सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

गोपों की उत्पत्ति श्रीकृष्ण सारांगिणी से ...

गोपों की उत्पत्ति एवं उनका पृथ्वी पर अवतरण

नमस्कार मित्रों ! मित्रों आप लोग इस महत्वपूर्ण विडियो में गोपों की उत्पत्ति एंव उनका श्रीकृष्ण के साथ भूतल पर अवतरण के बारे में विस्तार से जानेंगे। यानी आप लोग इस विडियो में जाने पाएगे कि वह कौन सी ऐसी घटना घटी जिसके परिणामस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण को अपने गोप गोपियों के साथ भूतल पर अपनी ही  जाति के गोप कुल में आकर जन्म लेना पड़ा।

तो चलिए बिना देर किए इस महत्वपूर्ण प्रसंग को शुरू करते हैं। तो मित्रों बात उस पूर्वकाल की है जब भूतल पर पाप का भार अत्यधिक बढ़ गया था। तब उस भार से निजात पाने के लिए भू देवी सबसे पहले ब्रह्मा जी के पास जाकर जो कहा  उसका वर्णन गर्गसंहिता के गोलोक खण्ड के अध्याय -2 में कुछ इस प्रकार लिखा गया है -


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बहुत पहले की बात है - दानव, दैत्य,असुर और दुष्ट स्वभाव के मनुष्य और दुष्ट राजाओं के भारी भार से अत्यंत पीड़ित हो, पृथ्वी गौ का रुप धारण करके अनाथ की भांति रोती बिलखती हुई अपनी आन्तरिक व्यथा का निवेदन करने के लिए ब्रह्मा जी के शरण में गई।

वहां उसकी कष्ट कथा सुनकर ब्रह्मा जी ने उसे धीरज बंधाया और तत्काल समस्त देवताओं तथा शिवजी को साथ लेकर वे सभी भगवान नारायण के वैकुण्ठ धाम में गये। वहां जाकर ब्रह्मा जी ने चतुर्भुज भगवान विष्णु को प्रणाम करके अपना सारा अभिप्राय निवेदन किया। तब लक्ष्मीपति भगवान विष्णु उन उद्विग्न देवताओं तथा ब्रह्मा जी से इस प्रकार बोले -

ब्रह्मन! साक्षात भगवान श्रीकृष्ण ही अगणित ब्रह्माण्डों के स्वामी, परमेश्वर, अखण्ड स्वरुप तथा देवातीत हैं। उनकी लीलाएं अनन्त एवं अनिर्वचनीय हैं। उनकी कृपा के बिना यह कार्य कदापि सिद्ध नहीं होगा, अतः तुम उन्हीं के अविनाशी एवं परम उज्जवल धाम में शीघ्र जाओ।

मित्रों आगे बढ़ने से पहले यहां पर पर दो बाते जानना आवश्यक है कि पहला यह कि यह धटना अति प्राचीन यानी गोलोक के बाराह कल्प की है। दूसरी बात यह कि अधिकांश कथा वाचक श्रीकृष्ण को विष्णु का अंश या श्रीकृष्ण को विष्णु से उत्पन्न बताकर लोगों में भ्रम फैलाया करते हैं। किन्तु यहां पर वहीं चतुर्भुज विष्णु भगवान श्रीकृष्ण को सुप्रीम पावर बताते हुए कहते हैं कि - साक्षात भगवान श्रीकृष्ण ही अगणित ब्रह्माण्डों के स्वामी, परमेश्वर, अखण्ड स्वरुप तथा देवातीत हैं। उनकी लीलाएं अनन्त एवं अनिर्वचनीय हैं। तब ऐसे में यह कैसे स्वीकार किया जाए कि परम प्रभु भगवान श्रीकृष्ण विष्णु के अंशावतार हैं। इसी भ्रम को दूर करना हमारा मुख्य उद्देश्य है।
दूसरी बात यह कि इस गूढ़ रहस्य को अभी तक ब्रह्मा जी भी नहीं जानते थे कथावाचक तो बहुत दूर हैं। तो विडियो में अंत तक बनें रहें क्योंकि आगे स्पष्ट हो जाएगा कि कौन अंशावतार हैं और कौन परिपूर्णतम और अनन्त कलाओं से युक्त परमब्रह्म हैं। तो चलिए आगे देखते हैं ब्रह्मा जी चार भुजा धारी विष्णु से आगे क्या कहा -


तब ब्रह्मा विष्णु जी से बोले- प्रभु ! आपके अतिरिक्त कोई दूसरा भी परिपूर्णतम तत्व है, यह मैं नहीं जानता। यदि कोई दूसरा भी आपसे उत्कृष्ट परमेश्वर हैं, तो उसके लोक का मुझे दर्शन कराइये। मित्रों यहां ध्यान दीजिए चार भुजा धारी विष्णु के लिए परिपूर्ण शब्द आया है न कि परिपूर्णतम। और यह  सर्वविदित है कि परिपूर्ण से श्रेष्टठतम परिपूर्णतम होता है। दूसरी बात यहां पर यह सिद्ध होती है कि ब्रह्मा जी को भी अबतक यह पता नहीं हैं कि परिपूर्णतम परमेश्वर श्रीकृष्ण हैं या चार भुजा धारी विष्णु। आगे यह भी स्पष्ट हो जाएगा अतः विडियो में अंत तक बनें रहें।

 तो मित्रों ब्रह्मा जी के इस प्रकार कहने पर परिपूर्ण भगवान विष्णु ध्यान रहे यहां पर विष्णु के लिए परिपूर्ण कहा गया है परिपूर्णतम नहीं। और यह बात सर्वविदित है कि परिपूर्ण से परिपूर्णतम आगे है। अब पुनः आगे बढ़ते हैं -
ब्रह्मा जी के इस प्रकार कहने पर परिपूर्ण भगवान ने सम्पूर्ण देवताओं सहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के ऊपरी शिखर पर विराजमान गोलोक धाम का मार्ग दिखलाया। तब देवता उसी मार्ग से वहां के लिए नियत जलयान द्वारा बाहर निकले। वहां ब्रह्माण्ड के उपर पहुंच कर उन सबने नीचे की ओर उस ब्रह्माण्ड को जो चतुर्भुज विष्णु का है, उसे एक तुमडी की भांति देखा।

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तत्पश्चात वहीं उपर की ओर देवताओं ने विरजा नदी का सुन्दर तट देखा, विरजा नदी को पार करके देवताओं ने उस उत्तम नगर यानी श्रीकृष्ण के गोलोक धाम में पहुंचे, जो अनन्त कोटि सूर्यों की ज्योति का पुंज जान पड़ता था। उसे देखकर देवताओं की आंखें चौंधिया गई। वे उस तेज से पराभूत हो जहां के तहां खडे़े रह गए। तब चतुर्भुज भगवान विष्णु की आज्ञा के अनुसार उस तेज को प्रणाम करके ब्रह्मा जी उसका ध्यान करने लगे। तभी उसी ज्योति के भीतर उन्होंने एक परम शक्तिमय साकार धाम को देखा जहां कामदेव के समान मनोहर रूप-लावण्य शालिनी, श्यामसुन्दर विग्रहा श्रीकृष्ण पार्शदा द्वारपाल का कार्य कर रही थी। देवता लोग उस द्वार में प्रवेश हेतु आगे बढ़ने लगे। तभी श्रीकृष्ण पार्षदा उन्हें रोक दी।


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तब देवता बोले- देवी! हम सभी ब्रह्मा, विष्णु, शंकर नाम के लोकपाल और इन्द्र आदि देवता हैं। भगवान श्रीकृष्ण के दर्शनार्थ यहां आये हैं। तभी एक सखी, जो शतचन्द्रानना नाम से विख्यात थी, जिसके पीले वस्त्र थे। और हाथ में बेंत की छडी़ लिए थी, बाहर आयी और उन देवताओं से पूछा - यहां पधारे हुए आप सब देवता किस ब्रह्माण्ड के अधिपति हैं, यह शीघ्र बताइये। तब मैं भगवान श्रीकृष्ण को सूचित करने के लिए उनके पास जाऊंगी।

तब देवताओं ने कहा- अहो! यह तो बडे़े आश्चर्य की बात है, क्या अन्यान्य ब्रह्माण्ड भी है? हमने तो उन्हें कभी नहीं देखा।शुभे! हम तो यही जानते हैं कि एक ही ब्रह्माण्ड है, इसके अतिरिक्त कोई है ही नहीं।
तब शतचंन्द्रानना बोली - ब्रह्मदेव! यहां तो विरजा नदी में करोड़ों ब्रह्माण्ड इधर उधर लुढ़क रहे हैं। उसमें भी आप जैसे ही पृथक पृथक देवता वास करते हैं। क्या आप लोग अपना नाम गांव तक नहीं जानते? जान पड़ता है कभी यहां आये नहीं है, अपनी थोड़ी सी जानकारी में ही हर्ष से फूल उठें हैं। जान पड़ता है, कभी घर से बाहर निकले ही नहीं हैं। जैसे गुलर के फलों में रहने वाले कीड़े जिस फल में रहते हैं, इसके सिवा दूसरे को नहीं जानते, उसी प्रकार आप जैसे साधारण जन जिसमें उत्पन्न होते हैं, एकमात्र उसी को ब्रह्माण्ड समझते हैं।

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इस प्रकार उपहास के पात्र बने हुए सभी देवता चुपचाप खडे़े रहे, कुछ बोल न सके। तब उन्हें चकित से देखकर भगवान विष्णु ने कहा - जिस ब्रह्माण्ड में भगवान पृश्निगर्भ का सनातन अवतार हुआ है तथा भगवान वामन नख से जिस ब्रह्माण्ड में विवर बन गया है, उसी ब्रह्माण्ड के हम लोग हैं।
यह सुनकर शतचंन्द्रानना स्वयं भीतर चली गई। फिर शीध्र ही आयी और सबको अन्तः पुर में पधारने की आज्ञा देकर वापस चली गई। तदनन्तर सम्पूर्ण देवताओं ने परम सुन्दर धाम का दर्शन किया।

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वहां देवताओं ने देखा कि गौओं की रक्षा करने वाले गोप चरवाहे भी अनेक है। उनमें से कुछ तो हाथ में छड़ी लिए हुए हैं और कुछ के हाथों में सुन्दर बांसुरी शोभा पाती है। उन सबके शरीर का रंग श्यामल है। वे भगवान श्रीकृष्ण लीलाएं ऐसे मधुर स्वरों में गाते हैं कि उसे सुनकर कामदेव भी मोहित हो जाता है। यह सब देखते देखते सभी देवता भीतर चलें गये। वहां उन्हें हजार दल वाला एक बहुत बड़ा कमल दिखायी दिया। वह ऐसा सुशोभित था मानो प्रकाश का पुंज हो। उसी पर भगवान श्रीकृष्णचन्द्र श्रीराधा जी के साथ विराजमान हैं।  ऐसी झांकी उन समस्त देवताओं को मिली।  

भगवान श्रीकृष्ण के ऐसे दिव्य दर्शन प्राप्त कर संपूर्ण देवता आनन्द के समुद्र में गोता खाने लगे। अत्यंत हर्ष के कारण उनकी आंखों से आंसुओं की धारा बह चली। तब। सम्पूर्ण देवताओं ने हाथ जोड़कर विनती भाव से श्रीकृष्ण को प्रणाम किया।

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इसके बाद देवताओं के सामने जो घटना घटी उसका वर्णन गर्गसंहिता के गोलोक खण्ड के अध्याय (3) में कुछ इस प्रकार लिखा गया है।

उसी समय देवताओं के सामने चकित कर देने वाली एक घटना घटी वह यह थी कि - देवताओं के देखते देखते अष्ट भुजाधारी वैकुण्ठाधिपति भगवान श्रीहरि उठे और साक्षात श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में लीन हो गए। उसी समय कोटि सूर्यों के समान तेजस्वी, प्रचण्ड पराक्रमी पूर्ण स्वरुप भगवन नृसिंह जी पधारे और वे भी श्रीकृष्ण के तेज में समा गए। इसके बाद सहस्त्र भुजाओं से सुशोभित श्वेतद्वीप के स्वामी विराट पुरुष भी श्रीलक्ष्मी के साथ श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में सहसा प्रविष्ट हो गये।

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इसके बाद परिपूर्णतम नहीं बल्कि पूर्ण स्वरुप कमल लोचन भगवान श्रीराम स्वयं वहां पधारे। उनके हाथ में धनुष और बाण थे तथा साथ में सीता जी और भरत आदि तीनों भाई भी थे। वे भी श्रीकृष्णचंद्र के दिव्य विग्रह में लीन हो गए।
इसके बाद साक्षात भगवान नर-नारायण वहां पधारे। उनकी चार भुजाएं थीं। सभी देवता आश्चर्य से उनकी ओर देख रहे थे। ध्यान रहे पृथ्वी के भार को दूर करने के लिए देवताओं को गोलोक में श्रीकृष्ण के पास इन्होंने ने ही भेजा था। किंतु वे भी भगवान नारायण, श्यामसुन्दर भगवान श्रीकृष्ण में तत्काल लींन हो गये। इस प्रकार श्रीकृष्ण के विलक्षण दिव्य दर्शन प्राप्त कर सम्पूर्ण देवताओं को महान आश्चर्य हुआ। और उन सभी को यह भलीभांति ज्ञात हुआ कि परमात्मा श्रीकृष्णचन्द्र ही स्वयं परिपूर्ण नहीं बल्कि परिपूर्णतम भगवान हैं। उन्हें यह भी ज्ञान हुआ कि श्रीकृष्ण परिपूर्णतम पुरुष, पर से भी पर, यज्ञों के स्वामी, कारण के भी परम कारण, परिपूर्णतम परमात्मा और साक्षात गोलोकधाम के अधिशासी है। तब वे सभी परमप्रभु श्रीकृष्ण की स्तुति करने लगे।

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इसके बाद देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा - भगवन् ! अब हम आप से क्या निवेदन करें, आप से तो कोई बात छिपी नहीं है। भगवन् आप संकट में पड़े हुए हम देवताओं की रक्षा करें। देवताओं का यह निवेदन सुनकर भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण ने गम्भीर वाणी में बोले -
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ब्रह्मा, शंकर, एवं अन्य देवताओं ! तुम सब मेरी बात सुनो। मेरे आदेशानुसार तुम लोग अपने अंशों से देवियों के साथ यदुकुल में जन्म धारण करो। मैं भी अवतार लूंगा और मेरे द्वारा पृथ्वी का भार दूर होगा। मेरा वह अवतार यदुकुल में ही होगा और मैं तुम्हारे सब कार्य करुंगा।

45- g.s

इसपर ब्रह्मा जी ने विनय पूर्वक भगवान श्रीकृष्ण से पूछा - भगवन् ! मेरे लिए कौन सा स्थान होगा ? आप कहां पधारेंगे?
तथा ये सम्पूर्ण देवता कहां उत्पन्न हो कर किन गृहों में रहेंगे और किन किन नामों से इनकी प्रसिद्धि होगी?

तब भगवन् ने कहा - मैं स्वयं गोप वसुदेव और देवकी के यहां प्रकट होउंगा मेरे कला स्वरूप में शेष यानी बलराम रोहिणी के गर्भ से जन्म लेंगे। और साक्षात लक्ष्मी गोपराज भीष्मक के घर पुत्री रूप से उत्पन्न होंगी। इनका नाम रुक्मिणी होगा। और पार्वती जाम्बवती के नाम से प्रकट होंगी। तुलसी सत्या के रूप में अवतरित होंगी और पृथ्वी (जो इस समय दस्यभूत राजाओं से आक्रांत है) वह स्वयं  सत्यभामा के रूप में प्रकट होंगी।
इसी तरह से यज्ञपुरुष की पत्नी दक्षिणा देवी वहां लक्ष्मणा नाम धारण करेंगी। यहां जो विरजा नाम की नदी है वहीं भूतल पर कालिन्दी नाम से विख्यात होगी। भगवती लज्जा का नाम भद्रा यानी विंध्यवासिनी होगा। और समस्त पापों का प्रशमन करने वाली गंगा मित्रविन्दा नाम धारण करेंगी।

और जो इस समय कामदेव हैं, वे ही रुक्मिणी के गर्भ से प्रद्युम्न रुप में उत्पन्न होंगे। और ये वसु जो द्रोण नाम से प्रसिद्ध हैं व्रज में नन्द होंगे और स्वंयं इनकी प्राणप्रिया धरा देवी यशोदा नाम धारण करेंगी। इसी तरह से सुचन्द्र वृषभानु गोप बनेगे तथा इनकी सहधर्मिणी कलावती धराधाम पर कीर्ति नाम से प्रसिद्ध होंगी। फिर उन्हीं के यहां इन राधिका का प्राकट्य होगा। और मैं व्रजमण्डल में गोपियों के साथ सदा रासविहार करुंगा। 47- और दिव्य व्रज में सुन्दर वस्त्र धारण करने वाली  शतचन्द्रानना गोप सुन्दरियों के सौ यूथ होंगे।

मित्रों अब इसके आगे की घटना का वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्म खण्ड के अध्याय -6 में कुछ इस प्रकार लिखा गया है -

439- B P
इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने पुनः देवताओं से कहा- देवताओं! मैं पृथ्वी पर अवश्य जाउंगा अब तुम लोग भी अपने स्थान को पधारो और शीघ्र ही अपने अंश रुप से अवतार लो।
ऐसा कहकर जगदीश्वर श्रीकृष्ण ने अपने गोप और गोपियों को बुलाकर मधुर, सत्य एवं समयोचित बातें कहीं - गोपों और गोपियों ! सुनो, तुम सब भू-तल पर श्रेष्ठ गोपों के शुभ घरों में जन्म लो।

446 BP
इतने में ही करोड़ों गोप गोपियों का समूह वहां आ पहुंचा। उन सबके साथ श्रीराधा ने पुनः श्रीकृष्ण को प्रणाम किया। तत्पश्चात तैतिल सखी स्वरुपा गोप किशोरियों और गोप समूहों के साथ सुन्दरी राधा श्रीहरि को मस्तक झुका कर भू-तल के लिए प्रस्थित हुईं। इन सबके भूतल पर चले जाने के बाद भगवान श्रीकृष्ण भी शीघ्र वहां पहुंचने के लिए उत्सुक हुए और शीघ्र ही मथुरा में जा पहुंचे।

447 BP 

उस समय भूतल पर गोपकुल के देवमीढ़ के द्वारा मरिषा के गर्भ से महान पुरुष वसुदेव का जन्म हुआ। और ठीक उसी समय यदुकुल यानी गोपकुल में ही आहुक के पुत्र श्रीमान देवक हुए। उन्हीं की पुत्री देवकी थीं। इसी देवकी का विवाह वसुदेव से हुआ और इन दोनो के पुत्र रुप में श्रीकृष्ण का भूतल जन्म हुआ। मित्रों ये तो रही बात भगवान श्रीकृष्ण और राधा सहित समस्त गोप गोपियों का भूतल पर जन्म लेने और उनके अवतरण की।


किन्तु सवाल यह है कि भगवान श्रीकृष्ण और उनके गोपों को पृथ्वी पर आने से पहले पृथ्वी पर पहले से ही विद्यमान गोप कौन थे जहां भगवान श्रीकृष्ण और राधा सहित समस्त गोप गोपियों का अवतरण हुआ। यानी अब यह जानना आवश्यक है कि पृथ्वी पर पहले से विद्यमान गोपों की  उत्पत्ति सर्वप्रथम कब और कहां हुई? इसके साथ ही यह भी जानना आवश्यक है कि गोलोक के गोप गोपियों की पहली बार उत्पत्ति कब और कैसे हुई? इन सब बातों को जानें बिना यह प्रसंग अधूरा रहेगा। इस लिए अब हम लोग गोप और गोपियों की गोलोक में और भूतल पर प्रथम उत्पत्ति को जानेंगे।

तो सबसे पहले हम लोग गोलोक में गोप और गोपियों की उत्पत्ति को जानेंगे इसके बाद जानेंगे कि गोलोक के गोप और गोपियां सर्वप्रथम पृथ्वी पर कैसे आए। तो मित्रों इन सभी बातों की पुष्टि- ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय-(5) के श्लोक संख्या- २५, (४० और ४२) से होती है, जिसमें लिखा गया है कि -

"आविर्बभूव कन्यैका कृष्णस्य वामपार्श्वतः।
धावित्वा पुष्पमानीय ददावर्घ्यं प्रभोः पदे।२५।

तस्या राधायाश्च लोमकूपेभ्यः सद्योगोपाङ्गनागणः। 
आविर्बभूव रूपेण वेशेनैव च तत्समः।४०।

कृष्णस्य लोमकूपेभ्यः सद्यो गोपगणो मुने।
आविर्बभूव रूपेण वेषेणैव च तत्समः।४२।
अनुवाद -
गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण के वाम-पार्श्व से वामा के रूप में एक कामनाओं की प्रतिमूर्ति- प्रकृति रूपा कन्या उत्पन्न हुई जो कृष्ण के ही समान किशोर-वय थी।२५।
• फिर तो उस किशोरी अर्थात् श्रीराधा के रोमकूपों से तत्काल ही अनेक गोपांगनाओं की उत्पत्ति हुई; जो रूप और वेष में राधा के ही समान थीं। ४०।
• उसी क्षण श्रीकृष्ण के रोमकूपों से भी अनेक गोप-गणों का आविर्भाव हुआ जो रूप और वेष रचना में श्रीकृष्ण के ही समान थे।४२।

इसी प्रकार से गोपों की उत्पत्ति के बारे में श्रीमद्देवी भागवत पुराण के नवम् स्कन्ध अध्याय-(२) के श्लोक- ६०-६१ में लिखा गया है कि -
अथगोलोकनाथस्य लोमनां विवरतो मुने।
भूताश्चासंख्यगोपाश्च वयसा तेजसा समाः।। ६०

रुपेण च गुणेनैव बलेन विक्रमेण च।
प्राणतुल्यप्रियाः सर्वे भभूवः पार्षदा विभोः।। ६१

अनुवाद- ६०-६१
हे मुने ! गोलोकनाथ श्रीकृष्ण के रोमकूपों (कोशिकाओं) से असंख्य गोपगण प्रकट हुए, जो वय, तेज, रुप, गुण, बल तथा पराक्रम में उन्हीं के समान थे। वे सभी परमेश्वर श्रीकृष्ण के प्राणों के समान प्रिय पार्षद बन गये।


गोप और गोपियों की उत्पत्ति के बारे में भगवान शिव ने पूर्व काल में पार्वती को भी ऐसा ही दृष्टान्त सुनाया था। जिसे शिव-वाणी समझ कर इस घटना को पुराणों में सार्वकालिक और सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया गया। जिसका वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृतिखण्ड के अध्याय-(४८) के श्लोक संख्या- (४३) में मिलता है। जिसमें शिवजी पार्वती से कहते हैं कि-

"बभूव गोपीसंघश्च राधाया लोमकूपतः।श्रीकृष्णलोमकूपेभ्यो बभूवुः सर्वबल्लवाः।।४३।
अनुवाद -• श्रीराधा के रोमकूपों से गोपियों का समुदाय प्रकट हुआ है, तथा श्रीकृष्ण के रोमकूपों से सम्पूर्ण गोपों (आभीरों) का प्रादुर्भाव हुआ है।


▪️ और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि गोपों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृति खण्ड के अध्याय -(३६) के श्लोक संख्या -(६२) में राधा जी से कहते हैं-
"गोपाङ्गनास्तव कला अत एव मम प्रियाः।
मल्लोमकूपजा गोपाः सर्वे गोलोकवासिनः। ६२।
अनुवाद:- 
हे राधे ! समस्त गोपियाँ तुम्हारी कलाऐं हैं। और सभी गोलोक वासी गोप मेरे रोमकूपों से उत्पन्न मेरी ही कलाऐं तथा अंश हैं।६२।

मित्रों ये तो रही गोलोक में गोप और गोपियों की उत्पत्ति की जानकारी। अब हमलोग पृथ्वी के गोप और गोपियों की उत्पत्ति के बारे में विस्तार से जानेंगे।


तो मित्रों यह बात सर्वविदित है कि गोलोक के गोप और गोपियां हीं पृथ्वी के गोप और गोपियां हैं। इस बात की पुष्टि 
उस समय होती है जब समस्त यादव विश्वजीत युद्ध के लिए भूमण्डल पर चारों दिशाओं में निकल पड़े थे, तब उस समय दन्तवक्र नाम के एक दुष्ट राजा से यादवों का भयानक युद्ध हुआ। उसी समय श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न ने गर्गसंहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय-( 11 ) के श्लोक संख्या-(२१ और २२) में दन्तवक्र को यादवों का परिचय देते हुए कहा-

"नन्दो द्रोणो वसुः साक्षाज्जातो गोपकुलेऽपि सः। गोपाला ये च गोलोके कृष्णरोम समुद्‌भवाः।२१।

"राधारोमोद्‌भवा गोप्यस्ताश्च सर्वा इहागताः।
काश्चित्पुण्यैः कृतैः पूर्वैः प्राप्ताः कृष्णं वरैः परै:।२२।
अनुवाद- २१-२२।
नन्दराज साक्षात् द्रोण नामक वसु हैं, जो गोपकुल में अवतीर्ण हुए हैं। और गोलोक में जो गोपालगण (आभीर) हैं, वे साक्षात श्रीकृष्ण के रोम से प्रकट हुए हैं, और गोपियों श्री राधा के रोम से उत्पन्न हुई हैं। वे सब की सब यहाँ व्रज में उतर आई हैं। उनमें से कुछ ऐसी भी गोपांगनाऐं हैं जो पूर्व-काल में पूण्यकर्मों तथा उत्तम वरों के प्रभाव से श्रीकृष्ण को प्राप्त हुईं है।

इसी तरह से गोप और गोपियों को गोलोक से भूतल पर आने की पुष्टि- गर्गसंहिता के गोलोकखण्ड के अध्याय- १५ के श्लोक-६३ से होती है। जिसमें लिखा 
यूयं सर्वेऽपि गोपाला गोलोकादागता भुवि ।
तथा गोपीगणा गोपा गोलोके राधिकेच्छया॥ ६३॥


अनुवाद :-आप समस्त गोप तथा गोपियाँ इस भूतल पर गोलोक से आये हुए हो। यह सब राधा जी की ही इच्छा थी।६३।

ठीक इसी तरह की बात गर्गसंहिता के गिरिराजखण्ड के अध्याय- ५ के श्लोक संख्या- ३७ में भी लिखी गई कि-

यूयं सर्वेऽपि गोपाला गोलोकादागता भुवि ।
 तथा गोपीगणा गावो गोकुले राधिकेच्छया॥ ३७॥

अनुवाद :-आप समस्त गोपगण इस भूतल पर गोलोक से आये हो। इसी तरह से गोपियाँ और गौए भी श्रीराधा की इच्छा से ही गोकुल में आयी हैं।३७।

अतः इन तमाम साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि गोलोक से ही गोप और गोपियों का पृथ्वी पर अवतरण हुआ है। जो 


अब सवाल यह है कि क्या गोलोक से आए गोप ही पृथ्वी पर यादव हैं? तो इसका जवाब है जी हां गोलोक से आए गोप ही पृथ्वी पर यादव हैं। इस बात की पुष्टि- 
गर्गसंहिता के विश्वजितखण्ड के अध्याय (२) के श्लोक संख्या- (७) से होती है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण पृथ्वी पर यादवों के विश्वजीत युद्ध के दरम्यान सुधर्मा सभा में उद्घोषणा करते हुए उग्रसेन से कहते हैं कि-

ममांशा यादवाः सर्वे लोकद्वयजिगीषवः॥ जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम्॥७॥

अनुवाद:- 

• समस्त यादव मेरे ही अंश से प्रकट हुए हैं, और वे लोक,परलोक दोनों को जीतने की इच्‍छा रखने वाले हैं। वे दिग्विजय के लिये यात्रा करके, शत्रुओं को जीतकर लौट आयेंगे और सम्‍पूर्ण दिशाओं से आपके लिये भेंट और उपहार लायेंगे। अतः इस श्लोक से सिद्ध होता है कि पृथ्वी पर गोप ही यादव हैं।

अतः इससे सिद्ध होता है कि पृथ्वी पर गोप ही यादव हैं। जो पूर्वकाल में गोलोक में श्रीकृष्ण के रोम कूपों से उत्पन्न हुए थे वहीं वर्तमान में पृथ्वी पर गोपकुल के यादव कहे जाते हैं।

तब पुनः प्रश्न उठता है कि क्या गोपों यानी यादवों का रक्त संबंध श्रीकृष्ण से है? तो इसका उत्तर होगा जी हां पूर्वकाल से ही गोपों का रक्त संबंध श्रीकृष्ण से है। इस बात की पुष्टि- स्कन्द पुराण खण्ड- (६) के नागर खण्ड के अध्याय- १९३ के श्लोक -(१४ और १५) से होती है जिसमें आभीर कन्या देवी गायत्री विष्णु से अपने कुल के गोपों के लिए कहतीं हैं कि -

तेनाकृत्येऽपि  रक्तास्ते  गोपायास्यन्ति श्लाघ्यताम्॥
सर्वेषामेव लोकानां देवानां च विशेषतः ॥१४॥

यत्रयत्र  च वत्स्यन्ति  मद्वंशप्रभवा नराः॥
तत्रतत्र श्रियो वासो वनेऽपि प्रभविष्यति॥१५॥

अनुवाद -(१४-१५)
 हे विष्णो ! तुम्हारे रक्त सम्बन्धी (blood relative) सभी गोप (अहीर) बिना कुछ किये ही तुम्हारे द्वारा प्रसिद्धि को प्राप्त हो जाऐंगे। और इनकी प्रशंसा विशेषतः देवताओं सहित सभी लोकों में  होगी। तथा मेरे गोप वंश (कुल) के लोग जहाँ भी रहेंगे, वहाँ श्री (सौभाग्य और समृद्धि) विद्यमान रहेगी, चाहे वह स्थान जंगल ही क्यों न हो। १४-१५।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है यादवों का रक्त संबंध श्रीकृष्ण से होने के कारण ही यादवों का मूल जनन गोत्र कार्ष्ण गोत्र कहा जाता है।

कुल मिलाकर इन सभी साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि समस्त गोलोकवासी गोप जो कभी गोलोक में परमेश्वर श्रीकृष्ण के रोमकूपों (कोशिकाओं) से या कहें उनके अँश से उत्पन्न हुए थे, वे सभी भूतल पर गोपजाति के यादव वंश में श्रीकृष्ण के ही अँश से यदुवंश के एक सौ एक कुलों में प्रकट हुए हैं। और भगवान श्रीकृष्ण भी हर द्वापर में पृथ्वी के भार को दूर करने के लिए हर बार इन्हीं गोकुल के यादवों के यहां अवतरित होते हैं। मित्रों मैं उम्मीद करता हूं कि आप लोग अच्छी तरह से समझ गये होंगे।

मित्रों इन सभी बातों को और विस्तार पूर्वक वर्णन हमने अपनी पुस्तक श्रीकृष्ण सारंगिणी में किया है। जिसको आप लोग बड़ी आसानी अमेजान और फ्लिपकार्ट से आनलाइन मंगवाकर सम्पूर्ण जानकारी ले सकते हैं।

मित्रों दूसरी बात यह है कि श्रीकृष्ण और उनके वंश विस्तार को बताने के लिए गोपाचार्य हंस श्री योगेश कुमार रोही ने यूट्यूब पर यादव योगेश रोही नाम से एक चैनल खोला है, जिसका मुख्य उद्देश्य ऐतिहासिक एवं पौराणिक साक्ष्यों के आधार पर श्रीकृष्ण और उनके वंश विस्तार को बताना है।
अतः आपलोग उनके चैनल के विडियो को अवश्य देखें और चैनल को सबस्क्राइब करके उनके हौसला को मजबूत करें।
उनके चैनल का लिंक नीचे डिस्क्रिप्शन में दिया गया है उसको टच करके सीधे उनके चैनल पर पहुंचा जा सकता है।

तो मित्रों गोपों की उत्पत्ति एवं उनका भूतल पर अवतरण वाला यह प्रसंग कैसा लगा अवश्य बताइयेगा, फिर मिलेंगे किसी दूसरे विडियो के साथ तबतक के लिए नमस्कार।

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