बुधवार, 18 जुलाई 2018

जिस ओ३म् (ऊँ) शब्द के उच्चारण करने पर शूद्र अथवा निम्न समझी जाने वाली जन-जातियाें की जिह्वा का रूढि वादी परम्पराओं के अनुगामी ब्राह्मण उच्छेदन तक कर देते थे । और जिस ओ३म् शब्द का प्रादुर्भाव उसी द्रविड संस्कृति से हुआ हो ! जिनके लिए इसका शब्द के उच्चारण पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया हो । आज हम उस शब्द की जन्म-कुण्डली खोलेंने का प्रयास करेंगे -

जिस ओ३म् (ऊँ) शब्द के उच्चारण करने पर शूद्र अथवा निम्न समझी जाने वाली जन-जातियाें की जिह्वा का रूढि वादी परम्पराओं के अनुगामी ब्राह्मण उच्छेदन तक कर देते थे ।
और जिस ओ३म् शब्द का प्रादुर्भाव उसी द्रविड संस्कृति से हुआ हो ! जिनके लिए इसका शब्द के उच्चारण पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया हो ।
आज हम उस शब्द की जन्म-कुण्डली खोलेंने का प्रयास करेंगे -
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सर्व-प्रथम हम विचार करते हैं ओ३म् शब्द के विकास की पृष्ठ-भूमि पर...
विश्व इतिहास के सांस्कृतिक अन्वेषणों के उपरान्त कुछ तथ्यों से हम अवगत हुए ।
कैल्ट जन जाति के धर्म साधना के रहस्य मय अनुष्ठानों में इसी कारण से आध्यात्मिक और तान्त्रिक क्रियाओं को प्रभावात्मक बनाने के लिए ओघम् (OGHUM )शब्द का दृढता से  उच्चारण विधान किया जाता था ।

  कि उस संस्कृति के  विश्वास करने वालों का मत था !  कि इस प्रकार आउ-मा (Ow- ma) अर्थात् जिसे
भारतीय आर्यों  ने ओ३म् रूप में साहित्य ,कला और ज्ञान के उत्प्रेरक और रक्षक के रूप में प्रतिष्ठित किया है ...
अर्थात्  प्राचीन भारतीय देव संस्कृति के अनुयायीयों की मान्यताओं के अनुसार सम्पूर्ण भाषा की आक्षरिक सम्पत्ति ( syllable prosperity ) यथावत् रहती है !
प्राचीनत्तम फ्रॉन्स की संस्कृतियों में ओघम् का मूर्त प्रारूप 🌞 सूर्य के आकार के सादृश्य पर था ।
जैसा कि प्राचीन पश्चिमीय संस्कृतियों की मान्यताऐं भी हैं
वास्तव में ओघम् (ogham )से बुद्धि उसी प्रकार  नि:सृत होती है जैसे सूर्य से उसका प्रकाश 🌞☀⚡☀⚡⛅☁प्राचीन मध्य मिश्र के लीबिया प्रान्त में तथा थीब्ज में भी द्रविड संस्कृति का यही ऑघम शब्द  आमोन् रा ( ammon - ra ) जो वस्तुत: ओ३म् -रवि के तादात्मयी रूप में प्रस्तावित है ..
आधुनिक अनुसन्धानों के अनुसार भी अमेरिकीय अन्तरिक्ष यान - प्रक्षेपण संस्थान
के वैज्ञानिकों ने भी सूर्य में अजस्र रूप से निनादित ओ३म् प्लुत स्वर का श्रवण किया है ।
सुमेरियन एवं सैमेटिक हिब्रू आदि परम्पराओं  में ..
रब़ अथवा रब्बी शब्द का अर्थ - नेता तथा महान एवं गुरू होता हेै !
जैसे रब्बी यहूदीयों का धर्म गुरू है ..
अरबी भाषा में रब़ -- ईश्वर का वाचक है ।
रब्बुल अल अलामीन मतलब ईश्वर सम्पूर्ण संसार का रक्षक है ।

अमीन शब्द (अरबी:जुबान में ( آمین) या आमीन का शाब्दिक अर्थ है "ऐसा हो सकता है" या "ऐसा है"। मुसलमानों में शब्द आमिन का प्रयोग आमतौर पर उसी शब्द के साथ किया जाता है जिसका अर्थ है "मुझे जवाब दें", और वाक्यांश "इलाही अमीन"
(अरबी: الهی آمین; अर्थ: हे मेरे भगवान! मुझे जवाब दें) आधुनिक काल सैमेटिक परम्पराओं के अनुयायी लोगों के बीच बहुत आम है। इसका उपयोग अंग्रेजी में अमेन के रूप में किया जाता है (अर्थ: तो यह हो)। वस्तुत: अमेन हिब्रू बाइबिल में वर्णित रूप है ।

शिया  शरीयत  में, प्रार्थनाओं में कुरान 1 (सूर अल-हम्द) को पढ़ने के बाद अमीन न कहने पर  कि प्रार्थना को शरीयती तौर पर अमान्य कर दिया गया है।

हिब्रू परम्पराओं से यह अरब की रबायतों में कायम हुआ

हिब्रू में, शब्द अमीन को सबसे पहले "सही" और "सत्य" नामक विशेषण के रूप में उपयोग किया जाता था, लेकिन यशायाह की किताब के मुताबिक इसका उपयोग संज्ञा के रूप में किया जाता था। यह शब्द फिर हिब्रू में एक invariant ऑपरेटर (अर्थात्, "वास्तव में" और "निश्चित रूप से")के अर्थ में बदल गया।
इसका उपयोग बाइबिल में 30 बार और तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के यूनानी अनुवाद में 33 बार किया गया है।

इतिहास की पहली पुस्तक [नोट 2] और किंग्स बुक्स [नोट 3] की पहली पुस्तक में इस शब्द की घटना से पता चलता है।
कि यह शब्द यहूदी प्रार्थनाओं और अनुष्ठानों में चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से पहले भी इस्तेमाल किया गया था।

प्राचीन यहूदी परम्परा में, इस शब्द का उपयोग शुरुआत या प्रार्थना के अन्त में किया गया था।
प्रार्थनाओं, और भजनों के अन्त में इसकी पुनरावृत्ति प्रासंगिक सामग्रियों की पुष्टि और समर्थन दोनों में थी , और उम्मीद की अभिव्यक्ति थी कि हर कोई अमेन का उल्लेख करने के दौरान अभ्यास के आशीर्वाद साझा कर सकता है।
तलमूद और अन्य यहूदी परम्पराओं की अवधि में, यह महत्वपूर्ण था कि विभिन्न स्थितियों में शब्द का उपयोग कैसे किया जाए, और ऐसा माना जाता था कि भगवान किसी भी प्रार्थना के लिए "आमीन" कहता है जो उसे सम्बोधित किया जाता है।

ईसाई धर्म में---------

यहूदी परम्पराओं को ईसाई चर्चों में अपना रास्ता मिला। "अमीन" शब्द का प्रयोग नए नियम में 119 बार किया गया था, जिनमें से 52 मामले यहूदी धर्म में इसका उपयोग कैसे किया जाता है।
नए नियम के माध्यम से, शब्द दुनिया की लगभग सभी मुख्य भाषाओं में प्रवेश किया।

शब्द, अमीन, जैसा कि नए नियम में प्रयोग किया गया है, उसमें इसके  चार अर्थ हैं -

पावती और अनुमोदन; एक प्रार्थना में समझौता या भागीदारी, और किसी के प्रतिज्ञा की अभिव्यक्ति।
दिव्य प्रतिक्रिया का अनुरोध, जिसका अर्थ है:
"हे भगवान! स्वीकार करें या जवाब दें!" अर्थात् एवं अस्तु !
एक प्रार्थना या प्रतिज्ञा की पुष्टि, जिसका अर्थ है: "तो यह हो" (आज शब्द को दो अर्थों को इंगित करने के लिए प्रार्थनाओं के अंत में उपयोग किया जाता है)।
एक विशेषता या यीशु मसीह का नाम ।
अरबी में

चूंकि इस्लाम के उद्भव से पहले यहूदी धर्म और नाज़रेन ईसाई धर्म दोनों अरब प्रायद्वीप में अनुयायी थे, इसलिए यह संभव है कि मक्का और मदीना समेत अरब, इससे परिचित थे, हालांकि जहिल्या काल की कविताओं में इसका कोई निशान नहीं मिला है। यह शब्द कुरान में नहीं होता है, लेकिन प्रारंभिक मुस्लिम शब्द से निश्चित रूप से परिचित थे। पैगंबर मुहम्मद ने शब्द का प्रयोग किया, लेकिन ऐसा लगता है कि शुरुआती मुस्लिम शब्द के अर्थ के बारे में निश्चित नहीं थे, क्योंकि पैगंबर ने उन्हें एक स्पष्टीकरण और शब्द की व्याख्या दी (यह कहकर कि "अमीन एक है अपने वफादार सेवकों पर दिव्य डाक टिकट ")। और 'अब्द अल्लाह बी। अल-अब्बास ने शब्द का व्याकरणिक विवरण देने की कोशिश की।

पवित्र कुरान के निष्कर्षों में

शब्द कुरान 10:88 और 89 के उत्थानों में उल्लिखित है। कुरान के लगभग सभी exegetes के अनुसार, जब पैगंबर मूसा (ए) फिरौन को शाप दिया, वह और उसके भाई, भविष्यवक्ता हारून (ए) , शब्द अमेन उद्धृत किया।

प्रार्थना में अमीन का हवाला देते हुए

सुन्नी मुस्लिम इस शब्द का हवाला देते हैं, अमीन, प्रार्थना में कुरान 1 को कविता के जवाब के रूप में पढ़ने के बाद, "हमें सही मार्ग दिखाएं", (कुरान, 1: 6)। यदि उपासक अपनी प्रार्थना व्यक्तिगत रूप से कहता है, तो वे स्वयं को इस शब्द का हवाला देते हैं, और यदि वे एक मंडली प्रार्थना कहते हैं, जब प्रार्थना के नेता कुरान 1 को पढ़ना समाप्त कर देते हैं, तो सभी अनुयायियों ने एक साथ उद्धृत किया है। शिया न्यायविदों का कहना है कि प्रार्थना में अमीन का हवाला देते हुए यह अमान्य है, क्योंकि यह प्रार्थना में एक विधर्मी अभ्यास है जिसे पैगंबर की परंपरा में पुष्टि नहीं माना जाता है।

टिप्पणियाँ

↑ यशायाह 65:16
↑ धन्य है यहोवा, इस्राएल का परमेश्वर, अनन्तकाल से अनन्तकाल तक। "तब सभी लोगों ने कहा"
आमीन! "1 पुरानी

.अमोन तथा रा प्रारम्भ में पृथक पृथक थे ..
दौनों सूर्य सत्ता के वाचक थे ..मिश्र की संस्कृति

में ये दौनों कालान्तरण में एक रूप होकर अमॉन रॉ के रूप में
अत्यधिक पूज्य था ..
क्यों की प्राचीन मिश्र के लोगों की मान्यता थी कि ..अमोन -- रॉ.. ही सारे विश्व में प्रकाश और ज्ञान का कारणहै मिश्र की परम्पराओ से ही यह शब्द मैसोपोटामिया की सैमेटिक हिब्रु परम्परओं में प्रतिष्ठित हुआ जो क्रमशः यहूदी ( वैदिक यदुः ) के वंशज थे !!
....इन्हीं से ईसाईयों में Amen तथा अ़रबी भाषा में यही आमीन् !! (ऐसा ही हो ) होगया है इतना ही नहीं जर्मन आर्य ओ३म् का सम्बोधन omi /ovin  या  के रूप में अपने ज्ञान के देव वॉडेन ( woden) के लिए सम्बोधित करते करते थे .....
.इसी वुधः का दूसरा सम्बोधन ouvin ऑविन् भी था ..
...यही woden अंग्रेजी मेंgoden बन गया था जिससे कालान्तर में गोड(god  )शब्द बना है
जो फ़ारसी में ख़ुदा के रूप में हैं !
सीरिया की सुर संस्कृति में यह शब्द ऑवम् ( aovm ) हो गया है ।
वेदों में ओमान् शब्द बहुतायत से रक्षक ,के रूप में आया है । भारतीय संस्कृति में मान्यता है कि शिव ( ओ३म् ) ने ही पाणिनी को ध्वनि निकाय के रूप में चौदह माहेश्वर सूत्रों की वर्णमाला प्रदान की ! ......
जिससे सम्पूर्ण भाषा व्याकरण का निर्माण हुआ  पाणिनी पणि अथवा ( phoenici) पुरोहित थे जो मेसोपोटामिया की सैमेटिक शाखा के लोग थे !
ये लोग द्रविडों से सम्बद्ध थे !
वस्तुत: यहाँ इन्हें द्रुज संज्ञा से अभिहित किया गया था ...
...द्रुज जनजाति ...प्राचीन इज़राएल ..
जॉर्डन ..लेबनॉन में तथा सीरिया में
आज तक प्राचीन सांस्कृतिक मान्यताओं को सञ्जोये हुए है ..
.द्रुजों की मान्यत थी कि आत्मा अमर है ..पुनर्जन्म ..   कर्म फल के भोग के लिए होता है ..ठीक यही मान्यता बाल्टिक सागर के तटवर्ति druid द्रयूडों में पुरोहितों के रूप में थी !
केल्ट वेल्स ब्रिटॉनस् आदि ने

इस वर्णमाला को द्रविडों से ग्रहण किया था !
एक द्रविड अपने समय के सबसे बडे़ द्रव्य - वेत्ता और तत्व दर्शी थे !
जैसा कि द्रविड नाम से ध्वनित होता है
...मैं  यादव योगेश कुमार 'रोहि'
भारतीय सन्दर्भ में भी इस शब्द पर
कुछ व्याख्यान करता हूँ !
जो संक्षिप्त ही है  ऊँ एक प्लुत स्वर है जो सृष्टि का आदि कालीन प्राकृतिक ध्वनि रूप है जिसमें सम्पूर्ण वर्णमाला समाहित है !!
इसके अवशेष एशिया - माइनर की पार्श्ववर्ती आयोनिया ( प्राचीन यूनान ) की संस्कृति में भी प्राप्त हुए है
यूनानी आर्य ज्यूस और पॉसीडन ( पूषण ) की साधना के अवसर पर अमोनॉस ( amonos) के रूप में ओमन् अथवा ओ३म् का उच्चारण करते थे !!!!!!!
भारतीय सांस्कृतिक संन्दर्भ में भी ओ३म् शब्द की व्युत्पत्ति परक व्याख्या आवश्यक है वैदिक ग्रन्थों विशेषतः ऋग्वेद मेंओमान् के रूप में भी है संस्कृत के वैय्याकरणों के अनुसार ओ३म् शब्द धातुज ( यौगिक) है जो अव् घातु में मन् प्रत्यय करने पर बना है
पाणिनीय धातु पाठ में अव् धातु के अनेक अर्थ हैं ।
अव्-- --१ रक्षक २ गति ३ कान्ति४ प्रीति ५ तृप्ति ६ अवगम ७ प्रवेश ८ श्रवण ९ स्वामी १० अर्थ ११ याचन १२ क्रिया १३ इच्छा १४ दीप्ति १५ अवाप्ति १६ आलिड्.गन १७ हिंसा १८ आदान १९ भाव वृद्धिषु ( १/३९६/  भाषायी रूप में ओ३म् एक अव्यय ( interjection) है जिसका अर्थ है -- ऐसा ही हो ! ( एवमस्तु !) it be so इसका अरबी़ तथा हिब्रू रूप है आमीन् ।
लौकिक संस्कृत में ओमन् ( ऊँ) का अर्थ--- औपचारिकपुष्टि करण अथवा मान्य स्वीकृति का वाचक है ---
मालती माधव ग्रन्थ में १/७५ पृष्ट पर-- ओम इति उच्यताम् अमात्यः" तथा साहित्य दर्पण --- द्वित्तीयश्चेदोम् इति ब्रूम १/"" हमारा यह संदेश प्रेषण क्रम अनवरत चलता रहेगा **** मैं योगेश कुमार रोहि निवेदन करता हूँ !! कि इस महान संदेश को सारे संसार में प्रसारित कर दो !!! आमीन् ..............

योगेश कुमार रोहि के द्वारा अनुसन्धानित
भारतीयही नहीं अपितु विश्व इतिहास का यह एक नवीनत्तम् सांस्कृतिक शोध है |

रविवार, 15 जुलाई 2018

BIBLICAL NAMES Jadon


Origin of the name YAH-dun:
The meaning of YAH-dun name in Hebrew language is:
 Thanks; A legend --- which connects truth with truth and false from untruth.
Judged by God; "God has heard"
The story behind this Christian name of this Bible is a very brief mention of this name in the book of Nehemiah.
From a place named Meronoth, a person named Jadoun helped rebuild the walls and gates of Jerusalem.
 The city of Jerusalem was a holy city for the Jewish people, and it was a great deal, in order to repair the defense and revitalize the sacred ceremonies of central and nations as part of the sacrificial system for this place and their religious beliefs. Is known.
Nehemiah has received great fame for the rebuilding of the walls of Jerusalem,
But these were the people who were part of this grand and dangerous project. They had to face a lot of opposition people,
And the threat of violence against them was sufficient that half of them would stand with arms while ready and the other half will work on the building. Even the construction workers kept the sword in their belt all the time.
 Each person involved in this construction effort is a hero, including Madanothai Jadounan.
 Scripture for Bible Stories for Bible Stories Judean
 Nehemiah 3: 7 (Special mention of Judean)

YAH-dun नाम की उत्पत्ति:
हिब्रू भाषा में YAH-dun नाम का अर्थ: है।
धन्यवाद;  एक न्याधीश ---जो  सत्य से सत्य को तथा असत्य से असत्य को जोड़ता है।
भगवान द्वारा न्याय किया; "भगवान ने सुना है"
इस बाइबिल के इस ईसाई नाम के पीछे की कहानी नहेम्याह की पुस्तक में इस नाम का एक बहुत ही संक्षिप्त उल्लेख है।
मेरोनोथ नामक एक जगह से जादौन नाम के एक व्यक्ति ने यरूशलेम की दीवारों और द्वारों का पुनर्निर्माण करने में मदद की।
यरूशलेम का शहर यहूदी लोगों के लिए पवित्र शहर था, और यह एक बड़ा सौदा था, रक्षा की मरम्मत और इस जगह को बलिदान प्रणाली के लिए केंद्रीय और राष्ट्रों के रूप में उनकी धार्मिक मान्यताओं और राजनीतिक पहचान के पवित्र समारोहों को पुनर्जीवित करने के रूप में जाना जाता है।
यरूशलेम की दीवारों के पुनर्निर्माण के लिए नहेम्याह को बहुत प्रसिद्धि मिली है, ।
लेकिन ये ऐसे लोग थे जो इस भव्य और खतरनाक परियोजना का हिस्सा थे। उन्हें बहुत विपक्षी लोगों का सामना करना पड़ा,
और उनके खिलाफ हिंसा की धमकी पर्याप्त थी कि उनमें से आधा तैयार होने पर हथियार के साथ खड़े रहेंगे जबकि दूसरी छमाही इमारत का काम करेगी। यहां तक ​​कि निर्माण कार्यकर्ताओं ने भी हर समय अपने बेल्ट में तलवार रखी थी।
इस निर्माण प्रयास में शामिल प्रत्येक व्यक्ति एक नायक है, जिसमें मेडनोथाइट जादौन भी शामिल हैं।
बाइबल कहानियों के लिए बाइबल कहानियों के लिए शास्त्र जदोैन
नहेम्याह 3: 7 (जदोैन का विशिष्ट उल्लेख)

शनिवार, 14 जुलाई 2018

ब्रह्म चारी कृष्ण ---

ब्रह्मचर्यं महद् घोरं तीर्त्त्वा द्वादशवार्षिकम् । हिमवत्पार्श्वमास्थाय यो मया तपसार्जितः ।। समानव्रतचारिण्यां रुक्मिण्यां योsन्वजायत । सनत्कुमारस्तेजस्वी प्रद्युम्नो नाम में सुतः ।।-(सौप्तिकपर्व १२/३०,३१) अर्थ:-मैंने १२ वर्ष तक रुक्मिणी के साथ हिमालय में ठहरकर महान् घोर ब्रह्मचर्य का पालन करके सनत्कुमार के समान तेजस्वी प्रद्युम्न नाम के पुत्र को प्राप्त किया था।विवाह के पश्चात् १२ वर्ष तक घोर ब्रह्मचर्य को धारण करना उनके संयम का महान् उदाहरण है। ऐसे संयमी और जितेन्द्रिय पुरुष को पुराणकारों ने कितना बीभत्स और घृणास्पद बना दिया है।5) राधा कौन थी?:-
वृषभानोश्च वैश्यस्य सा च कन्या बभूव ह ।
सार्द्धं रायणवैश्येन तत्सम्बन्धं चकार सः ।।
कृष्णमातुर्यशोदाया रायणस्तत्सहोदरः ।
गोकोले गोपकृष्णांश सम्बन्धात्कृष्णमातुलः ।।-
(ब्रह्म० प्रकृति ४९/३२,३७,४०)

अर्थ:-राधा वृषभानु वैश्य की कन्या थी।रायण वैश्य के साथ उसका सम्बन्ध किया गया।वह रायण यशोदा का भाई था और कृष्ण का मामा था।राधा उसकी पत्नि थी।सो राधा तो कृष्ण की मामी ठहरी।
मामी और भांजे का प्रेम-व्यापार कहाँ तक उचित है?

पुराणकारों ने कृष्ण के स्वरुप को बिगाड़ दिया।उनके पवित्र व्यक्तित्व को घृणित और बीभत्स बना दिया।

गुरुवार, 12 जुलाई 2018

लक्ष्मीबाई_ताम्बें_कुलकर्णी

#लक्ष्मीबाई_ताम्बें_कुलकर्णी
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आज तक साहित्य को इतिहास घोषित कर,   मुनि-मनुओं ने लक्ष्मीबाई का झूठा इतिहास बताया व पढाया जाता है ,कौन है ये लक्ष्मीबाई? झांसी की रानी थी?
,झांसी कभी-भी स्वतंत्र राज्य नही था ! बल्की छत्रपती के अनेक संस्थानों में से एक था। वहाँ कि सारी व्यवस्था छत्रपती के नौकर के रूप मे ब्राहमण गंगाधरपंत कुलकर्णी देखा करते थे। ब्राहमण गंगाधरपंत कुलकर्णी झांसी का प्रधान सेवक था ! इसी ब्राहमण गंगाधरपंत-कुलकर्णी ने बुढापे में किशोरी मनु तांबे नामक एक लडकी के साथ शादी रचाई और उसका नाम मनु से बदलकर लक्ष्मीबाई रख दिया ! झांसी कोई रियासत नही था, बल्कि लगान वसूली का गढ था। इसलिए  मतलब वहाँ न कोई  कोई राजा-रानी नही थी!
लक्ष्मीबाई एक साधारण महिला थी ! और ब्राह्मण गंगाधरपंत कुलकर्णी आठ प्रकार नपुंसक थे ! 1857 के सैनिक विद्रोह में लक्ष्मीबाई ने जखमी ब्रिटीश
सैनिको कि मरहमपट्टी करनेका का काम किया था ! लक्ष्मीबाई ने कभी भी लडाई नही लडी थी, ! बल्कि लक्ष्मीबाई कुलकर्णी का  कैप्टन जोर्डन से गहरा लगाव भी था, बताया जाता है कि लक्ष्मीबाई-कुलकर्णी ने  कैप्टन जार्डन को माफीनामा भी लिखकार दिया था।
झांसी का किला बचाने का काम कॉरी समाज कि झलकारीबाई ने आपने पति पूरन-कोरी के साथ मिलकर किया था। लक्ष्मीबाई कुलकर्णी सन 1858  में प्रतापगड के महाराज की सहायता से झांसी से नेपाल भाग गई थी ! वहीं नेपाल में सन 1915 में  करीब 80 साल की उम्र में लक्ष्मीबाई-कुलकर्णी मर गई थी !
झांसी की लक्ष्मीबाई कुलकर्णी ने कॅपटन जारडन को माफीनामा लिखाकार दिया था, इस बात का सबूत महाराष्ट्र के विद्वान ब्राम्हण तर्कतीर्थ लक्षुमन शास्त्री जोशी ने महाराष्ट्र "मराठी भाषा न्यानकोश" में दिया है! लक्ष्मीबाई कुलकर्णी झांसी में विद्रोह के दौरान कभी लडी ही नही, इसका सबूत यह भी है कि  आज भी झांसी के लोकगीतों मे गाय जाता है, जिसमें झांसी में लक्ष्मीबाई कुलकर्णी का नही बल्की झलकारीबाई के गाए जाते हैं।
भारत सरकार ने झलकारी बाई के सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया हुआ है !
लक्ष्मीबाई कुलकर्णी नेपाल भाग गई थी, इसके सबूत इतिहास संशोधक #शाम_पाटील की संशोधन में उपलब्ध है, जिसमें लक्ष्मीबाई कुलकर्णी का पति ब्राह्मण गंगाधर कुलकर्णी करीब  आठ प्रकार  की विभिन्न बीमारियों से ग्रस्त था और बुढापे में नपुंसक होना भी उनकी शारीरिक बीमारियों में शामिल था‌ इसी कारण लक्ष्मीबाई कुलकर्णी का खास "मर्दानखाना" भी बताया जाता है, जिसमें अंग्रेज़ भी शामिल थे।

Hansraj Dhanka Dhanka

बुधवार, 11 जुलाई 2018

गोप और गोपी -

गोपी शब्द का प्रयोग प्राचीन साहित्य में पशुपालक जाति की स्त्री के अर्थ में हुआ है। इस जाति के कुलदेवता 'गोपाल कृष्ण' थे। भागवत की प्रेरणा लेकर पुराणों में गोपी-कृष्ण के प्रेमाख्यान को आध्यात्मिक रूप दिया गया है। इससे पहले महाभारत में यह आध्यात्मिक रूप नहीं मिलता। इसके बाद की रचनाओं- हरिवंशपुराण तथा अन्य पुराणों में गोप-गोपियों को देवता बताया गया है, जो भगवान श्रीकृष्ण के ब्रज में जन्म लेने पर पृथ्वी पर अवतरित हुए थे। धीरे-धीरे कृष्ण भक्त संप्रदायों, विशेषत: गौड़ीय वैष्णव चैतन्य संप्रदाय में, गोपी का चित्रण कृष्ण की शक्ति तथा उनकी लीला में सहयोगी के रूप में होने लगा।

काव्य में स्थान

कृष्ण-भक्त कवियों ने अपने काव्य में गोपी-कृष्ण की रासलीला को प्रमुख स्थान दिया है। सूरदास के राधा और कृष्ण प्रकृति और पुरुष के प्रतीक हैं और गोपियाँ राधा की अभिन्न सखियाँ हैं। राधा कृष्ण के सबसे निकट दर्शाई गई हैं, किंतु अन्य गोपियाँ उससे ईर्ष्या नहीं करतीं। वे स्वयं को कृष्ण से अभिन्न मानती हैं।

ऋग्वेद में विष्णु के लिए प्रयुक्त 'गोप', 'गोपति' और 'गोपा' शब्द गोप-गोपी-परम्परा के प्राचीनतम लिखित प्रमाण कहे जा सकते हैं। इन उरूक्रम त्रिपाद-क्षेपी विष्णु के तृतीय पाद-क्षेप परमपद में मधु के उत्स और भूरिश्रृंगा-अनेक सींगोंवाली गउएँ हैं।[1]कदाचित इन गउओं के नाते ही विष्णु को गोप कहा गया है। इस आलंकारिक वर्णन में अनेक विद्वानों, यथा मेकडानेल, ब्लूमफील्ड ने विष्णु को सूर्य माना है, जो पूर्व दिशा से उठकर अन्तरिक्ष को नापते हुए तीसरे पाद-क्षेप में आकाश में फैल जाता है। कुछ लोगों ने ग्रह-नक्षत्रों को ही गोपी कहा है, जो सूर्य मण्डल के चारों ओर घूमते हैं।
परन्तु गोपी शब्द की प्रतीकात्मक व्याख्या कुछ भी हुई हो, इसका साधारण अर्थ है, बल्कि अनेकानेक धार्मिक व्याख्याओं के बावजूद काव्य और साधारण व्यवहार दोनों में निरन्तर समझा जाता रहा है। पशुपालक आभीरों या अहीरों की जाति परम्परा से क्रीड़ा-विनोदप्रिय आनन्दी जाति रही है। इसी जाति के कुलदेव गोपाल कृष्ण थे, जो प्रेम के देवता थे, अत्यन्त सुन्दर, ललित, मधुर-गोपियों के प्रेमाराध्य। ऐसा जान पड़ता है कि इस जाति में प्रचलित कृष्ण और गोपी सम्बन्धी कथाएँ और गीत छठी शताब्दी ईसवी तक सम्पूर्ण देश में प्रचलित होने लगे थे। धीरे-धीरे उन्हें पुराणों में सम्मिलित करके धार्मिक उद्देश्यपरक रूप दिया जाने लगा।

कथा साहित्य में वर्णन

दक्षिण भागवत धर्म आल्वार भक्ति के गीतों में गोपी-कृष्ण-लीला के अनेक मनोहर वर्णन मिलते हैं। काव्य में सबसे पहले 'गाहा सत्तसई'[2]में गोपी और उनमें विशिष्ट नामवाली राधा तथा कृष्ण के मिलन-विरह सम्बन्धी प्रेम-प्रसंग सर्वथा लौकिक सन्दर्भ वर्णित मिलते हैं। ऐसा जान पड़ता है कि गोपी-कृष्ण की कथा के अनेकानेक प्रसंग लोक-कथाओं और लोक-गीतों के रूप में देश भर में प्रचलित रहे होंगे। इन कथाओं और गीतों के भाव तथा प्रसंग साहित्य में भी यदा-कदा अभिव्यक्ति पाते रहे होंगे, जिसके बहुत थोड़े से प्रमाण शेष रह गये हैं। कदाचित साहित्य के इस अंश को शिष्ट जनों में अपेक्षाकृत कम महत्त्व मिला और इसी उपेक्षा के कारण यह नष्टप्राय हो गया। जो भी हो, संस्कृत में 'गीतगोविन्द' (बारहवीं शती) में उसका वह रूप मिलता है, जो आगे चलकर भाषा-काव्य में विकसित हुआ। 'गीतगोविन्द' और विद्यापति की 'पदावली' से इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि गोपी-कृष्ण और राधा-कृष्ण की कथा का लोक-साहित्य उस समय भी भाव-लालित्य की दृष्टि से कैसा सम्पन्न और मनोहर रहा होगा।

'जमुना'(गोपियों के साथ कृष्ण), द्वारा- राजा रवि वर्मा
वेद-पुराण उल्लेख

मध्ययुग में कृष्ण-भक्ति-सम्प्रदायों ने पुराणों, मुख्य रूप में 'श्रीमद्भागवत' का आधार लेकर गोपी-कृष्ण के प्रेमाख्यान को धार्मिक सन्दर्भ में आध्यात्मिक रूप दे दिया और गोपी, गोपी-भाव तथा राधा-भाव की अत्यन्त गम्भीर और रहस्यपूर्ण व्याख्याएँ होने लगीं। निश्चय ही इन व्याख्याओं के मूलाधार पुराण ही हैं, परन्तु उनके विवरण और विस्तार कहीं-कहीं स्वतन्त्र रूप में कल्पित किये गये जान पड़ते हैं। उनका प्रयोजन प्रतीकात्मक है।

'महाभारत' में गोपियों के सम्बन्ध में कोई आध्यात्मिक व्याख्या नहीं मिलती।
हरिवंशपुराण में, जिसे महाभारत का 'खिल' कहा जाता है, कृष्णावतार का हेतु बताते हुए कहा गया है कि "वसुदेव पहले कश्यप थे और कुबेर की गाय हरण करने के अपराध में शापित होकर उन्होंने गौओं के बीच स्थित गोपरूप में जन्म लिया था। कश्यप की स्त्री अदिति और सुरभी, देवकी और रोहिणी थीं। इन्हीं के यहाँ कृष्ण ने देवताओं को ब्रज में जन्म लेने की आज्ञा देकर, स्वयं जन्म लेने की इच्छा की थी। सैकड़ो-सहस्त्रों देवता पांचाल देश के कुरुवंश और वृष्णिवंश में उत्पन्न हुए।[3]हरिवंश में स्पष्टत: कहा नहीं गया है, परन्तु यह ध्वनित होता है कि गोप-गोपियाँ भी देव-देवियाँ ही थे।
हरिवंश के बाद वैष्णव पुराणों में गोप-गोपियों का दैवी उत्पत्ति-विषयक न्यूनाधिक उल्लेख बराबर पाया जाता है।
श्रीमद्भागवत में भी गोपियों को देवताओं की स्त्रियाँ कहा गया है, जो वसुदेव के भवन में जन्म लेने वाले साक्षात भगवान विष्णु का प्रिय करने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं।[4] परन्तु 'हरिवंशपुराण', 'विष्णुपुराण' और 'भागवतपुराण' की गोपियाँ फिर भी लौकिक रूप में ही चित्रित की गयी हैं, उनके विषय में कोई रहस्य-संकेत नहीं है।
'पद्मपुराण' और 'ब्रह्मवैवर्त्तपुराण' पुराणों में गोलोक के नित्य वृन्दावन की विशद कल्पना मिलती है, जिसमें परमानन्दरूप परब्रह्म श्रीकृष्ण राधा तथा गोपियों के साथ नित्य क्रीड़ारत रहते हैं।
'ब्रह्मवैतर्त'[5]में वर्णन है कि नन्द ब्रज में अवतीर्ण होने के पूर्व श्रीकृष्ण ने राधा तथा गोलोक के सब गोप और गोपियों को ब्रज में जन्म लेने की आज्ञा दी।[6]साथ ही देवी-देवताओं ने भी ब्रज में जन्म लेने के लिए गोप-गोपी का रूप धारण किया था।[7]
'पद्मपुराण' के अनुसार दण्डकारण्यवासी कृष्ण-भक्त मुनियों ने भी सौन्दर्य-माधुर्य का आस्वादन करने के हेतु गोपियों का जन्म पाया था। यहीं एक दूसरे स्थल पर तांत्रिक प्रभाव के कारण वंशीरव को अनाहत नाद, कालिन्दी को सुषुम्णा तथा गोपियों को योगिनी कहा है।[8]एक तीसरे स्थल पर इन्हें 'श्रुतिरूपिणी' भी कहा गया है।[9]
मध्ययुग के कृष्ण-भक्त-सम्प्रदायों ने ही वस्तुत: गोपियों की उत्पत्ति सम्बन्धी रहस्यात्मक कल्पनाएँ की हैं और कुछ आलोचकों ने यहाँ तक अनुमान किया है कि 'पद्म' और 'ब्रह्मवैवर्त्त' पुराणों के राधा और गोपी सम्बन्धी अनेक विवरण उसी के प्रभाव हैं। जो हो, गोपियों का उत्पत्ति सम्बन्धी उल्लेख अत्यन्त रोचक और विचारणीय है।
निम्बार्क के सनकादि या हंस-सम्प्रदाय में कृष्ण-ब्रह्म की अचिन्त्य शक्ति को द्विविध बताया गया है- ऐश्वर्य और माधुर्य।
रमा, लक्ष्मी या 'भू' नामकी उनकी ऐश्वर्य-शक्ति है और
गोपी और राधा माधुर्य या प्रेम-शक्ति
'दशश्लोकी' में उल्लेख
इस प्रकार राधा तथा अन्य गोपियाँ कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति हैं। निम्बार्करचित 'दशश्लोकी' में कहा गया है-

"अंगे तु वामे वृषभानुजां मुदा विराजमानामनुरूप सौभगाम्।
सखीसहस्त्रै: परिसेवितां सदा स्मरेम देवीं सकलेष्टकामदाम्॥"

अर्थात "अनुरूप सौभगारूप से कृष्ण के वामांग में आनन्दपूर्वक विराजमान, समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली बृषभानुजी को नमस्कार करता हूँ, जो सहस्त्रों सखियों द्वारा परिसेवित हैं।"

गोपी सम्बन्धी सबसे अधिक विस्तार गौडीय वैष्णव (चैतन्य) सम्प्रदाय और पुष्टिमार्ग((वल्लभ-सम्प्रदाय) में मिलते हैं। गौडीय वैष्णव मत के अनुसार गोपियाँ भगवान् श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति हैं। वे अप्रकट तथा प्रकट दोनों लीलाओं में उनके नित्य परिकर के यप में निरन्तर उनके साथ रहती हैं। श्रीकृष्ण की तरह गोप-गोपियों की प्रकट और अप्रकट, दोनों शरीर होते हैं। वृन्दावन की प्रकट लीला में गोपियाँ भगवान की स्वरूप-शक्ति-प्रादुर्भाव-रूपा हैं। भगवान की आह्लादिनी गुह्यविद्या के रहस्य का प्रवर्तन उन्हीं के द्वारा होता है। वे नित्यसिद्ध हैं। रूपगोस्वामी प्रभृति चैतन्य-मत के विवेचकों ने गोपियों का वर्गीकरण करके कृष्ण की ब्रज वृन्दावन की प्रेमलीला में उनके विभिन्न स्थानों का निर्देश किया है।
'कृष्णवल्लभा' का उल्लेख
'उज्ज्वल नीलमणि' के 'कृष्णवल्लभा' अध्याय के अनुसार कृष्णवल्लभाओं को पहले 'स्वकीया' और 'परकीया', इन दो भागों में बाँटा गया है।

स्वकीया - रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती आदि कृष्ण की विवाहिता पत्नियाँ स्वकीया हैं।
परकीया - श्रीकृष्ण की प्रेयसी गोपियाँ परकीया हैं।
परन्तु गोपियों का परकीयत्व लौकिक दृष्टिमात्र से है। वास्तव में तो वे सभी स्वकीया हैं, क्योंकि उन्होंने प्राण, मन और शरीर सभी कुछ कृष्णार्पण कर रखा है। फिर भी प्रकट लीला में इन गोपियों का परकीयात्व ही स्वीकार किया गया है। परकीया गोपियाँ-कन्या और परोढा दो प्रकार की हैं। कन्या अविवाहित कुमारियाँ हैं, जो कृष्ण को ही अपना पति मानती हैं। प्रेम-भक्ति में श्रेष्ठता परोढाओं की ही है।

परोढा गोपियाँ

रासलीला का दृश्य
परोढा गोपियाँ पुन: तीन प्रकार की हैं-

नित्यप्रिया
साधन-परा
देवी
नित्यप्रिया
जो गोपियाँ नित्यकाल के लिए नित्य वृन्दावन में श्रीकृष्ण के लीला-परिकर की अंग हैं, वे नित्यप्रिया हैं। ये वस्तुत: वे भक्त जीव हैं, जिन्होंने प्रेम-भक्ति के द्वारा भगवत्-स्वरूप में प्रवेश पा लिया है और जो नित्यसिद्ध गोपी-देह से उनकी लीला के अभिन्न अंग बन गये हैं। नित्यप्रिया गोपियों को प्राचीना भी कहा गया है, क्योंकि ये वे जीव हैं, जो बहुत लम्बी साधना के फलस्वरूप गोपी-देह पाते हैं। इनका गोपी-भाव भक्तों का साध्य नहीं है। नित्यप्रिया गोपियों में आठ प्रधान गोपियाँ यूथेश्वरी होती है। प्रत्येक यूथ में यूथेश्वरी गोपी के भावकी असंख्य गोपियाँ होती हैं। राधा और चन्द्रावली सर्वप्रधान यूथेश्वरी गोपियाँ हैं। इनमें भी राधा सर्वश्रेष्ठ-महाभाव-स्वरूपा हैं। उनका साध्य साधना-परा गोपियों का रूप है।

साधन-परा
ये साधना-परा गोपियाँ, 'यौथिकी' और 'अयौथिकी' दो प्रकार की हैं।

यौथिकी - ये अपने गण के साथ प्रेम-साधना में संलग्न रहती हैं। यौथिकी पुन: दो प्रकार की होती हैं- मुनि और उपनिषद। पौराणिक प्रमाणों के अनुसार अनेक मुनिगण जो कृष्ण के माधुर्यरूप का आव्वाद लेने के लिए गोपी-भावकी आकांक्षा करते हैं, गोपियों का जनम पाकर कृष्ण की ब्रजलीला में सम्मिलित होने का सौभाग्य लाभ करते हैं। ये ही मुनि-यूथकी गोपियाँ हैं। उपनिषद-यूथ की गोपियाँ पूर्वजन्म के उपनिषदगण हैं, जिन्होंने तपस्या करके ब्रज में गोपी रूप पाया है।
अयौथिकी - गोपियों का ये रूप उन कृपा प्राप्त जीवों को मिलता है, जो गोपी-भाव से भगवान कृष्ण के प्रेम में रत रहते हैं और अनेक योनियों में जन्म लेने के बाद गोपीरूप पाते हैं। ये अयौथिकी गोपियाँ नवीना भी कहलाती हैं और इन्हें भक्ति के फलस्वरूप प्राचीना नित्यप्रिया गोपियों के साथ सालोक्य प्राप्ति होती है।
देवी
देवी उन गोपियों का नाम है, जो नित्यप्रियाओं के अशं से श्रीकृष्ण के सन्तोष के लिए उस समय देवी के रूप में जन्म लेती हैं, जब स्वयं श्रीकृष्ण देवयोनि में अंशावतार धारण करते हैं। उपर्युक्त कन्या गोपियाँ ये ही देवियाँ हैं जो नित्यप्रियाओं की परम प्रिय सखियों का पद पाती हैं।