गुरुवार, 2 जुलाई 2026

रेडियो रूपक‌-


यह तो सर्वविदित है कि- "उर्वशी गाय और भेड़ें पालती थी। आभीर कन्या होने के नाते भी उसका इन पशुओं से प्रेम स्वाभाविक ही था। इस बात की भी पुष्टि- देवी भागवत पुराण  के प्रथम स्कन्ध के अध्याय- (१३) के श्लोक- संख्या-(८) से होती है कि उर्वशी के पास दो भेंड़े भी थीं।

पद्य शैली गायन करें–

"समयं चेदृशं कृत्वा स्थिता तत्र वराङ्गना ।एतावुरणकौ राजन्न्यस्तौ रक्षस्व मानद ॥८।

अनुवाद -वह वरांगना इस प्रकार की शर्त रखकर वहीं रहने लगी। उसने पुरूरवा से कहा - हे राजन ! यह दोनों भेंड़ के बच्चे मैं आपके पास धरोहर के रूप में रखती हूँ।

ध्यान रहे अमरकोश - 2/9/76/2/3 - भेंड़ के पर्याय निम्नांकित बताए गए हैं। "उरण पुं। मेषः"

समानार्थक- मेढ्र,उरभ्र,उरण,ऊर्णायु,मेष,वृष्णि,एडक,अवि आदि आदि -

अतः सिद्ध होता है कि उर्वशी के पास दो भेंड़ के बच्चे थे।        

कुछ समय बाद उर्वशी के दोनों भेड़ के बच्चों के साथ एक घटना घटी जिसमें इन्द्र के कहने पर गन्धर्वों ने उर्वशी के दोनों भेंड़ के बच्चों को चुरा कर आकाश मार्ग से ले जाने लगे, तब दोनों भेंड़ के बच्चे जोर-जोर से चिल्लाने लगे। इस घटना का वर्णन श्रीमद् देवी भागवत पुराण के प्रथम स्कन्ध के अध्याय- (१३) के  श्लोक - १७ से २० में वर्णित है । 

श्लोक गायन करे कोरस स्वर में -

इत्युक्तास्तेऽथ गन्धर्वा विश्वावसुपुरोगमाः। ततो गत्वा महागाढे तमसि  प्रत्युपस्थिते॥१७।।

जह्रुस्तावुरणौ देवा रममाणं विलोक्य तम्।चक्रन्दतुस्तदा तौ तु ह्रियमाणौ विहायसा॥१८।।

उर्वशी  तदुपाकर्ण्य  क्रन्दितं  सुतयोरिव।कुपितोवाच राजानं समयोऽयं कृतो मया॥ १९।।

नष्टाहं  तव  विश्वासाद्धृतौ  चोरैर्ममोरणौ।राजन्पुत्रसमावेतौ त्वं किं शेषे स्त्रिया समः॥२०।।

अनुवाद- १७-२०• तब इन्द्र के ऐसा कहने पर विश्वावसु आदि प्रधान गन्धर्वों ने वहाँ से जाकर रात्रि के घोर अन्धकार में राजा पुरूरवा को विहार करते देख उन दोनों भेंड़ों को चुरा लिया तब आकाश मार्ग से जाते हुए चुराए गए वे दोनों भेंड़ जोर से चिल्लाने लगे। १७-१८।

• अपने पुत्र के समान पाले हुए भेड़ों का क्रन्दन सुनते ही उर्वशी ने क्रोधित होकर राजा पुरूरवा से कहा-  हे राजन ! मैंने आपके सम्मुख जो पहली शर्त रखी थी, वह टूट गई आपके विश्वास पर मैं धोखे में पड़ी, क्योंकि पुत्र के समान मेरे प्रिय भेंड़ों को चोरों ने चुरा लिया फिर भी आप घर में स्त्री की तरह शयन कर रहे हैं।१९-२०।

अतः इन उपर्युक्त श्लोकों से सिद्ध होता है कि पुरूरवा और उर्वशी दोनों पशुपालक अहीर जाति से सम्बन्धित थे।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@

उर्वशी के अहिर कन्या होने की पुष्टि-  पद्म पुराण सृष्टि खण्ड अध्याय (२३) श्लोक (६६-६७) तथा  मत्स्यपुराण- के (६९) वें अध्याय के श्लोक- ६१-६२ से भी होती है।  यह हम पूर्व में ही बता चुके हैं । इसी अध्याय में  उर्वशी के द्वारा  "कल्याणिनी" नामक कठिन व्रत का अनुष्ठान करने का प्रसंग है। इसी प्रसंग में भगवान श्री कृष्ण भीम से कल्याणिनी व्रत के बारे में कहते हैं कि -

"त्वा च यामप्सरसामधीशा वैश्याकृता ह्यन्यभवान्तरेषु। आभीरकन्यातिकुतूहलेन सैवोर्वशी सम्प्रति नाकपृष्ठे॥६१।

जाताथवा वैश्यकुलोद्भवापि पुलोमकन्या पुरुहूतपत्नी। तत्रापि तस्याः परिचारिकेयं मम प्रिया सम्प्रति सत्यकामा॥६२।          

अनुवाद- ६१-६२-जन्मान्तरण में एक अहीर की कन्या ने अत्यन्त कुतूहलवश इस व्रत का अनुष्ठान किया था, जिसके फलस्वरूप वह वैश्य( गोप) पुत्री अप्सराओं की अधीश्वरी हुई। वही इस समय स्वर्गलोक में उर्वशी नाम से विख्यात है। ६१।

• इसी प्रकार इसी वैश्यकुल में उत्पन्न हुई एक दूसरी कन्या ने भी इस व्रत का अनुष्ठान किया था, जिसके परिणामस्वरूप वह पुलोम (दानव) की पुत्रीरूप में उत्पन्न होकर इन्द्र की पत्नी बनी। उसके कल्यणनी व्रत के  अनुष्ठान काल में जो उसकी सेविका थी, वही इस समय मेरी प्रिया सत्यभामा है।६२।

लगभग इसी प्रकार पद्मपुराण सृष्टि खण्ड अध्याय (२३ ) में उर्वशी के आभीर कन्या होने का वर्णन है।

"ऋग्वेद की ऋचाओं से लेकर श्रीमद्भागवत और मत्स्य पुराण तक—साक्ष्य यही सिद्ध करते हैं कि पुरूरवा और उर्वशी न केवल प्रेम के प्रतीक थे, बल्कि वे उस महान गोप-कुल के गौरवशाली आदि-पुरुष थे, जिसका ध्येय गो-पालन, धर्म-रक्षण और लोक-कल्याण था। यह गौरवशाली परंपरा, जो बाद में यदुवंश के उदय का कारण बनी, सनातन इतिहास का सबसे सशक्त अध्याय है।"

(पर्दा धीरे-धीरे काला होता है)


इस स्क्रिप्ट की मुख्य विशेषताएं:

  1. ऐतिहासिक संदर्भ: इसमें ऋग्वेद (10/95/3) के 'गोषा:' और 'अवीरे' शब्दों को पुरूरवा और उर्वशी की गोप (अहीर) पहचान के साथ जोड़ा गया है।
  2. पौराणिक प्रमाण: मत्स्य पुराण और पद्म पुराण  के उन अंशों को शामिल किया गया है जहाँ उर्वशी के पूर्व जन्म और उनके 'आभीर' कन्या होने का उल्लेख है।
  3. वंशावली का उल्लेख: आयु, नहुष और ययाति की चर्चा करते हुए इसे यादव वंश के उदय की भूमिका के रूप में दर्शाया गया है।
  4. वैष्णव कुल: पूरे संवाद में 'वैष्णव वर्ण' और 'गोप जाति' की मर्यादा और गरिमा को बनाए रखा गया है।

ध्वनि का प्रयोग करें, जिससे श्रोता विज़ुअलाइज़ (कल्पना) कर सकें।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें