मंगलवार, 3 नवंबर 2026

भागवत मंच से तेरा मेरा ...

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भागवत मंच से... 
​कभी-कभी जब हम किसी कथा मंच पर बैठकर वक्ता के शब्दों को सुनते हैं, तो मन में एक गहरा सवाल उठता है—क्या धार्मिक मंचों से आने वाली हर बात सिर्फ मनोरंजन है, या फिर यह जनमानस के विश्वास को गढ़ने का एक बहुत आस्था परक  माध्यम है?

​आज जिस तरह से मंचों पर राम और कृष्ण के चरित्रों की तुलना की जाती है, राजनीति से प्रेरित होकर एक को श्रेष्ठ और दूसरे को कमतर या 'टेढ़ा' साबित करने की होड़ लगती है, वह न केवल दार्शनिक दृष्टि से अनुचित है, बल्कि समाज की आध्यात्मिक एकता के भी विरुद्ध है।

तथाकथित कथावाचक के गलत बयान की सफाई देने केरल लिए उसके समर्थन में अनेक जातीय बन्धुओं प्रलाप प्रारम्भ करदिया है । वे तेरे मेरे बयान की आड़ में टेड़ेपन की सफाई देश रहे हैं उनकी भी कुत्सित मंशा जाहिर होगयी है ।


​[संगीत में हल्का सा बदलाव – थोड़ा गंभीर]

​आइए, जरा ठहरकर उन तर्कों पर गौर करें जो समय-समय पर हमारे महाकाव्यों और भगवान राम के चरित्र पर उठाए जाते रहे हैं।

​चाहे वह राजा के रूप में राजधर्म का पालन करते हुए गर्भवती सीता का त्याग करने वाले राम का हो, सीता की  अग्नि परीक्षा का संवेदनशील प्रसंग हो, या फिर किष्किंधा कांड में नीति के नियमों को ताक पर रखकर छिपकर किया गया राम द्वारा बालि का वध हो... और अथवा राम द्वारा उत्तर कांड में शूद्र तपस्वी शंबूक वध का वह प्रसंग, जिस पर आज भी सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से गहरी बहस होती है।

​ये ऐसे पहलू हैं जिन्हें न तो पूरी तरह नकारा जा सकता है, और न ही आधुनिक मानवीय संवेदनाओं की अनदेखी करके इन्हें बिना संदर्भ के परोसा जा सकता है।

​[स्वर में दार्शनिक रस और सहजता]

​दूसरी ओर, जब हम भगवान कृष्ण की ओर देखते हैं, तो पाते हैं कि उनका स्वरूप बिल्कुल अलग है। वे बहुत बड़े तत्ववेत्ता आध्यात्मिक व दार्शनिकता के शिखर पर विराजमान हैं ।  वहाँ पर श्री राम की पहुच नहीं है।  श्रीमद्भागवत और दर्शन के अनुसार, कृष्ण को "कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्" यानी पूर्ण अवतार माना गया है।

​राम अगर 'मर्यादा पुरुषोत्तम' हैं, जो नियमों के कठोर बंधन में बंधकर जीते हैं, तो कृष्ण 'लीला पुरुषोत्तम' हैं—जो मर्यादाओं को तोड़ते भी हैं और आवश्यकता पड़ने पर जोड़ते भी हैं। राम की जीवन लौकिक है तो कृष्ण का लौकिक और अलौकिक दोनों है।  भगवान कन्हैया का जीवन प्रेम, योग, युद्ध और गीता के उस सार्वभौमिक ज्ञान का समन्वय है, जो मनुष्य के संपूर्ण मनोविज्ञान को छूता है।

​[निर्णायक और प्रभावी स्वर]

​लेकिन, यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न यह है—क्या राम और कृष्ण दो अलग सत्ताएँ हैं?
क्या इसमें तेरा वाला और मेरा वाला भाव क्यो़ं आया - और जिस वाणी विकार से भावभंगिमा युक्त होकर कृष्ण की निन्दा की गयी ! यह आज देश का दुर्भाग्य है ।

​उच्च दार्शनिक और अद्वैत वेदांत का दृष्टिकोण बिल्कुल स्पष्ट है। राम और कृष्ण में कोई भेद नहीं है। दोनों एक ही परम ब्रह्म के दो अलग-अलग रूप हैं। शक्तियाँ भले ही इनकी आनुपातिक हो काव़ल परिवेश व स्थितियों के अनुसार अर्थात 

​फर्क सिर्फ काल और परिस्थितियों का था। त्रेतायुग की परिस्थितियाँ अलग थीं, इसलिए राम को मर्यादा का कठोर पालन करना पड़ा; द्वापर के अंत की परिस्थितियाँ अलग थीं, इसलिए कृष्ण को कूटनीति और योग का सहारा लेना पड़ा।

​[सकारात्मक और अपील करता हुआ समापन]

​इसलिए, निष्कर्ष साफ है। हल्के-फुल्के हास्य के नाम पर, या अपनी किसी खास संप्रदाय की श्रेष्ठता साबित करने की होड़ में, हमारे आराध्यों के चरित्र को तोड़-मरोड़कर पेश करना किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।


​जनता वक्ता के हर शब्द को प्रामाणिक मानती है। धार्मिक वक्ताओं को यह समझना होगा कि उनका मंच सिर्फ भीड़ जुटाने का साधन नहीं, बल्कि समाज के मानस को दिशा देने का एक पवित्र उत्तरदायित्व है।

​आइए, अपने महाकाव्यों को सतही विवादों से ऊपर उठकर, उनके वास्तविक मानवीय, दार्शनिक और समग्र स्वरूप में समझें।

यादव योगेश कुमार रोहि व उनके साथी पाखण्डवाद व महापुरुषो के राजनीतिकरण के विरुद्ध उद्घोष कर रहे हैं।  


​[संगीत धीरे-धीरे धीमा होते हुए समाप्त होता है।]


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धीरेन्द्र शास्त्री की बकबास !

मंच, मर्यादा और हमारे आराध्य
​[आवाज में एक ठहराव, गहराई और संजीदगी होनी चाहिए। बैकग्राउंड में बहुत ही हल्का, शांत सा शास्त्रीय वाद्य यंत्रों या बांसुरी का संगीत बज रहा हो, जो भावनाओं को उद्वेलित न करे बल्कि एकाग्रता बढ़ाए।]
​[एंकर / वक्ता:]
​कभी-कभी जब हम किसी कथा मंच पर बैठकर वक्ता के शब्दों को सुनते हैं, तो मन में एक गहरा सवाल उठता है—क्या धार्मिक मंचों से आने वाली हर बात सिर्फ मनोरंजन है, या फिर यह जनमानस के विश्वास को गढ़ने का एक बहुत बड़ा माध्यम है?
​आज जिस तरह से मंचों पर राम और कृष्ण के चरित्रों की तुलना की जाती है, राजनीति सेट प्रेरित होकर एक को श्रेष्ठ और दूसरे को कमतर या 'टेढ़ा' साबित करने की होड़ लगती है, वह न केवल दार्शनिक दृष्टि से अनुचित है, बल्कि समाज की आध्यात्मिक एकता के भी विरुद्ध है।

​[संगीत में हल्का सा बदलाव – थोड़ा गंभीर]
​आइए, जरा ठहरकर उन तर्कों पर गौर करें जो समय-समय पर हमारे महाकाव्यों और भगवान राम के चरित्र पर उठाए जाते रहे हैं।
​चाहे वह राजा के रूप में राजधर्म का पालन करते हुए गर्भवती सीता का त्याग हो, अग्नि परीक्षा का संवेदनशील प्रसंग हो, या फिर किष्किंधा कांड में नीति के नियमों को ताक पर रखकर छिपकर किया गया बालि का वध हो... और उत्तर कांड में शूद्र तपस्वी शंबूक वध का वह प्रसंग, जिस पर आज भी सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से गहरी बहस होती है।
​ये ऐसे पहलू हैं जिन्हें न तो पूरी तरह नकारा जा सकता है, और न ही आधुनिक मानवीय संवेदनाओं की अनदेखी करके इन्हें बिना संदर्भ के परोसा जा सकता है।

​[स्वर में दार्शनिक रस और सहजता]
​दूसरी ओर, जब हम भगवान कृष्ण की ओर देखते हैं, तो पाते हैं कि उनका स्वरूप बिल्कुल अलग है। श्रीमद्भागवत और दर्शन के अनुसार, कृष्ण को "कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्" यानी पूर्ण अवतार माना गया है।
​राम अगर 'मर्यादा पुरुषोत्तम' हैं, जो नियमों के कठोर बंधन में बंधकर जीते हैं, तो कृष्ण 'लीला पुरुषोत्तम' हैं—जो मर्यादाओं को तोड़ते भी हैं और आवश्यकता पड़ने पर स्थापित भी करते हैं। राम की जीवन लौकिक है तो कृष्ण का लौकिक और अलौकिक दोनों है।  भगवान कन्हैया का जीवन प्रेम, योग, युद्ध और गीता के उस सार्वभौमिक ज्ञान का समन्वय है, जो मनुष्य के संपूर्ण मनोविज्ञान को छूता है।

​[निर्णायक और प्रभावी स्वर]
​लेकिन, यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न यह है—क्या राम और कृष्ण दो अलग सत्ताएँ हैं?
​उच्च दार्शनिक और अद्वैत वेदांत का दृष्टिकोण बिल्कुल स्पष्ट है। राम और कृष्ण में कोई भेद नहीं है। दोनों एक ही परम ब्रह्म के दो अलग-अलग रूप हैं।

​फर्क सिर्फ काल और परिस्थितियों का था। त्रेतायुग की परिस्थितियाँ अलग थीं, इसलिए राम को मर्यादा का कठोर पालन करना पड़ा; द्वापर के अंत की परिस्थितियाँ अलग थीं, इसलिए कृष्ण को कूटनीति और योग का सहारा लेना पड़ा।

​[सकारात्मक और अपील करता हुआ समापन]
​इसलिए, निष्कर्ष साफ है। हल्के-फुल्के हास्य के नाम पर, या अपनी किसी खास संप्रदाय की श्रेष्ठता साबित करने की होड़ में, हमारे आराध्यों के चरित्र को तोड़-मरोड़कर पेश करना किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।

​जनता वक्ता के हर शब्द को प्रामाणिक मानती है। धार्मिक वक्ताओं को यह समझना होगा कि उनका मंच सिर्फ भीड़ जुटाने का साधन नहीं, बल्कि समाज के मानस को दिशा देने का एक पवित्र उत्तरदायित्व है।
​आइए, अपने महाकाव्यों को सतही विवादों से ऊपर उठकर, उनके वास्तविक मानवीय, दार्शनिक और समग्र स्वरूप में समझें।
यादव योगेश कुमार रोहि व उनके साथी पाखण्डवाद व महापुरुषो के राजनीतिकरण के विरुद्ध उद्घोष कर रहे हैं।  

​[संगीत धीरे-धीरे धीमा होते हुए समाप्त होता है।]

वक्ता:
टीवी बताएं, कृष्ण कन्हैया वाले कितने भक्त बैठे हैं, जरा हाथ उठाओ। अच्छा, आज तुम्हें बुरा लग सकता है। देखो, हम तो रामजी वाले हैं, तुम्हारे वाले बहुत टेढ़े हैं, बहुत टेढ़े हैं, बहुत टेढ़े हैं, बहुत ज्यादा ही टेढ़े हैं। तुम्हारे वालों के तो नाम ही में टेढ़ापन है।
अब पढ़ो, देखो कितना टेढ़ा नाम है- कृष्ण!
​और जो 'क' के नीचे 'रकार' लगी ना, वो ही खतरनाक। जो 'क' के नीचे ऐसी 'रकार' लगी, 'रकार', ऐसी कांटे जैसा और ये कांटे जैसा है, तुमने देखा होगा मछली पकड़ने वाले कांटे ले जाते हैं, उसको बंसी कहते हैं बंसी! और वो कांटे में ऐसा कुछ खाने का फंसाते हैं और डाल देते हैं, मछली जैसी ही फंस जाती है, कितनी भी फड़फड़ाए, लौट के नहीं निकलती। ये तुम्हारे वाले के नीचे जो 'रकार' है, उसमें कोई फंस जाए, फिर नहीं निकल पाता।  
​लेकिन हमारे वाले तो, हमारे वाले तो एकदम सीधे हैं। बहुत सीधे हैं बेचारे, चलते भी हैं हमारे वाले तो एकदम सीधे, बैठते भी हैं। नजर हमेशा मध्यम रखते हैं हमारे वाले। तुम्हारे वाले तो एक भी फोटो देख लो तुम अपने वाले ठाकुर जी की, एक भी फोटो! बैठे ऐसे तो ऐसे, कहीं ऐसे। और तुम्हारे वाले तो खड़े भी होते हैं तो तीन जगह से टेढ़े!
पांव के ऊपर पांव, कमर कहीं लचकाएं, खपड़िया ऐसी करें, ऐसी खपड़िया करें, फिर बंसी हो जाओ, ऐसे टेढ़े करके। हमारे वाले तो खड़े भी होते हैं एकदम सीधे। हमारे वाले का नाम भी सीधा, तुम्हारे वाले का... हमारे वाले का नाम भी सीधा, हमारे वाले का चलना भी सीधा, हमारे वाले दिखते भी सीधे। तुम्हारे वालों का नाम भी टेढ़ा, चलते भी टेढ़े, खड़े भी टेढ़े होते हैं। हमारे वालों का धाम भी सीधा- अयोध्या! तुम्हारे वाले का- वृन्दावन!
​और सुनो,
बंसी का बजाना तो खेल भी है,
धनुष चलाना खेल नहीं!
​जितने ठाकुर जी वाले बैठे हैं, आज तो तुम्हारे ठाकुर जी की भी जय-जयकार हो रही है। और सुनो, तुम्हारे ठाकुर जी क्या करते? बंसी बजाते? तो कहा, "बंसी कोई बड़ी बात थोड़ी है, देखो हमारे यहां तो ये भी बजा रहा है, बजा, बजैया, बजा!"
​रामजी वाले कितने बैठे हैं, हाथ उठाओ! हां, आज तुम लोग फूले नहीं समाओगे।
बंसी का बजाना तो खेल भी है,
पर धनुष चलाना खेल नहीं!
​और तुम कहो, "वाह! हमारे वाले तो गैया चराते हैं।"
गैयों का चराना तो खेल भी है,
बंदरों को नचाना खेल नहीं!
​गैया तो कोई भी चरा लेगा, हम चरा लेंगे, तुम चरा लोगे।
पर गैयों का चराना तो खेल भी है,
बंदरों को नचाना खेल नहीं!
​और तुम्हारे वाले, तुम कहो, "वाह! हमारे वाले तो सुदामा जी के तंदुल खाते हैं।"
तंदुल खाने जाते थोड़ी हैं, सुदामा जी बेचारे आते हैं, तब तंदुल खाते हैं। और हमारे वाले, तुम कहो-
तंदुल का... सुनो, तंदुल का खाना तो खेल भी है,
झूठे बेर चबाना खेल नहीं!
​बंसी का बजाना तो खेल भी है...
​तुम कहो, "वाह! हमारे वाले तो पर्वत उठा लेते हैं, एक उंगली के ऊपर।" ये कोई बड़ी बात है क्या?
गिरिधर गिरवर का उठाना तो खेल भी है,
गिरवर का उठाना तो खेल भी है,
गिरधर को उड़ा, गिरधर को उठाना खेल नहीं!
​पर्वत तो ठीक है, उठाया है, हम मानते हैं। लेकिन तुम्हारे वाले ने तो पर्वत ही उठाया, हमारे वाले सरकार की...  
उपर्युक्त स्क्रिप्ट में राम से कृष्ण की तुलना कर के उनके चरित्र व गुणों को निम्नतर आंका गया है और कृष्ण की अपेक्षा रामभक्ति का प्रचार हो इस भावना से उपर्युक्त वचन कह गयें हैं 

यथार्थपरक समीक्षा करें


पहले आप स्क्रिप्ट को पढ़े इसमें किसी बुराई नहीं की गयी है ।
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नया गीत

अश्कों से  लिखी गई रिवायत-ए-रब्बानी..."

इंटंरो ४
"यादव योगेश कुमार रोहि की एक रूहानी प्रस्तुति !
(तीनों मिलकर एक सुरीली गूँज पैदा करती हैं)
​[संगीत]: ढोलक की एक हल्की सी थाप के साथ लोक धुन का प्रवेश होता है।
​[गायन]:
​"गहरी नदिया नाव पुरानी, भँवरों में डूबा नादानी!"
ये मौजे हैं आनी जानी! अरे मूरख मत कर मन मानी।  
गहरी नदिया नाव पुरानी, भँवरों में डूबा नादानी!"
आलाप ---
​पहली गायिका: तेज बहाव में है ये पानी, तूफ़ानों की आई रवानी...
​दूसरी और तीसरी गायिका (कोरस/तिकड़ी):

अन्तरा-
नाखुदा तू ही खुदा, आज मत होना जुदा!
खामोश है पर होश है खोजता जीवन सुधा 

​तीनों मिलकर (लय बढ़ाते हुए):
​झूम गया है, बेखुदी में, मग्न है अपने ही निधी में...
ये ज़िंदगी है गुमशुदा,  आजतक नही पहचानी !
ये मौजे हैं आनी जानी ! अरे मूरख मत कर मन मानी।  
​[तिकड़ी का मुख्य टेक / समूह गान]:
​🎵 गहरी नदिया नाव पुरानी, भँवरों में डूबा नादानी।

​: अंतरा 2 — 
​दूसरी गायिका (अकेले, भावुक स्वर में):
​तपती हवाओं के,  ये झोंके, चलने से क्यों हमको रोके!  ये लहरों को जगा रहे हैं... तूफान गीत गा रहे हैं। 
उठ खड़ी हैं ये लहरें सोके। ये हवाओं की महरवानी।
गहरी नदिया नाव पुरानी भबरों डूबा नादानी।
अन्तरा: 
तूफ़ानों के आगोश में,  उच्छलती लहरों घोष में,  ये आकर के हमको डगमगा रहे हैं! और  हलचल दल मंगा रहे हैं।  
ये मुसाफिर सी जिन्दगानी !  ​दर्द में डूबी है आह  करहानी...
​तीनों का सामूहिक स्वर (दर्द भरी तान के साथ):
🎵 गहरी नदिया नाव पुरानी, भँवरों में डूबा नादानी!
तेज़ बहाव में है ये पानी, तूफ़ानों में आई रवानी!

​🔸 दृश्य 4: अंतरा 3 —
​तीसरी गायिका:
​इन बुलबुलों के दिलों में, ये कैसी बैचेनी तड़प है?
इश्क के बिना भी जीना, रोहि योगियों काही तप है!
​तीनों मिलकर (लोक धुन और भजन शैली की ऊँचाई पर):
​एक ही तड़प है, एक ही जप है, धड़कनों की,श्वासों से झड़प है!
उम्र है पंछियों का डेरा,  जीवन पतझड़ का विटप है! जिंदगी है ये सच से अनजानी...
गहरी नदीया नाव पुरानी! 
​🔸 दृश्य 5: समापन (Outro & Fade Out)
​[कैमरा निर्देश]: कैमरे का फोकस धीरे-धीरे जमीन पर रखे जलते हुए दीये और गायिकाओं के मिलनसार हाथों पर जाता है।
​[संगीत]: ढोलक की आवाज़ धीमी होती जाती है; केवल हारमोनियम की लंबी गूँज और मंजीरे की एक आख़िरी हल्की सी आवाज़ रह जाती है।
​[गायन (धीमे और रूहानी स्वर में तिकड़ी)]:
​साँसों में शोलों की कहानी...
🎵 गहरी नदिया नाव पुरानी, भँवरों में डूबा नादानी...
तूफ़ानों की आई रवानी...
(धीमी गूँज के साथ स्वर शून्य में विलीन हो जाते हैं)
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द्रुत ताल पर ढोलकों गुमक न थोपों में सिन्धी लोक धुन में ऑडियो जनरेट करें