मंच, मर्यादा और हमारे आराध्य
[आवाज में एक ठहराव, गहराई और संजीदगी होनी चाहिए। बैकग्राउंड में बहुत ही हल्का, शांत सा शास्त्रीय वाद्य यंत्रों या बांसुरी का संगीत बज रहा हो, जो भावनाओं को उद्वेलित न करे बल्कि एकाग्रता बढ़ाए।]
[एंकर / वक्ता:]
कभी-कभी जब हम किसी कथा मंच पर बैठकर वक्ता के शब्दों को सुनते हैं, तो मन में एक गहरा सवाल उठता है—क्या धार्मिक मंचों से आने वाली हर बात सिर्फ मनोरंजन है, या फिर यह जनमानस के विश्वास को गढ़ने का एक बहुत बड़ा माध्यम है?
आज जिस तरह से मंचों पर राम और कृष्ण के चरित्रों की तुलना की जाती है, राजनीति सेट प्रेरित होकर एक को श्रेष्ठ और दूसरे को कमतर या 'टेढ़ा' साबित करने की होड़ लगती है, वह न केवल दार्शनिक दृष्टि से अनुचित है, बल्कि समाज की आध्यात्मिक एकता के भी विरुद्ध है।
[संगीत में हल्का सा बदलाव – थोड़ा गंभीर]
आइए, जरा ठहरकर उन तर्कों पर गौर करें जो समय-समय पर हमारे महाकाव्यों और भगवान राम के चरित्र पर उठाए जाते रहे हैं।
चाहे वह राजा के रूप में राजधर्म का पालन करते हुए गर्भवती सीता का त्याग हो, अग्नि परीक्षा का संवेदनशील प्रसंग हो, या फिर किष्किंधा कांड में नीति के नियमों को ताक पर रखकर छिपकर किया गया बालि का वध हो... और उत्तर कांड में शूद्र तपस्वी शंबूक वध का वह प्रसंग, जिस पर आज भी सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से गहरी बहस होती है।
ये ऐसे पहलू हैं जिन्हें न तो पूरी तरह नकारा जा सकता है, और न ही आधुनिक मानवीय संवेदनाओं की अनदेखी करके इन्हें बिना संदर्भ के परोसा जा सकता है।
[स्वर में दार्शनिक रस और सहजता]
दूसरी ओर, जब हम भगवान कृष्ण की ओर देखते हैं, तो पाते हैं कि उनका स्वरूप बिल्कुल अलग है। श्रीमद्भागवत और दर्शन के अनुसार, कृष्ण को "कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्" यानी पूर्ण अवतार माना गया है।
राम अगर 'मर्यादा पुरुषोत्तम' हैं, जो नियमों के कठोर बंधन में बंधकर जीते हैं, तो कृष्ण 'लीला पुरुषोत्तम' हैं—जो मर्यादाओं को तोड़ते भी हैं और आवश्यकता पड़ने पर स्थापित भी करते हैं। राम की जीवन लौकिक है तो कृष्ण का लौकिक और अलौकिक दोनों है। भगवान कन्हैया का जीवन प्रेम, योग, युद्ध और गीता के उस सार्वभौमिक ज्ञान का समन्वय है, जो मनुष्य के संपूर्ण मनोविज्ञान को छूता है।
[निर्णायक और प्रभावी स्वर]
लेकिन, यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न यह है—क्या राम और कृष्ण दो अलग सत्ताएँ हैं?
उच्च दार्शनिक और अद्वैत वेदांत का दृष्टिकोण बिल्कुल स्पष्ट है। राम और कृष्ण में कोई भेद नहीं है। दोनों एक ही परम ब्रह्म के दो अलग-अलग रूप हैं।
फर्क सिर्फ काल और परिस्थितियों का था। त्रेतायुग की परिस्थितियाँ अलग थीं, इसलिए राम को मर्यादा का कठोर पालन करना पड़ा; द्वापर के अंत की परिस्थितियाँ अलग थीं, इसलिए कृष्ण को कूटनीति और योग का सहारा लेना पड़ा।
[सकारात्मक और अपील करता हुआ समापन]
इसलिए, निष्कर्ष साफ है। हल्के-फुल्के हास्य के नाम पर, या अपनी किसी खास संप्रदाय की श्रेष्ठता साबित करने की होड़ में, हमारे आराध्यों के चरित्र को तोड़-मरोड़कर पेश करना किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
जनता वक्ता के हर शब्द को प्रामाणिक मानती है। धार्मिक वक्ताओं को यह समझना होगा कि उनका मंच सिर्फ भीड़ जुटाने का साधन नहीं, बल्कि समाज के मानस को दिशा देने का एक पवित्र उत्तरदायित्व है।
आइए, अपने महाकाव्यों को सतही विवादों से ऊपर उठकर, उनके वास्तविक मानवीय, दार्शनिक और समग्र स्वरूप में समझें।
यादव योगेश कुमार रोहि व उनके साथी पाखण्डवाद व महापुरुषो के राजनीतिकरण के विरुद्ध उद्घोष कर रहे हैं।
[संगीत धीरे-धीरे धीमा होते हुए समाप्त होता है।]
वक्ता:
टीवी बताएं, कृष्ण कन्हैया वाले कितने भक्त बैठे हैं, जरा हाथ उठाओ। अच्छा, आज तुम्हें बुरा लग सकता है। देखो, हम तो रामजी वाले हैं, तुम्हारे वाले बहुत टेढ़े हैं, बहुत टेढ़े हैं, बहुत टेढ़े हैं, बहुत ज्यादा ही टेढ़े हैं। तुम्हारे वालों के तो नाम ही में टेढ़ापन है।
अब पढ़ो, देखो कितना टेढ़ा नाम है- कृष्ण!
और जो 'क' के नीचे 'रकार' लगी ना, वो ही खतरनाक। जो 'क' के नीचे ऐसी 'रकार' लगी, 'रकार', ऐसी कांटे जैसा और ये कांटे जैसा है, तुमने देखा होगा मछली पकड़ने वाले कांटे ले जाते हैं, उसको बंसी कहते हैं बंसी! और वो कांटे में ऐसा कुछ खाने का फंसाते हैं और डाल देते हैं, मछली जैसी ही फंस जाती है, कितनी भी फड़फड़ाए, लौट के नहीं निकलती। ये तुम्हारे वाले के नीचे जो 'रकार' है, उसमें कोई फंस जाए, फिर नहीं निकल पाता।
लेकिन हमारे वाले तो, हमारे वाले तो एकदम सीधे हैं। बहुत सीधे हैं बेचारे, चलते भी हैं हमारे वाले तो एकदम सीधे, बैठते भी हैं। नजर हमेशा मध्यम रखते हैं हमारे वाले। तुम्हारे वाले तो एक भी फोटो देख लो तुम अपने वाले ठाकुर जी की, एक भी फोटो! बैठे ऐसे तो ऐसे, कहीं ऐसे। और तुम्हारे वाले तो खड़े भी होते हैं तो तीन जगह से टेढ़े!
पांव के ऊपर पांव, कमर कहीं लचकाएं, खपड़िया ऐसी करें, ऐसी खपड़िया करें, फिर बंसी हो जाओ, ऐसे टेढ़े करके। हमारे वाले तो खड़े भी होते हैं एकदम सीधे। हमारे वाले का नाम भी सीधा, तुम्हारे वाले का... हमारे वाले का नाम भी सीधा, हमारे वाले का चलना भी सीधा, हमारे वाले दिखते भी सीधे। तुम्हारे वालों का नाम भी टेढ़ा, चलते भी टेढ़े, खड़े भी टेढ़े होते हैं। हमारे वालों का धाम भी सीधा- अयोध्या! तुम्हारे वाले का- वृन्दावन!
और सुनो,
बंसी का बजाना तो खेल भी है,
धनुष चलाना खेल नहीं!
जितने ठाकुर जी वाले बैठे हैं, आज तो तुम्हारे ठाकुर जी की भी जय-जयकार हो रही है। और सुनो, तुम्हारे ठाकुर जी क्या करते? बंसी बजाते? तो कहा, "बंसी कोई बड़ी बात थोड़ी है, देखो हमारे यहां तो ये भी बजा रहा है, बजा, बजैया, बजा!"
रामजी वाले कितने बैठे हैं, हाथ उठाओ! हां, आज तुम लोग फूले नहीं समाओगे।
बंसी का बजाना तो खेल भी है,
पर धनुष चलाना खेल नहीं!
और तुम कहो, "वाह! हमारे वाले तो गैया चराते हैं।"
गैयों का चराना तो खेल भी है,
बंदरों को नचाना खेल नहीं!
गैया तो कोई भी चरा लेगा, हम चरा लेंगे, तुम चरा लोगे।
पर गैयों का चराना तो खेल भी है,
बंदरों को नचाना खेल नहीं!
और तुम्हारे वाले, तुम कहो, "वाह! हमारे वाले तो सुदामा जी के तंदुल खाते हैं।"
तंदुल खाने जाते थोड़ी हैं, सुदामा जी बेचारे आते हैं, तब तंदुल खाते हैं। और हमारे वाले, तुम कहो-
तंदुल का... सुनो, तंदुल का खाना तो खेल भी है,
झूठे बेर चबाना खेल नहीं!
बंसी का बजाना तो खेल भी है...
तुम कहो, "वाह! हमारे वाले तो पर्वत उठा लेते हैं, एक उंगली के ऊपर।" ये कोई बड़ी बात है क्या?
गिरिधर गिरवर का उठाना तो खेल भी है,
गिरवर का उठाना तो खेल भी है,
गिरधर को उड़ा, गिरधर को उठाना खेल नहीं!
पर्वत तो ठीक है, उठाया है, हम मानते हैं। लेकिन तुम्हारे वाले ने तो पर्वत ही उठाया, हमारे वाले सरकार की...
उपर्युक्त स्क्रिप्ट में राम से कृष्ण की तुलना कर के उनके चरित्र व गुणों को निम्नतर आंका गया है और कृष्ण की अपेक्षा रामभक्ति का प्रचार हो इस भावना से उपर्युक्त वचन कह गयें हैं
यथार्थपरक समीक्षा करें
पहले आप स्क्रिप्ट को पढ़े इसमें किसी बुराई नहीं की गयी है ।
ऑडियो जनरेट करें!
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