गुरुवार, 13 अगस्त 2020

अनुभव के बोल ..

१-परिस्थितियाँ नहीं मिटती
     केवल रूप बदलती हैं
 जरूरतें बासूरतें भी उन्हीं राहों पे चलती हैं 

२-युगों की अथाह  धारा में रोहि 
स्वार्थों के भँवर में शोषण के गोते हैं 
इन्तजार की कतारों में लोग हजारों में होते 
 उम्र ढल जाती हैं और हम बस वहीं खड़े रोते हैं

३-भले ही मजबूत रखो अपने इरादे 
मुकम्मिल नहीं फिर भी यहाँ सब  आधे ।

४-शोषण -शोषक की  रीति ये सदीयों पुरानी है 
  हुक्मरानों का खू़ून तो ख़ून है 
गरीबों का खू़न तो नाली का पानी हैं 

५-अपनी हालातों के लिए
 गैरों को क्यों दोष दूँ ! 
भगदड़ का मंजर है 
गिरकर भी मैं क्यों न खुद सदूँ

६-हवाऐं रूख बदलती हैं 
रसूखों में वही रवानी है 
इन अन्धे युगों का दौर है
रूढ़ियों की राहें अनजानी है 

७- हम चले उन राहों पर 
जिनकी मंजिल न कोई ठिकाना है ?
इस देश की तकदीर को
 फिर कौन बदलने वाला है

८-तुम ने अपना सब कुछ गँवा कर 
उन्हें आशियाने में पनाह दी 
उन्होंने कब समझा तुमको 
तुम्हें कैसा लगा ? 
जब मजलिसों में बुलाकर उन्होंने 
तुम्हारे सर पे जब पनाह दी ...

९-परिवर्तन  वक्त का जीवन प्रमाण-पत्र
और यह प्रकृति का विधान है 
कर्म  इस सृष्टि का परिधान है 
और परिवर्तन से समय का ज्ञान है
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१०-आस्तिकता और नास्तिकता व्यक्ति की अनुभूतियों की अवस्थाऐं हैं ! 
और यह अनुभूतियाँ ज्ञान का प्रतिबिम्ब है और ज्ञान व्यक्ति की  परिस्थितियाँ  वातावरण और जीवन के अनुभवों पर निर्भर होता है।
प्रारब्ध इन सब का निर्धारक है |

११-समय , परिस्थिति और  व्यक्ति के मन: स्तर के अनुरूप हिंसा और अहिंसात्मक क्रियाओं का औचित्य है ...

१३-मत भूलिए की युद्ध में क्रोध, साहस को शक्ति के साथ आह्वान करता है !
युद्ध अधिकारों को प्रयत्न पूर्वक प्राप्त करने की प्रक्रिया मात्र भी  है !

१४-शठे शाठ्यम् समाचरेत् की नीति आज की आवश्यकता है !
युद्ध में दया, क्षमा का कोई सैद्धान्तिक औचित्य नहीं ! क्यों बेईमान के साथ बेईमानी और ईमानार के साथ ईमानदारी ही न्याय संगत वा प्राकृतिक  है जैसे गणित में सजातीय चिन्ह धनात्मक और विजातीय ऋणात्मक होते हैं
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आपके द्वारा प्रस्तुत विचार अत्यंत गहन, दार्शनिक और सामाजिक यथार्थ से ओतप्रोत हैं। इनमें समय की गतिशीलता, शोषण, आत्म-बोध और न्याय की कठोर नीति का सुंदर सम्मिश्रण है।

​आपके इन १३ भावों को मैंने संस्कृत श्लोकों (अनुष्टुप एवं अन्य छंदों) में ढालने का प्रयास किया है, साथ ही उनका व्याकरणिक विश्लेषण भी प्रस्तुत है:

​१. परिस्थिति और परिवर्तन (कथन १ एवं ९ का सार)

श्लोक:

कालो हि रूपं परिवर्तयेत, न संस्थितिं संहरते कदाचित्।

परिवर्तनं जीवनपत्रमेव, सृष्टिः प्रकृत्या खलु कर्मवस्त्रा॥


व्याकरण एवं विश्लेषण:

  • व्याकरण: 'परिवर्तयेत' में विधिलिङ् लकार है (बदलता है/चाहिए)। 'संस्थितिम्' (परिस्थिति) + 'संहरते' (नष्ट करता है)। 'कर्मवस्त्रा' में रूपक अलंकार है (कर्म रूपी वस्त्र)।
  • व्याख्या: परिस्थितियाँ कभी समाप्त नहीं होतीं, वे केवल रूप बदलती हैं। परिवर्तन ही जीवन का प्रमाण-पत्र है और कर्म इस सृष्टि का परिधान (वस्त्र) है।

​२. शोषण और सामाजिक विषमता (कथन २ एवं ४ का सार)

श्लोक:

शोषकस्य प्रथा लोके, पुरावृत्ता सनातनी।

धनिनः रुधिरं रक्तं, दीनस्य तु जलं समम्॥


व्याकरण एवं विश्लेषण:

  • व्याकरण: 'शोषकस्य' में षष्ठी विभक्ति है। 'पुरावृत्ता' (प्राचीन)। 'रुधिरम्' और 'रक्तम्' यहाँ सम्मान और जीवन के प्रतीक हैं।
  • व्याख्या: शोषक और शोषण की रीति सदियों पुरानी है। शासकों का खून तो 'खून' माना जाता है, पर गरीबों का रक्त नाली के पानी के समान तुच्छ समझा जाता है।

​३. नियति और पुरुषार्थ (कथन ५ एवं ७ का सार)

श्लोक:

दोषं न दद्यां परकीयलोके, स्वापराधैः पतितोऽहमेव।

अनिश्चितो गन्तव्यमार्ग एषः, भाग्यं कः परिवर्तयेत॥


व्याकरण एवं विश्लेषण:

  • व्याकरण: 'दद्यां' (दा धातु, विधिलिङ् लकार)। 'पतितोऽहमेव' (पतितः + अहम् + एव - विसर्ग और वृद्धि संधि)।
  • व्याख्या: अपनी दशा के लिए दूसरों को दोष क्यों देना? गिरकर भी खुद को संभालना ही पुरुषार्थ है। जब मार्ग और मंजिल अनिश्चित हो, तो देश की तकदीर बदलना एक कठिन यक्ष प्रश्न है।

​४. आस्तिकता, ज्ञान और प्रारब्ध (कथन १० का सार)

श्लोक:

ज्ञानस्य प्रतिबिम्बं हि, नास्तिकतास्तिकता मतिः।

अनुभवैः संचिता बुद्धिः, प्रारब्धं तद् नियामकम्॥


व्याकरण एवं विश्लेषण:

  • व्याकरण: 'नास्तिकतास्तिकता' (द्वन्द्व समास)। 'संचिता' (सम् + चि + क्त प्रत्यय)। 'नियामकम्' (नियंत्रण करने वाला)।
  • व्याख्या: ईश्वर को मानना या न मानना व्यक्ति के ज्ञान का प्रतिबिंब है, जो अनुभवों से निर्मित होता है। और इन सब का अंतिम निर्धारक 'प्रारब्ध' (भाग्य/पूर्वकृत कर्म) है।

​५. युद्ध नीति और 'शठे शाठ्यम्' (कथन ११, १३ एवं १४ का सार)

श्लोक:

शठे शाठ्यं प्रकुर्वीत, न्यायोऽयं प्राकृतिकः स्मृतः।

युद्धे क्षमा न धर्मोऽस्ति, ध्रुवं शौर्यं जयेच्छया॥


व्याकरण एवं विश्लेषण:

  • व्याकरण: 'प्रकुर्वीत' (कृ धातु, आत्मनेपद)। 'न्यायोऽयं' (न्यायः + अयम्)। 'सजातीय' और 'विजातीय' के गणितीय सिद्धांत को यहाँ 'समत्व' और 'विषमत्व' के न्याय से समझा जा सकता है।
  • व्याख्या: दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार ही आज की आवश्यकता और प्राकृतिक न्याय है। युद्ध में दया या क्षमा का कोई स्थान नहीं होता; वहाँ केवल विजय की इच्छा और शक्ति का आह्वान ही तर्कसंगत है।

​विशेष विश्लेषण (समग्र सारांश)

​आपके विचार 'यथा दृष्टि तथा सृष्टि' के सिद्धांत पर आधारित हैं। जहाँ एक ओर आप परिवर्तन को प्रकृति का नियम मानते हैं, वहीं दूसरी ओर सामाजिक यथार्थ (गरीब-अमीर का भेद) पर कटाक्ष करते हैं।

साहित्यिक टिप्पणी:

  • दर्शन: आपके कथनों में 'प्रारब्ध' और 'कर्म' के बीच का द्वंद्व स्पष्ट है।
  • नीति: 'शठे शाठ्यम् समाचरेत्' (दुष्ट के साथ दुष्टता) आचार्य चाणक्य की नीति का समर्थन करता है, जो व्यावहारिक जीवन के लिए अनिवार्य मानी गई है।
  • उपमा: खून को पानी बताना और कर्म को वस्त्र बताना आपके काव्य की उच्च कल्पनाशीलता को दर्शाता है।

यादव योगेश कुमार रोहि 'रोहि', आपकी यह रचना समाज के अंतर्विरोधों को बहुत सूक्ष्मता से पकड़ती है।



 यादव योगेश कुमार रोहि


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