मंगलवार, 21 जुलाई 2020

"यादवों का इतिहास "


प्राय:  कुछ रूढ़िवादी ब्राह्मण अथवा  भ्रान्त -मति राजपूत समुदाय के लोग यादवों को  आभीरों (गोपों) से पृथक बताने के लिए
महाभारत के मूसल पर्व अष्टम् अध्याय से 
यह श्लोक उद्धृत करते हैं ।
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ततस्ते पापकर्माणो लोभोपहतचेतस: । 
आभीरा मन्त्रामासु: समेत्याशुभ दर्शना: ।। ४७।

अर्थात्  वे  पापकर्म करने वाले तथा लोभ से पतित चित्त वाले ! अशुभ -दर्शन अहीरों ने एकत्रित होकर वृष्णि वंशी यादवों को लूटने की  सलाह की ।४७। 

अब इसी बात को  बारहवीं शताब्दी में रचित ग्रन्थ श्री-मद्भगवद् पुराण के प्रथम अध्याय में आभीर शब्द के स्थान पर गोप शब्द  सम्बोधन द्वारा कहा गया है 
इसे भी देखें---
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"सोऽहं नृपेन्द्र रहित: पुरुषोत्तमेन   
सख्याप्रियेण सुहृदा हृदयेन शून्य:।
 
अध्वन्युरूक्रम परिग्रहम् अंग रक्षन् । 
गौपै: सद्भिरबलेव विनिर्जितोेऽस्मि ।२०।
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हे राजन् ! जो मेरे सखा अथवा -प्रिय मित्र ---नहीं ,नहीं मेरे हृदय ही थे ; उन्हीं पुरुषोत्तम कृष्ण से मैं रहित हो गया हूँ । 
कृष्ण की पत्नीयाें को द्वारिका से अपने साथ इन्द्र-प्रस्थ लेकर आर रहा था । 
परन्तु मार्ग में दुष्ट गोपों ने मुझे एक अबला के समान हरा दिया ।
और मैं अर्जुन उनकी गोपिकाओं तथा वृष्णि वंशीयों की पत्नीयाें की रक्षा नहीं कर सका!
(  श्रीमद्भगवद् पुराण अध्याय एक श्लोक संख्या २०(पृष्ठ संख्या --१०६ गीता प्रेस गोरखपुर देखें---
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महाभारत के मूसल पर्व में गोप के स्थान पर आभीर शब्द का प्रयोग सिद्ध करता है कि गोप ही आभीर हैं।

  आप को ज्ञात होना चाहिए कि  नारायणी सेना के स्वरूप आभीर या गोप यौद्धा ही थे । 
और जिसका प्रत्येक गोप यौद्धा  बल में कृष्ण के ही समान था।
इसी बात की पुष्टि महाभारत उद्योग पर्व में वर्णित निम्न श्लोकों से होती है ।👇

मत्सहननं तुल्यानां,गोपानामर्बुद महत् ।
नारायण इति ख्याता सर्वे संग्राम यौधिन: ।107।

सेना के यौद्धा  रूप में मेरे समान अरबों की संख्या में महान संग्राम में युद्ध करने वाले गोप यौद्धा ही नारायणी सेना से अभिहित हैं ।

नारायणेय: मित्रघ्नं कामाज्जातभजं नृषु ।
सर्व क्षत्रियस्य पुरतो देवदानव योरपि 108।।

जिनके सम्मुख देव ,दानव या कोई क्षत्रिय नहीं ठहरता है । 
(महाभारत के उद्योग पर्व अध्याय 7/18-22,में) 

जब अर्जुन और दुर्योधन दौनों विपक्षी यौद्धा युद्ध काल में कृष्ण के पास युद्ध में सहायता माँगने के लिए गये तो श्रीकृष्ण ने प्रस्तावित किया कि आप दौनों ही मेरे लिए समतुल्य(समान) हो ।

आपकी युद्धीय स्तर पर सहायता के लिए एक ओर मेरी गोपों की नारायणी सेना होगी ! 
और दूसरी और ---मैं  स्वयं नि:शस्त्र  --- अब आपको जो  अच्छा लगे वह मुझसे माँंगलो ! 

तब स्थूल बुद्धि दुर्योधन ने कृष्ण की नारायणी गोप सेना को माँगा ! और अर्जुन ने स्वयं कृष्ण को !


इसी सन्दर्भ में कृष्ण ने नारायणी सेना के गोप यौद्धाओं की जानकारी दुर्योधन को दी थी उसी के पुष्टि करण में ये उपर्युक्त श्लोक उद्धृत हैं ।

बात ये भी आती है कि गोपों या अहीरों ने अर्जुन को क्यों लूटा या परास्त क्यों किया था ? 

दर असल इसके कई समवेत कारण थे ।
प्रथम अर्जुन द्वारा अपनी ममेरी बहिन  सुभद्रा का कामुकता से प्रेरित होकर अपहरण करना।
जो नि: सन्देह महापातक था 

और दूसरा समर्थित कारण नारायणी सेना का दुर्योधन का पक्ष धर होना ।

गोप अर्थात् अहीर निर्भीक यदुवंशी यौद्धा तो थे ही 
इसी लिए दुर्योधन ने उनका ही चुनाव किया था !

यही कारण था कि गोपों ने प्रभास के दौरान  पञ्चनद  क्षेत्र में अर्जुन को परास्त कर लूट किया था । 
लूटा क्या था एक स्त्रीयों के लुटेरा को ही रोककर उससे अपने यदुवंश की विधवा ,बालिका और छोटे बालकों को अर्जुन के ल़साथ जाने से रोका ।

क्यों वे अर्जुन के कामुकता पूर्ण चरित्र से परिचित थे ।
और फिर अर्जुन जैसे महारथी यौद्धा को परास्त करने वाले या स्वयं श्रीकृष्ण की स्त्रीयों को लूटने या अपने साथ ले जाने वाले साधारण लुटेरे कैसे ह सकते हैं ?
 
अर्जुन नारायणी सेना के गोपों का चिर शत्रु था ।
और  नारायणी सेना के ये यौद्धा दुर्योधन को पक्ष में थे । 
और यादव अथवा अहीर किसी को साथ विश्वास घात नहीं करते थे 
इसी लिए अर्जुन को परास्त करने वाले हुए 
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गर्ग संहिता अश्व मेध खण्ड अध्याय 60/41,में यदुवंशी गोपों ( अहीरों) की सुनने और गायन करने से मनुष्यों को सब पार नष्ट हो जाते हैं । 

 महाभारत के मूसल पर्व में आभीर शब्द के द्वारा भी नारायणी सेना के यौद्धा गोपों क वर्णन है ।

परन्तु कालान्तरण में स्मृति-ग्रन्थों में गोपों को शूद्र रूप में वर्णित करना यादवों के प्रति द्वेष भाव को ही इंगित भी करता है ।
गोप शूद्र नहीं अपितु स्वयं में क्षत्रिय ही हैं ।

जैसा की संस्कृति साहित्य का इतिहास पृष्ठ संख्या 368 पर भी वर्णित है ।
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अस्त्र हस्ताश़्च धन्वान: संग्रामे सर्वसम्मुखे ।
प्रारम्भे विजिता येन स: गोप क्षत्रिय उच्यते ।।101

यादवा: श्रृणोति चरितं वै गोलोकारोहणं हरे :
मुक्ति यदूनां गोपानां सर्व पापै: प्रमुच्यते ।102।

हाथों में अस्त्र और धनुष धारण करने वाले संग्राम में सब के सम्मुख रहकर प्रारम्भ में ही जिनके द्वारा विजय प्राप्त कर ली जाता है वे यौद्धा गोप कहे जाते हैं ।
यादव शिरोमणि श्रीकृष्ण जो गोलोक में उत्पन्न हुए उन हरि और उनके सहायक यादव गोपों के चरित्र का श्रवण करता है वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है ।

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बारहवीं सदी में लिपिबद्ध ग्रन्थ  श्रीमद्भागवत् पुराण में अहीरों को बाहर से आया बताया गया.....
 फिर महाभारत में मूसल पर्व में वर्णित अभीर कहाँ से आ गये.... 
ये विरोधाभासी बातें सत्य से परे हैं 

किरात हूणान्ध्र पुलिन्द पुलकसा: 
आभीर शका यवना खशादय :।
येऽन्यत्र पापा यदुपाश्रयाश्रया शुध्यन्ति
 तस्यै प्रभविष्णवे नम:।
 (श्रीमद्भागवत् पुराण-- २/४/१८) ------------------------------------
अर्थात् किरात हूण पुलिन्द पुलकस तथा आभीर शक यवन ( यूनानी) खश आदि जन-जाति तथा अन्य जन-जाति यदुपति कृष्ण के आश्रय में आकर शुद्ध हो गयीं ।
उस प्रभाव शाली कृष्ण को नमस्कार है।
श्रीमद्भागवत् पुराण-- २/४/१८ 

यद्यपि अन्यत्र एक विद्वान रूप गोस्वामी ने अपने ग्रन्थ 
"श्रीश्रीराधाकृष्ण गण उद्देश दीपिका"  में लिखा कि 👇
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पशुपालस्त्रिधा वैश्या आभीरा गुर्जरास्तथा ।
गोप वल्लभ पर्याया यदुवंश समुद्भवा : ।।७।।

भषानुवाद – पशुपाल भी वणिक , अहीर और गुर्जर भेद से तीन प्रकार के हैं ।
इन तीनों का उत्पत्ति यदुवंश से हुई है ।
 तथा ये सभी गोप और वल्लभ जैसे समानार्थक नामों से जाने जाते हैं ।७।।
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प्रायो गोवृत्तयो मुख्या वैश्या इति समारिता: ।
अन्ये८नुलोमजा: केचिद् आभीरा इति विश्रुता:।।८।

भषानुवाद– वैश्य प्राय: गोपालन के द्वारा अपना जीवन निर्वाह करते है ।
और आभीर तथा गुर्जरों से श्रेष्ठ माने जाते हैं ।
अनुलोम जात ( उच्च वर्ण के पिता और निम्न वर्ण की माता द्वारा उत्पन्न ) वैश्यों को आभीर नाम से जाना जाता है ।८।।
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आचाराधेन तत्साम्यादाभीराश्च स्मृता इमे ।।
आभीरा: शूद्रजातीया गोमहिषादि वृत्तय: ।।
घोषादि शब्द पर्याया: पूर्वतो न्यूनतां गता: ।।९।।

भाषानुवाद–आचरण में आभीर भी वैश्यों के समान जाने जाते हैं । ये शूद्रजातीया हैं ।
तथा गाय भैस के पालन द्वारा अपना जीवन निर्वाह करते हैं ।
 इन्हें घोष भी कहा जाता है ये पूर्व कथित वैश्यों से कुछ हीन माने जाते हैं ।९।।
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किञ्चिदाभीरतो न्यूनाश्च छागादि पशुवृत्तय:।
गोष्ठप्रान्त कृतावासा: पुष्टांगा गुर्जरा: स्मृता :।।१०।

भाषानुवाद – अहीरों से कुछ हीन बकरी आदि पशुओं को पालन करने वाले  तथा गोष्ठ की सीमा पर वास करने वाले गोप ही गुर्जर कहलाते हैं  ये प्राय हृष्ट-पुष्टांग वाले होते हैं ।१०।

वास्तव में उपर्युक्त रूप में वर्णित तथ्यों  की समीक्षा की जाए तो निष्कर्ष यही निकता है कि अहीर और गुर्जर यदुवंश से उत्पन्न होकर भी वैश्य और शूद्र क्यों हैं ? 
और जिस वेदों की अधिष्ठात्री देवी गायत्री का जन्म एक नरेन्द्र सेन अहीर की पुत्री के रूप में हुई हो ।

जिस गायत्री मन्त्र के वाचन से ब्राह्मण स्वयं को तथा दूसरों को पवित्र और ज्ञानवान बनाने का अनुष्ठान करता हो  वह गायत्री एक अहीर नरेन्द्र सेन की कन्या है ।
फिर अहीरों को शूद्र घोषित करना मूढ मान्यता ही है 


ये आभीरों के विरुद्ध बातें प्राचीनत्तम शास्त्रों के द्वारा सम्मत व युक्ति- युक्त नहीं हैं।
 क्यों कि पद्मपुराण सृष्टि खण्ड ,अग्निपुराण और नान्दी -उपपुराण आदि में  वेदों की अधिष्ठात्री देवी गायत्री नरेन्द्र सेन आभीर की कन्या हैं ।
जिसे गूजर और अहीर दौनों समान रूप से अपनी कुल देवी मानते हैं ।


जब शास्त्रों में ही ये बातें हैं कि गायत्री आभीरों कन्या हैं  तोे फिर 
अहीर तो ब्राह्मणों के भी पूज्य हैं 
फिर षड्यन्त्र के तहत किस प्रकार मूढ पुरोहितों के विधान में अहीर शूद्र और वैश्य हुए ।

वास्तव में जिन तथ्यों का अस्तित्व ही सत्य संगत  नहीं हो तो उनको उद्धृत करना भी महा मूढ़ता ही है ।

इस लिए अहीर यादव या गोप आदि विशेषणों से नामित यादव कभी शूद्र नहीं हो सकते हैं और यदि इन्हें किसी पुरोहित या ब्राह्मण का संरक्षक या सेवक माना जाए तो भी युक्ति- युक्त बात नहीं है 
क्यों कि एक ब्राह्मण विद्वान लेखक ज्वाला प्रसाद मिश्र अपने ग्रन्थ "जाति-भाष्कर" में आभीरों को ब्राह्मण भी लिखते हैं ।

परन्तु नारायणी सेना के ये अजेय यौद्धा आभीर या गोप  जो अर्जुन जैसे महारथी यौद्धा को क्षण-भर में परास्त कर देते हैं ।
क्या मूर्ख पुरोहितों के करने से ही शूद्र या वैश्य माने जाऐंगे ।

ये आभीर या गोप जो सम्पूर्ण विश्व की माता गो को पालन करने वाले हैं – वैश्य या शूद्र माने जाऐंगे  ?

किस मूर्ख ने ये विधान बनाया ?
हम इस आधार हीन बातों और विधानों को सिरे से खारिज करते हैं ।
यादव अपने विधानों के स्वयं विधायक है ।

इसी लिए यादवों ने  रूढ़िवादी पुरोहितों की वर्ण व्यवस्था को खण्डित किया और षड्यन्त्र कारी पुरोहितों को दण्डित भी किया ।

परिणाम स्वरूप यादवों ने मानवका की समताओं को जीवन्त रखने वाले भागवत धर्म की स्थापना की ।

जहाँ सारे कर्म काण्ड और वर्ण व्यवस्था आदि का कोई महत्व व मान्यता नहीं थी ।

(प्रस्तुति करण - यादव योगेश कुमार "रोहि" 8077160219)
कुछ लोग बार बार अज्ञानता के मद में उन्मत्त होकर ये बड़बड़ाते हैं 
कि गोप अहीरों से पृथक् है, या गोप यादवों से पृथक् हैं ।
परन्तु यह मूर्खों का प्रलाप ही है ।

हम महा भारत से ही सिद्ध करते हैं कि गोप ही यादव हैं 
क्यों कि यादव वंशमूलक विशेषण और गोप व्यवसाय मूलक विशेषण है ।

अब महाभारत के खिल-भाग हरिवंश पुराण में वसुदेव को गोप ही कहा गया है। 
और कृष्ण का जन्म भी गोप (आभीर) जन-जाति में हुआ था।
एेसा वर्णन है । 
प्रथम दृष्टवा तो ये देखें-- कि वसुदेव को गोप कहा है ।
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"इति अम्बुपतिना प्रोक्तो वरुणेनाहमच्युत ।
गावां कारणत्वज्ञ:कश्यपे शापमुत्सृजन् ।२१।

येनांशेन हृता गाव: कश्यपेन महर्षिणा ।
स तेन अंशेन जगतीं गत्वा गोपत्वमेष्यति।२२।

द्या च सा सुरभिर्नाम अदितिश्च सुरारिण: 
ते८प्यमे तस्य भार्ये वै तेनैव सह यास्यत:।।२३।

ताभ्यां च सह गोपत्वे कश्यपो भुवि संस्यते।
स तस्य कश्यस्यांशस्तेजसा कश्यपोपम: ।२४।

वसुदेव इति ख्यातो गोषु तिष्ठति भूतले ।
गिरिगोवर्धनो नाम मथुरायास्त्वदूरत: ।२५।

तत्रासौ गौषु निरत: कंसस्य कर दायक:।
तस्य भार्याद्वयं जातमदिति सुरभिश्च ते ।२६।

देवकी रोहिणी देवी चादितिर्देवकी त्यभृत् 
सतेनांशेन जगतीं गत्वा गोपत्वं एष्यति। २७।

गीता प्रेस गोरखपुर की हरिवंश पुराण 'की कृति में 
श्लोक संख्या क्रमश: 32,33,34,35,36,37,तथा 38 पर देखें--- अनुवादक पं० श्री राम नारायण दत्त शास्त्री पाण्डेय "राम"   "ब्रह्मा जी का वचन " नामक  55 वाँ अध्याय।
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अनुवादित रूप :----हे विष्णु ! महात्मा वरुण के ऐसे वचनों को सुनकर तथा इस सन्दर्भ में समस्त ज्ञान प्राप्त करके भगवान ब्रह्मा ने कश्यप को शाप दे दिया। 
तथा कहा 
।२१। कि कश्यप ने अपने जिस तेज से  प्रभावित होकरउन गायों का अपहरण किया ।
उस पाप के प्रभाव-वश होकर भूमण्डल पर अहीरों (गोपों)का जन्म धारण करें ।२२। 
तथा दौनों देव माता अदिति और सुरभि उनकी पत्नीयाें के रूप में पृथ्वी पर उनके साथ जन्म धारण करेंगी ।२३।

इस पृथ्वी पर अहीरों ( ग्वालों ) का जन्म धारण कर महर्षि कश्यप दौनों पत्नीयाें अदिति और सुरभि सहित आनन्द पूर्वक जीवन यापन करते रहेंगे ।
हे राजन् वही कश्यप वर्तमान समय में कश्यप के तेज स्वरूप वसुदेव गोप के नाम से प्रसिद्ध होकर पृथ्वी पर गायों की सेवा करते हुए जीवन यापन करते हैं।
मथुरा के ही समीप गोवर्धन पर्वत है ।

उसी पर पापी कंस के अधीन होकर गोकुल पर राज्य कर रहे हैं।
कश्यप की दौनों पत्नीयाें अदिति और सुरभि ही क्रमश: देवकी और रोहिणी के नाम से अवतीर्ण हुई हैं ।२४-२७।
(उद्धृत सन्दर्भ --------)
पितामह ब्रह्मा की योजना नामक ३२वाँ अध्याय पृष्ठ संख्या २३० अनुवादक -- पं० श्रीराम शर्मा आचार्य    " ख्वाजा कुतुब वेद नगर बरेली संस्करण)
अब कृष्ण को भी गोपों के घर में जन्म लेने वाला बताया है ।
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गोप अयनं य: कुरुते जगत: सार्वलौकिकम् ।
स कथं गां गतो देशे विष्णुर्गोपर्त्वमागत: ।।९।

अर्थात्:-जो प्रभु भूतल के सब जीवों की 
रक्षा करनें में समर्थ है ।
वे ही इस भूतल पर आकर गोप (आभीर) क्यों हुए ।९।
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हरिवंश पुराण "वराह ,नृसिंह  आदि अवतार नामक १९ वाँ अध्याय पृष्ठ संख्या १४४ (ख्वाजा कुतुब वेद नगर बरेली संस्करण) 
सम्पादक पण्डित श्री राम शर्मा आचार्य ..
गीता प्रेस गोरखपुर की हरिवंश पुराण की कृति में वराहोत्पत्ति वर्णन " नामक पाठ चालीसवाँ अध्याय 
पृष्ठ संख्या (182) श्लोक संख्या (12)
अब निश्चित रूप से आभीर और गोप परस्पर पर्याय वाची रूप हैं। यह शास्त्रीय पद्धति से प्रमाणित भी है ।

अब  द्वेष वश स्मृति-ग्रन्थों में गोपों को शूद्र कह कर वर्णित किया गया है। यह भी देखें---
व्यास -स्मृति )तथा  सम्वर्त -स्मृति में एक स्थान पर लिखा है 
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" क्षत्रियात् शूद्र कन्यानाम् समुत्पन्नस्तु य: सुत: । 
स गोपाल इति ज्ञेयो भोज्यो विप्रैर्न संशय:
 ----------------------------------------------------------------- 
अर्थात् क्षत्रिय से शूद्र की कन्या में उत्पन्न होने वाला पुत्र गोपाल अथवा गोप होता है ।
और विप्रों के द्वारा उनके यहाँ भोजान्न होता है इसमे संशय नहीं ....
पाराशर स्मृति में वर्णित है कि..
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वर्द्धकी नापितो गोप: आशाप: कुम्भकारक: ।
 वणिक् किरात: कायस्थ: मालाकार: कुटुम्बिन: एते चान्ये च बहव शूद्र:भिन्न स्व कर्मभि: चर्मकारो भटो भिल्लो रजक: पुष्करो नट: वरटो मेद। चाण्डालदास श्वपचकोलका: ।।११।। 

एतेऽन्त्यजा समाख्याता ये चान्ये च गवार्शना: 
एषां सम्भाषणाद् स्नानंदर्शनादर्क वीक्षणम् ।।१२।।
 -----------------------------------------------------------------  वर्द्धकी (बढ़ई) , नाई , गोप , आशाप , कुम्हार ,वणिक् ,किरात , कायस्थ, माली , कुटुम्बिन, ये सब अपने कर्मों से भिन्न बहुत से शूद्र हैं । 
चमार ,भट, भील ,धोवी, पुष्कर, नट, वरट, मेद , चाण्डाल ,दाश,श्वपच , तथा कोल (कोरिया)ये सब अन्त्यज कहे जाते हैं ।
और अन्य जो गोभक्षक हैं वे भी अन्त्यज होते हैं । इनके साथ सम्भाषण करने पर स्नान कर सूर्य दर्शन  करना चाहिए तब शुद्धि  होती है ।
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अभोज्यान्ना:स्युरन्नादो यस्य य: स्यात्स तत्सम: 
नापितान्वयपित्रार्द्ध सीरणो दास गोपका:।।४९।।

 शूद्राणामप्योषान्तु भुक्त्वाsन्न नैव दुष्यति ।
धर्मेणान्योन्य भोज्यान्ना द्विजास्तु विदितान्वया:।५०।।   
  (व्यास-स्मृति)
नाई वंश परम्परा व मित्र ,अर्धसीरी ,दास ,तथा गोप ,ये सब शूद्र हैं ।
तो भी इन शूद्रों के अन्न को खाकर दूषित नहीं होते ।।

जिनके वंश का ज्ञान है ;एेसे द्विज धर्म से परस्पर में भोजन के योग्य अन्न वाले होते हैं ।५०। ________________________________________
 (व्यास- स्मृति प्रथम अध्याय श्लोक ११-१२) -------------------------------------------------------------- 

स्मृतियों की रचना काशी में हुई , वर्ण-व्यवस्था का पुन: दृढ़ता से विधान पारित करने के लिए काशी के इन ब्राह्मणों ने रूढ़ि वादी पृथाओं के पुन: संचालन हेतु स्मृति -ग्रन्थों की रचना की जो पुष्यमित्र सुंग की परम्पराओं के अनुगामी थे ।
देखें--- निम्न श्लोक दृष्टव्य है इस सन्दर्भ में..
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 " वाराणस्यां सुखासीनं वेद व्यास तपोनिधिम् । 
पप्रच्छुमुर्नयोSभ्येत्य धर्मान् वर्णव्यवस्थितान् ।।१।।
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अर्थात् वाराणसी में सुख-पूर्वक बैठे हुए तप की खान वेद व्यास से ऋषियों ने वर्ण-व्यवस्था के धर्मों को पूछा ।
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निश्चित रूप इन विरोधाभासी तथ्यों से ब्राह्मणों के विद्वत्व की पोल खुल गयी है ।
जिन्होंने योजना बद्ध विधि से समाज में ब्राह्मण वर्चस्व स्थापित कर के लिए सारे -ग्रन्थों पर व्यास की मौहर लगाकर अपना ही स्वार्थ सिद्ध किया है ।

ये सारी हास्यास्पद व विकृतिपूर्ण अभिव्यञ्जनाऐं पुष्यमित्र सुंग के अनुयायी ब्राह्मणों की हैं।
समाज में अव्यवस्था उत्पन्न करने में इनके आडम्बरीय रूप का ही योगदान है ।

तुलसी दास जी भी इसी पुष्य मित्र सुंग की परम्पराओं का अनुसरण करते हुए लिखते हैं ।

राम चरित मानस के युद्ध काण्ड में राम और समुद्र के सम्वाद रूप में अहीरों के वध करने के लिए राम को दिया गया समुद्र सुझाव -
तुलसी दास ने वाल्मीकि-रामायण को उपजीव्य मान कर ही राम चरित मानस की  रचना की है ।

रामचरितमानस में भी तुलसीदास ने उत्तर कांड के 129 (1) में लिखा है कि " आभीर, यवन, ।
 किरात ,खस, स्वपचादि अति अधरुपजे। अर्थात् अहीर, यूनानी बहेलिया, खटिक, भंगी आदि पापयो को हे प्रभु तुम मार दो 
वाल्मीकि-रामायण में राम और समुद्र के सम्वाद रूप में वर्णित युद्ध-काण्ड सर्ग २२ श्लोक ३३पर इसी का मूल विद्यमान है  देखें---

महाभारत यद्यपि किसी एक व्यक्ति की रचना नहीं है।
जिन ब्राह्मणों ने महाभारत का लेखन किया निश्चित रूप से वे यादव विरोधी थे। 

  उन्होंने यादवों के प्रधान विशेषण आभीर शब्द की प्रस्तुति दस्यु अथवा शूद्र रूप में की परन्तु नकारात्मक रूप में  
अथवा यह भी अर्थ है कि आभीर शूद्रों के सहवर्ती थे ।

शूद्राभीरगणाश्चैव ये चाश्रित्य सरस्वतीम् ।
वर्तयन्ति च ये मत्स्यैर्ये च पर्वतवासिन: ।।१०।

महाभारत सभा पर्व के अन्तर्गत दिग्विजय पर्व३२वाँ अध्याय में वर्णित किया गया है कि 
सरस्वती नदी के किनारे निवास करने वाले जो शूद्र आभीर गण थे और उनके साथ मत्स्यजीवी धीवर जाति के लोग भी रहते थेे। 
तथा पर्वतों पर निवास करने वाले जो दूसरे दूसरे मनुष्य थे सब नकुल ने जीत लिए।
परन्तु ये वर्णन काल्पनिक ही हैं 
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इन्द्र कृष्टैर्वर्तयन्ति धान्यैर्ये च नदीमुखै: ।
समुद्रनिष्कुटे जाता: पारेसिन्धु च मानवा:।११।

तो वैरामा : पारदाश्च आभीरा : कितवै: सह ।
विविधं बलिमादाय रत्नानि विधानि च।१२।

महाभारत के सभा पर्व के अन्तर्गत द्यूतपर्व ५१वाँ अध्याय में वर्णित है कि -
अर्थात् जो समु्द्र तटवर्ती गृहोद्यान में तथा सिन्धु के उस पार रहते हैं।
 वर्षा द्वारा इन्द्र के पैंदा किये हुए तथा नदी के जल से उत्पन्न धान्यों द्वारा निर्वाह करते हैं ।

 वे वैराम ,पारद, आभीर ,तथा कितव जाति के लोग नाना प्रकार के रत्न एवं भेंट सामग्री बकरी भेड़ गाय सुवर्ण ऊँट फल तैयार किया हुआ मधु लि बाहर खड़े हुए हैं ।
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चीनञ्छकांस्तथा चौड्रान् बर्बरान् वनवासिन: ।२३ 
वार्ष्णेयान् हार हूणांश्च कृष्णान् हैमवतांस्तथा ।

नीपानूपानधिगतान्विविधान्  द्वारा वारितान् ।२४।

अर्थात् चीन शक ओड्र वनवासी बर्बर  तथा वृष्णि वंशी वार्ष्णेय, हार, हूण , और कृष्ण भी हिमालय प्रदेशों के समीप और अनूप देशों से अनेक राजा भेंट देने के लिए आये ।

वस्तुत यहाँ वार्ष्णेय शब्द यदुवंशी वृष्णि की सन्तानों के लिए है ।
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वाल्मीकि रामायण में 
अब अहीरों को समुद्र के करने पर राम द्रुमकुल्य देश में माने का उपक्रम करते हैं. 

समुद्र राम से निवेदन करता है !  हे प्रभु  आप अपने अमोघ वाण उत्तर दिशा में रहने वाले अहीरों पर छोड़ दे--
और उन अहीरों को नष्ट कर दें..
जड़ समुद्र भी राम से बाते करता है ।
और राम समु्द्र के कहने पर सम्पूर्ण अहीरों को अपने अमोघ वाण से त्रेता युग-- में ही  मार देते हैं ।
परन्तु अहीर आज भी कलियुग में  जिन्दा होकर ब्राह्मण और राजपूतों की नाक में दम किये हुए हैं ।
उनके मारने में रामबाण भी चूक गया ।

निश्चित रूप से यादवों (अहीरों) विरुद्ध इस प्रकार से लिखने में ब्राह्मणों की धूर्त बुद्धि ही दिखाई देती है।
कितना अवैज्ञानिक व मिथ्या वर्णन है ................

जड़ समुद्र भी अहीरों का शत्रु बना हुआ है  जिनमें चेतना नहीं हैं  फिर भी । ब्राह्मणों ने  राम को भी अहीरों का हत्यारा' बना दिया ।
और हिन्दू धर्म के अनुयायी बने हम हाथ जोड़ कर इन काल्पनिक तथ्यों को सही मान रहे हैं। भला हो हमारी बुद्धि का जिसको मनन रहित श्रृद्धा (आस्था) ने दबा दिया । और मन गुलाम हो गया पूर्ण रूपेण  अन्धभक्ति का ! आश्चर्य  ! घोर आश्चर्य ! 
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" उत्तरेणावकाशो$स्ति कश्चित् पुण्यतरो मम ।
द्रुमकुल्य इति ख्यातो लोके ख्यातो यथा भवान् ।।३२।।

उग्रदर्शनं कर्माणो बहवस्तत्र दस्यव: ।
आभीर प्रमुखा: पापा: पिवन्ति सलिलम् मम ।।३३।।

तैर्न तत्स्पर्शनं पापं सहेयं पाप कर्मभि: ।
अमोघ क्रियतां रामो$यं  तत्र शरोत्तम: ।।३४।।

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सागरस्य महात्मन: ।
मुमोच तं शरं दीप्तं परं सागर दर्शनात् ।।३५।।

     (वाल्मीकि-रामायण युद्ध-काण्ड २२वाँ सर्ग)
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अर्थात् समुद्र राम से बोल प्रभो ! जैसे जगत् में आप सर्वत्र विख्यात एवम् पुण्यात्मा हैं ।
उसी प्रकार मेरे उत्तर की ओर द्रुमकुल्य नामका बड़ा ही प्रसिद्ध देश है ।३२।

वहाँ अाभीर आदि जातियों के बहुत सेमनुष्य निवास करते हैं ।
जिनके कर्म तथा रूप बड़े भयानक हैं ।सबके सब पापी और लुटेरे हैं ।
वे लोग मेरा जल पीते हैं ।३३।

उन पापाचारियों का मेरे जल से स्पर्श होता रहता है ।
इस पाप को मैं नहीं यह सकता हूँ ।
हे राम आप अपने इस उत्तम वाण को वहीं सफल कीजिए ।३४।

महामना समुद्र का यह वचन सुनकर समुद्र के दिखाए मार्ग के अनुसार उसी अहीरों के देश द्रुमकुल्य की दिशा में राम ने वह वाण छोड़ दिया ।३५।
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निश्चित रूप से ब्राह्मण समाज ने राम को आधार बनाकर ऐसी मनगढ़न्त 
कथाओं का सृजन किया है । 
ताकि इन पर सत्य का आवरण  चढ़ा कर अपनी काल्पनिक बातें को सत्य व प्रभावोत्पादक बनाया जा सके ।

इन ब्राह्मणों का जैनेटिक सिष्टम ही कपट से मय है ।
जो अवैज्ञानिक ही नहीं अपितु मूर्खता पूर्ण भी है ।
अब ब्राह्मण सब तो कपटी नहीं होते परन्तु जो ब्राह्मण साधना हीन हते हैं वे ही नकली ब्राह्मण द्वेष और प्रमाद के वशीभूत होते हैं ।

क्योंकि चालाकी कभी बुद्धिमानी नहीं हो सकती है ; चालाकी में चाल ( छल) सक्रिय रहता है ।
कपट सक्रिय रहता है और बुद्धि मानी  में निश्छलता का भाव प्रधान है।
आइए अब पद्म पुराण में अहीरों के विषय में क्या लिखा  है देखें---
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पद्म पुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय १६  में गायत्री माता को  नरेन्द्र सैन आभीर की कन्या 'गायत्री' के रूप में वर्णित किया गया है ।
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" स्त्रियो दृष्टास्तु यास्त्व ,
      सर्वास्ता: सपरिग्रहा : |
आभीरः कन्या रूपाद्या ,
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      सुनासा चारू लोचना ।७।
न देवी न च गन्धर्वीं ,
नासुरी न च पन्नगी ।
वन चास्ति तादृशी कन्या , 
यादृशी सा वराँगना ।८।
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अर्थात् जब इन्द्र ने पृथ्वी पर जाकर देखा 
तो वे पृथ्वी पर कोई सुन्दर और शुद्ध कन्या न पा सके 
परन्तु एक नरेन्द्र सैन आभीर की कन्या गायत्री को सर्वांग सुन्दर और शुद्ध देखकर  दंग रह गये ।७।

उसके समान सुन्दर  कोई देवी न कोई गन्धर्वी  न सुर असुर की स्त्री और न कोई पन्नगी ही थी।
इन्द्र ने तब  ने उस कन्या गायत्री से पूछा कि तुम कौन हो  ? और कहाँ से आयी हो ? 
और किस की पुत्री हो ।८।

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गोप कन्यां च तां दृष्टवा , गौरवर्ण महाद्युति:।
एवं चिन्ता पराधीन ,यावत् सा गोप कन्यका ।।९ ।।

पद्म पुराण सृष्टि खण्ड अध्याय १६ १८२ श्लोक में 
इन्द्र ने कहा कि तुम बड़ा रूप वती हो , गौरवर्ण वाली महाद्युति से युक्त हो  इस प्रकार की गौर वर्ण महातेजस्वी कन्या को देखकर इन्द्र भी चकित रह गया   कि यह गोप कन्या इतनी सुन्दर है ।

अध्याय १७ के ४८३ में प्रभु ने कहा कि यह गोप कन्या पराधीन चिन्ता से व्याकुल है ।९।

देवी चैव महाभागा , गायत्री नामत: प्रभु ।
गान्धर्वेण विवाहेन ,विकल्प मा कथाश्चिरम्।९।

१८४ श्लोक में विष्णु ने ब्रह्मा जी से कहा कि हे प्रभो इस कन्या का नाम गायत्री है ।

अग्निपुराण और नान्दी-उपपुराण आदि में भी गायत्री आभीर कन्या हैं।

आभीरों  गायत्री  आभीर अथवा गोपों की कन्या है ।
 और गोपों को भागवतपुराण तथा महाभारत हरिवंश पुराण आदि मे देवताओं का अवतार बताया गया है ।
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" अंशेन त्वं पृथिव्या वै ,प्राप्य जन्म यदो:कुले ।
भार्याभ्याँश संयुतस्तत्र ,गोपालत्वं करिष्यसि ।१४।
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वस्तुत आभीर और गोप शब्द परस्पर पर्याय वाची हैं 
पद्म पुराण में पहले आभीर- कन्या शब्द आया है फिर गोप -कन्या भी गायत्री के लिए ..
तथा अग्नि पुराण मे भी आभीरों (गोपों) की कन्या गायत्री का है ।
आभीरा स्तच्च कुर्वन्ति तत् किमेतत्त्वया कृतम्
अवश्यं यदि ते कार्यं भार्यया परया मखे  ४०

एतत्पुनर्महादुःखं यदाभीरा विगर्दिता
वंशे वनचराणां च स्ववोडा बहुभर्तृका  ।५४।
आभीरीति सपत्नीति प्रोक्तवंत्यः हर्षिताः

इति श्रीवह्निपुराणे नांदीमुखोत्पत्तौ ब्रह्मयज्ञ समारंभे प्रथमोदिवसो नाम षोडशोऽध्यायः संपूर्णः
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ऋग्वेद भारतीय संस्कृति में ही नहीं अपितु विश्व- संस्कृतियों में प्राचीनत्तम है । 
अर्थात् ई०पू० २५०० से १५००के काल तक--
इसी ऋग्वेद में बहुतायत से यदु और तुर्वसु का साथ साथ वर्णन हुआ है । 

वह भी दास अथवा असुर रूप में 
दास शब्द का वैदिक ऋचाओं में अर्थ आर्यों के प्रतिद्वन्द्वी असुरों से ही है ।

परन्तु ये दास अपने पराक्रम बुद्धि कौशल से सम्माननीय ही रहे हैं ।
ऋग्वेद के दशम् मण्डल के ६२वें सूक्त की १० वीं ऋचा में यदु और तुर्वसु को स्पष्टत: दास के रूप में सम्बोधित किया गया है।  वह भी गोपों को रूप में 
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     " उत् दासा परिविषे स्मद्दिष्टी ।
     " गोपरीणसा यदुस्तुर्वश्च च मामहे ।। 
(ऋग्वेद १०/६२/१०)
यदु और तुर्वसु नामक दौनो दास जो गायों से घिरे हुए हैं 
हम उन सौभाग्य शाली दौनों दासों की प्रशंसा करते हैं ।
यहाँ पर गोप शब्द स्पष्टत: है। 
गो-पालक ही गोप होते हैं 
ऋग्वेद के प्राय: ऋचाओं में यदु और तुर्वसु का वर्णन
नकारात्मक रूप में हुआ है । 
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प्रियास इत् ते मघवन् अभीष्टौ 
        नरो मदेम शरणे सखाय:।
नि तुर्वशं नि यादवं शिशीहि 
        अतिथिग्वाय शंस्यं करिष्यन् ।।
(ऋग्वेद ७/१९/८ ) में भी यही ऋचा
अथर्ववेद में भी (काण्ड २० /अध्याय ५/ सूक्त ३७/ ऋचा ७)
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हे इन्द्र !  हम तुम्हारे मित्र रूप यजमान 
अपने घर में प्रसन्नता से रहें; तथा
तुम अतिथिगु को सुख प्रदान करो ।
और तुम तुर्वसु और यादवों को क्षीण करने वाले बनो। अर्थात् उन्हें परास्त करने वाले बनो ! 
(ऋग्वेद ७/१९/८)

ऋग्वेद में भी  यथावत यही ऋचा है ; इसका अर्थ भी देखें :- हे ! इन्द्र तुम अतिथि की सेवा करने वाले सुदास को सुखी करो ।
और तुर्वसु और यदु को हमारे अधीन करो ।
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और भी देखें यदु और तुर्वसु के प्रति पुरोहितों की दुर्भावना अर्वाचीन नहीं अपितु प्राचीनत्तम भी है ।...
देखें---

अया वीति परिस्रव यस्त इन्दो मदेष्वा ।
अवाहन् नवतीर्नव ।१।

पुर: सद्य इत्थाधिये दिवोदासाय ,
शम्बरं अध त्यं तुर्वशुं यदुम् ।२।

(ऋग्वेद ७/९/६१/ की ऋचा १-२)
हे  सोम ! तुम्हारे किस रस ने दासों के निन्यानवे पुरों अर्थात् नगरों) को तोड़ा था ।
उसी रस से युक्त होकर तुम  इन्द्र के पीने के लिए प्रवाहित हो ओ। १।
शम्बर के नगरों को तोड़ने वाले  ! सोम रस ने ही  तुर्वसु की सन्तान तुर्को तथा यदु की सन्तान यादवों  (यहूदीयों ) को  शासन (वश) में किया ।
यदु को ही ईरानी पुरातन कथाओं में यहुदह् कहा
जो ईरानी तथा बैबीलॉनियन संस्कृतियों से सम्बद्ध साम के वंशज- असीरियन जन-जाति के सहवर्ती यहूदी थे।
सुमेरियन मिथकों में उदु नाम यदु के लिए है ।

असुर तथा यहूदी दौनो साम के वंशज- हैं  
भारतीय पुराणों में साम के स्थान पर सोम हो गया ।
यादवों से घृणा चिर-प्रचीन है  देखें--और भी
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सत्यं तत् तुर्वशे यदौ विदानो अह्नवाय्यम् ।
व्यानट् तुर्वशे शमि । (ऋग्वेद ८/४६/२७)
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हे इन्द्र! तुमने यादवों के प्रचण्ड कर्मों  को सत्य (अस्तित्व) में मान कर संग्राम में अह्नवाय्यम् को प्राप्त कर डाला ।
अर्थात् उनका हनन कर डाला ।
अह्नवाय्य :- ह्नु--बा० आय्य न० त० ।
निह्नवाकर्त्तरि ।
“सत्यं तत्तुर्वशे यदौ विदानो अह्नवाय्यम्” ऋ० ८, ४५, २७ अथर्ववेद तथा ऋग्वेद में यही ऋचांश बहुतायत से है । 
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किम् अंगत्वा मघवन् भोजं आहु: शिशीहि मा शिशयं 
त्वां श्रृणोमि ।।
अथर्ववेद का० २०/७/ ८९/३/
हे इन्द्र तुम भोग करने वाले हो ।
तुम शत्रु को क्षीण करने वाले हो । 
तुम मुझे क्षीण न करो ।
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यदु को दास अथवा असुर कहना सिद्ध करता है कि ये असीरियन जन-जाति से सम्बद्ध सेमेटिक यहूदी यों के पूर्वज यहुदह् ही थे ।
यद्यपि यदु और यहुदह् शब्द की व्युत्पत्तियाँ समान है ।
अर्थात् यज्ञ अथवा स्तुति से सम्बद्ध व्यक्ति ।

यहूदीयों का सम्बन्ध ईरान तथा बेबीलोन से भी रहा है ।
ईरानी असुर संस्कृति में  दाहे शब्द दाहिस्तान के सेमेटिक मूल के व्यक्तियों का वाचक है।
यदु एेसे स्थान पर रहते थे।जहाँ ऊँटो का बाहुल्य था 
ऊँट उष्ण स्थान पर रहने वाला पशु है ।
यह स्था (उष + ष्ट्रन् किच्च ) 
ऊषरे तिष्ठति इति उष्ट्र (ऊषर अर्थात् मरुस्थल मे रहने से ऊँट संज्ञा )।
(ऊँट) प्रसिद्धे पशुभेदे स्त्रियां जातित्त्वात् ङीष् । “हस्तिगोऽश्वोष्ट्रदमकोनक्षत्रैर्यश्च जीवति” “नाधीयीताश्वमारूढ़ो न रथं न च हस्तिनम्
देखें---ऋग्वेद में 
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शतमहं तिरिन्दरे सहस्रं वर्शावा ददे ।
राधांसि यादवानाम् 
त्रीणि शतान्यर्वतां सहस्रा दश गोनाम् ददुष्पज्राय साम्ने ४६। 
उदानट् ककुहो दिवम् उष्ट्रञ्चतुर्युजो ददत् ।
श्रवसा याद्वं जनम् ।४८।१७।

यदु वंशीयों में परशु के पुत्र तिरिन्दर से सहस्र संख्यक धन मैने प्राप्त किया !
ऋग्वेद ८/६/४६
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यह स्थान इज़राएल अथवा फलस्तीन ही है । 
ब्राह्मणों का आगमन यूरोप स्वीडन से मैसॉपोटमिया सुमेरो-फोनियन के सम्पर्क में रहते हुए हुआ है ।

सुमेरियन पुरातन कथाओं में (बरमन) /बरम (Baram) पुरोहितों को कहते है । 
ईरानी मे बिरहमन तथा जर्मनिक जन-जातियाँ में ब्रेमन ब्रामर अथवा ब्रेख्मन है । 
जो ब्राह्मण शब्द का तद्भव है।
पुष्य-मित्र सुंग के अनुयायी ब्राह्मणों ने अहीरों( यादवों से सदीयों से घृणा की है )उन्हें ज्ञान से वञ्चित किया और उनके इतिहास को विकृत किया और उन्हें दासता की जञ्जीरों में बाँधने की कोशिश भी की परन्तु अहीरों ने दास (गुलाम) न बन कर दस्यु बनना स्वीकार किया ।
"यह समग्र शोध श्रृंखला यादव योगेश कुमार''रोहि'के द्वारा अनुसन्धानित नवीनत्तम तथ्य है "
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ईरानी भाषा में दस्यु तथा दास शब्द क्रमश दह्यु तथा दाहे के रूप में हैं ।
ऋग्वेद के दशम् मण्डल के ६२वें सूक्त की १० वीं ऋचा में यदु और तुर्वसु को स्पष्टत: दास के रूप में सम्बोधित किया गया है।
उत् दासा परिविषे स्मद्दिष्टी ।
गोपरीणसा यदुस्तुर्वश्च च मामहे ।। 
(ऋग्वेद १०/६२/१०)
यदु और तुर्वसु नामक दौनो दास जो गायों से घिरे हुए हैं 
हम उन सौभाग्य शाली दौनों दासों की प्रशंसा करते हैं ।
यहाँ पर गोप शब्द स्पष्टत: है ।

🐂जो अहीरों का वाचक है ।
अमरकोश में जो गुप्त काल की रचना है । उसमें अहीरों के अन्य नाम-  पर्याय वाची रूप में वर्णित हैं।
आभीर पुल्लिंग विशेषण संज्ञा
गोपालः 
समानार्थक: १-गोपाल,२-गोसङ्ख्य,३-गोधुक्,४-आभीर,५-वल्लव,६-गोविन्द,७-गोप 
(2।9।57।2।5 अमरकोशः)
कामं प्रकामं पर्याप्तं निकामेष्टं यथेप्सितम्. गोपे गोपालगोसंख्यगोधुगाभीरवल्लवाः॥ 
पत्नी : आभीरी 
सेवक : गोपग्रामः 
वृत्ति : गौः 
गवां-स्वामिः गायों का स्वामी ।
कुछ लोग कहते हैं कि गोप अलग होते हैं यादवों से 
तो ये भी भ्रमात्मक जानकारी है।
महाभारत का खिल-भाग हरिवंश पुराण स्पष्टत: गोपों को यादव कहता है ।
देखें--- 
" जित्वा गोपाल दायादं गत्वा  यादवा कान्बहूनन्।
एष न: प्रथम:  कल्पो जेष्याम् इति यादवान् ।२७।

अर्थात् हंस नाम का एक राजा कहता है --कृष्ण के सन्देश वाहक सात्यकि से -- मैं प्रतिज्ञा करता हूँ ।कि इस कृष्ण गोप को उसके सहायकों सहित बाँध कर यादवों के सम्पूर्ण ऐश्वर्य को जीत लुँगा ।२७।
हरिवंश पुराण " सात्यकि का हंस के समक्ष भाषण" नामक ७८वाँ अध्याय पृष्ठ संख्या ४०४ ( ख्वाजा कुतुब वेद नगर बरेली संस्करण)
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और यदि पुराणों की बात करें; तो महाभारत का खिल-भाग हरिवंश पुराण में वसुदेव को गोप रूप में वर्णित किया गया है । 
यह तथ्य पूर्व में वर्णित किया गया है ।
पितामह ब्रह्मा की योजना नामक ३२वाँ अध्याय पृष्ठ संख्या २३० अनुवादक पं० श्रीराम शर्मा आचार्य ख्वाजा कुतुब वेद नगर बरेली संस्करण)
अब वसुदेव को गोप कहा यह देखें--- नीचे 
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एक समय महात्मा वरुण के पास कुछ यज्ञ- काल के लिए दूध देने योग्य कुछ योग्य गायें थी ।
एक वार प्रजापति भगवान् कश्यप उन गायों को महात्मा वरुण से माँग कर ले गये । 

तो कश्यप की भार्याओं अदिति और सुरभि ने गायें वरुण को लोटाने में अनिच्छा प्रकट की ।१०-११।
तब ब्रह्मा जी ने विष्णु से कहा कि तब एक वार वरुण मेरे पास आकर तथा मुझे प्रणाम करके बोले भगवन् ! मेरी समस्त गायें  मेरे पिता भगवान् कश्यप ने ले ली हैं ।यद्यपि उनका कार्य सम्पन्न हो चुका है । 
किन्तु उन्होंने मेरी गायें नहीं लौटायीं हैं ।
और अपनी दौनों पत्नीयाें अदिति और सुरभि का समर्थन कर रहे हैं ।
हे पितामह ब्रह्मा चाहें कोई स्वामी हो , या गुरू हो अथवा कोई भी क्यों न हो ।
सभी को निर्धारित सीमा का उल्लंघन कने पर आप दण्डित अवश्य करते हो !
आपके अतिरिक्त मेरा कोई सहायक नहीं है ।क्यों कि आप ही मेरे अत्यन्त हितैषी हो । 
यदि इस जगत् में अपराधी अपने अपराध के लिए नियमित रूप से दण्डित न हो  ! तो इस समस्त संसार में अव्यवस्था उत्पन्न होकर संसार का विनाश हो जाएग तथा इसकी मर्यादा-भंग  हो जाएगी ।१६-१७। 
हे ब्रह्मन् इस सन्दर्भ में और कुछ नहीं  कहना चाहता हूँ , केवल अपनी गायें वापस चाहता हूँ।
तथा संस्कृत में कुछ विशेष तथ्य देखें---
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"इति अम्बुपतिना प्रोक्तो वरुणेनाहमच्युत ।
गावां कारणत्वज्ञ:कश्यपे शापमुत्सृजन् ।२१
येनांशेन हृता गाव: कश्यपेन महर्षिणा ।
स तेन अंशेन जगतीं गत्वा गोपत्वमेष्यति।२२
द्या च सा सुरभिर्नाम अदितिश्च सुरारिण: 
ते८प्यमे तस्य भार्ये वै तेनैव सह यास्यत:।।२३
ताभ्यां च सह गोपत्वे कश्यपो भुवि संस्यते।
स तस्य कश्यस्यांशस्तेजसा कश्यपोपम: ।२४
वसुदेव इति ख्यातो गोषु तिष्ठति भूतले ।
गिरिगोवर्धनो नाम मथुरायास्त्वदूरत: ।२५।
तत्रासौ गौषु निरत: कंसस्य कर दायक:।
तस्य भार्याद्वयं जातमदिति सुरभिश्च ते ।२६।
देवकी रोहिणी देवी चादितिर्देवकी त्यभृत् ।२७।
सतेनांशेन जगतीं गत्वा गोपत्वं एष्यति।
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अनुवादित रूप :----हे विष्णु ! महात्मा वरुण के ऐसे वचनों को सुनकर तथा इस सन्दर्भ में समस्त ज्ञान प्राप्त करके भगवान ब्रह्मा ने कश्यप को शाप दे दिया। 
तथा कहा 
।२१। कि कश्यप ने अपने जिस तेज से  प्रभावित होकरउन गायों का अपहरण किया ।
उस पाप के प्रभाव वश होकर भूमण्डल पर आहीरों (गोपों)का जन्म धारण करें ।२२। 
तथा दौनों देव माता अदिति और सुरभि उनकी पत्नीयाें के रूप में पृथ्वी पर उनके साथ जन्म धारण करेंगी ।२३। इस पृथ्वी पर अहीरों ( ग्वालों ) का जन्म धारण कर महर्षि कश्यप दौनों पत्नीयाें अदिति और सुरभि सहित आनन्द पूर्वक जीवन यापन करते रहेंगे ।
हे राजन् वही कश्यप वर्तमान समय में कश्यप के तेज स्वरूप वसुदेव गोप के नाम से प्रसिद्ध होकर पृथ्वी पर गायों की सेना करते हुए जीवन यापन करते हैं।
मथुरा के ही समीप गोवर्धन पर्वत है ।
उसी पर पापा कंस के अधीन होकर गोकुल पर राजंय कर रहे हैं।
कश्यप की दौनों पत्नीयाें अदिति और सुरभि ही क्रमश: देवकी और रोहिणी के नाम से अवतीर्ण हुई हैं ।२४-२७।
(उद्धृत सन्दर्भ )
पितामह ब्रह्मा की योजना नामक ३२वाँ अध्याय पृष्ट संख्या २३० अनुवादक पं० श्रीराम शर्मा आचार्य    " ख्वाजा कुतुब वेद नगर बरेली संस्करण)
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यह तथ्य भी प्रमाणित ही है ; कि ऋग्वेद का रचना काल ई०पू० १५०० के समकक्ष है । ऋग्वेद में कृष्ण को इन्द्र से युद्ध करने एक अदेव ( असुर) के रूप में वर्णित किया गया है। जो यमुना नदी ( अंशुमती नदी) के तट पर गोवर्धन पर्वत की उपत्यका में कहता है ।
अर्थात्   ऋग्वेद के अष्टम् मण्डल के सूक्त संख्या ९६ के श्लोक 
१३, १४,१५, पर असुर अथवा दास कृष्ण का युद्ध इन्द्र से हुआ है ।"
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" आवत् तमिन्द्र शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त।
द्रप्सम पश्यं विषुणे चरन्तम् उपह्वरे नद्यो अंशुमत्या: न भो न कृष्णं अवतस्थि वांसम् इष्यामि।।
वो वृषणो युध्य ताजौ ।।१४।।

अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थे८धारयत् तन्वं तित्विषाण: विशो अदेवीरभ्या (अदेव ईरभ्यां) चरन्तीर्बृहस्पतिना
युज इन्द्र: ससाहे ।। १५।।
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अर्थात् कृष्ण नामक असुर अंशुमती अर्थात्  यमुना  नदी के तटों पर दश हजार गोपों के साथ निवास करता है ,उसे अपनी बुद्धि-बल से इन्द्र ने खोज लिया है ! 
और उसकी सम्पूर्ण सेना (गोप मण्डली) को इन्द्र ने नष्ट कर दिया है ।
आगे इन्द्र कहता है :--कृष्ण को मैंने देख लिया है ,जो  यमुना नदी के एकान्त स्थानों पर घूमता रहता है ।
यहाँ कृष्ण के लिए अदेव विशेषण है अर्थात्  जो देव नहीं है __________________________________________
"कृष्ण के पूर्वज यदु को  वेदों में पहले ही शूद्र घोषित कर दिया " तो कृष्ण भी शूद्र हुए ऋग्वेद में तो कृष्ण को असुर कहा ही है ।
क्योंकि वैदिक सन्दर्भों में जो दास अथवा असुर कहे गये हैं । 
लौकिक संस्कृत में उन्हें शूद्र कहा गया है।
मनु-स्मृति का यह श्लोक  इस तथ्य को प्रमाणित करता  है । 
जो पुष्यमित्र सुंग ई०पू०१८४ के समकालिक निर्मित कृति  है ।
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शर्मा देवश्च विप्रस्य वर्मा त्राता भूभुज:
भूतिर्दत्तश्च वैश्यस्य दास शूद्रस्य कारयेत् ।।

अर्थात् विप्र (ब्राह्मण) के वाचक शब्द शर्मा तथा देव हों,
तथा क्षत्रिय के वाचक वर्मा तथा त्राता हों । और वैश्य के वाचक भूति अथवा दत्त हों तथा दास शूद्र का वाचक हो ।

हरिवंश पुराण में भी इन्द्र ने कृष्ण को शूद्र कह कर सम्बोधित किया है देखें---प्रमाण --

" तं वीक्ष्यं बालं  महता तेजसा दीप्तमव्ययम् ।
गोप वेषधरं विष्णु  प्रीति लेभे पुरन्दर: ।४।

त साम्युजलद श्याम कृष्ण श्रीवत्स लक्षणम् ।
पर्याप्तनयन: शूद्र सर्व नेत्रैर् उदक्षत् ।५।

दृष्टवा च एनं श्रिया जुष्टं मर्त्यलोके८मरोपमम्।
शूपविष्टं शिला पृष्ठे शक्र स ब्रीडितो८भवत् ।६।

अर्थात्:- जल युक्त मेघ के समान काले शूद्र कृष्ण को इन्द्र अपने हजारों नेत्रों से देखा जो हृदय पर श्रीवत्स लक्षणम् धारण किये हुए था ।४-५। पृथ्वी के एक शिला खण्ड पर विराजमान उस तेजस्वी बालकी शोभा देकर इन्द्र बड़ा लज्जित हुआ ।६।

हरिवंश पुराण "श्रीकृष्ण का गोविन्द पद पर अभिषेक नामक ४९वाँ अध्याय पृष्ठ संख्या ३१४ सम्पादक पं० श्री राम शर्मा आचार्य (  ख्वाजा कुतुब वेद नगर बरेली संस्करण)
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कृष्ण का सम्बन्ध मधु नामक असुर से स्थापित कर दिया है ।
और यादव और माधव पर्याय रूप में हैं ।

यादवों में मधु एक प्रतापी शासक माना जाता है । यह इक्ष्वाकु वंशी राजा दिलीप द्वितीय का अथवा उसके उत्तराधिकारी दीर्घबाहु का समकालीन रहा है , मधु के गुजरात से लेकर यमुना तट तक के स्वामी होने का वर्णन है ।  प्राय: मधु को `असुर`, दैत्य, दानव आदि कहा गया है ।

साथ ही यह भी है कि मधु बड़ा धार्मिक एवं न्यायप्रिय शासक था । मधु की स्त्री का नाम कुंभीनसी था, जिससे लवण का जन्म हुआ ।
लवण बड़ा होने पर लोगों को अनेक प्रकार से कष्ट पहुँचाने लगा । 
लवण को अत्याचारी राजा कहा गया है ।

 इस पर दु:खी होकर कुछ ऋषियों ने अयोध्या जाकर श्री राम से सब बातें बताई और उनसे प्रार्थना की कि लवण के अत्याचारों से लोगों को शीघ्र छुटकारा दिलाया जाय ।

 अन्त में श्रीराम ने शत्रुघ्न को मधुपुर जाने की आज्ञा दी  लवण को मार कर शत्रुघ्न ने उसके प्रदेश पर अपना अधिकार किया ।
पुराणों तथा वाल्मीकि रामायण के अनुसार मधु के नाम पर मधुपुर या मधुपुरी नगर यमुना तट पर बसाया गया ।

यद्यपि अवान्तर काल में पुष्यमित्र सुंग ई०पू०१८४ के अनुयायी ब्राह्मण समाज ने वाल्मीकि-रामायण में बहुत सी काल्पनिक व विरोधाभासी कथाओं का समायोजन भी कर दिया । अत: रामायण मे राम का कम  मिलाबटराम का अधिक वर्णन है।

फिर वाल्मीकि-रामायण के आधार पर यादवों के प्रति ब्राह्मणों की भावना परिलक्षित होती है ।
वाल्मीकि-रामायण में वर्णन है कि
इसके मथुरा के आसपास का घना वन `मधुवन` कहलाता था ।
मधु को लीला नामक असुर का ज्येष्ठ पुत्र लिखा है और उसे बड़ा धर्मात्मा, बुद्धिमान और परोपकारी राजा कहा गया है । 

मधु ने शिव की तपस्या कर उनसे एक अमोघ त्रिशूल प्राप्त किया ।
निश्चय ही लवण एक शक्तिशाली शासक था ।

किन्तु श्री कृष्ण दत्त वाजपेयी के मतानुसार 'चन्द्रवंश की 61 वीं पीढ़ी में हुआ उक्त 'मधु' तथा लवण-पिता 'मधु' एक ही थे अथवा नही, यह विवादास्पद है ।

परन्तु एक स्थान पर यदु का पुत्र मधु वर्णित है ।जिसने असुर संस्कृति का प्रसार किया । अस्तु !
यद्यपि यदु दो हैं  हर्यश्व पुत्र यदु जो मधुवती के गर्भ से उत्पन्न होते हैं मधु असुर  जिनके नाना हैं ।
परन्तु पुराणों में यह भी बताया गया कि ययाति पुत्र यदु ही योगेश बल से मधुवती के गर्भ में प्रवेश कर गये ।

ऐतिहासिक प्रणाम साक्षी हैं कि यहूदीयों का असीरियन जन-जाति से सेमेटिक होने से सजातीय सम्बन्ध है । 
अत: दौनो सोम अथवा साम वंशी हैं ।

  अत: यादवों से असुरों के जातीय सम्बन्ध हैं ।
 असीरियन जन-जाति को ही भारतीय पुराणों में असुर कहा है ।
जिन्हें भारतीय पुराणों में असुर कहा गया है वह यहूदीयों के सहवर्ती तथा सजातीय असीरियन लोग हैं ।

साम अथवा सोम शब्द हिब्रू एवं संस्कृत भाषा में समान अर्थक हैं ।
जिसके आधार पर सोम वंश की अवधारणा की गयी 
जिसे भारतीय पुराणों में चन्द्र से जोड़ कर काल्पनिक पुट दिया गया है ।
यह समग्र तथ्य यादव योगेश कुमार 'रोहि' के शोध पर आधारित असुरों का मैसॉपोटमिया की पुरातन कथाओं में एक परिचय :- थेसिस ( शोध श्रृंखला) पर आधारित हैं ।

हिन्दू धर्मग्रन्थों में असुर वे लोग हैं जो 'सुर' (देवताओं) से संघर्ष करते हैं। 
धर्मग्रन्थों में उन्हें शक्तिशाली, अतिमानवीय, के रूप में वर्णित किया गया है अर्थात् "असु राति इति असुर: अर्थात् जो प्राण देता है, वह असुर है "।
इस रूप में चित्रित किया गया है।
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'असुर' शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में लगभग (१०५) बार हुआ है।
उसमें ९० स्थानों पर इ सका प्रयोग 'असु युक्त अथवा प्राण -युक्त के अर्थ में किया गया है ।

और केवल १५ स्थलों पर यह 'देवताओं के शत्रु' का वाचक है।
'असुर' का व्युत्पत्ति -लभ्य अर्थ है :-प्राणवंत, प्राणशक्ति संपन्न :-
('असुरिति प्राणनामास्त: शरीरे भवति, निरुक्ति ३.८) 

और इस प्रकार यह वैदिक देवों के एक सामान्य विशेषण के रूप में व्यवहृत किया गया है।
विशेषत: यह शब्द इंद्र, मित्र तथा वरुण के साथ प्रयुक्त होकर उनकी एक विशिष्ट शक्ति का द्योतक है।

इंद्र के तो यह वैयक्तिक बल का सूचक है, परंतु वरुण के साथ प्रयुक्त होकर यह उनके नैतिक बल अथवा शासनबल का स्पष्टत: संकेत करता है।
असुर शब्द इसी उदात्त अर्थ में पारसियों के प्रधान देवता 'अहुरमज़्द' ('असुर: महत् ') के नाम से विद्यमान है।
यह शब्द उस युग की स्मृति दिलाता है जब वैदिक आर्यों तथा ईरानियों (पारसीकों) के पूर्वज एक ही स्थान पर निवास कर एक ही देवता की उपासना में निरत थे।
 अन्तर आर्यों की इन दोनों शाखाओं में किसी अज्ञात विरोध के कारण फूट पड़ी गई।
परन्तु ये सब काल्पनिक उड़ाने हैं ।
क्यों आर्य तो असुरों का वीरता मूलक विशेषण था ।

फलत: वैदिक आर्यों ने 'न सुर: असुर:' यह नवीन व्युत्पत्ति मानकर असुर का प्रयोग दैत्यों के लिए करना आरम्भ किया ।

और उधर ईरानियों ने भी देव शब्द का ('दएव' के रूप में) अपने धर्म के दानवों के लिए प्रयोग करना शुरू किया।

अर्थात् ईरानी आर्यों की भाषा में देव का अर्थ दुष्ट व्यभिचारी,----------
फलत: वैदिक 'वृत्रघ्न' (इंद्र) अवेस्ता में 'वेर्थ्रोघ्न' के रूप में एक विशिष्ट दैत्य का वाचक बन गया तथा ईरानियों का 'असुर' शब्द पिप्रु आदि देवविरोधी दानवों के लिए ऋग्वेद में प्रयुक्त हुआ जिन्हें इंद्र ने अपने वज्र से मार डाला था। 

ईरानी आर्यों ने असुर शब्द पूज्य अर्थ में प्रयुक्त किया है 
(ऋक्. १०।१३८।३-४)। शतपथ ब्राह्मण की मान्यता है कि असुर देवदृष्टि से अपभ्रष्ट भाषा का प्रयोग करते हैं :---
(तेऽसुरा हेलयो हेलय इति कुर्वन्त: पराबभूवु:)। 
अर्थात् वे असुर हे अरय: हे अरय इस प्रकार करते हुए पराजित हो गये ।
विश्व एैतिहासिक सन्दर्भों में असुर मैसॉपोटमिया की संस्कृति में वर्णित असीरियन लोग थे।

जिनकी भाषा में "र" वर्ण का उच्चारण "ल" के रूप में होता है ।
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वाल्मीकि-रामायण में वर्णित किया गया है, कि देवता सुरा पान करने के कारण देव सुर कहलाए ,
और जो सुरा पान नहीं करते वे असुर कहलाते थे  ।
बालकाण्ड सर्ग 45 के 38 वें छन्द में ) 
सुर-असुर की परिभाषा करते हुये लिखा है- 
“सुरा पीने वाले सुर और सुरा नहीं पीने वाले असुर कहे गये l” 
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" सुरा प्रति ग्रहाद् देवा: सुरा इति अभिविश्रुता ।
अप्रति ग्रहणात् तस्या दैतेयाश्चासुरा: स्मृता ।।
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वस्तुत देव अथवा सुर जर्मनिक जन-जातियाँ से सम्बद्ध हैं ।
स्वीडन के स्वीअर (Sviar)लोग ही भारतीय पुराणों में सुर देवों के रूप में सम्बद्ध हैं ।
यूरोपीय संस्कृतियों में सुरा एक सीरप (syrup)
के समान है l
यूरोपीय लोग शराब पीना शुभ और स्वास्थ्य प्रद समझते है ।
यह उनकी संस्कृति के लिए
स्वास्थ्य प्रद परम्परा है ।
कारण वहाँ की शीतित जल-वायु के प्रभाव से बचने के लिए शराब औषधि तुल्य है । 
फ्रॉञ्च भाषा में शराब को सीरप syrup ही कहते हैं ।
अत: वाल्मीकि-रामायण कार ने सुर शब्द की यह अानुमानिक व्युत्पत्ति- की है ।
परन्तु सुर शब्द का विकास जर्मनिक जन-जाति स्वीअर (Sviar) से हुआ है ।
असुर और सुर दौनों शब्दों की व्युत्पत्ति भिन्न भिन्न हुई है 
पतञ्जलि ने अपने 'महाभाष्य' के पस्पशाह्निक में शतपथ के इस वाक्य को उधृत किया है। 
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शबर स्वामी ने 'पिक', 'नेम', 'तामरस' आदि शब्दों को असूरी भाषा का शब्द माना है।
आर्यों के आठ विवाहों में 'आसुर विवाह' का सम्बन्ध असुरों से माना जाता है। 
पुराणों तथा अवान्तर साहित्य में 'असुर' एक स्वर से दैत्यों का ही वाचक माना गया है। 

असुर संस्कृति असीरियन लोगों की संस्कृति थी ।

असीरियन अक्काडियन ,हिब्रू आदि जातियों के आवास वर्तमान ईराक और ईरान के प्राचीनत्तम रूप में थे ।
जिसे यूनानीयों ने मैसॉपोटामिया अर्थात् दजला और फ़रात के मध्य की आवासित सभ्यता माना --
उत्तरीय ध्रव से भू-मध्य रेखीय क्षेत्रों में आगमन काल में आर्यों ने  दीर्घ काल तक असीरियन लोगों से संघर्ष किया प्रणाम स्वरूप बहुत से सांस्कृतिक तत्व ग्रहण किये 
वेदों में अरि शब्द देव वाची है ।और असीरियन भाषा में भी अलि अथवा इलु के रूप में देव वाची ही है ।
देखें--- 
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विश्ववो हि अन्यो अरि: आजगाम ।
मम इदह श्वशुरो न आजगाम ।
जक्षीयाद्धाना उत सोमं पपीयात् स्वाशित पुनरस्तं जगायात् ।।
             (10/28/1 ऋग्वेद )
अर्थात् ऋषि पत्नी कहती है कि सब देवता निश्चय हमारे यज्ञ में आये , परन्तु हमारे श्वशुर  नहीं आये इस यज्ञ में यदि वे आते तो भुने हुए जौ के साथ सोमपान करते ।।10/28/1
यहाँ अरि शब्द घर का वाचक है ।
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तथा अन्यत्र भी ऋग्वेद 8/51/9 -
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यस्यायं  विश्वार्यो दास: शेवधिपा अरि:।
तिरश्चिदर्ये रुशमे पवीरवि तुभ्येत् सो अज्यते रयि:।।
अरि: आर्यों का प्रधान देव था  आर्यों ने स्वयं को अरि पुत्र माना ।
यहाँ अरि शब्द ईश्वर का वाचक है ।

असुर संस्कृति में अरि: शब्द अलि के रूप में परिणति हुआ ।
सुमेरियन और बैबीलॉनियन तथा असीरियन अक्काडियन हिब्रू आदि संस्कृतियों में असुर संस्कृति में अरि: शब्द अलि के रूप में परिणति हुआ । सुमेरियन और बैबीलॉनियन तथा असीरियन अक्काडियन हिब्रू आदि संस्कृतियों में अरि एल (el)
इलु एलॉह elaoh तथा बहुवचन रूप एलोहिम Elohim हो गया । 
अरबों के अल्लाह शब्द का विकास अल् उपसर्ग Prefix के पश्चात् इलाह करने से हुआ है ।

निश्चित रूप से यादव मैसॉपोटमिया की पुरातन संस्कृति में यहुदह् के वंशज यहूदी हैं ।
तात्पर्य यही कि असुर संस्कृति यादव संस्कृति से सम्बद्ध थी ।
असुरों के इतिहास को भारतीय पुराणों में हेय रूप में वर्णित किया गया है ।
बाणासुर की पुत्री उषा का विवाह कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न से पुराणों में वर्णित है । 
बाणासुर तथा लवणासुर ये सभी  असुर संस्कृति के उपासक थे।

लवण ने अपने राज्य को विस्तृत कर लिया । 
इस काम में अपने बहनोई हृर्यश्व से मदद ली होगी । लवण ने राज्य की पूर्वी सीमा गंगा नदी तक बढ़ा ली और राम को कहलवाया कि 'मै तुम्हारे राज्य के निकट के ही राज्य का राजा हूँ ।'
 लवण की चुनौती से स्प्ष्ट था कि लवण की शक्ति बढ़ गई थी । लवण के द्वारा रावण की सराहना तथा राम की निंदा इस बात की सूचक है कि रावण की नीति और कार्य उसे पसंद थे ।

 इससे पता चलता है कि लवण और उसका पिता मधु संभवत: किसी अनार्य शाखा के थे । 
प्राचीन साहित्य में मधु की नगरी मधुपुरी के वर्णनों से ज्ञात होता है कि उस नगरी का स्थापत्य श्रेष्ठ कोटि का था । 
शत्रुघ्न भी उस मनमोहक नगर को देख कर आर्श्चयचकित हो गये । 
वैदिक साहित्य में अनार्यौं के विशाल तथा दृढ़ दुर्गों एव मकानों के वर्णन मिलते हैं ।

 संभवतः लवण-पिता मधु या उनके किसी पूर्वज ने यमुना के तटवर्ती प्रदेश पर अधिकार कर लिया हो । यह अधिकार लवण के समय से समाप्त हो गया । 
मधुवन और मधुपुरी के निवासियों या लवण के अनुयायिओं को शत्रुघ्न ने समाप्त कर दिया होगा ।

 संभवत: उन्होंने मधुपुरी को नष्ट नहीं किया ।
 उन्होंने जंगल को साफ़ करवाया तथा प्राचीन मधुपुरी को एक नये ढंग से आबाद कर उसे सुशोभित किया । 

(प्राचीन पौराणिक उल्लेखों तथा रामायण के वर्णन से यही प्रकट होता है ) रामायण में देवों से वर माँगते हुए शत्रुघ्न कहते हैं- `हे देवतागण, मुझे वर दें कि यह सुन्दर मधुपुरी या मथुरा नगरी, जो ऐसी सुशोभित है मानों देवताओं ने स्वयं बनाई हो, शीघ्र बस जाय ।
` देवताओं ने `एवमस्तु` कहा और मथुरा नगरी बस गई यद्यपि ये कथाऐं काल्पनिक उड़ाने अधिक हैं । 

परन्तु इन व्यक्तित्वों के उपस्थिति के सूचक हैं ।

दास असुर अथवा शूद्र परस्पर पर्याय वाची हैं ।
अहीर प्रमुखतः एक हिन्दू भारतीय जाति समूह है ।
परन्तु कुछ अहीर मुसलमान भी हैं ।

पश्चिमीय पाकिस्तान के सिन्धु प्रान्त में ..
और बौद्ध तथा कुछ सिक्ख भी हैं ,और ईसाई भी ।
अहीर एशिया की सबसे बड़ी जन-जाति है । 

भारत में अहीरों को यादव समुदाय के नाम से भी पहचाना जाता है, तथा अहीर व यादव या राव साहब ये सब के सब  यादवों के ही विशेषण हैं।
हरियाणा में राव शब्द यादवों का विशेषण है।
भारत में दो हजार एक की जन गणना के अनुसार यादव लगभग २०० मिलियन अर्थात् २० करोड़ से अथिक हैं । भारत में पाँच सौ बहत्तर से अधिक गोत्र यादवों में हैं । 
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” यहूदीयों की हिब्रू बाइबिल के सृष्टि-खण्ड नामक अध्याय Genesis 49: 24 पर --- अहीर शब्द को जीवित ईश्वर का वाचक बताया है । 
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The name Abir is one of The titles of the living god for some reason it,s usually translated( for some reason all god,s in Isaiah 1:24 we find four names of The lord in rapid succession as Isaiah Reports " Therefore Adon - YHWH - Saboath and Abir --Israel declares... -------------------------------------- 

Abir (अभीर )---The name reflects protection more than strength although one obviously -- has to be Strong To be any good at protecting still although all modern translations universally translate this name whith ---- Mighty One , it is probably best translated whith  Protector 
... ------------------ ---------------------

यह नाम अबीर किसी जीवित देवता के शीर्षक में से किसी एक कारण से है।
जिसे आमतौर पर अनुवाद किया गया है।
(यशायाह 1:24 में किसी भी कारण से सभी ईश्वर यशायाह के रूप में बहुतायत से उत्तराधिकार में भगवान के चार नाम मिलते हैं) 
"इसलिए अदोन - YHWH यह्व :  सबोथ और अबीर -इजराइल की घोषणा -
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अबीर (अबर) --- नाम ताकत से अधिक सुरक्षा को दर्शाता है ।
यद्यपि एक स्पष्ट रूप से मजबूत होना जरूरी है।
यद्यपि अभी भी सभी आधुनिक अनुवादक सार्वभौमिक रूप से इस नाम का अनुवाद करते हैं। शक्तिशाली (ताकतवर)यह शायद सबसे अच्छा अनुवाद किया है।
--रक्षक ।
हिब्रू बाइबिल में तथा यहूदीयों की परम्पराओं में ईश्वर के पाँच नाम प्रसिद्ध हैं :-(१)-अबीर (२)--अदॉन (३)--सबॉथ (४)--याह्व्ह् तथा (५)--(इलॉही)बाइबल> सशक्त> हिब्रू> 46
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◄ 46. अबीर ►
सशक्त कमान
अबीर: मजबूत
मूल शब्द: אֲבִיר
भाषण का भाग: विशेषण 'पौरुष '
लिप्यान्तरण: अबीर
ध्वन्यात्मक :-वर्तनी: (अ-बियर ')
लघु परिभाषा: एक
संपूर्ण संक्षिप्तता
शब्द उत्पत्ति:-
अबार के समान ही
परिभाषा
बलवान
अनुवाद
शक्तिशाली एक (6)
[אבִיר विशेषण रूप  मजबूत; हमेशा = सशक्त, भगवान के लिए पुराने नाम (कविता में प्रयुक्त अबीर); केवल निर्माण में उत्पत्ति खण्ड(Genesis) 49:24 और उसके बाद से भजन संहिता (132: 2; भजन 132: 5; यशायाह (49:26; )यशायाह 60:16; יִשְׂרָאֵל 'या यशायाह 1:24 (सीए के महत्वपूर्ण टिप्पणी की तुलना करें) -  51 इस निर्माण को बैंक के लिए निर्दिष्ट करता है।

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सशक्त की संपूर्णता
पराक्रमी
'Abar से; शक्तिशाली (भगवान की बात की) - शक्तिशाली (एक)

हिब्रू भाषा में 'अबीर रूप 
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रूप और लिप्यंतरण
אֲבִ֖יר אֲבִ֣יר אֲבִ֥יר אביר לַאֲבִ֥יר לאביר 'ר ·יי' רḇייר एक वैर ला'एरीर ला · 'ḇ ḇîr laaVir
'Ă ḇîr - 4 ओक
ला '' ırîr - 2 प्रा
उत्पत्ति खण्ड बाइबिल:-- (49:24)
יָדָ֑יו מִידֵי֙ אֲבִ֣יר יַעֲקֹ֔ב מִשָּׁ֥ם: याकूब के शक्तिशाली व्यक्ति के हाथों से
: याकूब के शक्तिशाली [परमेश्वर] (अबीर )के हाथों से;
: हाथ याकूब के पराक्रमी हाथ वहाँ
भजन 132: 2
और याकूब के पराक्रमी को  याकूब के पराक्रमी [ईश्वर] को वचन दिया;
भगवान के लिए और याकूब के शक्तिशाली करने के लिए कसम खाई

भजन 132: 5
: लेट्वाः लिबियूः יהו֑֑֑ מִ֝שְּנ֗וֹת לַאֲבִ֥יר יַעֲקֹֽב: याकूब के पराक्रमी एक के लिए एक आवास स्थान
केजेवी: याकूब के शक्तिशाली [परमेश्वर] के लिए एक निवासस्थान
: भगवान एक याकूब की ताकतवर(अबीर) निवास

यशायाह 1:24
: יְהוָ֣ה צְבָא֔וֹת אֲבִ֖יר יִשְׂרָאֵ֑ל ה֚וֹי
: मेजबान के, इज़राइल के पराक्रमी,
केजेवी: सेनाओं के, इस्राएल के पराक्रमी,
: सेनाओं के सर्वशक्तिमान इस्राएल के शक्तिशाली अहा

यशायाह 49:26
: מֽוֹשִׁיעֵ֔ךְ וְגֹאֲלֵ֖ךְ אֲבִ֥יר יַעֲקֹֽב: ס
: और अपने उद्धारकर्ता, याकूब के शक्तिशाली व्यक्ति
: और तेरा उद्धारकर्ता, याकूब के शक्तिशाली व्यक्ति।
: अपने उद्धारकर्ता और अपने उद्धारक याकूब की ताकतवर हूँ

यशायाह 60:16
: מֽוֹשִׁיעֵ֔ךְ וְגֹאֲלֵ֖ךְ אֲבִ֥יר יַעֲקֹֽב:
और अपने उद्धारकर्ता, याकूब के शक्तिशाली व्यक्ति
: और तेरा उद्धारकर्ता, याकूब के शक्तिशाली व्यक्ति।
अपने उद्धारकर्ता और अपने उद्धारक याकूब की ताकतवर हूँ
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 हिब्रू भाषा मे अबीर (अभीर) शब्द के बहुत ऊँचे अर्थ हैं- अर्थात् जो रक्षक है, सर्व-शक्ति सम्पन्न है इज़राएल देश में याकूब अथवा इज़राएल-- ( एल का सामना करने वाला )को अबीर का विशेषण दिया था । इज़राएल एक फ़रिश्ता है जो भारतीय पुराणों में यम के समान है ।
जिसे भारतीय पुराणों में ययाति कहा है ।
ययाति यम का भी विशेषण है ।
भारतीय पुराणों में विशेषतः महाभारत तथा श्रीमद्भागवत् पुराण में वसुदेव और नन्द दौनों को परस्पर सजातीय वृष्णि वंशी यादव बताया है ।
यादवों का सम्बन्ध पणियों ( Phoenician)
सेमेटिक जन-जाति से भी है ।

इनकी भाषा यहूदीयों तथा असीरियन लोगों के समान ही है ।
भारतीय इतिहास कारों ने इन्हें वणिक अथवा वणिक कहा है ।
पणि कौन थे? संक्षेप में इस तथ्य पर भी विश्लेषण हो जाय ।
राथ के मतानुसार यह शब्द 'पण्=विनिमय' से बना है तथा पणि वह व्यक्ति है, जो कि बिना बदले के कुछ नहीं दे सकता।

इस मत का समर्थन जिमर तथा लुड्विग ने भी किया है।
लड्विग ने इस पार्थक्य के कारण पणिओं को यहाँ का आदिवासी व्यवसायी माना है।
ये अपने सार्थ अरब, पश्चिमी एशिया तथा उत्तरी अफ़्रीका में भेजते थे और अपने धन की रक्षा के लिए बराबर युद्ध करने को प्रस्तुत रहते थे।
दस्यु अथवा दास शब्द के प्रसंगों के आधार पर उपर्युक्त मत पुष्ट होता है।
किन्तु आवश्यक है कि आर्यों के देवों की पूजा न करने वाले और पुरोहितों को दक्षिणा न देने वाले इन पणियों को धर्मनिरपेक्ष, लोभी और हिंसक व्यापारी कहा जा सकता है।

ये आर्य और अनार्य दोनों हो सकते हैं।
हिलब्रैण्ट ने इन्हें स्ट्राबो द्वारा उल्लिखित पर्नियन जाति के तुल्य माना है।
जिसका सम्बन्ध दहा (दास) लोगों से था।
फ़िनिशिया इनका पश्चिमी उपनिवेश था, जहाँ ये भारत से व्यापारिक वस्तुएँ, लिपि, कला आदि ले गए।


मिश्र में रहने वाले ईसाई कॉप्ट Copt यहूदीयों की ही शाखा से सम्बद्ध हैं ।
Copts are one of the oldest Christian communities in the Middle East. Although integrated in the larger Egyptian nation, the Copts have survived as a distinct religious community forming today between 10 and 20 percent of the native population. 

They pride themselves on the apostolicity of the Egyptian Church whose founder was the first in an unbroken chain of patriots  
_________________________________________
कॉप्ट (Copt)
मध्य पूर्व में सबसे पुराना ईसाई समुदायों में से एक है | 

यद्यपि बड़े मिस्र के राष्ट्र में एकीकृत, कॉप्ट्स आज एक अलग धार्मिक समुदाय के रूप में बचे हैं,
जो आज की जनसंख्या के 10 से 20 प्रतिशत के बीच हैं।
वे खुद को मिस्र के चर्च की धर्मोपयो गीता पर गर्व करते थे । 
जिनके संस्थापक देशभक्तों की एक अटूट श्रृंखला में सबसे पहले थे
जो भारतीय इतिहास में गुप्त अथवा गुप्ता के रूप में
देवमीढ़ के दो रानीयाँ मादिष्या तथा वैश्यवर्णा नाम की थी ।

 मादिषा के शूरसेन और वैश्यवर्णा के पर्जन्य हुए । शूरसेन के वसुदेव तथा पर्जन्य के नन्द हुए नन्द नौ भाई थे ।
__________________________________ धरानन्द ,ध्रुवनन्द ,उपनन्द ,अभिनन्द सुनन्द ________________________________ 

कर्मानन्द धर्मानन्द नन्द तथा वल्लभ ।
 हरिवंश पुराण में वसुदेव को भी गोप कहकर सम्बोधित किया है । _________________________________________

 "इति अम्बुपतिना प्रोक्तो वरुणेन अहमच्युत ! गावां कारणत्वज्ञ सतेनांशेन जगतीं गत्वा गोपत्वं एष्यति !! 
अर्थात् हे विष्णु वरुण के द्वारा कश्यप को व्रज में गोप (आभीर) का जन्म धारण करने का शाप दिया गया .. क्योंकि उन्होंने वरुण की गायों का अपहरण किया था.. ________________________________________

_ हरिवंश पुराण--(ब्रह्मा की योजना नामक अध्याय) ख्वाजा कुतुब वेद नगर बरेली संस्करण पृष्ठ संख्या १३३---- और गोप का अर्थ आभीर होता है ।

“आभीरवामनयनाहृतमानसाय दत्तं मनो यदुपते ! तदिदं गृहाण” उद्भटः स च सङ्कीर्ण्णवर्ण्णः। 
यहाँ आभीर और यदुपति परस्पर पर्याय वाची हैं ।
और आपको हम यह भी बता दे कि भारत की प्राय: सभी शूद्र तथा पिछड़े तबके (वर्ग-) की जन-जातियाँ 
यदु की सन्ताने हैं । 
जिनमें जादव जो शिवाजी महाराज के वंशज महारों का एक कब़ीलाई विशेषण है ।
सन् १९२२ में इसी मराठी जादव( जाधव) शब्द से 
पञ्जाबी प्रभाव से जाटव शब्द का विकास हुआ।
यादवों की शाखा जाट ,गुर्जर ,(गौश्चर) गो चराने वाला होने से तथा लगभग ५७२ गोत्र यादवों के हैं ।
शिक्षा से ये लोग वञ्चित किए गये इस कारण इनमें संस्कार हीनता तथा अाराधिक प्रवृत्तियों का भी विकास हुआ । 

ब्राह्मण जानते हैं कि ज्ञान ही संसार की सबसे बड़ी शक्ति है ।
यदि ये ज्ञान सम्पन्न हो गये तो हमारी गुलामी कौन करेगा ? अतः ब्राह्मणों ने 
स्त्रीशूद्रौ नाधीयताम् वेद वाक्य के रूप में विधान पारित कर दिया ।
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यादवों का एक विशेषण है घोष ---

    आयो घोष बड़ो व्यापारी |
लादि खेप गुन-ज्ञान जोग की, ब्रज में आन उतारी ||
फाटक दैकर हाटक मांगत, भोरै निपट सुधारी 
धुर ही तें खोटो खायो है, लए  फिरत सिर भारी ||
इनके कहे कौन डहकावै ,ऐसी कौन अजानी
अपनों दूध छाँड़ि को पीवै, खार कूप को पानी ||
ऊधो जाहु सबार यहाँ ते, बेगि गहरु जनि लावौ |
मुंह मांग्यो पैहो सूरज प्रभु, साहुहि आनि दिखावौ ||

वह उद्धव घोष की शुष्क ज्ञान चर्चा को अपने लिए निष्प्रयोज्य बताते हुए उनकी व्यापारिक-सम योजना का विरोध करते हुए कहती हैं –
                                      
घोषम्, क्ली, (घोषति शब्दायते इति । 
घुष विशब्दने + अच् ) कांस्यम् । 
इति राजनिर्घण्टः ॥ घोषः, पुं, (घोषन्ति शब्दायन्ते गावो यस्मिन् ।
घुषिर् विशब्दने + “हलश्च ।” ३ । ३ । १२१ । इति घञ् ।) आभीरपल्ली । (यथा, रघुः । १ । ४५ । “हैयङ्गवीनमादाय घोषवृद्धानुपस्थितान् । 
नामधेयानि पृच्छन्तौ वन्यानां मार्गशाखिनाम् ॥
” घोषति शब्दायते इति । घुष + कर्त्तरि अच् ।) 
गोपालः । (घुष + भावे घञ् ) ध्वनिः ।
(यथा, मनुः । ७ । २२५ । 
“तत्र भुक्त्वा पुनः किञ्चित् तूर्य्यघोषैः प्रहर्षितः । संविशेत्तु यथाकालमुत्तिष्ठेच्च गतक्लमः ॥”) घोषकलता । कांस्यम् । मेघशब्दः । इति मेदिनी । । ११ ॥ मशकः । इति त्रिकाण्ड- शेषः ॥
(वर्णोच्चारणवाह्यप्रयत्नविशेषः । यदुक्तं शिक्षायाम् । २० । “संवृतं मात्रिकं ज्ञेयं विवृतं तु द्बिमात्रिकम् । घोषा वा संवृताः सर्व्वे अघोषा विवृताः स्मृताः ॥”) कायस्थादीनां पद्धतिविशेषः । (यथा, कुलदीपि- कायाम् । “वसुवंशे च मुख्यौ द्वौ नाम्ना लक्षणपूषणौ । घोषेषु च समाख्यातश्चतुर्भुजमहाकृती ॥”) अमरकोशः

व्रज में गोप अथवा आभीर घोष कहलाते हैं ।
संज्ञा स्त्री०[संघोष + कुमारी] गोपबालिका ।
गोपिका । उ०—प्रात समै हरि को जस गावत उठि घर घर सब घोषकुमारी ।—(भारतेंदु ग्रन्थावली भा० २, पृ० ६०६ )
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संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० आभीरी] १. अहीर । ग्वाल । गोप — आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघ रुप जे । (राम चरित मानस । ७ । १३० )
तुलसी दास ने अहीरों का वर्णन भी विरोधाभासी रूप में किया है ।
कभी अहीरों को निर्मल मन बताते हैं तो कभी अघ ( पाप ) रूप देखें -
"नोइ निवृत्ति पात्र बिस्वासा ।
निर्मल मन अहीर निज दासा- 
(राम चरित मानस, ७ ।११७ )
विशेष—ऐतिहासिकों के अनुसार भारत की एक वीर और प्रसिद्ध यादव जाति जो कुछ लोगों के मत से बाहर से आई थी ।
इस जातिवालों का विशेष ऐतिहसिक महत्व माना जाता है ।
कहा जाता है कि उनकी संस्कृति का प्रभाव भी भारतीय संस्कृति पर पड़ा ।
वे आगे चलकर आर्यों में घुलमिल गए । 
इनके नाम पर आभीरी नाम की एक अपभ्रंश (प्राकृत) भाषा भी थी । य़ौ०—आभीरपल्ली= अहीरों का गाँव । ग्वालों की बस्ती ।
२. एक देश का नाम ।
३. एत छंद जिसमें ११ ।
मात्राएँ होती है और अंत में जगण होता है ।
जैसे—यहि बिधि श्री रघुनाथ ।
गहे भरत के हाथ । पूजत लोग अपार । गए राज दरबार । ४. एक राग जो भैरव राग का पुत्र कहा जाता है ।
संज्ञा पुं० [सं० आभीर] [स्त्री० अहीरिन] एक जाति जिसका काम गाय भैंस रखना और दूध बेचना है । ग्वाला । 
रसखान अहीरों को अपने -ग्रन्थों में कृष्ण के वंश के रूप में वर्णित करते हैं ।
या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि, नवों निधि को सुख, नंद की धेनु चराय बिसारौं॥
रसखान कबौं इन आँखिन सों, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिक हू कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं॥ 
सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावै।
जाहि अनादि अनंत अखण्ड, अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥
नारद से सुक व्यास रहे, पचिहारे तऊ पुनि पार न पावैं।
ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं॥
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हरिवंश पुराण में यादवों को घोष कहा है ।
हरिवंश पुराण में यादवों अथवा गोपों के लिए घोष (घोषी) शब्द का बहुतायत से प्रयोग है ।
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ताश्च गाव: स घोषस्तु स च सकर्षणो युवा।
कृष्णेन विहितं वासं तमध्याससत निर्वृता ।३५।
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अर्थात् उस वृदावन में सभी गौऐं  गोप (घोष) तथा संकर्षण आदि सब कृष्ण के साथ आनन्द पूर्वक निवास करने लगे ।३५।
हरिवंश पुराण श्रीकृष्ण का वृन्दावन गमन नामक ४१वाँ अध्याय।
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प्रेषित यह सन्देश का उद्देश्य एक भ्रान्ति का निवारण है 
आज अहीरों को कुछ रूढ़िवादीयों द्वारा फिर से परिभाषित करने की असफल कुचेष्टाऐं की जा रहीं अतः उसके लिए यह सन्देश आवश्यक है । 
कि इसे पढ़े.......
और अपना मिथ्या वितण्डावाद बन्द करें ..


गुरुवार, 16 जुलाई 2020

ओ श्याम रे --- हम बाबरे ! तर्ज -- ओ शाहिबा !

ओ  श्याम रे ~~ओ श्याम रे  
 हम  बाबरे  ~~ नहीं हैं बुरे 
 ओ श्याम रे ~~ओ श्याम रे  
 हम  बाबरे  ~~ नहीं हैं बुरे 
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ओ  श्याम रे ~~ओ श्याम रे  
 हम  बाबरे  ~~ नहीं हैं बुरे 
 ओ श्याम रे ~~ओ श्याम रे  
 हम  बाबरे  ~~ नहीं हैं बुरे 
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खोजते तुमको कब मिल पाओगे !
कितने युगों का है क्रम!

खोजते तुमको कब मिल पाओगे !
कितने युगों का है क्रम!

ओ  श्याम रे ~~ओ श्याम रे  
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तुझसे गुजारिश है ,होती नहीं बारिश है ।

लपटें सी उठती हैं हवाओं में 
विष है ।

हम कितने प्यासे हैं ।भक्तों से क्यों रिस  है ।

तुझको मानने की अपनी ये कोशिश है ।

ओ  श्याम रे ~~ओ श्याम रे! 
 हम बाबरे ~~  नहीं हैं बुरे !
~~~~~~~~~~~~~~~~~ 
जीवन के ये पल ,आते -जाते कल 
बन के गुजर जाते , नहीं पाते हैं सम्हल ।। 

राहें हुईं धूमिल , दूर कहीं मंजिल 
यहाँ पड़े पढ़ाबों पर , प्रभु यही मुश्किल ।।

ओ श्याम रे --ओ श्याम रे ।
हम बाबरे ~~~ नहीं हैं बुरे !!

खोजते तुमको कब मिल पाओगे
 कितने युगों का है क्रम ।

खोजते हैं तुमको कब मिल पाओगे ।
कितने युगों का है क्रम।

ओ श्याम रे --ओ श्याम रे--
हम बाबरे नहीं हैं बुरे ।।

खोजते हैं तुमको कब मिल पाओगे । 
कितने युगों का है क्रम !

खोजते हैं तुमको कब मिल पाओगे । कितने युगों का है क्रम।

ओ श्याम रे --ओ श्याम रे 
हम बाबरे -- नहीं है बुरे .....
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गीत यादव योगेश कुमार 'रोहि' 

कायस्थः कासाइट कार्थेज काशी और कशमीर तक...

कायस्थ भारत में रहने वाले हिन्दू समुदाय की एक जातियों का वांशिक कुल हैंं
यद्यपि ये सिख बौद्ध,जैन इसाई और कुछ इस्लाम के भी सागिर्द हैं ।
 परन्तु इनकी मूल सत्ता भारतीय और सुमेरियन मिथकों में विद्यमान है ।
पुराणों के अनुसार कायस्थ प्रशासनिक कार्यों का निर्वहन करते हैं।

ये हिन्दू धर्म के अनुयायीयों में भाषा हिन्दी, असमिया, मैथिली, उर्दू, बंगला, मराठी कन्नड़ तेलगु तमिल और उड़िया आदि के भाषाी नसिका राज्य असम, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखण्ड, दिल्ली, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और नेपाल के
अधिवासी हैं।
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उप विभाजन 12 मुख्य वंश में है ।
हिंदू धर्म की मान्यता हैंं कि कायस्थ धर्मराज श्री चित्रगुप्त भगवान जी की संतान हैं तथा श्रेष्ठ कुल में जन्म लेने के कारण इन्हें ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों धर्मों को धारण करने का अधिकार प्राप्त हैंं। 

बनारस के पंडितो द्वारा पेशवा दरबार को 1779 AD में दिए उत्तर के अनुसार चित्रगुप्त के वंशज "कायस्थ" ब्राह्मण एवं क्षत्रिय से श्रेष्ठ हैं । 
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वर्तमान में कायस्थ मुख्य रूप से श्रीवास्तव, सिन्हा, वर्मा, चित्रवंशी, सक्सेना, अम्बष्ट, निगम, माथुर, भटनागर, लाभ, लाल,बसु, शास्त्री , कुलश्रेष्ठ, अस्थाना, बिसारिया, कर्ण, खरे, सुरजध्वज, विश्वास, सरकार, बसु, घोष, परदेशी, बोस, दत्त, चक्रवर्ती, श्रेष्ठ, प्रभु, ठाकरे, आडवाणी, नाग, गुप्त, रक्षित, सेन ,बक्शी, मुंशी, दत्ता, देशमुख, बच्चन, पटनायक, नायडू, सोम, पाल, राव, रेड्डी, दास, मोहंती, देशपांडे, कश्यप, देवगन, अम्बानी, राय आदि उपनामों से जाने जाते हैं।

 वर्तमान में कायस्थों ने राजनीति और कला के साथ विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्रों में सफलतापूर्वक विद्यमान हैं।

 वेदों के अनुसार कायस्थ का उद्गम पितामह श्रृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा जी हैं।

 उन्हें ब्रह्मा जी ने अपनी काया[ध्यान योग] की सम्पूर्ण अस्थियों से बनाया था तभी इनका नाम काया+अस्थि = कायस्थ हुआ।

स्वामी विवेकानन्द ने अपनी जाति की व्याख्या कुछ इस प्रकार की है:

“ मैं उन महापुरुषों का वंशधर हूँ, जिनके चरण कमलों पर प्रत्येक ब्राह्मण यमाय धर्मराजाय चित्रगुप्ताय वै नमः का उच्चारण करते हुए पुष्पांजलि प्रदान करता है और जिनके वंशज विशुद्ध रूप से क्षत्रिय हैं।

 यदि अपने पुराणों पर विश्वास हो तो, इन समाज सुधारकों को जान लेना चाहिए कि मेरी जाति ने पुराने जमाने में अन्य सेवाओं के अतिरिक्त कई शताब्दियों तक आधे भारत पर शासन किया था। 

यदि मेरी जाति की गणना छोड़ दी जाये, तो भारत की वर्तमान सभ्यता शेष क्या रहेगा?

 अकेले बंगाल में ही मेरी जाति में सबसे बड़े कवि, इतिहासवेत्ता, दार्शनिक, लेखक और धर्म प्रचारक हुए हैं।

 मेरी ही जाति ने वर्तमान समय के सबसे बड़े वैज्ञानिक (जगदीश चन्द्र बसु) से भारतवर्ष को विभूषित किया है। 

स्मरण करो एक समय था जब आधे से अधिक भारत पर कायस्थों का शासन था।

 कश्मीर में दुर्लभ बर्धन कायस्थ वंश, काबुल और पंजाब में जयपाल कायस्थ वंश, गुजरात में बल्लभी कायस्थ राजवंश, दक्षिण में चालुक्य कायस्थ राजवंश, उत्तर भारत में देवपाल गौड़ कायस्थ राजवंश तथा मध्य भारत में सातवाहन और परिहार कायस्थ राजवंश सत्ता में रहे हैं।
 अतः हम सब उन राजवंशों की संतानें हैं।
 हम केवल बाबू बनने के लिये नहीं, अपितु हिन्दुस्तान पर प्रेम, ज्ञान और शौर्य से परिपूर्ण उस हिन्दू संस्कृति की स्थापना के लिये पैदा हुए हैं। ”
—स्वामी विवेकानन्द के विचार पद्म पुराण के अनुसार कायस्थ कुल के ईष्ट देव श्री चित्रगुप्त जी के दो विवाह हुए। 

इनकी प्रथम पत्नी सूर्यदक्षिणा (जिन्हें नंदिनी भी कहते हैं) सूर्य-पुत्र श्राद्धदेव की कन्या थी, इनसे ४ पुत्र हुए-भानू, विभानू, विश्वभानू और वीर्यभानू।
 इनकी द्वितीय पत्नी ऐरावती (जिसे शोभावती भी कहते हैं)
 धर्मशर्मा नामक ब्राह्मण की कन्या थी, 
इनसे ८ पुत्र हुए चारु, चितचारु, मतिभान, सुचारु, चारुण, हिमवान, चित्र एवं अतिन्द्रिय कहलाए। 

इसका उल्लेख अहिल्या, कामधेनु, धर्मशास्त्र एवं पुराणों में भी किया गया है। 

चित्रगुप्त जी के बारह पुत्रों का विवाह नागराज वासुकी की बारह कन्याओं से सम्पन्न हुआ। 

इसी कारण कायस्थों की ननिहाल नागवंश मानी जाती है और नागपंचमी के दिन नाग पूजा की जाती है। 

नंदिनी के चार पुत्र काश्मीर के निकटवर्ती क्षेत्रों में जाकर बस गये तथा ऐरावती के आठ पुत्रों ने गौड़ देश के आसपास (वर्तमान बिहार, उड़ीसा, तथा बंगाल) में जा कर निवास किया। 

वर्तमान बंगाल उस काल में गौड़ देश कहलाता था

इन बारह पुत्रों के दंश के अनुसार कायस्थ कुल में १२ शाखाएं हैं ।

जो - श्रीवास्तव, सूर्यध्वज, वाल्मीक, अष्ठाना, माथुर, गौड़, भटनागर, सक्सेना, अम्बष्ठ, निगम, कर्ण, कुलश्रेष्ठ नामों से चलती हैं।

 अहिल्या, कामधेनु, धर्मशास्त्र एवं पुराणों के अनुसार इन बारह पुत्रों का विवरण इस प्रकार से है।

'परन्तु उपर्युक्त विवरण ब्राह्मणों के कल्पना रञ्जित ग्रन्थों से है ।
'परन्तु निश्पक्षता की कषौटी पर देखें  
भारतीय समाज ही नहीं अपितु विश्व के सम्पूर्ण मानव समाजों में संस्कृतियों की भित्तियाँ ( दीवारें) धर्म की आधार-शिलाओं पर प्रतिष्ठित हुईं । 

भाषा जो परम्परागत रूप से अर्जित सम्पदा है वह भी मानव समाजों के सांस्कृतिक , धार्मिक और व्यावहारिक जीवन के संवादों की संवाहिका रही है । 

संस्कृतियों 'ने समय के अन्तराल में कई करबटें ली दूसरी संस्कृतियों  समन्वय और विनिमय सदीयों से चलता रहा।

 इतिहास अतीत का वक्ता बन कर जब उपस्थित हुआ तो कई सांस्कृतिक विपर्यय दृष्टि गोचर हुए । 

आज हम बात करते हैं कायस्थों की सांस्कृतिक उपलब्धियों पर
जिनका भारतीय पौराणिक ग्रन्थों में यम के पाप- पुण्य के लेखाधिकारी चित्रगुप्त सम्बद्ध किया गया।

यम का विवरण तो हम्हें विश्व की अनेक पुरा-कथाओं में मिलता है ।
कनान देश की कैनानाइटी संस्कृतियों में ईरानीयो के धार्मिक ग्रन्थों "अवेस्ता ए जैंद " और सुमेरियन बैबीलॉनियन मिथकों यूनानी-माइथॉलॉजी तथा सुदूर उत्तरावर्ती नॉर्स पुरा-कथाओं में भी मिलता है।
चित्रगुप्त भी एक योगज शब्द है - जिसका अर्थ होता है जो गुप्त रूप से मनुष्यों के अच्छे- बुरे कर्मों को देख कर उनका यथाक्रम चित्रण या लेखन करता हो ---
और राजा की राजनैतिक व्यवस्थाओं के नियमन का क्रमोत्तर विवरण  भी लिखित रूप में आवश्यक है ।

इसी लिए चित्रगुप्त को अपना आदिपुरुष मानने वाले  कायस्थ लोग भी मुगल और अंग्रेज़ी सल्तनत में प्रशासनिक लेखाधिकारी नियुक्त बहुतायत से किये गये ।
'परन्तु ये कायस्थ संज्ञा से क्यों अभिहित हुए ।
इसी शब्द की व्युत्पत्ति पर भी -विचार आवश्यक है ।

 यद्यपि कायस्थ शब्द का  सम्बन्ध काया में स्थित 
अथवा कार्यस्थ से निर्धारित करना भारतीय पुरोहितों की भारतीय पुरोहितों की समन्वय कारी नीति से सम्बद्ध है ।

'परन्तु कायस्थ शब्द की व्युत्पत्ति के सूत्र  सुमेरियन मिथकों में वर्णित कसाइट  अथवा कस्सी
 जन-जाति में खोजे जा सकते हैं ।
फॉनिशियन शब्द कार्थेज से भी है ।
किस प्रकार से है इन सभी बातों का विश्लेषण हम करेंगे ।

 वैदिक ऋचाओं में वर्णित पणि जन-जाति जो समुद्रीय यात्राोओं के द्वारा देश- देशान्तर में व्यापार करती था ।
इनको वंशज भी कहीं नहीं आज के बनिया या वणिक हैं ।
यद्यपि बणिको और कायस्थों की व्यावहारिक शैली में समानता  दृष्टि गोचर होती है ।

 कायस्थ का प्रत्यक्ष सम्बन्धी है इण्डो-यूरोपियन - सुमेरियन कासाइट शब्द ।
'परन्तु यह निर्णय या निष्कर्ष पूर्व दुराग्रह से प्रेरित भी माना जाएगा यदि इसके प्रभावी साक्ष्य प्रस्तुति-करण 'न किए जाऐं तो 

'परन्तु साक्ष्य हैं प्रभावशाली ---
भारत की प्राचीनत्तम सांस्कृतिक नगरी काशी या कशमीर जैसे नामों के मूल में  सुमेरियन कासाइट जन-जाति का नाम ही है ।
यह सुमेरियन जन-जाति भारतीय पौराणिक सन्दर्भों में कस: के नाम से है ।

👇खस (प्राचीन जाति) और एशिया ·
 तिब्बत का भूक्षेत्र तिब्बत के खम प्रदेश में बच्चे तिब्बत का पठार तिब्बत (Tibet) एशिया का एक क्षेत्र है जिसकी भूमि मुख्यतः उच्च पठारी है। इसे पारम्परिक रूप से बोड या भोट भी कहा जाता है। इसके प्रायः सम्पूर्ण भाग पर चीनी जनवादी गणराज्य का अधिकार है जबकि तिब्बत सदियों से एक पृथक देश के रूप में रहा है।

 यहाँ के लोगों का धर्म बौद्ध धर्म की तिब्बती बौद्ध शाखा है तथा इनकी भाषा तिब्बती है। चीन द्वारा तिब्बत पर चढ़ाई के समय (1955) वहाँ के राजनैतिक व धार्मिक नेता दलाई लामा ने भारत में आकर शरण ली और वे अब तक भारत में सुरक्षित हैं।

 खस (प्राचीन जाति) और तिब्बत · और देखें » नेपाल नेपाल, (आधिकारिक रूप में, संघीय लोकतान्त्रिक गणराज्य नेपाल) भारतीय उपमहाद्वीप में स्थित एक दक्षिण एशियाई स्थलरुद्ध हिमालयी राष्ट्र है। 

नेपाल के उत्तर मे चीन का स्वायत्तशासी प्रदेश तिब्बत है और दक्षिण, पूर्व व पश्चिम में भारत अवस्थित है। 


 कसाइट kassites /Kaysites या Kushites के साथ भ्रमित होने की नहीं। "कासाइट" यहां पुनर्निर्देश करता है। 


प्राचीन निकट पूर्व के लोग थे, जिन्होंने पुरानी बेबीलोनियन साम्राज्य के पतन के बाद बेबीलोनिया को नियंत्रित किया था। 

यह बात सॉ1531 ईसा पूर्व और सी तक। 1155 ईसा पूर्व (लघु कालक्रम)। कास्साइट्स का नाम शायद गैलज़ू था,

 हालाँकि उन्हें  कासेकू, कासी, कासी या काशी नामों से भी जाना जाता है।
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भारतीय पुरोहितों का  कलम पर ही नही राज्य के प्रत्येक क्षेत्र में एकाधिकार पुष्यमित्र सुंग ईसा० पूर्व 184 से 148 के समकक्ष स्पष्टत है ।

पुष्यमित्र सुँग का राज्य की सत्ता और समाज में 
उद्देश्य ब्राह्मण वर्चस्व स्थापित करना था ।
उसे अनुभव हो रहा था कि बौद्धों की उदार विचार धारा और महात्मा बुद्ध के धर्म चक्र के स्थापन से ब्राह्मण धर्म  की हानि 


 इन पुरोहितों'ने एक अभियान के तहत स्वयं को वर्तमान और भविष्य की दृष्टि से उपयोगकी सिद्ध करने के लिए अनेक धार्मिक विधानों का सृजन भी किया ।

 विद्वत्ताके क्षेत्र में तत्कालीन पुरोहितों से स्पर्द्धा रखने वाली जन-जाति कायस्थ ही थी । 
जिनके संयुक्त पूर्वज फोनीसियन और कस्सी जन-जाति के लोग थे

भारतीय पौराणिक सन्दर्भों में जो देव सूची में अनेक देवी देवता सुमेरियन , बैबीलोनियन पुराणों से सम्बद्ध हैं ।

इस  साम्राज्य का कसाइड वंश लगभग 1600 ई.पू. -से  लगभग 1155 ई.पू.  तक  अपने अस्तित्व में रहा --

कसदियों के अधीन बेबीलोन साम्राज्य,  13 वीं शताब्दी ई.पू.म ें था ।
  • असीरिया और एलम द्वारा आक्रमण लगभग 1158 ई.पू. में हुआ यह  विघटित रूप लगभग 1155 ई.पू. का  असीरीयों
द्वारा सफल द्वारा पूर्ववर्ती पहला बेबीलोन राजवंश मध्य असीरिया साम्राज्य एलामाइट साम्राज्य आज ईरान का हिस्सा है।
 

1595 ईसा पूर्व (यानी 1531 ईसा पूर्व लघु कालक्रम) में शहर के हित्ती शेखों के द्वारा बाद में उन्होंने बेबीलोनिया पर नियंत्रण प्राप्त किया, और पहले बाबुल और बाद में दुर-कुरिगालु में आधारित वंश की स्थापना की। 

कस्सी एक छोटे सैन्य अभिजात वर्ग के सदस्य थे, लेकिन कुशल शासक थे और स्थानीय रूप से अलोकप्रिय नहीं थे, ।

और उनके 500 साल के शासनकाल ने बाद के बेबीलोनियन संस्कृति के विकास के लिए एक आवश्यक आधार तैयार किया।

 रथ और घोड़ा, जिस पर काशी वासी पूजा करते थे, वह इस समय बेबीलोनिया में पहली बार आया।
सुमेरियन शहर किश की तर्ज पर काशी और अक्काड की तर्ज पर अवध जैसे राज्यों की परिकल्पना हुई ।

यद्यपि कस्सी भाषा का मिलान वैदिक ऋचाओं में प्राप्त भाषा से आँशिक रूप से है ।
 'परन्तु आधुनिक भाषा तत्व वेत्ताओं के अनुसार उनकी भाषा इंडो-यूरोपीय भाषा समूह से संबंधित नहीं थी, न ही सेमिटिक या अन्य एफ्रो-एशियाई भाषाओं से और सबसे अधिक संभावना है कि भाषा अलग-थलग रही है,।
'परन्तु इसका भाषा में वैदिक संस्कृतियों के प्राचीनत्तम सूत्र विद्यमान हैं।


 हालांकि कुछ भाषाविदों ने एशिया माइनर की हुरो-उरार्टियन भाषाओं के लिए एक लिंक का प्रस्ताव दिया है।

  और कासियों के आगमन को भारत-यूरोपीय लोगों के समकालीन प्रवास से जोड़ा गया है। 


 कई कस्सी नेताओं और देवताओं ने इंडो-यूरोपीय नामों को जन्म दिया,।
और यह संभव है कि वे मितानी के समान एक इंडो-यूरोपीय अभिजात वर्ग के प्रभुत्व में थे, जिन्होंने एशिया माइनर के हुरो-उरार्टियन बोलने वाले हुरियानों पर शासन किया था। ।

मितन्नी शब्द ऋग्वेद के मितज्ञु का विकसित रूप है ।

 Kassites की मूल मातृभूमि अच्छी तरह से स्थापित नहीं है, लेकिन प्रतीत होता है कि अब ईरान के लोरेस्तान प्रांत में ज़ाग्रोस पर्वत स्थित है।

 हालाँकि, कसाइड लोग एलामाइट्स, गुटियन और मानेन्स की तरह थे, जिन्होंने उनसे पहले भाषाई तौर पर ईरानी भाषी लोगों से संबंध नहीं बनाए थे, ।

 जो बाद में इस सहस्राब्दी के क्षेत्र में हावी हो गए थे।
वे पहली बार 18 वीं शताब्दी ईसा पूर्व इतिहास में दिखाई दिए, 

जब उन्होंने सामसु-इलूना (शासनकाल 1749–1712 ईसा पूर्व) के शासन के 9 वें वर्ष में बेबीलोनिया पर हमला किया, जो हम्मुराबी के पुत्र थे।

 सामसु-इलुना ने उन्हें निरस्त कर दिया, जैसा कि अबी-एशुह ने किया था, लेकिन बाद में उन्होंने बेबीलोनिया को नियंत्रित कर लिया। 1570 ईसा पूर्व में बाबुल के पतन के 25 साल बाद 1595 ईसा पूर्व, और मेसोपोटामिया के दक्षिणी भाग को जीतने के लिए चला गया, मोटे तौर पर प्राचीन सुमेर के अनुरूप और इनके द्वारा राजवंश के रूप में जाना जाता है। 

1520 ई.पू. हित्तियों ने भगवान मर्दुक की मूर्ति को हटा दिया था,

जिसे भारतीय वैदिक सन्दर्भों में मृडीक कहा गया ।
 लेकिन कसाहड शासकों ने कब्जा कर लिया, मर्दुक को बाबुल में लौटा दिया, और उन्हें कसाइड शुक्मुना के बराबर बना दिया।

 व्यापक उथल-पुथल के इस तथाकथित "डार्क एज" अवधि से प्रलेखन की कमी के कारण, सत्ता में उनके उदय की परिस्थितियां अज्ञात हैं। 

Kassite भाषा में कोई भी शिलालेख या दस्तावेज़ संरक्षित नहीं किया गया है, एक अनुपस्थिति जो आधिकारिक रूप से आकस्मिक नहीं हो सकती है, जो आधिकारिक हलकों में साक्षरता के गंभीर प्रतिगमन का सुझाव देती है।

 कैसिटाई शासकों के तहत बाबुल, जिन्होंने शहर करंदुनाश का नाम बदला, मेसोपोटामिया में एक राजनीतिक और सैन्य शक्ति के रूप में फिर से उभरा। 

कुरिगाल्ज़ू I (14 वीं शताब्दी ईसा पूर्व) के सम्मान में एक नव निर्मित राजधानी शहर डर-कुरिगालज़ू का नाम रखा गया था।

 उनकी सफलता के सापेक्ष राजनीतिक स्थिरता का निर्माण किया गया था, जो कासेट के राजाओं ने हासिल किया था। उन्होंने बेबीलोन पर लगभग चार सौ वर्षों तक बिना किसी रुकावट के शासन किया - बेबीलोन के इतिहास में किसी भी राजवंश का सबसे लंबा शासन।

 Kassite शक्ति का गठन दक्षिणी मेसोपोटामिया का एक क्षेत्रीय राज्य में परिवर्तन, मित्र देशों या जुझारू राज्यों के एक नेटवर्क के बजाय, बेबीलोनिया को एक अंतरराष्ट्रीय शक्ति बना दिया, 

हालांकि यह अक्सर इसके उत्तरी पड़ोसी, असीरिया (असुर)और एलाम द्वारा पूर्व में देखा गया था। 

कसाई राजाओं ने असीरिया के साथ व्यापार और कूटनीति की स्थापना की। 

असीरिया और बर्न-बरिश के पूजुर-आशुर III ने 16 वीं शताब्दी ईसा पूर्व, मिस्र, एलाम और हित्तियों और मध्य में दो राज्यों के बीच सीमा पर सहमति जताते हुए एक संधि पर हस्ताक्षर किए और कसाई शाही ने अपने शाही परिवारों के साथ विवाह किया।


 बेबीलोन और अन्य शहरों में विदेशी व्यापारी थे, और बेबीलोन के व्यापारी मिस्र (न्युबियन सोने का एक प्रमुख स्रोत) से असीरिया और अनातोलिया  (मध्य एशिया)तक सक्रिय थे।

 केसेट वेट और सील, पैकेट की पहचान करने और मापने के उपकरण, जो अब तक ग्रीस में थेब्स के रूप में, दक्षिणी आर्मेनिया में और यहां तक ​​कि आज के तुर्की के दक्षिणी तट से उलुबुरुन शिपव्रेक में पाए गए हैं।


 15 वीं शताब्दी ई.पू. के मध्य में असीरिया के कुरीगलज़ु  प्रथम 
और अशुर-बेल-निशु के बीच एक और संधि पर सहमति हुई।

 हालाँकि, बेबीलोनिया ने 1365 ईसा पूर्व में अशुर-उबलित प्रथम के आगमन के बाद अगले कुछ शताब्दियों के लिए असीरिया से हमले और वर्चस्व के तहत खुद को पाया जिसने आसिया (हित्तियों और मिस्रियों के साथ) को निकट पूर्व में प्रमुख शक्ति बनाया।

 बाबुल में 1360 के दशक में असीरियन राजा अशुर-उदबली प्रथम (1365–1330 ईसा पूर्व) द्वारा बाबुल को बर्खास्त कर दिया गया था जिसकी शादी अशुर-उबलित की बेटी से हुई थी, 

उसकी हत्या कर दी गई थी. और अशुर-उबलित ने तुरंत बेबीलोनिया में मार्च किया और अपने दामाद का बदला लिया, राजा को जमा किया और वहां के राजा के रूप में शाही कसाइड

 लाइन के कुरिगालज़ू द्वित्तीय को स्थापित किया।

 उनके उत्तराधिकारी एनिल-निरारी (1330–1319 ई.पू.) ने भी बेबीलोनिया पर हमला किया और उनके महान पोते अदद-निरारी प्रथम (1307–1275 ई.पू.) ने बेबिलोनियन क्षेत्र पर कब्जा कर लिया जब वह राजा बने।

 तुकुल्ली-निनूर्ता I (1244–1208 ई.पू.) केवल बेबीलोनिया के वर्चस्व वाली सामग्री नहीं थी, आगे जाकर बेबीलोनिया पर विजय प्राप्त की, कश्टिलाश चतुर्थ को जमा किया और 1235 ईसा पूर्व से 1227 ईसा पूर्व तक आठ वर्षों तक वहाँ शासन किया।

 नियंत्रण और प्रतिष्ठा के दौर में (Kassite )कसाइड राजा बनाए गये हैं ।

सुसा एल्म की राजधानी थी और बाद में एलियामिस की, इसलिए स्ट्रैबो का कथन है कि कास्तिस ने अपनी अपनी राजधानी के खिलाफ एलाम या एलियामी के भीतर एक विशेष समूह का समर्थन करने के लिए हस्तक्षेप किया, जो उस समय स्पष्ट रूप से बेबीलोन या सेल्यूकाइड के अधीन था।

 अंतिम रिकॉर्ड कसाईट संस्कृति का नवीनतम साक्ष्य दूसरी शताब्दी के भूगोलवेत्ता टॉलेमी का संदर्भ है, जिन्होंने "कोसैई" को "एलीमियंस" से सटे सूसा क्षेत्र में रहने वाले के रूप में वर्णित किया।

 यह कई मामलों में से एक का प्रतिनिधित्व कर सकता है जहां टॉलेमी आउट-ऑफ-डेट स्रोतों पर निर्भर थे। 

यह माना जाता है कि [किसके द्वारा?] कि काशियों का नाम काशगन नदी के नाम पर लोरेस्टन में रखा गया है। 


 भारतीय पौराणिक सन्दर्भों में कश: जन-जाति का वर्णन झल्ल और मल्ल जनजातियों के साथ है ।
सुमेरियन मिथकों से भारतीय मिथकों का सम्बन्धी आकस्मिक नहीं है ।
मल्ल और झल्ल जनजातियों के कश: सहवर्ती थे ।
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 सवर्णायां व्रात्यक्षत्रियाजाते जातिभेदे “झल्लो मल्लश्च राजन्याद्व्रात्यान्निच्छिविरेव च । 
नटश्च करणश्चैव खसो द्रविड एव च” मनुःस्मृति . 

वर्तमान गढ़वाल और उसके उत्तरवर्ती प्रांत का प्राचीन नाम भी कस है  और इस प्रदेश में रहनेवाली एक प्राचीन जाति ।

 स्वपच सवर खस जमन जड़ पाँवर कोल किरात ।
 राम कहत पावन परम होत भुवन विख्यात ।
— तुलसी राम-चरित मानस ।

 विशेष—कस को भारतीय पुराणों में व्रात्य क्षत्रिय से उत्पन्न इस जाति का वर्णन महाभारत और राजतरंगिणी में आया है । 

इस जाति के वंशज अब तक नेपाल और किस्तवाड़ (काश्मीर) में इसी नाम से विख्यात है और अपने आपको क्षत्रिय बतलाते हैं । 
भारतीय कायस्थ भी कसो से सम्बद्ध हैं।

ये लोग बड़े परिश्रमी और साहसी तथा प्रायः सैनिक होते हैं ।
 इन्ही को खासिया भी कहते 
-स्मृतियों में वर्णन है कि 

"पौण्ड्रकाश्चौड्रद्रविडाः काम्बोजा जवनाः शकाः ।
 पारदाः पह्नवाश्चीनाः कीराता दरदाः खशाः ।
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खस एक प्राचीन जाति, जो कदाचित शकों की कोई उपजाति थी।
वाले भी शक्सेना का अर्थ शकों की सेना में सम्मिलित...

 मनुस्मृति कार  ने इन्हें क्षत्रिय बताया है किंतु कहा है कि संस्कार-लोप होने और ब्राह्मणों से संपर्क छूट जाने के कारण वे शूद्र हो गए।

 महाभारत के सभापर्व एवं मार्कंडेय तथा मत्स्यपुराण में इनके अनेक उल्लेख प्राप्त होते है। 
'परन्तु पुराणों का रचनाकाल पुष्यमित्र सुँग के समय से उन्नीसवीं सदी तक होता रहा ।

समझा जाता है कि महाभारत में उल्लिखित खस का विस्तार हिमालय में पूर्व से पश्चिम तक था। 

राजतरंगिणी के अनुसार ये लोग कश्मीर के नैऋत्य कोण के पहाड़ी प्रदेश अर्थात् नैपाल में रहते थे। 
अत: वहाँ के निवासियों को लोग खस मूल का कहते हैं।
कश्मीर शब्द भी कस जन-जाति से सम्बद्ध है ।

 सिल्वाँ लेवी की धारणा है कि खस हिमालय में बसने वाली एक अर्धसंस्कृत जाति थी जिसने आगे चलकर बुद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। 

फिर 12 सताब्दी में हिन्दु धर्म को ग्रहण कर लिआ।
 यह भी धारणा है खस लोग काश्गर अथवा मध्य एशिया के निवासी थे और तिब्बत के रास्ते वे नैपाल और भारत आए। 
फोनीसियन लोगों से भी सम्बद्ध थे कसाइड लोग...
क्योंकि जो जनजातियाँ वेदों में हैं वही सुमेरियन बैबीलॉनियन मिथकों में भी वर्णित हैं ।
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यद्यपि ये कायस्थ भी कहीं 'न कहीं वणिकों के सजातीय पणियों के वंशज थे । 
अब ये बात सूत्रात्मक है जब व्याख्या की जाएगी तो बात समझ में आयेगी । 

अब हम इन्हीं तथ्यों की व्याख्या करते हैं कर्थेज शब्द से कायस्थ शब्द विकसित हुआ. भारत में यात्रा करते हुए इसका एक रूप केसेड और कायष्ड और कायस्थ भी हुआ ।

 . केसेड अथवा भारतीय कायस्थ .. कार्थेज शब्द (अरबी भाषा में ( قرطاج,) क़र्ताज; और अंग्रेज़ी: Carthage, कार्थ़ेज) हो गया है ।

 उत्तर अफ़्रीका के त्यूनिसीया देश में लगभग 3,000 साल से लगातार आबाद एक प्राचीन शहर है। कार्थेज था जहांँ पणि या वणिक रहते थे । 

ये समुद्रीय व्यापारों के द्वारा देश देश की यात्रा करते हुए अपने ज्ञान और भाषा से विश्व को व्यावहारिक संवाद के सूत्र या नियम दे रहे थे इन्होंने विश्व को लिपि और भाषा नेवी विद्या प्रदान की इनकी अनेक उपलब्धियों का वर्णन सहज नहीं ।

 ये प्यूनिक तो कहीं फोनीसियन तो कहीं बनिया के रूप में समाज को बनाते और बुनते रहे .. इनका सम्बन्ध इतिहास में असीरीयों या यहूदियों से भी स्थापित किया गया तो कही ड्रयूडस् Druids अथवा दक्षिणी भारत के द्रविडो से 'परन्तु असल बात यह नहीं बतायी गयी की ये सभी इनके ही सहचर थे ।

 यद्यपि सांस्कृतिक रूप से ये देव संस्कृतियों के विद्रोही या इन्द्र उपासक पुरोहितों को दान 'ने देने वाले भी थे । परिणाम स्वरूप वैदिक पुरोहितों 'ने इन्हें उपेक्षात्मक रूप में वर्णन किया।
 और शत्रुओं की प्रशंसा या उन में गुणों के होते हुए भी कौन वर्णन करता है । 

फोनीसियन लोगों का यात्रिक अड्डा कार्थेज शहर था । यह शहर प्राचीन काल मे रोमन एवं फ़ोनिसीयन साम्राज्य का एक प्रमुख गढ़ रहा है। 

सन् 1000 ईसा-पूर्व के आसपास इसकी शुरुआत फ़ोनीशिया द्वारा स्थापित एक दूर-दराज़ बस्ती के रूप में हुई। 

आधुनिक युग में इसे त्यूनिसीया की राजधानी त्यूनिस का एक बाहरी क्षेत्र माना जाता है।
 प्राचीन रोमन स्रोतों के अनुसार इसकी स्थापना सन् 814 ईसापूर्व में फ़ोनीशिया के टायर शहर से (जो आधुनिक लेबनान में पड़ता है) वहाँ से आये एक फ़ोनीशियाई समूह ने की थी। कार्थेज तेज़ी सेू धन, शक्ति और प्रभाव में बढ़ने लगा।

 इस नगर पर केन्द्रित संस्कृति को उसके समकालीन रोमन लोग प्यूनिक (लातिनी: Punic) बुलाया करते थे, ।

 जो "फ़ोनीशिया" शब्द का ही एक बिगड़ा रूप है। समय के साथ भूमध्य सागर में यह रोम और यूनान के सिराक्यूज़ शहर से मुक़ाबला करने वाली तीसरी शक्ति के रूप में उभरा। 
इनमें आपसी झड़पों का सिलसिला छिड़ गया। 

दूसरे प्यूनिक युद्ध में प्रसिद्ध कार्थेजी नेता हान्निबल ने इटली पर चढ़ाई की और सन् 216 ई॰पू॰ में दक्षिणपूर्वी इटली में लड़े गए कैने के युद्ध में जीत प्राप्त की, जिस से लगने लगा के इटली के कई क्षेत्रों से रोम का साम्राज्य उखड़ जाएगा। 

लेकिन सन् 202 ई॰पू॰ में लड़े गए ज़ामा के युद्ध में हान्निबल पराजित हुआ और कार्थेज बहुत कमज़ोर पड़ गया। सन् 149-146 ई॰पू॰ में लड़े गए तीसरे प्यूनिक युद्ध में कार्थेज की पूरी हार हो गयी। रोम के फ़ौजों ने कार्थेज के शहर को पूरी तरह जला और तोड़ डाला।

 कार्थेज के सभी नागरिकों को मार डाला गया या दास बना लिया गया। कुछ समय बाद रोम ने ही कार्थेज की फिर स्थापना की और यह शहर समय के साथ-साथ रोमन साम्राज्य का चौथा सब से महत्वपूर्ण नगर बना। 

कुछ समय तक यह अल्प आयु वाले वैन्डल राज्य की राजधानी भी रहा। सन् 698 ईसवी में अरब फ़ौजें यहाँ आ धमकी और कार्थेज दूसरी दफ़ा नष्ट किया गया।

 भारत में जब देव-संस्कृति के अनुयायीयों का आगमन हो रहा था ।
 वह समय ईसा० पूर्व 1500 से बारह सो के समकालिक है । 
फोनीसियन संस्कृति वैदिक पुरोहितों के समानान्तरण पणियों के रूप में भारत आयी ईसा० पूर्व सप्तम सदी में वर्ण व्यवस्था के विधानों को भारती समाज पर आरोपित किया जाने लगा । 
यद्यपि कायस्थ लोग यौद्धा, कलाकार, संगीत कार और भाषा तत्वो के सम्यक् विश्लेषक थे ।

 हैहयवंश के यादव आभीरों के सहवर्ती शकों की सेना में सम्मिलित होने से कायस्थ (कार्थेज वासी ) फोनीसियन लोगों का एक समुदाय शक्सेना हो गया । भारत में कायस्थों 'ने फोनीसियन तर्ज पर एक कैथी लिपिकालआविष्कार भी किया यह कैथी एक ऐतिहासिक लिपि है मैं मध्यकालीन भारत में प्रमुख रूप से उत्तर-पूर्व और उत्तर भारत में काफी बृहत रूप से प्रयोग किया जाता थी।

 खासकर आज के उत्तर प्रदेश एवं बिहार के क्षेत्रों में इस लिपि में वैधानिक एवं प्रशासनिक कार्य किये जाने के भी प्रमाण पाये जाते हैं इसे "कयथी" या "कायस्थी", के नाम से भी जाना जाता है। 

पूर्ववर्ती उत्तर-पश्चिम प्रांत, मिथिला, बंगाल, उड़ीसा और अवध में। इसका प्रयोग खासकर न्यायिक, प्रशासनिक एवं निजी आँकड़ों के संग्रहण में किया जाता था।

 ' कायस्थ समुदाय का पुराने रजवाड़ों एवं ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों से काफी नजदीक का रिश्ता रहा है। 

ये उनके यहाँ विभिन्न प्रकार के आँकड़ों का प्रबंधन एवं भंडारण करने के लिये नियुक्त किये जाते थे। 

कायस्थों द्वारा प्रयुक्त इस लिपि को बाद में कैथी के नाम से जाना जाने लगा। कैथी एक पुरानी लिपि है जिसका प्रयोग कम से कम 16 वी सदी मे धड़ल्ले से होता था। 

मुगल सल्तनत के दौरान इसका प्रयोग काफी व्यापक था। 1880 के दशक में ब्रिटिश राज के दौरान इसे प्राचीन बिहार के न्यायलयों में आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया था।

 इसे खगड़िया जिले के न्यायालय में वैधानिक लिपि का दर्ज़ा दिया गया था। भारत देश पर ढ़ाई हजार वर्षों से विदेशी आक्रमण होते रहे सबसे पहले ज्ञात साक्ष्यों के आधार पर असुर संस्कृति के उपासक ईरानीयों से भारतीय पुरोहितों का वैमनस्य परिणाम स्वरूप दारा प्रथम का भारत के सिन्धु क्षेत्र पर आधिपत्य उसके बाद सिकन्दर का आक्रमण ईसा० पूर्व 322 के समकालिक होता हैे ।

 'परन्तु ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र सुंग 'ने बौद्ध श्रमणों के संरक्षक वृहद्रथ की सैन्य परीक्षण के दौरान हत्या कर दी और नये सिरे ग्रन्थों का लेखन कार्य हुआ।

 पुष्यमित्र के शासन काल में पुरोहितों के दो वर्ग हो गये एक निश्पक्षता से आध्यात्मिक और आत्मिक साधानाओं के सम्पादक और एक पुष्यमित्र के निर्देशन में धार्मिक पौराणिक ग्रन्थों का लेखन कार्य करने वाले पुरोहितों का वर्ग । 

इन धार्मिक ग्रन्थों के कथानक सुमेरियन बैबीलॉनियन संस्कृतियों के मिथकों की जनश्रुतियों पर भी आश्रित थे ।

 -स्मृतियों का लेखन कार्य काशी में हुआ जिनमे अनेक जन-जातियों का उत्पत्ति काल्पनिक और ब्राह्मण पुरुषों के गुप्त यौनाचार के परिणाम स्वरूप दर्शायी ... लेखनी के वीर और कर्मनिष्ठ कायस्थों की उत्पत्ति के प्रसंग में अनेक काल्पनिक श्लक बाऐ गये ... 👇

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पुराणों में संवाद है कि –

 पुलस्त्य उवाच । 
चित्रगुप्तान्वये जाताः शृणु तान् कथयामि ते । 
महर्षि पुलस्त्य 'ने कहा कि चरित्र गुप्त के वंशजों के विषय में बताऊँगा।
______
श्रीमद्रा नागरा गौराः श्रीवत्साश्चैव माथुराः ।
 अहिफणाः सौरसेनाः शैवसेनास्तथैव च ।

 वर्णा वर्णद्वयञ्चैव अम्बष्ठाद्याश्च सत्तम! । 
शृणु तेषाञ्च कर्म्माणि कुरुवंशविवर्द्धन! ।

 पुत्रान् वै स्थापयामास चित्रगुप्तो महीतले । धर्म्माधर्म्मविवेकज्ञश्चित्रगुप्तो महामतिः । 

भूस्थानं बोधयामास सर्व्वसाधनमुत्तमम् ।
 पूजनं देवतानाञ्च पितॄणां यज्ञसाधनम् । 

वर्णानां ब्राह्मणानाञ्च सर्व्वदातिथिसेवनम् । 
प्रजाभ्यः करमादाय धर्म्माधर्म्म विलोकनम् । 

कर्त्तव्यं हि प्रयत्नेन पुत्राः स्वर्गस्य काम्यया । 
या माया प्रकृतिः शक्तिश्चण्डी चण्डप्रमर्द्दिनी ।
"_______________________________________

'परन्तु स्मृति ग्रन्थों में अनेक जन जैतियों के समान कायस्थों को भी नीचा बनाने के लिए काशी के पण्डितों'ने 
ब्राह्मण और वैश्या स्त्री के दे उत्पन्न कर दिया है ।
'परन्तु यह सब अस्तित्व हीन बातें हैं 
👇
 वैश्यायां विप्रतश्चौर्यात: कुम्भकारा प्रजायते ।
 कुलाल वृत्या जीवेत्तु, नापिता वा भवन्त्यतः ।।32।। 

कायस्थ इति जीवेत्तु विरचयेत् इतस्ततः । 
काकाल्लौल्यं यमात्क्रौर्यं स्थपते रथ कृन्तनम । 
आधक्षाराणि संगृहम कायस्थ इति कीर्तितः ।।34।। 
_______________________________________________
अर्थः-ब्राह्मण के द्वारा वेश्या स्त्री में चोरी से (जारकर्म द्वारा) कुम्हार उत्पन्न होता है । 

वह मिट्टी के बर्तन आदि बनाकर अपनी जीविका करे अथवा इसी प्रकार क्षौरकर्म करने वाला नाई उत्पन्न होता है ।

 वह अपने को कायस्थ कहकर कायस्थ की जीवका करता हुआ ईधर-उधर भ्रमण करे । 

काक से चंचलता, यमराज से क्रूरता, थवई से काटना, इस प्रकार काक, यम और स्थापित, इन तीनों शब्द के आद्य अक्षर लेकर कायस्थ शब्द की बनावट कही गई, 
जो उक्त तीनों दोषों के घोतक है । 
उक्त श्लोकों से स्पष्ट है कि शुक्राचार्य के नाम पर बनायी काल्पनिक मनगड़न्त स्मृति में कुम्हार ,नाई तथा कायस्थ की उत्पत्ति एक ही प्रकार से कर दी गयी है ।

 अथवा यों कहिए एक ही जाति के व्यक्तियों के ये जीविकानुसार तीन नाम हैं । अब व्यास के नाम बनायी व्यास स्मृति  के प्रथम अध्याय के श्लोक 11-12 में कायस्थ को शूद्रों और गोमांस भक्षियों में परिणित किया है ।

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 वणिक-किरात कायस्थ-मालाकार-कुटुम्बिनः ।
 वेरटोभेद-चाण्डाल-दास-श्वपच कोलकाः ।।

 एतेऽन्त्यजाः समाख्याता ये चान्ये च गवार्शनाः । 
एषा सम्भाषणात्स्नानं दर्शनादर्कवीक्षणम् ।।

 अर्थः-बनिए, किरात, कायस्थ, माली, बंसफोड़, स्यारमार, कंजर, चाण्डाल, कंजर, चांडाल, बारी, भंगी और कोल, ये सब अन्त्यज कहे गये हैं । 
इनसे और दूसरे गांमांस भक्षियों से बात करने पर स्नान करने से और इनको देखने पर सूर्य का दर्शन करने से दोष दूर होता है ।
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याज्ञवल्क्य के नाम पर बनायी स्मृति में  कायस्थों को चोर डाकुओं से अधिक खतरनाक बनाकर उनसे प्रजाओं की विशेष रक्षा करने का आदेश राजाओं को दिया है ।
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 याज्ञवल्क्य स्मृति, राजधर्म प्रकरण देखिए, 
चाट-तस्कर-दुर्वृत-महासाहसिकादिभिः । 
पीऽयमानाः प्रजारक्षेत्कायस्थैश्च विशेषतः ।।336।। 

अर्थः- राजा को उचित है कि उचक्के, चोर, दुराचारी, डाकू और विशेषकर कायस्थों से पीड़ा को प्राप्त हुई, अपनी प्रजा की रक्षा करें

अब इसका तो तो कोई इतिहास नहीं कि कायस्थों 'ने कब जनता का शोषण किया था ।

  यम द्वितीया के दिन इन कायस्थों के यहां चित्रगुप्त की पूजा तथा कथा होती है जिसका आधार पदम पुराण का उत्तर खण्ड है । 

यह खण्ड बाद में जोड़ा गई प्रतीत होती है, क्योंकि इसमें समाद्विस्थ ब्रह्माजी के शरीर से एक सावला मनुष्य अपने हाथों में कलम और दवात लिये हुए उत्पन्न हुआ ।
और जाति विषय पूछने पर ब्रह्मा जी ने कहा तुम्हारा नाम चित्र गुप्त है ।

 और तुम मेरे काय (शरीर) से निकले हो, अतः तुम कायस्थ नाम से विख्यात हो जाओ और तुम धर्मराज की पुरी से सदा रहकर सभी मनुष्यों के शुभाशुभ कर्मों को धर्माधर्म के विचारर्थ लिखा करो ।

 (देखें चित्रगुप्तोत्पत्तिप्रकाशे)

 दूसरी ओर कायस्थ संस्कार प्रकाशे में विवरण मिलता है ।👇 कायस्थः पंचमो वर्णों नतु शूद्र कथंचन ।
 अतो भवेयुः संस्कार गर्भाधानादयो दश ।।4।। 
अर्थात् – कायस्थ पांचवाँ वर्ण है वह शूद्र कभी नहीं है । 

अतः उसके गर्भाधानादि दश संस्कार होने चाहिए ।
 यहां पांचवाँ वर्ण का जिक्र है, किन्तु पुष्यमित्र सुँग के निर्देशन में सुमित भार्गव द्वारा लिखित मनु स्मृति के अध्याय /श्लोक 10/4 में स्पष्ट उल्लेख है कि चौथा वर्ण शूद्र है पांचवाँ कोई वर्ण नहीं है । 
ग्रन्थों में परस्पर विरोधाभासी स्थिति उनके प्रक्षिप्त होने को सिद्ध करती है ।

अतः विरोधाभाष की स्थिति इन पुराने धर्म ग्रन्थ में किस वजह से आई यह विचारणीय है ।

एक दलित साहित्यिक के लेखक श्री नवल वियोगी ‘‘सिन्धु-घाटी की सभ्यता के सृजनकर्ता शूद्र और वणिक’’ नामक अपनी किताब (पृ.क्र.-142) पर लिखते हैं कि 

‘‘सिन्धु देश के युद्ध में पराजित होने के बाद वध कर दिये वीरों की संतान का सम्बन्ध कायस्थ वर्ग से भी था, जिन्हें देव संस्कृतियों के अनुयायीयों' ने गुलाम बनाकर घरों में रख लिया था ।

 यही वह वर्ग था जिसने देव -पुरोहितों तथा क्षत्रिय राजाओं के घरों में नौकरों का काम किया । 

प्रसिद्ध नरवंश शास्त्री सर हिरवर्ट होप रिसले ‘‘बंगाल की कायस्थ जाति के बारे में अपने विचार रखते हैं – बंगाल का शार्गिद पेशा पहचाना वर्ग है जिनकी उत्पत्ति अवैध सन्तान के रूप में बतलाई जाती है । 

'परन्तु यह किसी जन-जाति को हीन और स्वाभिमान हीन बनाने के लिए व्यभिचारी पुरोहितों का षड्यन्त्र ही था ।

 सभी कायस्थों में समान रुप से विवाह आदि सम्बन्ध स्थापित किये जाने चाहिए, न कोर्इ ऊचा है न कोर्इ नीचा है।’
 
कायस्थ शब्द सर्व प्रथम पुराणों में धर्मराज अथवा यमराज के मंत्री के रुप में चित्रगुप्त-देव के विशेषण अथवा उपाधि के रुप में प्रयुक्त हुआ है। 

'परन्तु यम का सम्बन्ध कैनानाइटी , मितन्नी , ईरानी सुमेरियन आयोनियन और स्वीडन के मिथकों में प्राप्त है ।

 कायस्थ समुदाय समाज के सभी प्रशासनिक कारीयों का विवरण प्रस्तुत करने वाला भी हुआ जैसे यम के शासन में चित्रगुप्त की परिकल्पना यह गुप्त विशेषण मिश्र के कॉप्ट से साम्य रखता है । पुराणों से पूर्वकाल में रचित सूत्र ग्रन्थों में चित्रगुप्त का नाम तो मिलता है किन्तु उनके विशेषण के रुप में कायस्थ शब्द नहीं मिलता।

 इस सम्बन्ध में ‘बौधायन स्मृति’ के पृष्ठ 455 अध्याय 5 के सूत्र 140 में ‘ऊं चित्रगुप्तम तर्पयामि’ तथा कातीय तपर्ण सूत्र में ‘यमांश्चैके’। 

यमाध्र्माराजाय मृत्यवेचान्तकाय च। 

वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय च।।

 औदुम्बराय दध्नाय नीलाय परमेषिठने। 

वृकोदराय चित्राय चित्रगुप्ताय ते नम:।। 

एकैकस्य त्रीस्त्रीन दधाज्जलान्जुलीन।
 यावज्जन्म कृतम पापम तत्क्षणादेवनश्यति।।

 किन्तु पुराण काल के पश्चात बारहवीं शताब्दी में कायस्थ शब्द, श्री हर्ष विरतिचत ‘नैषधीय चरित’ में ‘दृग्गोचरोअभूदथ चित्रगुप्त: कायस्थ: उधैगर्णतदीय:।’ 

तथा इंडियन ऐणिडक्वेटी जिल्द-19 पृष्ठ 59 पंक्ति 15 में ‘ दक्ष: प्राज्ञो विनीतात्मा गुरुभक्त: प्रियंवद:। तृप्तो∙र्थेरौपकश्र्चासिमन कायस्थो गोमिकांगूंज:।’ 
प्रयुक्त हुआ। 

विष्णु धर्म सूत्र (विष्णु स्मृति के अध्याय 7 गधांश 3 में ‘राज्याधिकरणे तनिनयुक्त कायस्थ कृत तदध्यक्ष करं चिनिहतम राजा साक्षिकम’ के अनुसार ‘कायस्थ को राजलेखक माना गया है।

 क्षेमेन्द्रकृत ‘नर्ममाला’ में कायस्थ को गृह कृत्याधिपति’ अथवा ‘गृह-महत्तम’ (होम मिनिस्टर) कहा गया। 

इसी ग्रंथ के प्रथम परिहास के प्रथम श्लोक में तो कायस्थ को परमेश्वर का रुप कहा गया है। 

येनेदम स्वैच्छया, सर्वम, माययाम्मोहितम जगत।
 स जयत्यजित: श्रीमान कायस्थ: परमेश्वर:।।

 ‘उत्तर गीता’ के प्रथम अध्याय के श्लोक 27 से 31

 ‘काय-स्थो पि न जायते काय-स्थोपिन भुंजान: काय-स्थो पि न बाध्यते।’ के अनुसार कायस्थ को परमात्मा कहा गया है। 

विष्णु धर्मोत्तर पुराण के तृतीय खण्ड 51 श्लोक 13 में ‘कायस्थ चित्रगुप्त को अन्तर्यामी कहा गया है।

 यथा – ‘चित्रगुप्तो विनिर्दिष्टतयात्मा सर्व-देहग:।
 पत्रम धर्ममधर्म: च करस्था तस्य लेखिनी।।’

 इत्यादि ग्रन्थों के अनुसार कायस्थ शब्द कपोल कलिपत अथवा अर्वाचीन न होकर सनातन अथवा अत्यन्त प्राचीन है। 

कायस्थ की व्युत्पति पुराणों के अनुसार नवग्रहों में अन्तिम (नवम) केतु ग्रह की अधि देवता तथा प्रत्यधिदेवता क्रमश: ब्रह्राा जी व चित्रगुप्त जी हैं।

 चित्रगुप्त जी ब्रह्राा जी के ध्यान-ज-पुत्र हैं। 
उत्पत्ति से पूर्व चित्रगुप्त ब्रह्मा के काय (शरीर) में स्थित (‘स्थ’) थे जो ब्रह्राा के ध्यान करने से प्रकट हो गये।

 अत: वे ब्रह्रा-कायस्थ हुए। जो समयोपरान्त कायस्थ कहलाये।

 इस महाजाति के अन्तर्गत चित्रगुप्त वंशय, बंगीय, महाराष्ट्रीय, इत्यादि अवान्तर भेद तथा उनके भी उपभेद रुप सूर्यद्विज, श्रीवास्तव, निगम, गौड़, माथुर, भट्टनागरादि, उत्तरराढ़ीय वारेन्द्र, वंगज, आदि कायस्थों की विविध जातियां बनी।

 ब्रह्रा पुराण 21556 और शिवपुराण उमासंहिता के अध्याय 7 में चित्रगुप्त भगवान पापियों को धर्मोपदेश करते हुए जज अथवा सरकारी वकील का कार्य करते हैं। 

ब्रह्रावैवर्त पुराण 3236 और पदम पुराण के श्रृष्टि-खण्डोपनाम किया खंड अध्याय 56 के अनुसार श्री चित्रगुप्त जी यमधर्मराज के यहा दण्ड निर्धारण अर्थात जज का कार्य करते हैं।

 याज्ञवल्क्य स्मृति के सप्तम शताब्दी से लेकर सत्रहवीं शताब्दी के टीकाकारों ने ‘कायस्थ’ शब्द का अर्थ निरुपण इस प्रकार किया है – 1. रामदय: लेखका: इत्यन्ते। 2. लेखका: गणकाश्च। 3. कराधिकृता:। 4. राजाधिकृतैलेखिका:।

 आदि से किया है। वृहत पराशर संहिता तथा राजा तरंगिणी 8131 ‘निसर्ग-वचका: वेश्या: कायस्थों दिविरो वणिक’ के अनुसार कायस्थ और दिविर का अलग-अलग उल्लेख मिलता है। 

सामान्य अर्थ में कायस्थ का अर्थ कराधिकारी (एकाउन्टस आफीसर) और दिविर( लिपिक) का शब्द का अर्थ लेखाकार (एकाउन्टेंट) से किया जाता रहा है। 

राजंतरंगिणी 613 ‘कार्तानितको भिषक सभ्यो गुरुमंत्री पुरोहित: दूत: स्थेयो लेखको वा न तदाभूदपणिडत:।’ 
महाराज यशस्कर के राज्यकाल 939’948 र्इस्वी तक ज्योतिषी, वैध, सभासद, गुरु, मंत्री, पुरोहित, जज, लेखक आदि अधिकारीकर्मचारी अ-पण्डित नहीं थे। 

इससे स्पष्ट होता है कि कायस्थ ब्राह्राण वर्ग में ही आते थे। 
उधर ब्रह्रावैवर्त पुराण प्रकृति खण्ड 288-15, के अनुसार

 ‘यज्जन्म ब्रह्राणो वंशेज्वलतम ब्रह्राा तेजसा। 
योध्यायति परम ब्रह्रा वंशम नमाम्यहम’ में भी भगवान चित्रगुप्त को ब्रह्रा-वंशी होने के कारण नमस्कार किया गया है।

 पणि ऋग्वेद में पणि नाम से ऐसे व्यक्ति अथवा समूह का बोध होता है, जो कि धनी है किन्तु देवताओं का यज्ञ नहीं करता तथा पुरोहितों को दक्षिणा नहीं देता। 
अतएव यह वेदमार्गियों की घृणा का पात्र है। देवों को पणियों के ऊपर आक्रमण करने के लिए कहा गया है। 
आगे यह उल्लेख उनकी हार तथा वध के साथ हुआ है। 

वेदों में पणियों को ग्रथिन के रूप में भी  वर्णन है।
 पणि कौन थे? राथ के मतानुसार यह शब्द 'पण्=विनिमय' से बना है तथा पणि वह व्यक्ति है, जो कि बिना बदले के कुछ नहीं दे सकता। 

 ये अपने सार्थ अरब, पश्चिमी एशिया तथा उत्तरी अफ़्रीका में भेजते थे और अपने धन की रक्षा के लिए बराबर युद्ध करने को प्रस्तुत रहते थे।
 दस्यु अथवा दास शब्द के प्रसंगों के आधार पर उपर्युक्त मत पुष्ट होता है। 
किन्तु आवश्यक है कि आर्यों के देवों की पूजा न करने वाले और पुरोहितों को दक्षिणा न देने वाले इन पणियों को धर्मनिरपेक्ष, लोभी और हिंसक व्यापारी कहा जा सकता है।
 ये आर्य और अनार्य दोनों हो सकते हैं। 
हिलब्रैण्ट ने इन्हें स्ट्राबो द्वारा उल्लिखित पर्नियन जाति के तुल्य माना है। 
जिसका सम्बन्ध दहा (दास) लोगों से था। 
फ़िनिशिया इनका पश्चिमी उपनिवेश था, जहाँ ये भारत से व्यापारिक वस्तुएँ, लिपि, कला आदि ले गए। वैदिक-काल के सामाजिक-संघर्ष मानव सभ्यता के इतिहास का पुनर्पाठ करते हुए प्रेमकुमार मणि बता रहे हैं कि वैदिक काल के दौरान आर्यों-हिन्दुओं के अलावा आर्यों के विभिन्न समूहों के बीच भी सामाजिक और सांस्कृतिक दोनों तरह के संघर्ष हुए। वेदों की रचना हुई।

 विद्वानों के अनुसार यह समय अनुमानतः ईसापूर्व 1500 वर्ष से लेकर 1000 ईस्वीपूर्व तक का था। कुछ अतीतजीवी लोग समझते हैं कि वैदिक-काल की बोल-चाल की भाषा संस्कृत थी और उन दिनों सम्पूर्ण भारत पर आर्यजन ही रहते थे। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं था। 

संस्कृत रचना की भाषा थी। कुछ विशिष्ट किस्म के लोग ही इसमें पारंगत थे; और स्वाभाविक है, उन्हें इस बात का थोड़ा गुमान भी रहा होगा। 

जैसे आर्थिक रूप से संपन्न लोग अपने बनाये दुर्ग में रहते हैं, वैसे ही ये विशिष्ट लोग अपनी भाषा की गुफा में रहते थे। हाँ, इनकी जीवन-शैली और दृष्टिकोण शेष लोगों से भिन्न थे। 

देव संस्कृति के उपासक तत्कालीन भारतीय समाज के एक बहुत ही छोटा हिस्सा थे। 

अन्य समाजों से इनका धीरे-धीरे मिलना स्वाभाविक था। ये मिले और फिर एक मिश्रित समाज बना। 

लेकिन देव संस्कृति का प्रभाव भारतीय समाज पर जबरदस्त रूप से पड़ा।
 इसका कारण यह रहा कि राजसत्ता पर उनका प्रभाव बढ़ गया था। देव संस्कृति के अनुयायीयों का जीवन-यापन कैसा था, इसकी कुछ सूचना हमें ऋग्वेद से ही मिलती है।

 घोडा, आरा वाले पहिये का रथ, यज्ञ, अग्निवेदी, सोम-पान और दाहकर्म उनकी ऐसी विशेषता थी, जो उन्हें अन्य-जातियों से विलग करती थीं। 

सिन्धु-सभ्यता में घोड़े की उपस्थिति नहीं मिलती। अपवाद में लोथल में मिली घोड़े की मृण्मयी मूर्तियां हैं। लेकिन यह उत्तर सिंधु काल के समय की हैं।
 सिन्धुवासी व्यापार के लिए बाहर जाते रहते थे और घोड़े से उनका परिचित होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

 'परन्तु घोड़ा सिन्धु क्षेत्र में था ।
 क्योंकि सैन्धव घोड़े का पर्य्याय है । जैसे कि गाय। हड़प्पा की मोहरों पर सांढ़ की उपस्थिति गाय को उनके जीवन के लिए जरुरी होना सिद्ध करता है।
 बैल से हड़प्पावासी वही काम लेते थे , गाय दूसरे स्थान पर थी।
 ऋग्वेद में 250 स्थानों पर घोड़े का उल्लेख है, तो 176 स्थानों पर गौ के। 

यद्यपि आर्य्य थ्योरी को बनाने वाले नहीं जानते कि असीरीयों के असुर महत् (अहुर मज्दा) के उपासक ही अपने को आर्य्य कहते थे

प्रस्तुति-करण यादव योगेश कुमार'रोहि'भारतीय समाज ही नहीं अपितु विश्व के सम्पूर्ण मानव समाजों में संस्कृतियों की भित्तियाँ ( दीवारें) धर्म की आधार-शिलाओं पर प्रतिष्ठित हुईं । 

भाषा जो परम्परागत रूप से अर्जित सम्पदा है वह भी मानव समाजों के सांस्कृतिक , धार्मिक और व्यावहारिक जीवन के संवादों की संवाहिका रही है । 

संस्कृतियों 'ने समय के अन्तराल में कई करबटें ली दूसरी संस्कृतियों  समन्वय और विनिमय सदीयों से चलता रहा।

 इतिहास अतीत का वक्ता बन कर जब उपस्थित हुआ तो कई सांस्कृतिक विपर्यय दृष्टि गोचर हुए । 

आज हम बात करते हैं कायस्थों की सांस्कृतिक उपलब्धियों पर
जिनका भारतीय पौराणिक ग्रन्थों में यम के पाप- पुण्य के लेखाधिकारी चित्रगुप्त सम्बद्ध किया गया।

यम का विवरण तो हम्हें विश्व की अनेक पुरा-कथाओं में मिलता है ।
कनान देश की कैनानाइटी संस्कृतियों में ईरानीयो के धार्मिक ग्रन्थों "अवेस्ता ए जैंद " और सुमेरियन बैबीलॉनियन मिथकों यूनानी-माइथॉलॉजी तथा सुदूर उत्तरावर्ती नॉर्स पुरा-कथाओं में भी मिलता है।
चित्रगुप्त भी एक योगज शब्द है - जिसका अर्थ होता है जो गुप्त रूप से मनुष्यों के अच्छे- बुरे कर्मों को देख कर उनका यथाक्रम चित्रण या लेखन करता हो ---
और राजा की राजनैतिक व्यवस्थाओं के नियमन का क्रमोत्तर विवरण  भी लिखित रूप में आवश्यक है ।

इसी लिए चित्रगुप्त को अपना आदिपुरुष मानने वाले  कायस्थ लोग भी मुगल और अंग्रेज़ी सल्तनत में प्रशासनिक लेखाधिकारी नियुक्त बहुतायत से किये गये ।
'परन्तु ये कायस्थ संज्ञा से क्यों अभिहित हुए ।
इसी शब्द की व्युत्पत्ति पर भी -विचार आवश्यक है ।

 यद्यपि कायस्थ शब्द का  सम्बन्ध काया में स्थित 
अथवा कार्यस्थ से निर्धारित करना भारतीय पुरोहितों की भारतीय पुरोहितों की समन्वय कारी नीति से सम्बद्ध है ।

'परन्तु कायस्थ शब्द की व्युत्पत्ति के सूत्र  सुमेरियन मिथकों में वर्णित कसाइट  अथवा कस्सी
 जन-जाति में खोजे जा सकते हैं ।
फॉनिशियन शब्द कार्थेज से भी है ।
किस प्रकार से है इन सभी बातों का विश्लेषण हम करेंगे ।

 वैदिक ऋचाओं में वर्णित पणि जन-जाति जो समुद्रीय यात्राोओं के द्वारा देश- देशान्तर में व्यापार करती था ।
इनको वंशज भी कहीं नहीं आज के बनिया या वणिक हैं ।
यद्यपि बणिको और कायस्थों की व्यावहारिक शैली में समानता  दृष्टि गोचर होती है ।

 कायस्थ का प्रत्यक्ष सम्बन्धी है इण्डो-यूरोपियन - सुमेरियन कासाइट शब्द ।
'परन्तु यह निर्णय या निष्कर्ष पूर्व दुराग्रह से प्रेरित भी माना जाएगा यदि इसके प्रभावी साक्ष्य प्रस्तुत 'न किए जाऐं तो 

'परन्तु साक्ष्य हैं प्रभावशाली ---
भारत की प्राचीनत्तम सांस्कृतिक नगरी काशी या कशमीर जैसे नामों के मूल में  सुमेरियन कासाइट जन-जाति का नाम ही है ।
यह सुमेरियन जन-जाति भारतीय पौराणिक सन्दर्भों में कस: के नाम से है ।

👇खस (प्राचीन जाति) और एशिया ·
 तिब्बत का भूक्षेत्र तिब्बत के खम प्रदेश में बच्चे तिब्बत का पठार तिब्बत (Tibet) एशिया का एक क्षेत्र है जिसकी भूमि मुख्यतः उच्च पठारी है। इसे पारम्परिक रूप से बोड या भोट भी कहा जाता है। इसके प्रायः सम्पूर्ण भाग पर चीनी जनवादी गणराज्य का अधिकार है जबकि तिब्बत सदियों से एक पृथक देश के रूप में रहा है।

 यहाँ के लोगों का धर्म बौद्ध धर्म की तिब्बती बौद्ध शाखा है तथा इनकी भाषा तिब्बती है। चीन द्वारा तिब्बत पर चढ़ाई के समय (1955) वहाँ के राजनैतिक व धार्मिक नेता दलाई लामा ने भारत में आकर शरण ली और वे अब तक भारत में सुरक्षित हैं।

 खस (प्राचीन जाति) और तिब्बत · और देखें » नेपाल नेपाल, (आधिकारिक रूप में, संघीय लोकतान्त्रिक गणराज्य नेपाल) भारतीय उपमहाद्वीप में स्थित एक दक्षिण एशियाई स्थलरुद्ध हिमालयी राष्ट्र है। 

नेपाल के उत्तर मे चीन का स्वायत्तशासी प्रदेश तिब्बत है और दक्षिण, पूर्व व पश्चिम में भारत अवस्थित है। 


 कसाइट kassites /Kaysites या Kushites के साथ भ्रमित होने की नहीं। "कासाइट" यहां पुनर्निर्देश करता है। 


प्राचीन निकट पूर्व के लोग थे, जिन्होंने पुरानी बेबीलोनियन साम्राज्य के पतन के बाद बेबीलोनिया को नियंत्रित किया था। 

यह बात सॉ1531 ईसा पूर्व और सी तक। 1155 ईसा पूर्व (लघु कालक्रम)। कास्साइट्स का नाम शायद गैलज़ू था,

 हालाँकि उन्हें  कासेकू, कासी, कासी या काशी नामों से भी जाना जाता है।
 ________________________________
भारतीय पुरोहितों का  कलम पर ही नही राज्य के प्रत्येक क्षेत्र में एकाधिकार पुष्यमित्र सुंग ईसा० पूर्व 184 से 148 के समकक्ष स्पष्टत है ।
पुष्यमित्र सुँग का राज्य की सत्ता और समाज में 
उद्देश्य ब्राह्मण वर्चस्व स्थापित करना था ।
उसे अनुभव हो रहा था कि बौद्धों की उदार विचार धारा और महात्मा बुद्ध के धर्म चक्र के स्थापन से ब्राह्मण धर्म  की हानि 


 इन पुरोहितों'ने एक अभियान के तहत स्वयं को वर्तमान और भविष्य की दृष्टि से उपयोगकी सिद्ध करने के लिए अनेक धार्मिक विधानों का सृजन भी किया ।

 विद्वत्ताके क्षेत्र में तत्कालीन पुरोहितों से स्पर्द्धा रखने वाली जन-जाति कायस्थ ही थी । 
जिनके संयुक्त पूर्वज फोनीसियन और कस्सी जन-जाति के लोग थे

भारतीय पौराणिक सन्दर्भों में जो देव सूची में अनेक देवी देवता सुमेरियन , बैबीलोनियन पुराणों से सम्बद्ध हैं ।

इस  साम्राज्य का कसाइड वंश लगभग 1600 ई.पू. -से  लगभग 1155 ई.पू.  तक  अपने अस्तित्व में रहा --

कसदियों के अधीन बेबीलोन साम्राज्य,  13 वीं शताब्दी ई.पू.म ें था ।
  • असीरिया और एलम द्वारा आक्रमण लगभग 1158 ई.पू. में हुआ यह  विघटित रूप लगभग 1155 ई.पू. का  असीरीयों
द्वारा सफल द्वारा पूर्ववर्ती पहला बेबीलोन राजवंश मध्य असीरिया साम्राज्य एलामाइट साम्राज्य आज ईरान का हिस्सा है।

 

1595 ईसा पूर्व (यानी 1531 ईसा पूर्व लघु कालक्रम) में शहर के हित्ती शेखों के द्वारा बाद में उन्होंने बेबीलोनिया पर नियंत्रण प्राप्त किया, और पहले बाबुल और बाद में दुर-कुरिगालु में आधारित वंश की स्थापना की। 

कस्सी एक छोटे सैन्य अभिजात वर्ग के सदस्य थे, लेकिन कुशल शासक थे और स्थानीय रूप से अलोकप्रिय नहीं थे, ।

और उनके 500 साल के शासनकाल ने बाद के बेबीलोनियन संस्कृति के विकास के लिए एक आवश्यक आधार तैयार किया।

 रथ और घोड़ा, जिस पर काशी वासी पूजा करते थे, वह इस समय बेबीलोनिया में पहली बार आया।
सुमेरियन शहर किश की तर्ज पर काशी और अक्काड की तर्ज पर अवध जैसे राज्यों की परिकल्पना हुई ।

यद्यपि कस्सी भाषा का मिलान वैदिक ऋचाओं में प्राप्त भाषा से आँशिक रूप से है ।
 'परन्तु आधुनिक भाषा तत्व वेत्ताओं के अनुसार उनकी भाषा इंडो-यूरोपीय भाषा समूह से संबंधित नहीं थी, न ही सेमिटिक या अन्य एफ्रो-एशियाई भाषाओं से और सबसे अधिक संभावना है कि भाषा अलग-थलग रही है,।
'परन्तु इसका भाषा में वैदिक संस्कृतियों के प्राचीनत्तम सूत्र विद्यमान हैं।


 हालांकि कुछ भाषाविदों ने एशिया माइनर की हुरो-उरार्टियन भाषाओं के लिए एक लिंक का प्रस्ताव दिया है।

  और कासियों के आगमन को भारत-यूरोपीय लोगों के समकालीन प्रवास से जोड़ा गया है। 


 कई कस्सी नेताओं और देवताओं ने इंडो-यूरोपीय नामों को जन्म दिया,।
और यह संभव है कि वे मितानी के समान एक इंडो-यूरोपीय अभिजात वर्ग के प्रभुत्व में थे, जिन्होंने एशिया माइनर के हुरो-उरार्टियन बोलने वाले हुरियानों पर शासन किया था। ।

मितन्नी शब्द ऋग्वेद के मितज्ञु का विकसित रूप है ।

 Kassites की मूल मातृभूमि अच्छी तरह से स्थापित नहीं है, लेकिन प्रतीत होता है कि अब ईरान के लोरेस्तान प्रांत में ज़ाग्रोस पर्वत स्थित है।

 हालाँकि, कसाइड लोग एलामाइट्स, गुटियन और मानेन्स की तरह थे, जिन्होंने उनसे पहले भाषाई तौर पर ईरानी भाषी लोगों से संबंध नहीं बनाए थे, ।

 जो बाद में इस सहस्राब्दी के क्षेत्र में हावी हो गए थे।
वे पहली बार 18 वीं शताब्दी ईसा पूर्व इतिहास में दिखाई दिए, 

जब उन्होंने सामसु-इलूना (शासनकाल 1749–1712 ईसा पूर्व) के शासन के 9 वें वर्ष में बेबीलोनिया पर हमला किया, जो हम्मुराबी के पुत्र थे।

 सामसु-इलुना ने उन्हें निरस्त कर दिया, जैसा कि अबी-एशुह ने किया था, लेकिन बाद में उन्होंने बेबीलोनिया को नियंत्रित कर लिया। 1570 ईसा पूर्व में बाबुल के पतन के 25 साल बाद 1595 ईसा पूर्व, और मेसोपोटामिया के दक्षिणी भाग को जीतने के लिए चला गया, मोटे तौर पर प्राचीन सुमेर के अनुरूप और इनके द्वारा राजवंश के रूप में जाना जाता है। 

1520 ई.पू. हित्तियों ने भगवान मर्दुक की मूर्ति को हटा दिया था,

जिसे भारतीय वैदिक सन्दर्भों में मृडीक कहा गया ।
 लेकिन कसाहड शासकों ने कब्जा कर लिया, मर्दुक को बाबुल में लौटा दिया, और उन्हें कसाइड शुक्मुना के बराबर बना दिया।

 व्यापक उथल-पुथल के इस तथाकथित "डार्क एज" अवधि से प्रलेखन की कमी के कारण, सत्ता में उनके उदय की परिस्थितियां अज्ञात हैं। 

Kassite भाषा में कोई भी शिलालेख या दस्तावेज़ संरक्षित नहीं किया गया है, एक अनुपस्थिति जो आधिकारिक रूप से आकस्मिक नहीं हो सकती है, जो आधिकारिक हलकों में साक्षरता के गंभीर प्रतिगमन का सुझाव देती है।

 कैसिटाई शासकों के तहत बाबुल, जिन्होंने शहर करंदुनाश का नाम बदला, मेसोपोटामिया में एक राजनीतिक और सैन्य शक्ति के रूप में फिर से उभरा। 

कुरिगाल्ज़ू I (14 वीं शताब्दी ईसा पूर्व) के सम्मान में एक नव निर्मित राजधानी शहर डर-कुरिगालज़ू का नाम रखा गया था। उनकी सफलता के सापेक्ष राजनीतिक स्थिरता का निर्माण किया गया था, जो कासेट के राजाओं ने हासिल किया था। उन्होंने बेबीलोन पर लगभग चार सौ वर्षों तक बिना किसी रुकावट के शासन किया - बेबीलोन के इतिहास में किसी भी राजवंश का सबसे लंबा शासन।

 Kassite शक्ति का गठन दक्षिणी मेसोपोटामिया का एक क्षेत्रीय राज्य में परिवर्तन, मित्र देशों या जुझारू राज्यों के एक नेटवर्क के बजाय, बेबीलोनिया को एक अंतरराष्ट्रीय शक्ति बना दिया, 

हालांकि यह अक्सर इसके उत्तरी पड़ोसी, असीरिया (असुर)और एलाम द्वारा पूर्व में देखा गया था। 

कसाई राजाओं ने असीरिया के साथ व्यापार और कूटनीति की स्थापना की। 

असीरिया और बर्न-बरिश के पूजुर-आशुर III ने 16 वीं शताब्दी ईसा पूर्व, मिस्र, एलाम और हित्तियों और मध्य में दो राज्यों के बीच सीमा पर सहमति जताते हुए एक संधि पर हस्ताक्षर किए और कसाई शाही ने अपने शाही परिवारों के साथ विवाह किया।


 बेबीलोन और अन्य शहरों में विदेशी व्यापारी थे, और बेबीलोन के व्यापारी मिस्र (न्युबियन सोने का एक प्रमुख स्रोत) से असीरिया और अनातोलिया  (मध्य एशिया)तक सक्रिय थे।

 केसेट वेट और सील, पैकेट की पहचान करने और मापने के उपकरण, जो अब तक ग्रीस में थेब्स के रूप में, दक्षिणी आर्मेनिया में और यहां तक ​​कि आज के तुर्की के दक्षिणी तट से उलुबुरुन शिपव्रेक में पाए गए हैं।


 15 वीं शताब्दी ई.पू. के मध्य में असीरिया के कुरीगलज़ु  प्रथम 
और अशुर-बेल-निशु के बीच एक और संधि पर सहमति हुई।

 हालाँकि, बेबीलोनिया ने 1365 ईसा पूर्व में अशुर-उबलित प्रथम के आगमन के बाद अगले कुछ शताब्दियों के लिए असीरिया से हमले और वर्चस्व के तहत खुद को पाया जिसने आसिया (हित्तियों और मिस्रियों के साथ) को निकट पूर्व में प्रमुख शक्ति बनाया।

 बाबुल में 1360 के दशक में असीरियन राजा अशुर-उदबली प्रथम (1365–1330 ईसा पूर्व) द्वारा बाबुल को बर्खास्त कर दिया गया था जिसकी शादी अशुर-उबलित की बेटी से हुई थी, 

उसकी हत्या कर दी गई थी. और अशुर-उबलित ने तुरंत बेबीलोनिया में मार्च किया और अपने दामाद का बदला लिया, राजा को जमा किया और वहां के राजा के रूप में शाही कसाइड

 लाइन के कुरिगालज़ू द्वित्तीय को स्थापित किया।

 उनके उत्तराधिकारी एनिल-निरारी (1330–1319 ई.पू.) ने भी बेबीलोनिया पर हमला किया और उनके महान पोते अदद-निरारी प्रथम (1307–1275 ई.पू.) ने बेबिलोनियन क्षेत्र पर कब्जा कर लिया जब वह राजा बने।

 तुकुल्ली-निनूर्ता I (1244–1208 ई.पू.) केवल बेबीलोनिया के वर्चस्व वाली सामग्री नहीं थी, आगे जाकर बेबीलोनिया पर विजय प्राप्त की, कश्टिलाश चतुर्थ को जमा किया और 1235 ईसा पूर्व से 1227 ईसा पूर्व तक आठ वर्षों तक वहाँ शासन किया।

 नियंत्रण और प्रतिष्ठा के दौर में (Kassite )कसाइड राजा बनाए गये हैं ।

सुसा एल्म की राजधानी थी और बाद में एलियामिस की, इसलिए स्ट्रैबो का कथन है कि कास्तिस ने अपनी अपनी राजधानी के खिलाफ एलाम या एलियामी के भीतर एक विशेष समूह का समर्थन करने के लिए हस्तक्षेप किया, जो उस समय स्पष्ट रूप से बेबीलोन या सेल्यूकाइड के अधीन था।

 अंतिम रिकॉर्ड कसाईट संस्कृति का नवीनतम साक्ष्य दूसरी शताब्दी के भूगोलवेत्ता टॉलेमी का संदर्भ है, जिन्होंने "कोसैई" को "एलीमियंस" से सटे सूसा क्षेत्र में रहने वाले के रूप में वर्णित किया।

 यह कई मामलों में से एक का प्रतिनिधित्व कर सकता है जहां टॉलेमी आउट-ऑफ-डेट स्रोतों पर निर्भर थे। 

यह माना जाता है कि [किसके द्वारा?] कि काशियों का नाम काशगन नदी के नाम पर लोरेस्टन में रखा गया है। 



 भारतीय पौराणिक सन्दर्भों में कश: जन-जाति का वर्णन झल्ल और मल्ल जनजातियों के साथ है ।
सुमेरियन मिथकों से भारतीय मिथकों का सम्बन्धी आकस्मिक नहीं है ।
मल्ल और झल्ल जनजातियों के कश: सहवर्ती थे ।
_______________________________________
 सवर्णायां व्रात्यक्षत्रियाजाते जातिभेदे “झल्लो मल्लश्च राजन्याद्व्रात्यान्निच्छिविरेव च । 
नटश्च करणश्चैव खसो द्रविड एव च” मनुःस्मृति . 

वर्तमान गढ़वाल और उसके उत्तरवर्ती प्रांत का प्राचीन नाम भी कस है  और इस प्रदेश में रहनेवाली एक प्राचीन जाति ।

 स्वपच सवर खस जमन जड़ पाँवर कोल किरात ।
 राम कहत पावन परम होत भुवन विख्यात ।
— तुलसी राम-चरित मानस ।

 विशेष—कस को भारतीय पुराणों में व्रात्य क्षत्रिय से उत्पन्न इस जाति का वर्णन महाभारत और राजतरंगिणी में आया है । 

इस जाति के वंशज अब तक नेपाल और किस्तवाड़ (काश्मीर) में इसी नाम से विख्यात है और अपने आपको क्षत्रिय बतलाते हैं । 
भारतीय कायस्थ भी कसो से सम्बद्ध हैं।

ये लोग बड़े परिश्रमी और साहसी तथा प्रायः सैनिक होते हैं ।
 इन्ही को खासिया भी कहते 
-स्मृतियों में वर्णन है कि 

"पौण्ड्रकाश्चौड्रद्रविडाः काम्बोजा जवनाः शकाः ।
 पारदाः पह्नवाश्चीनाः कीराता दरदाः खशाः ।
 "__________________________________

खस एक प्राचीन जाति, जो कदाचित शकों की कोई उपजाति थी।
वाले भी शक्सेना का अर्थ शकों की सेना में सम्मिलित...

 मनुस्मृति कार  ने इन्हें क्षत्रिय बताया है किंतु कहा है कि संस्कार-लोप होने और ब्राह्मणों से संपर्क छूट जाने के कारण वे शूद्र हो गए।

 महाभारत के सभापर्व एवं मार्कंडेय तथा मत्स्यपुराण में इनके अनेक उल्लेख प्राप्त होते है। 
'परन्तु पुराणों का रचनाकाल पुष्यमित्र सुँग के समय से उन्नीसवीं सदी तक होता रहा ।

समझा जाता है कि महाभारत में उल्लिखित खस का विस्तार हिमालय में पूर्व से पश्चिम तक था। 

राजतरंगिणी के अनुसार ये लोग कश्मीर के नैऋत्य कोण के पहाड़ी प्रदेश अर्थात् नैपाल में रहते थे। 
अत: वहाँ के निवासियों को लोग खस मूल का कहते हैं।
कश्मीर शब्द भी कस जन-जाति से सम्बद्ध है ।

 सिल्वाँ लेवी की धारणा है कि खस हिमालय में बसने वाली एक अर्धसंस्कृत जाति थी जिसने आगे चलकर बुद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। 

फिर 12 सताब्दी में हिन्दु धर्म को ग्रहण कर लिआ।
 यह भी धारणा है खस लोग काश्गर अथवा मध्य एशिया के निवासी थे और तिब्बत के रास्ते वे नैपाल और भारत आए। 
फोनीसियन लोगों से भी सम्बद्ध थे कसाइड लोग...
क्योंकि जो जनजातियाँ वेदों में हैं वही सुमेरियन बैबीलॉनियन मिथकों में भी वर्णित हैं ।
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यद्यपि ये कायस्थ भी कहीं 'न कहीं वणिकों के सजातीय पणियों के वंशज थे । 
अब ये बात सूत्रात्मक है जब व्याख्या की जाएगी तो बात समझ में आयेगी । 

अब हम इन्हीं तथ्यों की व्याख्या करते हैं कर्थेज शब्द से कायस्थ शब्द विकसित हुआ. भारत में यात्रा करते हुए इसका एक रूप केसेड और कायष्ड और कायस्थ भी हुआ ।

 . केसेड अथवा भारतीय कायस्थ .. कार्थेज शब्द (अरबी भाषा में ( قرطاج,) क़र्ताज; और अंग्रेज़ी: Carthage, कार्थ़ेज) हो गया है ।

 उत्तर अफ़्रीका के त्यूनिसीया देश में लगभग 3,000 साल से लगातार आबाद एक प्राचीन शहर है। कार्थेज था जहांँ पणि या वणिक रहते थे । 

ये समुद्रीय व्यापारों के द्वारा देश देश की यात्रा करते हुए अपने ज्ञान और भाषा से विश्व को व्यावहारिक संवाद के सूत्र या नियम दे रहे थे इन्होंने विश्व को लिपि और भाषा नेवी विद्या प्रदान की इनकी अनेक उपलब्धियों का वर्णन सहज नहीं ।

 ये प्यूनिक तो कहीं फोनीसियन तो कहीं बनिया के रूप में समाज को बनाते और बुनते रहे .. इनका सम्बन्ध इतिहास में असीरीयों या यहूदियों से भी स्थापित किया गया तो कही ड्रयूडस् Druids अथवा दक्षिणी भारत के द्रविडो से 'परन्तु असल बात यह नहीं बतायी गयी की ये सभी इनके ही सहचर थे ।

 यद्यपि सांस्कृतिक रूप से ये देव संस्कृतियों के विद्रोही या इन्द्र उपासक पुरोहितों को दान 'ने देने वाले भी थे । परिणाम स्वरूप वैदिक पुरोहितों 'ने इन्हें उपेक्षात्मक रूप में वर्णन किया। और शत्रुओं की प्रशंसा या उन में गुणों के होते हुए भी कौन वर्णन करता है । 

फोनीसियन लोगों का यात्रिक अड्डा कार्थेज शहर था । यह शहर प्राचीन काल मे रोमन एवं फ़ोनिसीयन साम्राज्य का एक प्रमुख गढ़ रहा है। 

सन् 1000 ईसा-पूर्व के आसपास इसकी शुरुआत फ़ोनीशिया द्वारा स्थापित एक दूर-दराज़ बस्ती के रूप में हुई। 

आधुनिक युग में इसे त्यूनिसीया की राजधानी त्यूनिस का एक बाहरी क्षेत्र माना जाता है। प्राचीन रोमन स्रोतों के अनुसार इसकी स्थापना सन् 814 ईसापूर्व में फ़ोनीशिया के टायर शहर से (जो आधुनिक लेबनान में पड़ता है) वहाँ से आये एक फ़ोनीशियाई समूह ने की थी। कार्थेज तेज़ी सेू धन, शक्ति और प्रभाव में बढ़ने लगा।

 इस नगर पर केन्द्रित संस्कृति को उसके समकालीन रोमन लोग प्यूनिक (लातिनी: Punic) बुलाया करते थे, ।

 जो "फ़ोनीशिया" शब्द का ही एक बिगड़ा रूप है। समय के साथ भूमध्य सागर में यह रोम और यूनान के सिराक्यूज़ शहर से मुक़ाबला करने वाली तीसरी शक्ति के रूप में उभरा। इनमें आपसी झड़पों का सिलसिला छिड़ गया। 

दूसरे प्यूनिक युद्ध में प्रसिद्ध कार्थेजी नेता हान्निबल ने इटली पर चढ़ाई की और सन् 216 ई॰पू॰ में दक्षिणपूर्वी इटली में लड़े गए कैने के युद्ध में जीत प्राप्त की, जिस से लगने लगा के इटली के कई क्षेत्रों से रोम का साम्राज्य उखड़ जाएगा। 

लेकिन सन् 202 ई॰पू॰ में लड़े गए ज़ामा के युद्ध में हान्निबल पराजित हुआ और कार्थेज बहुत कमज़ोर पड़ गया। सन् 149-146 ई॰पू॰ में लड़े गए तीसरे प्यूनिक युद्ध में कार्थेज की पूरी हार हो गयी। रोम के फ़ौजों ने कार्थेज के शहर को पूरी तरह जला और तोड़ डाला।

 कार्थेज के सभी नागरिकों को मार डाला गया या दास बना लिया गया। कुछ समय बाद रोम ने ही कार्थेज की फिर स्थापना की और यह शहर समय के साथ-साथ रोमन साम्राज्य का चौथा सब से महत्वपूर्ण नगर बना। 

कुछ समय तक यह अल्प आयु वाले वैन्डल राज्य की राजधानी भी रहा। सन् 698 ईसवी में अरब फ़ौजें यहाँ आ धमकी और कार्थेज दूसरी दफ़ा नष्ट किया गया।

 भारत में जब देव-संस्कृति के अनुयायीयों का आगमन हो रहा था । वह समय ईसा० पूर्व 1500 से बारह सो के समकालिक है । फोनीसियन संस्कृति वैदिक पुरोहितों के समानान्तरण पणियों के रूप में भारत आयी ईसा० पूर्व सप्तम सदी में वर्ण व्यवस्था के विधानों को भारती समाज पर आरोपित किया जाने लगा । यद्यपि कायस्थ लोग यौद्धा, कलाकार, संगीत कार और भाषा तत्वो के सम्यक् विश्लेषक थे ।

 हैहयवंश के यादव आभीरों के सहवर्ती शकों की सेना में सम्मिलित होने से कायस्थ (कार्थेज वासी ) फोनीसियन लोगों का एक समुदाय शक्सेना हो गया । भारत में कायस्थों 'ने फोनीसियन तर्ज पर एक कैथी लिपिकालआविष्कार भी किया यह कैथी एक ऐतिहासिक लिपि है मैं मध्यकालीन भारत में प्रमुख रूप से उत्तर-पूर्व और उत्तर भारत में काफी बृहत रूप से प्रयोग किया जाता थी।

 खासकर आज के उत्तर प्रदेश एवं बिहार के क्षेत्रों में इस लिपि में वैधानिक एवं प्रशासनिक कार्य किये जाने के भी प्रमाण पाये जाते हैं इसे "कयथी" या "कायस्थी", के नाम से भी जाना जाता है। 

पूर्ववर्ती उत्तर-पश्चिम प्रांत, मिथिला, बंगाल, उड़ीसा और अवध में। इसका प्रयोग खासकर न्यायिक, प्रशासनिक एवं निजी आँकड़ों के संग्रहण में किया जाता था।

 ' कायस्थ समुदाय का पुराने रजवाड़ों एवं ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों से काफी नजदीक का रिश्ता रहा है। 

ये उनके यहाँ विभिन्न प्रकार के आँकड़ों का प्रबंधन एवं भंडारण करने के लिये नियुक्त किये जाते थे। 

कायस्थों द्वारा प्रयुक्त इस लिपि को बाद में कैथी के नाम से जाना जाने लगा। कैथी एक पुरानी लिपि है जिसका प्रयोग कम से कम 16 वी सदी मे धड़ल्ले से होता था। 

मुगल सल्तनत के दौरान इसका प्रयोग काफी व्यापक था। 1880 के दशक में ब्रिटिश राज के दौरान इसे प्राचीन बिहार के न्यायलयों में आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया था।

 इसे खगड़िया जिले के न्यायालय में वैधानिक लिपि का दर्ज़ा दिया गया था। भारत देश पर ढ़ाई हजार वर्षों से विदेशी आक्रमण होते रहे सबसे पहले ज्ञात साक्ष्यों के आधार पर असुर संस्कृति के उपासक ईरानीयों से भारतीय पुरोहितों का वैमनस्य परिणाम स्वरूप दारा प्रथम का भारत के सिन्धु क्षेत्र पर आधिपत्य उसके बाद सिकन्दर का आक्रमण ईसा० पूर्व 322 के समकालिक होता हैे ।

 'परन्तु ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र सुंग 'ने बौद्ध श्रमणों के संरक्षक वृहद्रथ की सैन्य परीक्षण के दौरान हत्या कर दी और नये सिरे ग्रन्थों का लेखन कार्य हुआ।

 पुष्यमित्र के शासन काल में पुरोहितों के दो वर्ग हो गये एक निश्पक्षता से आध्यात्मिक और आत्मिक साधानाओं के सम्पादक और एक पुष्यमित्र के निर्देशन में धार्मिक पौराणिक ग्रन्थों का लेखन कार्य करने वाले पुरोहितों का वर्ग । 

इन धार्मिक ग्रन्थों के कथानक सुमेरियन बैबीलॉनियन संस्कृतियों के मिथकों की जनश्रुतियों पर भी आश्रित थे ।

 -स्मृतियों का लेखन कार्य काशी में हुआ जिनमे अनेक जन-जातियों का उत्पत्ति काल्पनिक और ब्राह्मण पुरुषों के गुप्त यौनाचार के परिणाम स्वरूप दर्शायी ... लेखनी के वीर और कर्मनिष्ठ कायस्थों की उत्पत्ति के प्रसंग में अनेक काल्पनिक श्लक बाऐ गये ... 👇

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पुराणों में संवाद है कि –

 पुलस्त्य उवाच । 
चित्रगुप्तान्वये जाताः शृणु तान् कथयामि ते । 
महर्षि पुलस्त्य 'ने कहा कि चरित्र गुप्त के वंशजों के विषय में बताऊँगा।
______
श्रीमद्रा नागरा गौराः श्रीवत्साश्चैव माथुराः ।
 अहिफणाः सौरसेनाः शैवसेनास्तथैव च ।

 वर्णा वर्णद्वयञ्चैव अम्बष्ठाद्याश्च सत्तम! । 
शृणु तेषाञ्च कर्म्माणि कुरुवंशविवर्द्धन! ।

 पुत्रान् वै स्थापयामास चित्रगुप्तो महीतले । धर्म्माधर्म्मविवेकज्ञश्चित्रगुप्तो महामतिः । 

भूस्थानं बोधयामास सर्व्वसाधनमुत्तमम् ।
 पूजनं देवतानाञ्च पितॄणां यज्ञसाधनम् । 

वर्णानां ब्राह्मणानाञ्च सर्व्वदातिथिसेवनम् । 
प्रजाभ्यः करमादाय धर्म्माधर्म्म विलोकनम् । 

कर्त्तव्यं हि प्रयत्नेन पुत्राः स्वर्गस्य काम्यया । 
या माया प्रकृतिः शक्तिश्चण्डी चण्डप्रमर्द्दिनी ।
"_______________________________________

'परन्तु स्मृति ग्रन्थों में अनेक जन जैतियों के समान कायस्थों को भी नीचा बनाने के लिए काशी के पण्डितों'ने 
ब्राह्मण और वैश्या स्त्री के दे उत्पन्न कर दिया है ।
'परन्तु यह सब अस्तित्व हीन बातें हैं 
👇
 वैश्यायां विप्रतश्चौर्यात: कुम्भकारा प्रजायते ।
 कुलाल वृत्या जीवेत्तु, नापिता वा भवन्त्यतः ।।32।। 

कायस्थ इति जीवेत्तु विरचयेत् इतस्ततः । 
काकाल्लौल्यं यमात्क्रौर्यं स्थपते रथ कृन्तनम । 
आधक्षाराणि संगृहम कायस्थ इति कीर्तितः ।।34।। 
_______________________________________________
अर्थः-ब्राह्मण के द्वारा वेश्या स्त्री में चोरी से (जारकर्म द्वारा) कुम्हार उत्पन्न होता है । 

वह मिट्टी के बर्तन आदि बनाकर अपनी जीविका करे अथवा इसी प्रकार क्षौरकर्म करने वाला नाई उत्पन्न होता है ।

 वह अपने को कायस्थ कहकर कायस्थ की जीवका करता हुआ ईधर-उधर भ्रमण करे । 

काक से चंचलता, यमराज से क्रूरता, थवई से काटना, इस प्रकार काक, यम और स्थापित, इन तीनों शब्द के आद्य अक्षर लेकर कायस्थ शब्द की बनावट कही गई, 
जो उक्त तीनों दोषों के घोतक है । 
उक्त श्लोकों से स्पष्ट है कि शुक्राचार्य के नाम पर बनायी काल्पनिक मनगड़न्त स्मृति में कुम्हार ,नाई तथा कायस्थ की उत्पत्ति एक ही प्रकार से कर दी गयी है ।

 अथवा यों कहिए एक ही जाति के व्यक्तियों के ये जीविकानुसार तीन नाम हैं । अब व्यास के नाम बनायी व्यास स्मृति  के प्रथम अध्याय के श्लोक 11-12 में कायस्थ को शूद्रों और गोमांस भक्षियों में परिणित किया है ।

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 वणिक-किरात कायस्थ-मालाकार-कुटुम्बिनः ।
 वेरटोभेद-चाण्डाल-दास-श्वपच कोलकाः ।।

 एतेऽन्त्यजाः समाख्याता ये चान्ये च गवार्शनाः । 
एषा सम्भाषणात्स्नानं दर्शनादर्कवीक्षणम् ।।

 अर्थः-बनिए, किरात, कायस्थ, माली, बंसफोड़, स्यारमार, कंजर, चाण्डाल, कंजर, चांडाल, बारी, भंगी और कोल, ये सब अन्त्यज कहे गये हैं । 
इनसे और दूसरे गांमांस भक्षियों से बात करने पर स्नान करने से और इनको देखने पर सूर्य का दर्शन करने से दोष दूर होता है ।
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याज्ञवल्क्य के नाम पर बनायी स्मृति में  कायस्थों को चोर डाकुओं से अधिक खतरनाक बनाकर उनसे प्रजाओं की विशेष रक्षा करने का आदेश राजाओं को दिया है ।
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 याज्ञवल्क्य स्मृति, राजधर्म प्रकरण देखिए, 
चाट-तस्कर-दुर्वृत-महासाहसिकादिभिः । 
पीऽयमानाः प्रजारक्षेत्कायस्थैश्च विशेषतः ।।336।। 

अर्थः- राजा को उचित है कि उचक्के, चोर, दुराचारी, डाकू और विशेषकर कायस्थों से पीड़ा को प्राप्त हुई, अपनी प्रजा की रक्षा करें

अब इसका तो तो कोई इतिहास नहीं कि कायस्थों 'ने कब जनता का शोषण किया था ।

  यम द्वितीया के दिन इन कायस्थों के यहां चित्रगुप्त की पूजा तथा कथा होती है जिसका आधार पदम पुराण का उत्तर खण्ड है । 

यह खण्ड बाद में जोड़ा गई प्रतीत होती है, क्योंकि इसमें समाद्विस्थ ब्रह्माजी के शरीर से एक सावला मनुष्य अपने हाथों में कलम और दवात लिये हुए उत्पन्न हुआ ।
और जाति विषय पूछने पर ब्रह्मा जी ने कहा तुम्हारा नाम चित्र गुप्त है ।

 और तुम मेरे काय (शरीर) से निकले हो, अतः तुम कायस्थ नाम से विख्यात हो जाओ और तुम धर्मराज की पुरी से सदा रहकर सभी मनुष्यों के शुभाशुभ कर्मों को धर्माधर्म के विचारर्थ लिखा करो ।

 (देखें चित्रगुप्तोत्पत्तिप्रकाशे)

 दूसरी ओर कायस्थ संस्कार प्रकाशे में विवरण मिलता है ।👇 कायस्थः पंचमो वर्णों नतु शूद्र कथंचन ।
 अतो भवेयुः संस्कार गर्भाधानादयो दश ।।4।। 
अर्थात् – कायस्थ पांचवाँ वर्ण है वह शूद्र कभी नहीं है । 

अतः उसके गर्भाधानादि दश संस्कार होने चाहिए ।
 यहां पांचवाँ वर्ण का जिक्र है, किन्तु पुष्यमित्र सुँग के निर्देशन में सुमित भार्गव द्वारा लिखित मनु स्मृति के अध्याय /श्लोक 10/4 में स्पष्ट उल्लेख है कि चौथा वर्ण शूद्र है पांचवाँ कोई वर्ण नहीं है । 
ग्रन्थों में परस्पर विरोधाभासी स्थिति उनके प्रक्षिप्त होने को सिद्ध करती है ।

अतः विरोधाभाष की स्थिति इन पुराने धर्म ग्रन्थ में किस वजह से आई यह विचारणीय है ।

एक दलित साहित्यिक के लेखक श्री नवल वियोगी ‘‘सिन्धु-घाटी की सभ्यता के सृजनकर्ता शूद्र और वणिक’’ नामक अपनी किताब (पृ.क्र.-142) पर लिखते हैं कि 

‘‘सिन्धु देश के युद्ध में पराजित होने के बाद वध कर दिये वीरों की संतान का सम्बन्ध कायस्थ वर्ग से भी था, जिन्हें देव संस्कृतियों के अनुयायीयों' ने गुलाम बनाकर घरों में रख लिया था ।

 यही वह वर्ग था जिसने देव -पुरोहितों तथा क्षत्रिय राजाओं के घरों में नौकरों का काम किया । 

प्रसिद्ध नरवंश शास्त्री सर हिरवर्ट होप रिसले ‘‘बंगाल की कायस्थ जाति के बारे में अपने विचार रखते हैं – बंगाल का शार्गिद पेशा पहचाना वर्ग है जिनकी उत्पत्ति अवैध सन्तान के रूप में बतलाई जाती है । 

'परन्तु यह किसी जन-जाति को हीन और स्वाभिमान हीन बनाने के लिए व्यभिचारी पुरोहितों का षड्यन्त्र ही था ।

 सभी कायस्थों में समान रुप से विवाह आदि सम्बन्ध स्थापित किये जाने चाहिए, न कोर्इ ऊचा है न कोर्इ नीचा है।’
 
कायस्थ शब्द सर्व प्रथम पुराणों में धर्मराज अथवा यमराज के मंत्री के रुप में चित्रगुप्त-देव के विशेषण अथवा उपाधि के रुप में प्रयुक्त हुआ है। 

'परन्तु यम का सम्बन्ध कैनानाइटी , मितन्नी , ईरानी सुमेरियन आयोनियन और स्वीडन के मिथकों में प्राप्त है ।

 कायस्थ समुदाय समाज के सभी प्रशासनिक कारीयों का विवरण प्रस्तुत करने वाला भी हुआ जैसे यम के शासन में चित्रगुप्त की परिकल्पना यह गुप्त विशेषण मिश्र के कॉप्ट से साम्य रखता है । पुराणों से पूर्वकाल में रचित सूत्र ग्रन्थों में चित्रगुप्त का नाम तो मिलता है किन्तु उनके विशेषण के रुप में कायस्थ शब्द नहीं मिलता।

 इस सम्बन्ध में ‘बौधायन स्मृति’ के पृष्ठ 455 अध्याय 5 के सूत्र 140 में ‘ऊं चित्रगुप्तम तर्पयामि’ तथा कातीय तपर्ण सूत्र में ‘यमांश्चैके’। 

यमाध्र्माराजाय मृत्यवेचान्तकाय च। 

वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय च।।

 औदुम्बराय दध्नाय नीलाय परमेषिठने। 

वृकोदराय चित्राय चित्रगुप्ताय ते नम:।। 

एकैकस्य त्रीस्त्रीन दधाज्जलान्जुलीन।
 यावज्जन्म कृतम पापम तत्क्षणादेवनश्यति।।

 किन्तु पुराण काल के पश्चात बारहवीं शताब्दी में कायस्थ शब्द, श्री हर्ष विरतिचत ‘नैषधीय चरित’ में ‘दृग्गोचरोअभूदथ चित्रगुप्त: कायस्थ: उधैगर्णतदीय:।’ 

तथा इंडियन ऐणिडक्वेटी जिल्द-19 पृष्ठ 59 पंक्ति 15 में ‘ दक्ष: प्राज्ञो विनीतात्मा गुरुभक्त: प्रियंवद:। तृप्तो∙र्थेरौपकश्र्चासिमन कायस्थो गोमिकांगूंज:।’ 
प्रयुक्त हुआ। 

विष्णु धर्म सूत्र (विष्णु स्मृति के अध्याय 7 गधांश 3 में ‘राज्याधिकरणे तनिनयुक्त कायस्थ कृत तदध्यक्ष करं चिनिहतम राजा साक्षिकम’ के अनुसार ‘कायस्थ को राजलेखक माना गया है।

 क्षेमेन्द्रकृत ‘नर्ममाला’ में कायस्थ को गृह कृत्याधिपति’ अथवा ‘गृह-महत्तम’ (होम मिनिस्टर) कहा गया। 

इसी ग्रंथ के प्रथम परिहास के प्रथम श्लोक में तो कायस्थ को परमेश्वर का रुप कहा गया है। 

येनेदम स्वैच्छया, सर्वम, माययाम्मोहितम जगत।
 स जयत्यजित: श्रीमान कायस्थ: परमेश्वर:।।

 ‘उत्तर गीता’ के प्रथम अध्याय के श्लोक 27 से 31

 ‘काय-स्थो पि न जायते काय-स्थोपिन भुंजान: काय-स्थो पि न बाध्यते।’ के अनुसार कायस्थ को परमात्मा कहा गया है। 

विष्णु धर्मोत्तर पुराण के तृतीय खण्ड 51 श्लोक 13 में ‘कायस्थ चित्रगुप्त को अन्तर्यामी कहा गया है।

 यथा – ‘चित्रगुप्तो विनिर्दिष्टतयात्मा सर्व-देहग:।
 पत्रम धर्ममधर्म: च करस्था तस्य लेखिनी।।’

 इत्यादि ग्रन्थों के अनुसार कायस्थ शब्द कपोल कलिपत अथवा अर्वाचीन न होकर सनातन अथवा अत्यन्त प्राचीन है। 

कायस्थ की व्युत्पति पुराणों के अनुसार नवग्रहों में अन्तिम (नवम) केतु ग्रह की अधि देवता तथा प्रत्यधिदेवता क्रमश: ब्रह्राा जी व चित्रगुप्त जी हैं।

 चित्रगुप्त जी ब्रह्राा जी के ध्यान-ज-पुत्र हैं। 
उत्पत्ति से पूर्व चित्रगुप्त ब्रह्मा के काय (शरीर) में स्थित (‘स्थ’) थे जो ब्रह्राा के ध्यान करने से प्रकट हो गये।

 अत: वे ब्रह्रा-कायस्थ हुए। जो समयोपरान्त कायस्थ कहलाये।

 इस महाजाति के अन्तर्गत चित्रगुप्त वंशय, बंगीय, महाराष्ट्रीय, इत्यादि अवान्तर भेद तथा उनके भी उपभेद रुप सूर्यद्विज, श्रीवास्तव, निगम, गौड़, माथुर, भट्टनागरादि, उत्तरराढ़ीय वारेन्द्र, वंगज, आदि कायस्थों की विविध जातियां बनी।

 ब्रह्रा पुराण 21556 और शिवपुराण उमासंहिता के अध्याय 7 में चित्रगुप्त भगवान पापियों को धर्मोपदेश करते हुए जज अथवा सरकारी वकील का कार्य करते हैं। 

ब्रह्रावैवर्त पुराण 3236 और पदम पुराण के श्रृष्टि-खण्डोपनाम किया खंड अध्याय 56 के अनुसार श्री चित्रगुप्त जी यमधर्मराज के यहा दण्ड निर्धारण अर्थात जज का कार्य करते हैं।

 याज्ञवल्क्य स्मृति के सप्तम शताब्दी से लेकर सत्रहवीं शताब्दी के टीकाकारों ने ‘कायस्थ’ शब्द का अर्थ निरुपण इस प्रकार किया है – 1. रामदय: लेखका: इत्यन्ते। 2. लेखका: गणकाश्च। 3. कराधिकृता:। 4. राजाधिकृतैलेखिका:।

 आदि से किया है। वृहत पराशर संहिता तथा राजा तरंगिणी 8131 ‘निसर्ग-वचका: वेश्या: कायस्थों दिविरो वणिक’ के अनुसार कायस्थ और दिविर का अलग-अलग उल्लेख मिलता है। 

सामान्य अर्थ में कायस्थ का अर्थ कराधिकारी (एकाउन्टस आफीसर) और दिविर( लिपिक) का शब्द का अर्थ लेखाकार (एकाउन्टेंट) से किया जाता रहा है। 

राजंतरंगिणी 613 ‘कार्तानितको भिषक सभ्यो गुरुमंत्री पुरोहित: दूत: स्थेयो लेखको वा न तदाभूदपणिडत:।’ 
महाराज यशस्कर के राज्यकाल 939’948 र्इस्वी तक ज्योतिषी, वैध, सभासद, गुरु, मंत्री, पुरोहित, जज, लेखक आदि अधिकारीकर्मचारी अ-पण्डित नहीं थे। 

इससे स्पष्ट होता है कि कायस्थ ब्राह्राण वर्ग में ही आते थे। 
उधर ब्रह्रावैवर्त पुराण प्रकृति खण्ड 288-15, के अनुसार

 ‘यज्जन्म ब्रह्राणो वंशेज्वलतम ब्रह्राा तेजसा। 
योध्यायति परम ब्रह्रा वंशम नमाम्यहम’ में भी भगवान चित्रगुप्त को ब्रह्रा-वंशी होने के कारण नमस्कार किया गया है।

 पणि ऋग्वेद में पणि नाम से ऐसे व्यक्ति अथवा समूह का बोध होता है, जो कि धनी है किन्तु देवताओं का यज्ञ नहीं करता तथा पुरोहितों को दक्षिणा नहीं देता। 
अतएव यह वेदमार्गियों की घृणा का पात्र है। देवों को पणियों के ऊपर आक्रमण करने के लिए कहा गया है। 
आगे यह उल्लेख उनकी हार तथा वध के साथ हुआ है। 

वेदों में पणियों को ग्रथिन के रूप में भी  वर्णन है।
 पणि कौन थे?

 राथ के मतानुसार यह शब्द 'पण्=विनिमय' से बना है तथा पणि वह व्यक्ति है, जो कि बिना बदले के कुछ नहीं दे सकता। 

 ये अपने सार्थ अरब, पश्चिमी एशिया तथा उत्तरी अफ़्रीका में भेजते थे और अपने धन की रक्षा के लिए बराबर युद्ध करने को प्रस्तुत रहते थे।
 दस्यु अथवा दास शब्द के प्रसंगों के आधार पर उपर्युक्त मत पुष्ट होता है। 

किन्तु आवश्यक है कि आर्यों के देवों की पूजा न करने वाले और पुरोहितों को दक्षिणा न देने वाले इन पणियों को धर्मनिरपेक्ष, लोभी और हिंसक व्यापारी कहा जा सकता है।
 ये आर्य और अनार्य दोनों हो सकते हैं। 
हिलब्रैण्ट ने इन्हें स्ट्राबो द्वारा उल्लिखित पर्नियन जाति के तुल्य माना है। 
जिसका सम्बन्ध दहा (दास) लोगों से था। 
फ़िनिशिया इनका पश्चिमी उपनिवेश था, जहाँ ये भारत से व्यापारिक वस्तुएँ, लिपि, कला आदि ले गए।

 वैदिक-काल के सामाजिक-संघर्ष मानव सभ्यता के इतिहास का पुनर्पाठ करते हुए प्रेमकुमार मणि बता रहे हैं कि वैदिक काल के दौरान आर्यों-हिन्दुओं के अलावा आर्यों के विभिन्न समूहों के बीच भी सामाजिक और सांस्कृतिक दोनों तरह के संघर्ष हुए। वेदों की रचना हुई।

 विद्वानों के अनुसार यह समय अनुमानतः ईसापूर्व 1500 वर्ष से लेकर 1000 ईस्वीपूर्व तक का था। कुछ अतीतजीवी लोग समझते हैं कि वैदिक-काल की बोल-चाल की भाषा संस्कृत थी और उन दिनों सम्पूर्ण भारत पर आर्यजन ही रहते थे। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं था। 

संस्कृत रचना की भाषा थी। कुछ विशिष्ट किस्म के लोग ही इसमें पारंगत थे; और स्वाभाविक है, उन्हें इस बात का थोड़ा गुमान भी रहा होगा। 

जैसे आर्थिक रूप से संपन्न लोग अपने बनाये दुर्ग में रहते हैं, वैसे ही ये विशिष्ट लोग अपनी भाषा की गुफा में रहते थे। हाँ, इनकी जीवन-शैली और दृष्टिकोण शेष लोगों से भिन्न थे। 

देव संस्कृति के उपासक तत्कालीन भारतीय समाज के एक बहुत ही छोटा हिस्सा थे। 

अन्य समाजों से इनका धीरे-धीरे मिलना स्वाभाविक था। ये मिले और फिर एक मिश्रित समाज बना। 

लेकिन देव संस्कृति का प्रभाव भारतीय समाज पर जबरदस्त रूप से पड़ा।

 इसका कारण यह रहा कि राजसत्ता पर उनका प्रभाव बढ़ गया था। देव संस्कृति के अनुयायीयों का जीवन-यापन कैसा था, इसकी कुछ सूचना हमें ऋग्वेद से ही मिलती है।

 घोडा, आरा वाले पहिये का रथ, यज्ञ, अग्निवेदी, सोम-पान और दाहकर्म उनकी ऐसी विशेषता थी, जो उन्हें अन्य-जातियों से विलग करती थीं। 

सिन्धु-सभ्यता में घोड़े की उपस्थिति नहीं मिलती। अपवाद में लोथल में मिली घोड़े की मृण्मयी मूर्तियां हैं। लेकिन यह उत्तर सिंधु काल के समय की हैं।

 सिन्धुवासी व्यापार के लिए बाहर जाते रहते थे और घोड़े से उनका परिचित होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

 'परन्तु घोड़ा सिन्धु क्षेत्र में था ।
 क्योंकि सैन्धव घोड़े का पर्य्याय है । 
जैसे कि गाय।
 हड़प्पा की मोहरों पर सांढ़ की उपस्थिति गाय को उनके जीवन के लिए जरुरी होना सिद्ध करता है।
 बैल से हड़प्पावासी वही काम लेते थे , गाय दूसरे स्थान पर थी।
 ऋग्वेद में 250 स्थानों पर घोड़े का उल्लेख है, तो 176 स्थानों पर गौ के। 

यद्यपि आर्य्य थ्योरी को बनाने वाले नहीं जानते कि असीरीयों के असुर महत् (अहुर मज्दा) के उपासक ही अपने को आर्य्य कहते थे ।

असीरी सैमेटिक होने से यहूदियों के सजातीय थे
-यद्यपि ये सिख बौद्ध,जैन इसाई और कुछ इस्लाम के भी सागिर्द हैं ।
परन्तु इनकी मूल सत्ता भारतीय और सुमेरियन मिथकों में विद्यमान है ।

फुट हिटलर 'ने यहूदियों को अनार्य कह कर मरवाया 
ये तथ्य विचारणीय हैं 
क्योंकि ईरानी असुर संस्कृति और भारतीय देव संस्कृतियों में परस्पर विरोधाभासी स्थिति आकस्मिक नहीं अपितु प्राचीनत्तम है ।
ईरानी यम को सम्मान देते हैं तो भारतीय , जर्मनिक आदि मनु को 
कैनानाइटी मितन्नी ईरानी सुमेरियन आदि संस्कृतियों में यम की प्रतिष्ठा सर्वोपरि है