मंगलवार, 1 अक्टूबर 2019

यूरोपीय पुरातन भाषाओं में विशेषत: जर्मनिक भाषाओं में आत्मा शब्द अनेक वर्ण--विन्यास के रूप विद्यमान है।

यूरोपीय पुरातन भाषाओं में विशेषत:
जर्मनिक भाषाओं में आत्मा शब्द अनेक वर्ण--विन्यास के रूप विद्यमान है।

👇 जैसे -
1-पुरानी अंगेजी में--Aedm

2-डच( Dutch) भाषा में Adem रूप

3-प्राचीन उच्च जर्मन में Atum = breath अर्थात् प्राण अथवा श्वाँस--

4-डच भाषा में इसका एक क्रियात्मक रूप (Ademen )--to breathe श्वाँसों लेना परन्तु Auto शब्द ग्रीक भाषा का प्राचीन रूप है ।
जो की Hotos रूप में था ; जो संस्कृत भाषा में स्वत: से समरूपित है ।

श्री मद् भगवद्गीता में कृष्ण के इस विचार को👇
नैनं छिदन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक: ।
न च एनं क्लेदयन्ति आपो न शोषयति मारुत:।।

कृष्ण का यह विचार ड्रयूड Druids अथवा द्रविड दर्शन से प्रेरित है ।

आत्मा नि:सन्देह अजर ( जीर्ण न होने वाला) और अमर (न मरने वाला ) है;  आत्मा में मूलत: अनन्त ज्ञान अनन्त शक्ति अौर यह स्वयं अनन्त आनन्द स्वरूप है।
क्योंकि ज्ञान इसका परम स्वभाव है ।
ज्ञान ही शक्ति है और ज्ञान ही आनन्द परन्तु ज्ञान से तात्पर्य सत्य से अन्वय अथवा योग है । __________________________________________

ज्ञा धातु जन् धातु का ही विपर्यय अथवा सम्प्रसारण रूप है ।
संस्कृत भाषा में "गा" धातु भी जनन अर्थ को प्रकट करती है ।

देखें लट्लकार में रूप
एकवचनम्  द्विवचनम् बहुवचनम्

प्रथमपुरुषः  जिगाति जिगीतः जिगति

मध्यमपुरुषः जिगासि जिगीथः जिगीथ

उत्तमपुरुषः जिगामि जिगाव  जिगाम

तथा जनँ धातु का लट्लकार में रूप भी देखें 🌷

एकवचनम्  द्विवचनम् बहुवचनम्

प्रथमपुरुषः जजन्ति जजातः जज्ञति

मध्यमपुरुषः जजंसि  जजाथः  जजाथ

उत्तमपुरुषः जजन्मि जजन्वः जजन्मः

यूरोपीय भाषाओं में जन क्रिया अनेक रूपान्तरणों मे है
देखें---

*genə-, also *gen-, Proto-Indo-European root meaning "give birth, beget,"

with derivatives referring to procreation and familial and tribal groups.

It is the hypothetical source of/evidence for its existence is provided by:

1-Sanskrit janati  "begets, bears," janah "offspring, child, person," janman- "birth, origin," jatah "born;"

2-Avestan zizanenti "they bear;"

3- Greek gignesthai "to become, happen," genos "race, kind," gonos "birth, offspring, stock;"

4- latin gignere "to beget," gnasci "to be born," genus  (genitive generis) "
race, stock, kind; family, birth, descent, origin," genius "procreative divinity, inborn tutelary spirit, innate quality,"

ingenium "inborn character," possibly germen "shoot, bud, embryo, germ;"

5-Lithuanian gentis "kinsmen;"

6-Gothic kuni  "race;"

7-Old English cennan "beget,  create," gecynd "kind, nature, race;"

8-Old High German kind "child;"

9- Old Irish ro-genar "I was born;"

10-Welsh geni "to be born;"

11-Armenian cnanim "I bear, I am born."

Gen , यह क्रिया भी प्रोटो-इंडो-यूरोपियन भाषा में है जिसकी मूल अर्थ "जन्म देते हैं,"

जन्म सम्बन्ध पारिवारिक और जनजातीय समूहों के संदर्भ में जेन शब्द प्रयुक्त है।

यह इसके अस्तित्व के लिए / सबूत का अवधारणा मूलक स्रोत है:

संस्कृत भाषा  जजन्ति जन्म देता है,"
जना "संतान, बच्चा, व्यक्ति," जाति (ज्ञाति) मूल, "जन्म;"

Avestan zizanenti जिजान्ति" वे जन्म देते हैं;"

ग्रीक भाषा में गिन्नेस्थाई ( gignesthai)"बनने, होने," जीनोस "जाति ," गोनोस "जन्म, संतान,

लैटिन गिगनेयर " gignere " को जन्म देने के लिए," गैनसी "को जन्म देने के लिए," जीनस (जीनियस ,जेनिस) "जाति ,परिवार, जन्म, वंश, उत्पत्ति," जीनियस "उपादेय देवता, जन्मजात टूटी-फूटी आत्मा, जन्मजात गुणवत्ता," इंगेनियम "

जन्मजात चरित्र, "संभवतः जर्मेन"  कली, भ्रूण, रोगाणु; "

लिथुआनियाई जेंटिस gentis "किंसमेन;" जाति

गॉथिक कुनी जाति (ज्ञाति)

पुरानी अंग्रेजी सेनन cennan "जन्म-देना, बनाएँ," gecynd "प्रकार, प्रकृति, नस्ल;"

पुरानी उच्च जर्मन तरह का "बच्चा;"

पुराने आयरिश रो-जीनर (ro-gena) "मैं पैदा हुआ था?"

वेल्श जीन (geni)"पैदा होने के लिए;"

अर्मेनियाई cyanim " मैं जन्म-देना हूँ, मैं पैदा हुआ हूं।"

वस्तुत जान ही ज्ञान है ।
क्योंकि लोक जीवन ज्ञान से ही व्यक्ति की शक्ति का मापन होता है ।

सत्य ज्ञान का गुण है और चेतना भी ज्ञान एक गुण है सत्य और ज्ञान दौनों मिलकर ही आनन्द का स्वरूप धारण करते हैं।

जैसे सत्य पुष्प के रूप में हो तो ज्ञान इसकी सुगन्ध और चेतना इसका पराग और आनन्द स्वयं मकरन्द (पुष्प -रस )है ;

आत्मा सत्य है ।

क्योंकि इसकी सत्ता शाश्वत है ।

एक दीपक से अनेक दीपक जैसे जलते हैं ; ठीक उसी प्रकार उस अनन्त सच्चिदानन्द ब्रह्म अनेक आत्माऐं उद्भासित हैं ।

परन्तु अनादि काल से वह सच्चिदानन्द ब्रह्म लीला रत है ;यह संसार लीला है ।

और अज्ञानता ही इस समग्र लीला का कारण है ।
अज्ञानता सृष्टि का स्वरूप है ;

उसका स्वभाव है यह सृष्टि स्वभाव से ही अन्धकार उन्मुख है।

क्यों कि अन्धकार का तो कोई दृश्य श्रोत नहीं है, परन्तु प्रकाश का प्रत्येक श्रोत दृश्य है।

अन्धकार तमोगुणात्मक है ,तथा प्रकाश सतो गुणात्मक है यही दौनो गुण द्वन्द्व के प्रतिक्रिया रूप में रजो गुण के कारक हैं यही द्वन्द्व सृष्टि में पुरुष और स्त्री के रूप में विद्यमान है।

स्त्री स्वभाव से ही वस्तुत: कहना चाहिए प्रवृत्ति गत रूप से भावनात्मक रूप से प्रबल होती हैं ;

और पुरुष विचारात्मक रूप से प्रबल होता है।

इसके परोक्ष में सृष्टा सृष्टा का एक सिद्धान्त निहित है ।
वह भी विज्ञान - संगत क्योंकि व्यक्ति इन्हीं दौनों विचार भावनाओं से पुष्ट होकर ही ज्ञान से संयोजित होता है । अन्यथा नहीं ,

वास्तव में इलैक्ट्रॉन के समान सृष्टि सञ्चालन में स्त्री की ही प्रधानता है।

..और संस्कृत भाषा में आत्मा शब्द का व्यापक अर्थ है :--जो सर्वत्र चराचर में व्याप्त है ।

---आत्मा शब्द द्वन्द्व से रहित ब्रह्म का वाचक भी और द्वन्द्व से संयोजित जीव का वाचक भी है।

जैसे समुद्र में लहरें उद्वेलित हैं वैसे ही आत्मा में जीव उद्वेलित है ,वास्तव में लहरें समुद्र जल से पृथक् नहीं हैं ,लहरों का कारक तो मात्र एक आवेश या वेग है ।

ब्रह्म रूपी दीपक से जीवात्मा रूपी अनेक दीपकों में जैसे एक दीपक की अग्नि का रूप अनेक रूपों भी प्रकट हो जा है ।

परन्तु इन सब के मूल में आवेश

अथवा इच्छा ही होती है ।
और आवेश द्वन्द्व के परस्पर घर्षण का परिणाम है ! जीव अपने में अपूर्णत्व का अनुभव करता है ।
कपरन्तु यह अपूर्णत्व किसका अनुभव करता है उसे ज्ञाति नहीं :-
*******************************************

ज्ञान दूर है और क्रिया भिन्न ! 

      श्वाँसें क्षण क्षण होती विच्छिन्न ।

पर खोज अभी तक जारी है ।

अपने स्वरूप से मिलने की ।
    हम सबकी अपनी तैयारी है ।

आशा के पढ़ाबों से दूर निकर
संसार में किसी पर मोह न कर

ये हार का हार स्वीकार न कर
मञ्जिल बहुत दूर तुम्हारी है ।

शोक मोह में तू क्यों खिन्न है ।
कुछ पल के रिश्ते सब भिन्न है ।
'रोहि' मतलब की दुनियाँ सारी है ।

****************************************** शक्ति , ज्ञान और आनन्द के अभाव में व्यक्ति अनुभव करता है कि उसका कुछ तो खो गया है ।

जिसे वह जन्म जन्म से प्राप्त करने में संलग्न है ।
परन्तु परछाँईयों में ,परन्तु सबकी समाधान और निदान आत्मा का ज्ञान अथवा साक्षात्कार ही है ।

और यह केवल मन के शुद्धिकरण से ही सम्भव है ।
और एक संकीर्ण वृत्त (दायरा)भी ।

यह एक बिन्दुत्व का भाव ( बूँद होने का भाव )है । जबकि स्व: मे अात्म सत्ता का बोध सम्पूर्णत्व के साथ है ; यह सिन्धुत्व का भाव (समु्द्र होने का भाव )है ।

व्यक्ति के अन्त: करण में स्व: का भाव तो उसका स्वयं के अस्तित्व का बोधक है ।

परन्तु अहं का भाव केवल मैं ही हूँ ; इस भाव का बोधक है। इसमें अति का भाव ,अज्ञानता है । _________________________________________ अल्पज्ञानी अहं भाव से प्रेरित होकर कार्य करते हैं ; तो ज्ञानी सर्वस्व: के भाव से प्रेरित होकर , इनकी कार्य शैली में यही बड़ा अन्तर है।

संस्कृत भाषा में आत्मा शब्द के अनेक प्रासंगिक अर्थ भी हैं जैसे :---- १--वायु २--अग्नि ३---सूर्य ४--- व्यक्ति --स्त्री पुरुष दौनो का सम्यक् (पूर्ण) रूप ५---ब्रह्म जो कि द्वन्द्व से सर्वथा परे है।

मिश्र की प्राचीन संस्कृति में आत्मा एटुम (Atum )के रूप में सृष्टि का सृजन करने वाले प्रथम देवता के रूप में मान्य है ।

कालान्तरण में मिश्र की संस्कृति में यह रूप "Aten" या "Aton"के रूप में सूर्य देव को दे दिया गया , प्राचीन मिश्र के लोग भारतीयों के समान सूर्य को विश्व की आत्मा मानते थे ।

मिश्र की संस्कृति में अातुम Atum का स्वरूप स्त्री और पुरुष दौनो के समान रूप में था । 👇

और यही (एतुम )वास्तव में सुमेर और बैबीलॉन की संस्कृतियों में आदम के रूप उदित हुआ , जो स्त्री और पुरुष दौनो का वाचक है- और यही से आदम शब्द हिब्रू परम्पराओं में उदय हुआ जिसका समायोजन कुछ अल्पान्तरण के साथ यहूदी.ईसाई तथा इस्लामी शरीयत ने किया है ।

मिश्र वालों की अवधारणा थी; की आतुम( Atum) पूर्ण तथा अनादि देव है ।
जिसने समग्र सृष्टि का सृजन कर दिया है ।

इसी सन्दर्भ में भारतीय उपनिषदों ने कहा है आत्मा के विषय में जो ब्रह्म के अर्थ में है-- _______________________________________________
पूर्णम् अदः पूर्णम् इदम् पूर्णात् पूर्णम् उद्च्यते । .

पूर्णस्य पूर्णम् आदाय पूर्णम् इव अवशिष्यते .।। ________________________________________

..ईशावास्योपनिषदअर्थात् यह आत्मा पूर्ण है और इस पूर्ण से पूर्ण निकालने पर भी पूर्ण ही अवशेष बचता है । ..इधर श्रीमद भगवद् गीता उद्घोष करती है..

🌷🌷🌷 नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः | नैनं क्लेदयन्ति आपो न शोषयति मारुतः || ..

भारतीयों की धारणा के समान जर्मन देव संस्कृतियों के अनुयायीयों  की अवधारणा भी यही थी।

..जर्मन वर्ग की प्राचीन भाषाओं में आज भी आत्मा को एटुम (Atum) कहते हैं ।

पुरानी उच्च जर्मन O.H.G. भाषा में (Atum) शब्द प्रेत एवम् प्राण का वाचक है ।

अर्थात् (Breath & Ghost )यही आत्मा शब्द मध्य उच्च जर्मन M.H.G. भाषा में "Atem" शब्द के रूप में हुआ । जर्मन आर्यों की सांस्कृतिक भाषा डच में यह शब्द (Adem )के रूप में प्रतिष्ठित है ।

और पुरानी अंग्रेजी (ऐंग्लो-सेक्शन)में यह शब्द ईड्म (Aedm) कहीं कहीं यही आत्मा शब्द आल्मा "Alma" के रूप में भी परवर्तित हुआ है ।

"Atum" (संस्कृत आत्मा शब्द से साम्य परिलक्षित है) प्राचीन मिश्र में आत्मा की अवधारणा एक देवता के रूप में की गयी ---जो स्त्री और पुरुष दौनों रूपों में था ।

परम (संस्कृत आत्मा शब्द से साम्य परिलक्षित है) अतूम (जिसे टेम या तेमू के नाम से भी जाना जाता है) पहली और सबसे महत्वपूर्ण प्राचीन मिस्र के देवता, जिनकी उपासना आयनू (हेलिपोलिस, लोअर मिस्र) में हुई थी, हालांकि बाद के दिनों में रा शहर में महत्व बढ़ गया और उसे कुछ हद तक ग्रहण किया।

वह पूर्वी डेल्टा में पिथॉम में प्रति-मंदिर ("अतत का घर") का मुख्य देवता था।

हालांकि वह लोअर मिस्र के पुराने राज्य में अपने सबसे लोकप्रिय में था, लेकिन वह अक्सर मिस्र में फिरौन के साथ निकटता से जुड़ा हुआ है।

नई साम्राज्य के दौरान, अट्टम और थबर्न देव मोंटू (मोंटजू) को राजा के साथ कर्नाक में अमीन के मंदिर में दर्शाया गया है।

स्वर्गीय काल में, भगवान के चिन्ह के रूप में छिपकलियों के ताबीज पहनाए जाते थे।

द्वित्तीय-चरण की प्रस्तुति ...

यादव योगेश कुमार रोहि - 8077160219

योग स्वास्थ्य की सम्यक् साधना है ; इसीलिए योग और स्वास्थ्य इन दौनों का पारस्परिक सातत्य समन्वय अथवा एकता अपेक्षित है । तृतीय चरण की प्रस्तुति ...

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योग स्वास्थ्य की सम्यक् साधना है ; इसीलिए योग और स्वास्थ्य इन दौनों का पारस्परिक सातत्य समन्वय अथवा एकता अपेक्षित  है ।

योग’ शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत भाषा की  ‘युजँ समाधौ’ संयमने च आत्मनेपदीय धातु रूप से है ।
इस चुरादिगणीय सेट् उभयपदीय धातु में ‘घञ् " प्रत्यय लगाने से ही योग शब्द  निष्पन्न होता है।

इस प्रकार ‘योग’ शब्द का अर्थ हुआ- समाधि अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध।

और चित्त की वृत्ति क्या हैं ?
अर्थात्- चित्त का व्यापार ।
वस्तुत यह मन की ही चञ्चलता है
--जो उसके स्वाभाविक 'व्यवहार' का स्वरूप है।
योग के अनुसार चित्त की अवस्था जो पाँच प्रकार की मानी गई हैं  निम्न प्रकार से हैं।
👇
१-क्षिप्त, २-मूढ़ ३-विक्षिप्त, ४-एकाग्र और ५-निरुद्ध।
चित्त की वृत्ति का अर्थ चित्त के कार्य (व्यापार) से है ;
जो स्वभाव जन्य हैं ।

साधारण रूप में चित्त ही हमारी चेतना का संवाहक है :--जो विचार (चिन्तन)और चित्रण (दर्शन)
की शक्ति देता है।

साँख्य-दर्शन के अनुसार चित्त अन्तःकरण की एक वृत्ति है।

स्वामी सदानन्द ने वेदान्तसार में अन्तःकरण की चार वृत्तियाँ वर्णित की हैं:— 👇

1- मन, 2-बुद्धि, 3- चित्त और 5-अहंकार ।
इसे ही अन्त:करण चतुष्टय कहते हैं।

१- संकल्प विकल्पात्मक वृत्ति को मन कहते हैं ।

२-निश्चयात्मक वृत्ति को बुद्धि कहते हैं ( -जब आत्मा का प्रकाश मन पर परावर्तित होता है तब निर्णय शक्ति उत्पन्न होती है; और वही बुद्धि है ।

और इन्हीं दोनों मन और बुद्धि के अन्तर्गत चिन्तनात्मक वृत्ति को चित्त और अस्मिता अथवा अहंता वृत्ति को अंहकार कहते हैं ।

ये ही शूक्ष्म शरीर के साथ सम्पृक्त (जुड़े)रहते हैं ।
योग के आचार्य पतञ्जलि चित्त को स्वप्रकाश नहीं स्वीकार करते ।

वे चित्त को दृश्य और जड़ पदार्थ मानकर उसको एक अलग प्रकाशक मानते हैं जिसे जीव कहते हैं।
वैसे जीव शब्द दिव् धातु का विकसित रूप है ।

उनके विचार में प्रकाश्य और प्रकाशक के संयोग से प्रकाश होता है, अतः कोई वस्तु अपने ही साथ संयोग नहीं कर सकती। 🌸🌸🌸

योगसूत्र के अनुसार चित्त-वृत्ति पाँच प्रकार की है
मन ही चित्त का रूप है —
१-प्रमाण, २-विपर्यय, ३- विकल्प, ४-निद्रा और ५-स्मृति तथा  कुछ विचारक तीन और वृत्तियों को मानते हैं ६-प्रत्यक्ष, ७-अनुमान और ८-शब्दप्रमाण;

ये भी चित्त की संज्ञानात्मक वृत्तियाँ-हैं ।
अतः ये इस प्रकार आठ हो जाती हैं।

चित्त की पाँच वृत्तियाँ इसकी पाँच अवस्थाऐं ही हैं ; नामकरण में भिन्नता होते हुए भी गुणों में समानताओं के स्तर हैं ।

१- एक में दूसरे का भ्रम–विपर्यय है ।

२-स्वरूपज्ञान के बिना मन की कल्पना "विकल्प "है

३-सब विषयों के अभाव का बोध ही  निद्रा है

४-और कालान्तरण में पूर्व किए गये कर्मों के अनुभव का आरोप स्मृति कहलाता है;
यह जाग्रति का बोध है ।

पञ्च-दशी तथा और अन्य दार्शनिक ग्रन्थों में मन या चित्त का स्थान हृदय या हृत्पक्षगोलक लिखा है।

परन्तु आधुनिक पाश्चात्य जीव-विज्ञान ने अन्तःकरण के सारे व्यापारों का स्थान हृदय न मानकर मस्तिष्क में माना है; जो सब ज्ञानतन्तुओं का केंद्र-स्थान है ।

खोपड़ी के अन्दर जो टेढ़ी मेढ़ी गुरियों की सी बनावट होती है, जिसे मेण्डुला कहते है वहीं विचार और चेतना केन्द्रित है । 💥

वही अंतःकरण है और उसी के सूक्ष्म मज्जा-तन्तु-जाल और कोशों की क्रिया द्वारा सारे मानसिक व्यापारों के सम्पादन होता हैं ।
ये तन्तु और कोश प्राणी की कशेरुका या रीढरज्जु से सम्पृक्त हैं ।

भौतिकवादी वैज्ञानिकों के मत से चित्त, मन या आत्मा कोई पृथक् वस्तु नहीं है, केवल व्यापार- विशेष का नाम है।
जो छोटे जीवों में बहुत ही अल्प परिमाण में होता है
और बड़े जीवों में क्रमशः बढ़ता जाता है ;

इस व्यापार का प्राणरस/ जीवद्रव्य (प्रोटोप्लाज्म) के कुछ विकारों के साथ नित्य सम्बन्ध है।

जीव-विज्ञानी कोशिका को जीवन का इकाई मानते हैं । मस्तिष्क के ब्रह्म (Bragma) भाग में पीनियल ग्रन्थि ही आत्मा का स्थान है ।
👂👇👂👂

शारीरिक दृष्टि से पीनियल ग्रन्थि मानव-शरीर का सबसे छोटा अवयव है।

यह एक-चौथाई इंच लंबा एवं सौ मिलीग्राम भारी होता है।
इतना छोटा अंग शायद ही कभी इतनी उत्तेजना का कारण बना हो।

गरदन और सिर के मिलन बिंदु पर मेरुदंड के ठीक ऊपर स्थित यह ग्रंथ भूमध्य भाग में मस्तिष्क की दीवार से जुड़ी है।

ग्रीक वैज्ञानिक हीरोबिस जो ईसा से चार शताब्दी पूर्व शरीर-विज्ञान की अपनी व्याख्याओं के कारण काफी प्रसिद्ध हुए थे, पीनियल संबंधी अपने विचारों से विवादास्पद भी रहे।

वे इस ग्रंथि को विचार-प्रवाह का नियामक मानते थे। उनके अनुसार यह ग्रंथि शारीरिक एवं मानसिक क्षेत्र के मध्यस्थ के रूप में कार्य करती है।

प्रारंभिक लैटिन संरचना शास्त्रियों ने भी इसे स्वामी ग्रंथि की संज्ञा दी थी।

सोलहवीं शताब्दी के फ्राँसीसी दार्शनिक एवं स्नायु विज्ञानी रैने डेस्कार्टिस ने इसे आत्मा का निवास स्थान बताया था।

सन् 1100 में दो वैज्ञानिकों एच. डब्ल्यू ग्राफ तथा ई. बाल्डविन स्पेन्सर ने पीनियल पर गहन शोध की।

उनके शोध-निष्कर्षों ने यह प्रमाणित किया कि यह ग्रंथि वातावरण के प्रकाश से सीधे और चर्म चक्षु के स्नायु मार्ग द्वारा दोनों ही तरह से प्रतिक्रिया करती है। यह निष्कर्ष अध्यात्मवेत्ताओं की इस घोषणा से साम्य रखता है।
कि पीनियल ग्लैंड ही तृतीय चक्षु है।

हाल के वर्षों में मेलाटोनिन तथा सेरोटोनिन नामक दो हार्मोन पीनियल ग्रंथि से पृथक किए गए हैं।

इन दोनों रसस्रावों के गुणों एवं कार्यों के संबंध में किया गया अनुसंधान स्थूल शरीर की रहस्यमय परतों के संबंध में कई नए तथ्य उजागर करता है।

येल स्कूल ऑफ मेडिसिन में कार्यरत मूर्द्धन्य वैज्ञानिक डेनिस लिचेन ने सन् 1160 में पीनियल से मेलाटोनिन नामक हार्मोन पृथक किया।

यह पदार्थ मेढ़क तथा मछलियों में वातावरणीय प्रकाश परिवर्तन की प्रतिक्रिया स्वरूप त्वचा में रंग-परिवर्तन हेतु जिम्मेदार है और मनुष्य में यही भावनात्मक बदलाव का तथा क्रोध एवं भय के आवेगों का नियंत्रणकर्त्ता समझा जाता है।

वयः संधि के प्रारंभ में तथा मनुष्य के यौन विकास में इसकी विशिष्ट भूमिका हैं।

जैसे-जैसे बच्चे वयः संधि काल में प्रवेश करते हैं, उनकी पीनियल ग्रंथि का आकार और कार्य-क्षमता घटती जाती है।

ऐसा माना जाता है कि उक्त ग्रंथि यौन विकास के प्रारंभ को अपने नियंत्रण में रखती है और जब उसका नियमन हट जाता है, तो यही कार्य पिट्यूटरी अपने जिम्मे ले लेती हैं।

कामेंद्रिय को पिट्यूटरी ग्लैंड के माध्यम से नियंत्रित करने में इस तरह का सक्रिय योगदान पीनियल की महत्वपूर्ण भूमिका प्रतिपादित करता है।

आज्ञाचक्र का जागरण क्या है? इसे यदि सरल शब्दों में समझा जाए, तो यह विवेक का अनावरण कहलाएगा। इस विवेक का सहारा लेकर जब मनुष्य अपनी समस्त क्षमताओं को रचनात्मकता की ओर मोड़ लेता है, तो अचेतन की सुप्त संपदा के हीरे-मोती उसे प्राप्त हो जाते हैं। यही प्रसुप्त का जागरण है।

सर्वसामान्य में इस अवयव की सक्रियता उतनी ही होती है, जितने से शरीरगत क्रियाप्रणाली सुचारु रूप से चलती रह सके।
यह साधारण स्थिति और इसका भौतिक स्वरूप हुआ। इस दशा में इसका क्रिया-कलाप शरीर-तंत्र को नियमित-नियंत्रित भर करने तक सीमित होता है, किन्तु जब इसे उत्तेजित कर जाग्रत् किया जाता है, तब यह अपनी सूक्ष्म शक्ति के साथ प्रकट होता और साधक के व्यक्तित्व एवं दृष्टिकोण में ऐसा आमूलचूल परिवर्तन लाता है, जिसे किसी भी प्रकार कायाकल्प स्तर से कम का नहीं कहा जा सकता।

दूरदर्शी विवेकशीलता इसका प्रथम लक्षण है। जिस व्यक्ति में यह दिखलाई पड़े, उसके बारे में असंदिग्ध रूप से कहा जा सकता है कि उसमें पीनियल की सूक्ष्म शक्ति जाग्रत् हो चुकी है। जब यह शक्ति संपूर्ण रूप से उद्बुद्ध होती है, तो आदमी में अनेक प्रकार की आध्यात्मिक विभूतियों का प्रादुर्भाव होता और वह साधारण से असाधारण बन जाता है।

भौतिक स्तर पर इसे प्रभावित करने का कोई उपाय नहीं है, पर आध्यात्मिक स्तर पर इसको उद्दीप्त करने के कितने ही उपाय-उपचार बताए गए है, जिनमें अगोचरी मुद्रा, शाम्भवी मुद्रा, खेचरी मुद्रा, त्राटक, ध्यान-धारणा आदि प्रमुख है।

हार्मोन्स में हमारे शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास की अनंत संभावनाएँ भरी पड़ी हैं। योगाभ्यास द्वार, मनोमय कोश का जागरण और तृतीय नेत्र उन्मीलन का महत् उद्देश्य व्यक्तित्व का परिमार्जन और चिंतन का परिष्कार हैं।
शारीरिक बल-वृद्धि तथा मानसिक स्वास्थ्य के रूप में

पीनियल ग्रन्थि (जिसे पीनियल पिण्ड, एपिफ़ीसिस सेरिब्रि, एपिफ़ीसिस या "तीसरा नेत्र" भी कहा जाता है।
यह पृष्ठवंशी मस्तिष्क में स्थित एक छोटी-सी अंतःस्रावी ग्रंथि है।

यह सेरोटोनिन और मेलाटोनिन को सृजन करती है, जोकि जागने/सोने के ढर्रे तथा मौसमी गतिविधियों का नियमन करने वाला हार्मोन के रूप हैं।.
(पीनियल ग्रन्थिका का स्वरूप) _____________________________________________
इसका आकार एक छोटे से पाइन शंकु से मिलता-जुलता है (इसलिए तदनुसार इसका नाम करण हुआ ) और यह मस्तिष्क के केंद्र में दोनों गोलार्धों के बीच, खांचे में सिमटी हुई स्थिति में रहती है, जहां दोनों गोलकार चेतकीय पिंड जुड़ते हैं।
यह पूर्व भी निर्देशित है कि इसका उपस्थिति:- मानव में पीनियल ग्रन्थिका लाल-भूरे रंग की और लगभग चावल के दाने के बराबर आकार वाली (5-8 मिली-मीटर), ऊर्ध्व लघु उभार के ठीक पीछे, पार्श्विक चेतकीय पिण्डों के बीच, स्ट्रैया मेड्युलारिस के पीछे अवस्थित है।

यह अधिचेतक भाग का अवयव है।

पीनियल ग्रन्थि एक मध्यवर्ती संरचना है
और अक्सर खोपड़ी के मध्य सामान्य एक्स-रे में देखी जा सकती है, क्योंकि प्रायः यह कैल्सीकृत होता है।

पीनियल ग्रन्थि को आत्मा का आसन
भी कहा जाता है।
जो चेतनामय क्रियाओं की सञ्चालक है ।
वस्तुत चित्त ही जीवात्मा का सञ्चालक रूप है ; और चित्त ही स्व है और स्व का अपने मूल रूप में स्थित होने का भाव ही स्वास्थ्य है ।
और यह केवल और केवल योग से ही सम्भव है ।

योग संसार में सदीयों से आध्यात्मिक साधना-पद्धति का सिद्धि-विधायक रूप रहा है ।
और योग से ही ज्ञान का प्रकाश होता है ; और ज्ञान ही जान है ।
अस्तित्व की पहिचान है ।
कठोपोपनिषद में एक सुन्दर उपमा के माध्यम से आत्मा, बुद्धि ,मन तथा इन्द्रीयों के सम्बन्ध का पारस्परिक वर्णन इस किया गया है । 👇 ________________________________________________
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मन: प्रग्रहमेव च।।

इन्द्रियाणि हयान् आहु: विषयांस्तेषु गोचरान् ।
आत्मेन्द्रियं मनोयुक्तं भोक्ता इति आहुर्मनीषिणा ।

( कठोपोपनिषद अध्याय १ वल्ली ३ मन्त्र ३-४ )

अर्थात् मनीषियों ने आत्मा को रथेष्ठा( रथ में बैठने वाला ) ही कहा है ; अर्थात् --जो (केवल प्रेरक है और जो केवल बुद्धि के द्वारा मन को प्रेरित ही करता है।
--जो स्वयं चालक नहीं है ।
यह शरीर रथ है ।

बुद्धि जिसमें सारथी तथा मन लगाम ( प्रग्रह)–पगाह इन्द्रियाँ ही रथ में जुते हुए घोड़े ।
और आगे तो आप समझ ही गये होंगे ।
एक विचारणीय तथ्य है कि आत्मा को प्रेरक सत्ता के रूप में स्वीकार किया जा सकती है ।

--जो वास्तविक रूप में कर्ता भाव से रहित है ।
भारोपीय भाषाओं में
आत्मा के अतिरक्त रूप प्रचलित हैं ।

(प्रेत -Spirit ) शब्द आत्मा की प्रेरक सत्ता का ही बोधक है।
आत्मा कर्म तो नहीं करता परन्तु प्रेरणा अवश्य करता है।

और प्रेरणा कोई कर्म नहीं एक निर्देशन है !
अत: आत्मा को प्रेत भी इसी कारण से कहा गया ;
परन्तु कालान्तरण में अज्ञानता के प्रभाव से लोग के द्वारा प्रेत शब्द का अर्थ ही बदल गया !

इसीलिए आत्मा का विशेषण प्रेत शब्द सार्थक होना चाहिए।

प्रेत शब्द पर हम आगे यथास्थान व्याख्या करेंगे । कठोपोपनिषद का यह श्लोक श्रीमद्भगवत् गीता में है परन्तु शान्ति पर्व में समायोजित है कुछ शब्दों के अन्तर के साथ।

महाभारत के भीष्म पर्व में समायोजित श्रीमद्भगवत् गीता उपनिषद् कठोपोपनिषद का रूपान्तरण न सही परन्तु 'बहुत से श्लोक दोनों के समान हैं।

निम्न गद्यांशों में महाभारत का 'वह श्लोक देखें महाभारत के स्त्री पर्व के अन्तर्गत सातवें अध्याय के श्लोक 13-14 में वर्णन है कि

" विद्वान् पुरुष कहते हैं कि प्राणियों का शरीर रथ के समान है ; सत्व सारथी है इन्द्रिय घोड़े हैं ।

(कर्म करने वाला बुद्धि) मन लगाम है और जो पुरुष स्वेच्छा पूर्वक दौड़ते हुए घोड़ों के वेग का अनुसरण करता है ।

वह तो इस संसार चक्र में पहिए के समान घूमता रहता है।13-14👇

रथ: शरीरं भूतानां सत्वामाहुस्तु सारिथिम् ।
इन्द्रियाणि हयानाहु:कर्मबुद्धिस्तु रश्मय:।13।

तेषां हयानां यो वेगं धावतामनुधावति।
स तु संसारचक्रे८स्मिंश्चक्रवत् परिवर्तते।14।

यस्तान् संयमते बुद्ध्या संयतो न नवर्तते ।
ये तु संसारचक्रे८स्मिंश्चक्रवत् परिवर्तिते।15।

भ्रममाणा न मुह्यन्ति संसारे न भ्रमन्ति ते।

किन्तु जो संयम शील होकर बुद्धि के द्वारा उन इन्द्रियरूपी अश्वों को नियन्त्रण में रखते हैं ।
वे फिर इस संसार में नहीं लौटते।

जो लोग चक्र की भांति घूमने वाले इस संसार चक्कर में घूमते हुए भी मोह के वशीभूत नहीं होते उन्हें फिर संसार में नहीं भटकना पड़ता।।15। _________________________________________

यही बात कठोपोपनिषद में भी दो चार शब्दों के अन्तर से है 👇।
कठोपनिषद् में वाजश्रवापुत्र ऋषिकुमार नचिकेता और यम देव के बीच आध्यात्मिक प्रश्नोत्तरों का कथा रूप में वर्णन है।

यम और नचिकेता का संवाद हुआ था कि नहीं यह प्रमाणित तथ्य नहीं है अपितु तथ्य ज्ञान की प्रमाणिकता का है ।
कि यह ज्ञान सत्य है अथवा असत्य ।

बालक नचिकेता की शंकाओं का समाधान करते हुए यमराज उसे उपमाओं के माध्यम से सांसारिक भोगों में लिप्त आत्मा, अर्थात् जीवात्मा, और उसके शरीर के मध्य का सम्बन्ध स्पष्ट करते हैं ।

संबंधित आख्यान में यम देवता के निम्नांकित श्लोकनिबद्ध दो वचन हम्हें प्रभावित करते हैं ।

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।।
(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ३)

(आत्मानम् रथिनम् विद्धि, शरीरम् तु एव रथम्,
बुद्धिम् तु सारथिम् विद्धि, मनः च एव प्रग्रहम् )

इस जीवात्मा को तुम रथी, रथ का स्वामी, समझो, शरीर को उसका रथ, बुद्धि को सारथी, रथ हांकने वाला, और मन को लगाम समझो ।
(लगाम इंद्रियों पर नियंत्रण हेतु आवश्यक है ।
अगले मन्त्र में उल्लेख है  )

इंद्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ।।

(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ४)

अन्वय:-(मनीषिणः इंद्रियाणि हयान् आहुः, विषयान् तेषु गोचरान्, आत्मा-इन्द्रिय-मनस्-युक्तम् भोक्ता इति आहुः )

मनीषियों, विवेकी पुरुषों ने इंद्रियों को इस शरीर-रथ को खींचने वाले घोड़े कहा है, जिनके लिए इंद्रिय-विषय विचरण के मार्ग हैं, इन्द्रियों तथा मन से युक्त इस आत्मा को उन्होंने शरीर-रूपी रथ के द्वारा काल पथ पर भोग करने वाला बताया है ।

प्राचीन भारतीय विचारकों का चिंतन प्रमुखतया आध्यात्मिक प्रकृति का रहा है ।

ऐहिक सुखों के आकर्षण का ज्ञान
उन्हें भी रहा ही होगा ।
किन्तु उनके प्रयास रहे थे ;
कि वे उस आकर्षण पर विजय पायें ।

इसी लिए उनकी जीवन-पद्धति आधुनिक काल की पद्धति के सर्था  विपरीत रही ।

स्वाभाविक भौतिक आकर्षण से लोग स्वयं को मुक्त करने का प्रयास करें ऐसा वे सोचते रहे होंगे और उपनिषद् आदि ग्रंथ उनकी इसी विचार धारा
को प्रदर्शित करते हैं ।

तृतीय चरण की प्रस्तुति ...

यादव योगेश कुमार "रोहि" 8077160219