रविवार, 30 मार्च 2025

गीता -

मूल श्लोकः

«श्री भगवानुवा»

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः।।2.11।।

 


।।2.11।।इस प्रकार धर्मके विषयमें जिसका चित्त मोहित हो रहा है और जो महान् शोकसागरमें डूब रहा है ऐसे अर्जुनका बिना आत्मज्ञानके उद्धार होना असम्भव समझकर उस शोकसमुद्रसे अर्जुनका उद्धार करनेकी इच्छावाले भगवान् वासुदेव आत्मज्ञानकी प्रस्तावना करते हुए बोले

जो शोक करने योग्य नहीं होते उन्हें अशोच्य कहते हैं भीष्म द्रोण आदि सदाचारी और परमार्थरूपसे नित्य होने के कारण अशोच्य हैं। उन न शोक करने योग्य भीष्मादि के निमित्त तू शोक करता है कि वे मेरे हाथों मारे जायँगे मैं उनसे रहित होकर राज्य और सुखादि का क्या करूँगा
तथा तू प्रज्ञावानों के अर्थात् बुद्धिमानों के वचन भी बोलता है अभिप्राय यह है कि इस तरह तू उन्मत( पागल) की भाँति मूर्खता और बुद्धिमत्ता इन दोनों परस्परविरुद्ध भावों को अपने में दिखलाता है।
क्योंकि जिनके प्राण चले गये हैं जो मर गये हैं उनके लिये और जिनके प्राण नहीं गये जो जीते हैं उनके लिये भी पण्डित(आत्मज्ञानी) शोक नहीं करते।
पाण्डित्य को सम्पादन करके इस श्रुतिवाक्यानुसार आत्मविषयक बुद्धि का नाम पण्डा है और वह बुद्धि जिनमें हो वे पण्डित हैं।
परन्तु परमार्थदृष्टिसे नित्य और अशोचनीय भीष्म आदि श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये तू शोक करता है अतः तू मूढ है। यह अभिप्राय है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.11।।

 अशोच्यान् इत्यादि । न शोच्या अशोच्याः भीष्मद्रोणादयः सद्वृत्तत्वात् परमार्थस्वरूपेण च नित्यत्वात् तान्  अशोच्यान् अन्वशोचः  अनुशोचितवानसि ते म्रियन्ते मन्निमित्तम् अहं तैर्विनाभूतः किं करिष्यामि राज्यसुखादिना इति।  त्वं प्रज्ञावादान्  प्रज्ञावतां बुद्धिमतां वादांश्च वचनानि च भाषसे। तदेतत् मौढ्यं पाण्डित्यं च विरुद्धम्

आत्मनि दर्शयसि उन्मत्त इव इत्यभिप्रायः। यस्मात्  गतासून्  गतप्राणान् मृतान्  अगतासून्  अगतप्राणान् जीवतश्च  न अनुशोचन्ति पण्डिताः  आत्मज्ञाः। पण्डा आत्मविषया बुद्धिः येषां ते हि पण्डिताः पाण्डित्यं निर्विद्य इति श्रुतेः
परमार्थतस्तु तान् नित्यान् अशोच्यान् अनुशोचसि अतो मूढोऽसि इत्यभिप्रायः।।
कुतस्ते अशोच्याः यतो नित्याः। कथम्

।।2.11।। श्रीभगवान् ने कहा -- (अशोच्यान्) जिनके लिये शोक करना उचित नहीं है, उनके लिये तुम शोक करते हो और ज्ञानियों के से वचनों को कहते हो, परन्तु ज्ञानी पुरुष मृत (गतासून्) और जीवित (अगतासून्) दोनों के लिये शोक नहीं करते हैं।।
 

मूल श्लोकः
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः। न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्।।2.12।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.12।।वे भीष्मादि अशोच्य क्यों है इसलिये कि वे नित्य हैं। नित्य कैसे हैं

किसी कालमें मैं नहीं था ऐसा नहीं किंतु अवश्य था अर्थात् भूतपूर्व शरीरोंकी उत्पत्ति और विनाश होते हुए भी मैं सदा ही था।
वैसे ही तू नहीं था सो नहीं किंतु अवश्य था ये राजागण नहीं थे सो नहीं किंतु ये भी अवश्य थे।
इसके बाद अर्थात् इन शरीरोंका नाश होनेके बाद भी हम सब नहीं रहेंगे सो नहीं किन्तु अवश्य रहेंगे। अभिप्राय यह है कि तीनों कालोंमें ही आत्मरूपसे सब नित्य हैं।
यहाँ बहुवचनका प्रयोग देहभेदके विचारसे किया गया है आत्मभेदके अभिप्रायसे नहीं।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.12।।

 न तु एव जातु  कदाचिद्  अहं नासम्  किं तु आसमेव। अतीतेषु देहोत्पत्तिविनाशेषु घटादिषु वियदिव नित्य एव अहमासमित्यभिप्रायः। तथा न त्वं न आसीः किं तु आसीरेव। तथा  न इमे जनाधिपाः  न आसन् किं तु आसन्नेव। तथा  न च एव न भविष्यामः  किं तु भविष्याम एव सर्वे वयम् अतः अस्मात् देहविनाशात्  परम्  उत्तरकाले अपि। त्रिष्वपि कालेषु नित्या आत्मस्वरूपेण इत्यर्थः। देहेभेदानुवृत्त्या बहुवचनं नात्मभेदाभिप्रायेण।।
तत्र कथमिव नित्य आत्मेति दृष्टान्तमाह

 

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.12।। किसी कालमें मैं नहीं था और तू नहीं था तथा ये राजालोग नहीं थे, यह बात भी नहीं है; और इसके बाद (भविष्य में) मैं, तू और राजलोग - हम सभी नहीं रहेंगे, यह बात भी नहीं है।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.12।। वास्तव में न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था अथवा तुम नहीं थे अथवा ये राजालोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे।।




देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।

तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति।।2.13।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.13।।आत्मा किसके सदृश नित्य है इसपर दृष्टान्त कहते हैं

जिसका देह है वह देही है उस देहीकी अर्थात् शरीरधारी आत्माकी इस वर्तमान शरीरमें जैसे कौमार बाल्यावस्था यौवनतरुणावस्था और जरा वृद्धावस्था ये परस्पर विलक्षण तीनों अवस्थाएँ होती हैं।
इनमें पहली अवस्थाके नाशसे आत्मका नाश नहीं होता और दूसरी अवस्थाकी उत्पत्तिसे आत्माकी उत्पत्ति नहीं होती तो फिर क्या होता है कि निर्विकार आत्माको ही दूसरी और तीसरी अवस्थाकी प्राप्ति होती हुई देखी गयी है।
वैसे ही निर्विकार आत्माको ही देहान्तरकी प्राप्ति अर्थात् इस शरीरसे दूसरे शरीरका नाम देहान्तर है

उसकी प्राप्ति होती है ( होती हुईसी दीखती है )।
ऐसा होनेसे अर्थात् आत्माको निर्विकार और नित्य समझ लेनेके कारण धीर बुद्धिमान् इस विषयमें मोहित नहीं होता मोहको प्राप्त नहीं होता।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.13।।

देहः अस्य अस्तीति देही तस्य  देहिनो  देहवतः आत्मनः  अस्मिन्  वर्तमाने देहे यथा येन प्रकारेण  कौमारं  कुमारभावो बाल्यावस्था  यौवनं  यूनो भावो मध्यमावस्था  जरा  वयोहानिः जीर्णावस्था इत्येताः तिस्रः अवस्थाः अन्योन्यविलक्षणाः। तासां प्रथमावस्थानाशे न नाशः द्वितीयावस्थोपजने न उपजननम् आत्मनः। किं तर्हि अविक्रियस्यैव द्वितीयतृतीयावस्थाप्राप्तिः आत्मनो दृष्टा।  तथा  तद्वदेव देहाद् अन्यो देहो देहान्तरं तस्य प्राप्तिः  देहान्तरप्राप्तिः  अविक्रियस्यैव आत्मन इत्यर्थः।  धीरो  धीमान्  तत्र  एवं सति  न मुह्यति  न मोहमापद्यते।।
यद्यपि आत्मविनाशनिमित्तो मोहो न संभवति नित्य आत्मा इति विजानतः तथापि शीतोष्णसुखदुःखप्राप्तिनिमित्तो मोहो लौकिको दृश्यते सुखवियोगनिमित्तो मोहः दुःखसंयोगनिमित्तश्च शोकः। इत्येतदर्जुनस्य वचनमाशङ्क्य भगवानाह

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.13।। देहधारीके इस मनुष्यशरीरमें जैसे बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, ऐसे ही देहान्तरकी प्राप्ति होती है। उस विषयमें धीर मनुष्य मोहित नहीं होता।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.13।। जैसे इस देह में देही जीवात्मा की कुमार, युवा और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही उसको अन्य शरीर की प्राप्ति होती है;  धीर पुरुष इसमें मोहित नहीं होता है।।




मूल श्लोकः

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।

आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।2.14।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.14।।यद्यपि आत्मा नित्य है ऐसे जाननेवाले ज्ञानीको आत्मविनाशनिमित्तक मोह होना तो सम्भव नहीं तथापि शीतउष्ण और सुखदुःखप्राप्तिजनित लौकिक मोह तथा सुखवियोगजनित और दुःखसंयोगजनित शोक भी होता हुआ देखा जाता है ऐसे अर्जुनके वचनोंकी आशंका करके भगवान् कहते हैं

मात्रा अर्थात् शब्दादि विषयोंको जिनसे जाना जाय ऐसी श्रोत्रादि इन्द्रियाँ और इन्द्रियोंके स्पर्श अर्थात् शब्दादि विषयोंके साथ उनके संयोग वे सब शीतउष्ण और सुखदुःख देने वाले हैं अर्थात् शीतउष्ण और सुखदुःख देते हैं।
अथवा जिनका स्पर्श किया जाता है वे स्पर्श अर्थात् शब्दादि विषय ( इस व्युत्पत्तिके अनुसार यह अर्थ होगा कि ) मात्रा और स्पर्श यानी श्रोत्रादि इन्द्रियाँ और शब्दादि विषय ( ये सब ) शीतउष्ण और सुखदुःख देनेवाले हैं।
शीत कभी सुखरूप होता है कभी दुःखरूप इसी तरह उष्ण भी अनिश्चितरूप है परंतु सुख और दुःख निश्चितरूप हैं क्योंकि उनमें व्यभिचार ( फेरफार ) नहीं होता। इसलिये सुखदुःखसे अलग शीत और उष्णका ग्रहण किया गया है।
जिससे कि वे मात्रास्पर्शादि ( इन्द्रियाँ उनके विषय और उनके संयोग ) उत्पत्तिविनाशशील हैं इससे अनित्य हैं अतः उन शीतोष्णादिको तू सहन कर अर्थात् उनमें हर्ष और विषाद मत कर।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.14।।

 मात्रा  आभिः मीयन्ते शब्दादय इति श्रोत्रादीनि इन्द्रियाणि। मात्राणां  स्पर्शाः  शब्दादिभिः संयोगाः। ते  शीतोष्णसुखदुःखदाः  शीतम् उष्णं सुखं दुःखं च प्रयच्छन्तीति। अथवा स्पृश्यन्त इति स्पर्शाः विषयाः शब्दादयः। मात्राश्च स्पर्शाश्च शीतोष्णसुखदुःखदाः। शीतं कदाचित् सुखं कदाचित् दुःखम्। तथा उष्णमपि अनियतस्वरूपम्। सुखदुःखे पुनः नियतरूपे यतो न व्यभिचरतः। अतः ताभ्यां पृथक् शीतोष्णयोः ग्रहणम्। यस्मात् ते मात्रास्पर्शादयः  आगमापायिनः  आगमापायशीलाः तस्मात्  अनित्याः । अतः  तान्  शीतोष्णादीन् तितिक्षस्व प्रसहस्व। तेषु हर्षं विषादं वा मा कार्षीः इत्यर्थः।।
शीतोष्णादीन् सहतः किं स्यादिति श्रृणु

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.14।। हे कुन्तीनन्दन! इन्द्रियोंके जो विषय (जड पदार्थ) हैं, वो तो शीत (अनुकूलता) और उष्ण (प्रतिकूलता) - के द्वारा सुख और दुःख देनेवाले हैं तथा आने-जानेवाले और अनित्य हैं। हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! उनको तुम सहन करो।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.14।। हे कुन्तीपुत्र ! शीत और उष्ण और सुख दुख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग का प्रारम्भ और अन्त होता है;  वे अनित्य हैं,  इसलिए,  हे भारत ! उनको तुम सहन करो।।


मूल श्लोकः

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।

समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते।।2.15।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.15।।शीतउष्णादि सहन करनेवालेको क्या ( लाभ ) होता है सो सुन

सुखदुःखको समान समझनेवाले अर्थात् जिसकी दृष्टिमें सुखदुःख समान हैं सुखदुःखकी प्राप्तिमें जो हर्षविषादसे रहित रहता है ऐसे जिस धीर बुद्धिमान् पुरुषको ये उपर्युक्त शीतोष्णादि व्यथा नहीं पहँचा सकते अर्थात् नित्य आत्मदर्शनसे विचलित नहीं कर सकते।
वह नित्य आत्मदर्शननिष्ठ और शीतोष्णादि द्वन्द्वोंको सहन करनेवाला पुरुष मृत्युसे अतीत हो जानेके लिये यानी मोक्षके लिये समर्थ होता है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.15।।

 यं हि पुरुषं  समे दुःखसुखे यस्य तं  समदुःखसुखं  सुखदुःखप्राप्तौ हर्षविषादरहितं धीरं धीमन्तं  न व्यथयन्ति  न चालयन्ति नित्यात्मदर्शनाद् एते यथोक्ताः शीतोष्णादयः    नित्यात्मस्वरूपदर्शननिष्ठो द्वन्द्वसहिष्णुः  अमृतत्वाय  अमृतभावाय मोक्षायेत्यर्थः  कल्पते  समर्थो भवति।।
इतश्च शोकमोहौ अकृत्वा शीतोष्णादिसहनं युक्तं यस्मात्

 

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.15।। कारण कि हे पुरुषोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! सुख-दुःखमें सम रहनेवाले जिस धीर मनुष्यको ये मात्रास्पर्श (पदार्थ) व्यथित (सुखी-दुःखी) नहीं कर पाते, वह अमर होनेमें समर्थ हो जाता है अर्थात् वह अमर हो जाता है।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.15।। हे पुरुषश्रेष्ठ ! दुख और सुख में समान भाव से रहने वाले जिस धीर पुरुष को ये व्यथित नहीं कर सकते हैं वह अमृतत्व (मोक्ष) का अधिकारी होता है।।


एकाधिकरणत्वं घटादिविशेष्याभावे न युक्तमिति चेत् न इदमुदकम् इति मरीच्यादौ अन्यतराभावेऽपि सामानाधिकरण्यदर्शनात्।।
तस्माद्देहादेः द्वन्द्वस्य च सकारणस्य असतो न विद्यते भाव इति। तथा  सत श्च आत्मनः  अभावः  अविद्यमानता न  विद्यते  सर्वत्र अव्यभिचारात् इति अवोचाम।।
एवम् आत्मानात्मनोः सदसतोः  उभयोरपि दृष्टः  उपलब्धः  अन्तो  निर्णयः सत् सदेव असत् असदेवेति  तु अनयोः  यथोक्तयोः  तत्त्वदर्शिभिः।  तदिति सर्वनाम् सर्वं च ब्रह्म तस्य नाम तदिति तद्भावः तत्त्वम् ब्रह्मणो याथात्म्यम्। तत् द्रष्टुं शीलं येषां ते तत्त्वदर्शिनः तैः तत्त्वदर्शिभिः। त्वमपि तत्त्वदर्शिनां दृष्टिमाश्रित्य शोकं मोहं च हित्वा शीतोष्णादीनि नियतानियतरूपाणि द्वन्द्वानि विकारोऽयमसन्नेव मरीचिजलवन्मिथ्यावभासते इति मनसि निश्चित्य तितिक्षस्व इत्यभिप्रायः।।
किं पुनस्तत् यत् सदेव सर्वदा इति उच्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.16।। (टिप्पणी प0 55) असत् का तो भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है, तत्त्वदर्शी महापुरुषोंने इन दोनोंका ही अन्त अर्थात् तत्त्व देखा है।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.16।। असत् वस्तु का तो अस्तित्व नहीं है और सत् का कभी अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का ही तत्त्व,  तत्त्वदर्शी ज्ञानी पुरुषों के द्वारा देखा गया है।।
 


मूल श्लोकः

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति।।2.17।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.17।।तो जो निस्सन्देह सत् है और सदैव रहता है वह क्या है इसपर कहा जाता है

नष्ट न होना जिसका स्वभाव है वह अविनाशी है। तु शब्द असत्से सत्की विशेषता दिखानेके लिये है।
उसको तू ( अविनाशी ) जान समझ किसको जिस सत् शब्दवाच्य ब्रह्मसे यह आकाशसहित सम्पूर्ण विश्व आकाशसे घटादिके सदृश व्याप्त है।
इस अव्ययका अर्थात् जिसका व्यय नहीं होता जो घटताबढ़ता नहीं उसे अव्यय कहते हैं उसका विनाशअभाव ( करनेके लिये कोई भी समर्थ नहीं है )।
क्योंकि यह सत् नामक ब्रह्म अवयवरहित होनेके कारण देहादिकी तरह अपने स्वरूपसे नष्ट नहीं होता अर्थात् इसका व्यय नहीं होता।
तथा इसका कोई निजी पदार्थ नहीं होनेके कारण निजी पदार्थोंके नाशसे भी इसका नाश नहीं होता जैसे देवदत्त अपने धनकी हानिसे हानिवाला होता है ऐसे ब्रह्म नहीं होता।
इसलिये कहते हैं कि इस अविनाशी ब्रह्मका विनाश करनेके लिये कोई भी समर्थ नहीं है। कोई भी अर्थात् ईश्वर भी अपने आपका नाश नहीं कर सकता।
क्योंकि आत्मा ही स्वयं ब्रह्म है और अपने आपमें क्रियाका विरोध है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.17।।  अविनाशि  न विनष्टुं शीलं यस्येति। तु शब्दः असतो विशेषणार्थः।  तत् विद्धि  विजानीहि। किम्  येन सर्वम् इदं  जगत्  ततं  व्याप्तं सदाख्येन ब्रह्मणा साकाशम् आकाशेनेव घटादयः।  विनाशम्  अदर्शनम् अभावम्। अव्ययस्य न व्येति उपचयापचयौ न याति इति अव्ययं तस्य अव्ययस्य। नैतत् सदाख्यं ब्रह्म स्वेन रूपेण व्येति व्यभिचरति निरवयवत्वात् देहादिवत्। नाप्यात्मीयेन आत्मीयाभावात्।
यथा देवदत्तो धनहान्या व्येति न तु एवं ब्रह्म व्येति। अतः अव्ययस्य  अस्य  ब्रह्मणः विनाशं  न कश्चित् कर्तुमर्हति  न कश्चित् अत्मानं विनाशयितुं शक्नोति ईश्वरोऽपि। आत्मा हि ब्रह्म स्वात्मनि च क्रियाविरोधात्।।
किं पुनस्तदसत् यत्स्वात्मसत्तां व्यभिचरतीति उच्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.17।। अविनाशी तो उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है। इस अविनाशीका विनाश कोई भी नहीं कर सकता।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.17।। उस वस्तु को तुम अविनाशी जानों,  जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। इस अव्यय का नाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।।
 



मूल श्लोकः

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।

अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत।।2.18।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.18।।तो फिर वह असत् पदार्थ क्या है जो अपनी सत्ताको छो़ड़ देता है ( जिसकी स्थिति बदल जाती है ) इसपर कहते हैं

जिनका अन्त होता है विनाश होता है वे सब अन्तवाले हैं। जैसे मृगतृष्णादिमें रहनेवाली जलविषयक सत्बुद्धि प्रमाणद्वारा निरूपण की जानेके बाद विच्छिन्न हो जाती है वही उसका अन्त है वैसे ही ये सब शरीर अन्तवान् हैं तथा स्वप्न और मायाके शरीरादिकी भाँति भी ये सब शरीर अन्तवाले हैं।
इसलिये इस अविनाशी अप्रमेय शरीरधारी नित्य आत्माके ये सब शरीर विवेकी पुरुषोंद्वारा अन्तवाले कहे गये हैं। यह अभिप्राय है।



नित्य और अविनाशी यह कहना पुनरुक्ति नहीं है क्योंकि संसारमें नित्यत्वके और नाशके दोदो भेद प्रसिद्ध हैं।
जैसे शरीर जलकर भस्मीभूत हुआ अदृश्य होकर भी नष्ट हो गया कहलाता है और रोगादिसे युक्त हुआ विपरीत परिणामको प्राप्त होकर विद्यमान रहता हुआ भी नष्ट हो गया कहलाता है।
अतः अविनाशी और नित्य इन दो विशेषणोंका यह अभिप्राय है कि इस आत्माका दोनों प्रकारके ही नाशसे सम्बन्ध नहीं है।



ऐसे नहीं कहा जाता तो आत्माका नित्यत्व भी पृथ्वी आदि भूतोंके सदृश होता। परंतु ऐसा नहीं होना चाहिये इसलिये इसको अविनाशी और नित्य कहा है।
प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे जिसका स्वरूप निश्चित नहीं किया जा सके वह अप्रमेय है।
पू0 जब कि शास्त्रद्वारा आत्माका स्वरूप निश्चित किया जाता है तब प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे उसका जान लेना तो पहले ही सिद्ध हो चुका ( फिर वह अप्रमेय कैसे है ) ।
0 यह कहना ठीक नहीं क्योंकि आत्मा स्वतः सिद्ध है। प्रमातारूप आत्माके सिद्ध होनेके बाद ही जिज्ञासुकी प्रमाणविषयक खोज ( शुरू ) होती है।
क्योंकि मै अमुक हूँ इस प्रकार पहले अपनेको बिना जाने ही अन्य जाननेयोग्य पदार्थको जाननेके लिये कोई प्रवृत्त नहीं होता। तथा अपना आपा किसीसे भी अप्रत्यक्ष ( अज्ञात ) नहीं होता है।
शास्त्र जो कि अन्तिम प्रमाण है वह आत्मामें किये हुए अनात्मपदार्थोंके अध्यारोपको दूर करनेमात्रसे ही आत्माके विषयमें प्रमाणरूप होता है अज्ञात वस्तुका ज्ञान करवानेके निमित्तसे नहीं।
ऐसे ही श्रुति भी कहती है कि जो साक्षात् अपरोक्ष है वही ब्रह्म है जो आत्मा सबके हृदयमें व्याप्त है इत्यादि।
जिससे कि आत्मा इस प्रकार नित्य और निर्विकार सिद्ध हो चुका है इसलिये तू युद्ध कर अर्थात् युद्धसे उपराम न हो।
यहाँ ( उपर्युक्त कथनसे ) युद्धकी कर्तव्यताका विधान नहीं है क्योंकि युद्धमें प्रवृत्त हुआ ही वह ( अर्जुन ) शोकमोहसे प्रतिबद्ध होकर चुप हो गया था उसके कर्तव्यके प्रतिबन्धमात्रको भगवान् हटाते हैं। इसलिये युद्ध कर यह कहना अनुमोदनमात्र है विधि ( आज्ञा ) नहीं है।
गीताशास्त्र संसारके कारणरूप शोकमोह आदिको निवृत्त करनेवाला है प्रवर्तक नहीं है। इस अर्थकी साक्षिभूत दो ऋचाओंको भगवान् उद्धृत करते हैं।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.18।।

अन्तः विनाशः विद्यते येषां ते  अन्तवन्तः । यथा मृगतृष्णिकादौ सद्बुद्धिः अनुवृत्ता प्रमाणनिरूपणान्ते विच्छिद्यते स तस्य अन्तः तथा  इमे देहाः  स्वप्नमायादेहादिवच्च अन्तवन्तः  नित्यस्य शरीरिणः  शरीरवतः  अनाशिनः अप्रमेयस्य  आत्मनः अन्तवन्त इति  उक्ताः  विवेकिभिरित्यर्थः। नित्यस्य अनाशिनः इति न पुनरुक्तम् नित्यत्वस्य
द्विविधत्वात् लोके नाशस्य च। यथा देहो भस्मीभूतः अदर्शनं गतो नष्ट उच्यते। विद्यमानोऽपि यथा अन्यथा परिणतो व्याध्यादियुक्तो जातो नष्ट उच्यते। तत्र नित्यस्य अनाशिनः इति द्विविधेनापि नाशेन असंबन्धः
अस्येत्यर्थः। अन्यथा पृथिव्यादिवदपि नित्यत्वं स्यात् आत्मनः तत् मा भूदिति नित्यस्य अनाशिनः इत्याह।
अप्रमेयस्य न प्रमेयस्य प्रत्यक्षादिप्रमाणैः अपरिच्छेद्यस्येत्यर्थः।।
ननु आगमेन आत्मा परिच्छिद्यते प्रत्यक्षादिना च पूर्वम्। न आत्मनः स्वतःसिद्धत्वात्। सिद्धे हि आत्मनि प्रमातरि प्रमित्सोः प्रमाणान्वेषणा भवति। न हि पूर्वम् इत्थमहम् इति आत्मानमप्रमाय पश्चात् प्रमेयपरिच्छेदाय प्रवर्तते। न हि आत्मा नाम कस्यचित् अप्रसिद्धो भवति। शास्त्रं तु अन्त्यं प्रमाणम् अतद्धर्माध्यारोपणमात्रनिवर्तकत्वेन प्रमाणत्वम् आत्मनः प्रतिपद्यते न तु अज्ञातार्थज्ञापकत्वेन। तथा च श्रुतिः यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरः इति।।
यस्मादेवं नित्यः अविक्रियश्च आत्मा तस्मात् युध्यस्व युद्धात् उपरमं मा कार्षीः इत्यर्थः।।
न हि अत्र युद्धकर्तव्यता विधीयते युद्धे प्रवृत्त एव हि असौ शोकमोहप्रतिबद्धः तूष्णीमास्ते। अतः तस्य प्रतिबन्धापनयनमात्रं भगवता क्रियते। तस्मात् युध्यस्व इति अनुवादमात्रम् न विधिः।।
शोकमोहादिसंसारकारणनिवृत्त्यर्थं गीताशास्त्रम् न प्रवर्तकम् इत्येतस्यार्थस्य साक्षिभूते ऋचौ आनिनाय भगवान्।
यत्तु मन्यसे युद्धे भीष्मादयो मया हन्यन्ते अहमेव तेषां हन्ता इति एषा बुद्धिः मृषैव ते। कथम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.18।। अविनाशी, अप्रमेय और नित्य रहनेवाले इस शरीरी के ये देह अन्तवाले कहे गये हैं। इसलिये हे अर्जुन! तुम युद्ध करो।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.18।। इस नाशरहित अप्रमेय नित्य देही आत्मा के ये सब शरीर नाशवान् कहे गये हैं। इसलिये हे भारत ! तुम युद्ध करो।।



मूल श्लोकः

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।

उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते।।2.19।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.19।।जो तू मानता है कि मेरेद्वारा युद्धमें भीष्मादि मारे जायँगे मैं ही उनका मारनेवाला हूँ यह तेरी बुद्धि ( भावना ) सर्वथा मिथ्या है। कैसे

जिसका वर्णन ऊपरसे आ रहा है इस आत्माको जो मारनेवाला समझता है अर्थात् हननक्रियाका कर्ता

मानता है और जो दूसरा ( कोई ) इस आत्माको देहके नाशसे मैं नष्ट हो गया ऐसे नष्ट हुआ मानता है अर्थात् हननक्रियाका कर्म मानता है।
वे दोनों ही अहंप्रत्ययके विषयभूत आत्माको अविवेकके कारण नहीं जानते।
अभिप्राय यह कि जो शरीरके मरनेसे आत्माको मैं मारनेवाला हूँ मैं मारा गया हूँ इस प्रकार जानते हैं वे दोनों ही आत्मस्वरूपसे अनभिज्ञ हैं।
क्योंकि यह आत्मा विकाररहित होनेके कारण न तो किसीको मारता है और न मारा जाता है अर्थात् न तो हननक्रियाका कर्ता होता है और न कर्म होता है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.19।।

 य एनं  प्रकृतं देहिनं  वेत्ति  विजानाति  हन्तारं  हननक्रियायाः कर्तारं  यश्च एनम्  अन्यो  मन्यते हतं  देहहननेन हतः अहम् इति हननक्रियायाः कर्मभूतम्  तौ उभौ न विजानीतः  न ज्ञातवन्तौ अविवेकेन आत्मानम्। हन्ता अहम् हतः अस्मि अहम् इति देहहननेन आत्मानमहंप्रत्ययविषयं यौ विजानीतः तौ आत्मस्वरूपानभिज्ञौ इत्यर्थः। यस्मात् न  अयम्  आत्मा  हन्ति  न हननक्रियायाः कर्ता भवति    च  हन्यते  न च कर्म भवतीत्यर्थः अविक्रियत्वात्।।
कथमविक्रय आत्मेति द्वितीयो मन्त्रः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.19।। जो मनुष्य इस अविनाशी शरीरीको मारनेवाला मानता है और जो मनुष्य इसको मरा मानता है, वे दोनों ही इसको नहीं जानते; क्योंकि यह न मारता है और न मारा जाता है।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.19।। जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसको मरा समझता है वे दोनों ही नहीं जानते हैं,  क्योंकि यह आत्मा न मरता है और न मारा जाता है।।



मूल श्लोकः

न जायते म्रियते वा कदाचि

न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो

न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।2.20।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.20।।आत्मा निर्विकार कैसे है इसपर दूसरा मन्त्र ( इस प्रकार है )

यह आत्मा उत्पन्न नहीं होता अर्थात् उत्पत्तिरूप वस्तुविकार आत्मामें नहीं होता और यह मरता भी नहीं। वा शब्द यहाँ च के अर्थमें है।
मरता भी नहीं इस कथनसे विनाशरूप अन्तिम विकारका प्रतिषेध किया जाता है।
कदाचित् शब्द सभी विकारोंके प्रतिषेधके साथ सम्बन्ध रखता है। जैसे यह आत्मा न कभी जन्मता है न कभी मरता है इत्यादि।
जिससे कि यह आत्मा उत्पन्न होकर अर्थात् उत्पत्तिरूप विकारका अनुभव करके फिर अभावको प्राप्त होनेवाला नहीं है इसलिये मरता नहीं क्योंकि जो उत्पन्न होकर फिर नहीं रहता वह मरता है इस प्रकार लोकमें कहा जाता है।
वा शब्दसे और न शब्दसे यह भी पाया जाता है कि यह आत्मा शरीरकी भाँति पहले न होकर फिर होनेवाला नहीं है इसलिये यह जन्मता नहीं क्योंकि जो न होकर फिर होता है वहीं जन्मता है यह कहा जाता है। आत्मा ऐसा नहीं है इसलिये नहीं जन्मता।
ऐसा होनेके कारण आत्मा अज है और मरता नहीं इसलिये नित्य है।
यद्यपि आदि और अन्तके दो विकारोंके प्रतिषेधसे ( बीचके ) सभी विकारोंका प्रतिषेध हो जाता है तो भी बीचमें होनेवाले विकारोंका भी उनउन विकारोंके प्रतिषेधार्थक खासखास शब्दोंद्वारा प्रतिषेध करना उचित

है। इसलिये ऊपर न कहे हुए जो यौवनादि सब विकार हैं उनका भी जिस प्रकार प्रतिषेध हो ऐसे भावको शाश्वत इत्यादि शब्दोंसे कहते हैं
सदा रहनेवालेका नाम शाश्वत है शाश्वत शब्दसे अपक्षय ( क्षय होना ) रूप विकारका प्रतिषेध किया जाता है क्योंकि आत्मा अवयवरहित है इस कारण स्वरूपसे उसका क्षय नहीं होता और निर्गुण होनेके कारण गुणोंके क्षयसे भी उसका क्षय नहीं होता।
पुराण इस शब्दसे अपक्षयके विपरीत जो वृद्धिरूप विकार है उसका भी प्रतिषेध किया जाता है। जो पदार्थ किसी अवयवकी उत्पत्तिसे पुष्ट होता है। वह बढ़ता है नया हुआ है ऐसे कहा जाता है परंतु यह आत्मा तो अवयवरहित होनेके कारण पहले भी नया था अतः पुराण है अर्थात् बढ़ता नहीं।
तथा शरीरका नाश होनेपर यानी विपरीत परिणामको प्राप्त हो जानेपर भी आत्मा नष्ट नहीं होता अर्थात् दुर्बलतादि अवस्थाको प्राप्त नहीं होता।
यहाँ हन्ति क्रियाका अर्थ पुनरुक्तिदोषसे बचनेके लिये विपरीत परिणाम समझना चाहिये इसलिये यह अर्थ हुआ कि आत्मा अपने स्वरूपसे बदलता नहीं।
इस मन्त्रमें लौकिक वस्तुओंमें होनेवाले छः भावविकारोंका आत्मामें अभाव दिखलाया जाता है। आत्मा सब प्रकारके विकारोंसे रहित है यह इस मन्त्रका वाक्यार्थ है।
ऐसा होनेके कारण वे दोनों ही ( आत्मस्वरूपको ) नहीं जानते। इस प्रकार पूर्व मन्त्रसे इसका सम्बन्ध है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.20।।

 न जायते  न उत्पद्यते जनिलक्षणा वस्तुविक्रिया न आत्मनो विद्यते इत्यर्थः। तथा  न म्रियते वा । वाशब्दः चार्थे। न म्रियते च इति अन्त्या विनाशलक्षणा विक्रिया प्रतिषिध्यते।  कदाचिच्छ ब्दः सर्वविक्रियाप्रतिषेधैः संबध्यते न कदाचित् जायते न कदाचित् म्रियते इत्येवम्। यस्मात्  अयम्  आत्मा  भूत्वा  भवनक्रियामनुभूय पश्चात्  अभविता  अभावं गन्ता  न भूयः  पुनः तस्मात् न म्रियते। यो हि भूत्वा न भविता स म्रियत इत्युच्यते लोके। वाशब्दात् न शब्दाच्च अयमात्मा अभूत्वा वा भविता देहवत् न भूयः। तस्मात् न जायते। यो हि अभूत्वा भविता स जायत इत्युच्यते। नैवमात्मा। अतो न जायते। यस्मादेवं तस्मात्  अजः  यस्मात् न म्रियते तस्मात्  नित्य श्च। यद्यपि आद्यन्तयोर्विक्रिययोः प्रतिषेधे सर्वा विक्रियाः प्रतिषिद्धा भवन्ति तथापि मध्यभाविनीनां विक्रियाणां स्वशब्दैरेव प्रतिषेधः कर्तव्यः अनुक्तानामपि यौवनादिसमस्तविक्रियाणां प्रतिषेधो यथा स्यात् इत्याह  शाश्वत  इत्यादिना। शाश्वत इति अपक्षयलक्षणा विक्रिया प्रतिषिध्यते। शश्वद्भवः शाश्वतः। न अपक्षीयते स्वरूपेण निरवयवत्वात्। नापि गुणक्षयेण अपक्षयः निर्गुणत्वात्। अपक्षयविपरीतापि वृद्धिलक्षणा विक्रिया प्रतिषिध्यते पुराण इति। यो हि अवयवागमेन उपचीयते स वर्धते अभिनव इति च उच्यते।  अयं  तु आत्मा निरवयवत्वात् पुरापि नव एवेति  पुराणः  न वर्धते इत्यर्थः। तथा  न हन्यते । हन्तिः अत्र विपरिणामार्थे द्रष्टव्यः अपुनरुक्ततायै। न विपरिणम्यते इत्यर्थः।

 हन्यमाने  विपरिणम्यमानेऽपि  शरीरे । अस्मिन् मन्त्रे षड् भावविकारा लौकिकवस्तुविक्रिया आत्मनि प्रतिषिध्यन्ते। सर्वप्रकारविक्रियारहित आत्मा इति वाक्यार्थः। यस्मादेवं तस्मात् उभौ तौ न विजानीतः इति पूर्वेण मन्त्रेण अस्य संबन्धः।।
य एनं वेत्ति हन्तारम् इत्यनेन मन्त्रेण हननक्रियायाः कर्ता कर्म च न भवति इति प्रतिज्ञाय न जायते इत्यनेन अविक्रियत्वं हेतुमुक्त्वा प्रतिज्ञातार्थमुपसंहरति

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.20।। यह शरीरी न कभी जन्मता है और न मरता है तथा यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला नहीं है। यह जन्मरहित, नित्य-निरन्तर रहनेवाला, शाश्वत और पुराण (अनादि) है। शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.20।। यह आत्मा किसी काल में भी न जन्मता है और न मरता है और न यह एक बार होकर फिर अभावरूप होने वाला है। यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है,  शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता।।




श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।

कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्।।2.21।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.21।।य एनं वेत्ति हन्तारम् इस मन्त्रसे आत्मा हननक्रियाका कर्ता और कर्म नहीं है यह प्रतिज्ञा करके तथा न जायते इस मन्त्रसे आत्माकी निर्विकारताके हेतुको बतलाकर अब प्रतिज्ञापूर्वक कहे हुए अर्थका उपसंहार करते हैं

पूर्व मन्त्रमें कहे हुए लक्षणोंसे युक्त इस आत्माको जो अविनाशी अन्तिम भावविकाररूप मरणसे रहित नित्य रोगादिजनित दुर्बलता क्षीणता आदि विकारोंसे रहित अज जन्मरहित और अव्यय अपक्षयरूप विकारसे रहित जानता है।
वह आत्मतत्त्वका ज्ञाताअधिकारी पुरुष कैसे ( किसको ) मारता है और कैसे ( किसको ) मरवाता है अर्थात् वह कैसे तो हननरूप क्रिया कर सकता और कैसे किसी मारनेवालेको नियुक्त कर सकता है
अभिप्राय यह कि वह न किसीको किसी प्रकार भी मारता है और न किसीको किसी प्रकार भी मरवाता है। इन दोनों बातोंमे किम् और कथम् शब्द आक्षेपके बोधक हैं क्योंकि प्रश्नके अर्थमें यहाँ इनका प्रयोग सम्भव नहीं।
निर्विकारतारूप हेतुका तात्पर्य सभी कर्मोंका प्रतिषेध करनेमें समान है इससे इस प्रकरणका अर्थ भगवान्को यही इष्ट है कि आत्मवेत्ता किसी भी कर्मका करने करवानेवाला नहीं होता।
अकेली हननक्रियाके विषयमें आक्षेप करना उदाहरणके रूपमें है।
पू0 कर्म न हो सकनेमें कौनसे खास हेतुको देखकर ज्ञानीके लिये भगवान् कथं स पुरुषः इस कथनसे कर्मविषयक आक्षेप करते हैं
0 पहले ही कह आये हैं कि आत्माकी निर्विकारता ही ( ज्ञानीकर्तृक ) सम्पूर्ण कर्मोंके न होनेका खास हेतु है।
पू0 कहा है सही परंतु अविक्रिय आत्मासे उसको जाननेवाला भिन्न है इसलिये ( यह ऊपर बतलाया हुआ ) खास कारण उपयुक्त नहीं है क्योंकि स्थाणुको अविक्रिय जाननेवालेसे कर्म नहीं होते ऐसा नहीं ऐसी शङ्का करें तो
0 यह कहना ठीक नहीं क्योंकि आत्मा स्वयं ही जाननेवाला है। देह आदि संघातमें ( जड होनेके कारण ) ज्ञातापन नहीं हो सकता इसलिये अन्तमें देहादि संघातसे भिन्न आत्मा ही अविक्रिय ठहरता है और वही जाननेवाला है। ऐसे उस ज्ञानीसे कर्म होना असम्भव है अतः कथं स पुरुष यह आक्षेप उचित ही

है।
जैसे ( वास्तवमें ) निर्विकार होनेपर भी आत्मा बुद्धिवृत्ति और आत्माका भेदज्ञान न रहनेके कारण अविद्याके सम्बन्धसे बुद्धि आदि इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण किये हुए शब्दादि विषयोंका ग्रहण करनेवाला मान लिया जाता है।
ऐसे ही आत्मअनात्मविषयक विवेकज्ञानरूप जो बुद्धिवृत्ति है जिसे विद्या कहते हैं वह यद्यपि असत्रूप है तो भी उसके सम्बन्धसे वास्तव में जो अविकारी है ऐसा आत्मा ही विद्वान् कहा जाता है।
ज्ञानीके लिये सभी कर्म असम्भव बतलाये हैं इस कारण भगवान्का यह निश्चय समझा जाता है कि शास्त्रद्वारा जिन कर्मोंका विधान किया गया है वे सब अज्ञानियोंके लिये ही विहित हैं।
पू0 विद्या भी अज्ञानीके लिये ही विहित है क्योंकि जिसने विद्याको जान लिया उसके लिये पिसेको पीसनेकी भाँति विद्याका विधान व्यर्थ है। अतः अज्ञानीके लिये कर्म कहे गये हैं ज्ञानीके लिये नहीं इस प्रकार विभाग करना नहीं बन सकता।
0 यह कहना ठीक नहीं क्योंकि कर्तव्यके भाव और अभावसे भिन्नता सिद्ध होती है अभिप्राय यह कि अग्निहोत्रादि कर्मोंका विधान करनेवाले विधिवाक्योंके अर्थको जान लेनेके बाद अनेक साधन और उपसंहारके सहित अमुक अग्निहोत्रादि कर्म अनुष्ठान करनेके योग्य है मैं कर्ता हूँ मेरा अमुक कर्तव्य है इस प्रकार जाननेवाले अज्ञानीके लिये जैसे कर्तव्य बना रहता है वैसे न जायते इत्यादि आत्मस्वरूपका विधान करनेवाले वाक्योंके अर्थको जान लेनेके बाद उस ज्ञानीके लिये कुछ कर्तव्य शेष नहीं रहता।
क्योंकि ( ज्ञानीको ) मैं न कर्ता हूँ न भोक्ता हूँ इत्यादि जो आत्माके एकत्व और अकर्तृत्व आदिविषयक ज्ञान है इससे अतिरिक्त अन्य किसी प्रकारका भी ज्ञान नहीं होता। इस प्रकार यह ( ज्ञानी और अज्ञानीके कर्तव्यका ) विभाग सिद्ध होता है।
जो अपनेको ऐसा समझता है कि मैं कर्ता हूँ उसकी यह बुद्धि अवश्य ही होगी कि मेरा अमुक कर्तव्य है उस बुद्धिकी अपेक्षासे वह कर्मोंका अधिकारी होता है इसीसे उसके लिये कर्म हैं। और उभौ तौ न विजानीतः इस वचनके अनुसार वही अज्ञानी है।
क्योंकि पूर्वोक्त विशेषणोंद्वारा वर्णित ज्ञानीके लिये तो कथं स पुरुषः इस प्रकार कर्मोंका निषेध करनेवाले वचन हैं।
सुतरां ( यह सिद्ध हुआ कि ) आत्माको निर्विकार जाननेवाले विशिष्ट विद्वान्का और मुमुक्षुका भी सर्वकर्मसंन्यासमें ही अधिकार है।
इसीलिये भगवान् नारायण ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् इस कथनसे सांख्ययोगी ज्ञानियों और कर्मी अज्ञानियोंका विभाग करके अलगअलग दो निष्ठा ग्रहण करवाते हैं।
ऐसे ही अपने पुत्रसे भगवान् वेदव्यासजी कहते हैं कि ये दो मार्ग हैं इत्यादि तथा यह भी कहते हैं कि पहले क्रियामार्ग और पीछे संन्यास।
इसी विभागको बारंबार भगवान् दिखलायेंगे। जैसे अहंकारसे मोहित हुआ अज्ञानी मैं कर्ता हूँ ऐसे मानता है तत्त्ववेत्ता मैं नहीं करता ऐसे मानता है तथा सब कर्मोंका मनसे त्यागकर रहता है इत्यादि।
इस विषयमें कितने ही अपनेको पण्डित समझनेवाले कहते हैं कि जन्मादि छः भावविकारोंसे रहित निर्विकार अकर्ता एक आत्मा मैं ही हूँ ऐसा ज्ञान किसीको होता ही नहीं कि जिसके होनेसे सर्वकर्मोंके संन्यासका उपदेश किया जा सके।
यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि ( ऐसा मान लेनेसे ) न जायते इत्यादि शास्त्रका उपदेश व्यर्थ होगा।
उनसे यह पूछना चाहिये कि जैसे शास्त्रोपदेशकी सामर्थ्यसे कर्म करनेवाले मनुष्यको धर्मके अस्तित्वका ज्ञान और देहान्तरकी प्राप्तिका ज्ञान होता है उसी तरह उसी पुरुषको शास्त्रसे आत्माकी विर्विकारता अकर्तृत्व और एकत्व आदिका विज्ञान क्यों नहीं हो सकता
यदि वे कहें कि ( मनबुद्धि आदि ) करणोंसे आत्मा अगोचर है इस कारण ( उसका ज्ञान नहीं हो

सकता )।
तो यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि मनके द्वारा उस आत्माको देखना चाहिये यह श्रुति है अतः शास्त्र और आचार्यके उपदेशद्वारा एवं शम दम आदि साधनोंद्वारा शुद्ध किया हुआ मन आत्मदर्शनमें करण ( साधन ) है।
इस प्रकार उस ज्ञानप्राप्तिके विषयमें अनुमान और आगमप्रमाणोंके रहते हुए भी यह कहना कि ज्ञान नहीं होता साहसमात्र है।
यह तो मान ही लेना चाहिये कि उत्पन्न हुआ ज्ञान अपनेसे विपरीत अज्ञानको अवश्य नष्ट कर देता है।
वह अज्ञान मैं मारनेवाला हूँ मैं मारा गया हूँ ऐसे मारनेवाले दोनों नहीं जानते इन वचनोंद्वारा पहले दिखलाया ही था फिर यहाँ भी यह बात दिखायी गयी है कि आत्मामें हननक्रियाका कर्तृत्व कर्मत्व और हेतुकर्तृत्व अज्ञानजनति है।
आत्मा निर्विकार होनेके कारण कर्तृत्व आदि भावोंका अविद्यामूलक होना सभी क्रियाओंमे समान है। क्योंकि विकारवान् ही ( स्वयं ) कर्ता ( बनकर ) अपने कर्मरूप दूसरेको कर्ममें नियुक्त करता है कि तू अमुक कर्म कर।
सुतरां ज्ञानीका कर्मोंमें अधिकार नहीं है यह दिखानेके लिये भगवान् वेदाविनाशिनम् कथं स पुरुषः इत्यादि वाक्योंसे सभी क्रियाओंमें समान भावसे विद्वान्के कर्ता और प्रयोजक कर्ता होनेका प्रतिषेध करते हैं।
ज्ञानीका अधिकार किसमें है यह तो ज्ञानयोगेन सांख्यानाम् इत्यादि वचनोंद्वारा पहले ही बतलाया जा चुका है वैसे ही फिर भी सर्वकर्माणि मनसा इत्यादि वाक्योंसे सर्व कर्मोंका संन्यास ( भगवान् ) कहेंगे।
पू0 ( उक्त श्लोकमें ) मनसा यह शब्द है इसलिये मानसिक कर्मोंका ही त्याग बतलाया है शरीर और वाणीसम्बन्धी कर्मोंका नहीं।
0 यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि सर्व कर्मोंको छोड़कर इस प्रकार कर्मोंके साथ सर्व विशेषण

है।
पू0 यदि मनसम्बन्धी सर्व कर्मोंका त्याग मान लिया जाय तो
0 ठीक नहीं। क्योंकि वाणी और शरीरकी क्रिया मनोव्यापारपूर्वक ही होती है। मनोव्यापारके अभावमें उनकी क्रिया बन नहीं सकती।
पू0 शास्त्रविहित कायिकवाचिक कर्मोंके कारणरूप मानसिक कर्मोंके सिवा अन्य सब कर्मोंका मनसे संन्यास करना चाहिये यह मान लिया जाय तो
0 ठीक नहीं। क्योंकि न करता हुआ और न करवाता हुआ यह विशेषण साथमें है ( इसलिये तीनों तरह कर्मोंका संन्यास सिद्ध होता है। )
पू0 यह भगवान्द्वारा कहा हुआ सर्व कर्मोंका संन्यास तो मुमूर्षु के लिये है जीते हुएके लिये नहीं यह माना जाय तो
0 ठीक नहीं। क्योंकि ऐसा मान लेनेसे नौ द्वारवाले शरीररूप पुरमें आत्मा रहता है इस विशेषणकी उपयोगिता नहीं रहती।
कारण जो सर्वकर्मसंन्यास करके मर चुका है उसका न करते हुए और न करवाते हुए उस शरीरमें रहना सम्भव नहीं।
पू0 उक्त वाक्यमें शरीरमें कर्मोंको रखकर इस तरह सम्बन्ध है शरीरमें रहता है इस प्रकार सम्बन्ध नहीं है ऐसा मानें तो
0 ठीक नहीं है। क्योंकि सभी जगह आत्माको निर्विकार माना गया है। तथा आसन क्रियाको आधारकी अपेक्षा है और संन्यास को उसकी अपेक्षा नहीं है एवं स पूर्वक न्यास शब्दका अर्थ यहाँ त्यागना। है निक्षेप ( रख देना ) नहीं।
सुतरां गीताशास्त्रमें आत्मज्ञानीका संन्यासमें ही अधिकार है कर्मोंमें नहीं। यही बात आगे चलकर आत्मज्ञानके प्रकरणमें हम जगहजगह दिखलायेंगे।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.21।।

वेद विजानाति अविनाशिनम् अन्त्यभावविकाररहितं नित्यं विपरिणामरहितं यो वेद इति संबन्धः। एनं पूर्वेण
मन्त्रेणोक्तलक्षणम् अजं जन्मरहितम् अव्ययम् अपक्षयरहितं कथं केन प्रकारेण सः विद्वान् पुरुषः अधिकृतः हन्ति हननक्रिया करोति कथं वा घातयति हन्तारं प्रयोजयति। न कथञ्चित् कञ्चित् हन्ति न कथञ्चित् कञ्चित् घातयति इति उभयत्र आक्षेप एवार्थः प्रश्नार्थासंभवात्। हेत्वर्थस्य च अविक्रियत्वस्य तुल्यत्वात् विदुषः सर्वकर्मप्रतिषेध एव प्रकरणार्थः अभिप्रेतो भगवता। हन्तेस्तु आक्षेपः उदाहरणार्थत्वेन कथितः।।
विदुषः कं कर्मासंभवहेतुविशेषं पश्यन् कर्माण्याक्षिपति भगवान् कथं स पुरुषः इति। ननु उक्त एवात्मनः अविक्रियत्वं सर्वकर्मासंभवकारणविशेषः। सत्यमुक्तः। न तु सः कारणविशेषः अन्यत्वात् विदुषः अविक्रियादात्मनः। न हि अविक्रियं स्थाणुं विदितवतः कर्म न संभवति इति चेत् न विदुषः आत्मत्वात्। न देहादिसंघातस्य विद्वत्ता। अतः पारिशेष्यात् असंहतः आत्मा विद्वान् अविक्रियः इति तस्य विदुषः कर्मासंभवात् आक्षेपो युक्तः कथं स पुरुषः इति। यथा बुद्ध्याद्याहृतस्य शब्दाद्यर्थस्य अविक्रिय एव सन् बुद्धिवृत्त्यविवेकविज्ञानेन अविद्यया उपलब्धा आत्मा कल्प्यते एवमेव आत्मानात्मविवेकज्ञानेन बुद्धिवृत्त्या विद्यया असत्यरूपयैव परमार्थतः अविक्रिय एव आत्मा विद्वानुच्यते। विदुषः कर्मासंभववचनात् यानि कर्माणि शास्त्रेण विधीयन्ते तानि अविदुषो विहितानि इति भगवतो निश्चयोऽवगम्यते।।
ननु विद्यापि अविदुष एव विधीयते विदितविद्यस्य पिष्टपेषणवत् विद्याविधानानर्थक्यात्। तत्र अविदुषः कर्माणि विधीयन्ते न विदुषः इति विशेषो नोपपद्यते इति चेत् न अनुष्ठेयस्य भावाभावविशेषोपपत्तेः। अग्निहोत्रादिविध्यर्थज्ञानोत्तरकालम् अग्निहोत्रादिकर्म अनेकसाधनोपसंहारपूर्वकमनुष्ठेयम् कर्ता अहम् मम कर्तव्यम् इत्येवंप्रकारविज्ञानवतः अविदुषः यथा अनुष्ठेयं भवति न तु तथा न जायते इत्याद्यात्मस्वरूपविध्यर्थज्ञानोत्तरकालभावि किञ्चिदनुष्ठेयं भवति किं तु नाहं कर्ता नाहं भोक्ता इत्याद्यात्मैकत्वाकर्तृत्वादिविषयज्ञानात् नान्यदुत्पद्यते इति एष विशेष उपपद्यते। यः पुनः कर्ता अहम् इति वेत्ति आत्मानम् तस्य मम इदं कर्तव्यम् इति अवश्यंभाविनी बुद्धिः स्यात् तदपेक्षया सः अधिक्रियते इति तं प्रति कर्माणि संभवन्ति। स च अविद्वान् उभौ तौ न विजानीतः इति वचनात् विशेषितस्य च विदुषः कर्माक्षेपवचनाच्च कथं स पुरुषः इति। तस्मात् विशेषितस्य अविक्रियात्मदर्शिनः विदुषः मुमुक्षोश्च सर्वकर्मसंन्यासे एव अधिकारः। अत एव भगवान् नारायणः सांख्यान् विदुषः अविदुषश्च कर्मिणः प्रविभज्य द्वे निष्ठे ग्राहयति ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् इति। तथा च पुत्राय आह भगवान् व्यासः द्वाविमावथ पन्थानौ इत्यादि। तथा च क्रियापथश्चैव पुरस्तात् पश्चात्संन्यासश्चेति। एतमेव विभागं पुनः पुनर्दर्शयिष्यति भगवान् अतत्त्ववित् अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते तत्त्ववित्तु नाहं करोमि इति। तथा च सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते इत्यादि।।
तत्र केचित्पण्डितंमन्या वदन्ति जन्मादिषड्भावविक्रियारहितः अविक्रियः अकर्ता एकः अहमात्मा इति न कस्यचित् ज्ञानम् उत्पद्यते यस्मिन् सति सर्वकर्मसंन्यासः उपदिश्यते इति। तन्न न जायते इत्यादिशास्त्रोपदेशानर्थक्यप्रसङ्गात्। यथा च शास्त्रोपदेशसामर्थ्यात् धर्माधर्मास्तित्वविज्ञानं कर्तुश्च देहान्तरसंबन्धविज्ञानमुत्पद्यते तथा शास्त्रात् तस्यैव आत्मनः अविक्रियत्वाकर्तृत्वैकत्वादिविज्ञानं कस्मात् नोत्पद्यते इति प्रष्टव्याः ते। करणागोचरत्वात् इति चेत् न मनसैवानुद्रष्टव्यम् इति श्रुतेः। शास्त्राचार्योपदेशशमदमादिसंस्कृतं मनः आत्मदर्शने करणम्। तथा च तदधिगमाय अनुमाने आगमे च सति ज्ञानं नोत्पद्यत इति साहसमात्रमेतत्। ज्ञानं च उत्पद्यमानं तद्विपरीतमज्ञानम् अवश्यं बाधते इत्यभ्युपगन्तव्यम्। तच्च अज्ञानं दर्शितम् हन्ता अहम् हतः अस्मि इति उभौ तौ न विजानीतः इति। अत्र च आत्मनः हननक्रियायाः कर्तृत्वं कर्मत्वं हेतुकर्तृत्वं च अज्ञानकृतं दर्शितम्। तच्च सर्वक्रियास्वपि समानं कर्तृत्वादेः अविद्याकृतत्वम् अविक्रियत्वात् आत्मनः। विक्रियावान् हि कर्ता आत्मनः कर्मभूतमन्यं प्रयोजयति कुरु इति। तदेतत् अविशेषेण विदुषः
सर्वक्रियासु कर्तृत्वं हेतुकर्तृत्वं च प्रतिषेधति भगवान्वासुदेवः विदुषः कर्माधिकाराभावप्रदर्शनार्थम् वेदाविनाशिनं৷৷. कथं स पुरुषः इत्यादिना। क्व पुनः विदुषः अधिकार इति एतदुक्तं पूर्वमेव ज्ञानयोगेन सांख्यानाम् इति। तथा च सर्वकर्मसंन्यासं वक्ष्यति सर्वकर्माणि मनसा इत्यादिना।।
ननु मनसा इति वचनात् न वाचिकानां कायिकाना च संन्यासः इति चेत् न सर्वकर्माणि इति विशेषितत्वात्।
मानसानामेव सर्वकर्मणामिति चेत् न मनोव्यापारपूर्वकत्वाद्वाक्कायव्यापाराणां मनोव्यापाराभावे तदनुपपत्तेः। शास्त्रीयाणां वाक्कायकर्मणां कारणानि मानसानि कर्माणि वर्जयित्वा अन्यानि सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्येदिति चेत् न नैव कुर्वन्न कारयन् इति विशेषणात्। सर्वकर्मसंन्यासः अयं भगवता उक्तः मरिष्यतः न जीवतः इति चेत् न नवद्वारे पुरे देही आस्ते इति विशेणानुपपत्तेः। न हि सर्वकर्मसंन्यासेन मृतस्य तद्देहे आसनं संभवति। अकुर्वतः अकारयतश्च देहे संन्यस्य इति संबन्धः न देहे आस्ते इति चेत् न सर्वत्र आत्मनः अविक्रियत्वावधारणात् आसनक्रियायाश्च अधिकरणापेक्षत्वात् तदनपेक्षत्वाच्च संन्यासस्य। संपूर्वस्तु न्यासशब्दः अत्र त्यागार्थः न निक्षेपार्थः। तस्मात् गीताशास्त्रे आत्मज्ञानवतः संन्यासे एव अधिकारः न कर्मणि इति तत्र तत्र उपरिष्टात् आत्मज्ञानप्रकरणे दर्शयिष्यामः।।
प्रकृतं तु वक्ष्यामः। तत्र आत्मनः अविनाशित्वं प्रतिज्ञातम्। तत्किमिवेति उच्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.21।। हे पृथानन्दन! जो मनुष्य इस शरीरीको अविनाशी, नित्य, जन्मरहित और अव्यय जानता है, वह कैसे किसको मारे और कैसे किसको मरवाये?
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.21।। हे पार्थ ! जो पुरुष इस आत्मा को अविनाशी,  नित्य और अव्ययस्वरूप जानता है,  वह कैसे किसको मरवायेगा और कैसे किसको मारेगा?
 

 

श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय

नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-

न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।2.22।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.22।।अब हम प्रकृत विषय वर्णन करेंगे। यहाँ ( प्रकरणमें ) आत्माके अविनाशित्वकी प्रतिज्ञा की गयी है वह किसके सदृश है सो कहा जाता है

जैसे जगत्में मनुष्य पुरानेजीर्ण वस्त्रोंको त्याग कर अन्य नवीन वस्त्रोंको ग्रहण करते हैं वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरको छोड़कर अन्यान्य नवीन शरीरोंको प्राप्त करता है। अभिप्राय यह कि ( पुराने वस्त्रोंको छोड़कर नये धारण करनेवाले ) पुरुषकी भाँति जीवात्मा सदा निर्विकार ही रहता है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.22।।

वासांसि वस्त्राणि जीर्णानि दुर्बलतां गतानि यथा लोके विहाय परित्यज्य नवानि अभिनवानि गृह्णाति उपादत्ते नरः पुरुषः अपराणि अन्यानि तथा तद्वदेव शरीराणि विहाय जीर्णानि अन्यानि संयाति संगच्छति नवानि देही आत्मा पुरुषवत् अविक्रिय एवेत्यर्थः।।
कस्मात् अविक्रिय एवेति आह

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.22।। मनुष्य जैसे पुराने कपड़ोंको छोड़कर दूसरे नये कपड़े धारण कर लेता है, ऐसे ही देही पुराने शरीरोंको छोड़कर दूसरे नये शरीरोंमें चला जाता है।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.22।। जैसे मनुष्य जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को धारण करता है, वैसे ही देही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।।
 


 




श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।।2.23।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.23।।आत्मा सदा निर्विकार किस कारणसे है सो कहते हैं

इस उपर्युक्त आत्माको शस्त्र नहीं काटते अभिप्राय यह कि अवयवरहित होनेके कारण तलवार आदि शस्त्र इसके अङ्गोंके टुकड़े नहीं कर सकते।
वैसे ही अग्नि इसको जला नहीं सकता अर्थात् अग्नि भी इसको भस्मीभूत नहीं कर सकता।



जल इसको भिगो नहीं सकता क्योंकि सावयव वस्तुको ही भिगोकर उसके अङ्गोंको पृथक्पृथक् कर देनेमें जलकी सामर्थ्य है। निरवयव आत्मामें ऐसा होना सम्भव नहीं।
उसी तरह वायु आर्द्र द्रव्यका गीलापन शोषण करके उसको नष्ट करता है अतः वह वायु भी इस स्वस्वरूप आत्माका शोषण नहीं कर सकता।



Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.23।।

एनं प्रकृतं देहिनं न च्छिन्दन्ति शस्त्राणि निरवयवत्वात् न अवयवविभागं कुर्वन्ति। शस्त्राणि अस्यादीनि। तथा न एनं दहति पावकः अग्निरपि न भस्मीकरोति। तथा न च एनं क्लेदयन्ति आपः। अपां हि सावयवस्य वस्तुनः आर्द्रीभावकरणेन अवयवविश्लेषापादने सामर्थ्यम्। तत् न निरवयवे आत्मनि संभवति। तथा स्नेहवत् द्रव्यं स्नेहशोषणेन नाशयति वायुः। एनं तु आत्मानं न शोषयति मारुतोऽपि।।
यतः एवं तस्मात्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.23।। शस्त्र इस शरीरीको काट नहीं सकते, अग्नि इसको जला नहीं सकती, जल इसको गीला नहीं कर सकता और वायु इसको सुखा नहीं सकती।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.23।। इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते और न अग्नि इसे जला सकती है ; जल इसे गीला नहीं कर सकता और वायु इसे सुखा नहीं सकती।।
 


मूल श्लोकः

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।

नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः।।2.24।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.24।।ऐसा होनेके कारण

( यह आत्मा न कटनेवाला न जलनेवाला न गलनेवाला और न सूखनेवाला है )। आपसमें एक दूसरेका नाश कर देनेवाले पञ्चभूत इस आत्माका नाश करनेके लिये समर्थ नहीं है। इसलिये यह नित्य है।
नित्य होनेसे सर्वगत है। सर्वव्यापी होनेसे स्थाणु है अर्थात् स्थाणु ( ठूँठ ) की भाँति स्थिर है। स्थिर होनेसे यह आत्मा अचल है और इसीलिये सनातन है अर्थात् किसी कारणसे नया उत्पन्न नहीं हुआ है। पुराना है।
इन श्लोकोंमें पुनरुक्तिके दोषका आरोप नहीं करना चाहिये क्योकि न जायते म्रियते वा इस एक श्लोकके द्वारा ही आत्माकी नित्यता और निर्विकारता तो कही गयी फिर आत्माके विषयमें जो भी कुछ कहा जाय वह इस श्लोकके अर्थसे अतिरिक्त नहीं है। कोई शब्दसे पुनरुक्त है और कोई अर्थसे ( पुनरुक्त है )।
परंतु आत्मतत्त्व बड़ा दुर्बोध है सहज ही समझमें आनेवाला नहीं है इसलिये बारंबार प्रसंग उपस्थित करके दूसरेदूसरे शब्दोंसे भगवान् वासुदेव उसी तत्त्वका निरूपण करते हैं यह सोचकर कि किसी भी तरह वह अव्यक्त तत्त्व इन संसारी पुरुषोंके बुद्धिगोचर होकर संसारकी निवृत्तिका कारण हो।



Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.24।।

यस्मात् अन्योन्यनाशहेतुभूतानि एनमात्मानं नाशयितुं नोत्सहन्ते अस्यादीनि तस्मात् नित्यः। नित्यत्वात् सर्वगतः। सर्वगतत्वात् स्थाणुः इव स्थिर इत्येतत्। स्थिरत्वात् अचलः अयम् आत्मा। अतः सनातनः चिरंतनः न कारणात्कुतश्चित् निष्पन्नः अभिनव इत्यर्थः।।
नैतेषां श्लोकानां पौनरुक्त्यं चोदनीयम् यतः एकेनैव श्लोकेन आत्मनः नित्यत्वमविक्रियत्वं चोक्तम् न जायते म्रियते वा इत्यादिना। तत्र यदेव आत्मविषयं किञ्चिदुच्यते तत् एतस्मात् श्लोकार्थात् न अतिरिच्यते किञ्चिच्छब्दतः पुनरुक्तम् किञ्चिदर्थतः इति। दुबोर्धत्वात् आत्मवस्तुनः पुनः पुनः प्रसङ्गमापाद्य शब्दान्तरेण तदेव वस्तु निरूपयति भगवान् वासुदेवः कथं नु नाम संसारिणामसंसारित्वबुद्धिगोचरतामापन्नं सत् अव्यक्तं तत्त्वं संसारनिवृत्तये स्यात् इति।।
किञ्च

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.24।। यह शरीरी काटा नहीं जा सकता, यह जलाया नहीं जा सकता, यह गीला नहीं किया जा सकता और यह सुखाया भी नहीं जा सकता। कारण कि यह नित्य रहनेवाला सबमें परिपूर्ण, अचल, स्थिर स्वभाववाला और अनादि है।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.24।। क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य (काटी नहीं जा सकती),  अदाह्य (जलाई नहीं जा सकती),  अक्लेद्य (गीली नहीं हो सकती ) और अशोष्य (सुखाई नहीं जा सकती) है;  यह नित्य,  सर्वगत,  स्थाणु (स्थिर),  अचल और सनातन है।।
 



श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।

तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि।।2.25।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.25।।तथा

यह आत्मा बुद्धि आदि सब करणोंका विषय नहीं होनेके कारण व्यक्त नहीं होता ( जाना नहीं जा सकता ) इसलिये अव्यक्त है।
इसीलिये यह अचिन्त्य है क्योंकि जो पदार्थ इन्द्रियगोचर होता है वही चिन्तनका विषय होता है। यह आत्मा इन्द्रियगोचर न होनेसे अचिन्त्य है।
यह आत्मा अविकारी है अर्थात् जैसे दहीके जावन आदिसे दूध विकारी हो जाता है वैसे यह नहीं होता।
तथा अवयवरहित ( निराकार ) होनेके कारण भी आत्मा अविक्रिय है क्योंकि कोई भी अवयवरहित ( निराकार ) पदार्थ विकारवान् नहीं देखा गया। अतः विकाररहित होनेके कारण यह आत्मा अविकारी कहा जाता है।
सुतरां इस आत्माको उपर्युक्त प्रकारसे समझकर तुझे यह शोक नहीं करना चाहिये कि मैं इनका मारनेवाला हूँ मुझसे ये मारे जाते हैं इत्यादि।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.25।।

सर्वकरणाविषयत्वात् न व्यज्यत इति अव्यक्तः अयम् आत्मा। अत एव अचिन्त्यः अयम्। यद्धि इन्द्रियगोचरः तत् चिन्ताविषयत्वमापद्यते। अयं त्वात्मा अनिन्द्रियगोचरत्वात् अचिन्त्यः। अत एव अविकार्यः यथा क्षीरं
दध्यातञ्चनादिना विकारि न तथा अयमात्मा। निरवयवत्वाच्च अविक्रियः। न हि निरवयवं किञ्चित् विक्रियात्मकं दृष्टम्। अविक्रियत्वात् अविकार्यः अयम् आत्मा उच्यते। तस्मात् एवं यथोक्तप्रकारेण एनम् आत्मानं विदित्वा त्वं न अनुशोचितुमर्हसि हन्ताहमेषाम् मयैते हन्यन्त इति।।
आत्मनः अनित्यत्वमभ्युपगम्य इदमुच्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.25।। यह देही प्रत्यक्ष नहीं दीखता, यह चिन्तनका विषय नहीं है और यह निर्विकार कहा जाता है। अतः इस देहीको ऐसा जानकर शोक नहीं करना चाहिये।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.25।। यह आत्मा अव्यक्त,  अचिन्त्य और अविकारी कहा जाता है;  इसलिए इसको इस प्रकार जानकर तुमको शोक करना उचित नहीं है।।
 




श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्।

तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि।।2.26।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.26।।औपचारिक रूपसे आत्माकी अनित्यता स्वीकार करके यह कहते हैं

अथ च ये दोनों अव्यय औपचारिक स्वीकृतिके बोधक हैं।
यदि तू इस आत्माको सदा जन्मनेवाला अर्थात् लोकप्रसिद्धिके अनुसार अनेक शरीरोंकी प्रत्येक उत्पत्तिके

साथसाथ उत्पन्न हुआ माने तथा उनके प्रत्येक विनाशके साथसाथ सदा नष्ट हुआ माने।
तो भी अर्थात् ऐसे नित्य जन्मने और नित्य मरनेवाले आत्माके निमित्त भी हे महाबाहो तुझे इस प्रकार शोक करना उचित नहीं है क्योंकि जन्मनेवालेका मरण और मरनेवालेका जन्म यह दोनों अवश्य ही होनेवाले हैं।



Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.26।।
अथ च इति अभ्युपगमार्थः। एनं प्रकृतमात्मानं नित्यजातं लोकप्रसिद्ध्या प्रत्यनेकशरीरोत्पत्ति जातो जात इति मन्यसे तथा प्रतितत्तद्विनाशं नित्यं वा मन्यसे मृतं मृतो मृत इति तथापि तथाभावेऽपि आत्मनि त्वं महाबाहो न एवं शोचितुमर्हसि जन्मवतो नाशो नाशवतो जन्मश्चेत्येताववश्यंभाविनाविति।।
तथा च सति

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.26।। हे महाबाहो ! अगर तुम इस देहीको नित्य पैदा होनेवाला अथवा नित्य मरनेवाला भी मानो, तो भी तुम्हें इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिये।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.26।। और यदि तुम आत्मा को नित्य जन्मने और नित्य मरने वाला मानो तो भी,  हे महाबाहो !  इस प्रकार शोक करना तुम्हारे लिए उचित नहीं है।।
 



श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।

तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।।2.27।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.27।।ऐसा होनेसे

जिसने जन्म लिया है उसका मरण ध्रुव निश्चित है और जो मर गया है उसका जन्म ध्रुव निश्चित है इसलिये यह जन्ममरणरूप भाव अपरिहार्य है अर्थात् किसी प्रकार भी इसका प्रतिकार नहीं किया जा सकता इस अपरिहार्य विषयके निमित्त तुझे शोक करना उचित नहीं।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.27।।

जातस्य हि लब्धजन्मनः ध्रुवः अव्यभिचारी मृत्युः मरणं ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्योऽयं जन्ममरणलक्षणोऽर्थः। तस्मिन्नपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।।
कार्यकरणसंघातात्मकान्यपि भूतान्युद्दिश्य शोको न युक्तः कर्तुम् यतः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.27।। क्योंकि पैदा हुएकी जरूर मृत्यु होगी और मरे हुएका जरूर जन्म होगा। इस (जन्म-मरण-रूप परिवर्तन के प्रवाह) का परिहार अर्थात् निवारण नहीं हो सकता। अतः इस विषयमें तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.27।। जन्मने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म निश्चित है;  इसलिए जो अटल है अपरिहार्य - है उसके विषय में तुमको शोक नहीं करना चाहिये।।
 




श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।

अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।।2.28।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.28।।कार्यकरणके संघातरूप ही प्राणियोंको माने तो उनके उद्देश्यसे भी शोक करना उचित नहीं है क्योंकि

अव्यक्त यानी न दीखना उपलब्ध न होना ही जिनकी आदि है ऐसे ये कार्यकरणके संघातरूप पुत्र मित्र आदि समस्त भूत अव्यक्तादि हैं अर्थात् जन्मसे पहले ये सब अदृश्य थे।
उत्पन्न होकर मरणसे पहलेपहल बीचमें व्यक्त हैं दृश्य हैं। और पुनः अव्यक्तनिधन हैं अदृश्य होना ही जिनका निधन यानी मरण है उनको अव्यक्तनिधन कहते हैं अभिप्राय यह कि मरनेके बाद भी ये सब अदृश्य हो ही जाते हैं।
ऐसे ही कहा भी है कि यह भूतसंघात अदर्शनसे आया और पुनः अदृश्य हो गया। न वह तेरा है और न तू उसका है व्यर्थ ही शोक किस लिये
सुतरां इनके विषयमें अर्थात् बिना हुए ही दीखने और नष्ट होनेवाले भ्रान्तिरूप भूतोंके विषयमें चिन्ता ही क्या है रोनापीटना भी किस लिये है।



Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.28।।

अव्यक्तादीनि अव्यक्तम् अदर्शनम् अनुपलब्धिः आदिः येषां भूतानां पुत्रमित्रादिकार्यकरणसंघातात्मकानां तानि अव्यक्तादीनि भूतानि प्रागुत्पत्तेः उत्पन्नानि च प्राङ्मरणात् व्यक्तमध्यानि। अव्यक्तनिधनान्येव पुनः अव्यक्तम् अदर्शनं निधनं मरणं येषां तानि अव्यक्तनिधनानि। मरणादूर्ध्वमप्यव्यक्ततामेव प्रतिपद्यन्ते इत्यर्थः। तथा चोक्तम्

अदर्शनादापतितः पुनश्चादर्शनं गतः। नासौ तव न तस्य त्वं वृथा का परिदेवना इति। तत्र का परिदेवना को वा प्रलापः अदृष्टदृष्टप्रनष्टभ्रान्तिभूतेषु भूतेष्वित्यर्थः।।
दुर्विज्ञेयोऽयं प्रकृत आत्मा किं त्वामेवैकमुपालभे साधारणे भ्रान्तिनिमित्ते। कथं दुर्विज्ञेयोऽयमात्मा इत्यत आह

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.28।। हे भारत ! सभी प्राणी जन्मसे पहले अप्रकट थे और मरनेके बाद अप्रकट हो जायँगे, केवल बीचमें ही प्रकट दीखते हैं। अतः इसमें शोक करनेकी बात ही क्या है?
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.28।। हे भारत ! समस्त प्राणी जन्म से पूर्व और मृत्यु के बाद अव्यक्त अवस्था में रहते हैं और बीच में व्यक्त होते हैं। फिर उसमें चिन्ता या शोक की क्या बात है ?




श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।

तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि।।2.30।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.30।।अब यहाँ प्रकरणके विषयका उपसंहार करते हुए कहते हैं

यह जीवात्मा सर्वव्यापी होनेके कारण सबके स्थावरजंगम आदि शरीरोंमें स्थित है तो भी अवयवरहित और नित्य होनेके कारण सदा सब अवस्थाओंमें अवश्य ही है।
जिससे कि सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरोंका नाश किये जानेपर भी इस आत्माका नाश नहीं किया जा सकता इसलिये भीष्मादि सब प्राणियोंके उद्देश्यसे तुझे शोक करना उचित नहीं है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.30।।

देही शरीरी नित्यं सर्वदा सर्वावस्थासु अवध्यः निरवयवत्वान्नित्यत्वाच्च तत्र अवध्योऽयं देहे शरीरे सर्वस्य सर्वगतत्वात्स्थावरादिषु स्थितोऽपि सर्वस्य प्राणिजातस्य देहे वध्यमानेऽपि अयं देही न वध्यः यस्मात् तस्मात् भीष्मादीनि सर्वाणि भूतानि उद्दिश्य न त्वं शोचितुमर्हसि।।
इह परमार्थतत्त्वापेक्षायां शोको मोहो वा न संभवतीत्युक्तम्। न केवलं परमार्थतत्त्वापेक्षायामेव। किं तु

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.30।। हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! सबके देहमें यह देही नित्य ही अवध्य है। इसलिये सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अर्थात् किसी भी प्राणीके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.30।। हे भारत ! यह देही आत्मा सबके शरीर में सदा ही अवध्य है, इसलिए समस्त प्राणियों के लिए तुम्हें शोक करना उचित नहीं।।
 




श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।

क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति।।2.43।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.43।।तथा वे

कामात्माजिन्होंने भोगकामनाको ही अपना स्वभाव बना लिया है ऐसे भोगपरायण और स्वर्गको प्रधान माननेवाले यानी स्वर्ग ही जिनका परम पुरुषार्थ है ऐसे पुरुष जन्मरूप कर्मफलको देनेवाली ही बातें किया करते हैं। कर्मके फलका नाम कर्मफल है जन्मरूप कर्मफल जन्मकर्मफल कहलाता है उसको देनेवाली वाणी जन्मकर्मफलप्रदा कही जाती है। ऐसी वाणी कहा करते हैं।
इस प्रकार भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये जो क्रियाओंके भेद हैं वे जिस वाणीमें बहुत हों अर्थात् स्वर्ग पशु पुत्र आदि अनेक पदार्थ जिस वाणीद्वारा अधिकतासे बतलाये जाते हों ऐसी बहुतसे क्रियाभेदोंको बतलानेवाली वाणीको बोलनेवाले वे मूढ़ बारंबार संसारचक्रमें भ्रमण करते हैं यह अभिप्राय है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.43।।

 कामात्मानः  कामस्वभावाः कामपरा इत्यर्थः।  स्वर्गपराः  स्वर्गः परः पुरुषार्थः येषां ते स्वर्गपराः स्वर्गप्रधानाः।  जन्मकर्मफलप्रदां  कर्मणः फलं कर्मफलं जन्मैव कर्मफलं जन्मकर्मफलं तत् प्रददातीति जन्मकर्मफलप्रदा तां वाचम्। प्रवदन्ति इत्यनुषज्यते।  क्रियाविशेषबहुलां  क्रियाणां विशेषाः क्रियाविशेषाः ते बहुला यस्यां वाचि तां स्वर्गपशुपुत्राद्यर्थाः यया वाचा बाहुल्येन प्रकाश्यन्ते।  भोगैश्वर्यगतिं   प्रति  भोगश्च ऐश्वर्यं च भोगैश्वर्ये तयोर्गतिः प्राप्तिः भोगैश्वर्यगतिः तां प्रति साधनभूताः ये क्रियाविशेषाः तद्बहुलां तां वाचं प्रवदन्तः मूढाः संसारे परिवर्तन्ते इत्यभिप्रायः।।
तेषां च

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.42 -- 2.43।। हे पृथानन्दन ! जो कामनाओंमें तन्मय हो रहे हैं, स्वर्गको ही श्रेष्ठ माननेवाले हैं, वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं, भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं - ऐसा कहनेवाले हैं, वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकारकी जिस पुष्पित (दिखाऊ शोभायुक्त) वाणीको कहा करते हैं, जो कि जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली है तथा भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये बहुतसी क्रियाओंका वर्णन करनेवाली है।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.43।। कामनाओं से युक्त? स्वर्ग को ही श्रेष्ठ मानने वाले लोग भोग और ऐश्वर्य को प्राप्त कराने वाली अनेक क्रियाओं को बताते हैं जो (वास्तव में) जन्मरूप कर्मफल को देने वाली होती हैं।।



श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।

निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्।।2.45।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.45।।जो इस प्रकार विवेकबुद्धिसे रहित हैं उन कामपरायण पुरुषोंके

वेद त्रैगुण्यविषयक हैं अर्थात् तीनों गुणोंके कार्यरूप संसारको ही प्रकाशित करनेवाले हैं। परंतु हे अर्जुन तू असंसारी हो निष्कामी हो।
तथा निर्द्वन्द्व हो अर्थात् सुखदुःखके हेतु जो परस्पर विरोधी ( युग्म ) पदार्थ हैं उनका नाम द्वन्द्व है उनसे रहित हो और नित्य सत्त्वस्थ हो अर्थात् सदा सत्त्वगुणके आश्रित हो।
तथा निर्योगक्षेम हो। अप्राप्त वस्तुको प्राप्त करनेका नाम योग है और प्राप्त वस्तुके रक्षणका नाम क्षेम है योगक्षेमको प्रधान माननेवालेकी कल्याणमार्गमें प्रवृत्ति होनी अत्यन्त कठिन है अतः तू योगक्षेमको न चाहनेवाला हो।
तथा आत्मवान् हो अर्थात् ( आत्मविषयोंमें ) प्रमादरहित हो। तुझ स्वधर्मानुष्ठानमें लगे हुएके लिये यह उपदेश है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.45।।

 त्रैगुण्यविषयाः  त्रैगुण्यं संसारो विषयः प्रकाशयितव्यः येषां ते  वेदाः  त्रैगुण्यविषयाः। त्वं तु  निस्त्रैगुण्यो भव अर्जुन  निष्कामो भव इत्यर्थः।  निर्द्वन्द्वः  सुखदुःखहेतू सप्रतिपक्षौ पदार्थौ द्वन्द्वशब्दवाच्यौ ततः निर्गतः निर्द्वन्द्वो भव।  नित्यसत्त्वस्थः  सदा सत्त्वगुणाश्रितो भव। तथा  निर्योगक्षेमः  अनुपात्तस्य उपादानं योगः उपात्तस्य रक्षणं क्षेमः
योगक्षेमप्रधानस्य श्रेयसि प्रवृत्तिर्दुष्करा इत्यतः निर्योगक्षेमो भव।  आत्मवान्  अप्रमत्तश्च भव। एष तव उपदेशः स्वधर्ममनुतिष्ठतः।।
सर्वेषु वेदोक्तेषु कर्मसु यान्युक्तान्यनन्तानि फलानि तानि नापेक्ष्यन्ते चेत् किमर्थं तानि ईश्वरायेत्यनुष्ठीयन्ते इत्युच्यते श्रृणु

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.45।। वेद तीनों गुणोंके कार्यका ही वर्णन करनेवाले हैं; हे अर्जुन! तू तीनों गुणोंसे रहित हो जा, निर्द्वन्द्व हो जा, निरन्तर नित्य वस्तु परमात्मा में स्थित हो जा, योगक्षेमकी चाहना भी मत रख और परमात्मपरायण हो जा।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.45।। हे अर्जुन वेदों का विषय तीन गुणों से सम्बन्धित (संसार से) है तुम त्रिगुणातीत? निर्द्वन्द्व? नित्य सत्त्व (शुद्धता) में स्थित? योगक्षेम से रहित और आत्मवान् बनो।।

मूल श्लोकः

यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके।

तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः।।2.46।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.46।।सम्पूर्ण वेदोक्त कर्मोंके जो अनन्त फल हैं उन फलोंको यदि कोई न चाहता हो तो वह उन कर्मोंका अनुष्ठान ईश्वरके लिये क्यों करे इसपर कहते हैं सुन

जैसे जगत्में कूप तालाब आदि अनेक छोटेछोटे जलाशयोंमें जितना स्नानपान आदि प्रयोजन सिद्ध होता है वह सब प्रयोजन सब ओरसे परिपूर्ण महान् जलाशयमें उतने ही परिमाणमें ( अनायास ) सिद्ध हो जाता है। अर्थात् उसमें उनका अन्तर्भाव है।
इसी तरह सम्पूर्ण वेदोंमें यानी वेदोक्त कर्मोंसे जो प्रयोजन सिद्ध होता है अर्थात् जो कुछ उन कर्मोंका फल मिलता है वह समस्त प्रयोजन परमार्थतत्त्वको जाननेवाले ब्राह्मणका यानी संन्यासीका जो सब ओरसे परिपूर्ण महान् जलाशयस्थानीय विज्ञान आनन्दरूप फल है उसमें उतने ही परिमाणमें ( अनायास ) सिद्ध हो जाता है। अर्थात् उसमें उसका अन्तर्भाव है।
श्रुतिमें भी कहा है कि जिसको वह ( रैक्व ) जानता है उस ( परब्रह्म ) को जो भी कोई जानता है वह उन सबके फलको पा जाता है कि जो कुछ प्रजा अच्छा कार्य करती है। आगे गीतामें भी कहेंगे कि सम्पूर्ण कर्म ज्ञानमें समाप्त हो जाते हैं। इत्यादि।
सुतरां यद्यपि कूप तालाब आदि छोटे जलाशयोंकी भाँति कर्म अल्प फल देनेवाले हैं तो भी ज्ञाननिष्ठाका अधिकार मिलनेसे पहलेपहले कर्माधिकारीको कर्म करना चाहिये।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.46।।

यथा लोके कूपतडागाद्यनेकस्मिन्  उदपाने  परिच्छिन्नोदके  यावान्  यावत्परिमाणः स्नानपानादिः  अर्थः  फलं प्रयोजनं स सर्वः अर्थः  सर्वतःसंप्लुतोदके ऽपि यः अर्थः तावानेव संपद्यते तत्र अन्तर्भवतीत्यर्थः। एवं  तावान्  तावत्परिमाण एव संपद्यते  सर्वेषु वेदेषु  वेदोक्तेषु कर्मसु यः अर्थः यत्कर्मफलं सः अर्थः  ब्राह्मणस्य  संन्यासिनः परमार्थतत्त्वं  विजानतो  यः अर्थः यत् विज्ञानफलं सर्वतःसंप्लुतोदकस्थानीयं तस्मिन् तावानेव संपद्यते तत्रैवान्तर्भवतीत्यर्थः। यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं  सर्वं तदभिसमेति यत् किञ्चित् प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद  इति श्रुतेः।  सर्वं कर्माखिलम्  इति च वक्ष्यति। तस्मात् प्राक् ज्ञाननिष्ठाधिकारप्राप्तेः कर्मण्यधिकृतेन कूपतडागाद्यर्थस्थानीयमपि कर्म कर्तव्यम्।।
तव च

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.46।। सब तरफसे परिपूर्ण महान् जलाशयके प्राप्त होनेपर छोटे गड्ढों में भरे जल में मनुष्यका जितना प्रयोजन रहता है अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता, वेदों और शास्त्रोंको तत्त्वसे जाननेवाले ब्रह्मज्ञानीका सम्पूर्ण वेदोंमें उतना ही प्रयोजन रहता है अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.46।। सब ओर से परिपूर्ण जलराशि के होने पर मनुष्य का छोटे जलाशय में जितना प्रयोजन रहता है? आत्मज्ञानी ब्राह्मण का सभी वेदों में उतना ही प्रयोजन रहता है।।



श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।2.47।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.47।।तेरा कर्ममें ही अधिकार है ज्ञाननिष्ठामें नहीं। वहाँ ( कर्ममार्गमें ) कर्म करते हुए तेरा फलमें कभी अधिकार न हो अर्थात् तुझे किसी भी अवस्थामें कर्मफलकी इच्छा नहीं होनी चाहिये।
यदि कर्मफलमें तेरी तृष्णा होगी तो तू कर्मफलप्राप्तिका कारण होगा। अतः इस प्रकार कर्मफलप्राप्तिका कारण तू मत बन।
क्योंकि जब मनुष्य कर्मफलकी कामनासे प्रेरित होकर कर्ममें प्रवृत्त होता है तब वह कर्मफलरूप पुनर्जन्मका हेतु बन ही जाता है।
यदि कर्मफलकी इच्छा न करें तो दुःखरूप कर्म करनेकी क्या आवश्यकता है इस प्रकार कर्म न करनेमें भी तेरी आसक्तिप्रीति नहीं होनी चाहिये।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.47।।

 कर्मण्येव अधिकारः  न ज्ञाननिष्ठायां  ते  तव। तत्र च कर्म कुर्वतः  मा फलेषु  अधिकारः अस्तु कर्मफलतृष्णा मा भूत्  कदाचन  कस्याञ्चिदप्यवस्थायामित्यर्थः। यदा कर्मफले तृष्णा ते स्यात् तदा कर्मफलप्राप्तेः हेतुः स्याः एवं  मा कर्मफलहेतुः  भूः। यदा हि कर्मफलतृष्णाप्रयुक्तः कर्मणि प्रवर्तते तदा कर्मफलस्यैव जन्मनो हेतुर्भवेत्। यदि कर्मफलं नेष्यते किं कर्मणा दुःखरूपेण इति  मा ते  तव  सङ्गः अस्तु अकर्मणि  अकरणे प्रीतिर्मा भूत्।।
यदि कर्मफलप्रयुक्तेन न कर्तव्यं कर्म कथं तर्हि कर्तव्यमिति उच्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.47।। कर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं। अतः तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.47।। कर्म करने मात्र में तुम्हारा अधिकार है? फल में कभी नहीं। तुम कर्मफल के हेतु वाले मत होना और अकर्म में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।।



श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।

सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।2.48।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.48।।यदि कर्मफलसे प्रेरित होकर कर्म नहीं करने चाहिये तो फिर किस प्रकार करने चाहिये इसपर कहते हैं

हे धनंजय योगमें स्थित होकर केवल ईश्वरके लिय कर्म कर। उनमें भी ईश्वर मुझपर प्रसन्न हों। इस आशारूप आसक्तिको भी छोड़कर कर।
फलतृष्णारहित पुरुषद्वारा कर्म किये जानेपर अन्तःकरणकी शुद्धिसे उत्पन्न होनेवाली ज्ञानप्राप्ति तो सिद्धि है और उससे विपरीत ( ज्ञानप्राप्तिका न होना ) असिद्धि है ऐसी सिद्धि और असिद्धिमें भी सम होकर अर्थात् दोनोंको तुल्य समझकर कर्म कर।
वह कौनसा योग है जिसमें स्थित होकर कर्म करनेके लिये कहा है यही जो सिद्धि और असिद्धिमें समत्व है इसीको योग कहते हैं।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.48।।

 योगस्थः  सन्  कुरु कर्माणि  केवलमीश्वरार्थम् तत्रापि ईश्वरो मे तुष्यतु इति  सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।  फलतृष्णाशून्येन क्रियमाणे कर्मणि सत्त्वशुद्धिजा ज्ञानप्राप्तिलक्षणा सिद्धिः तद्विपर्ययजा असिद्धिः तयोः  सिद्ध्यसिद्ध्योः  अपि  समः  तुल्यः  भूत्वा  कुरु कर्माणि। कोऽसौ योगः यत्रस्थः कुरु इति उक्तम् इदमेव तत् सिद्ध्यसिद्ध्योः  समत्वं योगः उच्यते।।
यत्पुनः समत्वबुद्धियुक्तमीश्वराराधनार्थं कर्मोक्तम् एतस्मात्कर्मणः

 

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.48।। हे धनञ्जय ! तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.48।। हे धनंजय आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समभाव होकर योग में स्थित हुये तुम कर्म करो। यह समभाव ही योग कहलाता है।।



श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।

तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्।।2.50।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.50।।समत्वबुद्धिसे युक्त होकर स्वधर्माचरण करनेवाला पुरुष जिस फलको पाता है वह सुन

समत्वयोगविषयक बुद्धिसे युक्त हुआ पुरुष अन्तःकरणकी शुद्धिके और ज्ञानप्राप्तिके द्वारा सुकृतदुष्कृतको पुण्यपाप दोनोंको यहीं त्याग देता है इसी लोकमें कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है। इसलिये तू समत्वबुद्धिरूप योगकी प्राप्तिके लिये यत्न कर चेष्टा कर।
क्योंकि योग ही तो कर्मोंमें कुशलता है अर्थात् स्वधर्मरूप कर्ममें लगे हुए पुरुषका जो ईश्वरसमर्पित बुद्धिसे उत्पन्न हुआ सिद्धिअसिद्धिविषयक समत्वभाव है वही कुशलता है।
यही इसमें कौशल है कि स्वभावसे ही बन्धन करनेवाले जो कर्म हैं वे भी समत्व बुद्धिके प्रभावसे अपने स्वभावको छोड़ देते हैं अतः तू समत्वबुद्धिसे युक्त हो।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.50।।

 बुद्धियुक्तः  कर्मसमत्वविषयया बुद्ध्या युक्तः बुद्धियुक्तः सः  जहाति  परित्यजति  इह  अस्मिन् लोके उभे  सुकृतदुष्कृते  पुण्यपापे सत्त्वशुद्धिज्ञानप्राप्तिद्वारेण यतः  तस्मात्  समत्वबुद्धि योगाय युज्यस्व  घटस्व।  योगो  हि  कर्मसु कौशलम्  स्वधर्माख्येषु कर्मसु वर्तमानस्य या सिद्ध्यसिद्ध्योः समत्वबुद्धिः ईश्वरार्पितचेतस्तया तत् कौशलं कुशलभावः। तद्धि कौशलं यत् बन्धनस्वभावान्यपि कर्माणि समत्वबुद्ध्या स्वभावात् निवर्तन्ते। तस्मात्समत्वबुद्धियुक्तो भव त्वम्।।
यस्मात्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.50।। बुद्धि-(समता) से युक्त मनुष्य यहाँ जीवित अवस्थामें ही पुण्य और पाप दोनोंका त्याग कर देता है। अतः तू योग-(समता-) में लग जा, क्योंकि योग ही कर्मोंमें कुशलता है।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.50।। समत्वबुद्धि युक्त पुरुष यहां (इस जीवन में) पुण्य और पाप इन दोनों कर्मों को त्याग देता है, इसलिये तुम योग से युक्त हो जाओ। कर्मों में कुशलता योग है।।




श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।

समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि।।2.53।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.53।।यदि तू पूछे कि मोहरूप मलिनतासे पार होकर आत्मविवेकजन्य बुद्धिको प्राप्त हुआ मैं कर्मयोगके फलरूप परमार्थयोगको ( ज्ञानको ) कब पाऊँगा तो सुन

अनेक साध्य साधन और उनका सम्बन्ध बतलानेवाली श्रुतियोंसे विप्रतिपन्न अर्थात् नाना भावोंको प्राप्त हुई विक्षिप्त हुई तेरी बुद्धि जब समाधिमें यानी जिसमें चित्तका समाधान किया जाय वह समाधि है इस व्युत्पत्तिसे आत्माका नाम समाधि है उसमें अचल और दृढ़ स्थिर हो जायगी यानी विक्षेपरूप चलनसे और विकल्पसे रहित होकर स्थिर हो जायगी।
तब तू योगको प्राप्त होगा अर्थात् विवेकजनित बुद्धिरूप समाधिनिष्ठाको पावेगा।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.53।।

 श्रुतिविप्रतिपन्ना  अनेकसाध्यसाधनसंबन्धप्रकाशनश्रुतिभिः श्रवणैः प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणैः विप्रतिपन्ना नानाप्रतिपन्ना विक्षिप्ता सती ते तव बुद्धिः  यदा  यस्मिन् काले  स्थास्यति  स्थिरीभूता भविष्यति  निश्चला  विक्षेपचलनवर्जिता सती  समाधौ  समाधीयते चित्तमस्मिन्निति समाधिः आत्मा तस्मिन् आत्मनि इत्येतत्।  अचला  तत्रापि विकल्पवर्जिता इत्येतत्।  बुद्धिः  अन्तःकरणम्।  तदा  तस्मिन्काले  योगम् अवाप्स्यसि  विवेकप्रज्ञां समाधिं प्राप्स्यसि।।
प्रश्नबीजं प्रतिलभ्य अर्जुन उवाच लब्धसमाधिप्रज्ञस्य लक्षणबुभुत्सया

अर्जुन उवाच

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.53।। जिस कालमें शास्त्रीय मतभेदोंसे विचलित हुई तेरी बुद्धि निश्चल हो जायगी और परमात्मामें अचल हो जायगी, उस कालमें तू योगको प्राप्त हो जायगा।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.53।। जब अनेक प्रकार के विषयों को सुनने से विचलित हुई तुम्हारी बुद्धि आत्मस्वरूप में अचल और स्थिर हो जायेगी तब तुम (परमार्थ) योग को प्राप्त करोगे।।




श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।

इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः।।2.60।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.60।।यथार्थ ज्ञानरूप बुद्धिकी स्थिरता चाहनेवाले पुरुषोंको पहले इन्द्रियोंको अपने वशमें कर लेना चाहिये क्योंकि उनको वशमें न करनेसे दोष बतलाते हैं

हे कौन्तेय जिससे की प्रयत्न करनेवाले विचारशील बुद्धिमान् पुरुषकी भी प्रमथनशील इन्द्रियाँ उस विषयाभिमुख हुए पुरुषको क्षुब्ध कर देती हैं व्याकुल कर देती हैं और व्याकुल करके ( उस ) केवल प्रकाशको ही देखनेवाले विद्वान्के विवेकविज्ञानयुक्त मनको ( भी ) बलात्कारसे विचलित कर देती हैं।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.60।।

 यततः  प्रयत्नं कुर्वतः  अपि हि  यस्मात्  कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः  मेधाविनः अपि इति व्यवहितेन संबन्धः।  इन्द्रियाणि प्रमाथीनि  प्रमथनशीलानि विषयाभिमुखं हि पुरुषं विक्षोभयन्ति आकुलीकुर्वन्ति आकुलीकृत्य च  हरन्ति प्रसभं  प्रसह्य प्रकाशमेव पश्यतो विवेकविज्ञानयुक्तं  मनः ।।
यतः तस्मात्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.60।। हे कुन्तीनन्दन! (रसबुद्धि रहनेसे) यत्न करते हुए विद्वान् मनुष्यकी भी प्रमथनशील इन्द्रियाँ उसके मनको बलपूर्वक हर लेती हैं।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.60।। हे कौन्तेय (संयम का) प्रयत्न करते हुए बुद्धिमान (विपश्चित) पुरुष के भी मन को ये इन्द्रियां बलपूर्वक हर लेती हैं।।

 


श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।

वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2.61।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.61।।जब कि यह बात है इसलिये

उन सब इन्द्रियोंको रोककर यानी वशमें करके और युक्त समाहितचित्त हो मेरे परायण होकर बैठना चाहिये। अर्थात् सबका अन्तरात्मारूप मैं वासुदेव ही जिसका सबसे पर हूँ वह मत्पर है अर्थात् मैं उस परमात्मासे भिन्न नहीं हूँ। इस प्रकार मुझसे अपनेको अभिन्न माननेवाला होकर बैठना चाहिये।
क्योंकि इस प्रकार बैठनेवाले जिस यतिकी इन्द्रियाँ अभ्यासबलसे ( उसके ) वशमें है उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.61।।

 तानि सर्वाणि संयम्य  संयमनं वशीकरणं कृत्वा  युक्तः  समाहितः सन्  आसीत मत्परः  अहं वासुदेवः सर्वप्रत्यगात्मा परो यस्य सः मत्परः न अन्योऽहं तस्मात् इति आसीत इत्यर्थः। एवमासीनस्य यतेः  वशे हि यस्य इन्द्रियाणि  वर्तन्ते अभ्यासबलात्  तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।
अथेदानीं पराभविष्यतः सर्वानर्थमूलमिदमुच्यते

 

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.61।। कर्मयोगी साधक उन सम्पूर्ण इन्द्रियोंको वशमें करके मेरे परायण होकर बैठे; क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वशमें हैं, उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.61।। उन सब इन्द्रियों को संयमित कर युक्त और मत्पर होवे। जिस पुरुष की इन्द्रियां वश में होती हैं? उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित होती है।।




श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।

सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।2.62।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.62।।इतना कहनेके उपरान्त अब यह पतनाभिमुख पुरुषके समस्त अनर्थोंका कारण बतलाया जाता है

विषयोंका ध्यान चिन्तन करनेवाले पुरुषकी अर्थात् शब्दादि विषयोंके भेदोंकी बारंबार आलोचना करनेवाले पुरुषकी उन विषयोंमें आसक्ति प्रीति उत्पन्न हो जाती है। आसक्तिसे कामना तृष्णा उत्पन्न होती है। कामसे अर्थात् किसी भी कारणवश विच्छिन्न हुई इच्छासे क्रोध उत्पन्न होता है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.62।।

 ध्यायतः  चिन्तयतः  विषयान्  शब्दादीन् विषयविशेषान् आलोचयतः  पुंसः  पुरुषस्य  सङ्गः  आसक्तिः प्रीतिः  तेषु  विषयेषु  उपजायते  उत्पद्यते।  सङ्गात्  प्रीतेः  संजायते  समुत्पद्यते  कामः  तृष्णा।  कामात्  कुतश्चित् प्रतिहतात्  क्रोधः अभिजायते।।
 

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.62 -- 2.63।। विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.62।। विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उसमें आसक्ति हो जाती है? आसक्ति से इच्छा और इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता है।।



श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।

स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।2.63।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.63।।क्रोधसे संमोह अर्थात् कर्तव्यअकर्तव्यविषयक अविवेक उत्पन्न होता है क्योंकि क्रोधी मनुष्य मोहित होकर गुरुको ( बड़ेको ) भी गोली दे दिया करता है।
मोहसे स्मृतिका विभ्रम होता है अर्थात् शास्त्र और आचार्यद्वारा सुने हुए उपदेशके संस्कारोंसे जो स्मृति उत्पन्न होती है उसके प्रकट होनेका निमित्त प्राप्त होनेपर वह प्रकट नहीं होती।
इस प्रकार स्मृतिविभ्रम होनेसे बुद्धिका नाश हो जाता है। अन्तःकरणमें कार्यअकार्यविषयक विवेचनकी योग्यताका न रहना बुद्धिका नाश कहा जाता है।
बुद्धिका नाश होनेसे ( यह मनुष्य ) नष्ट हो जाता है क्योंकि वह तबतक ही मनुष्य है जबतक उसका अन्तःकरण कार्यअकार्यके विवेचनमें समर्थ है ऐसी योग्यता न रहनेपर मनुष्य नष्टप्राय ( मनुष्यतासे हीन ) हो जाता है।
अतः उस अन्तःकरणकी ( विवेकशक्तिरूप ) बुद्धिका नाश होनेसे पुरुषका नाश हो जाता है। इस कथनका यह अभिप्राय है कि वह पुरुषार्थके अयोग्य हो जाता है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.63।।

 क्रोधात् भवति संमोहः  अविवेकः कार्याकार्यविषयः। क्रुद्धो हि संमूढः सन् गुरुमप्याक्रोशति।  संमोहात् स्मृतिविभ्रमः  शास्त्राचार्योपदेशाहितसंस्कारजनितायाः स्मृतेः स्यात् विभ्रमो भ्रंशः स्मृत्युत्पत्तिनिमित्तप्राप्तौ अनुत्पत्तिः। ततः  स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः  बुद्धेर्नाशः। कार्याकार्यविषयविवेकायोग्यता अन्तःकरणस्य बुद्धेर्नाश उच्यते।  बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।  तावदेव हि पुरुषः यावदन्तःकरणं तदीयं कार्याकार्यविषयविवेकयोग्यम्। तदयोग्यत्वे नष्ट एव पुरुषो भवति। अतः तस्यान्तःकरणस्य बुद्धेर्नाशात् प्रणश्यति पुरुषार्थायोग्यो भवतीत्यर्थः।।
सर्वानर्थस्य मूलमुक्तं विषयाभिध्यानम्। अथ इदानीं मोक्षकारणमिदमुच्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.62 -- 2.63।। विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.63।। क्रोध से उत्पन्न होता है मोह और मोह से स्मृति विभ्रम। स्मृति के भ्रमित होने पर बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश होने से वह मनुष्य नष्ट हो जाता है।।



श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।

न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्।।2.66।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.66।।उस प्रसन्नताकी स्तुति की जाती है

अयुक्त पुरुषमें अर्थात् जिसका अन्तःकरण समाहित नहीं है ऐसे पुरुषमें आत्मस्वरूपविषयक बुद्धि नहीं होती अर्थात् नहीं रहती और उस अयुक्त पुरुषमें भावना अर्थात् आत्मज्ञानमें प्रगाढ प्रवेश अतिशय प्रीति भी नहीं होती।
तथा भावना न करनेवालेको अर्थात् आत्मज्ञानके साधनमें प्रीतिपूर्वक संलग्न न होनेवालेको शान्ति अर्थात् उपशमता भी नहीं मिलती।
शान्तिरहित पुरुषको भला सुख कहाँ क्योंकि विषयसेवनसम्बन्धी तृष्णासे जो इन्द्रियोंका निवृत्त होना है वही सुख है विषयसम्बन्धी तृष्णा कदापि सुख नहीं है वह तो दुःख ही है।
अभिप्राय यह कि तृष्णाके रहते हुए तो सुखकी गन्धमात्र भी नहीं मिलती।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.66।।

 नास्ति  न विद्यते न भवतीत्यर्थः  बुद्धिः  आत्मस्वरूपविषया  अयुक्तस्य  असमाहितान्तःकरणस्य।  न च  अस्ति  अयुक्तस्य   भावना  आत्मज्ञानाभिनिवेशः। तथा  न च  अस्ति  अभावयतः  आत्मज्ञानाभिनिवेशमकुर्वतः  शान्तिः  उपशमः।  अशान्तस्य कुतः सुखम्  इन्द्रियाणां हि विषयसेवातृष्णातः निवृत्तिर्या तत्सुखम् न विषयविषया तृष्णा। दुःखमेव हि सा। न तृष्णायां सत्यां सुखस्य गन्धमात्रमप्युपपद्यते इत्यर्थः।।
अयुक्तस्य कस्माद्बुद्धिर्नास्ति इत्युच्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.66।। जिसके मन-इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, ऐसे मनुष्यकी व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती और व्यवसायात्मिका बुद्धि न होनेसे उसमें कर्तव्यपरायणताकी भावना नहीं होती। ऐसी भावना न होनेसे उसको शान्ति नहीं मिलती। फिर शान्तिरहित मनुष्यको सुख कैसे मिल सकता है? 
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.66।। (संयमरहित) अयुक्त पुरुष को (आत्म) ज्ञान नहीं होता और अयुक्त को भावना और ध्यान की क्षमता नहीं होती भावना रहित पुरुष को शान्ति नहीं मिलती अशान्त पुरुष को सुख कहाँ


श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।

तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि।।2.67।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.67।।अयुक्त पुरुषमें बुद्धि क्यों नहीं होती इसपर कहते हैं

क्योंकि अपनेअपने विषयमें विचरनेवाली अर्थात् विषयोंमें प्रवृत्त हुई इन्द्रियोंमेंसे जिसके पीछेपीछे यह मन जाता है विषयोंमें प्रवृत्त होता है वह उस इन्द्रियके विषयको विभागपूर्वक ग्रहण करनेमें लगा हुआ मन इस साधककी आत्मअनात्मसम्बन्धी विवेकज्ञानसे उत्पन्न हुई बुद्धिको हर लेता है अर्थात् नष्ट कर देता है।
कैसे जैसे जलमें नौकाको वायु हर लेता है वैसे ही अर्थात् जैसे जलमें चलनेकी इच्छावाले पुरुषोंकी नौकाको वायु गन्तव्य मार्गसे हटाकर उल्टे मार्गपर ले जाता है वैसे ही यह मन आत्मविषयक बुद्धिको विचलित करके विषयविषयक बना देता है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.67।।

 इन्द्रियाणां हि  यस्मात्  चरतां  स्वस्वविषयेषु प्रवर्तमानानां  यत् मनः अनुविधीयते  अनुप्रवर्तते  तत्  इन्द्रियविषयविकल्पनेन प्रवृत्तं मनः  अस्य  यतेः  हरति प्रज्ञाम्  आत्मानात्मविवेकजां नाशयति। कथम्  वायुः नावमिव अम्भसि  उदके जिगमिषतां मार्गादुद्धृत्य उन्मार्गे यथा वायुः नावं प्रवर्तयति एवमात्मविषयां प्रज्ञां हृत्वा मनो विषयविषयां करोति।।
यततो हि इत्युपन्यस्तस्यार्थस्य अनेकधा उपपत्तिमुक्त्वा तं चार्थमुपपाद्य उपसंहरति

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.67।। अपने-अपने विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंमेंसे एक ही इन्द्रिय जिस मनको अपना अनुगामी बना लेती है, वह अकेला मन जलमें नौकाको वायुकी तरह इसकी बुद्धिको हर लेता है।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.67।। जल में वायु जैसे नाव को हर लेता है वैसे ही विषयों में विरचती हुई इन्द्रियों के बीच में जिस इन्द्रिय का अनुकरण मन करता है? वह एक ही इन्द्रिय इसकी प्रज्ञा को हर लेती है।।






श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।।2.69।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.69।।यह जो लौकिक और वैदिक व्यवहार है वह सबकासब अविद्याका कार्य है अतः जिसको विवेकज्ञान प्राप्त हो गया है ऐसे स्थितप्रज्ञके लिये अविद्याकी निवृत्तिके साथहीसाथ ( यह व्यवहार भी ) निवृत्त हो जाता है और अविद्याका विद्याके साथ विरोध होनेके कारण उसकी भी निवृत्ति हो जाती है। इस अभिप्रायको स्पष्ट करते हुए कहते हैं

तामस स्वभावके कारण सब पदार्थोंका अविवेक करानेवाली रात्रिका नाम निशा है। सब भूतोंकी जो निशा अर्थात् रात्रि है
वह ( निशा ) क्या है ( उ
त्तर ) परमार्थतत्त्व जो कि स्थितप्रज्ञका विषय है ( ज्ञेय है )। जैसे उल्लू आदि रजनीचरोंके लिये दूसरोंका दिन भी रात होती है वैसे ही निशाचरस्थानीय जो सम्पूर्ण अज्ञानी मनुष्य हैं जिनमें परमार्थतत्त्वविषयक बुद्धि नहीं है उन सब भूतोंके लिये अज्ञात होनेके कारण यह परमार्थतत्त्व रात्रिकी भाँति रात्रि है।
उस परमार्थतत्त्वरूप रात्रिमें अज्ञाननिद्रासे जगा हुआ संयमी अर्थात् जितेन्द्रिय योगी जागता है।
ग्राह्यग्राहकभेदरूप जिस अविद्यारात्रिमें सोते हुए भी सब प्राणी जागते हैं ऐसे कहा जाता है अर्थात् जिस रात्रिमें सब प्राणी सोते हुए स्वप्न देखनेवालोंके सदृश जागते हैं। वह ( सारा दृश्य ) अविद्यारूप होनेके कारण परमार्थतत्त्वको जाननेवाले मुनिके लिये रात्रि है।
सुतरां ( यह सिद्ध हुआ कि ) अविद्याअवस्थामें ही ( मनुष्यके लिये ) कर्मोंका विधान किया जाता है विद्यावस्थामें नहीं क्योंकि जैसे सूर्यके उदय होनेपर रात्रिसम्बन्धी अन्धकार दूर हो जाता है उसी प्रकार ज्ञान उदय होनेपर अज्ञान नष्ट हो जाता है।
ज्ञानोत्पत्तिसे पहलेपहले प्रमाणबुद्धिसे ग्रहण की हुई अविद्या ही क्रिया कारक और फल आदिके भेदोंमें परिणत होकर सब कर्म करवानेका हेतु बन सकती है अप्रमाणबुद्धिसे ग्रहण की हुई ( अविद्या ) कर्म करवानेका कारण नहीं बन सकती।
क्योंकि प्रमाणस्वरूप वेदने मेरे लिये अमुक कर्तव्यकर्मोंका विधान किया है ऐसा मानकर ही कर्ता कर्ममें प्रवृत्त होता है यह सब रात्रिकी भाँति अविद्यामात्र है इस तरह समझकर नहीं होता।
जिसको ऐसा ज्ञान प्राप्त हो गया है कि यह सारा दृश्य रात्रिकी भाँति अविद्यामात्र ही है उस आत्मज्ञानीका तो सर्व कर्मोंके संन्यासमें ही अधिकार है प्रवृत्तिमें नहीं।
इस प्रकार तद्बुद्धयस्तदात्मानः इत्यादि श्लोकोंसे उस ज्ञानीका अधिकार ज्ञाननिष्ठामें ही दिखलायेंगे।
पू0 उस ज्ञाननिष्ठामें भी ( तत्त्ववेत्ताको ) प्रवृत्त करनेवाले प्रमाणका ( विधिवाक्यका ) अभाव है इसलिये उसमें भी उसकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती।
0 यह कहना ठीक नहीं क्योंकि आत्मज्ञान अपने स्वरूपको विषय करनेवाला है अतः अपने स्वरूपज्ञानके विषयमें प्रवृत्त करनेवाले प्रमाणकी अपेक्षा नहीं होती। वह आत्मज्ञान स्वयं आत्मा होनेके कारण स्वतःसिद्ध है और उसीमें सब प्रमाणोंके प्रमाणत्वका अन्त है अर्थात् आत्मज्ञान होनेतक ही प्रमाणोंका प्रमाणत्व है अतः आत्मस्वरूपका साक्षात् होनेके बाद प्रमाण और प्रमेयका व्यवहार नहीं बन सकता।
( आत्मज्ञानरूप ) अन्तिम प्रमाण आत्माके प्रमातापनको भी निवृत्त कर देता है। उसको निवृत्त करता हुआ वह स्वयं भी जागनेके बाद स्वप्नकालके प्रमाणकी भाँति अप्रमाणी हो जाता है अर्थात् लुप्त हो जाता है।
क्योंकि व्यवहारमें भी वस्तु प्राप्त होनेके बाद कोई प्रमाण ( उस वस्तुकी प्राप्तिके लिये ) प्रवृत्तिका हेतु होता नहीं देखा जाता।
इसलिये यह सिद्ध हुआ कि आत्मज्ञानीका कर्मोंमें अधिकार नहीं है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.69।।

 या निशा  रात्रिः सर्वपदार्थानामविवेककरी तमःस्वभावत्वात्  सर्वभूतानां  सर्वेषां भूतानाम्। किं तत् परमार्थतत्त्वं स्थितप्रज्ञस्य विषयः। यथा नक्तञ्चराणाम् अहरेव सदन्येषां निशा भवति तद्वत् नक्तञ्चरस्थानीयानामज्ञानां सर्वभूतानां निशेव निशा परमार्थतत्त्वम् अगोचरत्वादतद्बुद्धीनाम्।  तस्यां  परमार्थतत्त्वलक्षणायामज्ञाननिद्रायाः प्रबुद्धो  जागर्ति   संयमी  संयमवान् जितेन्द्रियो योगीत्यर्थः।  यस्यां  ग्राह्यग्राहकभेदलक्षणायामविद्यानिशायां प्रसुप्तान्येव  भूतानि
 जाग्रति  इति उच्यन्ते यस्यां निशायां प्रसुप्ता इव स्वप्नदृशः  सा निशा  अविद्यारूपत्वात् परमार्थतत्त्वं  पश्यतो मुनेः।।
अतः कर्माणि अविद्यावस्थायामेव चोद्यन्ते न विद्यावस्थायाम्। विद्यायां हि सत्याम् उदिते सवितरि शार्वरमिव तमः प्रणाशमुपगच्छति अविद्या। प्राक् विद्योत्पत्तेः अविद्या प्रमाणबुद्ध्या गृह्यमाणा क्रियाकारकफलभेदरूपा सती

सर्वकर्महेतुत्वं प्रतिपद्यते। न अप्रमाणबुद्ध्या गृह्यमाणायाः कर्महेतुत्वोपपत्तिः प्रमाणभूतेन वेदेन मम चोदितं कर्तव्यं कर्म इति हि कर्मणि कर्ता प्रवर्तते न अविद्यामात्रमिदं सर्वं निशेव इति। यस्य पुनः निशेव अविद्यामात्रमिदं
सर्वं भेदजातम् इति ज्ञानं तस्य आत्मज्ञस्य सर्वकर्मसंन्यासे एव अधिकारो न प्रवृत्तौ। तथा च दर्शयिष्यति तद्बुद्धयस्तदात्मानः इत्यादिना ज्ञाननिष्ठायामेव तस्य अधिकारम्।।
तत्रापि प्रवर्तकप्रमाणाभावे प्रवृत्त्यनुपपत्तिः इति चेत् न स्वात्मविषयत्वादात्मविज्ञानस्य। न हि आत्मनः स्वात्मनि प्रवर्तकप्रमाणापेक्षता आत्मत्वादेव। तदन्तत्वाच्च सर्वप्रमाणानां प्रमाणत्वस्य। न हि आत्मस्वरूपाधिगमे सति पुनः प्रमाणप्रमेयव्यवहारः संभवति। प्रमातृत्वं हि आत्मनः निवर्तयति अन्त्यं प्रमाणम् निवर्तयदेव च अप्रमाणीभवति स्वप्नकालप्रमाणमिव प्रबोधे। लोके च वस्त्वधिगमे प्रवृत्तिहेतुत्वादर्शनात् प्रमाणस्य। तस्मात् न आत्मविदः कर्मण्यधिकार इति सिद्धम्।।
विदुषः त्यक्तैषणस्य स्थितप्रज्ञस्य यतेरेव मोक्षप्राप्तिः न तु असंन्यासिनः कामकामिनः इत्येतमर्थं दृष्टान्तेन प्रतिपादयिष्यन् आह

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.69।। सम्पूर्ण प्राणियों की जो रात (परमात्मासे विमुखता) है, उसमें संयमी मनुष्य जागता है, और जिसमें सब प्राणी जागते हैं (भोग और संग्रहमें लगे रहते हैं), वह तत्त्वको जाननेवाले मुनिकी दृष्टिमें रात है।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.69।। सब प्रणियों के लिए जो रात्रि है? उसमें संयमी पुरुष जागता है और जहाँ सब प्राणी जागते हैं? वह (तत्त्व को) देखने वाले मुनि के लिए रात्रि है।।



श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।

निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति।।2.71।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।2.71।।क्योंकि ऐसा है इसलिये

जो संन्यासी पुरुष सम्पूर्ण कामनाओंको और भोगोंको अशेषतः त्यागकर अर्थात् केवल जीवनमात्रके निमित्त ही चेष्टा करनेवाला होकर विचरता है।
तथा जो स्पृहासे रहित हुआ है अर्थात् शरीरजीवनमात्रमें भी जिसकी लालसा नहीं है।
ममतासे रहित है अर्थात् शरीरजीवनमात्रके लिये आवश्यक पदार्थोंके संग्रहमें भी यह मेरा है ऐसे भावसे रहित है।
तथा अहंकारसे रहित है अर्थात् विद्वत्ता आदिके सम्बन्धसे होनेवाले आत्माभिमानसे भी रहित है।
वह ऐसा स्थितप्रज्ञ ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी संसारके सर्वदुःखोंकी निवृत्तिरूप मोक्ष नामक परम शान्तिको पाता है अर्थात् ब्रह्मरूप हो जाता है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।2.71।।

 विहाय  परित्यज्य  कामान् यः  संन्यासी  पुमान् सर्वान्  अशेषतः कात्स्न्र्येन  चरति  जीवनमात्रचेष्टाशेषः पर्यटतीत्यर्थः।  निःस्पृहः  शरीरजीवनमात्रेऽपि निर्गता स्पृहा यस्य सः निःस्पृहः सन्  निर्ममः  शरीरजीवनमात्राक्षिप्तपरिग्रहेऽपि ममेदम् इत्यभिनिवेशवर्जितः  निरहंकारः  विद्यावत्त्वादिनिमित्तात्मसंभावनारहितः इत्येतत्।  सः  एवंभूतः स्थितप्रज्ञः ब्रह्मवित्  शान्तिं  सर्वसंसारदुःखोपरमलक्षणां निर्वाणाख्याम्  अधिगच्छति  प्राप्नोति ब्रह्मभूतो भवति इत्यर्थः।।
सैषा ज्ञाननिष्ठा स्तूयते।।

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।2.71।। जो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके स्पृहारहित, ममतारहित और अहंकाररहित होकर आचरण करता है, वह शान्तिको प्राप्त होता है।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।2.71।। जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर स्पृहारहित? ममभाव रहित और निरहंकार हुआ विचरण करता है? वह शान्ति प्राप्त करता है।

श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

श्री भगवानुवाच

लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।

ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्।।3.3।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।3.3।।प्रश्नके अनुसार ही उत्तर देते हुए श्रीभगवान् बोले हे निष्पाप अर्जुन इस मनुष्यलोकमें शास्त्रोक्त कर्म और ज्ञानके जो अधिकारी हैं ऐसे तीनों वर्णवालोंके लिये ( अर्थात् ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्योंके लिये ) दो प्रकारकी निष्ठास्थिति अर्थात् कर्तव्य तत्परता पहलेसृष्टिके आदिकालमें प्रजाको रचकर उनकी लौकिक उन्नति और मोक्षकी प्राप्तिके साधनरूप वैदिक सम्प्रदायको आविष्कार करनेवाले मुझ सर्वज्ञ ईश्वरद्वारा कही गयी हैं। वह दो प्रकारकी निष्ठा कौनसी हैं सो कहते हैं जो आत्मअनात्मके विषयमें विवेकजन्य ज्ञानसे सम्पन्न हैं जिन्होंने ब्रह्मचर्यआश्रमसे ही संन्यास ग्रहण कर लिया है जिन्होंने वेदान्तके विज्ञानद्वारा आत्मतत्त्वका भलीभाँति निश्चय कर लिया है जो परमहंस संन्यासी हैं जो निरन्तर ब्रह्ममें स्थित हैं ऐसे सांख्ययोगियोंकी निष्ठा ज्ञानरूप योगसे कही है। तथा कर्मयोगसे कर्मयोगियोंकी अर्थात् कर्म करनेवालोंकी निष्ठा कही है। यदि एक पुरुषद्वारा एक ही प्रयोजनकी सिद्धिके लिये ज्ञान और कर्म दोनों एक साथ अनुष्ठान करने योग्य हैं ऐसा अपना अभिप्राय भगवान्द्वारा गीतामें पहले कहीं कहा गया होता या आगे कहा जानेवाला होता अथवा वेदमें कहा गया होता तो शरणमें आये हुए प्रिय अर्जुनको यहाँ भगवान् यह कैसे कहते कि ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठा अलगअलग भिन्नभिन्न अधिकारियोंद्वारा ही अनुष्ठान की जानेयोग्य हैं। यदि भगावन्का यह अभिप्राय मान लिया जाय कि ज्ञान और कर्म दोनोंको सुनकर अर्जुन स्वयं ही दोनोंका अनुष्ठान कर लेगा दोनोंको भिन्न भिन्न पुरुषोंद्वारा अनुष्ठान करनेयोग्य तो दूसरोंके लिये कहूँगा। तब तो भगवान्को रागद्वेषयुक्त और अप्रामाणिक मानना हुआ। ऐसा मानना सर्वथा अनुचित है। इसलिये किसी भी युक्तिसे ज्ञान और कर्मका समुच्चय नहीं माना जा सकता। कर्मोंकी अपेक्षा ज्ञानकी श्रेष्ठता जो अर्जुनने कही थी वह तो सिद्ध है ही क्योंकि भगवान्ने उसका निराकरण नहीं किया। उस ज्ञाननिष्ठाके अनुष्ठानका अधिकार संन्यासियोंका ही है क्योंकि दोनों निष्ठा भिन्नभिन्न पुरुषोंद्वारा अनुष्ठान करनेयोग्य बतलायी गयी हैं। इस कारण भगवान्की यही सम्मति है। यह प्रतीत होता है। बन्धनके हेतुरूप कर्मोंमें ही भगवान् मुझे लगाते हैं ऐसा समझकर व्यथितचित्त हुए और मैं कर्म नहींकरूँगा ऐसा माननेवाले अर्जुनको देखकर भगवान् बोले न कर्मणामनारम्भात् इति। अथवा ज्ञाननिष्ठाका और कर्मनिष्ठाका परस्पर विरोध होनेके कारण एक पुरुषद्वारा एक कालमें दोनोंका अनुष्ठान नहीं किया जा सकता। इससे एक दूसरेकी अपेक्षा न रखकर दोनों अलगअलग मोक्षमें हेतु हैं ऐसा शंका होनेपर

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।3.3।। लोके अस्मिन् शास्त्रार्थानुष्ठानाधिकृतानां त्रैवर्णिकानां द्विविधा द्विप्रकारा निष्ठा स्थितिः अनुष्ठेयतात्पर्यं पुरा पूर्वं सर्गादौ प्रजाः सृष्ट्वा तासाम् अभ्युदयनिःश्रेयसप्राप्तिसाधनं वेदार्थसंप्रदायमाविष्कुर्वता प्रोक्ता मया सर्वज्ञेन ईश्वरेण हे अनघ अपाप। तत्र का सा द्विविधा निष्ठा इत्याह तत्र ज्ञानयोगेन ज्ञानमेव योगः तेन सांख्यानाम् अत्मानात्मविषयविवेकविज्ञानवतां ब्रह्मचर्याश्रमादेव कृतसंन्यासानां वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थानां परमहंसपरिव्राजकानां ब्रह्मण्येव अवस्थितानां निष्ठा प्रोक्ता। कर्मयोगेन कर्मैव योगः कर्मयोगः तेन कर्मयोगेन योगिनां कर्मिणां निष्ठा प्रोक्ता इत्यर्थः। यदि च एकेन पुरुषेण एकस्मै पुरुषार्थाय ज्ञानं कर्म च समुच्चित्य अनुष्ठेयं भगवता इष्टम् उक्तं वक्ष्यमाणं वा गीतासु वेदेषु चोक्तम् कथमिह अर्जुनाय उपसन्नाय प्रियाय विशिष्टभिन्नपुरुषकर्तृके एव ज्ञानकर्मनिष्ठे ब्रूयात् यदि पुनः अर्जुनः ज्ञानं कर्म च द्वयं श्रुत्वा स्वयमेवानुष्ठास्यति अन्येषां तु भिन्नपुरुषानुष्ठेयतां वक्ष्यामि इति मतं भगवतः कल्प्येत तदा रागद्वेषवान् अप्रमाणभूतो भगवान् कल्पितः स्यात्। तच्चायुक्तम्। तस्मात् कयापि युक्त्या न समुच्चयो ज्ञानकर्मणोः।।यत् अर्जुनेन उक्तं कर्मणो ज्यायस्त्वं बुद्धेः तच्च स्थितम् अनिराकरणात्। तस्याश्च ज्ञाननिष्ठायाः संन्यासिनामेवानुष्ठेयत्वम् भिन्नपुरुषानुष्ठेयत्ववचनात्। भगवतः एवमेव अनुमतमिति गम्यते।।मां च बन्धकारणे कर्मण्येव नियोजयसि इति विषण्णमनसमर्जुनम् कर्म नारभे इत्येवं मन्वानमालक्ष्य आह भगवान् न कर्मणामनारम्भात् इति। अथवा ज्ञानकर्मनिष्ठयोः परस्परविरोधात् एकेन पुरुषेण युगपत् अनुष्ठातुमशक्यत्वे सति इतरेतरानपेक्षयोरेव पुरुषार्थहेतुत्वे प्राप्ते कर्मनिष्ठाया ज्ञाननिष्ठाप्राप्तिहेतुत्वेन पुरुषार्थहेतुत्वम् न स्वातन्त्र्येण ज्ञाननिष्ठा तु कर्मनिष्ठोपायलब्धात्मिका सती स्वातन्त्र्येण पुरुषार्थहेतुः अन्यानपेक्षा इत्येतमर्थं प्रदर्शयिष्यन् आह भगवान्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।3.3।। श्रीभगवान् बोले - हे निष्पाप अर्जुन! इस मनुष्यलोकमें दो प्रकारसे होनेवाली निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है। उनमें ज्ञानियोंकी निष्ठा ज्ञानयोगसे और योगियोंकी निष्ठा कर्मयोगसे होती है।

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।3.3।। श्री भगवान् ने कहा हे निष्पाप (अनघ) अर्जुन इस श्लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है ज्ञानियों की (सांख्यानां) ज्ञानयोग से और योगियों की कर्मयोग से।।





श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

न हि कश्िचत्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।

कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।।3.5।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।3.5।।बिना ज्ञानके केवल कर्मसंन्यासमात्रसे मनुष्य निष्कर्मतारूप सिद्धिको क्यों नहीं पाता इसका कारण जाननेकी इच्छा होनेपर कहते हैं कोई भी मनुष्य कभी क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रहता क्योंकि सभी प्राणी प्रकृतिसे उत्पन्न सत्त्व रज और तमइन तीन गुणोंद्वारा परवश हुए अवश्य ही कर्मोंमें प्रवृत्त कर दिये जाते हैं। यहाँ सभी प्राणीके साथ अज्ञानी ( शब्द ) और जोड़ना चाहिये ( अर्थात् सभी अज्ञानी प्राणी ऐसे पढ़ना चाहिये ) क्योंकि आगे जो गुणोंसे विचलित नहीं किया जा सकता इस कथनसे ज्ञानियोंको अलग किया है अतः अज्ञानियोंके लिये ही कर्मयोग है ज्ञानियोंके लिये नहीं। क्योंकि जो गुणोंद्वारा विचलित नहीं किये जा सकते उन ज्ञानियोंमें स्वतः क्रियाका अभाव होनेसे उनके लिये कर्मयोग सम्भव नहीं है। ऐसे ही वेदाविनाशिनम् इस श्लोककी व्याख्यामें विस्तारपूर्वक कहा गया है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।3.5।। न हि यस्मात् क्षणमपि कालं जातु कदाचित् कश्चित् तिष्ठति अकर्मकृत् सन्। कस्मात् कार्यते प्रवर्त्यते हि यस्मात् अवश एव अस्वतन्त्र एव कर्म सर्वः प्राणी प्रकृतिजैः प्रकृतितो जातैः सत्त्वरजस्तमोभिः गुणैः। अज्ञ इति वाक्यशेषः यतो वक्ष्यतिगुणैर्यो न विचाल्यते इति। सांख्यानां पृथक्करणात् अज्ञानामेव हि कर्मयोगः न ज्ञानिनाम्। ज्ञानिनां तु गुणैरचाल्यमानानां स्वतश्चलनाभावात् कर्मयोगो नोपपद्यते। तथा च व्याख्यातम् वेदाविनाशिनम् इत्यत्र।।यत्त्वनात्मज्ञः चोदितं कर्म नारभते इति तदसदेवेत्याह

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।3.5।। कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता; क्योंकि (प्रकृतिके) परवश हुए सब प्राणियोंसे प्रकृतिजन्य गुण कर्म कराते हैं।

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।3.5।। कोई भी पुरुष कभी क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता क्योंकि प्रकृति से उत्पन्न गुणों के द्वारा अवश हुए सब (पुरुषों) से कर्म करवा लिया जाता है।।




श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।

इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते।।3.6।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।3.6।।जो आत्मज्ञानी न होनेपर भी शास्त्रविहित कर्म नहीं करता उसका वह कर्म न करना बुरा है यह कहते हैं जो मनुष्य हाथ पैर आदि कर्मेन्द्रियोंको रोककर इन्द्रियोंके भोगोंको मनसे चिन्तन करता रहता है वह विमूढात्मा अर्थात् मोहित अन्तःकरणवाला मिथ्याचारी ढोंगी पापाचारी कहा जाता है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।3.6।। कर्मेन्द्रियाणि हस्तादीनि संयम्य संहृत्य यः आस्ते तिष्ठति मनसा स्मरन् चिन्तयन् इन्द्रियार्थान् विषयान् विमूढात्मा विमूढान्तःकरणः मिथ्याचारो मृषाचारः पापाचारः सः उच्यते।।

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।3.6।। जो कर्मेन्द्रियों- (सम्पूर्ण इन्द्रियों-) को हठपूर्वक रोककर मनसे इन्द्रियोंके विषयोंका चिन्तन करता रहता है, वह मूढ़ बुद्धिवाला मनुष्य मिथ्याचारी (मिथ्या आचरण करनेवाला) कहा जाता है।

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।3.6।। जो मूढ बुद्धि पुरुष कर्मेन्द्रियों का निग्रह कर इन्द्रियों के भोगों का मन से स्मरण (चिन्तन) करता रहता है वह मिथ्याचारी (दम्भी) कहा जाता है।।

मूल श्लोकः

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।

परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ।।3.11।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।3.11।।कैसे तुमलोग इस यज्ञद्वारा इन्द्रादि देवोंको बढ़ाओ अर्थात् उनकी उन्नति करो। वे देव वृष्टि आदिद्वारा तुमलोगोंको बढ़ावें अर्थात् उन्नत करें। इस प्रकार एक दूसरेको उन्नत करते हुए ( तुमलोग ) ज्ञानप्राप्तिद्वारा मोक्षरूप परमश्रेयको प्राप्त करोगे। अथवा स्वर्गरूप परमश्रेयको ही प्राप्त करोगे।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।3.11।। देवान् इन्द्रादीन् भावयत वर्धयत अनेन यज्ञेन। ते देवा भावयन्तु आप्याययन्तु वृष्ट्यादिना वः युष्मान्। एवं परस्परम् अन्योन्यं भावयन्तः श्रेयः परं मोक्षलक्षणं ज्ञानप्राप्तिक्रमेण अवाप्स्यथ। स्वर्गं वा परं श्रेयः अवाप्स्यथ।।किञ्च

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas



।।3.10 -- 3.11।। प्रजापति ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिकालमें कर्तव्य-कर्मोंके विधानसहित प्रजा-(मनुष्य आदि-) की रचना करके (उनसे, प्रधानतया मनुष्योंसे) कहा कि तुमलोग इस कर्तव्यके द्वारा सबकी वृद्धि करो और वह कर्तव्य-कर्म-रूप यज्ञ तुमलोगोंको कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री प्रदान करनेवाला हो। अपने कर्तव्य-कर्मके द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवतालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें। इस प्रकार एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।3.11।। तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं की उन्नति करो और वे देवतागण तुम्हारी उन्नति करें। इस प्रकार परस्पर उन्नति करते हुये परम श्रेय को तुम प्राप्त होगे।।




श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।3.21।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।3.21।।लोकसंग्रह किसको करना चाहिये और किसलिये करना चाहिये सो कहते हैं श्रेष्ठ पुरुष जोजो कर्म करता है अर्थात् प्रधान मनुष्य जिसजिस कर्ममें बर्तता है दूसरे लोग उसके अनुयायी होकर उसउस कर्मका ही आचरण किया करते हैं। तथा वह श्रेष्ठ पुरुष जिसजिस लौकिक या वैदिक प्रथाको प्रामाणिक मानता है लोग उसीके अनुसार चलते हैं अर्थात् उसीको प्रमाण मानते हैं।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।3.21।। यद्यत् कर्म आचरति करोति श्रेष्ठः प्रधानः तत्तदेव कर्म आचरति इतरः अन्यः जनः तदनुगतः। किञ्च सः श्रेष्ठः यत् प्रमाणं कुरुते लौकिकं वैदिकं वा लोकः तत् अनुवर्तते तदेव प्रमाणीकरोति इत्यर्थः।।यदि अत्र ते लोकसंग्रहकर्तव्यतायां विप्रतिपत्तिः तर्हि मां किं न पश्यसि

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।3.21।। श्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण  देता है,  दूसरे मनुष्य उसीके अनुसार आचरण करते हैं।

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।3.21।। श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही अनुकरण करते हैं; वह पुरुष जो कुछ प्रमाण कर देता है, लोग भी उसका अनुसरण करते हैं।।
 

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।

अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते।।3.27।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।3.27।।मूर्ख अज्ञानी मनुष्य कर्मोंमें किस प्रकार आसक्त होता है सो कहते हैं सत्त्व रजस् और तमस् इन तीनों गुणोंकी जो साम्यावस्था है उसका नाम प्रधान या प्रकृति है उस प्रकृतिके गुणोंसे अर्थात् कार्य और करणरूप समस्त विकारोंसे लौकिक और शास्त्रीय सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे किये जाते हैं। परंतु अहंकारविमूढात्मा कार्य और करणके संघातरूप शरीरमें आत्मभावकी प्रतीतिका नाम अहंकार है उस अहंकारसे जिसका अन्तःकरण अनेक प्रकारसे मोहित हो चुका है ऐसा देहेन्द्रियके धर्मको अपना धर्म माननेवाला देहाभिमानी पुरुष अविद्यावश प्रकृतिके कर्मोंको अपनेमें मानता हुआ उनउन कर्मोंका मैं कर्ता हूँ ऐसा मान बैठता है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।3.27।। प्रकृतेः प्रकृतिः प्रधानं सत्त्वरजस्तमसां गुणानां साम्यावस्था तस्याः प्रकृतेः गुणैः विकारैः कार्यकरणरूपैः क्रियमाणानि कर्माणिलौकिकानि शास्त्रीयाणि च सर्वशः सर्वप्रकारैः अहंकारविमूढात्मा कार्यकरणसंघातात्मप्रत्ययः अहंकारः तेन विविधं नानाविधं मूढः आत्मा अन्तःकरणं यस्य सः अयं कार्यकरणधर्मा कार्यकरणाभिमानी अविद्यया कर्माणि आत्मनि मन्यमानः तत्तत्कर्मणाम् अहं कर्ता इति मन्यते।।यः पुनर्विद्वान्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।3.27।। सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं; परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अज्ञानी मनुष्य 'मैं कर्ता हूँ' -- ऐसा मानता है।

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।3.27।। सम्पूर्ण कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं, अहंकार से मोहित हुआ पुरुष, "मैं कर्ता हूँ"  ऐसा मान लेता है।।
 



प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।

अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते।।3.27।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।3.27।।मूर्ख अज्ञानी मनुष्य कर्मोंमें किस प्रकार आसक्त होता है सो कहते हैं सत्त्व रजस् और तमस् इन तीनों गुणोंकी जो साम्यावस्था है उसका नाम प्रधान या प्रकृति है उस प्रकृतिके गुणोंसे अर्थात् कार्य और करणरूप समस्त विकारोंसे लौकिक और शास्त्रीय सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे किये जाते हैं। परंतु अहंकारविमूढात्मा कार्य और करणके संघातरूप शरीरमें आत्मभावकी प्रतीतिका नाम अहंकार है उस अहंकारसे जिसका अन्तःकरण अनेक प्रकारसे मोहित हो चुका है ऐसा देहेन्द्रियके धर्मको अपना धर्म माननेवाला देहाभिमानी पुरुष अविद्यावश प्रकृतिके कर्मोंको अपनेमें मानता हुआ उनउन कर्मोंका मैं कर्ता हूँ ऐसा मान बैठता है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।3.27।। प्रकृतेः प्रकृतिः प्रधानं सत्त्वरजस्तमसां गुणानां साम्यावस्था तस्याः प्रकृतेः गुणैः विकारैः कार्यकरणरूपैः क्रियमाणानि कर्माणिलौकिकानि शास्त्रीयाणि च सर्वशः सर्वप्रकारैः अहंकारविमूढात्मा कार्यकरणसंघातात्मप्रत्ययः अहंकारः तेन विविधं नानाविधं मूढः आत्मा अन्तःकरणं यस्य सः अयं कार्यकरणधर्मा कार्यकरणाभिमानी अविद्यया कर्माणि आत्मनि मन्यमानः तत्तत्कर्मणाम् अहं कर्ता इति मन्यते।।यः पुनर्विद्वान्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।3.27।। सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं; परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अज्ञानी मनुष्य 'मैं कर्ता हूँ' -- ऐसा मानता है।

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।3.27।। सम्पूर्ण कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं, अहंकार से मोहित हुआ पुरुष,  "मैं कर्ता हूँ"  ऐसा मान लेता है।।
 

श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

श्री भगवानुवाच

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।

महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।।3.37।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।3.37।।यह काम जो सब लोगोंका शत्रु है जिसके निमित्तसे जीवोंको सब अनर्थोंकी प्राप्ति होती है वहीं यह काम किसी कारणसे बाधित होनेपर क्रोधके रूपमें बदल जाता है इसलिये क्रोध भी यही है। यह काम रजोगुणसे उत्पन्न हुआ है अथवा यों समझो कि रजोगुणका उत्पादक है क्योंकि उत्पन्न हुआ काम ही रजोगुणको प्रकट करके पुरुषको कर्ममें लगाया करता है। तथा रजोगुणके कार्य सेवा आदिमें लगे हुए दुःखित मनुष्योंका ही यह प्रलाप सुना जाता है कि तृष्णा ही हमसे अमुक काम करवाती है इत्यादि। तथा यह काम बहुत खानेवाला है। इसलिये महापापी भी है क्योंकि कामसे ही प्रेरित हुआ जीव पाप किया करता है। इसलिये इस कामको ही तू इस संसारमें वैरी जान।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।3.37।। ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः। वैराग्यस्याथ मोक्षस्य षण्णां भग इतीरणा (विष्णु पु0 6।5।74) ऐश्वर्यादिषट्कं यस्मिन् वासुदेवे नित्यमप्रतिबद्धत्वेन सामस्त्येन च वर्तते उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम्। वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति (विष्णु प0 6।5।78) उत्पत्त्यादिविषयं च विज्ञानं यस्य स वासुदेवः वाच्यः भगवान् इति।।काम एषः सर्वलोकशत्रुः यन्निमित्ता सर्वानर्थप्राप्तिः प्राणिनाम्। स एष कामः प्रतिहतः केनचित् क्रोधत्वेन परिणमते। अतः क्रोधः अपि एष एव रजोगुणसमुद्भवः रजश्च तत् गुणश्च रजोगुणः सः समुद्भवः यस्य सः कामः रजोगुणसमुद्भवः रजोगुणस्य वा समुद्भवः। कामो हि उद्भूतः रजः प्रवर्तयन् पुरुषं प्रवर्तयति तृष्णया हि अहं कारितः इति दुःखिनां रजःकार्ये सेवादौ प्रवृत्तानां प्रलापः श्रूयते। महाशनः महत् अशनं अस्येति महाशनः अत एव महापाप्मा कामेन हि प्रेरितः जन्तुः पापं करोति। अतः विद्धि एनं कामम् इह संसारे वैरिणम्।।कथं वैरी इति दृष्टान्तैः प्रत्याययति

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।3.37।। श्रीभगवान् बोले - रजोगुणसे उत्पन्न हुआ  यह काम ही क्रोध  है। यह बहुत खानेवाला और महापापी है। इस विषयमें तू इसको ही वैरी जान।

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।3.37।। श्रीभगवान् ने कहा -- रजोगुण में उत्पन्न हुई यह 'कामना' है,  यही क्रोध है; यह महाशना (जिसकी भूख बड़ी हो) और महापापी है, इसे ही तुम यहाँ (इस जगत् में) शत्रु जानो।।
 




श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च।

यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्।।3.38।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।3.38।।यह काम किस प्रकार वैरी है सो दृष्टान्तोंसे समझाते हैं जैसे प्रकाशस्वरूप अग्नि अपने साथ उत्पन्न हुए अन्धकाररूप धूएँसे और दर्पण जैसे मलसे आच्छादित हो जाता है तथा जैसे गर्भ अपने आवरणरूप जेरसे आच्छादित होता है वैसे ही उस कामसे यह ( ज्ञान ) ढका हुआ है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।3.38।। धूमेन सहजेन आव्रियते वह्निः प्रकाशात्मकः अप्रकाशात्मकेन यथा वा आदर्शो मलेन च यथा उल्बेन च जरायुणा गर्भवेष्टनेन आवृतः आच्छादितः गर्भः तथा तेन इदम् आवृतम्।।किं पुनस्तत् इदंशब्दवाच्यं यत् कामेनावृतमित्युच्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।3.38।। जैसे धुएँसे अग्नि और मैलसे दर्पण ढक जाता है तथा जैसे जेरसे गर्भ ढका रहता है, ऐसे ही उस कामके द्वारा यह ज्ञान ( विवेक) ढका हुआ है।

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।3.38।। जैसे धुयें से अग्नि और धूलि से दर्पण ढक जाता है तथा जैसे भ्रूण गर्भाशय से ढका रहता है, वैसे उस (काम) के द्वारा यह (ज्ञान) आवृत होता है।।
 



श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।

कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च।।3.39।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।3.39।।जिसका ( उपर्युक्त श्लोकमें ) इदम् शब्दसे संकेत किया गया है जो कामसे आच्छादित है वह कौन है सो कहा जाता है ज्ञानीके ( विवेकीके ) इस कामरूप नित्य वैरीसे ज्ञान ढका हुआ है। ज्ञानी ही पहलेसे जानता है कि इसके द्वारा मैं अनर्थोंमें नियुक्त किया गया हूँ। इससे वह सदा दुखी भी होता है। इसलिये यह ज्ञानीका ही नित्य वैरी है मूर्खका नहीं क्योंकि वह मूर्ख तो तृष्णाके समय उसको मित्रके समान समझता है। फिर जब उसका परिणामरूप दुःख प्राप्त होता है तब समझता है कि तृष्णाके द्वारा मैं दुखी किया गया हूँ पहले नहीं जानता इसलिये यह काम ज्ञानीका ही नित्य वैरी है। कैसे कामके द्वारा ( ज्ञान आच्छादित है इसपर कहते हैं ) कामना इच्छा ही जिसका स्वरूप है जो अति कष्टसे पूर्ण होता है तथा जो अनल है भोगोंसे कभी भी तृप्त नहीं होता ऐसे कामनारूप वैरीद्वारा (ज्ञान आच्छादित है )।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।3.39।। आवृतम् एतेन ज्ञानं ज्ञानिनः नित्यवैरिणा ज्ञानी हि जानाति अनेन अहमनर्थे प्रयुक्तः इति पूर्वमेव। दुःखी च भवति नित्यमेव। अतः असौ ज्ञानिनो नित्यवैरी न तु मूर्खस्य। स हि कामं तृष्णाकाले मित्रमिव पश्यन् तत्कार्ये दुःखे प्राप्ते जानाति तृष्णया अहं दुःखित्वमापादितः इति न पूर्वमेव। अतः ज्ञानिन एव नित्यवैरी। किंरूपेण कामरूपेण कामः इच्छैव रूपमस्य इति कामरूपः तेन दुष्पूरेण दुःखेन पूरणमस्य इति दुष्पूरः तेन अनलेन न अस्य अलं पर्याप्तिः विद्यते इत्यनलः तेन च।।किमधिष्ठानः पुनः कामः ज्ञानस्य आवरणत्वेन वैरी सर्वस्य लोकस्य इत्यपेक्षायामाह ज्ञाते हि शत्रोरधिष्ठाने सुखेन निबर्हणं कर्तुं शक्यत इति

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।3.39।। और हे कुन्तीनन्दन ! इस अग्निके समान कभी तृप्त न होनेवाले और विवेकियोंके नित्य वैरी इस कामके द्वारा मनुष्यका विवेक ढका हुआ है।

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।3.39।। हे कौन्तेय ! अग्नि के समान जिसको तृप्त करना कठिन है ऐसे कामरूप,  ज्ञानी के इस नित्य शत्रु द्वारा ज्ञान आवृत है।।
 


मूल श्लोकः

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।

एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्।।3.40।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।3.40।।ज्ञानको आच्छादित करनेवाला होनेके कारण जो सबका वैरी है वह काम कहाँ रहनेवाला है अर्थात् उसका आश्रय क्या है क्योंकि शत्रुके रहनेका स्थान जान लेनेपर सहजमें ही उसका नाश किया जा सकता है। इसपर कहते हैं इन्द्रियाँ मन और बुद्धि यह सब इस कामके अधिष्ठान अर्थात् रहनेके स्थान बतलाये जाते हैं। यह काम इन आश्रयभूत इन्द्रियादिके द्वारा ज्ञानको आच्छादित करके इस जीवात्माको नाना प्रकारसे मोहित किया करता है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।3.40।। इन्द्रियाणि मनः बुद्धिश्च अस्य कामस्य अधिष्ठानम् आश्रयः उच्यते। एतैः इन्द्रियादिभिः आश्रयैः विमोहयति विविधं मोहयतिएष कामः ज्ञानम् आवृत्य आच्छाद्य देहिनं शरीरिणम्।।यतः एवम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।3.40।। इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इस कामके वास-स्थान कहे गये हैं। यह काम इन- (इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि-) के द्वारा ज्ञानको ढककर देहाभिमानी मनुष्यको मोहित करता है।

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।3.40।। इन्द्रियाँ,  मन और बुद्धि इसके निवास स्थान कहे जाते हैं;  यह काम इनके द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके देही पुरुष को मोहित करता है।।
 

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।

पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्।।3.41।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।3.41।।जब कि ऐसा है इसलिये हे भरतर्षभ तू पहले इन्द्रियोंको वशमें करके ज्ञान और विज्ञानके नाशक इस ऊपर बतलाये हुए वैरी पापाचारी कामका परित्याग कर। अभिप्राय यह कि शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे जो आत्माअनात्मा और विद्याअविद्या आदि पदार्थोंका बोध होता है उसका नाम ज्ञान है एवं उसका जो विशेषरूपसे अनुभव है उसका नाम विज्ञान है अपने कल्याणकी प्राप्तिके कारणरूप उन ज्ञान और विज्ञानको यह काम नष्ट करनेवाला है इसलिये इसका परित्याग कर।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।3.41।। तस्मात् त्वम् इन्द्रियाणि आदौ पूर्वमेव नियम्य वशीकृत्य भरतर्षभ पाप्मानं पापाचारं कामं प्रजहिहि परित्यज एनं प्रकृतं वैरिणं ज्ञानविज्ञाननाशनं ज्ञानं शास्त्रतः आचार्यतश्च आत्मादीनाम् अवबोधः विज्ञानं विशेषतः तदनुभवः तयोः ज्ञानविज्ञानयोः श्रेयःप्राप्तिहेत्वोः नाशनं नाशकरं प्रजहिहि आत्मनः परित्यजेत्यर्थः।।इन्द्रियाण्यादौ नियम्य कामं शत्रुं जहिहि इत्युक्तम् तत्र किमाश्रयः कामं जह्यात् इत्युच्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।3.41।। इसलिये हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! तू सबसे पहले इन्द्रियोंको वशमें करके इस ज्ञान और विज्ञानका नाश करनेवाले महान् पापी कामको अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल।

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।3.41।। इसलिये, हे अर्जुन ! तुम पहले इन्द्रियों को वश में करके, ज्ञान और विज्ञान के नाशक इस कामरूप पापी को नष्ट करो।।
 


तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।

पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्।।3.41।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।3.41।।जब कि ऐसा है इसलिये हे भरतर्षभ तू पहले इन्द्रियोंको वशमें करके ज्ञान और विज्ञानके नाशक इस ऊपर बतलाये हुए वैरी पापाचारी कामका परित्याग कर। अभिप्राय यह कि शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे जो आत्माअनात्मा और विद्याअविद्या आदि पदार्थोंका बोध होता है उसका नाम ज्ञान है एवं उसका जो विशेषरूपसे अनुभव है उसका नाम विज्ञान है अपने कल्याणकी प्राप्तिके कारणरूप उन ज्ञान और विज्ञानको यह काम नष्ट करनेवाला है इसलिये इसका परित्याग कर।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।3.41।। तस्मात् त्वम् इन्द्रियाणि आदौ पूर्वमेव नियम्य वशीकृत्य भरतर्षभ पाप्मानं पापाचारं कामं प्रजहिहि परित्यज एनं प्रकृतं वैरिणं ज्ञानविज्ञाननाशनं ज्ञानं शास्त्रतः आचार्यतश्च आत्मादीनाम् अवबोधः विज्ञानं विशेषतः तदनुभवः तयोः ज्ञानविज्ञानयोः श्रेयःप्राप्तिहेत्वोः नाशनं नाशकरं प्रजहिहि आत्मनः परित्यजेत्यर्थः।।इन्द्रियाण्यादौ नियम्य कामं शत्रुं जहिहि इत्युक्तम् तत्र किमाश्रयः कामं जह्यात् इत्युच्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।3.41।। इसलिये हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! तू सबसे पहले इन्द्रियोंको वशमें करके इस ज्ञान और विज्ञानका नाश करनेवाले महान् पापी कामको अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल।

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।3.41।। इसलिये, हे अर्जुन ! तुम पहले इन्द्रियों को वश में करके, ज्ञान और विज्ञान के नाशक इस कामरूप पापी को नष्ट करो।।
 

एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।

जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।3.43।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।3.43।।इस प्रकार बुद्धिसे अति श्रेष्ठ आत्माको जानकर और आत्मासे ही आत्माको स्तम्भन करके अर्थात् शुद्ध मनसे अच्छी प्रकार आत्माको समाधिस्थ करके हे महाबाहो इस कामरूप दुर्जय शत्रुका त्याग कर अर्थात् जो दुःखसे वशमें किया जाता है उस अनेक दुर्विज्ञेय विशेषणोंसे युक्त कामका त्याग कर दे।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।3.43।। एवं बुद्धेः परम् आत्मानं बुद्ध्वा ज्ञात्वा संस्तभ्य सम्यक् स्तम्भनं कृत्वा आत्मानं स्वेनैव आत्मना संस्कृतेन मनसा सम्यक् समाधायेत्यर्थः। जहि एनं शत्रुं हे महाबाहो कामरूपं दुरासदं दुःखेन आसदः आसादनं प्राप्तिः यस्य तं दुरासदं दुर्विज्ञेयानेकविशेषमिति।।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्यश्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ श्रीमद्भगवद्गीताभाष्येतृतीयोऽध्यायः।।

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।3.42 -- 3.43।। इन्द्रियोंको (स्थूलशरीरसे) पर (श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक तथा सूक्ष्म) कहते हैं। इन्द्रियोंसे पर मन है, मनसे भी पर बुद्धि है औऱ जो बुद्धिसे भी पर है वह (काम) है। इस तरह बुद्धिसे पर - (काम-) को जानकर अपने द्वारा अपने-आपको वशमें करके हे महाबाहो ! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रुको मार डाल।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।3.43।। इस प्रकार बुद्धि से परे (शुद्ध) आत्मा को जानकर आत्मा (बुद्धि) के द्वारा आत्मा (मन) को वश में करके, हे महाबाहो ! तुम इस दुर्जेय (दुरासदम्) कामरूप शत्रु को मारो।।
 

एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।

जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।3.43।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।3.43।।इस प्रकार बुद्धिसे अति श्रेष्ठ आत्माको जानकर और आत्मासे ही आत्माको स्तम्भन करके अर्थात् शुद्ध मनसे अच्छी प्रकार आत्माको समाधिस्थ करके हे महाबाहो इस कामरूप दुर्जय शत्रुका त्याग कर अर्थात् जो दुःखसे वशमें किया जाता है उस अनेक दुर्विज्ञेय विशेषणोंसे युक्त कामका त्याग कर दे।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।3.43।। एवं बुद्धेः परम् आत्मानं बुद्ध्वा ज्ञात्वा संस्तभ्य सम्यक् स्तम्भनं कृत्वा आत्मानं स्वेनैव आत्मना संस्कृतेन मनसा सम्यक् समाधायेत्यर्थः। जहि एनं शत्रुं हे महाबाहो कामरूपं दुरासदं दुःखेन आसदः आसादनं प्राप्तिः यस्य तं दुरासदं दुर्विज्ञेयानेकविशेषमिति।।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्यश्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ श्रीमद्भगवद्गीताभाष्येतृतीयोऽध्यायः।।

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।3.42 -- 3.43।। इन्द्रियोंको (स्थूलशरीरसे) पर (श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक तथा सूक्ष्म) कहते हैं। इन्द्रियोंसे पर मन है, मनसे भी पर बुद्धि है औऱ जो बुद्धिसे भी पर है वह (काम) है। इस तरह बुद्धिसे पर - (काम-) को जानकर अपने द्वारा अपने-आपको वशमें करके हे महाबाहो ! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रुको मार डाल।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।3.43।। इस प्रकार बुद्धि से परे (शुद्ध) आत्मा को जानकर आत्मा (बुद्धि) के द्वारा आत्मा (मन) को वश में करके, हे महाबाहो ! तुम इस दुर्जेय (दुरासदम्) कामरूप शत्रु को मारो।।
 

एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।

जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।3.43।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।3.43।।इस प्रकार बुद्धिसे अति श्रेष्ठ आत्माको जानकर और आत्मासे ही आत्माको स्तम्भन करके अर्थात् शुद्ध मनसे अच्छी प्रकार आत्माको समाधिस्थ करके हे महाबाहो इस कामरूप दुर्जय शत्रुका त्याग कर अर्थात् जो दुःखसे वशमें किया जाता है उस अनेक दुर्विज्ञेय विशेषणोंसे युक्त कामका त्याग कर दे।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।3.43।। एवं बुद्धेः परम् आत्मानं बुद्ध्वा ज्ञात्वा संस्तभ्य सम्यक् स्तम्भनं कृत्वा आत्मानं स्वेनैव आत्मना संस्कृतेन मनसा सम्यक् समाधायेत्यर्थः। जहि एनं शत्रुं हे महाबाहो कामरूपं दुरासदं दुःखेन आसदः आसादनं प्राप्तिः यस्य तं दुरासदं दुर्विज्ञेयानेकविशेषमिति।।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्यश्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ श्रीमद्भगवद्गीताभाष्येतृतीयोऽध्यायः।।

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।3.42 -- 3.43।। इन्द्रियोंको (स्थूलशरीरसे) पर (श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक तथा सूक्ष्म) कहते हैं। इन्द्रियोंसे पर मन है, मनसे भी पर बुद्धि है औऱ जो बुद्धिसे भी पर है वह (काम) है। इस तरह बुद्धिसे पर - (काम-) को जानकर अपने द्वारा अपने-आपको वशमें करके हे महाबाहो ! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रुको मार डाल।
 

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।3.43।। इस प्रकार बुद्धि से परे (शुद्ध) आत्मा को जानकर आत्मा (बुद्धि) के द्वारा आत्मा (मन) को वश में करके, हे महाबाहो ! तुम इस दुर्जेय (दुरासदम्) कामरूप शत्रु को मारो।।
 

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।

नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतो़ऽन्यः कुरुसत्तम।।4.31।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।4.31।।इस प्रकार उपर्युक्त यज्ञोंका सम्पादन करके यज्ञोंके शेषका नाम यज्ञशिष्ट है वही अमृत है उसको जो भोगते हैं वे यज्ञशिष्ट अमृतभोजी हैं। उपर्युक्त यज्ञोंको करके उससे बचे हुए समयद्वारा यथाविधि प्राप्त अमृतरूप विहित अन्नको भक्षण करनेवाले यज्ञशिष्ट अमृतभोजी पुरुष सनातन यानी चिरन्तन ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। यहाँ यान्ति इस गतिविषयक शब्दकी शक्तिसे यह पाया जाता है कि यदि यज्ञ करनेवाले मुमुक्षु होते हैं तो कालातिक्रमकी अपेक्षासे ( मरनेके बाद कितने ही कालतक ब्रह्मलोकमें रहकर फिर प्रलयके समय ) ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। हे कुरुश्रेष्ठ जो मनुष्य उपर्युक्त यज्ञोंमेंसे एक भी यज्ञ नहीं करता उस यज्ञरहित पुरुषको सब प्राणियोंके लिये जो साधारण है ऐसा यह लोक भी नहीं मिलता फिर विशेष साधनोंद्वारा प्राप्त होनेवाला अन्य लोक तो मिल ही कैसे सकता है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।4.31।। यज्ञशिष्टामृतभुजः यज्ञानां शिष्टं यज्ञशिष्टं यज्ञशिष्टं च तत् अमृतं च यज्ञशिष्टामृतं तत् भुञ्जते इति यज्ञशिष्टामृतभुजः। यथोक्तान् यज्ञान् कृत्वा तच्छिष्टेन कालेन यथाविधिचोदितम् अन्नम् अमृताख्यं भुञ्जते इति यज्ञशिष्टामृतभुजः यान्ति गच्छन्ति ब्रह्म सनातनं चिरन्तनं मुमुक्षवश्चेत् कालातिक्रमापेक्षया इति सामर्थ्यात् गम्यते। न अयं लोकः सर्वप्राणिसाधारणोऽपि अस्ति यथोक्तानां यज्ञानां एकोऽपि यज्ञः यस्य नास्ति सः अयज्ञः तस्य। कुतः अन्यो विशिष्टसाधनसाध्यः कुरुसत्तम।।

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।4.31।। हे कुरुवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! यज्ञसे बचे हुए अमृतका अनुभव करनेवाले सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करनेवाले मनुष्यके लिये यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक होगा?

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।4.31।। हे कुरुश्रेष्ठ ! यज्ञ के अवशिष्ट अमृत को भोगने वाले पुरुष सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञ रहित पुरुष को यह लोक भी नहीं मिलता,  फिर परलोक कैसे मिलेगा?
 

मूल श्लोकः

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप।

सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।।4.33।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।4.33।।ब्रह्मार्पणम् इत्यादि श्लोकद्वारा यथार्थ ज्ञानको यज्ञरूपसे सम्पादन किया फिर बहुतसे यज्ञोंका वर्णन किया। अब पुरुषका इच्छित प्रयोजन जिन यज्ञोंसे सिद्ध होता है उन उपर्युक्त अन्य यज्ञोंकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञकी स्तुति करते हैं। कैसे सो कहते हैं हे परन्तप द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा अर्थात् द्रव्यरूप साधनद्वारा सिद्ध होनेवाले यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठतर है। क्योंकि द्रव्यमय यज्ञ फलका आरम्भ करनेवाला है और ज्ञानयज्ञ ( जन्मादि ) फल देनेवाला नहीं है। इसलिये वह श्रेष्ठतर अर्थात् अधिक प्रशंसनीय है। क्योंकि हे पार्थ सबकेसब कर्म मोक्षसाधनरूप ज्ञानमें जो कि सब ओरसे परिपूर्ण जलाशयके समान है समाप्त हो जाते हैं अर्थात् उन सबका ज्ञानमें अन्तर्भाव हो जाता है। जैसे ( चौपड़के खेलमें कृतयुग त्रेता द्वापर और कलियुग ऐसे नामवाले जो चार पासे होते हैं उनमेंसे ) कृतयुग नामक पासेको जीत लेनेपर नीचेवाले सब पासे अपनेआप ही जीत लिये जाते हैं ऐसे ही जिसको वह रैक्व जानता है उस ब्रह्मको जो कोई भी जान लेता है प्रजा जो कुछ भी अच्छे कर्म करती है उन सबका फल उसे अपनेआप ही मिल जाता है। इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।4.33।। श्रेयान् द्रव्यमयात् द्रव्यसाधनसाध्यात् यज्ञात् ज्ञानयज्ञः हे परंतप। द्रव्यमयो हि यज्ञः फलस्यारम्भकः ज्ञानयज्ञः न फलारम्भकः अतः श्रेयान् प्रशस्यतरः। कथम् यतः सर्वं कर्म समस्तम् अखिलम् अप्रतिबद्धं पार्थ ज्ञाने मोक्षसाधने सर्वतःसंप्लुतोदकस्थानीये परिसमाप्यते अन्तर्भवतीत्यर्थः यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं सर्वं तदभिसमेति यत् किञ्चित्प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद (छा0 उ0 4.1.4) इति श्रुतेः।।तदेतत् विशिष्टं ज्ञानं तर्हि केन प्राप्यते इत्युच्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।4.33।। हे परन्तप अर्जुन ! द्रव्यमय यज्ञसे ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। सम्पूर्ण कर्म और पदार्थ ज्ञान-(तत्त्वज्ञान-) में समाप्त हो जाते हैं।

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।4.33।। हे परन्तप ! द्रव्यों से सम्पन्न होने वाले यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ ! सम्पूर्ण अखिल कर्म ज्ञान में समाप्त होते हैं,  अर्थात् ज्ञान उनकी पराकाष्ठा है।।
 





श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।

ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।।4.37।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।4.37।।ज्ञान पापको किस प्रकार नष्ट कर देता है सो दृष्टान्तसहित कहते हैं हे अर्जुन जैसे अच्छी प्रकारसे प्रदीप्त यानी प्रज्वलित हुआ अग्नि ईंधनको अर्थात् काष्ठके समूहको भस्मरूप कर देता है वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सब कर्मोंको भस्मरूप कर देता है अर्थात् निर्बीज कर देता है। क्योंकि ईंधनकी भाँति ज्ञानरूप अग्नि कर्मोंको साक्षात् भस्मरूप नहीं कर सकता इसलिये इसका यही अभिप्राय है कि यथार्थ ज्ञान सब कर्मोंको निर्बीज करनेका हेतु है। जिस कर्मसे शरीर उत्पन्न हुआ है वह फल देनेके लिये प्रवृत्त हो चुका इसलिये उसका नाश तो उपभोगद्वारा ही होगा। यह युक्तिसिद्ध बात है। अतः इस जन्ममें ज्ञानकी उत्पत्तिसे पहले और ज्ञानके साथसाथ किये हुए एवं पुराने अनेक जन्मोंमें किये हुए जो कर्म अभीतक फल देनेके लिये प्रवृत्त नहीं हुए हैं उन सब कर्मोंको ही ज्ञानाग्नि भस्म करता है ( प्रारब्धकर्मोंको नहीं )।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।4.37।। यथा एधांसि काष्ठानि समिद्धः सम्यक् इद्धः दीप्तः अग्निः भस्मसात् भस्मीभावं कुरुते हे अर्जुन ज्ञानमेव अग्निः ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा निर्बीजीकरोतीत्यर्थः। न हि साक्षादेव ज्ञानाग्निः कर्माणि इन्धनवत् भस्मीकर्तुं शक्नोति। तस्मात् सम्यग्दर्शनं सर्वकर्मणां निर्बीजत्वे कारणम् इत्यभिप्रायः। सामर्थ्यात् येन कर्मणा शरीरम् आरब्धं तत् प्रवृत्तफलत्वात् उपभोगेनैव क्षीयते। अतो यानि अप्रवृत्तफलानि ज्ञानोत्पत्तेः प्राक् कृतानि ज्ञानसहभावीनि च अतीतानेकजन्मकृतानि च तान्येव सर्वाणि भस्मसात् कुरुते।।यतः एवम् अतः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।4.37।। हे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनोंको सर्वथा भस्म कर देती है, ऐसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मोंको सर्वथा भस्म कर देती है।

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।4.37।। जैसे प्रज्जवलित अग्नि ईन्धन को भस्मसात् कर देती है,  वैसे ही,  हे अर्जुन ! ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्मसात् कर देती है।।
 




श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।

तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति।।4.38।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।4.38।।क्योंकि ज्ञानका इतना प्रभाव है इसलिये ज्ञानके समान पवित्र करनेवाला शुद्ध करनेवाला इस लोकमें ( दूसरा कोई ) नहीं है। कर्मयोग या समाधियोगद्वारा बहुत कालमें भली प्रकार शुद्धान्तःकरण हुआ अर्थात् वैसी योग्यताको प्राप्त हुआ मुमुक्ष स्वयं अपने आत्मामें ही उस ज्ञानको पाता है यानी साक्षात् किया करता है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।4.38।। न हि ज्ञानेन सदृशं तुल्यं पवित्रं पावनं शुद्धिकरम् इह विद्यते। तत् ज्ञानं स्वयमेव योगसंसिद्धः योगेन कर्मयोगेन समाधियोगेन च संसिद्धः संस्कृतः योग्यताम् आपन्नः सन् मुमुक्षुः कालेन महता आत्मनि विन्दति लभते इत्यर्थः।।येन एकान्तेन ज्ञानप्राप्तिः भवति स उपायः उपदिश्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।4.38।। इस मनुष्यलोकमें ज्ञानके समान पवित्र करनेवाला निःसन्देह दूसरा कोई साधन नहीं है। जिसका योग भली-भाँति सिद्ध हो गया है, वह (कर्मयोगी) उस तत्त्वज्ञानको अवश्य ही स्वयं अपने-आपमें पा लेता है।

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।4.38।। इस लोक में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला,  निसंदेह,  कुछ भी नहीं है। योग में संसिद्ध पुरुष स्वयं ही उसे (उचित) काल में आत्मा में प्राप्त करता है।।
 



श्रीमद् भगवद्गीता

मूल श्लोकः

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।

ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।।4.39।।

 

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।4.39।।जिसके द्वारा निश्चय ही ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है वह उपाय बतलाया जाता है श्रद्धावान् श्रद्धालु मनुष्य ज्ञान प्राप्त किया करता है। श्रद्धालु होकर भी तो कोई मन्द प्रयत्नवाला हो सकता है इसलिये कहते हैं कि तत्पर अर्थात् ज्ञानप्राप्तिके गुरुशुश्रूषादि उपायोंमें जो अच्छी प्रकार लगा हुआ हो। श्रद्धावान् और तत्पर होकर भी कोई अजितेन्द्रिय हो सकता है इसलिये कहते हैं कि संयतेन्द्रिय भी होनाचाहिये। जिसकी इन्द्रियाँ वशमें की हुई हों यानी विषयोंसे निवृत्त कर ली गयी हों वह संयतेन्द्रिय कहलाता है। जो इस प्रकार श्रद्धावान् तत्पर और संयतेन्द्रिय भी होता है वह अवश्य ही ज्ञानको प्राप्त कर लेता है। जो दण्डवत्प्रणामादि उपाय हैं वे तो बाह्य हैं और कपटी मनुष्यद्वारा भी किये जा सकते हैं इसलिये वे ( ज्ञानरूप फल उत्पन्न करनेमें ) अनिश्चित भी हो सकते हैं। परंतु श्रद्धालुता आदि उपायोंमें कपट नहीं चल सकता इसलिये ये निश्चयरूपसे ज्ञानप्राप्तिके उपाय हैं। ज्ञानप्राप्तिसे क्या होगा सो ( उत्तरार्धमें ) कहते हैं ज्ञानको प्राप्त होकर मनुष्य मोक्षरूप परम शान्तिको यानी उपरामताको बहुत शीघ्रतत्काल ही प्राप्त हो जाता है। यथार्थ ज्ञानसे तुरंत ही मोक्ष हो जाता है यह सब शास्त्रों और युक्तियोंसे सिद्ध सुनिश्चित बात है।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।4.39।। श्रद्धावान् श्रद्धालुः लभते ज्ञानम्। श्रद्धालुत्वेऽपि भवति कश्चित् मन्दप्रस्थानः अत आह तत्परः गुरूपासदनादौ अभियुक्तः ज्ञानलब्ध्युपाये श्रद्धावान्। तत्परः अपि अजितेन्द्रियः स्यात् इत्यतः आह संयतेन्द्रियः संयतानि विषयेभ्यो निवर्तितानि यस्य इन्द्रियाणि स संयतेन्द्रियः। य एवंभूतः श्रद्धावान् तत्परः संयतेन्द्रियश्च सः अवश्यं ज्ञानं लभते। प्रणिपातादिस्तु बाह्योऽनैकान्तिकोऽपि भवति मायावित्वादिसंभवात् न तु तत् श्रद्धावत्त्वादौ इत्येकान्ततः ज्ञानलब्ध्युपायः। किं पुनः ज्ञानलाभात् स्यात् इत्युच्यते ज्ञानं लब्ध्वा परं मोक्षाख्यां शान्तिम् उपरतिम् अचिरेण क्षिप्रमेव अधिगच्छति। सम्यग्दर्शनात् क्षिप्रमेव मोक्षो भवतीति सर्वशास्त्रन्यायप्रसिद्धः सुनिश्चितः अर्थः।।अत्र संशयः न कर्तव्यः पापिष्ठो हि संशयः कथम् इति उच्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।4.39।। जो जितेन्द्रिय तथा साधन-परायण है, ऐसा श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होता है और ज्ञानको प्राप्त होकर वह तत्काल परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है।

Hindi Translation By Swami Tejomayananda

।।4.39।। श्रद्धावान्,  तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान को प्राप्त करके शीघ्र ही वह परम शान्ति को प्राप्त होता है।।
 




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