम्पूर्ण आध्यात्मिक दृष्टि कोण प्राचीनत्तम द्रविड संस्कृति से अनुप्राणित है ।
---जो मैसॉपोटमिया की संस्कृति में द्रुज़ (Druze) कैल्ट संस्कृति में ड्रयूड (Druids) कहे गये ।
द्रविड दर्शन ही कृष्ण का दर्शन है ।
एक साम्य दौनों का कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते।।6।।
जो मूढबुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी कहा जाता है |
(6) यस्त्विन्द्रियाणी मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन। कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते।। 7।।
किन्तु हे अर्जुन ! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है |।।7।।
उस महापुरुष का इस विश्व में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मों के न करने से ही कोई प्रयोजन रहता है तथा सम्पूर्ण प्राणियों में भी इसका किंचिन्मात्र भी स्वार्थ का सम्बन्ध नहीं रहता |18। -------------------------------------------------------------- आत्मा के विषय में यथावत इसी प्रकार की मान्यता प्राचीन वेल्स तथा कैल्ट संस्कृति में उनके पुरोहितों की थीं
। जिन लोगों को वेल्स लोग डरविड तथा रोमन ड्रयूड (Druids) कहते थे ।
जो यहूदीयों के सहवर्ती द्रुज़ तथा भारतीय द्रविड ही थे यूनानी तथा रोमन इतिहास कार लिखते हैं ,कि ड्रयूड पुरोहित ही आत्मा की अमरता तथा पुनर्जन्म के प्रतिपादक थे ।
पश्चिमीय एशिया में तथा यूरोप में भी ... इतिहास कारों की कुछ एैसी ही मान्यताऐं हैं । ------------------------------------------------------------ Alexander Cornelius polihystor--referred to the Druids as philosopher and called their doctrine of the immortality of the Soul and reincarnation or metaphychosis " Pythagorean _______________________________________ The pathyagorean doctrine prevails among the goals teaching that the souls of men are immortal , and that After a fixed Number of years they Will enter into Another body " ज्यूलियस सीज़र आगे लिखता है , ------------------------------------------------------------
Julius Caesar, De Bello Gllic, VI, 13.. __________________________________

कि ड्रयूड पुरोहितों के सिद्धान्तों का मुख्य बिन्दु था, कि आत्मा मरती नहीं है ।
( Philosophyof Druids About Soul) Alexander Cornelius Polyhistor referred to the druids as philosophers and called their doctrine of the immortality of the soul and reincarnation or metempsychosis " Pythagorean": "The Pythagorean doctrine prevails among the Gauls' teaching that the souls of men are immortal, and that after a fixed number of years they will enter into another body." Caesar remarks: "The principal point of their doctrine is that the soul does not die and that after death it passes from one body into another" (see metempsychosis). Caesar wrote: With regard to their actual course of studies, the main object of all education is, in their opinion, to imbue their scholars with a firm belief in the indestructibility of the human soul, which, according to their belief, merely passes at death from one tenement to another; for by such doctrine alone, they say, which robs death of all its terrors, can the highest form of human courage be developed. Subsidiary to the teachings of this main principle, they hold various lectures and discussions on astronomy, on the extent and geographical distribution of the globe, on the different branches of natural philosophy, and on many problems connected with religion. —  Julius Caesar, De Bello Gallico, VI, 13
कि ड्रयूड पुरोहितों के सिद्धान्तों का मुख्य बिन्दु था, कि आत्मा मरती नहीं है ।
( Philosophyof Druids About Soul) Alexander Cornelius Polyhistor referred to the druids as philosophers and called their doctrine of the immortality of the soul and reincarnation or metempsychosis "Pythagorean": "The Pythagorean doctrine prevails among the Gauls' teaching that the souls of men are immortal, and that after a fixed number of years they will enter into another body." Caesar remarks: "The principal point of their doctrine is that the soul does not die and that after death it passes from one body into another" (see metempsychosis).
Caesar wrote: With regard to their actual course of studies, the main object of all education is, in their opinion, to imbue their scholars with a firm belief in the indestructibility of the human soul, which, according to their belief, merely passes at death from one tenement to another; for by such doctrine alone, they say , which robs death of all its terrors, can the highest form of human courage be developed. Subsidiary to the teachings of this main principle, they hold various lectures and discussions on astronomy, on the extent and geographical distribution of the globe, on the different branches of natural philosophy, and on many problems connected with religion. — Julius Caesar, De Bello Gallico, VI, 13 आत्मा के बारे में द्रुडों का दर्शन)👇
अलेक्जेंडर कर्नेलियस पॉलीफास्टर ने द्रविडों को दार्शनिकों के रूप में संदर्भित किया और आत्मा और पुनर्जन्म या (मेटाम्प्सीकोसिस )
"पायथागॉरियन" की अमरता के अपने सिद्धान्त को कहा: "गौल्स (कोल)के बीच पाइथोगोरियन सिद्धान्त प्रचलित हैं । ______________________________________

कि मानव की आत्माएं अमर हैं, और निश्चित अवधि के बाद वे दूसरे शरीर में प्रवेश करेंगीं।"
सीज़र टिप्पणी: "उनके सिद्धांत का मुख्य बिन्दु यह है कि आत्मा मर नहीं जाती है और मृत्यु के बाद यह एक शरीर से दूसरे में गुज़रता है"
अर्थात् नवीन शरीर धारण करती है ।( मेटेमस्पर्शिसिस)।
सीज़र ने लिखा: अध्ययन के अपने वास्तविक पाठ्यक्रम के संबंध में, सभी शिक्षा का मुख्य उद्देश्य उनकी राय में, मानव आत्मा की अविनाशी होने में दृढ़ विश्वास के साथ अपने विद्वानों को आत्मसात करने के लिए है, जो उनकी धारणा के अनुसार, केवल मृत्यु से गुजरता है ।
जैसे एक मकान से दूसर मकान में; केवल इस तरह के सिद्धान्त द्वारा वे कहते हैं, जो अपने सभी भयों की मृत्यु को रोकता है, मानव स्वभाव के सर्वोच्च रूप को विकसित किया जा सकता है ।
इस मुख्य सिद्धान्तों की शिक्षाओं के लिए सहायक, वे विभिन्न व्याख्यान और विश्व के भौगोलिक वितरण, प्राकृतिक दर्शन की विभिन्न शाखाओं पर, और धर्म से जुड़े कई समस्याओं पर, खगोल विज्ञान पर चर्चाएं आयोजित करते हैं।
- जूलियस सीज़र, डी बेलो गैलिको, VI, 13 इतना ही नहीं पश्चिमीय एशिया में यहूदीयों के सहवर्ती द्रुज़ एकैश्वरवादी (Monotheistic) थे ।
ये इब्राहीम परम्पराओं के अनुयायी थे । जिसे भारतीय संस्कृति में ब्रह्मा कहा गया है ।
परन्तु ये मुसलमान ,ईसाई और यहूदी होते हुए भी ईश्वर को एक मानते थे ।
तथा इनका विश्वास था कि पुनर्जन्म होता है । और आत्मा दूसरे शरीर में जाती है । सीरिया ,इज़राएल ,लेबनान और जॉर्डन में बहुसंख्यक रूप से ये लोग आज भी अपनी मान्यताओं का दृढता से अनुपालन कर रहे हैं तथा इनका मानना है कि मृत्यु के पश्चात आत्मा एक दूसरे शरीर में प्रवेश करती है ,वह भी जीवन में वर्ष की निश्चित संख्या के अन्तर्गत .. ------------------------------------------------------------------ वस--निवासे आच्छादने वा आधारकर्मादौ घञ् । १ गृहे २ वस्त्रे ३ अवस्थाने हेमचन्द्र कोश। __________________________________________ भारतीय पुराणों की कालगणना के अनुसार कृष्ण का जन्म आज से लगभग 5,235 ई सन् हुआ था । परन्तु कई वैज्ञानिक कारणों से प्रेरित कृष्ण का जन्म 950 ईसापूर्व मानना है सम्भवतः इस समय कृष्ण का वर्णन भोज पत्रों आदि पर हुआ हो ।
परन्तु कृष्ण का युद्ध आर्यों के नेता इन्द्र से हुआ ऐसा ऋग्वेद के अष्टम् मण्डल के ९०वें सूक्त का वर्णन कहता है ।
और महाभारत में कृष्ण के दार्शिनिक तथा राजनैतिक रूप का वर्णन है। महाभारत का लेखन बुद्ध के बाद में हुआ है । क्योंकि आदि पर्व में बुद्ध का ही वर्णन हुआ है। _________________________________________________
अब कृष्ण और 'द्रविड दर्शन का एक अद्भुत साम्य __________________________________________________
एक साम्य दौनों का तुलनात्मक रूप से -- आत्मा शाश्वत तत्व है ; इस बात को ड्रयूड (Druids) अथवा द्रविड तत्व दर्शी भी कहते हैं ! और कृष्ण भी .. श्रीमद्भगवत् गीता में कठोपोनिषद भी कृष्ण विचार धारा से अनुप्रेरित कुछ साम्य के साथ यही उद्घोष करता है ।👇
न जायते म्रियते वा कदाचित्
न अयम् भूत्वा भविता वा न भूयः |
अजो नित्यः शाश्वतोSयम् पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ||
(श्रीमद्भागवत् गीता तथा कठोपनिषद । .

..वास्तव में सृष्टि का १/४ भाग ही दृश्यमान् ३/४ पौन भाग तो अदृश्य है । परिवर्तन शरीर और मन के स्तर पर निरन्तर होते रहते हैं, परन्तु आत्मा सर्व -व्यापक व अपरिवर्तनीय है ।
एेसा कृष्ण और द्रविडों की मान्यताओं का दिग्दर्शन है। वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृहणाति नरोsपराणि |
तथा शरीराणि विहाय जीर्णानि
अन्यानि संयाति नवानि देही ||

अर्थात् पुराने वस्त्रों को त्याग कर नर जिस प्रकार नये वस्त्र धारण करता है ठीक उसी प्रकार यह जीव -आत्मा भी पुराने शरीर को त्याग कर कर्म संस्कार और प्रवृत्तियों के अनुसार नया शरीर धारण करती है ।
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते। न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति।।4।
मनुष्य न तो कर्मों का आरम्भ किये बिना निष्कर्मता को यानि योगनिष्ठा को प्राप्त होता है ,और न कर्मों के केवल त्यागमात्र से सिद्धि यानि सांख्यनिष्ठा को ही प्राप्त होता है (4) न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।।5।।
निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किये नहीं रहता, क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है |
प्राणी की श्वाँसों का चलना हृदय का धड़कना भी एक सतत् कर्मों का रूप ही तो है । वस्तुत कर्म की ऐसा सुन्दर व्याख्या अन्यत्र दुर्लभ ही है ।
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते।।6।।

जो मूढ़बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी कहा जाता है |(6)👇
यस्त्विन्द्रियाणी मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते।।7 किन्तु हे अर्जुन ! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है |7
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः।।8।। उस महापुरुष का इस विश्व में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है; और न कर्मों के न करने से ही कोई प्रयोजन रहता है

तथा सम्पूर्ण प्राणियों में भी इसका किंचिन्मात्र भी स्वार्थ का सम्बन्ध नहीं रहता |(8)
आत्मा के विषय में यथावत इसी प्रकार की मान्यता प्राचीन वेल्स तथा कैल्ट संस्कृति में उनके पुरोहितों की थीं ।
जिन लोगों को वेल्स लोग डरविड तथा रोमन ड्रयूड (Druids)कहते थे।
वही यहूदीयों के सहवर्ती द्रुज़ तथा भारतीय द्रविड ही थे _________________________________________________
यूनानी तथा रोमन इतिहास कार लिखते हैं ;
कि ड्रयूड पुरोहित ही आत्मा की अमरता तथा पुनर्जन्म के प्रतिपादक थे ।
पश्चिमीय एशिया में तथा यूरोप में भी ... इतिहास कारों की रही है ।
आत्मा के विषय में यथावत इसी प्रकार की मान्यता प्राचीन वेल्स तथा कैल्ट संस्कृति में उनके पुरोहितों की थीं ।जिन लोगों को वेल्स लोग डरविड तथा रोमन ड्रयूड (Druids)कहते थे।
वही यहूदीयों के सहवर्ती द्रुज़ तथा भारतीय द्रविड ही थे यूनानी तथा रोमन इतिहास कार लिखते हैं ; कि ड्रयूड पुरोहित ही आत्मा की अमरता तथा पुनर्जन्म के प्रतिपादक थे ।
पश्चिमीय एशिया में तथा यूरोप में भी ... इतिहास कारों की कुछ एेसी ही मान्यताऐं हैं ।
जिसके कुछ उद्धरण जूलियस सीज़र के ग्रन्थ से निम्न उद्धृत हैं।👇
Alexander Cornelius polihystor--referred to the Druids as philosopher and called their doctrine of the immortality of the Soul and reincarnation or metaphychosis " Pythagorean "
The pathyagorean doctrine prevails among the goals teaching that the souls of men are immortal
, and that After a fixed Number of years they Will enter into Another body
" ज्यूलियस सीज़र आगे लिखता है , Julius Caesar, De Bello Gllic, VI, 13.. कि ड्रयूड पुरोहितों के सिद्धान्तों का मुख्य बिन्दु था, कि आत्मा मरती नहीं है । __________________________________________
Philosophy of Druids About Soul) Alexander Cornelius Polyhistor referred to the druids as philosophers and called their doctrine of the immortality of the soul and reincarnation or metempsychosis
"Pythagorean": "The Pythagorean doctrine prevails among the Gauls' teaching that the souls of men are immortal,
and that after a fixed number of years they will enter into another body."
Caesar remarks: "The principal point of their doctrine is that the soul does not die and that after death..
अलेक्जेंडर कुरनेलियस पॉलिहाइस्टर ने ड्रुइड्स (द्रविडों)को दार्शनिकों के रूप में सन्दर्भित किया और आत्मा और पुनर्जन्म की शाश्वतता के सिद्धान्तों को "पायथागोरियन" कहा।
यूनानी विद्वान् पाइथागोरस ने भी ये सिद्धान्त द्रविड (ड्रयूड- Druid

भागवत पुराण में १०/२७/२२-२४ पर सबसे पहले जब इन्द्र ने गोविन्द नामकरण कृष्ण का करते हैं तो वेद में गोविन्द शब्द कहाँ से आया ...यह विचारणीय है ...

त्रयोविंशोऽध्याय : (आहार्याभिनयाध्याय)
भरट नाट्य शास्त्र के तैइसवें अध्याय में आहार्य (नेपथ्यसज्जा)
प्रकरण के अन्तर्गत विभिन्न प्रदेशों की स्त्रीयों की वेश-भूषा सम्बन्धी 
निर्देशों का विधान करते हुए कहा 
कि ⬇
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आभीर युवतीनान्तु द्विवेणिधर एव तु | 65||
शिर : परिगम: कार्यो नील प्रायमथाम्बरम् | 
अर्थ-आभीर युवतीयाँ दो वेणियों को धारण करें तथा अपने सिर को नीलवर्ण के दुपट्टे आच्छादित करें ||65|
वस्तुत: नील वर्ण विष्णु और कृष्ण का प्रतीक है व्रज की गोपीयों ने भी नीलाम्बर धारण किये थे वे  भी दो वेणियाँ धारण करती थी  इस प्रकार दौनों की पूर्व कालिक एक रूपता स्थापित हती है |

नीला रंग यादवों का सांस्कृतिक प्रतीक है कृष्ण का अर्थ भी नीला है नकि काला श्याम मूलक शब्द स्याही भी नीली होती है  काली नहीं चित्रों में भी कृष्ण नीला आसमानी दर्शाया जाता है काला नहीं ..ये तथ्य विचारणीय हैं