रविवार, 2 जनवरी 2022

गाँधी जी की क्षमा और क्षमता-


महात्मा गांधी  के बारे में अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने वाले आर.एस.एस" की विचार धारा के  प्रतिनिधि "कालीचरण  ही नही अपितु
जिन दलितों के उद्धार के लिए महात्मा गाँधी ने स्वयं को रूढ़िवादी ब्राह्मणों कि  विरोधी बनाया और एक वर्णव्यवस्था वादी के द्वारा अपने जीवन का बलिदान कर दिया।

 उन महात्मा गाँधी के वर्चस्व से कुछ दलितों के नेताओं ने भी गाँधी को अमर्यादित भाषा में अपशब्द कहे हैं ।

 किस पर सहानुभूति की जाय किस के उत्थान के लिए लड़ा जाय- 

संविधान निर्मात्री सभा के अध्यक्ष बी.आर. अम्बेडकर  से लेकर वामन मेश्राम तक ने गांधी को महात्मा मानने से इनकार कर अनेक प्रकार से उनको आलोचना का शिकार बनाया  था.
__________________________________

 डाँ अम्बेडकर की श्रृंखला में ही  "बामन मेश्राम ने तो बेशर्म होकर गाँधी जी को एक मंच से पाखण्डी कहते हुए उनकी समाधि को तोड़ डालने की भी बात कह डाली।

वर्तमान में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अपशब्द कहने के मामले में फरार चल रहे  कालीचरण  को गिरफ्तार कर लिया गया है.

 कालीचरण ने इस मामले में" एफआईआर" दर्ज होने के बाद एक वीडियो जारी कर कहा था कि 'मैं डरने वाला नही हूं.। 

फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा, तो भी मैं अपनी बात पर कायम रहूंगा.

मैं गांधी से नफरत करता हूं.' खजुराहो से गिरफ्तार किए गए कालीचरण  पर देशद्रोह समेत कई धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है.
______
आम्बेडकर साहब ने तो गांधी जी को चालाक बताने में भी संकोच नहीं किया था.
चालाकी को समझने वाला भी चालाक ही होता यह सर्वविदित ही है ।

 उन्होंने कहा कि गाँधी के चरित्र में ईमानदारी से ज्यादा चालाकी है -  

बाबा साहेब भीराव आंबेडकर के महात्मा गांधी के बारे में विचार किसी से छिपे नही हैं.।
क्या एक महान व्यक्ति भी द्वेष से दूषित होकर किसी की बुराई कर सकता है ।

सायद नहीं ये शब्द ही किसी की महानता के पैमाने माने जा सकते हैं ।

डॉ० आंबेडकर ने अपने कई भाषणों में खुले तौर पर महात्मा गांधी की आलोचना की  थी.

 उन्होंने महात्मा गांधी को महात्मा मानने से इनकार कर दिया था. 

यहां तक कि आंबेडकर ने गांधी को ईमानदार की तुलना में अधिक चालाक बता दिया था.

ट्विटर पर आनंद रंगनाथन ने महात्मा गांधी को लेकर "बीआर आंबेडकर द्वारा कही कुछ बातें शेयर कीं.
_______________

बीआर आंबेडकर ने कहा था कि भारत में किसी के लिए भी महात्मा बनना बहुत आसान है, इसके लिए केवल उसे अपने कपड़े बदलने होते हैं.
जबकि गाँधी ने कभी स्वयं को महात्मा नहीं कहा 
यह उपाधि तो उन्हें रविंद्र नाथ टैगोर ने दी थी । जो एक बंगाली ब्राह्मण थे ।

12 अप्रैल 1919 को रविंद्र नाथ टैगोर ने गांधीजी को एक पत्र लिखा था.
 उस पत्र में उन्होंने गांधीजी को सबसे पहले  महात्मा कहकर संबोधित किया था.
सदा जीवन उच्च विचार कि नारा गाँधी जी के जीवन में चरितार्थ था ।
___________________________________

अगर आप एक साधारण पोशाक पहन रहे हैं और एक सामान्य जीवन जी रहे हैं, तो भले ही आप असाधारण नेक काम कर रहे हों, कोई भी आप पर ध्यान नहीं देता है.
परन्तु वेशभूषा को लोग उपाधि देते हैं ।

 लेकिन, जो व्यक्ति सामान्य तरीके से व्यवहार नहीं करता है और अपने चरित्र में कुछ अजीबोगरीब प्रवृत्ति और असामान्यता दिखाता है, 
वह संत या महात्मा बन जाता है.
भले ही उसके वस्त्र उसके कर्म के अनुरूप न हों ।

 परन्तु गाँधी ने कभी दिखावा और दावा नहीं किया।

 फिर भी "बीआर आंबेडकर ने गांधी और गांधिवादियों पर भी सवाल खड़े किए थे.

 उन्होंने कहा था कि क्या यह सच नहीं है कि हजारों साल पहले भगवान बुद्ध ने दुनिया को सत्य और अहिंसा का संदेश दिया था? 

_________

आंबेडकर ने गांधी को चालाक बताने में भी संकोच नहीं किया था. 
उन्होंने कहा था कि जब मैं गांधी के चरित्र का गंभीरता से अध्ययन करता हूं, तो मुझे विश्वास हो जाता है कि उनके चरित्र में गंभीरता या ईमानदारी की तुलना में चालाकी अधिक स्पष्ट है.

(बीआर आंबेडकर) ने गांधी के लिए ये भी कहा था कि छल और कपट दुर्बलों के हथियार हैं. 
और, गांधी ने हमेशा इन हथियारों का इस्तेमाल किया है।

आंबेडकर ने 'मुंह में राम, बगल में छुरी' वाली कहावत का उदाहरण देते हुए कहा था कि अगर ऐसे व्यक्ति को महात्मा कहा जा सकता है, तो गांधी को भी महात्मा कहा जाए.

 मेरे हिसाब से वह एक साधारण मोहनदास करमचंद गांधी से ज्यादा कुछ नहीं हैं.

 उन्होंने महात्मा गांधी की राजनीति को बेईमान राजनीति की संज्ञा दी थी. 

आंबेडकर ने कहा था कि गांधी राजनीति से नैतिकता को खत्म करने के लिए जिम्मेदार व्यक्ति थे. 

और, उन्होंने भारतीय राजनीति में व्यावसायिकता की शुरुआत की. बीआर आंबेडकर के अनुसार, समाज के कुछ विशेषाधिकार प्राप्त लोगों ने जानबूझकर जनता को अज्ञानी और अनपढ़ रखा. 

________________________

वस्तुत:, तर्क और तर्कवाद के बल पर महात्मा के विरुद्ध लड़ना असंभव है.
 यह चमत्कारों और मूर्खताओं के खिलाफ बौद्धिकता की लड़ाई भी नहीं  है.
क्यों सत्य को जानने के लिए खुद को सच्चा होना चाहिए ।

 केवल तर्क ही महात्माओं चमत्कारों के सम्मोहन प्रभाव को मिटा नहीं सकता.

भारत में महात्माओं की कोई कमी नहीं है.

इसी परम्परा नें दलितों का नायक बनने का उपक्रम करने वाले एक दलित विचारक ने पूर्वदुराग्रह वश एक मंच से कहा-

"मैं गांधी को महात्मा नहीं बदमाश मानता हूं- वामन मेश्राम बहुजन क्रांति मोर्चा के राष्ट्रीय संयोजक और दलित विचारक वामन मेश्राम भी कई मंचों से महात्मा गांधी के खिलाफ अपमानजनक भाषा और अपशब्दों का इस्तेमाल करते नजर आए हैं. जो कि घोर निन्दनीय है ।

ललित नारायण झा नाम के एक यूजर ने वामन मेश्राम का एक वीडियो शेयर करते हुए लिखा है। 

कि वामन मेश्राम का बोल तो सुन लीजिए भूपेश बघेल साहब. बस इतना पूछना चाहते हैं ।गांधीवादी और अम्बेडकरवादियों से कि आप इसको कितना उचित मानते हैं?

 दरअसल, वीडियो में वामन मेश्राम कहते नजर आ रहे हैं कि गांधी ने हमारा (
यानि दलितों का साथ लेकर अपने लोगों को आजाद कराया.  
 

आज दो अक्टूबर के दिन ही ये शैतान पैदा हुआ.
मैंने कांग्रेस के नेताओं से कहा कि मैं गांधी को शैतान मानता हूं, तो मुझे गलत साबित करो.

लेकिन, कांग्रेस नेताओं ने कहा कि नेताओं से गलतियां हो जाती हैं.
लेकिन, आप बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं.

 ___________________________________

और इसी श्रृंखला में दलित विचार धारा के घोर विरोधी वर्णव्यवस्था वादी आर.एस.एस (स्वयंसेवक संघ और तमाम कट्टर हिन्दु मंचों से देश के एक महान बलिदानी की हत्या करने के बाद भी गाली दें तो ये दुर्भाग्य पूर्ण ही नही राष्ट्रीय अस्मिता की हानि है ।

जैसा कि अभी हाल में 
शिव ताण्डव करने का अभिनय करने वाले,  हिन्दू और हिन्दुत्व का नारा देने वाले कालीचरन सरागी" सन्त कि वेशभूषा में  "गोडसे को नमन करते हुए गाँधी को सार्वजनिक रूप से धार्मिक मंच से सरेआम गोलियाँ देने वाला कप कृत्य करते हुए दिखाई देते हैं ।
________________
ये वही लोग हैं जो साम्प्रदायिकता का गाँजा फूँकते हुए भारतीय संस्कृति कि उस भावना को धूमिल करते हैं ।

जिसमें उद्घोष है कि ---यह पूरी पृथ्वी एक परिवार है ।
 
"वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को सनातन धर्म का मूल संस्कार तथा विचारधारा माना है।

जो महा-उपनिषद सहित कई ग्रन्थों में लिपिबद्ध है। 
इसका अर्थ है- धरती ही परिवार है (वसुधा एव कुटुम्बकम्)।
यह वाक्य भारतीय संसद के प्रवेश कक्ष में भी अंकित है।

संसार में केवल भारतीय संस्कृति ही इस प्रकार सम्पूर्ण मानवता को आत्मवत् मानने की पक्षधर है।
परन्तु सत्तासीन पार्टी विशेष- के लोग-भारतीय संस्कृति कि इस गुणवत्ता को दूषित कर रहे हैं ।
_______________________
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।
 उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥
 (महोपनिषद्, अध्याय ४, श्‍लोक ७१)

अर्थ - यह अपना है और यह दूसरे का है, इस तरह की गणना छोटे चित्त (तुच्छ) वाले लोग करते हैं। 
उदार हृदय वाले (उच्च) लोगों की तो (सम्पूर्ण) धरती ही परिवार है।

भारतीय संस्कृति कि यही उद्घोष उसे दुनियाभर नें श्रेष्ठ सिद्ध करता था ।

परन्तु आज ये तुच्छ लोग  भारतीय संस्कृति की आत्मा कि हनन करने का दुस्साहस कर रहे हैं ।

ये घोर जातिवादी  लोग वही लोग हैं जिन्हें वर्ण- व्यवस्था में आस्था है ; 
और केवल हिन्दुत्व के नाम पर रूढिवादी परम्पराओं से नाता है ।

उस वर्ण-व्यवस्था को लागू करने का  जो जन्म सिद्ध बन जाती है

यद्यपि एक 'दो अपवादों को छोड़कर कालीचरण के समर्थन में आने वाले बहुतायत"भाजपा" के चिर-प्राचीन समर्थक हैं (आरएसएस) को हिन्दू एजेण्डा को पोषक हैं ।
जिसके मूल में घोर ब्राह्मणवाद निहित है ।
___________

दु:शीलोऽपि द्विज: पूजयेत् न न विजितेन्द्रिय: क:परीतख्य दुष्टांगा दोहिष्यति शीलवतीं खरीम् ।।
 (पाराशर-स्मृति (192) 

अर्थात् व्यभिचारी ब्राह्मण भी पूजना चाहिए परन्तु शूद्र संयमी और जितेन्द्रीय भी हो तब ही वह सम्मान के योग्य नहीं ! 

कौन दुषित अंगों वाली गाय को छोड़कर शील वती गधी को दुहेगा ।।

कालीचरन भी जो स्वयं को "भारतीय जनता पार्टी का सदस्य बताते हैं ।-
और गाँधी जी की हत्या करने वाले को महान मानते हैं ।
सन्त के लिबास नें कैसे आ गये ।
नाथूराम को अपना आदर्श यही लोग मानते हैं ।
नाथूराम विनायकराव गोडसे का जन्म एक मराठी चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

उनके पिता, विनायक वामनराव गोडसे, एक डाक कर्मचारी थे;। जो वर्णव्यवस्था के पोषक थे

पं० गोडसे पुन: ब्राह्मण वाद की  प्रतिष्ठा में प्रयास रत थे ।
नाथूराम विनायक गोडसे (19 मई 1910 - 15 नवंबर 1949) महात्मा गांधी के हत्या की थी। 
क्योंकि गाँधी जी ने दलितों को हरिजन का खिताब देकर मन्दिर नें पूजा कराने का प्रयास किया। 
और हिन्दू मुस्लिम, सिख ,ईसाई को भाई- भाई बताया।
गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली में बिंदु रिक्त सीमा पर देखे से गांधी को तीन बार सीने में गोली मार दी थी। 

हे राम कहते हुए जिनकी अन्तिम श्वास निकली-
महात्मा गाँधी रामराज्य के उस रूप को समर्थक थे जहाँ सबको सुख और न्याय मिले। 
परन्तु गोडसे भारत को हिन्दू-देश बनाने को पक्ष में थे ।

ये गोडसे, पुणे के एक हिंदू राष्ट्रवादी, थे जो मानते थे कि गांधी ने भारत के विभाजन के दौरान भारत के मुसलमानों की राजनीतिक मांगों का समर्थन किया था और शूद्रों को भी ईश्वर की पूजा का अधिकार दे दिया। 

नारायण आप्टे और छह अन्य लोगों के साथ मिलकर गोडसे ने गांधी की हत्या की साजिश रची ये सभी  कट्टर ब्राह्मण थे ।

बापू ने जब दलितों और मुसलमानों के प्रति उदारता दिखाई तो कुछ ब्राह्मण वादियों को बुरा लगा था ।

गाँधी हत्या के बाद एक साल तक चले मुकदमे के बाद, गोडसे को 8 नवंबर 1949 को मौत की सजा सुनाई गई थी।
ये दुश्मन को भी क्षमा करने को पक्ष नें रहते थे ।
इनकी सन्तानें भी इनकी इस परम्परा या पालन करती थीं ।
सजा के रूपान्तरण के लिए गांधी के दो बेटे मणिलाल गांधी और रामदास गांधी, ने दलील दी, लेकिन वह भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, उप प्रधानमंत्री वल्लभ भाई पटेल, और गवर्नर जनरल सी राजगोपालाचारी द्वारा ठुकरा दिया गया। 

अन्तत:गोडसे को 15 नवंबर 1949 को अंबाला सेंट्रल जेल में फांसी दी गई थी।
________
गोडसे हाई स्कूल से बाहर हो गया और हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संगठन) और हिंदू महासभा के साथ एक कार्यकर्ता बन गया, हालांकि उसकी सदस्यता की सही तारीख अनिश्चित हैं।

"आरएसएस "की सदस्यता-
गोडसे 1932 में एक संघी (महाराष्ट्र) कार्यकर्ता के रूप में सांगली (महाराष्ट्र) में आरएसएस में शामिल हो गए, और एक साथ दोनों दक्षिणपंथी संगठनों के हिंदू महासभा के सदस्य बने रहे।

उन्होंने अपने विचारों को प्रचारित करने के लिए अक्सर अखबारों में लेख लिखे।
 इस दौरान, गोडसे और एमएस गोलवलकर,(जो बाद में आरएसएस प्रमुख बने), अक्सर एक साथ काम करते थे, 

और उन्होंने बाबाराव सावरकर की पुस्तक "राष्ट्र मीमांसा" का अंग्रेजी में अनुवाद किया।

कालीचरण जी के शाब्दिक तांडव से भी 
विचलित कथित गांधीवादियों की ही नहीं अपितु प्रत्येक अहिंसा वादी का व्यथित होना स्वाभाविक ही है ।  

धार्मिक होने कि नाटक करने वाले भगवाधारी (जय श्रीराम) वाक्याँश का  उग्रवाद और आतंकवाद के उपोदघात और मानवता को आघात में रूढ़ार्थ करने वाले लोग नहीं जानते कि महात्मा गाँधी ने अपनी आत्मकथा में कहा कि "धर्म रहित जीवन पतवार विहीन नौका के सदृश है। 

धर्म जीवन को सन्मार्ग पर ले जाने ,व्यवस्थित जीवन जीने का माध्यम है "।
________________________________
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धीविद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥

शास्त्रों में धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शोच, इंद्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध-धर्म के ये दश लक्षण हैं।

 जिसमें ये लक्षण विद्यमान हों उसो को धर्मात्मा समझना चाहिए ।

"धृति" सबसे पहला धर्म का लक्षण है। 

धर्म-पथ में अग्रसर होने के लिये सबसे प्रथम धृति का पाथेय चाहिए।

धर्ममंदिर में प्रविष्ट होने के समय सबसे पहले धृतिमान की ही पात्रता होती है। 

जिसके पास धृति नहीं, उसके पास धर्म भी नहीं होता । 
_______________________________

क्षमा आदि सब गुणों से प्रथम 'धृति' का नाम लेकर महर्षियों ने इसी बात को सूचित किया है। इसलिये आज हम भी और लक्षणों से प्रथम इसी का विचार करते हैं।

स्मृति के टीकाकारों ने धृति शब्द का अर्थ बहुधा संतोष किया है और किसी किसी ने इसका अर्थ धैर्य भी लिखा है।

सन्तोष और धैर्य सम्पूरक ही नहीं अपितु  क्रमश चमक और प्रकाश से समान हैं सन्तोष धैर्य कि शैशवावस्था है ।
 _______________

धर्म "धृ धातु से मनिन् प्रत्यय करने पर बना कृदन्त शब्द है। 
जिसका उद्देश्य सद्गुणों के धारण करने से है ।ऋषियों ने जिन सद्गुणों के वर्णन किये है ।
उसमें क्षमा प्रमुख है । 

क्षमा व्यक्ति कि क्षमताओं का प्रतिमान है ।
क्षमा वीरो का आभूषण है।
गान्धी क्षमाशील थे।

रामधारी सिंह 'दिनकर' ने कुरुक्षेत्र खण्ड काव्य में
कहा है –

"कि विषधर सर्प को ही क्षमा शोभा देती है। आशय यह है कि जिसके पास शक्ति होती है तथा जो शक्ति के द्वारा शत्रु का दमन करने में सक्षम होता है, ।
क्षमा करने का अधिकारी भी वही होता है, शक्तिहीन व्यक्ति की क्षमा निरर्थक होती है। उसका कोई मूल्य नहीं होता।
और अग्र पंक्ति में कहा -
____
अत्याचार सहन करने का कुफल यही होता है,
पौरुष का आतंक मनुज कोमल होकर खोता है ।
_____________
क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो ,
उसको क्या जो दंतहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो ।
____________

क्षमा शोभती उसी भुजंग को ,जिसके पास गरल हो।
उसको क्या जो दन्त हीन विषहीन विनीत सरल हो।।

हिन्दुत्व के नाम पर उग्रवाद और वितण्डावाद करने वाले बताऐं कि हिन्दू किस धर्म ग्रन्थ में है ।
हिन्दू कोई धर्म नहीं अपितु  एक भू -सांस्कृतिक अवधारणा है । हिन्दू शब्द या  प्रयोग ईसा पूर्व ५०० में अपने पुरालेख मे दारा प्रथम ने किया था।

ईरानी धर्मग्रन्थ "अवेस्ता ए जन्द" में हफ्तहिन्दव को रूप में भारत कि सात नदीयों का उल्लेख किया है।
सप्त सिंधव अथवा 'सप्त सिन्धु' देव संस्कृति को अनुयायी लोगों का प्रारम्भिक निवास स्थान माना जाता है।

 वेदों में१- गंगा,२- यमुना, ३-सरस्वती, ४-सतलुज, ५-परुष्णी, ६-मरुद्वधा और ७-आर्जीकीया सात नदियों का उल्लेख है। 

सप्त सिंधव भारतवर्ष का उत्तर पश्चिमी भाग था। 

सप्त सिंधव देश का फैलाव कश्मीर, पाकिस्तान और पंजाब के अधिकांश भाग में था। 

देवसंस्कृति को उपासक उत्तरीध्रुव , मध्य एशिया अथवा किसी अन्य स्थान से भारत आये हों, 

 ये सात नदियाँ इस प्रकार हैं 

१-सिंधु 
२-विपासा(व्यास)
३-आतुल(सतलुज)शतद्रु
४-वितस्ता(झेलम)
५-अस्क्नी(चिनाव)
६-परूसी(रावी)
७-सरस्वती
हिन्दू शब्द कि जन्म-

और आज ईरानी धर्मग्रन्थ "अवेस्ता ए जन्द" में प्रयुक्त शब्द हिन्द ही जब यूनानी "सरजमीं पर पहुँचा तो  वहाँ इसका रूप इन्दिया" हो गया जिसे अंग्रेज़ी हुकूमत मनेर इण्डिया' बना दिया और जो आज मात्र राजनेताओं की कण्डिया' बनकर रह गयी है ।

महात्मा गाँधी से पहले देश अंग्रेज़ी हुकूमत का गुलाम था।
गाँधी ने अपना बलिदान देकर हमे हें आजादी दी 
   
महात्मा क्षमाशीलता के प्रतिमूर्ति थे । 
एक गाल पर चाटा मारने वाले के समक्ष दूसरे गाल को प्रस्तुत करने को आदर्श मानते थे। 

स्वाधीनता के उग्र आंदोलन के जगह सविनय अहिंसात्मक आंदोलन में विश्वास करते थे।
      

आवश्यकता गांधी वाद को आत्मसात करने की है यदि आज  महात्मा जीवित होते तो वे कीचड़ से कीचड़ नही धोते ,कालीचरण को क्षमा कर देते है 

लेकिन गांधी जी  राम राज्य के आदर्श और मानवता वादी रूप को समर्थक व पेरौकार थे। 
 परन्तु "जयश्रीराम" को रूप में आतंकवादी गतिविधियों को अन्जाम देने वाले महात्मा गाँधी को राम राज्य के आदर्श को क्या जाने ?
_________________
महात्मा गाँधी और उनकी निर्मला" बकरी की महानता जिसे शास्त्रों ने भी स्वीकारा-  शास्त्रों में बकरी को गाय से भी श्रेष्ठ पशु बताया-

विश्व के जन्तु वैज्ञानिकों ने जब बकरी के दूध की गुणवत्ता का अनुसन्धान किया तो वे चमत्कृत हो गये ।
__________________________________________

ब्रह्मा ने  अपने मुख से बकरियाँ उत्पन्न कीं और वक्ष से भेड़ों को  और उदर से गायों को उत्पन्न किया ।

ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न होने को कारण ही बकरियाँ  पशुओं में मुख्य( श्रेष्ठ) हैं ।

मुखे आदौ भवः यत् प्रथमकल्पे अमरः कोश - श्रेष्ठे च ।
_____________
और दोनों पैरों से घोड़ो और तुरंगो, गदहों और नील गाय तथा ऊँटों को उत्पन्न किया और भी इसी प्रकार सूकर(वराह)कुत्ता जैसी अन्य  जातियाँ उत्पन्न हुईं ।

बकरी ब्राह्मणों की सजातीय  इसीलिए है कि 
ब्राह्मण भी ब्रह्मा जी के मुख से उत्पन्न हुए हैं।

 अग्नि, इन्द्र ,ब्राह्मण और अजा ये सभी पहले उत्पन्न हुए और विराट पुरुष के मुख से उत्पन्न हुए इसी लिए इन्हें मुख्य कहा गया।
 "अग्रजायते ब्रह्मण:मुखात् इति अजा।

_________________________
(ऋग्वेद मण्डल दश सूक्त नवति ऋचा द्वादश)
१०/९०/ १ से १२ तक ऋग्वेद मैं वर्णन है कि

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥१॥

पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् ।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥२॥

एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः ।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥३॥

त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः ।
ततो विष्वङ्व्यक्रामत्साशनानशने अभि ॥४॥

तस्माद्विराळजायत विराजो अधि पूरुषः ।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥५॥

यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत ।
वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः॥६॥

तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन्पुरुषं जातमग्रतः।
तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये॥७॥

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् ।
पशून् ताँश्चक्रे वायव्यानारण्यान्ग्राम्याश्च ये॥८॥

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥९॥
_____________________________
तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः ।
गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजा अवयः।१०॥
________________________________

यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् ।
मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरू पादा उच्येते।११।

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥१२॥

मुखतोऽजाः सृजन्सो वै वक्षसश्चावयोऽसृजत् गावश्चैवोदराद्ब्रह्मा  पुनरन्याँश्च निर्ममे ।1.107.३० । 

पादतोऽश्वांस्तुरङ्गांश्च रासभान्गवयान्मृगान् ।उष्ट्रांश्चैव वराहांश्च श्वानानन्यांश्च जातयः 1.107.३१।

________________

ब्रह्मा ने मुख से बकरियाँ उत्पन्न कीं ।
वक्ष से भेड़ों को  और उदर से गायों को उत्पन्न किया   
।३०।
और दोनों पैरों से घोड़ो और तुरंगो गदहों और नील गाय तथा ऊँटों को उत्पन्न किया और भी इसी प्रकार सूकर(वराह)कुत्ता जैसी अन्य जातियाँ उत्पन्न हुईं ।३१।
 सन्दर्भ-(विष्णु धर्मोत्तर पुराण खण्ड प्रथम अध्याय (१०७)

अन्य बहुतायत पुराणों में भी वेदों के सन्दर्भों का ही हवाला दिया गया है ।
_______________________________
अवयो वक्षसश्चक्रे मुखतोजाः स सृष्टवान् ।
सृष्टवानुदराद्गाश्च पार्श्वभ्यां च प्रजापतिः ।४८।

पद्भ्यां चाश्वान्समातङ्गान्रासभान्गवयान्मृगान्।
उष्ट्रानश्वतरांश्चैव न्यङ्कूनन्याश्च जातयः। ४९।

विष्णु पुराण प्रथमाँश पञ्चमो८ध्याय (५) 
__________________

में भी बकरी और ब्राह्मण ब्रह्मा जी के मुख से उत्पन्न हुए हैं ।
ततः स्वदेहतोऽन्यानि वयांसि पशवोऽसृजत् ।
__________________
मुखतोऽजाः ससर्जाथ वक्षसश्चावयोऽसृजत्॥४८.२५॥
गावश्चैवोदराद् ब्रह्मा पार्श्वाभ्याञ्च विनिर्ममे ।
पद्भ्याञ्चाश्वान् स मातङ्गान् रासबान् शशकान् मृगान्॥४८.२६॥

बकरी को शास्त्रों में सर्वाधिक श्रेष्ठ पशु माना गया है ब्राह्मण भी प्रारम्भिक काल में बकरी ही पालते थे ।क्यों कि बकरी ब्रह्मा के मुख से निकली- जो ब्राह्मणों की सजातीय है।

दु:ख तो तब होता है जब बकरी पालने वाले हजरत ईसा' हजरत मूसा और राम,और  भगवान श्रीकृष्ण भी थे  परन्तु आज के जाहिल बकरी को तुच्छ पशु मानते हैं और कहते हैं की बकरी तो पाल (गड्ढरि) समाज के  लोगों का पालने का काम रिवाज सदीयों पुराना है ।

गड्डरिक, प्राकृत गड़डरि -एक जाति जो भेड़ें पालती और उनके ऊन से कंबल बुनती हैं । 
हिब्रू भाषा नें गडेरी जिसका अर्थ ईश्वर का भक्त होता है ।

____________
महात्मा गाँधी शास्त्रों के सार को जानते थे 
इसी लिए बकरी माता को पालने का उनका कार्य उनके  शास्त्रों का तत्वज्ञानी होने कि प्रमाण है ।

सांख्य दर्शन में बकरी( अजा) को ही संसार की आदि माता कहा है ।
_____________
अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां वह्वी: प्रजा सृजामानां सरूपा:।

अजो हि एको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्य:॥

सन्दर्भ-श्वेताश्वेतरउपनिषद-४/५]

यहाँ लोहित शुक्ल कृष्ण रंग ( वर्ण)क्रमश: रजस, सत्त्व तथा तमस-त्रिगुण के लिए प्रयुक्त है। इन तीन रंगों वाली अथवा

इन तीन गुणों से युक्त एक अजा ( बकरी)  है ; इसका भोग करता हुआ  एक अज (बकरा) है।

तथा भोग रहित एक और अज तत्त्व (परमात्मा) है। 

इस प्रकार यह उपनिषदवाक्य त्रिगुणात्मक प्रसवधर्मि (सृजन करने वाली) प्रकृति का उल्लेख भी  अजा के रूप में करता है।
 


परमात्मा को मायावी कहकर प्रकृति को ही माया कहा गया है। इस प्रसंग में पुन: मायावी और माया से बन्धे हुए अन्य तत्त्व जीवात्मा का उल्लेख भी है।

____________

बकरी सदीयों से अनके संस्कृतियों में पाली जाती रही है। इसका दूध प्राणी मात्र को लिए अमृत तुल्य व आसानी से पच जाने वाला है।

बकरी के दूध में (लिपिड कण) प्रचुर जबकि गाय के दूध में काफी छोटे होते हैं। 

लिपिड एक अघुलनशील पदार्थ हैं, जो कार्बोहाइड्रेट एवं प्रोटीन के साथ मिलकर प्राणियों एवं वनस्पति के ऊतक का निर्माण करते है। ... इनका प्रमुख कार्य शरीर में उर्जा संरक्षण करना, ऊतकों की कोशिका झिल्ली बनाना और हार्मोन और विटामिन के अभिन्न अवयव निर्माण करना होता है।

बड़ी संख्या में छोटे व्यास के साथ वसा' ग्लोबुल्स होने से बकरी का दूध अधिक सुपाच्य होता है। 
इसमें कैल्शियम, मैग्नीशियम और फोस्फोरस की उच्च मात्रा सम्यक होती है।

इसमें पॉलीअनसेचुरेटेड वसा( PUFA )की उच्च मात्रा है। 

जो (LDL) एलडीएल (खराब) कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करता है।

यह हृदय रोग, जठरांत्र रोगों और एलर्जी की रोकथाम में मददगार है।
इसके अलावा पाचन विकार, दमा, अल्सर, एलर्जी, सूखा रोग, क्षय रोग में भी बकरी सा दूध लाभकारी है।
_______________________________
शोधों को अनुसार-
बकरी का दूध शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है, जिससे शरीर को कोई बीमारी अटैक नहीं कर पाती है। 
यह एलर्जी के लिए भी फायदेमंद है।

बकरी का दूध ज्यादा सफ़ेद होता है। 
ये इसलिए की इसमें विटामिन( ए) की मात्रा ज्यादा होती है। विटामिन( ए) ही प्रतिरक्षा और एंटीबॉडी प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करता है।
_______________________________
बकरी के दूध में पोटेशियम, कैल्शियम, क्लोराइड, फास्फोरस, सेलेनियम, जिंक और तांबा जैसे तत्व गाय के दूध की तुलना में ज्यादा होते है।

यही तत्व आंत्र सूजन को कम करने और कोलाइटिस से राहत देता है।

_______________________
बकरी के दूध में गाय के दूध से ज्यादा पौष्टिक और स्वास्थ्यकर तत्व होते हैं| 

बकरी के दूध का नियमित सेवन आपको ताकतवर बनाता है 
और बिमारियों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है| महात्मा गाँधी इस गुणवत्ता को जानते थे ।

बकर सा दूध पचाने में आसान है –जबकि कुछ लोगों को गाय के दूध से गैस और सूजन या फुलावट की समस्या होती है| 

बकरी का दूध इन उदर से सम्बंधित विकारों का समाधान है| 
ऐसा इसलिए है क्योंकि बकरी के दूध में फैट के तत्व छोटे होते हैं और ये गाय के दूध की अपेक्षा जल्दी टूट या पच भी जाते हैं|

 इसके अलावा बकरी के दूध में मौजूद पोटेशियम की मात्रा मानव शरीर में क्षारीय गुण पैदा करता है|

 जबकि गाय के दूध में इन पोषक तत्वों की कमी होती है जिससे गैस जैसी समस्या पैदा होती है|
______________________
इसका प्राकृतिक रूप से एकरूप होने का गुण अर्थात होमाजनाइज़्ड जिसका मतलब है एक रूपता  बकरी को दूध में प्रचुर रूप नें पाया जाता है| 

गाय के दूध में फैट होता है जिसकी पानी जैसी परत इसकी सतह पर आ जाती है| 

इसको दूर करने के लिए गाय के दूध के साथ एक प्रक्रिया करनी होती है जिसे "होमाजनाइजेशन कहा जाता है, इससे फैट के अणु ख़त्म हो जाते हैं| 

इससे क्रीम बनती है और दूध होमोजेनेस और अच्छी तरह मिला हुआ बनता है|
होमाजनाइजेशन के नुकसान भी हैं| 

इससे दूध में तथा साथ ही साथ हमारे शरीर में फ्री रेडिकल्स इकट्ठे होते हैं| 
ये आगे चलकर स्वास्थ्य से सम्बंधित परेशानियां पैदा करते हैं| 

___________________________
जबकी बकरी का दूध प्राकृतिक रूप से होमोग्नाइज़्ड होता है और इसके साथ अन्य कोई प्रक्रिया करने की आवश्यकता नहीं होती है|

इसलिए बकरी का दूध आपको होमाजनाइजेशन से दूर रखता है|

इससे एलर्जी कम होती है-  गाय के दूध में हाई लेवल मिल्क प्रोटीन होता है जिसे "कैसिइन" कहते हैं| 

गाय के दूध से बहुत से बच्चों को इस दूध से एलर्जी होती हैं, परिणामस्वरूप उलटी, दस्त, खुजली आदि होते हैं|

परन्तु इन एलेर्जीज से बचने के लिए बकरी के दूध को एक विकल्प के रूप में लिया जा सकता है| 
बकरी के दूध में 'कैसिइन की मात्रा काफी कम होती है|

‘लेक्टोज इंटॉलरेंस‘जैसी समस्या नहीं: लेक्टोज को भी मिल्क शुगर के रूप में जाना जाता है|

 इस लेक्टोज को पचाने के लिए मनुष्य शरीर में एक एंजाइम पैदा होता है जिसे लेक्टेस कहते हैं|

 जिन लोगों में लेक्टेस की कमी होती है उनमे ‘लेक्टोज इंटॉलरेंस’ जैसी समस्या रहती है|

बकरी के दूध में लेक्टोज की मात्रा कम होती है जिससे यह पचाने में आसान रहता है
_______________
बकरी का दूध ज्यादा सफ़ेद होता है। 
ये इसलिए की इसमें विटामिन ए की मात्रा ज्यादा होती है।
विटामिन ए प्रतिरक्षा और एंटीबॉडी प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करता है।

बकरी के दूध में पोटेशियम, कैल्शियम, क्लोराइड, फास्फोरस, सेलेनियम, जिंक और तांबा गाय के दूध की तुलना में ज्यादा होते है। 

यह आंत्र सूजन को कम करने और कोलाइटिस से राहत देता है।
यह हम पूर्व में ही बता चुके हैं ।

बकरी के दूध में गाय के दूध से ज्यादा पौष्टिक और स्वास्थ्यकर तत्व होते हैं| 

बकरी के दूध का नियमित सेवन आपको ताकतवर बनाता है और बिमारियों  से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है| 

बकरी का दूध कई रोगों के उपचार एवं रोकथाम में लाभदायक है, जैसे कि-
________

अधिक पोषक:बकरी के दूध में विटामिन "ए" की अधिकता होती है जिसे मानव शरीर द्वारा आसानी से अवशोषित कर लिया जाता है|

इसमें विटामिन बी-2 और राइबोफ्लेविन की मात्रा भी अधिक होती है जिसे प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट्स जैसे तत्व भी आसानी से पच जाते हैं|

बकरी के दूध में प्रोटीन, कैल्शियम और फास्फोरस की भी अधिकता होती है| यह एंटीबॉडीज का निर्माण कर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाता है | 

बकरी का दूध बायो-आर्गेनिक सोडियम का भी अच्छा स्त्रोत है जो पाचन क्षमता बढ़ाने वाले एन्जाइम्स पैदा करता है|

डेंगू रोग के उपचार में–डेंगू बीमारी से हम हर साल एक समस्या के रूप में रुबरु होते हैं। 
यह रोग जमे हुए पानी में पनपने वाले एडीज मच्छर के काटने से होता है।

बीमारी से बचने के लिए सतर्क और सावधान रहें तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाएं।

इसके लिए जरूरी है रक्त कणिकाओं की संख्या में इजाफा होना। 
शोध में पाया गया है कि बकरी का दूध रक्तकणों को बढ़ाने में मदद करता है, जो डेंगू से लड़ने के लिए बेहद आवश्यक है।

मधुमेह के रोग के उपचार में– बकरी के दूध का सेवन करने से शरीर में मौजूद एसिड आसानी से पच जाता है ।
जिससे उच्च रक्तचाप, कैंसर और मुधमेह आदि का इलाज आसानी से हो सकता है।

बकरी के दूध में कई गुण होते हैं जो शरीर के आलस्य को दूर करने के साथ-साथ थकान, मांसपेशियों का खिचाव, सिर दर्द और वजन का बढ़ना आदि की समस्याओं को आसानी से ठीक कर देता है!

इससे एलर्जी कम होती है- गाय के दूध में हाई लेवल मिल्क प्रोटीन होता है जिसे कैसिइन कहते हैं| 
बहुत से बच्चों को इस दूध से एलर्जी होती हैं, परिणामस्वरूप उलटी, दस्त, खुजली आदि होते हैं|
 इन एलेर्जीज से बचने के लिए बकरी के दूध को एक विकल्प के रूप में लिया जा सकता है|

बकरी के दूध में कैसिइन की मात्रा काफी कम होती है|

‘लेक्टोज इंटॉलरेंस‘जैसी समस्या नहीं: लेक्टोज को भी मिल्क शुगर के रूप में जाना जाता है|

इस लेक्टोज को पचाने के लिए मनुष्य शरीर में एक एंजाइम पैदा होता है जिसे लेक्टेस कहते हैं|
 जिन लोगों में लेक्टेस की कमी होती है उनमे ‘लेक्टोज इंटॉलरेंस’ जैसी समस्या रहती है|

बकरी के दूध में लेक्टोज की मात्रा कम होती है जिससे यह पचाने में आसान रहता है|

अधिक पोषक:बकरी के दूध में विटामिन ए की अधिकता होती है जिसे मानव शरीर द्वारा आसानी से अवशोषित कर लिया जाता है| 

इसमें विटामिन बी-2 और राइबोफ्लेविन की मात्रा भी अधिक होती है जिसे प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट्स जैसे तत्व भी आसानी से पच जाते हैं|

 बकरी के दूध में प्रोटीन, कैल्शियम और फास्फोरस की भी अधिकता होती है| यह एंटीबॉडीज का निर्माण कर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाता है|

 बकरी का दूध बायो-आर्गेनिक सोडियम का भी अच्छा स्त्रोत है जो पाचन क्षमता बढ़ाने वाले एन्जाइम्स पैदा करता है|

डेंगू रोग के उपचार में–डेंगू बीमारी से हम हर साल एक समस्या के रूप में रुबरु होते हैं। यह रोग जमे हुए पानी में पनपने वाले एडीज मच्छर के काटने से होता है। 

बीमारी से बचने के लिए सतर्क और सावधान रहें तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाएं। 

इसके लिए जरूरी है रक्त कणिकाओं की संख्या में इजाफा होना। शोध में पाया गया है कि बकरी का दूध रक्तकणों को बढ़ाने में मदद करता है, जो डेंगू से लड़ने के लिए बेहद आवश्यक है।

मधुमेह के रोग के उपचार में– बकरी के दूध का सेवन करने से शरीर में मौजूद एसिड आसानी से पच जाता है जिससे उच्च रक्तचाप, कैंसर और मुधमेह आदि का इलाज आसानी से हो सकता है।

बकरी के दूध में कई गुण होते हैं जो शरीर के आलस्य को दूर करने के साथ-साथ थकान, मांसपेशियों का खिचाव, सिर दर्द और वजन का बढ़ना आदि की समस्याओं को आसानी से ठीक कर देता है।

रोग–प्रतिरोधक क्षमता बढाने में–शोध में पता चला है कि बकरी के दूध में सेलेनियम की अधिक मात्रा होती है जिससे यह दूसरे दुधारू पशुओं की तुलना में तीन गुना अधिक सेलेनियम प्रदान करती है जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा देता है।

एचआईवी के रोग के उपचार में– बकरी के दूध में मौजूद गुण से एचआईवी एड्स से पीडि़त मरीजों को लंबे समय तक बचाया जा सकता है। 

सीडी 4 काउन्टस को बढ़ाता है बकरी का दूध। 

जो एचआईवी पीडि़त रोगीयों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने का काम करता है।

11.इम्यूनिटी -
बकरी के दूध में सेलेनियम नामक एक मिनरल पाया जाता है जो बॉडी के इम्यून पावर को बढ़ाने में मददगार होता है।
स्ट्रॉन्ग इम्यूनिटी बॉडी को कई तरह के रोगों से दूर रखती है।
बहुत से डॉक्टर भी बकरी का दूध पीने की सलाह देते हैं।

डेंगू से बचाव में फायदेमंद है बकरी का दूध, जानिए कारण——

डेंगू से बचने के लिए सावधानियां तो आवश्यक है ही, रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना भी बेहद जरूरी है।
इसके लिए जरूरी है रक्त कणिकाओं की संख्या में इजाफा होना।
एक शोध के अनुसार बकरी का दूध रक्तकणों को बढ़ाने में मदद करता है, जो डेंगू से लड़ने के लिए बेहद आवश्यक है।

इस तरह से बकरी का दूध डेंगू से बचने के लिए एक अच्छा विकल्प हो सकता है। 

हरे पौधों और पत्ति‍यों को आहार के रूप में ग्रहण करने के कारण इसके दूध में भी औषधीय गुण होते हैं, और यह कई तरह की बीमारियों को दूरकरने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 

यही कारण है कि जो व्यक्ति नियमित तौर पर बकरी का दूध पीता है, उसे बुखार जैसी समस्याएं नहीं होती।

बकरी के दूध में विटामिन और मिनरल्स भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो बीमारियों से लड़ने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करते हैं।

विटामिन बी6, बी12, विटामिन डी, फोलिक एसिड और प्रोटीन से भरपूर बकरी का दूध शरीर को पुष्ट कर, प्रतिरक्षी तंत्र को मजबूत करता है, 

जिससे बीमारियों की संभावना नहीं के बराबर हो जाती है।

एक अन्य शोध के अनुसार किसी बच्चे को बकरी का दूध पिलाने पर उसकी रोधप्रतिरोधक क्षमता में इस कदर इजाफा होता है,

 कि उसके बीमार होने की संभावना नहीं के बराबर होती है।

हालांकि 1 साल से छोटे बच्चों को बकरी का दूध नहीं पिलाना चाहिए, क्यों‍कि इससे उन्हें एलर्जी का खतरा होता है।

बकरी के दूध में पाया जाने वाला प्रोटीन, गाय या भैंस के दूध में मौजूद प्रोटीन की तुलना में बेहद हल्का होता है। 
______________________        
जहां गाय के दूध का पाचन लगभग 8 घंटे में होता है, वहीं बकरी का दूध पचने में महज 20 मिनट का समय लेता है।

बकरी का दूध अपच की समस्या को दूर कर शरीर में उर्जा का संचार करता है। 

इसके अलावा इसमें मौजूद क्षारीय भस्म आंत्र तंत्र में अम्ल का निर्माण नहीं करता जिससे थकान, मसल्स में खिंचाव, सिर दर्द आदि की समस्या नहीं होती।

डेंगू के इलाज व डेंगू से बचाव में बकरी का दूध बेहद कारगर उपाय है।

डेंगू रोग के उपचार में–डेंगू बीमारी से हम हर साल एक समस्या के रूप में रुबरु होते हैं।
यह रोग जमे हुए पानी में पनपने वाले एडीज मच्छर के काटने से होता है।

बीमारी से बचने के लिए सतर्क और सावधान रहें तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाएं।
इसके लिए जरूरी है रक्त कणिकाओं की संख्या में इजाफा होना।

शोध में पाया गया है कि बकरी का दूध रक्तकणों को बढ़ाने में मदद करता है, जो डेंगू से लड़ने के लिए बेहद आवश्यक है।

मधुमेह के रोग के उपचार में– बकरी के दूध का सेवन करने से शरीर में मौजूद एसिड आसानी से पच जाता है जिससे उच्च रक्तचाप, कैंसर और मुधमेह आदि का इलाज आसानी से हो सकता है।

बकरी के दूध में कई गुण होते हैं जो शरीर के आलस्य को दूर करने के साथ-साथ थकान, मांसपेशियों का खिचाव, सिर दर्द और वजन का बढ़ना आदि की समस्याओं को आसानी से ठीक कर देता है।

रोग–प्रतिरोधक क्षमता बढाने में–शोध में पता चला है कि बकरी के दूध में सेलेनियम की अधिक मात्रा होती है जिससे यह दूसरे दुधारू पशुओं की तुलना में तीन गुना अधिक सेलेनियम प्रदान करती है जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा देता है।

"एचआईवी" के रोग के उपचार में– बकरी के दूध में मौजूद गुण से एचआईवी एड्स से पीड़ित मरीजों को लंबे समय तक बचाया जा सकता है। सीडी 4 काउन्टस को बढ़ाता है बकरी का दूध।

 जो एचआईवी पीडि़त रोगीयों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने का काम करता है।

बकरी के दूध में सेलेनियम नामक एक मिनरल पाया जाता है जो बॉडी के इम्यून पावर को बढ़ाने में मददगार होता है।
स्ट्रॉन्ग इम्यूनिटी बॉडी को कई तरह के रोगों से दूर रखती है।
 बहुत से डॉक्टर भी बकरी का दूध पीने की सलाह देते हैं।

डेंगू से बचाव में फायदेमंद है बकरी का दूध, जानिए कारण———

डेंगू से बचने के लिए सावधानियां तो आवश्यक है ही, रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना भी बेहद जरूरी है।
इसके लिए जरूरी है रक्त कणिकाओं की संख्या में इजाफा होना। 

एक शोध के अनुसार बकरी का दूध रक्तकणों को बढ़ाने में मदद करता है, जो डेंगू से लड़ने के लिए बेहद आवश्यक हैं।

__________________________________

प्रस्तुति- करण 
यादव योगेश कुमार" रोहि" - 8077160219 हैं।




सामाजिक विसंगति हैं गलतीयाँ ।और भूल हैं मनुष्यों की विस्मृतियाँ ।भूल और गलती चलती सदियों सेदौनों के स्तर अलग- अलग हैं गतियाँ।।


















 
एक आवेश हो मन में और चंचलता क्षण क्षण 
समझो तूफानों का दौर है , होगी जरूर गड़बड़।। 

ये उमंग और रंगत , लगें मोहक नजारे,
सयंम की राह हे मन पकड़ ! इधर उधर 'न जारे

–सच बयान करने वाले मुख नहीं ,
दुनियाँ में अब महज चहरे होते हैं । 
केवल शब्दों की ही भाषा सुनने वाले  
लोग तो अक्सर बहरे होते हैं।।

 अरे तेरी आँखें जो कहती हैं पगले । 
वो भाव ही असली तेरे होते हैं। 

उमड़ आते हैं वे एकदम चहरे पर
बर्षों से दिल में जो कहीं ठहरे होते हैं
 
 दर्द देते हमको वीरानी राहों में "रोहि"
 अक्सर तन्हाई में  जब कहीं बसेरे होते हैं ।
 अपमान हेयता की चोटों के जख़्म , 
जो न भरने वालेे और बड़े गहरे होते हैं ।। 

–दान दीन को दीजिए भिक्षा जो मोहताज ।
 और दक्षिणा दक्ष को जिसका श्रममूलक काज।

 परन्तु रीति विपरीत है सब जगह देख लो आज ।
 श्रृंँगार बनाकर असुन्दरी जैसे नैन - मटका वाज।

 जैसे डिग्रीयों में अब नहीं, रही योग्यता की आवाज ।।

-ये परिस्थियाँ ये अनिवार्यताऐं जीवन की एक सम्पादिका !
 जिनकी वजह से खरीदा और बेका भी बहुत परन्तु अपना कभी चरित्र नहीं बिका ।। 

प्रवृत्तियाँ जन्म सिद्ध होती जिनसे निर्धारित जातियाँ।
आदतें व्यवहार सिद्ध ज्योति सुलगती जीवन बातियाँ ।।

 ये कर्म अस्तित्व है जीवन का धड़कने श्वाँस के साँचे।
 समय और परिवर्तन मिलकर जगत् के गीत सब बाँचे ।।

 –क्योंकि जिन्दे पर पूछा नहीं न किया कभी उन्हें याद ! 
तैरहीं खाने आते हैं वे उसके मरने के वाद ।
 कर्ज लेकर कर इलाज कराया जैसे खुजली में दाद ।
 खेती बाड़ी सभी बिक गयी हो गया गरीब बर्वाद 

 पण्डा , पण्डित गिद्द पाँत में फिर भी ले रहे स्वाद 
 घर की हालत खश्ता इतनी छाया है शोक विषाद 

 किस मूरख ने यह कह डाला ? 
तैरहीं ब्राह्मणों को प्रसाद !
 आज तुमने धन्यवाद वाद क्या दिया !
 मुझे तुमने धन्य कर दिया साध! 

धुल गया वो पाप सारा सब क्षमा जघन्य अपराध!
 तभी मुसाफिर आगे बढ़ता ले उन बातों की याद। 

–अज्ञानता के अँधेरों में हकीकत ग़ुम थी ।
 उजाले इल्म के होंगे ! उन्हें न ये मालुम थी ।।

 –धड़कने थम जाने पर श्वाँसें कब चलती हैं ? 
–बहारे गुजर जाती जहाँ वहाँ खामोशियाँ मचलती हैं !

 –हम इच्छाओं की खातिर जिन्द़ा ये इच्छा वैशाखी है। 
दर्द तो दिल में बहुत है लोगों , बस अब सिसकना बाकी है । 

–वासना लोभ मूलक पास रहने की इच्छा है ।
 जबकि उपासना स्वत्व मूलक पास रहने की इच्छा है ।

 काम अथवा वासना में क्रूरता का समावेश उसी प्रकार सन्निहित है ! –जैसे रति में करुणा- मिश्रित मोह सन्निहित है। 
जैसे शरद और वसन्त ऋतु दौनों का जन्म समान कुल और पिता से हुआ है । 
परन्तु जहाँ वसन्त कामोत्पादक है ।
वहीं शरद वैराग्य व आध्यात्मिक भावों की उत्पादिका ऋतु है ।

 –एक अनजान और अजीव देखा मैंने वह जीव । 
जीवन की एक किताब पढ़ न पाया तरतीब ।।

 १-साहित्य गूँगे इतिहास का वक्ता है ।
 परन्तु इसे नादान कोई नहीं समझता है ।।
 
साहित्य किसी समय विशेष का प्रतिबिम्ब 
तथा तात्कालिक परिस्थितियों का खाका है । 
ये पूर्ण चन्द्र की धवल चाँदनी है जैसे 
अतीत कोई तमस पूर्ण राका है ।। 

इतिहास है भूत का एक दर्पण। 
गुजरा हुआ कल, गुजरा हुआ क्षण -क्षण ।। 

२- कोई नहीं किसी का मददगार होता है । 
आदमी भी मतलब का बस यार होता है ।।

 छोड़ देते हैं सगे भी अक्सर मुसीबत में ।
 मुफ़लिसी में जब कोई लाचार होता है ।। 

बात ये अबकी नहीं सदीयों पुरानी है । 
स्वार्थ से लिखी हर जीवन कहानी है ।।

 स्वार्थ है जीवन का वाहक । 
और अहं जीवन की सत्ता है ।। 

अहंकार और स्वार्थ ही है । 
हर प्राणी की गुणवत्ता है ।। 

३- विश्वास को भ्रम , और दुष्कर्म को श्रम कह रहे 
 आज लूट के व्यवसाय को , अब कुछ लोग उपक्रम कह रहे।।

 व्यभिचार है,पाखण्ड है , ईमान भी खण्ड खण्ड है 
संसार जल रहा है हर तरफ से ये वासनाओं की ज्वाला प्रचण्ड है ।

 साधना से हीन साधु सन्त शान्ति से विहीन ।
 दान भी उनको नहीं मिलता जो वास्तव में बने हैं दीन।।

 व्यभिचार में डूबा हुआ । 
भक्त उसको परम कह रहे । 

रूढ़ियों जो सड़ गयीं लोग उनके धर्म कह रहे ।।

 ४- इन्तहा जिसकी नहीं, उसका कहाँ आग़ाज है 
 ना जान पाया तू अभी तक जिन्द़गी क्या राज है 

५- धड़कनों की ताल पर , श्वाँसों की लय में ढ़ाल कर ।
 स्वर बनाकर प्रीति को तब गाओ जीवन गीत को ।। 

साज़ लेकर संवेदनाओं का । 
दु:ख सुख की ये सरग़में ।
 आहों के आलाप में । ये कुछ सुनाती हैं हम्हें ।। 

सुने पथ के ओ पथिक ! 
तुम सीखो जीवन रीति को ।। 
स्वर बनाकर प्रीति को तब गाओ जीवन गीत को ।।

 सिसकियों की तान जिसमें एक राग है अरमान का ।।
 प्राणों के झँकृत तार पर । उस चिर- निनादित गान का ।। 

विस्तृत मत कर देना तुम , इस दायित पुनीत को  
स्वर बनाकर प्रीति को तब गाओ जीवन गीत को  

ताप न तड़पन रहेगी। जब श्वाँस से धड़कन कहेगी 
 हो जोश में तनकर खड़ा। विद्युत - प्रवाह सी प्रेरणा ।

 बनती हैं सम्बल बड़ा ।। 
तुम्हेें जीना है अपने ही बल पर ।
 तुम लक्ष्य बनाओं जीत को ।। 

स्वर बनाकर प्रीति को तब गाओ जीवन गीत को 

६- खो गये कहीं बेख़ुदी में । हम ख़ुद को ही तलाशते ।।
 लापता हैं मञ्जिलें । 
अब मिट गये सब रास्ते ।। 
न तो होश है न ही जोश है ।। 

ये जिन्द़गी बड़ी खामोश है ।। 
बिखर गये हैं अरमान मेरे सब बदनशीं के वास्ते ।। 
ये दूरियाँ ये फासिले , बेतावीयों के सिलसिले !! 
एक साद़गी की तलाश में , हम परछाँयियों से आमिले ।। 

दूर से भी काँच हमको। मणियों जैसे भासते ।।
 सज़दा किया मज्दा किया ।। कुर्बान जिसके वास्ते।। 
हम मानते उनको ख़ुदा ।। 
जो कभी न हमारे ख़ास थे ।। 

किश्ती किनारा पाएगी कहाँ मिल पाया ना ख़ुदा ।।
 वो खुद होकर हमसे ज़ुदा । 
ओझल हो गया फिर आस्ते ।। 
खो गये कहीं बेख़ुदी में । 
हम ख़ुद को ही तलाशते ।। 

७- जिन्द़गी की किश्ती ! 
आशाओं के सागर ।। 
बीच में ही डूब गये ; 
कुछ लोग तो घबराकर ।।
 किसी आश़िक को पूछ लो । 
अरे तुम द़िल का हाल जाकर ।।
 दुपहरी सा जल रहा है ; बैचारा तमतमाकर ।। 
किसी कँवारी से मत पूछना सहानुभूति थोड़ी भी दिखाकर ।।

 तड़फड़ाती फिरती है ' वह जैसे खोई प्यासी लहर 
 असीमित आशाओं के डोर में । 
बँधी पतंग है जिन्द़गी कोई ।। 
मञ्जिलों से पहले ही यहाँं , 
भटक जातों हैं अक्सर बटोही क्यों कि ! बख़्त की राहों पर ! जिन्द़गी वो मुसाफिर है ।। 

जिसकी मञ्जिल नहीं "रोहि" कहीं । 
और न कोई सफ़र ही आखिर है ।। 
आशाओं के कुछ पढ़ाब जरूर हैं 
वह भी अभी हमसे बहुत दूर हैं ।। 

बस ! चलते रो चलते रहो " चरैवेति चरैवेति ! 

८- अपनों ने कहा पागल हमको । ग़ैरों ने कहा आवारा है । 
जिसने भी देखा पास हम्हें । उसने ही हम्हें फटकारा है ।। 

९- कोई तथ्य असित्व में होते हुए भी उसी मूल-रूप में नहीं होता ; जिस रूप में कालान्तरण में उसके अस्तित्व को लोगों द्वारा दर्शाया जाता है । 

क्यों कि इस परिवर्तित -भिन्नता का कारण लोगों की भ्रान्ति पूर्ण जानकारी, श्रृद्धा प्रवणता तथा अतिरञ्जना कारण है । 
और परम्पराओं के प्रवाह में यह अस्त-व्यस्त होने की क्रिया स्वाभाविक ही है । 
देखो ! आप नवीन वस्त्र और उसी का अन्तिम जीर्ण-शीर्ण रूप ! अतः उसके मूल स्वरूप को जानने के लिए केवल अन्त:करण की स्वच्छता व सदाचरण व्रत आवश्यक है क्यों कि दर्पण के स्वच्छ होने पर ज्ञान रूप प्रकाश स्वत: ही परावर्तित होता है ।
 और यह ज्ञान वही प्रकाश है । 

जिससे वस्तु अथवा तथ्यों का मूल वास्तविक रूप दृष्टि गोचर होता है । और ज्ञान की सिद्धि के लिए अन्त:करण चतुष्टय की शुद्धता परमावश्यक है ।
 फिर आपसे बड़ा कोई ज्ञानी नहीं । 
समझे ! अभी नहीं समझे !
 अनुभव उम्र की कषौटी है । 
ज्ञान की मर्यादा उससे कुछ छोटी है । 

क्योंकि अनुभव प्रयोगों के आधार पर अपने आप में सिद्ध होता है और ज्ञान केवल एक सैद्धान्तिक स्थति है भक्तों आप ही बताइए कि प्रयोग बड़ा होता है या सिद्धांत ! 

परिस्थितियों के साँचे में । 'रोहि' व्यक्तित्व ढलता है ।
 बदलती है दुनियाँ उनकी , जिनका केवल मन बदलता है। 

मेरे विचार मेरे भाव यही मेरे ठिकाने हैं ।
 हर कर्म है इनकी व्याख्या ये लोगो को समझाने हैं 

जन्म जन्मान्तरण के अहंकारों का सञ्चित रूप ही
 तो नास्तिकता है । 
आत्मा को छोड़कर दुनियाँ में बस सब-कुछ बिकता है ।

 जो जीवन को निराशाओं के अन्धेरों से आच्छादित कर देती है । और ये आस्तिकता जीने का एक सम्बल देती है ।
 समझने की आवश्यकता है कि क्या नास्तिकता है ? 

अपने उस अस्तित्व को न मानना जिससे अपनी पता है ।
 क्यों कि लोग अहं में जीते है । 

जिसमें फजीते ही फजीते हैं । 
परन्तु यदि वे स्वयं में जी कर देखें तो वे परम आस्तिक हैं और बड़े सुभीते हैं।। 

बुद्ध ने भी स्व को महत्ता दी अहं को नहीं !
 दर्शन ( Philosophy) से विज्ञान का जन्म हुआ !
 दर्शन वस्तुत सैद्धान्तिक ज्ञान है । 

और जबकि विज्ञान प्रायौगिक है , --जो किसी वस्तु अथवा तथ्य के विश्लेषण पर आधारित है ।

 ताउम्र बुझती नहीं "रोहि " जिन्द़गी 'वह प्यास है । 
आनन्द की एक बूँद के लिए भी , आदमी इच्छाओं का दास है ।।

 परन्तु दु:ख सुख की मृग मरीचि का में 
उसका ये सारा प्रयास है।। 

आस जब तलक छोड़ी नहीं थीं धड़कने और श्वाँस ।
 जीवन किसी पहाड़ सा दुर्गम और स्वप्न जैसे झरना कोई खा़स.. 

ये नींद सरिता की अविरल धारा. 
जहाँ मिलता नहीं कभी कोई किनारा। 

हर श्वाँस में है अभी जीने की चाह ... 
क्योंकि जीवन है अनन्त जन्मों का प्रवाह ....
 शिक्षा का व्यवसायी करण दु:खद व पतनकारी हे भगवन् ! 

शिक्षा अन्धेरे में दिया इसके विना सूना जीवन । 
आज के अधिकतर शिक्षा संस्थान (एकेडमी) एक ब्यूटी-पार्लर से अधिक कुछ नहीं हैं । 

जिनमें केवल डिग्रीयों का श्रृँगार करके विद्या - अरथी नकलते हैं । ये योग्यता या विद्या का अरथी ले जा रहे हों ऐसा लगता है । 

जिनमें योग्यता रूपी सुन्दरता का प्राय: अभाव ही रहता है केवल आँखों में सबको चूसने का भाव रहता है। इन्हें -जब समझ में आये कि सुन्दरता कोई श्रृँगार नहीं ! -
जैसे साक्षरता शिक्षाकार नहीं । 
योग्यता एक तपश्चर्या है । 

--जो नियम- और संयम के पहरे दारी में रहती है ।
 वैसे भी योग्य व्यक्ति दुनियाँ का सबसे शक्ति शाली व्यक्ति है । 
यदि स्त्रीयाँ सुन्दर न हों केवल श्रृँगार सर्जरी कराई कर रुतबा बिखेरती हों तो विद्वानों की दृष्टि में कभी भी सम्माननीया नहीं रहती । 

जिन्हें अपने संसारी पद का , "रोहि" हद से ज्यादा मद है । 
सन्त और विद्वान समागम , उनका छोटा क़द है ।

 उनके पास कुछ टुकड़े हैं । क्षण-भङ्गुर चन्द कनक के , 
उन्मुक्त कर रहे स्वर उनको , बड़ते पैसों की खनक के ।।

 उनकी उपलब्धियों की भी , संसार में यही सरहद है ।
 ये लौकिक यात्रा का साधन धन !
 जिसकी टिकट भी अब तो रद है ।।
 जीवात्मा की अनन्त यात्रा ।
 जिसका पाथेय उपनिषद् है । 
पढ़ाबों से वही बढ़ पाता है रोहि ।

 --जो राहों का गहन विशारद है .
.. सच कहने में संकोच खौंच दीवार की आँसे ! 
व्यक्ति की छोटी शोच , मोच पैरों की नाँसे !!

 बातचीत करके और व्यवहार परख कर चलने वाले कभी नहीं पाते झांसे ! 

सभी दूध के धुले भी कहाँ निर्विवाद होते हैं । 
नियमों में भी अक्सर यहाँं अपवाद होते हैं ।। 

कार्य कारण की बन्दिशें , उसके भी निश्चित दायरे। 
नियम भी सिद्धान्तों का तभी, अनुवाद होते हैं ।। 

महानताऐं घूमती हैं "रोहि" गुमनाम अँधेरों में । 
चमत्कारी तो लोग प्रसिद्धियों के बाद होते हैं ।। 

भव सागर है कठिन डगर है । 
हम कर बैठे खुद से समझौते ! 
डूब न जाए जीवन की किश्ती । 
यहाँ मोह के भंवर लोभ के गोते ।
 मन का पतवार बीच की धार। 
रोही उम्र बीत गई रोते-रोते। 
प्रवृत्तियों के वेग प्रबल हैं । 
लहरों के भी कितने छल हैं । 

बस बच गए हैं हम खोते खोते। 
सद्बुद्धि केवटिया बन जा । 
इन लहरों पर सीधा तंजा । 

प्रायश्चित के फेनिल से चमकेगा। 
रोही अन्तर घट ये धोते-धोते।। 

तन्हाईयों के सागर में खयालों की बाड़ हैं । 
जिन्दगी की किश्ती लहरें प्रगाढ़ हैं ।

 पतवार छूट गये मेरे ज्ञान और कर्म के ।
 हर तरफ मेरे मालिक ! 
घोर स्वार्थो की दहाड़ है । 
जिसकी दृष्टि में भय मिश्रित छल है। 

रोही वह निश्चित ही कोई अपराध कर रहा है और उसे अपराध बोध भी है। परन्तु वह दुर्भावनाओं से प्रेरित है । 

यह मेरा निश्चित मत है और जो व्यक्ति हमसे भयभीत है हम्हें उनसे भी भयभीत रहें।
 क्योंकि यह अपने भय निवारण के लिए हमारा अवसर के अनुकूल अनिष्ट कर सकते हैं। 
व्यक्तित्व तो रोहि परिस्थितियों के साँचे में ढलते हैं । 

अभावों की आग में तप कर भत्त भी फौलाद में बदलते हैं । अनजान और अजीव , ऐसा था एक जीव ।। 

वक्त की राहों पर चल पड़ा बेतरतीव ।। 
शरद और वसन्त ऋतु क्रमश वैराग्य और काम भावों की उत्प्रेरक हैं । वैराग्य और काम एक ही वेग की दो विपरीत धाराऐं हैं ।
 ये हुश़्न भी "कोई " ख़ूबसूरत ब़ला है ! _______________________________

 बड़े बड़े आलिमों को , इसने छला है !!
 इसके आगे ज़ोर किसी चलता नहीं भाई! 

ना इससे पहले किसी का चला है ! 
ये आँधी है ,तूफान है ये हर ब़ला है 
परछाँयियों का खेल ये सदीयों का सिलस़िला है ! 

आश़िकों को जलाने के लिए इसकी एक च़िगारी काफी है , 
जलाकर राख कर देना । 

फिर इसमें ना कोई माफी है । 
सबको जलाया है इसने , ये बड़ा ज़लज़ला है !!
 इश्क है दुनियाँ की लीला, तो ये हुश़्न उसकी कला है ।।

 ________________________________________ 

ये अ़दाऐं बिजलीयाँ हैं , इन हुश़्न वालों की-💥 
सौन्दर्य वेत्ता भी तारीफ़ करते हैं , 'रोहि' इनके बालों की ,

 झटका इतना जबरद़स्त कि ! 
किसी की ज़िन्दगी पुर्जा पुर्जा हिला है !

 लुटाकर चले , सब कुछ खाली हाथ , 
कर्म- संस्कारों का बस जख़ीरा मिला है .

 समझा दो मन को .नज़रों से कह दो अरे !
 हुश़्न के नजारों से ना किसी का भला है ! 

ये 'रोहि' की ग़ुजारिश है तुमसे नौंजवानो .
 मन को निगरानी में लो ,और खुद़ को भी जानो !

 यह मेरी आख़िरी सलाह है ! 
और यही इत्तला है । 
मौहब्बत खूब सूरत दोखा । 
जहाँ हुश़्न एक अनोखी बल़ा है ।।

 छोटे या बड़े होने का प्रतिमान यथार्थों की सन्निकटता ही है ।
 क्यों कि ज्ञान सत्य का परावर्तन और सर्वोच्च शक्तियों का विवर्तन ( प्रतिरूप ) है । 

-वह व्यक्ति दुनियाँ का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति है ; 
जो सत्य के समकक्ष उपस्थित है ।
 ज्ञान जान है यह सत्य का प्रतिमान ( पैमाना )है । 
संसार में प्रत्येक व्यक्ति की एक सोच होती है ; 

जो समानान्तरण उसकी प्रवृत्ति और स्वभाव को प्रतिबिम्बित करती रहती है । 
उसी के अनुरूप वह जीवन में व्यवसाय क्षेत्रों का चयन करता है। और सत्य पूछा जाय तो इसका मूल कारण उसकी प्रारब्ध है जो जन्म- जमान्तरण के संचित 'कर्म'- संस्कारों से संग्रहीत है जीव संचित' क्रियमाण और प्रारब्ध का प्रतिफलन हैं । 

प्रारम्भ में सृष्टि में एक अवसर सबको मिलता है ।
 फिर समय उपरान्त वह अपने कर्मों से अपने जीवन की यात्रा निर्धारित करता है । 
लव तलब मतलब इन हयातों का सबब !

 दुनियाँ की उथल -पुथल दुनियाँ इनसे ये सारी है । 
कर्म जीवन का अस्तित्व कर्म ये कर्म की फुलवारी है ।।

 आमीन !!! 
आपका शुभ चिन्तक यादव योगेश कुमार "रोहि" ~~ इस शुभ उद् गार को सभी अाश़िकों मे प्रेषित कर दो -----📡..... _____________________________________ 

रोहि सुधरेगा नहीं , सदियों तक ये देश।।
अनपढ़ बैठे दे रहे ,  मंचों  पर  उपदेश।।

मंचों पर उपदेश  पंच बैठे हैं अन्यायी ।
वारदात के बाद पुलिस लपके से आयी।।

राजनीति का खेल , विपक्षी बना है द्रोही।
जुल्मों का ये ग्राफ  क्रम बनता आरोहि ।।
___________

पाखण्डी इस देश में , पाते हैं सम्मान ।
अन्ध भक्त बैठे हुए, लेते उनसे  ज्ञान ।।

लेते उनसे ज्ञान  मति गयी उनकी मारी ।
दौलत के पीछे पड़े, उम्र बीत गयी सारी

स्वर" ईश्वर बिकते जहाँ ,दुनियाँ ऐसी मण्डी।
भाँग धतूरा ,कहीं चिलम फूँक रहे पाखण्डी।।
_______
रोहि सुधरेगा नहीं ,सदियों तक अपना देश।।
अनपढ़ बैठे दे रहे  पढने वालों को उपदेश।।

पढने वालों को उपदेश  राजनीति है गन्दी।
बेरोजगारी भी बड़ी  और पड़ी देश में मन्दी।।

अपराधी ज़ालिम बड़े और लड़े  देश में  द्रोही।
किसी की ना सुनता कोई , जुल्म  बना आरोहि।।



भाई कमाल के आशिक थे तुम भी 
मुद्दतों ये मुद्दा  सरफराज करते हैं।
दिल में  उमड़ते मोहब्बत के बादल 
 आज भी  बयाने अंदाज करते है।।

बवाल की परम्परा को आप संजोये हुए हैं।
खाम खां  इश्क में रोये हुए हैं।
मोहब्बत में कहीं तुम  सहादत न करना 
उलफत की जंग बहुत तो खोए हुए हैं।


बवाल की परम्परा को आप संजोये हुए हैं।
खाम खां  इश्क में रोये हुए हैं।
मोहब्बत में कहीं तुम  सहादत न करना 
उलफत की जंग बहुत तो खोए हुए हैं।


मजबूरियाँ हालातों के जब से  साथ हैं।
सफर में सैकड़ों  हजारों   फुटपाथ हैं।।

सम्हल रहा हूँ जिन्दगी की दौड़ में गिर कर !
किस्मतों को तराशने वाले भी कुछ हाथ हैं।


गुरुर्मातृसमो नास्ति नास्ति भार्यासमःसखा।
नीचावमाननाद्दुःखाद्दुःखं नास्ति यथा परम्।४०। 
(विष्णु धर्मोत्तर पुराण  अध्याय 305 -)

अनुवाद:-
माता को समान गुरु नहीं है और पत्नी को समान सखा नहीं । नीच व्यक्ति द्वारा किया गया अपमान इस दुनियाँ का सबसे बड़ा दु:ख है।

 जीवन की अनन्त विस्तारमयी श्रँखलाओं में से एक कड़ी है वर्तमान जीवन और इस वर्तमान जीवन में घटित पहलू प्रारब्ध द्वारा निर्धारित हो गये है। इस संसार में प्रत्येक प्राणी के जीवन में सभी घटित  घटनाओं और प्राप्त  वस्तुओं का अस्तित्व उद्देश्य पूर्ण और सार्थक ही है। वह नियत है ,निश्चित है। उसके

भले हीं उस समय  उनकी उपयोगिता हमारे जीवन के अनुकूल हो अथवा  न हो । क्योंकि उसकी घटित वास्तविकता का स्थूल रूप से हम्हें कभी बोध ही नहीं होता है।

और लोगों को कभी भी भविष्य में स्वयं के द्वारा करने वाले कर्मों के लिए दाबा - और भूल से किए गये गलत कर्मों  के लिए भी पछतावा नहीं करना चाहिए।  क्यों कि भूल से जो कर्म हुआ वह काल से प्रेरित प्रारब्ध का विधान था । 
बुद्धिमानी इसी में है कि अहंकार से रहित होकर उस परम सत्ता से मार्गदशन का निरन्तर आग्र क्या जाए।

हाँ भूत काल की घटनाओं से उनके सकारात्मक या नकारात्मक रूप में घटित  परिणामों से मनुष्य को  शिक्षा लेकर भविष्य की  सुधारात्मक परियोजना का अवश्य विचार करना चाहिए। वहाँ  कर्म का दावा तो कभी नहीं करना चाहिए-

यद्यपि कर्म तो वर्तमान के ही धरातल पर सम्पादित होता है। अत: वर्तमान को ही बहुत सजग तरीके जीना- जीवन है।

भविष्य की घटित घटनाओं का ज्ञान  स्थूल दृष्टि से तो कोई नहीं कर सकता है।

परन्तु रात्रि के अन्तिम पहर में देखे हुए स्वप्न भी जीवन में सन्निकट भविष्य में होने वाली कुछ घटनाओं का प्रकाशन अवश्य करते हैं। वास्तव में यह मन में स्फुटित प्रारब्ध का प्रकाशन है।

ये भविष्य की घटनाएँ कभी प्रतिकूल प्रतीत होते हुए भी अनुकूल स्थितियों का निर्माण करती हैं ।

और अनुकूल प्रतीत होते हुए भी वाली ये  घटनाएँ  प्रतिकूल परिस्थितियों का निर्माण भी कर देती हैं। साधारण लोग इनके गूढ सत्य को नहीं जानते हैं!  ये सब तो प्रारब्ध के विधान ही हैं। 
कभी कभी हम बचपन में केवल शोक अथवा सनक में ऐसी वस्तुओं का संग्रह कर लेते हैं जो उस समय तो निरर्थक और बेकार सी होती हैं परन्तु भविष्य में कभी उनकी उपयोगिता सार्थक हो जाती है। यही तो प्रारब्ध का विधान है।

दर-असल प्रारब्ध अनेक जन्मों के मन के  निर्देशन द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों से किए गये कर्मों का सञ्चित रूप में से- एक जीवन के  निर्देशन के लिए विभाजित एक रूप है।

अर्थात्  ( एक जीवन में फलित परिस्थितियों और उपलब्धियों की सुलभता का नाम प्रारब्ध है । स्वभाव की रवानगी में यही प्रारब्ध ही व्याप्त है। 
यही प्रारब्ध भाग्य संज्ञा से भी अभिहित किया जाता है।

परन्तु जब लोग स्वभाव के विपरीत संयम से कुछ नया करते हैं तब  वह साधना नवीन कर्म संस्कार का निर्माण करती है। यही तपस्या अथवा साधना नवीन सृजन की भी क्रिया या शक्ति है। 
यह क्रियमाण कर्म है - जिससे आगामी जीवन के प्रारब्ध का निर्माण होता है।

यही जीवन का सत्य है। हमने जीवन की प्रयोगशाला में यह अनुभव रूपी प्रयोग भी किया है। यह प्रयोगशाला और प्रयोग सबका मौलिक ही होता है। सार्वजनिक कदापि नहीं सबका जीवन अपनी एक निजी प्रयोगशाला है। -

दुनियाँ के सभी प्राणियों की क्रियाविधि काल के तन्तुओं से निर्मित‌ प्रारब्ध की डोर से नियन्त्रित है।

परिस्थितियों के वस्त्रों में है डोर या धागा  सबका प्रारब्ध का ही लगा है   इसी वस्त्र से  जीवन आवृत  है।
 
इसी लिए अहंकार रहित होकर कर्तव्य करने में ही जीवन की सार्थकता है। निष्काम भक्त इस संसार में सबसे बड़ा साधक है।

धर्म का अधिष्ठाता यम हैं ।

और यम की दार्शनिक व्याख्या की जाए तो 
यम स्वाभाविकताऐं जो मन और सम्पूर्ण जीवन का अन्तत: पतन कर देती हैं। 
उनके  नियमन अथवा ( निरोध) की विधि है।
योगशास्त्र में प्रथम सूत्र है।

 योग की परिभाषा निरूपित करते हुए ।

योगश्चितवृत्तिनिरोध:” चित्तवृत्ति के निरोध का नाम योग है | 
चित्त अर्थात मन वृत्ति ( स्वाभाविक तरंगे) उनका निरोध( यमन - नियन्त्रण) करने के लिए ही जीवन में धर्माचरण आवश्यक है।
इसी धर्माचरण के ही अन्य नाम व्रत- तपस्या -सदा चरण आदि हैं योग भी मन की वृत्तियों के नियन्त्रण की  क्रिया -विधि है।

 मन की इन्हीं वृत्तियों ( तरंगो) के नियन्त्रण हेतु कतिपय उपाय  आवश्यक होते हैं  जो संख्या में आठ माने जाते हैं। अष्टांग योग के अंतर्गत प्रथम पांच अंगों में  (यम, नियम, आसन, प्राणायाम तथा प्रत्याहार) ‘बहिरंग’ हैं।

 और शेष तीन अंग (धारणा, ध्यान, समाधि) ‘अंतरंग’ नाम से प्रसिद्ध हैं।
अत: यम बाह्य सदाचरण मूलक साधना है।
यही धर्म है।

बहिरंग साधना के यथार्थ रूप से अनुष्ठित या क्रियान्वित होने पर ही साधक को अंतरंग साधना का अधिकार प्राप्त होता है।

 यम’ और ‘नियम’ वस्तुत: शील और तपस्या के द्योतक हैं। 

यम का अर्थ है संयम जो पांच प्रकार का माना जाता है : (क) अहिंसा, (ख) सत्य, (ग) अस्तेय (चोरी न करना अर्थात्‌ दूसरे के द्रव्य के लिए स्पृहा न रखना) अथवा बिना उनकी अनुमति के उसकी इच्छा न करना।

सत्य यही है कि व्यक्ति जब सदाचरण और यम की इन प्रक्रियाओं को करता है तो उसका अन्त:करण शुद्ध और मन बुद्ध ( बोध युक्त)हो जाता है बुद्धि चित् या मन की ही बोध शक्ति है।
यहीं से ईश्वरीय ज्ञान का स्वत: स्फुरण होने लगता है। 
इसी लिए तो साधक सन्त तपस्वी सबके मन की बात जान लेते हैं और अनेक भविष्य वाणीयाँ भी सटीक करते हैं।




नास्तिक व्यक्ति आत्म चिन्तन से विमुख तथा मन की स्वाभाविक वासनामूलक वृत्तियों की लहरों में उछलता -डूबता हुआ  कभी भी शान्ति को प्राप्त नहीं होता और जो शान्ति से रहित व्यक्ति   सुखी अथवा आनन्दित कैसे रह सकता है ? आनन्द रहित व्यक्ति नीरस और निराशाओं में जीवन में सदैव अतृप्त ही रह जीवन बिता देता है।


दर-असल नास्तिकता जन्म - जन्मान्तरों के सञ्चित अहंकार का घनीभूत रूप है। 

जिसकी गिरफ्त हुआ व्यक्ति कभी भी सत्य का दर्शन नहीं कर सकता यही अहंकार अन्त:करण की मलीनता( गन्दिगी) के लिए उत्तरदायी है।

अन्त:करण ( मन ,बुद्धि, चित्त ,और स्वत्वबोधकसत्ता का समष्टि रूप ) के शुद्ध होने पर ही सत्य का दर्शन होता है।

और इस  अहंकार का निरोध ही तो भक्ति है।
अहंकार व्यक्ति को सीमित और संकुचित दायरे में कैद कर देता है ।

वह भक्ति जिसमें सत्य को जानकर उसके अनुरूप सम्पूर्ण जीवन के कर्म उस परम शक्ति के प्रति समर्पित करना होता है। जो जन्म और मृत्यु के द्वन्द्व से परे होते हुए भी इन रूपों को अपने लीला हेतु अवलम्बित करता है। वह अनन्त और सनातन है।

मानवीय बुद्धि उसका एक अनुमान तो कर सकती है परन्तु अन्य पात्रता हीन व्यक्तियों के सामने व्याख्यान नहीं कर सकती हैं।


संसार में कर्म इच्छओं  से कभी रहित नहीं होता है 


कर्म में इच्छा और इच्छाओं के मूल में संकल्प और संकल्प अहंकार का विकार -है।

भक्ति में कर्म फल को भक्त ईश्वर के प्रति समर्पित कर देता है अत: ईश्वर स्वयं प्रेरणात्मक रूप से उसका मार्गदर्शन करता है ।

जब एक बार किसी के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो जाय तो जनसाधारण उनकी गलत बातों को भी सही मानते हैं। धर्म के क्षेत्र में यही सिद्धान्त लागू है।
क्योंकि श्रद्धा तर्क विचार और विश्लेषण के द्वार बन्द कर देती है।

जब जब व्यक्ति अपनी प्राप्तव्य वस्तु के अनुरूप योग्यता अर्जित कर लेता है वह वस्तु उसे प्राप्त हो के ही रहती है।
देर भले ही हो जाय !



वासना " तृष्णा " लोभ " मोह " और  लालसा" एक ही परिवार के सदस्य नहीं है। अपितु यह एक भाव ही  सभी अवान्तर भूमिकाओं में भिन्न भिन्न नाम धारण किए हुए है। 
और "आवश्यकता" (जरूरत) नामक जो भाव है वह  इन सबसे पृथक  जीवन के अस्तित्व का अवधारक है। जरूरतें जैविक अवधान हैं सृष्टा द्वारा निर्धारित जीवन का विधान हैं।

और जो वस्तु जीवन के लिए आवश्यक है वहीउसी रूप और अनुपात में उतनी ही सुन्दर भी  है।

यद्यपि प्रत्येक इन्सान में  गुण- दोष होते ही हैं व्यक्ति स्वयं अपने दोषों पर गौर नहीं करता  परन्तु हम्हें तो उसके गुण ही ग्रहण करने चाहिए सायद वे हमारे लिए गुण न हों क्योंकि हम जिसे एक बार शत्रु मान लेते हैं उस व्यक्ति में चाहें कितने भी गुण हों वह हम्हें  दोष ही दिखाई देते हैं। क्यों कि उस शत्रु भाव से हमारे दृष्टि के लेन्स का कलर ही बदल जाता है।

शत्रुता "ईर्ष्या" घृणा अथवा विरोध सभी भाव मूलत: उस व्यक्ति के हमारी प्रति वैचारिक प्रतिकूलता के प्रतिबिम्बित रूप हैं।
यहीं से हमारे मस्तिष्क में पूर्वदुराग्रह का जन्म होता है। 
ऐसी स्थिति में हमारा निर्णय कभी भी निष्पक्ष नहीं होता है।


व्यक्ति को अपने लम्बे समय से चाहे हुए (आकाँक्षित) अभियान की शुरुआत स्थान को बदलकर ही करनी चाहिए।
 क्योंकि वह जिस स्थान पर दीर्घकाल से रह रहा है। वहाँ के लोगों की दृष्टि में  वह प्रभाव हीन और गुणों से हीन हो गया है। और वे लोग उसको लगातार हतोत्साहित और हीन बनाने के लिए मौके की तलाश में बैठे हैं।
अच्छा है उस स्थान को बदल ही दिया जाए -

जैसे कोई वाहन भार से युक्त होने पर आगे गति करते हुए यदि  सिलप होने लगे तो फिर लीख काटकर ही आगे बढ़ पाता है।

क्योंकि उस वाहन की गति के अवरोधक  तत्व निरन्तर उसकी गति को अवरोधित  अथवा क्षीण करते हुए अपनी अवरोधन क्रिया का विस्तार ही करते ही रहते हैं।

अन्य  गाँव का जोगिया 
और गाँव का सिद्ध ।

बराबर से दिखने लगे 
लोगों को हंस और गिद्ध ।

प्रेम धोखा पाई हुई स्त्री उस नागिन के समान  आक्रामक होती है जिसकी खोंटी कर दी गयी हो। और प्रेम में धोखा खाया हुआ पुरुष पागल हो जाता है जैसे उसकी बुद्धि को लकवा मार गया हो ! इस प्रकार का विश्लेषण प्राय हम करते रहते हैं।

परन्तु ये वास्तव में प्रेम के नाम पर यह केवल सांसारिक स्वार्थ परक वासना मूलक आकर्षण ही है। इसे आप प्रेम नही कह सकते हैं।

क्योंकि प्रेम कभी आक्रामक हो ही  नहीं सकता  प्रेम तो बलिदान और त्याग  का दूसरा नाम है। 

स्त्रीयाँ में दर -असल व्यक्तियों के  गुण - वैभव और साहस की आकाँक्षी होती हैं।
 विशेषत: उन चीजों की जो उनके अन्दर नहीं हैं।
जैसे तर्क " विश्लेषण की शक्ति " विचार अथवा चिन्तन और साहस या कठोरता प्राय: स्त्रियों में कम ही होता है पुरुष के मुकाबले स्त्रियाँ 
पुरुष के  महज सौन्दर्य की आकाँक्षी कभी नहीं होती हैं।  
स्त्रियों तथा पुरुषों  की दृष्टि में सौन्दर्य आवश्यकता मूलक दृष्टिकोण या नजरिया है। पुरुष की दृष्टि में स्त्रीयों की कोमलता ही सौन्दर्य है। पुरुष में कोमलता होती नहीं हैं  पुरुष तो परुषता या कठोरता का पुतला है। 

और स्त्री रबड़ की गुड़िया-
जैनों एक दूसरे के भावों के तलबदार हैं यही उनके परस्पर आकर्षण और मिलन का कारण भी है।
यदि पुरुष इश्क कि शहंशाह है तो स्त्री हुश्न की मलिका है दोनों को एक दूसरे की चाह ( इच्छा) है।

यह उनका एक बहुत महान दृष्टिकोण है। अधिकतर स्त्रीयाँ प्राय: समर्पित" सहनशील और निष्ठावान प्रवृत्ति की  होती हैं।

आपने स्त्रियों को नास्तिक होते नहीं पाया होगा वे भावनाओं से आप्लावित होती हुई श्रद्धा भावनाओं का घनीभूत रूप है। 

 श्रद्धा भक्ति का ही समर्पण युक्त रूपांतरण है।
 जबकि अहंकार इसके विपरीत  भाव है। अहंकार के  जन्म जन्मातरों का घनीभूत रूप ही नास्तिकता है।

 स्त्रीया" भावनाओं से आप्लावित एक नाव को समान होती हैं।

महिलाएँ पुरुषों की अपेक्षा अधिक जितेन्द्रिया और व्यवस्थापिका होती हैं।

यह उनके गुण अनुकरणीय हैं।

परन्तु दु:ख की बात की धर्म शास्त्र लिखने वाले पुरुषों ने स्त्रीयों के दोषों को ही देखा है गुणों को नहीं यही उनका पूर्वदुराग्रह उनकी विद्वत्ता पर कलंक है।


दर्द जान की पहिचान है।

मन एक समुद्र जिसमें विचारों की लहरें तब आन्दोलित होती हैं। जब विचारों का परस्पर आघात -प्रत्याघात ही ज्ञान के बुलबुले उत्पन्न करता है। जिसमें सिद्धान्त की ऑक्सीजन (प्राण वायु) समाहित होती है।
बाल बढ़ाए तीनगुण लोग कहें महाराज ।
 साधक सा जीवन बने  सिद्धों में सरताज।।

 सिद्धों में सरताज  साधना जब हो  सच्ची।
भोगों - रोगों से रहित ज़िन्दगी सबसे अच्छी ।

साधना के पथ पर चलें, फाँसे जगत के जाल ।
सबको सुलझाते रहो , यह याद दिलाते बाल!

व्यक्ति का कर्म ही उसके उच्च और निम्न स्तर के मानक को सुनिश्चित करता है।
 न कि उसका जन्म ! अभावों और विकटताओं में जन्म लेने वाले भी महान बन जाते हैं और सम्पन्नता और भोग विलास में जीवन यापन करने वाले भी पतित और चरित्रहीन हो जाते हैं।

"सराफत की दुहाई देने वाले अधिकर दोषी निकले।
परिवार का जिनको हम समझ रहे वे पड़ोसी निकले।।

भौतिक उपलब्धियाँ व्यक्ति की हैसियत का मापन तो कर सकती हैं परन्तु उसकी शख्सियत का मापन तो उसके आचरण और विचारों की महानता ही करती है।
अत: सस्ती लोकप्रियता के बदले अपने विचारों की महानता का समझौता मत करो!

अनुमान का सत्य के इर्दगिर्द विश्लेषण होता है सत्य केन्द्र है तो अनुमान परिधि !

ज़िन्दगी के सफर में 
आशंकाओं के जब ब्रेकर बहुत हो।
ज़िन्दगी  रेंग रेंग चलती है।
मंजिल कैसे फतह हो।।

आशंकाऐ सम्भावी अनहोनीयों के द्वार भी बन्द कर देती हैं। ये इन आशंकओं का सकारात्मक पक्ष है कि ये अनिष्टों के प्रति सदैव सावधान करती हैं। इस प्रकार विधाता ने इनको भी सार्थकता दी है

संसार में सामाजिक सारोकारों के तीन कारण दिखाई देते हैं। कर्तव्य - मोह और स्वार्थ 
कर्तव्य निर्देश करता है कि मनुष्य को क्या करना चाहिए ताकि उसका जीवन सफल हो सार्थक हो।

"भगवद् गीता अध्याय 5 श्लोक 11

"कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये।।5.11।।

हिंदी अनुवाद - कर्मयोगी आसक्तिका त्याग करके केवल (ममतारहित) इन्द्रियाँशरीरमनबुद्धिके द्वारा अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये ही कर्म करते हैं।
मूल श्लोकः
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।4.21।।
 अनुवाद:-जो आशा रहित है तथा जिसने चित्त और आत्मा (शरीर) को संयमित किया है,  जिसने सब परिग्रहों का त्याग किया है,  ऐसा पुरुष शारीरिक कर्म करते हुए भी पाप को नहीं प्राप्त होता है।।


मन आग्रह ही स्मरण है ।   
किसी भावों के आवेश से युक्त मन निर्णय उसी के उसी से सम्बन्धित वस्तु के पक्ष में लेता है।


_________________________________
प्रस्तुति करण:- 
यादव योगेश कुमार रोहि-





प्रस्तुति करण :- यादव योगेश कुमार रोहि -


आपका दास ! रूढ़िवादी यों से हताश ! 
यादव योगेश कुमार "रोहि" सम्पर्क-सूत्र:–8077160219../