शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

अन्य देवताओं की पूजा तथा कृष्ण की भक्ति का भिन्न भिन्न फल- विधान- संशोधित संस्करण-

सावित्री धर्मराज के प्रश्नोत्तर और धर्मराजद्वारा सावित्री को वरदान देने के प्रसंग में एक प्राचीन पौराणिक आख्यान है।
जिसमें विभिन्न देवी और देवों के पूजन और आराधना- साधना का फल तथा उनके महिमा मण्डित रूप का तुलनात्मक मूल्यांकन किया गया है। 
"अनुवाद:-

    {सावित्र्युपाख्याने कर्मविपाकवर्णनम्}

                "श्रीनारायण उवाच
सावित्रीवचनं श्रुत्वा जगाम विस्मयं यमः ।
प्रहस्य वक्तुमारेभे कर्मपाकं तु जीविनाम् ॥१। 

"अनुवाद:-

श्रीनारायण बोले [हे नारद!] सावित्री की बात सुनकर यमराज आश्चर्यमें पड़ गये और हँसकर उन्होंने प्राणियों के कर्मफलके विषयमें बताना आरम्भ किया ॥1॥

                  "धर्म उवाच
कन्या द्वादशवर्षीया वत्से त्वं वयसाधुना।
ज्ञानं ते पूर्वविदुषां ज्ञानिनां योगिनां परम् ॥२॥

"अनुवाद:-

धर्म बोले- हे वत्से ! इस समय तुम्हारी अवस्था तो मात्र बारह वर्षकी है, किंतु तुम्हारा ज्ञान बड़े-बड़े विद्वानों, ज्ञानियों और योगियोंसे भी बढ़कर है॥2॥

*सेवन्ते द्विभुजं कृष्णं परमात्मानमीश्वरम् ।
गोलोकं प्रति ते भक्ता दिव्यरूपविधारिणः ॥२७

"अनुवाद:-

हे साध्वी ! उन निष्काम जनों को पुनः इस लोक में नहीं आना पड़ता जो द्विभुज परमात्मा श्रीकृष्ण की उपासना करते हैं और अन्त में वे भक्त दिव्यरूप धारणकर गोलोक को ही प्राप्त होते हैं ॥27 ॥

सकामिनो वैष्णवाश्च गत्वा वैकुण्ठमेव च ।
भारतं पुनरायान्ति तेषां जन्म द्विजातिषु ॥२८॥

"अनुवाद:-

सकाम वैष्णव वैकुण्ठधाम में जाकर समयानुसार पुनः भारतवर्ष में लौट आते हैं और यहाँ पर द्विजातियों ( ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य) के कुलमें उनका जन्म होता है।२८। 

काले गते च निष्कामा भवन्त्येव क्रमेण च ।
भक्तिं च निर्मलां तेभ्यो दास्यामि निश्चितं पुनः॥ २९ ॥

"अनुवाद:-

वे सभी कुछ समय बीतने पर क्रमशः निष्काम भक्त बन जाते हैं और मैं उन्हें अपनी निर्मल भक्ति प्रदान कर देता हूँ; यह सर्वथा निश्चित है। २९।

*ब्राह्मणा वैष्णवाश्चैव सकामाः सर्वजन्मसु ।
न तेषां निर्मला बुद्धिर्विष्णुभक्तिविवर्जिताः॥३०॥

"अनुवाद:-

जो सकाम ब्राह्मण तथा वैष्णवजन हैं, अनेक जन्मों में भी विष्णुभक्ति से रहित होने के कारण उनकी बुद्धि निर्मल नहीं हो पाती ॥30 ॥

*मूलप्रकृतिभक्ता ये निष्कामा धर्मचारिणः।
मणिद्वीपं प्रयान्त्येव पुनरावृत्तिवर्जितम् ॥३४॥

"अनुवाद:-

जो धर्मपरायण तथा निष्काम मानव मूलप्रकृति भगवती जगदम्बा की भक्ति करते हैं, वे मणिद्वीप  में जाते हैं और फिर वहाँ से लौटकर नहीं आते ॥ 34 ॥

*स याति विष्णुलोकं च श्वेतद्वीपं मनोहरम् ।
तत्रैव निवसत्येव यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥४९॥

"अनुवाद:-

जो मनुष्य ब्राह्मणोंको भूमि तथा प्रचुर धन प्रदान करता है, वह भगवान् विष्णुके श्वेतद्वीप नामक मनोहर लोक में पहुँच जाता है और वहाँ पर चन्द्र सूर्यकी स्थितिपर्यन्त निवास करता है।४९।

*अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ।
देवतीर्थसहायेन कायव्यूहेन शुध्यति।
एतत्ते कथितं किञ्चित् किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥ ७०॥

(देवीभागवतपुराण)

कृतकर्मक्षयो नास्ति कल्पकोटिशतैरपि ।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥३९॥

शिवपुराण-8/23/39

शिवपुराण में कर्म- फल के विषय में एक प्राचीन प्रसंग है 

एक बार-देवर्षि नारद जी ने श्री सनकजी से कहाः "भगवन् ! मेरे मन में एक संदेह पैदा हो गया है। आपने कहा है कि जो लोग पुण्यकर्म करते हैं, उन्हें कोटि सहस्र कल्पों तक उनका महान भोग प्राप्त होता रहता है। दूसरी ओर यह भी आपने बताया है कि प्राकृत प्रलय में सम्पूर्ण लोकों का नाश हो जाता है और एकमात्र भगवान स्वराट् विष्णु ही शेष रह जाते हैं। अतः मुझे यह संशय हुआ है कि क्या प्रलयकाल तक जीव के पुण्य और पापभोग की समाप्ति नहीं होती ? आप इस संदेह का निवारण कीजिये "
श्रीसनक जी बोलेः "महाप्राज्ञ ! भगवान स्वराट-विष्णु अविनाशी, अनंत, परम प्रकाशस्वरूप और सनातन पुरुष हैं। वे विशुद्ध, निर्गुण, नित्य और माया-मोह से रहित हैं। परमानंदस्वरूप श्रीहरि निर्गुण होते हुए भी सगुण से प्रतीत होते हैं। 
ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि रूपों में व्यक्त होकर वे ही भेदभाव से दिखायी देते हैं। वे ही माया के संयोग से सम्पूर्ण जगत का कार्य करते हैं। 

 ये ही श्री हरि ब्रह्माजी के रूप से सृष्टि तथा विष्णुरूप से जगत का पालन करते हैं और अंत में भगवान रूद्र के रूप से ही सबको अपना ग्रास बनाते हैं। यह निश्चित सत्य है। प्रलय काल व्यतीत होने पर भगवान जनार्दन ने शेषशय्या से उठकर ब्रह्माजी के रूप से सम्पूर्ण चराचर विश्व की पूर्वकल्पों में जो-जो स्थावर-जंगम जीव जहाँ-जहाँ स्थित थे, नूतन कल्प में ब्रह्माजी उस सम्पूर्ण जगत की पूर्ववत् सृष्टि कर देते हैं। 

अतः साधुशिरोमणे ! किये हुए पापों और पुण्यों का अक्षय फल अवश्य भोगना पड़ता है (प्रलय हो जाने पर जीव के जिन कर्मों का फल शेष रह जाता है, दूसरे कल्प में नयी सृष्टि होने पर वह जीव पुनः अपने पुरातन कर्मों का भोग भोगता है।) 

कोई भी कर्म सौ करोड़ कल्पों में भी बिना भोगे नष्ट नहीं होता। अपने किये हुए शुभ और अशुभ कर्मों का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है।"

"नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।।
(नारद पुराणः पूर्व भागः 31.69-70)

अवश्यमेव भोक्तव्यं कर्मणां ह्यक्षयं फलम् ।
नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि।३१-६९।

अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।
यो देवः सर्वलोकानामंतरात्मा जगन्मयः।

सर्वकर्मफलं भुक्ते परिपूर्णः सनातनः।३१-७०।
योऽसौ विश्वंभरो देवो गुणमेदव्यवस्थितः।

सूजत्यवति चात्त्येतत्सर्वं सर्वभुगव्यय:।३१-७१।

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे यमदूतकृत्यनिरुपणं नामैकत्रिंशोऽध्यायः।


(राम और कृष्ण की भक्ति का  भिन्न भिन्न फल-)

श्रीरामनवमीं यो हि करोति भारते पुमान् ।
सप्तमन्वन्तरं यावन्मोदते विष्णुमन्दिरे ॥७६॥

पुनः सुयोनिं सम्प्राप्य रामभक्तिं लभेद्‌ध्रुवम् ।
जितेन्द्रियाणां प्रवरो महांश्च धनवान्भवेत् ॥ ७७॥

         (कृष्ण की भक्ति का फल-)

कार्तिकीपूर्णिमायां च कृत्वा तु रासमण्डलम् ।
गोपानां शतकं कृत्वा गोपीनां शतकं तथा ।८५।

शिलायां प्रतिमायां च श्रीकृष्णं राधया सह ।
भारते पूजयेद्‍भक्त्या चोपचाराणि षोडश ।८६।

गोलोके वसते सोऽपि यावद्वै ब्रह्मणो वयः ।
भारतं पुनरागत्य कृष्णे भक्तिं लभेद्‌दृढाम् ।८७।

क्रमेण सुदृढां भक्तिं लब्ध्वा मन्त्रं हरेरहो ।
देहं त्यक्त्वा च गोलोकं पुनरेव प्रयाति सः।८८।

ततः कृष्णस्य सारूप्यं पार्षदप्रवरो भवेत् ।
पुनस्तत्पतनं नास्ति जरामृत्युहरो भवेत् ।८९।

शुक्लां वाप्यथवा कृष्णां करोत्येकादशीं च यः ।
वैकुण्ठे मोदते सोऽपि यावद्वै ब्रह्मणो वयः।९०।

भारते पुनरागत्य कृष्णभक्तिं लभेद्‌ध्रुवम् ।
क्रमेण भक्तिं सुदृढां करोत्येकां हरेरहो ।९१।

देहं त्यक्त्वा च गोलोकं पुनरेव प्रयाति सः ।
ततः कृष्णस्य सारूप्यं सम्प्राप्य पार्षदो भवेत्।९२।

पुनस्तत्पतनं नास्ति जरामृत्युहरो भवेत् ।
अनुवाद:-

जो भारतवर्ष में कार्तिक पूर्णिमा को सैकड़ों गोपों (अहीरों) तथा गोपियों(अहीराणीयों) को साथ लेकर रासमण्डल - सम्बन्धी उत्सव मनाकर शिलापर या प्रतिमा में सोलहों प्रकार के पूजनोपचारों से भक्तिपूर्वक राधासहित श्रीकृष्णकी पूजा सम्पन्न करता है, वह ब्रह्माजी के स्थितिपर्यन्त गोलोक में निवास करता है। पुनः भारतवर्ष में जन्म पाकर वह श्रीकृष्ण की स्थिर भक्ति प्राप्त करता है। 
भगवान् श्रीहरि की क्रमशः सुदृढ़ भक्ति तथा उनका मन्त्र प्राप्त करके देह त्याग के अनन्तर वह पुनः गोलोक चला जाता है। वहाँ श्रीकृष्णके समान रूप प्राप्त करके वह उनका प्रमुख पार्षद बन जाता है।
पुनः वहाँ से उसका पतन नहीं होता, वह जरा तथा मृत्युसे सर्वथा रहित हो जाता है । 85-89 ॥


इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे नारायणनारदसंवादे सावित्र्युपाख्याने कर्मविपाकवर्णनं नामैकोनत्रिशोऽध्यायः ॥२९॥

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कृष्ण 16  कलाओं से से भी अधिक परिपूर्णत्तम परमेश्वर स्वरूप में हैं।  राम बूँद हैं तो कृष्ण समुद्र है।

गोलोक खण्ड : अध्याय -3

भगवान श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में श्रीविष्णु आदि का प्रवेश; देवताओं द्वारा भगवान की स्तुति; भगवान का अवतार लेने का निश्चय; श्रीराधा की चिंता और भगवान का उन्हें सांत्वना-प्रदान

श्री जनकजी (बहुलाश्व) ने पूछा- मुने ! परात्पर महात्मा भगवान श्रीकृष्णचन्द्र का दर्शन प्राप्त कर सम्पूर्ण देवताओं ने आगे क्या किया, मुझे यह बताने की कृपा करें।

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन ! उस समय सबके देखते-देखते अष्ट भुजाधारी वैकुण्ठधिपति भगवान श्रीहरि उठे और साक्षात भगवान श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में लीन हो गये।

उसी समय कोटि सूर्यों के समान तेजस्वी, प्रचण्ड पराक्रमी पूर्ण स्वरूप भगवान नृसिंहजी पधारे और भगवान श्रीकृष्ण तेज में वे भी समा गये। इसके बाद सहस्र भुजाओं से सुशोभित, श्वेतद्वीप के स्वामी विराट पुरुष, जिनके शुभ्र रथ में सफेद रंग के लाख घोड़े जुते हुए थे, उस रथ पर आरूढ़ होकर वहाँ आये।

उनके साथ श्रीलक्ष्मीजी भी थीं।
वे अनेक प्रकार के अपने आयुधों से सम्पन्न थे। पार्षदगण चारों ओर से उनकी सेवा में उपस्थित थे। वे भगवान भी उसी समय श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में सहसा प्रविष्ट हो गये।

फिर वे पूर्णस्वरूप कमल लोचन भगवान श्रीराम स्वयं वहाँ पधारे। उनके हाथ में धनुष और बाण थे तथा साथ में श्रीसीताजी और भरत आदि तीनों भाई भी थे। उनका दिव्य रथ दस करोड़ सूर्यों के समान प्रकाशमान था।

उस पर निरंतर चँवर डुलाये जा रहे थे। असंख्य वानर यूथपति उनकी रक्षा के कार्य में संलग्न थे। 

उस रथ के एक लाख चक्कों से मेघों की गर्जना के समान गम्भीर ध्वनि निकल रही थी।

उस पर लाख ध्वजाएँ फहरा रही थीं। उस रथ में लाख घोड़े जुते हुए थे।

वह रथ सुवर्णमय था। 
उसी पर बैठकर भगवान श्रीराम वहाँ पधारे थे। वे भी श्रीकृष्णचन्द्र के दिव्य विग्रह में लीन हो गये।

फिर उसी समय साक्षात यज्ञनारायण श्रीहरि वहाँ पधारे, जो प्रलयकाल की जाज्वल्यमान अग्निशिखा के समान उद्भासित हो रहे थे। देवेश्वर यज्ञ अपनी धर्मपत्नी दक्षिणा के साथ ज्योतिर्मय रथ पर बैठे दिखायी देते थे।

वे भी उस समय श्याम विग्रह भगवान श्रीकृष्णचन्द्र में लीन हो गये।  तत्पश्चात् साक्षात भगवान नर-नारायण वहाँ पधारे। उनके शरीर की कांति मेघ के समान श्याम थी। उनके चार भुजाएँ थीं, नेत्र विशाल थे और वे मुनि के वेष में थे। उनके सिर का जटा-जूट कौंधती हुई करोड़ों बिजलियों के समान दीप्तिमान था।

परम बुद्धिमान नरेश ! भगवान विष्णु स्वयं जिनके अंत:करण में आविष्ट हो, अभीष्ट कार्य का सम्पादन करके फिर अलग हो जाते हैं, राजन ! ऐसे नानाविध अवतारों को ‘आवेशावतार’ समझो।
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आवेश अवतार स्थाई नहीं होता है जिस प्रकार किसी पर देवी आ जाती और फिर तान्त्रिक के झाड़ -फूँक करने पर चली जाती है उसी प्रकार परशुराम पर भी ईश्वर की आवेशीय ऊर्जा  आती है और फिर चली जाती है।।

सन्दर्भ:-गोलोक खण्ड : अध्याय -3



करोति भारते यो हि कृष्णजन्माष्टमीव्रतम् ।
शतजन्मकृतं पापं मुच्यते नात्र संशयः ॥ ६९ ॥

वैकुण्ठे मोदते सोऽपि यावदिन्द्राश्चतुर्दश ।
पुनः सुयोनिं सम्प्राप्य कृष्णे भक्तिंलभेद्‌ ध्रुवम्॥ ७०॥

इहैव भारते वर्षे शिवरात्रिं करोति यः ।
मोदते शिवलोके स सप्तमन्वन्तरावधि ॥ ७१ ॥

शिवाय शिवरात्रौ च बिल्वपत्रं ददाति यः ।
पत्रमानयुगं तत्र मोदते शिवमन्दिरे ॥ ७२ ॥

पुनः सुयोनिं सम्प्राप्य शिवभक्तिं लभेद्‌ध्रुवम् ।
विद्यावान्पुत्रवाञ्छ्रीमान् प्रजावान्भूमिमान्भवेत् ॥ ७३॥

चैत्रमासेऽथवा माघे शङ्‌करं योऽर्चयेद्‌व्रती ।
करोति नर्तनं भक्त्या वेत्रपाणिर्दिवानिशम् ॥७४॥

मासं वाप्यर्धमासं वा दश सप्त दिनानि च ।
दिनमानयुगं सोऽपि शिवलोके महीयते ॥ ७५ ॥

श्रीरामनवमीं यो हि करोति भारते पुमान् ।
सप्तमन्वन्तरं यावन्मोदते विष्णुमन्दिरे ॥७६॥

पुनः सुयोनिं सम्प्राप्य रामभक्तिं लभेद्‌ध्रुवम् ।
जितेन्द्रियाणां प्रवरो महांश्च धनवान्भवेत्॥७७ ॥


शारदीयां महापूजां प्रकृतेर्यः करोति च ।
महिषैश्छागलैर्मेषैः खड्गैर्भेकादिभिः सति ॥ ७८ ॥
नैवेद्यैरुपहारैश्च धूपदीपादिभिस्तथा ।
नृत्यगीतादिभिर्वाद्यैर्नानाकौतुकमङ्‌गलम् ॥ ७९ ॥
शिवलोके वसेत्सोऽपि सप्तमन्वन्तरावधि ।
पुनः सुयोनिं सम्प्राप्य नरो बुद्धिं च निर्मलाम् ॥ ८० ॥
अतुलां श्रियमाप्नोति पुत्रपौत्रविवर्धनीम् ।
महाप्रभावयुक्तश्च गजवाजिसमन्वितः ॥ ८१ ॥
राजराजेश्वरः सोऽपि भवेदेव न संशयः ।
ततः शुक्लाष्टमीं प्राप्य महालक्ष्मीं च योऽर्चयेत् ॥ ८२ ॥
नित्यं भक्त्या पक्षमेकं पुण्यक्षेत्रे च भारते ।
दत्त्वा तस्यै प्रकृष्टानि चोपचाराणि षोडश ॥ ८३ ॥
गोलोके च वसेत्सोऽपि यावदिन्द्राश्चतुर्दश ।
पुनः सुयोनिं सम्प्राप्य राजराजेश्वरो भवेत् ॥ ८४ ॥
कार्तिकीपूर्णिमायां च कृत्वा तु रासमण्डलम् ।
गोपानां शतकं कृत्वा गोपीनां शतकं तथा ॥ ८५ ॥
शिलायां प्रतिमायां च श्रीकृष्णं राधया सह ।
भारते पूजयेद्‍भक्त्या चोपचाराणि षोडश ॥ ८६ ॥
गोलोके वसते सोऽपि यावद्वै ब्रह्मणो वयः ।
भारतं पुनरागत्य कृष्णे भक्तिं लभेद्‌दृढाम् ॥ ८७ ॥
क्रमेण सुदृढां भक्तिं लब्ध्वा मन्त्रं हरेरहो ।
देहं त्यक्त्वा च गोलोकं पुनरेव प्रयाति सः ॥ ८८ ॥
ततः कृष्णस्य सारूप्यं पार्षदप्रवरो भवेत् ।
पुनस्तत्पतनं नास्ति जरामृत्युहरो भवेत् ॥ ८९ ॥
शुक्लां वाप्यथवा कृष्णां करोत्येकादशीं च यः ।
वैकुण्ठे मोदते सोऽपि यावद्वै ब्रह्मणो वयः ॥ ९० ॥
भारते पुनरागत्य कृष्णभक्तिं लभेद्‌ध्रुवम् ।
क्रमेण भक्तिं सुदृढां करोत्येकां हरेरहो ॥ ९१ ॥
देहं त्यक्त्वा च गोलोकं पुनरेव प्रयाति सः ।
ततः कृष्णस्य सारूप्यं सम्प्राप्य पार्षदो भवेत् ॥ ९२ ॥
पुनस्तत्पतनं नास्ति जरामृत्युहरो भवेत् ।
भाद्रे च शुक्लद्वादश्यां यः शक्रं पूजयेन्नरः ॥ ९३ ॥
षष्टिवर्षसहस्राणि शक्रलोके महीयते ।
रविवारे च संक्रान्त्यां सप्तम्यां शुक्लपक्षके ॥ ९४ ॥
सम्पूज्यार्कं हविष्यान्नं यः करोति च भारते ।
महीयते सोऽर्कलोके यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥ ९५ ॥
भारतं पुनरागत्य चारोगी श्रीयुतो भवेत् ।
ज्येष्ठकृष्णचतुर्दश्यां सावित्रीं यो हि पूजयेत् ॥ ९६ ॥
महीयते ब्रह्मलोके सप्तमन्वन्तरावधि ।
पुनर्महीं समागत्य श्रीमानतुलविक्रमः ॥ ९७ ॥
चिरजीवी भवेत्सोऽपि ज्ञानवान्सम्पदा युतः ।
माघस्य शुक्लपञ्चम्यां पूजयेद्यः सरस्वतीम् ॥ ९८ ॥
संयतो भक्तितो दत्त्वा चोपचाराणि षोडश ।
महीयते मणिद्वीपे यावद्ब्रह्म दिवानिशम् ॥ ९९ ॥
सम्प्राप्य च पुनर्जन्म स भवेत्कविपण्डितः ।
गां सुवर्णादिकं यो हि ब्राह्मणाय ददाति च ॥ १०० ॥
नित्यं जीवनपर्यन्तं भक्तियुक्तश्च भारते ।
गवां लोमप्रमाणाब्दं द्विगुणं विष्णुमन्दिरे ॥ १०१ ॥
मोदते हरिणा सार्धं क्रीडाकौतुकमङ्‌गलैः ।
तदन्ते पुनरागत्य राजराजेश्वरो भवेत् ॥ १०२ ॥
श्रीमांश्च पुत्रवान्विद्वाञ्ज्ञानवान्सर्वतः सुखी ।
भोजयेद्योऽपि मिष्टान्नं ब्राह्मणेभ्यश्च भारते ॥ १०३ ॥
विप्रलोमप्रमाणाब्दं मोदते विष्णुमन्दिरे ।
ततः पुनरिहागत्य सुखी च धनवान्भवेत् ॥ १०४ ॥
विद्वान्सुचिरजीवी च श्रीमानतुलविक्रमः ।
यो वक्ति वा ददात्येव हरेर्नामानि भारते ॥ १०५ ॥
युगं नाम प्रमाणं च विष्णुलोके महीयते ।
ततः पुनरिहागत्य स सुखी धनवान्भवेत् ॥ १०६ ॥
यदि नारायणक्षेत्रे फलं कोटिगुणं भवेत् ।
नाम्ना कोटिं हरेर्यो हि क्षेत्रे नारायणे जपेत् ॥ १०७ ॥
सर्वपापविनिर्मुक्तो जीवन्मुक्तो भवेद्‌ध्रुवम् ।
न लभेत्स पुनर्जन्म वैकुण्ठे स महीयते ॥ १०८ ॥
लभेद्विष्णोश्च सारूप्यं न तस्य पतनं भवेत् ।
विष्णुभक्तिं लभेत्सोऽपि विष्णुसारूप्यमाप्नुयात् ॥ १०९ ॥
शिवं यः पूजयेन्नित्यं कृत्वा लिङ्‌गं च पार्थिवम् ।
यावज्जीवनपर्यन्तं स याति शिवमन्दिरम् ॥ ११० ॥
मृदो रेणुप्रमाणाब्दं शिवलोके महीयते ।
ततः पुनरिहागत्य राजेन्द्रो भारते भवेत् ॥ १११ ॥
शिलां च पूजयेन्नित्यं शिलातोयं च भक्षति ।
महीयते च वैकुण्ठे यावद्वै ब्रह्मणः शतम् ॥ ११२ ॥
ततो लब्ध्वा पुनर्जन्म हरिभक्तिं च दुर्लभाम् ।
महीयते विष्णुलोके न तस्य पतनं भवेत् ॥ ११३ ॥
तपांसि चैव सर्वाणि व्रतानि निखिलानि च ।
कृत्वा तिष्ठति वैकुण्ठे यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥ ११४ ॥
ततो लब्ध्वा पुनर्जन्म राजेन्द्रो भारते भवेत् ।
ततो मुक्तो भवेत्पश्चात्पुनर्जन्म न विद्यते ॥ ११५ ॥
यः स्नात्वा सर्वतीर्थेषु भुवः कृत्वा प्रदक्षिणाम् ।
स तु निर्वाणतां याति न च जन्म भवेद्‌भुवि ॥ ११६ ॥
पुण्यक्षेत्रे भारते च योऽश्वमेधं करोति च ।
अश्वलोममिताब्दं च शक्रस्यार्धासनं भजेत् ॥ ११७ ॥
चतुर्गुणं राजसूये फलमाप्नोति मानवः ।
सर्वेभ्योऽपि मखेभ्यो हि परो देवीमखः स्मृतः ॥ ११८ ॥
विष्णुना च कृतः पूर्वं ब्रह्मणा च वरानने ।
शङ्‌करेण महेशेन त्रिपुरासुरनाशने ॥ ११९ ॥
शक्तियज्ञः प्रधानश्च सर्वयज्ञेषु सुन्दरि ।
नानेन सदृशो यज्ञस्त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥ १२० ॥
दक्षेण च कृतः पूर्वं महान्संवादसंयुतः ।
बभूव कलहो यत्र दक्षशङ्‌करयोः सति ॥ १२१ ॥
शेपुश्च नन्दिनं विप्रा नन्दी विप्रांश्च कोपतः ।
यद्धेतोर्दक्षयज्ञं च बभञ्ज चन्द्रशेखरः ॥ १२२ ॥
चकार देवीयज्ञं स पुरा दक्षः प्रजापतिः ।
धर्मश्च कश्यपश्चैव शेषश्चापि च कर्दमः ॥ १२३ ॥
स्वायम्भुवो मनुश्चैव तत्पुत्रश्च प्रियव्रतः ।
शिवः सनत्कुमारश्च कपिलश्च ध्रुवस्तथा ॥ १२४ ॥
राजसूयसहस्राणां फलमाप्नोति निश्चितम् ।
देवीयज्ञात्परो यज्ञो नास्ति वेदे फलप्रदः ॥ १२५ ॥
वर्षाणां शतजीवी च जीवन्मुक्तो भवेद्‌ध्रुवम् ।
ज्ञानेन तेजसा चैव विष्णुतुल्यो भवेदिह ॥ १२६ ॥
देवानां च यथा विष्णुर्वैष्णवानां च नारद ।
शास्त्राणां च यथा वेदा वर्णानां ब्राह्मणो यथा ॥ १२७ ॥
तीर्थानां च यथा गङ्‌गा पवित्राणां शिवो यथा ।
एकादशी व्रतानां च पुष्पाणां तुलसी यथा ॥ १२८ ॥
नक्षत्राणां यथा चन्द्रः पक्षिणां गरुडो यथा ।
यथा स्त्रीणां च प्रकृती राधा वाणी वसुन्धरा ॥ १२९ ॥
शीघ्राणां चेन्द्रियाणां च चञ्चलानां मनो यथा ।
प्रजापतीनां ब्रह्मा च प्रजानां च प्रजापतिः ॥ १३० ॥
वृन्दावनं वनानां च वर्षाणां भारतं यथा ।
श्रीमतां च यथा श्रीश्च विदुषां च सरस्वती ॥ १३१ ॥
पतिव्रतानां दुर्गा च सौभाग्यानां च राधिका ।
देवीयज्ञस्तथा वत्से सर्वयज्ञेषु भामिनि ॥ १३२ ॥
अश्वमेधशतेनैव शक्रत्वं च लभेद्‌ध्रुवम् ।
सहस्रेण विष्णुपदं सम्प्राप्तः पृथुरेव च ॥ १३३ ॥
स्नानं च सर्वतीर्थानां सर्वयज्ञेषु दीक्षणम् ।
सर्वेषां च व्रतानां च तपसां फलमेव च ॥ १३४ ॥
पाठे चतुर्णां वेदानां प्रादक्षिण्यं भुवस्तथा ।
फलभूतमिदं सर्वं मुक्तिदं शक्तिसेवनम् ॥ १३५ ॥
पुराणेषु च वेदेषु चेतिहासेषु सर्वतः ।
निरूपितं सारभूतं देवीपादाम्बुजार्चनम् ॥ १३६ ॥
तद्वर्णनं च तद्ध्यानं तन्नामगुणकीर्तनम् ।
तत्स्तोत्रस्मरणं चैव वन्दनं जपमेव च ॥ १३७ ॥
तत्पादोदकनैवेद्यं भक्षणं नित्यमेव च ।
सर्वसम्मतमित्येवं सर्वेप्सितमिदं सति ॥ १३८ ॥
भज नित्यं परं ब्रह्म निर्गुणं प्रकृतिं पराम् ।
गृहाण स्वामिनं वत्से सुखं वस च मन्दिरे ॥ १३९ ॥
अयं ते कथितः कर्मविपाको मङ्‌गलो नृणाम् ।
सर्वेप्सितः सर्वमतस्तत्त्वज्ञानप्रदः परः ॥ १४० ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्या संहितायां नवमस्कन्धे यमेन कर्मविपाककथनं नाम त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥


इस भारतवर्षमें जो मनुष्य शिवरात्रिका व्रत करता है, वह सात मन्वन्तरोंके कालतक शिवलोकों आनन्दसे रहता है॥ 71 ॥

जो मनुष्य शिवरात्रिके दिन भगवान् शंकरको बिल्वपत्र अर्पण करता है, वह बिल्वपत्रोंकी जितनी संख्य है उतने वर्षोंतक उस शिवलोकमें आनन्द भोगता है। पुनः श्रेष्ठ योनि प्राप्त करके वह निश्चय ही शिवभक्ति प्राप्त करता है और विद्या, पुत्र, श्री, प्रजा तथा भूमि- इन सबसे सदा सम्पन्न रहता है ॥ 72-73 ।।

जो व्रती चैत्र अथवा माघमें पूरे मासभर, आधे मास, दस दिन अथवा सात दिनतक भगवान् शंकरकी पूजा करता है और हाथमें बेंत लेकर भक्तिपूर्वक उनके सम्मुख नर्तन करता है, वह उपासनाके दिनोंकी संख्याके बराबर युगोंतक शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ।। 74-75 ll

जो मनुष्य भारतवर्षमें श्रीरामनवमीका व्रत सम्पन करता है, वह विष्णुके धाममें सात मन्वन्तरतक आनन्द करता है। पुनः उत्तम योनिमें जन्म पाकर वह निश्चय ही रामकी भक्ति प्राप्त करता है और जितेन्द्रियोंमें सर्वश्रेष्ठ तथा महान् धनी होता है ॥ 76-77॥

हे साध्वि! जो मनुष्य विविध प्रकारके नैवेद्यों, उपहार सामग्रियों, धूप-दीप आदि पूजनोपचारोंके द्वारा भगवती प्रकृतिको शारदीय महापूजा करता है। तथा उस अवसरपर नृत्य, गीत, वाद्य आदिके द्वारा अनेकविध मंगलोत्सव मनाता है; वह सात मन्वन्तरोंकी अवधितक शिवलोकमें निवास करता है। पुनः उत्तम योनिमें जन्म पाकर वह मनुष्य निर्मल बुद्धि, अपार सम्पत्ति तथा पुत्र-पौत्रोंकी अभिवृद्धि प्राप्त करता है। | वह हाथी, घोड़े आदि वाहनोंसे सम्पन्न तथा महानु | प्रभावशाली राजराजेश्वर हो जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है ll78-813llशारदीय नवरात्रकी शुक्लाष्टमी तिथिसे प्रारम्भ करके एक पक्षतक नित्य पवित्र भारतभूमिपर जो मनुष्य भक्तिपूर्वक उत्तम षोडशोपचार अर्पित करके भगवती महालक्ष्मीकी पूजा करता है, वह चौदह इन्द्रोंके कालपर्यन्त गोलोकमें वास करता है। तत्पश्चात् उत्तम कुलमें जन्म लेकर वह राजराजेश्वर बनता है ।। 82-84 ॥

जो भारतवर्षमें कार्तिकपूर्णिमाको सैकड़ों गोपों तथा गोपियोंको साथ लेकर रासमण्डल - सम्बन्धी उत्सव मनाकर शिलापर या प्रतिमामें सोलहों प्रकारके पूजनोपचारोंसे भक्तिपूर्वक राधासहित श्रीकृष्णकी पूजा सम्पन्न करता है, वह ब्रह्माजीके स्थितिपर्यन्त गोलोकमें निवास करता है। पुनः भारतवर्षमें जन्म पाकर वह श्रीकृष्णकी स्थिर भक्ति प्राप्त करता है। भगवान् श्रीहरिकी क्रमशः सुदृढ़ भक्ति तथा उनका मन्त्र प्राप्त करके देह त्यागके अनन्तर वह पुनः गोलोक चला जाता है। वहाँ श्रीकृष्णके समान रूप प्राप्त करके वह उनका प्रमुख पार्षद बन जाता है। पुनः वहाँसे उसका पतन नहीं होता, वह जरा तथा मृत्युसे सर्वथा रहित हो जाता है ।। 85-89 ॥

जो व्यक्ति शुक्ल अथवा कृष्णपक्षको एकादशीका व्रत करता है, वह ब्रह्माके आयुपर्यन्त वैकुण्ठलोकमें आनन्दका भोग करता है। पुनः भारतवर्षमें जन्म लेकर वह निश्चय ही श्रीकृष्णकी भक्ति प्राप्त करता है और वह क्रमशः एकमात्र श्रीहरिके प्रति अपनी भक्तिको सुदृढ़ करता जाता है। अन्तमें मानव देह त्यागकर वह पुनः गोलोक चला जाता है और वहाँपर श्रीकृष्णका सारूप्य प्राप्त करके उनका पार्षद बन जाता है। वहाँसे पुनः संसारमें उसका आगमन नहीं होता और वह सदाके लिये जरा तथा मृत्युसे मुक्त हो जाता है । ll90 - 92 ॥


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