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भागवत मंच से...
कभी-कभी जब हम किसी कथा मंच पर बैठकर वक्ता के शब्दों को सुनते हैं, तो मन में एक गहरा सवाल उठता है—क्या धार्मिक मंचों से आने वाली हर बात सिर्फ मनोरंजन है, या फिर यह जनमानस के विश्वास को गढ़ने का एक बहुत आस्था परक माध्यम है?
आज जिस तरह से मंचों पर राम और कृष्ण के चरित्रों की तुलना की जाती है, राजनीति से प्रेरित होकर एक को श्रेष्ठ और दूसरे को कमतर या 'टेढ़ा' साबित करने की होड़ लगती है, वह न केवल दार्शनिक दृष्टि से अनुचित है, बल्कि समाज की आध्यात्मिक एकता के भी विरुद्ध है।
तथाकथित कथावाचक के गलत बयान की सफाई देने केरल लिए उसके समर्थन में अनेक जातीय बन्धुओं प्रलाप प्रारम्भ करदिया है । वे तेरे मेरे बयान की आड़ में टेड़ेपन की सफाई देश रहे हैं उनकी भी कुत्सित मंशा जाहिर होगयी है ।
[संगीत में हल्का सा बदलाव – थोड़ा गंभीर]
आइए, जरा ठहरकर उन तर्कों पर गौर करें जो समय-समय पर हमारे महाकाव्यों और भगवान राम के चरित्र पर उठाए जाते रहे हैं।
चाहे वह राजा के रूप में राजधर्म का पालन करते हुए गर्भवती सीता का त्याग करने वाले राम का हो, सीता की अग्नि परीक्षा का संवेदनशील प्रसंग हो, या फिर किष्किंधा कांड में नीति के नियमों को ताक पर रखकर छिपकर किया गया राम द्वारा बालि का वध हो... और अथवा राम द्वारा उत्तर कांड में शूद्र तपस्वी शंबूक वध का वह प्रसंग, जिस पर आज भी सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से गहरी बहस होती है।
ये ऐसे पहलू हैं जिन्हें न तो पूरी तरह नकारा जा सकता है, और न ही आधुनिक मानवीय संवेदनाओं की अनदेखी करके इन्हें बिना संदर्भ के परोसा जा सकता है।
[स्वर में दार्शनिक रस और सहजता]
दूसरी ओर, जब हम भगवान कृष्ण की ओर देखते हैं, तो पाते हैं कि उनका स्वरूप बिल्कुल अलग है। वे बहुत बड़े तत्ववेत्ता आध्यात्मिक व दार्शनिकता के शिखर पर विराजमान हैं । वहाँ पर श्री राम की पहुच नहीं है। श्रीमद्भागवत और दर्शन के अनुसार, कृष्ण को "कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्" यानी पूर्ण अवतार माना गया है।
राम अगर 'मर्यादा पुरुषोत्तम' हैं, जो नियमों के कठोर बंधन में बंधकर जीते हैं, तो कृष्ण 'लीला पुरुषोत्तम' हैं—जो मर्यादाओं को तोड़ते भी हैं और आवश्यकता पड़ने पर जोड़ते भी हैं। राम की जीवन लौकिक है तो कृष्ण का लौकिक और अलौकिक दोनों है। भगवान कन्हैया का जीवन प्रेम, योग, युद्ध और गीता के उस सार्वभौमिक ज्ञान का समन्वय है, जो मनुष्य के संपूर्ण मनोविज्ञान को छूता है।
[निर्णायक और प्रभावी स्वर]
लेकिन, यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न यह है—क्या राम और कृष्ण दो अलग सत्ताएँ हैं?
क्या इसमें तेरा वाला और मेरा वाला भाव क्यो़ं आया - और जिस वाणी विकार से भावभंगिमा युक्त होकर कृष्ण की निन्दा की गयी ! यह आज देश का दुर्भाग्य है ।
उच्च दार्शनिक और अद्वैत वेदांत का दृष्टिकोण बिल्कुल स्पष्ट है। राम और कृष्ण में कोई भेद नहीं है। दोनों एक ही परम ब्रह्म के दो अलग-अलग रूप हैं। शक्तियाँ भले ही इनकी आनुपातिक हो काव़ल परिवेश व स्थितियों के अनुसार अर्थात
फर्क सिर्फ काल और परिस्थितियों का था। त्रेतायुग की परिस्थितियाँ अलग थीं, इसलिए राम को मर्यादा का कठोर पालन करना पड़ा; द्वापर के अंत की परिस्थितियाँ अलग थीं, इसलिए कृष्ण को कूटनीति और योग का सहारा लेना पड़ा।
[सकारात्मक और अपील करता हुआ समापन]
इसलिए, निष्कर्ष साफ है। हल्के-फुल्के हास्य के नाम पर, या अपनी किसी खास संप्रदाय की श्रेष्ठता साबित करने की होड़ में, हमारे आराध्यों के चरित्र को तोड़-मरोड़कर पेश करना किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
जनता वक्ता के हर शब्द को प्रामाणिक मानती है। धार्मिक वक्ताओं को यह समझना होगा कि उनका मंच सिर्फ भीड़ जुटाने का साधन नहीं, बल्कि समाज के मानस को दिशा देने का एक पवित्र उत्तरदायित्व है।
आइए, अपने महाकाव्यों को सतही विवादों से ऊपर उठकर, उनके वास्तविक मानवीय, दार्शनिक और समग्र स्वरूप में समझें।
यादव योगेश कुमार रोहि व उनके साथी पाखण्डवाद व महापुरुषो के राजनीतिकरण के विरुद्ध उद्घोष कर रहे हैं।
[संगीत धीरे-धीरे धीमा होते हुए समाप्त होता है।]
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