बुधवार, 4 नवंबर 2026

सुभौम चक्रवर्ती के डर से) उन श्रेष्ठ द्विजों (ब्राह्मणों) ने अपने गले के यज्ञोपवीत (जनेऊ) का त्याग कर दिया,

जैन हरिवंश पुराण (सर्ग 25) के ये श्लोक महाभारत और हिंदू पुराणों के प्रसिद्ध चरित्र परशुराम और क्षत्रियों के संहार की कथा से मिलते-जुलते हैं, लेकिन इन्हें जैन परंपरा और दृष्टिकोण के अनुसार प्रस्तुत किया गया है।
इन श्लोकों का सरल अर्थ और संदर्भ इस प्रकार है:
श्लोक 1:
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा विप्रविवर्जिताम्।
सुभौमश्चक्रवर्त्येष क्रोधाद् दीप्तशिवामुखः॥
  • अर्थ: इस पृथ्वी को इक्कीस (21) बार विप्रों (ब्राह्मणों/द्विजों) से रहित करके, क्रोध से प्रदीप्त मुख वाले सुभौम चक्रवर्ती ने राज्य किया।
  • विशेष संदर्भ: हिंदू पुराणों में यह कथा भगवान परशुराम के बारे में है, जिन्होंने पृथ्वी को 21 बार क्षत्रियविहीन किया था। इसके विपरीत, जैन हरिवंश पुराण के इस प्रसंग में सुभौम (Subhoma) नाम के चक्रवर्ती राजा का वर्णन है, जिन्होंने क्रोध में आकर पृथ्वी को 21 बार ब्राह्मणविहीन (विप्रविवर्जिताम्) कर दिया था।
श्लोक 2:
कण्ठपाशान् परित्यज्य केशाञ्छ्मश्रूणि वर्धयन्।
धीवराः स्म इति प्रोच्य ररक्षुः स्वान् द्विजोत्तमाः॥
  • अर्थ: (सुभौम चक्रवर्ती के डर से) उन श्रेष्ठ द्विजों (ब्राह्मणों) ने अपने गले के यज्ञोपवीत (जनेऊ) का त्याग कर दिया, अपने केश (बाल) और श्मश्रु (दाढ़ी-मूछें) बढ़ा लीं, और स्वयं को 'धीवर' (मछुआरा) घोषित कर दिया ("हम मछुआरे हैं")। इस प्रकार उन्होंने किसी तरह अपने प्राणों की रक्षा की।

मुख्य अंतर और सांस्कृतिक महत्व
जैन पुराणों में अक्सर हिंदू महाकाव्यों के पात्रों को एक अलग धार्मिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में ढाला गया है। जहाँ वैदिक परंपरा में परशुराम द्वारा क्षत्रियों के संहार और क्षत्रियों के छिपने (जैसे धीवर या अन्य जातियों में बदलने) की कथा आती है, वहीं इस जैन ग्रंथ में राजा सुभौम द्वारा ब्राह्मणों के उत्पीड़न और ब्राह्मणों द्वारा धीवर (मछुआरे) का रूप धरकर प्राण बचाने का उल्लेख मिलता है।

सुभौम चक्रवर्ती के डर से) उन श्रेष्ठ द्विजों (ब्राह्मणों) ने अपने गले के यज्ञोपवीत (जनेऊ) का त्याग कर दिया,

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