देवश्रवा: प्रजास्तु नैषादिर्य: प्रतिश्रुत:।
एकलव्यो महाराज निषादै: परिवर्धित:।।33।
हरिवशं पुराण (हरिवशं पर्व) चौंतीसवाँ अध्याय
पृष्ठ संख्या 165..
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किसी कारण वश वसुदेव के भाई देवश्रवा के द्वारा बालकपन में ही वन में छूट जाने के कारण) इस देवश्रवा के पुत्र को निषादों 'ने पाल कर बड़ा किया इस लिए आगे चलकर ये निषाद वंशी एकलव्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ।।33।
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