🌹---:#यात्रा_प्रेतलोक_की:---🌹
प्रेतात्माएँ दुर्घटनाओं और सामूहिक मौतों का आयोजन भी करती हैं।
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जीवन काल में मनुष्य की जो वासना सबसे अधिक प्रबल और स्थायी होती है, वही वासना मृत्यु के बाद भी प्रबल और स्थायी रहती है। उसी वासना की तृप्ति के लिए वह बराबर प्रयासरत रहती है। प्रेतात्माओं की अपनी स्वशक्ति होती है। प्रेतयोनि केवल भोगयोनि है। मनुष्य योनि कर्म और भोग योनि-- दोनों है। भौतिक शरीर द्वारा कर्म भी किया जाता है और भोग भी भोगा जाता है। इसीलिए प्रेतात्माएँ जैसी भोग शरीरधारी आत्माएं मनुष्य के शरीर को माध्यम बनाकर भोग भोगती हैं और तृप्ति का अनुभव करती हैं। जैसे कोई व्यक्ति शराबी रहा है जीवन में। मरने के बाद पार्थिव शरीर के अभाव में वह शराब तो पी नहीं सकता, इसलिए जो व्यक्ति शराब पीता होगा, उसके अचेतन मन में प्रभाव डाल कर उसकी प्रेतात्मा उसे प्रेरित करेगी और जब वह शराब पीने लगेगा तो वह प्रेतात्मा शराब के तत्वों और गुणों को ग्रहण कर तृप्ति अनुभव करेगी मगर उसका जरा-सा भी पता उस शराब पीने वाले व्यक्ति को न लगेगा।
इसी प्रकार जो खूनी और डकैत व्यक्ति की आत्माएं होती हैं, वे जीवित व्यक्तियों पर प्रभाव डाल कर उनसे खून, क़त्ल और चोरी करवा देती हैं और उसके परिणामों में सुख अनुभव करती हैं। सहसा बिना किसी पूर्व योजना के, आवेशवश, कोई काम चाहे अच्छा हो या बुरा हो--किसी के द्वारा हो जाता है तो उसकी पृष्ठभूमि में इसी प्रकार की अतृप्त प्रेतात्माओं की वासनाएं ही रहती हैं। जीवन-काल में जिस किसी व्यक्ति को कोई अच्छी-बुरी आदत नहीं रही है और एकाएक लग जाती है, तो उसके लिए भी प्रेतात्माओं की अदृश्य प्रेरणा ही समझनी चाहिए। एकाएक कोई चोर साधू बन जाता है। कोई-कोई व्यक्ति पूरे जीवन अच्छे और भले काम करते हैं, लेकिन अचानक उनके भी स्वभाव और विचारों में परिवर्तन हो जाता है।
इन सबका क्या रहस्य है ?
जब कभी कोई व्यक्ति किसी विषय में गहराई से विचार करता है अथवा कोई गम्भीर चिंतन-मनन करता है तो उस व्यक्ति के भावनाओं के अनुकूल अनेक प्रेतात्माएँ उसके चारों ओर अदृश्य रूप से मडराने लगती हैं। इसी प्रकार जहाँ कोई दुर्घटना घटित होती है, सामूहिक मृत्यु होती है, जहाँ कोई मरणासन्न अवस्था में होता है, वहां उस स्थान पर प्रेतात्माएँ सामूहिक रूप से चक्कर काटने लगती हैं। जहाँ पति-पत्नी सहवास-रत होते हैं या जहाँ बच्चा पैदा होने वाला होता है, वहां भी प्रेतात्माएँ मडराने लगती हैं।
जहाँ जिस स्थान पर भयंकर दुर्घटना होने वाली होती है, वहां उस स्थान पर प्रेतात्माएँ पहले से ही उपस्थित हो जाया करती हैं। कभी-कभी तो यह देखने में आता है कि प्रेतात्माएँ स्वयं दुर्घटनाओं और सामूहिक मौतों का आयोजन करती हैं, मगर ऐसा निकृष्ट आत्माएं ही करती हैं। इससे उनको सुख और तृप्ति मिलती है। इस प्रकार से आयोजित मृत्यु में जो लोग मरते हैं, उन्हें वे प्रेतात्माएँ अपने समाज में मिला लेती हैं।
मरणासन्न व्यक्ति को भी बहुत परेशान करती हैं प्रेतात्माएँ। मरने वाला व्यक्ति यह समझता है कि वे यमदूत हैं। कभी-कभी प्रेतात्माएँ तुरंत मरे हुए व्यक्ति के शव में प्रवेश कर जाती हैं और हडक़म्प मचाती हैं। इसीलिए परिजन लोग शव के निकट ही आग रखते हैं, दीपक जलाते हैं और शव को अकेला भी नहीं छोड़ते।
क्रमशः--
------------:यात्रा प्रेतलोक की:-------------- ***********************************
प्रेतों का जीवन अत्यन्त कष्टमय होता है। पार्थिव शरीर के अभाव में वासना वेग के कारण असीम यातना सहन करनी पड़ती है उन्हें। यही नर्क है। प्रेतलोक अंधकारमय है। नारके( स्वीडन केरल दक्षिण में शीत और जड़ देश । जैसे चन्द्रमा पर पन्द्रह दिन रात्रि और पन्द्रह दिन दिन (प्रकाश) रहता है, उसी प्रकार प्रेतलोक और पितृलोक में 349 दिन अन्धकार रहता है और 16 दिन सूर्य का प्रकाश रहता है। उन्हीं सोलह दिनों को 'पित्रपक्ष' कहा जाता है। पितृपक्ष वास्तव में वासना लोक के प्राणियों का सबेरा है।
देवताओं में 'भाव' प्रधान है। पितरों में 'मन्त्र' प्रधान है। मनुष्यों में 'कर्म' प्रधान है, उसी प्रकार प्रेतों में 'वासना' की प्रधानता है। प्रेतात्माओं के नाम पर दी गयी वस्तुएं भौतिक दृष्टि से भले ही न मिलती हों, मगर अपने नाम से किसी व्यक्ति को वह वस्तु देने मात्र से प्रेत संतुष्ट हो जाते हैं--यही उनकी सन्तुष्टि है, तृप्ति है। यदि कोई व्यक्ति जीवन-काल में मिठाई अधिक खाता रहा हो और मरने के बाद उसके सगे सम्बन्धी उसके नाम पर मिठाई खिलाते हैं तो उसकी प्रेतात्मा प्रसन्न होती है। वह खाने वाले व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर मिठाई के तत्वों और गुणों को ग्रहण कर लेती है। यही उसकी तृप्ति और सन्तुष्टि है।
प्रेतात्मा, सूक्ष्मात्मा और जीवात्मा के शरीर में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग 'ब्रह्मरंध्र' होता है। इसके आलावा एक और मार्ग है, वह है--नाभि।
प्रेतबाधा
1-- जिस किसी व्यक्ति से प्रेतात्मा की वासना, कामना, इच्छा मिल गयी तो तुरंत वह ब्रह्मरंध्र के मार्ग से उसके शरीर में प्रवेश कर जाती है। इसी को पहले प्रकार की प्रेतबाधा कहते हैं।
2-- यदि किसी व्यक्ति का किसी प्रेतात्मा से पूर्व जन्म का सम्बन्ध है तो प्रेतात्मा उसे देखते ही अपनी अच्छाई-बुराई का बदला लेने के लिए उसके शरीर में प्रवेश कर जायेगी। यह दूसरे प्रकार की प्रेतबाधा समझी जाती है।
3-- रूप, सौंदर्य आदि को महत्त्व देने वाली प्रेतात्माएँ विलासपूर्ण जीवन जीने की आदी रही होती हैं, वे जहाँ जिस स्त्री-पुरुष में अपने अनुरूप रूप, सौंदर्य और विलासिता देखती हैं, उस स्त्री-पुरुष के शरीर में प्रवेश कर उसका उपभोग करने लग जाती हैं। यह तीसरे प्रकार की प्रेतबाधा है।
4-- जीवनकाल में जिस स्त्री या पुरुष से सर्वाधिक प्रेम, अपनत्व और सहानुभूति होती है और उससे सहायता भी मिलती है, प्रेतात्माएँ उसकी ओर बराबर आकर्षित रहती हैं। अदृश्य रूप से उसको सभी प्रकार की सहायता भी करती हैं। कभी- कभी उसके शरीर में प्रवेश कर अपनी किसी वासना की पूर्ति भी करती हैं। यह चौथे प्रकार की बाधा है।
5-- इसी प्रकार जीवन-काल में जिस स्त्री या पुरुष से छल, कपट, यातना, यंत्रणा, तकलीफ और मानसिक क्लेश मिला होता है और मिला होता है उससे धोखा, प्रेतात्माएँ उससे बदला लेना कभी नहीं भूलतीं। यह पांचवें प्रकार की प्रेतबाधा है।
प्रेतात्माएँ सबसे पहले उपचेतन मन पर आक्रमण करती हैं। इस अवस्था में व्यक्ति की आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। लेकिन मन की स्थिति विचित्र हो जाती है। व्यक्ति हमेशा अपने आपमें खोया-खोया-सा, डूबा-डूबा-सा रहता है। वह क्या बोल रहा है, क्या सोच रहा है ?--इन सबका उसे जरा-सा भी ख्याल नहीं रहता। उसकी अर्धचेतन स्थिति रहती है। मति-गति भी अर्ध-विक्षिप्तों जैसी रहती है उस व्यक्ति की। उसे नींद बहुत कम आती है। यदि कभी नींद आ भी गयी तो बड़ा भयंकर स्वप्न देखता है। आग, पानी, कीचड़, खून आदि के सपने अधिकतर दिखलायी पड़ते हैं उसे। बार- बार रोमांच होना, अँधेरे में डर लगना, एकान्त में अधिक रहना, शरीर से दुर्गन्ध निकलना, उँगलियों के नखों का पीला पड़ जाना, आत्महत्या करने का प्रयास करना आदि-आदि लक्षण भी इसी अवस्था के अंतर्गत हैं।
प्रेतात्माएँ जब उपचेतन मन से चेतन मन को प्रभावित करती हैं तो उस समय व्यक्ति की मानसिक यंत्रणा के साथ- साथ शारीरिक यंत्रणा भी बढ़ जाती है। इसी प्रकार जब चेतन मन की सीमा को लांघ कर प्रेतात्माएँ व्यक्ति की आत्मा पर आक्रमण करती हैं तो चेतन मन अचेतन मन की अवस्था में बदल जाता है। परामनोविज्ञान इसीको 'मूढ़ावस्था' या 'जड़ावस्था' कहता है। इस प्रकार मन की अचेतन स्थिति में उपचेतन मन अधिक सक्रिय और शक्तिशाली हो उठता है। मगर दूसरी ओर आत्मा प्रेतात्मा से प्रभावित होकर क्षीण होने लगती है। प्रेतबाधा की इस भयंकर स्थिति में व्यक्ति को जरा भी ज्ञान नहीं रहता। बाह्य चेतना के अलावा उसकी बाह्य प्रज्ञा भी लुप्त हो जाती है। किन्तु उपचेतन मन के सक्रिय रहने के फल- स्वरूप उसके मुख से भूत, भविष्य, वर्तमान से सम्बंधित चमत्कारपूर्ण बातें निकलती हैं। क्योंकि उसके लिए अंतःप्रज्ञा अथवा विराट चेतना का द्वार खुल जाता है। जितने प्रकार की प्रेत-बाधाएं हैं, उनमें यह प्रेतबाधा सबसे अधिक भयंकर होती है। इस बाधा में मृत्यु की आशंका हमेशा बनी रहती है। आत्मा की शक्ति क्षीण होने पर प्रेतात्माएँ व्यक्ति को अपने समाज में मिला लेती हैं।
क्रमशः--
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व्यक्ति की आत्मा से संघर्ष करने वाली प्रेतात्माएँ अपनी वासना पूरी करने के लिए चमत्कारपूर्ण बातें तो करती ही हैं, इसके आलावा लोगों को प्रभावित करने के लिए अपने आपको दुर्गा, काली, शीतला माई, संतोषी माता, हनुमान, भैरव, वीर आदि बतलाती हैं जिसे साधरण लोग सत्य मानकर पूजा करते हैं। चढ़ावा भी चढ़ाते हैं और उसके बदले तरह-तरह की मनौतियां मानते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं, हमारे देश में इस प्रकार भ्रम के वशीभूत लाखों लोग हैं। इस विषय में जान लेना चाहिए कि कभी किसी अवस्था में मनुष्य के शरीर में किसी भी प्रकार के देवी-देवता का प्रवेश असम्भव है। यदि प्रवेश करती हैं तो केवल प्रेतात्माएँ, भले ही वे अपने को देवी कहें, भवानी कहें या कहें देवता।
जो लोग प्रेत की साधना करते हैं, यदि अज्ञानतावश ऐसी प्रेतात्मा को उन्होंने सिद्ध कर लिया तो वह प्रेतात्मा साधक के ही शरीर में प्रवेश कर उपयुक्त वातावरण तैयार कर देती है। इसीको 'आवेश' कहते हैं। प्रेत सिद्ध करने वाला व्यक्ति स्वयं इस भ्रम में पड़ जाता है कि उसके शरीर में कोई उच्चकोटि की दैवीय शक्ति प्रविष्ट होकर चमत्कारपूर्ण बातें करती है। लोग यही समझते हैं कि उस व्यक्ति पर दुर्गा, काली, भवानी, हनुमान, वीर, पवन, भैरव आदि शक्ति आरूढ़ हो गयी है और व्यक्तियों की मनोकामना पूरी करती है। जबकि वास्तविकता कुछ और ही होती है।
हाँ, एक बात अवश्य है, उच्चकोटि की प्रेतात्माएँ एक विशेष सीमा तक प्रकृति के गूढ़ रहस्यों को उद्घाटित कर सकने में समर्थ होती हैं।
तान्त्रिक साधना के सभी संप्रदायों में किसी न किसी रूप में प्रेत-साधना प्रचलित है। मगर प्रत्येक संप्रदाय के अपने अलग-अलग नियम, पद्धति और विधियाँ हैं। और किस पद्धति और किस विधि से किस प्रकार की प्रेतात्मा अधिकार में आती है और उससे कौन-सा कार्य लिया जा सकता है--इन सब बातों का भी तंत्र साहित्य में पूर्ण विवरण है।
शक्ति और सामर्थ्य के आधार पर प्रेतात्माओं को तीन कोटि में विभक्त किया जा सकता है। सात्विक वृत्ति की प्रेतात्माएँ उच्चकोटि की समझी जाती हैं। इनमें प्रचुर शक्ति और सामर्थ्य होती है। इनकी सहायता से धार्मिक, बौद्धिक कार्यों में मार्ग-दर्शन प्राप्त किया जा सकता है। इस कोटि की प्रेतात्माएँ मानव के लिए कल्याणकारी भावनाएं रखती हैं। इन्हीं के द्वारा मानव जीवन के रहस्यों और सृष्टि और प्रकृति के गूढ़ तत्वों को भी जाना-समझा जा सकता है।
साधारण राजसी वृत्ति की प्रेतात्माएँ भी मनुष्य के लिए अहितकारी नहीं होती हैं। वे किसी-न-किसी तरह मनुष्य की हित चिन्तक होती हैं। तान्त्रिक लोग इनको सिद्ध कर इनकी सहायता से मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, विद्वेषण आदि कार्य करते हैं।
तामसिक वृत्ति की प्रेतात्माएँ निम्नकोटि की मानी जाती हैं। निकृष्ट तान्त्रिक इस प्रकार की प्रेतात्माओं को अधिकार में कर चमत्कारपूर्ण कार्य करते हैं। जैसे हाथ को हवा में लहराकर मिठाई, पान, इलाइची आदि मंगाना। प्रेतात्मायें अदृश्य प्राणी हैं मगर वे स्थूल और भौतिक वस्तुओं को उपस्थित कर देती हैं।
इसका क्या कारण होता है ?
वास्तव में प्रेतात्माएँ कहीं से कोई वस्तु लाती नहीं हैं। प्रेतसिद्ध व्यक्ति जिस वस्तु की कामना करेगा, उसको प्रेतात्माएँ मानस-पटल पर देख लेती हैं और फिर जहाँ जिस स्थान पर वह वस्तु रहती है, वहां जाकर देख आती हैं और तुरन्त अपने वासना-वेग से उसकी भौतिक सृष्टि कर देती हैं। लेकिन उस वस्तु का अस्तित्व भौतिक दृष्टि से तभी तक रहता है जब तक प्रेतात्मा का मनोबल बना रहता है और वासना का सम्बन्ध उस वस्तु से जुड़ा रहता है। देखने में यह कार्य अवश्य कौतूहलपूर्ण और आश्चर्यजनक लगता है, मगर इससे कोई लाभ नहीं। लोगों को केवल आकर्षित करने के लिए या अपने 'अहम्' को संतुष्ट करने के उद्देश्य से तान्त्रिक लोग यह खेल दिखाते हैं।
ऐसे तान्त्रिक लोगों के प्रति जो व्यक्ति इस रहस्य को नहीं जानता, आकर्षित होकर अपना तन, मन, धन सब कुछ गँवा बैठता है। बहुत से ऐसे तांत्रिक होते हैं जो किये तो रहते हैं प्रेत-सिद्धि मगर बतलाते हैं कि उन्हें देवी की सिद्धि है, भैरव की सिद्धि है या हनुमान की सिद्धि है। ऐसे महापुरुष लोग मदारी की तरह तमाशा दिखाने के सिवाय किसी भी प्रकार की न सहायता कर सकते हैं और न तो किसी प्रकार का कल्याण ही कर सकते हैं। हाँ, वे अपने स्वार्थ में तामसिक प्रेतात्माओं का उपयोग करते हैं जिसका भारी मूल्य उन्हें अपनी जान देकर चुकाना पड़ता है। कारण कि कोई भी अभौतिक शक्ति जैसे ही मनुष्य के अधिकार में आती है, उसी पल से वह अपनी मुक्ति के लिए युक्ति लगाती रहती है। जैसे ही उस व्यक्ति से थोड़ी-सी भूल हुई या लापरवाही हुई, वैसे ही वे उसको धर दबोचती हैं। उनका गला दबाते उन्हें देर नहीं लगती। अपने स्वार्थ में ऐसी तामसिक शक्तियों का दुरुपयोग जीवन में भारी कीमत चुकाने वाला होता है।
समाप्त
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