सभ्यता और संयम
वस्त्र सभ्यता के प्रतीक, हैं पशुता का अवसान।
संयम बिना सब नग्नता, अधम सोच की पहिचान॥
इंद्रिय नियंत्रण और पाखंड
मोटे-सोटे देह कर, खुद को कहें भगवान। भोग-विलास में लिप्त है,साधु नहीं शैतान ॥
चेतना और कर्म
पशु योनि भोगी सदा, नर कर्मठ बड़ा प्रवीन।
चेतना बिना मानव बने,वे पशुओं से भी हीन॥
काम-ऊर्जा और मर्यादा
काम-अग्नि को साधे जो, मुनि बने महान।
मर्यादा और शील ही, मुनियों का है निशान॥
आडंबर और यथार्थ
बाहर से नंगे घूमें, मन में भी भरे विकार।
ऐसा साधु जगत में , फैलाता व्यभिचार ॥
2. चेतना और विवेक
पशु योनि में विवेक नहीं, नर को मिला ज्ञान।
वासनाओं पर विजय पाकर, बनता नर भगवान॥
3. वस्त्र और मर्यादा
सभ्यता ने वस्त्र गढ़े , ढकने को विषय विकार।
नागा बन नंगा जो घूमें,उसे धिक्कारे संसार॥
4. साधना और तप
लंगोट और संयम धारे, वही साधक कहलाय।
भोग-विलास में डूबा है जो, वह भँबरो में गोता खाय॥
साधना और ढोंग
साधना बिन जो योग जपावे, जग को मूर्ख बनाए। मन के संयम की साधना क्यों माला तिलक दिखाए।
3. शील और मर्यादा
वस्त्र और मर्यादा दोनों, ये आभूषण हैं नर के।
इनको तजकर फिरने वाले, भागी सदा भ्रम के॥
1. स्वभाव और प्रवृत्ति
स्वभाव वश हो प्रवृत्ति, स्थिति में सब ढलें।
एक रूप मानव जाति, भेद नहीं कुछ पलें॥
2. संकल्प और जिद का भेद
संकल्प ज्ञान का निश्चय, शठ पाले जिद-हठ।
सत्य-असत्य का अंतर, समझे बुद्धि का घट॥
3. तपस्या और बंशीवाला
जलकर खुद को संभाला, तपन सहे तपस्वी मन।
ठुकराए दुनिया जिसे, वह अपने मन का करले नियमन। ॥
4. आकलन और दृष्टिकोण
छोटा परमाणु देखे, कभी न लंबी काया।
गलत आकलन जो करे, वो खुद ही पछताया॥
1. आत्म-शोधन और मन की शांति
लांछित आक्षेपों से परे, जो तजे मोह और मान।
वही साधक जग में सदा, पाता है पद निर्वान॥
2. तपन और साधना
तपन से तपता रहा, मन में रख विश्वास।
बंशीवाला साथ हो, मिटे सभी संत्रास॥
3. जीवन और सत्य
सत्य मार्ग पर जो चले, मिटे सभी अभिमान।
छल-पाखंडी दूर हों, जागे परमब्रह्म का ज्ञान॥
1. तन्हाई और यथार्थ
तन्हाई ही मंजूर है हमको, राहें जुदा तमाम।
दौलत के गुरूर वाले, जानें न दिल का काम॥
2. सभ्यता और चंचलता
सफलता उसने पाई, 'रोहि' जिसने मन को जीता।
चंचलता के दौर में नर ने, करवाया बहुत फीता ॥
3. साधना और ढोंग
साधना से हीन जो, बने फिरें भगवंत।
ज्ञान बिना पाखंडी हैं,कैसे कहलाए संत॥
4. कर्म और योग्यता
डिग्रियों के शोर में, रोहि खोई योग्यता की शान।
तपस्या और संयम के बिना, झूँठा है सारा ज्ञान॥
5. हुस्न और मोह माया
हुस्न एक ऐसी बला, अच्छे-अच्छों को छला है।
इश्क की इस आग में, एक पतंगा भी जला है॥
6. प्रारब्ध और कर्म
कर्म ही अस्तित्व जीवन का, श्वाँस-धड़कन का वाचा।
प्रारब्ध और पुरुषार्थ से, बनता भविष्य सांचा।
1. जीवन और कर्म की डोर
कर्म की फूलवारी है जीवन, श्वाँस-धड़कन का साज। आहों के आलाप हैं वेदनाओं की आबाज !
2. ज्ञान और अनुभव की कषौटी
अनुभव उम्र की कसौटी, ये ज्ञान विज्ञान समान।
प्रयोगों से जो सिद्ध हो, वही असली है ज्ञान
4. आत्म-पहचान और ज्ञान
अहंकार में जो डूबा, वह नास्तिकता के द्वार।
स्वयं को पहचान कर,सत्य का करो विचार।
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