सोमवार, 19 अक्टूबर 2026

नग्नता

सभ्यता और संयम

​वस्त्र सभ्यता के प्रतीक, हैं पशुता का अवसान।

संयम बिना सब नग्नता, अधम सोच की पहिचान॥

​इंद्रिय नियंत्रण और पाखंड

​मोटे-सोटे देह कर, खुद को कहें भगवान।      भोग-विलास में लिप्त है,साधु नहीं शैतान ॥

​चेतना और कर्म

​पशु योनि भोगी सदा, नर कर्मठ बड़ा प्रवीन।

चेतना बिना मानव बने,वे पशुओं से भी हीन॥

​काम-ऊर्जा और मर्यादा

​काम-अग्नि को साधे जो, मुनि बने महान।

मर्यादा और शील ही, मुनियों का है निशान॥

आडंबर और यथार्थ

​बाहर से नंगे घूमें, मन में भी भरे विकार।

ऐसा साधु जगत में , फैलाता व्यभिचार ॥

​2. चेतना और विवेक

​पशु योनि में विवेक नहीं, नर को मिला ज्ञान।

वासनाओं पर विजय पाकर, बनता नर भगवान॥

​3. वस्त्र और मर्यादा

​सभ्यता ने वस्त्र गढ़े , ढकने को विषय विकार।

नागा बन नंगा जो घूमें,उसे धिक्कारे संसार॥

​4. साधना और तप

​लंगोट और संयम धारे, वही साधक कहलाय।

भोग-विलास में डूबा है जो, वह भँबरो में गोता खाय॥

साधना और ढोंग

​साधना बिन जो योग जपावे, जग को मूर्ख बनाए। मन के संयम की साधना  क्यों माला तिलक दिखाए। 

​3. शील और मर्यादा

​वस्त्र और मर्यादा दोनों, ये आभूषण हैं नर के।

इनको तजकर फिरने वाले, भागी सदा भ्रम के॥


​1. स्वभाव और प्रवृत्ति

​स्वभाव वश हो प्रवृत्ति, स्थिति में सब ढलें।

एक रूप मानव जाति, भेद नहीं कुछ पलें॥

​2. संकल्प और जिद का भेद

​संकल्प ज्ञान का निश्चय, शठ पाले जिद-हठ।

सत्य-असत्य का अंतर, समझे बुद्धि का घट॥

​3. तपस्या और बंशीवाला

​जलकर खुद को संभाला, तपन सहे तपस्वी मन।

ठुकराए दुनिया जिसे, वह अपने मन का करले नियमन। ॥

​4. आकलन और दृष्टिकोण

​छोटा परमाणु देखे, कभी न लंबी काया।

गलत आकलन जो करे, वो खुद ही पछताया॥

​1. आत्म-शोधन और मन की शांति

​लांछित आक्षेपों से परे, जो तजे मोह और मान।

वही साधक जग में सदा, पाता  है पद निर्वान॥

​2. तपन और साधना

​तपन से तपता रहा, मन में रख विश्वास।

बंशीवाला साथ हो, मिटे सभी संत्रास॥

​3. जीवन और सत्य

​सत्य मार्ग पर जो चले, मिटे सभी अभिमान।

छल-पाखंडी दूर हों, जागे परमब्रह्म का ज्ञान॥

​1. तन्हाई और यथार्थ

​तन्हाई ही मंजूर है हमको, राहें जुदा तमाम।

दौलत के गुरूर वाले, जानें न दिल का काम॥

​2. सभ्यता और चंचलता

​सफलता उसने पाई, 'रोहि' जिसने मन को जीता।

चंचलता के दौर में नर ने, करवाया बहुत फीता ॥

​3. साधना और ढोंग

​साधना से हीन जो,  बने फिरें भगवंत।

ज्ञान बिना पाखंडी हैं,कैसे कहलाए संत॥

​4. कर्म और योग्यता

​डिग्रियों के शोर में, रोहि खोई योग्यता की शान।

तपस्या और संयम के बिना, झूँठा है सारा ज्ञान॥

​5. हुस्न और मोह माया

​हुस्न एक ऐसी बला, अच्छे-अच्छों को छला है।

इश्क की इस आग में, एक पतंगा भी जला है॥

​6. प्रारब्ध और कर्म

​कर्म ही अस्तित्व जीवन का, श्वाँस-धड़कन का वाचा।

प्रारब्ध और पुरुषार्थ से, बनता भविष्य सांचा। 

​1. जीवन और कर्म की डोर

​कर्म की फूलवारी है जीवन, श्वाँस-धड़कन का साज। आहों के आलाप हैं वेदनाओं की आबाज !

​2. ज्ञान और अनुभव की कषौटी

​अनुभव उम्र की कसौटी, ये ज्ञान विज्ञान  समान।

प्रयोगों से जो सिद्ध हो, वही असली है ज्ञान 

​

​4. आत्म-पहचान और ज्ञान

​अहंकार में जो डूबा, वह नास्तिकता के द्वार।

स्वयं को पहचान कर,सत्य का करो विचार। 






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