मंगलवार, 18 अगस्त 2026

गीत-हालात, इश्क और बगावत


​गीत परिचय

​गायन शैली: भावुक लोक-गीत एवं अर्ध-शास्त्रीय फ्यूजन (दर्द और कटाक्ष का मिश्रण)।


​स्थाई भाव: व्यवस्था पर तंज, मोहब्बत की उलझन और जिंदगी के संघर्ष का खूबसूरत संगम।


​(अंतरा 1: देश, व्यवस्था और विडंबना)


​मुखड़ा (टेम्पो धीमा और गंभीर):


रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक ये देश...

कुछ अनपढ़ बैठे दे रहे, मंचों पर उपदेश!


मंचों पर उपदेश, पंच बैठे हैं अन्यायी,

वारदात के बाद पुलिस लपके से आयी!


​अंतरा (कोरस के साथ):


राजनीति का गंदा खेल, विपक्षी बना है द्रोही,

जुल्मों का बढ़ता ग्राफ, क्रम बनता आरोही। अपराधी भी बचने को बनाऐं सन्त का भेष।


रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!


​(अंतरा 2: पाखंड और अंधी भक्तियाँ)


​संगीत की हल्की गूंज (गिटार और हारमोनियम):


​पाखंडी इस देश में, पाते हैं सम्मान,

अंध-भक्त बैठे हुए, लेते उनसे ज्ञान!

लेते उनसे ज्ञान, मति गयी उनकी मारी,

दौलत के पीछे, उम्र बीत गयी सारी।

जीवन के कुछ दिन अभी रहे हैं शेष।


रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, कुछअनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश!


​मुख्य गायक (व्यंग्य भाव में):


स्वर "ईश्वर" बिकते जहाँ, ये दुनियाँ ऐसी मण्डी,

भाँग-धतूरा, फूँक रहे मन्दिरों में पाखंडी !


पढ़ने वालों को उपदेश, राजनीति है गंदी, बेरोजगारी भी बढ़ी और पड़ी देश में मंदी! युगों युगों में होता है नेता कोई अखिलेश ।


रोहि सुधरेगा नहीं, सदियों तक अपना देश, अनपढ़ बैठे दे रहे, पढ़ने वालों को उपदेश


संशोधित गीत -

उत्तर भारतीय लोक संगीत शैली में कब्बाली का हारमोनियम व ढोलक की ताल पर सम्फोनी व सिंथ के स्वर को साथ  स्पष्ट उच्चारण करते हुए ऑडियो जनरेट करें !

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