शुक्रवार, 8 दिसंबर 2023

गोलोक से भूलोक तक "पञ्चम वैष्णव-वर्ण गोपों की सृष्टि -

गोपालक (पुरुरवा) की पत्नी आभीर कन्या उर्वशी का प्रचीन प्रसंग का विवरण- 
गायत्री अहीरों की सबसे विदुषी और कठिन व्रतों का पालन करने वाली प्रथम कन्या सिद्ध होती हैं। इसी लिए स्वयं विष्णु भगवान ने ब्रह्मा के यज्ञ-सत्र में गायत्री की भूरि -भूरि प्रशंसा की है।
गायत्री को ही ज्ञान की अधिष्ठात्री देवता पद पर नियुक्त किया गया। संसार का सम्पूर्ण ज्ञान गायत्री से नि:सृत होता है।
गायत्री की माता का नाम "गोविला" और पिता का नाम गोविल है  जो गोलोक से अवतरित होकर आनर्त (गुजरात)देश में निवास करते थे क्योंकि यह गायों के निवास करने का स्थान है।

गोविल- और गोविला- नाम उनके  गायों से सम्बन्धित गौलोकीय अवधारणा को पुष्ट करते हैं।
ब्रह्मा ने सृष्टि रचना के पश्चात यह अपना  प्रथम यज्ञ सत्र प्रारम्भ किया था। जिसमें अपने द्वारा उत्पन्न चारों वर्णो के लोग देवगण सप्तर्षि
आदि आमन्त्रित किए थे। परन्तु ब्रह्मा के इस यज्ञ समारोह में गोपगण नहीं थे। क्योंकि गोप ब्रह्मा की सृष्टि नहीं हैं । ये मनुष्य गण गोलोक में ही स्वराट विष्णु ( द्विभुज धारी) कृष्ण के लोम(रोम) कूपों से उत्पन्न हैं। स्वयं गायत्री की उत्पत्ति गोलोक में हुई है।

विशेष:- गोपों को ही संसार में धर्म का आदि प्रसारक माना गया है। ऋग्वेद में वर्णित है कि भगवान विष्णु गोप रूप में धर्म को धारण किये हुए हैं।

आभीर लोग प्राचीन काल से ही व्रती, धर्म वत्सल और सदाचार सम्पन्न होते थे।
स्वयं भगवान् विष्णु ने सतयुग में भी अहीरों के समान किसी अन्य जाति को व्रती और सदाचारीयों में सम्पन्न न जानकर अहीरों को ही सदाचार सम्पन्न और धर्मवत्सल स्वीकार किया है।

और इसी कारण से विष्णु ने अपना अवतरण भी इन्हीं अहीरों की जाति में लेना स्वीकार किया। वैदिक ऋचाओं में विष्णु का गोप होना सर्वविदित ही है।

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गोपालक (पुरुरवा) की पत्नी आभीर कन्या उर्वशी का प्रचीन प्रसंग का विवरण- 

हम बात करते हैं पद्मपुराण सृष्टि खण्ड के अध्याय-17 में वर्णित- अहीरों की जाति में भगवान कृष्ण के रूप में विष्णु के निम्नलिखित तीन श्लोक की :- जिसमें प्रथम श्लोक में अहीरों को धर्मतत्व का ज्ञाता होना तथा सदाचारी होना सूचित किया गया है इसके बाद के श्लोकों में गायत्री के द्वारा आभीर जाति का उद्धार करने वाला बताकर तृतीय श्लोक में विष्णु द्वारा अपने अवतरण की स्वीकृति अहीरों को दे दी गयी है।

ये तीनों बाते हीं सिद्ध करती हैं कि अहीरों की जाति सबसे प्राचीन और पवित्र है जिसमें स्वयं भगवान विष्णु अवतरण करते हैं।
पद्मपुराण सृ्ष्टिखण्ड के (१७) वें अध्याय के निम्न लिखित श्लोक विचारणीय है।

"धर्मवन्तं सदाचारं भवन्तं धर्मवत्सलम्। मया ज्ञात्वा ततःकन्या दत्ता चैषा विरञ्चये।१५।
___________________________________

"अनया गायत्र्या तारितो गच्छ युवां भो आभीरा ! दिव्यान्लोकान्महोदयान्।
युष्माकं च कुले चापि देवकार्यार्थसिद्धये।१६।
"अवतारं करिष्येहं सा क्रीडा तु भविष्यति यदा नन्दप्रभृतयो ह्यवतारं धरातले।१७।
अनुवाद -विष्णु ने अहीरों से कहा मैंने तुमको धर्मज्ञ और धार्मिक, सदाचारी तथा धर्मवत्सल जानकर तुम्हारी इस गायत्री नामकी कन्या को ब्रह्मा के लिए यज्ञकार्य हेतु पत्नी रूप में दिया है। (क्योंकि यज्ञ एक व्रतानुष्ठान ही है)। और अहीर कन्याऐं सदैव कठिन व्रतों का पालन करती हैं।
हे अहीरों ! इस गायत्री के द्वारा उद्धार किये गये तुम सब लोग ! दिव्यलोकों को जाओ- और तुम्हारी अहीर जाति के यदुवंश के अन्तर्गत वृष्णिकुल में देवों की कार्य की सिद्धि के लिए मैं अवतरण करुँगा (अवतारं करिष्येहं ) और वहीं मेरी सांसारिक लीला (क्रीडा) होगी जब धरातल पर नन्द आदि का भी अवतरण होगा।

निष्कर्ष:- उपर्युक्त श्लोकों में भगवान विष्णु संसार में अहीरों को ही सबसे बड़े धर्मज्ञ ' धार्मिक सदाचारी और सुव्रतज्ञ ( अच्छे व्रतों को जानने वाला ) मानते हैं और इसी लिए उनका सांसारिक कल्याण करने के लिए उनकी ही अहीर जाति में अवतरण करते हैं।

गोप लोग विष्णु के शरीर से उनके रोमकूपों से उत्पन्न होते हैं। अत: ये वैष्णव जन हैं।

ब्रह्मवैवर्तपुराण में लिखा है कि वैष्णव ही इन अहीरों का वर्ण है।

गोपों अथवा अहीरों की सृष्टि चातुर्यवर्ण- व्यवस्था से पृथक (अलग) है। क्यों कि ब्रह्मा आदि देव भी विष्णु के नाभि कमल से उत्पन्न होते हैं तो गोप सीधे विष्णु के शरीर के रोम कूपों से उत्पन्न होते हैं। इसीलिए ब्रह्मवैवर्त पुराण में गोपों को वैष्णव वर्ण में समाविष्ट ( included ) किया गया है।

"पाद्मे विष्णोर्नाभिपद्मे स्रष्टा सृष्टिं विनिर्ममे । त्रिलोकीं ब्रह्मलोकान्तां नित्यलोकत्रयं विना ।१५।
अनुवाद:-

तत्पश्चात् पाद्म कल्प में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने विष्णु के नाभि कमल से उत्पन्न हो सृष्टि का निर्माण किया।

ब्रह्मलोक पर्यन्त जो त्रिलोकी है, उसी की रचना ब्रह्मा ने की परन्तु , ऊपर के जो नित्य तीन लोक हैं, उनकी रचना ब्रह्मा ने नहीं की।

"सा च सम्भाष्य गोविन्दं रत्नसिंहासने वरे । उवास सस्मिता भर्तुः पश्यन्ती मुखपङ्कजम्।३९।
तस्याश्च लोमकूपेभ्यः सद्यो गोपाङ्गनागणः।आविर्बभूव रूपेण वेशेनैव च तत्समः ।1.5.४०।
कृष्णस्य लोमकूपेभ्यः सद्यो गोपगणो मुने।। आविर्बभूव रूपेण वेषेणैव च तत्समः। ४२ ।
त्रिंशत्कोटिपरिमितः कमनीयो मनोहरः ।।संख्याविद्भिश्च संख्यातो बल्लवानां गणः श्रुतौ।४३।
कृष्णस्य लोमकूपेभ्यः सद्यश्चाविर्बभूव ह ।। नानावर्णो गोगणश्च शश्वत्सुस्थिरयौवनः ।४४।
श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे सौतिशौनकसंवादे



सृष्टिनिरूपणे ब्रह्मखण्डे पञ्चमोऽध्यायः ।५।
अनुवाद:- वह गोविन्द से वार्तालाप करके उनकी आज्ञा पा मुसकराती हुई श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासन पर बैठ गयीं। उनकी दृष्टि अपने उन प्राणवल्लभ के मुखारविन्द पर ही लगी हुई थी। उस किशोरी के रोमकूपों से तत्काल ही गोपांगनाओं का आविर्भाव हुआ, जो रूप और वेष के द्वारा भी उसी की समानता करती थीं। उनकी संख्या लक्षकोटि थी। वे सब-की-सब नित्य सुस्थिर-यौवना थीं। संख्या के जानकार विद्वानों ने गोलोक में गोपांगनाओं की उक्त संख्या ही निर्धारित की है।

मुने ! फिर तो श्रीकृष्ण के रोमकूपों से भी उसी क्षण गोपगणों का आविर्भाव हुआ, जो रूप और वेष में भी उन्हीं के समान थे। संख्यावेत्ता महर्षियों का कथन है कि श्रुति में गोलोक के कमनीय मनोहर रूप वाले गोपों की संख्या तीस करोड़ बतायी गयी है।

ब्रह्म वैवर्त पुराण एकादश -अध्याय श्लोक संख्या (४१)
निम्नलिखित श्लोक में ब्राह्मण" क्षत्रिय" वैश्य" और शूद्र वर्ण के अतिरिक्त एक स्वतन्त्र जाति और वर्ण भी माना गया है। जिसे वैष्णव नाम दिया गया है। जो विष्णु से सम्बन्धित अथवा उनके रोमकूपों से उत्पन्न है।

विष्णुर्देवताऽस्य तस्येदं वा अण् वैष्णव -विष्णू- पासके विष्णोर्जातो इति वैष्णव विष्णुसम्बन्धिनि च स्त्रियां ङीप् वैष्णवी- दुर्गा गायत्री आदि।

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"ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्राश्चतस्रो जातयो यथा। स्वतन्त्रा जातिरेका च विश्वेष्वस्मिन्वैष्णवाभिधा ।४३।।
अनुवाद:-ब्राह्मण' क्षत्रिय 'वैश्य और शूद्र जो चार जातियाँ जैसे इस विश्व में हैं वैसे ही वैष्णव नाम कि एक स्वतन्त्र जाति व वर्ण भी इस संसार में है ।४३।
उपर्युक्त श्लोक में पञ्चम जाति व वर्ण के रूप में भागवत धर्म के प्रर्वतक आभीर / यादव लोगो को स्वीकार किया गया है। क्योंकि वैष्णव शब्द भागवत शब्द का ही पर्याय है।

विष्णु का परम पद, परम धाम दिव्य- आकाश में स्थित एवं सूर्य के समान देदीप्यमान माना गया है -

तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् ॥२०॥

देवता — विष्णुः ; छन्द — गायत्री;
स्वर — षड्जः; ऋषि — मेधातिथिः काण्वः

(सूरयः) बहुत से सूर्य (दिवि) आकाश में (आततम्) फैले हुए (चक्षुरिव) नेत्रों के समान जो (विष्णोः) विष्णु भगवान् ! (परमम्) उत्तम से उत्तम (पदम्) स्थान को ! (तत्) उसको (पश्यन्ति) देखते हैं॥20॥(ऋग्वेद १/२२/२०)।

इसी प्रकार का वर्णन भविष्य पुराण में भी ऋग्वेद का उपर्युक्त श्लोक है।

तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यंति सूरयः ।।
दिवीव चक्षुराततम् ।।१९।।
पीतवस्त्रेण कृष्णाय श्वेतवस्त्रेण शूलिने।।
कौसुंभवस्त्रेणाढ्येन गौरीमुद्दिश्य दापयेत्।।4.130.२०।।

इति श्रीभविष्ये महापुराण उत्तरपर्वणि श्रीकृष्णयुधिष्ठिरसंवादे दीपदानविधिवर्णनं नाम त्रिंशदुत्तरशततमोऽध्यायः।।१३०।।

उरुक्रमस्य स हि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः ॥५॥

अर्थानुवाद:-

(यत्र) जिसमें (देवयवः) देवों का अन्न( जौ) (नरः) जन (मदन्ति) आनन्दित होते हैं (तत्) उस (अस्य) इस (उरुक्रमस्य) अनन्त पराक्रमयुक्त (विष्णोः) के (प्रियम्) प्रिय (पाथः) मार्ग को (अभ्यश्याम्) सब ओर से प्राप्त होऊँ, जिस परमात्मा के (परमे) अत्युत्तम (पदे) प्राप्त होने योग्य पद में (मधवः) मधुरादि गुणयुक्त पदार्थ का (उत्सः) श्रोत- वर्तमान है (सः, हि) वही (इत्था) इस प्रकार से हमारा (बन्धुः) भाई के समान है ॥५॥


ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयासः।
अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णः परमं पदमवभाति भूरि ॥६॥

(यत्र) जहाँ (अयासः) स्थित हुईं (भूरिशृङ्गाः) बहुत सींगों वाली (गावः)गायें हैं (ता) उन (वास्तूनि)




तृतीय क्रम में वही शक्ति सतयुग के दित्तीय चरण में नन्दसेन / नरेन्द्र सेन अथवा गोविल आभीर की पुत्री के रूप में जन्म लेती हैं और बचपन से ही गायत्री गोपालन और गो दुग्ध का दोहन भी करती हैं। अत: पद्मपुराण सृष्टि खण्ड में गायत्री का दुहिता सम्बोधन प्राप्त है।
भारतीय सांस्कृतिक परम्परा में आज तक ग्रामीण क्षेत्र में लड़की ही गाय-भैंस का दूध दुहती है। यह उसी परम्परा अवशेष हैं।


गोपालक (पुरुरवा) की पत्नी आभीर कन्या उर्वशी का प्रचीन प्रसंग का विवरण- 
गायत्री अहीरों की सबसे विदुषी और कठिन व्रतों का पालन करने वाली प्रथम कन्या सिद्ध होती हैं। इसी लिए स्वयं विष्णु भगवान ने ब्रह्मा के यज्ञ-सत्र में गायत्री की भूरि -भूरि प्रशंसा की है। गायत्री को ही ज्ञान की अधिष्ठात्री देवता पद पर नियुक्त किया गया। संसार का सम्पूर्ण ज्ञान गायत्री से नि:सृत होता है।
गायत्री की माता का नाम "गोविला" और पिता का नाम नन्दसेन/अथवा नरेन्द्र सेन आभीर था। जो आनर्त (गुजरात) में निवास करते थे


मत्कृते येऽत्र शापिता शावित्र्या ब्राह्मणा सुरा:। तेषां अहं करिष्यामि शक्त्या साधारणां स्वयम्।।७।।
"अनुवाद:-मेरे कारण ये ब्राह्मण और देवगण सावित्री के द्वारा शापित हुए हैं‌। उन सबको मैं (गायत्री) अपनी शक्ति से साधारणत: पूर्ववत् कर दुँगी।।७।।

किसी के द्वारा दिए गये शाप को 
समाप्त कर समान्य करना और समान्य
 को फिर वरदान में बदल देना 
अर्थात जो शापित थे उनको वरदान देना
 यह कार्य आभीर कन्या गायत्री के द्वारा
 ही सम्भव हो सका ।  
अन्यथा कोई देवता किसी अन्य के द्वारा दिए गये शाप का शमन नहीं कर सकता है।

अपूज्योऽयं विधिः प्रोक्तस्तया मन्त्रपुरःसरः॥ सर्वेषामेव वर्णानां विप्रादीनां सुरोत्तमाः॥८।
"अनुवाद:-यह ब्रह्मा (विधि) अपूज्य हो यह उस सावित्री के द्वारा कहा गया था परन्तु विपरीत है।


गायत्री के माता-पिता गोविल और गेविला गोलोक से सम्बन्धित हैं।

क्योंकि ब्रह्मा ने अपने यज्ञ सत्र नें अपनी सृष्टि को ही आमन्त्रित किया था  चतुर्यवर्ण सप्तर्षि देवतागण आदि सभी यज्ञ में उपस्थित थे।


गायत्री की उत्पत्ति भी गोलोक में हुयी है। देखें कृष्ण से गायत्री की उत्पत्ति  सभी नाम गो मूलक हैं।
गोविल-गोविला- गायत्री -गोप गोविन्द गोपाल आदि -
पृथ्वी पक गायत्री का आगमन गे लोक से हीन हुआ था।

पुरुरवा भी गायत्री उपासक के रूप में प्रचीन है।
उसके गोष और गोपाल विशेषण भी हैं ।





📚: गोलोक से भूलोक तक "पञ्चम वर्ण गोपों की सृष्टि -

"गोपालक (पुरुरवा) की पत्नी आभीर कन्या उर्वशी का प्रचीन प्रसंग व  विवरण- 
गायत्री अहीरों की सबसे विदुषी और कठिन व्रतों का पालन करने वाली प्रथम कन्या सिद्ध होती हैं।

इसी लिए स्वयं विष्णु भगवान ने ब्रह्मा के यज्ञ-सत्र में गायत्री की भूरि -भूरि प्रशंसा की है।
गायत्री को ही ज्ञान की अधिष्ठात्री देवता पद पर नियुक्त किया गया। संसार का सम्पूर्ण ज्ञान गायत्री से नि:सृत होता है।

गायत्री की माता का नाम "गोविला" और पिता का  थे
दोनों का सम्बन्ध गो तथा गोलोक से है।

विशेष:- गोपों को ही संसार में धर्म का आदि प्रसारक माना गया है। ऋग्वेद में वर्णित है कि भगवान विष्णु गोप रूप में धर्म को धारण किये हुए हैं।

आभीर लोग प्राचीन काल से ही व्रती, धर्म वत्सल और सदाचार सम्पन्न होते थे। स्वयं भगवान् विष्णु ने सतयुग में भी अहीरों के समान किसी अन्य जाति को व्रती और सदाचारीयों में सम्पन्न न जानकर अहीरों को ही सदाचार सम्पन्न और धर्मवत्सल स्वीकार किया है।

और इसी कारण से विष्णु ने अपना अवतरण भी इन्हीं अहीरों की जाति में लेना स्वीकार किया। वैदिक ऋचाओं में विष्णु का गोप होना सर्वविदित ही है।

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हम बात करते हैं पद्मपुराण सृष्टि खण्ड के अध्याय-17 में वर्णित- अहीरों की जाति में भगवान कृष्ण के रूप में विष्णु के निम्नलिखित तीन श्लोक की :- जिसमें प्रथम श्लोक में अहीरों को धर्मतत्व का ज्ञाता होना तथा सदाचारी होना सूचित किया गया है इसके बाद के श्लोकों में गायत्री के द्वारा आभीर जाति का उद्धार करने वाला बताकर तृतीय श्लोक में विष्णु द्वारा अपने अवतरण की स्वीकृति अहीरों को दे दी गयी है।

ये तीनों बाते हीं सिद्ध करती हैं कि अहीरों की जाति सबसे प्राचीन और पवित्र है जिसमें स्वयं भगवान विष्णु अवतरण करते हैं।
पद्मपुराण सृ्ष्टिखण्ड के (१७) वें अध्याय के निम्न लिखित श्लोक विचारणीय है।

"धर्मवन्तं सदाचारं भवन्तं धर्मवत्सलम्। मया ज्ञात्वा ततःकन्या दत्ता चैषा विरञ्चये।१५।
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"अनया गायत्र्या तारितो गच्छ युवां भो आभीरा ! दिव्यान्लोकान्महोदयान्।
युष्माकं च कुले चापि देवकार्यार्थसिद्धये।१६।

"अवतारं करिष्येहं सा क्रीडा तु भविष्यति यदा नन्दप्रभृतयो ह्यवतारं धरातले।१७।

अनुवाद -विष्णु ने अहीरों से कहा मैंने तुमको धर्मज्ञ और धार्मिक, सदाचारी तथा धर्मवत्सल जानकर तुम्हारी इस गायत्री नामकी कन्या को ब्रह्मा के लिए यज्ञकार्य हेतु पत्नी रूप में दिया है। (क्योंकि यज्ञ एक व्रतानुष्ठान ही है)। और अहीर कन्याऐं सदैव कठिन व्रतों का पालन करती हैं।
हे अहीरों ! इस गायत्री के द्वारा उद्धार किये गये तुम सब लोग ! दिव्यलोकों को जाओ- और तुम्हारी अहीर जाति के यदुवंश के अन्तर्गत वृष्णिकुल में देवों की कार्य की सिद्धि के लिए मैं अवतरण करुँगा (अवतारं करिष्येहं ) और वहीं मेरी सांसारिक लीला (क्रीडा) होगी जब धरातल पर नन्द आदि का भी अवतरण होगा।

निष्कर्ष:- उपर्युक्त श्लोकों में भगवान विष्णु संसार में अहीरों को ही सबसे बड़े धर्मज्ञ ' धार्मिक सदाचारी और सुव्रतज्ञ (अच्छे व्रतों को जानने वाला ) मानते हैं और इसी लिए उनका सांसारिक कल्याण करने के लिए उनकी ही अहीर जाति में अवतरण करते हैं।

गोप लोग विष्णु के शरीर से उनके रोमकूपों से उत्पन्न होते हैं। अत: ये वैष्णव जन हैं।

ब्रह्मवैवर्तपुराण में लिखा है कि वैष्णव ही इन अहीरों का वर्ण है।

गोपों अथवा अहीरों की सृष्टि चातुर्यवर्ण- व्यवस्था से पृथक (अलग) है। क्यों कि ब्रह्मा आदि देव भी विष्णु के नाभि कमल से उत्पन्न होते हैं तो गोप सीधे विष्णु के शरीर के रोम कूपों से उत्पन्न होते हैं। इसीलिए ब्रह्मवैवर्त पुराण में गोपों को वैष्णव वर्ण में समाविष्ट ( included ) किया गया है।

"पाद्मे विष्णोर्नाभिपद्मे स्रष्टा सृष्टिं विनिर्ममे । त्रिलोकीं ब्रह्मलोकान्तां नित्यलोकत्रयं विना ।१५।
अनुवाद:-
तत्पश्चात् पाद्म कल्प में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने विष्णु के नाभि कमल से उत्पन्न हो सृष्टि का निर्माण किया।

ब्रह्मलोक पर्यन्त जो त्रिलोकी है, उसी की रचना ब्रह्मा ने की परन्तु , ऊपर के जो नित्य तीन लोक हैं, उनकी रचना ब्रह्मा ने नहीं की।

"सा च सम्भाष्य गोविन्दं रत्नसिंहासने वरे । 
उवास सस्मिता भर्तुः पश्यन्ती मुखपङ्कजम्।३९।
तस्याश्च लोमकूपेभ्यः सद्यो गोपाङ्गनागणः।आविर्बभूव रूपेण वेशेनैव च तत्समः ।1.5.४०।
कृष्णस्य लोमकूपेभ्यः सद्यो गोपगणो मुने।। आविर्बभूव रूपेण वेषेणैव च तत्समः। ४२ ।

त्रिंशत्कोटिपरिमितः कमनीयो मनोहरः ।।संख्याविद्भिश्च संख्यातो बल्लवानां गणः श्रुतौ।४३।
कृष्णस्य लोमकूपेभ्यः सद्यश्चाविर्बभूव ह ।। नानावर्णो गोगणश्च शश्वत्सुस्थिरयौवनः ।४४।
(श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे सौतिशौनकसंवादे)
सृष्टिनिरूपणे ब्रह्मखण्डे पञ्चमोऽध्यायः ।५।

अनुवाद:- वह गोविन्द से वार्तालाप करके उनकी आज्ञा पा मुसकराती हुई श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासन पर बैठ गयीं। उनकी दृष्टि अपने उन प्राणवल्लभ के मुखारविन्द पर ही लगी हुई थी। उस किशोरी के रोमकूपों से तत्काल ही गोपांगनाओं का आविर्भाव हुआ, जो रूप और वेष के द्वारा भी उसी की समानता करती थीं। उनकी संख्या लक्षकोटि थी। वे सब-की-सब नित्य सुस्थिर-यौवना थीं। संख्या के जानकार विद्वानों ने गोलोक में गोपांगनाओं की उक्त संख्या ही निर्धारित की है।

मुने ! फिर तो श्रीकृष्ण के रोमकूपों से भी उसी क्षण गोपगणों का आविर्भाव हुआ, जो रूप और वेष में भी उन्हीं के समान थे। संख्यावेत्ता महर्षियों का कथन है कि श्रुति में गोलोक के कमनीय मनोहर रूप वाले गोपों की संख्या तीस करोड़ बतायी गयी है।

ब्रह्म वैवर्त पुराण एकादश -अध्याय श्लोक संख्या (४१)
निम्नलिखित श्लोक में ब्राह्मण" क्षत्रिय" वैश्य" और शूद्र वर्ण के अतिरिक्त एक स्वतन्त्र जाति और वर्ण भी माना गया है। जिसे वैष्णव नाम दिया गया है। 

जो विष्णु से सम्बन्धित अथवा उनके रोमकूपों से उत्पन्न है।

विष्णुर्देवताऽस्य तस्येदं वा अण् वैष्णव -विष्णू पासके विष्णोर्जातो इति वैष्णव विष्णुसम्बन्धिनि च स्त्रियां ङीप् वैष्णवी- दुर्गा गायत्री आदि।

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"ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्राश्चतस्रो जातयो यथा। स्वतन्त्रा जातिरेका च विश्वेष्वस्मिन्वैष्णवाभिधा ।४३।।

अनुवाद:-ब्राह्मण' क्षत्रिय 'वैश्य और शूद्र जो चार जातियाँ जैसे इस विश्व में हैं वैसे ही वैष्णव नाम कि एक स्वतन्त्र जाति व वर्ण भी इस संसार में है ।४३।
उपर्युक्त श्लोक में पञ्चम जाति व वर्ण के रूप में भागवत धर्म के प्रर्वतक आभीर / यादव लोगो को स्वीकार किया गया है। 
क्योंकि वैष्णव शब्द भागवत शब्द का ही पर्याय है।

विष्णु का परम पद, परम धाम दिव्य- आकाश में स्थित एवं सूर्य के समान देदीप्यमान माना गया है 

तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् ॥२०॥

देवता — विष्णुः ; छन्द — गायत्री;
स्वर — षड्जः; ऋषि — मेधातिथिः काण्वः

(सूरयः) बहुत से सूर्य (दिवि) आकाश में (आततम्) फैले हुए (चक्षुरिव) नेत्रों के समान जो (विष्णोः) विष्णु भगवान् ! (परमम्) उत्तम से उत्तम (पदम्) स्थान को ! (तत्) उसको (पश्यन्ति) देखते हैं॥20॥(ऋग्वेद १/२२/२०)।

इसी प्रकार का वर्णन भविष्य पुराण में भी ऋग्वेद का उपर्युक्त श्लोक है।

तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यंति सूरयः ।।
दिवीव चक्षुराततम् ।।१९।।

पीतवस्त्रेण कृष्णाय श्वेतवस्त्रेण शूलिने।।
कौसुंभवस्त्रेणाढ्येन गौरीमुद्दिश्य दापयेत्।।4.130.२०।।

इति श्रीभविष्ये महापुराण उत्तरपर्वणि श्रीकृष्णयुधिष्ठिरसंवादे दीपदानविधिवर्णनं नाम त्रिंशदुत्तरशततमोऽध्यायः।।१३०।।

उरुक्रमस्य स हि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः ॥५॥

अर्थानुवाद:-
(यत्र) जिसमें (देवयवः) देवों का अन्न( जौ) (नरः) जन (मदन्ति) आनन्दित होते हैं (तत्) उस (अस्य) इस (उरुक्रमस्य) अनन्त पराक्रमयुक्त (विष्णोः) के (प्रियम्) प्रिय (पाथः) मार्ग को (अभ्यश्याम्) सब ओर से प्राप्त होऊँ, जिस परमात्मा के (परमे) अत्युत्तम (पदे) प्राप्त होने योग्य पद में (मधवः) मधुरादि गुणयुक्त पदार्थ का (उत्सः) श्रोत- वर्तमान है (सः, हि) वही (इत्था) इस प्रकार से हमारा (बन्धुः) भाई के समान है ॥५॥

ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयासः।
अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णः परमं पदमवभाति भूरि ॥६॥

(यत्र) जहाँ (अयासः) स्थित हुईं (भूरिशृङ्गाः) बहुत सींगों वाली (गावः)गायें हैं (ता) उन (वास्तूनि)

तृतीय क्रम में वही शक्ति सतयुग के  प्रथम चरण में नन्दसेन / नरेन्द्र सेन अथवा गोविल आभीर की पुत्री के रूप में जन्म लेती हैं और बचपन से ही गायत्री गोपालन और गो दुग्ध का दोहन भी करती हैं। 

अत: पद्मपुराण सृष्टि खण्ड में गायत्री का दुहिता सम्बोधन प्राप्त है।
भारतीय सांस्कृतिक परम्परा में आज तक ग्रामीण क्षेत्र में लड़की ही गाय-भैंस का दूध दुहती है। यह उसी परम्परा अवशेष हैं।


गोपालक (पुरुरवा) की पत्नी आभीर कन्या उर्वशी का प्रचीन प्रसंग का विवरण- 
गायत्री अहीरों की सबसे विदुषी और कठिन व्रतों का पालन करने वाली प्रथम कन्या सिद्ध होती हैं। इसी लिए स्वयं विष्णु भगवान ने ब्रह्मा के यज्ञ-सत्र में गायत्री की भूरि -भूरि प्रशंसा की है। गायत्री को ही ज्ञान की अधिष्ठात्री देवता पद पर नियुक्त किया गया। संसार का सम्पूर्ण ज्ञान गायत्री से नि:सृत होता है।
गायत्री की माता का नाम "गोविला" और पिता का नाम नन्दसेन/अथवा नरेन्द्र सेन आभीर था। जो आनर्त (गुजरात) में निवास करते थे


मत्कृते येऽत्र शापिता शावित्र्या ब्राह्मणा सुरा:। तेषां अहं करिष्यामि शक्त्या साधारणां स्वयम्।।७।।
"अनुवाद:-मेरे कारण ये ब्राह्मण और देवगण सावित्री के द्वारा शापित हुए हैं‌। उन सबको मैं (गायत्री) अपनी शक्ति से साधारणत: पूर्ववत् कर दुँगी।।७।।

किसी के द्वारा दिए गये शाप को 
समाप्त कर समान्य करना और समान्य
 को फिर वरदान में बदल देना 
अर्थात जो शापित थे उनको वरदान देना
 यह कार्य आभीर कन्या गायत्री के द्वारा
 ही सम्भव हो सका ।  
अन्यथा कोई देवता किसी अन्य के द्वारा दिए गये शाप का शमन नहीं कर सकता है।

अपूज्योऽयं विधिः प्रोक्तस्तया मन्त्रपुरःसरः॥ सर्वेषामेव वर्णानां विप्रादीनां सुरोत्तमाः॥८।
"अनुवाद:-यह ब्रह्मा (विधि) अपूज्य हो यह उस सावित्री के द्वारा कहा गया था परन्तु विपरीत है।


गायत्री के मातापिता गोविल और गेविला गोलोक से सम्बन्धित हैं।
क्योंकि ब्रह्मा ने अपने यज्ञ सत्र नें अपनी सृष्टि को ही आमन्त्रित किया था  चतुर्यवर्ण सप्तर्षि देवतागण आदि सभी यज्ञ में उपस्थित थे।

गायत्री की उत्पत्ति भी गोलोक में हुयी है। देखें कृष्ण से गायत्री की उत्पत्ति  सभी नाम गो मूलक हैं।

गोविल-गोविला- गायत्री -गोप गोविन्द गोपाल आदि -
पृथ्वी पर गायत्री का आगमन गोलोक से ही हुआ था।
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गर्ग संहिता
गोलोक खण्ड : अध्याय- (3) इस अध्याय में विष्णु के सभी अवतारों का विलय भगवान श्री कृष्ण में अपनी शक्ति के अनुरूप शरीर के विशेष 
स्थानों में होता है। 

भगवान श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में श्रीविष्णु आदि का प्रवेश; देवताओं द्वारा भगवान की स्तुति; भगवान का अवतार लेने का निश्चय; श्रीराधा की चिंता और भगवान का उन्हें सांत्वना-प्रदान

श्री जनकजी ने पूछा- मुने ! परात्पर महात्मा भगवान श्रीकृष्णचन्द्र का दर्शन प्राप्त कर सम्पूर्ण देवताओं ने आगे क्या किया, मुझे यह बताने की कृपा करें।

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन ! उस समय सबके देखते-देखते अष्ट भुजाधारी वैकुण्ठधिपति भगवान श्रीहरि उठे और साक्षात भगवान श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में लीन हो गये। उसी समय कोटि सूर्यों के समान तेजस्वी, प्रचण्ड पराक्रमी पूर्ण स्वरूप भगवान नृसिंहजी पधारे और भगवान श्रीकृष्ण तेज में वे भी समा गये। इसके बाद सहस्र भुजाओं से सुशोभित, श्वेतद्वीप के स्वामी विराट पुरुष, जिनके शुभ्र रथ में सफेद रंग के लाख घोड़े जुते हुए थे, उस रथ पर आरूढ़ होकर वहाँ आये। उनके साथ श्रीलक्ष्मीजी भी थीं। वे अनेक प्रकार के अपने आयुधों से सम्पन्न थे। पार्षदगण चारों ओर से उनकी सेवा में उपस्थित थे। 
वे भगवान भी उसी समय श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में सहसा प्रविष्ट हो गये।

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तदैव चागतः साक्षाद्‌रामो राजीवलोचनः ।
धनुर्बाणधरः सीताशोभितो भ्रातृभिर्वृतः ॥ ६ ॥
दशकोट्यर्कसंकाशे चामरैर्दोलिते रथे ।
असंख्यवानरेंद्राढ्ये लक्षचक्रघनस्वने ॥ ७ ॥
श्रीगर्गसंहितायां गोलोकखण्डे नारदबहुलाश्वसंवादे आगमनोद्योगवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
अनुवाद:-
फिर वे पूर्णस्वरूप कमल लोचन भगवान श्रीराम स्वयं वहाँ पधारे। उनके हाथ में धनुष और बाण थे तथा साथ में श्रीसीताजी और भरत आदि तीनों भाई भी थे। उनका दिव्य रथ दस करोड़ सूर्यों के समान प्रकाशमान था। उस पर निरंतर चँवर डुलाये जा रहे थे। असंख्य वानर यूथपति उनकी रक्षा के कार्य में संलग्न थे। उस रथ के एक लाख चक्कों से मेघों की गर्जना के समान गम्भीर ध्वनि निकल रही थी।

उस पर लाख ध्वजाएँ फहरा रही थीं। उस रथ में लाख घोड़े जुते हुए थे। वह रथ सुवर्णमय था। उसी पर बैठकर भगवान श्रीराम वहाँ पधारे थे।
वे भी श्रीकृष्णचन्द्र के दिव्य विग्रह में लीन हो गये। 


फिर उसी समय साक्षात यज्ञनारायण श्रीहरि वहाँ पधारे, जो प्रलयकाल की जाज्वल्यमान अग्निशिखा के समान उद्भासित हो रहे थे। देवेश्वर यज्ञ अपनी धर्मपत्नि दक्षिणा के साथ ज्योतिर्मय रथ पर बैठे दिखायी देते थे। वे भी उस समय श्याम विग्रह भगवान श्रीकृष्णचन्द्र में लीन हो गये। तत्पश्चात् साक्षात भगवान नर-नारायण वहाँ पधारे। 
उनके शरीर की कांति मेघ के समान श्याम थी। उनके चार भुजाएँ थीं, नेत्र विशाल थे और वे मुनि के वेष में थे।
उनके सिर का जटा-जूट कौंधती हुई करोड़ों बिजलियों के समान दीप्तिमान था।

गर्गसंहिता/खण्डः(१) (गोलोकखण्डः)
अध्यायः (१)

"गर्गसंहिता‎-खण्डः १-(गोलोकखण्डः)अध्यायः २ →
गर्गमुनिः श्रीकृष्ण-माहात्म्य वर्णन-


              श्रीबहुलाश्व उवाच -
कतिधा श्रीहरेर्विष्णोरवतारो भवत्यलम् ।
साधूनां रक्षणार्थं हि कृपया वद मां प्रभो ।१५।

               श्रीनारद उवाच -
"अंशांशोंऽशस्तथावेशः कलापूर्णः प्रकथ्यते ।
व्यासाद्यैश्च स्मृतः षष्ठः परिपूर्णतमः स्वयम्।१६।

अंशांशस्तु मरीच्यादिरंशा ब्रह्मादयस्तथा ।
कलाः कपिलकूर्माद्या आवेशा भार्गवादयः।१७।

पूर्णो नृसिंहो रामश्च श्वेतद्वीपाधिपो हरिः।
वैकुण्ठोऽपि तथा यज्ञो नरनारायणः स्मृतः।१८।

परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो भगवान् स्वयम् ।
असंख्यब्रह्माण्डपतिर्गोलोके धाम्नि राजते ।१९।

कार्याधिकारं कुर्वन्तः सदंशास्ते प्रकिर्तिताः ।
तत्कार्यभारं कुर्वन्तस्तेंऽशांशा विदिताः प्रभोः।२०।

येषामन्तर्गतो विष्णुः कार्यं कृत्वा विनिर्गतः ।
नानाऽऽवेषावतारांश्च विद्धि राजन्महामते ॥२१॥

धर्मं विज्ञाय कृत्वा यः पुनरन्तरधीयत ।
युगे युगे वर्तमानः सोऽवतारः कला हरेः ॥ २२ ॥

चतुर्व्यूहो भवेद्‌यत्र दृश्यन्ते च रसा नव ।
अतः परं च वीर्याणि स तु पूर्णः प्रकथ्यते ॥ २३ ॥

यस्मिन्सर्वाणि तेजांसि विलीयन्ते स्वतेजसि ।
तं वदन्ति परे साक्षात्परिपूर्णतमं स्वयम् ॥ २४ ॥

पूर्णस्य लक्षणं यत्र तं पश्यन्ति पृथक् पृथक् ।
भावेनापि जनाः सोऽयं परिपूर्णतमः स्वयम् ।२५।

परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो नान्य एव हि ।
एककार्यार्थमागत्य कोटिकार्यं चकार ह।२६।

पूर्णः पुराणः पुरुषोत्तमोत्तमः
     परात्परो यः पुरुषः परेश्वरः ।
स्वयं सदाऽऽनन्दमयं कृपाकरं
     गुणाकरं तं शरणं व्रजाम्यहम् ॥ २७ ॥
______________  
               'श्रीगर्ग उवाच -
तच्छ्रुत्वा हर्षितो राजा रोमाञ्ची प्रेमविह्वलः ।
प्रमृश्य नेत्रेऽश्रुपूर्णे नारदं वाक्यमब्रवीत् ॥ २८ ॥

              "श्रीबहुलाश्व उवाच -
परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो केन हेतुना ।
आगतो भारते खण्डे द्वारवत्यां विराजते ॥ २९ ॥

तस्य गोलोकनाथस्य गोलोकं धाम सुन्दरम् ।
कर्माण्यपरिमेयानि ब्रूहि ब्रह्मन् बृहन्मुने ॥ ३० ॥

यदा तीर्थाटनं कुर्वञ्छतजन्मतपःपरम् ।
तदा सत्सङ्‍गमेत्याशु श्रीकृष्णं प्राप्नुयान्नरः ॥ ३१ ॥

श्रीकृष्णदासस्य च दासदासः
     कदा भवेयं मनसाऽऽर्द्रचित्तः ।
यो दुर्लभो देववरैः परात्मा
     स मे कथं गोचर आदिदेवः ॥ ३२ ॥

धन्यस्त्वं राजशार्दूल श्रीकृष्णेष्टो हरिप्रियः ।
तुभ्यं च दर्शनं दातुं भक्तेशोऽत्रागमिष्यति ॥ ३३ ॥

त्वं नृपं श्रुतदेवं च द्विजदेवो जनार्दनः ।
स्मरत्यलं द्वारकायामहो भाग्यं सतामिह ॥ ३४ 



गर्गसंहिता/खण्डः (१) (गोलोकखण्डः) अध्यायः (१)

"गर्गसंहिता‎ | खण्डः १ (गोलोकखण्डः)
गर्गसंहिता
गोलोकखण्डः
गर्गमुनिः अध्यायः २ →
श्रीकृष्ण-माहात्म्य वर्णनम्

ॐ नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ १ ॥
शरद्विकचपङ्‍कजश्रियमतीवविद्वेषकं
     मिलिन्दमुनिसेवितं कुलिशकंजचिह्नावृतम् ।
स्फुरत्‌कनकनूपुरं दलितभक्ततापत्रयं
   चलद्‌द्युतिपदद्वयं हृदि दधामि राधापतेः॥२॥

वदनकमलनिर्यद्यस्य पीयूषमाद्यं
     पिबति जनवरो यं पातु सोऽयं गिरं मे ।
बदरवनविहारः सत्यवत्याः कुमारः
     प्रणतदुरितहारः शाङ्‌र्गधन्वावतारः ॥ ३ ॥

कदाचिन्नैमिषारण्ये श्रीगर्गो ज्ञानिनां वरः ।
आययौ शौनकं द्रष्टुं तेजस्वी योगभास्करः ॥४॥

तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय शौनको मुनिभिः सह ।
पूजयामास पाद्याद्यैरुपचारैर्विधानतः ॥५॥

श्रीशौनक उवाच -
सतां पर्यटनं धन्यं गृहिणां शान्तये स्मृतम् ।
नृणामन्तस्तमोहारी साधुरेव न भास्करः ॥ ६ ॥

तस्मान्मे हृदि सम्भूतं संदेहं नाशय प्रभो ।
कतिधा श्रीहरेर्विष्णोरवतारो भवत्यलम् ॥ ७ ॥

श्रीगर्ग उवाच -
साधु पृष्टं त्वया ब्रह्मन् भगवद्‌गुणवर्णनम् ।
शृण्वतां गदतां यद्वै पृच्छतां वितनोति शम् ॥ ८ ॥

अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
यस्य श्रवणमात्रेण महादोषः प्रशाम्यति ॥ ९ ॥

मिथिलानगरे पूर्वं बहुलाश्वः प्रतापवान् ।
श्रीकृष्णभक्तः शान्तात्मा बभूव निरहङ्‍कृतिः॥१०।

अम्बरादागतं दृष्ट्वा नारदं मुनिसत्तमम् ।
सम्पूज्य चासने स्थाप्य कृताञ्जलिरभाषत ॥११

श्री-बहुलाश्व उवाच -
योऽनादिरात्मा पुरुषो भगवान्प्रकृतेः परः ।
कस्मात्तनुं समाधत्ते तन्मे ब्रूहि महामते ॥ १२ ॥

श्रीनारद उवाच -
गोसाधुदेवताविप्रदेवानां रक्षणाय वै ।
तनुं धत्ते हरिः साक्षाद्‌भगवानात्मलीलया ॥ १३ ॥

यथा नटः स्वलीलायां मोहितो न परस्तथा ।
अन्ये दृष्ट्वा च तन्मायां मुमुहुस्ते न संशयः।१४।

श्रीबहुलाश्व उवाच -
कतिधा श्रीहरेर्विष्णोरवतारो भवत्यलम् ।
साधूनां रक्षणार्थं हि कृपया वद मां प्रभो ॥ १५ ॥

श्रीनारद उवाच -
अंशांशोंऽशस्तथावेशः कलापूर्णः प्रकथ्यते ।
व्यासाद्यैश्च स्मृतः षष्ठः परिपूर्णतमः स्वयम् ॥ १६।
________
अंशांशस्तु मरीच्यादिरंशा ब्रह्मादयस्तथा ।
कलाः कपिलकूर्माद्या आवेशा भार्गवादयः ॥१७॥

पूर्णो नृसिंहो बलरामश्च श्वेतद्वीपाधिपो हरिः ।
वैकुण्ठोऽपि तथा यज्ञो नरनारायणः स्मृतः।१८।

परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो भगवान् स्वयम् ।
असंख्यब्रह्माण्डपतिर्गोलोके धाम्नि राजते।१९।

कार्याधिकारं कुर्वन्तः सदंशास्ते प्रकिर्तिताः ।
तत्कार्यभारं कुर्वन्तस्तेंऽशांशा विदिताः प्रभोः ॥ २० ॥

येषामन्तर्गतो विष्णुः कार्यं कृत्वा विनिर्गतः।
 नानाऽऽवेशावतारांश्च विद्धि राजन्महामते।२१।

धर्मं विज्ञाय कृत्वा यः पुनरन्तरधीयत ।
युगे युगे वर्तमानः सोऽवतारः कला हरेः ॥ २२ ॥

चतुर्व्यूहो भवेद्‌यत्र दृश्यन्ते च रसा नव ।
अतः परं च वीर्याणि स तु पूर्णः प्रकथ्यते ॥ २३ ॥

यस्मिन्सर्वाणि तेजांसि विलीयन्ते स्वतेजसि ।
तं वदन्ति परे साक्षात्परिपूर्णतमं स्वयम् ॥२४ ॥

पूर्णस्य लक्षणं यत्र तं पश्यन्ति पृथक् पृथक् ।
भावेनापि जनाः सोऽयं परिपूर्णतमः स्वयम् ।२५।

परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो नान्य एव हि ।
एककार्यार्थमागत्य कोटिकार्यं चकार ह ॥ २६।

पूर्णः पुराणः पुरुषोत्तमोत्तमः
     परात्परो यः पुरुषः परेश्वरः ।
स्वयं सदाऽऽनन्दमयं कृपाकरं
     गुणाकरं तं शरणं व्रजाम्यहम् ॥ २७ ॥

श्रीगर्ग उवाच -
तच्छ्रुत्वा हर्षितो राजा रोमाञ्ची प्रेमविह्वलः ।
प्रमृश्य नेत्रेऽश्रुपूर्णे नारदं वाक्यमब्रवीत् ॥ २८ ॥

श्रीबहुलाश्व उवाच -
परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो केन हेतुना ।
आगतो भारते खण्डे द्वारवत्यां विराजते ॥ २९ ॥

तस्य गोलोकनाथस्य गोलोकं धाम सुन्दरम् ।
कर्माण्यपरिमेयानि ब्रूहि ब्रह्मन् बृहन्मुने ॥ ३० ॥

यदा तीर्थाटनं कुर्वञ्छतजन्मतपःपरम् ।
तदा सत्सङ्‍गमेत्याशु श्रीकृष्णं प्राप्नुयान्नरः ॥ ३१ ॥

श्रीकृष्णदासस्य च दासदासः
     कदा भवेयं मनसाऽऽर्द्रचित्तः।
यो दुर्लभो देववरैः परात्मा
     स मे कथं गोचर आदिदेवः ॥ ३२ ॥

धन्यस्त्वं राजशार्दूल श्रीकृष्णेष्टो हरिप्रियः ।
तुभ्यं च दर्शनं दातुं भक्तेशोऽत्रागमिष्यति ॥ ३३ ॥

त्वं नृपं श्रुतदेवं च द्विजदेवो जनार्दनः ।
स्मरत्यलं द्वारकायामहो भाग्यं सतामिह ॥ ३४ ॥

इति श्रीगर्गसंहितायां गोलोकखण्डे नारदबहुलाश्वसंवादे कृष्णमाहात्म्यवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

अनुवाद :-

अथ- श्रीगर्गसंहितायां गोलोकखण्डे नारदबहुलाश्वसंवादे कृष्णमाहात्म्यवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

श्रीजनक( बहुलाश्व) बोले- महामते ! जो भगवान अनादि, प्रकृति से परे और सबके अंतर्यामी ही नहीं, आत्मा हैं, वे शरीर कैसे धारण करते हैं? (जो सर्वत्र व्यापक है, वह शरीर से परिच्छिन्न कैसे हो सकता है? ) यह मुझे बताने की कृपा करें।

नारदजी ने कहा- गौ, साधु, देवता, ब्राह्मण और वेदों की रक्षा के लिये साक्षात भगवान श्रीहरि अपनी लीला से शरीर धारण करते हैं। [अपनी अचिंत्य लीलाशक्ति से ही वे देहधारी होकर भी व्यापक बने रहते हैं। उनका वह शरीर प्राकृत नहीं, चिन्मय है।]

जैसे नट अपनी माया से मोहित नहीं होता और दूसरे लोग मोह में पड़ जाते हैं, वैसे ही अन्य प्राणी भगवान की माया देखकर मोहित हो जाते हैं, किंतु परमात्मा मोह से परे रहते हैं- इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है।

श्रीजनकजी ने पूछा- मुनिवर ! संतों की रक्षा के लिये भगवान विष्णु के कितने प्रकार के अवतार होते हैं ? यह मुझे बताने की कृपा करें। श्रीनारदजी बोले- राजन ! 
_______________
व्यास आदि मुनियों ने १-अंशांश, २-अंश, ३-आवेश, ४-कला, ५-पूर्ण और ६-परिपूर्णतम- ये छ: प्रकार के अवतार बताये हैं। 
________
इनमें से छठा परिपूर्णतम अवतार साक्षात श्रीकृष्ण ही हैं। 

मरीचि आदि “अंशांशावतार”( अंश के अंश अवतरित-) , ब्रह्मा आदि ‘अंशावतार’, कपिल एवं कूर्म प्रभृति ‘कलावतार’ और परशुराम आदि ‘आवेशावतार’ कहे गये हैं।

 नृसिंह, बलराम, श्वेतद्वीपाधिपति हरि, वैकुण्ठ, यज्ञ और नर नारायण- ये सात ‘पूर्णावतार’ हैं।

 एवं साक्षात भगवान भगवान श्रीकृष्ण ही एक  ‘परिपूर्णतम’ अवतार हैं।
अंसख्य ब्रह्माण्डों के अधिपति वे प्रभु गोलोकधाम में विराजते हैं।

 जो भगवान के दिये सृष्टि आदि कार्यमात्र के अधिकार का पालन करते हैं, वे ब्रह्मा आदि ‘सत’ (सत्स्वरूप भगवान) के अंश हैं। रजोगुण के प्रतिनिधि हैं।

जो उन अंशों के कार्यभार में हाथ बटाते हैं, वे ‘अंशांशावतार’ के नाम से विख्यात हैं। 

परम बुद्धिमान नरेश ! भगवान विष्णु स्वयं जिनके अंत:करण में आविष्ट हो, अभीष्ट कार्य का सम्पादन करके फिर  अलग हो जाते हैं, राजन ! ऐसे नानाविध अवतारों को ‘आवेशावतार’ समझो।
यह अवतार उसी प्रकार का हैं जैसे किसी व्यक्ति पर कुछ समय तक कोई भूत या प्रेत प्रवेश कर उसको उत्तेजित या उन्मादी बना देता है। यह स्थाई नहीं होता है। परशुराम पर भी इसी प्रकार उन्माद आवेश आता था

आवेश:- वेग - आतुरता - जोश- दौरा-। 
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श्रीनारद उवाच -
अंशांशोंऽशस्तथावेशः कलापूर्णः प्रकथ्यते ।
व्यासाद्यैश्च स्मृतः षष्ठः परिपूर्णतमः स्वयम् ॥ १६।
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अंशांशस्तु मरीच्यादिरंशा ब्रह्मादयस्तथा ।
कलाः कपिलकूर्माद्या आवेशा भार्गवादयः ॥१७॥

पूर्णो नृसिंहो बलरामश्च श्वेतद्वीपाधिपो हरिः ।
वैकुण्ठोऽपि तथा यज्ञो नरनारायणः स्मृतः।१८।

परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो भगवान् स्वयम् ।
असंख्यब्रह्माण्डपतिर्गोलोके धाम्नि राजते।१९।

कार्याधिकारं कुर्वन्तः सदंशास्ते प्रकिर्तिताः ।
तत्कार्यभारं कुर्वन्तस्तेंऽशांशा विदिताः प्रभोः ॥ २० ॥

येषामन्तर्गतो विष्णुः कार्यं कृत्वा विनिर्गतः।
नानाऽऽवेशावतारांश्च विद्धि राजन्महामते ।२१।

धर्मं विज्ञाय कृत्वा यः पुनरन्तरधीयत ।
युगे युगे वर्तमानः सोऽवतारः कला हरेः ॥ २२ ॥

चतुर्व्यूहो भवेद्‌यत्र दृश्यन्ते च रसा नव ।
अतः परं च वीर्याणि स तु पूर्णः प्रकथ्यते ॥ २३ ॥

यस्मिन्सर्वाणि तेजांसि विलीयन्ते स्वतेजसि ।
तं वदन्ति परे साक्षात्परिपूर्णतमं स्वयम् ॥२४ ॥

पूर्णस्य लक्षणं यत्र तं पश्यन्ति पृथक् पृथक् ।
भावेनापि जनाः सोऽयं परिपूर्णतमः स्वयम् ।२५।

परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो नान्य एव हि ।
एककार्यार्थमागत्य कोटिकार्यं चकार ह ॥ २६।

पूर्णः पुराणः पुरुषोत्तमोत्तमः
     परात्परो यः पुरुषः परेश्वरः ।
स्वयं सदाऽऽनन्दमयं कृपाकरं
     गुणाकरं तं शरणं व्रजाम्यहम् ॥ २७ ॥

श्रीगर्ग उवाच -
तच्छ्रुत्वा हर्षितो राजा रोमाञ्ची प्रेमविह्वलः ।
प्रमृश्य नेत्रेऽश्रुपूर्णे नारदं वाक्यमब्रवीत् ॥ २८ ॥

गोलोक खण्ड : अध्याय 1

जो प्रत्येक युग में प्रकट हो, युगधर्म को जानकर, उसकी स्थापना करके, पुन: अंतर्धान हो जाते हैं, भगवान के उन अवतारों को ‘कलावतार’ कहा गया है। 


जहाँ चार व्यूह प्रकट हों- जैसे श्रीराम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न एवं वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरूद्ध, तथा जहाँ नौ रसों की अभिव्यक्ति देखी जाती हो एवं जहाँ बल-पराक्रम की भी पराकाष्ठा दृष्टिगोचर होती हो, भगवान के उस अवतार को ‘पूर्णावतार’ कहा गया है।
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जिसके अपने तेज में अन्य सम्पूर्ण तेज विलीन हो जाते हैं, भगवान के उस अवतार को श्रेष्ठ विद्वान पुरुष साक्षात ‘परिपूर्णम’ बताते हैं। जिस अवतार में पूर्ण का पूर्ण लक्षण दृष्टिगोचर होता है और मनुष्य जिसे पृथक-पृथक भाव के अनुसार अपने परम प्रिय रूप में देखते हैं, वही यह साक्षात ‘परिपूर्णतम’ अवतार है।

 [इन सभी लक्षणों से सम्पन्न] स्वयं परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्ण ही हैं,।

 दूसरा नहीं; क्योंकि श्रीकृष्ण ने एक कार्य के उद्देश्य से अवतार लेकर अन्यान्य करोड़ों कार्यों का सम्पादन किया है।

 जो पूर्ण, पुराण पुरुषोत्तमोत्तम एवं परात्पर पुरुष परमेश्वर हैं, उन साक्षात सदानन्दमय, कृपानिधि, गुणों के आकार भगवान श्रीकृष्ण चन्द्र की मैं शरण लेता हूँ।

यह सुनकर राजा हर्ष से भर गये।

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उनके शरीर में रोमांच हो आया। वे प्रेम से विह्वल हो गये और अश्रुपूर्ण नेत्रों को पोंछकर नारदजी से यों बोले। राजा बहुलाश्व ने पूछा- महर्षे ! साक्षात परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्णचन्द्र सर्वव्यापी चिन्मय गोलोकधाम से उतरकर जो भारत वर्ष के अंतर्गत द्वारकापुरी में विराज रहे हैं- 
इसका क्या कारण है ? ब्रह्मन ! उन भगवान श्रीकृष्ण के सुन्दर बृहत (विशाल या ब्रह्म स्वरूप) गोलोकधाम का वर्णन कीजिये। महामुने ! साथ ही उनके अपरिमेय कार्यों को भी कहने की कृपा कीजिये। मनुष्य जब तीर्थ यात्रा तथा सौ जन्मों तक उत्तम तपस्या करके उसके फलस्वरूप सत्संग का सुअवसर पाता है, तब वह भगवान श्रीकृष्णचन्द्र को शीघ्र प्राप्त कर लेता है। कब मैं भक्ति रस से आर्द्रचित्त हो मन से भगवान श्रीकृष्ण के दास का भी दासानुदास होऊँगा ? जो सम्पूर्ण देवताओं के लिये भी दुर्लभ हैं, वे परब्रह्म परमात्मा आदिदेव भगवान श्रीकृष्ण मेरे नेत्रों के समक्ष कैसे होंगे?

श्रीनारद जी बोले- नृपश्रेष्ठ ! तुम धन्य हो, भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के अभीष्ट जन हो और उन श्रीहरि के परम प्रिय भक्त हो। तुम्हें दर्शन देने के लिये ही वे भक्त वत्सल भगवान यहाँ अवश्य पधारेंगे। ब्रह्मण्यदेव भगवान जनार्दन द्वारका में रहते हुए भी तुम्हें और ब्राह्मण श्रुतदेव को याद करते रहते हैं। अहो ! इस लोक में संतों का कैसा सौभाग्य है 

इस प्रकार श्री गर्ग संहिता में गोलोक खण्ड के अन्तदर्गत नारद- बहुलाश्व् संवाद में ‘श्रीकृष्णम माहातमय का वर्णन’ नामक पहला अध्याय पूरा हुआ।

गर्ग संहिता

गोलोक खण्ड : अध्याय 3

भगवान श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में श्रीविष्णु आदि का प्रवेश; देवताओं द्वारा भगवान की स्तुति; भगवान का अवतार लेने का निश्चय; श्रीराधा की चिंता और भगवान का उन्हें सांत्वना-प्रदान

श्री जनकजी ने पूछा- मुने ! परात्पर महात्मा भगवान श्रीकृष्णचन्द्र का दर्शन प्राप्त कर सम्पूर्ण देवताओं ने आगे क्या किया, मुझे यह बताने की कृपा करें।

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन ! उस समय सबके देखते-देखते अष्ट भुजाधारी वैकुण्ठधिपति भगवान श्रीहरि उठे और साक्षात भगवान श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में लीन हो गये। उसी समय कोटि सूर्यों के समान तेजस्वी, प्रचण्ड पराक्रमी पूर्ण स्वरूप भगवान नृसिंहजी पधारे और भगवान श्रीकृष्ण तेज में वे भी समा गये। इसके बाद सहस्र भुजाओं से सुशोभित, श्वेतद्वीप के स्वामी विराट पुरुष, जिनके शुभ्र रथ में सफेद रंग के लाख घोड़े जुते हुए थे, उस रथ पर आरूढ़ होकर वहाँ आये। उनके साथ श्रीलक्ष्मीजी भी थीं। वे अनेक प्रकार के अपने आयुधों से सम्पन्न थे। पार्षदगण चारों ओर से उनकी सेवा में उपस्थित थे। वे भगवान भी उसी समय श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में सहसा प्रविष्ट हो गये।

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"तदैव चागतः साक्षाद्‌रामो राजीवलोचनः 
धनुर्बाणधरः सीताशोभितो भ्रातृभिर्वृतः ॥६॥

"दशकोट्यर्कसंकाशे चामरैर्दोलिते रथे 
असंख्यवानरेन्द्राढ्ये लक्षचक्रघनस्वने।७।

'लक्षध्वजे लक्षहये शातकौंभे स्थितस्ततः।
श्रीकृष्णविग्रहे पूर्णः सम्प्रलीनो बभूव ह ।८।

इति श्रीगर्गसंहितायां गोलोकखण्डे नारदबहुलाश्वसंवादे आगमनोद्योगवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

अनुवाद:-

तभी साक्षात्- कमल लोचन श्रीराम स्वयं वहाँ पधारे। उनके हाथ में धनुष और बाण थे तथा साथ में श्रीसीताजी और भरत आदि तीनों भाई भी थे।६।

उनका दिव्य रथ दस करोड़ सूर्यों के समान प्रकाशमान था। उस पर निरन्तर चँवर डुलाये जा रहे थे। असंख्य वानर यूथपति उनकी रक्षा के कार्य में संलग्न थे। उस रथ के एक लाख चक्कों से मेघों की गर्जना के समान गम्भीर ध्वनि निकल रही थी।७।

 उस पर लाख ध्वजाएँ फहरा रही थीं। उस रथ में लाख घोड़े जुते हुए थे। वह रथ सुवर्णमय था। उसी पर बैठकर  श्रीराम वहाँ पधारे थे। वे भी श्रीकृष्णचन्द्र के दिव्य विग्रह में लीन हो गये।८।

विदित होना चाहिए कि राम और कृष्ण की किसी प्रकार भी समानता नहीं है।कृष्ण समुद्र हैं तो राम बूँद हैं।

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फिर उसी समय साक्षात यज्ञनारायण श्रीहरि वहाँ पधारे, जो प्रलयकाल की जाज्वल्यमान अग्निशिखा के समान उद्भासित हो रहे थे। देवेश्वर यज्ञ अपनी धर्मपत्नि दक्षिणा के साथ ज्योतिर्मय रथ पर बैठे दिखायी देते थे। वे भी उस समय श्याम विग्रह भगवान श्रीकृष्णचन्द्र में लीन हो गये। तत्पश्चात् साक्षात भगवान नर-नारायण वहाँ पधारे। उनके शरीर की कांति मेघ के समान श्याम थी। उनके चार भुजाएँ थीं, नेत्र विशाल थे और वे मुनि के वेष में थे। उनके सिर का जटा-जूट कौंधती हुई करोड़ों बिजलियों के समान दीप्तिमान था।

राम कहाँ 12 कलाओं से अवतार लेते हैं और कृष्ण16  कलाओं से पूर्ण परमेश्वर स्वरूप में हैं। राम बूँद हैं तो कृष्ण समुद्र है।

गोलोक खण्ड : अध्याय 3

भगवान श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में श्रीविष्णु आदि का प्रवेश; देवताओं द्वारा भगवान की स्तुति; भगवान का अवतार लेने का निश्चय; श्रीराधा की चिंता और भगवान का उन्हें सांत्वना-प्रदान


श्री जनकजी (बहुलाश्व) ने पूछा- मुने ! परात्पर महात्मा भगवान श्रीकृष्णचन्द्र का दर्शन प्राप्त कर सम्पूर्ण देवताओं ने आगे क्या किया, मुझे यह बताने की कृपा करें।


श्रीनारदजी कहते हैं- राजन ! उस समय सबके देखते-देखते अष्ट भुजाधारी वैकुण्ठधिपति भगवान श्रीहरि उठे और साक्षात भगवान श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में लीन हो गये। उसी समय कोटि सूर्यों के समान तेजस्वी, प्रचण्ड पराक्रमी पूर्ण स्वरूप भगवान नृसिंहजी पधारे और भगवान श्रीकृष्ण तेज में वे भी समा गये। इसके बाद सहस्र भुजाओं से सुशोभित, श्वेतद्वीप के स्वामी विराट पुरुष, जिनके शुभ्र रथ में सफेद रंग के लाख घोड़े जुते हुए थे, उस रथ पर आरूढ़ होकर वहाँ आये। उनके साथ श्रीलक्ष्मीजी भी थीं। वे अनेक प्रकार के अपने आयुधों से सम्पन्न थे। पार्षदगण चारों ओर से उनकी सेवा में उपस्थित थे। वे भगवान भी उसी समय श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में सहसा प्रविष्ट हो गये।

फिर वे पूर्णस्वरूप कमल लोचन भगवान श्रीराम स्वयं वहाँ पधारे। उनके हाथ में धनुष और बाण थे तथा साथ में श्रीसीताजी और भरत आदि तीनों भाई भी थे। उनका दिव्य रथ दस करोड़ सूर्यों के समान प्रकाशमान था। उस पर निरंतर चँवर डुलाये जा रहे थे। असंख्य वानर यूथपति उनकी रक्षा के कार्य में संलग्न थे। 

उस रथ के एक लाख चक्कों से मेघों की गर्जना के समान गम्भीर ध्वनि निकल रही थी।

 उस पर लाख ध्वजाएँ फहरा रही थीं। उस रथ में लाख घोड़े जुते हुए थे। वह रथ सुवर्णमय था। 
उसी पर बैठकर भगवान श्रीराम वहाँ पधारे थे। वे भी श्रीकृष्णचन्द्र के दिव्य विग्रह में लीन हो गये।

 फिर उसी समय साक्षात यज्ञनारायण श्रीहरि वहाँ पधारे, जो प्रलयकाल की जाज्वल्यमान अग्निशिखा के समान उद्भासित हो रहे थे। देवेश्वर यज्ञ अपनी धर्मपत्नि दक्षिणा के साथ ज्योतिर्मय रथ पर बैठे दिखायी देते थे। वे भी उस समय श्याम विग्रह भगवान श्रीकृष्णचन्द्र में लीन हो गये। तत्पश्चात् साक्षात भगवान नर-नारायण वहाँ पधारे। उनके शरीर की कांति मेघ के समान श्याम थी। उनके चार भुजाएँ थीं, नेत्र विशाल थे और वे मुनि के वेष में थे। उनके सिर का जटा-जूट कौंधती हुई करोड़ों बिजलियों के समान दीप्तिमान था।

परम बुद्धिमान नरेश ! भगवान विष्णु स्वयं जिनके अंत:करण में आविष्ट हो, अभीष्ट कार्य का सम्पादन करके फिर अलग हो जाते हैं, राजन ! ऐसे नानाविध अवतारों को ‘आवेशावतार’ समझो।
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आवेश अवतार स्थाई नहीं होता है जिस प्रकार किसी पर देवी आ जातीऔर फिर तान्त्रिक के झाड़ -फूँक करने पर चली जाती है उसी प्रकार परशुराम पर भी ईश्वर की आवेशीय ऊर्जा  आती हैऔर फिर चली जाती है।।



गुरुवार, 7 दिसंबर 2023

वैकुण्ठ और शिव लोक नित्य नहीं हैं केवल गोलोक नित्य है।


भगवान नारायण बोले– नारद! आत्मा, आकाश, काल, दिशा, गोकुल तथा गोलोकधाम– ये सभी नित्य हैं। कभी इनका अन्त नहीं होता।
 गोलोकधाम का एक भाग जो उससे नीचे है, वैकुण्ठधाम है।
वह भी नित्य है। ऐसे ही प्रकृति को भी नित्य माना जाता है।
                 "श्रीनारायण उवाच।
नित्यात्मा च नभो नित्यं कालो नित्यो दिशो यथा।
विश्वेषां गोकुलं नित्यं नित्यो गोलोक एव च ।५।

तदेकदेशो वैकुण्ठो लम्बभागः स नित्यकः ।
तथैव प्रकृतिर्नित्या ब्रह्मलीना सनातनी ।६।

यथाऽग्नौ दाहिका चन्द्रे पद्मे शोभा प्रभा रवौ।
शश्वद्युक्ता न भिन्ना सा तथा प्रकृतिरात्मनि।७।

विना स्वर्णं स्वर्णकारः कुण्डलं कर्तुमक्षमः।
विना मृदा कुलालो हि घटं कर्तुं न हीश्वरः।८।

सन्दर्भ:-
ब्रह्म वैवर्त पुराण
प्रकृतिखण्ड: अध्याय 2-
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     (पञ्चप्रकृतितद्‍भर्तृगणोत्पत्तिवर्णनम्)

                 "नारद उवाच
समासेन श्रुतं सर्वं देवीनां चरितं प्रभो ।
विबोधनाय बोधस्य व्यासेन वक्तुमर्हसि ॥१॥

सृष्टेराद्या सृष्टिविधौ कथमाविर्बभूव ह ।
कथं वा पञ्चधा भूता वद वेदविदांवर ॥ २॥

भूता ययांशकलया तया त्रिगुणया भवे।व्यासेन तासां चरितं श्रोतुमिच्छामि साम्प्रतम् ॥३॥

तासां जन्मानुकथनं पूजाध्यानविधिं बुध ।
स्तोत्रं कवचमैश्वर्यं शौर्यं वर्णय मङ्‌गलम्॥४॥

              "श्रीनारायण उवाच
नित्य आत्मा नभो नित्यं कालो नित्यो दिशो यथा।
विश्वानां गोलकं नित्यं नित्यो गोलोक एव च ॥५॥

तदेकदेशो वैकुण्ठो नम्रभागानुसारकः ।
तथैव प्रकृतिर्नित्या ब्रह्मलीला सनातनी।६॥

यथाग्नौ दाहिका चन्द्रे पद्मे शोभा प्रभा रवौ ।
शश्वद्युक्ता न भिन्ना सा तथा प्रकृतिरात्मनि॥ ७॥

विना स्वर्णं स्वर्णकारः कुण्डलं कर्तुमक्षमः ।
विना मृदा घटं कर्तुं कुलालो हि नहीश्वरः।८॥

न हि क्षमस्तथात्मा च सृष्टिं स्रष्टुं तया विना ।
सर्वशक्तिस्वरूपा सा यया च शक्तिमान्सदा॥ ९॥

ऐश्वर्यवचनः शश्चक्तिः पराक्रम एव च ।
तत्स्वरूपा तयोर्दात्री सा शक्तिः परिकीर्तिता ॥१०॥

ज्ञानं समृद्धिः सम्पत्तिर्यशश्चैव बलं भगः ।
तेन शक्तिर्भगवती भगरूपा च सा सदा॥ ११॥

तया युक्तः सदात्मा च भगवांस्तेन कथ्यते ।
स च स्वेच्छामयो देवः साकारश्च निराकृतिः॥ १२॥





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 कृत्रिमाणि च विश्वानि विश्वस्थानि च यानि च ।
अनित्यानि च विप्रेन्द्र स्वप्नवन्नश्वराणि च ।१९।

वैकुण्ठः शिवलोकश्च गोलोकश्च तयोः परः।
नित्यो विश्वबहिर्भूतश्चात्माकाशदिशो यथा ।1.7.२०।

इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे सौतिशौनकसंवादे ब्रह्मखण्डे सृष्टिनिरूपणं नाम सप्तमोऽध्यायः।७।

अनुवाद:-

विप्रवर ! कृत्रिम विश्व तथा उसके भीतर रहने वाली जो वस्तुएँ हैं, वे सब अनित्य तथा स्वप्न के समान नश्वर( नाशवान्) हैं। 

वैकुण्ठ, शिवलोक तथा इन दोनों से परे जो गोलोक है, ये सब नित्य-धाम हैं।

 इन सबकी स्थिति कृत्रिम विश्व से बाहर है।

 ठीक उसी तरह, जैसे आत्मा, आकाश और दिशाएँ कृत्रिम जगत से बाहर तथा नित्य हैं।
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 "इति श्रीब्रह्मवैवर्त महापुराण सौतिशौनकसंवाद ब्रह्मखण्ड- सृष्टिनिरूपणं नामक सप्तमोऽध्यायः।७।

वेदान्त एकेश्वरवाद का उद्घोष करता है।
शिव और विष्णु जब मूलत: श्रीकृष्ण से उत्पन्न हैं। तम और सके गुण के प्रतिनिधि होकर तो उनके लोक शिव लोक और विष्णु लोक( वैकुण्ठ)  भी नित्य नहीं हैं हाँ ब्रह्मा के लोक की अपेक्षा अधिक आयु वाले हो सकते हैं। क्यों कि ब्रह्मा रजोगुणी हैं। रजो गुण सतोगुण और तमोगुण के मध्य में उनका ही मिश्रित रूप है। रजोगुण हरित वर्ण है।सतोगुण नील वर्ण है। और तमोगुण पीतवर्ण है।

अथवा श्वेत सत लाल रज और काला तमोगुण है।



 : तदैक्षत् बहु स्यां प्रजायेयति तत्तेजोऽसृजत् तत्तेज् अक्षत् बहु स्यां प्रजायेयति तदपोऽसृजत्। तस्माद्यत्र क्वच शोचति स्वेदते वा पुरुषस्तेजस एव तदध्यापो जायन्ते ॥ 6.2.3 ॥

तदैक्षत बहु स्याम प्रजायेति तत्तेजोऽसृजता तत्तेजा अक्षत बहु स्याम प्रजायेति तदपोऽसृजता | तस्माद्यत्र क्वच शोचति स्वेदते वा पुरुषस्तेजस एव तदध्यपो जायन्ते || 6.2.3 ||

3. उस साक्षत्कार ने निर्णय लिया: 'मैं अनेक हो गया हूं। मैं जन्म लूंगा।' फिर उसने आग पैदा कर दी. उस आग ने यह भी तय कर दिया: 'मैं बहुत हो जाऊंगी।' मैं जन्म लूंगा।' फिर अग्नि से जल उत्पन्न हुआ। ऐसे में जब भी या जहां भी कोई व्यक्ति शोक मनाता है या खाना खाता है, तो वह जल उत्पन्न करता है।

शब्द-शब्द-शब्द:
तत् , वह [अस्तित्व]; अक्षरशत , निर्णय लिया गया ; बहु स्याम , मैं बहुत हो जाऊँगा; पेजयेय इति , मेरा जन्म होगा; तत् , वह [अस्तित्व] ; असृजता , निर्मित; तेजः , अग्नि; तत् तेजः , वह [अग्नि के रूप में अनुभव]; अक्षरशत , निर्णय लिया गया ; बहु स्याम , मैं बहुत हो जाऊँगा; पेजयेय इति , मेरा जन्म होगा; तत् , वह [अग्नि]; आपः , जल ; असृजता , निर्मित; तस्मात् , इसी प्रकार ; यात्रा क्वा सीए , जब भी और जहां भी; पुरुषः , एक व्यक्ति; शोकति , दुःखी; पान आना , या पान आना ; तत् , [ऐसा होता है] कि; तेजसः एव , अग्नि से; आपः अधिजायन्ते , पानी आता है।

टिप्पणी:
अक्षत शब्द का अर्थ है 'देखा,' 'सोचा,' या 'निर्णय लिया।' यह केवल चेतन सिद्धांत ही लागू हो सकता है, क्योंकि केवल चेतन सिद्धांत ही निर्णय ले सकता है, सोच सकता है या देख सकता है। और केवल एक चेतन प्राणी ही यह कह सकता है कि वह अनेक होगा।

शास्त्र कहते हैं कि यह साक्षात, या ब्रह्म , बिना किसी क्षण के एक है, हमेशा एक जैसा, विपरीत दिशा और विपरीत दिशा है। तो यह एक ही समय में अनेक कैसे हो सकते हैं? वेदांत का कहना है कि यह मिट्टी की एक आंत की तरह होती है जो कभी-कभी पोकर, कप आदि के अलग-अलग रूप में दिखाई देती है या यह तितली की तरह होती है जो कभी-कभी सांप की तरह दिखती है। परिवर्तन केवल नाम और रूप में है। यह कोई वास्तविक परिवर्तन नहीं है.

वेदांत कहावत है, यह बात उन सभी पर लागू होती है जिन्हें हम इस दुनिया में देखते हैं। विशिष्ट होने वाली विविधता के मूल में एकता है। यह एकता-यह एक-विविधता का समर्थन करती है। यही वह है जो अनेक हो गया है, परन्तु केवल दिखावे में। पृथ्वी के उदाहरण पर पृथ्वी वापस आती है तो मिट्टी ही रहती है, हालाँकि देखने में यह एक ढेलेदार या कोई पोक या किसी अन्य चीज़ का रूप ले सकती है।

यह एक उपयुक्त वर्णन है 'अनेकता में एकता'। यह ब्रह्म ही है जो सब कुछ बन गया है - अंतरिक्ष, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी।

फिर प्रश्न यह है कि अग्नि, जो निर्जीव है, कैसी सोच हो सकती है? इसका उत्तर यह है कि यहाँ अग्नि का अर्थ ब्रह्म है। अग्नि के रूप में ब्रह्म का अभ्यास किया जा रहा है। ब्रह्म ही हर वस्तु का स्रोत है। ये आधार है, वास्तविकता है. जिस प्रकार पृथ्वी धले या घड़े के रूप में हो सकती है, उसी प्रकार ब्रह्म अग्नि, जल या किसी और वस्तु के रूप में हो सकती है।

ऐसा नहीं है कि ब्रह्म में कोई परिवर्तन नहीं होता। ब्रह्म, ब्रह्म ही रहता है। यह सत, शाश्वत सत्ता है। यह पूर्ण है. यह कभी भी किसी भी चीज़ से वातानुकूलित नहीं होता है। जब यह कहा जाता है कि यह 'अनेक' होगा, तो इसका अर्थ यह है कि मिट्टी या सोना जैसे कई सिद्धांतों में प्रकट हो सकते हैं। लेकिन यह ध्यान रखना होगा कि यह अनुभव भी शुद्ध निजी है।
छान्दोग्य- उपनिषद-
श्लोक 6.2.3
[12/7, 8:55 PM] yogeshrohi📚: गोप-गोपाल ,गोसंख्य, गोधुक्-आभीर,बल्लव:।५७।

(अमरकोश द्वितीय काण्ड)
[12/7, 10:23 PM] yogeshrohi📚: गोमहिष्यादिकं धनं यदूनामिदं यादवं स्यात् " गवादि यादवं वित्तं  (इति बोपपालित)= 
गाय भैंस आदि यादवों का धन है गो आदि यादवों का वित्त(धन) है।

बोपपालितकोश-

संस्कृत भाषा का विकास- इतिहास-

  • संस्कृत > सम् + सुट् + 'कृ करणे' + क्त, ('सम्पर्युपेभ्यः करोतौ भूषणे' इस सूत्र से 'भूषण' अर्थ में 'सुट्' या सकार का आगम/ 'भूते' इस सूत्र से भूतकाल(past) को द्योतित करने के लिए संज्ञा अर्थ में क्त-प्रत्यय /कृ-धातु 'करणे' या 'Doing' अर्थ में) अर्थात् विभूूूूषित, समलंकृत(well-decorated) या संस्कारयुक्त (well-cutured)।

क्या संस्कृत भाषा को पहली शताब्दी में बनाया गया?

कुछ दिनों पहले Reborn Manish ji ने लिखा था कि संस्कृत पहली शताब्दी की भाषा है न कि 1500 ई.पू. की जब ऋग्वेद के अधिकाँश भागों की रचना हुई, और ऐसा लिखने वाले ये अकेले नहीं, नवभाषावैज्ञानिक तो इसे बहुत पहले से लिखते आ रहे हैं।

ख़ैर, हमें यह देखना है कि क्या वाकई संस्कृत भाषा, जिसे ये लोग वैदिक भी मानते हैं(पर वैदिक और संस्कृत में अंतर है, हाँ वैदिक को प्रोटो संस्कृत कहा जा सकता है) पहली शताब्दी के आसपास बनाई गई थी?
ध्यान दें कि ऐसा लिखने वालों का यह भी कहना है कि जब संस्कृत ही पहली शताब्दी में बनी तो संस्कृत भाषा में ऋग्वेद जैसे ग्रन्थ का रचनाकाल तो और बाद का है। 
जबकि सभी देशी-विदेशी इतिहासकार और भाषावैज्ञानिक वैदिक श्रुति भाषा और लिखित संस्कृत में काफी अंतर बताते हैं।

पहले तो ये जान लें कि "संस्कृत" शब्द का सबसे पहला आर्कियोलॉजिकल एविडेन्स छठी शताब्दी का है, फिर तो  इन लोगों के अनुसार किसी भाषा का संस्कृत नाम भी इससे पुराना नहीं हो सकता और ऋग्वेद की पांडुलिपियाँ भी चौदहवीं सदी का उपलब्ध है तो ऋग्वेद भी तभी का हुआ😊 

उस पोस्ट के अनुसार संस्कृत एक संस्कारित भाषा है यानी सुधरा हुआ, सुंदर और बेहतर किया हुआ। हाँ यह बात सही है, संस्कृत का शाब्दिक अर्थ होता है संस्कारित और ऐसा माना जाता है कि पाणिनि ने व्याकरण ग्रन्थ अष्टध्यायी बनाकर इसका संस्कार किया था(पाणिनि कब हुए इसका सटीक समय बताना बड़ा मुश्किल है,बौद्ध एवं जैन ग्रन्थ उन्हें नन्दो के समय का बताते हैं अर्थात चौथी-पाँचवीं शताब्दी ई. पू. बाकी पाणिनि ई. पू. के पहले हो चुके थे इसकी सूचना अश्वघोष के ग्रन्थ देते ही हैं)। 

उनका कहना है, संस्कृत पाली से साफ सुधरी और विकसित भाषा है इसलिये यह पाली से प्राचीन नहीं हो सकती(यह भी सही है पर ऐसा लिखते समय वे प्राकृत भाषा को भूल जाते हैं जिसका उपयोग हमारे यहाँ के प्राचीनतम शिलालेखों में हुआ है, पाली उसी प्राकृत का एक क्षेत्रीय रूप है पर दोनों में एक महीन अंतर है)।

आगे वे संस्कृत भाषा के उत्पत्ति और विकास के लिए उपलब्ध प्राचीनतम भारतीय शिलालेखों का प्रमाण देते हैं जिनमें वाकई शुरुआती संस्कृत का कच्चा रूप(बेसनगर, अयोध्या, घोसुंडी अभिलेख) और फिर 100-200 साल के अंदर ही उसका अति परिष्कृत रूप(रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख) देखने को मिलता है।

अब नया सवाल है कि क्या वाकई संस्कृत की उत्पत्ति और विकास को शिलालेखों की लिपि के आधार पर तय किया जा सकता है? 

इसका जवाब है नहीं, संस्कृत या किसी भी भाषा की उत्पत्ति लिपि के आधार पर तय नहीं की जा सकती क्योंकि लिपि या लेखन का विकास भाषा बनने के कई शताब्दियों बाद होता है, इसके लिए उस भाषा का प्रयोग भी विस्तृत क्षेत्र और व्यवहार में आना चाहिए। लिपि के अक्षरों के विश्लेषण से केवल भाषा के लिखित रूप के बारे पता लग सकता है और यह उसके होने का निर्विवाद प्रमाण भी है कि उस समय तक उस भाषा का विकास और व्यवहार इतना हो चुका था कि उसे राइटिंग फॉर्म दिया जा चुका था यानी उसके लिखित प्रमाण को उस भाषा का प्राचीनतम आर्कियोलॉजिकल एविडेन्स माना जायेगा लेकिन यह भारतीय उपमहाद्वीप के लिए सटीक नहीं जहाँ किसी भी ज्ञात भाषा का लिखित रूप मात्र 2400 साल पुराना है। सिंधु घाटी सभ्यता में लिपियाँ मिली हैं पर भाषा क्या थी? हम नहीं जानते, इसलिये इस बहस में यह शामिल नहीं।

प्राचीन भारतीय भाषाओं की उत्पत्ति और विकास लिपि के आधार पर और भी तय नहीं हो सकती क्योंकि भारत की सभी धार्मिक किताबें जिनमें बौद्ध त्रिपिटक और जैन आगम भी शामिल हैं, शुरुआत में श्रुत परम्परा में ही थे, इनका लेखन भी इनकी रचना के बहुत बाद पहली शताब्दी ई. के आसपास हुआ।

तो क्या लिपि के अक्षरों के हिसाब से संस्कृत भाषा बनने का दावा किया जा सकता है? यानी संस्कृत को बोलने से पहले लिखने के लिए बनाया गया?

अब अगर केवल लिपि या अक्षरों की बनावट के आधार पर तय करना हो तो तमिल भाषा भी तीसरी और चौथी शताब्दी में बनाई हुई बताई जाएगी क्योंकि उसके पहले दक्षिण के शिलालेखों में प्राकृत भाषा ही है और यहाँ भी संस्कृत के जैसे तमिल का क्रमशः विकास हो रहा लिपि के अक्षरों से। ध्यान दें कि केवल लिपि के ऊपरी हिस्से की बनावट से ही दक्षिण की ब्राह्मी 'द्रविड़ लिपि' बन जाती है।

इस नियम को अप्लाई करने में सबसे ज्यादा कठिनाई प्राकृत/पाली भाषा पर ही आएगी क्योंकि प्राकृत भाषा का भी सबसे पुराना लिखित प्रमाण संस्कृत से मात्र 200 साल पुराना है और इन प्राचीन शिलालेखों में प्राकृत का भी जन्म और विकास ठीक संस्कृत के ही जैसा दिखाई देता है,इसके लिए आप अशोक के अभिलेखों से ठीक पहले चंद्रगुप्त मौर्य के सोहगौरा और महास्थान लेख को पढ़ें। इसमें जो प्राकृत भाषा है वह अशोक के अभिलेखों की प्राकृत भाषा से अल्पविकसित है,दीर्घ स्वरों और सयुंक्त अक्षरों का अभाव है जबकि अशोक के अभिलेखों में धीरे-धीरे कम मात्रा में ही दीर्घ स्वरों और संयुक्त अक्षरों को देखा जा सकता है, अधिकाँश संयुक्त अक्षर भी आधे-आधे नहीं बल्कि ऊपर-नीचे रखकर बनाये गए हैं। अशोक के अभिलेखों में ही 20-30 साल के अंदर प्राकृत के अक्षरों का एक विकासक्रम दिखता है, क्षेत्र अनुसार लिपि के अक्षर भी बदले हुए हैं।
 
जबकि प्राकृत भाषा इस 2400 साल पुराने लिखित शिलालेखों से भी हजारों साल पुरानी एक प्राकृतिक भाषा है जो यहाँ के लोगों ने बहुत पहले बोलना शुरू किया। फिर 2400 साल पहले यूनानी, ईरानी आदि लोगों के लिखित दस्तावेजों को देखकर हमने भी अपनी लिपि बनानी शुरू की जिससे प्राकृत भाषा को लिखा जा सके।

प्राकृत उस समय की सर्वसुलभ आम लोगों और प्रशासन की भाषा थी(अशोक के शिलालेखों के अनुसार) जबकि वैदिक भाषा गिनेचुने पुरोहितों की जो अपनी भाषा और साहित्य को सार्वजनिक करने से परहेज करते थे।
प्राकृत का लिखित रूप आने के बाद धीरे-धीरे वैदिक छंदस और प्राकृत भाषाओं के मेल से बनी संस्कृत को भी लिखने के अक्षरों का निर्माण किया गया जो पहली शताब्दी के आसपास देखने को मिलती है फिर भी संस्कृत को वर्तमान शुद्ध रूप में लिखने के लिए एक विशेष लिपि का अभाव था जिसे नागरी लिपि बनाकर आठवीं सदी में पूरा किया गया(इसके पहले यह सिद्धमातृका और शारदा लिपि में था)।

जहाँ तक मैंने पढ़ा है,लिपि और भाषावैज्ञानिकों के अनुसार अक्षर या लिपि के आधार पर भाषा के विकास को नहीं देखना चाहिए। बल्कि उस भाषा का नैचुरल एवोल्यूशन कैसे हुआ यानी कि वर्ड्स और सेन्टेंस कैसे बन रहे हैं। वर्ड्स का फॉर्मेशन नेचुरल है या आर्टिफिशियल यानी संधि समास का क्या प्रयोग है वर्ड फॉर्मेशन में यह देखना चाहिए क्योंकि रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख जो विशुद्ध संस्कृत का सबसे लम्बा लिखित दस्तावेज है, संस्कृत की गौड़ी शैली में उसकी सामासिक और संधि विशेषताएँ, महाभारत, रामायण और पुराणों की भाषा से अधिक जटिल और अलंकृत है।
यह इतनी जटिल है जितनी सातवीं शताब्दी में रचित "हर्षचरित" है।
 तभी तो एक पोस्ट में नवभाषावैज्ञानिक महोदय ने सवाल उठाया था कि रुद्रदामन का अभिलेख दूसरी शताब्दी का नहीं सातवीं शताब्दी का है क्योंकि भाषा की ठीक यही जटिलता हर्षचरित में है।

इस बहस में सबसे अच्छा होगा कि पहली शताब्दी लिखित अश्वघोष की बुद्धचरित पर बात किया जाय जिनके पहले की कुछ बुद्धिष्ट ग्रँथों की भाषा शिलालेखों की संस्कृत के जैसी ही पाली/प्राकृत मिक्स है, तभी तो इस लिखित संस्कृत को कई विद्वान बुद्धिष्ट हाईब्रिड संस्कृत बताते हैं यानी इस विशेष संस्कृत का निर्माण बौद्ध मठों में हुआ जहाँ पाली और संस्कृत दोनों भाषाओं के लोग शास्त्रार्थ करते थे।

रही बात ऋग्वेद और उसकी भाषा की प्राचीनता की तो अबतक सभी देशी-विदेशी इतिहासकार और भाषावैज्ञानिक एकमत से लिखते हैं कि ऋग्वेद की भाषा और विषयवस्तु अवेस्ता से काफी मिलती है, कई अन्य प्रमाण भी ऋग्वेद का रचनाकाल 1500- 1000 ई.पू. निर्धारित करते हैं जिसपर अलग से कई बार लिखा गया है। कुछ एविडेन्स फोटो के रूप में दे रहा।

एक लिंक भी है उसे खोलिए। 

बाकी इस बहस में कई और एविडेन्स हैं जिनपर बात करने से पोस्ट बहुत लम्बी हो जाएगी इसलिए आज केवल उसी आर्कियोलॉजिकल प्रमाण पर लिखा हूँ जिसपर इन लोगों की थ्योरी टिकी है।

इस मैटर पर आप चाहें तो लिपि विद्वान गुणाकर मुले की किताब "भारतीय लिपियों की कहानी" मंगवाकर पढ़ सकते हैं जो इस विषय पर कम शब्दों में समझाने वाली किताब है, हिंदी में गौरीशंकर ओझा, परमेश्वरी लाल गुप्त की किताबें भी हैं। अंग्रेजी में तो बहुत हैं, डीसी सरकार या ब्यूहलर को पढ़ें। एपिग्राफी ऑफ इंडिया भी देख सकते हैं।

अंतिम बात कि संस्कृत या वैदिक भाषा न तो देवताओं की भाषा है और न ही सभी भाषाओं की जननी या आदि भाषा। इसलिये भाषा की उत्कृष्टता और प्राचीनता को लेकर मिथ्याभिमान से बचें क्योंकि भाषा के लिखित आर्कियोलॉजिकल एविडेन्स हमारे यहाँ नहीं बल्कि मेसोपोटामिया की सभ्यता में मिलती है।

सुर और असुरों के गुण-दोष-

देव अथवा सुरगण सुरापान करते और उन्मत्त होकर विलास करते थे।
इसके साक्ष्य स्वयं रामायण ,महाभारत और पुराणों में भी हैं।

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असुराः तेन दैतेयाः सुराः तेन अदितेः सुताः।
हृष्टाः प्रमुदिताः च आसन् वारुणी ग्रहणात् सुराः॥ 
अनुवाद
दैत्य वे असुर, अदिति के पुत्र सुर;  प्रसन्न, स्वस्थ सुरों ने वारुणी को ग्रहण किया.।

असुं राति लाति ददाति इति असुरः
असुषु रमन्ते इति असुरः 
असु क्षेपणे, असून प्राणान राति ददाति इति असुरः
सायण के अनुसार: असुर = बलवान, प्राणवान
निघंटु के अनुसार: असुर = जीवन से भरपूर, प्राणवान।

असुर और सुर दौंनों के गुण दोषों पर निष्पक्ष मूल्यांकन होना ही चाहिए -

वाल्मीकि रामायण  के बालकाण्ड का पैतालीसवां सर्ग के श्लोक संख्या ३६ से ३८ , में प्रसंग है  समुद्र मंथन का --

जिसमें विश्वामित्र राम लक्ष्मण को कुछ वेद पुराण सुना रहे हैं और उसी के अनुसार  समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों के बारे बताते हुए कहते हैं ।

असुरास्तेंन दैतेयाः सुरास्तेनादितेह सुताः 
हृष्टा: प्रमुदिताश्चासन वारुणीग्रह्नात सुराः। (३८)

वारुणी ( वाइन)को   ग्रहण करने से देवता लोग हर्ष से उत्फुल्ल एवं आनंदमग्न हो गए )

इसके पहले और बाद के दो श्लोकों में समुद्रमंथन से वरुण की कन्या वारुणी "जो सुरा की अभिमानिनी देवी थी" के प्रगट होने और दैत्यों द्वारा उसे ग्रहण न करने और देवों द्वारा इन अनिनद्य सुन्दरी को ग्रहण करने का उल्लेख है।
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असुर देवताओं के सबसे प्रबल शत्रुओं में गिने जाते थे। उनकी संस्कृति देवों से भिन्न थी ।

पौराणिक धर्म ग्रंथों और ब्राह्मण- मान्यताओं के अनुसार भी असुरों और देवों में सदा युद्ध होता रहा। 

असुरों ने भारत में अनेकों वर्ष तक शासन किया था। इसके बाद उन्होंने ईरान के निकटवर्ती राज्यों पर विजय प्राप्त की और वहाँ अपना साम्राज्य स्थापित किया। 

ईसाईयों की धार्मिक पुस्तक 'बाईबल' मे भी असुर राजाओं का उल्लेख है। 
 
असुर का अर्थ
असुर शब्द 'असु' अर्थात 'प्राण', और 'र' अर्थात 'वाला' (प्राणवान् अथवा शक्तिमान) से मिलकर बना है। 

बाद के समय में धीरे-धीरे असुर भौतिक शक्ति का प्रतीक हो गया। 

विज्ञान के आदि प्रवर्तक अशीरिया के अशीरी लोग ही थे।

ऋग्वेद में 'असुर' वरुण तथा दूसरे देवों के विशेषण रूप में व्यवहृत हुआ है, जिसमें उनके  प्रज्ञा वान और बलशाली होने के गुणों का पता लगाता है।

 किंतु परवर्ती युग में असुर का प्रयोग देवों (सुरों) के शत्रु रूप में प्रसिद्ध हो गया। सुर की विपरीत असुर हो गया।

देवताओं से संघर्ष
असुरों ने लगातार देवों के साथ युद्ध किया और इनमें से कई युद्धों में वे प्राय: विजयी भी होते रहे। उनमें से कुछ ने तो सारे विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित किया, जब तक कि उनका संहार इन्द्र, विष्णु, शिव आदि देवों ने नहीं किया।

 देवों के शत्रु होने के कारण उन्हें ही असुरों ही दुष्ट दैत्य कहा गया है, किंतु सामान्य रूप से वे दुष्ट नहीं थे।

 उनके गुरु भृगु के पुत्र शुक्राचार्य थे, जो देवगुरु बृहस्पति के तुल्य ही ज्ञानी और राजनयिक थे।

ग्रंथों में उल्लेख
महाभारत एवं अन्य प्रचलित दूसरी कथाओं के वर्णन में असुरों के गुणों पर प्रकाश डाला गया है।

 साधारण विश्वास में वे मानव से श्रेष्ठ गुणों वाले विद्याधरों की कोटि में आते हैं।

'कथासरित्सागर' की आठवीं तरङ्ग में एक प्रेम पूर्ण कथा में किसी असुर का वर्णन नायक के साथ हुआ है। 

संस्कृत के धार्मिक ग्रंथों में असुर, दैत्य एवं दानव में कोई अंतर नहीं दिखाया गया है, किंतु प्रारम्भिक अवस्था में दैत्य एवं दानव असुर जाति के दो विभाग समझे गये थे।

 दैत्य 'दिति' के पुत्र एवं दानव 'दनु' के पुत्र थे।

पुराणों में आये उल्लेखों से स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण के उदय से पूर्व कंस ने यादव गणतंत्र के प्रमुख अपने पिता और मथुरा के राजा उग्रसेन को बंदी बनाकर निरंकुश एकतंत्र की स्थापना करके अपने को सम्राट घोषित किया था। 

उसने यादव अथवा (आभीरों) को दबाने के लिए इस क्षेत्र में असुरों को भारी मात्रा में ससम्मान बसाया था,

वाल्मीकि रामायण कार ने वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड सर्ग 45 के 38 वें छन्द में )
सुर-असुर की परिभाषा करते हुये लिखा है-
“सुरा पीने वाले सुर और सुरा नहीं पीने वाले असुर कहे गये l”
 

सुराप्रतिग्रहाद् देवा: सुरा इत्यभिविश्रुता:।
अप्रतिग्रहणात्तस्या दैतेयाश्चासुरा: स्मृता:॥
अनुवाद:-
सुरा के प्रति आग्रहीत सुरा ग्रहण करने से देवगण सुर कहलाए। और सुरा ग्रहण न करने से दैत्य असुर कहलाए ।

उक्त श्‍लोक के अनुसार सुरा का अर्थ ‘मादक द्रव्य-शराब’ है. चूंकि देवता लोग मादक तत्व सुरा का प्रारम्भ से पान (सेवन) करते थे

कृष्ण देव पूजा के विरोध में क्यों थे ? 

परन्तु इस बात के -परोक्षत: संकेत प्राप्त होते हैं कि यज्ञों में बलि के नाम पर पशुओं की निर्मात  पूर्वक हत्या लोक कल्याण में नहीं थी।

इसीलिए कृष्ण देव संस्कृति के  विद्रोही  पुरुष थे।
उन्होंने वन पशु और पर्वतों को अपना उपास्य स्वीकार किया।

इसी लिए उनके चरित्र-उपक्रमों  में इन्द्र -पूजा का विरोध परिलक्षित होता है ।👇

"महाभारत अनुशासन पर्व-13.65.42

एकं गोब्राह्मणं तस्मात्प्रवदन्ति मनीषिणः।41।

रन्तिदेवस्य यज्ञे ताः पशुत्वेनोपकल्पिताः।
अतश्चर्मण्वती। राजन्गोचर्मभ्यः प्रवर्तिता।
पशुत्वाच्च विनिर्मुक्ताः प्रदानायोपकल्पिताः।42।

"अनुवाद:-
गाय और ब्राह्मण को मनीषी पुरुष एक कहते हैं। राजा रन्तिदेव के यज्ञ में गायें पशु रूप में दान देने के लिए संकल्पित की गयीं थीं। इसलिए गायों के चमड़ों से वहाँ चर्मण्वती नदी प्रवाहित हो गयी थी वे सभी गोंऐं पशुत्व से मुक्त और दान देने के लिए संकल्पित की गयीं थी।४२-४३ 
( महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय- ६६)

इसीलिए कृष्ण को ऋग्वेद के अष्टम मण्डल में अदेव
( देवों को न मानने वाला ) कहकर सम्बोधित किया गया है ।

श्रीमद्भगवद् गीता के कुछ पक्ष प्रबलत्तर हैं इस बात के  कि कृष्ण 
देव विषयक कर्मकाण्डों का विरोध करते हैं।

कारण यही था कि यज्ञ को नाम पर निर्दोष जीवों की हत्या होती थी।

श्रीमद्भागवतम्
भागवत पुराण   स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास    अध्याय 5: नारद द्वारा वसुदेव को दी गई शिक्षाओं का समापन  श्लोक 13

श्लोक  11.5.13 भागवत पुराण 
"यद् घ्राणभक्षो विहित: सुराया-
स्तथा पशोरालभनं न हिंसा।
एवं व्यवाय: प्रजया न रत्या
इमं विशुद्धं न विदु: स्वधर्मम् ॥१३॥
 
शब्दार्थ:- यत्—चूँकि; घ्राण—सूँघ कर; भक्ष:—खाओ; विहित:—वैध है; सुराया:—मदिरा का; तथा—उसी तरह; पशो:—बलि पशु का; आलभनम्—विहित वध; न—नहीं; हिंसा— हिंसा;वध  एवम्—इसी प्रकार से; व्यवाय:—यौन; प्रजया—सन्तान उत्पन्न करने के लिए; न—नहीं; रत्यै—इन्द्रिय-भोग के लिए; इमम्—यह  (जैसाकि पिछले श्लोक में कहा गया है); विशुद्धम्—अत्यन्त शुद्ध; न विदु:—वे नहीं समझ पाते; स्व-धर्मम्—अपने उचित कर्तव्य को ।.
 
अनुवाद:- वैदिक आदेशों के अनुसार, जब यज्ञोत्सवों में सुरा प्रदान की जाती है, तो उसको पीकर नहीं अपितु सूँघ कर उपभोग किया जाता है। इसी प्रकार यज्ञों में पशु-बलि की अनुमति है, किन्तु व्यापक पशु-हत्या के लिए कोई प्रावधान नहीं है। धार्मिक यौन-जीवन की भी छूट है, किन्तु विवाहोपरान्त सन्तान उत्पन्न करने के लिए, शरीर के विलासात्मक दोहन के लिए नहीं।

किन्तु दुर्भाग्यवश मन्द बुद्धि भौतिकतावादी जन यह नहीं समझ पाते कि जीवन में उनके सारे कर्तव्य नितान्त आध्यात्मिक स्तर पर सम्पन्न होने चाहिए।
भागवत पुराण का उपर्युक्त श्लोक यद्यपि कृष्ण के हिंसा वरोधी मत को अभिव्यक्त करने में समर्थ नहीं है। और देवयजन ( यज्ञ)के नाम पर हिंसामूलक यज्ञ का विरोध न करके उससे बचने का तो रास्ता बता रहा है। परन्तु कृष्ण देव पूजा के इसी हिंसामूलक उपक्रम के कारण विरोधी भी थे।
  
तात्पर्य:- पशु-यज्ञ के सम्बन्ध में मध्वाचार्य ने भी देव पजा  का पक्ष बड़ी सहजता से लिया है। उन्होंने  निम्नलिखित कथन दिया है—

यज्ञेष्वालभनं प्रोक्तं देवतोद्देशत: पशो:।
हिंसानाम तदन्यत्र तस्मात् तां नाचरेद् बुध:॥
यतो यज्ञे मृता ऊर्ध्वं यान्ति देवे च पैतृके।
अतो लाभादालभनं स्वर्गस्य न तु मारणम् ॥
भावार्थ:-
इस कथन के अनुसार कभी कभी  किसी देवता विशेष की तुष्टि के लिए पशु-यज्ञ करने की संस्तुति करते हैं। 
किन्तु यदि कोई व्यक्ति वैदिक नियमों का दृढ़ता से पालन न करते हुए अंधाधुंध पशु-वध करता है, तो ऐसा वध वास्तविक हिंसा है।
आखिर रूढ़िवादी परम्पराओं का भी निर्वहन करना क्या बुद्धि मानी है?

और इसे आज किसी भी बुद्धिमान व्यक्ति द्वारा स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। 
यदि पशु-यज्ञ सही ढंग से सम्पन्न किया जाता है, तो बलि किया गया पशु तुरन्त देवलोक तथा पितृलोक को चला जाता है।

इसलिए ऐसा यज्ञ पशुओं का वध नहीं है, अपितु वैदिक मंत्रों की शक्ति-प्रदर्शन के लिए होता है, जिसकी शक्ति से बलि किया हुआ पशु, तुरन्त उच्च लोकों को प्राप्त होता है।

किन्तु चैतन्य महाप्रभु ने इस युग में ऐसे पशु-यज्ञ का पूर्ण  निषेध किया है,

क्योंकि मंत्रों का उच्चारण करने वाले योग्य ब्राह्मणों का अभाव है और तथाकथित यज्ञशाला सामान्य कसाई-घर का रूप धारण कर लेती है।

इसके पूर्व के युग में जब पाखण्डी लोग वैदिक यज्ञों का गलत अर्थ लगाकर, यह सिद्ध करना चाहते थे कि पशु-वध तथा मांसाहार वैध है,

विचारणीय प्रश्न यह है कि मुसलमान भी कुरबानी अथवा हलाल कलमा पढकर करते हैं ।
क्या ईश्वर कुरबानी का भूखा है। देवता माँस भक्षी हैं क्या?

यद्यपि कृष्ण ने यज्ञ को नाम पर पशु वध का निषेध करते हुए ही देव यज्ञ को बन्द करा दिया था।
अधिकतर यज्ञों में पशुबध अनिवार्य था।

इसी लिए इस बोध को बन्द करने के लिए  स्वयं भगवान् बुद्ध ने अवतार लिया और उनकी घृणित उक्ति को अस्वीकार किया।
इसका वर्णन गीत गोविन्द कार  जयदेव ने किया है—
"निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातं सदयहृदय दर्शित पशुघातम्।
केशव धृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे ॥
अतस्तु भगवता कृष्णेन हिंसायज्ञं कलौ युगे समाप्य नवीनमतो विधीयते।3.4.19.६०।

अनुवाद:-इसी कारण से भगवान -कृष्ण ने सभी देव-यज्ञों में  विशेषत: इन्द्र के हिंसा पूर्ण यज्ञों पर रोक लगा दी  क्यों कि यज्ञों में निर्दोष  पशुओं की हिंसा होती। कृष्ण ने कलियुग में हिंसात्मक यज्ञों को समाप्त कर नये मत का विधान किया ।६०।

समाप्य कार्तिके मासि प्रतिपच्छुक्लपक्षके।अन्नकूटमयं यज्ञं स्थापयामास भूतले ।६१।
अनुवाद:- ★-
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा तिथि में भूतल पर कृष्ण ने अन्नकूट का  विधान किया।61
विशेष:- अन्नकूट-एक उत्सव जो कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से पूर्णिमा पर्यन्त यथारुचि किसी दिन (विशेषत? प्रतिपदा को वैष्णवों के यहाँ)होता है । उस दिन नाना प्रकार के भोजनों की ढेरी लगाकर भगवान को भोग लगाते हैं। यह त्यौहार कृष्ण द्वारा वैदिक हिंसा पूर्ण यज्ञों के विरोध में स्थापित किया गया विधान था।

"देवराजस्तदा क्रुद्धो ह्यनुजं प्रतिदुःखितः ।  
वज्रं सप्लावयामास तदा कृष्णः सनातनीम् ।   प्रकृतिं स च तुष्टाव लोकमङ्गलहेतवे ।६२।
अनुवाद:-★
कृष्ण द्वारा स्थापित इस अन्नकूट उत्सव से क्रोधित होकर देवराज इन्द्र ने सम्पूर्ण व्रजमण्डल को मेघ द्वारा डुबो देने का कार्य प्रारम्भ कर दिया। तब कृष्ण ने सनातन प्रकृति की आराधना की इससे वह भगवती प्रकृति लोक कल्याण के लिए प्रसन्न हो गयीं ।६२।    

तदा सा प्रकृतिर्माता स्वपूर्वाद्दिव्यविग्रहम् ।
राधारूपं महत्कृत्वा हदि कृष्णस्यचागता।६३।
अनुवाद:- ★
तभी अपने पूर्वाद्धदिव्य शरीर से महान राधा रूप धारण किया तथा कृष्ण के हृदय में प्रवेश कर गयीं।६३।    
            
तच्छक्त्या भगवान्कृष्णो धृत्वा गोवर्धनं गिरिम्। नाम्ना गिरिधरो देवः सर्वपूज्यो बभूव ह ।६४।अनुवाद:- ★
तब उस शक्ति द्वारा कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत धारण किया तब से उनका नाम गिरिधर हो गया और वे सबके पूज्य हो गये।64।
राधाकृष्णस्स भगवान्पूर्णब्रह्म सनातनः।       
अतः कृष्णो न भगवान्राधाकृष्णः परः प्रभुः।६५।
अनुवाद:-★ 
वे राधाकृष्ण भगवान् सनातन पूर्णब्रह्म हैं। तभी तो कृष्ण को केवल कृष्ण नहीं कहते हैं। वे राधाकृष्ण भगवान् कहे गये हैं यह संयुक्त नाम ही पूर्ण ब्रह्म का वाचक है।

वे ही सबसे परे तथा प्रभु ( सर्व समर्थ) हैं।६५।
इति श्रुत्वा वचस्तस्य मध्वाचार्यो हरिप्रियः।    
शिष्यो भूत्वा स्थितस्तत्र कृष्णचैतन्यपूजकः।६६।
अनुवाद:- ★
यह सुनकर कृष्णप्रिय मध्वाचार्य ने चैतन्यमहाप्रभु का शिष्यत्व  ग्रहण किया तथा कृष्ण चैतन्य आराधना में रत हो गये।६६।
इति श्रीभविष्ये महापुराणे प्रतिसर्गपर्वणि चतुर्युगखण्डापरपर्याये कलियुगीयेतिहाससमुच्चये कृष्णचैतन्ययज्ञांशशिष्यबलभद्रविष्णुस्वामिमध्वाचार्यादिवृत्तान्तवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः।१९।

इस प्रकार श्रीभविष्य पुराण के प्रतिसर्गपर्व चतुर्थ खण्ड अपरपर्याय"कलियुगीन इतिहास का समुच्चय में कृष्ण चैतन्य यज्ञाञ्श तथा शिष्यबलभद्र-अंश विष्णु स्वामी तथा मध्वाचार्य वृतान्त वर्णन नामक उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ-★
___________

विचार विश्लेषण-
इन्द्र तथा इन्द्रोपासक पुरोहितो का कृष्ण से युद्ध ऐतिहासिक है। 
जिसके साक्ष्य जहाँ तहाँ पुराणों तथा वैदिक ऋचाओं में बिखरे पड़े हैं।
जिस समय देव-यज्ञ के नाम पर असाह्य और निर्दोष पशुओं की यज्ञों में निरन्तर हिंसा (कत्ल) हो रही थी और इस कारण से यज्ञ वेदियाँ रक्त-रञ्जित रहती थीं।
तब ऐसे कृष्ण ने सर्वप्रथम इन अन्ध रूढ़ियों का खण्डन व विरोध किया।
पुरोहितों की जिह्वालोलुपता, ब्राह्मण वादी वर्चस्व और देवपूजा के नाम पर व्यभिचार और हिंसा चरम पर थी  तब कृष्ण ने इन्द्र की हिंसापूर्ण यज्ञों को समस्त गोप-यादव समाज में  रोककर निषिद्ध दिया था। 
पुराणकारों ने भी जहाँ-तहाँ उन घटनाओं को वर्णित  भी किया ही है। भले ही रूपक-विधेय कोई भी हो-
जब कृष्ण ने सभी गोपों से कहा कि " देवों की यज्ञ करना व्यर्थ है। 
कृष्ण का स्पष्ट उद्घोषणा थी कि "जिस शक्ति मार्ग का वरण करके हिंसा द्वारा अश्वमेध आदि द्वारा देवों के यज्ञ किए जाते हैं तो उन देवों की पूजा व्यर्थ है।

कृष्ण की यह बात सुनकर शचीपुत्र यज्ञांश के बहाने से  रूढ़िवादी देवोपासक पुरोहितों के मन्तव्य को  हंसकर कहा जिसका आरोपण चैतन्य के रूप में हुआ है:-  कि  कृष्ण साक्षात् भगवान नहीं है ।
वह तामसी शक्ति से उत्पन्न है।

____________
यज्ञ से यद्यपि ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती 
यज्ञ केवल देवपूजा की प्रक्रिया है ।
यह देव पूजा के विधान कि सांकेतिक परम्परा मात्र बन रह गयी है।

श्रीमद्भगवत् गीता पाँचवीं सदी में रचित ग्रन्थ में जिसकी कुछ प्रकाशन भी है ।

यह अधिकाँशत: कृष्ण के सिद्धान्त व मतों की विधायिका है। 
अब कृष्ण जिस वस्तुत का समर्थन करते हैं
मनुःस्मृति उसका विरोध करती है ।

मनुःस्मृति में वर्णन है कि 👇
" सामवेद: स्मृत: पित्र्यस्तस्मात्तस्याशुचिर्ध्वनि:
( मनुःस्मृति चतुर्थ अध्याय 4/124 वाँ श्लोक )

अर्थात्‌ सामवेद का अधिष्ठात्री पितर देवता है ।
इस कारण इस साम वेद की ध्वनि
अपवित्र व अश्रव्य है ।

मनुःस्मृति में सामवेद को हेय
और ऋग्वेद को उपादेय माना ।

वस्तुत अब यह मानना पड़ेगा कि श्रीमद्भगवद् गीता और वेद या मनुःस्मृति एक ही ईश्वर की वाणी नहीं हैं ।
अथवा इनका प्रतिपाद्य विषय एक नहीं ।

क्यों कि श्रीमद्भगवद् गीता के दशवें अध्याय के बाइसवें श्लोक (10/22) में कृष्ण के मुखार-बिन्दु से नि:सृत वाणी है।👇

"वेदानां सामवेदोऽस्मि = वेदों में सामवेद मैं हूँ" और इसके विरुद्ध  मनुःस्मृति में तो यहाँं तक वर्णन है कि "👇

सामध्वनावृग्ययजुषी नाधीयीत कदाचन" मनुःस्मृति(4/123)

सामवेद की ध्वनि सुनायी पड़ने पर ऋग्वेद और यजुर्वेद का अध्ययन कभी न करें !

अब तात्पर्य यह कि यहाँं अन्य तीनों वेदों को हेय और केवल सामवेद को उपादेय माना।

वैसे भी सामवेद संगीत का आदि रूप है ।
यूरोपीय भाषाओं में प्रचलित साँग (Song) शब्द भी साम शब्द से व्युपन्न है ।

पता होना चाहिए कि कृष्ण मुरली को बजाने  वाले और सबको नाच नचाने वाले श्रेष्ठ संगीतकार थे ।
परन्तु इनकी संगीत भी आध्यात्मिक नाद -ब्रह्म का गायन था ।👇

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मंगलवार, 5 दिसंबर 2023

भाग द्वित्तीय -



आगामी विडियों में हम स्पष्ट करेंगे कि अत्रि चन्द्रमा ( सोम) और बुध का अहीर जाति से क्या सम्बन्ध है?
अत्रि की उत्पत्ति कभी ब्रह्मा के मन से तो कभी शिव से अग्नि रूप में होती है। अत्रि की उपस्थिति  आभीर कन्या  गायत्री और जगत पिता ब्रह्मा के विवाह के प्रसंग में भी होती है। जिसमें गायत्री स्वयं सावित्री द्वारा गायत्री  और ब्रह्मा के विवाह में सहायक सभी सप्तर्षि गण सभी देवों और देवीयों के अतिरिक्त स्वयं ब्रह्मा और विष्णु तथा शिव को भी शापित कर देती हैं। 
******
तब सावित्री द्वारा दिए गये शाप के निवारण स्वरूप आभीर कन्या गायत्री ही सभी के शाप को वरदान में बदल देती हैं।  और  गायत्री माता अत्रि और विष्णु को अपनी अहीर जाति के उत्थान ,मार्गदर्शन और संरक्षण करने का वचन देती हैं। 
तभी से अत्रि आभीर जाति के गोत्र प्रवर्तक माने जाते हैं। 

और विष्णु  सतयुग में नहुष और द्वापर में अपने मूल कारण सम्पूर्ण अंशों से कृष्ण रूप में गोपों ( अहीरों ) के मध्य में ही अवतरित होते हैं।
अहीर जाति सतयुग के प्रारम्भ में भी विद्यमान है। और कालान्तर में पुरुरवा जो गायत्री की नित्य अधिक स्तुति करने से पुरुरवा पुरु  रौति रु--असि दीर्षश्च। पुरु= अधिक + रौति =स्तुते( स्तुति करता है।
गर्ग संहिता में सभी यादवों अथवा अहीरों को कृष्ण नें अपना सनातन अंश कहा है। इसलिए भी अहीरों (यादवों)को विष्णु से उत्पन्न -माना जाता है।
क्योंकि शास्त्रों की विरोधाभासी बातों में एक बात तो मिथकीय आधार पर स्वीकार करनी पड़ेगी ।
तर्क या दर्शन के आधार पर स्वीकार करना भी शास्त्रीय पद्धति है। 

कालान्तर में गोपों, यादवों अथवा अहीरों के सर्वोपरिता को विखण्डन करने के लिए पुरोहितों में उन्हें ब्राह्मण वाद के दायरे में समेटने का प्रयास किया - और अभीर गोपाल ,गोप और यादव आदि पर्याय शब्दों को द्वेष वश अलग अलग जाति बनाकर प्रस्तुत कर दिया 
यहाँ उन प्रक्षेपों को प्रस्तुत करने की आवश्यता नहीं है।
 
यादवों को ब्रह्मा के मानस पुत्र  अत्रि से जोड़कर शास्त्र में लिपिबद्ध करना भी गोपों को ब्राह्मी वर्ण-व्यवस्था में गी घसीटना है।

ब्रह्मा के मन से अत्रि उत्पन्न किए और फिर अत्रि के नेत्रों के मल  से समुद्र में चन्द्रमा उत्पन्न कर दिया । समुद्र मंथन के दौरान दसवें नंबर पर "चन्द्रमा" प्रकट हुआ जिसे  शिव ने अपने मस्तक पर धारण कर लियाl
और चन्द्रमा से बुध को उत्पन्न कर दिया 
महाभारत आदि पर्व नें एक स्थान पर सूर्य चन्द्र दनु की संतान दानव हैं।

"सूर्याचन्द्रमसौ तथा। एते ख्याता दनोर्वंशे दानवाः परिकीर्तिताः।26।
📚: सूर्य और चन्द्रमा हैं। ये दनु के वंश में विख्यात दानव बताये गये हैं।
सूर्यवंश और चन्द्र वंश देव ही नही अपितु दानव वंश भी है।
(महाभारत-65) अध्‍याय: आदि पर्व (सम्भव पर्व)

इस लिए यादवों को किस चन्द्र वंश से समबन्धित किया जाए दानव अथवा देव सम्बन्धित अत: ये सारी अत्रि" चन्द्रमा और बुध मूलक थ्योरी सिद्धान्त हीन व परवर्ती  ही है।

ऋषिः - नारायण ऋषिः
देवता - पुरुषो देवता
छन्दः - अनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः

"चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्याऽअजायत । श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत ॥
अनुवाद:-
हे मनुष्यो ! इस विराट पुरुष के (मनसः)-मनन रूप से (चन्द्रमाः)  (जातः) उत्पन्न हुआ (चक्षोः)  आँखों से  (सूर्य्यः) सूर्य (अजायत) उत्पन्न हुआ (श्रोत्रात्) श्रोत्र नामक अवकाश रूप सामर्थ्य से (वायुः) वायु (च) तथा आकाश प्रदेश (च) और (प्राणः) जीवन के निमित्त दश प्राण और (मुखात्) मुख्य ज्योतिर्मय भक्षणस्वरूप सामर्थ्य से (अग्निः) अग्नि (अजायत) उत्पन्न हुआ है, ऐसा तुमको जानना चाहिये॥१२॥
_________    
इस लिए अहीरों की उत्पत्ति गायत्री से भी पूर्व है और गायत्री के परवर्ती उत्पन्न गायत्री का अनन्य  स्तौता- (स्तुति करने वाला)  पुरुरवा पृथ्वी ( इला पर उत्पन्न प्रथम  गोपालक सम्राट है । जिसका साम्राज्य पृथ्वी से लेकर स्वर्ग तक स्थापित है।
पुरुरवा के आयुष-फिर उनके नहुष और बहुत के ययाति से यदु तुर्वसु पुरु अनु द्रुह आदि पुत्र आभीर जाति के अन्तर्गत ही हैं।
____________
और विडियो के अन्त में हम  एक समीक्षा प्रस्तुत करेंगे  कि भगवान श्रीकृष्ण की कथा का राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचार प्रसार के लिए हमने कौन सी संस्था का निर्माण किया है ? 

और इस दुर्लभ प्रसंग को विस्तार पूर्वक जानकारी के लिए एक पुस्तक को  लेखनी बद्ध करने के लिए किन दो  विद्वानों को प्रेरित  किया है ?  यह भी बताया जाएगा-

मित्रों विडियो थोड़ा लम्बा अवश्य है। किन्तु अद्भुत जानकारी से परिपूर्ण है। 

जिसे आज तक साधारण लोग नहीं जानते हैं  इसलिए इस विडियो को एकाग्र चित्त होकर अन्ततक अवश्य देखें-पद्म पुराण सृष्टि खण्ड के अध्याय-17 में अहीरों की जाति में भगवान कृष्ण के रूप में विष्णु के निम्नलिखित तीन श्लोक विशेष विचारणीय हैं।

१- जिसमें प्रथम श्लोक में अहीरों का धर्मतत्व का ज्ञाता होना और सदाचारी होना सूचित किया गया है !

इसके बाद के श्लोकों में गायत्री के द्वारा आभीर जाति का उद्धार करने वाला बताकर अहीरो को दिव्य लोको (गोलोकों) में निवास करने का अधिकारी बनाकर तृतीय श्लोक में विष्णु द्वारा अपने अवतरण की स्वीकृति अहीरों को दी गयी है।

"आभीर लोग पूर्वकाल में भी धर्मतत्व वेत्ता धार्मिक, सदाचारी और धर्मवत्सल कहकर सम्बोधित किए गये हैं।

तीनों तथ्यों के प्रमाणों का वर्णन इन श्लोकों में निर्दशित है।

"धर्मवन्तं सदाचारं भवन्तं धर्मवत्सलम्।           मया ज्ञात्वा ततःकन्या दत्ता चैषा विरञ्चये।१५।।

"अनया गायत्र्या तारितो गच्छ युवां भो आभीरा ! दिव्यान्लोकान्महोदयान्।          
युष्माकं च कुले चापि देवकार्यार्थसिद्धये।१६।

"अवतारं करिष्येहं सा क्रीडा तु भविष्यति यदा नन्दप्रभृतयो ह्यवतारं धरातले।१७।

अनुवाद:-विष्णु ने अहीरों से कहा- मैंने तुमको धर्मज्ञ और धार्मिक सदाचारी तथा धर्मवत्सल जानकर तुम्हारी इस गायत्री नामकी कन्या को ब्रह्मा के लिए यज्ञकार्य हेतु पत्नी रूप में दिया है। (क्योंकि यज्ञ एक व्रतानुष्ठान ही है)। और अहीर कन्याऐं कठिन व्रतों का पालन करती हैं।

हे अहीरों इस गायत्री के द्वारा उद्धार किये गये तुम सब दिव्यलोकों (गोलोकों) को जाओ- तुम्हारी अहीर जाति के यदुवंश के अन्तर्गत वृष्णिकुल में देवों की कार्य की सिद्धि के लिए मैं अवतरण करुँगा ( अवतारं करिष्येहं ) और वहीं मेरी लीला (क्रीडा) होगी जब धरातल पर नन्द आदि का भी अवतरण होगा।

"गर्गसंहिता के विश्वजित् खण्ड में के अध्याय दो और ग्यारह में यह वर्णन है।

"एक समय की बात है- सुधर्मा में श्रीकृष्‍ण की पूजा करके, उन्‍हें शीश नवाकर प्रसन्नचेता राजा उग्रसेन ने दोनों हाथ जोड़कर धीरे से कहा।

उग्रसेन कृष्ण से बोले ! - भगवन् ! नारदजी के मुख से जिसका महान फल सुना गया है, उस राजसूय नामक यज्ञ का यदि आपकी आज्ञा हो तो अनुष्‍ठान करुँगा। पुरुषोत्तम ! आपके चरणों से पहले के राजा लोग निर्भय होकर, जगत को तिनके के तुल्‍य समझकर अपने मनोरथ के महासागर को पार कर गये थे।

तब श्री कृष्ण भगवान ने कहा- राजन् ! यादवेश्‍वर ! आपने बड़ा उत्तम निश्‍चय किया है। उस यज्ञ से आपकी कीर्ति तीनों लोको में फैल जायगी। प्रभो ! सभा में समस्‍त यादवों को सब ओर से बुलाकर पान का बीड़ा रख दीजिये और प्रतिज्ञा करवाइये।

क्योंकि सभी यादव मेरे ही अंश है।

"ममांशा यादवाः सर्वे लोकद्वयजिगीषवः ॥ जित्वारीनागमिष्यंति हरिष्यंति बलिं दिशाम् ॥७॥

"शब्दार्थ:-१-ममांशा= मेरे अंश रूप (मुझसे उत्पन्न) २-यादवा: सर्वे = सम्पूर्ण यादव।३- लोकद्वयजिगीषवः = दोनों लोकों को जीतने की इच्छा वाले। ४- जिगीषव: = जीतने की इच्छा रखने वाले। ५- जिगीषा= जीतने की इच्छा - जि=जीतना धातु में +सन् भावे अ प्रत्यय ।= जयेच्छायां । ६- जित्वा= जीतकर।७-अरीन्= शत्रुओ को। ८- आगमिष्यन्ति = लौट आयेंगे। ९-हरिष्यन्ति= हरण कर लाऐंगे।१०-बलिं = भेंट /उपहार।११- दिशाम् = दिशाओं में।

"अनुवाद:-समस्‍त यादव मेरे अंश से प्रकट हुए हें। वे दौनों लोक, को जीतने की इच्‍छा रखने वाले हैं।वे दिग्विजय के लिये यात्रा करके, शत्रुओं को जीतकर लौट आयेंगे और सम्‍पूर्ण दिशाओं से आपके लिये भेंट और उपहार लायेंगे।७।

सन्दर्भ:- गर्गसंहिता‎ खण्डः ७ विश्वजित्खण्ड)

"गोप अथवा यादव एक ही हैं। क्योंकि एक स्थान पर गर्ग सहिता में यादवों को कृष्ण के अंश से उत्पन्न बताया गया है। और दूसरी ओर उसी अध्याय में गोपों को कृष्ण के रोमकूपों से उत्पन्न बताया है।"

जब ब्राह्मण स्वयं को ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न मानते हैं। तो यादव तो विष्णु के शरीर से क्लोन विधि से भी उत्पन हो सकते हैं।

और ब्रह्मा का जन्म विष्णु की नाभि में उत्पन्न कमल से सम्भव है। तो यादव अथवा गोप तो साक्षात् स्वराट् विष्णु ( कृष्ण) के शरीर से उत्पन्नहैं। अत: पुराणों में स्वयं ब्राह्मणों के आदि पितामह ब्रह्मा गोपों की स्तुति करते हैं । और उनकी चरणधूलि लेकर अपने को धन्य मानते हैं। गोप ब्रह्मा की सृष्टि नहीं हैं गोप स्वराट विष्णु (कृष्ण) की सृष्टि हैं।  इसी लिए ब्रह्मा भी गोपों की स्तुति करते हैं।

"शास्त्र में लिखा है कि वैष्णव ही इन अहीरों का वर्ण है।

सम्पूर्ण गोप अथवा यादव विष्णु अथवा कृष्ण के अंश अथवा उनके शरीर के रोमकूपों से उत्पन्न हुए है। यह बात ब्रह्म-वैवर्त पुराण ,गर्गसंहिता ,पद्मपुराण और अन्य परवर्ती ग्रन्थ लक्ष्मी नारायणी संहिता और ब्रह्म संहिता आदि में वर्णित है।
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विष्णोरिदम् ।  विष्णु + अण् । )  विष्णुसम्बन्धी  वैष्णव!

विष्णु के उपासक, भक्त और विष्णु से सम्बंधित वैष्णव. कहे जाते हैं। विष्णु के इन छै: गुणों से युक्त होने के कारण भगवत् - संज्ञा है। जो निम्नलिखित हैं।

 १-अनन्त ऐश्वर्य, २-वीर्य, ३-यश, ४-श्री, ५-ज्ञान और ६-वैराग्य रूप 'भग' से सम्पन्न होने के कारण परमात्मा को भगवान् या भगवत् कहा जाता है।

"इस कारण वैष्णवों को भागवत नाम से भी जाना जाता है - भगवत्+अण्=भागवत।

जो भगवत् का भक्त हो वह भागवत् है। श्रीमद् -वल्लभाचार्य का कथन है कि इन्ही परमतत्त्व को वेदान्त में 'ब्रह्म'. स्मृतियों में 'परमात्मा' तथा भागवत में 'भगवान्' कहा गया है।

उनकी सुदृढ़ मान्यता है कि श्रीकृष्ण ही परब्रह्म है वल्लभाचार्य द्वारा लिखित ग्रन्थ में वर्णन है।

"श्रीमद्वल्लभाचार्य लिखित -सिद्धान्त मुक्तावलि "वैष्णव धर्म मूलत: भक्तिमार्ग है।"भक्ति का सम्बंध हृदय की रागात्मिक वृति प्रेम से है। इसीलिए महर्षि शाण्डिल्य भक्ति को ईश्वर के प्रति अनुरक्ति अर्थात् उत्कृष्ठ प्रेम मानते हैं और देवर्षि नारद इसे परमात्मा के प्रति परम प्रेमस्वरूपता कहते हैं।

"मान ले कि ब्रह्माण्ड के जो गोप हैं उनके साथ लीला सहचर बनने के लिए विष्णु उपस्थित होते हैं तो ये असम्भव है ।

 क्योंकि गोपों की उत्पत्ति ब्रह्माण्ड ( ब्रह्मा का अण्ड) में नहीं होती है वे तो गोलोक में ही उत्पन्न होते हैं।

इसी विधान सिद्धान्त के अनुसार स्वयं कृष्ण ही गोलोक से ब्रह्माण्ड में केवल गोपों के घर उनके साथ लीला सहचर बनकर आते है।

ब्राह्मण आदि चातुर्वर्ण की सृष्टि ब्रह्मा द्वारा- ब्रह्माण्ड में होती है फले ही आज पृथ्वी पर गोप भी  उत्पन्न होते हैं।

 परन्तु यह उत्पत्ति गोलोक की ही मूल परम्परा की आवृत्ति है।
गोपों का स्थान गोलोक में सुरक्षित है। 

"ब्राह्मणों की उत्पत्ति ब्रह्मा द्वारा- वर्ण-व्यवस्था का स्वरूप- 

देखें ऋग्वेद के दशम मण्डल के द्वादश सूक्त की यह नब्बे वी ऋचा में जिसमें ब्राह्मी सृष्टि का वर्णन है - ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न होते हैं।
"ब्राह्मणो अस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत।।
(ऋग्वेद 10/90/12-

श्लोक का अनुवाद:- इस (ब्रह्मा) के मुख से ब्राह्मण हुआ , बाहू से क्षत्रिय लोग हुए एवं उसकी जांघों से वैश्य हुआ एवं दौनों चरण से शूद्रो की उत्पत्ति हुई।-(10/90/12)

"वक्राद्भुजाभ्यामूरुभ्यां पद्भ्यां चैवाथ जज्ञिरे। "सृजतः प्रजापतेर्लोकानिति धर्मविदो विदुः।-5।

 "मुखजा ब्राह्मणास्तात बाहुजाः क्षत्रियाः स्मृताः।ऊरुजा धनिनो राजन्पादजाः परिचारकाः। 6।
अनुवाद:-
धर्मज्ञ पुरुष यह जानते हैं कि प्रजापति ब्रह्मा जी जब मानव-जगत की सृष्टि करने लगे, उस समय उनके मुख, भुजा, ऊरू और पैर- इन अंगों से मनुष्‍यों का प्रादुर्भाव हुआ था।
 तात! जो मुख से उत्‍पन्‍न हुए, वे ब्राह्मण कहलाये। दोनों भुजाओं से उत्‍पन्‍न होने वाले मनुष्‍यों को क्षत्रिय माना गया। राजन! जो ऊरूओं (जाँघों) से उत्‍पन्‍न हुए, वे धनवान (वैश्‍य) कहे गये; जिनकी उत्‍पत्ति चरणों से हुई, वे सेवक या शूद्र कहलाये ।5-6।

श्रीमहाभारत शान्तिपर्व के अन्‍तर्गत मोक्षधर्म पर्व में पराशरगीता विषयक दो सौ छानबेवाँ अध्‍याय।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ब्रह्मा की सृष्टि हैं। यही चातुर्वर्ण व्यवस्था के अवयव हैं। 
परन्तु गोप  स्वराट् विष्णु से गोलोक में उत्पन्न हुए है। वह ब्राह्मी सृष्टि नहीं माने जाऐंगे- वे स्वराट् विष्णु ( कृष्ण) से उत्पन्न होने से वैष्णव हैं। 

"इसी सिद्धान्त से पञ्चम वर्ण की उत्पत्ति हुई जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। 
अथवा पुरोहितों अथवा कथावाचको  द्वारा जानबूझकर छिपाया गया !

शास्त्रों में वर्णन है कि गोप (आभीर) वैष्णव (विष्णु या कृष्ण या मूल तत्व परम्ब्रह्म के रोमकूप) से उत्पन्न वैष्णव (विष्णु या कृष्ण या मूल तत्व परम्ब्रह्म के रोमकूप) से उत्पन्न वैष्णव अञ्श ही थे।

ब्रह्म-वैवर्त पुराण में भी यही अनुमोदन साक्ष्य है।

"कृष्णस्य लोमकूपेभ्य: सद्यो गोपगणो मुने:" आविर्बभूव रूपेण वैशैनेव च तत्सम:।४१।
👇(ब्रह्म-वैवर्त पुराण अध्याय -5 श्लोक 41)

अनुवाद:- कृष्ण के रोमकूपों से गोपोंं (अहीरों) की उत्पत्ति हुई है , जो रूप और वेश में उन्हीं कृष्ण ( विष्णु) के समान थे।

वास्तव में विष्णु का ही गोलोक धाम का वृहद् रूप कृष्ण है।
यही गोपों की उत्पत्ति की बात गर्गसंहिता श्रीविश्वजित्खण्ड के ग्यारहवें अध्याय में यथावत् वर्णित है।

"नन्दो द्रोणो वसुःसाक्षाज्जातो गोपकुलेऽपि सः।गोपाला ये च गोलोके कृष्णरोम समुद्‌भवाः।२१।"

"राधारोमोद्‌भवा गोप्यस्ताश्च सर्वा इहागताः॥काश्चित्पुण्यैः कृतैः पूर्वैः प्राप्ताः कृष्णं वरैः परैः।२२।

परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो भगवान्स्वयम् ।असंख्यब्रह्मांडपतिर्गोलोकेशः परात्परः ॥२३॥

यस्मिन्सर्वाणि तेजांसि विलीयंते स्वतेजसि ॥तं वदंति परे साक्षात्परिपूर्णतमः स्वयम् ॥२४॥

अनुवाद:-नन्‍दराज साक्षात द्रोण नामक वसु हैं, जो गोपकुल में अवतीर्ण हुए हैं। गोलोक में जो गोपालगण हैं, वे साक्षात श्रीकृष्‍ण के रोम से प्रकट हुए हैं और गोपियॉं श्रीराधा के रोम से उत्पन्‍न हुई हैं।

वे सब की सब यहाँ व्रज में उतर आयी हैं। कुछ ऐसी भी गोपांगनाएं हैं, जो पूर्वकृत पुण्‍यकर्मों तथा उत्तम वरों के प्रभाव से श्रीकृष्‍ण को प्राप्‍त हुई हैं।२१-२२।

भगवान श्रीकृष्‍ण साक्षात परिपूर्णतम परमात्‍मा हैं, असंख्‍य ब्रह्माण्‍डों के अधिपति, गोलोक के स्‍वामी तथा परात्‍पर ब्रह्म हैं। जिनके अपने तेज में सम्‍पूर्ण तेज विलीन होते हैं, उन्‍हें ब्रह्मा आदि उत्‍कृष्‍ट देवता साक्षात ‘परिपूर्णतम’ कहते हैं, 

____सन्दर्भ:-
इति श्रीगर्गसंहितायां श्रीविश्वजित्खण्डे श्रीनारदबहुलाश्वसंवादे दंतवक्त्रयुद्धे करुषदेशविजयो नामैकादशोऽध्यायः।११।
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"ब्रह्मक्षत्त्रियविट्शूद्राश्चतस्रो जातयो यथा । स्वतन्त्रा जातिरेका च विश्वस्मिन्वैष्णवाभिधा।४३। 
ब्रह्मवैवर्तपुराण ब्रह्मखण्ड अध्याय- एकादश( ग्यारह)।(१.२.४३
अनुवाद- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ,और शूद्र जैसे चार वर्ण-और उनके अनुसार जातियाँ हैं । इनसे पृथक स्वतन्त्र एक वर्ण और उसके अनुसार जाति है वह वर्ण इस विश्व में  वैष्णव नाम से है  और उसकी एक स्वतन्त्र जाति है।(१.२.४३)
 
उपर्युक्त श्लोक में परोक्ष रूप से आभीर जाति का ही संकेत है। जो कि स्वयं स्वराट् विष्णु ( कृष्ण) के रोम कूपों से प्रादुर्भूत होने से वैष्णव वर्ण में हैं।
अहीरों का गोपालन वृत्ति मूलक विशेषण गोप  है।
अहीरों का वर्ण चातुर्यवर्ण से पृथक पञ्चम् वर्ण वैष्णव है।

शास्त्रों में प्रमाण प्राप्त हुए हैं कि यादव,गोप अथवा अहीर लोग ब्रह्मा की सृष्टि न होने से ही ब्रह्मा के द्वारा बनायी गयी वर्णव्यवस्था में शामिल नहीं माने जाते हैं। विष्णु से उत्पन्न होने से इनका पृथक वर्ण वैष्णव है।

तादृशं मुनिशार्दूल शृणु त्वं वच्मि सांप्रतम् ।विष्णोरयं यतो ह्यासीत्तस्माद्वैष्णव उच्यते ३।

जाति सर्वेषां चैव वर्णानां वैष्णव: श्रेष्ठ उच्यते। येषां पुण्यतमाहारस्तेषां वंशे तु वैष्णवः ।४।

क्षमा दया तपः सत्यं येषां वै तिष्ठति द्विज ।तेषां दर्शनमात्रेण पापं नश्यति तूलवत् ।५।

हिंसाधर्माद्विनिर्मुक्ता यस्य विष्णौ स्थिता मतिः ।शंखचक्रगदापद्मं नित्यं वै धारयेत्तु यः ।६।

तुलसीकाष्ठजां मालां कंठे वै धारयेद्यतः ।तिलकानि द्वादशधा नित्यं वै धारयेद्बुधः७।

धर्माधर्मं तु जानाति यः स वैष्णव उच्यते ।वेदशास्त्ररतो नित्यं नित्यं वै यज्ञयाजकः ८।

उत्सवांश्च चतुर्विंशत्कुर्वंति च पुनः पुनः ।तेषां कुलं धन्यतमं तेषां वै यश उच्यते।९।

ते वै लोके धन्यतमा जाता भागवता नराः ।एक एव कुले यस्य जातो भागवतो नरः ।१०।

तत्कुलं तारितं तेन भूयोभूयश्च वाडव ।
अंडजा उद्भिजाश्चैव ये जरायुज योनयः ।११।
_________________

"अनुवाद:-महेश्वर ने कहा:- हे नारद सुनो ! मैं वैष्णव के लक्षण बताता हूँ। उसके सुनने मात्र से मनुष्य ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो जाता है ।१।

वैष्णवों के जैसे लक्षण और स्वरूप होते हैं। उसे मैं बतला रहा हूँ। हे मुनि श्रेष्ठ उसे तुम सुनो!।२।

चूँकि वह विष्णु से उत्पन्न  होता है। इस लिए वह वैष्णव हुआ।


विष्णोरयं यतो हि आसीत् तस्मात् वैष्णव उच्यते .३..........सर्वेषां चैव वर्णानां वैष्णव श्रेष्ठ: उच्यते ।४।

अनुवाद:- विष्णु से यह उत्पन्न होने ही वैष्णव कहे जाते हैं....... सभी वर्णों में वैष्णव वर्ण श्रेष्ठ कहा जाता है।३-४।

"ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र चार वर्ण और उनके अनुसार( जातीयाँ) इस विश्व में हैं उसी प्रकार वैष्णव वर्ण के अनुसार एक स्वतन्त्र जाति है।*

"विशेष:- ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र जातियाँ नहीं हैं ये वर्ण हैं जातियाँ वर्णों के अन्तर्गत ही होती है।

"पद्म पुराण उत्तरखण्ड में अध्याय 68 में  वैष्णव वर्ण को रूप में वर्णित है।

"जाति सर्वेषां चैव वर्णानां वैष्णव: श्रेष्ठ उच्यते। येषां पुण्यतमाहारस्तेषां वंशे तु वैष्णवः ।४।

पद्म पुराण कार ने वैष्णव वर्ण के रूप में सम्पादित किया है। 


ऐसे वैष्णव का वंश अत्यन्त धन्य है। उन्ही का यश बढ़ता है।"जो भागवत हो जाते हैं। वे मनुष्य अत्यन्त धन्य हैं।९। 

जिसके वंश में एक भी भागवत हो जाता है  हे नारद ! उस वंश को बार- बार तार देता है।१०।

"उपर्युक्त श्लोकों में गोपों के वैष्णव वर्ण तथा भागवत धर्म का संकेत है जिसे अन्य जाति के पुरुष गोपों के प्रति श्रृद्धा और कृष्ण भक्ति से प्राप्त कर लेते हैं।। 

"सन्दर्भ:-(पद्मपुराण खण्ड ६ (उत्तरखण्डः) अध्यायः -(६८)

"विशेष:-विष्णोरस्य रोमकूपैर्भवति  अण्सन्तति वाची- विष्णु+ अण् = वैष्णव= विष्णु से उत्पन्न अथवा विष्णु से सम्बन्धित- जन वैष्णव हैं।

अर्थ- विष्णु के रोमकूपों से उत्पन्न अण्- प्रत्यय सन्तान वाची भी है विष्णु पद में तद्धित अण्प्रत्यय करने पर वैष्णव शब्द निष्पन्न होता है। अत: गोप वैष्णव वर्ण के हैं। 

वैष्णव वर्ण की स्वतन्त्र जाति आभीर है। पद्म पुराण उत्तराखण्ड के अतिरिक्त इसका संकेत ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी है । प्रसंगानुसार वर्णित किया गया है।
सन्दर्भ:-
श्री पद्म पुराण सृष्टि खंड उमापतिनारदसंवादे वैष्णवमाहात्म्यंनाम अष्टषष्टितमोऽध्यायः ।६८।

_________
अत: यादव अथवा गोप गण ब्राह्मणों की वर्ण व्यवस्था में समाहित नही होने से रूढ़िवादी पुरोहितों ने अहीरों के विषय में इतिहास छुपा कर बाते लिखीं हैं।

किसी भी पुराण अथवा शास्त्र में ब्रह्मा से गोपों की उत्पत्ति नहीं हुई है ।

गोप वैष्णव वर्ण में आभीर जाति के रूप में हैं देखे नीचे ब्रह्मवैवर्त पुराण का सन्दर्भ-
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मूल विष्णु स्वयं भगवान् कृष्ण का गोलोक वासी सनातन रूप है। और स्थूल विष्णु ही उनका विराट् रूप है।
कृष्ण सदैव गोपों में ही अवतरित होते हैं। और
गो" गोलोक और गोप सदैव समन्वित (एकत्रित) रहते हैं।

गोपों की उत्पत्ति गोपियों सहित कृष्ण और राधा से गोलोक धाम में ही होती है। कृष्ण की लीलाओं के सहायक बनने के लिए ही गोप गोलोक से सीधे पृथ्वी लोक में आते हैं।

और जब तक पृथ्वी पर गोप जाति विद्यमान रहती है तब तक कृष्ण भी अपने लौकिक जीवन का अवसान होने पर भी निराकार रूप से विद्यमान रहते ही हैं। इसमें कोई सन्देह पृथ्वी पर दोनों की उपस्थित कृष्ण के होने को सूचित करती है। 
"गोप अथवा यादव एक ही थे क्योंकि एक स्थान पर गर्ग सहिता में यादवों को कृष्ण के अंश से उत्पन्न बताया गया है। और दूसरी ओर उसी अध्याय में गोपों को कृष्ण के रोमकूपों से उत्पन्न बताया है।" जिसका समान भावार्थ है।

"जब ब्राह्मण स्वयं को ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न मानते हैं। तो यादव तो विष्णु के शरीर से क्लोन विधि से भी उत्पन क्यों नहीं हो सकते हैं ?

और ब्रह्मा का जन्म विष्णु की नाभि में उत्पन्न कमल से सम्भव है।

तो यादव अथवा गोप तो साक्षात् विष्णु के शरीर से उत्पन्न हैं।परन्तु दोनों की उत्पत्ति मूलत: ब्रह्माण्ड से परे गोलोक में ही होती है और ब्राह्मणों की उत्पत्ति विराट के एक रोम कप में स्थित  ब्रह्माण्ड में ब्रह्मा के मुख से -इसलिए गोप अथवा यादव ब्राह्मणों से कई गुना  श्रेष्ठ व पूज्य हैं।

परन्तु उन्हें इसके अनुरूप चरित्र स्थापित करने की आवश्यकता है।

परन्तु हम इन शास्त्रीय मान्यताओं पर ही आश्रित होकर वर्णव्यवस्था का पालन और आचरण करते हैं जो कि गोप जाति के अनुकूल नहीं है । "किसी शास्त्र में ब्रह्मा से गोपों की उत्पत्ति नहीं दर्शायी है!

तो विचार करना होगा कि गोप साक्षात् विष्णु के ही शरीर(रोम कूप) से उत्पन्न हैं । जबकि ब्राह्मण विष्णु की सृष्टि ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न हैं  । इस लिए गोप ब्राह्मणों से श्रेष्ठ और उनके भी पूज्य हैं।

ब्रह्म-वैवर्त पुराण में भी यही अनुमोदन साक्ष्य है।

(👇 "कृष्णस्य लोमकूपेभ्य: सद्यो गोपगणो आविर्बभूव रूपेण वैशैनेव च तत्सम:।४१।
👇(ब्रह्म-वैवर्त पुराण अध्याय -5 श्लोक 41)

अनुवाद:- कृष्ण के रोमकूपों से गोपोंं (अहीरों) की उत्पत्ति हुई है , जो रूप और वेश में उन्हीं कृष्ण ( विष्णु) के समान थे।

वास्तव में विष्णु का ही गोलोक धाम का वृहद् रूप कृष्ण है।
यही गोपों की उत्पत्ति की बात गर्गसंहिता श्रीविश्वजित्खण्ड के ग्यारहवें अध्याय में यथावत् वर्णित है।

"नन्दो द्रोणो वसुःसाक्षाज्जातो गोपकुलेऽपि सः।गोपाला ये च गोलोके कृष्णरोम समुद्‌भवाः।२१।"

"राधारोमोद्‌भवा गोप्यस्ताश्च सर्वा इहागताः॥काश्चित्पुण्यैः कृतैः पूर्वैः प्राप्ताः कृष्णं वरैः परैः।२२।

परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो भगवान्स्वयम् ।असंख्यब्रह्मांडपतिर्गोलोकेशः परात्परः ॥२३॥

यस्मिन्सर्वाणि तेजांसि विलीयंते स्वतेजसि ॥तं वदंति परे साक्षात्परिपूर्णतमः स्वयम् ॥२४॥

अनुवाद:-नन्‍दराज साक्षात द्रोण नामक वसु हैं, जो गोपकुल में अवतीर्ण हुए हैं। गोलोक में जो गोपालगण हैं, वे साक्षात श्रीकृष्‍ण के रोम से प्रकट हुए हैं और गोपियॉं श्रीराधा के रोम से उद्भुत हुई हैं।

वे सब की सब यहाँ व्रज में उतर आयी हैं। कुछ ऐसी भी गोपांगनाएं हैं, जो पूर्वकृत पुण्‍यकर्मों तथा उत्तम वरों के प्रभाव से श्रीकृष्‍ण को प्राप्‍त हुई हैं।२१-२२।

भगवान श्रीकृष्‍ण साक्षात परिपूर्णतम परमात्‍मा हैं, असंख्‍य ब्रह्माण्‍डों के अधिपति, गोलोक के स्‍वामी तथा परात्‍पर ब्रह्म हैं। जिनके अपने तेज में सम्‍पूर्ण तेज विलीन होते हैं, उन्‍हें ब्रह्मा आदि उत्‍कृष्‍ट देवता साक्षात ‘परिपूर्णतम’ कहते हैं, 

____सन्दर्भ:-
इति श्रीगर्गसंहितायां श्रीविश्वजित्खण्डे श्रीनारदबहुलाश्वसंवादे दंतवक्त्रयुद्धे करुषदेशविजयो नामैकादशोऽध्यायः।११।
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"ब्रह्मक्षत्त्रियविट्शूद्राश्चतस्रो जातयो यथा । स्वतन्त्रा जातिरेका च विश्वस्मिन्वैष्णवाभिधा।४३।

ब्रह्मवैवर्तपुराण ब्रह्मखण्ड अध्याय- एकादश( ग्यारह)।(१.२.४३
अनुवाद- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ,और शूद्र जैसे चार वर्ण-और उनके अनुसार जातियाँ हैं । इनसे पृथक स्वतन्त्र एक वर्ण और उसके अनुसार जाति है वह वर्ण इस विश्व में  वैष्णव नाम से है  और उसकी एक स्वतन्त्र जाति है।(१.२.४३)
 
उपर्युक्त श्लोक में परोक्ष रूप से आभीर जाति का ही संकेत है। जो कि स्वयं स्वराट् विष्णु ( कृष्ण) के रोम कूपों से प्रादुर्भूत होने से वैष्णव वर्ण में हैं।
अहीरों का गोपालन वृत्ति मूलक विशेषण गोप  है।
अहीरों का वर्ण चातुर्यवर्ण से पृथक पञ्चम् वर्ण वैष्णव है।

शास्त्रों में प्रमाण प्राप्त हुए हैं कि यादव,गोप अथवा अहीर लोग ब्रह्मा की सृष्टि न होने से ही ब्रह्मा के द्वारा बनायी गयी वर्णव्यवस्था में शामिल नहीं माने जाते हैं। विष्णु से उत्पन्न होने से इनका पृथक वर्ण वैष्णव है।

तादृशं मुनिशार्दूल शृणु त्वं वच्मि सांप्रतम् ।विष्णोरयं यतो ह्यासीत्तस्माद्वैष्णव उच्यते ।३।

जाति सर्वेषां चैव वर्णानां वैष्णव: श्रेष्ठ उच्यते। येषां पुण्यतमाहारस्तेषां वंशे तु वैष्णवः ।४।
क्षमा दया तपः सत्यं येषां वै तिष्ठति द्विज ।
तेषां दर्शनमात्रेण पापं नश्यति तूलवत् ।५।
हिंसाधर्माद्विनिर्मुक्ता यस्य विष्णौ स्थिता मतिः ।शंखचक्रगदापद्मं नित्यं वै धारयेत्तु यः ।६।
तुलसीकाष्ठजां मालां कंठे वै धारयेद्यतः ।तिलकानि द्वादशधा नित्यं वै धारयेद्बुधः।७।
धर्माधर्मं तु जानाति यः स वैष्णव उच्यते ।वेदशास्त्ररतो नित्यं नित्यं वै यज्ञयाजकः ।८।
उत्सवांश्च चतुर्विंशत्कुर्वंति च पुनः पुनः ।
तेषां कुलं धन्यतमं तेषां वै यश उच्यते।९।
ते वै लोके धन्यतमा जाता भागवता नराः ।एक एव कुले यस्य जातो भागवतो नरः १०।
तत्कुलं तारितं तेन भूयोभूयश्च वाडव ।
अण्डजा उद्भिजाश्चैव ये जरायुज योनयः ११।
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"अनुवाद:-महेश्वर ने कहा:- हे नारद सुनो ! मैं वैष्णव के लक्षण बताता हूँ। उसके सुनने मात्र से मनुष्य ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो जाता है ।१।

वैष्णवों के जैसे लक्षण और स्वरूप होते हैं। उसे मैं बतला रहा हूँ। हे मुनि श्रेष्ठ उसे तुम सुनो!।२।

चूँकि वह विष्णु से उत्पन्न  होता है। इस लिए वह वैष्णव हुआ।

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"विष्णोरयं यतो हि आसीत् तस्मात् वैष्णव उच्यते .३..........सर्वेषां चैव वर्णानां वैष्णव श्रेष्ठ: उच्यते ।४।

अनुवाद:- विष्णु से यह उत्पन्न होने ही वैष्णव कहे जाते हैं....... सभी वर्णों में वैष्णव वर्ण श्रेष्ठ कहा जाता है।३-४।

"ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र चार वर्ण और उनके अनुसार( जातीयाँ) इस विश्व में हैं उसी प्रकार वैष्णव वर्ण के अनुसार एक स्वतन्त्र जाति है।*

"विशेष:- ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र जातियाँ नहीं हैं ये वर्ण हैं जातियाँ वर्णों के अन्तर्गत ही होती है।

"पद्म पुराण उत्तरखण्ड में अध्याय 68 में  वैष्णव
वर्ण को रूप में वर्णित है।

"जाति सर्वेषां चैव वर्णानां वैष्णव: श्रेष्ठ उच्यते। येषां पुण्यतमाहारस्तेषां वंशे तु वैष्णवः ।४।

पद्म पुराण कार ने वैष्णव वर्ण के रूप में सम्पादित किया है।